आलेख अति सुंदरहै। यह भारतीयताको बहुत अच्छे ढंग से परिभाषितकरता है। इसे हर भारत वासी को जान करर मनसा वाचा कर्मणा अपनाने की जरूरतहै।
(1)
कोलाहल
- विज्ञानव्रत
मंचों ने
खामोशी ओढ़ी
नेपथ्यों में कोलाहल है
सभी पात्र है गूँगे - बहरे
सिर्फ दिखायी देते चेहरे
दर्शक-गण भी
समझ रहे हैं
सोचा-समझा ये छल-बल है
भाषा और सम्वाद नहीं हैं
अभिनेता आजाद नहीं हैं
अभिनय में भी
नहीं दक्षता
ऐसा लगता सिर्फ नकल है
नहीं कहीं पर कुछ भी पूरा
सारा मंजर लगे अधूरा
कहने का
मतलब है ये ही
पूरा नाटक ही असफल है।
- नोएडा (उ0प्र0)
दूरभाष: 0981224571
(2)
करघा व्यर्थ हुआ
- त्रिलोक सिंह ‘ठकुरैला’
करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने बुनना छोड़ दिया।
काशी में
नंगों का बहुमत,
अब चादर की
किसे जरूरत,
सिर धुन रहे कबीर
रुई का
धुनना छोड़ दिया ।
धुन्ध भरे दिन
काली रातें,
पहले जैसी
रहीं न बातें,
लोग काँच पर मोहित
मोती
चुनना छोड़ दिया ।
तन मन थका
गाँव घर जाकर,
किसे सुनाएँ
ढाई आखर,
लोग बुत हुए
सच्ची बातें
सुनना छोड़ दिया।
-सिरोही (राजस्थान)
चलभाष: 9460714267
(3)
हत्या का अभियोग
- प्रो0 मालिनी गौतम
बरगद के सायों पर लगता
हत्या का अभियोग।
सुख के पौधे
पनप न पाये
अँधियारों में
धूप रोकते
दुःख के जाले
गलियारों में
इच्छाओं की अमर बेल पर
सूखेपन का रोग ।
मोर-मुकुट
चिन्ता के जब
खुशियों ने पहने
आहत मुस्कानों
पर थे
चुप्पी के गहने
चाहत की उजड़ी मज़ार पर
लाचारी के भोग।
दहशत के
बेताल टँगे
मन की डाली पर
आशंका की
बेल चढ़ी
सच की जाली पर
अनुबन्धों के भी सूली पर
चढ़ने के संजोग।
- संतरामपुर (महीसागर, गुजरात)
चलभाष : 9427078711
(4)
गीत का प्रतिरूप
- गरिमा सक्सेना
पत्तियों की
छन्नियों से
छन रही है धूप
दिख रहा
पगडंडियों का
अब सुनहरा रूप
सूर्य बनने को
चली हैं
शावकों की टोलियाँ
स्वप्न आँखों में
सजाये
तोतली सी बोलियाँ
नये कल का
गढ़ रही हैं
पुस्तकें प्रारूप
जा रहीं
अल्हड़ गगरियाँ
खिलखिलाने घाट पर
स्वर्ण
मिट्टी को बनाने
कृषक निकले बाट पर
चाहते
सुख-दुख फटकना
आँख के दो सूप
मंदिरों में बज रही हैं
आस्था की घंटियाँ
रोटियों को
थाप देतीं
खनखनाती चूड़ियाँ
लग रही है
भोर मनहर
गीत का प्रतिरूप।।
- यलहंका, बंगलौर (कर्नाटक)
चलभाष: 7694928448
(5)
बस यही हैं चेष्टाएँ
- अवनीश त्रिपाठी
है अकेलापन, उदासी
और बूढ़ी भावनाएँ।
आजकल बीते समय की
कुछ किताबें बाँचते हैं
खोलकर के कवर उसके
पृष्ठ में भी झाँकते हैं
उम्र के धुँधले समय में
बस यही हैं चेष्टाएँ।
बात की गुंजाइशें सब
पायताने पर पड़ी हैं
हर असहमति की बलाएँ
रोज सिरहाने खड़ी हैं
झेलकर तन्हाइयों को
थक चुकी हैं चेतनाएँ।
वर्गफुट की जिंदगी में
शेष है अवसाद केवल
होंठ का है झुर्रियों से
हो रहा संवाद केवल
