जीवनवृत्त
1. नाम : डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव
2. जन्मतिथि : 21 अक्टूबर 1954
3. शैक्षिक योग्यता : बी0एड0, एम0एससी0, पीएच0 डी0 (रसायन विज्ञान)
4. साहित्यिक उपलब्धियाँ :
* वर्ष 1975 से कहानी ‘काँटों की राह’ से साहित्यिक यात्रा प्रारम्भ, कहानी ‘स्वतन्त्र भारत’ द्वारा प्रायोजित प्रतियोगिता 1976 में पुरस्कृत।
* कुछेक बालकथाएँ एवं दो विज्ञानकथाएँ रचित।
* विज्ञान एवं आध्यात्मिक विषयों पर अनेक आलेख रचित।
* ‘अवध-अर्चना’ त्रैमा0 का प्रबन्धन।
* एक विज्ञानकथा और चार विज्ञान-आलेख ‘विज्ञान’ मासिक एवं ‘विज्ञान-प्रगति’ मासिक में प्रकाशित।
* आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों से सम्बन्धित आलेख ‘अवध-अर्चना’ त्रैमा0 में प्रकाशित।
5. वर्तमान पता : द्वारा विजय रंजन, सम्पा0 ‘अवध-अर्चना’ 4/14/41 ए, महताब बाग, अवधपुरी कालोनी, फेज-2, फैजाबाद (उ0प्र0)
डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव की कहानियाँ
कहानी-1
आनन्द के आँसू
- डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव
सुबह के नौ बज रहे थे। पं0 रघुनन्दन शर्मा ने अपने बेटे के निवास पर पहुँच कर कॉलबेल का बटन दबाने को ज्योंही हाथ बढ़ाया, उन्हें घर के अन्दर कोहराम सा मचा हुआ प्रतीत हुआ। उनका हाथ रुक गया। अनायास ही उनके कान अन्दर से आती ध्वनि पर लग गए।
“ ह्वाट माम ? वुन्ट यू एलाउ मी टु सेलिब्रेट माई बर्थ डे विद द कटिंग ऑफ केक ! केक नहीं कटेगा तो फिर मेरे बर्थ डे सेलिब्रेशन्स में आप करेंगी क्या ? ”
यह उनके ग्यारह वर्षीय पोते रतन की आवाज थी।
“ वही सबकुछ, जो भारतीय रीति-रिवाजों के अनुसार होता है। भगवान् की पूजा-प्रार्थना, फिर तुझे रुचने का टीका लगा कर आशीष देना, बस और क्या ? ” बहू ने शान्त स्वर में हँस कर कहा।
“ दैट सिली कस्टम्स ! ओह माम ! ह्वाई डोन्ट यू अन्डरस्टैण्ड ? इफ आई वुन्ट सेलिब्रेट बर्थ डे एज बिफोर, माई फ्रैण्ड्स विल लॉफ एट मी। बट, डू टेल मी माम ! बर्थ डे पर केक तो मैं हर साल ही काटता हूँ, फिर इस बार क्यों नहीं ? ” रतन की आवाज में आश्चर्य घुला था।
“ बिकाज़ योर ग्रैण्डपा डजन्ट लाइक इट एण्ड ही इज एबाउट टु कम टुडे टु शेयर योर बर्थ डेज़ ज्वॉयज़ ! ”
“ टु शेयर माई बर्थ डेज़ ज्वॉयज़ आर टु शेयर माई बर्थ डेज़ सारोज़ ! ” रतन के स्वर में तीखा आक्रोश और झुँझलाहट थी।
“ बेटे ! अब तक हर वर्ष तेरा जन्मदिन हम तेरी इच्छानुसार मनाते रहे किन्तु ..... आज पहली बार तेरे दादा जी तेरे जन्मदिन पर आ रहे हैं, तो हमें उनकी खुशियों और भावनाओं का भी तो ख्याल रखना चाहिए न। ”
माँ ने बेटे को समझाने की पुरजोर कोशिश की पर बेटा अपने हठ पर अड़ा रहा।
अन्ततः बहू ने सख्त लहजे में कहा, “ यू मस्ट नो, योर ग्रैण्डपा डज़न्ट लाइक ऑल दीज़ थिंग्स एण्ड आल ऑफ अस हैव टु रेस्पेक्ट हिज़ फीलिंग्स, बिकाज़ ही इज़ अवर एल्डर, अण्डरस्टैण्ड ! ”
“ ओह नो माम, नो ! प्लीज़ माम, डू अण्डरस्टैण्ड मी !....प्लीज माम ! आप मेरी प्रेस्टिज़ का कुछ तो ख्याल कीजिए!! ”
कभी फर्राटेदार अंग्रेजी तो कभी धाराप्रवाह हिंग्रेजी में उन दोनों में वाक् युद्ध जारी था।
पं0 रघुनन्दन शर्मा को एकबारगी लगा जैसे वे किसी अजनबी के दरवाजे पर आ गए हैं। उनका अपना बेटा, रतन का पिता, तो ऐसा न था और न ही उन्होंने उसकी शादी किसी अंग्रेज लड़की से की थी। फिर उनका पोता ? क्या इसका कारण सिर्फ यह था कि वह एक ईसाई मिशनरी के स्कूल में पढ़ रहा था ?
गाँव से बहुत सुबह से ही कष्टकारी यात्रा करके जिसके जन्मदिन पर खुशियाँ मनाने वे यहाँ तक आए हैं, यदि वही उनके कारण दुःखी और असन्तुष्ट रहा, तो फिर .... ? क्या उन्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था ? वे दुविधा में पड़ गए।
अभी वे ‘ उल्टे पैर वापस गाँव लौट जाएँ अथवा नहीं ’ की ऊहापोह में पड़े ही थे कि तभी रतन की आवेश भरी आवाज घर के बन्द दरवाजे को भेदती उनके कानों से टकराई , “ बट , आई बिलीव माम ! यू आर रांग। माई ग्रैण्डपा इज नाइदर एन इल्लिट्रेट पर्सन नार बैकवर्ड ! ही इज द मैन ऑफ माडर्न थॉट्स । आई बिलीव, उन्हें बर्थ डे सेलिब्रेशन्स में मेरे केक काटने से कतई दुःख न होगा। प्लीज़ ! ममा प्लीज !! ” आवेश में बोलते-बोलते रतन पुनः अनुनय-विनय पर आ गया था।
अपने बारे में रतन की धारणा जानकर पं0 रघुनन्दन शर्मा ने अकस्मात् एक निर्णय लिया और वे बिना कॉलबेल बजाए ही वापस लौट पड़े।
पं0 रघुनन्दन शर्मा ने पैतृक गाँव के ही सरकारी प्राइमरी स्कूल के प्रधान अध्यापक के पद से अवकाश प्राप्त किया था। गाँव में उनकी अच्छी जमीन-जायदाद थी। अपने इकलौते बेटे को उन्होंने ऊँची शिक्षा दिलाई थी। आज वह एक ऊँचे सरकारी पद पर आसीन था और पत्नी व बेटे के साथ शहर में रहता था। नौकरी के कारण शहर में रहने वाला और हर 3-4 वर्ष में स्थानान्तरित होने वाला उनका बेटा न तो पैतृक सम्पत्ति की देखभाल कर सकता था और न ही उसकी रक्षा कर सकता था। अतः अवकाश प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने जब तक हाथ-पैर चलते रहें तब तक गाँव में ही रहने का निर्णय लिया था यह सोच कर कि आखिर हाथ-पैर थकने पर तो उन्हें बेटे के दरवाजे पर जाना ही है, अभी से जाकर बेटे-बहू की स्वतन्त्रता में बाधक क्यों बनें !
ऐसा नहीं था कि अबसे पहले वे कभी बेटे-बहू के पास आए नहीं थे। साल-छः महीने में एकाध बार दो-एक रोज के लिए तो वे आते ही थे और छुट्टियों में बेटे-बहू भी गाँव जाते ही थे। हाँ, विशेष तौर पर पोते के जन्मदिन पर वे पहली बार बेटे के घर आए थे।
घर से निकल कर शर्मा जी सीधे बेकरी पर गए। अपने कन्धे पर लटके झोले में रखे घर की गाय-भैंसों के दूध से बने शुद्ध 2 किलो खोये को बेकरी वाले को सौंप कर उन्होंने उसे उससे ही शाकाहारी केक बनाने का आदेश दिया। केक की सजावट के लिए उन्होंने केक पर पौष्टिकता प्रदान करने वाले फल और सब्जियों के चित्र अंकित करने को कहा।
केक तैयार होकर मिलने में दो घंटे का समय था। इस बीच पं0 रघुनन्दन शर्मा बाजार में घूम-घूम कर रतन के लिए एक अच्छी सी पोशाक, मिठाई और घर की सजावट का सामान खरीदते रहे। केक तैयार होने पर वे उसे लेकर घर की ओर चल दिए।
दरवाजा खुलते ही अपने ग्रैण्डपा को एक कन्धे पर सफरी झोला, दूसरे कन्धे पर दो गाँधी झोलों में रतन के लिए उपहार, पोशाक और सजावट का ढेर सा सामान टाँगे और दोनों हाथों से केक के बड़े से डिब्बे को थामे देख कर रतन आश्चर्य के साथ खुशी से उछल पड़ा।
“ ओह, यू ! ग्रैण्डपा विद केक !! हाऊ ग्रेट यू आर ग्रैण्डपा !!! लुक माम ! मैं कहता न था माई ग्रैण्डपा इज़ ग्रेट। ही इज़ नाइदर इल्लिट्रेट नार बैकवर्ड ! ” कहते हुए रतन ने शेकहैण्ड करने के लिए अपना दायाँ हाथ पं0 रघुनन्दन शर्मा की ओर बढ़ा दिया।
बाएँ हाथ से सावधानीपूर्वक केक थाम कर दाएँ हाथ से शेकहैण्ड कर पं0 रघुनन्दन शर्मा ने केक पोते को थमा दिया।
“ यस ! ऑफ कोर्स ! ” कहते हुए उनकी बहू ने आकर उनके पैर छुए और उनका कुशल-क्षेम पूछते हुए उनके स्वागत-सत्कार में जुट गई।
भोजन-आदि से निवृत्त होने के बाद पं0 रघुनन्दन शर्मा ने थोड़े तर्क-वितर्क के बाद केक काटने से पूर्व जन्मदिन की भारतीय रीति-रस्मों को निभाने हेतु रतन को सहमत कर लिया।
दोपहर से ही बहू के साथ पं0 रघुनन्दन शर्मा और रतन मिल कर घर के विशाल बैठक कक्ष को गुब्बारों और झालरों से सजा कर कक्ष को जन्मदिनोत्सव के लिए तैयार करने में ही लगे रहे।
शाम तक सारी व्यवस्था पूरी हो चुकी थी।
एक बड़ा सा दर्पण मँगवा कर जमीन से 3 फुट की ऊँचाई पर बैठक-कक्ष की पूर्वी दीवार पर बीचोंबीच लगाया गया था। दर्पण के नीचे पूजा की चौकी रखी गई थी जिस पर लाल साटन का कपड़ा बिछा कर शिव-पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, श्रीकृष्ण, राम-सीता आदि देवी-देवताओं के बड़े-बड़े चित्र रखे गए थे। चित्रों के आगे शेष चौकी पर चौक बनाई गई थी। चौकी पर एक दीपक रखा गया था और पूजन की सामग्री से भरी थाली रखी गई थी। पूजा की चौकी के पास ही एक मोढ़ा रखा गया था। चौकी के चारों ओर एवं बैठक कक्ष के कोनों और दरवाजे पर फर्श को सुन्दर रंगोली से सजाया गया था। पूजा की चौकी से कुछ दूर एक गोल मेज पर गुलाबी साटन का मेजपोश बिछा कर उसके ऊपर केक रखा गया था। केक के आगे पूजा की चौकी की ओर एक बड़ा सा मोम का दीपक स्टील की एक तश्तरी पर रखा गया था। केक के दाईं ओर केक काटने के लिए एक बड़ा सा स्टील का चाकू रखा गया था। कक्ष में दूधिया रोशनी अपनी छटा बिखेर रही थी और चाँदनी की सी शीतलता का आभास दे रही थी।
रतन ने अपने ग्रैण्डपा द्वारा लाई गई पोशाक पहन रखी थी--- सिर पर राजसी पगड़ी, श्वेत रेशमी अचकन पर सितारों जड़ी लाल-भूरी कोटी, सफेद चूड़ीदार पायजामा और राजसी सज्जा वाले नागरे जूते।
शाम पाँच बजते-बजते रतन के स्कूली दोस्त और पड़ोसियों के बच्चे अपने अभिभावकों के साथ आ गए।
“ हाय ! रतन, यू आर लुकिंग वेरी स्मार्ट ! ”
रतन के एक दोस्त ने रतन से शेकहैण्ड करते हुए कहा जो स्वयं जीन्स और शर्ट में कैद था।
“ यस ऑफ कोर्स । रतन ! यू आर लुकिंग लाइक ए प्रिंस इन दिस फैन्सी ड्रेस ! यह ड्रेस तुम्हें किसने प्रेजेन्ट किया ? ”
बेल-बॉटम से सजी रागिनी की निर्दोष आँखों में प्रशंसा के भाव थे।
“ माई ग्रैण्डपा हैज़ प्रेजेन्टेड इट टु मी । ”
रतन ने कुछ शर्माते हुए कहा। अपनी पोशाक अपने मित्रों द्वारा पसन्द किए जाने पर वह काफी प्रसन्न था।
अधिकांश मेहमानों के आ जाने पर जन्मोत्सव आरम्भ हुआ।
पं0 रघुनन्दन शर्मा ने जन्मोत्सव के शुभारम्भ की घोषणा करते हुए सबको बताया कि आज रतन का बारहवाँ जन्मदिन है और उसने अपने जीवन के विगत वर्षों में न केवल स्कूली पढ़ाई में भरपूर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था वरन् पाठ्यक्रमेतर कार्यक्रमों में भी कर्मठता और जीवन्तता का परिचय दिया था। उन्होंने रतन के विगत जीवन की समस्त उपलब्धियों एवं उसके स्वभावगत सद्गुणों की चर्चा करते हुए उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
तत्पश्चात् जन्मोत्सव में निहित रीति-रिवाजों का क्रियान्वयन आरम्भ किया गया।
सर्वप्रथम देवी-देवताओं के चित्रों के आगे रखे दीप को प्रज्ज्वलित किया गया और फिर उनका पूजन किया गया। रतन ने भी पूजा में हिस्सा लिया।
पूजा के बाद पूजा की चौकी के सामने रखे मोढे पर रतन को बिठा कर रतन की माँ और आमन्त्रित महिलाओं ने रतन के मस्तक पर हल्दी-चूने के मिश्रण से बने रुचने का तिलक लगा कर अक्षत से उसका सत्कार कर उसे आशीर्वाद दिया और उपहार भी दिए।
उसके बाद अपने ग्रैण्डपा के आग्रह पर रतन ने दीप-ज्योति से अगरबत्ती जला कर पूजास्थल की ओर मुँह करके मेज के सामने खड़े होकर केक के सामने स्टील की तश्तरी पर रखे मोम के दीपक की बाती जलती अगरबत्ती की लौ से प्रज्ज्वलित की।
अचानक रतन की नजर सामने की ओर उठ गई। सामने के दर्पण में उसने अपनी जो छवि देखी तो वह आत्मविभोर हो उठा। केक के सामने रखे दीपक की लम्बी भरपूर प्रज्ज्वलित लौ की सुनहरी आभा उसके चेहरे पर अपनी स्वर्णिम छटा बिखेर रही थी। ग्रैण्डपा की दी हुई पोशाक में वह सचमुच एक युवराज लग रहा था जिसका राजतिलक अभी-अभी किया गया हो।
आत्म-मुग्ध हो उसने केक काटने से पहले केक के आगे रखे प्रज्ज्वलित दीप की ज्योति को फूँक मार कर बुझाना चाहा।
अकस्मात् पं0 रघुनन्दन शर्मा ने रतन के मुख पर हाथ रखते हुए कहा, “ न, न , दीप-ज्योति बुझा मत बेटे ! जलती ज्योति तो जीवन्तता, उत्साह, आशा-विश्वास, प्रसन्नता और कर्मठता का प्रतीक है जबकि ज्योति का बुझना मृत्यु, अवसाद, हताशा और कर्महीनता का प्रतीक है। तेरी जीवन-ज्योति भी इसी दीप-ज्योति जैसी ही जीवन्त होकर सबको सुख-शान्ति प्रदायी ज्ञानस्वरूप प्रकाशदायिनी और दुःख व अज्ञान रूप अंधकारहारिणी बने, यही प्रज्ज्वलित दीप की प्रज्ज्वलित ज्योति का अर्थ और सन्देश है। ”
रतन ने आवाक् होकर ग्रैण्डपा की ओर देखा। प्रज्ज्वलित ज्योति का यह अर्थ होता है ! - यह उसे पता न था। उसके मुख पर गहरा आश्चर्य फैला था।
कुछ क्षण पश्चात् “ ओह सारी ! ...... याह, आई सी ग्रैण्डपा ! ” कहते हुए रतन ने मुस्करा कर केक को काटा।
जन्मदिनोत्सव के हर महत्त्वपूर्ण क्षण को अविस्मरणीय बनाने के लिए रतन के पापा ने कैमरे से रतन के ढेर सारे चित्र खींचे।
रतन के द्वारा केक काटते ही ‘ हैप्पी बर्थ डे टु यू ! हैप्पी.....’ कहते हुए बच्चे सजावट में लगे गुब्बारों को फोड़ने के लिए गुब्बारों की ओर लपके परन्तु तभी पं0 रघुनन्दन शर्मा ने हाथ के संकेत से सबको शान्त रहने का आग्रह करते हुए मधुर स्वरों में स्वरचित वह गीत गाना शुरु किया जिसे इस अवसर पर गाने के लिए उन्होंने खास तौर पर रतन के लिए लिखा था।
“ आज हुए तुम रतन ग्यारह बरस के !
