गुरुवार, 28 अगस्त 2025

संवाद

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                                                                             ब्लॉग प्रस्तोत्री

                                                                          डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव

                                                          प्रबन्ध सम्पादक ‘अवध-अर्चना’ अयोध्या , उ0प्र0 , भारत

सोमवार, 25 अगस्त 2025

विजय रंजन कृत कतिपय समीक्षाएँ : प्रथम किश्त

कविता की रोचक डुगडुगी :‘ कितनी दूर और चलने पर ’






भौतिकतावाद के परवान चढ़ने के आज के युग में हमारे देश में नितान्त असाहित्यिक परिवेश में कविता के लिए अवकाश और अवसर प्रायः विलुप्त सा है। दाल-रोटी की जुगत में लगे रहने वाले श्रमिक/निम्न वर्ग की कौन कहे, मध्य एवं उच्च वर्ग के बहु-बहुलांश जन के लिए भी ‘कविता’ कविता-वविता जैसी चीज़ बन गई है आज। सवा अरब भारतवासियों में से साढ़े बारह हजार लोग भी नहीं मिलेंगे जो कविता के प्रयोजन, कविता की वांछा और कविता के विविध आयामों से सरोकारित हों। जो कथित कविता-प्रेमी कवि दिखते हैं, उनमें भी बहु-बहुलांश कविता को मनोरंजन मात्र का माध्यम मानते हैं। जो कथित विचारशील कवि अत्यल्प संख्या में हैं भी, वे समकालीन कविता के नाम पर कविता को गद्यगीत बनाते हैं। यदा-कदा कथित संवेदनशील कवि जो इतस्ततः दिखते हैं, वे भी कविता के वस्तुनिष्ठ अपेक्षाओं के बजाय कविता को मात्र संवेदना की अभिव्यक्ति तक सीमित मान कर शब्दों की जोड़-तोड़ को ही कविता कहते हैं। साहित्य के ऐसे त्रासद देशकाल में श्रेष्ठ शब्दायन वाले सरस गीत-नवगीत या कि उदात्त मनोभावों वाली गजल के लिए अवकाश कहाँ है ? तब, क्या आश्चर्य कि ‘बंसी और मादल’ या ‘साए में धूप’ जैसी काव्य-कृतियाँ कभी-कभार ही देखने को मिलती हैं। कुमार रवीन्द्र, नईम, नचिकेता, माहेश्वर तिवारी, इसाक अश्क, यश मालवीय, कुमार विश्वास कितने हैं आज ? ऐसी अवस्थिति में नवगीत सह गजल की श्रेष्ठ प्रस्तुति ‘कितनी दूर और चलने पर’ किसी भी सहृदय को एक बार नहीं, दुबारा-तिबारा भी पढ़ने को विवश कर सकती है। मेरी इस टिप्पणी को फतवा न मानें औ..र, स्वयं पढ़ लें आलोच्य कृति ‘कितनी दूर और चलने पर’। संवेदनशील कवि डॉ0 सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी की सद्यःप्रकाशित कृति है यह। निःसन्देह आप भी सहमत हो जाएँगे कि कृति की नवगीत और गजल विधा में अभिरूपित कविताएँ किसी भी काव्य-रसिक का ध्यान अपनी ओर संकेन्द्रित करने में समर्थ हैं।
‘ज्यों ही तने गुलेल तुरत ही मैना का डैना खुल जाए’ जैसी पंक्तियों में सहित भाव का सहज इंगित या कि ‘कुछ ऐसे हो बोल कि पिंकी, सारी वीरानी धुल जाए’, ‘मटमैली हो नदी न अब अपने उद्गम पर’, ‘बज रहे हैं डुगडुगी से वक्त के हाथों सभी’, ‘मित्र हम रोपें हरापन इस कड़े पतझार में’ सदृश काव्य-पंक्तियों के काव्योद्गार,, प्रथम नवगीत से लेकर अन्तिम गजल तक सम्पूर्ण संग्रह में विद्यमान काव्य-पंक्तियों का रसास्वादन करने के पश्चात कोई भी काव्य-रसिक मुग्ध हो सकता है कृति पर। वहीं, सहित भाव, प्रादुष्कृतमन्यथा,शिवेतर की क्षति के दिशाबोध आदि भी भरपूर वाचाल हैं संगृहीत विभिन्न कविताओं में।
प्रकटतः, कृति की बहु-बहुलांश कविताएँ कवि की उत्कट काव्य-भावनाओं की उच्छल तरंगों को मात्र अभिव्यक्ति देने के लिए बेचैन नहीं प्रतीत होतीं, प्रत्युत काव्योचित अनेकानेक सद्गुण उच्छलित दिखते हैं कृति में। यथा --
“ बहुत शोर है, चलो बनाएँ नीड़ किसी बादल में हम तुम......”, “ कुछ तो कम हो उमस घनेरों की, तोड़ो अपने काँच खिड़कियो, घबराना मत इस आँधी में, अगर चटकना पड़े टहनियो ”, “ हाँ बताओ हम करें बर्दाश्त उनको किस तरह, ढोलकों पर आदमी की खाल मढ़वाते हुए ” सदृश पंक्तियों में ‘छन्दांसि यज्ञाः....भूतम् भव्यं....सृजते’ और ऊर्ध्ववाही संचेतना को मुखर करता है कवि। ऐसी लोकमांगलीय काव्य-साधना सर्वत्र परिव्याप्त दिखती है समीक्ष्य कृति में। प्रकट-अप्रकट स्वरूप में उदात्तता, मानवता, मानवीयता जैसे मानवोचित सद्गुणों का कुतुबनुमाई आरेखन आलोच्य कविताओं की विशेषता है।
औ..र, “ कौन कहता है आस्माँ में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों ” की तर्ज पर प्रत्युत उससे भी बढ़ कर आशावादी कर्मशील तमसः परस्तात को साकार करते हुए कवि लिखता है -
मोम की मानिन्द पिघलेगी अचानक जिन्दगी,
एक ठोकर मारिए तो इस कड़ी चट्टान को।
“ आँखों से अधिक रगों में अश्रु रहे हैं तैर ”, “ पाँव तले उभरे हैं देखो कितनी घनी नागफनियाँ ”, “ काट दिया कुछ लोगों ने कल, बस्ती का आखिरी नीम भी ”, ” कमरा है कमरे में घड़ी है रुकी सुईयों वाली ”, “ अरहर के खेतों से जीवन में दुबक गया खरगोश कहीं उल्लासों का ” आदि-आदि के माध्यम से कृतिकार वर्तमान की प्रतिकूलताओं और आसपास विद्यमान मानवीयता-विरोधी दुष्चक्रों को रेखायित करता है फिर भी “ गली-गली दुष्चक्र रचे हैं उच्छंृखल तम ने, किन्तु न अपनी कसम कभी तोड़ी पूनम ने ”, “ शुक्ल पक्ष हैं, अंधकार में हम, विश्वास नहीं रखते हैं ” जैसी व्यवहारविद् पंक्तियाँ रच कर तमोनुबेध का कवि-दायित्व भी निर्वहित किया है कवि ने। “ पृथ्वी के सारे काँटों की नोक और ये पैर, है न हमारी खैर ” लिख कर परिवेश में फैली दुश्वारियों के समक्ष अपनी अल्प सक्षमता को वाचाल करता है कवि। ले..कि..न, ‘स कवि काव्याः पुरुरूपम् द्यौरिव पुष्यति’ के ऋग्वैदिक निदेशन को रूपायित करते हुए “ अद्भुत गंध मिली प्राणों को, हम गुलाब से विहँसे जब तब ”, “ उड़ जाएँ मोर न घबरा कर, चुप रखने हैं आँगन इतने ” सदृश काव्यादर्श भी प्रस्तुत करता है कवि।
वस्तुतः ‘न न्यूनम्, न अधिकम्’ के शास्त्रोक्त स्वरूप में कृति में प्रयुक्त शब्द, अर्थ, भाव के प्रायः सभी सद्गुण भीें आद्यन्त समोए हुए हैं इन कविताओं में इस सीमा तक कि प्रायः सभी गीत-नवगीत और गजलें किसी भी कविता-प्रेमी की टकटकी को स्वयं में बाँध लेने में सक्षम दिखते हैं।
वहीं, बिम्बवाद, वक्रोक्ति, अन्योक्ति, औचित्य सदृश काव्य-गुण तो सराहनीय स्वरूप में विजडि़त हैं ही आलोच्य कृति में। मुखपृष्ठ पर मुद्रित बिम्बवादी चित्रांकन और कृति-शीर्षक ‘कितनी दूर और चलने पर’ से लेकर कविता-शीर्षक ‘आए बहेलिए’, ‘पीतल की दृष्टियाँ हमारी’, ‘हम दरख्त हैं’, ‘आखिरी नीम’, ‘चिन्दी चिन्दी हम’, ‘गर्म हवा लिपटी है हमसे’, ‘छुओ उँगलियों से’, ‘तलवारों पर चलना’, ‘ओ दुनिया के कर्ज’, ‘देह सो गई’, ‘दुनिया है रंगोली जैसी’, ‘एक अदद तारा मिल जाए’, ‘सारी धूप पड़ी हम पर ही’, ‘ओ नदी’, ‘हिलती-डुलती मेजें हैं’, ‘साजिश अमावस की’, ‘एक तो शीशम मिले’, ‘हर निःश्वास एक कुबड़ा है’ आदि में कवि ने बिम्बवाद का सफल रूपायन साकार किया है। इस तरह अभिधा के साथ-साथ व्यंजना और लक्षणा की दृष्टि से भी श्रेष्ठ कही जाएंगी आलोच्य रचनाएँ। 
प्रकृतिवाद के निकष पर देखें। वस्तुतः प्रकृति के उपादानों के सटीक प्रयोग से आलोच्य कविताएँ इस निकष पर भी सराही जाएंगी। प्रतीततः कवि को पक्षियों से विशेष लगाव है। कपोती, चकोर, सुगना, तोता, चकवी, बया, तीतर, बटेर, गौरेय्या, मैना, बत्तख, पिकी, टिटहरी, श्यामा, बुलबुल पहली कविता ‘आए बहेलिये’ में ही नहीं, बाद की अनेकानेक कविताओं में भी विभिन्न रूपकों में उपभुक्त हैं। गुलाब, नदी, वसन्त, शिला, चाँद, सूरज आदि के सुचारु प्रयोग कविताओं के प्रकृतिवादी होने के गहन साक्षी हैं। तीज-त्योहार से लेकर सड़क, पुल, रेलिंग, लालटेन तक का औचित्यपूर्ण प्रयोग भी है। प्रकृति, परिन्दे आदि का प्रचुर प्रयोग आलोक धनवा की कविताओं में भी है। ‘पहाड़ पर लालटेन’ वाले मंगलेश डबराल में भी प्रतीकात्मकता पर्याप्त है। प्रतीकात्मकता से रचना को गुरु-गम्भीर बनाने का काम नकेनवादी कविताओं के संग्रह ‘पश्पशा’ में भी दृश्यमान है ले..कि..न इन कवियों द्वारा प्रयुक्त प्रतीकात्मकताओं से आलोच्य कविताओं की प्रतीकात्मकता में मुख्य अन्तर है प्रयुक्त बिम्बों का सहज साधारणीकरण। प्रत्युत अन्यान्य कवियों से कहीं अधिक वाग्वैचित्र्य और वाग्वैदग्ध्य मुखर है आलोच्य कृति की कविताओं में ।
सारतः प्रचुर मानवीय संवेदना, मानवता के प्रति सचेतनता औ..र वैश्विक विसंगतियों से जूझने के भाव आलोच्य कृति की अधिकांश गीतिक रचनाओं को गीतांगनी में प्रथम बार निरूपित नवगीतिक निकषों से समेकित सिद्ध करते हैं। खटकने वाली बात है कि स्वयं रचनाकार कवि ने आलोच्य नवगीतों को ‘गीत’ क्यों कहा ?
औ..र, गजलें। ‘आँधियाँ, ज्वालामुखी, चिन्गारियाँ, शोले, अब गजल की हैं यही वंशावली बाबा’ की प्रकृति वाली गजलें, भले ही उनमें महबूबा से बातचीत का रंग-ढंग न दिखे और वे जदीद गजलों की तर्ज पर हों --ऐसी गजलों में से अधिकांश हालात-ए-हाजरा से दो-दो हाथ करने को उद्यत दिखती हैं।
गजल प्रखण्ड (यद्यपि गजल प्रखण्ड का अलग से नामकरण नहीं है कृति में लेकिन सारी गजलें एक साथ समाहित हैं क्रमवार) की गजलों में परम्परागत साकी, सागर, मीना, मय या कि किसी महबूब को प्रायः प्रत्यक्ष सम्बोधन नहीं है। आपवादिक गजल ‘भँवर के बीच आओ तुम’ में भी परम्परागत गजलियात का तसब्बुर नहीं है। दूसरी ओर, ‘रोशनी को रात भर बेचैन रहने दो जरा, एक घायल चाँद का कुछ खून बिखरा है यहाँ’, ‘हर घड़ी नोचे गए हैं पंख मन के, हम समय के हाथ आई तितलियाँ हैं’ जैसी व्यंजनापरक शे’रों की भरमार है आलोच्य कृति में। शायर चरागों का सबक साथ लेकर गजल में आग जलाने की कोशिश करता है। “ हर नगर में एक मुर्दा रोशनी का जिक्र है, जिन्दगी को आज थोड़ा सा चलो जिन्दा करें ” जैसे व्यवहारविद् अनुरोध या सागौन की सूखती टहनियों को शाख को सींचने की सलाह वाले मिसरे ‘वाह’ कहने को विवश कर देते हैं।
गजलों में हिन्दी के साथ उर्दू और यदा-कदा देशी शब्दों का भी सफल प्रयोग किया गया है; लेकिन हिन्दीइतर शब्द-प्रयोग में भी हिन्दी-व्याकरण का ध्यान रखा गया है। फलतः काव्यमय भाषा भी कृति में आम बोलचाल की भाषा बन जाती है। संगृहीत गजलों में उर्दू के प्रचलित शब्द, भाव या कि निचबिन्दी वाले अक्षरों के प्रयोग के बावजूद आलोच्य गजलें प्रथम बार 1965 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हिन्दी गजल के नाम से सुस्थापित और निरन्तर सशक्त बनती हिन्दी गजल की विधा वाली बहुलांश विशेषताएँ उजागर करती हैं। उर्दू/फारसी की गजल-परम्परा से विलग इन गजलों में मकता भी नहीं है।
औ...र ,संगृहीत गजलें हों या गीत-नवगीत, कमोबेश सभी में आचार्य भामह के कथन कि ‘दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे लेकर कविता न की जा सके’ को साकार किया गया है कृति ‘कितनी दूर और चलने पर’ में । वस्तुतः सत् $ शिव $ सार्वसुन्दरम् की समवेत आराधना के साथ-साथ मानव-जीवन की विसंगतियों का, विद्रूपों का आलोच्य कृति में किया गया कवितायन आलोच्य कविताओं को बलशील बनाता है। जीवन में व्याप्त कुण्ठा, संत्रास आदि का चित्रांकन औ..र उतनी ही कुशलता से विविध आयामी त्रास से उबरने का दिशाबोध........ बहुत कुछ रूपायित है आलोच्य कृति में।
संक्षेपतः, आचार्य भामह ही नहीं, कविता से लोकयात्रा के सुप्रवर्तन के दिशावाहक आचार्य दण्डी एवम् आचार्य मम्मट, आचार्य भरत, आचार्य रुद्रट, राजा भोज, आचार्य क्षेमेन्द्र भी आलोच्य कृति की कविताओं के नेपथ्य में यत्र-तत्र-सर्वत्र मुस्कुराते दिखते हैं। उन सभी के काव्य-निकषों का प्रायः सम्यक् अनुपालन दृश्यमान है यहाँ। तथैव, कृति किसी भी शास्त्रीय समीक्षक को (नव्य समीक्षक एवं आधुनिक समीक्षक को भी) आलोच्य कविताओं की प्रतिक्रिया में ‘पुनः क्वापि’ कहने के लिए विवश करेगी अवश्य।
यतः कृति के अंतिम पृष्ठ पर अंकित डॉ0 रविशंकर पाण्डेय की आमुखी आशंसा से भी सहमति जतानी होगी जिसमें आलोच्य कृति को परिवेश संचेतना, सामाजिक संचेतना तथा मानवीय संचेतना के साथ अपने समय का एक गहरा कालबोध, लोकजीवन से गहरा सरोकार, देशज और ठेठ के प्रति लगाव, तीव्र कालबोध और साधारण के प्रति असाधारण प्रतिबद्धता से अभिनामित किया गया है। तदनुसार कृति ‘कितनी दूर और चलने पर’ का मनीषी साहित्यकों द्वारा स्वागत अवश्य किया जाएगा। ऐसी कविता-कृतियाँ यदि पाठक को मिलती रहें, तो निश्चय ही उससे कविता-जगत् से जन के बिलगाव को दूर किया जा सकेगा-- ऐसी आशा जगाने में भी समर्थ है आलोच्य कृति। 
समीक्ष्य कृति : कितनी दूर और चलने पर
कृतिकार : डॉ0 सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी(प्रमुख सचिव, उ0प्र0 शासन लखनऊ)
पृष्ठ : 134   ,  मूल्य : रु0 195/-
प्रकाशक : अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद (उ0प्र0)
दूरभाष : 9415347186, 9415763049
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नारीवाद का सत्वशील पाठ है ‘आह्वान




अभिव्यक्ति संस्था के तत्त्वावधान में सुलभ प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित समीक्ष्य कृति ‘आह्वान’ प्रदेशीय राजधानी लखनऊ की 17 चुनिंदा श्रेष्ठ महिला कथाकारों की कहानियों का संकलन है।

