झंकार
आँखें तेरी मद भरी, लब पे खिला गुलाब।
मन में है कश्मीर तो, तन में है पंजाब।।
आँखें नीली हो गईं, गाल हो गया लाल।
प्रियतम तेरे प्यार ने, कैसा किया कमाल।।
मिटी प्रतिष्ठा धूल में, घटा मान-सम्मान।
फिर भी मिट पाया नहीं, दिल से तेरा नाम।।
मिलन जुदाई का अजब, है ऐसा दस्तूर
जो मन से है निकट, वो तन से है दूर।।
योग और शुुभ योग का, जब हो सकल सुयोग।
उस पर प्रभु की हो कृपा, तब बनता संयोग।।[
- डाॅ0 अशोक गुलशन
उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच (उ0प्र0)
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दूरियाँ इस कदर बड़ी मत कर।।
बीच अपने अना खड़ी मत कर।।
पल दो पल को जरा ठहर भी जा,
खुद को इस तरह से घड़ी मत कर।।
ख्वाहिशों का सिरा नहीं कोई,
बेसबब ख्वाहिशें बड़ी मत कर।।
तू जले और सबके सब खुश हों,
इस तरह खुद को फुलझड़ी मत कर।।
प्यार में शर्त तो गवारा है,
शर्त को यार हथकड़ी मत कर।।[
- डाॅ0 दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’
जवाहर नवोदय विद्यालय, ग्राम व पोस्ट: घुघुलपुर, जिला बलरामपुर (उ0प्र0)-271201
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चुप हुईं ऐसे हवाएँ, धुएँ हो गए ऊध् र्वगामी।
इस सदी के बाद लौटेगा
दिवस ले कोई अन्दर,
था प्रतीक्षित शत कोरों में
विवश सा भग्न मन्दिर
हाथ बाँध ईश्वर, तकता था बदलाव कामी।
भयग्रसित शैवाल बाला,
घुट रही थी पाँव-नीचे
शंख सितुए भोगते थे
यातनाएँ दाँत भींचे।
काँपती-सी उर्मियों पर डगमगाती नाव दामी।
नाम लिख कर काट डाले
तलमलाती आहटों पे,
बीतते वर्षों में आए
लोग कितने इन तटों पे।
की सभी सैलानियों ने डुब्बियों के घर गुलामी।
काँपने की आदतों को
देह कैसे छोड़ पाती,
खेल ऐसे रुक न पाया
उम्र बीती आत्मघाती।
कसमसाती रहगई उन मुट्ठियों की शक्ल वामी।[
- अश्विनी कुमार ‘आलोक’
प्रभा निकेतन, धरनी पट्टी, प्रभाग बछड़ा, समस्तीपुर-848506 (बिहार)
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झूठे संसार में
दर्पण भी झूठ हुए प्यार में।।
झूठे संसार में ।।
शब्द नहीं लगते हैं,
भाषा के पास में।
हम कैसे बोलेंगे-
नीले आकाश में।
क्या होगा
बतलाओ,
ऐसे व्यवहार में।
झूठे संसार में।।
कटे हुए लगते हैं,
पिंगल संवाद के।
कुछ भी तो पास नहीं बचा-
लगता है याद के।
कैसे फिर निकलोगे,
डूब के उधार में।
झूठे संसार में।।
मौसम है, बादल हैं
अर्थहीन बातों का।
स्वप्न भी दिवसों का,
मिली जुली रातों का।
मिलती है जीत जहाँ
बार-बार हार में
झूठे संसार में।[
- ओमप्रकाश ‘अडिग’
गीतायन, 454 रोशनगंज, शाहजहाँपुर-242001 (उ0प्र0)
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चेहरा
मेरे आस पास भीड़
भीड़ में चेहरे ही चेहरे,
मुस्कराते, गम्भीर थके से,
सबके सब एक जैसे, पुते पुते से,
ऊपर का चेहरा अलग
अन्दर कुछ और
मैं झाँकता हूँ अन्दर
वे मुस्करा देते हैं।
कैसे कहूँ उनकी मुस्कान भी
अलग है
थकी थकी सी,
चुप रहता हूँ
डर लगता है
कुछ बोलूँगा तो,
तो चेहरा हट जाएगा
नकली चेहरा उघड़ना,
दर्द देता है
इसलिए मुस्करा देता हूँ मैं भी।[
- सत्यनारायण भटनागर
2-एम आई जी देवरादेव नारायण नगर, रतलाम
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चाहे घर में दो जने, चाहे हों दस पाँच।
रिश्तों में दिखती नहीं, पहले जैसी आँच।।
रिश्ते सब ‘इन लाॅ’ हुए, क्या साला, क्या सास।
पड़ी गाँठ-पर-गाँठ है, गायब हुई मिठास।।
हर रिश्तों की नींव की, दरकी आज जमीन।
पति-पत्नी भी अब लगें, जैसे भारत-चीन।।
न ही युद्ध की घोषणा, और न युद्ध-विराम।
शीत-युद्ध के दौर से, रिश्ते हुए तमाम।।
रिश्तों में है रिक्तता, साँसों में संत्रास।
घर में भी अब भोगते, लोग यहाँ वनवास।।
स्वारथ जी जब से हुए, रिश्तों के मध्यस्त।
रिश्ते तब से हो गए, घावों के अभ्यस्त।।
अब ऐसे कुछ हो गए, शहरों में परिवार।
बाबू जी चाकर हुए, अम्मा च ौकीदार।।
माँ मूरत थी नेह की, बापू आशीर्वाद।
बातें ये इतिहास की, नहीं किसी को याद।।
समकालिक सन्दर्भ में, मुख्य हुआ बाजार।
स्वार्थपरता बनी तभी, रिश्तों का आधार।।
क्यों रिश्ते पत्थर हुए, गया कहाँ सब ताप ?
पूछ रही संवेदना, आज आप से आप।।[
- डाॅ0 रामनिवास ‘मानव’
‘अनुकृति’, 706, सेक्टर-13, हिसार-125005 (हरियाणा)
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गर फिसला
फिसल ही जाएगा
मुट्ठी से वक्त।[
*
नैतिक मूल्य
गिरा, गिरता गया
पाताल तक ![
*
सेंसर बोर्ड
खिड़कियाँ खुली हैं
किवाड़ बन्द ![
*
सेक्स का भूत
टी0 वी0 से उतर के
घुसा घर में।[
*
जीवन-मूल्य
हाशिये पे जीवन
बदहाल सा।[
-आनन्द बिल्थरे
प्रेमनगर, बालाघाट-481001(म0प्र0)
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लघुकथाएँ
अभिशाप
- नरेन्द्र आहूजा ‘विवेक’
अगले दिन करवाचौथ था। सुहागिनों द्वारा अपने सुहाग की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला उपवास।
सुहागिनें सज रही थीं।
‘रुपसी ब्यूटी पार्लर’ ने भी ‘मेंहदी मेला’ लगाया था। हाथों में मेंहदी सजाई जा रही थी।
कमला की माँग सबसे ज्यादा थी। वह सबसे अच्छी, बारीक, आकर्षक अरेबियन आदि हर प्रकार की मेंहदी डिजायन बनाने में कुशल थी। चुपचाप पूरी तन्मयता से वह सुहागन का सिंगार करती थी।
मेंहदी लगवाते समय निशा लगातार बोलती जा रही थी। निशा की बातों से बेखबर कमला उसके हाथों एक नया डिजायन बना रही थी।
तभी अचानक निशा बोली, “इसमें मेरे सुहाग का नाम ‘राजेश’ छिपा कर लिख दो । इस ढंग से लिखना कि वह ढूँढ न पाएँ।”
‘राजेश’ नाम सुन कर कमला चौंक उठी। सधे-सँभले हाथ अचानक हिल गए ।
यही नाम तो था उसके पति का भी जो शादी के प्रथम वर्ष में ही करवाचौथ वाले दिन दुर्घटना का शिकार होकर उसे छोड़ कर हमेशा-हमेशा के लिए चला गया था।
कमला के दिल के जख्म हरे हो गए थे। कैसे-कैसे लांछन सहे थे उसने- “डायन ! पति को खा गई मनहूस।”..............“ करवाचौथ के व्रत में पानी पी लिया था। इसीलिए पति दुर्घटना में मर गया। ”
पति की याद आते ही कमला की आँखों से दो आँसू टपक पड़े थे।
अब चौंकने की बारी निशा की थी।
“ क्या हो गया ? तुम रो क्यों रही हो ? ”
“ कुछ नहीं, बस वैसे ही कुछ याद आ गया था। ”
गौर से देखने पर भी कमला के शरीर पर सुहाग का कोई निशान न पाकर निशा जोर से बोली, “ तुम तो विधवा हो ! विधवा होकर सुहागिनों का सिंगार करती हो ? इससे तो अपशगुन होता है। ”
कह कर निशा ने कमला के हाथों को परे झटक दिया और पैर पटकती हुई पार्लर से बाहर चली गई।
यह सुन कर अन्य सारी सुहागिनें भी जो काफी देर से कमला के हाथों से मेंहदी लगवाने के लिए अपनी बारी का इन्तजार कर रही थीं, अचानक उठ कर चल दीं।
कमला जोर-जोर से रोने लगी थी। विधवा होना उसके लिए अभिशाप बन चुका था।[
- 922/28, फरीदाबाद (हरियाणा)
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अमीरी का तड़का
- एस0 सी0 कटारिया
मलमास में शुभ कार्य, शादी-ब्याह स्थगित रहे थे। लग्नमास शुरु होते ही वे शुरु हो गए।
मुझे भी विवाह-उत्सव के अंतर्गत एक बारात में शामिल होने का अवसर मिला।
बारात निकल कर वधू के यहाँ रात में पहुँचनी थी।
बाराती सजे-धजे धूम-धड़ाके के साथ चल रहे थे। महिलाएँ नृत्य व मांगलिक गान कर रही थीं।
बारात की विद्युत सज्जा के लिए बारात के अगल-बगल कुछ आदिवासी महिलाएँ कैरोसिन से जलने वाली गैस बत्ती को, तो कुछ आदिवासी महिलाएँ झूमर को उठा कर चल रही थीं।
अचानक संतुलन बिगड़ने से झूमर उठाए एक महिला झूमर सहित सड़क पर गिर गई।
झूमर चकनाचूर हो गया। चारों तरफ काँच और तेल फैल गया।
बारात में सम्मिलित एक महिला के बच्चे को भी हाथ में इससे थोड़ी चोट लग गई। उसके हाथ से खून रिसने लगा था।
उचित ही था कि घायल बच्चे को हाथोंहाथ लिया गया।
विडम्बना यह थी कि दुर्घटना-प्रभावित आदिवासी महिला की ओर किसी का ध्यान नहीं था जिसको बच्चे से अधिक चोट लगी थी और वह लहूलुहान स्थिति में एक तरफ बैठ कर रो रही थी।
मैं सोचने लगा था- संवेदना व्यक्त करने और सहायता उपलब्ध कराने में भी सम्पन्नता और निर्धनता कितनी आड़े आती है ! क्या उस गरीब आदिवासी महिला को लगी चोट और निकला हुआ उसका खून सम्पन्न घर के बच्चे की चोट और उसके खून से भिन्न था ?
- 10, महावीर नगर, रतलाम (म0प्र0)
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कहानियाँ
शर्म की बात
- डाॅ0 गोपाल नारायण आवटे
रामनाथ बाबू के यहाँ से खबर मिली थी कि अगले हफ्ते होने वाली उनकी उम्मीदवारी में दिल्ली से आ रहे अध्यक्ष महोदय के सामने भीड़ की जरूरत पड़ेगी। सब व्यक्तियों को रैली में लेकर आ जाओ। शक्ति-प्रदर्शन हो जाएगा और टिकट मिलना भी पक्का हो जाएगा।
रामनाथ बाबू पूर्व में हमारे गाँव के ही जमींदार थे। हम तो उनकी रियासत में मजदूरी करते थे। उनकी बदौलत ही हम दस दर्जे तक पढ़ पाए थे।
सेवा करना रामनाथ बाबू का शौक था। यही सेवा आगे जाकर विधानसभा में काम आई और वह जीत भी गए।
सेवा और नेतागीरी फैशन बन गया था। इसी के परिणामस्वरूप कुकुरमुत्ते के समान कई नेता क्षेत्र में पैदा हो गए थे। रामनाथ बाबू को उनसे खतरा हो गया था।
देश में प्रजा का तंत्र है। इस तंत्र में जिसके पास भीड़ है, वोट है, वही सिकन्दर होता है। परिणामस्वरूप गाँवों में एकता और समाज-सेवा करने के लिए उन्होंने एक दलित संघ बनवा दिया और उसकी पूरी देख-रेख मेरे सुपुर्द कर दी।
कभी भी कोई भी कार्य होता तो मैं पत्र लिख कर, फोन करके हमारे विधायक जी को सूचित करता। काम पूरा न होने पर भी थोड़ा-बहुत होने का भ्रम सामने वाले को अवश्य हो जाता था।
रामनाथ बाबू का एक ही सिद्धान्त था कि कुत्ते को भरपेट रोटी मिलेगी तो वह घर की रखवाली नहीं करके सोता रहेगा। इसी तरह देहातियों की सब माँगें पूरी हो जाएंगी तो यह हमारे महल-कोठियों में आकर रहने की माँग कर बैठेंगे। इसलिए इन्हें अधिक देने की आवश्यकता नहीं है। मैं उनकी शिक्षा को गुरुमंत्र की तरह अपने में सहेज रहा था।
रामनाथ बाबू का कभी भाषण सुनने को मिल जाए तो व्यक्ति चकित रह जाएंगे। क्या भाषण देते हैं। भाषण में गरीबों की चर्चा करते-करते रोने लगेंगे, आँसू पोछेंगे। लगेगा कि यही विश्व के एकमात्र जनता के मसीहा हैं।
रामनाथ बाबू जब कभी गाँव आते हैं तो मेरे कंधे पर हाथ रख कर ऊँच-नीच समझाते हैं। मुझसे कहते हैं कि तू तो घर का लड़का है। मेरे बाद तुझे ही क्षेत्र का विधायक बनना है। उनकी बात सुन कर मैं सुनहरे सपनों के इन्द्रधनुष में खो जाता हूँ।
पिछले चार चुनावों में उनके लिए भीड़ जुटाना, उनका प्रचार करना और उन्हें बाहर की गुप्त सूचनाएँ देने का काम करता आ रहा हूँ। परिणामस्वरूप कभी-कभी किसी से शिकायत करने की धमकी देकर हजार-पाँच सौ रुपए मैं कमा भी लेता हूँ।
पिछले एक-दो वर्षों से मैं अनुभव कर रहा हूँ कि उन भुखमरे, देहाती अनपढ़ भीड़ का स्वार्थी हिस्सा मैं भी बनता जा रहा हूँ। जब भी जी चाहा रामनाथ बाबू मेरा उपयोग कर लेते हैं। आखिर कब तक क्षेत्र के दलित वर्ग को या निर्धन तबके को मूर्ख बना कर ऐसी रैलियों में ले जाकर रामनाथ बाबू का प्रभाव जमवाता रहूँगा ? यह तो प्रभाव जमाने की सिलसिले का ही एक हिस्सा है। अध्यक्ष महोदय रामनाथ बाबू पर, रामनाथ बाबू मुझ पर और मैं ग्रामीणों पर प्रभाव जमाता हूँ। आखिर यह क्रम कब तक चलेगा ? इससे मुक्ति कैसे मिलेगी ? क्या हम सबको गुलाम बनाए रखने के लिए ही रामनाथ बाबू ने दलित संघ बनवाया था ताकि जीवन भर उनकी चाकरी करके उनकी जयजयकार करते रहें ? इन प्रश्नों में से किसी एक का भी उत्तर मेरे पास नहीं था। मैं बेबस उनका हुक्म मानने के लिए बाध्य था।
हाँ, तो मैं कह रहा था कि रामनाथ बाबू का संदेश आया था कि भीड़ लेकर रेस्ट हाउस पहुँचो। वहाँ नारेबाजी करवा दो ताकि विरोधी टिकट के उम्मीदवारों का हौसला पस्त हो जाए।
रैली के लिए चार-पाँच सौ की भीड़ सदैव रहती ही है। फिर रैली में आने-जाने के लिए रेलगाड़ी भी निःशुल्क रहती है। जिला मुख्यालय में जाना निःशुल्क, शहर घूमना निःशुल्क, भोजन के पैकेट निःशुल्क ! कौन भुखमरा जाना नहीं चाहेगा ?
फिर रामनाथ बाबू गाँववालों से देशी भाषा में बात करते हैं; भीड़ में घुस कर काका, दाऊ, दादा करके सबके पाँव छूना, प्रणाम करना। बस, अनपढ़ ग्रामीण और क्या चाहेंगे ? सब खुश रहते हैं और जब भी शहर से खबर लगती है, मैं तुरन्त भीड़ को बुला कर रवाना हो जाता हूँ।
मैंने रामनाथ बाबू की रैली की सूचना अपने छोटे साथियों को दे दी। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर सूचना दे दी।
निश्चित दिन सब लोग एकत्र भी हो गए।
हम सब शान से रेल में बैठ कर राजधानी जा पहुँचे।
वहाँ हमारी प्रतीक्षा करते महादेव प्रसाद जी मिल गए। उन्होंने मेरे पीछे सबको एक कतार में किया और जहाँ अध्यक्ष ठहरे थे उस ओर लेकर बढ़ चले।
सिर पर चिलचिलाती धूप थी। माथे पर पसीना आ रहा था किन्तु प्यास से सूखते हलक से जोर-जोर से नारे लगाते हम चले जा रहे थे।
विश्राम-गृह के सामने जाकर मैंने फिर से दूने जोश से नारे लगाने प्रारंभ किए- “ हमारा नेता कैसा हो।”
भीड़ ने जवाब दिया- “ रामनाथ बाबू जैसा हो। रामनाथ जी तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। ”
लगभग एक घंटे तक इस तरह चीखने के बाद अध्यक्ष महोदय ने मुझे बुलाया और आश्वासन दिया कि रामनाथ बाबू को विधानसभा सीट का टिकट हेतु हम वरीयता क्रम में रखेंगे। फिर वह तो कभी हारे भी नहीं थे।
हमने खुश होकर अध्यक्ष महोदय जिन्दाबाद के नारे भी लगवा दिए, जिससे वह भी प्रसन्न दिखे।
लगभग चार बजे महादेव प्रसाद जी ने कहा कि काम खत्म हो गया है। रात 9 बजे जाने की गाड़ी है। भोजन-व्यवस्था रखी है। सो नीचे दशहरा मैदान में भोजन करा के सबको वापस ले जाना। रामनाथ बाबू वहीं भेंट करने आ जाएंगे।
शाम हो चुकी थी। कुछ घूमने के लिए निकल गए थे, जिन्हें जोरों से भूख लग आई थी, वे केले या मूँगफली खरीद कर खा कर अपनी भूख मिटा रहे थे।
रात 8 बजे के करीब रामनाथ बाबू दशहरा मैदान पहुँचे। साथ में वीडियो शूटिंग वाला भी था। रामनाथ बाबू ग्रामीणों के साथ भोजन भी करने वाले थे ताकि उसे टी0 वी0 पर या लोकल चैनल पर दिखाया जा सके।
गपशप करने के बाद थोड़ी देर में ही टेबिल लग गए। स्वरुचि भोज की व्यवस्था हो गई। कहा गया ‘सब अपने हाथ से जितना खा सकते हैं, ले लें और भोजन करें।’
ग्रामीणों के लिए यह नया अनुभव था। गरमा-गरम व्यंजन थे। कुछ के नाम तो स्वयं मुझे भी नहीं मालूम थे।
रामनाथ बाबू सब ग्रामीणों के मध्य खड़े होकर उनके हाल-चाल पूछते, उन्हें भोजन परोसते घूम रहे थे। वीडियो शूटिंग बराबर जारी थी। मेरे मन में इस कार्यवाही से वितृष्णा सी जाग रही थी-- गरीबों के साथ भोजन भी विज्ञापन बन कर रह गया है !
भोजन करके हमने रात की गाड़ी पकड़ी। रेलगाड़ी में जहाँ भी जगह मिली बैठ गए और सोते-जागते सुबह-सुबह अपने घर पहुँचे।
रामनाथ बाबू चुनाव का टिकट पा गए और चुनाव भी जीत गए। हम शहर में उन्हें बधाई देने के लिए पहुँचे। साथ में आठ-दस व्यक्ति हमारे क्षेत्र के भी थे।
बंगले के लाॅन में हम बैठ गए। थोड़ी ही देर में रामनाथ बाबू बाहर निकल कर आ गए।
हमने चरण छूकर उन्हें बधाई दी और उनके गले में पु ष्पों का हार को पहना कर क्षेत्र में आने की तारीख पूछी ताकि वहाँ उनका भव्य स्वागत किया जा सके।
उन्होंने समय के लिए सचिव से मिलने को कह दिया।
वह वापस जाने को मुड़े ही थे कि अचानक रुके और मुझसे कहा- “ रे गोपाला ! तू ही उस रैली में लोगों को लाया था ना, उसकी वीडियो शूटिंग करवाई थी ? ”
मैंने उनकी स्मृति में मूक सहमति प्रगट की।
उन्होंने कहना जारी रखा- “ बड़ी नाक कटाई रे। जब टी0 वी0 पर चलाया, तो देखा कि ये सब भुखमरे पार्टी में खाना खा कम रहे थे, रोटी चुरा कर झोले-थैलियों में अधिक भर रहे थे। भविष्य में ऐसे लोगों को मत लाया कर। क्या ऐसे रोटी की चोरी करना शोभा देता है ?”
उन्होंने ऐसा कहा तो मुझे लगा मानो किसी ने भरे बाजार में मेरा अपमान कर दिया हो।
वह जाने को आगे बढ़े ही थे कि मैंने कहा, “ नेता जी, देश की आजादी के 69 वर्षों में अधिकतर आपके दल की सरकार होने के बावजूद और स्वयं आपके इस क्षेत्र से चार बार चुनाव जीतने के बावजूद भी आपके क्षेत्र के लोग रोटी चुरा रहे हैं। क्या यह आपके लिए शर्म की बात नहीं है ? ”
कह कर मैं अपने साथियों सहित बिना उनके सचिव से मिले तेजी से उनके बंगले के बाहर निकल आया और खुली हवा में जोर-जोर से साँस लेने लगा। लगा जैसे मेरे पैरों की बेड़ियाँ कट गई हैं और अब मैं आजाद हो गया हूँ।
एकदम ताजा दम होकर मैं आगे बढ़ गया।
- विनायक फीचर्स से
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नहीं, तुम पति नहीं !