जियो बनो तुम रतन सौ-सौ बरस के ....! ”
मुस्कराती आँखों से आशा भरी निगाहों से रतन को देखते हुए पं0 रघुनन्दन शर्मा भावपूर्ण आवाज में गीत गाते जा रहे थे। गीत का हर शब्द रतन के लिए उनकी आत्मा की गहराईयों से उनके हृदय में उमड़ते गहन आशीर्वाद से ओत-प्रोत था।
सभी मन्त्रमुग्ध होकर उनके गीत को सुन रहे थे। गीत का हर एक शब्द अपने गहन, विशाल और जीवन्त अर्थ के साथ न केवल रतन वरन् वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को सार्थक जीवन जीने का सन्देश व प्रेरणा देते हुए उनकी आत्मा में उतरता जा रहा था।
वातावरण में एक अद्भुत लावण्यमयी सम्मोहक शान्ति बिखरी थी जिसके बीच गूँज रहे थे तो बस पं0 रघुनन्दन शर्मा के जीवन्त मधुर स्वर।
रतन के स्मृति-पटल पर अपनी बीती जन्मदिनपार्टियों के दृश्य उभर आए-
पैण्ट-शर्ट में नेक टाई लगाए रतन, जीन्स-टॉप में सजा रतन, कटा हुआ केक, बुझी-निस्तेज अस्त-व्यस्त पड़ी मोमबत्तियाँ, फटे गुब्बारों के टुकड़ों से पटा पड़ा कमरे का फर्श, बिखरी सजावट वाली बिलखती दीवारें, बच्चों के मुख से यन्त्रवत् निकलते शब्द- ‘ हैप्पी बर्थ डे टु .....!’, टू-इन-वन में बजते कैसेट से निकलते बेजान से शब्द ‘हम भी अगर बच्चे होते....’ या ‘बार-बार ये दिन आए ..... तुम जियो हजारों साल .... सुनीता हैप्पी बर्थ डे टु यू ! ’...... और फिर ‘काँटा लगा... !’ जैसे कनफोड़ू संगीत वाले गीतों पर थिरकते उसके मित्र .....और ....!
लेकिन वे सब आज के उत्सवी माहौल के समक्ष फीके और प्राणहीन थे। उन जन्मदिनपार्टियों में रोमांच, जोश, मस्ती, स्वच्छन्दता .......... सबकुछ था किन्तु अगर कुछ नहीं था तो वह रतन था।
दूसरी ओर, आज के जन्मदिन का हर पल रतन के लिए था; घर के कण-कण में रतन था; सबकी आँखों में रतन था। सबके मन में रतन था और वातावरण में थी रतन के उज्ज्वल भविष्य के लिए सबके हृदयों में उमड़ती शुभकामनाएँ व आशीर्वाद की सम्मोहनी सुगन्ध।
सच तो यह था कि जो मानसिक सन्तुष्टि और आत्मा की गहराईयों तक छू लेने वाला अद्भुत आनन्द उसे आज अनुभव हो रहा था, वह आज से पहले उसे अपने किसी भी जन्मदिन पर कभी अनुभव नहीं हुआ था। जो जीवन-दृष्टि उसे आज मिली थी, वह उसे पहले कभी नहीं मिली थी।
रतन पर जैसे एक शुभ्र सम्मोहन सा छा गया था। अनायास ही रतन ने प्रसन्नता व आत्मतुष्टि से भरी हँसती आँखों से माँ को देखा, मानों कह रहा हो, “ आई अण्डरस्टैण्ड माम ! इण्डियन कस्टम्स आर नॉट सिली कस्टम्स ! दे आर फुल ऑफ डिवाइन सेन्स, डिवाइन फीलिंग्स एण्ड डिवाइन प्लेजर !!”
अपने अतीत में गोते लगाता और ग्रैण्डपा के गीत को सुनता रतन वर्तमान के झूले में अभी झूल ही रहा था कि पं0 रघुनन्दन शर्मा ने एक अन्य गीत गाना शुरु कर दिया जो उसकी माँ को सम्बोधित करते हुए था किन्तु जिसकी हर पंक्ति और हर शब्द केवल रतन के लिए ही था।
“ शत-शत जीवे रतन तेरा ऽ ऽ !
सत्कर्म करे हर साल, माई री, ऐसो बने तेरो लाल ऽऽ !! ”
गीत समाप्त होने पर पं0 रघुनन्दन शर्मा के शान्त होते ही सभी बच्चों ने जोरदार ढंग से ताली बजाई मानों वे गीतों में निहित भावों का पुरजोर समर्थन कर रहे हों। उनकी आँखों में जन्मदिन के प्रेरणादायी उत्सवी वातावरण के सम्मोहन के साथ रतन के दादाजी के लिए गहन आदर के भाव साकार थे।
“ तो क्या ग्रैण्डपा के मन में उसे लेकर इतने ऊँचे सपने हैं ! ” मन ही मन कहता हुआ रतन अपने ग्रैण्डपा के प्रति गहरे आदर व श्रद्धा से अभिभूत हो उठा।
“ दादा जी ! ” कहते हुए भाव-विह्वल रतन अपने ग्रैण्डपा के चरण छूने के लिए उनके पैरों पर झुक गया।
पं0 रघुनन्दन शर्मा ने पोते को उठा कर कलेजे से लगा लिया। उनकी आँखों से दो बूँद आँसू चू पड़े लेकिन वे आँसू किसी दुःख के आँसू नहीं थे वरन् नई पीढ़ी के मन में बैठाई गई अपसंस्कृति पर भारतीय संस्कृति की विजयानुभूति से उत्पन्न आनन्द के आँसू थे।
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कहानी-2
काँटों की राह
- डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव
“ सौरभ कुछ भी सोच नहीं पा रहा है। उतरती रात उसके मन-मस्तिष्क पर छाई जा रही है। खिड़की की सलाखें पकड़े वह आँखें फाड़े बाहर की ओर देख रहा है। वृक्ष, मकान, दृश्य अंधकार के शिकंजे में फँस कर अपना रंग-रूप खो चुके हैं। सौरभ को लग रहा है जैसे वह खुद भी अंधकार में डूब कर उसका एक अंग बन चुका है। ”
“ रतन ! ” माँ ने अन्दर से आवाज लगाई।
“ आज तुझे कालेज नहीं जाना ? दस बज रहे हैं। ”
पराग की ‘अँधेरे की ओर’ शीर्षक कहानी में डूबा रतन एकाएक माँ की पुकार से चौंक पड़ा।
“ जरूर जाऊँगा माँ, अभी आया ! ”
कहने के साथ ही फिर उसी कहानी में रम गया वह।
कहानी के नायक सौरभ ने किया एक क्रान्तिकारी संकल्प-- अँधेरे में प्रकाश भर देने का और झूठ को परास्त कर देने का संकल्प।
अद्भुत रोमांच से सिहर उठा रतन। उसकी आँखें नम हो आईं।
हाँ, बिछी बाजी को मात देने के लिए मोहरों को पीटना ही होगा, अन्याय और अधर्म को जीतने के लिए शरीर में रक्त की जगह बिजली भरनी ही हो़ेगी।
उसे लगा अपना मार्ग प्रशस्त करने के लिए, वर्षों से सँजोए सपनों को साकार करने के लिए उसे भी सौरभ सा ही क्रान्तिकारी कदम उठाना होगा।
वर्षों से सँजोए स्वप्न ...... । उसके स्मृतिपटल पर अतीत के पृष्ठ एक-एक करके खुलने लगे।
सोलह वर्ष की अवस्था में ही हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त करने के बाद जब उसने इन्टर की परीक्षा में भी 80 प्रतिशत अंक प्राप्त किए तो कालेज के प्रिंसिपल साहब ने उसे गले से लगा लिया था। गर्व से छाती फूल उठी थी उनकी रतन की सफलता को देख कर।
रतन पढ़ने लिखने में ही नहीं, वरन् खेलकूद और साहित्य-लेखन में भी अपार रुचि रखता था। धार्मिक एवं विज्ञान विषयों पर अनेक वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में वह पुरस्कार जीत चुका था और विज्ञान प्रदर्शनी में भी स्वनिर्मित मॉडल प्रदर्शित कर दर्शकों को चकित कर चुका था।
अनायास ही प्रिंसिपल साहब के मुख से निकला था-- “ रतन ! तू एक दिन अवश्य ही बड़ा आदमी बनेगा। तू सचमुच ही भारत का रतन है। तुम जैसे ही नवयुवकों पर ही भारत का सुखद भविष्य निर्भर है। ”
टन्....टन् ....टन्... ! घड़ी ने पूरे दस बजा दिए।
अरे ! दस बज गए और 11 बजे उसे कालेज पहुँच जाना है। अभी तो उसने स्नान तक नहीं किया। खाना भी नहीं खाया। रतन हड़बड़ा कर उठ पड़ा और बोझिल कदमों से स्नानगृह की ओर चल पड़ा।
तब उसका मन कितने हर्ष, गर्व, आत्मविश्वास व असीम उत्साह से भर उठा था, उसने सोचा। वह भी अपने देश के काम आ सकता है, सोच कर कितनी सुखपूर्ण अनुभूति हुई थी उसे !