कुछेक माह पूर्व इस संकलन की एक प्रति भेंट करते हुए उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान की प्रकाशन अधिकारी आदरणीया डॉ0 अमिता दुबे ने कृति की समीक्षा का अनुरोध किया था।
वस्तुतः समीक्षा/समालोचना एक ऐसी साहित्यिक विधा है कि इसके नाम से अच्छे-अच्छे समीक्षक आगतेय खतरों से सिहर-सिहर जाते हैं। चतुर सुजान लेखक संभवतः इसीलिए समीक्षा की विधा से सिरे से कन्नी काट जाते हैं इसलिए कि समीक्ष्य कृति का प्रणेता स्वयंभू, परिभू होता है। वह माननीय भी होता है। उसे अपनी तनिक सी आलोचना भी प्रायः स्वीकार्य नहीं होती।
औ..र, कृति रचयिता यदि माननीया लेखिका हैं तो.....। एक अकेली मानिनी नारी बहन, बेटी, पत्नी, सखा किसी भी रूप में प्रतिहिंसक बन कर अपने आपा पर आ जाए तो शिकारित पुरुष की ऐसी की तैसी सुनिश्चित है। ‘आह्वान’ में तो सक्षम कलम की धनी 17 माननीया लेखिकाएँ हैं; वह भी प्रदेशीय राजधानी लखनऊ की प्रबुद्ध समाज की सदस्याएँ। त..थै..वः, ‘आह्वान’ की समीक्षा से प्रथमदृष्टया भारी-भरकम खतरे बार-बार बरज रहे थे इन पंक्तियों के लेखक को प..र..न्तु कालिदासीय पर्युत्सकीय भाव के निर्देश उतना ही उकसा भी रहे थे ‘आह्वान’ की साहित्यिक सुरभि से विस्तृत पाठक-वृन्द को आसिक्त करने/कराने के लिए।
औ..र, साहित्यिक दायित्व निर्वहन में कलम के सिपाही को निजी हानि-लाभ से परे तो जाना ही पड़ेगा। त..ब, प्रणेता कथाकारों को प्रिय प्रतीत हो या अप्रिय, समीक्ष्य कृति ‘आह्वान’ की समालोचना से बचने का कोई सारवान् तर्काधार अलभ्य था। अतएव तद्गत काक-दृष्टीय विहंगावलोकन एतद्द्वारा सम्प्रस्तुत है-
‘आह्वान’ के समवीक्षण से प्रारम्भ में ही कई प्रश्न उभरते हैं-
- क्या कृति-कथ्य किसी मुक्ति-कामना की प्रतिध्वनि है ?
- क्या यह कतिपय लेंखिकाओं का बैठे-ठाले का मनोरंजन है ?
- क्या यह किसी सुनियोजित विचार-विमर्श की कृति है ?
- क्या यह कृति साहित्यिक अपेक्षाओं की सम्पूर्ति करती है ?
- क्या यह ऊर्ध्ववाही, ज्ञानवाही है ?
- यदि यह मात्र मनोरंजनवादी या मनोरंजनपरक कृति नहीं, तो क्या इसका विमर्श नारीवादी है ?....... आदि-आदि।
पाश्चात्य विचारक कवयित्री माया एंजिलो की कविता ' Why the Birds Sing ---' की सुधि भी आई आलोच्य परिप्रेक्ष्य में।
तथ्यतया साहित्य ज्ञानवाही हो या मनोरंजनवादी, यह बहस अरस्तू के समय से साहित्य जगत् में गतिमान है। पाश्चात्य अभिमतों से इस फलक पर उभय पक्ष केे पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा चुका है, कहा जा रहा है। अद्यतन परिणाम अनिर्णीत है। हाँ, भारतीय अभिमत से प्रश्नगत प्रश्नचिह्न के समाहार लभ्य है। राजा भोज के शब्दों में कह सकते हैं- “ सः परिष्कारकः। ” आचार्य मम्मट साहित्य/काव्य से व्यवहारविदे और शिवेतर क्षतए आदि कहते हैं। छान्दोग्यकार साहित्य को ‘भूतम् भव्य सृजते.....विश्वमेत’ कहते हैं। यजुर्वेदकार इसे ‘आदित्यवर्णः तमसा परस्तात’ बताते हैं। संयोगात् ‘आह्वान’ में संकलित कहानियों का समग्र महाकथन तमोनुबेधक है, परिष्कारक है, तमसः परस्तात भी। यह व्यवहारविद् एवं शिवेतर क्षतए से समन्वित भी है और भूत (जीव) को भव्य बनाने की दिशा में अग्रसर भी। इस प्रकार ‘आह्वान’ की कहानियों को कतिपय लेखिकाओं का बैठे-ठाले का मनोरंजन मात्र नहीं कह सकते अपितु प्रतीततः वर-विचार से आसिक्त साहित्यिक कृति ही माना जाएगा इसे।
जहाँ तक माया एंजिलो की मुक्तिकामना वाले उपरि-अंकित गीत या कि नारीवादी विमर्श का फलक है, उस फलक से परे है आलोच्य कृति में संकलित बहुलांश कहानियों का कथ और कथ्य। 
जाने क्यों लेखिकाओं को जाने-अनजाने अधुना नारी विमर्श से जोड़ दिया जाता है, जबकि नारी के पुरुष-समकक्ष सामाजिक/राजनैतिक अधिकार की माँग से 18 वीं शताब्दि के अन्तिम दशक में उभरी उत्तरी योरोपीय नारियों की माँग से आरम्भित नारी-विमर्श नारी की स्वायत्तता A room for ones own से बढ़ते-बढ़ते नारी की पूर्ण उन्मुक्ति और फिर 20 वीं शताब्दि के उत्तरार्द्ध में उससे भी आगे बढ़ कर यौन-उच्छ्रंखलता के सीमान्त पर जा पहुँचा। सन् 1791 में फ्रेंच नाटककार राजनीतिज्ञ ओलम्पीद गूजे ने महिला-अधिकारों का घोषणापत्र लिख कर जिस नारीवाद को जन्म दिया था, उसका पल्लवन उत्तरी योरोपीय नारी-आन्दोलनों में हुआ और यह सन् 1963 में अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन IVOW -USA तक साकार हुआ। बाद के वर्षों में वही नारीवाद अपरूपित हो गया। नारीवादी आन्दोलन के तीसरे चरण में नारीवाद के अपरूपण की निन्दा भी अनेक विदुषी महिला साहित्यकारों/पश्चिमी नारीवादियों नामतः बेट्टी फ्र्रीडन, मिसेज डेक्टर, फिलिस शेलेफली आदि द्वारा की गई। मोना चारेन, सूसन, ब्राउन मिलर आदि ने उच्छ्रंखल यौनस्वतंत्रता वाले नारी-आन्दोलन को ‘डिप्रेशन’ एवं ‘सामाजिक विकृति’ तक कहा। लेकिन ग्लेरिया स्टीनम हों या हिन्दी जगत् में कृष्णा सोबती, कमलादास, प्रो0 कमलेश कुमारी आदि-- वे सभी नारी-विमर्श के नाम पर कथित यौनक्रान्ति, पुरुष-विरोध आदि को अपने लेखन का मूलाधार बनाए रखने पर अडिग-सी दिखती हैं। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी है कि महिला साहित्यकारों के लेखन में प्रथमदृष्टया ऐसे ही किसी पुरुष विरोधी, पूर्ण स्वच्छन्द यौन-उन्मुक्त नारी के जयकारा की तलाश की जाने लगी है।
संतोषप्रद ही नहीं अपितु हर्षप्रद है कि नारीवाद के ऐसे किसी विकृत अपरूप से परे है ‘आह्वान’ की कहानियाँ।
विदित हो कि दिग्भ्रमित नारीवाद से हमारा साहित्य जगत भी पर्याप्त विभ्रमित हुआ। हमारे देश/समाज में भी भौतिकतावाद, उपभोक्तावाद के पैसार ने ‘नारी’ को देह-केन्द्रित करके विशेषकर उसके बाजारीकरण को बढ़ावा दिया और इसे ही नारीवाद का परचम माना जाने लगा। ग्लेरिया स्टीनम या चार्र्लाेन चुंच न सही तो भी मेरी वोल्सटन के नारी-विमर्श से लेकर हेनरी फ्रिशर के ‘नई सदी में स्त्री: प्रथम सेक्स की माँग’ तक की प्रतिच्छवि तलाशने लगे हमारे विचारशील युवा समीक्षक भी हर नारी-लेखन में। राजकुमार गौतम, मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रभृति अधुना समीक्षक भी बच नहीं सके ऐसी अपरूपता से। ले..कि..न प्रशंसनीय है कि प्रश्नगत अपरूपता के बजाय ख्यात लेखिका आशारानी ह्वोरा के ‘स्त्री सरोकार’ की खाँटी भारतीय नारी के करुणा, ममता, प्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा, सत्त्व, शिवत्व, ऋतत्व आदि से सरोकारित दिखता है आलोच्य ‘आह्वान’। उषा महाजन ने बाधाओं के बावजूद ‘नई औरत’ में भारतीय स्त्री की नैतिकता परम्परा का जो पोषण रूपायित किया है, वह भी वाचालित करती हैं ‘आह्वान’ की कहानियाँ। इन कहानियों में ‘इसको या उसको’, ‘वह जो तुम नहीं हो’, ‘पँख सा’, ‘एक कतरा आसमान’ आदि में नारी की इयत्ता को स्वरित किया गया है, अवश्य, परन्तु वह पाश्चात्यवादी नारी-विमर्श के विकृतरूप-सा नहीं है। ‘पीले गुलाब की हँसी’ (शीला मिश्रा) में मेरी वोल्स्टन प्रणीत पितृसत्तात्मकता का विरोध तो है लेकिन वह भी सकारात्मकता से आसिक्त है। कह सकते हैं कि मनीषा कुलश्रेष्ठ कृत ‘हम सब औरतें’ में 74 स्त्रीपाठ के 74 आलेखों में उकेरित न्याय-अभीप्सा, आत्मबल से वंचित की पक्षधरता आदि अधिलक्ष्यों के बावजूद आलोच्य कृति का पाठ-समग्र नारीवाद के 75वें पाठ की अपेक्षा साकारित करता है।
एक-एक कर देखें-
वयःसिद्ध ख्यात लेखिका स्वरूपकुमारी बख्शी कृत कहानी ‘धड़कन’ में भारतीय नारी के अंतःस्तल में पैठी स्वाभाविक करुणा, ममता भरपूर उकेरित है। अनाम ‘कुली’ की कर्त्तव्यनिष्ठा ईमानदारी भी भरपूर मुखरित है इसमें। कुली को कहानी-नायक बना कर कहानी-नायिका अपनी ममता, करुणा को साकारित करती है। इस तरह डॉ0 श्यामसुन्दरदास के शब्ग्दों में कह सकते हैं कि कहानी आख्यायिका बनते-बनते ‘आख्यान’ बन गई है। यह संकलन की एक सशक्त कहानी है। कहानी का प्रमुख कथ्य वहीं पूरा हो जाता है, जहाँ कहानी-नायिका कुली के द्वारा लौटाए गए चार सौ रूपए कुली के बेटे को पुस्तक खरीदने के लिए भेजने के लिए दे देती है। कुली का कृतज्ञता-ज्ञापन भी स्वीकार किया जा सकता है कुली के चरित्र-चित्रण की दृष्टि से। परन्तु कहानी का अन्तिम दुःखान्त परिच्छेद जिसमें जम्मू स्टेशन पर कुली के दिल की धड़कन बन्द होने का चित्रांकन है, कथ्य की दृष्टि से अनावश्यक है। संभवतः कहानी को कारुणिक बनाने की ललक में लेखिका ने अन्तिम परिच्छेद के निवेशन-औचित्य की ओर ध्यान नहीं दिया।
संकलन की द्वितीय कहानी ‘पीले गुलाब की हँसी’ भी एक सशक्त कहानी है। इसमें मेरी वोल्सटन-प्रणीत पितृ सत्ता पर प्रश्नचिह्न तो उकेेरित है ही, नारी की सक्षमता, आत्मविश्वास आदि भी स्वनित है। परन्तु यह कहानी जैसा कि लेखिका स्वयं मानती है, अपसंस्कृति, अविवाहित मातृत्व आदि को भी वाचालित करती है। ऐसी मान्यता परिवार-व्यवस्था, समाज-व्यवस्था के हित के विपरीत है। कन्या-भ्रूण हत्या के विरोध जैसे विषयों को भी समेटने का प्रयास है कहानी में औ..र, कहना होगा कि आलोच्य प्रयास सबल सफल भी है। त..द..पि कहानी की सशक्त पात्र पल्लवी के कार्यकलाप नारी-समाज या वृहत्तर समाज के वृहत्तर हित-साधन में समर्थ नहीं हैं। पल्लवी का चरित्रांकन बहुत कुछ पाश्चात्य आधुनिकाओं जैसा ही है। ‘दिस इज़ नन ऑफ योर बिजनेस, नाइदर एनीबडीज़। शी इज़ ओनली माइन’ जैसा वाक्य आश्चर्यचकित नहीं करता। पल्लवी के चेहरे पर संकल्प की दृढ़ता, उजास की किरणें और भविष्य के प्रति आशा भी कथानक की दृष्टि से असामान्य नहीं, परन्तु लेखिका ने अधुना आधुनिक (अप)संस्कृति सम्बन्धी जो प्रश्न उकेरे हैं, उनका उत्तर नहीं है प्रश्नगत संकल्प-दृढ़ता आदि। लेखिका वांछनीय उत्तर से कन्नी काट जाती है और आलोच्व्य कन्नी को ढकने के लिए ‘गदबदी बच्ची की किलिकारी’ का सहारा लेती है। ‘गदबदी बच्ची’ का प्रयोग लुभावना है। फिर भी अनसुलझे प्रश्न प्रस्तुत करके उत्तर न देना व्यवहारविदे, शिवेतर क्षतए आदि के विपरीत है।
एक पक्ष और। ‘पीले गुलाब’ का बिम्ब काव्य-रूढि़ से श्रमिक-शोषण के विरोध के रूप में मान्य है। लेखिका ने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया है। फिर भी कमलेश्वर की कहानी ‘पीला गुलाब’ से परिप्रेक्ष्य-इतर होते हुए भी कम सबल नहीं है आलोच्य कहानी कथ्य, कथानक आदि की दृष्टि से। हाँ, ‘वसन्तनुमा वीरानी’ जैसे विरोधाभास की छोटी-मोटी विभ्रमपरक त्रुटियाँ हैं कहानी में। वसन्त में वीरानी नहीं होती। सूखी पत्ती, सूखी नदी आदि भी वसन्त नहीं हेमन्त के प्रतीक माने जाते हैं।
संकलन की तीसरी कहानी ‘अग्निपुष्प’ वर्णनात्मक शैली में लिखी गई सशक्त शीर्षक वाली कहानी है। वर्णन सशक्त है। ले..कि..न, कहानी का कथ्य क्या है, यह अन्त तक स्पष्ट नहीं है। कला फोटोग्राफर अन्ना श्रीमोहन से लेकर शुभम् मानसी और बौद्ध भिक्खु आदि-आदि की छवियों को उभारती ही रह गई है। कथ्य के फलक पर लेखिका की चुप्पी अखरती है।
अग्रेतर, कहानी ‘कोई एक पल’ (लेखिका ऊषा चौधरी) भी संग्रह की एक सशक्त कहानी है। शीर्षक से लेकर कथ्य-कथानक तक चुस्त-दुरुस्त कारुणिक कथानक के बावजूद कहानी-नायिका माला नाटकीय घटनाक्रम में अपंग हो जाती है। अपंग माला के प्रति लेखिका की संवेदना श्लाघनीय है। घुटने के ऊपर से कटे दोनों पैर वाली माला जिस ढंग से आत्मनिर्भर जीवनयापन कर रही है, उससे लेखिका की आशा ‘अमलतास की तरह खिल उठने की आशा’ निराधार नहीं लगती। दुर्योग से यहाँ भी फैजाबाद का लँगड़ा (आम) उपभुक्त है। लेखिका संभवतः भूल गई कि लँगड़ा आम बनारस का है, फैजाबाद का नहीं। तदपि ऐसी भूलें कहानी के आलोच्य कथ-कथ्य आदि की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
सुषमा श्रीवास्तव-प्रणीत ‘कोड़े’ भौतिकतावादी अर्थलिप्सा से आग्रस्त कहानी-नायिका कोइली की कहानी है जो अपने ईमानदार पति सुशील से छुपा कर सूद पर लेनदेन का साहूकारी का कार्य करने लगती है। परन्तु कहानी के घटनाक्रम में गिरवी रखे आभूषण आदि को ‘चोरी का’ जानते ही कोइली छटपटा उठी। गिरवी सामान वापस कर आई। लेकिन एक बुढि़या की विवश गिड़गिड़ाहट के कोड़े से कोइली को अपने बचपन की गरीबी याद आ गई और अपनी शिक्षिका की सीख भी। वह चोरी नहीं .... अपनी पीढ़ी के उसूलों को अपने तरीके से स्थापित करने की सोच से बलशील हो जाती है। कहानी कसे हुए ताने-बाने में ऋतत्व की राह दिखाती है।
निशा गहलौत-प्रणीत कहानी है ‘मैं सुन्दर हूँ’। इसमें सामाजिक कुरीति पर व्यंग्य करने के साथ-साथ चारित्रिक दृढ़ता, औदार्य, करुणा, परहितता आदि को प्रांजल स्वरूप में प्रशंसित किया गया है। इन्हीं आधारों पर सफल कथ के सहारे सुन्दरता के सत्त्व को रेखांकित किया गया है। सशक्त कथानक, सशक्त चरित्र-चित्रण आदि के आधार पर इस कहानी को प्रशंस्य मानना होगा।
अग्रेतर, अलका प्रमोद-प्रणीत ‘सोचा भी न था’ भी एक सफल कथ, कथ्य, कथानक से रची-बसी सशक्त कहानी है। आधुनिक युग में धन की बढ़ती आवश्यकता में पति-पत्नी दोनों नौकरी करने को विवश हैं कि..न्तु इस तरह सन्तान उपेक्षित हो जाती है। ऐसे पति-पत्नी अपनी सन्तान के प्रति अपना दायित्व-निर्वाह कर पाने में प्रायः अक्षम होते हैं। लेखिका ने इस कहानी के प्रथमांश में यही दर्शाया है। वहीं, महानगर में ‘भिक्षा’ को व्यवसाय बनाने वालंे दरिंदे क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं, यह भी सशक्त स्वरूप में उकेरित है इस कहानी में। इससे भी बढ़ कर कहानी में रेखांकनीय है कि ‘परिवार’ में ‘पति-पत्नी और अवयस्क पुत्र-पुत्री तक सीमित अवधारणा’ के बजाय भारतीय पारिवारिक उद्भावना के अनुरूप बाबा-दादी को भी समेकित किया जाना आवश्यक है और उपादेय भी--- कहानी से लेखिका यह सात्विक संदेश सफलतया रूपायित करती है।
ख्यात कहानीकार डॉ0 अमिता दुबे प्रणीत ‘सुखमनी’ नितान्त भिन्न परिवेश, भिन्न कथ-कथानक की कहानी है। इसमें बेटा से बढ़ कर बेटी को दर्शाने का प्रयास दृश्यमान है। रिटायर्ड बलवन्त सिंह की पत्नी रूमाल कौर अपनी युवावस्था से बेटा के बजाय बेटी सुखमनी की चाहत रखती है। बेटी न होने पर पुत्रों की पत्नियों में सुखमनी/सुक्खी को ढूँढती है। बलवंत सिंह स्वाभिमानी और कर्मठ हैं। रिटायरमेंट के बाद वे सुखमनी के नाम से एक ढाबा खोल लेते हैं। रुमालकौर यहाँ भी ग्राहकों में सुखमनी की तलाश करती है। अंततः एक ग्राहक स्नेहा को सुखमनी मान लेती है वह। स्नेहा भी रुमालकौर को माँ का मान देती है। ले..कि..न दुर्भाग्य से विजय सिंह से कहासुनी हो जाने पर स्नेहा चौरसिया आत्महत्या कर लेती है। अखबार से यह जानकारी होते ही रुमालकौर विह्वल हो जाती है। बलवन्त सिंह ने स्नेहा की आत्महत्या की कदर्थना करते हुए रुमालकौर को ढाँढस दिया- ”अवश्य वह स्नेहा चौरसिया थी......हमारी सुखमनी इतनी कायर नहीं हो सकती।“ आत्महत्या की कदर्थना का एक अच्छा सन्देश देती है यह कहानी। नारी-मनोविज्ञान का यह पक्ष भी सबलतया उकेरित है आलोच्य कहानी में। फिर भी ‘सुखमनी द ढाबा’ की रौनक कहीं गुम हो जाती है। यह दर्शा कर लेखिका सुखमनी कहानी के माध्यम से परोक्षतया बेटा के बजाय माँ की बेटी की चाहत को सर्वोपरि बताती हैं।
और हाँ, आलोच्य कहानी में पंजाबी परिवार में प्रयुक्त सम्बन्धवाचक शब्दों का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण परिवेश, कथानक और परिवेश के अनुरूप पंजाबी शब्दों के सुचारु प्रयोग से कहानी अमिता दुबे की नहीं वरन् किसी अमित कौर की कहानी प्रतीत होती है। यह कहानी लेखिका की सक्षमता का अतिरिक्त परिचायक है।
अग्रेतर, शशि जैन की कहानी ‘वह जो तुम नहीं हो’ को नारी-इयत्ता की उद् घोषक कहानी कहा जा सकता है। नारीवादी विमर्श की कहानी मानी जा सकती है यह। परन्तु यहाँ भी अधुना नारी की प्रतिरूप कथित खुले दिमाग वाली कहानी-नायिका मणिका की उदारता, दयालुता के उकेर के साथ-साथ अधुना युवा नारी जिसके साथ जीवन बिताए उसके व्यक्तित्व की वास्तविकता से विवाह-पूर्व परिचित भी होना चाहती है। और उसमें भी दयालुता, करुणा, उदारता, मानवीय सद्भाव आदि देखना चाहती है। ऐसे मनोविश्लेषण सफल ढंग से रूपायित किया गया है आलोच्य कहानी में। कसे हुए ताने-बाने में कहानी सशक्त कथ के साथ-साथ सबल कथ्य को भी रूपायित करती है।
दीपक शर्मा की ‘बिगुल’ कहानी में लेखिका बिगुल बजाने की कला का आद्यन्त सटीक वर्णन करती है। बिगुल के मन्द, मध्यम, तीव्र एवं प्रबल स्वरग्राम को रेखांकित करके वह इस कला में अपनी निपुणता का परिचय देती है। इस तथ्य को गौण माना जाए तो भी घोर अभ्यास के बल से कला-सक्षमता प्राप्त की जा सकती है--इस तथ्य के सफल उकेर को उपेक्ष्य नहीं माना जा सकता। इस दृष्टि से यह कहानी एक सार्थक संदेश देती है। बिगुलवादक सरनदास जी की अवयस्क पुत्री पुलिस-समारोह में जिस तरह बिगुल का स्वरग्राम बाँधने में सफल रहती है-- वह नारी-सक्षमता का सबल प्रदर्शन है। पुलिस लाइन में अद्यतन पुरुष ही बिगुलवादक होते हैं। परन्तु सरनदास जी की सक्षम पुत्री के बिगुलवादन से न केवल उसके पिता मूँछों पर ताव बढ़ाते जाते हैं अपितु पुलिस-अधीक्षक भी पुलिस में महिला बैण्ड-संस्थापन का सुझाव शासन को देने के लिए तत्पर हो जाती हैं। ऐसी सक्षमता नारी की अपार शक्ति का द्योतन कराने में समर्थ है। नारी अस्मिता, नारी इयत्ता को ऐसे सार्थक भारतीय स्वरूप में मुखर करने के प्रति कहानी लेखिका बधाई की सुपात्रा सिद्ध हैं।
औ..र, ‘प्रवाह’ ! मंजू शुक्ला-प्रणीत इस कहानी को संकलन की सर्वाधिक सशक्त एवं लोकोन्मुखी कहानी कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगा। पर्यावरणीय चिन्ता, प्रकृति के दोहन का परोक्ष विरोध वाचाल करने के साथ-साथ मन्दाकिनी की बाढ़ से विनाशित गाँव के पुनर्वासन के निमित्त घर बनाने का सामान और फलदार वृक्षारोपण हेतु वृक्षों की माँग करके कहानी-नायिका कुसुमा बाढ़-विभीषिका का सार्थक समाधान प्रस्तुत करती है। श्लाघनीय है यह प्रयास। कहानी के कसे हुए ताने-बाने में बाढ़-विनाशित शिवकाशी की कुसुमा की मनोदशा, साथ ही उसकी कर्मठता, मानवता आदि का रूपांकन सशक्त स्वरूप में शब्दांकित किया है लेखिका ने। बीच-बीच में बालक नीलकण्ठ के बालसुलभ कार्यकलाप, राहत-कैम्प की कार्यवाही आदि का चित्रांकन सटीक है। कहानी का पहाड़ी परिवेश और यथावश्यक बोलचाल के पहाड़ी शब्दों का प्रयोग कहानी को स्वाभाविक बनाता है। वहीं, संकट की इस घड़ी में मन्दिर के पुजारी आदि का वर्ष भर की कमाई के लिए केदारनाथ जाना दर्शा कर वक्रोक्ति में शिवेतरक्षतए को साकारित करती है लेखिका।
अग्रेतर सरणि की कहानी है ‘सपना’ जो लेखिका नारायणी-लिखित राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य की कहानी है। स्वतंत्रता-आन्दोलन में शहीद हुए पिता-पुत्र जयकरन और 16 वर्षीय शिवराज के राष्ट्रवादी सपनों की कहानी है यह। जयकरन-शिवराज का ही नहीं, संभवतः 1947 में प्रत्येक भारतवासी की खुली आँखों में पल रहा था यह सपना। सदियों की दासता से देश की मुक्ति का सपना। उसी सपने को साकार करने में भारतमाता की जय बोलते हुए शहीद हुए थे जयकरन-शिवराज ले..कि..न जयकरन की विधवा शिवराज की अम्मा (लछमा) के पास 10-5 रुपए भी नहीं कि वह स्वतंत्रता मिलने की खुशी में 10-5 दिया ही जला सके और लोगों में बताशा बाँट सके। पिता-पुत्र की शहादत के बाद मजदूरी करके अपने दिन काट रही लछमा (अछूत) अपनी गरीबी के बावजूद, पति और पुत्र के शहीद हो जाने के बावजूद देश को स्वतंत्रता मिलने के अवसर पर अपनी झोंपड़ी में 10-5 दिया जलाना चाहती है, लोगों में बताशा बाँटना चाहती है। आख्यान शैली में लिखी छोटी सी यह कहानी स्वतः राष्ट्रवाद के भाव-उद्भाव को वाचाल करती है। कहानी-नायिका ‘माँ’ लछमा को पकवानों का नैवेद्य अर्पित करती है और बताशा बाँटने के लिए उधार नहीं, चढ़ावा के रूप में रुपए भी। इस तरह राष्ट्रवादी भावानुभाव को परोक्ष रूप में प्रशंसित करती है यह कहानी। ऐसी सारवान् कहानी-रचना के लिए प्रशंसा की पात्र है लेखिका।
ख्यात वरिष्ठ लेखिका डॉ0 विद्याबिन्दु सिंह-प्रणीत कहानी ‘पंख सा’ भौतिक वैभव के लिए आकुल सुधा बनाम सात्विक प्रेम की मूर्ति, चित्रकार, कवयित्री, कोमल संवेदनाओं की धनी कल्याणी के विपरीत ध्रुवी चरित्र-चित्रण की कहानी है। प्रशान्त और उसकी पत्नी सुधा के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाया जाता है। ऐसे पात्र कहानी के सहायक पात्र ही हैं। कल्याणी की बेटी के जन्मदिन को बहाना बना कर और उसमें भी नाटकीय मोड़ देकर प्रशान्त से कल्याणी की भेंट करा देती है लेखिका। तब स्वनित हो जाती है सात्विक प्रेम की शक्ति। प्रेम के बिछोह की शक्ति। प्रेम की अलौकिकता की शक्ति। प्रेम-पीड़ा की जीवनदायिनी शक्ति। इन शक्तियों की अनुभूति के उपरान्त आश्चर्य कि प्रशान्त का व्याकुल मन चिडि़या के पंख-सा हल्का हो उठा था। लेखिका द्वारा इस तरह ऊर्ध्ववाही प्रेम का रूपायन प्रेम के सद्-व्यवहारिक स्वरूप का ही रूपायन है। 
कहानी ‘एक कतरा आसमान’ में लेखिका विनीता शुक्ला ने कथित उच्चवर्गीय भौतिकतावादी विभवी परिवेश में सिन्डेªला बनी महक के प्रतिपक्ष में परम्परागत भारतीय शालीन संस्कारों वाले सामान्य मध्यम वर्गीय सहेली ऋतु एवं उसके बेटे-बेटी के आत्मीय सम्बन्धों की श्रेष्ठतरता को रूपायित किया है। ‘एक कतरा आसमान’ वाली आत्मीयता से विभोर महक भीड़ में भी अकेलेपन, झूठी वाहवाही मैरिज एनीवर्सरी की दिखावटी मुबारकवाद आदि से उन्मुक्ति अनजाने प्रदान करने हेतु अपने पति देवेश को थैंक्स देती है। प्रकटतः इस तरह लेखिका सन्देश देती है भौतिकतावादी विभव के प्रतिपक्ष में।
और ‘तलाश’ ! ख्यात लेखिका शारदा लाल ने छोटी सी कहानी ‘तलाश’ में भी महानगरी बाम्बे की आवासीय समस्या के बहाने से महानगरी में पनप रही कुटिलता, स्वार्थवृत्ति भीड़ में भी अकेलापन आदि को उकेरा है। कहानी में दिनेशचन्द्र के समक्ष अन्तस्तल में पैठे दिनेश-अस्तित्व को प्रस्तुत करके लेखिका ने आज के व्यक्ति के विभाजित व्यक्तित्व में अंतस्तलीय अस्तित्व को अधिक सत्त्वशील अधिक सत् शील दर्शाया है जो सत्व को अधिक स्पष्टता से अनुभूत कर सकता है और उवाचित भी। कहानी में घर की तलाश प्रतीकात्मक है।
शीला पाण्डे की कहानी ‘इसको या उसको’ भी एक सशक्त कथानक की स्यक्त कथ की कहानी है। ग्रामांचल में वर्तमान में पनपते माफियाओं की आपराधिक वृत्ति को भी उकेरती है यह कहानी। मध्यवर्गीय चन्द्रेश बहुत दिनों बाद अपनी पत्नी और बहन के साथ किसी रिश्तेदार के घर शादी में गाँव जाता है। विदाई के बाद वापसी में गाँव की सड़क पर पहुँचते-पहुँचते ढले शाम कुछ दादा किस्म के 4-5 लोग बैठे थे जो चन्द्रेश से ‘इसको या उसको’ को रात भर के लिए छोड़ जाने के लिए कहते हैं। विवशतः बहन को बचाने के लिए चन्द्रेश पत्नी को छोड़ जाता है। दूसरे दिन जाकर वह पत्नी को ले आता है। मगर पत्नी इस अपघटना को भुला नहीं पाती। चन्द्रेश को अनकथ रूप में दोषी मान लेती है वह कि क्लीव की तरह उसे अपराधियों के हवाले कर दिया उसने। पत्नी सीता उसे तलाक देकर मायके जाना चाहती है। वह बहन साक्षी के अनुरोध को भी अनसुना कर देती है। अंततः मायके के बजाय कहीं और चली जाती है वह। चन्द्रेश निर्जीव सा हो जाता है। दुखांतिक है यह कहानी। बहुत कुछ अनकहे भी बहुत कुछ कहने में समर्थ है यह।
संकलन ‘आह्वान’ की अन्तिम कहानी है ‘पर अब क्या हो’। कहानीकार रीता पंकज की छोटी सी किन्तु अति गम्भीर कहानी है यह। कहानी आख्यानक स्वरूप में है। इसमें मनोभावों का अंकन प्रभावशील है। कहानी-नायिका ऋतु की उदारता, परहित-कातरता आदि को उकेरने के क्रम में रिक्शाचालक वृद्ध की कर्मठता, आत्माभिमान आदि को शालीन ढंग से उकेरा गया है, दहेज की बढ़ती माँग के कारण बेटी के विवाह में असमर्थ वृद्ध रिक्शाचालक जो किसी कालेज से रिटायर हुए और अब मजबूरी में रिक्शा चला रहे हैं। ऋतु उन्हें मदद करने को तत्पर है परन्तु वे गायब-से हो गए। मदद लेने कभी नहीं आए। इस तरह कर्मठता, आत्मनिर्भरता के साथ-साथ परहित कातरता का निर्देश देती है आलोच्य कहानी जो साहित्यिक सदाशय से सार्थक ही है।
परिस्पष्टतः छिटपुट अपवादों को छोड़ दें तो आलोच्य कहानी-संकलन की प्रायः सभी कहानियाँ हितेन सह कीे साहित्यिक अभीप्सा से आप्लावित हैं। संकलन की बहु-बहुलांश कहानियों में सम्बन्धित लेखिका ने सहज भाषा में सुष्ठु शैली में कहानी के आख्यायिका, आख्यान, या आख्यानक स्वरूपों में अपने लेखकीय सदाशय सफलतया रूपायित किए हैं। लेखिकाओं के भावानुभाव सहजतया साधारणीकृत हो जाते हैं।
आलोच्य कहानियाँ आकार में लघु हैं। एडगर एलन पो, एच0 जी0 वेल्स आदि जीवित होते तो कहानी-आकार के अपने निकषों पर इन कहानियों को सफल ही घोषित करते। इससे भी आगे बढ़ कर है यह कि आलोच्य कहानियाँ प्रायः आपबीती नहीं हैं। वे जगबीती को ही रूपायित करती हैं। इस तरह इलियटीय निकष ‘डिपर्सनलाइजेशन’ के सापेक्ष भी कहानियाँ प्रशंसनीय हैं।
हाँ, एक बात समझ से परे है कि आलोच्य कृति में जब विविध 17 लेखिकाओं की एक-एक कहानियों का संकलन किया गया है तो इसे ‘कहानी-संग्रह’ क्यों कहा गया ? आवरण पृष्ठ और अंतः मुखपृष्ठ पर भी इसे ‘कहानी-संग्रह’ बताया जाना खटकता है विशेषकर तब जब प्रधान सम्पादिका ने ‘आत्मकथ्य’ में इसे ‘कहानी-संकलन’ ही कहा है। आश्चर्य है कि प्रबुद्ध लेखिकाओं के संगठन की ओर से प्रकाशित आलोच्य कृति में इस तथ्य को क्यों अनदेखा कर दिया गया कि ‘संग्रह’ किसी एक लेखक/लेखिका की रचनाओं का होता है। अनेक लेखक/लेखिकाओं की संकलित रचनाओं के एकीकृत प्रकाशन को ‘संकलन’ नाम ही दिया जाना साहित्यिक दृष्टि से उचित है।
तदपि ‘फैजाबादी आम’, वसन्तनुमा वीरानी या कि ‘कहानी संग्रह बनाम कहानी-संकलन’ जैसी छोटी-मोटी भूलों को अनदेखा कर दें तो आलोच्य कृति ‘आह्वान’ लोकशास्त्रीय समवीक्षण दृष्टि से प्रशंसनीय ही माना जाएगा।
ईश्वर करे कि जीवन-धड़कन को रूपायित करने से लेकर चुनौतियों से रुबरू होने की छटपटाहट, विषमता से परिचय और उससे निबटने के सार्थक साहस वाले जिस लेखन की अभीप्सा प्रधान सम्पादिका ने कृति के आरम्भ में व्यक्त की, उस अभीप्सा के समानुरूप ही नहीं अपितु सहित भाव साहित्यम् , स परिष्कारकः, ‘भूतम् भव्यं...सृजते... विश्वमेत’, प्रादुष्कृतमन्यथा आदि-इत्यादि साहित्यिक अधिलक्ष्यों को भी साकारित करने वाला लेखन ‘अभिव्यक्ति’ की प्रबुद्ध महिला साहित्यकारों द्वारा सतत रूपायित किया जाता रहे। ‘आह्वान’ की विहंगावलोकित समालोचना के सर्वान्त में इन पंक्तियों का लेखक यही शुभाशंसा अर्पित कर सकता है।
समीक्ष्य कृति : ‘आह्वान’ (कहानी-संकलन)
संपादिका : डॉ0 अमिता दुबे
संस्करण : प्रथम, 2014, मूल्य: रु0 150/-
प्रकाशक : सुलभ प्रकाशन, 17 अशोक मार्ग, लखनऊ (उ0प्र0 )
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शब्द का सार्थक परास है -  शब्द कहे आकाश