- किशनलाल शर्मा
दिसम्बर का महीना। सुबह के आठ बज चुके थे। लेकिन वातावरण में अभी भी कोहरा छाया था। दैनिक जरूरत का कुछ सामान अनुराग को बाजार से लाना था। वह बाजार के लिए निकला था। उसका घर स्टेशन के बाईं तरफ था जबकि बाजार स्टेशन के दाईं तरफ था। इसलिए बाजार जाने के लिए रेलवेलाइनें पार करनी पड़ती थी।
अनुराग रेलवेलाइनों को पार करके प्लेटफार्म के अन्तिम छोर से गुजरा तो उसकी नजर तीन लड़कों पर पड़ी जो एक युवती को घेर कर खड़े थे। वह युवती सर्दी के मौसम में भी सिर्फ साड़ी-ब्लाउज में थी।
अनुराग को देखते ही वह युवती मदद को चिल्लाई।
अनुराग समझ गया कि वे तीनों उस युवती को छेड़ रहे थे। अनुराग ने उन तीनों को ललकारा। अनुराग को अपनी तरफ आता देखकर वे तीनों भाग खड़े हुए।
लड़कों के भागने के बाद अनुराग ने उस युवती से पूछा, “ क्या नाम है तुम्हारा ? ”
“ नजमा। ”
“ कहाँ रहती हो ? ”
“ दिल्ली। ”
“ दिल्ली ! ” नजमा का उत्तर सुन कर अनुराग च ौंका, “ दिल्ली की रहने वाली हो फिर इस छोटे से स्टेशन पर कैसे ? ”
“ अभी जो ट्रेन यहाँ से गुजरी थी, उसी से मैं आ रही थी। ट्रेन यहाँ रुक गई तो मैं चाय की तलाश में उतरी थी। अचानक ट्रेन चली गई और मैं यहाँ रह गई। ”
“ तुम्हारा सामान ट्रेन में ही रह गया होगा ? ”
“ सामान मेरे पास कुछ था ही नहीं। ”
नजमा का जवाब सुन कर अनुराग समझ गया कि नजमा घर से भाग कर आई है। फिर भी उसने नजमा से पूछ लिया, “ तुम घर से भाग कर आई हो ? ”
नजमा अनुराग का प्रश्न सुन कर चुप रह गई।
अनुराग द्वारा अपना प्रश्न दुहराने पर वह नजरें झुका कर बोली, “ जी। ”
“ लेकिन तुम घर से भागी क्यों ? ”
“ घरवाला जब अपनी औरत की इज्जत बेच कर ऐश करना चाहे तो फिर ऐसी औरत के पास घर छोड़ने के अलावा और रास्ता ही क्या है ? ”
अनुराग के कुरेदने पर नजमा ने अपना अतीत साकार किया।
नजमा गरीब विधवा सलमा की बेटी थी। वह तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। सलमा ने मेहनत-मजदूरी करके अपनी औलादों को पाला-पोसा। नजमा के जवान होते ही सलमा उसके लिए वर की तलाश करने लगी। नजमा ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। लेकिन सलमा चाहती थी उसकी बेटी को उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरी वाला लड़का पति के रूप में मिले।
परन्तु ऐसे वर के लिए मोटा दहेज चाहिए। सलमा के पास इतना धन नहीं था। इसीलिए सलमा को नजमा की शादी सलीम से करनी पड़ी। सलीम ने शादी से पूर्व बताया था कि वह एक फैक्ट्री में नौकर है। परन्तु शादी के बाद नजमा को पता चला कि उसकी नौकरी स्थायी नहीं थी। वह कामचोर था जिसकी वजह से वह जहाँ भी जाता, हटा दिया जाता था। सलीम को शराब और जुए की आदत भी थी जिसके लिए उसे हर कीमत पर रोज पैसा चाहिए होता था। पैसा न होने पर अपनी इन्हीं आदतों के लिए उसने नजमा के विरोध के बावजूद शादी में मिले दहेज के सामान को धीरे-धीरे बेचना शुरु कर दिया था। दहेज का सारा सामान समाप्त होने के बाद वह नजमा पर मायके से पैसा लाने का दबाव बनाने लगा था। एक-दो बार वह अपनी माँ से पैसे ले भी आई किन्तु फिर उसने माँ से पैसे लाने से इन्कार कर दिया। शराबी, जुएबाज व व्यसनी आदमी के दोस्त भी ऐसे ही होते हैं। वे उसकी आदतों को बढ़ाने की ही कोशिश करते हैं। एक दिन सलीम ने अपने दोस्त रमेश से दारू के लिए दो सौ रुपए उधार माँगे।
वह बोला, “ मैं पहले ही तुम्हें बहुत उधार दे चुका हूँ। अब मैं तुम्हारी कोई चीज लिए बगैर तुम्हें उधार नहीं दूँगा।”
“ मेरे पास अब क्या है जो मैं तुम्हें दे सकूँ ? ”
“ नजमा तो है। ”
“ क्या ? ” रमेश की बात सुन कर सलीम चौंका, “ क्या मतलब है तुम्हारा ? ”
“ एक रात के लिए तुम नजमा को मेरे हवाले कर दो और दो सौ रुपए ले लो। ”
रमेश की बात सुन कर सलीम सोच में पड़ गया।
“ क्या सोचने लगे ? ”
“ नजमा इस बात पर तैयार न होगी। ”
“ यह तुम मुझ पर छोड़ दो। राजी से तैयार नहीं होगी तो जबरदस्ती से मानेगी। ”
सलीम लालच में आ गया। दारू की तलब ने पत्नी का सौदा करा दिया। सलीम रमेश को अपने घर ले आया।
सलीम और रमेश ने पहले साथ बैठ कर दारू पी। उनको पीता देख कर नजमा अपने कमरे में जाकर सो गई। दारू पीने के बाद रमेश नजमा के कमरे में चला गया।
नजमा खाट पर सो रही थी। रमेश ने उसके सीने पर हाथ रखा तो उसकी नींद टूट गई।
उसने रमेश को अपने पास देखा तो चौंक पड़ी, “ तुम यहाँ ? ”
“ हाँ, मैं। ”
“ सलीम कहाँ है ? ”
“ बाहर। उसी ने तो मुझे यहाँ भेजा है। ” वह ढिठाई से बोला।
“ तुम यहाँ से जाओ। ”
“आज की रात नहीं जाऊँगा। ”
“ क्यों ? ”
“ आज की रात तुम मेरी हो। ”
“ क्या बकते हो ? ”
“ तुम्हारे पति ने दो सौ रुपए लेकर आज की रात के लिए तुम्हें मुझको बेच दिया है। ”
“ क्या ? ” नजमा को सहसा विश्वास नहीं हुआ, “ तुम झूठ बोल रहे हो। ”
“ मैं सच कह रहा हूँ। आज की रात तुम मेरी हो। ” कह कर उसने नजमा को पकड़ना चाहा।
नजमा उठकर बाहर की ओर भागी किन्तु दरवाजा बाहर से बन्द था। नजमा चीखी-चिल्लाई, रोई-गिड़गिड़ायी किन्तु लाख प्रयत्न करने पर भी वह अपनी इज्जत नहीं बचा सकी।
सुबह रमेश चला गया।
नजमा सलीम पर बरस पड़ी, “ शर्म नहीं आती रुपयों की खातिर अपनी औरत को बेचते ? ”
“ मैके से तूने रुपए लाने से मना कर दिया। मुझे किसी भी तरह से किसी भी कीमत पर रुपया चाहिए। चाहे इसी तरह से ही सही। आज तो मुझे एक नया रास्ता मिला है। ”
अब सलीम नजमा का दलाल बन गया। सलीम में पत्नी के प्रति अपने कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का बोध समाप्त हो गया था। उसे इस तरह रुपया कमाने का चस्का लग चुका था।
नजमा इस तरह शरीर बेच कर सलीम के साथ नहीं रहना चाहती थी। परन्तु उसका विरोध काम नहीं आ रहा था। अतः उसने सलीम का घर छोड़ने का फैसला कर लिया था और एक दिन जब सलीम घर पर नहीं था तो उसने घर छोड़ दिया और ट्रेन पकड़ ली सलीम की पकड़ से दूर जाने के लिए।
नजमा अपनी कहानी सुना कर चुप हो गई।
अनुराग बोला, “ आओ, मेरे साथ। ”
अनुराग नजमा को अपने घर लाकर बोला, “ यह मेरा घर है। यहाँ तुम्हारी इज्जत पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। तुम जब तक चाहो, यहाँ रह सकती हो। ”
नजमा अनुराग के घर रहने लगी।
अनुराग वकील था। वह अकेला था। उसका घर अस्त-व्यस्त रहता था। नजमा ने उसका घर पूरी तरह से सम्हाल दिया।
उसके हाथ का बना खाना खाते हुए अनुराग यह कहना नहीं भूलता, “ नजमा तुम खाना बहुत अच्छा बनाती हो।”
इस तरह काफी दिन गुजर गए।
एक दिन अनुराग को बुखार आ गया। बुखार टायफायड था। नजमा ने अनुराग की सेवा करने में रात-दिन एक कर दिया। स्वस्थ होने पर अनुराग नजमा से बोला, “ मैं तुम्हारा शुक्रिया अदा कैसे करुँ ? ”
“ उसकी जरूरत नहीं। तुमने मुझे आश्रय दिया और मेरे लिए इतना कुछ करते हो, तो क्या मेरा इतना करना फर्ज नहीं था ? ”
एक दिन नजमा बोली, “ इस तरह कब तक चलेगा ? तुम कहीं मेरी नौकरी लगवा दो। ”
“ क्या मैं जो कमाता हूँ , उससे पूरा नहीं पड़ता ? ”
“ मैं अब ज्यादा दिन तुम पर बोझ बन कर नहीं रहना चाहती। ”
“ नजमा, मैं तुम्हें अपने ऊपर बोझ नहीं समझता। ”
दिन मजे से बीत रहे थे। ले..कि..न, दिन सदा एक से कब रहते हैं ?
नजमा सलीम के लिए सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी थी। उसके भाग जाने से उसकी कमाई का जरिया बन्द हो गया था। उसने उसकी तलाश में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। नजमा का पता लगते ही वह अनुराग के घर आ धमका।
“ नजमा मेरी बीवी है। आपने मेरी बीवी को अपने घर में कैसे रख रखा है ? ”
“ आप नजमा के पति नहीं हैं। ” अनुराग शान्त स्वर में प्रतिवाद किया।
“ आप झूठ बोल रहे हैं। नजमा की शादी मुझसे ही हुई थी। देखिए मेरी शादी का अल्बम। ”
“ आप नजमा के पति नहीं हैं। ” अनुराग ने पुनः शान्त स्वर में प्रतिवाद किया।
“ आपने मेरी बीवी को अपने घर में रख रखा है। आप इसे मेरे साथ भेज दीजिए। ”
“ जरूर, यदि नजमा चाहे तो आप इसे ले जा सकते हैं किन्तु समझ लीजिए आप नजमा के पति नहीं हैं। ”
“ नजमा, मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें लेने आया हूँ। ”
“ मुझे तुम्हारे साथ न जाना है और न ही तुम्हारे घर रहना है। ” नजमा ने दृढ़ता से कहा।
“ अगर तुम मेरे साथ सीधे से नहीं गईं तो मैं जबरदस्ती तुम्हें ले जाऊँगा। ”
“ तुम कौन होते हो जबरदस्ती करने वाले ? ”
“ तुम्हारा पति। ”
“ नहीं, तुम पति नहीं। पति अपनी पत्नी के शरीर और शील को बेचता नहीं बल्कि उसकी रक्षा करता है। तुम मेरे पति बन कर नहीं, दलाल बन कर रहना चाहते हो। इसीलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती। ”
“ अगर तुम सीधे से नहीं चलीं तो मैं कानून की मदद से तुम्हें ले जाऊँगा। तब ये बाबूजी भी तुम्हें रख नहीं पाएंगे जिनके दम पर तुम इतना अकड़ रही हो। ”
“ कानून ? कानून जानता भी है तू ? ” अब अनुराग उखड़ गया, “ तू नजमा का पति नहीं, दलाल है। लेकिन नजमा धन्धा नहीं करना चाहती। खबरदार, जो तूने नजमा को हाथ भी लगाया, कानून से ही तेरी खाल खिंचवा दूँगा। तेरी करतूत ऐसी है कि अगर जिन्दगी भर को मैंने तुझे जेल न भिजवा दिया तो मेरा नाम अनुराग नहीं। ”
अनुराग के तेवर देख कर सलीम डर कर भाग गया और फिर लौट कर नहीं आया।
वक्त के साथ नजमा और अनुराग के बीच नजदीकियाँ बढ़ती गईं।
नजमा अनुराग के साथ बिना विवाह के रह रही थी। अपने रिश्ते का कोई परिणाम आने से पूर्व ही नजमा विवाह-बन्धन में अनुराग को बाँध लेना चाहती थी।
नजमा की इच्छा जान कर अनुराग ने नजमा से कोर्ट-मैरिज कर ली।
- प्लाॅट -103, रामस्वरूप नगर, आगरा-10
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(उपन्यास अंश)
कृष्ण: अन्तिम दिनों में
- डाॅ0 अशोक शर्मा
अब तक आपने पढ़ा-
गीता-ज्ञान के प्रणेता, योगिराज, सुधीर, कर्मवीर, महानायक श्रीकृष्ण मानवीय संवेदनाओं से भी ऊब-चूब थे। अपने अन्तिम दिनों में उनकी ये संवेदनाएँ अधिक वाचाल हो गई थीं। लब्ध-प्रतिष्ठ विद्वान् लेखक उपन्यासकार डाॅ0 अशोक शर्मा ने अपने उपन्यास ‘कृष्ण: अन्तिम दिनों में’ यही दर्शाया है। विगत अंक से हम इस उपन्यास के अंश-दर-अंश को धारावाहिक रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इस क्रम में अब तक आप पढ़ चुके हैं -
द्वारिका के समुद्र-तट पर कृष्ण शान्त और विचारमग्न अकेले बैठे थे। इसी अकेलेपन में उभर रहे थे बचपन में कंस-वध के पहले के सुहाने दिनों के चित्र। कृष्ण को याद आया था रुक्मिणी-प्रसंग। विदर्भ-राजकुमारी रुक्मिणी का पत्र मिलने पर वे चले गए थे विदर्भ गरुड़-ध्वज वाले अपने रथ पर। रुक्मिणी बढ़ आईं थीं उनकी ओर। बाद में एक प्रेमिल भार्या की तरह सौभाग्य की सुखद अनुभुति भर दी थी उन्होंने कृष्ण के जीवन मे। समन्तपंचक के महाआयोजन में राधा से हुई श्री कृष्ण की अन्तिम भेंट। अन्तिम किश्त में अब आगे पढ़े। - संपा0
13- प्रयाण की ओर
जरा नामक बहेलिया रोज जंगल में जाकर पशु-पक्षियों का शिकार करता और उनके माँस को बेच कर अपने परिवार का जीवनयापन करता था। किन्तु पिछले दो दिनो से उसका मन बहुत अशान्त था। वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा उसे क्यों लग रहा था ? यद्यपि इसका एक कारण तो स्पष्ट था। पिछले कुछ दिनों से उसकी पत्नी उससे यह धन्धा छोड़ कर कुछ और करने के लिए कह रही थी। निर्दोष पशु-पक्षियों को मार कर अपना पेट भरना उसे बहुत बुरा लगने लगा था। वह नहीं समझ पा रहा था कि पिछले कुछ दिनों से उसकी पत्नी को क्या हो गया था जो वह उससे उसका खानदानी पेशा छोड़ने के लिए कह रही थी। अब तो कभी-कभी उसका भी दिल करने लगा था कि यह पेशा अच्छा नहीं है। किन्तु उसे कोई दूसरा कार्य आता भी तो नहीं था।
आज जब वह पक्षियों को फँसाने का जाल और तीर-कमान लेकर घर से निकल रहा था तो पत्नी ने पुनः टोका, “ तुम फिर निर्दोष पशु-पक्षियों को मारने जा रहे हो। मुझे अपनी रोटियाँ भी उनके रक्त से सनी लगती हैं। तुम कोई और कार्य क्यों नहीं शुरु कर देते ?”
“ तुम कहती तो ठीक हो। जबसे तुमने कहना शुरु किया है मुझे भी यह कार्य बुरा महसूस होने लगा है। निर्दोष उछलते-कूदते पशु-पक्षियों को मारना सचमुच क्रूरतापूर्ण कार्य है किन्तु हम अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए आखिर क्या करें ? मुझे कोई और कार्य आता भी तो नहीं है। ”
“ तुम्हारे मन में यह बात उठी है तो हम अवश्य ही कुछ न कुछ और कार्य ढूँढ़ ही लेंगे। तुम जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाया करो। मैं उन्हें बाजार में बेच आऊँगी। मुझे वस्त्र ठीक करने आते हैं। पड़ोसियों के वस्त्र ठीक करके मैं भी घर की कुछ मदद कर सकती हूँ। नहीं, तो हम कहीं, मेहनत-मजदूरी भी कर सकते हैं। ”
“ तुम ठीक कह रही हो। हम इस कार्य के अलावा भी जीवनयापन के लिए कुछ न कुछ रास्ता निकाल ही सकते हैं। ”
“ फिर रख दो न यह जाल और तीर-कमान। हम आज से ही शुरु करते हैं। ”
“ मैं यह जाल रख देता हूँ। इससे बहुत से पक्षी फँसते हैं और अधिक जानें जाती हैं। ऐसा करते हैं आज मैं केवल तीर-कमान लेकर जाता हूँ। फिर किसी एक ही जानवर का शिकार करूँगा और उसी से अपना काम चलाऊँगा।”
“ नहीं, यह तीर-कमान भी रख दो। आज ही से चलो, कहीं मजदूरी ढूँढ़ते हैं।”
“ नहीं, आज और जाने दो मुझे। एकदम से अचानक मजदूरी भी हो सकता है, न मिले। ”
“ तो चलो, हम अपने राजा द्वारिकाधीश के यहाँ चलते हैं, वे हमारी कुछ न कुछ सहायता अवश्य करेंगे। हो सकता है, वे हमें कुछ कार्य ही दे दें। ”
“ तुम ठीक कहती हो। हम आवश्यकता पड़ने पर वहाँ भी अवश्य चलेंगे किन्तु आज अन्तिम बार मुझे जाने दो। मैंने सोचा है मैं आज अवश्य ही किसी हिरन का शिकार करूँगा। उसका माँस महँगा बिकता है और खाल भी। हम उससे अपने आज के भोजन का प्रबन्ध भी कर लेंगे और एक अच्छी सी कुल्हाड़ी भी खरीद लेंगे। कल से हमारी दिनचर्या बदल जाएगी। जैसा तुम चाहती हो, मैं जंगल से लकड़ियाँ काट कर बाजार में बेच भी आया करूँगा और तुम्हें मिल जाएँ तो पास-पड़ोस के लोगों के वस्त्र ठीक करने का कार्य शुरु कर देना।”
“ किन्तु मेरा मन कह रहा है कि तुम आज भी शिकार के लिए मत जाओ। पता नहीं किस निर्दोष पर तुम्हारा तीर चल जाए। हम बाजार की ओर चलें तो कुछ न कुछ काम अवश्य ढूँढ ही लेंगे।”
“ नहीं, केवल आज मुझे जाने दो, कल से तुम जैसा चाहती हो वैसा ही करूँगा। आज पता नहीं, क्या चीज मुझे जंगल की ओर खींच रही है। ऐसा लगता है जैसे कोई अधूरा कार्य पड़ा है जो मुझे पूरा करना है या जैसे मुझे किसी से कोई पुराना हिसाब चुकाना है। बस, केवल आज मुझे मत रोको। ऐसा लगता है जैसे कोई जबरन ले जा रहा है। मैं रुक नहीं पाऊँगा। ”
“ ठीक है, मैं कोई जबरदस्ती भी तो नहीं कर सकती। किन्तु मुझे तुम्हारा आज का जाना बहुत अमंगलकारी लग रहा है। ”
“ मैं बहेलिया हूँ। मेरे लिए क्या मंगल, क्या अमंगल। तुम चिन्ता मत करो। मैं शीघ्र ही एक बड़े हिरन को मार कर लाता हूँ। ”
“ भगवान् विष्णु हमारी रक्षा करें। ” कहते हुए बहेलिये की पत्नी खड़े-खड़े उसको जाते हुए देखती रही।
भोर ने बहुत हल्के से द्वार खटखटाया और कृष्ण उठ गए, मानो इसी प्रतीक्षा में थे। पास में लेटी रुक्मिणी के मुख पर दृष्टि डाली। बहुत ही शान्त भाव से प्रगाढ़ निद्रा में लीन रुक्मिणी के मुखमण्डल की आभा उगते हुए सूर्य की किरणों से होड़ कर रही थीं। कक्ष में खिड़की से आती हुई प्रकाश की किरणें उनके मुख पर पड़ कर चमक बिखेरने लगी थीं।
कृष्ण धीरे से उठे, उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि रुक्मिणी की नींद में कोई व्यवधान न पड़े। शयन कक्ष से बाहर आए और स्नानादि से निवृत्त होने चले गए।
कृष्ण जब तक स्नानादि से निवृत्त होकर आए, रुक्मिणी उठ चुकी थीं। कृष्ण को उठा हुआ पाकर उन्हें आश्चर्य हुआ, उन्होंने पूछा, “ आज बहुत जल्दी उठ गए ! कहीं जाना है क्या ? ”
कृष्ण अचानक हुए इस प्रश्न का उत्तर देने में अचकचा गए। जाने का निश्चय तो वे कर चुके थे किन्तु यदि वे ‘हाँ’ कहते तो अगला प्रश्न होता ‘कहाँ ?’ और फिर वे कैसे कहते कि आज उन्हें इस संसार से विदा लेनी है और यदि ‘ना’ कहते यह मिथ्या-भाषण होता। वे चुप रह गए।
रुक्मिणी का मन शान्त नहीं हुआ था। कुछ दिनों से कृष्ण के चेहरे पर रहने वाला गाम्भीर्य उन्हें पहले ही परेशान कर रहा था। उन्होंने फिर पूछा, “ कहीं जल्दी जाना है क्या ? ”
अब कृष्ण को उत्तर देना पड़ा किन्तु रुक्मिणी के प्रश्न में ही उन्हें उत्तर देने का रास्ता भी मिल गया। बोले, “ हाँ, जाना तो है। किन्तु जल्दी तो इस कारण उठा हूँ कि आज तुम्हारे साथ मैं भी सुबह-सुबह उपवन में घूमने चलूँगा। हम साथ-साथ मन्दिर जाएंगे। वहाँ माँ और पिताश्री से भी भेंट हो जाएगी। फिर मैं तुम्हारे साथ-साथ गोशाला भी चलूँगा। तुम्हारी कजरी गाय मुझे भी पहचानने लगी है। मैं उसको और उसके बछड़े को भी देखूँगा, अच्छा लगेगा। ”
“ मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा। बस, कुछ पल प्रतीक्षा करें। मैं तैयार होकर अभी आई। आप साथ में होंगे इससे अच्छा और क्या हो सकता है। ”
कहते हुए रुक्मिणी वहाँ से चलने लगीं तो कृष्ण ने कहा, “ ठीक है, मैं महल के बाहर अशोक के वृक्षों के नीचे तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ। ”
“ ठीक है। ” कह कर रुक्मिणी चली गई।
कृष्ण धीरे-धीरे बाहर आए और अशोक के वृक्षों के नीचे चहलकदमी करते हुए उनकी प्रतीक्षा करने लगे।
सुबह हो रही थी। पैरों के नीचे की घास ओस की बूँदों से गीली थी। कृष्ण के पैर भीग गए पर बहुत अच्छा लग रहा था। शीतल हवा उनके वस्त्रों को उड़ा रही थी और चूँकि आस-पास बहुत अधिक गुलाब खिले हुए थे इसीलिए यह हवा उनकी महक से भरी हुई थी। शरीर से उस हवा का स्पर्श ताजगी का संचार सा कर रहा था। चलते-चलते कृष्ण रजनीगंधा के वृक्ष के पास आ गए। भूमि पर बहुत से सफेद फूल बिखरे हुए थे। कृष्ण उन फूलों को बचा कर चलने लगे। फिर ध्यान आया कि रुक्मिणी आएंगी तो अशोक के वृक्षों के पास उनकी प्रतीक्षा करेंगी। अतः वे उन वृक्षों की ओर लौट चले।
आसमान की ओर दृष्टि डाली। सूर्य तो नहीं दिख रहा था किन्तु उसके उगने की सूचना देता हुआ प्रकाश की किरणों का पुंज दिखाई देने लगा था। अशोक के वृक्षों के निकट पहुँचे तो सहसा स्मरण हो आया कि पूर्वजन्म में इन्हीं वृक्षों की वाटिका में सीता के रूप में रुक्मिणी ने कितना अधिक मानसिक सन्ताप झेलते हुए उनकी प्रतीक्षा की थी और फिर सहसा राधा का स्मरण हो आया। राधा, उनका तो सारा जीवन ही प्रतीक्षा करते बीत गया। आज उनका इस देह को छोड़ने का समय भी आ गया। अब उस पार ही भेंट होगी। तभी रुक्मिणी आती हुई दिखाई दीं। उन्होंने लाल साड़ी धारण कर रखी थी और उनके हाथ में पूजन-सामग्री से सजी पूजा की थाली थी। जब वे पास आ गईं तो कृष्ण उनके साथ-साथ मन्दिर की ओर चल पड़े। चलते-चलते दोनों ने कुछ फूल चुनें और पूजा की थाली में सजा लिए।
मन्दिर के द्वार पर दोनों रुके। हाथ उठा कर ऊपर टँगे घंटे को बजाया, फिर कृष्ण अन्दर बढ़ने लगे तो रुक्मिणी ने उनके उत्तरीय (कन्धे पर डाला जाने वाले वस्त्र) का कोना पकड़ा और पूजा की थाली कृष्ण को पकड़ा दी। कृष्ण ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा तो पाया कि उत्तरीय के उस कोने से वे अपनी साड़ी का पल्लू बाँध रही थीं। हरे-भरे वृक्षों से घिरा मन्दिर, लाल और पीले वस्त्रों का वह जोड़, आकाश से नीले कृष्ण, चन्द्रमा की किरणों सी धवल रुक्मिणी, सामने शिवलिंग और उसके पीछे माँ दुर्गा की भव्य मूर्ति, इस परम मनोहर दृश्य को देखने के लिए सूर्य देव जो पेड़ों के पीछे से धीरे-धीरे निकल रहे थे। अचानक उठ कर ऊपर आ गए। रुक्मिणी को इस प्रकार गाँठ बाँधते देख कर कृष्ण हँसे। पूछा, “ यह क्या ? ”
रुक्मिणी ने सलज्ज मुस्कान से कहा, “ मेरा मन। ”
फिर कृष्ण ने कुछ नहीं कहा। रुक्मिणी ने गाँठ बाँध कर उनके हाथ से पूजा की थाली ले ली और इस तरह उनके आगे हो गईं मानों उन्हें भरोसा हो गया कि अब कृष्ण कहीं नहीं जा सकते। पूजा करके दोनों बाहर निकले तो माली की बच्ची बाहर खड़ी थी। रुक्मिणी ने उसे बुलाया और गाँठ खोलने का संकेत किया। उसने गाँठ खोली तो कृष्ण ने उसे प्यार किया और उसकी मुट्ठी में कुछ मुद्राएँ रख दीं। तब तक देवकी और वसुदेव भी वहाँ आ गए। रुक्मिणी और कृष्ण ने उनके चरण-स्पर्श कर उनको प्रणाम किया। वे पूजन करने के लिए मन्दिर के अन्दर गए तो रुक्मिणी और कृष्ण वहीं खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगे। वे बाहर आए तो सभी टहलते हुए गोशाला की ओर बढ़ने लगे। गोशाला पहुँच कर रुक्मिणी और कृष्ण ठिठके तो देवकी ने कहा, “ रुक्मिणी, तुम लोग यहाँ रुकना चाहो तो रुको, हम चलेंगे, और हाँ आज सबके कलेवे का इन्तजाम मैं कर रही हूँ। तुम चिन्ता मत करना, आराम से आना। ”
“ अच्छा माँ। ” रुक्मिणी ने कहा।
कृष्ण और रुक्मिणी वहीं रुके रह गए।