वह अवश्य ही ऐसी योग्यता व क्षमता हासिल करेगा जिससे वह दीन-दुःिखयों के आँसू पोंछ सके, उनकी पीड़ा पी सके, गुमराहों को सच्ची राह बता सके और विश्व को नर-रत्न दे सके--- उसने उसी क्षण संकल्प किया था और फिर पूरे उत्साह, लगन और शक्ति से जुट पड़ा था वह अपने लक्ष्य की पूर्ति में।
बड़ा ही सोच-विचार कर उसने बी0एससी0 प्रथम वर्ष में दाखिला लेने का इरादा छोड़ प्रीमेडिकल टेस्ट में बैठने का निश्चय किया और कोचिंग कालेज ज्वाइन कर लिया। डॉक्टरी का पूरा कोर्स करने के बाद किसी मेडिकल कालेज में अध्यापन करने की कितनी बड़ी लालसा लिए था वह अपने मन में।
बड़ा ही कष्ट होता था उसे सुन कर कि डॉक्टर की लापरवाही के कारण मरीज की हालत इतनी बिगड़ गई कि वह चल बसा, डॉक्टर की फीस न दे पाने के कारण अमुक रोग का रोगी इलाज के अभाव में मर गया।
क्या इन लोगों के हृदय नहीं होता ?-- वह सोचा करता। इन्हें तो सहानुभूति का अवतार होना चाहिए।उनका ध्यान रोगी के रोग की ओर पहले होना चाहिए और अपनी सुख-सुविधा की ओर बाद में।
तभी उसे डॉक्टर अंकल की याद आ जाती--- लम्बा चेहरा, चौड़ा माथा, बड़ी-बड़ी स्नेह भरी आँखें, रौब भरी शान्त मुखमुद्रा। कर्णप्रिय आवाज में जब वह कुछ कहते तो मानों मुँह से फूल झरते। व्यवहार इतना आत्मीय कि रतन को लगता कि रोगी का आधा रोग तो वे अपने मधुर व्यवहार से ही दूर कर देते होंगे।
वह भी तो एक डॉक्टर हैं। वहीं से पढ़ कर निकले हैं। उनमें तो वह क्रूरता, स्वार्थपरता और धन-लोलुपता नहीं है।
रैगिंग के किस्सों को तो याद करके वह घृणा से भर उठता ! मेडिकल कालेज की रैगिंग से तंग आकर अमुक ने कॉलेज छोड़ दिया अथवा फाँसी लगा ली। ऐसे समाचारों से उसे असीम व्यथा होती।
अवश्य ही कहीं पर कोई कमी है। वह इस कमी को दूर करेगा--- वह निश्चय करता।
नहा कर कपड़े पहनते हुए रतन ने गहरी साँस भरी।
पूरा एक वर्ष उसने गुजार दिया था अपने संकल्पों के योग्य अपने आपको बनाने में।
किन्तु अब एकाएक उसके जीवन में एक ऐसा झोंका आया, जो उसके समस्त स्वप्नों को धूमिल कर उसके उत्साह पर निराशा की काली स्याही पोत गया।
सप्ताह भर पहले के रतन और अबके रतन में कितना फर्क आ गया है। जिस कालेज में जाने में वह कभी अरुचि अनुभव नहीं करता था, जहाँ के अध्यापकों की स्मृति मात्र ही उसे प्रसन्नता से भर देती थी, जो मार्ग उसके लिए आत्मीय से बन गए थे, आज वहीं जाने में उसेे झिझक होती है ! यह उसे क्या होता जा रहा है ?
‘टन् !’
अरे, साढ़े दस बज गए !
“ माँ , मुझे खाना दो। ” रतन ने कहा और रसोई में जाकर बैठ गया।
सदा की भाँति माँ खाना बनाने में व्यस्त थी।
“ सुषी कहाँ है माँ ? दिखाई नहीं देती। ”
“ अभी स्कूल से कहाँ आई ? सुबह तू ही तो उसे स्कूल छोड़ कर आया था। भूल गया क्या रे ? ”
मैं भी पूरा गधा हूँ ! खीझ उठा रतन स्वयं पर। सुषी तो साढ़े बारह के पहलेे कभी घर नहीं आती। इतनी साधारण सी बात भूल कैसे गया मैं ?
माँ ने खाना परोसा और रतन के सामने थाली रख दी।
“ क्या बात है ? आज तू बड़ा अनमना है रे ? ”
माँ ने गौर से उसे देखते हुए पूछा।
“ नहीं तो, कुछ भी तो नहीं। ”
रतन सिर झुकाए खाना खाने लगा।
उसके मन में उथल-पुथल फिर शुरु हो गई।
ये आजकल के छात्रों को क्या होता जा रहा है ? न जाने कहाँ से गन्दी-गन्दी हरकतें सीख लेतेे हैं और फिर उनकी गन्दी हरकतें, आवारागर्दी उन्हीं तक सीमित रहती तो भी एक बात थी। उनकी चपेट में तो अब अच्छे और सीधे-सादे छात्र भी आने लगे हैं !
वह तो सोचता था, किसी की बुराईयों से उसे क्या लेना-देना ? वह तो अपनी ही सीधी सच्ची राह पर चलता रहेगा। खूब पढ़ेगा, योग्य बनेगा। देश और जाति का मान बढ़ाएगा। जब वह किसी का अहित न करेगा तो भला कोई उसे हानि पहुँचाने की बात क्यों सोचेगा ?
पर वह नहीं जानता था कि आजकल दुनिया में ऐसे लोग अधिक हैं जो नहीं चाहते कि कोई दूसरा आगे बढ़े और सुख-शान्ति से जीवन गुजारे। दूसरों को कष्ट पहुँचा कर ही उन्हें शान्ति मिलती है। दूसरे के आँसुओं पर ही उनकी मुस्कान खिलती है।
उस दिन वह कालेज में मध्यावकाश के समय लान में खड़ा गुलाब की लालिमा पर मुग्ध हो रहा था कि .....!
“ कहो रतन ! क्या हाल-चाल हैं ? ”
अचानक एक अपरिचित मुख से अपना नाम सुन कर उसका ध्यान भंग हुआ था। उसने नजरें घुमा कर इधर-उधर देखा।
तभी उसके पीछे से दो लड़के निकल कर उसके सामने आ गए।
रतन ने ध्यान से देखा। उससे डेढ़-दो बालिश्त ऊँचे क्रूर से दिखने वाले वे लड़के उसे गुण्डे प्रतीत हुए।
दोनों में से एक छोटा था। रंग गेहुआँ, बिल्ली सी छोटी-छोटी चमकती आँखें, गोल चेहरा, मोटी सी नाक और नीचे का ओंठ नीचे की ओर लटका हुआ। दूसरा उससे कुछ बड़ा था। साँवला रंग और मोटे शरीर वाले उस लड़के के रंग-ढंग भी रतन को ठीक न जँचे।
दोनों ने कीमती वस्त्र पहन रखे थे। वे अपने को सभ्य प्रकट करने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे।
इनको मुझसे क्या काम हो सकता है ? मैंने इन्हें पहले तो कभी नहीं देखा। रतन ने स्वयं को सावधान किया।
“ क्या सोच रहा है यार ? हम तेरे पुराने दोस्त हैं। ” छोटे ने कंधे उचकाते हुए कहा, “ इनका नाम चन्द्रप्रकाश उर्फ चन्दू है और मैं रामप्रकाश हूँ, पर प्यार से लोग मुझे रामू ही कहते हैं। ”
“ ठीक हूँ। ” रतन ने घड़ी देखते हुए उपेक्षापूर्वक संक्षिप्त उत्तर दिया।
“ क्यों रे, पढ़ाई-वढ़ाई तो ठीक चल रही है ना ? अब तो परीक्षा होने में बहुत कम समय रह गया है। ” बड़े ने अपनी आवाज में शक्कर घोलते हुए कहा।
“ हाँ, अब सबको मन लगा कर पढ़ना चाहिए। ” कहते हुए रतन ने क्लास रूम की ओर कदम बढ़ाए। वह शीघ्र से शीघ्र उनसे दूर हो जाना चाहता था।
उसे बड़ा ही अजीब लग रहा था। ये लोग आखिर कहना क्या चाहते हैं ?
रतन के एकाएक चल देने से छोटे ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं और अपने साथी की ओर देखा।
“ चुप बे ! ” चन्दू ने धीरे से कहा और उसका हाथ दबाया तो रामू का खुला मुँह तुरन्त बन्द हो गया।
“ क्लास में जा रहे हो, डियर ? ”
“ अच्छा, हम भी चलते हैं। बॉय...बॉय ! ” दोनों गेट के पास वाले रूम की ओर बढ़ गए थे तो रतन ने चैन की साँस ली थी।
अब वह इन्हें जरा भी लिफ्ट नहीं देगा, रतन ने निश्चय किया था।
फिर दो-तीन दिन तक उनके दर्शन न हुए तो रतन उनकी ओर से निश्चिन्त हो गया था।
लेकिन कल कालेज से घर लौटते समय उन्होंने एक पार्क के पास उसे फिर घेरा था। रतन तो कन्नी काट जाना चाहता था पर ........ !
“ सुन तो यार, अच्छा एक बात बता। तेरे पापा तो साधारण अध्यापक ही हैं। कितनी तनख्वाह मिलती है उन्हें ? ” कहते हुए रामू ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया था।
‘पापा’--- यह शब्द रतन के मन को कचोट सा गया था। स्मृतिपटल पर साँवली किन्तु तेजपूर्ण मुखाकृति उभर आई थी।
“ पापा तो आज से चार वर्ष पूर्व ही स्वर्गवासी हो गए थे। ” रतन भरे गले से बोला था। उसकी आँखें सजल हो गई थीं।
“ अच्छा-अच्छा। हम यह न जानते थे वरना यूँ तेरे मन को न दुःखाते। क्यों चन्दू ? ” रामू ने अपना स्वर सहानुभूतिपूर्ण बनाते हुए कहा था।
“ हाँ, और क्या ? अच्छा, तो फिर तू डॉक्टरी कैसे पढ़ेगा ? क्या तेरी माँ के पास इतना पैसा है ? ”
चन्दू ने ऐसे सहानुभूति दर्शाई थी कि रतन का अपने पर वश नहीं रहा था। उन्होंने उसकी दुःखती रग पर हाथ रख दिया था। उसका मन उदास हो उठा। माँ के पास इतना पैसा कहाँ है कि वह उसकी पढ़ाई का खर्च उठा सके। दो-एक ट्यूशन करके, दूसरों के कपड़े सिल कर व कढ़ाई-बुनाई करके वह नामालूम किस मुश्किल से घर की गाड़ी खींच रही है। उसके नाना जी की सारी पेंशन तो घर के किराया देने में ही चुक जाती है। अपनी ट्यूशन की कमाई से वह केवल अपनी और बहन की पढ़ाई वगैरह के खर्च का प्रबन्ध ही कर पाता है।
“ माँ के पास पैसा नहीं तो क्या हुआ, मैं सरकार से कर्ज लेकर पढ़ूँगा। ”
रतन ने सहज होने की कोशिश की थी।
“ पढ़ते-पढ़ते तो तूने अपने जीवन के 17 वर्ष गुजार दिए और पढ़ कर तू अभी तक किसी लायक न हुआ। अब 5 वर्ष की पढ़ाई तू कर्ज लेकर करेगा ? ” चन्दू ने आश्चर्य से आँखें फैलाई थीं।
“ फिर दो-तीन साल तक नौकरी ढूँढता फिरेगा। फिर से कर्ज लेकर अपना खर्च चलाएगा। कर्ज का बोझ भी बढ़ाएगा और सूदखोर सरकार से सूद भी बढ़वाएगा। ” रामू ने पलकें झपकाई थीं।
“ आधी उमर तो कर्ज उतारने में ही बिता देगा। जिन्दगी का लुत्फ न खुद उठाएगा और न ही माँ-बहन को उठाने देगा। ”
चन्दू ने भौंहें सिकोड़ कर रतन को हिकारत से देखा था।
दोनों एक के बाद एक बोलते जा रहे थे और रतन हतप्रभ सा कभी चन्दू की ओर देख रहा था तो कभी रामू की ओर।
“ पर तू चाहे तो तुझे इन सभी परेशानियों से एक सेकण्ड में छुटकारा मिल सकता है। फिर न तुझे ही अपनी और अपनी बहन की पढ़ाई की चिन्ता करने की आवश्यकता रह जाएगी और न ही तेरी माँ को दिन-रात रोटी की चक्की में पिसना पड़ेगा। ” रामू बोला था।
“ फिर तेरे पास भी हमारे जैसे ही कीमती वस्त्र होंगे। अँधेरी कोठरी और सीलन भरे दालान की जगह एक सुन्दर बंगला होगा। ” चन्दू ने उसे मानों दिलासा दिया था।
क्या ‘फिसलने से पहले’ कहानी के सुकान्त और जयन्त के समान ये भी मुझसे अपने किसी बॉस का कोई गलत काम करवाना चाहते हैं ? रतन की सद् बुद्धि जागी थी।
रतन ने उत्सुकतापूर्ण आँखों से उनकी ओर देखा था मानों देखने मात्र से ही वह उनके मनोगत भावों को पढ़ लेगा।
“ कैसे ? ” रतन पूछ ही बैठा था।
“ अगर तू इसके बदले में पी0एम0टी0 की परीक्षा दे दे तो। ” चन्दू ने रामू की ओर इशारा करते हुए कहा था।
“ क्या मतलब ?----- मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा। ” रतन स्तब्ध रह गया था ।
“ मतलब कुछ खास नहीं है। यहाँ की कोचिंग में तू भी एक वर्ष पढ़ा है और यह भी। इन्टर तू भी पास है और सेकण्ड डिवीजन में ही सही, इन्टर की परीक्षा इसने भी पास की है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि पी0 एम0 टी0 की परीक्षा में यह शायद न आ सके, पर तू अवश्य आ जाएगा। यदि तू इसके बदले में इसके प्रवेशपत्र एवं अनुक्रमांक के साथ परीक्षा दे दे, तो इसे भी डॉक्टरी में प्रवेश मिल जाएगा। प्रवेशपत्र पर परीक्षार्थी की फोटो तो लगी होती नहीं। सो तू चाहे तो बड़ी आसानी से तू रामू के स्थान पर परीक्षा दे सकता है। ” चन्दू ने विस्तार से अपनी बात समझाई थी।
” हूँ ऽऽ! अब समझा। कितना अनुचित और अन्याय पूर्ण काम करवाना चाहते हैं ये मुझसे। ” रतन का मन घृणा से भर गया था।
“ और मेरा यह वर्ष खराब न चला जाएगा ? एक चांस व्यर्थ न हो जाएगा ? ” रतन ने उन्हें घूरते हुए कहा था।
“ अरे, तेरे लिए तो पी0 एम0 टी0 में आना बाएँ हाथ का खेल है। तेरे लिए चांस-वांस क्या चीज है यार। तू इस वर्ष न सही अगले वर्ष दाखिला ले लेना। तुझे इससे फर्क ही क्या पड़ेगा ? ” यह चन्दू की आवाज थी।
“ और फिर हम तुझसे यह काम मुफ्त में थोड़े ही करवाएंगे। इसके लिए तुझे मालामाल कर देंगे। फिर तुझे पढ़ाई के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ेगा। ” रामू ने उसे सब्ज-बाग दिखाने आरम्भ किए थे।
“ तू सबल है रतन। सबलों को निर्बलों का साथ देना ही होगा। सोच ले, कितने पुन्न का काम होगा कि तू अपने साथ एक अन्य को भी डॉक्टर बना देगा। ” चन्दू ने उसे फुसलाने की चेष्टा की थी।
रतन चुप था। नकल करके, रिश्वत देकर और सोर्स द्वारा परीक्षा में पास होने की न जाने कितनी वारदातें वह सुन चुका था, पर बिना परीक्षा में उपस्थित हुए परीक्षा में पास होने का ऐसा भी कोई तरीका हो सकता है ? वह आश्चर्यचकित था।
“ अच्छा, तू खूब सोच लेना। परीक्षा होने में अभी एक सप्ताह का समय है। अपना निर्णय हमें शीघ्र बताना। हम अधिक इन्तजार नहीं कर सकते। ” कहते-कहते चन्दू का स्वर तीखा हो गया था।
वे उसे अकेला छोड़ कर चले गए थे।
तबसे रतन अजीब उलझन में पड़ गया था। वह क्या करेे उसे समझ में कुछ नहीं आ रहा था। इन्कार करने पर हो सकता है कि वे उसे या उसके परिवार को हानि पहुँचाएँ या उसे ही परीक्षा न देने दें और उसकी वर्ष भर की तपस्या पर पानी फेर दें।
रतन ने एक बार काम में व्यस्त माँ को निराशा भरी दृष्टि से देखा और थाली पर से उठ पड़ा।
“ अगर कोई व्यक्ति किसी विकट परिस्थिति में घिर जाने पर भी अपना मन शान्त रखे तो उस परिस्थिति से उसके सुरक्षित निकल आने की बड़ी संभाावना है। ” एक बार उसके अध्यापक ने कहा था, उसे याद आया। उसने अपने को कुछ हल्का अनुभव किया।
इस समस्या का इलाज वह फिर फुरसत से सोचेगा। देखें आज उनके क्या रंग-ढंग हैं ? रतन ने सिर को झटका दिया।
“ मैं जा रहा हूँ, माँ ! ” उसने कहा और पुस्तकें समेट कर चल दिया।
सूर्य डूब चुका है। संध्या का धुँधलका फैलता जा रहा है। छत पर बैठे रतन को लग रहा है-- चन्दू और रामू के शिकंजे में जकड़ कर वह भी गहन अन्धकार में डूब कर अपना अस्तित्व, अपना रूप-रंग खोता जा रहा है। वह तो सदा अँधेरे में प्रकाश भरने की बात सोचता था, पर आज वह स्वयं गहन अंधकार से घिर गया है। परीक्षा में सिर्फ 5 दिन शेष रह गए हैं। दैव कैसा क्रूर खेल खेल रहा है उसके साथ ! वह किससे मदद माँगे ?
