सही रास्ता
- डॉ0 निरुपमा श्रीवास्तव
“माँ ! माँ, मुझे बाजार से बुलबुल ला दोगी ? मैं बुलबुल पालूँगा। ”
“ नहीं ! ”
“अच्छा, तो फिर तोता, मैना, कबूतर, लाल मुनिया या फिर कुछ और जो तुम्हें अच्छा लगे ? ”
“ नहीं बेटे ! यह ठीक नहीं। ”
“ पर क्यों माँ ? मेरे तो बहुत से दोस्तों ने तरह-तरह के पंछी पाल रखे हैं। ”
“ जरूर पाले होंगे बेटे ! किन्तु किसी आजाद पंछी को पिंजरे में कैद कर उसकी आजादी छीन कर उसे दुःखी करना अच्छी बात नहीं है। पंछी भी हमारे समान प्राणी हैं। उन्हें भी अपनी आजादी उतनी ही प्रिय है, जितनी कि हमें। अच्छा बताओ, यदि कोई तुम्हें इसी तरह पिंजरे में कैद कर दे और तुम्हें अच्छे-अच्छे खाने की चीजें और कपड़े तो दे किन्तु तुम्हें पिंजरे से बाहर न आने दे तो क्या तुम्हें अच्छा लगेगा ? ”
संजीव की माँ ने उसे समझाते हुए कहा।
माँ की बात सुन कर दस वर्षीय संजीव ने इन्कार में अपना सिर हिलाया अवश्य, किन्तु पंछी न पालने की माँ की सलाह उसके गले नहीं उतरी।
दरअसल संजीव अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थी। संजीव के माता-पिता दोनों ही नौकरी करते थे। घर में सिर्फ माँ ही थी क्योंकि उसके पिता का तबादला दूसरे शहर में हो गया था। घर में माँ के ऑफिस से घर लौटने तक ४-५ घंटे वह अकेला ऊबता रहता था।
सारे पक्षियों में बुलबुल, मैना, तोता और कबूतर तो संजीव को बहुत ही अच्छे लगते थे। जब सोमेश की बुलबुल उसके पुचकारने पर ‘पिच्चणों-पिच्चणों’ कह कर अपने सिर की कलगी उठा कर सोमेश को जवाब देती थी या रवि का तोता उसके रवि के घर पहुँचने पर जब ‘संजीव !... संजीव !! ’ पुकार कर संजीव के आने की सूचना रवि को देता और खाने की कोई चीज देने पर चोंच से पकड़ी गई चीज को पंजे से पकड़ने के बाद ‘ धन्यवाद बन्धु ! ’ कहता या जब सुनील की मैना उसके पहुँचते ही ‘नमस्कार भइया ! कहो क्या हाल हैं ?’ कहती तो उसे बड़ा ही अच्छा लगता था। सौरभ के कबूतर के जोड़े की ‘गुटर गूँ गूँ’ टेर को सुन कर तो वह झूम ही उठता था। वह सोचता था काश ! उसके घर में भी ऐसा ही कोई पंछी उसका मित्र होता जिसके साथ वह अपना अकेलापन बाँट सकता। लेकिन जब भी उसने माँ से पालने के लिए बाजार से एक पक्षी खरीद कर लाने को जिद की तो माँ ने सख्ती से मना कर दिया।
संजीव के घर के पिछवाड़े एक बड़ा सा मैदान था जिसमें बहुत से बड़े-बड़े पेड़ लगे थे। उन पेड़ों पर तमाम पंछी चहचहाते-अठखेलियाँ करते रहते थे। संजीव अक्सर ही अपने कमरे की पिछवाड़े की ओर खुलने वाली खिड़की से उन्हें देखा करता था और सोचा करता था कि काश ! इनमें से कोई एक पंछी उसके घर में भी होता।
एक दिन अचानक संजीव को पक्षी पकड़ने की एक तरकीब सूझी। बस फिर क्या था। वह झटपट अपने उपाय को अंजाम देने में जुट गया। उसने अपनी गुल्लक को फोड़ कर अपनी बचत के पैसे निकाले और दूसरे दिन स्कूल से लौटते समय बाजार से लोहे की बड़ी सी एक ढक्कनदार टोकरी खरीद कर ले आया। घर में आकर छत पर जाकर उसने ढक्कन को जमीन पर रख कर उस पर काला कागज बिछाया और कागज पर पके चावल के कुछ दाने बिखेर दिए। दानों के पास ही उसने एक छोटी कटोरी में पीने के लिए पानी रख दिया। फिर उसने एक छः-सात ईंच लम्बी लकड़ी ली और उसके बीचोंबीच एक लम्बा सा मजबूत धागा बाँध दिया। अब उसने टोकरी के ढक्कन के ऊपर टोकरी को औंधा रख कर उसे धागा बँधी लकड़ी से टिका कर इस प्रकार रख दिया कि उसके अन्दर पक्षी के जाने के लिए मार्ग रहे। लकड़ी से बँधे धागे का स्वतन्त्र सिरा उसने सीढ़ियों के पास तक खींच कर रख दिया और स्वयं सीढ़ी पर इस तरह छुप कर बैठ गया कि उसे टोकरी के पास पहुँचा पंछी देख न सके।