कौण्डिन्य साहित्य सेवा समिति, कादीपुर सुल्तानपुर, के तत्त्वावधान में प्रकाशित दोहा-संग्रह ‘शब्द कहे आकाश’ अध्येता ,साहित्यसेवी, कविर्मनीषी डॉ0 सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ की नवीनतम काव्य-कृति है। ले. .कि..न , इतना भर नहीं है इस कृति का परिचय इसलिए कि यह काव्य-कृति ‘शब्द’ और ‘आकाश’ दोनों को अभिनव स्वरूप में रेखायित करने में समर्थ है।
शब्द ! संघटक अक्षरों के संस्कार-समवेत को वाचाल करने वाली इयत्ता के परिचायक होते हैं। ‘शब्द’ ही अर्थ से सहभाव मुखर करके साहित्य की सम्प्रस्तुति करते हैं। ‘शब्द’ ही हितेन सह स्वरूप में लोकचेता लोकसंग्रही ऊर्ध्वमुखी विवेक, प्रमा, प्रज्ञा प्रदान करने में कुतुबनुमा बन जाते हैं। ‘शब्द’ ऋतम्भरिक प्रज्ञा उजागर करने में समर्थ होते हैं। ‘शब्द’ संचेतना को मुखर करते हैं। उपनिषदों को मानें तो जब कोई सहायक न हो तो ‘शब्द-समुच्चय’: वाक् ही परम सहायक बन कर अप्रतिम सहायता प्रदान करते हैं। वाक् हो या काव्य के विविध अंग-उपांग, वे सभी शब्दों के उपादान से मूर्त्तमान होकर उच्चतर भावदशा प्रदान करते हैं, भूत (जीव) को भव्य बनाते हैं और धरा को स्वर्गिक पावन पुण्य-प्रकाश से पोषित करते हैं। अक्षरों के संघटक अक्षरों का समुच्चय ‘शब्द’ वास्तव में ब्रह्म समुच्चय का साक्षात्कार कराने में भी सक्षम है। ब्रह्म जो सर्वशक्तिमान है, सर्वहिती है, दैवीय गुणों से सुसम्पन्न है, उदार, उदात्त है और परम न्यायी, विराट भी। ऐसे ब्रह्म को अपने संघटन में समोए ‘शब्द’ की महिमा असीम है।
औ..र आकाश ! असीम निस्सीम आकाश भी वैराट्य का पर्याय माना जाता है। सांख्य में आकाश तत्त्व का भरपूर गुणगान किया गया है। सनातनधर्मी हर जीव को क्षिति, जल, पावक, समीर के साथ-साथ गगन (आकाश) तत्त्व से विनिर्मित मानते हैं। आकाश तत्त्व के अभाव में जीव क्षुद्र, क्षुद्रतर, क्षुद्रतम होता जाता है। कह सकते हैं कि आकाश (वैराट्य तत्त्व) ही वह सारभूत तत्त्व है जो मानव जैसे जीव की मानवीयता मुखर करता है। प्रकारान्तर से यही तत्त्व शेष जीव जगत् से विलग करके मानव को विशिष्ट सचेतन प्राणी की संज्ञा प्रदान करता है। मानव जितना ही जितना क्षुद्रता त्याग कर वैराट्य की ओर अग्रसर होता है, उतना ही उतना उच्चतर श्रेष्ठतर जीव बनता जाता है वह। आदि-महाकवि वाल्मीकि जिस महत् तत्त्व की औ..र, पाश्चात्य मनीषी लांजाइनस जिस औदात्य की वांछा प्रकट करते है वे तत्त्व भी तत्त्वतः ‘आकाश’ तत्त्व से इतर नहीं है।
प्रकट है कि स्वभावतया वैराट्य का साक्षात्कार कराने वाले तत्त्व: आकाश तत्त्व का समेकन जब ‘शब्द’ में साक्षात् हो और वह शब्द भी ‘स कविः काव्या पुरुरूपम् द्यौरिव पुष्यति’ को साकार करने वाले डॉ0 ‘साहित्येन्दु’ सदृश कवि के काव्य में अभिरूपित हों तो मणि-कांचन सुयोग स्वतः साक्षात् हो जाएगा। संदर्भगततः यह सुयोग इन पंक्तियों के लेखक की कोरी कल्पना नहीं है। ‘शब्द कहे आकाश’ के रचनाकार कवि की समरैखिक मान्यता का ध्वन्यार्थ भी यही है। कृति-प्रणेता कहता है-
सरल श्रव्य शुभ अर्थ का मणि कांचन संयोग।
ललित छन्द रस पाक जब कहें सुकविता लोग।।
‘शब्द कहे आकाश’ के प्रणेता तो और भी आगे जाकर दो टूक लिखते हैं-
वह प्रकथन निस्सार है बस कोरी बकवास।
अर्थ अतल का हो रहा ‘शब्द कहे आकाश’।। 
निश्चय ही हर सुधी काव्यज्ञ को अतल-वितल के अर्थान्वयन से ऊपर उठ कर शब्द को आकाश में रूपायित करना ही चाहिए। कृति-प्रणेता के इस प्रज्ञासम्मत वचन को सारवान् मानना ही होगा।
औ..र, ‘शब्द’ के परास को व्याख्यायित करने के साथ-साथ प्रणेता कवि ने कविता/काव्य के विन्यास को भी रेखांकित कर दिया है- 
जनमै कविता-कोख से मानव के अधिकार।
न्याय शान्ति सद्भावना इसके मूलाधार।।
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कविता मन की शक्ति है, उर का है विश्राम।
मीमांसा यह जगत् की शाश्वत सत्य ललाम।।
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कविता सम्बल निबल की, कविता मित्र समान।
क्षमता की तो उत्स है, वह है ज्ञान-निधान।।
ऐसे रेखांकन अप्रतिवाद्य हैं।
संयोगात् नहीं, अपितु काव्य-विवेक का परिपाक माना जाना चाहिए यह कि ‘शब्द कहे आकाश’ के प्रणेता आलोच्य कृति में वायवीय आकाशीय उड़ान के साथ-साथ धरातलीय यथार्थ को भी काव्य के व्यवहारविदे एवम् शिवेतरक्षतए अधिलक्ष्यों के समानुरूप रूपायित करने में सफल दिखते हैं। 
माँ वाणी की वन्दना से आरम्भित आलोच्य कृति में प्रारम्भ में ही कवि माँ वाणी के साथ-साथ वाणी-सपूत वाल्मीकि, कालिदास, कबीर, तुलसी, रैदास, मीरा, रहीम, गालिब, जयशंकर प्रसाद, दुष्यन्त, प्रेमचन्द, स्थानीय कविजन प्रगतिराम किशोर, मानबहादुर सिंह, मथुराप्रसाद जटायु, आद्यासिंह प्रदीप तक और वहीं, राणाप्रताप, चेतक, मंगल पाण्डेय, लक्ष्मीबाई, विपिन, बिस्मिल, अश्फाक आदि को नमन करता है---उससे उद्भासित है कि प्रणेता कवि के कवि-मन का आकाश वैराट्य औदात्य आदि के साथ-साथ सत्त्वशील शिष्ट आचार और राष्ट्रवाद आदि से आप्लावित भी है। इस तरह कविता के आकाश का ईशान बखूबी रेखायित कर दिया है प्रणेता कवि ने।
तदन्तर , दोहा सं0 95 से लेकर कृति के अनन्तिम चरण के दोहा सं0 578 तक जग बीती का यथार्थ आरेखित है आलोच्य कृति में। पाश्चात्य समाजशास्त्रीय आलोचक इपालीत तेन की वांछा वाले क्षण, प्रजाति, परिवेश का रेखांकन रेखांकित दिखता है प्रस्तुत्य आरेखन में। वर्तमान देश काल परिवेश के विद्रूपों के कुशल चित्रांकन देखें-
कौए अब करने लगे, सामवेद का गान।
सुग्गे सब डरने लगे क्या होगा भगवान।।
+ + + + +
कैंची अब सिलने लगी दलितों के पैबन्द।
अब सियार पढ़ने लगे जोर जोर से छन्द।।
+ + + + +
डॉट बेर कहने लगा अब चुप रह बे आम।
नौ दो ग्यारह बन निकल तेरा क्या है काम।।
+ + + + +
सच चम्पक मुरझा गया मधु ऋतु में इस बार।
उस पर बैठा प्रेत है दोनों पाँव पसार।।
+ + + + +
दहशतगर्दों से भरा, हजरतबल दरगाह।
जला उसी घर को दिया जिसमें लिया पनाह।।
+ + + + +
आलू जब रूपया किलो चिप्स बिके छत्तीस।
कम्पनियाँ परदेस की रहीं देश को पीस।
+ + + + +
जिन्हें पकड़ना चाहिए, खडि़या, कलम दवात।
वे होटल में धो रहे हैं बरतन दिन रात।।
+ + + + +
ईटों के भट्ठे बढ़े सूख नीम रसाल।
वक्ष धौंकनी बन गया अब तो हाल-बेहाल।।
+ + + + +
बच्चा बाँधे पीठ पर सिर पर ईंटे बीस।
बुढि़या जैसी चल रही किन्तु उमर उन्नीस।।
+ + + + +
काला हांडी क्षेत्र में भूखे मरते लोग।
राजतंत्र है कह रहा इनको कोई रोग।।
+ + + + +
अब जंगल को काट कर, मंगल की है चाह।
होगी क्रोधित प्रकृति जब तब निकलेगी आह।।
+ + + + +
दरवाजे पर दिख गई रखी किलो भर प्याज।
भीषण डाका पड़ गया उसके घर में आज।।
+ + + + +
अकथ गरीबी भार से वे बेबस लाचार।
वे रैली के नाम पर फूँकैं विभव अपार।।
+ + + + +
धुरहू चुप सहता रहा देख रहा था गाँव।
वे प्रहार करते रहे उस पर ठाँव कुठाँव।।
+ + + + +
फटी बिवाई खोह सी, माथे शिकन हजार।
पंजा गिनने योग्य है , धँसे नयन लाचार।।
+ + + + +
पाले से अरहर गई फर्रे से सब धान।
माहू से सरसों गई, बिटिया हुई सयान।।
+ + + + +
वे अलकतरा पी गए, खाया पशु आहार।
भरा पेट फिर भी नहीं, करते हाहाकार।।
+ + + + +
बिच्छू गोजर ही रहे उनके परमादर्श।
बाज गोहटों से करें , सतत विचार-विमर्श।।
+ + + + +
जब भी डसा करैत ने, रहा सुरक्षित प्रान।
अबकी तुमने छू लिया निश्चित हुआ मसान।।
+ + + + +
वर्षों से करते रहे सत्य न्याय का जाप।
सत्ता सुख के मोह में सब कुछ भूले आप।।
इस तरह आतंकवाद, महँगाई, बालश्रम, पर्यावरण-चिन्ता, किसान-मजदूर, राजनैतिक भ्रष्टाचार, पुलिस-लेखपाल, प्रशासन के अनाचार आदि के विरुद्ध, वर्तमान की प्रायः सभी समस्याओं के विरुद्ध वक्रोक्ति में अपना आक्रोश व्यक्त करते हैं आलोच्य कृति के प्रणेता। आलोच्य दोहों में यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रशस्त रूपकों का प्रयोग कृति को कांतिमान बनाता है।
औ..र, प्रणेता कवि की चेतावनी भी ध्यातव्य है -
हवा उलटती देख यदि, बुधजन होंगे मौन।
कुटिया उजड़ेंगी सभी, होगा रक्षक कौन ??
+ + + + +
मेरे माथे की शिकन मेरा दस्तावेज।
यदि तू पढ़ सकता नहीं और किसी को भेज।।
अप्रतिम बिम्ब विधान में कवि ने उपरि-इंगित समस्याओं का हल भी सुझाया है-
चाहे जितने हों कठिन उठते आज सवाल।
हल कर सकते हैं उन्हें मिल कर कलम कुदाल।।
कलम और कुदाल अर्थात् विवेक और श्रम यदि मिल जाएँ, तो निश्चित ही अनेक कठिन समस्या रूपी सवालों का हल निकल सकता है।
कृति में राष्ट्रवादी दोहे भी हैं-
जाति धर्म समुदाय से किसका उच्च स्थान।
होता है सबसे अधिक अपना राष्ट्र महान् ।।
+ + + + +
हम विभक्त होंगे नहीं, हम सब मिल हैं एक।
ग्यारह बनता है तभी, जब रहे एक संग एक।।
और तो और, नारी विमर्श सदृश विमर्श भी है कृति में-
नारी कविता मूल है, प्रीति छन्द रस सार।
कल्पवृक्ष का फूलवट अमिय कलश साकार।।
+ + + + +
जो बस देती ही रही लिया नहीं प्रतिदान।
उस जननी को मिल सका नहीं उचित प्रतिदान।।
और देखें-
कहते हैं शिखर-आसीन पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है। उस उक्ति को मर्यादा में ढाल कर कृति प्रणेता कहता है-
जीवन-सारथि बन जभी नारी आती पास।
अकथ प्यार को वार कर ले जाती आकाश।।
यहाँ आकाश का श्लेष सफलता की ऊँचाई का दिग्दर्शन भी कराता है।
औ..र अन्यान्य अलंकारों के साथ ही आलोच्य कृति में रसराज शृंगार भी उपभुक्त किया है कृतिकार ने। देखें-
अधर हँसे आँखें झुकीं खिले फूल ही फूल।
जो कल तक पत्थर रहे, आज हो गए तूल।।
+ + + + +
विकल कली मुसकान पर मधु मधुकर गुंजार।
ललित फलित लोचन दिखें मधुरस पारावार।।
+ + + + +
कंचन के दिन हो गए रजत राजती रात।
जब उर से होने लगी, थोड़ी-थोड़ी बात।।
कवि का शृंगारिक मन इतने पर ही ठहरा नहीं। थोड़ी-थोड़ी बात करते-करते कवि-दृग प्रिया के आँचल वायु से उड़ जाने पर अनावृत प्रिया को देख कर अपना धीरत्व खो बैठते हैं, उसकी कल्पना के दृग-विहग भी उड़ने लगते हैं। वे उसके किसी वक्ष-वारिधि के तीर पर जा बैठते हैं। शृंगार के ऐसे प्रयोग को अशालीन नहीं माना जा सकता है। प..र..न्तु कतिपय आलोचक आगे वाले दोहे में ”अवयव के प्रति तन्तु में बढ़ने लगा कसाव, और उधर कन्दर्प का भारी हुआ दबाव“ की भाव-योजना में शृंगार के नाम पर अभिसार के चरम को परोसने की आलोचना कर सकते हैं। यहाँ भी मर्यादा, शालीनता का उल्लंघन न किया जाता तो अच्छा था। कवि जो कभी युवा/किशोर रहा होगा संभवतः उसी वय की आभिसारिक स्मृतियों का अवदान है यह दोहा जिसे प्रणेता-कवि ने जीवन-यथार्थ के समग्र उद्घाटन के हेतुक से अथवा कृति नीरस न हो जाए इस हेतुक से ‘शब्द कहे आकाश’ में समेकित किया होगा। कह सकते हैं कि तन्तुओं का तनाव दर्शाने वाला दोहा ‘शब्द कहे आकाश’ जैसी कृति में न रखा जाता तो श्रेयस्कर होता। यह सुस्वादु खीर में कंकड़ सदृश खटकता है। कृति के कथ्य से असंगति भी वाचाल करता है यह। तदपि एकाध कृति-असंगत दोहा के सम्बल से सम्पूर्ण कृति को अश्लाघनीय नहीं बताया जा सकता। 
कृति का अन्तिम दोहा (सं0 582) स्वस्तिवाचन सदृश है-
जन जन को मिलता रहे भोजन वस्त्र मकान।
विश्ववंद्य फिर से बने अपना हिन्दुस्तान।।