रुक्मिणी कजरी गाय के पास पहुँचीं। उसे और उसके बछड़े को सहलाया तो कजरी मुँह उठा कर उनसे लाड़ दिखाने लगी। तब तक एक अनुचर दूध दुहने का पात्र ले आया तो रुक्मिणी वह पात्र घुटनों के बीच दबा कर बैठ गईं और दूध दुहने लगीं। कृष्ण खड़े हुए उन्हें निहार रहे थे और कजरी का माथा भी सहला रहे थे। रुक्मिणी ने दृष्टि उठाई तो कृष्ण की आँखें उन्हें ही देख रही थीं। रुक्मिणी सकुचा गईं। बोलीं, “ क्या देख रहे हो ? ”
कृष्ण शरारत से हँसते हुए बोले, “ तुम्हें। ”
“ क्यों ? बहुत अच्छी लग रही हूँ क्या ? ”
“ तुम हमेशा बहुत अच्छी ही तो लगती हो। ”
रुक्मिणी हल्के से हँसीं, बोलीं, “ अच्छा, चलो, आज कम से कम हँस तो रहे हो। ”
इस बीच ध्यान बँटने से दूध की धार बर्तन में जाने के स्थान पर उनके कपड़ों पर चली गई और कुछ दूध जमीन पर भी गिर पड़ा। रुक्मिणी ने दूध दुहना बन्द कर दिया और उठ कर कृष्ण के पास आ गईं। उलाहने भरे स्वर में बोलीं, “ आपके कारण दूध भी गिर गया और मेरे वस्त्र भी खराब हो गए। ”
कृष्ण हँ पड़े। बोले, “ अरे ! अच्छा चलो, माँ और पिताश्री कलेवे के लिए प्रतीक्षा कर रहे होंगे। ”
रुक्मिणी ने नयन तिरछे करके उन्हें देखा, अधरों को भी थोड़ा सा तिरछा किया बोलीं, “ चलिए। ”
किन्तु थोड़ा रुक कर उन्होंने फिर कहा, “ क्या हम यहाँ थोड़ी देर और नहीं रुक सकते ? आपका हँसता हुआ चेहरा मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। मैं इसे कुछ देर और निहारना चाहती हूँ। ”
कृष्ण कुछ शरमा से गए। फिर बोले, “ मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा है। आओ हम मन्दिर की ओर चलें। वहाँ उसके सामने घास पर कुछ देर बैठेंगे। ”
यह कह कर कृष्ण ने रुक्मिणी का हाथ पकड़ा और मन्दिर की ओर चल पड़े। वहाँ पर बैठने के बाद वे बोले, “ यहाँ पर कितना अच्छा लग रहा है ! ”
“ हाँ। ” रुक्मिणी ने उत्तर दिया।
कृष्ण ने एक दृष्टि मन्दिर की ओर डाली फिर आस-पास के वृक्षों को तथा स्वच्छ और नीले दूर-दूर तक पसरे हुए आसमान की ओर देखा और एक गहरी साँस भीतर खींची। ऐसा लगा जैसे उनके अन्दर कुछ चल रहा है। तभी उन्हें अपने हाथ पर एक मखमली स्पर्श सा महसूस हुआ। उन्होंने देखा रुक्मिणी ने उनके हाथ पर अपना हाथ रखा है। कृष्ण ने रुक्मिणी की ओर देखा तो पाया कि वे तिरछी दृष्टि से उन्हीं की ओर निहार रही हैं। कृष्ण ने उस दृष्टि को अपने चेहरे पर महसूस किया और पुकारा, “ रुक्मिणी ! ”
“ हूँ ! ” कह कर रुक्मिणी ने उनकी ओर देखा।
नेत्र मिले तो रुक्मिणी की आँखों की चमक उन्हें भीतर तक हिला गई। वहाँ प्रेम तो था ही, कुछ पढ़ने की कोशिश और शायद बहुत सी शिकायतें भी थीं। कृष्ण ने उनकी आँखों से अपनी आँखें हटा लीं। धीरे से रुक्मिणी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और बोले, “ रुक्मिणी तुम बहुत अच्छा गाती हो। क्या इस समय मेरे लिए कुछ गाओगी ? ”
“ हाँ, क्यों नहीं ! ” रुक्मिणी ने कहा और धीमे स्वरों से गाना शुरु किया। थोड़ी देर बाद उनकी आवाज कुछ तेज हुई और धीरे-धीरे फिर धीमी हो गई। ऐसा लगा जैसे वे गा तो रही हैं, साथ ही कुछ कह भी रही हैं। उन पंक्तियों का अर्थ था- “ तुम मेरे हृदय में अपना एक पैर तिरछा करके अड़े हुए हो। कभी भी बाहर नहीं जा सकोगे और मुझसे दूर जाने का तुम्हारा कोई भी प्रयत्न मुझे बिना प्राणों के शरीर में बदल देगा। ”
बहुत अधिक दर्द छलक गया था। कृष्ण ने पंक्तियों का अर्थ समझा और जीवन में पहली बार अपने को कुछ भी करने में असमर्थ पाया। जब गीत समाप्त हुआ, शान्ति छा गई और हवा में खालीपन तैर गया। दोनों कुछ देर तक उसी प्रकार बैठे रह गए। अचानक एक पक्षी की तेज स्वर में बोला तो दोनों चौंक से गए, उठे और चुपचाप महल की ओर चल पड़े।
रुक्मिणी और कृष्ण महल के अन्दर पहुँचे। देवकी और वसुदेव उनकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे। कलेवा तैयार था। दूध की कुछ मिठाईंयाँ जो देवकी ने स्वयं तैयार की थीं, कुछ फल और मक्खन।
रुक्मिणी ने सबके लिए इन्हें पात्रों में सजा दिया। देवकी रुक्मिणी से कहने लगीं , “ बेटी ! तुम अपने लिए भी लो, प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। हम सब साथ ही लेंगे। ”
रुक्मिणी ‘जी, माँ जी’ कह कर अपने लिए भी एक पात्र में कलेवा निकाल कर ओट करके बैठ गई।
कृष्ण आज कुछ अधिक ही मुखर थे। खाने की एक-एक वस्तु की प्रशंसा कर रहे थे। देवकी उनके इस भाव से पुलकित थीं। कलेवा समाप्त हुआ तो रुक्मिणी के संकेत से अनुचर आकर पात्र ले गया।
कलेवा समाप्त होने के बाद भी किसी को उठने का मन नहीं हुआ। बातें शुरु हुईं तो गोकुल और वृन्दावन की कृष्ण की लीलाओं, कंस के वध और महाभारत से होते हुए द्वारिका पर आ गईं। द्वारिका की विशेषताओं की चर्चा होने लगी तो कृष्ण ने महल के भीतर और द्वारिका नगरी पर रुक्मिणी के कुशल प्रबन्धन की बहुत प्रशंसा की।
कृष्ण स्वयं योगिराज थे। उन्हें किसी भी तरह की आसक्ति छू भी नहीं सकती थी किन्तु वे चाहते थे कि उनके प्रयाण के पश्चात् भी द्वा रिकाऔर उनके आश्रित जन शान्ति और सुखपूर्वक रहें। रुक्मिणी ने द्वारिका के प्रशासनिक दायित्वों को सम्भालना भी शुरु कर दिया था। इससे कृष्ण बहुत सन्तुष्ट थे। द्वारिका और उनके निवासियों को अर्जुन का संरक्षण प्राप्त था। कृष्ण को कोई मोह नहीं था, अपना कार्य पूरा करने का सन्तोष था फिर भी मन हलचलों से भरा था। यादें बराबर आ-जा रही थीं। कितने ही दृश्य मानस-पटल पर कौंध रहे थे। उन्हें रह-रह कर यह भी लग रहा था कि उनके जाने के बाद रुक्मिणी को बहुत अधिक व्यथा होगी।
थोड़ी देर बाद देवकी और वसुदेव उठे और अपने कक्ष की ओर चले गए। रुक्मिणी और कृष्ण अकेले रह गए तो रुक्मिणी ने पूछा, “ आप कुछ सोच रहे हैं क्या ? ”
“ कुछ नहीं, बस यूँ ही। ”
“ यूँ ही क्या ? ”
“ कुछ नहीं, रुक्मिणी ! कुछ भी नहीं। ”
“ चलिए, आप नहीं बताते तो मैं ही बता देती हूँ कि आप क्या सोच रहे हैं। ”
“ बताओ। ” कह कर कृष्ण हल्के से हँसे।
“ आपको लग रहा है कि इस जन्म के सब कार्य पूरे हुए और इसीलिए आज आपने इस मानव-देह को छोड़ने का मन बना लिया है। ”
कृष्ण रुक्मिणी के शब्द सुन कर आश्चर्य से भर उठे। बोले, “ क्या कह रही हो रुक्मिणी ? ”
“ क्यों, मेरा अनुमान गलत है क्या ? और यदि मैं गलत हूँ तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए अन्य कोई हो भी नहीं सकता। मैं सही होना भी नहीं चाहतीे। ”
“ नहीं, तुम गलत नहीं हो रुक्मिणी और मैं झूठ बोल भी तो नहीं सकता, तुमने आज सुबह गाँठ बाँध कर पूजा इसीलिए की थी क्या ? ”
“ हाँ, आपके साथ एक बार और गाँठ बाँध कर चलने का मोह मैं छोड़ नहीं सकी। ”
“ पर तुमने यह जाना कैसे ? ”
“ पिछले कुछ दिनों से आपका व्यवहार बहुत बदला हुआ सा है। आप मेरा बहुत अधिक ख्याल रखने लगे हैं। राज्य के कार्यों से समय निकाल कर आप माँ और पिताश्री के साथ अधिक समय बिताने लगे हैं और फिर जिस दिन आपने मुझसे द्वारिका के प्रशासन को सँभालने की बात कही उस दिन मैं चौंकी अवश्य थी। किन्तु आपका मन्तव्य बाद में मेरी समझ में आ गया था। मैं समझ गई थी कि आपने जाने का मन बना लिया है। ”
“ किन्तु रुक्मिणी फिर भी तुम इतना सामान्य व्यवहार करती रहीं, मुझे किंचित् भी आभास नहीं होने दिया कि तुम सब कुछ जान चुकी हो। ”
“ हाँ, क्योंकि यदि मेरा व्यवहार बदलता तो अन्य लोग भी तरह-तरह के अनुमान लगाने लगते। और इससे आपकी परेशानियाँ और चिन्ताएँ बढ़तीं। ”
कृष्ण ने आगे बढ़ कर रुक्मिणी का हाथ थाम लिया। बोले, “ रुक्मिणी तुमने मेरा बहुत साथ दिया है, बहुत ध्यान रखा है। मेरे जीवन के संघर्षों में तुम सदैव मेरे साथ खड़ी रही हो। ”
“ प्रभु, आपने तो मेरा जीवन ही सँवार दिया। यदि आप नहीं आते तो मैं उस दुष्ट शिशुपाल से बच नहीं पाती। ”
“ मेरे होते ऐसा सम्भव नहीं था। ” फिर कृष्ण कुछ रुक कर बोले, “ रुक्मिणी तुम सचमुच बहुत अच्छी हो। ”
“ अच्छी या बुरी जैसी भी हूँ, आपकी हूँ। ”
“ रुक्मिणी ! ”
“ भगवन् ! ”
“ हमारे अलग होने का समय आ गया है। शायद हमारा इतना ही साथ लिखा था। मुझे विदा दो। ”
“ विदा देने का प्रश्न ही नहीं है, केवल हमारे शरीर अलग हो रहे हैं। लक्ष्मी को नारायण से कौन अलग कर सकता है। ” कहते हुए रुक्मिणी की आँखों से आँसू झरने लगे।
“ रुक्मिणी, मुझे चलना है। ”
“ ठीक है जाएँ, किन्तु आपके पीछे मैं यहाँ अधिक नहीं रुक पाऊँगी। मैं भी आपके पीछे-पीछे ही आ रही हूँ। ”
“ कहीं तुम सती होने की बात तो नहीं कर रही हो ? ”
रुक्मिणी इस बात पर बुरी तरह रो पड़ी। उन्होंने कृष्ण के कन्धे से सिर टिका लिया। कृष्ण ने उनका सिर सहलाया फिर उनका चेहरा देखने की कोशिश में उनका सिर अपने कन्धे से उठाने का प्रयत्न किया। किन्तु रुक्मिणी ने उनके कन्धे से सिर नहीं हटाया। बोली, “ आज के बाद मुझे सिर टिकाने के लिए यह कन्धा कहाँ मिलेगा ? ”
कृष्ण बोले, “ अपने को सँभालो रुक्मिणी ! हमें सचमुच कोई अलग नहीं कर सकता; शरीरों की मृत्यु भी नहीं। किन्तु फिर भी सती होने की बात सोचना भी अनुचित है। ” कुछ रुक कर कृष्ण पुनः बोले, “ आत्महत्या पाप है रुक्मिणी। ”
“ मैं पाप-पुण्य कुछ नहीं जानती, केवल आपको जानती हूँ। ” कह कर रोती हुई रुक्मिणी कृष्ण से लिपट गई।
कृष्ण को इस बात का कोई उत्तर नहीं सूझा।
राधा जा चुकी थीं, वे जा रहे थे। रुक्मिणी इसके बाद रुक नहीं पाएंगी यह वे जानते थे, किन्तु उनके सती होने की कल्पना से वे बहुत विचलित थे। वे उन्हें समझाना चाहते थे कि यह घोर अनुचित है, किन्तु यह भी जानते थे कि रुक्मिणी ऐसा कुछ भी समझने के लिए तैयार नहीं होगी। फिर उन्होंने मृत्यु के बाद होने वाली घटनाओं को विधि के विधान पर ही छोड़ना उचित समझा। वे कुछ देर वैसे ही रुक्मिणी को अपनी बाँहों में लिए खड़े रहे, फिर मन कड़ा किया। धीरे से रुक्मिणी को अपने से अलग किया, उनके मुख को अपने हाथों में थामा और उनकी आँखों में देख कर बोले, “ रुक्मिणी, तुम जीवन भर मेरी शक्ति भी रही हो और कमजोरी भी। मुझे विदा दो। ”
“ नाथ ! ” कहते हुए रुक्मिणी झुकीं और उनके पैरों पर सिर रख कर सिसकने लगीं।
कृष्ण ने उन्हें उठाया और जब वे उठ कर खड़ी हुईं तो शून्य की ओर देखते हुए महल से बाहर निकल गए। रुक्मिणी कुछ देर तक उनके पीछे-पीछे चलीं फिर खड़ी हो गईं और जब तक वे दिखाई देते रहे, देखती रहीं।
कृष्ण कुछ दूर तक उनकी सिसकियों और साँसों की आवाजें सुनते रहे, एक बार मुड़ कर पीछे देखा फिर दर्द की अनुभूतियों के साथ आगे बढ़ गए।
बहेलिये जरा के घर में आज भोजन नहीं पका था। शाम दोनों पति-पत्नी बैठे सिसक रहे थे। आज उसने जिस पर हिरन का मुख समझ कर तीर चलाया था, वह द्वारिकाधीश का तलवा था। उस विष-बुझे तीर ने उनको यह मानव-देह छोड़ने का बहाना दे दिया था। उससे कृष्ण के अन्तिम शब्द थे- “ न दुःखी हो, न भयभीत, यही प्रारब्ध था। ”
इस तरह से चल दिया कोई
कि जैसे वह अगर आया तो क्या
जाना तो था ही
पर कभी ना मिट सकें ऐसे
चमकते और गहरे निशाँ पैरों के
उकर आए थे उसके
समय के विस्तृत फलक पर
और मन पर भी।[
- 81, विनायकपुरम्, विकासनगर, लखनऊ-22 दूरभाष: 09044436325
.......................
तलाश
- कादम्बरी मेहरा
सैंडविच और ड्रिंक दोनों खत्म करके मैंडी कौर ने अपने हाथ की पत्रिका के बाकी पन्ने उलट-पुलट कर देखे और उठने का उपक्रम करने लगी तो बेंच के दूसरे सिरे पर बैठी स्त्री से आँखें चार हुईं। वह सहज मुस्कुरा दी। उसके बाल काले थे परन्तु रंग एकदम गोरा। फिर भी वह किसी कोण से भारतीय जैसी लगती थी।
“ बैठो ना थोड़ी देर और। ” उसने बेतकल्लुफी से कहा।
मैंडी को किंचित् आश्चर्य हुआ, पर वह बैठ गई। वह एकदम करीब सरक आई और मैंडी के वक्ष पर टँगे नाम-पत्र को पढ़ती हुई बोली, “ मैंडी के0 पियर्स। हह ! और मेरा नाम है सान्ड्रा के0 श्वेप्स। मेरी माँ मुझे सैंडी बुलाती है। सो तुम हुईं मैंडी के0 और मैं सैंडी के0। है ना फनी ! ”
मैंडी भी खुल कर हँस दी।
“ ठीक है। मैं भी तुम्हें सैंडी पुकारूँगी। रोज आती हो यहाँ ?”
हाँ ! आज से मेरी ड्यूटी-शिफ्ट बदल गई है। लंच टाइम एक से दो बजे तक रहेगा। तभी तुम्हें देख पाई। ”
“ किस देश की हो ? देखने में बिल्कुल इण्डियन लगती हो, पर भाषा से अजनबी।”
“ मेरी माँ जर्मनी की हैं। काले बालों वाले कई लोग मिलेंगे यूरोप में। इसमें खास बात कुछ नहीं।”
सांड्रा मैंडी को अपने से काफी बड़ी लगी। उसका बदन गदराने लगा था। यहाँ जेनेवा लेक के किनारे बने इस पार्क में लाल जेपनेरियम के फूलों से सजी जैटी की रौनक और नीले जल में तैरती बत्तखों को देखती वे अपना लंच टाइम बितातीं। कभी दूकानों में घूम आतीं। सांड्रा को ट्रैवल एजेंट की दूकान से नए नए ब्रोशर इकट्ठा करना बहुत भाता था।
“ मेरा दिल करता है, मैं खूब घूमूँ-फिरूँ।”
“ अकेली हो या कोई साथी है ? ”
“ फिलहाल तो अकेली हूँ।”
“ तुम्हारे जैसी सुन्दर लड़की अकेली कैसे रह गई? ”
“ कभी कोई ऐसा आएगा, जिसे मैं सुन्दर समझूँगी, अन्दर से भी और बाहर से भी। तब अकेली नहीं रह जाऊँगी। मगर फिलहाल तलाश जारी है।”
“ माँ जर्मनी में रहती है ?”
“ हाँ। शहर से दूर एक गाँव में। खेती-बाड़ी, घोड़े ट्रैक्टर। कभी-कभार जाकर मिल आती हूँ। ”
“ पिताजी ?”
“ तुम्हारा मतलब मेरी माँ का पति ? ठीक है, अच्छा है। मेरा एक सौतेला भाई भी है।”
मैंडी ने कुछ और पूछना नहीं चाहा।
दोस्ती का रंग गहराया तो मैंडी ने सांड्रा को अपने पति नेविल से मिलवाया। परिचय बाजार में हुआ था।
“ मैंडी ! सांड्रा को फ्लैट पर बुलाओ खाने पर। सांड्रा ! सच बोलूँ तो मैंने मैंडी के हाथ का खाना जबसे खाया, मैं वहीं लोटन कबूतर बन गया।”
“ झूठा ! बचपन की दोस्ती भूल गया ? बचपन में हम पड़ोसी थे। एक ही स्कूल में जाते थे। इसकी माँ देर से घर पहुँच पाती थीं इसलिए नेविल स्कूल खत्म होने पर हमारे संग आता था।”
उसी सप्ताहान्त में सांड्रा खाने पर आई। अपने मेजबान को उसने ह्विस्की की बोतल भेंट की और मैंडी को फूलों का एक गुलदस्ता।
खाने के बाद सांड्रा ने रसोई साफ करने में मैंडी की मदद की और नेविल अपना संगीत का खजाना म्यूजिक सेंटर पर चढ़ा कर शाम को रंगीन बनाने लगा। वह बातून और जीवन्त प्रकृति का व्यक्ति था।
“ मैंडी के0, सैंडी के0 ! काफी पियोगी ?” पूछते हुए वह ठठा कर हँस पड़ा। दोनों लड़कियाँ भी हँसने लगीं।
“ कैसा अजीब इत्तिफाक है। वैसे मैंडी का नाम मनदीप है। स्कूल के मैदान में संगी-साथियों ने ‘प’ हटा दिया तो यह मैंडी रह गई। पर सांड्रा तुम्हारा बीच का नाम क्या है ?”
“ सोचो ! कुछ अटकल लगाओ। ”
“ जर्मनी भाषी लोग ‘के’ से ‘क्रिस’ भी लिखते हैं। ‘कर्सटी’ या ‘क्रिस्टीना’ होगा।” नेविल ने चातुर्य दिखाया।
“ बताओ ना ! ” मैंडी इतरा कर बोली।
सांड्रा तीन पैग चढ़ा चुकी थी। संगीत में विभोर, डूबी-डूबी सी गुनगुना रही थी। बेझिझक नेविल के वक्ष पर अपना सिर टिका कर बोली, “ कौर ! सांड्रा कौर श्वेप्स ! ”
मैंडी को लगा सांड्रा नशे में सुन-बोल नहीं पा रही है। दिमाग ठिकाने नहीं लगता। दुहरा कर पूछने लगी,
“ नहीं ! नहीं ! सांड्रा हम तुम्हारा नाम पूछ रहे हैं। तुम्हारा....समझी ? ”
सांड्रा एकदम गम्भीर संयत स्वर में बोली, “ मेरा ही तो। इसमें इतना अचरज क्या है भई। ”
नेविल ने भी गम्भीरता से पूछा, “ मेरी पत्नी का मजाक तो नहीं बनाना चाहतीं तुम ? नहीं ! नहीं ! सीरियसली ! शायद जर्मन होने के नाते तुम अन्य धर्मों को... अश्वेत लोगों को स्वीकार नहीं करतीं।”
सांड्रा ठठा कर हँस पड़ी, “ जर्मन माई फुट ! मैंने अपने को कभी उस युग से नहीं जोड़ा। मेरा बिचला नाम सचमुच ‘कौर’ ही है। मेरी माँ ने मेरे पिता की याद में रखा था। वह सिख थे। मैं आधी भारतीय हूँ।”
कमरे का वातावरण फिर से मुखरित हो उठा। नेविल ने कहा, “मौका खुशी का है क्योंकि मैंडी भी सिख है।”
फिर से जाम भरे गए व संगीत की द्रुत लय पर वह मध्यरात्रि तक थिरकते रहे।
सांड्रा गमगीन सी बोली, “ सब आते हैं तो कहते हैं मैं बहुत सुन्दर हूँ पर जब पता चलता है कि मेरी सुन्दरता में भारत की मसालेदार खुश्बू भी है तो ‘दोगली’ कह कर ठण्डे पड़ जाते हैं। कैसे ब्याह करती ?”
नेविल ने नशे में ही उद्घोष किया, “ ऐसी क्या बात है। हम भारतीय स्टाइल में तुम्हारे लिए वर खोजेंगे। अरेंज्ड मैरिज करवाएंगे। मैं तुम्हरा कन्यादान करूँगा।”
नेविल बहक रहा था। मैंडी ने रौब से कहा, “ चलो अपने कमरे में ! रात ज्यादा हो गई है। इट्स स्लीप टाइम गुड ब्वाॅय। सांड्रा को गुड बाॅय कहो।”
सांड्रा दोनों को गाल पर चुम्मी देकर ‘गुड नाइट’ कहती हुई चली गई।
अगली बार जब वह दोनों लेक के किनारे मिलीं तो मनदीप के मन में कई सवाल थे।
“ सांड्रा ! तुमने कहा था कि तुम्हारे पिता सिक्ख ‘थे’। क्या वे अब नहीं हैं ?”
“ पता नहीं। होंगे तो जरूर कहीं न कहीं।”
“ तुमने देखा है उन्हें ? ”
“ नहीं। मेरी माँ भी अब शायद उन्हें पहचान नहीं पाएंगी। एक नाम और कुछ यादों के सिवा उसके पास और कुछ भी नहीं। फिर भी वह मुझे एक पवित्र निशानी मानती हैं। मेरे पिता को े। उसका पति भी मेरा आदर करता है। ..... तुम सुनाओ तुम्हारे जैसे कट्टर समाज में कैसे तुम्हारी शादी नेविल से हो गई ? तुम्हारे माता-पिता ने कुछ नहीं कहा ? ”
“ मेरी माँ नहीं हैं अब। मेरे पिता बहुत उदार हैं। नेविल का परिवार हमारा पड़ोसी ही था। हम एक ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। हमारी माएँ एक ही स्टोर में काम करती थीं। मुझसे पाँच वर्ष बाद जब मेरा छोटा भाई अजीत आया, मेरी माँ ने नौकरी छोड़ दी। नेविल की माँ ने स्कूल से उसे लाने का जिम्मा हमें दिया। नेविल मुझसे एक साल बड़ा है। प्राइमरी खत्म होते-होते मेरे पापा ने घर बदल लिया। हम दूर चले गए। पापा का बिजनेस था। माँ भी उसी में हाथ बँटाने लगीं।
बरसों बाद जब मैं नौकरी करने लगी तब एक दिन ट्रेन में नेविल ने मुझे देखा। जाने क्यूँकर वह मुझे पहचान गया। फिर तो हम कई बार मिल जाते थे। मुझे ऐसा लगा नेविल जानबूझ कर मेरी राह तकता है। नेविल के साथ मेरी माँ की यादें जुड़ी थीं। हम अपना बचपन याद करके हँसते। धीेरे-धीरे मैं भी उसके आने का इन्तजार करने लगी। उसकी उपस्थिति में मैं माँ को महसूस करती। ऐसे ही एक दिन हम साथ-साथ सफर कर रहे थे। नेविल रोज की तरह अखबार पढ़ रहा था। अचानक जब उसका स्टेशन आया तो वह हड़बड़ा कर उतर गया। मगर लैपटाॅप समेत अपना बैग वहीं भूल गया। मैंने झटपट उसे उठा लिया और अगले स्टेशन पर उतर पड़ी। वापसी की ट्रेन लेकर मैं नेविल के स्टाॅप पर उतरी। वह घबराया हुआ स्टेशन मास्टर के पास बैठा रिपोर्ट लिखवा रहा था। मैंने उसे जाकर पुकारा और बैग वापस किया। नेविल खुशी से पगला गया और मुझे उठा कर नाच गया। स्टेशन मास्टर बोला, “ दैट्स द गर्ल फार यू मेट। मैरी हर इफ यू कैन। ” (यही लड़की तेरे लिए ठीक है। अगर कर सकता है तो शादी कर ले।)
बस, यहीं से हमारे रिश्तों में प्यार की चिंगारी सुलगने लगी। अवर रिलेशंस स्पार्कड अप।”
“ कितनी रूमानी कहानी ! किस्मत वाली छोकरी !! तुम्हारी शादी तुम्हारे पापा ने मान ली आसानी से ! ”
“ आसानी से तो नहीं...! पर हाँ अंत में। कहते थे तेरी माँ होती, तो ऐसा नहीं होता। तू अब तक क्वाँरी होती वगैरह-वगैरह ! ”
“ क्या हुआ था माँ को ?”
“ ब्रेस्ट कैंसर। किस्मतवाली तो तुम हो सांड्रा ! जो तुम्हें माँ का भरपूर प्यार मिला। जानती हो मैं सिर्फ पन्द्रह-सोलह की थी जब मेरी माँ अचानक बीमार पड़ी और दो महीने में चल बसी। मेरा भाई दस साल का था। ....माँ के मरने के बाद हमारा घर घास के तिनके की तरह बिखर गया। मेरे पिताजी ने उनकी भावनाओं को कभी समझा ही नहीं। अपने बिजनेस में ही रमे रहे। उन्हें साध थी यूरोप घूमने की, स्काॅटलैण्ड जाने की, आक्सफोर्ड पढ़ने की। सब गृहस्थी में डूब गई। पैसा कमाना और जोड़ना मेरे पापा का व्यसन बन गया था। कहते थे एक दिन सब छोड़ कर बेच दूँगा। फिर हम घूमेंगे-फिरेंगे। पर वह दिन नहीं आया। माँ धार्मिक विचारों की थी। पापा को शराब से लगाव था। दोनों में एक तनाव बना रहता था। हमारे घर की धुरी माँ ही थीं।.....”
मैंडी सिसकने लगी थी। सैंडी ने उसे बाहों के घेरे में ले लिया। मैंडी को इतनी आत्मीयता भरा स्पर्श सुखद लगा। सैंडी के गर्म आलिंगन में सिमट कर वह थोड़ा आश्वस्त हुई फिर आगे कहने लगी, “ जब पापा को पता चला कि माँ को कैंसर है, तो वह बहुत पछताए। बहुत दफा मैंने उन्हें चुपके से रोते हुए देखा। वे अन्दर ही अन्दर टूट रहे थे। दोनों की मानसिक हालत इतनी भुरभुरी थी कि समझ में नहीं आता था कि किसका सँबल लूँ। धरती पारा बन गई थी। रोज अस्पताल के चक्कर। पापा को घर-गृहस्थी के काम भी करने पड़ते थे। घर में न कोई हँसता-बोलता था, ना रोता था, ना गुस्सा करता था। एक सन्नाटा घने कोहरे की तरह हमारे बीच व्याप रहा था, जिसके आर-पार हम एक-दूसरे को महसूस भी नहीं कर पा रहे थे। इन सबका सबसे बुरा असर अजीत पर हुआ। मैंने उसे सिगरेट पीते हुए देखा। बस, तभी से मैंने अपने मन को कठोर बना लिया। पढ़ाई में कुछ कम नम्बर आएंगे तो दुबारा इम्तिहान देकर ठीक कर लूँगी मगर उसकी हर जरूरत पूरी करूँगी। मैंने दृढ़ निश्चय से रसोई सँभाल ली। पापा को भी आखिरी कुछ हफ्तों में माँ के साथ पूरा समय मिला। थैंक गाॅड ! आज अजीत एक सफल डाॅक्टर है।....”