काफी देर तक वह इस आस में बैठा रहा कि कोई न कोई पंछी इस तरह उसकी टोकरी में बन्द हो ही जाएगा किन्तु कुछ न हुआ। फिर भी उसने हिम्मत न हारी। वह रोज ही स्कूल से लौट कर इस तरह पंछी पकड़ने का प्रयास करता रहा।
रविवार का दिन था। सुबह के समय बहुत से पंछियों को उड़ते-चहकते देख कर उसने सुबह ही अपना पक्षी-पकड़ यन्त्र छत पर सुव्यवस्थित कर दिया और छुप कर पक्षियों की गतिविधियाँ देखने लगा।
कुछ ही देर बाद हठात् न जाने कहाँ से वहाँ एक बुलबुल आकर उसकी छत की मुँडेर पर आ बैठी। उसने टोकरी के नीचे बिखरे चावल के दानों को देखा। चावल के दानों को देख कर प्रसन्नता से ‘पिच्चणों-पिच्चणों’ बोलती इधर-उधर ताकती सशंकित सी वह टोकरी के पास पहुँची। पूर्ण एकान्त से आश्वस्त हो वह धीरे से टोकरी के अधखुले मार्ग से टोकरी के अन्दर घुसी। अभी उसने चावल के दो-चार दाने चुगे ही थे कि संजीव ने टोकरी को ढक्कन के ऊपर अधखुला रखने के लिए लगाई गई लकड़ी से बँधे धागे के अपने पास तक फैले स्वतन्त्र सिरे को धीरे से खींच दिया। लकड़ी के हट जाने से टोकरी अपने ढक्कन के ऊपर औंधी गिर पड़ी और बुलबुल उसके अन्दर कैद हो गई।
संजीव झपट कर टोकरी के पास पहुँचा। उसने टोकरी को ढक्कन सहित उठा लिया और टोकरी को सीधा कर सावधानी से टोकरी का ढक्कन मजबूती से उसके ऊपर बन्द कर दिया।
बुलबुल भयभीत होकर बुरी तरह फड़फड़ाती हुई पूरी टोकरी में इधर से उधर चक्कर लगा रही थी। परन्तु संजीव बुलबुल को पाकर खुशी से पागल हुआ जा रहा था। उसका दिल धक्-धक् कर रहा था।
संजीव ने झाँक कर नीचे आँगन में देखा। माँ स्नानगृह में थी।
दबे पाँव नीचे आकर उसने चुपचाप अपने कमरे में टोकरी ले जाकर रख दी और कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया।
अपने द्वारा बुलबुल पकड़ी जाने की बात उसने चाह कर भी माँ को नहीं बताई। उसे डर था कि कहीं माँ उस पर नाराज होकर बुलबुल को स्वतन्त्र न कर दे।
दोपहर में अपने खाने में से थोड़े से चावल उसने अपनी जेब में रख लिए बुलबुल को देने के लिए। माँ के अपने कमरे में आराम करने चले जाने पर वह अपने कमरे में पहुँचा। उसने टोकरी के पास जाकर बुलबुल को देखा।
बुलबुल थक-हार कर टोकरी में एक ओर चुपचाप बैठी थी। वह अत्यन्त उदास थी। उसकी चोंच घायल थी। उस पर खून की कुछ बूँदें जमी थीं। संभवतः टोकरी से आजाद होने की जद्दोजहद में ही उसकी चोंच घायल हो गई थी। उसे पास आया देख कर वह फिर डर गई और बेचैनी से टोकरी के अन्दर ही इधर-उधर उड़ती छटपटाने लगी।
संजीव ने उसे पुचकारा। टोकरी में बने छिद्रों से किसी प्रकार उसने जेब से निकाले चावल के दाने घुसेड़ कर दाने टोकरी के अन्दर डाल दिए। उसने कटोरी में पानी भी डाल दिया ताकि बुलबुल दाना-पानी पा ले।
किन्तु , बुलबुल का डर व बेचैनी कम न इुई। उसने न तो संजीव द्वारा दिए गए चावल खाए और न ही पानी पिया। काफी देर प्रतीक्षा करने पर संजीव दुःखी मन से वहाँ से हट गया।
रात्रि में भी संजीव ने बुलबुल को पुनः खाने-पीने की चीजें दीं किन्तु उसने किसी भी चीज में मुँह न लगाया। बुलबुल की भूख-हड़ताल से संजीव काफी हताश व परेशान था लेकिन वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे ?