जहाँ तक काव्यकला का प्रश्न है, दोहा-छन्द से, छन्द-प्रवाह से, गेयता से, सरस रस-अलंकार से कहीं भी विरहित नहीं हैं कृति के दोहा शैली में संगृहीत दोहे।
यत्र-तत्र-अनेकत्र प्रणेता कवि ने कैंची, बेंत, सुग्गा, प्याज सदृश बिम्बों से प्रयोज्य रूपकों का सार्थक सफल रूपायन भी किया है। प्रायः सम्पूर्ण कृति में सहज सरस शैली में वक्रोक्ति में, व्यंग्योक्ति में सफल भावाभिव्यक््ित की गई है। प्रयुक्त व्यंग्य इतने साधारणीकृत हैं कि वैखरी वाले कवि-वचन ही नहीं, कृति-समेकित दोहों के अभिधा, व्यंजना, लक्षणा वाले कवि-वाच्य भी परा, मध्यमा, पश्यन्ती में पाठक के मन-मष्तिष्क में सहजतया पैठ जाते हैं। श्लाघ्य कहेंगे इसे भी कि प्रस्तुत कवि-वचन और/या तद्गत कवि-वाच्य उपदेश-शैली या प्रवचन शैली में नहीं हैं। परन्तु यदा-कदा ही सही, अति सहजता के फेर में प्रणेता कवि ने जहाँ-जहाँ मात्र अभिधा में अपनी बात कहने का यत्न किया है, वहाँ-वहाँ विवसना नायिका-तुल्य तद्गत दोहे काव्य-कोटि से विलग हो गए हैं। काव्य में अन्यूनाधिकम् अलंकरण तो होना ही चाहिए।
एक और बात। ‘कौण्डिन्य’, ‘अगस्त्य’ सरीखे प्रबन्ध-काव्य के प्रणेता क्षमतावान् कवि इस श्रेष्ठ दोहा-संग्रह में 582 दोहों पर ही क्यों ठहर गए ? उन्होंने ‘सतसैय्या’ क्यों नहीं बनाया इस कृति को ? इस तथ्य का का स्पष्टीकरण नहीं है कृति में।
कुल मिला कर कृति ‘शब्द कहे आकाश’ जहाँ शब्द की, शब्द-कहन की विराटता को रूपायित करने में सक्षम है, वहीं, यह ऋक् निदेशन से लेकर तमोनुबेध, प्रादुष्कृतमन्यथा, शिवेतर क्षतए, व्यवहारविदे सदृश काव्य-परास तथा शास्त्रोक्त काव्य-लक्षणों से समेकित रस, सहज काव्य शैली आदि के निकषों पर सौ फीसदी टंच मानी जाएगी। काव्यरसिक इसे पठनीय और सराहनीय ही मानेंगे।
समीक्ष्य कृति : ‘शब्द कहे आकाश’ (दोहा-संग्रह)
कृतिकार : डॉ0 सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
संस्करण : प्रथम, 2014 , मूल्य : रु0 150/-
प्रकाशक : कौण्डिन्य साहित्य सेवा समिति,   कादीपुर-सुल्तानपुर (उ0प्र0)

                                                                                (शीघ्र प्रकाश्य समीक्षा-संग्रह ‘ आर-पार ’ से)














































शनिवार, 23 अगस्त 2025

विजय रंजन की कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ की कतिपय समीक्षाएँ

 


जड़ और जमीन से जुड़ी वैचारिक संवेदना की अंतःसलिला की पहचान है कृति-  
       ‘कविता का पश्यन्ती निकष  : नयत्व’  

 - डाँ॰ नित्यानन्द श्रीवास्तव

हिन्दी कविता की आलोचना का एक बड़ा हिस्सा वैचारिक स्वराज्य के अभाव में रूपवाद, आत्ममुग्धता, अनायास प्रशंसा-निन्दा, पश्चिमी प्रत्ययों और चन्द गुटबाजियों का शिकार है। रूपवादी विभ्रमों ने भी छांदस रूपों और कविता की अन्य विधाओं को हाशिये पर रखने का काम किया है। 

पिछले सात दशकों की हिन्दी आलोचना का व्यवहारिक पक्ष पाश्चात्य आर्थिक और वैचारिक सम्प्रदायों द्वारा प्रक्षेपित वादों, विवादों और विमर्शों का प्रायः क्रीतदास रहा है। ऐसा भी नहीं कि हिन्दी ने भारतीय साहित्यशास्त्र की परम्परा में अनुवाचन के रूप में ही सही कुछ न जोड़ा हो, पर उसका व्यवहारिक पक्ष पूरी तरह उभर कर सामने न आ सका। भारतीय साहित्यशास्त्र की जमीन पर खड़े होकर पाश्चात्य विमर्शों का निरीक्षण-परीक्षण करने का अतिरिक्त उद्यम भी आचार्य शुक्ल के बाद बहुत कम विद्वानों के  अध्ययन-पथ में रहा। पिछली आधी शताब्दी से भी अधिक समय से लेखक, सम्पादक और आलोचक का त्रिदोष सिद्ध होता रहा। उसने इस महत्त्वपूर्ण कार्य पर एक अवगुंठन-सा डाल दिया। 

पाश्चात्य वादों, विवादों और विमर्शों की ओर त्वरित गति करने वाले महानुभावों को भारतीय साहित्यशास्त्र के इस अभिमत-पल्लवन ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ (कृतिकार विजय रंजन) को अवश्य परखना चाहिए। 

‘नयवाद’ की स्थापना करते हुए इस कृति में विजय रंजन जी लिखते हैं- “ न्याय का आधारभूत तत्त्व ‘ऋत’ एवं ‘लोकमंगल’ होने के ब्याज से ‘नय’ में देश-काल सापेक्ष विवेकसम्मत औचित्य, सदाशयता आदि तो हैं ही, यह (नय) सामाजिक न्याय, सामाजिक सदाचार (Social Ethics) साहित्यशास्त्री साहित्य का सम्बन्ध मन की उदात्त वृत्तियों न बताते। मनुष्य का जो उदात्त मन अन्याय के किसी भी प्रकार से जहाँ भी प्रतिक्रिया करता है, प्रतिकार करता है; वही मन साहित्य में नयवाद का प्रस्तावक भी है। 

हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद, जनवाद या जनपक्षधरता जैसे वादों के पोषक मार्क्सवाद में वस्तुतः जिसका अभाव है, नयवाद उससे इतर भिन्न भावभूमि पर समग्रता की बात करता है। 

मार्क्सवाद में यह ‘अनय’ जहाँ वर्गभेद पर केन्द्रित है और प्रतिकार वर्गहित पर, वहीं नयवाद के केन्द्र में ‘अनय’ का बर्ताव प्रकृति के सभी आयामों को केन्द्र में रख कर है, सिर्फ मनुष्य-केन्द्रित नहीं। 

जल, वायु, मानवेतर जीव तथा वृक्षादि वनस्पतियाँ जहाँ भी अपनी प्रकृतितया अपने अधिवास से उन्मूलित या आक्रान्त किए जाते हैं, वे सब अन्याय कृति-प्रस्तावित नयवाद की वैचारिकी के केन्द्र में हैं। यह समग्रता काव्य की जिस भी अभिव्यक्ति तथा प्रस्तुति में है, वहाँ कवि की वाणी वैखरी के तल पर होते हुए भी चेतना के स्तर पर ‘पश्यन्ती’ तक जाती है; जहाँ-जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ कवि और भावक (पाठक) दोनों सम्प्रेषणीयता की समस्या से जूझते हैं। 

बहरहाल, विजय रंजन जी ने नयवाद की वैचारिकी में सत्, ऋत, कल्याण, लोकसुन्दरम्, नैतिकता, प्रमा आदि तत्त्वों को रखा है। ये सारे शब्द मनुष्य और उसके परिवेश के जीवन-व्यवहारों के आधारभूत तत्त्व हैं जिनको हमने असावधानीवश स्वयं से पृथक-सा कर दिया है। इस प्रकार इस विमर्श में ‘नयवाद’ वैचारिकी के स्वराज्य की आधारभूमि भी बन जाता है।

नयवाद की प्रस्थापना का लक्ष्य असत् के आधान को प्रश्नांकित करना है। भारतीय परम्परा में असत् को कालिमावर्णी माना गया है। विजय रंजन लिखते हैं-   “वैज्ञानिक अभिमत है कि कालिमा में प्रकाश-किरण को समग्रतः (उसके प्रत्येक अवयव को) सोख लेने की क्षमता होती है। गहरी कालिमा (Z Black) प्रकाश का अंशमात्र भी परावर्तित नहीं करती। वस्तुतः जो वस्तु जितने ही अधिक परिमाण में प्रकाश को सोषती है, वह उतने ही परिमाण में काली दिखती है। इस वैज्ञानिक सत्य को यदि समाजशास्त्रीय कलेवर प्रदान किया जाए तो वैज्ञानिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि समाज में असत्/तमस् को वरेण्यता प्रदान करने पर शोषक/शोषण उत्तरोत्तर चरम तक परिव्याप्त होता जाएगा। वह समाज की समग्र श्रेष्ठ ऊर्जा/ऊर्जस्विता को सोष लेगा जिससे समाज अंततः क्षरित हो जाएगा क्योंकि तब समाज की समग्र श्रेष्ठ ऊर्जा/ऊर्जस्विता को सोषने के प्रतिकार में कुछ भी परावर्तित/प्रत्यावर्तित न करने की दशा में समाज की सारी ऊर्जा जो सबसे ज्यादा तमस्शील होगा उसी के द्वारा सोष/हड़प ली जाएगी। चूँकि विज्ञान मानता है कि ऊर्जा और संहति आपस में परिवर्तनीय हैं अतएव, ऐसी दुःस्थिति भी आ सकती है कि सृष्टि से सारी संहति ऊर्जा के रूप में या संहति के रूप में सर्वशोषक द्वारा सोष ली जाए, तब समाज ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि तक का अस्तित्व मिट जाएगा। अ..त..ए..व, तमस्/असत् की आराधना न वरेण्य हो सकती है और न स्वीकार्य।” 

नयवाद का दूसरा अधिष्ठान है ‘ऋत’। महाभारत और उसके बाद के वाङ्मय में ऋत और सत्य प्रायः पर्यायवाची माने गए हैं लेकिन वैदिक तथा उपनिषदों के साहित्य में दोनों के आभामण्डल में पर्याप्त भिन्नता है। विजय रंजन इसकी सैद्धान्तिक स्थापना करते हुए लिखते हैं-  “प्रख्यात दर्शन-अध्येता डॉ॰ देवराज के अभिमत से ऋत ‘पावन नियमशीलता’ का वाचक है।......पावनता, विशुद्धता, नैतिकता, शाश्वत सद्-व्यवस्था, नियमन की अधिष्ठापना आदि के साथ-साथ अपदूषण-प्रक्षालन जैसे सद्गुण ‘ऋत’ को ‘नयवादी पहचान’ देने में समर्थ हैं। ‘ऋत’ को सघन सत्त्वशील, पावन नियमशीलता का संवाहक, सर्वात्म ब्रह्मत्व के निकटतर, अपावनता का निवारणकर्त्ता एवम् सत्त्वशील पावन ‘नयत्व’ का कारक माना जाना चाहिए।”  

विजय रंजन लिखते हैं- “आक्षरिक काव्य-संयुजन के परिप्रेक्ष्य में तथ्यतया ‘शिव’ के उपर्युक्त गुणधर्म के संवाहक/वाचक अर्थों में शब्द ‘शिवम्’ को भी अर्थायित किया जा सकता है जिसके क्रम में कल्याण को व्यापकता प्रदान करते हुए ‘काव्य’ के ‘शिवत्व’ को लोकमंगल/लोककल्याण का वाचक माना जाता है। दक्षिणात्य विद्वान् एम॰ वी॰ नाडकर्णी ‘शिवम्’ को ‘ईश्वर के नैतिक रूप का निचोड़’ कहते हैं। इसी रूप में वे ‘कविता’ में ‘शिवत्व’ की आराधना के हामीकार हैं।” 

नयवाद की वैचारिकी का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है ‘लोकसुन्दरम्’। सौन्दर्य की समझ और उसके व्यवहार को सामान्यतः संसार में आकर्षक, मनोहर, रम्य और मोहक से अर्थ-सन्दर्भित किया जाता है। इस व्यवहार में यह समझ 

व्यक्तिगत रुचि-अरुचि का विधान करती है जिससे व्यक्तिभेद से एक ही तत्त्व सुन्दर और असुन्दर कहा जाता है। इस मनोवृत्ति का विस्तार साम्प्रदायिक उन्माद तथा धर्मयुद्ध जैसे अभियानों में देखा जा सकता है और कुटिल राजनैतिक अभियानों में भी। सुन्दर-असुन्दर की मीमांसा करते हुए विजय रंजन लिखते हैं- “‘सुन्दर’ बनाम ‘असुन्दर’ के विभेद के क्रम में बताते चलें कि मिथक कथा है कि राजा जनक के दरबार में अष्टावक्र के शरीर-विकृति पर हँसने वाले सभासदों से अष्टावक्र ने प्रश्न पूछा जिसका सार था- ” मोहिं का हँसेसि कि हँसेसि कोंहरहि ?“औ..र, तब उन सभासदों को सन्न रह जाना पड़ा था। अंततः उन्हीं अष्टावक्र का भारी सम्मान हुआ था राजा जनक के दरबार में। इस मिथक से भी सिद्ध है कि मात्र ‘रूपवादी सौन्दर्य’ हमारे यहाँ अन्तिम प्रेय नहीं रहा कभी।”

नयवाद में एक सशक्त उपस्थिति ‘प्रमा’ की है। विजय रंजन जी इसे निरुपित करते हुए कहते हैं-“ ‘प्रमा’ वस्तुतः नैयायिकों की शब्दावली का शब्द है। ‘प्रमा’ का सहज अर्थ ‘प्रमाणाधारित वस्तुनिष्ठ ज्ञान’ के अर्थ में अर्थायित किया जाता है।....जहाँ तक ‘सर्जनाशील प्रमा’ का फलक है उस फलक पर कहना होगा कि प्रमाण-आधारित यथार्थ ज्ञान से जब हमारी सिसृक्षा (सर्जनाशीलता) मुखर हो जाती है तो ऐसी सिसृक्षा स्वतः नयत्वशील हो जाती है।” प्रमा यानि प्रमाण आधारित यथार्थ ज्ञान कोरे बुद्धिवाद की क्रिया नहीं है। पिछले सात दशकों में हिन्दी-साहित्य में वामपंथ और दक्षिणपंथ की क्रिया- प्रतिक्रिया के विवर्त में बौद्धिक कुण्ठाओं के दृश्य लेखक-सम्पादक-आलोचक की त्रिगुण फाँस में खूब दीखते हैं। यथार्थवाद और यथार्थबोध के नाम पर स्थूल और सतही दृश्यबोध का क्षैतिज फैलाव बहुत हुआ है। इसलिए तात्कालिकता कवि-विवेक पर भी हावी होती गई है। विमर्शों और वादों के दबाव ने सर्जनाशील प्रतिभा के सहज व्यवहारों को एक सिरे से नकारने का दुस्साहस भी किया है। इन परिस्थितियों में ‘प्रमा’ का प्रत्यय साहित्य-विवेक को मुखर कर सकता है।

बौद्धिक अतिवाद कई बार हिंसक-प्रतिहिंसक मनोग्रंथियों का कारण भी बनता है। व्यापक फलक पर देखें तो यह बुद्धिवाद   अवधारणाओं के संकट का प्रतिफल है। अवधारणाएँ जो जीवन-शैली का निर्धारण करती हैं, उन पर औपनिवेशिक प्रचार-तंत्र का गहरा असर तो है ही साथ ही एक विशेष प्रकार की आत्मविस्मृति और कुछ हद तक आत्मद्रोह की स्थितियाँ प्रभावी होती दिखती हैं। यह विचलन साहित्यालोचन और सृजनशीलता के सरोकारों में प्रसारित न हों, इसके लिए आवश्यक है कि नयवाद जैसे वैचारिक प्रस्थानों के साथ ही अपनी जड़ और जमीन से जुड़ी संवेदना की अंतःसलिला की पहचान की जाए। 

 -दिग्विजयनाथ पी॰जी॰ कालेज, गोरखपुर (उ॰प्र॰),दूरभाष: 7800989398

                           (अवध-अर्चना अंक 102 में प्रकाशित)

                ...................................................