“ और तुम्हारे पापा ? ”
“ माँ के मरने के बाद उन्हें होश आया। हम दोनों को उन्होंने बहुत प्यार दिया। हमारी देख-रेख की खातिर उन्होंने बिजनेस बेच दिया और पैसा प्रापर्टी में लगा दिया। भरी जवानी में अपना संगी साथी खो देने से जीवन कितना नीरस हो जाता है। पर उन्होंने माँ की धार्मिक पुस्तकों का सहारा लिया। अजीत की शादी अपनी ही जात-बिरादरी में हो गई। पापा उसी के साथ रहते हैं। नियम से गुरुद्वारे जाते हैं और समाज-सेवा करते हैं। ”
“ समाज-सेवा ? क्या वह बहुत लोगों को जानते हैं ? क्या वह मेरे पापा को ढूँढने में मेरी मदद कर देंगे ? ”
“ पर तुमने तो कहा, पता नहीं, कहाँ हैं वह ? ”
“ नाम तो जानती हूँ। माँ से पता लिया था एक बार और उन्हें ढूँढने लंदन भी गई थी। मगर वह वहाँ से चले गए थे। शायद भारत वापस चले गए हों। माँ उन्हें ढूँढना नहीं चाहतीं। तुम्हारा नाम पढ़ कर मैंने अनुमान लगाया कि तुम भी पंजाब से हो। तभी मैंने तुम्हें लक्ष्य बनाया और सोचा कोई टूटा तार है जो तुमसे जोड़ कर खुशी पा जाऊँ।..... मैं आठ साल की थी जब माँ ने शादी कर ली। उसके बाद मेरी दुनिया ही बदल गई। इतना तो पता था कि मेरा पिता कोई और था परन्तु माँ ने नहीं बताया। नौकरी पर जाने लगी तब अपना बर्थ सर्टिफिकेट पढ़ा। पिता की जगह जो नाम था वह अटपटा लगा। तब नानी ने उपेक्षा से बताया कि मैं माँ की एक भूल थी। मुझे अच्छा नहीं लगा। इस बात को लेकर माँ और नानी में बहुत बहस हुई। मैंने माँ से मुँह फुला लिया। उसका पति बहुत अच्छा व्यक्ति है। उसने मुझे प्यार से समझाया। जीवन तो चलता जाता है। मैं अपनी माँ की तरह एक ‘भूल’ करने से डरती रही। कहीं भी सच्चे मन से रिश्ता जोड़ नहीं पाई। बस, ऐसे ही रह गई। ”
“ सब बुरे तो नहीं होते सैंडी ! ”
“ मेरी माँ उसे कभी बुरा नहीं कहती, बल्कि खुद को ही दोष देती है। ”
“ कैसे बिछड़ गए थे दोनों ? ”
“ मेरी माँ ऊटा अंग्रेजी भाषा सीखने लन्दन चली गई। वहाँ एक समृद्ध अंग्रेज परिवार के साथ औ पियर गर्ल बन कर रहती थी। सारा दिन घर का काम करती। बच्चों को देखती। शाम को अंग्रेजी पढ़ने काॅलेज जाती। वहीं, वह डिल्लू से मिली। दोनों में दोस्ती हो गई। डिल्लू पंजाब से लाॅ में डिग्री करके बैरिस्टर बनने यहाँ आया था। मगर उसके बोलने का अन्दाज पंजाबी था। पगड़ी और दाढ़ी के कारण उसे उपहास और उपेक्षा सहनी पड़ती। एक दिन मेरी माँ ने उसे समझाया कि जैसा देश वैसा भेष अच्छा रहता है। वह दाढ़ी कटा आया और पगड़ी उतार दी। दो साल वह संग रहे। एक दिन मेरी माँ को पता चला कि वह गर्भ से है। वह डिल्लू को बताने उसके घर गई। वह एक ईरानी परिवार के साथ उनके एक कमरे में रहता था। परन्तु वहाँ से पता चला कि डिल्लू अपनी बहन की शादी कराने भारत गया है। यूँ अचानक उसका जाना अजीब बात थी। मेरी माँ ने उसके दोस्तों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि मामला जरा टेढ़ा था। उसकी बहन का किसी हिन्दू लड़के से प्रेम हो गया था। डिल्लू चूँकि जमींदार वर्ग का सरदार था, वह कभी भी यह मंजूर नहीं कर सकता था। गैर जात और मजहब में शादी उनके परिवार की इज्जत के खिलाफ थी। डिल्लू के माँ-बाप ने लड़की की झटपट शादी अपनी जात में तय करके उसे पंजाब वापस बुला लिया। मेरी माँ का दिल यह सुन कर बैठ गया। जो व्यक्ति अपनी बहन को हिन्दू से शादी ना करने दे, वह उसे जो समाज, जाति, देश, धर्म आदि सबसे फर्क थी, क्या स्वीकार करेगा ?
वह लंदन छोड़ कर अपने गाँव वापस आ गई। उसने बच्चे को गिराना चाहा पर मेरी नानी पक्की कट्टर कैथोलिक थी। उसने ऐसा नहीं होने दिया। मुझे आना था, सो आ गई। ”
“ उसका नाम-पता बताना, पापा से पूछूँगी। ”
“ उनका नाम डौलजीत सिंग था। डी, ए, एल, जे, आई, टी। ठीक लगता है। ”
हँस कर मैंडी बोली, “ हाँ, ठीक है। मानों न मानों यही नाम....” अपनी ही बात काट कर मैंडी सहसा चुप हो गई। एक भयानक अहसास उसके मस्तिष्क में कौंध गया। बहुत धीमे से उसने कहा, “ यह सिक्खों का बहुत काॅमन नाम है। इतने से शायद काम न चले। और कुछ पता है ? ”
“ नहीं। मैं तुम्हें अपनी मम्मी से मिलवाऊँगी। शायद वह तुम्हें बता दे। ”
मैंडी का चित्त हर चीज से उखड़ गया। यादों के पन्ने पीछे की ओर उड़ने लगे।
मम्मी सिरदर्द से तड़प रही थीं। पापा जी रोज की तरह पब में जा बैठे। गिन्नी आन्टी का बर्मिंघम से फोन आया था। मम्मी सिसक-सिसक कर कह रही थी, “गिन्नी ! उसे मेरी क्या परवाह ! शादी से पहले से यहाँ है। मुझे ऐसे ट्रीट करता है जैसे मैं दूसरी-तीसरी बीवी होऊँ। पहली बार जिसका ब्याह हुआ हो, वह इतना ठण्डा ?”
कई बार पापा जी से झगड़ पड़तीं, “ घर में मैं दिखाई नहीं देती, जो पब में जा बैठते हो। बोतल मैं भी तो खोल सकती हूँ, गोरी का ठेका है क्या ? ”
पापा जी ढिठाई से हँसते, “ अरे, हम जमींदार लोग भरी नियत के होते है। शादी से पहले जो चखना था चख लिया। ऐंवई नई शक किया कर। दुकान में भी तो गोरियाँ आती हैं। रोज जलवे दिखाती हैं। पब तो कम्पनी के लिए जाते हैं। ”
माँ की यादें। उसका अधूरा बचपन। एक रिसता नासूर। मैंडी रात भर रोती रही। मन में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा। शक जो उसकी माँ को खा गया।
सुबह नेविल ने उसकी हलवा आँखें देखीं तो प्रश्नसूचक दृष्टि उसके चेहरे पर गड़ा दी। चाय की प्याली पकड़ाते मैंडी ने कहा, “ नेविल ! मुझे पापा की याद आ रही है। मैं कल ही लंदन जाना चाहती हूँ। शुक्रवार है। आॅफिस के बाद निकल जाऊँगी। शनिवार रह कर इतवार को वापस आ जाऊँगी। ”
नेविल ने उसी दम इंटरनेट पर बुकिंग करवा दी।
लंदन में अचानक मैंडी को आया देख कर दलजीत सिंह का मन आशंका से काँप गया। बेटी ने अंग्रेज से शादी तो कर ली थी मगर अंग्रेजों पर उनका विश्वास ना के बराबर था। वह उन्हें चमड़ी का गाहक ही समझते थे। मैंडी अचानक घर आ गई और वह भी गम्भीर चेहरा लिए तो उनका डर सतह पर तिर आया।
“ सब ठीेक तो है न पुत्तर ? ”
“ हाँ, पापा जी। ”
“ नेविल नहीं आया ? तेरा मुँह क्यों उतरा हुआ है ? कुछ झगड़ा-वगड़ा तो नहीं ? ”
“ झगड़ा उससे तो नहीं हुआ......”
“ फिर ? ”
“ फिर क्या ? आप मेरे पिता हो ! याद आई तो मिलने चली आई। मेरे और आपके बीच में नेविल का क्या काम ? इस वीकेन्ड में बस आप और मैं। ”
“ सच्ची ? ” दलजीत सिंह ने नजरें गड़ा कर पूछा।
“ सच पापा जी, यकीन करिए। आप नेविल को गलत समझना कब छोड़ेंगे ? ”
“ बेटा ये गोरे .... इनका प्यार बड़ा ही सतही होता है। जब दिल भर गया, तो चल देते हैं। प्यार और बात होती है। गृहस्थी जमा कर जीवन भर का साथ निभाना इनके वश की बात नहीं। ”
“ यह बात सब पर लागू नहीं होती। और जमी हुई गृहस्थी में कोई प्यार को तरसता रह जाए, उसका क्या ? ”
मैंडी के स्वर में उपालम्भ था और गुस्सा दलजीत सिंह से छुपा नहीं था।
निःश्वास लेकर बोले, ”मैंने धूप में बाल सफेद नहीं किए बेटा। तजुर्बा है, खुद मेरा तजुर्बा...तभी कह रहा हूँ। ”
“ तजुर्बा ... आपका ? यानी आपने किसी से प्यार किया और वह आपको छोड़ कर कहीं चली गई ? जरूर वह आपके अविश्वास को ताड़ गई होगी और भाग गई। ”
कुछ बोल ना पाए दलजीत सिंह। अपना अतीत बेटी के साथ बाँटने में उनके संस्कार आड़े आ गए।
नवजोत से पहले उनके जीवन में कौन आई थी ? यह एक राज था जो सिर्फ वही जानते थे। पैंतीस की उम्र में माँ-बाप के दबाव में आकर उन्होंने शादी तो कर ली परन्तु कहाँ-कहाँ नहीं रने थे, पंछी गाते थे, तो वह चुपचाप विलय हो गई। वह तैरते रहे बरसों अकेले, पर संसार-सागर में उसे नहीं पाते किसे वह ज्यादा प्यार करते थे।
“ तू बहुत बोलने लगी है, मैंडी ! बात क्या है ? .... मैंने तेरे नेविल को तो कुछ नहीं कहा। ”
“ कहा कैसे नहीं। अब तो कम से कम अपनी सोच बदलिए। ”
अगले दिन शनिवार था। मैंडी को पता था कि उसके पापा जी को गार्डन सेन्टर जाकर नए-नए पौधे ढूँढना अच्छा लगता है। वह सुबह-सुबह ही तैयार हो गई।
“ चलिए पापा जी, कहीं घूम कर आते हैं। दिल बहल जाएगा। ”
गार्डन सेंटर में घूम-घूम कर पापा जी काफी रिलैक्स लग रहे थे। वहीं एक रेस्तरां में बैठ गए, भीड़ से दूर। ठण्डी बियर, नीला दिन, दूर-दूर तक फैले अजेलिया और रंग-बिरंगे जेरेनियम।
“ पापा जी, आपको क्या सचमुच गोरों के प्यार-व्यार का व्यक्तिगत अनुभव है ? ”
“ यह मैंने कब कहा ? ” अचानक पकड़े गए चोर की तरह टालते हुए से बोले।
“ कहा था....बिल्कुल कहा था। आपके गाल लाल पड़ गए हैं। ” मैंडी हँसी।
“ तू उल्टे-सीधे सवाल करने लगी है। अपने बड़ों से इस तरह बात......”
“ पापा जी प्लीज़ ! ..... मैं छोटी नहीं हूँ अब। आपके अतीत को जानने का हक रखती हूँ। यह सवाल तो बचपन से ही मेरे मन में उठता था.... मम्मी ही आपको ज्यादा चाहती थीं। आपने उनकी उतनी कद्र नहीं की, ना उनके दिल की सुनी। कितनी बार रुलाया आपने उन्हें।” कहते-कहते मैंडी भावुक हो उठी।
“ ना पुत्तर ! यह सब वहम है तेरा। तेरी माँ बड़ी नेक औरत थी।..... काम-शाम में मैंने परवाह नहीं की। किसे पता था इतनी जल्दी ....। ”
पर वह ज्यादा देर टिक न पाए अपनी दलीलों में। मान गए कि कोई और भी थी।
“ आपने उससे शादी करनी चाही थी या यूँ ही.....”
“ रब जानता है पुत्तर, मैं बेईमान नहीं था। मगर जो ऊपर वाले ने लिखा होता है, वही होता है। मेरी तकदीर में नहीं थी वह। ..... तेरी बुआ बलवीर हमारी इकलौती बहन थी। बौजी ने उसकी शादी तय कर दी और तार देकर मुझे बुला भेजा। मैंने उसे बताने के लिए फोन किया, वह घर पर नहीं मिली। उसकी लैण्डलेडी ने बताया कि तबयित खराब थी इसलिए डाॅक्टर के यहाँ गई थी। मुझे ब्याह की शाॅपिंग भी करनी थी। दो-दिन बाद मैं चला गया। जब पंजाब से लौट कर आया तो वह न जाने कहाँ चली गई थी। बहुत ढूँढा उसे। उसकी लैण्डलेडी के घर गया था। मगर उसने तो मुझे देख कर दरवाजा भी नहीं खोला। अंग्रेज बड़े रेसिस्ट होते हैं। दरवाजे की चेन चढ़ाए बस इतना बताया कि वह अपने देश चली गई। उसकी एजेंसी का पता पूछ कर मैं वहाँ भी गया, पर उन्हें उसका जर्मनी का पता नहीं मालूम था। बहुत सालों तक इन्तजार किया.... ये मस्तानी लड़कियाँ होती हैं। शादी के नाम से, जिम्मेदारी से बिदक जाती हैं। मौज-मस्ती के लिए रिश्ता बना लिया, फिर छोड़ कर चल दी....तभी तो कहता हूँ....। ”
“ पापा जी ! क्या बुआ जी की शादी जबरदस्ती की गई थी ? ”
“ हाँ....आँ .... ! कुछ ऐसी ही बात थी। हिन्दू लड़के से फँसी थी। ...... हम लोग जमींदार....”
मैंडी को सांड्रा की बताई बात का पता लग चुका था। फिर भी पक्का करना चाहती थी।
“ क्या ‘वो’ आपको कुछ और पुकारती थी ? ”
“ मेरे दोस्तों से सीख गई थी ना ! ‘डिल्लू-डिल्लू’ कहती थी, ‘डौल-डौल’ से तो अच्छा था। ” मीठी यादों में खोए दलजीत सिंह मुस्कुरा दिए।
“ और उसका नाम ऊटा था ? ”
“ हाँ ! कहाँ मिली तुझे वह ? ” दलजीत सिंह हिल गए। उनकी आवाज काँपने लगी।
“ रिलैक्स, प्लीज़ पापा जी ! टेक इट इजी.... ”
“ नहीं, पहले तू बता.... ”
बच्चों की तरह मिनमिना कर बोले और आवेश में उसका हाथ पकड़ लिया।
जितना धक्का उन्हें लगा था, उतना ही मैंडी को भी। आँसू ढरक आए उसके गालों पर। ”
“ आपने मम्मी से शादी क्यों की ? ”
दलजीत सिंह वापस वर्तमान में लौट आए और संजीदगी को ओढ़ते हुए से मूक बैठे रहे। बेटी का यूँ हिलक-हिलक कर रोना उन्हें भी रुला गया। वाकई वह अपराधी थे नवजोत के बच्चों के।
मैंडी शनैः-शनैः सामान्य होने लगी। आँसू पोंछ कर बोली, “ बताना क्या है ? आप मेरे साथ चलिए। संसार अचम्भों से भरा पड़ा है। यकीन मानिए। नेविल को यह सब नहीं पता। आप चाहेंगे तो यह भेद-भेद ही रहेगा।”
अगले वीकेंड पर दलजीत सिंह जेनेवा गए। शनिवार को मैंडी के फ्लैट पर सांड्रा का खाना था। मैंडी ने उसे भी कुछ नहीं बताया। बस, कहा कि कुछ और मेहमान भी होंगे, भारतीय लोग।
“ ओ हो, फिर तो मुझे अपनी जुबान पर लगाम रखनी पड़ेगी। ”
“ बिल्कुल और जूस पीना पड़ेगा, अच्छी लड़की बनना पड़ेगा। ”
दोनों खूब हँसीं एक-दूसरे की खिंचाई करके।
“ कहाँ रहीं इतने दिन मुझे अकेला छोड़ कर ? ”
“ तुम्हारा ही काम करने गई थी सांड्रा कौर। बहुत कठिन काम था। सोचो भला, मैंने तुम्हारे लिए क्या किया ? .... मैंने तुम्हारे पिताजी को ढूँढ निकाला है। तो मिलो ये हैं ....दलजीत सिंह मेरे और तुम्हारे पिता ! पापा जी, ये आपकी बड़ी बेटी, ऊटा की बेटी। ”
मैंडी की आवाज रुँध गई।
सांड्रा ठगी सी देखती रह गई।
दलजीत सिंह के सिर पर जैसे बम फट गया।
एक युग जैसे ठहर गया।
नेविल ड्रिंक्स की ट्रे लेकर दरवाजे पर खड़ा था। इस बोझिल क्षण को गले में घुटकता हुआ बोला, “ चियर्स ! बधाई-बधाई ! सैंडी ! ”
“ पापा जी, कम आॅन ! इसे गले से तो लगाइए। ”
मैंडी उनके कान के पास फुसफुसाई।
बहुत धीरे से दलजीत सिंह की चेतना लौटी। यंत्रवत् उन्होंने दोनों हाथ बढ़ाए तो सांड्रा पुतली की तरह उनके वक्ष से लिपट गई। देर तक चिपकी चुपचाप खड़ी रही।
बुदबुदा कर दलजीत सिंह ने पूछा, “ ऊटा कहाँ है ? ”
“ अभी फोन लगाती हूँ। ” गालों के आँसू पोंछती सांड्रा उनकी बाहों में ही सिमटी हुई बोली।
सांड्रा ने फोन पर माँ को सारी बात बताई और पूछा, “ तुम बात करना चाहोगी माँ ? यह बहुत चार्मिंग व्यक्ति हैं।”
परन्तु सांड्रा की माँ ने बस इतना ही जानना चाहा कि क्या उसने अब दाढ़ी और पगड़ी वापस रख ली है।
“ नहीं। ”
“ रहने दे बेटी ! मुझे अब क्या लेना-देना ? तुझे तेरा परिवार मुबारक हो। यह मिलन भगवान ने नहीं रचा था। मैं अपनी जगह, वह अपनी।”
-35 द एवेन्यू, चीम सरे, एस0एम0, 7 क्यू0ए0 (यू0के0)
........................
पुराने जमाने सी
हमदर्दी उभर आई है।
न्यूयार्क की गलियों में
मुहब्बत उतर आई है।
चाय और केक लिए महिलाएँ
ममता बाँट रही है
सैनिकों के साथ।
मुर्दों से जिंदा अलग करते
सैनिक स्वयं से लड़ रहे हैं।
डाॅक्टर और नर्सें
जख्मों के साथ-साथ
आवेशों की भी
मरहम-पट्टी कर रहे हैं।
बूढ़े और जवान
मलबा बीन रहे हैं
दिन और रात
इक त्रासदी को कैद करने का
असफल प्रयत्न
कर रहे हैं टी0 वी0 वाले
गए झुलस हैं स्वयं
आग बुझाने वाले
क्या करें कि दिल ये सँभल जाए
कैसे ये संकट टल जाए
इस क्रोध की यदि सीमा टूटी
तो कतार में खड़ी साईकिलों सी
सैकड़ों इमारतें
कहर । [
- डाॅ0 दिव्या माथुर, लंदन (यू0 के0)
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(मलयालम से हिन्दी: अनुवाद स्वयंकृत)
अकेलापन
घर के
सारे सदस्य व्यस्त हैं
इतने कि
कोने के तंग कमरे में
अकेले पड़े
बूढ़े दादा से
हफ्ते में एक शब्द भी कहने की
फुरसत
नहीं मिलती किसी को !!
बस
छोटी पोती ही
एकमात्र दोस्त है उनकी
जो
किलकिलाहट के स्वर में
छेड़ने के लिए ही सही
उनसे
हर दिन
कुछ न कुछ
कह देती है।
वह वाणी
बूढ़े के कानों में
पीयूष बन टपकती है।[
- के0 जी0 बालकृष्ण पिल्लै, त्रिवेन्द्रम (केरल)
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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का सौन्दर्य-बोध
- डाॅ0 सत्यप्रकाश त्रिपाठी
सौन्दर्य किसी वस्तु अथवा व्यक्ति का वह मर्म है जिससे उसे देखने अथवा सुनने वाले का हृदय रससिक्त होता है। पाठक के हृदय को रससिक्त करने वाले ऐसे सौन्दर्य का चित्रण कवि और कलाकार का कत्र्तव्य-कर्म है। जो कार्य चित्रकार अपनी तूलिका से करता है, मूर्तिकार अपनी छेनी से करता है, वास्तुकार अपनी ‘कन्नी’ से करता है; वही कार्य कवि अपनी लेखनी से शब्दों के माध्यम से करता है।
द्विवेदी जी की कविता में सौन्दर्य का चित्रण मुख्य रूप से मानवी एवं प्रकृति-सौन्दर्य रूप में दिखाई पड़ता है, जो इस प्रकार है।
मानवी सौन्दर्य
जिस युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी काव्य-रचना कर रहे थे, वह सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों का युग था। ऐसे में सच्चे रचनाकार को निजी राग-भोग का चित्रण करने के लिए अवकाश नहीं था। फिर भी सौन्दर्य का जादू किसे वशवर्ती नहीं बनाता ?
महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रारम्भिक कविताओं में विशेष रूप से शृंगार-वर्णन के साथ नारी-सौन्दर्य का अंकन हुआ है। उनकी परवर्ती मौलिक रचनाएँ भी इससे अछूती नहीं है।
नारी के सौन्दर्यांकन में द्विवेदी जी की प्रतिभा का सर्वाधिक स्फुरण राजा रवि वर्मा के पौराणिक आख्यानों पर आधृत तैल चित्रों पर लिखी गई कविताओं के साथ हुआ।
राजा रवि वर्मा के चित्र सन् 1900 से ही ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने लगे थे। जब द्विवेदी जी ने सरस्वती का प्रकाशन-दायित्व अपने हाथों में लिया, तब उन्होंने उन चित्रों के समानान्तर उनका परिचय देने वाली कविताएँ भी प्रकाशित करना शुरु किया। इस प्रकार चित्रकला के समानान्तर काव्य-कला का उपयोग सौन्दर्य-निरूपण की दृष्टि से हुआ।
द्विवेदी जी की ‘रम्भा’, ‘कुमुद सुन्दरी’, ‘महाश्वेता’, ‘उषास्वप्न’, ‘गौरी’, ‘गंगा’, ‘भीष्म’, ‘प्रियंवदा’, ‘इन्दिरा’ आदि चित्रों पर इन्हीं शीर्षकों से लिखी गई कविताएँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
‘विहारवाटिका’, ‘स्नेहमाला और कुमारसम्भवसार’ में मानवीय सौन्दर्य के जो चित्र द्विवेदी जी ने उकेरे हैं, वे यद्यपि सर्वथा मौलिक नहीं कहे जा सकते हैं फिर भी उनमें रचनाकार की तूलिका का निजी रंग अवश्य है। उनकी नायिका की बंकिम भौंहें, चारु मुखमण्डल, स्नेहयुक्त मृदुल वाणी, चंचल नेत्र, मंद मुस्कान और गज समान गति मनुष्य मात्र को अपने वश में कर लेती है। 1 उसके चन्द्रासन, सरसिज नयन, स्वर्णमयी देहयष्टि और कुंचित केशपाश को देख कर भ्रमर-समूह बलि-बलि जाता है। 2
इसी प्रकार राधा और माधव के युगलज सौन्दर्य का चित्रण करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं कि यमुना के तट पर राधा और श्रीकृष्ण विहार करते हुए ब्रजभूमि निवासियों के नयन-चकोर के लिए इन्दु-छवि के समान सिद्ध होते हैं।3 मानिनी राधा के सौन्दर्य का एक अभिराम चित्र द्रष्टव्य है-
कोमल कपोत कटाक्ष तीक्ष्ण विशिष जनु हिय में लगे।
सिर बारबर तम भार-पूरित लखत रदमनसिज जगै।।
सुषमा सदन सुचि रूप सुन्दर धन्य लखि मनमानहिं।
अनमोल गोल अडोल गोरे उरज युगुल समानहीं।। 4
रवि वर्मा के तैल चित्रों पर आद्धृत कविताओं में भी नारी-सौन्दर्य का लालित्य पदे-पदे दर्शनीय है। ‘कुमुदसुन्दरी’ चित्र की शोभा का वर्णन करते हुए कवि लिखता है-
इसके अधर देख जब पाते,
शुष्क गुलाब फूल हो जाते
कोमल इसकी देह लता है।
मूर्ति भक्ति यह सुन्दरता है। 5
इसी सौन्दर्य में ‘रम्भा’ के रूप-चित्त का उदाहरण भी अनावश्यक न होगा।
वेश विचित्र बनाया इसने,
मुख मयंक दिखलाया इसने।
भृकुटि धनुषाकार मनोहर
अरूण दुकूल बहुल ही सुन्दर।6
उपर्युक्त उद्धरणों में सौन्दर्य का कोई परिष्कृत स्वरूप नहीं उभरता। वस्तुतः इस समय तक द्विवेदी जी का रचनाकार उनके आलोचक, पत्रकार एवं विचारक स्वरूप से इतना दब चुका था कि उन्होंने स्वयं ही यह कहना शुरु कर दिया था कि मैं कवि नहीं हूँ । मेरी रचनाएँ कविताएँ नहीं हैं। उन्हें पद कहा जाए। कदाचित् इन्हीं तथ्यों को दृष्टि में रखते हुए डाॅ0 रामशकल राय शर्मा ने कहा है - “ कवि की स्थिति ठीक वैसी ही लगती है जैसे कोई गंगा-स्नान के लिए एक लम्बी यात्रा करके आए। परन्तु धार पर पहुँच कर चुल्लू भर पानी मस्तक पर चढ़ा ले और सीढ़ियों पर बैठ कर स्नान की क्रिया पूरी करे और धारा में तैरने का साहस न करे। ”7
प्रकृति-सौन्दर्य
नारी-सौन्दर्य के बाद प्रकृति का सौन्दर्य ही मनुष्य को प्रायः रागाविष्ट करता रहा है। यद्यपि पन्त जैसे कुछ कवि ऐसे भी मिल सकते हैं जिन्हें प्रकृति का सौन्दर्य मानवी-सौन्दर्य से भी श्रेष्ठतर लगा हो। द्विवेदी जी की अनूदित कविताओं में प्रकृति मानवी-सौन्दर्य का विधान करने में सहायक बन कर आयी है। बिधु, अम्बुज, कुसुम, गजगति, मृग, नील सरोज, सरसिज, चक्रवाक्, केहरि-कटि, शिशु मृगी, भूधर, पद्मराग, रजनी शंकर, जन्तुपति, लता, मलयज पावस, श्याम जलधि, कदम्ब, धनपटल जैसे अनेक विध प्रकृति के उपादान नारी-सौन्दर्य के उपमान रूप में बार-बार प्रयुक्त हुए हैं। विहारवाटिका में प्रकृति का वर्णन उद्दीपन रूप में भी हुआ है। कहीं चतुर्दिश घिरे हुए मेघ राधा-माधव की रति-लीला का मानव-वर्णन करते हैं और कहीं विरहाग्नि से दग्ध नायक-नायिका के दुःख को बढ़ाने का कार्य करते हैं। विरह की दशा में व्यथित राधा के दुःख को बढ़ाने वाली प्रकृति का एक चित्र बहुत ही मर्मस्पर्शी है-
पल्लव लता नव विशद किसलय शोक उर उपजावहीं।
सुन्दर सुगन्धित मंद मारुत सुमन सुचित सतावहीं।।
गुंजत भ्रमर वर मंजु कंजनि लखत तप तनतावहीं।
ब्रजराज बिनु सब काज अकाज करि, अकुलावही।।8
‘कुमारसम्भवसार’ में प्रकृति के आलम्बन रूप का चित्रण हुआ है। यद्यपि इस कृति के भी प्रकृति-चित्र कवि के स्वरचित और मौलिक नहीं हैं। साथ ही, महाकवि कालिदास की चित्रण-कला को भी वह पकड़ नहीं सका। तथापि उनमें अनुवादक रचनाकार का न्यूनाधिक योगदान अवश्य है। हिमालय पर्वत सम्बन्धी छन्द देखें-
दिव्यदिशा उत्तर में शोभित, देवात्मा कामाधिकारी।
भूधरपति अति पृथुल हिमालय, हिममण्डित मस्तकधारी।।
पूर्व और पश्चिम पयोधि के बीच बढ़ा कर तनु भारी।
महीमाय के दण्डतुल्य है, रक्खा बहु विस्मयकारी।।9
द्विवेदी जी की मौलिक रचनाओं में प्रकृति-चित्रण की दृष्टि से ‘प्रभात-वर्णनम्’ और ‘सूर्यग्रहणम्’ संस्कृत भाषा में रचित है। इनमें प्रकृति के भाव एवं रूप के चित्रण में कवि को अपेक्षाकृत अधिक सफलता मिली है।
‘प्रभात-वर्णनम्’ में प्रकृति का सुन्दर चित्र प्रस्तुत होने के साथ-साथ भाषा की प्रसादगुणमयता और काव्योचित गरिमा उल्लेखनीय है। सूर्योदय के साथ ताराओं के विलुप्त होने का वर्णन करते हुए कवि कल्पना करता है कि जैसे सिंह के आते ही अल्प सत्त्व वाले पशु जंगल को छोड़ कर अन्यत्र भाग जाते हैं, वैसे ही प्रभात होने पर सूर्य से भयभीत होकर तारासमूह विलुप्त होने लगे। यहाँ प्रकृति के प्रस्तुत और अप्रस्तुत रूपों का वर्णन बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से हुआ है। यथा-
मृगाधिपस्यागमनेन सर्वे,
यथाल्प सत्त्वा विपिन त्यजन्ति।
तथा भयनेव विभाकरस्य
तारागणा लोपपरा बभूवः।।10
‘सूर्यग्रहणम्’ शीर्षक कविता में प्रकृति को प्रायः उपदेशात्मक रूप में ग्रहण किया गया है। ग्रहण के दौरान सूर्य के अन्धकाराच्छन्न होने का वर्णन करते हुए कवि कल्पना करता है कि सूर्यग्रहण ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों महात्माओं को विपत्तिग्रस्त देखकर दुर्जन प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हों। यथा-
ग्रासं गते नभसि पूर्णतया अर्क बिम्बे
स्पष्टीबभूव भुवि कोपि तस्मि पुज्जः
आलोक्य कष्टममितो महतां मलीनाः
स्वान्ते सदा सामधिका मुद मुद हीन्त।। 11
खड़ी बोली की प्रकृति-चित्रण सम्बन्धी मौलिक कविताओं में ‘कोकिल’, ‘वसन्त’, ‘शरत्सायंकाल’, ‘मेघोपालम्भ’ आदि के नाम भी आते हैं। इन कविताओं में से ‘कोकिल’ को बालसाहित्य के अन्तर्गत रखा जाना चाहिए। नितान्त वर्णनात्मक ढंग से लिखी जाने के कारण इसमें साहित्यिकता का अत्यन्ताभाव है। स्वरूप बोध कराने की दृष्टि से कुछ पंक्तियों को उद्धृत किया जा रहा है -
कोकिल अति सुन्दर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रंगत के कुँवर कन्हाई,
उसने भी वह रंगत पाई।
अथवा जामुन का रंग जैसे,
इसका भी होता है तैसे।
ज्यों ही चैतमास लगता है,
जाड़ा अपने घर भगता है।। 12
‘वसन्त’ और ‘शरत्सायंकाल’ शीर्षक कविताएँ वस्तुपरिगणना पद्धति पर लिखी गई हैं। इनमें प्रकृति की रमणीयता की अपेक्षा उसके उपादानों की सूची प्राप्त होती है जिस पर आलोचकों ने प्रायः विपरीत टिप्पणी दी है। द्विवेदी जी की ‘वसन्त’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ निम्नांकित हैं-
चिर मौरन के रस तै पगी,
पिक कुछ-कुछ बोलन है लगी।
भँवर फूलन फूलन गावहीं,
निज मनोहर शब्द सुनावहीं।।
कमलिनी दिन माहिं नई नई,
कुमुदिनी निधि में सबपे छई।
जल सुगन्धित तालन को भयो,
रहिकहूँ न पनोगयो।।13
इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं द्विवेदी जी की खड़ी बोली में रचित प्रकृति सम्बन्धी कविताएँ प्रकृति के आह्लादक सौन्दर्य-चित्र प्रस्तुत करने में अक्षम हैं। डाॅ0 उदयभानु सिंह ने ठीक ही लिखा है-
“ निरुपित और निरुपयिता की दृष्टि से द्विवेदी जी के प्रकृति-वर्णन में केवल दृश्य-दर्शक-सम्बन्ध की व्यंजना हुई है, तादात्म्य सम्बन्ध की नहीं। यही कारण है कि उनकी प्रकृति-विषयक कविताओं में गहरी अनुभूति की अपेक्षा वर्णनात्मकता ही अधिक है। ”14
संदर्भ :
1. 2, 3, 4, 5. 8, 9, 10, 11 , 12, 13, द्विवेदी काव्यमाला, पृ0 39; पृ0 39, पृ0 21, पृ0 28, पृ0 377, पृ0 23, पृ0 307, पृ0 168, पृ0 207, पृ0 357, पृ0 359
7. ‘द्विवेदी युग का हिन्दी काव्य’ पृ0 93, पृ0 93
6. ‘सं0 आचार्य द्विवेदी’: निर्मल तलवार, पृ0 78
14. ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग’: डाॅ0 उदयभानु सिंह
- एसो0 प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बी0 एन0 के0 बी0 पी0 जी0 कालेज, अकबरपुर-अम्बेडकर नगर (उ0प्र0) , दूरभाष: 9415917908
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विन्यास
‘गुलेरी’ जी की कालजयी रचना
उसने कहा था
- राजेन्द्र परदेसी
पं0 चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ हिन्दी के सफल सम्पादक, निबन्धकार और अद्वितीय कहानीकार थे। परन्तु इन तीन रूपों में ‘गुलेरी’ जी कहानीकार रूप में अधिक ख्यातिप्राप्त थे।
‘गुलेरी’ जी ने कहानी-जगत् को तीन कहानियाँ दीं- ‘सुखमय जीवन’, ‘बुद्धू का काँटा’, ‘उसने कहा था’। इनकी तीनों ही कहानियाँ अपनी प्रभावशीलता के कारण उन्हें कहानी-जगत् में अमरत्व प्रदान करने में समर्थ हुईं।
इन कहानियों में से ‘उसने कहा था’ मात्र ‘गुलेरी’ की ही नहीं बल्कि हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है।
‘उसने कहा था’ कहानी सन् 1915 में सरस्वती पत्रिका के माध्यम से पाठकों के सम्मुख आई। उस समय कहानी-कला के विभिन्न प्रयोग हिन्दी कथा-साहित्य में हो रहे थे। जो भी कहानियाँ लिखी जा रही थीं, कलात्मक दृष्टि से उन कहानियों का स्तर अनेक रूप लेकर सामने आया किन्तु उनमें कहानी-कला के तत्त्व विकसित नहीं हो पाए थे।
कहानी-कला के सभी आवश्यक तत्त्वों का जिस सुन्दरता के साथ ‘उसने कहा था’ कहानी में समावेश हुआ है, उससे ऐसा आभास होता है जैसे यह कहानी उस काल की रचना है, जब कथा-साहित्य हर दृष्टि से बहुत सम्पन्न हो गया था।
‘उसने कहा था’ कहानी का कथानक बड़ा विविधतामय है। विषयवस्तु की दृष्टि से कहानी का क्षेत्र बहुत फैला हुआ है। वह अमृतसर की गलियों के बीच दो बालक-बालिकाओं के सहज प्रेम को प्रकट करता है। अमृतसर के दृश्यों के बाद ही कहानी एकदम फ्रांस और बेल्जियम की युद्धभूमि पर पहुँच जाती है। उस समय तक बालक लहना सिंह सैनिक लहना सिंह बन जाता है।
‘उसने कहा था’ में कहानीकार फ्रांस और बेल्जियम की युद्ध-भूमि के दृश्यों को हमारे सामने रखता है। इस प्रकार स्थान की दृष्टि से कहानी का कथानक बहुत विस्तृत रूप लिए हुए है। फिर भी कहानी का रूप कहीं भी उलझने नहीं पाया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता है।
मनोवैज्ञानिक कहानी के पुरुष पात्रों में लहना सिंह, सूबेदार हजारा सिंह, वजीरा सिंह और बोधा सिंह है। ये सभी सिक्ख सैनिक हैं जो फ्रांस और बेल्जियम की भूमि पर जर्मनी के विरुद्ध लड़ रहे हैं। बोधा सिंह का चरित्र अधिक उभरने नहीं पाया। वजीरा सिंह बड़ा मसखरा सैनिक है। युद्ध के जीवन में भी मस्ती और आनन्द के गीत गाता है। सूबेदार हजारा सिंह भी एक वीर साहसिक सैनिक है। एक सूबेदार के सभी गुण उसमें विद्यमान हैं। वह अपने सैनिकों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है। लहना सिंह एक कत्र्तव्यनिष्ठ वीर और साहसिक सैनिक भी है। सैनिक के रूप में वह आज्ञा का पालन भी करना जानता है और आदेश देना भी। वह वीर है इसलिए खन्दकों में पड़े रहना पसन्द नहीं करता बल्कि खुले मैदान में दुश्मनों से लड़ने में अपने उत्साह को अधिक प्रकट करता है। सात जर्मनों को वह अकेले ही मारने का हौसला रखता है। युद्ध-भूमि में उसका रूप ऐसा दिखाई पड़ता है जैसे मृत्यु उसके लिए खिलवाड़ हो और युद्ध-भूमि क्रीड़ा-स्थल। गहरे घाव लगने की उसे बिल्कुल परवाह नहीं, बल्कि अपने कार्य में बराबर जुटा रहता है। अपनी बुद्धिमानी से वह जर्मन अफसर के धोखे को पहचान लेता है और कार्यकुशलता से सिक्ख रेजीमेंट को जर्मन सेना के आक्रमण से बचाता है। सूबेदार हजारासिंह भी उसकी कार्यकुशलता की हृदय से प्रशंसा करता है।
लहनासिंह एक नमकहलाल सैनिक है। नौकरी करते हुए भी वह अंग्रेज सरकार का परम मित्र है। इसीलिए अंग्रेजों के विरुद्ध प्रचार करने वाले मौलवी साहब को वह अपने गाँव से बाहर कर देता है।
लहनासिंह को अपने परिवार से भी अत्यन्त प्रेम है। इसीलिए वह अपने भाई कीरत सिंह की गोद में मरना चाहता है।
कहानी के स्त्री पात्रों में सूबेदारनी जो सूबेदार हजारा सिंह की पत्नी है तथा लहनासिंह की पूर्व परिचित बालिका है, का चरित्र प्रमुख है। वह कहानी की नायिका है। बालिका के रूप में जब उसकी भेंट लहना सिंह से होती है तब उसका नटखट, चंचल और लज्जा से भरा रूप पाठकों के सम्मुख आता है। कालान्तर में जब वही बालिका सूबेदार हजारा सिंह की पत्नी बन जाती है तब उसका ममतामयी माँ और कत्र्तव्यपरायण पत्नी का रूप हमारे सामने आता है। अपने पति और पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए वह लहना सिंह से आँचल पसार कर भीख माँगती है।
लहना सिंह का चरित्र इस कहानी का मूल केन्द्र है। वही इस कहानी का नायक है। सारी कहानी उसी के चरित्र पर प्रकाश डालती हुई नजर आती है। लहना सिंह का चरित्र आदर्श प्रेमी और कत्र्तव्यनिष्ठ वीर व्यक्ति की कहानी है जिसने प्रेम पर सबकुछ न्यौछावर करते हुए विलक्षण रीति से अपने कत्र्तव्य का भी निर्वाह किया।
लहना सिंह का आदर्श प्रेमी का रूप बचपन से ही हमारे सामने आता है, जब उसका परिचय अमृतसर की सिक्ख बालिका से होता है। बालिका को वह ताँगे के नीचे आने से बचाता है। आशा के विरुद्ध बालिका के मुँह से कुड़माई की बात सुन कर उसके हृदय में जो प्रतिक्रिया होती है वही उसके प्रेम की तीव्रता की परिचायक है। आगे चल कर भी उसके निःस्वार्थ प्रेम और हृदय की विशालता का परिचय मिलता है जब वह सूबेदारनी बनी उसी बालिका के पुत्र बोधासिंह और पति सूबेदार हजारा सिंह की रक्षा अपने प्राण देकर करता है। वह स्वयं ठण्ड में मरता है किन्तु अपनी जरसी और कम्बल बोधासिंह को उढ़ा देता है। गहरे घाव लगने पर भी वह स्वयं अस्पताल नहीं जाता बल्कि दोनों पिता-पुत्र को अस्पताल भेज देता है। इस प्रकार सूबेदारनी के प्रति वह अपने हृदय के निस्वार्थ और निश्छल प्रेम का परिचय देता है।
कथोपकथन की दृष्टि से भी ‘उसने कहा था’ कहानी बड़ी कलात्मक है। कहानी में आए कथोपकथन बड़े रोचक और स्वाभाविक हैं। वे एक ओर जहाँ पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं, वहीं कहानी की घटनाओं को भी आगे बढ़ाते हैं, पूर्व की घटनाओं की सूचना देते हैं और उपयुक्त वातावरण की सृष्टि करते हैं।
प्रारम्भ में ही लहना सिंह और बालिका का वार्तालाप बड़े ही मार्मिक और स्वाभाविक रूप से दोनों के बाल-हृदय की भावनाओं को चित्रित करता है।
युद्ध-क्षेत्र के दृश्यों को भी कहानीकार ने बड़ी सजीवता से कथोपकथन के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यदि इनकी वर्णना कहानीकार स्वयं करता तो वह वर्णन निश्चय ही नीरस और पाठकों के मन को उबाने वाला हो जाता।
कथोपकथन पात्रानुकूल और भावानुकूल भी है। पात्रों के मुख से निकले पंजाबी भाषा के शब्दों में कथोपकथन पात्रानुकूल और अधिक वास्तविक बन गया है।
कहानी में सर्वत्र प्रवाह, वेग और तीव्रता बनी हुई है। लाक्षणिक वक्रता ने इसके सौष्ठव को और भी आकर्षक बना दिया है।
पं0 चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी की सफलता का श्रेय बहुत कुछ उनकी भाषा-शैली पर भी निर्भर है। उन्हें अपनी भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इसीलिए भावों का प्रकाशन बड़ी ही सशक्तता से हुआ है। उनके भाव उनके पात्रों तक सीधे और सरल ड़ी सी लगा दी है।
प्रेम और कत्र्तव्यपालन से परिपूर्ण लहना सिंह के चरित्र को पाठकों के सामने रखना ही ‘उसने कहा था’ कहानी का मुख्य उद्देश्य है। इसी उद्देश्य को लेकर विभिन्न परिस्थितियों में लहना सिंह के हृदय की विविध दशाओं का चित्रण ‘गुलेरी’ जी ने किया है। परन्तु कहानी का यह मुख्य उद्देश्य होते हुए भी अप्रत्यक्ष रूप से ‘गुलेरी’ जी की कहानी ‘उसने कहा था’ का एक और उद्देश्य भी है और वह उद्देश्य है जीवन के अंतर्गत प्रेम और कत्र्तव्य की स्थिति का सुन्दर विश्लेषण करना।
निष्कर्षतः ‘गुलेरी’ जी का वास्तविक उद्देश्य ‘उसने कहा था’ कहानी के माध्यम से जीवन में आदर्श प्रेम और कत्र्तव्यपरायणता के समन्वित रूप को रेखायित करना है।[
- 44 शिव विहार, फरीदी नगर, लखनऊ-226001, दूरभाष- 09415045584
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हिन्दी भाषा की समस्याएँ
- स्व0 डाॅ0 प्रभाकर माचवे
भाषा कोई भी हो, वह मनुष्य सापेक्ष है। यानी उसे बोलने, लिखने एवं सीखने वाले उस भाषा की स्थिति गति के नियन्ता होते हैं। हिन्दी बोलने वाले भारत के छः प्रान्तों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में बहुतायत से हैं। इसमें दिल्ली राज्य को भी जोड़ लें तो हम मान सकते हैं कि समस्त भारतवासियों में से चालीस प्रतिशत लोग हिन्दी का व्यवहार करते हैं, रेडियो पर हिन्दी गीत सुनते हैं, हिन्दी भाषी सिनेमा देखते हैं, लेकिन अपने-अपने घरों में वे हिन्दी की ही किसी बोली रूप और उपभाषा का प्रयोग करते हैं। यथा- ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, मालवी, बुन्देली, पहाड़ी, मगही, छत्तीसगढ़ी इत्यादि।
तो हिन्दी की पहली भीतरी समस्या यह हुई कि गाँव का आदमी जब शहर में आता है तो कैसी हिन्दी बोलने लगता है। वह अपनी मातृभाषा या हिन्दी की उपभाषा में कुछ शहरीपन का पुट देने लगता है। अंग्रेजी के कई शब्द जो कि वह गाँव में प्रयोग नहीं लाता था, सही या विकृत रूप में अपनाने को बाध्य हो जाता है। मैंने सुना है कि देहाती पुस्तक ‘स्पीक इंग्लिश रैपिडली’ की खपत लाखों में हुई है और प्रकाशक लेखक ने करोड़ों रुपयों का बिजनेस इस पुस्तक से किया है। हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी मातृभाषा वाले भी अंग्रेजी जल्दी से जल्दी सीखने के लिए उत्सुक हैं। जहाँ दोनों भाषाओं का विकल्प है, वहाँ हिन्दी में प्रश्नपत्रों का उत्तर कम विद्यार्थी देते हैं, अंग्रेजी में अधिक। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएँ इसका प्रमाण हैं।
‘धर्मयुग’ या ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का कोई भी नया-पुराना अंक मैं उठा लेता हूँ और विज्ञापनों की भाषा पर सरसरी नजर डालता हूँ, तो उसमें मुझे इतने अंग्रेजी के शब्द मिल जाते हैं कि जिनके पर्यायवाची हिन्दी में न हों, ऐसा नहीं है। अखबारवाले कहते हैं, विज्ञापन की भाषा जैसी होती है, वैसी देनी पड़ती है। क्या यह बात अंग्रेजी अखबारों पर भी लागू होती है ? मैंने ‘स्टेट्समैन’ या ‘टाइम्स आॅफ इण्डिया’ में हिन्दी में या अन्य भारतीय भाषाओं में कोई विज्ञापन नहीं देखा है। ऐसा क्यों होता है ? जो अंग्रेजी शब्द और शब्द-पुंज मैंने हिन्दी विज्ञापनों से छाँटे हैं उनकी सूची बानगी के तौर पर प्रस्तुत है- शेड्स, लैंगुएल, एक्सपट्र्स, स्पीकन अंग्रेजी, कम्प्यूटराज्ड, डिक्शनरी, प्रूफरीडर, बेबी रिकार्ड अलबम, वंशावली कार्ड, साइज, नारदर्न सेल्स एजेन्सीज़, कैपसूल (आयुर्वेदिक), टानिक फार स्मार्टनेस, यूनीफार्म क्लाथ, ब्लैंडेड किस्म के, मार्केट यार्न, हैण्डलूम सेक्टर, हिट फिल्मों की लाइब्रेरी, प्रैक्टिकल, इंग्लिश, तुरन्त डिलीवरी, सेफ्टीताला, हेयरलोशन, डैन्ड्रफ, स्पेशल क्वालिटी, डबल-डेफ्थ क्लींजिंग लोशन, मास्चराइजर, निकिल क्रीम फिनिशिंग, स्टील बाडी, कनेक्शन, क्वालिटी की गारन्टी, स्टाइलिश बन सकते हैं...... आदि-आदि। हिन्दी विज्ञापनों में बहुधा यह निर्देश भी देखा जाता है- सिर्फ अंग्रेजी में पत्राचार करें।
डाॅ0 रघुवीर कहा करते थे कि एक अंग्रेजी या विदेशी शब्द आयातित करने का अर्थ धीरे-धीरे अंग्रेजी की ही कहावत ‘लव मी एण्ड लव माई डाॅग’ (मुझसे प्रेम करो, मेरे कुत्ते से भी प्रेम करो) की हालत लाना है। हम उस हद तक आग्रही न हों तो भी कुछ अंग्रेजी शब्द तो हम ‘साहब’, ‘बाबू’ या ‘माड’ (आधुनिक) होने की लालच में अनावश्यक रूप से प्रयोग में लाते हैं हिन्दी का असली भीतरी शत्रु यही है।
समस्या यह है कि स्कूल-कालेजों में हिन्दी के प्रयोजनमूलक या व्यवहारोपयोगी स्वरूप पर ध्यान न देकर ‘भाषा’ के बदले ‘साहित्य’ पढ़ाया जाता है। अंग्रेजी में विद्यार्थी चैसर को एम0ए0 में जाकर पढ़ते हैं। पर हिन्दी में खड़ी बोली के साथ प्राचीन और मध्ययुगीन कवियों और लेखकों की ऐसी रचनाएँ पढ़ाई जाती हैं जिनकी शब्दावली आगे कभी विद्यार्थी के काम नहीं आती है। क्या विद्यार्थी का इतना समय और श्रम हमें इन चीजों पर जाया करना चाहिए ? आज जब हम अंग्रेजी सीखते हैं तो क्या ओल्ड इंग्लिश, मिडिल इंग्लिश या लैटिन और ग्रीक भी सीखते हैं ? इन बातों पर हमारे शिक्षाशास्त्रियों को विचार करना चाहिए।
भीतरी समस्याओं की ही तरह हिन्दी की बाहरी समस्याएँ भी हैं। उनमें कुछ कल्पित हैं, कुछ वास्तविक हैं। माना जाता है कि दक्षिण में, विशेषतः तमिलनाडु में 1965 की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बाद सर्वत्र हिन्दी इल्लै, हिन्दी इल्लै (हिन्दी नहीं, हिन्दी नहीं) का नारा गूँज रहा है। परन्तु यह धारणा गलत है। तीर्थ स्थानों में जाइए आपको सब भारतीय भाषाएँ जानने वाले पण्डे और पुजारी मिल जाएंगे। हिन्दुस्तानी समझने वाले कुली, पोर्टर रेलों पर होटलों के बैरे, टैक्सी वाले, ‘जटका’, ‘बण्डो’ वाले (यानी गाड़ीवान् ), नाव चलाने वाले, दुकानदार मिल जाएंगे।
हिन्दी की समस्याओं में ही समावेश करने योग्य हैं हमारे कई हिन्दी भाषी मित्र, समालोचक और विवेचक भी, जो दो तरह के अतिवादी दुराग्रहों से हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बाधा पैदा करते हैं। एक ओर ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ की मनोवृत्ति वाले या हिन्दी और आर्य समाज को, अथवा हिन्दी और जनसंघ या आर0एस0एस0 की पर्यायवाची बना कर पेश करने वाले लोग हैं। वे यह मान कर चलते हैं कि हिन्दी की सबके लिए कानूनन अनिवार्य कर देने मात्र से काम हो जाएगा। अंग्रेजी डेढ़ सौ वर्षों तक अनिवार्य रही तो क्या हुआ ? क्या दो प्रतिशत लोग भी अच्छी तरह सीख पाए ?