अचानक संजीव ने देखा कि आँगन में बैठी बिल्ली की नजरें उसकी बुलबुल पर ही टिकी थीं। वह अनिष्ट की आशंका से भयभीत हो उठा। उसने दोस्तों से सुन रखा था कि बिल्ली पक्षियों की दुश्मन होती है। वह उन्हें मार कर खा जाती है।
संजीव ने निश्चय किया कि वह कमरे की खिड़की व दरवाजे को अच्छी तरह से बन्द करके सोएगा और कमरे की नाली का मुँह भी एक भारी ईंट से बन्द कर देगा ताकि बिल्ली कमरे में आ ही न सके। उसने टोकरी के ऊपर लकड़ी का एक भारी सा टुकड़ा रख दिया जिससे यदि बिल्ली किसी प्रकार से कमरे में घुस ही जाए तो भी वह टोकरी का ढक्कन खोल कर बुलबुल को न पकड़ सके। सब इन्तजाम करके वह निश्चिन्त होकर सो गया।
‘ खटाक ! ’ की तेज आवाज से अचानक संजीव की आँख खुल गई।
एकबारगी तो वह समझ ही न पाया कि हुआ क्या है ? उसने झट से कमरे की बत्ती जलाई।
रोशनी में उसने जो दृश्य देखा, उससे उसका कलेजा मुँह को आ गया। उसकी साँसें थम सी गईं।
बुलबुल के पिंजरे के पास बिल्ली उसकी बुलबुल की गर्दन को अपने मुँह में दबाए खड़ी थी। रोशनी होते ही वह एक ही छलांग में कमरे के रोशनदान के रास्ते कमरे से बाहर हो गई। संजीव ये दृश्य देख कर छटपटा कर रह गया।
संभवतः बिल्ली रोशनदान के रास्ते ही कमरे में घुसी थी और उसने अपने पंजे से टोकरी के ऊपर रखा लकड़ी का टुकड़ा धकेल कर टोकरी का ढक्कन खोल लिया था और बुलबुल को दबोच लिया था। लकड़ी का टुकड़ा गिरने की आवाज से ही संजीव की नींद खुली थी।
उसने घड़ी देखी। आधी रात का समय था। सुबह होने में अभी दो-ढाई घंटे शेष थे। माँ अभी सो ही रही होगी।
कमरे से बाहर निकलने में उसे डर लग रहा था। कहीं आँगन के किसी कोने में ही बिल्ली उसकी प्यारी बुलबुल को ............ ! नहीं-नहीं ! वह अब उस दृश्य को देख न सकेगा।
‘हाय, मेरी बुलबुल ! इतनी सावधानी के बाद भी मैं तुझे बिल्ली के मुख से बचा नहीं सका।’ पछतावे से उसकी आत्मा चीत्कार कर उठी।
उसे इस बात की भी बहुत ग्लानि हुई कि बुलबुल भूखी-प्यासी ही मर गई थी। कष्ट उसे इस बात का भी था कि वह उससे हिलमिल न सकी थी।
अतिशय दुःख से विह्वल होकर वह बिस्तर पर गिर पड़ा और तकिये में मुँह छिपा कर सिसकने लगा। रह-रह कर उसकी आँखों के समक्ष ‘भय से टोकरी के अन्दर इधर-उधर फड़फड़ाती-उड़ती बुलबुल’, ‘थक-हार कर टोकरी में निश्चल बैठी हताश, बेबस बुलबुल’, ‘घायल चोंच वाली बुलबुल’, ‘भूखी-प्यासी बुलबुल’, ‘बिल्ली के मुँह में दबोची हुई बुलबुल’ जैसे अनेक चित्र बार-बार साकार होने लगे। उसकी आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। घंटों इसी तरह रोते-रोते वह कब बेसुध हो गया, उसे पता ही न चला।
सुबह के सात बज रहे थे। संजीव का स्कूल साढ़े सात बजे का था किन्तु उसका कहीं अता-पता नहीं था। उसके कमरे का दरवाजा भी अन्दर से बन्द था।
संजीव की माँ को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर संजीव रात में कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द करके क्यों सोया था और अब तक सोकर उठा क्यों नहीं था ?