 व्यापक चिन्तन-मनन-अध्ययन की परिणति है-  
   ‘कविता का पश्यन्ती निकष  : नयत्व’ 

                                  - डॉ॰ शिवम् तिवारी            

लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकार विजय रंजन की उत्कृष्ट अध्येतावृत्ति, गहन मंथन एवं सहज दर्शन ही इनके सृजन को विशिष्टता प्रदान करती है। 

वास्तव में वर्तमान दौर में लोग लगातार सृजन तो कर रहे हैं परन्तु शोधपरक एवं समीक्षात्मक सृजन यदा-कदा ही देखने को मिलता है। ऐसे में विजय रंजन जी की यह विद्वत्तापूर्ण समीक्षात्मक कृति देश-विदेश में साहित्य-प्रेमियों एवं शोधार्थियों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। 100 से अधिक पुस्तकों के मंथन के उपरान्त विरचित, विजय रंजन की यह कृति सचमुच हिन्दी साहित्य में एक प्रतिमान है। 

पुरावृत्ति और विवृति के प्रारम्भ में विजय रंजन जी ने बड़ी सहजता से लिखा है- 

“34 वर्ष पश्चात् 1999 के अन्तिम चरण में या कि वर्ष 2000 के प्रारम्भिक माह में भान हुआ मुझे कि कविता, गजल, साहित्य के ‘क्या’ से परिचय ही नहीं है मेरा। इनकी सटीक परिभाषा तक ज्ञात नहीं थी मुझे तब तक।” 

इस कथन से कृतिकार के हृदय की निश्छलता और स्वीकारोक्ति साफ दिखाई देती है। 

उम्र के इस पड़ाव में भी वयोवृद्ध कृतिकार के अन्दर का जागृत विद्यार्थी ही ऐसी कृतियों का प्रेरणास्रोत है। 

लेखक ने प्रसंगित कृति में बड़े ही सैद्धान्तिक एवं तथ्यात्मक रूप से कविता, पश्यन्ती, नयवाद और निकष आदि विभिन्न पहलुओं को समाहित किया है। 

कृति के अध्ययनोपरान्त यह ज्ञात होता है कि यह कृति वैदिक, आधुनिक एवं वैज्ञानिक साहित्यिक अध्ययन का एक समन्वित अनूठा दस्तावेज है। लेखक ने भविष्य को इंगित करते हुए दूरदृष्टि से बिल्कुल सटीक और सार्थक लिखा है- “यह अभीप्सा समग्रतः तभी सम्पूर्त्त हो सकती है जब सिद्धान्ततः एवं व्यवहार्यतः ‘काव्य’ से नयशीलता को, नय-न्याय को वैखरी में सहयुजित कर दिया जाए।” आधुनिक प्रासंगिकता के मद्देनजर कृतिकार ने बड़े ही सलीके से कविता के मूल को विश्लेषित एवं उद्घाटित किया है । 

निष्कर्षतः उसने बिल्कुल ठीक कहा है- “अच्छा होगा कि हम वैचारिक स्वराज शीघ्र प्राप्त करते हुए कमसकम आलोच्य प्रसंग में अधुना दार्शनिक के॰ सी॰ भट्टाचार्य को स्वीकार करके पश्चिम को, पश्चिमी काव्य-निकषन को, भारतीय दृष्टि से देखें और भारतीय देशना के समानुरूप काव्य-निकष के रूप में ‘काव्य-नयवाद’ को प्रथम वांछा के रूप में स्वीकार करें।”

पुस्तक-अनुक्रमणिका के पूर्वाचिक के विभिन्न अध्यायों में -

1. वैदिक संचेतना औ...र काव्य-नयवाद, 2. नयवादी महत् काव्य का गोमुख: रामायणम्, 3. तुलसीदास औ...र काव्य-नयवाद, 4. अन्यान्य भारतीय काव्यज्ञ  औ...र  काव्य-नयवाद, 5. प्रमुख भारतीयेतर काव्यशास्त्री औ...र काव्य-नयवाद, 6. समाजशास्त्र औ...र काव्य-नयवाद, 7. मनोविज्ञान औ...र काव्य-नयवाद, 8. कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व  हैं।

पुस्तक के उत्तरार्चिक में हैं- 1. काव्य-नयवाद के फलितार्थ,  2.   काव्य-नयवाद: आपत्तियाँ एवम् निदान 

इन अध्यायों के रूप में काव्य-नयवाद के विभिन्न पक्षों पर गम्भीर विवेचना प्रस्तुत है कृति में। भारती पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, फैजाबाद से वर्ष 2014 में प्रकाशित 271 पेज की यह कृति काव्यशास्त्र को समझने के लिए वर्तमान की चुनिन्दा कृतियों में से एक है। मूल्य इसका रु॰ 550/- मात्र है। इस कृति के सम्पादक संस्कृत के आचार्य, अनेक पुस्तक के लेखक डॉ॰ सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ जी हैं। कुल मिला कर विजय रंजन की लेखनी अद्भुत एवं अद्वितीय है। यही आपको लेखकों की भारी-भरकम  भीड़ में अलग पहचान देती है।                           

- नगर पंचायत सतीगंज अंतू , प्रतापगढ़-230501, दूरभाष: 9403067212

विजय रंजन के कविता-संग्रह ’ किर्चें ’ की कतिपय समीक्षाएँ


  किर्चें 

 एक सामाजिक आईना

    - मनोज चन्द तिवारी

साहित्य-भूषण से सम्मानित,  लब्ध -प्रतिष्ठ साहित्यकार एवं सामाजिक चिन्तक विजय रंजन जी द्वारा सृजित पुस्तक ‘किर्चें’ महज एक कविता- संग्रह नहीं, बल्कि एक सामाजिक आईना है। अपने सृजन में कवि ने सामाजिक परिस्थितियों को हू-बहू दर्शाया है। यह गीत, गजल, कविता और देशभक्ति की पंक्तियों के माध्यम से भारत की मुखर आवाज है। यह कृति भारतीयता से रूबरू कराने वाली महत्त्वपूर्ण कृति है। 

सरस्वती वन्दना को पहले पृष्ठ पर सँजोए यह कृति आपको विभिन्न पड़ाव से गुजर कर एक सार्थक निष्कर्ष तक ले जाती है जिससे पाठक खुद को एक नए प्रश्नोत्तरों के बीच खड़ा पाता है और अंततः समाज को बेहतर बनाने के निष्कर्ष के साथ अपने कदम आगे बढ़ाता है। सरलता, सहजता और रोचकता की वजह से पाठक इसे बिना पूरा पढ़े चैन नहीं पा सकता है। सरस्वती वन्दना में कवि कहता है-

सुन ले  मइया मेरी  वंदना,   आरत  आया  द्वार तिहारे ।।

वीणा-वादिनि  तुझे  पुकारूँ,  आरत-मन से साँझ सकारे ।।

माँ सरस्वती से कवि निवेदन कर रहा है कि माँ आपने तुलसीदास, सूरदास, मीरा, जयशंकर, दिनकर, घनानन्द, भूषण, नागार्जुन, बच्चन, नीरज, महादेवी वर्मा को अपने आशीर्वाद से भवसागर पार लगा दिया तो मात हमारे ऊपर भी कृपा करो और हमें भी इस भवसागर के पार लगा दो। अगले ही पल माँ सरस्वती का वरद-पुत्र दिव्य पंक्तियाँ लिखता है- 

मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं, गीत के नाम, अगीत के नाम ।।

जीवन  का  संगीत  लिखूँ मैं, हार के नाम या जीत के नाम ।।

विजय रंजन जी की भाषा सहज, सरल और प्रवाहपूर्ण है। इन्होंने शब्दों को प्रसंगों के साथ बड़े ही सलीके से पिरोया है। जो कविता को बेहद जीवन्त बना देते हैं। इस कृति में 18 गीत-नवगीत, 26 गजलें और 36 अकविता-अगीत का संग्रह है जो न केवल पठनीय है बल्कि प्रबल मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाता है। इस पुस्तक में खड़ी बोली हिन्दी और अवधी का प्रयोग देखने को मिलता है। 

अंततः मैं यही कहना चाहूँगा कि विजय रंजन जी एक जन कवि भी हैं। समाज को बारीकी से समझ कर उसकी मूक अभिव्यक्तियों को वे बड़ी ही संजीदगी से व्यक्त करते हैं। इनका चिन्तन जन-कल्याण से ओत-प्रोत है। मुझे पूरा विश्वास है कि इनकी कविताएँ समाज को आलोकित करेंगी और एक नया स्वर्णिम भारत बुनेंगी।

                                                                                                     - कोच्चि, दूरभाष: 0812778057

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    वैविध्यपूर्ण काव्य-संग्रह    किर्चें  

                                - अजय मिश्र ‘अजर’ 

‘हाशिये सेे’ के बाद ‘ किर्चें ’ अवध-अर्चना के सम्पादक विजय रंजन का दूसरा काव्य-संग्रह है। विधा-वैविध्य से समृद्ध इस काव्य-संग्रह में सरस गीतों का प्रवाह है, गजलों की महकती फुलवारी है और साथ ही है अकविता-अगीत की प्रखरता। 

काव्य-कृति का आरम्भ एक मनोहारी गीत से हुआ है, जिसमें विपरीत परिस्थितियों में भी कवि का सत् संकल्प पूरे साहस के साथ अभिव्यक्त हुआ है। कवि ठिठुरी अँगुलियों से भी हिमनद ऋत देवता को प्रणाम लिखने के लिए संकल्पबद्ध है। 

वाणी-वंदना के पश्चात् संग्रह का दूसरा ही गीत ‘मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं ........’ अति आकर्षक बन पड़ा है जिसमें प्रतीक पद-विधानों द्वारा एक विशिष्ट भाव-बिम्ब के प्रस्तुतीकरण में कवि सफल रहा है। कवि जीवन की सभी दिशाओं को अपने गीत समर्पित करना चाहता है -

“ दूर कहीं महुआ बन महके

फिर पलाश के जंगल दहके

रतनारे कजरारे नयना

आज लगे कुछ बहके-बहके

नयनों की अनुभूति लिखूँ मैं

रीति के नाम, अरीति के नाम। ”

इसी भाँति अन्य गीतों की भी भाव-सघनता, बिम्बात्मकता, प्रतीकात्मकता द्रष्टव्य है। 

ग्रामीण जीवन का वर्तमान कवि को उद्वेलित करता है और कवि मूल्यों, स्वस्थ परम्पराओं आदि के क्षरण पर चिन्तित दिखाई पड़ता है। 

जनकल्याण की उदात्त भावना पर वणिक बुद्धि की विजय से भी कवि दुःखी है। तभी तो वह कह उठता है-

“ दिन बीते वे

जब मुखिया जी बनवाते थे कूप !! ”

अपने गीतों में कवि कहीं रोमानी हो उठता है, तो कहीं गहरी उदासी पसरी दिखाई देती है। पर इस रूमानियत के बावजूद न तो कवि की दृष्टि से यथार्थ ही ओझल हुआ है और न ही उदासी के कारण जीवन-जगत् से उसका विश्वास ही उठा है बल्कि विश्वास टूटने पर कवि दूसरे विश्वास का आश्रय लेने को सहर्ष प्रस्तुत है। कवि का अटूट आत्मविश्वास एक सकारात्मक और आशावादी चेतना का संचार करता है-

“ फिर लिखेंगे हम नदी की धार पर इक नाम

फिर किसी विश्वास की पतवार लेंगे थाम ”

संग्रह के दूसरे प्रभाग में गजलों की बहुवर्णी छटा है। कवि अपेक्षित ताजगी लाने में सफल रहा है। पर ताजगी के प्रबल आग्रह में चूक भी होती गई है। जैसे -

“ अधमरे तन को न सताओ

   चील जैसी लगन छोड़ दो। ”

यहाँ पहले मिसरे का प्रवाह बाधित होने और लय को टूटने से बचाया जा सकता था। इसी तरह “ उड़ते गए हैं, उड़े थे चाँद को छूने, व्याकरण उड़ने का शायद रह गए जैसा “ या “ भीड़ से चलो करें बातें दो टूक, तन्हा कहीं बैठ कर, समन्दर किनारे। ” इन दोनों शे’रों में कवि का आशय समझने में कठिनाई होती है। अवधी गजल की छौंक अच्छी बन पड़ी है, जिसकी सहजता ध्यान खींचती है। जैसे-  “ हाल न पूछो बड़कऊ। ”

कवि की दृष्टि अलक्षितों, उपेक्षितों की ओर भी है, जो उसकी गुण-ग्राहकता, सौन्दर्य-बोध और साधारण में भी कुछ असाधारण खोजी दृष्टि को रेखांकित करती है। एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा-      

       “ नीम का यह फूल भी आखिर तो फूल है। ”

संग्रह के तीसरे भाग में अकविताएँ-अगीत हैं। जो कवि के गहरे सामाजिक व मानवीय सरोकारों को अभिव्यक्त करते हैं। कवि स्वयं पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकता और कह उठता है-    

        “ बताओ कब-कब की तुमने किसी सच की तलाश ? ” 

बौद्धिकता के आधिक्य में भी कवि का हृदय पक्ष उपेक्षित नहीं हुआ है। ‘माँ’ शीर्षक कविता इसका अच्छा उदाहरण है, जिसमें माँ एक जीवन्त अरगनी है जिस पर हर कोई अपना दुःख-दर्द टाँगता है और तब तक टाँगता रहता है जब तक वह टूट न जाए। समय को सहेजने के प्रति सचेत कवि एक बेहतर जीवन के प्रति सचेष्ट है। ‘सलाह’ कविता जीवन की सार्थकता तलाश करती हुई आश्वस्त करती है वहीं इस क्रम में ‘जड़-चेतन’ शीर्षक कविता भी लोकमांगल्य हेतु कवि के दार्शनिक दृष्टिकोण का परिचय देती है। अन्य कविताएँ भी अपनी गम्भीरता, विचारशीलता की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं, मसलन-- ‘बामियान के बुद्ध से’, ‘पाब्लो नरुदा से’, ‘मोनालिसा से’, ‘क्षमायाचना मरी चुहिया से’।

            - द्वारा ‘पूर्वाकर’ पत्रिका, गोण्डा (उ॰प्र॰), (‘पूर्वापर’ त्रैमा॰ अंक जुलाई-सितम्बर 2011 में प्रकाशित)

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  समकालीन सृजन-सन्दर्भों की संवाहक काव्यकृति 
               ‘ किर्चें ’ 

                             - डॉ॰ किरन पाण्डेय

‘किर्चें’ विजय रंजन जी की एक विशिष्ट काव्य-कृति है जिसकी रचनाएँ सर्वथा अध्येय और अनुभावनीय हैं। यह सार्थक रूप में समकालीन सृजन-सन्दर्भों की संवाहिका कृति है। 

संग्रह में 18 गीत-नवगीत, 27 ग़ज़ल-हिन्दी गजल और 36 अगीत-अकविताएँ समाहित हैं। संग्रह में विशेेष बात यह है कि संग्रह की रचनाओं के द्वारा रचनाकार ने प्रायः सर्वत्र जमीन खोजने और उसे पेश करने का प्रयास किया है जिसमें वह पूरी तौर से सफल नजर आता है। संग्रह की कविताएँ अपनी सहजता, निष्कपटता और भावनात्मक तीव्रता के कारण मन को ‘छूती’ हैं। कवि के जीवन का अनुभव बिना किसी लाग-लपेट के इन रचनाओं में रचा-बसा दिखता है। इस तथ्य का विवेकी-आरेख एक उदाहरण है -

लहुलुहान-सा गूँगा मौसम,

अनचाही हर साँस ढले।।

करवट बदल दिया नदिया ने,

घाट किनारे रेत जले।।

ठहर गए आँखों में बादल,

बरसातें बीमार हो गई !!

                                                                                किर्चें: ‘रातें भी बीमार.......,’ पृ॰ 8

कहने की आवष्यकता नहीं कि यहाँ भाव और भाषा का मणि-कांचन योग दिखायी पड़ता है और शब्दों की अर्थ-गुरुता तथा प्रकृति की चाल और रहनी सहजतया आरेखित है। यहाँ उभरा बिम्ब कवि की काव्य-कला की विशेषताओं का निदेशक है।

प्रस्तुत कविता-संग्रह के गजल संग्रह-खण्ड में हमें युग-समाज की समस्याओं के प्रति कवि की छटपटाहट की गन्ध ही नहीं मिलती, अपितु विद्रोही स्वर की अनुगूँज भी सुनाई देती है। कवि ने उस पर अपनी कलम बड़ी बेबाकी से चलाई है। 

आज समाज वस्तुतः कदाचार का कारखाना बन चुका है; धर्म प्रदूषित हो चला है; पर्यावरण और जीवन से खिलवाड़ हो रहा है। ऐसी सामाजिक संरचना में श्री विजय रंजन के कवि ने अपनी असंतोष भरी लेखनी चलाई है। इस सत्य के प्रमाण हेतु नीचे अवतरित कतिपय पंक्तियाँ देखिए-

सच है तुम्हें-हमें आज नहीं ज्यादा वास्ता

नदी की कल-कल से

आम-महुआ की बौराई डाली से

भौंरे की गुन-गुन से/कमलिनी की झलमल से

औ..र, ऐसे ढेर सारे प्राकृतिक उपादानों से !

किसी को गिला अब कहाँ/बूढ़े पीपल से ?

विहँस रही है बेबसी जिसकी

टूटे बिखरे पत्तों की तरह !!

सरस पुरवा से अब मिलता कहाँ

छटपटाहटों को दूर करने का रास्ता ?

                                     किर्चें: ‘चेतावनी’, पृ॰ 62

संग्रह की कविताएँ कवि की जीवन-दृष्टि, उसकी सौन्दर्य-वैशिष्ट्य दृष्टि की कविताएँ हैं। उसने जीवन-व्यापारों को अपनी दृष्टि से देखा और उसे अपने समय के द्वन्द्व से जोड़ा है। उससे निकल कर आई कविता पाठक को हिला कर रख देती हैं। देखें-

काश ! बेवफा कसमों के नाम ही सही

मत टकराओ अपनी बेशर्म आँख/मेरी भरी आँखों से !

अपनी वहशी बेदिली छोड़ो ;

तूफानी सैलाब अपनी तरफ मत मोड़ो !!

संभव है तुम्हारी आँख हो बेपानी

मेरी आँख का पानी अभी मरा नहीं !!

मेरे धीरज का बाँध मत तोड़ो !!

                               किर्चें:  ‘चेतावनी’, पृ॰ 63

वह कुत्सित ईप्सा का विरोध करता है, लोगों की स्वार्थी मनोवृत्ति का प्रतिरोध करता है, साथ ही ऐसी वीभत्स स्थिति से कुढ़ता नजर आता है -

होने लगता है हावी स्वार्थी-निजत्व/समष्टि पर

बढ़ जाती है बहुत ईप्सा-लिप्सा उसकी 

त...ब/कर पाती कहाँ सहन.....यह वीभत्स स्थिति

एक विशिष्ट प्रकृति-प्रवृत्ति

हो उठती जो विवश

करने को भरसक

प्रतिरोध-विरोध ...... हर ईप्सा-लिप्सा का ! 

                                किर्चें:  ‘परम्परा’, पृ॰ 67

यदि कविता का कार्य मनुष्य की चेतना में परिवर्तन लाना है तो ये कविताएँ उसका मापदण्ड हैं और राष्ट्र के नागरिकों के लिए चुनौती है। कविता का एक अंश दर्शनीय है -

तब.... हाँ ! त....ब/अपनी मिट्टी से जुड़ाव

यति-गति...............निरन्तर प्रगति

बिना पहुँचाए किसी को क्षति

सतत विकास/सुधार

बिना प्रतिदान के निष्कलुष प्रदान/त्याग/अपरिग्रह,

लोकमांगल्य की साधना का साकार प्रतिमान ;

क्या नहीं हैं ये/लक्षण चरम चेतना के ???

फिर भला/ क्यों मानते हैं आप 

वृक्षों को मात्र जड़ ???

आप मानें तो मानें ..... मैं नहीं मानता !!!

                किर्चें: ‘जड़-चेतन’, पृ॰ 71

काव्यत्व और कल्पना के धनी श्री विजय रंजन ने श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर विषयक एक रेखाचित्र भी आरेखित किया है। यहाँ भाव और भाषा दोनों की चारुतर कल्पनाशीलता, यथार्थता और उनकी अपनी दृष्टि की मौलिकता सहज दर्शनीय है, जहाँ वह अप्रत्यक्षतः लोक को सचेत कर रहा है -

मेरे भाई !/ बनवाया यदि तुमने-

अनाचार सम्पृक्त मन्दिर या मात्र मन्दर

वह भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के नाम पर

तब.... हाँ, त....ब, /है संभव

ऐसी प्रायोजना के प्रतिकार के लिए 

उठा लें स्वयं राम जी अपना धनुष

बरसाने लगें/फव्वारे से फूटती पानी की धार सदृश

अपने अमोघ बाण अनवरत् !

नहीं सहते हैं अन्याय वे, अधिक दिनों तक ??