दूसरी ओर, कुछ वे लोग हैं जो सदा हिन्दी की नुक्ताचीनी करते रहते हैं। हिन्दी भाषा और साहित्य को सदा हेय दृष्टि से देखते हैं। वे मानते हैं कि जो दरबान-टरबान की या रिक्शा वालांे या सत्तुखोरों की भाषा है, जो बस्ती वालों, झुग्गी-झोंपड़ी वालों की भाषा है, वही हिन्दी है। हमारे अच्छे-अच्छे विद्वान् यह कहते फिरते हैं कि हिन्दी केवल शहरों के मुट्ठी भर लोग समझते हैं। संस्कृत प्रचुर बंगला या मलयालम या कन्नड़ उन्हें चलेगी परन्तु आल इण्डिया रेडियो के समाचारों की भाषा उनके लिए संस्कृतमयी है। वे तो आल इण्डिया रेडियो को आकाशवाणी कहने के भी विरुद्ध हैं। ऐसे दोहरे मानदण्डों वाले लोग काफी हैं। यह बात हम सबको जाननी चाहिए कि विश्व के पचास के ऊपर देशों में हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है। पाकिस्तान में भी हिन्दी (और संस्कृत) पढ़ाने की व्यवस्था विश्वविद्यालयों में है। रूस, चीन, अमेरिका आदि महादेशों में तो वह है ही। ऐसी अवस्था में अपने ही देश में हिन्दीइतर प्रदेशों में हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था का अभाव या उसकी दुर्दशा होना बड़ी शोचनीय स्थिति है। विदेशों में हिन्दी भाषा और साहित्य पर निष्ठापूर्वक गहराई से शोधकार्य हो रहा है। स्वयं मैंने अमेरिका के दस विश्वविद्यालयों में, पश्चिम जर्मनी के छह विश्वविद्यालयों में, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, सोवियत रूस, जापान, श्रीलंका, थाईलैण्ड आदि में जाकर देखा है यह काम कितना विशद और सूक्ष्म है। अभी गत वर्ष कोरिया की एक हिन्दी अध्यापिका भारतीय भाषाओं की कहानियों का संग्रह सम्पादित कर रही थी और मुझसे सलाह लेने आई थी। अमेरिका के एक अध्यापक ने मुझे बताया कि सूरसागर की पाण्डुलिपियों के आधार पर वहाँ पाठानुसंधान चल रहा है। रूस में मुक्तिबोध पर शोध हो रहा है तो जापान में हिन्दी के ‘सर्वोदय’ साहित्य पर। ऐसी लम्बी सूची बनाई जा सकती है किन्तु हमारे विश्वविद्यालयों में स्थिति आदर्श नहीं है। तुलनात्मक अध्ययन करने वाले भी स्वयं हिन्दी के अतिरिक्त कोई भाषा नहीं जानते।
दो शब्द हिन्दी के संदर्भ ग्रन्थों के अभाव और प्रकाशकों की अति व्यवसायिक अदूरदर्शिता के बारे में भी कहने होंगे। हिन्दी में ‘मराठी प्रकाशन डायरी’ की तरह कोई प्रकाशन नहीं जिसमें सब महत्त्वपूर्ण लेखकों-प्रकाशकों के नाम पते एक स्थान पर मिल जाएँ।
अनुवादित पुस्तकों की भी सूचियाँ उपलब्ध नहीं। यह अनुवाद-कार्य या तो व्यवसायिक दृष्टि सामने रख कर किया जाता है या फिर एकदम मनमाने ढंग से ।
हिन्दी के शत्रु तो हिन्दी वाले ही हैं
भारत के सात हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेशों में शायद एक हजार से अधिक संस्थाएँ होंगी जो हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास, प्रचार-प्रसार, समुत्थान आदि नामों पर कार्यरत हैं। उनमें से कई सौ संस्थाएँ पंजीकृत हैं। केन्द्रीय और प्रादेशिक सरकारें उन्हें अनुदान देती है। कुछ लोगों को उन संस्थाओं से रोजी-रोटी मिल जाती है। हिन्दी के नाम पर कुछ आयोजन हो जाते हैं। कुछ ‘लिखारी’ एक दूसरे को सम्मानित कर लेते हैं, सब खुश रहते हैं। अमूत्र्त विषयों पर संगोष्ठियाँ हो जाती हैं। विख्यात कवि-लेखकों की शताब्दियाँ मनायी जाती हैं और फिर सब जस का तस हो जाता है। न हिन्दी के लोगों का रुतबा बढ़ता है और न हिन्दी की किताबों की बिक्री बढ़ती है। न हिन्दी के संपादक खुश हैं न प्रकाशक। कुछ कालेजों में अध्यापक-अध्यापिकाएँ हिन्दी-हिन्दी शोर मचा लेते हैं, भारतीय संस्कृतिवादी अपनी पीठ खुद ठोंक लेते हैं, और कम्युनिस्ट दुःखी होते हैं कि इतने जनकवि गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह उगने पर भी इतने दाढ़ीवाले मुफ्त की शराबें एम्बेसियों में पी लेते हैं, फिर भी क्रान्ति नहीं हो पा रही है।
इस दृश्य का मूल कारण क्या है ? तीन दशक पहले हिन्दी संस्थाओं से सम्बद्ध हिन्दी साहित्य सम्मेलन (इलाहाबाद या प्रयाग यह दुमुहाँ प्राणी तब नहीं था) में हमने सत्यनारायण कुटीर में रह कर गर्मियों में इंटर क्लास में सात प्रान्त घूम कर 16000 शब्दों का ‘शासन शब्दकोश’ राहुल जी के साथ सम्पादित किया, एक पैसा रायल्टी नहीं ली। अब यह कोश दुष्प्राप्य है। नागरी प्रचारिणी सभा में स्व0 रामनारायण मिश्र ने हमें मानद सदस्य बनाया था। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद में शिवपूजन सहाय और नलिन विलोचन शर्मा जी तब साहित्य पत्रिका ‘हिमालय’ में हमसे लिखवाते थे। मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के आज के कार्यकत्र्ता यह शायद जानते ही नहीं कि शान्तिप्रिय द्विवेदी के संपादकत्व में रोम्यां रोला अंक, कला अंक की सारी सामग्री हमने लिखी थी। यहाँ तक कि वीणा में कवर के अक्षर और चित्र भी होली अंक में बिना नाम लिखा। हिमाचल प्रदेश साहित्य कला परिषद के हम मानद सदस्य थे। शिमला में ही हरियाणा हिन्दी अकादमी के ‘हरिगंधा’ के लिए मैंने गुप्त शताब्दी समारोह में गुप्त जी की तस्वीर बना दी थी। राजस्थान अकादमी ने हमारे हाथों से पुरस्कार दो वर्ष पूर्व दिलवाए तब प्रकाश आतुर जीवित थे। ऐसी सब सूची लिखने बैठें तो सन् 1934 में हमने हि0 सा0 सम्मेलन के अधिवेशन में पहली बार भाग लिया, तो कुरुक्षेत्र अधिवेशन तक की कई खट्टी-मीठी स्मृतियाँ मन में जगेंगी।
यह दृश्य परिवर्तन क्यों हो गया ? क्योंकि इसके बीच में सरकार आ गई ? अनुदान मिलने लगे ? मैं जब 1945 में पहली बार साहित्य अकादमी के कार्य से भारत के सब प्रदेशों में घूमा तो मन में यह भी कहीं अचेतन में था कि हिन्दी अनुवादकों से कार्य करवाएंगे। देश एक सूत्र से जुड़ेगा, पर हुआ कुछ उल्टा ही। हिन्दी राजनीतिक सौदेबाजी का एक पासा बन गई। पहले हिन्दुस्तानी, फिर हिन्दी शैली पर विद्वान् और कांग्रेसी हिन्दुत्वनिष्ठ लड़ मरे। फिर सरकार द्वारा चुपचाप ‘रघुवीरवादियों को पारिभाषिक शब्दावलियाँ बनाने की संस्थाओं में आत्मसात कर लिया गया। वहाँ प्रतिदिन सहानुभूति वाले और रा0 स्व0 संघ सहानुभूति वाले पारिभाषिक शब्दावलि निर्माताओं में मारामारी होती रही। हिन्दी का व्यवहारिक मानकीकरण नहीं हो सका। प्रयोजनमूलक हिन्दी चल ही नहीं पाई। नौकरशाही जो अंग्रेजीपरस्त थी, यही चाहती थी। हजारों हिन्दी अधिकारी सब मंत्रालयों में, संचालनालयों में, बैंकों में, छोटी-मोटी संस्थाओं में कुर्सी से चिपक कर जम गए। पत्रकार, उनके उपयोगी कोशों के लिए तरसते रहे। विद्यार्थी खिचड़ी ‘हिंग्रेजी या इंग्लिदी’ बोलते रहे। सिनेमा ने और इसमें रेड मारी। वहाँ के सस्ते गाने-डायलाग लिखने वाले पंजाबी, उर्दूभाषी वैसे ही हिन्दी को आर्यजबान (आर्यसमाज के कारण आर्य) कहते थे। हिन्दी का रथचक्र वहीं अड़ गया, कीचड़ और दलदल में फँस गया। इसी आशय का लेख सन् 1950 के करीब साप्ताहिक हिन्दुस्तान में हमने लिखा। हमारी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनी रही (देखें ‘हिन्दी ही क्यों’ और अन्य निबन्ध शंकरदयाल सिंह द्वारा पारिजात प्रकाशन से आठ साल पहले छपी मेरी किताब में)।
सरकार ऊपरी मन से कहती रही। देखिए, हिन्दी के लिए हम कितना खर्च कर रहे हैं। हर दफ्तर में एक हिन्दी प्रकोष्ठ है। हिन्दी में आए पत्रों के उत्तर हिन्दी में दिए जा रहे हैं। ‘हिन्दी दिवस’ पर एक मद्रासी या बंगाली अफसर को बुलवा कर टूटी-फूटी हिन्दी में उससे उद्घाटन-भाषण दिलवा कर तालियाँ बजवा कर या किसी सरकार से या मुस्लिम क्लर्क से गजल गवा कर हिन्दी महोत्सव मना लिया गया। तीन-तीन विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित किए गए, करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए। सुधाकर पाण्डेय ने इन्दिरा जी को हिन्दी माता कह दिया। पर उस माता के पुत्र ने तो हिन्दी को सपाट कर दिया। गए चुनाव-अभियान में राजीव जी ने अलग मुहावरे हिन्दी को दिए जैसे हम अपने विपक्ष को चपटा कर देंगे (वी शैल मेक दैम फ्लैट)। जब सर्वोच्च पद-प्राप्त माखनलाल चतुर्वेदी को मक्खनलाला और नैमिषारण्य को नेमिशरण कहें, तो हिन्दी जन-जन की भाषा हो चुकी !
हिन्दी प्रचार-प्रसार का मतलब केवल सृजनशील साहित्यकारों के हाथों पुरस्कार योजनाएँ सौंपना नहीं है। उसमें सदा पूर्वाग्रह और अपने अपने प्रिय लेखकों, अपनी जात बिरादरी या वाद पंथी लोगों को तरजीह मिलेगी सोवियत लैण्ड पुरस्कारों की तरह या भारत भवन भोपाल की तरह। साहित्य अकादमी बहुत निष्पक्ष होने की कोशिश करती है पर अध्यापकों के हाथों वह भी खेल जाती है। कभी दिल्ली विश्वविद्यालय, कभी इलाहाबाद तो कभी गोरखपुर, कभी काशी विद्यापीठ तो कभी अन्य किसी विशिष्ट विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष (और उनसे जुड़े हिन्दी प्रकाशक) अपनी चाँदी बनाने में लगे रहते हैं। साहित्य गुण जहाँ द्वितीय या गौण हो जाते हैं, वहाँ व्यक्ति पूजा उभरती है।
अगर हिन्दी प्रचारक या हिन्दी अध्यापक, समालोचकों की सलाह न लें, तो क्या पत्रकारों के हाथ पर यह कार्य सौंपा जाए ? हिन्दी संस्थाओं में ऐसे ऐसे लोग भरे हुए हैं जिनका भाषा-साहित्य से दूर-दराज का भी सम्बन्ध नहीं होता। भूतपूर्व विधायक, भूतपूर्व सम्पादक, भूतपूर्व अध्यापक, भूतपूर्व अधिकारी सब अपनेआपको हिन्दी विशेषज्ञ मान लेते हैं। कहीं कोई न्यायाधीश हिन्दी अधिकारी हैं कहीं कोई राजनीतिक कार्यकत्र्ता। मुझे ऐसे भी हिन्दी संस्था संचालकगण के नाम भी मालूम हैं जिन्होंने हिन्दी की एक भी किताब नहीं लिखी या जिनका ज्ञान हिन्दी का न होकर संस्कृत का है या इतिहास, पुरातत्व का या समाज-विज्ञान या रंगमंच का है। आज हिन्दी में क्या हो रहा है ? प्रकाशक किसी कष्ट में है। कागज के दाम कैसे बढ़ते जा रहे हैं। नई प्रतिभाओं के लिए कोई अवसर नहीं हैं। कोई साहित्यिक पत्र-पत्रिका नहीं है। कई भाषाओं से हिन्दी में अनुवादक नहीं मिलते। कई नए वैज्ञानिक विषयों के जानकार हिन्दी भाषा-भाषी नहीं है। इन सबके कारण हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि-
1. हिन्दी का भविष्य केवल सृजनशील लेखक (कवि, कहानीकार, नाटककार, उपन्यासकार कहलाने वाले) व्यक्तियों के हाथों में सुरक्षित नहीं हैं।
2. हिन्दी का भविष्य केवल साहित्यकारों संस्था संचालक, संस्था-संघटक, संस्था के लिए पैसे जुटाने वालों के हाथों में सुरक्षित नहीं है।
3. हिन्दी का भविष्य सरकारी नौकरों या सरकार के पैसे से पूर्णतया चलने वाली तथाकथित स्वायत्त संस्थाओं के हाथों सुरक्षित नहीं है। वे जनता से कटे हुए हैं, जनभाषा से कटे हुए हैं।
4. हिन्दी का भविष्य केवल पत्रकारों या सिनेमास्टारों या मंचीय कवि-सम्मेलनों के हाथों सौंपना हिन्दी के लिए काफी नहीं है। लिखे हुए शब्द को बोला हुआ शब्द बहुत जल्दी पराजित कर देगा।
5. हिन्दी का भविष्य केवल कक्षाओं में चालीस साल पुराने रसशास्त्र और माक्र्सवाद की पुरानी दवाईयाँ बेचने वाले बूढ़ों के हाथों भी सुरक्षित नहीं है।
हिन्दी संस्थाओं को सरकारी अनुदान या उसके सहयोग-दुरुपयोग पर एक जाँच कमीशन बैठाना चाहिए, कितनी द्विरुक्ति, दोहराहट, बेकार का शब्द-व्यायाम हवा में हो रहा है। गाँव-गाँव तक साक्षरता पहुँचानी है, तो हिन्दी वहाँ-वहाँ तक फैलानी होगी। कैसे फैलेगी ? अभी इस पर व्यापक विचार जरूरी है।
हम आशा करते हैं कि हिन्दी संस्थाओं के इस कबाड़खाने की ओवरहालिंग और मरम्मत जल्दी होगी, जल्दी ही नया खून संचारित किया जाएगा। वर्ना हिन्दी और पिछड़ जाएगी। हिन्दी के शत्रु तो हिन्दी वाले ही हैं, अंग्रेजी तो उसमें सिर्फ हवा दे रही है।
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देवनागरी लिपि का इतिहास
- स्व0 डाॅ0 वासुदेवशरण अग्रवाल
देवनागरी भारत की प्रमुख लिपि है। हिन्दी और उसकी अनेक बोलियों को देवनागरी लिपि में ही लिखा जाता है। मराठी भी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसे वहाँ बालबोध कहते हैं। गुजरात और सौराष्ट्र में भी देवनागरी लिपि का काफी प्रयोग होता है। संस्कृत की लिपि भी देवनागरी ही है।
सभी मानते हैं कि देवनागरी प्राचीन ब्राह्मी लिपि से निकली है। ब्राह्मी प्राचीन भारत की राष्ट्रीय वर्णमाला थी। ब्राह्मी लिपि के आविष्कारकत्र्ता विद्वान् ब्राह्मण थे। उनका कहना था कि यह लिपि स्वयं ब्रह्मा की देन है। ब्राह्मी लिपि संस्कृत भाषा लिखने के लिए बनाई गई थी। बाद में प्राकृत ने भी इसी लिपि को अपनाया।
पूर्ण और शुद्ध लिपि
ब्राह्मी लिपि प्राचीन भारत का एक अद्भुत आविष्कार है जिसमें ध्वनियों को बिल्कुल शुद्ध लिखा जाता है। यास्क और पाणिनी से भी पहले ब्राह्मी लिपि जितनी विकसित हो चुकी थी, उतनी उन दिनों कोई भी लिपि नहीं हुई थी।
ब्राह्मी लिपि में वर्णमाला के सभी स्वर और व्यंजन बड़े वैज्ञानिक हैं।
ब्राह्मी भारत की सबसे पुरानी लिपि है। अशोक के राज्यकाल में यह सार्वदेशिक सरकारी लिपि थी। हिमालय में कालसी से लेकर मैसूर के सिद्धपुर तक और सौराष्ट्र के गिरनार से लेकर उड़ीसा के धौली और जौगढ़ तक अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में ही अंकित हैं।
यह महत्त्व की बात है कि देवनागरी ही नहीं, भारत की अन्य सभी उत्तरी या पश्चिमी लिपियों का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है।
भारतीय भाषाओं की मूलभूत एकता का ही यह प्रमाण है कि हिन्दी, काश्मीरी, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, उड़िया, बंगला, मैथिली और असमिया की लिपियों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। दक्षिण भारत की चारों भाषाओं की लिपियाँ भी ब्राह्मी लिपि से निकली हैं।
ब्राह्मी में परिवर्तन
अशोक-काल की ब्राह्मी में क्रमशः रूप-परिवर्तन होता गया। अशोक-काल की ब्राह्मी शुंग-काल (दूसरी सदी ई0 पू0) की ब्राह्मी में परिवर्तित हुई। फिर पहली शताब्दी में कुषाण-काल की ब्राह्मी विकसित हुई। चैथी और पाँचवीं शताब्दी में गुप्त-काल में इस लिपि में और भी परिवर्तन हुए। गुप्त-साम्राज्य बंगाल से लेकर दक्षिण तक फैला हुआ था, अतः ‘गुप्त लिपि’ का (जो कि ब्राह्मी का ही विकसित रूप था) चलन भी दूर-दूर तक रहा।
दक्षिण में ब्राह्मी लिपि का एक अन्य रूप ‘पल्लव’ लिपि चलता था जिसमें अक्षरों की दुम लम्बी होती थी। छठी और सातवीं शताब्दी ई0 में गुप्त लिपि का रूप और बदला। ताड़पत्र और कागज पर लिखाई लगातार चलती रही। इसी हिसाब से अक्षरों का रूप बदला। इस परिवर्तित लिपि को ‘सिद्धमात्रिका’ कहा जाता था। मध्य एशिया और जापान में भी इसका चलन था, जहाँ धार्मिक पुस्तकों को इसी लिपि में लिखा जाता था। ‘सिद्धम् लिपि’ का सबसे पुराना ताड़पत्र जापान के होरीओजी मन्दिर में मिला है। इस लिपि को ‘कुटिल लिपि’ भी कहा जाता था। ‘सिद्धम्’ नाम पड़ने का कारण यह है कि इसमें ‘ओमनमो सिद्धम्’ से ही किसी लेख का आरम्भ होता था। इसका रूप भाषा में ‘ओना मासी धम’ हो गया। बोधगया के महानाम के लेख (588 ई0) और लाखामण्डल की करीब-करीब इसी समय की प्रशस्ति इसी सिद्धनागरी लिपि में है। इसमें शिरोरेखा और अक्षरों के ऊपर त्रिकोणाकार सिरनामे है, जो इस लिपि की विशेषता है।
देवनागरी के प्राचीन लेख
सातवीं ई0 में देवनागरी लिपि ने वर्तमान रूप ग्रहण करना शुरु किया। आठवीं शताब्दी के बाद देवनागरी लिपि का वर्तमान रूप और स्पष्ट होता गया। गुजरात के महाराज जयभट्ट और अन्य राजा इसी लिपि में हस्ताक्षर करते थे- ‘स्वहस्तो मम जय भट्टस्य’। ‘स्वहस्त’ का अर्थ हस्ताक्षर है।
देवनागरी के आरम्भिक लेखों में राष्ट्रकूट के महाराजा दंतिदुर्ग का समनगढ़ का शिलालेख (754 ई0), गोविन्दराज द्वितीय का धुलिया शिलालेख (780 ई0) और धु्रवराज का बड़ौदा के शिलालेख (835 ई0) आदि हैं। कोंकण के शिलाहार राजाओं (843 ई0 और 851 ई0) ने भी अपने कन्हेरी के गुप्त लेखों में इसी लिपि का प्रयोग किया है।
8वीं शताब्दी के बीच नागरी का वर्तमान स्वरूप बन चुका था और 11 वीं शताब्दी ई0 के आरम्भ में गुजरात, राजस्थान तथा दक्षिण प्रदेश के उत्तरी भाग से ताड़पत्र और शिलालेख इसी लिपि में लिखे मिले हैं। परमार, चन्देल, चाहमान (चैहान), कच्छपघात आदि वंशों के राजाओं ने भी इसी लिपि में अपने लेख अंकित कराए।
एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि दक्षिण में नागरी लिपि का विकास आठवीं शताब्दी में हुआ, जबकि उत्तर में दसवीं शताब्दी ई0 में। पश्चिमी चालुक्य, यादव और विजयनगर वंश की तीन पीढ़ियों के शिलालेख देवनागरी लिपि में मिलते हैं। दक्षिण में अब तक संस्कृत देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। उत्तर में इस इस लिपि को देवनागरी कहते हैं और दक्षिण में नन्दिनागरी।
देवनागरी नाम कैसे पड़ा ?
इस लिपि का नाम देवनागरी कैसे पड़ा ? पहले इसका अर्थ ब्रह्मा की, देवताओं की या राजघरानों की नागरी बताया गया। हाल ही में कुछ ऐसे तथ्य मिले हैं जिनसे देवनागरी का दक्षिण में नन्दिनागरी नाम पड़ने का ठीक कारण समझ में आता है। हाल ही में ‘पादताड़ितम्’ नामक नाटक मिला है। इसमें लिखा है कि पाटलिपुत्र को नगर अर्थात् राजधानी कहा जाता था। गुप्तकाल के शिलालेखों से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का निजी नाम देव था। अतः पाटलिपुत्र से सम्बद्ध किसी भी शैली या पद्धति को नागरी कहा जाता था। जैसे मन्दिर-निर्माण की नागरी शैली का शिल्प, मन्दिर-शिखरों की नागरी रेखा और इसी प्रकार नागरी लिपि।
उत्तर में पाटलिपुत्र की तरह दक्षिण का प्रसिद्ध नगर नन्दिन नगर (आज का नन्दिड़) था जो पहले वाकाटक और बाद में राष्ट्रकूट राज्य में था। इस प्रकार उन दिनों की नागरी लिपि के दोनों रूपों का नाम उत्तर और दक्षिण के मुख्य नगरों के ऊपर पड़ा था।
गुप्त लिपि के विविध रूप
गुप्तकाल की नागरी लिपि का विकास पूर्व में बंगला लिपि के रूप में और पश्चिम में पंजाबी लिपि और कश्मीर में शारदा लिपि के रूप में हुआ। दक्षिण में तेलुगु, तमिष, मलयालम और ग्रंथ लिपियों का विकास भी इसी क्रम से हुआ। कोंकण के शिलाहार, मान्यखेत के राष्ट्रकूट और यादव राजा तथा विजयनगर के राजाओं ने नन्दिनागरी लिपि का प्रयोग किया। विन्ध्याचल के उत्तर में मेवाड़ के गुहिल, अजमेर और साम्भर के चैहान, कन्नौज के गहड़वाल, काठियावाड़ और गुजरात के सोलंकी, आबू के परमार, जेजेकमुक्ति के चन्देल और त्रिपुरी के कलचुरि राजाओं ने देवनागरी लिपि का प्रयोग किया।
मुस्लिम शासन में देवनागरी
संस्कृत के पुराने प्रसिद्ध विद्वान् अलबरूनी ने लिखा है कि सिद्धमात्रिका वर्णमाला कश्मीर और वाराणसी में चलती थी और मालवा में इसे नागरी कहते थे। इससे पता चलता है कि सिद्ध या देवनागरी के दो रूप थे- शारदा और नागरी। महमूद गजनवी के सिक्कों पर अरबी में कलमे का संस्कृत अनुवाद ‘अब्दुलमेकम मुहम्मद अवतार’ देवनागरी लिपि में लिखा है। अलाऊद्दीन और शेरशाह के अपने सिक्कों पर भी देवनागरी चलती थी। अकबर ने भी अपने प्रसिद्ध रामसिया सिक्कों पर ‘रामसिया’ देवनागरी में ही लिखवाया था। यह लिपि गोस्वामी तुलसीदास जी के समय की देवनागरी है जो प्रायः आज जैसी है।[
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आलेख
मातृभाषा, राष्ट्रभाषा एवं राष्ट्रप्रेम के प्रेरक प्रसंग
- डाॅ0 राजेन्द्रनाथ मेहरोत्रा
प्रख्यात शिक्षाविद् और स्वाधीनता-संग्राम सेनानी डाॅ0 सम्पूर्णानन्द की भारतीय जीवन-मूल्यों में अपार आस्था थी। उनकी चाहत थी कि भारत राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी प्राप्त करे और आजाद भारत में भारतीय शिक्षा-प्रणाली लागू हो। देश आजाद हुआ और डाॅ0 सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के शिक्षा-मंत्री बने। शिक्षा मंत्री के उनके कार्यकाल के दौरान एक बार किसी विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय उनसे मिलने आए। सम्पूर्णानन्द जी ने उनसे शिक्षा-प्रणाली के बारे में बातचीत शुरु की। सम्पूर्णानन्द जी की राय थी कि अंग्रेजों द्वारा चलाई गई शिक्षा-पद्धति तो भारत के नवयुवकों को केवल पाश्चात्य संस्कृति की गुलामी ही सिखाती है। कुलपति महोदय बोले, “ सर ! आपकी बात तो सही है। आप आर्डर दें कि क्या किया जाना चाहिए। ” आगे भी बातचीत में उन महाशय ने दो-तीन बार ‘सर’ शब्द कहा, तब सम्पूर्णानन्द जी बिफर पड़े और बोले, “आप तो कई भाषाओं के ज्ञाता हैं, एक विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। लाखों छात्र-छात्राओं के चरित्र एवं भविष्य के निर्माण का दायित्व आपके कंधों पर है। फिर भी आप ‘सर-सर’ की रट लगाए हुए अंग्रेजियत का बोझ क्यों ढो रहे हैं ?”