“ हरे राम ! हरे राम ! अरे सुषमा बिटिया, तेरी माँ कहाँ है ? आज अभी तक रतन नहीं आया क्या ? ”
रतन की नजरें घर में प्रवेश करते आगन्तुक वृद्ध पर गड़ गईं। पापा की मृत्यु के बाद पिता की छवि अपने नाना में ही पाई थी उसने। एक दिन भी पापा की कमी न महसूस होने दी थी उन्होंने। अपना सब कुछ अर्पण कर दिया था उन्होंने उसका जीवन सँवारने और अपनी इकलौती बेटी के आँसू पोंछने में।
रतन सोचता ही जा रहा है। नाना जी के जीवन की संध्या भी आ रही है। आखिर कब तक सहारा देते रहेंगे वे ? उनके ढह जाने पर सहारा कौन देगा ? क्या उसे बिना समय नष्ट किए अपनी पढ़ाई पूरी कर अपने पैंरों पर खड़े होने का प्रयास नहीं करना चाहिए ?
वह पुनः सोचने लगा। यदि वह रामू-चन्दू को इन्कार कर दे तो वे उसका जीवन बर्बाद करने में कुछ कसर न उठा रखेंगे। लेकिन उनके ही अनुसार कार्य करने पर यदि परिणाम उनके अनुकूल न हुआ तो ? तब क्या वह उनके क्रोध से बच सकेगा ? क्या वह उनकी धमकियों से डर जाए ? अन्याय के आगे घुटने टेक दे ? या फिर .....
हे भगवान् ! तू ही मुझे मार्ग दिखा।
रतन बेचैन हो उठा। वह छत की दीवार के सहारे खड़ा हो गया। सिर को हथेली से टिका कर वह सामने फैले अन्धकार में ढलते धुँधलके में आँखें फाड़-फाड़ कर देखने लगा मानों रोशनी की किरण ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा हो।
नहीं ! वह उनके मनसूबों को पूरा नहीं होने देगा। मिट जाएगा पर अन्याय के आगे सिर नहीं झुकाएगा।
रतन की मुखमुद्रा कठोर हो गई। उसने मुट्ठियाँ भींच लीं।
वह परीक्षा-केन्द्र के व्यवस्थापक से मिलेगा और उन दुष्टों को उनकी दुष्टता का फल चखा कर ही छोड़ेगा।
“ तूने क्या तय किया है रतन ? ”
उसे तलाशती हुई माँ छत पर आकर कब से उसके पास खड़ी उसकी उद्विग्नता को परख रही थी, रतन को इसका ख्याल न था।
“ मेरी सलाह मान। उनके कहे के अनुसार ही कर दे। ”
माँ उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरने लगी।
“ तेरा एक वर्ष ही तो बर्बाद होगा। समझ ले तेरी उमर अभी उस टेस्ट के लायक न है। ”
उसकी आँखें गीली हो गईं। वह अटकते हुए बोली, “ बेटा, जमाना खराब है। आजकल किसी से दुश्मनी लेना ठीक नहीं है। ”
माँ की बात का कोई उत्तर नहीं दिया रतन ने। एकटक वह देखता रह गया उसे।
जबसे उसने माँ को वह घटना बताई है, माँ अत्यन्त भयभीत और चिन्तित हो उठी है। वह उसे विवश करने लगी है अन्याय और दुष्टता को चुपचाप सह लेने के लिए।
“ तू समझती क्यों नहीं माँ ! अन्याय के आगे झुक जाना समस्या का हल नहीं है। क्या तू समझती है कि बात इतने पर ही समाप्त हो जाएगी ? आज ये लोग मुझे अपने बदले परीक्षा देने के लिए बाध्य कर रहे हैं, तो कल किसी और काम के लिए भी विवश कर सकते हैं। क्या मैं उनके हाथ की कठपुतली बन जाऊँ ? ”
“ और अगर तू उनकी बात न मानेगा तो क्या वे शान्त होकर बैठ जाएंगे ? कहीं क्रुद्ध होकर ......” माँ रो पड़ी।
“ अगर तुझे या सुषी को कुछ हो गया तो ......” इसके आगे वह कुछ न बोल सकी।
माँ के शब्दों ने बिजली सा छू लिया रतन को। वह पलट कर सीधा खड़ा हो गया।
“ और अगर रामप्रकाश के बदले परीक्षा देने पर भी उसका दाखिला न हुआ तब भी क्या मुझे और सुषी को कुछ नहीं हो सकता माँ ? ”
माँ स्तम्भित रह गई।
“ नहीं माँ , नहीं ! मैं ऐसा हरगिज नहीं करूँगा। अन्याय के आगे नहीं झुकूँगा। तुझे हमारे प्राणों की चिन्ता है माँ, पर अनिष्ट की आशंका किस राह में नहीं है ? गुलाब को चुनने के लिए काँटों की पीड़ा तो सहनी ही होगी ! ” रतन का स्वर दृढ़ था।
धीमे स्वर में पुनः बोला वह , “ और इसके लिए माँ, तुझे भी आज रतन का जीवन दान करना ही होगा......आगे भी करना होगा। ”
“ नहीं, रतन नहीं...... ” रोती हुई माँ कहती ही रह गई।
रतन तेजी से चल पड़ा परीक्षा-केन्द्र के व्यवस्थापक से मिलने के लिए। रतन ने काँटों की राह चुन ली थी।
रतन तेजी से चल पड़ा परीक्षा-केन्द्र के व्यवस्थापक से मिलने के लिए। रतन ने काँटों की राह चुन ली थी।
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कहानी-3
जनम
- डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तवआज सुबह से ही घर में उत्सव का सा माहौल है जैसे कोई खास बात हो, लेकिन वह खास बात क्या है ? - माधवी को नहीं मालूम। उसने भइया से पूछा। इस बारे में भइया को भी कुछ नहीं मालूम।
माधवी रसोई में गई। उसने देखा आज चूल्हे पर चावल नहीं पक रहा है। दाल भी नहीं बनी थी। दादी सरौते से मखाना काट रही हैं। उनके आगे रखी थाली में गरी और छुहारा रखा है। मखाना काटने के बाद शायद वे गरी और छुहारा भी काटेंगी। बुआ आटा जैसा कुछ छान रही हैं। उसने चलनी के नीचे अपना हाथ लगा कर छनती वस्तु को हाथ में लेकर देखना चाहा।
“ अरे... रे ! छुओ मत ! गन्दा हो जाएगा। ” बुआ ने डाँटा।
माधवी ने अपनी दोनों हथेलियाँ देखीं। हथेलियाँ तो साफ हैं ! फिर बुआ ने ऐसा क्यों कहा ? उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आया।
“ बुआ ! बुआ ! ! थोड़ा सा आटा दे दो। मैं चिडि़या बनाऊँगी। ” माधवी ने बुआ को छनी हुई चीज को आटे की तरह गूँथते हुए देख कर अनुनय की।
“ इस आटे की चिडि़या नहीं बनती। ” बुआ ने उत्तर दिया।
“ क्यों ? ”
“ क्योंकि यह गेहूँ का आटा नहीं है, सिंघाड़े का आटा है। ”
“ क्या आज इसकी रोटी बनेगी ?” माधवी को आश्चर्य हुआ।
“ नहीं ! इसकी रोटी नहीं बनती। इसकी पूड़ी बनती है। आज रोटी नहीं बनेगी।” बुआ हँस पड़ीं।
“ क्यों ? ”
“ आज कृष्णजन्माष्टमी है। आज के दिन सब व्रत रखते हैं, अन्न नहीं खाते। ”
“ अच्छा ! ” माधवी की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
“ अन्न ? अन्न क्या होता है बुआ ? ”
“ अन्न कहते हैं गेहूँ , चावल, दाल आदि को। ” बुआ ने समझाते हुए कहा।
मन ही मन अन्न के नामों को दुहराती हुई माधवी रसोई के बाहर चल दी।
बाहर आकर उसने देखा कि माँ आँगन बुहार रही हैं।
“ माँ ! बुआ जी कह रही हैं कि आज सब लोग व्रत हैं। तब तो मैं और भइया भी व्रत होंगे ? ” माधवी ने पीछे से माँ के गले से लिपटते हुए कहा।
“ नहीं, छोटे बच्चे व्रत नहीं रहते। ” माँ ने हँस कर कहा।
माँ की बात माधवी के गले नहीं उतरी। छोटे बच्चे ? लेकिन मैं और भइया अब छोटे बच्चे कहाँ हैं ! कल ही तो माँ ने कहा था कि अब तुम लोग बड़े हो गए हो, अपना काम अपने आप किया करो।
भइया को ढूँढते-ढूँढते माधवी बगीचे में जा पहुँची। भइया पौधों में पानी दे रहा था।
“ भइया ! भइया ! तुम कितने साल के हो ? ”
“ आठ साल का । ”
“ और मैं कितने साल की हूँ ? ”
“ छः साल की। क्यों ? अब उम्र क्यों गिनवाने लगी ? ”
“ भइया ! 2 से तो 6 बड़ा होता है न और 8 भी ? ”
“ हाँ । ”
“ चाची जी का मुन्ना तो अभी दो ही साल का है। तब तो हम दोनों चाची जी के मुन्ने से बड़े हुए न ? फिर हम लोग छोटे बच्चे कैसे हुए ? याद है कल जब हम लोगों ने माँ से अपने हाथ से खाना खिलाने के लिए कहा था तो माँ ने क्या कहा था ? कहा था, “ तुम लोग अब बड़े हो गए हो ” ........... लेकिन ....! ”
“ लेकिन क्या ? ”
“ लेकिन आज माँ कहती है हम दोनों छोटे बच्चे हैं और छोटे बच्चे व्रत नहीं रहते। ”
“ व्रत ? कैसा व्रत ? ” पौधों में पानी देना छोड़ गौतम ने माधवी को प्रश्नसूचक निगाह से देखा। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
“ भइया ! आज कृष्णजन्माष्टमी है। बुआ कहती हैं आज सब व्रत रखते हैं, अन्न नहीं खाते। अन्न होता है जैसे गेहूँ, चावल, दाल। ” बाएँ हाथ की उँगलियों पर दाएँ हाथ की उँगली रख-रख कर माधवी ने अन्न के नाम गिना दिए जो बुआ ने उसे बताए थे।
“ अच्छा ! ” गौतम ने आखिरी क्यारी में पानी डालते हुए कहा।
“ भइया ! आज जब सब लोग व्रत हैं तो फिर हम लोग व्रत क्यों न रहें ? ”
“ हाँ - हाँ, और क्या ? हम दोनों को भी व्रत रहना चाहिए। ” गौतम ने माधवी का पुरजोर समर्थन किया।
दोनों ने घर के अन्दर जाकर बड़ों के समक्ष एलानिया तौर पर कह दिया कि आज वे दोनों भी व्रत रहेंगे।
“ बच्चों को भूख ज्यादा लगती है। व्रत में ज्यादा खाने-पीने को नहीं मिलता। मेरी मानों, जिद मत करो। व्रत मत रहो। ” दादी ने समझाने की कोशिश की लेकिन दोनों ही अपने हठ पर अड़े रहे।
नहा-धोकर सबने मिल कर हवन किया। हवन के बाद माधवी के पिताजी ने श्रीकृष्ण भगवान् के व्यक्तित्व और कृतित्व को बताते हुए भगवत्गीता में वर्णित उनके द्वारा प्रदत्त अनासक्ति और कर्मयोग के बारे में विस्तृत चर्चा की। माधवी और गौतम ने ध्यान से उनकी सारी बातें सुनीं।
दोपहर में सबके साथ उन दोनों ने भी फलाहार किया।
लेकिन ?