तीन ही दिन किया था विनय,/समुद्र-बंधन से पूर्व, उन्होंने सागर से

                      किर्चें: ‘एक रेखाचित्र’ पृ॰ 78-79 

श्री रंजन का कवि काव्य-बिम्बों को उभारने एवं नए-नए प्रतीकों-उपमानों के प्रयोग में सिद्धहस्त है, इस दृष्टि से ‘रातें भी बीमार’, ‘कैसे अंगीकार करे मन’, ‘तुम सम्हाल रखना’, ‘अनागत’ आदि कविताएँ विशेष उल्लेखनीय हैं। 

इसी प्रकार कवि की दृष्टि प्रचलित वर्तमान उपभोक्तावाद और अपसंस्कृति पर भी गई है जिससे सम्बन्धित काव्यांश हमारे मर्म को छूते हैं। 

संग्रह की कविताओं का मूल्य इसलिए भी विशेष है कि जब तमाम कवि भटकाव एवं चमत्कार के शिकार हो रहे हैं, ऐसी दशा में ये कविताएँ एक दिशा तय करती हैं और पाठकों को विकृतियों से दूर रहने का संदेश देती हैं। आशयतः श्री विजय रंजन का रचनाकार कवि स्थितियों और विद्रूपताओं के आरेखन और उन पर करारी चोट करने से कहीं नहीं चूका है। उसे अपने काव्यत्व में महारथ हासिल है। 

संग्रह की कविताएँ जितनी दमदार हैं उतनी ही कलात्मक हैं। उसकी कविताओं में जीवन का संघर्ष अंतर्निहित है। 

संग्रह को दर्द और संघर्ष का, मौलिक दृष्टि और कल्पना का एक जीवन्त दस्तावेज भी कहा जा सकता है। इस दस्तावेज की सभी रचनाएँ सच्चे अर्थों में ‘कविता/काव्य’ हैं, नवगीत हैं। 

संग्रह की कविताओं के अनुभावन से यह भी ज्ञात होता है कि श्री रंजन एक न्यायविद् होने के साथ-साथ एक गम्भीर चिन्तक और समीक्षक भी हैं। उनकी आस्था डगमगाती नहीं है। 

संग्रह की रचनाएँ कवि की चेतनशीलता, सजगता, संवेदनमयता, अनाहत जिजीविषा और विशिष्ट तथा गहन सम्प्रेषणीयता का परिचय देती हैं। 

ऐसे विशिष्ट-संग्रह के विरचन हेतु मैं उन्हें भूरिशः बधाई देती हूँ। विश्वास है संग्रह पाठकों का मनोरंजन तो करेगा ही साथ ही यह उनके लिए मनस्-रंजक भी सिद्ध होगा।

- प्रवक्ता, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, महिला महाविद्यालय, गोसाईंगंज- फैजाबाद (उ॰प्र॰), (‘अवध-अर्चना’ फरवरी-अप्रैल 2011 में प्रकाशित)

    

   

विजय रंजन की कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ की कतिपय समीक्षाएँ


   अद्भुत शोधपरक ग्रन्थ है - 
 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                           - डॉ॰ अनुज प्रताप सिंह

विजय रंजन का यह अद्भुत शोधपरक ग्रन्थ है। इसमें सबकुछ नई दृष्टि से कहा गया है। ग्रन्थ की पीठिका में ही  बहुत कुछ दे दिया गया है। 

मैं मानता हूँ कि किसी भी कृति की समीक्षा उसके रचनाकार की मान्यताओं, देश-काल और वातावरण के अनुसार होनी चाहिए। लेखक ने इस मत का अनुगमन किया है। इसी से नए तथ्य सामने आ सके हैं। नहीं तो वाल्मीकि-रामायण पर अनगिनत कार्य हो चुके हैं। 

प्रस्तुत सामग्री को व्यवस्थित करने हेतु इस प्रकार क्रम दिया गया है- 

पूर्वार्चिक: 1. प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा और वाल्मीकि-रामायण,  2. प्रमुख अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषी और वाल्मीकि- रामायण, 3. प्रमुख हिन्दी-इतर भारतीय भाषाओं के काव्य-निकष और वाल्मीकि-रामायण, 4. पाश्चात्य काव्य-मनीषा और वाल्मीकि-रामायण 

उत्तरार्चिक: 1. महाकवि वाल्मीकि और महाकवि होमर, 2. उपसंहार

प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा और वाल्मीकि- रामायण: इस अध्याय में गहन समीक्षात्मक अध्ययन के उपरान्त लेखक ने प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय वाङ्मय के संदर्भ में वाल्मीकि-रामायण को देखा है। विश्व के आदि-ग्रन्थ ऋग्वेद से बात आरम्भ की गई है। आज तक प्रस्तुत विषय पर जो कुछ कहा गया है, उसको दृष्टि में रख कर लेखक ने कार्य किया है। लेखक की स्थापनाएँ अपना विशेष महत्त्व रखती हैं। जैसे - ” “मेरे अभिमत से ऋग्वेद का बहुलांश राम के पूर्व ही रचित किया जा चुका था परन्तु कालान्तर में जब ऋक् का दशम् स्कन्ध रचा गया, उस समय तक वाल्मीकि-रामायण, रामाख्यान और राम की प्रतिष्ठा इस सीमा तक लोकव्याप्त हो गई थी कि बाद के ऋचाकारों/वेदों को तद्गत नाम-गुण का उल्लेख करना अपनी रचना में अनिवार्य हो गया। ” बात पते की है, जो लोग वेद को अपौरुषेक मानते हैं, उनको इस कृति को अवश्य देखना चाहिए। 

कृति में भारतीय वाङ्मय के ‘प्रमाण चतुष्टय’ का आधार लिया गया है। प्रमाण चतुष्टय हैं- वेद, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता। इनके साथ पुरुषार्थ चतुष्टय पर भी विचार है जो काव्य का हेतु कहा गया है।  वाल्मीकि-रामायण में धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष की बातें पर्याप्त हैं। इस संदर्भ में लेखक ने भारतीय साहित्यशास्त्रियों के मतों की तार्किक विवेचना की है। 

आगे लेखक ने अर्वाचीन हिन्दी काव्य मनीषी औ..र वाल्मीकि-रामायण शीर्षक में हिन्दी के सम्बन्ध में कहा गया है। भारतेन्दु काल या नवजागरण काल से आज तक की काव्यसम्बन्धी मान्यताओं को प्रस्तुत किया गया है। इसी काल के आसपास वैश्विक स्तर पर विवेकानन्द, टालस्टॉय, डार्विन, कार्लमार्क्स आदि के विचार भी देश को मिले। सबके लिए हमें राष्ट्रीय चेतना और समरसता की प्राप्ति हुई। काव्य व्यक्ति से अधिक राष्ट्र एवं समाज से जुड़ा है। लेखक ने यहाँ भी काव्य-हेतु को प्रस्तुत किया है। कवितासम्बन्धी मान्यताओं की यहाँ सुन्दर विवेचना है। इसमें साहित्येतिहास से साहित्यशास्त्र की सामग्री सम्पृक्त है। इस तरह अन्तःकरण की उद्भावक क्रिया को कवि-प्रतिभा मानें तो मानना होगा कि ऋषिक कवि वाल्मीकि की नयशील, सत्त्वशील, ऋतशील उद्भावना का स्वाभाविक रूपायन है आलोच्य महाकाव्य। कहीं-कहीं सूचनाधिक्य में मौलिकता दब सी गई है। सबके उपरान्त भारतीय (दक्षिण वाम) और पाश्चात्य मतों को प्रस्तुत करते हुए वे अपना कार्य करते हैं। यह असाधारण कार्य है। लेखन के प्रति लेखक ईमानदार है। 

प्रमुख हिन्दी-इतर भारतीय भाषाओं के काव्य निकष और वाल्मीकि-रामायण :

इस शीर्षक में लेखक ने भारत में प्रचलित अन्यान्य भाषा-साहित्य के प्रमुख मनीषियों के काव्य-निकषों के सापेक्ष आलोच्य कृति का स्थान निरुपित किया है। भारतीय मतों में उर्दू के मत को भी लिया गया है। 

दक्षिण भारत की रामकथा से वाल्मीकि-रामायण की तुलनात्मक समीक्षा सराहनीय है। अनेक दुर्लभ तथ्य प्रस्तुत हैं। संक्षेपतः कह सकते हैं कि - “ असमिया, कश्मीरी/डोगरी, पंजाबी, मराठी, उड़िया प्रायः समस्त हिन्दी-इतर भारतीय भाषाओं की मूल नयशील, सतोमुखी, लोकसंग्रही भाव-भूमि से भी आलोच्य कृति  सर्वथा सुसंगत और समरैखिक है।“(पृ॰ 132) इस तरह सम्पूर्ण भारतीय साहित्यशास्त्रीय मानकों के अनुसार आलोच्य महाकाव्य एक श्रेष्ठ कृति है। 

पाश्चात्य काव्य मनीषा और वाल्मीकि रामायण : 

पाश्चात्य जगत् में देवी इन्हेंदुआना या कि म्यूजेस देवियों की कृपा से आविर्भूत माने जाने वाले काव्य की परम्परा की आरम्भिक कालावधि निश्चित नहीं है। पर यह निश्चित है कि ईसापूर्व नवीं शताब्दि से कुछ ग्रीस (यूनान) में काव्य-रचना हो रही थी। पाश्चात्य जगत् के प्रथम महाकवि ग्रीक होमर (825 या 900 ई॰ पू॰) प्रतिष्ठित हुए। उनकी कविता इलियड और ओडिसी में काव्यशास्त्र का विधान नहीं है। परन्तु अपनी चर्चित कृति ‘हिम टु अपोलो’ में उन्होंने अनुकरण (डपउमेपे) शब्द का प्रयोग किया है।

पाश्चात्य काव्य-निकषों की पर्याप्त चर्चा है। वाल्मीकि-रामायण सबके अनुसार महान् कृति प्रमाणित होती है। समाजशास्त्र की दृष्टि से भी यह कृति महान् है। इसके मनोवैज्ञानिक निकष पर यह कृति खरी उतरती है।           आधुनिकता की दृष्टि से यह प्रासंगिक है। अनेक विद्वानों ने प्रतीक, बिम्ब और प्रकृति-चित्रण की दृष्टि से इसको महान् कृति कहा है। लेखक का निष्कर्ष सर्वथा उचित है-  ” यतः, आदर्शवाद, नैतिकतावाद, शास्त्रवाद, नवशास्त्रवाद, स्त्रीवादी पाठ के निकष हों या बिम्बवाद, प्रतीकवाद, प्रकृतिवाद, मार्क्सवाद के समीक्षा निकष हों अथवा मैथ्यू अर्नाल्ड के ‘जीवन-आलोचना’ वाले साहित्य सिद्धान्त, इलियट के निर्वैयक्तिकता के सिद्धान्त या सुकरात, प्लेटो, होरेस, लांजाइनस के उच्चतर काव्य के काव्यादर्श, नैतिकता, औचित्य, उदात्ततता आदि की अभिवांछाएँ प्रायः सभी लोककल्याणक पाश्चात्य निकषों पर आलोच्य काव्य सर्वश्रेष्ठ ही सिद्ध है जबकि पाश्चात्य मनीषियों के वे काव्य निकष जो मानवीयता, मानवता, शास्त्रोक्त नीति, नैतिकता, लोकहित, नय-न्याय आदि लोक-श्रेष्ठताओं से विच्छिन्न हैं, और जो वैयक्तिक मनोगत सुख या/और रतिक आनन्द तक अति ससीम हैं--- उनसे रामायण का ताल-लय अमेलित है, जो मेरी दृष्टि में रामायण की हेयता नहीं वरन् उसकी सार्वश्रेष्ठता का परिचायक है। “ (पृ0 190)। वाल्मीकि-रामायण की इतनी खुली और तुलनात्मक समीक्षा अन्यत्र दुर्लभ है। 

उत्तरार्चिक के आदि-महाकवि वाल्मीकि और महाकवि होमर अध्याय में लेखक ने दोनों की रचनाओं के अंतःसाक्ष्य को लेकर तुलना की है। नायकत्व, मनुष्यता, उदारता, लोकमंगल, सहिष्णुता आदि की दृष्टि से वाल्मीकि-रामायण को ऊँचा प्रमाणित किया गया है। सबकुछ सप्रमाण प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार नायिका का चरित्र है। रामायण की सीता के कारण लंका युद्ध, दूसरी ओर इलियड की हेलन के निमित्त ट्राय युद्ध में समानता है, सीता और हेलन में साम्य नहीं है। सीता में लोकमंगल की भावना, मानवीय गुण, शील, संस्कार, आदर्श, सतीत्त्व, निश्छल प्रेम, दाम्पत्य-जीवन के प्रति समर्पण, विश्वास, आस्तिकता आदि अनेक आदर्श सुरक्षित हैं; तो हेलन अतिथि पेरिस के रूप-यौवन की आकृष्ट होकर अपने पति-गृह से अपार सम्पदा लेकर भाग जाती है। वह छली, प्रपंची, लोभी और स्वार्थी है। दूसरी ओर दोनों की परिस्थितियों, मान्यताओं और समाज में भी अन्तर है। 

रामायण सभी प्रकार से ऊँचे स्तर की रचना है। लोकमंगल की भावना रामायण में सर्वोपरि है। रामायण का कथा-क्षेत्र भी होमरिक साहित्य से व्यापक है। वाल्मीकि आदर्शवादी, व्यवहारिक, लोकमंगली रचनाकार हैं। वे बड़े ढंग से होमर से ऊँचे उठ जाते हैं। लेखक यह दर्शाने में सफल रहा है। एक महाकाव्य और उत्तम रचना को दृष्टि में रख कर लेखक ने इस कार्य को सम्पादित किया। इसमें उसको पूर्ण सफलता मिली है। कृति की भाषा-शैली उत्तम है। तार्किकता, उद्धरण-प्रणाली सब कुछ सराहनीय है।                           

-विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, आर॰आर॰पी॰जी॰ महाविद्यालय, अमेठी (उ॰प्र॰) ,दूरभाष:9161638532 (‘शिक्षा-साहित्य’, अंक जनवरी-जून 2013 में प्रकाशित)

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 अति उपयोगी कृति है    

साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                             - अशोक पाण्डेय ‘अनहद’

साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ का मैंने अध्ययन किया। आपने दि0 4 नवम्बर को हिन्दी संस्थान में जब पुस्तक मुझे दी थी तो सत्य कहूँ तो आप और इस ग्रन्थ के प्रति वो श्रद्धा कतई मेरे मन में नहीं थी जो अब इसके अध्ययनोपरान्त मेरे अंतःस्थल में जागृत है। सचमुच, आपने तो बहुत ही बड़ा कार्य किया है इस ग्रन्थ को रच कर। आपने विभिन्न उद्भट विद्वानों और उनकी कृतियों का बहुत ही गहनता और विद्वतापूर्ण अध्ययन किया है और हिन्दी ही नहीं वरन् अन्य भाषाओं के ग्रन्थों का भी। वाल्मीकि-रामायण के माहात्म्य का वर्णन कहीं भी भावविभोर होकर आस्था के वशीभूत हो नहीं, वरन् तार्किकता, विद्वता, चिन्तन-मनन, अध्ययन और तुलनात्मक दृष्टिकोण अपना कर किया गया है। 

मैं आपको और आपकी लेखनी को शत-शत नमन करता हूँ और इतने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के प्रणयन पर आपको कोटिशः बधाईयाँ और शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ। पुस्तक निश्चित रूप से अति उपयोगी है। पूर्वाग्रही डॉ0 नामवर सिंह जैसों के सम्बन्ध में तो आपने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है। दरअसल इन जैसों को हमारे यहाँ आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया जाता है न, इसीलिए ये अपनी विद्वत्ता कुछ ज्यादा ही झाड़ने लगते हैं। सम्भव हो तो इस पुस्तक की एक प्रति उन्हें भी अवश्य भिजवाएँ।

   - लखनऊ     (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 71 में प्रकाशित)

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      शोधार्थियों के लिए बहुमूल्य है  
 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण 

                                    - रजनी सिंह  

‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ विद्वान् लेखक विजय रंजन के अधिकाधिक अध्ययन और सृजनात्मक परिश्रम से रचित कृति है। रचनाकार ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की लुप्तप्राय ‘रामायण’ को उसके रचयिता के साथ एक बार पुनः साहित्य-प्रेमियों की स्मरण-वाटिका में भ्रमण करा दिया है। ‘बधाई’ के पात्र हैं लेखक विजय रंजन।

लेखक ने ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ में अनेक प्राचीन, मध्ययुगीन और नवीन भारतीय तथा विश्वस्तरीय काव्य-मनीषियों की कृतियों एवं उनकी समग्र सार्थक विवेचनाओं के प्रमाणित पहलुओं का वाल्मीकि-रामायण पर उतारते हुए तुलनात्मक रूप प्रस्तुत किया है। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् आदर्श सत्यसंध राम के आजीवन आचरणों में व्याप्त हैं, जब लेखक इन आदर्शों को विभिन्न विद्वान् लेखकों और कवियों के रचित ग्रंथों में उद्धष्त उदाहरणों से पेश करता है तो आलोच्य कृति की भारतीय परिवेश में ही नहीं वरन् विश्वस्थल पर भी उपयोगिता और सार्थकता सिद्ध होती है। कृतिकार का काव्य-मनीषियों की विचार-शृंखला को विभिन्न कोणों से अवलोड़न कर ‘रामायण’ को वैश्विक स्तर पर लोककल्याणकारी ‘महाकाव्य’ घोषित करने का पुण्यमयी कदम उठाना प्रशंसनीय है। 

वास्तव में वाल्मीकि-रामायण वेद, पुराण, उपनिषद् और अन्य पौराणिक बहुमूल्य ग्रंथों के समानान्तर काव्य-मीमांसियों की बौद्धिक प्रणालियों पर अपनी मानवीय अस्मिता बनाए रखने में सक्षम है। मेरे विचार में यह निस्संदेह सत्य है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि की आलोच्य कृति एक सर्वश्रेष्ठ काव्यकृति है। आदि-रचना काल से ही जिस आलोच्य कृति को अनेक विद्वान्, काव्य-मनीषी एवं आलोचक अपनी अवधारणाओं पर प्रमाणित करते रहे हैं, उसका ‘सर्वश्रेष्ठ’ होना स्वाभाविक है। यह भारतीय ही नहीं वरन् विश्व-स्तरीय महाकाव्य है।

विचारशील लेखक प्रेमचन्द, प्रख्यात आलोचक नन्ददुलारे बाजपेयी और प्रख्यात समीक्षक शान्तिप्रिय द्विवेदी के विचारों को लेखक ने प्रस्तुत कर यह प्रामाणिकता दर्शाई है कि ‘रामायण’ के नायक राम मानवीय गुणों से ओत-प्रोत सम्पूर्ण विराट महापुरुष हैं। रामायण के सभी पात्र समाज को कुछ न कुछ ‘सार्थक पहल’ देने में समर्थ हैं। यह शाश्वत सत्य अति मानवीय है।

छायावाद युग के कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, अप्रतिम कवयित्री महादेवी वर्मा, समालोचना में युगीन संवेदना के पक्षधर सुमित्रानन्दन पंत, छायावादी युग के काव्य-पुरोधा जयशंकर प्रसाद के सभी सारवान् साहित्यिक निकषों से वाल्मीकि का कवि-धर्म सार्थक दिखाई देता माना है लेखक ने। यह मानव की भावनात्मक और सर्जनात्मक प्रवृत्ति को मुखरित करता है।

प्रगतिवादी लेखक संघ के डॉ॰ रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, नागार्जुन आदि अन्य मनस्वियों की दृष्टि से भी रामायण में देश-प्रेम, राष्ट्रीयता, ग्राम्य-प्रेम, प्रकृति-प्रेम आदि की सम्पूर्ण उपस्थिति का दर्ज होना सापेक्ष किया गया है। ‘लोकमंगलकामना’ का आधिपत्य आलोच्य कृति की प्रमुखता होना करीब-करीब प्रत्येक युग के कवियों और आलोचकों ने दर्शाया है। डॉ0 रामकुमार वर्मा का दृष्टिकोण है कि ‘वाल्मीकि-रामायण का दृष्टिकोण लौकिक है।’ ”हम न मरैं मरिहै संसारा“ कबीर का कथन और ”अब लौं नसानी अब न नसैहों“ तुलसी के विचार ‘समानता’ की कसौटी पर हैं।

वास्तव में विजय रंजन की सोच और दूरदर्शिता वाल्मीकि रामायण को एक ‘सम्पूर्ण महाकाव्य’ सिद्ध करने में अक्षरशः ऋत है। जीवन के उच्चतम मूल्यों का निर्वहन से लेकर तुच्छ प्राणियों के क्रिया-कलापों से रूबरू कराने में आलोच्य कृति पूर्ण है। सभ्य-असभ्य और धर्मात्मा, राक्षस सभी के जीवन-कर्मों की भली-बुरी घटनाओं को शब्द-पटल के माध्यम से पाठकों को अवगत कराने में रामायण अद्वितीय है। जीवन-पथ पर निर्गमन करते हुए प्रकृति के प्राणियों की प्रतिक्रियाएँ, पथ पर आने वाले झंझावातों और उनसे जूझते हुए गलत और सही का विचार बुद्धि, विवेक और संयम की धुरी पर कसते हुए निर्णय लेकर उन्हें अन्तिम रूप प्रदान करना आलोच्य कृति का गुण है। लेखक का विचार इसे इस प्रकार प्रमाणित करने की पहल करता है--- ” रामायण की कविता भारतीय काव्य-चिन्तन, दर्शन विचारधाराओं के योग का प्रमाण है “।

” रामचरितमानस (तो) क्या समस्त परवर्ती रामायणों में वर्णित रामकथा का प्रेरणास्रोत आदि-कविकृत रामायण ही है “, विद्वान् डॉ॰ राधिका प्रसाद त्रिपाठी के यह विचार मेरी राय में सत्यता की कसौटी पर खरे हैं--” जितनी भी रामकथाएँ लिखी गईं, उनका मूल रूप किसी न किसी रूप में वाल्मीकि रामायण से प्रभावित दृश्यमान है।“ इस प्रकार यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि वाल्मीकि रामायण साहित्यिक तुला पर सुसंगत कृति है।

आश्चर्यप्रद तो यह है कि विश्व के अनेक लेखकों ने अपनी भाषा में रामायण का अनुवाद किया और माना कि रामायण ‘लोकमंगल भावों से प्रतिपूरित नैतिक मूल्यों का ज्ञान प्रदान करने में श्रेष्ठ काव्य-कृति है।’ अंग्रेजी के एक महान् कवि पी0 बी0 शेली द्वारा कविता और नैतिकता में अंतःसम्बन्ध दर्शा करके लेखक विजय रंजन इसे इस प्रकार प्रस्थापित कर और अधिक दृढ़ता प्रदान की है-- ”कविता मनुष्य की उस आन्तरिक शक्ति को समृद्ध करती है जो नैतिक गुणों का मूल आधार हैं।“ अर्थात् रामायण-काव्य नैतिकता का संदेशवाहक है।

साथ ही उर्दू (जिसका जन्म और पालन-पोषण भारत में हुआ है) के कतिपय कट्टरपंथियों ने, जो उर्दू को फारसी की अनुगामिनी बना देने वाले हुए, भी ‘राम को पैगम्बर माना और अल्लामा इकबाल ने अपनी नज्म में ‘है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़, अहले नजर समझते हैं उनको इमामे हिन्द’ से जाहिर है कि उर्दू लेखक भी ‘राम’ से अंतःप्रेरित रहे हैं।

इस प्रकार मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचती हूँ कि लेखक विजय रंजन ने इस पुस्तक की रचना करने के लिए अपने अध्ययन, मनन और चिन्तन की वृहद्ता का सहारा लेकर वाल्मीकि-रामायण को साहित्यिक तुला पर सम्पूर्ण लोकोपयोगी कृति समालोचित कर सार्थक एवं सकारात्मक पहल की है। ऐसा ग्रन्थ शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुमूल्य ग्रन्थ है एवं अवश्यमेव पठनीय है।  

      -रजनीविला, डिबाई- 202393 (उ॰प्र॰), दूरभाष: 9412653980

         (अवध-अर्चना, अंक नव॰ 2012-जन॰ 2013 में प्रकाशित)

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 पाण्डित्यपूर्ण शोध-ग्रन्थ है 
साहित्यक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

               - डॉ॰ सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’

आदि-महाकवि वाल्मीकि द्वारा विरचित ‘रामायणम््’ भारत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक पहचान है। आ॰रामचन्द्र शुक्ल का कथन है-      

”वाल्मीकीय रामायण को मैं आर्य काव्य का आदर्श मानता हूँ।“  

वाल्मीकि-रामायण ने मानवता की सच्ची परिभाषा प्रतिपादित की है। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही कहा है- 