यह सुन कर कुलपति महोदय थोड़ा सहम गए।
तब सम्पूर्णानन्द जी ने समझाया, “ अंग्रेजों की शिक्षा ने अंग्रेजियत अपनाने की सीख दी थी। अब तो हम आजाद हैं। हमें अपनी संस्कृति के अनुरूप व्यवहार करना सीखना चाहिए। ”
खेद का विषय है कि देश की आजादी के 62 साल (प्रस्तुत आलेख अनेक वर्षों पूर्व लिखा गया था) बाद आज भी हम यह ठीक से समझ नहीं पाए हैं। अब समय आ गया है कि हम भाषायी गुलामी की जंजीरों को तोड़ते हुए दुनिया में अपनी अलग पहचान स्थापित करें।
मारीशस, हिन्द महासागर का प्रसंग :हिन्दी की दशा, दिशा और भावी पीढ़ी
बात सन् 1984 की है जब मैं मारीशस में ‘वसन्त’ पत्रिका के संपादक राज हीरामन के घर ठहरा हुआ था। दोपहर का समय था। राज हीरामन और उनकी पत्नी तथा मैं कुछ साहित्यिक चर्चा कर रहे थे। सामने देखा कि उनके दो छोटे बच्चे स्कूल से चले आ रहे हैं। आपस में अंग्रेजी में बात करते हुए वे ड्राईंगरूम में घुसे ही थे कि राज हीरामन और उनकी पत्नी ने उन्हें एकसाथ टोका, ”चलो-चलो, बाहर जाओ और घर में अपनी बोली, अपनी हिन्दी बोलते हुए घुसो।“ बच्चे बाहर चले गए और फिर हिन्दी में बात करते हुए घर में घुसे। मैंने देखा घर में दीवार पर स्टीकर भी चिपका हुआ था- ”घर में हिन्दी बोलो।“ हम यह बात जानते हैं कि मारीशस में बोलचाल की भाषा ‘क्रियोल’ है जिसमें अंग्रेजी, जर्मन, उर्दू, अरबी, पुर्तगाली, हिन्दी और कुछ अन्य उन भाषाओं के शब्द आ मिले हैं जो वहाँ के सामान्य जीवन में बोली जाती हैं। मारीशस में आॅफिसों में काम-काज की भाषा अंग्रेजी ही है और स्कूलों में भी अंग्रेजी माध्यम से ही शिक्षा दी जाती है। राज हीरामन की पिछली कई पीढ़ियाँ मारीशस में ही रही है। मारीशस की जनसंख्या में 52 प्रतिशत लोग भारतवंशी ही हैं। उनके पूर्वजों को अंग्रेज सोने का लालच देकर लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व मारीशस लाए थे और फिर उनके साथ वहाँ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता था। सन् 1984 में भारतवंशियों के मारीशस-निवास की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ मनाई गई थी। इसी अवसर पर भारत से 178 लोगों के एक प्रतिनिधिमण्डल को मारीशस लाया गया था। मैं भी उनमें से एक था। मारीशस की भारतीय मूल की जनसंख्या में अधिकतर लोग बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं जो घरों में भोजपुरी और अवधी बोलते हैं। समय≤ पर वे वर्तमान की खड़ी बोली में भी बात करते हैं। इतने वर्षों तक उन्होंने हिन्दी को कैसे बचाए रखा है उसका प्रमाण राज हीरामन और उनकी पत्नी द्वारा अपने बच्चों पर घर में अंग्रेजी में बात करने पर लगाया गया वह प्रतिबन्ध ही है जिसके कारण मारीशस में हिन्दी पनपती रही है।
जब तक जनमानस में अपनी भाषा के प्रति निष्ठा और उसको बोलने पर गौरवानुभूति नहीं होगी, तब तक कोई भी भाषा सम्मान और गौरव प्राप्त नहीं कर सकती।
फ्रांस (यूरोप) का प्रसंग: फ्रांस का राष्ट्र-प्रेम एवं भाषा-प्रेम
पिछले दिनों एक पुराने संदर्भ को पढ़ते हुए भारत के धुरन्धर विद्वान् डाॅ0 रघुवीर के ऐतिहासिक अपमान का एक किस्सा जानकारी में आया, जो इस प्रकार है-
डाॅ0 रघुवीर जब फ्रांस जाते, वे वहीं के राज-परिवार से सम्बन्धित एक युवा दम्पत्ति के घर ठहरा करते थे। एक बार डाॅ0 रघुवीर को भारत से उनके एक घनिष्ठ मित्र का पत्र मिला। पत्र को डाकिए से लेकर डाॅ0 रघुवीर को देने के लिए गृहस्वामिनी की ग्यारह वर्षीय पुत्री उनके पास पहुँची। थोड़ी देर बाद उत्सुकतावश यह जानने के लिए लौट पड़ी कि पत्र किस भाषा में लिखा गया है। पहले तो डाॅ0 रघुवीर ने आनाकानी की लेकिन लड़की के अधिक आग्रह करने पर उन्हें वह पत्र खोल कर दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही लड़की बोली, “ यह तो अंग्रेजी में है। क्या आपके राष्ट्र की कोई भाषा नहीं है ? ” डाॅ0 रघुवीर को सच्चाई सामने रखनी पड़ी। इस पर लड़की उदास होकर चली गई।
उस दिन भी भोजन के समय सभी लोग साथ-साथ बैठे थे। लेकिन एक मनहूस सन्नाटा छाया रहा। भोजन के बाद गृहस्वामिनी ने कहा- “ डाॅ0 रषुवीर मुझे बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आगे से आप हमारे घर नहीं ठहर सकेंगे। आइन्दा आप अपना और कोई ठिकाना कर लें। मुझे मेरी लड़की ने बताया कि आपकी कोई भाषा ही नहीं है। जिसकी अपनी कोई भाषा न हो, उसे फ्रेंच लोग ‘बर्बर’ कहते हैं तथा उनसे सम्बन्ध रखना अ-गौरव की बात समझते हैं। ”
डाॅ0 रघुवीर बहुत लज्जित हुए।
गृहस्वामिनी ने फिर कहा, “ हम फ्रेंच लोग आतिथ्य के लिए प्रसिद्ध हैं। इसलिए आपका तिरस्कार करते हुए मुझे दुःख होता है। लेकिन भाषा के नाम पर हम कोई समझौता नहीं कर सकते।
इस सम्बन्ध में मैं अपनी माता का एक उदाहरण आपको देती हूँ। वे प्रदेश के ड्यूक की कन्या थीं। प्रथम विश्वयुद्ध के समय वह फ्रेंचभाषी प्रदेश जर्मनी के आधीन था और जर्मनी में शिक्षा का माध्यम फ्रेंच भाषा के बजाय जर्मन भाषा में था। राज्य का सारा काम-काज जर्मन भाषा में ही होता था। मेरी माँ उस समय 11 वर्ष की थीं और एक श्रेष्ठ कान्वेंट में पढ़ती थीं। एक बार साम्राज्ञी उस शाला में पधारीं। उनके स्वागत में अनेक कार्यक्रम बच्चों ने पेश किए, एक से एक आकर्षक और मनोहारी। इसके बाद साम्राज्ञी ने पूछा- “ क्या कोई छात्र जर्मन राष्ट्रगान भी सुना सकता है ? ” यहाँ मैं प्रसंगवश बता दूँ कि मेरी माँ न केवल अतीव सुन्दरी थीं बल्कि अति कुशाग्र बुद्धि की भी थीं। साम्राज्ञी का आग्रह सुन कर मेरी माँ उठ खड़ी हुईं और उन्होंने इतनी शुद्ध जर्मन भाषा में राष्ट्रगान गाकर सुनाया कि साम्राज्ञी भाव-विभोर हो गईं। इतनी अच्छी और शुद्ध भाषा में तो कोई जर्मन छात्र भी राष्ट्रगान नहीं सुना सकता था।
साम्राज्ञी ने मेरी माँ से कोई इनाम माँगने को कहा, लेकिन वह चुप रहीं। एक बार पुनः साम्राज्ञी ने माँग दोहराई।
तब मेरी माँ ने पूछा, “ क्या वह इनाम आप दे सकेंगी जो मैं आपसे माँगूगी ? ”
साम्राज्ञी का चेहरा आवेश में लाल हो उठा। उन्होंने कहा, “ बच्ची ! साम्राज्ञी का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। तुम जो चाहो माँग लो। ”
तब मेरी माँ ने कहा था, “ महारानी जी, यदि आप अपने वचन की धनी हैं, तो आगे से इस प्रदेश में जर्मन भाषा में नहीं, सारी शिक्षा और राजकाज फ्रेंच भाषा में होना चाहिए। ”
वातावरण में सन्नाटा छा गया। महारानी बच्ची की माँग पर आश्चर्यचकित थीं।
वे क्रोध से लाल होकर बोलीं, “ लड़की ! नेपोलियन की सेनाओं ने भी कभी जर्मनी पर ऐसा प्रहार नहीं किया था, जैसा तूने किया है। साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन तो असत्य नहीं हो सकता लेकिन तुझ जैसी बच्ची ने जो शिकस्त दी है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकूँगी। जर्मनी ने जिस प्रदेश को अपने बाहुबल से जीता था, उसे आज तूने अपनी वाणी से लौटा लिया है। मैं भलीभाँति जानती हूँ अब आगे लोरेन प्रदेश अधिक दिनो तक जर्मनी के आधीन नहीं रह सकेगा। ” यह कह कर महारानी अति उदास होकर सभास्थल से लौट गईं।
डाॅ0 रघुवीर, इस उदाहरण से आप समझ गए होंगे कि मैं किस माँ की बेटी हूँ। फ्रेंच संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी मातृभाषा को देते हैं। ऐसा इसलिए है कि हमारे लिए राष्ट्रप्रेम और भाषा-प्रेम में कोई अन्तर नहीं है। ”
दागिस्तान (रूस) का प्रसंग: मातृभाषा का एक मर्मांतक प्रसंग
सोवियत रूस के अवारिस्तान निवासी लेनिन पुरस्कार विजेता प्रख्यात कवि श्री रसूल हमजातोव एक बार फ्रांस की राजधानी पेरिस गए। वहाँ अपने ही देश और गाँव दागिस्तान के एक चित्रकार से उनकी भेंट हुई। वह चित्रकार उच्च अध्ययन के लिए इटली गया था। वहाँ से अनेक देशों में गया और बड़ी प्रसिद्धि अर्जित की। बाद में उसने एक इतालवी सुन्दरी से शादी कर ली और पेरिस में बस गया। कवि प्रवर रसूल हमजातोव को अपने देशवासी चित्रकार से मिल कर बड़ी खुशी हुई। चित्रकार उन्हें अपने घर ले गया। उसने हमजातोव को अपने अनेक चित्र दिखाए। उनसे प्रतीत होता था कि चित्रकार अपनी जन्मभूमि को भूल नहीं सका है। उस समय हमजातोव ने चित्रकार से पूछा, “ आप अपनी जन्मभूमि लौटना क्यों नहीं चाहते ? देर हो चुकी है। कभी मैं अपनी मातृभूमि से जवान और जोशीला दिल लेकर आया था। अब मैं उसे सिर्फ बूढ़ी हड्डियाँ कैसे वापस कर सकता हूँ ? ”
पेरिस से लौट कर उन्होंने चित्रकार के सगे सम्बन्धियों को ढूँढ निकाला। बड़ी हैरानी हुई कि उसकी माँ अभी तक जिन्दा थीं। अपनी मातृभूमि को छोड़ देने और विदेश में बसने वाले बेटे के बारे में उसके सगे सम्बन्धियों ने उदास होते हुए उनकी बातें सुनीं। ऐसा लगता था कि उन्होंने मानों उसे माफ कर दिया था और इस बात से खुश थे कि वह जिन्दा तो है। पर तभी उसकी माँ अचानक पूछ बैठी, “ तुम दोनों ने अवार भाषा में बातचीत की ? ”
“ नहीं, हमारी बातचीत दुभाषिए के जरिये हुई। मैं रूसी बोलता था और तुम्हारा बेटा फ्रांसीसी। ”
माँ ने काले दुपट्टे से मुँह ढक लिया जैसा कि बेटे की मौत की खबर मिलने पर किया जाता है। पहाड़ी घर की छत पर बारिश टपाटप ताल दे रही थी। सभी अवारिस्स्तान में थे। अपनी मातृभूमि को त्याग देने वाला, दागिस्तान का बेटा भी शायद पृथ्वी के दूसरे छोर पर पेरिस में बारिश का राग सुन रहा था।
बहुत देर तक चुप रहने के बाद चित्रकार की माँ नें कहा, “ तुम्हें गलतफहमी हुई है रसूल, मेरा बेटा तो कभी का मर चुका। वह मेरा बेटा नहीं था। मेरा बेटा वह जबान नहीं भूल सकता था, जो उसे मैंने, अवार माँ, ने सिखाई थी। ”
ब्रिटेन का भाषा-चिन्तन (21वीं सदी की भाषाएँ)
इंग्लैण्ड की वह घटना याद आ गई जब अंग्रेजों की मातृभाषा अंग्रेजी होने के बाद भी फ्रेंच और लैटिन भाषाओं का बोलबाला था। कानून फ्रेंच में बनते थे। शिक्षा लैटिन में दी जाती थी। सन् 1650 में इंग्लैण्ड की संसद ने एक याचिका में फ्रेंच और लैटिन भाषाओं को दासता का प्रतीक कहा था। 22 नवम्बर 1650 ई0 को इंग्लैण्ड की संसद ने निर्णय लिया कि 1 जनवरी 1651 के बाद से फ्रेंच या लैटिन का प्रयोग सरकारी या गैरसरकारी कार्यों में नहीं किया जाएगा। मात्र 36 दिनों में इंग्लैण्ड की राजभाषा अंग्रेजी बन गई, जो अनवरत चल रही है। इसी प्रकार भारत से आठ मास पश्चात् स्वाधीन हुए लघु देश इजरायल ने अपनी प्राचीन हिब्रू भाषा की जीवंतता बनाए रख कर शत्रुओं से युद्ध करते हुए बहुमुखी विकास भी किया।
फिजी देश के हिन्दी-निष्ठ पूर्व मंत्री डाॅ0 विवेकानन्द शर्मा के दर्द भरे स्वर हिन्दी-प्रेमियों को स्पष्ट संकेत दे रहे हैं - “ हम फिजी में बसे प्रवासी लोग अपनी सांस्कृतिक और अपनी आत्मा के लिए भारत की ओर देखते हैं। मगर हिन्दी रूपी द्रौपदी आज भारत में नग्न हो रही है। और द्रोण चुप बैठे हैं। आज कृष्ण नहीं हैं, मगर फिजी जैसे छोटे से द्वीप से भी हम चीर देने को तैयार हैं। इसके लिए हम शहीद होने को भी तैयार हैं। ”
मारीशस के भारत स्थित राजदूत श्री रोहित नारायण सिंह गत्ति के मेरे पास आए पत्र की कुछ पंक्तियों से ही हिन्दी के प्रति मारीशस के अटूट सम्बन्धों का अनुभव होगा। यों तो इस छोटे से द्वीप में फ्रेंच, इंग्लिश, उर्दू, तेलुगु, चीनी, तमिल, मराठी, गुजराती एवं क्रियोल भाषाएँ बोली जाती हैं। लेकिन हिन्दी सबसे अधिक लोग समझते और बोलते हैं। क्रियोल में भी हिन्दी शब्दों की बहुतायत है। युगपुरुष महात्मा गाँधी जी के सद्प्रयास से मारीशस में हिन्दी के पठन-पाठन की सुविधाओं का बहुत विकास हुआ। ...राष्ट्रीय त्यौहारों के कार्यक्रमों का आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से हिन्दी में सीधा-प्रसारण किया जाता है। यह हिन्दी की प्रगति और उसकी लोकप्रियता का परिचायक है। सप्ताह में कई बार हिन्दी फिल्में दूरदर्शन पर भी दिखाई जाती हैं। सर्वप्रथम मानस-प्रवचन का हिन्दी में सीधा प्रसारण संत मोरारी बापू ने किया। तत्पश्चात् लंदन से भी आस्था चैनल ने इसका प्रसारण किया जो हिन्दी की विश्व में लोकप्रियता का परिचायक है। जनवादी जर्मन गणतंत्र में रेडियो बर्लिन के अधिकारी डाॅ0 फ्रैडमैन श्लैडर की हिन्दी के प्रति उनकी भावना उन्हीं की कलम से -- “ हमें न केवल प्रसन्नता बल्कि गर्व है कि हम बर्लिन रेडियो द्वारा छोटी सी सेवा कर रहे हैं और कार्यक्रमों के द्वारा उसे अन्तरराष्ट्रीय संवाद की भाषा बनाने में योगदान दे रहे हैं। हिन्दी एक अन्तर-राष्ट्रीय चरित्र अपना रही है और हम उसकेे अन्तर-राष्ट्रीय चरित्र में अपना निरन्तर योगदान दे रहे हैं। जर्मनी का वही बर्लिन रेडियो है जहाँ नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने राष्ट्रभाषा हिन्दी में भारत के स्वाधीनता-प्रेमियों को प्रेरणादायी जोशीला सन्देश दिया था। अंत में हिन्दी में बहुचर्चित नारे ‘जय हिन्द’ और ‘दिल्ली चलो’ लगाए थे।”
हिन्दी के प्रति दिखाई जा रही उदासीनता का कारण
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ0 नरसिम्हाराव जी की विज्ञता अनेक भाषाओं तथा हिन्दी भाषा पर उनके अधिकार को सब समझते हैं किन्तु स्वतंत्रता के बाद से ही हमारे अंग्रेजीदाँ नेताओं और शासन के अधिकारियों की हिन्दी के प्रति उदासीनता ही आज हिन्दी के वास्तविक राजभाषा पद पर सुशोभित होने में बाधक है। सर्वसम्प्रभुतासम्पन्न राष्ट्र के प्रधानमंत्री से यह आशा की जाती है कि वे विदेशों में अपने भाषण राजभाषा हिन्दी में देकर गौरव अनुभव करें किन्तु परम्परानुसार सचिवों द्वारा तैयार किए गए अंग्रेजी के भाषणों का वाचन ही अब तक हमारे शासनाध्यक्ष करते रहे हैं। एक मार्मिक तथ्य जानना हिन्दीप्रेमियों के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। श्री नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री रहते हुए चीन-यात्रा पर गए थे। अनेक शासकीय कार्यक्रमों के लिए तैयार अंग्रेजी के भाषणों और इनके हिन्दी रूपान्तरों को सुनाते रहने के अन्त में स्वदेश लौटते हुए उनका अन्तिम कार्यक्रम बीजिंग विश्वविद्यालय के छात्रों की सभा में था। सभा का संचालन एक चीनी छात्रा हिन्दी में कर रही थी। प्रधानमंत्री से भाषण दिए जाने का अनुरोध करने पर हिन्दी विद्वान् श्री नरसिम्हाराव जी परम्परानुसार अंग्रेजी में लिखित भाषण पढ़ने लगे। छात्रों ने एक स्वर से आवाज उठाई हमें भारत के प्रधानमंत्री से वहाँ की राजभाषा हिन्दी में ही भाषण सुनना है, अंग्रेजी में नहीं। यह तो श्री नरसिम्हाराव की विद्वत्ता व कुशलता थी कि उन्होंने समय की नजाकत को पहचान कर अपना भाषण तत्काल हिन्दी में दिया। कुछ लाज तो बची। यह प्रसंग देश के स्वाभिमानी कर्णधारों, विदेशों में देश का प्रतिनिधित्व करने वालों एवं देशवासियों को झकझोर कर उनमें अवश्य ही अपनी राजभाषा के प्रति सम्मान जाग्रत कर सकेगा।
हिन्दी की गरिमा, शुद्धता एवं अस्मिता सर्वोपरि
हिन्दी की शुद्धता तथा गरिमा का ध्यान रखना आवश्यक है। इसी के आधार पर हमारी राष्ट्रभाषा प्रतिष्ठा अर्जित करेगी। जिसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, उसकी ओर ध्यान अनायास आकर्षित हो जाता है। ध्यानाकर्षण का गुण जिसमें आ जाता है उसकी लोकप्रियता बढ़ने लगती है। तो हमें ध्यान देना होगा हिन्दी के सम्मान की स्थापना पर। इस कथन के अभिप्राय कोे स्पष्ट करना उचित प्रतीत हो रहा है। दूरदर्शन पर प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ हुए वात्र्तालाप बहुलता से प्रसारित होते हैं। उन सफल व्यक्तियों के विचार एवं उनकी धारणाओं से हम इन साक्षात्कारों से अवगत होते हैं। ये बड़े उपयोगी होते हैं। इन साक्षात्कारों में एक विचित्र मानसिकता का अनुभव हमें होता है। हिन्दी कार्यक्रम में प्रश्नकत्र्ता के प्रश्न हिन्दी में होते हैं, पर उनके उत्तर जो हिन्दी सिनेमा में प्रसिद्धि पाए लोग देते हैं, अधिकांशतया अंग्रेजी में होते हैं। एक और रोचक किन्तु लगभग असह्य बात सामने आती है। सिने कलाकारों द्वारा बोली गई अंग्रेजी निम्न स्तर की होती है और उनमें अशुद्धियाँ भी रहती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें अंग्रेजी का ज्ञान है ही नहीं, पर और कोई भाषा बोलने में उन्हें लज्जा आती है।
विश्व में फैले भारतवंशियों का भारतीय संस्कृति एवं मातृभाषा-प्रेम
लगभग 170 वर्ष पहले भारत के शर्तबन्द मजदूरों के जहाज कलकत्ता से चल कर हिन्दी महासागर स्थित मारीशस में और फिर सुदूर दक्षिणी अमेरिका के देशों में पहुँचने लगे थे। सन् 1838 में गुयाना में पहला जहाज पहुँचा। सन् 1845 में त्रिनिदाद में भारतीय मजदूरों को लेकर पहला जहाज पहुँचा और सन् 1873 में भारतीय मजदूरों का पहला जत्था सूरीनाम की धरती पर उतरा। सन् 1916 तक यह प्रक्रिया बराबर चलती रही। अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक पीड़ा को सहते हुए भारत के इन वंशजों ने धीरे-धीरे नए देशों को अपना घर बना लिया। इन नए देशों में बसने का इतिहास एक लम्बी दर्दभरी कहानी है। परन्तु परिश्रम और अपनी संस्कृति के महान् मूल्यों के सहारे ये मजदूर आज उन देशों के सम्माननीय नागरिक बने हैं।
गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का इनके पुनर्जागरण में विशेष योगदान रहा। इन मजदूरों के परिवारों में छिपे गुदड़ी के लाल धीरे-धीरे बाहर निकलने लगे और विश्व ने अनेक हस्तियों के दर्शन किए। इनमें सर्वोपरि हैं त्रिनिदाद की मजदूर कोठरियों में पले नोबेल पुरस्कार विजेता विद्याधर सूरजप्रसाद नायपाल जो अंग्रेजी साहित्य के एक महान् लेखक के रूप में ख्याति पा चुके हैं। गुयाना के डाॅ0 छेदीजगन देश के प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने। विश्वविख्यात श्रीदत्त रामफल अन्तर-राष्ट्रीय जगत् में 1975 से 1990 तक कामनवेल्थ सचिवालय के महामंत्री रहे। राष्ट्रमण्डल त्रिनिदाद के वासुदेव पाण्डेय देश के प्रधानमंत्री रहे। मारीशस में सर शिवसागर रामगुलाम देश के प्रधानमंत्री और कालान्तर में गवर्नर जनरल बने और आज भी उन्हीं के वंशज उस देश की बागडोर सँभाले हुए हैं।
ये सभी देश आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सशक्त हैं। इन महान् विभूतियों की पुस्तकों, लेखों, भाषणों और दिल के किसी न किसी कोने में छुपा भारतीयता का भाव तथा हिन्दी के प्रति भावनात्मक सम्बन्ध किसी न किसी रूप में झलकता है। ज्यों-ज्यों अन्तर-राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त भारत का सूरज चमकेगा और वहाँ विभिन्न कार्यक्षेत्रों में हिन्दी का वर्चस्व बढ़ेगा, त्यों-त्यों हिन्दी की शक्ति बढ़ेगी। हिन्दी के प्रति अस्मिता का भाव भारतीय वंशजों की रग-रग में व्याप्त है। यह व्याप्ति पारस्परिक व्यवहार की भावना से प्रेरित है और अपनी ही संस्कृति के प्रति सहज ही पैदा होने वाली आत्मीयता से ओत-प्रोत है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी: अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के उद्गार
संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी पर विचार करते समय हमें सर्वप्रथम अमर शहीद स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी ध्यान में आते हैं। उन्होंने 2 मार्च 1930 को गोरखपुर में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 19वें अधिवेशन में यह घोषणा की थी कि एक दिन हिन्दी एशिया ही नहीं, विश्व की पंचायत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। एशियन कांग्रेस 1947 में गाँधी जी ने हिन्दी में अपना व्याख्यान देकर अन्तर-राष्ट्रीय मंच पर हिन्दी को प्रतिष्ठित किया। इसी तरह प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में 10 जनवरी 1975 को काका कालेलकर ने यह उद्बोधन दिया था कि “ मैं अन्तर्मन से विश्वास करता हूँ संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसे संगठन में यदि बयालीस करोड़ लोगों की यह आवाज पहुँचेगी तो वह विश्वशान्ति की ओर, अहिंसा-प्रधान मानव-व्यवस्था की ओर, शोषणरहित समाज की ओर तथा समस्त विश्व के बीच एक पारिवारिक स्नेह सम्बन्ध की ओर आगे बढ़ेगा, इसमें कोई शक नहीं। ” काका साहब के अन्तर्मन की इस कामना को संयुक्त राष्ट्रमहासभा के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण देकर श्री अटलबिहारी बाजपेयी, श्री श्यामानन्द मिश्र तथा श्री पी0 वी0 नरसिंहाराव ने आंशिक रूप से पूरा किया।
4 अक्टूबर 1978 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 32वें अधिवेशन में हिन्दी में भाषण देकर तत्कालीन विदेशमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने नए इतिहास का निर्माण किया था। पुनः 4 अक्टूबर 1988 को श्री नरसिंहाराव ने भी हिन्दी में ही संयुक्त राष्ट्र-महासभा में भाषण देकर न केवल हिन्दी के अधिकाधिक उपयोग के बारे में राजभाषा अधिनियम के निर्देश का पालन किया बल्कि अपनी भाषा में अपने को व्यक्त करने की भारत राष्ट्र की अदम्य आकांक्षा को भी वाणी दी।
सरकार का यह पुनीत कर्त्तव्य है कि वह हिन्दी के राजभाषा के रूप में प्रयोग को पूर्णरूपेण सुनिश्चित करे। उचित होगा कि हमारे राजनेता अपने शासकीय कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करें तथा विदेशों में भी अपने व्याख्यान भारत की राजभाषा हिन्दी में दें।
अंग्रेजी विश्वभाषा नहीं
अंग्रेजी को विश्व-भाषा मान लेने का दुष्परिणाम यह हुआ कि दुनिया के हर देश के साथ हम अंग्रेजी से व्यवहार करते हैं, चाहे उनकी भाषा जर्मन हो, रूसी हो, चीनी हो या फारसी। हर रोग का हमारे पास एक ही इलाज है जमालगोटा। इसी का नतीजा है कि श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित जब राजदूत का पद-ग्रहण करने रूस गईं तो उनके अंग्रेजी में लिखे परिचयपत्र को स्तालिन ने उठा कर फेंक दिया और पूछा कि क्या आपकी कोई भाषा नहीं है ? इसी का परिणाम है कि जिन देशों में हमारे राजदूतों को नियुक्त किया जाता है वे उन देशों की भाषा नहीं सीखते और अंग्रेजी में काम चलाने की असफल कोशिश करते रहते हैं। उस देश के राजनीतिज्ञ क्या सोचते है ? उस देश की जनता का विचार-प्रवाह किधर जा रहा है ? उस देश के अखबार क्या लिख रहे हैं ? यह हमारे राजदूतों को तभी पता चल सकता है और जल्दी और ठीक-ठीक पता चल सकता है जब वे स्थानीय भाषाएँ जानते हों।
प्रायः होता यह है कि वे या तो दुभाषिये के जरिए सूचनाएँ और गुप्त जानकारियाँ इकट्ठी करते हैं या तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं जब तक कि लन्दन और न्यूयार्क के अंग्रेजी अखबार उन्हें पढ़ने को न मिलें। घटनाएँ हंगरी और चेकोस्लोवाकिया में भले ही उनकी आँख के सामने घटें किन्तु बुदापोस्त और प्रहा में बैठे हमारे राजदूत उन घटनाओं पर तब तक अपनी रपट नई दिल्ली नहीं भेज पाते जब तक कि उन्हें लन्दनिया विवरण प्राप्त नहीं हो जाते, तो इससे बढ़ कर विडम्बना क्या होगी ? ऐसा इसलिए होता है कि वे भाषायी तौर पर अपाहिज हैं। वे अंग्रेजी की बैसाखी के सहारे चलते हैं। नकली बैसाखियाँ असली पैरों से भी अधिक प्यारी हो गई हैं।