दादी की बात सही निकली। दो घंटे में ही दोनों को फिर से बड़े जोरों की भूख लग आई। रसोई में जाकर कुछ भी लेकर खाने में उन्हें डर लग रहा था कि कहीं व्रत खराब न हो जाए, पता नहीं कौन सी चीज अन्न हो, कौन सी नहीं।
कुछ देर वे दोनों इधर-उधर की बातें कर एवं कुछ खेल खेल कर समय बिताने की कोशिश करते रहे किन्तु मन था कि बार-बार भूख पर चला जाता। अन्ततः दोनों ने निश्चय किया कि चलो किसी मित्र के यहाँ हो आएँ, समय जल्दी कट जाएगा।
बुआ से बता कर वे दोनों घर के सामने रहने वाली अपनी मित्र के यहाँ चले गए।
पड़ोसी की छोटी बेटी मीना उनकी अभिन्न मित्र थी, उनकी ही हमउम्र। तीनों में खूब पटती थी। तीनों मिल कर हर तरह के खेल खेलते थे। चाहे गुडि़या-गुड्डे का ब्याह रचाना हो, खाना-पकाना खेलना हो, रस्सी कूदना हो, कड़क्को खेलना हो या फिर गिल्ली-डंडा, बास्केट-बॉल, क्रिकेट-कंचे खेलना। उनके खेलों में लड़कियों के खेल, लड़कों के खेल जैसा विभेद न था।
भइया के साथ उछलती-कूदती माधवी जब मीना के घर पहुँची तो पाया कि वहाँ भी उत्सव का माहौल था।
घर के बीच वाले कमरे को झाड़-पोंछ कर अच्छी तरह साफ किया गया था। कमरे के एक कोने में एक चौकी रखी गई थी जिसके तीन ओर साडि़याँ तान कर दीवारें बना कर चौकी को एक कक्ष का रूप दिया गया था। गुलाबी रंग की एक सुन्दर सितारों जड़ी साड़ी से उस कक्ष का द्वार बनाया गया था। इस कक्ष में भगवान् के बड़े-बड़े मढ़े हुए चित्र रखे गए थे। कक्ष के बीचोंबीच एक छोटा सा खाली सिंहासन रखा गया था।
माधवी को यह सब देख कर बहुत अचरज हुआ। अबसे पहले उसने यह सब देखा न था। उसके अपने घर में ऐसा कभी कुछ न हुआ था।
माधवी ने मीना से पूछा, “ यह सब क्या सज रहा है ? ”
“ यह झाँकी है। आज जन्माष्टमी है न ! ” कक्ष का द्वार बनाने वाली साड़ी को ठीक करते हुए मीना ने उत्तर दिया।
मीना की बड़ी बहन आशा कक्ष में रोशनी करने के लिए कक्ष के बीच में एक बिजली का बल्ब लगाने में व्यस्त थी।
“ मीना ! बाजार से झाँकी सजाने के लिए रंग-बिरंगी पन्नी कागज ले आओ और पण्डित जी से जाकर कह दो कि रात में साढे ग्यारह बजे तक जरुर आ जाएँ जिससे जनम में देर न हो। ” बरामदे से मीना को पुकार कर मीना की माँ ने कहा।
मीना गौतम के साथ तुरन्त ही पण्डित जी के घर की ओर चल दी।
जनम ? जनम माने क्या ? ठोढ़ी पर उँगली रख कर माधवी सोचने लगी। मस्तिष्क पर काफी जोर डालने पर माधवी को याद आया कि जब चाची जी के कमरे में छोटा मुन्ना आया था तो घर में सबने यही कहा था कि चाची जी के यहाँ एक छोटे मुन्ने ने जनम लिया है। इसका मतलब यहाँ पर भी आज रात में कोई आएगा। लेकिन कौन ? किसका जनम होगा ? माधवी को कुछ समझ न आया।
माधवी ने देखा मीना की माँ छोटे-छोटे कपड़े सिल रही हैं।
“ बुआ जी ! आप इतने छोटे-छोटे कपड़े किसके लिए सिल रही हैं ? ” माधवी से पूछे बिना न रहा गया।
“ भगवान् के लिए। ” मीना की माँ ने मुस्करा कर कहा।
भगवान् के लिए ? क्या भगवान् इतने छोटे होते हैं ? माधवी का मन फिर उलझ गया।
मीना पण्डित जी के घर से वापस आ गई। गौतम नहीं लौटा था। वह झाँकी सजाने के लिए सुनहरे, लाल, हरे, नीले रंग का पन्नी कागज खरीदने गया था।
माधवी दौड़ कर मीना के पास पहुँची और उसे झकझोर कर बोली, “ मीना ! मीना !! रात में किसका जनम होना है ? ”
“ भगवान् जी का। ” मीना ने सहजता से उत्तर दिया।
“ कौन से भगवान् जी का ? ” माधवी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।
“ ये जो तस्वीर में बने हैं, उन्हीं का । ” मीना ने भगवान् श्रीकृष्ण के एक बड़े से चित्र की ओर संकेत करके कहा।
माधवी ध्यान से भगवान् श्रीकृष्ण के चित्र को देर तक देखती रही। तेजपूर्ण मुखमण्डल, बोलती आँखें, होठों पर स्निग्ध मुस्कराहट, साँवला रंग, पीत वस्त्र, सिर पर मुकुट, मुकुट में मोर-पंख, एक हाथ में शंख, दूसरे में सुदर्शन चक्र !
तो क्या आज यहाँ भगवान् जी आएंगे ? क्या वे वैसे ही होंगे जैसे इस तस्वीर में बने हैं ? लेकिन वे आएंगे कहाँ से ? क्या इसी तस्वीर से ? हाँ, शायद इसी तस्वीर से। माधवी के मन में ढेर सारे प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगे किन्तु फिर वह यह सोच कर पुलकित हो उठी कि जब भगवान् यहाँ आएंगे तो कितना अच्छा लगेगा ! तब मैं उनसे यह जरुर पूछूँगी कि जैसे चाची जी का छोटा मुन्ना हमारे साथ रहता है वैसे ही वे भी हमारे साथ क्यों नहीं रहते, तस्वीर में क्यों रहते हैं ?
तभी गौतम बाजार से वापस आ गया। भगवान् के जनम लेकर वहाँ आने की बात माधवी ने चुपके से गौतम को बता दी। दोनों असीम कौतूहल से भर उठे। शाम हो रही थी। उन्हें भूख भी बड़े जोर की लगी थी लेकिन उन्होंने निश्चय किया कि कुछ भी हो वे जब तक भगवान् को देख न लेंगे, तब तक घर वापस नहीं जाएंगे।
“ गौतम ! माधवी ! आओ चलें, पार्क से घास ले आएँ। ” मीना ने माधवी का हाथ पकड़ कर कहा।
“ घास ? लेकिन क्यों ? ” माधवी ने पूछा ।
“ घास से हम झाँकी में घास के मैदान बनाएंगे। ” मीना ने उत्तर दिया।
तीनों उछलते-कूदते पार्क की ओर चल दिए और कुछ ही देर में ढेर सारी घास ले आए।
देर शाम तक सब मिल कर झाँकी में कुछ न कुछ सजाने में व्यस्त रहे।
शाम गहराते ही माधवी और गौतम की दादी, बुआ, माँ, पिताजी और चाचा ने बारी-बारी से उन्हें वापस बुलाने के लिए घर के छज्जे पर खड़े होकर न जाने कितनी आवाजें दीं किन्तु वे वापस घर नहीं गए। रात के दस बज गए, फिर साढ़े दस, ग्यारह, साढ़े ग्यारह। घर के सभी बड़े आश्चर्यचकित थे कि आखिर वे दोनों घर वापस आ क्यों नहीं रहे हैं ? झुँझला कर उन्होंने उन दोनों को डाँटा-डपटा, धमकाया, लेकिन सब बेकार। वे दोनों अपने निश्चय से टस से मस न हुए।
ठीक पौने बारह बजे पण्डित जी मीना के घर पधारे। आते ही वे पूजा की तैयारियों में व्यस्त हो गए। बारह बजने से पाँच मिनट पूर्व उन्होंने पूजा आरम्भ की और ठीक बारह बजे उन्होंने खीरे में पहले से रखी भगवान् श्रीकृष्ण की मूर्ति को खीरे से बाहर निकाला और चरणामृत व गंगाजल से नहला कर कपड़े पहना कर चौकी के बीचोंबीच रखे खाली सिंहासन पर रख दिया।
माधवी और गौतम पण्डित जी के क्रियाकलापों को आँखें फाड़े बड़े ध्यान से देख रहे थे। वे बार-बार श्रीकृष्ण के चित्र की ओर भी देखते जा रहे थे। वे पलकें भी मुश्किल से झपका रहे थे। वे डर रहे थे कि कहीं ऐसा न हो कि वे भगवान् को आता हुआ देख ही न सकें। पता नहीं, भगवान् तस्वीर से बाहर निकल कर कितनी देर रुकेंगे ? कहीं ऐसा न हो कि जल्दी ही वे फिर से वापस तस्वीर में चले जाएँ और वे दोनों न तो उन्हें देख ही पाएँ और न ही उनसे बात कर पाएँ।
पण्डित जी ने कृष्ण-जन्म और भगवत्पूजा के सभी विधान जल्दी-जल्दी निपटाए, प्रसाद बाँटा, स्वयं प्रसाद लिया और अपना झोला उठा कर वापस चलने को झटपट तैयार हो गए।
पूर्ण एकाग्रता से पण्डित जी के समस्त कार्यकलापों का सूक्ष्म निरीक्षण करते रहने के बावजूद माधवी और गौतम नहीं जान सके कि कृष्ण-जन्म कब हो गया।
पण्डित जी को जाता देख कर वे दोनों अधीर हो उठे, “ भगवान् का जनम कब होगा मीना ? ”
“ जनम हुआ तो था ! ”
“ कब ? कहाँ ?? कैसे ??? ”
“ ऐसे ! ” मीना ने खीरे को लम्बाई में बीच से काटकर उसमें भगवान् की छोटी सी पीतल की मूर्ति रख कर पुनः निकालते हुए बताया।
यह देख कर दोनों आवाक् रह गए। दुःख और क्षोभ से उनका हृदय बैठने लगा; आँखें नम हो आईं। मीना की माँ ने उन्हें भी प्रसाद देना चाहा परन्तु बिना प्रसाद लिए और बिना कुछ बोले वे दोनों घर वापस चल दिए।
घर पहुँचने पर इतनी देर तक घर से बाहर रहने और बड़ों के द्वारा बार-बार बुलाए जाने पर भी घर वापस न आने के लिए उन्हें पुनः डाँट खानी पड़ी।
उन दोनों को खाने को फलाहार दिया गया। रात के साढे बारह बज रहे थे। दोनों ने दोपहर बाद से कुछ नहीं खाया था लेकिन अब जैसे उनकी भूख ही मर गई थी।
फलाहार न खाने पर पुनः डाँट न पड़े इस डर से गौतम ने किसी प्रकार उसे खा लिया लेकिन माधवी से कुछ न खाया गया। बार-बार उसकी आँखें भर आ रही थीं और वह अपने आँसू फ्राक के घेर से पोंछ रही थी।
“ क्या बात है ? खाती क्यों नहीं ? रो क्यों रही है ? ” माँ ने उसे रोता देख कर विह्वल होकर कहा।
“ माँ ! मीना ने कहा था कि रात बारह बजे तस्वीर वाले भगवान् श्रीकृष्ण जनम लेंगे। इसीलिए हम दोनों वहाँ पर रुके थे, लेकिन वहाँ तो खीरे से भगवान् की मूर्ति निकालने को ही भगवान् का जनम कहा गया। तस्वीर वाले भगवान् नहीं आए। ” कहते-कहते गौतम का गला भर आया; आँखों से आँसू छलक पड़े।
“ अरे ! अपने जन्मदिन पर कोई क्या बार-बार जन्म लेता है ! भगवान् का जन्म देखने के लिए तुम दोनों इतनी रात गए वहाँ रुके थे ! यह तुम लोगों ने पहले क्यों नहीं बताया ? बताते तो वह बात जो तुमने वहाँ देखी हम लोग पहले ही तुम्हें बता देते; तुम्हें इतनी निराशा का सामना नहीं करना पड़ता। ”
माँ ने उन दोनों के आँसू पोंछते हुए कहा, “ भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराम का जन्मदिन इसी प्रकार मनाने की परम्परा मन्दिरों और बहुत से परिवारों में है। ”
वास्तविकता जानने के बाद अब गौतम के मन का क्षोभ कम हो गया था। उसके आँसू सूख गए थे लेकिन माधवी अभी भी दुःखी थी।
“ पर माँ ! भगवान् का जन्मदिन ये लोग इस तरह क्यों मनाते हैं ? ” सोने के कमरे की ओर माधवी और माँ के साथ जाते हुए गौतम पूछ बैठा।
“ यद्यपि यह परम्परा भगवान् के जन्मदिवस को एक उत्सव-दिवस के रूप में बदल देती है तथापि इस परम्परा को प्रारम्भ करने व प्रचलन में बनाए रखने का मुख्य उद्देश्य पुजारियों और पण्डितों द्वारा यजमानों से धन-धान्य का दान प्राप्त करना रहा है लेकिन इस तरह भगवान् का जन्मदिवस मनाने का एक बुरा प्रभाव यह होता है कि केवल ऐसा करने से इन महान् विभूतियों का व्यक्तित्व और कृतित्व जनमानस में गौण हो जाता है और खीरे में से भगवान् का जनम कराने का यह बाह्याडम्बर मुख्य। ”
बात करते हुए माँ उन दोनों के बिस्तर लगा रही थी।
“ तो फिर हमें भगवान् का जन्मदिन किस तरह मनाना चाहिए माँ ? ” गौतम की उत्सुकता अभी शान्त न हुई थी।
“ भगवान् का जन्मदिन साधारण मनुष्यों के जन्मदिवस से भिन्न होता है। साधारण मनुष्य के लिए उसका जन्मदिवस जहाँ उसके लिए आत्मनिरीक्षण करने और अगले वर्ष पूरे किए जाने वाले नए संकल्प लेने का दिन है, वहीं भगवान् जैसी महान् विभूतियों का जन्मदिन साधारण जन के लिए भगवान् की जीवन-दृष्टि को अपना कर कार्य करने का संकल्प लेने का दिन है। इसीलिए इस दिन पूजा के साथ-साथ इनके विचारों, सद्कार्यों व उपदेशों पर विशद चर्चा भी होनी चाहिए और इनके कार्यों और जीवन-दर्शन का ही झाँकी के रूप में प्रदर्शन होना चाहिए जिससे कि न केवल बड़े लोग वरन् बच्चे भी उनके जीवन-दर्शन के अनुरूप ही अपने जीवन में उदात्त जीवन-दृष्टि अपना कर जीवन के हर क्षेत्र में कर्म करने का दृढ निश्चय कर सकें। ” माँ ने समझाते हुए कहा।
अपने ही विचारों में खोई हुई माधवी उनकी बातों से बेखबर थी।
“ अच्छा, अब सो जाओ ! कल सुबह जल्दी उठ कर स्कूल भी तो जाना है तुम दोनों को। ” माँ ने उन्हें बिस्तर पर लिटा कर उनकी पीठ थपकाते हुए कहा और कमरे का दरवाजा उढ़का कर अपने कमरे की ओर चल दी।
गौतम बिस्तर पर लेट कर जल्दी ही खर्राटे भरने लगा किन्तु माधवी को देर तक नींद न आई। वह लगातार भगवान् के बारे में ही सोचती रही कि वे कहाँ हैं ? उसके साथ क्यों नहीं रहते ? क्या भगवान् उससे नाराज हैं और इसीलिए उसके सामने नहीं आए ? न जाने कितनी ही देर वह ऐसे ही विचारों में डूबती-उतराती रही। अन्ततः उसकी भी आँख लग ही गई।
नींद में डूबी माधवी की बन्द आँखों के समक्ष अनायास ही चाँदनी सा मद्धिम प्रकाश खिल उठा। उस स्निग्ध शुुभ्र प्रकाश के मध्य उसे दिखा एक दैवीय व्यक्तित्व ! नीलापन लिए हुए साँवला शरीर, ओजपूर्ण तेजस्वी मुखमण्डल, होंठों पर स्मित हास्य, कंधे पर लाल किनारी वाला पीताम्बर, गले में सफेद मोतियों की माला और घुटनों तक लटकता लाल फूलों का बड़ा सा हार, कमर की पीली धोती के फेंटे में खुँसी बाँसुरी, सिर पर मुकुट, मुकुट में मोरपंख, दाएँ हाथ में सुदर्शन चक्र व बाएँ हाथ में सफेद शंख !