”रामायण ने बाहुबल को नहीं, जिगीषा को नहीं, राष्ट्रगौरव को नहीं, केवल शान्त रसास्वाद गृह-धर्म को ही करुणा के अश्रुजल से अभिषिक्त कर महान् शौर्य-वीर्य के ऊपर प्रतिष्ठित किया है।“ 

रामायणम् का जन्म करुणा की कोख से हुआ है। वाल्मीकि का हृदय एक क्रौंच पक्षी की हत्या से करुणा-विगलित हो गया, वे पक्षी-वध की पीड़ा सह न सके और उनके मुख से अनुष्टुप्् छन्द निकल पड़ा। उन्होंने निषाद व्याध को शाप दिया, ”तुम बहुत दिनों तक निन्दा का पात्र बने रहोगे।“  इस संदर्भ में भारतीय संविधान का अनु0 51 क (छ) उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया है- ” भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, की रक्षा करे, उसका संवर्द्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखे। “ महर्षि वाल्मीकि आज के भारतीय नागरिकों से पूछ रहे हैं कि क्या आप लोग प्राणिमात्र के प्रति दया-भाव रखते हैं ? मैं तो एक पक्षी की हत्या से ही बहुत आहत हुआ था और मैंने उसका पुरजोर विरोध भी किया था, जितना मेरे वश में था। निःसन्देह, वाल्मीकि-कृत रामायणम् अकेला ऐसा ग्रन्थ है जिसकी उद््भूति हिंसा की निन्दा करते हुए हुई है और जो मानव तो क्या पशु-पक्षी तक की पीड़ा को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। 

कालान्तर में वाल्मीकि-रामायण को आधार बना कर बहुत से ग्रन्थ विभिन्न भाषाओं में लिखे गए। इस महाग्रन्थ के विभिन्न पक्षों की अनेक विलक्षण विद्वानों द्वारा अनेक कोणों से मीमांसा भी की जा चुकी है और की जा रही है तथा की जाती रहेगी। वाल्मीकि-रामायण का उद्घोष सत्य ही प्रतीत होता है- 

” जब तक पृथ्वी पर पर्वत तथा नदियाँ रहेंगी, तब तक रामायण-कथा का लोक में प्रचार-प्रसार होता रहेगा। “

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद निवासी विजय रंजन व्यवसाय से अधिवक्ता किन्तु व्यसन से महा विद्याव्यसनी हैं। उनका स्वाध्याय सुविस्तृत, चिन्तन तर्कपूर्ण, मीमांसा तथ्यपूर्ण तथा लेखन औचित्यपूर्ण है। 

शैशवकाल में ही विजय रंजन की दादी ने पौत्र में राम-कथा के संस्कार-बीज का वपन किया जो सम्प्रति सुविस्तृत छायादार वट वृक्ष के रूप में ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ नामक गुरुगवेषणात्मक ग्रन्थ के आकार में समाज को प्राप्त हुआ है। इस ग्रन्थ के लेखन में लेखक के उर्वर विचारशील मस्तिष्क में रामकथा के विविध आयामों के चिन्तन-अनुचिन्तन के पचास सालों का लेखा-जोखा है।

लेखक ने करीब 150 हिन्दी, 12 अंग्रेजी समालोचना ग्रन्थों का आलोडन-विलोडन कर अपने वर्ण्य विषय की गहन एवं गम्भीर विवेचना की है। करीब 23 पत्रिकाओं को सन्दर्भ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ये सारे ग्रन्थ महापण्डितों द्वारा रचित मानक ग्रन्थ हैं। 

भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना के मानकों पर ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ रचा गया है जिसके अध्ययन, मनन एवं चिन्तन के लिए पर्याप्त समय, रुचि तथा प्रभूत सारस्वत श्रम चाहिए। यह ग्रन्थ उन्हें प्रिय प्रतीत होगा जो साहित्य-सागर में गहरे उतरने का साहस रखते हैं।   

लेखक ने विषय को बहुत पढ़ा है तथा गम्भीरता से स्थिरतापूर्वक गुना है। अतएव, उसने अनेक ऐसे विद्वानों के कुतर्कों का करारा जवाब दिया है जिन्हें वाल्मीकि लोकधर्मी नहीं दिखते (पृ॰ 111)। 

ग्रन्थ मुख्यतः 3 भागों में विभक्त है- 1. पूर्वार्चिक 2. उत्तरार्चिक 3. परिशिष्ट

पूर्वार्चिक के अंतर्गत अध्याय हैं-

1. प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा औ..र वाल्मीकि-रामायण

2. प्रमुख अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषी औ..र वाल्मीकि-रामायण

3. प्रमुख हिन्दी इतर भारतीय भाषाओं के काव्य निकष औ..र वाल्मीकि-रामायण

4. पाश्चात्य काव्य मनीषा औ...र वाल्मीकि-रामायण

ग्रन्थ का उत्तरार्चिक 1. ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि और होमर’ 

                 2. ‘उपसंहार’ शीर्षकों से उपनिबद्ध है।

ग्रन्थ के परिशिष्ट में सहायक ग्रन्थ आदि के संदर्भ संकलित हैं।

 ‘प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा औ..र वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक से ग्रन्थ में जिस विषयवस्तु को प्रस्तुत किया गया है उसमें वैदिक वाङ्मय के सार-तत्त्व, काव्यशास्त्र (अलंकारशास्त्र) के सूत्र-तथ्य बौद्ध, जैन आदि भाषाओं में रचित रामकथा का समास-स्वरूप दर्शनीय, पठनीय तथा मननीय है। 

इतने विपुल परिमाण वाले गम्भीर ग्रन्थों से सार-तत्त्व निकालना, वह भी सूक्ष्म रूप में, बहुत कठिन है, पर लेखक ने साधना की यातना सही है या यातना की साधना की है, कोई प्रबुद्ध पाठक तथा समीक्षक ही इसे समझ सकेगा। ये सारे प्रकरण मानों वर्ण्य विषय के कोषागार हैं। 

‘प्रमुख अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषी औ..र वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक के अन्तर्गत लेखक द्वारा आधुनिक समालोचकों की रामायण-दृष्टि पर विवेचनात्मक, विष्लेषणात्मक नवीन दृष्टि डाली है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से लेकर डॉ॰ रामचन्द्र तिवारी तक के सम्बद्ध विचारों का समाकलन किया गया है। एक ओर ‘दिनकर’ की कालजयी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के आलोक में वाल्मीकि-रामायण की गुणवत्ता आँकी गई है तो दूसरी ओर स॰ ही॰ वा॰ अज्ञेय की समालोचनात्मक दृष्टि से रामायण की कालजयी मूल्यवत्ता का परिमापन किया गया है। इस अध्याय में उपर्युक्त विचारकों के साथ ही डॉ॰ सूर्यप्रसाद दीक्षित, डॉ॰ विश्वनाथप्रसाद तिवारी तथा प्रभाकर श्रोत्रिय के समालोचनात्मक निकष पर भी कसने के बाद लेखक द्वारा निष्कर्षतः वाल्मीकि-रामायण को ‘श्रेष्ठ’ निरुपित किया गया है। उक्त समीक्षक त्रिवेणी के ज्ञानानुशीलन से सामान्य पाठक को वाल्मीकि-रामायण के विषय में अनेक नवीन उद्भावनाएँ पढ़ने को मिलती हैं।

‘प्रमुख हिन्दी इतर भारतीय भाषाओं के काव्य निकष और वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक के अंतर्गत लेखक द्वारा उर्दू, , तमिल, मलयालम, तेलुगु तथा बांग्ला आदि भाषाओं के लेखकों तथा समालोचकों की दृष्टि में सन्निहित काव्यशास्त्रीय तथा मानवीय मूल्यों की कसौटी पर वाल्मीकि-रामायण को कस कर कसा गया है। अंततः यह निष्कर्ष सारवान् प्रतीत होता है कि- 

”सम्पूर्ण भारतीय साहित्यिक जगत् के सारवान् निकषों से आलोच्य महाकाव्य एक श्रेष्ठ कृति है।“

यह ग्रंथ लेखक की बहुविज्ञता, अमेय सारस्वत श्रम की क्षमता तथा गहन मीमांसापरक योग्यता का पुष्ट प्रमाण बन गया है।

‘पाश्चात्य काव्य मनीषा औ..र वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक से ग्रन्थ में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू , मार्क्स आदि अनेक पाश्चात्य समीक्षकों एवं मनीषियों के काव्य-कला विषयक मानदण्डों पर वाल्मीकीय रामायण का समाकलन किया गया है जिसमें समीक्षा-दृष्टि, विवेचना की पैनी नजर तथा निर्णय की दूर-दृष्टि स्पष्टतः परिलक्षित होती है। लेखक ने स्वाध्याय के बल पर प्रभूत परिमाण में सम्बद्ध समीक्षकों की वर्ण्य विषय के प्रकरण में विवेचना की है। इस प्रकरण को हृदयंगम करने के लिए पाठक को सजग, धैर्यवान्, बहुपाठी तथा सारस्वत-सेवक होना होगा।

ग्रन्थ के उत्तरार्चिक में निबद्ध ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि और होमर’ शीर्षक अध्याय लेखक के पाश्चात्य जगत् के अनेकविध संज्ञानों का सुपरिचायक है जिसमें उसने काफी मशक्कत के बाद सिद्ध कर ही दिया-

”होमर कमोबेश उसी पंथ के हमराही हैं जिसका प्रथम प्रकल्पन आदिमहाकवि वाल्मीकि ने किया था।“ (पृ॰ 133) 

यह अध्याय में लेखक ने काफी सोच-समझ कर लिखा है-

”होमर पाश्चात्य जगत् में प्रथम प्रपितामह महाकवि हैं।“ (पृ॰194)

भारत के आदि-महाकवि वाल्मीकि की रचना तथा उक्त विशेषणों से युक्त होमर की रचनाओं का सह समाकलन बहुत खूबसूरत बन पड़ा है। ‘ओडिसी’ तथा ‘इलियड’ की चर्चा उठा कर अंततः निर्णय दिया गया कि- 

”जब होमर सदृश शीर्षस्थ पाश्चात्य महाकवि रामायण-प्रणेता वाल्मीकि से उदात्तता आदि निकष पर निम्नतर है तो अन्यान्य पाश्चात्य कवि को (हर भारतीय कवि को भी) वाल्मीकि के समकक्ष माने जाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठ सकता।“ (पृ॰ 212)

यहाँ यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि यदि आदि-महाकवि वाल्मीकि हैं तो कविकुल गुरु कालिदास कहे गए हैं।

ग्रन्थ का ‘उपसंहार’ तो वाल्मीकि-रामायण की महत्ता की इयत्ता का सुपरिचायक हैं। 

भारत में भले ही हम वाल्मीकि और राम को महत्त्व न दे रहे हों, पर विदेशों में भारत की पहचान राम तथा रामाख्यान से ही है जिसके प्रथम महागायक वाल्मीकि थे- ”घर का जोगी जोगिया, आन गाँव का सिद्ध।“

विवेच्य ग्रन्थ के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि यह प्रौढ़ प्रकृति, परा-प्रतिभा सम्पन्न कवि तथा समीक्षक के गुणों से सम्पन्न कोई प्रबुद्ध पाठक ही इस ग्रन्थ का समुचित रसास्वादन कर सकेगा। मोती के लिए महासागर में उतरना ही होगा। उड़ान के लिए अनन्त को नापना ही होगा। 

लेखकीय अपार शब्द-सम्पदा, प्रांजल भावाभिव्यक्ति, साम्य तुला की स्थिरता पर लगातार निगाह बनाए रखना इस ग्रन्थ की मौलिक विशेषता है। अनेकशः भाव भारी तथा शब्द हल्के पड़ गए हैं जो कुछ को अच्छे लगेंगे कुछ को नहीं।

कोई भी मानवीय रचना पूरी नहीं कही जा सकती। ग्रन्थ में ‘तदेव’ को   ‘त..दे..व’ लिखा गया है। ऐसा अनेक शब्दों के साथ अनेकशः किया गया है। लेखक ने ऐसा क्यों किया-- इसका स्पष्टीकरण होता तो अच्छा रहता।

कुल मिला कर ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ ग्रन्थ गहन गरिम पाण्डित्यपूर्ण शोध-ग्रन्थ है जो ज्ञान-पिपासुओं और शोधार्थियों के लिए एक अमूल्य ग्रन्थ-रत्न है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

-एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, संत तुलसीदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कादीपुर-सुल्तानपु र (उ॰प्र॰),         दूरभाष: 9532006900

                               (‘अवध-अर्चना’ अंक 77 में प्रकाशित)

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 आलोचना के नए प्रतिमान प्रस्तुत करती कृति 
 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                    - डॉ॰ महेश ‘दिवाकर’

‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ (कृति में) वाल्मीकि-रामायण की आपने साहित्यशास्त्रीय समीक्षा प्रस्तुत की है। आपके विवेचन एवं विश्लेषण बौद्धिक निकष पर सराहनीय हैं। वाल्मीकि-रामायण के सन्दर्भ में आपने अपनी इस कृति के द्वारा पाठकों के समक्ष नए प्रतिमान प्रस्तुत किए हैं। यह आलोचना-कृति आलोचना-जगत् के लिए वाल्मीकि-रामायण के सन्दर्भ में नए-नए निष्कर्ष प्रस्तुत कर रही है। पाठक अपनी सोच को परम्पराओं से हट कर परिवर्तित करने को बाध्य होंगे। यही नहीं, आपने अपने निष्कर्षों को तथ्यों एवं कथ्यों के सन्दर्भ में बिल्कुल हटकर नवीन धरातल पर प्रस्थापित किया है। समग्र कृति और नए-नए आलोचनात्मक मानदण्ड सराहनीय बन पड़े हैं। 

लेकिन परमादरणीय ! आपने क्लिष्ट हिन्दी प्रस्तुति-शैली को प्रयोग कर एक छोटे से पण्डित-वर्ग के लिए पुस्तक को सीमित कर दिया है जबकि इस प्रकार की कृति आम हिन्दी के प्राध्यापकों हेतु लिखी जानी चाहिए थी और वह तथाकथित पण्डित वर्ग--हिन्दी के ठेकेदार और साहित्य-शौर्य मण्डल के दीप्तिमान नक्षत्र-- इसे खोलकर भी नहीं देखेंगे क्योंकि वे तो ज्ञान-वैभव की उच्च स्तरीय हिमालयीय शृंखलाओं पर विचरते हैं ! 

काश ! इसकी प्रस्तुति आम बोल-चाल की हिन्दी भाषा में होती तो आपका श्रम अत्यधिक सार्थक हो जाता। चलिए, अब जो हो गया सो हो गया। आपने कुछ सोच कर ही विशुद्ध साहित्यिक हिन्दी की भाषा-शैली का प्रयोग किया होगा। मैं तो एक पाठक हूँ और शिक्षक हूँ--- मेरे सोचने-समझने का तरीका पृथक है। असली चिन्तक विचारक तो कृति का सर्जक ही होता है। 

कृति-प्रस्तुति में आपका परिश्रम, सोच, चिन्तन-मनन एवं अध्ययन स्पष्ट झलक रहा है। आपको बहुत-बहुत बधाई।  

     -12, मिलन विहार, दिल्ली रोड मुरादाबाद, दूरभाष: 9927383877

                     (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 72 में प्रकाशित)

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श्रेष्ठ कृति है 
  साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                  - प्रो॰ (डॉ॰) शरदनारायण खरे 

यह गम्भीर चिन्तनपरक श्रेष्ठ कृति है जिसमें लेखक (वस्तुतः विद्वान्  शोधकर्त्ता) का गहन श्रम समर्पित हुआ है। 

वाल्मीकि-रामायण का ऐसा तुलनात्मक अध्ययन व दार्शनिक मीमांसापूर्ण प्रस्तुतिकरण अन्यत्र दुर्लभ है। ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य में धैर्य, लगन, निष्ठा व समर्पण की निश्चित रूप से आवश्यकता होती है।

हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, जर्मन, फ्रेंच, संस्कृत और भारत की तमाम भाषाओं के (और साहित्य के भी काव्य-निकषों के) सापेक्ष ‘वाल्मीकि-रामायण’ की तुलनात्मक विवेचना व मीमांसा सच में प्रणम्य है। 

मैं विजय रंजन जी की साधना को प्रणाम करता हूँ।   

- विभागाध्यक्ष, इतिहास, शासकीय महिलामहाविद्यालय, मण्डला (म॰प्र॰),     

     दूरभाष: 9425484382 (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 72 में प्रकाशित)

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 वाल्मीकि-रामायण और विश्वजनीन काव्य-निकष

                           - डॉ॰ प्रभुदयाल मिश्र

श्री विजय रंजन कृत ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ विराट विश्वफलक पर इस ग्रन्थ की सर्वश्रेष्ठता के प्रतिपादन का उपक्रम है। 

इसमें सन्देह नहीं कि इसके लेखक के अध्ययन के आयाम और उसकी अपनी प्रतिबद्धता के प्रति उसका अविचल भाव स्पृहणीय है। 

लगभग सभी प्राचीन और अर्वाचीन काव्य और साहित्य निकषों के आलोड़न द्वारा लेखक अपनी इस उद्घोषणा से निश्चित ही कृत-कृत्यता का अनुभव कर रहा होगा कि-  

 “अपनी अप्रतिम नयवादिता, महत् सद्विचार, चरम उदात्तता के साथ-साथ तद्गत श्रेष्ठतम महाकाव्यात्मक सम्प्रस्तुति-कौशल आदि के आधार पर युग-युग से सफल-सिद्ध महाकवि हैं आदि-महाकवि वाल्मीकि। ऐसे महाकवि की तुलना में होमर तो क्या विश्व का कोई भी कवि/महाकवि टिक पाने में समर्थ नहीं है।” (पृ॰ 212)

किन्तु प्रश्न उठता है कि वाल्मीकि को क्या अपनी महत्ता के लिए इतनी मशक्कत की दरकार है ? 

यदि समालोचक नामवर सिंह ने ‘दूसरी परम्परा की खोज’ का स्रोत वाल्मीकि में नहीं देखा तो इतने से ही इसे उनकी अक्षम्य उपेक्षा का परिणाम मान कर उनके पुरखों के परखच्चे उड़ा देना क्या कोई सचमुच बहादुरी होगी ?  

संभवतः श्री रंजन महाभारत की उस स्थापना से अनुप्राणित हैं जिसमें कहा गया है कि सत्य केवल उतना ही है जितना उस ग्रन्थ में है, उससे इतर कुछ है ही नहीं, यही मानना होगा। 

ठीक वैसे ही शोध-संश्लिष्ट रंजन वाल्मीकि के वैशिष्ट्य के रेखांकन के लिए साम्यवादी और फ्रायड दर्शन का भी आलोड़न कर डालने से नहीं चूकते- 

”महीन विभेदों को यदि अनदेखा कर सकें तो कह सकते हैं कि समाजवादी विचारधारा के दृक्-बिन्दुओं पर मार्क्सवादी अपेक्षा (सामाजिक नय आदि की सुचारु व्यवस्था) का रामायणीय व्यवस्था से अधिक चारुतर सार्वहिती उदाहरण अन्यत्र अलभ्य है।“ (पृ॰ 163)

आगे लेखक ने फ्रायड और जुंग के अवचेतन को चीर कर उसमें वाल्मीकीय चेतना खोजी है- 

”यह ग्रंथ और इसके नायक-सहनायक से लेकर कृति-प्रणेता तक का आचरित ‘चरित’ फ्रायडीयन मनोग्रंथियों- ‘इडिपस’ या कि ‘इलेक्ट्रा का औ..र फ्रायड-प्रणीत ‘लिबिडो’- का फलित नहीं है; न ही यह ग्रंथ अल्फ्रेड एडलर की हीनता की ग्रंथि/श्रेष्ठता की ग्रंथि का ही प्रतिफलन है बल्कि रामायण अधिकतमतः गुस्ताव जुंग प्रणीत एनीमस और एनीमा की अंतर्मुखी व बहिर्मुखी शक्तियों से समेकित (कवि के अचेतन नहीं प्रत्युत) सर्वथा चेतन मन के विचार, भाव एवं संवेदन से आविर्भूत ‘चेतना-उद्बोधी’ रचना है.....। (पृ॰ 171)

निश्चित ही जैसा कि भूमिकाकार विद्वानों ने पुस्तक में लिखा है, लेखक विश्वकोष को अपनी वर्तनी की स्याही में घोल कर चला है। उसके अध्ययन और अनुशीलन की सामर्थ्य चमत्कारी है, किन्तु यह चमत्कार जब भाषा के स्तर पर भी उतरता चलता है, तो यह गहन विचार सरणि उफनते बरसाती नाले के अधिक निकट खिसक जाती है। वैसे संसार की बिखरी शब्द-संपदा को अब कम्प्यूटर सटीकता से समेटने लगा है। 

अतः विचारवान् लेखकों का गम्भीर और मौलिक होना ही उन्हें उनके लेखकीय दायित्व के निकट पहुँचाता है, मेरी ऐसी मान्यता है। 

इतना मैं अवश्य कहूँगा कि ऐसे साहित्य-प्रेमियों को जो साहित्य की समग्र समालोचना और अध्ययन के सिद्धान्त तथा अनुशीलन की खोज में हैं, उन्हें जरूर इस पुस्तक को पढ़ना चाहिए। 

एक बात के लिए मैं और बधाई दूँगा कि रंजन जी ने श्री मनोज श्रीवास्तव की तरह सुन्दरकाण्ड के 10 दोहों में 2000 पृ0 भर देने का बीड़ा न उठा कर पाठकों के संयम की परीक्षा नहीं ली है, अतः वे बधाई के पात्र हैं।

- 35 ए, ईडेन गार्डन, कोलार रोड, भोपाल (म॰प्र॰), दूरभाष: 9425079072

(समीक्षा पत्रिका ‘तुलसी मानस भारती’ (भोपाल) अंक मई 2013 में एवं कृति ‘अर्द्धालियों के पूर्णाकार’ में प्रकाशित) 

                  ..................................