“ संजीव ! ओ संजीव !! उठो बेटा ! आज स्कूल नहीं जाना क्या ? ”
कहते हुए माँ ने संजीव के कमरे का दरवाजा खटखटाया।
माँ की आवाज सुन कर संजीव चौंक पड़ा। उसने उठ कर दरवाजा खोल दिया।
अधिक रोने के कारण उसकी आँखें लाल थीं। गालों पर सूखे हुए आँसुओं की लकीरें बनी थीं।
संजीव की हालत देखकर माँ अचरज और आशंका से भर उठी।
“ अरे ! ये तुझे क्या हुआ ? रोया क्यों था तू ? तबियत ठीक नहीं है क्या ? क्या पेट में दर्द था? ”
माँ ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी किन्तु संजीव उत्तर में सूनी-सूनी, खोई-खोई आँखों से कुछ देर माँ को देखता रहा। फिर आहिस्ता से उसने कमरे के कोने में बेतरतीब पड़ी टोकरी की ओर संकेत कर दिया।
माँ ने टोकरी को देखा। पर उसे कुछ समझ न आया।
माँ के काफी पूछने पर संजीव ने सुबकते हुए बुलबुल को टोकरी में कैद करने से लेकर बिल्ली द्वारा उसको पकड़ कर ले जाने तक की पूरी दास्तान माँ को कह सुनाई।
संजीव की बात सुन कर माँ ने गहरी निःश्वास छोड़ी।
“ देख ! तेरी जिद की वजह से आज एक निर्दोष बुलबुल की जान चली गई। बुलबुल यदि टोकरी में बन्द न होती तो बिल्ली उसेे पकड़ न पाती। इसीलिए मैं तुझे पक्षियों को कैद करने से रोक रही थी।”
संजीव ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया।
कुछ देर ठहर कर माँ फिर बोली, “पिंजरे में कैद कर पक्षी पालने के मनुष्य के शौक के कारण पक्षियों का जीवन इसी तरह खतरे में पड़ जाता है। पिंजरे में कैद पक्षी प्रायः रोगी होकर भी मर जाते हैं। ”
संजीव ने पछतावे भरी दृष्टि से माँ की ओर देखा। उसकी आँखें फिर छलकने लगीं।
“ बेटे ! पक्षी हमारे पर्यावरण का अनिवार्य अंग हैं। वे न केवल वनस्पतियों के बीजों के वितरण और वनस्पतियों की किन्हीं-किन्हीं प्रजातियों में परागण की क्रिया और बीज बनने में सहायक होते हैं वरन् मच्छर, मक्खी, तिलचट्टा, झींगुर, बरसाती कीट-पतंगे जैसे कीड़े-मकोड़ों को खाकर वे उनकी जनसंख्या पर नियन्त्रण भी रखते हैं। इस तरह पक्षी हमारे गहरे मित्र हैं जो वृक्षों में फल बनने और खेतों हमारी फसलों में बीज बनने की क्रिया में केवल सहायक ही नहीं हैं वरन् वे पर्यावरण-संतुलन बनाए रखने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ”
संजीव माँ की बात को अचरज से सुन रहा था। पछतावे के आँसू उसकी आँखों से बह रहे थे।
संजीव को समझाते हुए माँ पुनः बोली, “मनुष्य के पक्षी को कैद कर अपना मन बहलाने के बुरे शौक के कारण ही बाजार में पक्षी अच्छी कीमत पर बिकते हैं जिससे बहुत से लोग आकाश में स्वतन्त्र, स्वच्छन्द विचरते और वृक्षों पर घोंसला बना कर रहते पक्षियों को पकड़ने के धन्धे में लग जाते हैं। उनके पक्षी पकड़ने की कोशिशों में न जाने कितने निर्दोष सुन्दर-सुन्दर, विशिष्ट गुण वाले पक्षी ही नहीं साधारण पक्षी भी बुरी तरह घायल होकर मर जाते हैं। पक्षियों को पकड़ने के अपने जुनून के चलते ऐसे लोग अक्सर वह पेड़ ही काट कर गिरा देते हैं जिन पर इनके घोंसले होते हैं, जिससे पक्षियों के असहाय छोटे-छोटे बच्चे मर जाते हैं, उनके न जाने कितने अण्डे फूट कर नष्ट हो जाते हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो भविष्य में हमें केवल सुन्दर और विशिष्ट पक्षी ही नहीं, कोई अन्य पक्षी भी कहीं देखने को नहीं मिलेगा और उनकी अनुपस्थिति में खेती-बागवानी और पर्यावरण असन्तुलित होगा सो अलग से।”