माधवी ने उस मनभावन व्यक्तित्व को ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा। उसे पहचान कर अकस्मात् वह रोमांचित हो उठी- अरे ! ये तो वैसे ही हैं जैसे कि उसने मीना के घर श्रीकृष्ण भगवान् की तस्वीर में देखा था। उसका हृदय खिल उठा। सहसा ‘भगवान् जी ! भगवान् जी !!’ कहते हुए उसने उठकर उस दिव्य विभूति के चरणस्पर्श करना चाहा किन्तु तत्क्षण वह आकृति मुस्कराई और अन्तर्ध्यान होकर उसके हृदय में समा गई।
माधवी की आँख खुल गई। पास के कमरे से दादी के गायत्री मन्त्र जपने की धीमी-धीमी आवाज आ रही थी।
तो क्या सुबह के चार बज गए ? सोचती हुई माधवी लपक कर दादी के पास जा पहुँची। प्रसन्नता से उमगते हुए उसने दादी को वह सब कह सुनाया जो उसने थोड़ी ही देर पहले नींद में बन्द आँखों से देखा था।
“ दादी ! मैं तो समझती थी कि भगवान् जी मुझसे नाराज हैं, इसीलिए मेरे सामने नहीं आए मीना के घर में जनम लेने। ”
माधवी की बातें सुन कर दादी कुछ क्षण तक माधवी को चुपचाप अपलक देखती रहीं। फिर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरती हुई धीरे से बोली, “ भगवान् तो सबके ही हृदय में रहते हैं बेटी। परन्तु जिसके मन में उन्हें देखने और पाने की तीव्र इच्छा होती है; जिसका मन शान्त और हृदय निश्छल होता है, केवल उसके ही समक्ष प्रकट होकर वे इस प्रकार उसे दर्शन देते हैं। जो लोग भगवान् के द्वारा दी गई जीवन-दृष्टि अपना लेते हैं, उन्हें छोड़ कर वे कभी नहीं जाते। ”
थोड़ी देर रुक कर वे पुनः बोलीं, “ बेटी ! किसी एक रूप में भगवान् का सांसारिक जनम तो केवल एक ही बार होता है किन्तु उसके बाद मनुष्य के हृदय में भगवान् के उस रूप का इस तरह अवतरण होना और भगवान् के उस रूप द्वारा मानव को बताया गया जीवन-दर्शन मनुष्य के द्वारा अपनाना ही भगवान् का जनम होना है।
माधवी ! भगवान् श्रीकृष्ण ने तुझे साक्षात् दर्शन दिए हैं। तेरे हृदय में उनका जनम हुआ है। सचमुच तू बड़ी ही भाग्यवान् है ! श्रीकृष्ण के गीता में बताए गए अनासक्तिपूर्ण कर्मयोग को अपना कर अपने मन-वचन-कर्म को सदा इसी प्रकार निश्छल व ईश्वरोन्मुख बनाए रखना। भगवान् सदा ही तेरे साथ रहेंगे। ” कहते हुए भाव-विह्वल दादी ने माधवी को हृदय से लगा लिया।
माधवी मंत्रमुग्ध सी दादी की बातें सुन रही थी। उसकी छोटी सी बुद्धि में दादी की इतनी बड़ी-बड़ी बातें पूरी तरह समा नहीं पा रही थीं लेकिन वह इतना अवश्य समझ रही थी कि भगवान् ने उसके हृदय में जनम लिया है। आनन्दविभोर होकर उसने दादी की गोद में अपना मुँह छिपा लिया।
कहानी-4
सतानो की भाभियाँ
- डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव
घर के आँगन में एक कोने में चौक बनाई गई थी। सतानो और उसके सात भाइयों के रेखाचित्रनुमा पुतले भी बनाए गए थे। आज भैया-दूज की पूजा जो होनी थी।“ पूजा की थाली तैयार है माँ ! ”
सुषमा ने चौक बनाने के बाद हाथ साफ करती हुई माँ के पास पूजा की थाली रखते हुए कहा।
माँ के कहने पर सुषमा और उसकी बहन माधवी भी उनके साथ पूजा करने लगीं।
पूजन के बाद माँ ने सतानो की कथा कहनी आरम्भ की-
“ एक थीं सतानो। सतानो के थे सात भाई। सतानो के भाई सतानो को बहुत चाहते थे। धन कमाने के लिए परदेस जाते समय उन्होंने अपनी-अपनी पत्नियों से कहा- “ सतानो को कोई दुःख न देना। उन्हें दूध-भात खिलाना और पालने में झूला झुलाना। ”
सतानो की सभी भाभियों ने कहा- “ हाँ-हाँ ! ऐसा ही होगा। ”
सतानो का कुछ समय बहुत आराम से बीता। वह दूध-भात खातीं और झूला झूलती रहतीं।
एक दिन सुबह-सुबह सतानो की एक भाभी ने 50 धान के दाने देकर सतानो से कहा- “ सतानो ! जाओ धान से चावल निकाल लाओ। ध्यान रहे, न कोई चावल का दाना टूटे और न ही खोए। ”
सतानो दाने लेकर घर के बाहर लगे आम के पेड़ के नीचे बैठ गईं।
धान से किस प्रकार चावल निकालें कि न तो कोई दाना टूटे और न ही खोए ? सतानो बहुत देर तक सोच-विचार में पड़ी रहीं।
शाम ढलने लगी। सतानो जिस पेड़ के नीचे बैठी थीं, उस पर रहने वाली चिडि़याँ बसेरा लेने आ गईं, लेकिन सतानो घर वापस जाएँ तो कैसे ? कारण ? धान से चावल नहीं निकले थे।
शाम ढलते देख सतानो रोने लगीं।
सतानो को रोता देख कर पेड़ पर बैठी चिडि़याँ नीचे उतर आईं और सतानो से रोने का कारण पूछने लगीं।
कारण जानने पर उनकी मुखिया ने कहा, “ बस ! इतनी सी बात है। रो मत, चावल हम निकाल देती हैं। ”
सभी चिडि़याँ अपनी चोंच में धान का दाना दबा-दबा कर चावल निकालने लगीं। कुछ ही देर में सारे धानों से चावल निकल आए।
उन चिडि़यों में से एक चिडि़या कानी थी। घोंसले में उसका बच्चा था। पूरे दिन घूमने पर भी अपने बच्चे को खिलाने के लिए उसे कुछ न मिला था। उसने चावल का एक दाना अपनी कानी आँख में दबा लिया।
सतानो धान से निकले चावल के दानों को लेकर भाभी के पास पहुँचीं- “ लो भाभी ! धान से निकले चावल के दाने। ”
भाभी ने सतानो की हथेली में पड़े दानों को ध्यान से देखा और कहा, “ अरे ! सतानो, इसमें तो एक दाना कम है। जाओ, ढूँढ़ कर लाओ। ”
आम के पेड़ पर चिडि़याँ अभी बसेरा लेने जा ही रहीं थीं कि सतानो वहाँ वापस आकर फिर जोर-जोर से रोने लगीं।
चिडि़यों की मुखिया ने पूछा, “ सतानो ! धान से चावल तो निकाल दिए हमने, अब क्यों रो रही हो ? ”
“ भाभी कह रही हैं, चावल का एक दाना कम है। ”
मुखिया चिडि़या ने सभी चिडि़यों की तलाशी ली। कानी चिडि़या की कानी आँख में चावल का खोया हुआ दाना मिल गया।
दाना पाकर सतानो की भाभी संतुष्ट हुईं।
कुछ दिनों बाद सतानो की एक दूसरी भाभी ने सतानो को चलनी देकर कहा, “ जाओ इस चलनी में कुएँ से पानी भर कर ले आओ। ”
सतानो चलनी लेकर घर के बाहर कुछ दूर पर बने कुएँ की जगत पर पहुँचीं।
कुएँ से बाल्टी भर पानी निकाल कर सतानो ज्योहीं चलनी में डालतीं, सारा पानी चलनी के छेदों से बह जाता। बार-बार यही करते-करते रात घिरने को आई लेकिन सतानो चलनी में पानी लेकर घर न जा सकीं।
चलनी में पानी लिए बिना हम घर कैसे जाएँ ? सोच कर सतानो जोर-जोर से रोने लगी।
सतानो के रोने की आवाज कुएँ में गूँजने लगी। उसे सुन कर कुएँ की दीवार में रहने वाले मेंढकों ने सतानो से उनके रोने का कारण पूछा।
कारण जान कर उन्होंने कहा, “ ये कौन सी बड़ी बात है ! लाओ, चलनी कुएँ में नीचे डालो। हम अपने-अपने मुँह में पानी भर कर चलनी की दीवार के किनारे बैठ जाएंगे। घर में भाभी के पास जाकर कहना, ' भाभी ! ये लो चलनी में पानी। ' तब हम सब अपने-अपने मुँह का पानी उगल देंगे। ”
सतानो ने ऐसा ही किया। पानी देख कर सतानो की भाभी खुश हो गईं।
कुछ समय और बीता। एक अन्य भाभी ने सतानो को एक काला कम्बल देकर कहा, “ सतानो, जाओ काली कम्बली उजली कर लाओ। ”
सतानो तालाब पर गईं और काली कम्बली को तालाब के पानी से धो-धो उजला करने लगीं। बहुत कोशिश करने पर भी वह उजली न हुई।
शाम ढलने पर पक्षियों का कोलाहल शान्त होने लगा। जंगली जानवर बोली बोलने लगे।
सतानो बहुत ही डर गईं। वह घर नहीं जा सकती थीं क्योंकि काली कम्बली उजली न हुई थी।
सतानो ने आसपास देखा। दूर-दूर तक कोई नहीं था जो उनकी मदद कर सकता।
सतानो को लगा कि यदि उसके भाई घर पर होते तो उसे ये दिन न देखना पड़ता।
सतानो भाईयों को पुकार-पुकार कर जोर-जोर से रोने लगीं, “ हाय भाई ! तुम सब कहाँ चले गए ? रात घिरने को आई, काली कम्बली उजली न भई, हम घर कैसे जाएँ ? हमें बहुत डर लग रहा है। भाई-भाई तुम कहाँ हो ? ”
संयोग से सतानो के सभी भाई उसी समय परदेस से वापस घर लौट रहे थे।
सतानो की रोने की आवाज सुन कर वे अचम्भे में पड़ गए।
एक ने कहा, “ भाई ! लगता है कहीं सतानो रो रही हैं। ”
दूसरे ने कहा, “ नहीं ! ऐसा कैसे हो सकता है ? रात घिरने को है। सतानो तो घर में होंगी। ”
तीसरे ने कहा, “ हाँ-हाँ ! सतानो अवश्य ही दूध-भात खा कर पालने में झूला झूल रही होंगी। ”
लेकिन चौथे ने कहा, “ भाई, आवाज तो सतानो की ही लग रही है। ”
पाँचवें ने कहा, “ आप ठीक कह रहे हैं। ‘भाई-भाई तुम कहाँ हो। हमंे डर लग रहा है’- कह कर सतानो हमें ही बुला रही हैं। ”
छठें ने कहा, “ लगता है सतानो आस-पास ही कहीं हैं। वह किसी भारी विपत्ति में पड़ गई हैं। ”
सातवें ने सलाह दी, “ हमें आवाज की दिशा में चल कर देखना चाहिए। ”
सभी को यह बात पसन्द आई। आवाज का पीछा करते-करते वे तालाब के किनारे पहुँच गए।
सतानो एक हाथ में काला कम्बल लिए दूसरे हाथ को सिर पर रखे दहाड़ें मार-मार कर रो रही थीं।
यह देख कर सभी भाई भौंचक्के रह गए।
उन्होंने सतानो से पूछा कि वह वहाँ कैसे और क्यों पहुँच गईं।
सतानो ने अपनी भाभियों के द्वारा दिए गए सभी कामों के विषय में बता कर कहा, “ पहले चिडि़यों और कुँए के मेंढ़कों ने हमारी मदद कर दी लेकिन आज कोई मदद नहीं मिली। ”
सुनते ही सभी भाई आग-बबूला हो गए। उन्हें अपनी-अपनी पत्नियों पर बड़ा ही क्रोध आया। उन्होंने उन्हें दण्ड देने का निश्चय किया।
बड़े भाई ने अपनी जाँघ चीर कर उसमें सतानो को छुपा लिया।
घर पहुँच कर सबने अपनी-अपनी पत्नियों से पूछा कि सतानो कहाँ हैं ?