            नतशिर

                              - केवल गोस्वामी

विजय रंजन धारा के संग-संग बहने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वह धारा के विरुद्ध जाते हैं, ऐसा भी नहीं है, पर यथासंभव वह धारा को चीर कर अपनी अलग राह बनाने की चेष्टा करते हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा उन्हें कभी वांछित परिणाम मिलते हैं, कभी-कभी भ्रमित भी हो जाते हैं। अपनी मौलिकता के सुख को वह प्रायः हजारों से बाँटना चाहते हैं। पाठकों का एक समूह उन्हें अपनी सद्भावना प्रदान जरूर करता है किन्तु हर आलोचक उनकी कृति के लिए ऐसा नहीं कर पाता। यह क्षोभ उन्हें कभी-कभी असह्य मालूम होता है परन्तु वह तुरन्त हिसाब चुकता करने की चेष्टा करते हैं। 

विजय रंजन ने साहित्य के मुख्य द्वार से इसमें प्रवेश नहीं किया। मनीषियों के कथन के अनुसार विजय रंजन अधिवक्ता हैं, किन्तु वकालत उनकी वृत्ति है प्रवृत्ति नहीं। उसकी पुष्टि के लिए वृन्दावनलाल वर्मा, और केदारनाथ अग्रवाल के उदाहरण भी प्रस्तुत किए जाते हैं। कहना न होगा कि वृत्ति और प्रवृत्ति में मूल्यों का भयंकर टकराव है। साहित्य के मूल्यों के द्वारा वकालत नहीं चलती और वकालत के मूल्यों द्वारा श्रेष्ठ साहित्य की रचना नहीं की जा सकती। वकालत के मूल्यवान् तर्क साहित्य के लिए कुतर्क सिद्ध कर सकता है ? 

उनकी वृत्ति के दायरे से मैं उतना परिचित नहीं हूँ , किन्तु प्रवृत्ति द्वारा रचित उनकी कतिपय रचनाओं का अवलोकन मैंने अवश्य किया है। उनकी त्रैमासिक पत्रिका अवध-अर्चना में उनके सम्पादकीय और टिप्पणियों के द्वारा जाना-समझा। वह अपनी अवधारणाओं के द्वारा बड़े आत्मविश्वास से पाठकों तक पहुँचते हैं, सहमति-असहमति अपनी जगह है। 

‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ कृति उनकी अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी कृति है। यह अपूर्व, अद्भुत, अनूठी रचना है, इसे सिद्ध करने के लिए लेखक को सुदीर्घ मानसिक ऊहा-पोह से गुजरना पड़ा है और ऐसा करते हुए वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि सुधि पाठकों के अपने तर्क हो सकते हैं। जिस अभिव्यक्ति को वह अन्तिम सत्य मान कर चल रहे हैं उससे पूर्व भी ऐसे अनेक प्रयास हो चुके होंगे।

हिन्दू कालगणना के अनुसार रामायण का समय त्रेता युग माना जाता है। भारतीय कालगणना के अनुसार समय को चार युगों में बाँटा गया है- सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलि युग। कलि युग 4,32,000 वर्ष का, द्वापर 8,64,000 वर्ष का, त्रेता 12,96,000 वर्ष का तथा सत युग 17, 28,000 वर्ष का होता है। इस गणना के अनुसार रामायण का समय न्यूनतम 8,70,000 वर्ष है। वर्तमान कलि युग के 5,250 वर्ष बीते, द्वापर के 8,64,000 वर्ष। कुछ विद्वान् इसका तात्पर्य ईसा पूर्व 8000 से भी लगाते हैं। कहा जाता है कि संसार के समूचे साहित्य में इस प्रकार का लोकप्रिय काव्य जातीय-गं्रथ नहीं है। सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का आधार इस महाकाव्य से अनुप्राणित है। इसलिए विजय रंजन के लिए तुलना करने के बहुत कम क्षेत्र बचते हैं। सर्वथा सिद्ध को बार-बार सिद्ध करके आप कोई चमत्कारी अर्थ पैदा नहीं कर सकते। फिर रामकथा का एक स्रोत तो है नहीं और हर ग्रंथ की एक ही परिणति भी नहीं है। इसलिए तुलना के अवसर और भी कम हो जाते हैं। यदि अतिरिक्त आग्रह के वशीभूत होकर ऐसा किया भी जाता है तो वह रिपीटीशन के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता। प्रो॰ ए॰ के॰ रामानुज का आलेख ‘ तीन सौ रामायणै: पाँच उदाहरण और अनुवाद पर तीन तरह के विचार’ दिल्ली विश्वविद्यालय के बी॰ ए॰ (आनर्स) इतिहास के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा था। 2008 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अभिभूत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जो हंगामा किया, उस टोली के किसी सदस्य ने यह लेख पढ़ा नहीं था और न ही वे रामकथा की समृद्ध परम्परा के विभिन्न पाठान्तरों से परिचित थे। उन्हें हिन्दू धर्म की आस्था की चिन्ता थी। इस सारे प्रकरण का जिक्र आलोच्य कृति को नहीं मिलता। जब हम इलियड और ओडिसी को इस संदर्भ में स्मरण करते हैं (रचनाकाल 850 ई0पू0) से पहले प्रचलित वाचिक परम्परा में ट्राय समाहित ट्राय युद्ध की दंतकथाओं और किंवदन्तियों का अनेक प्रकार से विश्लेषण, इतिहास, लेखन, साहित्यिक समालोचना और सांस्कृतिक नृतत्त्वशास्त्र के क्षेत्र में अनेक प्रकार से विश्लेषण किया गया। विद्वान् इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि कोई एक कृति अन्तिम रूप से निर्णायक और प्रामाणिक नहीं रही है।

डॉ॰ कामिल बुल्के ने अपनी पुस्तक ‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ में यह लिखा है कि आदि-कवि वाल्मीकि ने 12 हजार श्लोकों में इस आख्यान की रचना की थी। कई शताब्दियों तक यह आदि-काव्य मौखिक रूप से ही प्रचलित रहा। फलतः श्रोताओं की अभिरुचि को ध्यान में रख कर इसमें नई-नई घटनाएँ जोड़ी जाती रहीं। कनकमृग का वृत्तान्त, लंका दहन, हनुमान द्वारा औषध-पर्वत लाना, सीता की अग्नि-परीक्षा आदि। बुल्के के अनुसार जनसाधारण की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से बालकाण्ड के प्रारम्भिक रूप की रचना लोक-कल्पना की परिणति मानी जाएगी। 

बहुत से विद्वान् वाल्मीकि-रामायण के लिखित, मुद्रित तीन पाठ मानते हैं- दक्षिणात्य पाठ (गुजराती प्रिंटिंग प्रेस, बम्बई का संस्करण), गौड़ीय पाठ (गौरेसियों द्वारा सम्पादित एवं रेरिस में 1842 में प्रकाशित), पश्चिमोत्तरी पाठ (दयानन्द महाविद्यालय लाहौर का संस्करण)। इसके अतिरिक्त दशरथ जातकम्, अनाम जातकम् तथा दशरथ कथानम् भी रामकथा पर आधारित हैं। इन ग्रंथों में हिन्दू रामकथा जैसे मूल्य नहीं हैं। देशकाल-भौगोलिक परिस्थितियों का प्रभाव काव्य-रचना पर पड़ना अनिवार्य है और ऐसी स्थिति में जीवन-मूल्यों में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है इसलिए इसके पठन-पाठन का दृष्टिकोण भी बदलेगा। इसलिए लोकमंगल किसका, किसके द्वारा और क्यों के प्रश्न भी शाश्वत नहीं माने जा सकते। वाल्मीकि-रामायण पर गद्गद होना एक बात है और आधुनिक दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्त्व पहचानना दूसरी बात है। विवेक का रास्ता श्रम-साध्य है। सरलीकरण की कोई भी पद्धति, चाहे वह रूढ़िवादी हो या क्रान्तिकारी, इस दिशा में अपर्याप्त सिद्ध होती है। 

जैसा कि मैंने पहले कहा, इस पुस्तक के लेखक ने इन तुलनाओं में अधिकतर अनुवाद का सहारा लिया है और अनुवाद कितना सार्थक और ग्राह्य है, इसकी प्रामाणिकता को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया, लगता है इसलिए अपने मत को सिद्ध करने के मोह से वह कुछ ऐसे नामों और उद्धरणों का सहारा लेता है, जो इस दिशा में अल्पज्ञ ही नहीं, अप्रासंगिक भी हैं। 

पुस्तक की भाषाशैली भी लोकप्रियता की सीमाओं से छिटक गई है। अतः कहीं-कहीं अपठनीय हो जाती है। लेखक के धैर्य की और हठ की प्रशंसा की जानी चाहिए अन्यथा इस रूप में इस पुस्तक का आविर्भाव संभव नहीं था। एक अधिवक्ता के रूप में भी विजय रंजन ने अपने मुवक्किल के हितों का ध्यान हर हाल में रखा है। पर इस अदालती बहस का अन्तिम निर्णय पाठक के बुद्धि-विवेक पर निर्भर करता है।    

  - जे 363, सरिता विहार, मथुरा रोड, दिल्ली, दूरभाष: 9871638634,       

               (‘अक्षर पर्व’ जून 2013 में प्रकाशित)

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वाल्मीकि-रामायण के उद्गम की खोज है

      साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण
                  - स्वप्निल श्रीवास्तव    
हम सब जानते हैं कि वाल्मीकि-रामायण, रामकथा का आदि-ग्रंथ है। उसका समय और समाज अलग है। रामकथा को लेकर 250 से अधिक रामकथा के ग्रंथ अनेक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। रामकथा के प्रणयन में कवियों की दृष्टि अलग है। रामकथा के चरित्रों को लेकर उनकी व्याख्याएँ अलग हैं लेकिन जब हम राम के जीवन-चरित से टकराते हैं अथवा उस पर विचार करते हैं तो हमारे सामने वाल्मीकि  की रामायण जरूर रहती है। वाल्मीकि जैसे दलित कवि ने सीता को जितना दृढ़ दिखाया है वह यह सिद्ध करता है कि वे स्त्री को एक स्वायत्त और प्रगतिशील भूमिका में देखना चाहते थे। सीता की तुलना में राम का चरित्र कमजोर है। कहीं न कहीं राम की लोकनायक की छवि खण्डित होती है।
‘वाल्मीकि-रामायण’ को ‘साहित्य की तुला’ पर तौलने का कार्यभार कवि, कथाकार, सम्पादक विजय रंजन ने उठाया है। इस कार्य को संभव करने के लिए तत्कालीन ग्रंथों और सूत्रों का अवगाहन किया है। यह कठिन और दुस्साहसिक कार्य है। कठोपनिषद, सामवेद, अथर्ववेद, मुण्डकोपनिषद, यजुर्वेद के साथ आचार्य दण्डी, भामह, भवभूति, राजशेखर एवं आचार्य मम्मट की स्थापनाओं और उद्धरणों से टकराते हैं वे। उन्होंने कालिदास, कबीर तथा रामकथा के विवादास्पद उपन्यासकार डॉ0 भगवान सिंह का भी अनुशीलन किया है। उनका यह कृत महाकवि तुलसीदास के रामचरितमानस के बिना अधूरा है। तुलसीदास ने रामकथा को अवधी भाषा में लिख कर उसे जन-सामान्य को सुलभ कराया है यानी वाल्मीकि-रामायण की जाँच-परख के लिए उनके पास औजारों की कमी नहीं है।
इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में ‘प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा और वाल्मीकि-रामायण’ विषय पर प्रकाश डाला गया है। लेखक ने अपनी स्थापनाओं की पुष्टि के लिए विश्वसनीय स्रोतों का सहयोग लिया है। यह इस पुस्तक का आधार अध्याय है और महत्त्वपूर्ण भी है। लेखक ने इस अध्याय में सम्यक् विवेचना की है।
दूसरा अध्याय ‘अर्वाचीन हिन्दी काव्य मनीषी और वाल्मीकि रामायण’ शीर्षक के अंतर्गत है। लेखक लिखता है कि “ आचार्य शुक्ल ने महर्षि और रामायण के बारे में हिन्दी साहित्य के इतिहास में संक्षिप्त चर्चा की है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। आचार्य शुक्ल ने रामचरितमानस में लोकमंगल जैसे लोकतत्व की खोज की है। कितना अच्छा होता कि वे रामचरितमानस की व्याख्या के साथ वाल्मीकि रामायण का उल्लेख करते।  ” लेकिन आलोचक अपनी स्थापना के अनुसार काम करता है। इस अध्याय में विजय रंजन ने जयशंकर प्रसाद, बाबू गुलाबराय, अज्ञेय के काव्य- उद्देश्यों की चर्चा की है, उसे अपने विषय के साथ जोड़ा है। उन्होंने मुक्तिबोध का बहुपठित वाक्य उद्धृत किया है, जिसमें वे कहते हैं - “  जनता का साहित्य का अर्थ जनता को तुरन्त समझ में आने वाले साहित्य से हर्गिज नहीं है। अगर ऐसा होता तो किस्सा तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य का प्रधान रूप होता। ” इसी तरह रामविलास शर्मा का वाक्य पठनीय है-  “ लेखक स्थायी (कालजयी) साहित्य तभी दे सकता है जब वह अस्थायी लगने वाली परिस्थितियों का चित्रण करे। ”
लेखक ने अपनी स्थापनाओं की पुष्टि केे लिए डॉ0 रामकुमार वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, जगदीश गुप्त, डॉ0 रघुवंश के विचारों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। कितना अच्छा होता वे वाल्मीकि-रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंगों को हमारे सामने लाते, तो इससे लेखक का मूल उद्देश्य स्प्ष्ट हो जाता। आगे चल कर लेखक कहता है-- ‘पूर्वाग्रह’ के 109 अंक में वागीश शुक्ल ने वाल्मीकि-रामायण की बेबाक व्याख्या दी है। उनका महत्वपूर्ण  वाक्य है- उन्होंने बताया है कि वाल्मीकि-रामायण रामकथा की आलोचना है। यह कथन महत्त्वपूर्ण है। वाल्मीकि-रामायण के पात्र दिव्य-पोषित नहीं हैं। उनके भीतर गुण के साथ कमजोरियाँ भी हैं। यह विवाद का बिन्दु भी है। प्रायः महाकाव्यकार या खण्डकाव्यकार अपने नायकों को ऐसा स्वरूप देते हैं जो यथार्थ से भिन्न वायवीय होता है। उसे देवताओं की कोटि में पहुँचा कर चरित्र की स्वाभाविकता को नष्ट कर देते हैं। चाहे वाल्मीकि-रामायण हो या रामचरितमानस दोनों के रचनाकारों ने अपने समय और उद्देश्यों को ध्यान में रख कर इच्छित ग्रंथों की रचना की है। वाल्मीकि का यथार्थ रामचरितमानस के लोकमंगल से अलग है। बड़ी से बड़ी कृतियाँ आलोचना के लिए स्पेस (स्थान) छोड़ती हैं और नए विमर्श को जन्म देती हैं। किसी भी कृति के मूल्यांकन के लिए असहमतियाँ नव्य-आलोचना के लिए प्रेरित करती हैं।
विजय रंजन ने भगवान सिंह की कथा असहमति और जैनसाहित्य के विद्वान (!) पुष्पदंत के इस मत का उल्लेख किया है जिसके अनुसार वाल्मीकि और व्यास ने लोगों को गुमराह किया है। यह मत अपनेआप में पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। असहमति का अर्थ पूर्णतः नकार नहीं है। पुष्पदंत ने आगे चल कर राहुल के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वोल्गा से गंगा तक’ में वाल्मीकि को राजभक्त चाटुकार कहा है। ऐसे सिनिकल लोग साहित्य और इतिहास के प्रति घोर अज्ञानी होते हैं और बिना सिर-पैर के वाक्यों के जरिये सनसनी पैदा करते है। ऐसे लोगों का उल्लेख ही व्यर्थ है।
विजय रंजन ने कृति का पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को साथ-साथ प्रस्तुत कर लोकतांत्रिक दृष्टि का परिचय दिया है। यह एक तरह से आलोचकीय उदारता है।
वाल्मीकि लोकधर्मी कवि हैं या नहीं ? इस हेतु लेखक ने डॉ0 राधावल्लभ त्रिपाठी की कृति ‘संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा’ की समीक्षा में वाल्मीकि-रामायण को लोकधर्मी परम्परा का काव्य मानते हुए अपनी कृति में इस कृति को बड़ा सम्मानपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने आगे यह भी बताया है कि नामवर सिंह ने अपने सम्पादकीय (आलोचना-83) में केवल दूसरी परम्परा के कवियों और उनकी कविताओं की चर्चा की है जबकि राधावल्लभ त्रिपाठी ने स्वीकार किया है कि वाल्मीकि, भास और कालिदास के नाटकों तथा बाण की रचनाओं में लोकधर्मी चेतना है।
किसी भी ग्रंथ में सम्बन्धों की अलग-अलग दृष्टि होती है। इस पर किसी को किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए बल्कि उनके मत की सम्यक् रूप से जाँच करने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का धैर्य आवश्यक है। इस अध्याय में लेखक ने डॉ0 राममनोहर लोहिया के वाल्मीकि रामायण पर टिप्पणी को स्थान दिया है-  “ राम का चरित्र ऐसा है जिनके पीछे चलने का मन होता है। राम आगे हैं तो आश्वासन है कि कोई आगे है जो राह बताएगा। जिस राह पर चलेगा, वह राह अच्छी होगी।  ” राममनोहर लोहिया ने राम के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण कथन किया है। निश्चित रूप से रामकथा नायक नहीं लोकनायक हैं। वे शब्दों में नहीं लोककण्ठों में जीवित हैं। उनकी अनन्त व्याख्याएँ होंगी। कहा भी गया है - ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।’
रामकथा संस्कृत और हिन्दी भाषा तक सीमित नहीं है। अन्य भाषाओं में रामकथा की रचना हुई है। राम के लोक की सीमाएँ देश की सीमा का अतिक्रमण करती हैं। उर्दू कवियों के यहाँ राम काव्य-विषय बने हुए हैं। अल्लामा इकबाल की नज्म को लेखक ने उद्धृत किया है- ‘है राम के वजूद पर हिन्दोस्ताँ को नाज। अहले नजर समझते हैं, उनको इमामे हिन्द।’ निश्चित रूप से यह काव्यांश बँटवारे के पहले का लिखा हुआ लगता है। बशीर बद्र, कैफी आजमी, मुनव्वर राना और बेकल उत्साही जैसे शायरों ने भी अपनी शायरी में किसी न किसी रूप में राम का उल्लेख किया है। यह मानना चाहिए कि राम हिन्दू के ही आराध्य नहीं है, वे मनुष्यता के नायक हैं। उर्दू लेखक डॉ0 एस0 आबिद हुसेन ने कहा है - ‘यथार्थ में कहा जाए तो वाल्मीकि-रामायण धार्मिक काव्यग्रंथ नहीं है बल्कि उसे चिरन्तन काव्य का पहला उदाहरण माना जा सकता है।’ संस्कृत हिन्दी भाषा से इतर कम्बन रामायण (तेलुगू), ‘रामचरितम्’ (मलयालम) के अलावा कन्नड़ और उडि़या भाषा में रामायण की रचना हुई है। इसी तरह गोविन्द रामायण पंजाबी भाषा में लिखा गया है।
इस पुस्तक का अन्तिम अध्याय का शीर्षक ‘पाश्चात्य काव्य मनीषा और वाल्मीकि-रामायण’ है। यह अध्याय काव्य की सैद्धान्तिकी पर रोशनी डालता है। इस अध्याय में यह बताया गया है कि पश्चिमी काव्य-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में वाल्मीकि-रामायण की अवस्थिति क्या है ? इस अध्याय में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू के महाकाव्य और काव्य के सम्बन्ध में विचार-विमर्श है जिसके जरिये वाल्मीकि-रामायण के काव्य-तत्त्वों और संरचना की जाँच की गई है। लेखक का मत है कि वाल्मीकि रामायण त्रासदी का काव्य नहीं है। मेरा अपना विचार है कि पाश्चात्य और भारतीय मूल्य अलग हैं। हम पश्चिमी वैचारिकी को पूर्व के महाकाव्यों के संदर्भ में लागू नहीं कर सकते। लेकिन विजय रंजन ने विवेचना का खतरा उठाया है। यह आलोचकीय दुस्साहस विजय रंजन का मुख्य भाव है। इसी प्रकार पश्चिम के प्रमुख विचारकों, टी0 एस0 इलियट, रिचर्ड की प्रकारान्तर से चर्चा की गई है। मिल्टन के पैराडाइज़ लास्ट का संदर्भ दिया गया है।
इसमें सन्देह नहीं कि लेखक ने वाल्मीकि-रामायण के स्थापत्य और मूल भाव को समझने के लिए उसका गहन अध्ययन किया है जो इस पुस्तक को पढ़ कर सहज ही जाना जा सकता है। अपनी बात कहने के लिए आप भाषा की जगह सैद्धान्तिक भाषा का उपयोग करते हैं लेकिन अगर ठीक से विचार किया जाए तो इस तरह के ग्रंथ के विवेचन के लिए आमबोलचाल की भाषा पर्याप्त नहीं है। यह पुस्तक पाठकों को किसी न किसी रूप में अवश्य विचलित करेगी और पाठक संस्कृत के वाङ्मय से लेकर अधुनातन विचारधाराओं से परिचित हो सकेंगे। वाल्मीकि जैसे मनीषी कवि का भाष्य और व्याख्या अपने आप में कठिन कार्य है। यह विमर्श का सामान्य विषय नहीं है। इसमें अवगाहन के लिए गहरी दृष्टि और विचार की आवश्यकता है। लेखक ने यह कठिन चुनौती स्वीकार कर वाल्मीकि-रामायण को चर्चा के केन्द्र में लाने का महती कार्य किया है। देखें इस कार्य को आगे कौन बढ़ाता है ?        

                           - आवास विकास कोलोनी, अमानीगंज, फैजाबाद (उ0प्र0)            
                                       (अवध-अर्चना, मई-जुलाई 2013 में प्रकाशित)