रोज दर्पण में झुलसतीं
बिम्ब की सब धारणाएँ।
- देवलपुर सहिनवाँ, सुल्तानपुर
दूरभाष: 9451554243
(6)
बूढ़ा चश्मा
- शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
बूढ़ा चश्मा, ढूँढ़ रहा है,
तले समोसे में,
इस जीवन का हल।
बुझी अँगीठी सुलगाती है,
एक रतौंधी साँस,
झूली चमड़ी और वक्ष की
रही यक्ष्मा खाँस,
चढ़ी कड़ाही में हँसती हैं,
ब्रेड पकौड़ों की,
गरम आँच के बल।
नहीं कहीं है ग्राहक कोई,
खड़े लोग कुछ दूर,
तना परिश्रम की आँखों की
सेवा का संतूर,
सोने का है एक बिछौना
और मुलायम है,
नम मिट्टी का तल ।
आगे खुली कमीज की तरह,
देह सिली है शर्ट,
तनी हुई है एक अरगनी,
फटा टँगा स्कर्ट,
थोड़ा-थोड़ा दीख रहा है,
बाल्टी में पानी,
जो है गंगाजल।
काली पड़ी पतीली में है,
नये समय की भूख,
खड़ा पास से देख रहा मग,
अंग गए हैं सूख,
बहा पसीना, झरना कोई,
धुआँधार वाला,
या है बहता नल।
-मेरठ-1 (उ0प्र0)
दूरभाष: 9412212255
(7)
मन से मन के शब्द
- योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’
अब संवाद नहीं करते हैं
मन से मन के शब्द
एक समय था, आदर पाते
खूब चहकते थे
जिनकी खुशबू से हम-तुम सब
रोज महकते थे
लगता है अब रूठ गए हैं
घर-आँगन के शब्द
हर दिन हर पल परतें पहने
दुहरापन जीते
बाहर से समृद्ध बहुत पर
भीतर से रीते
अपना अर्थ कहीं खो बैठे
अपनेपन के शब्द
आभासी दुनिया में रहते
तनिक न बतियाते
आसपास ही हैं लेकिन अब
नज़र नहीं आते
ख़ुद को ख़ुद ही ढूँढ रहे हैं
अभिवादन के शब्द।।
- मुरादाबाद (उ0प्र0)
दूरभाष: 9412805981
(8)
युगबोधी
- डॉ0 अजय पाठक
युगबोधी चतुराई सीखी
समकालीन हुए
अंधे युग में काम नहीं
आती है चेतनता
बुद्धिमान हो जाने भर से
काम नहीं चलता
पढ़े पेट का रामपहाड़ा
रीढ़ विहीन हुए
अपने कंधे पर नाहक
ईमान नहीं ढ़ोते
अब हम छप्पनभोग दबाकर
देर तलक सोते
इनकी-उनकी निंदा करने में
तल्लीन हुए
दंडकवन की पर्णकुटी में
तपना छोड़ दिया
नैतिकता की राम कहानी
जपना छोड़ दिया
अवसर पाकर आसन पर
हम आसीन हुए।।
-बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाष: 098271 85785
(9)
ढाई आखर धीरे-धीरे
- शुभम् श्रीवास्तव ‘ओम’
ढाई आखर धीरे-धीरे
मेरे साथी बाँच जरा !
आर पार कुहराई खिड़की
भीतर मैना, बाहर तोता
और तीसरा भीतरघाती
पंखुड़ियों में पिनें चुभोता
वो कुरेदता - पत्थर साधो
तोड़ो भी ये काँच जरा !
कुछ ही राहें मंजिल की हैं
हैं बहकावा बाकी सब
कुछ ही वादे सच्चे होते
और दिखावा बाकी सब
पेगें भरने से पहले मन
अपनी रस्सी जाँच जरा !
बहुत सरल से शुरु हुआ कुछ
पहुँचा एक पहेली तक
ताजा ताजा क्या लिखने को
उँगली बढ़ी हथेली तक
कोई जब सच कहने आए
तुम भी कहना साँच जरा !
-मालवीय नगर, मकरीखोह, मिर्जापुर-1 (उ0प्र0)
दूरभाष: 7668788189