सबने अनभिज्ञता प्रकट की और कहा कि इस समय सतानो दूध-भात खाकर पालने में झूला झूलते सो जाया करती थीं। वे वहीं पालने में ही होंगी।
सभी भाईयों ने एक स्वर में कहा, “ नहीं, सतानो पालने में नहीं है। ”
बड़े भाई ने अपनी जाँघ से सतानो को निकाल कर कहा, “ सतानो हमें तालाब के किनारे मिलीं। सतानो ने हमें बता दिया है कि तीन भाभियों ने उन्हें सताया है। सच-सच बताओ, किस-किस ने सतानो को सताया है और हमारे कहने के अनुसार उन्हें दूध-भात खा कर पालना झूलने नहीं दिया। हम सब अपनी बहन को बहुत चाहते हैं। हमें यह जरा भी पसन्द नहीं कि कोई उसे किसी भी तरह से दुःख दे, चाहे वह हमारी पत्नी ही क्यों न हो। ”
दण्ड पाने की आशंका से सभी भाभियाँ डर गईं। सभी कहने लगीं हमने नहीं सताया है।
तब यह फैसला हुआ कि गर्म तेल के कड़ाह में सभी भाभियाँ हाथ डालेंगी। जिन भाभियों ने सतानो को नहीं सताया होगा उनके हाथ नहीं जलेंगे, शेष के जल जाएंगे।
जिन भाभियों ने सतानो को काम बताए थे उनके हाथ जल गए।
काम बताने वाली सभी भाभियों को उनके पतियों ने दण्ड दिया। ऐसा देख कर सतानो बहुत प्रसन्न हुईं।
जैसे सतानो के दुःख दूर हुए वैसे ही हर बहन के दुःख दूर हों। जैसे सतानो के भाई थे, वैसे ही हर बहन के भाई हों। ”
माँ कहानी कह चुकी थी।
लेकिन सुषमा के कानों में कहानी का अंत अभी तक गूँज रहा था - “ जिन भाभियों ने सतानो को काम बताए थे....! ”
रात घिर आई। पूरे परिवार ने प्रसन्नतापूर्वक साथ-साथ भोजन किया। भोजन के बाद सब अपने-अपने कक्ष में शयन करने के लिए चले गए।
सुषमा और माधवी भी लेट गईं। थोड़ी ही देर में कमरा माधवी के खर्राटों से गूँजने लगा।
लेकिन सुषमा की आँखों में नींद का नामोनिशान न था। अब भी रह-रह कर सतानो की कहानी के अंत की अनुगूँज उसके मानस को झकझोर रही थी। उसके पाँच भाईयों में से किसी की भी शादी नहीं हुई थी। उसका किशोर हृदय सतानो की कहानी में बताए गए ननद-भाभी के रिश्ते के स्वरूप को पचा नहीं पा रहा था।
यह किस जमाने की कहानी है ? क्या संदेश है इसका ? हर लड़की किसी न किसी की बहन होती है। विवाह के बाद वही लड़की किसी न किसी लड़की की भाभी भी बनती है। क्या भाभी बनी लड़की द्वारा अपने पति की बहन से कोई काम कह देना अपराध है ? क्या सतानो अपने विवाह के बाद किसी की भाभी नहीं बनी होगी ? क्या तब उसने भी अपनी ननद से कोई काम करने को कह कर कोई अपराध नहीं किया होगा ? क्या ननद बनी लड़की से कोई काम नहीं कहा जा सकता ? क्या चुप रह कर बस ससुरालजनों यहाँ तक की अपने जैसी लड़की ननद की भी सेविका की तरह सेवा करना ही भाभी यानी घर की बहू का धर्म है ?
देर रात तक सुषमा का मन उधेड़बुन में लगा रहा। फिर न जाने कब उसकी आँख लग गई।
उसने देखा, सतानो की जिन भाभियों के हाथ नहीं जले थे, वे अपने-अपने कमरे में हैं। वे सुख से अपनी-अपनी शैय्या पर सोई हुई थीं।
लेकिन जिनके हाथ जले थे और जिन्हें अपने पतियों से दण्ड भी मिला था-- शारीरिक प्रताड़ना का दण्ड, भूखे रहने का दण्ड, कमरे से निष्कासित होने का दण्ड; वे अपने-अपने कमरे के दरवाजे के बाहर दीवार से टेक लगाए भूमि पर बैठी जाग रही थीं।
आश्चर्य कि वे रो नहीं रही थीं ! उनकी आँखों में न दुःख के आँसू थे, न मुख पर किसी वेदना के चिन्ह, न कोई पछतावा और न ही अपनी ननद के प्रति क्रोध या शिकवा-शिकायत। हाँ, उनकी आँखें आक्रोश से दहक रही थीं। उनमें जलते प्रश्न तैर रहे थे।
सुषमा ने देखा इन भाभियों के पति कमरे में अपनी-अपनी शैय्या पर आराम से सो रहे थे। उनके चेहरों पर अपनी बहन के प्रति पूर्ण न्याय करने का दर्प अट्टहास कर रहा था।
जागती हुई प्रत्येक भाभी के पास सुषमा गई। उसने उन्हें सम्मानपूर्ण नजरों से देखा और उनकी आँखों के आक्रोश को समझने और उनमें तैरते प्रश्नों को पढ़ने का प्रयत्न किया। लेकिन उसे सफलता न मिली।
उसका जी चाहा कि वह उनसे बात करे। लेकिन सुषमा को डर था कि उनके पास जाकर बात करने पर संभवतः वे अपने पति के डर से अपने दिल की बात साफ-साफ न कह सकेंगी।
कमरों से कुछ दूर जाकर उसने उन्हें अपने पास आने का संकेत किया।
पहले तो उनमें इसके लिए अनिच्छा दिखी। फिर कुछ देर बाद बड़ी भाभी उठ कर उसके पास आई तो शेष दो ने भी उसका अनुसरण किया।
“ बहुत दर्द और जलन हो रही है ? आइए, मैं आप सबके हाथों में मलहम लगा देती हूँ, बहुत जल्द जलन शान्त हो जाएगी। घाव भी भर जाएंगे। ”
बात शुरु करने की इच्छा से सुषमा ने छोटी भाभी का हाथ पकड़ कर शेेष दोनों को सहानुभूतिपूर्वक देखते हुए कहा।
“ घाव हमारे हाथों में ही नहीं, हमारे हृदय में भी है। ”
बड़ी भाभी ने धीरे से कहा।
सुषमा के हाथ में दवा का ट्यूब था।
दवा के ट्यूब को देखते हुए मँझली भाभी ने पूछा, “ तुम्हारा यह मलहम क्या हृदय के घावों को भी ठीक कर सकता है ? ”
सुषमा निरुत्तर हो गई।
“ हाँ, बेकसूर होते हुए भी....... ”
छोटी भाभी इसके आगे कुछ न कह सकी। उसका आक्रोश पिघल चला था।
“ हमने सतानो को सताने के लिए कभी कुछ नहीं किया हम तो केवल ........ आह ! ”
मँझली भाभी ने कमजोर आवाज में अपनी बात कहनी चाही किन्तु उसकी बात तकलीफ की कराहट में दब कर रह गई।
“ हाँ, बात सही है .... ननद से काम कहना कोई अपराध या कि ननद को सताना, दुःख देना कैसे हो सकता है ? ”
सुषमा ने मँझली भाभी का पुरजोर समर्थन किया।
“ सतानो के साथ हमने जो कुछ भी किया उसका कारण तुम नहीं जानतीं .... सतानो के भाई भी नहीं जानते...सही बात तो यह है कि सतानो के प्रति अपने अंधे प्रेम के चलते सतानो के भाई न कुछ जानना चाहते हैं और न ही कुछ समझना। ”
बड़ी भाभी का आक्रोश भी अब हताशा का रूप लेने लगा था।
“ क्या कारण था ? आप मुझे निःसंकोच बताएँ। ”
सुषमा के स्वर में गम्भीरता और सहानुभूति के साथ उत्सुकता भी थी। उसे उनके हृदय के घावों में मरहम लगाने का रास्ता मिल गया था।
“ सतानो के भाई सतानो को इतना प्यार करते हैं कि उन्होंने सतानो को कभी कोई काम नहीं करने दिया। वे सदा यही कहते हैं कि भाभियों के रहते सतानो को काम करने की क्या जरूरत ? इसीलिए सतानो को कोई काम करना नहीं आता। लेकिन ..... ”
बड़ी भाभी ने आगे भी कुछ कहना चाहा परन्तु साड़ी का किनारा उनके घाव से टकरा गया तो वेदना से उनके होंठ सिल से गए।
“ दरअसल सतानो के भाई जब परदेस धन कमाने गए थे तब वे मात्र सात वर्ष की थीं। आज वे चौदह वर्ष की हैं। कल को उनका ब्याह होगा, घर-गृहस्थी सँभालनी होगी उन्हें। अब यदि उन्हें गृहस्थी के काम-काज करना नहीं आएगा तो तुम्हीं बताओ ब्याह के बाद अपने जीवन में उन्हें बहुत दुःख उठाने पड़ेंगे या नहीं ? ब्याह के बाद भी सतानो सदा सुखी रहें, यही सोच कर हमने उन्हें काम सिखाने के लिए कुछ घरेलू काम बताए थे अन्यथा जैसे विगत 6 वर्षों से हम उनसे बिना कोई काम लिए उन्हें घर में आराम से रखे थीं वैसे ही अब भी रखतीं। ”
मँझली भाभी ने बड़ी भाभी के मंतव्य को पूरा-सा करते हुए कहा।
“ बीते वर्षों में हमारे पास का लगभग सारा धन खर्च हो चुका था। हमारे पति परदेस से धन कमा कर कब लौटेंगे, इसका कोई पता न था। ऐसी स्थितियाँ गृहणियों के सामने आती ही रहती है। तब काफी सोच-समझ कर और बिना तनिक भी अन्न बर्बाद किए हमें गुजारा करना होता है।..... तभी तो मैंने सतानो को धान में से चावल निकालने के लिए गिन कर धान के दाने दिए थे और हिदायत दी थी कि न कोई दाना टूटे और न खोए। ” छोटी भाभी ने मानों अपनी सफाई दी।
“ हाँ, और अक्सर हमारे घड़ों में छेद हो जाते हैं और नया घड़ा खरीदने के लिए हमारे पास पैसे नहीं होते तब ? तब उन फूटे घड़ों में ही हमें पानी भर कर लाना और रखना होता है। ऐसी स्थिति यदि सतानो के जीवन में आए तो उन्हें तकलीफ न हो इसके लिए ही छेददार बर्तन में कुएँ से पानी लाना सिखाने के लिए मैंने सतानो को चलनी में कुएँ से पानी लाने के लिए कहा था, उन्हें सताने के लिए नहीं। ” मँझली भाभी ने अपनी बात पर सुषमा की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसकी ओर टटोलती नजरों से देखा।
“ और जो कपड़ा मैंने सतानो को धोकर लाने को कहा था वह कपड़ा और कोई नहीं, सतानो की ही सफेद लोई थी जिसे उन्होंने पिछले वर्ष गन्दा ही रख दिया था। अब सर्दियाँ आने को हैं। लोई की आवश्यकता होगी। सतानो को कपड़ा धुलना सिखाने के लिए ही मैंने उन्हें उनकी मैल से काली हो गई कम्बली को साफ करके उजली कर लाने के लिए कहा था। ” बड़ी भाभी ने भी अपना पक्ष स्पष्ट किया।
“ लेकिन इन कामों को कराने का उद्देश्य यदि अच्छा ही था तो आप सबने सतानो को काम करने का तरीका क्यों नहीं बताया ? ”
“ बताया था....बताया था। ” तीनों लगभग एकसाथ बोल पड़ीं।
“ लेकिन कहानी में तो ऐसा कुछ भी नहीं बताया गया था। ” सुषमा ने प्रतिवाद किया।
तीनों कुछ न बोलीं। बस एक-दूसरे को एकटक निहारती रह गईं।
फिर एकसाथ ही बोल पड़ीं, “ यही तो हमारे दुःख का मूल कारण है। जब-जब हम गृहस्थी के काम-काज करती हैं तो सतानो को सबकुछ बताती हैं, फिर भी लोकगाथा में लोग इसे नहीं कहते और हमें अपराधी बना देते हैं। ”
“ मैं रोज ही जब पकाने के लिए धान को मूसल से कूट कर चावल निकालती हूँ, तो सतानो वहीं आसपास गाती-नाचती रहती हैं। मैंने अनेक बार मूसल से धान को कूट कर चावल का दाना निकाल कर दिखाया भी था सतानो को। ” यह छोटी भाभी का स्वर था।
“ हमारा घड़ा फूट गया है। सतानो रोज ही तो हमें कपड़े के टुकड़े को फूटे घड़े के छेद में फँसा कर छेद बन्द करके कुएँ से पानी लाते हुए देखती हैं। ” मँझली भाभी ने भी जोर देकर कहा।
“ जब हम कपड़े साफ करने तालाब पर जाती हैं तब अनेक बार सतानो भी हमारे साथ तालाब तक जा चुकी हैं और हमें कपड़े साफ करते हुए देख चुकी हैं कि कैसे कपड़े को तालाब के पानी से भिगोने के बाद रेह मिट्टी से रगड़-रगड़ कर कपड़े का मैल साफ करने के बाद कपड़ा तालाब के पानी से धुल कर साफ किया जाता है। ” बड़ी भाभी का स्वर भी सशक्त था।
वह ही पुनः बोलीं, “ दरअसल सतानो को उनके भाईयों के अतिशय प्रेम ने न केवल आलसी बना दिया है बल्कि उनकी बुद्धि को भी निष्क्रिय रहने के कारण अविकसित कर दिया है। सतानो को केवल अपने भाईयों की यही बात अच्छी लगती है कि हमारे रहते काम सतानो क्यों करेंगी ? वे तो दूध-भात खाएंगी और पालना झूलेंगी। इसी कारण सतानो ने न तो कभी हमारे कामों में रुचि ली, न कभी हमारा हाथ बँटाया और न ही हमारी बताई हुई किसी बात पर कान दिया। ”
“ और तो और, सतानो ने हमें धोखा दिया। यह तो हमें बाद में पता चला कि पानी को घर तक चलनी के अन्दर बैठ कर मेंढक लाए थे....सतानो नहीं। ” मँझली भाभी के स्वर में आश्चर्य झलक रहा था।
“ और यह भी कि धान से भी चावल के दाने सतानो ने नहीं बल्कि द्वारे पर लगे आम के पेड़ पर रहने वाली चिडि़यों ने निकाले थे। ” छोटी भाभी आक्रोशित थी।
“ सतानो ने हमें नित्य काम करते हुए देख कर जो अनुभव प्राप्त किया था उसे याद कर यदि तनिक भी बुद्धि लगाई होती तो वे किसी की मदद के बिना ही सारे काम स्वयं कर डालतीं। ....लेकिन सतानो ने ऐसा नहीं किया, बल्कि ऐसा समझा मानों काम देकर हम उन्हें सता रहे हैं। ” बड़ी भाभी के स्वर में दुःख झलक गया।
कुछ क्षण रुक कर बड़ी भाभी फिर बोलीं, “ हमें दुःख तो इसी बात का है कि लोककथा कहने वाले भी हमारी भावनाएँ और सतानो के प्रति हमारी सदिच्छाएँ प्रकट नहीं करते। इससे लड़कियों के मन में बचपन से ही ननद-भाभी के रिश्ते के प्रति वैमनस्य की गाँठ बन जाती है। इसका दुष्प्रभाव उनके वास्तविक जीवन में तब दिखता है जब वे स्वयं इस रिश्ते में बँधती हैं। ”
सुषमा उन सबके तर्कों को ध्यान से सुन रही थी। भाभियों के तर्कों से उसकी सहमति उसके चेहरे से प्रकट हो रही थी।
लेकिन अभी भी एक शंका उसके मन में बार-बार सिर उठा रही थी। क्या सतानो की इन तीनों भाभियों की अन्य चारों देवरानियाँ सतानो को प्यार नहीं करतीं ? क्या उन्हें सतानो के भविष्य की कतई चिन्ता नहीं है ?