माँ अति गम्भीर हो चली थी। उसने संजीव के आँसू पोंछते हुए कहा, “खैर, अब जो हो चुका, उसे बदला नहीं जा सकता। उससे सबक ले और भविष्य में ऐसा न हो, ऐसा निश्चय कर। स्कूल जाने के लिए जल्दी कर ! देर हो रही है। ”
संजीव अनमना-सा स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगा।
इस घटना के चार दिन बाद ही संजीव की माँ ने आफिस से लौटते समय ढेर सारे गमले खरीदे।
अगले ही दिन माली को बुला कर कुछ गमले उन्होंने घर के आँगन में उस ओर रखवा दिए जहाँ आँगन में ज्यादा देर तक धूप रहती थी। इसी तरह कुछ गमले उन्होंने घर की छत पर भी रखवा दिए। सभी गमलों में उन्होंने गोबर की खाद मिली मिट्टी भरवा कर उनमें मकोय, मिर्च, टमाटर, गेंदा, गुलाब, चमेली, बेला, सूरजमुखी जैसे शीघ्र फूलने-फलने वाले पौधे रोपवा दिए।
घर के लान में भी माँ ने ऐसे ही पौधों को क्यारियों लगवाने के साथ-साथ केला, पपीता, अंगूर, अमरूद जैसे पेड़ भी रोपवा दिए।
एक छोटे से बाल्टे में गोबर की खाद तैयार करने के उपाय भी करवाए उन्होंने।
माँ के आदेश पर संजीव ने इन कामों में माली बाबा की पूरी मदद की किन्तु माँ ऐसा क्यों करवा रही है ?--- यह उसे समझ न आया। इस सम्बन्ध में माँ से कुछ भी पूछने का साहस उसमें नहीं था।
वर्षा का मौसम आ गया था। पेड़-पौधों में पानी देने की कोई आवश्यकता नहीं थी, फिर भी माँ के आदेश पर जिस दिन वर्षा नहीं होती थी, उस दिन संजीव सुबह-शाम सभी पेड़-पौधों में पानी डाल देता था ताकि पानी की कमी से वे सूख न जाएँ। माँ के ही कहने पर वह थोड़े-थोड़े दिनों के अन्तराल से सभी पेड़-पौधों की मिट्टी में बाल्टे में तैयार की गई खाद भी डाल दिया करता था।
लगभग चार-पाँच माह में उसकी मेहनत रंग लाई। उसका लान, आँगन और घर की छत हरियाली से भर उठे। घर की आबोहवा फूलों की भीनी-भीनी खुश्बू से महक उठी।
घर की हरियाली व फूलों की सुगन्ध ने पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित किया और अचानक एक दिन संजीव का समूचा घर पक्षियों के कलरव से गूँज उठा।
दोपहर बारह बजे स्कूल से घर लौटे संजीव के आश्चर्य और हर्ष का ठिकाना न रहा जब उसनेे देखा कि दोपहर का सन्नाटा पाकर उसके घर के लान में बुलबुल, कबूतर, तोते, लाल मुनिया, गौरैय्या और न जाने कितने तरह के रंग-बिरंगे मनमोहक पक्षी आकर अंगूर, मकोय-फल, टमाटर आदि को देख कर चहक रहे थे। पौधों-लताओं और छोटे-छोटे वृक्षों की टहनियों पर फुदक-फुदक कर एक से बढ़ कर एक खूबसूरत पंछी फलों को खाकर प्रसन्नता से परस्पर अठखेलियाँ कर रहे थे।