उसने अपने मन की शंका उनके समक्ष रखी।
“ नहीं, ऐसा नहीं है। वे भी सतानो से उतना ही प्रेम करती हैं जितना कि हम। ” छोटी भाभी ने जल्दी से उनका पक्ष लेते हुए कहा।
“ छोटी ठीक कह रही है किन्तु अपने पतियों द्वारा दण्डित किए जाने के भय से वे सतानो को कुछ भी सिखाने का साहस नहीं कर सकीं। उन्हें लगता है कि बचपन से आलस्य और आरामपरस्ती की शिकार सतानो आसानी से श्रमशील नहीं बन सकेंगी। सिखाने के लिए कोई काम बताने पर सतानो उनकी शिकायत अवश्य ही अपने भाईयों से कर देंगी। तब उन्हें अपने-अपने पतियों के दण्ड का भागी बनना होगा जैसा कि हमारे साथ हुआ है। ”
मँझली भाभी भी अपनी देवरानियों का बचाव कर रही थी।
“ लेकिन हम दण्ड के भय से भी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं हो सकते। भाभी माँ समान होती है और माँ हर कीमत पर अपनी सन्तान का भला ही चाहती है, भला ही करती है। ..... काश ! लोककथा कहने वाली महिलाएँ इसे समझ सकतीं, तो हमारे हृदय का क्लेश मिट जाता। ”
बड़ी भाभी ने गहरी निःश्वास भरी।
दो बूँद आँसू उसके नेत्रों से टपक पड़े। शेष दोनों भाभियाँ भी सुबकने लगीं।
सुषमा का हृदय उनकी वेदना से भर गया। उसके जेहन में एक दृढ़ निश्चय उभर कर उसके स्वरों से फूट पड़ा।
“ भविष्य में ऐसा नहीं होगा। भैया दूज पर अब सतानो की कहानी में सतानो के प्रति तुम्हारी सद्भावनाओं और सदिच्छाओं को बताया जाएगा। अब कहानी में सतानो के भाईयों को सतानो के प्रति अपने प्रेम में निहित सतानो का अहित समझना ही होगा और समझना होगा सतानो को भी कि उनकी भाभियाँ उन्हें उतना ही प्रेम कर सकती हैं जितना कि उन्हें जन्म देने वाली उनकी माँ। अतः उसे भी भाभियों को अपना शत्रु या भातृ-प्रेम से दूर करने वाली न समझ कर उन्हें मातृवत् ही समझना होगा। ”
उसके दृढ़ स्वर को सुन कर भाभियों के चेहरे खिल उठे। कृतज्ञता और अतिशय प्रेम के आवेग में उन तीनों ने उसे अपनी बाहों में भर कर गले लगाना चाहा।
लेकिन ?
“ अरे...रे ! कृपया ऐसा न करें। आपके घाव दुःख जाएंगे....... आपके घाव दुःख जाएंगे। ” कहते हुए सुषमा तेजी से पीछे हटी।
“ अरे ! अरे ! ये क्या कर रही हो, गिर जाओगी। ” माँ के चिन्ताकुल स्वर कानों में पड़ते ही सुषमा ने आँखें खोल दीं। देखा, माँ मन्दिर जाने को तैयार खड़ी थी। सूरज सिर पर चढ़ आया था।
सतानो की भाभियों के खिले हुए चेहरे अभी भी उसके नेत्रों के समक्ष झिलमिला रहे थे। स्वप्न से यथार्थ में आने में उसे कुछ क्षण लगे।
समय पंख लगा कर उड़ता रहा। माह-दर-माह बीतते साल कैसे बीत गया कुछ पता ही न चला। पिछली गर्मियों में सुषमा के सबसे बड़े भाई का विवाह हुआ और सुषमा बन गई अपनी भाभी की ननद।
कहते हैं इतिहास अपने को दुहराता है। फिर यह तो त्यौहारगत पारिवारिक इतिहास है, इसे तो दुहरना ही है।
आज फिर भैया दूज है। पिछले वर्षों की तरह आँगन में चौक बनाई गई है। किन्तु आज पूजा की थाली सुषमा या माधवी ने नहीं, बल्कि उनकी भाभी ने सजाई है।
पूजा करने के उपरान्त माँ ने कहानी कहना आरम्भ किया, “ एक थीं सतानो। सतानो के थे सात भाई।.........”
माँ कहानी कहती जा रही थी।
सुषमा एकटक अपनी भाभी के चेहरे को देख रही थी। सुषमा देख रही थी कहानी सुनते हुए उसकी भाभी के चेहरे पर दैन्यता, अपराधबोध, आक्रोश .... और भी न जाने कितने रंग आ-जा रहे थे।
माँ कहानी के अंत की ओर तेजी से बढ़ रही थी।
“ हाय, भईया तुम सब कहाँ हो ? यदि आज तुम होते तो मेरी यह दुर्दशा न होती...मेरी भाभियाँ मुझे कठिन-कठिन काम बता कर यूँ न सता पातीं.....”
सतानो का उपर्युक्त आरोप सुनते ही सुषमा को लगा कि सतानो की भाभियाँ उसकी अपनी भाभी के चेहरे पर उभर-उभर कर उसकी ओर आशा भरी निगाहों से देख रही हैं। उसे वर्ष भर पूर्व सतानो की भाभियों से हुए साक्षात्कार और उन्हें दिए गए अपने वचन स्मरण हो उठे। तत्क्षण ही वह बोल उठी, “ नहीं माँ ! आप कहानी में कुछ भूल रही हैं। सतानो की भाभियाँ सतानो को बहुत प्रेम करती थीं। वे सतानो को काम उन्हें सताने के लिए नहीं, वरन् उनके भावी गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने के लिए, उन्हें घरेलू काम-काज की ट्रेनिंग देने के लिए, दे रही थीं। ” सुषमा कहती जा रही थी और एकटक अपनी भाभी को देखती भी जा रही थी।
उसने कहना जारी रखा, “ आगे की कहानी मैं सुनाती हूँ माँ। हाँ, तो सब सुनें। ..... हुआ यह कि सतानो के भाई जब सतानो को साथ लेकर घर पहुँचे तो जिन भाभियों ने सतानो को काम बताए थे उन्होंने निर्भयतापूर्वक स्वीकार किया कि वे ही वे तीन भाभियाँ हैं जिन्होंने सतानो को काम बताए थे।
उनमें से बड़ी भाभी ने सभी भाईयों से कहा, “ आप सब जब धन कमाने परदेस गए थे तब सतानो मात्र सात वर्ष की थीं। छह वर्षों तक हमने आपकी आज्ञा का पालन किया किन्तु अब सतानो चौदह वर्ष की हो गई हैं। कल को उनका ब्याह होगा तब उन्हें भी हमारी तरह ससुराल में घर-गृहस्थी केे अपने सभी कर्त्तव्य पूरे करने होंगे। अब यदि उनमें घर-गृहस्थी के सामान्य काज-काज करने का भी कौशल नहीं होगा तो सतानो का जीवन कितना विषादमय होगा ! यही सोच-सोच कर हमारा हृदय फटा जाता था। इसी कारण हमने काम-काज सिखाने की इच्छा से सतानो को काम बताए जो उन्हें कठिन केवल इसलिए लगे क्योंकि सतानो ने कभी भी हमारे द्वारा किए जाने वाले ऐसे ही कामों में न तो कोई रुचि ली और न ही कभी हमारे कामों में हाथ बँटाने की कोशिश की। ”
मँझली भाभी ने कहा, “ हमें सबसे अधिक दुःख तो इसी बात का है कि सतानो ने दिए गए किसी भी काम को पूरा करने की कोई ईमानदार कोशिश भी नहीं की। उन्होंने जो कुछ भी हमें दिखाया वह उन्होंने नहीं, वरन् हमारे घर में आश्रय पाए हुए जन्तुओं ने किया था। ”
छोटी भाभी ने दृढ़ स्वर में कहा, “ सच मानिए, हम सभी सतानो को उतना ही प्रेम करते हैं जितना कि आप सब। लेकिन आपके अतिशय लाड़ भरे आदेश के कारण सतानो की कर्म-निष्क्रियता ने सतानो की बुद्धि का विकास अवरुद्ध कर दिया है। उनकी बुद्धि में विवेक का जागरण न हो पाने से वे अपने मित्र-शत्रु में भेद करने की क्षमता से हीन हैं। ऐसी स्थिति में वे अपनी भाभियों को गलत समझ कर उनकी झूठी शिकायत कर सकती हैं। इसी संभावना के चलते आपसे दण्ड पाने के भय से हमारी देवरानियों ने सतानो से कभी कोई काम नहीं कराया। लेकिन हम तीनों अपनी देवरानियों से बड़ी है। सतानो के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का अहसास अधिक है हमें।”
बड़ी भाभी ने विनम्र शब्दों में कहा, “ सतानो को काम-काज सिखाने हेतु काम बताने के बदले मिलने वाले आपके दण्ड के भय से अधिक हमें सतानो के भविष्य की चिन्ता है। अब यह जानने के पश्चात् भी यदि आप सब समझते हैं कि हमने गलत किया है, हम सतानो के अपराधी हैं तो हम तीनों दण्ड भोगने के लिए तैयार हैं। ”
सतानो के भाई उनकी बात सुन कर हतप्रभ थे। अपने अतिशय लाड़ में वे सतानो का कितना बड़ा अहित कर रहे थे, उसका उन्हें सपने में भी अनुमान न था। उन्होंने बिना समझे-बूझे अपनी-अपनी पत्नियों को दुर्वचन कहने के लिए उनसे क्षमा माँगी और सतानो को समझाया कि तुम्हारी सभी भाभियाँ तुम्हें उतना ही प्रेम करती हैं जितना कि हम। उन्होंने जो कुछ भी किया उसमें तुम्हारी भलाई ही निहित थी, कोई घृणा, वैमनस्य या ईर्ष्या-द्वेष नहीं। ऐसा सुन कर सतानो बहुत प्रसन्न हुई। उसने दौड़़ कर अपनी भाभियों को प्यार से गले लगा लिया और अपने दुर्व्यवहार के लिए उनसे क्षमा माँगी।
जैसे सतानो के दुःख दूर हुए वैसे ही हर बहन के दुःख दूर हों। जैसे सतानो के भाई-भाभियाँ थीं, वैसे ही हर बहन के भाई-भाभी हों। ”
कहानी समाप्त कर सुषमा ने अपनी वाणी को विराम दिया।
उसे लगा उसकी अपनी भाभी के चेहरे पर एक-एक कर सतानो की भाभियों के चेहरे उभर रहे हैं। उन चेहरों पर कृतज्ञता और आह्लाद अठखेलियाँ कर रहे हैं।
अचानक सुषमा की भाभी उठी और उसने उसे अपनी बाहों में भर कर गले से लगा लिया।
सुषमा को लगा कि उसकी भाभी के हाथ उसके अपने हाथ नहीं हैं बल्कि वे सतानो की भाभियों के हाथ हैं। अब वे हाथ जले हुए नहीं थे वरन् गोरे-गोरे सुन्दर स्वस्थ हाथ थे।
सुषमा ने असीम आत्मतृप्ति के साथ अपनी आँखें मूँद लीं। उसके होंठों पर उजली मुस्कान तैर उठी।