संजीव देर तक घर के सदर दरवाजे के खम्भे की आड़ में खड़ा उनकी गतिविधियों को मन्त्रमुग्ध सा देखता रहा। फिर वह घर में घुसा।
उसे देखते ही सारे पक्षी फुर्र से उड़ गए।
संजीव एक बड़े बर्तन में पानी भर कर ले आया। पानी से भरा बर्तन उसने लान में गमलों के पास रख दिया और अपने कमरे में आकर खिड़की खोल कर लान में देखने लगा।
उसके कमरे में जाते ही सन्नाटा पाकर पक्षी पुनः लान में आ डटे। फल खाकर उन्होंने बर्तन में रखा पानी भी पिया।
उन्हें देख कर संजीव को अत्यन्त सुख मिल रहा था। पहली बार वह पक्षियों को इतने पास से देख पा रहा था।
अब तो संजीव का नित्य ही का यह नियम बन गया कि वह आँगन, लान व घर की छत पर साफ पानी से भरा एक बर्तन रख देता और खाने के लिए गेहूँ, चावल आदि के दाने भी बिखेर देता। दोपहर में जब माँ ऑफिस में होती और घर में सर्वत्र पक्षियों का कलरव गूँज रहा होता तो वह छुप-छुप कर उन्हें देख कर अपना मन बहलाया करता। अब अकेलेपन से वह ऊबता नहीं था।
लेकिन उसे अभी भी इस बात का गहरा दुःख था कि पक्षी उसे अपना मित्र नहीं समझते थे। ज्योंही वह लान, आँगन या छत पर जाता, वे सब उसे देखते ही फुर्र हो जाते थे।
खाने-पीने की सुलभता व सन्नाटा पाकर कुछ पक्षियों ने लान में लगे पेड़ों, घर की दीवारों में बने छेदों में अपने घोंसले बना लिए।
एक दिन संजीव जब स्कूल से लौटा तो उसने देखा लान में दीवार के बडे़ से झरोखानुमा छेद में बनाए गए बुलबुल के घोंसले से न जाने कैसे बुलबुल का एक बच्चा जमीन पर आ गिरा था। उसके पंख भी ठीक तरह से निकले नहीं थे और अपनी बड़ी सी चोंच को फैलाए वह असहाय होकर छटपटा रहा था। उसकी माँ बुलबुल बार-बार उसके पास जा रही थी किन्तु वह बच्चे को वापस घोंसले में ले जाने में असमर्थ थी।
संजीव ने जल्दी से अपने कमरे में जाकर अपना बस्ता एक ओर फेंका और वापस आकर सावधानी से बुलबुल के बच्चे को उठा कर गत्ते के टुकड़े पर रख दिया।
शनिवार का दिन था। ऑफिस में छुट्टी होने से माँ घर पर ही थी।
उसने बुलबुल के बच्चे के घोंसले से गिर पड़ने की बात माँ को बताई।
माँ के कहने पर वह रसोई में जाकर एक कटोरी में दूध और पूजा की अलमारी से रुई की बत्ती ले आया।
वह रुई की बत्ती दूध में भिगो-भिगो कर बच्चे की खुली चोंच में देकर बत्ती दबा-दबा कर बच्चे को दूध देने लगा। थोड़ी देर में दूध पीकर बच्चा शान्त हो गया।
संजीव ने सीढ़ी लगा कर बच्चे को बुलबुल के घोंसले में सावधानी के साथ रख दिया।
बच्चे की माँ बुलबुल पहले तो अपने बच्चे के जीवन के लिए चिन्तित हो संजीव के आस-पास मँडराती रही, लेकिन जब उसने संजीव को घोंसले में अपने बच्चे को सुरक्षित रखते देखा तो उसका भय जाता रहा। वह फुदकती हुई संजीव की बाँह पर आ बैठी और प्यार व कृतज्ञता से ‘पिच्चणों-पिच्चणों’ करती हुई उसे देखने लगी।
यह देख संजीव प्रसन्नता से चहक उठा-- “ माँ ! माँ ! देखो तो, बुलबुल मेरी दोस्त बन गई। ”
पक्षियों को घर में पालने और उनसे मित्रता करने का सही रास्ता अब उसे मिल गया था।