जो कौम बैसाखियों पर चलती है, हजार साल की यात्रा के बावजूद भी स्वयं को उसी स्थान पर खड़ा हुआ पाती है, जहाँ से उसने पहला कदम उठाया था।[
- अभिलाषा भवन, रूपज्योतिपुरम्, मेहरोत्रा फार्म, भिण्ड रोड, ग्वालियर-474005 (मध्य प्रदेश)
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इतिहास के दर्पण में गोण्डा जनपद
- डाॅ0 श्रीनारायण तिवारी
गोण्डा : प्रागितिहासिक काल में
यह जनपद 26.120 डिग्री से 27.510 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 81.500 डिग्री से 82.510 डिग्री पूर्वी देशान्तर के मध्य अवस्थित है जिसकी उत्तरी सीमा को बलरामपुर जनपद, पश्चिमी सीमा को बहराइच व श्रावस्ती, पूर्वी सीमा को बस्ती और सिद्धार्थनगर तथा दक्षिणी सीमा को फैजाबाद और बाराबंकी जिले सीमांकित करते हैं। प्रागैतिहासिक पुरातात्त्विक अध्ययनों के अभाव के कारण गोण्डा जनपद की प्राचीन सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था का सुस्पष्ट चित्र उपलब्ध नहीं होता। गोण्डा नाम का कोई प्राचीन सत्ता-केन्द्र नहीं था बल्कि राजनीतिक व्यवस्था के आदिम युगों से यह किसी न किसी प्रतिष्ठित सत्ता-केन्द्र के आधीन एक क्षेत्र था जिसकी संस्कृति और राज-व्यवस्था का आशय हम तत्तत् सत्ता केन्द्र की संस्कृति और राजव्यवस्था से लगाने को विवश है।
भारतीय पुराणेतिहास के अनुसार लगभग 6977 ई0 पू0 से 6937 ई0 पू0 तक भारत के विन्ध्योत्तर भाग में सम्राट मनु की शासन-व्यवस्था थी। गोण्डा का वर्तमान क्षेत्र मनु के दस पुत्रों में ज्येष्ठ इक्ष्वाकु के स्थाई कोसल राज्य के अंतर्गत था। इस कोसल राज्य का विस्तार परवर्ती अवध प्रदेश के विस्तार से अधिक था जो सामान्यतः हिमालय की उपत्यका से दक्षिण गंगा नदी तथा पूर्व में सदानीरा (गण्डक) तक विस्तृत था। इसकी पश्चिमी सीमा स्थूल रूप से पांचाल राज्य की पूर्वी सीमा निश्चित की जाती थी। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 62,363 कि0 मी0 था। उत्तर से दक्षिण 270 कि0मी0 तथा उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व 450 कि0 मी0 लम्बाई में फैले इस प्रदेश का आकार पंचभुज क्षेत्र के समान था। बुद्ध पूर्व षोडष महाजनपदों में एक कोशल जनपद का उत्तर-पश्चिम का क्षेत्र था। इसकी राजधानी अयोध्या थी जिसकी स्थापना मनु ने करके विश्व-सभ्यता के संदर्भ में राज्य संस्था की भी नींव डाली थी। कोसल की तत्कालीन काशी पांचाल, विदेह, मगध आदि राज्यों से अधिक प्रसिद्ध इसकी सुदीर्घ सुशासकीय परम्परा रही। इस राज्य के प्रवर्तक क्षत्रिय वंश में इक्ष्वाकु, मान्धाता, पुरुकुत्स, त्रसदस्यु, त्रयारूण, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश, सिन्धुद्वीप, सुदास, दशरथ, राम का वैदिक साहित्य में उल्लेख मिलता है।
वर्तमान गोण्डा क्षेत्र जिस कोसल राज्य के अन्तर्गत था, उसे इतिहासविदों ने अपने अध्ययनों में पाँच विभाग करके इस प्रकार चिन्हित किया है-
1. उत्तर कोसल - इसके अंतर्गत सरयू पार मैदान के वर्तमान बहराइच, गोण्डा, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, बलरामपुर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, सन्तकबीरनगर, महाराजगंज एवं कुशीनगर जनपद है।
2. सिलियाना या सैलियाना - हिमालय की निचली श्रेणियों के भूभाग इसके अन्तर्गत थे जो इस समय नेपाल में सम्मिलित हैं।
3. पश्चिम राठ - घाघरा व गोमती नदियों का वह भू-भाग जो पूर्व में अयोध्या से सुल्तानपुर को मिलाने वाली रेखा तथा पश्चिम में गोमती नदी के उद्गम-स्थल नीमसार ( नैमिषारण्य) होते हुए खींची जाने वाली रेखा से आवेष्टित था। इसके अन्तर्गत फैजाबाद जनपद का एक तिहाई भू-भाग, सुल्तानपुर जनपद का थोड़ा सा उत्तरी भाग, बाराबंकी का अधिकांश भाग तथा लखनऊ व सीतापुर के कुछ हिस्से शामिल थे।
4. पूरब राठ - इसके अन्तर्गत फैजाबाद जनपद का दो-तिहाई भाग, सुल्तानपुर का उत्तरी-पूर्वी भाग, आजमगढ़ व जौनपूर का कुछ भाग इसमें सम्मिलित था।
5. अरबर या अरोर - गोमती व सई नदियों के बीच का वह भू-भाग जो दक्षिण-पूर्व में प्रतापगढ़ (अगोर) तक विस्तृम था।
वर्तमान गोण्डा कोसल की प्राचीन सीमा में अन्तर्भुक्त था एवं प्राचीन कोशल का महानगर और राजधानी श्रावस्ती, वर्तमान गोण्डा जनपद की पश्चिमी सीमा में अन्तर्भुक्त था।
गोनर्द > गोण्डा क्षेत्र पूर्व से पश्चिम विस्तृत उस हिमालय के समानान्तर ‘सरवार’ (< सरयूपार) क्षेत्र का एक भाग रहा है जो संभवतः अपने वैदुष्य और आचार से प्रसिद्ध सरवरिया अथवा सरवरिहा (< सरयूपारिणः) ब्राह्मणों का क्षेत्र माना जाता है। संस्कृत के प्राचीन ग्र्रन्थ ऋग्वेद में सरयू का उल्लेख मिलता है। विस्तृत काल-प्रवाह में ‘सरवार’ क्षेत्र उत्तर कोशल, श्रावस्ती, गौड देश आदि नामों से अभिहित होता रहा है। इस क्षेत्र के लिए सरयूपार संज्ञा का प्रयोग कलचुरि राजा सोढ़देव के कहल दानपत्र-लेख से प्राप्त होता है। यह लेख 11वीं शती उत्तरार्द्ध का है- ‘श्रीमत्सोढ़देवोयं सरयूपारजीवितम्।’ देवरिया जनपद के लाट कस्बे से प्राप्त 1145 ई0 के गहड़वाल गोविन्दचन्द्र के दान लेख में यह शब्द ‘सरवार’ के रूप में आया है-
‘श्रीमद् गोवन्दचन्द्र देव विजयी। सरवारे दुधाली सम्बद्ध गोविसालके पण्डलापत्तल्याम्।’
ई0 1865 में बस्ती जिले का जन्म होने के पूर्व गोण्डा जिले की पूर्वी सीमा गोरखपुर जिले से मिलती थी जिसमें वर्तमान देवरिया जनपद भी सम्मिलित था। इन उत्तरप्रदेशीय जिलों और बिहार के कुछ भागों को मिला कर सरवार क्षेत्र की पहचान होती थी। गोण्डा जनपद की पश्चिमी सीमा में अन्तर्भुक्त वर्तमान सहेट-महेट गाँवों से प्राचीन श्रावस्ती के सुप्रतिष्ठ समीकरण की एक मत से स्वीकृति है। मत्स्य पुराण, वायु पुराण, कूर्म पुराण, विष्णु पुराण, महाभारत, हरिवंश पुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण में श्रावस्ती को गौड में स्थित कहा गया है तथा इसके संस्थापक को श्रावस्तक (श्रावस्त) बताया गया है। जनरल कनिंघम ने गौडा का समीकरण आधुनिक गोण्डा जनपद से किया है। अवध के गोण्डा जिले में अयोध्या से 58 मील उत्तर राप्ती नदी के किनारे सहेट-महेट (शरावती) है, जो बौद्ध साहित्य का श्रावस्ती है। पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी में कोसल सारव और ऐक्ष्वाकुओं का उल्लेख किया है। समूचा उत्तर कोसल ‘गन्द’ नाम से भी जाना जाता था। इसे गोनर्द > गोनद्ध >गोड्डा > गौडा > गोण्डा संज्ञा का क्रमशः विकास माना जा सकता है।
‘शतपथ ब्राह्मण’ उत्तर दिशा में मनुष्य लोक की स्थिति मानता है। इस उदीच्य भू-खण्ड में देविका नाम की सरयू की सहायक नदी हिमालय से निकलती है। आधा योजन चैड़ी तथा पाँच योजन लम्बी इस नदी के तट पर सभी पंच महागौड ब्राह्मणों के उद्गम स्थल कहे गए हैं। उक्त नदी-नाम सरयू की एक दक्षिणी धारा का नाम है जो देविका नदी बतलाई जाती है। इसी से सरयू कहीं-कहीं देवहा भी कहलाती है। इस स्थिति को स्वीकारें तो सरवार का देविका तट गौड देश से संयुक्त है और उदीच्य ब्राह्मणों के पाँच प्रकार पंच गौडो के विभाजन-- सारस्वत, सरवावारेण्य (सरवरिया) कान्यकुब्ज, मैथिलि और उत्कल गौड के लिए व्यवह्रत है जिसकी सम्मिलित संज्ञा आदि गौड अथवा महागौड का उल्लेख होता है और उसकी मूल भूमि गोण्डा ही है। ‘सरयू’ का मूल उद्गम मानसरोवर माना गया है।
प्रागैतिहासिक-पुरैतिहासिक गोण्डा
गोण्डा जनपद का भू-खण्ड प्रीस्टोन (पूर्व पाषाण) काल (प्रायः पाँच लाख वर्ष पूर्व) के जलोढ़ निक्षेपों से निर्मित है। नदी-निक्षेपों से चापर-चापिंग, क्लीनर आदि प्रागैतिहासिक उपकरण प्राप्त होते रहे हैं। कुआनो नदी के कतिपय जीवाश्मों के प्रमाण क्षेत्र के तत्सम्बद्ध वैशिष्ट्य की सिद्ध करते हैं। गोण्डा जनपद में मानव का प्रवेश अग्नि की खोज के पश्चात् हुआ। यह कालखण्ड ही वस्तुतः गोण्डा की मूल संस्कृति के अंकुरण एवं पल्लवन का युग था। नृतत्वशास्त्र की तकनीकी शब्दावली में प्राचीन कोसलकजनों में, ब्रैकिसिफैलिक, नार्डिक, आस्ट्रिक, मंगोलायड अर्थात् लघुकापालिक, कोल, शबर, मुण्डा, किरात और अपेक्षतया बाद में मिश्र हुए आर्य रक्त का अद्भुत योग उपस्थित था। बहुविध प्रजातीय संस्कृतियों के महत् परिपाक की पृष्ठभूमि निर्मित हो सकी थी।
पुरैतिहासिक समृद्धि की दृष्टि से सहेट-महेट से प्राप्त जेतवन, पूर्वाराम, राजकाराम, पंचछिद्दकगेह, ब्राह्मणवाटक, कोसम्बकुटी, गंधकुटी, अंगुलिमाल-गुहा-स्तूपादि संयुक्त बौद्ध महानगर और कोसलक राजधानी श्रावस्ती के अवशेष विशिष्ट हैं। जेतवन विहार को सुदत्त ने बुद्ध के जीवनकाल में ही बनवाया था। सुदत्त ने इस उपवन की भूमि को राजकुमार जेत से उस पर स्वर्णमुद्राएँ बिछा कर खरीदा था और फिर उस उपवन को बुद्ध को दान कर दिया था। जनरल एलेक्जेण्डर कनिंघम, श्री डब्ल्यू0 सी0 बेनेब, डाॅ0 कृष्णकान्त सिन्हा एवं राहुल सांस्कृत्यायन द्वारा संपादित खुदाईयों-शोधों और प्रकाशित निष्कर्षों ने क्षेत्र की पुरातात्त्विक इतिहास-संरचना को दृष्टि दी है और उस क्षेत्र को एक महत् परम्परा का वारिस होने का गौरव दिया है। परन्तु गोण्डा के जइतागढ़, कोटखास, डुमरियाडीह, परास, उमरी बेगमगंज, पचरन महादेव तथा तिर्रेमनोरमा के प्रायः अनुद्घाटित पुरावशेषों का महत्त्व अभी आंका जाना शेष है। अभी हाल ही में मनहना (पकड़ी) के पास सदाशिव मन्दिर की खुदाई करने पर उसमें पार्वती की अष्टधातु की मूर्ति मिली है जिसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया है।
वैदिक कालखण्ड
आदिगौड क्षेत्र अथवा गोण्डा प्राचीन कोशलक क्षेत्र का विशिष्ट जनपदीय अंश रहा है। इस प्रदेश के विजेता राजाओं में इक्ष्वाकु, मान्धाता, पुरुकुत्स, त्र्याण, भगीरथ, अम्बरीष, दशरथ और राम के नाम ऋग्वेद को ज्ञात है, यद्यपि जनपद के रूप में कोसल की चर्चा उसमें नहीं हुई है।
वैदिक साहित्य का ‘शतपथ ब्राह्मण’ प्रथमतः जनपद के रूप में कोसल की पहचान करते हुए उसके पूर्वात्य प्रान्तर प्रदेश पर अवस्थित सदानीरा नदी की चर्चा करता है, जो कोसल प्रदेश और विदेह जनपदों की सीमारेखा बनाती थी। यह ब्राह्मण ग्रंथ ऐक्ष्वाकु नृपति त्रदस्यु से भी परिचित है। इस ग्रन्थ में परअटणार नामक विजेता राजा के पराक्रम की प्रशंसा करते हुए हिरण्यनाभ नामक नरेश का उल्लेख मिलता है। प्रश्नोपनिषद के अनुसार हिरण्यनाभ कौसल्य आश्वलायन के समकालीन थे। यदि ‘कोसलक आश्वलायन मज्झिनिकाय’ में उल्लिखित सावत्थी (गोण्डा की श्रावस्ती) के आस्सलायन को समीकृत किया जाए तो हिरण्यनाभ को छठीं ई0 पू0 में रखना होगा। पौराणिक सूचियों में हिरण्यनाभ श्रावस्ती नरेश प्रसेनजित का पूर्वज कहा गया है। ‘गोपथ ब्राह्मण’ मान्धातृ युवनाश्व की चर्चा करता है। ‘पंचविंश ब्राह्मण’ ऐक्ष्वाकु त्रिशंकु की जानकारी रखता है। ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ ऐक्ष्वाकु हरिश्चन्द्र और उनके पुत्र रोहित का नामोल्लेख करता है। ‘जैमनीय उपनिषद् ब्राह्मण’ में एकराट् भगीरथ (भग्रेरथ) की चर्चा है।
‘बौधायन श्रौत सूत्र’ से ऋतुपर्ण नाम प्राप्त है। पाणिनी ने वृद्धेत्कोसला जादाञञङ पद से कोसल की चर्चा की है। कोसल से सम्बद्ध सरयू नदी और ऐक्ष्वाकुओं के उल्लेख भी पाणिनी के अन्य अंशों में उपलब्ध हैं। तथापि उक्त सन्दर्भों से पुराना विवरण अथर्ववेद से प्राप्त है। सम्बन्धित अंश में प्रथम कोसलक राजधानी अयोध्या के नगरीकृत वास्तु और वैभव की गौरदृप्त चर्चा की गई है।
प्राचीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्राचीन समय में गोण्डा जनपद वनों से आच्छादित था जो गोचर भूमि हेतु सुरक्षित था। गोण्डा का प्राचीन नाम गोनर्द है। यह तथ्य सुप्रसिद्ध विद्वान् कैयट और नागेश भट्ट ने भी सिद्ध किया है और महर्षि पतंजलि को इसी आधार पर गोनर्दीय कहा है-
गोनर्दीयस्तटवाह भाष्यकारस्तवाह इति।
- कैयट
गोनर्दीय पदं व्याचष्टे इति भाष्यकारः।
- नागेश भट्ट
आज का गोण्डा अतीत काल में उत्तर कोशल के नाम से जाना जाता था। हिमालय पर्वत की शैवालिक शृंखला व सरयू-घाघरा के बीच की यह धरती ऋषियों-मुनियों की तपःस्थली रही है, जिनकी दिनचर्या मुख्य रूप से तपस्या और गोपालन से जुड़ी थी। स्पष्ट है कि इस सम्भाग में अतीत काल में गोपालन की प्रचुरता के कारण ही सम्पूर्ण उत्तर कोशल को गोनर्द कहा जाने लगा था। इक्ष्वाकु की 58वीं पीढ़ी में उत्पन्न दिलीप ने गो-सेवा का व्रत लिया था और उसके लिए अचिरावती (राप्ती) और सरयू नदी के बीच का क्षेत्र सुरक्षित करा दिया था। गोनर्द का अर्थ ही होता है- “ गावः नर्दन्ति अत्र इति गोनर्दम्। ” अर्थात् वह भूमि जहाँ गायें रम्भाती या कुलेल करती हों, उसे गोनर्द कहते हैं। जनसंख्या-वृद्धि के कारण लोग गोपालन के साथ कृषि-कार्य भी करने लगे। वे पशुओं को बाँधने लगे। पशुओं को बाँधने के स्थान को गोष्ठ या गो-अड्डा कहते हैं। यही गो-अड्डा (गोड्डा) बाद में गौडा हुआ। ई0 पश्चात् लिखे गए मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण, लिंग पुराण तथा पद्म पुराण में श्रावस्ती नगरी को गौडा (गौड) में स्थापित होने का उल्लेख है। दाशरथ रामचन्द्र ने अपने कनिष्ठ पुत्र लव को उत्तर कोशल (श्रावस्ती) का राज्य बँटवारे में दिया था। ऐसा वाल्मीकि रामायण, वायुपुराण तथा रघुवंशम् महाकाव्य में प्राप्त होता है।
कनिंघम ने भी अयोध्या अथवा अवध के क्षेत्र को चार भागों में विभक्त किया है। उनके अनुसार सरयू के दाहिनी ओर के क्षेत्र को बनौध (वन-अवध) क्षेत्र कहा गया है, जो पुनः दो भागों में विभक्त था। पूर्व के क्षेत्र को पूर्व राट (पूर्व राष्ट्र) और पश्चिम के क्षेत्र को पश्चिम राट (पश्चिम राष्ट्र) कहा है। सरयू के उत्तर का क्षेत्र अथवा मोटे तौर पर राप्ती के दक्षिण का क्षेत्र गौड़ कहलाता था जिसे आजकल गोण्डा और बहराइच जिलों के क्षेत्र कहा जा सकता है। पूर्व का भाग जो मोटे तौर पर घाघरा-सरयू के उत्तर का भाग था, उसे ही अवध अथवा अयोध्या का राज्य कहा जाता था। इस प्रकार के विवरण का सूक्ष्म विवेचन करें तो यही स्पष्ट होगा कि राम के पैतृक राज्य में मुख्य रूप से गोण्डा, बहराइच, बस्ती, सिद्धार्थनगर तथा गोरखपुर का क्षेत्र आता था। वर्तमान सरयू पार क्षेत्र भी घाघरा के इसी उत्तरी क्षेत्र को कहा जाता था और इसका प्रशासन अयोध्या से होता था। इसका प्रमाण इस क्षेत्र का नामकरण ‘सरयूपार’ ही बताया जा सकता है। मोटे तौर पर अयोध्या से शासित होने वाला सरयू पार का क्षेत्र मुख्य रूप से सरयू के उत्तरी भाग में रहा होगा और इसी का प्रशासन राम के द्वारा लव को सौंपा गया था।
‘शब्दकल्पद्रुमः’ एवं ‘वाचस्पत्यम्’ में गोनर्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी गई है-
“ गवि पृथिव्यां नर्दृ ऋयते स्वनाम्ना आख्यायते इत्यर्थः गोनर्द्द:। ” - शब्दकल्पद्रुमः
“ गवा वाचा नर्दते अच् = गोनर्द्द:। ” - वाचस्पत्यम्
इसी प्रकार ‘गोनर्द’ शब्द का अपभ्रंश ‘गोण्डा’ कालान्तर में प्रचलित हुआ।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने जो भारत-भ्रमण पर ई0 637 से ई0 639 में आया था, उसके समय में भी वर्तमान गोण्डा को गौडा या गौड ही कहा जाता था। उस समय सरयू और राप्ती के बीच का क्षेत्र गौडा या गौड तथा राप्ती के उत्तर का क्षेत्र उत्तर कोसल कहलाता था।
गोनर्द प्रदेश को आर0जी0 भण्डारकर ने मथुरा और पाटलिपुत्र के बीच स्थित माना है। व्याकरण साहित्य के इतिहासकार आचार्य युधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार उत्तर भारत का वर्तमान गोण्डा जनपद संभवतः प्राचीन गोनर्द है। काशिका 1-1-75 में गोनर्द को प्राच्य देश माना गया है। ‘गोनर्दीय’ शब्द में विद्यमान तद्धित प्रत्यय से स्पष्ट है कि गोनर्दीय आचार्य प्राच्य गोनर्द देश का था। बी0 सी0 लाहा के अनुसार रामायण में अयोध्या को कोसल की प्राचीन तथा श्रावस्ती को उत्तरकालीन राजधानी बताया गया है। बाद में दक्षिण कोसल से अलग करने के लिए उत्तर कोसल को श्रावस्ती कहा जाने लगा था। राजा दशरथ की रानी कौशल्या दक्षिण कोसल की राजकन्या थीं। कालिदास ने उत्तर कोसल की राजधानी के रूप में अयोध्या का उल्लेख किया है। गौड का उल्लेख 56 देशांे के रूप में सम्मोहतन्त्र और षट्पंचाशद्देश विभाग की दो सूचियों में वर्णित है। प्रथम सूची के अनुसार -
ऐराकमोटांतचीन(ना) महाचीनस्तथैव च।
नेपाल (लः) शीलहट्टश्च गौडकोसलमा (म) गध (धाः)।।16।।
द्वितीय सूची के अनुसार-
चोलायां (पां) चाल गौडश्च मलयांढ (याल) श्च सिंहलः।
व्योंकविडो व्योन्तश्चैव (?) का (क) र्णाटो लाट एव च।।3।।
प्रथम सूची में भूटान, चीन, महाचीन, नेपाल तथा सिलहट्ट के बाद गौड और कोसल का नाम आया है। अतः प्रथम तथा द्वितीय दोनों सूचियों में वर्णित गौड आधुनिक गोण्डा ही है।
डाॅ0 डी0 सी0 सरकार ने गोनर्द को प्राच्य देश (बंगाल) में स्थिति को गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया है। उनका कथन है- For Gonarda which belonged to east India only theoretically.
क्षेमेन्द्र ने स्वयं गौड़ देश की स्थिति ‘समय मातृका’ के द्वितीय सर्ग श्लोक 104 में इंगित की है। उन्होंने क्रमानुसार पश्चिमोत्तर से दक्षिण-पूर्व की ओर के भूगोलीय क्षेत्र लिए हैं। तो हमें मिलता है- कम्बोज, तुर्क, चीनी (भारतीय चीन प्रदेश) त्रिगर्त गौड अंग और बंग हैं। इस प्रकार गौड़ देश को गोण्डा ही माना है।
गौडा का समीकरण कनिंघम ने आधुनिक गोण्डा जनपद से किया है-
Uttar Kosala neyare Gonda (Vulgarly Gonda) to the south of the Rapti, and Kosala to the north of the Rapti or rawati as it is universally called Oudh. Some of these names are found in the Puranas. Thus in the Vayu Purana so of Rama is said to have region in Uttarkosala; but in the Matsya, Ling and Kurma Purana, Sraswasti is stated to be in Gauda, these apparent discreoencies are satisfactorily explained when we learn that Guda is only a subdivision of Uttar Kosala, and that the ruins of Srawasti have actually been discovered in the district of Gauda, which is the Gonda of the marks ......Srawasti was the capital of Uttar Kosala or Oudh to the north of the Ghaghra.
प्रसिद्ध विद्वान् आर जी0 भण्डारकर ने भी ‘गोनर्द’ शब्द से गोण्डा शब्द की व्युत्पत्ति सम्भव मानी है-
According to the usual rules of corruption Sanskrit 'rda' (र्द) is in prakrits corrupted to 'dda' (द्द) but some times it is also changed into 'dda' (द्द) and as, hasty pronunciation sometimes elides the a and in the latter stages of the development of prakritis one of two similar consonants is rejected, so Gonarda becomes Gonda.
One such Gauda was the modern Gonda District of Uttar Pradesh in which the celeberated city of Srawasti was situated. It is however possible to think that Gauda as the name of Gonda was a later modification of the older name of the are imitation of the famous land of east India.
One the analogy of the above divisions, the north indian Brahmans were also divided in to five groups under the general name of Gauda. The sabdakalpdrum, S.V.Gauda, quotes the following verse from the Skanda Purana -
सारस्वताः कान्यकुब्जा गौडमैथिलिकोत्कलाः।
पंचगौडा इति ख्याता विंध्यस्योत्तरवासिनः।।
- स्कन्द पुराण
The five classes of the Gauda north India brahmans were thus the Saraswat, Kanyakubj, Gauda, Maithila and Utkala. Although this seems to be a rather arbitrary classification, there is no doubt that the name Gauda has been applied in this case to north India generally.
The application of the name Gauda in the general sense of Aryavartaor north India can also be traced elsewhere in literature, These is a tradition regarding King Bhoj of the Paramara dynesty of Malwa recorded in the following verse.
पंचाशत्पंचवर्षाणि सप्तमासदिनत्रयम्।
पोजराज्येन भोक्तव्यः स गौडो दक्षिणापथः।।
The application of the name Gauda in the general sense of Aryavartaor north India can also be traced elsewhere in literature, These is a tradition regarding King Bhoj of the Paramara dynesty of Malwa recorded in the following verse.
इस प्रकार मेरे मत से गोनर्द का विकासमान रूप गोनर्द > गोनद्ध > गन्द > गोड्डा > गौडा (गौड) > गोण्डा हुआ है। परन्तु आजकल जनपद गोण्डा के अशिक्षित एवं गवाँर लोग इसे गोण्ड़ा भी कहने लगे हैं।
- पूर्व प्रधानाचार्य, जनता इन्टर कालेज, अमदही, गोण्डा (उ0प्र0)
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शोध आलेख
हिन्दी साहित्य में प्रगतिवादी काव्य-चेतना
- डाॅ0 सत्यनारायण पाण्डेय
प्रगतिवादी हिन्दी कविता माक् र्सवादी मानदण्डों के आधार पर प्रस्तुत, प्रगतिशील मान्यताओं से प्रेरित व प्रभावित वह कविता है जो साधारण जन-मानस के दुःख-दर्द के ताने-बाने से निर्मित है। यही इस कविता का सैद्धान्तिक आधार है। साहित्य अनादिकाल से प्रगतिशील ही होता आया है। पर आधुनिक युग तक पहुँचते-पहुँचते वह माक् र्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना कर अपनी स्वस्थ परम्परा में अग्रसर हुआ है। अतः उसकी मान्यताएँ अधिक क्रान्तिकारी एवं सर्वजनहितकारी बन पड़ी हैं। हिन्दी के प्रगतिवादी साहित्य पर देशी-विदेशी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। प्रगतिशील मान्यताओं की स्थापना करने वाले विदेशी लेखकों में प्लेखनेव, काडवेल, फाक्स, गोर्की, थामसन, फास्ट आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
सन् 1917 ई0 की रूसी राज्यक्रान्ति का प्रभाव संसार के सभी साहित्यों पर पड़ा। भारत भी उससे अप्रभावित नहीं रह सका। भारत में एक ओर अंग्रेजों के शासन का आतंक था और दूसरी ओर पूँजीपतियों का शोषण। साथ ही, देश निम्न वर्ग और उच्च वर्ग के अत्याचारों से पिसा जा रहा था। यहाँ का साहित्य इस घटना को वाणी देकर उसे जागृत करने को अग्रसर हो रहा था। राजनैतिक परिस्थितियाँ भी दलित वर्गों के समर्थन और विदेशी शासन को मिटाने को प्रस्तुत थीं। यों तो कविता में सन् 1930 ई0 से ही सामाजिक सम्बन्धों का आग्रह हो रहा था। लगभग इसी समय प्रेमचन्द ने ‘गबन’ की रचना की और देवीदीन के मुँह से मेहनतकश मजदूरों के आशामय भविष्य की ओर संकेत कर नई पीढ़ी के साहित्यकारों के हृदयों में प्रगतिशील साहित्य-सृजन की अटूट प्रेरणाएँ दीं। परिणामस्वरूप एक नवीन काव्यधारा आविर्भूत हुई।
अधिकांश विद्वानों ने सन् 1936 ई0 के वर्ष को ही छायावाद के अन्त और प्रगतिवाद के आरम्भ का वर्ष स्वीकार किया है। पन्त जी ने सन् 1936 में ‘युगान्त’ के द्वारा छायावादी युग की समाप्ति की घोषणा कर युगवाणी स्वर देने का यत्न किया है। इस सम्बन्ध में डाॅ0 नामवर सिंह का कथन है-
“ छायावाद के गर्भ से सन् ’30 के आसपास नवीन सामाजिक चेतना से युक्त जिस साहित्य धारा का जन्म हुआ, उसे ही सन् ’36 में प्रगतिशील साहित्य अथवा प्रगतिवाद की संज्ञा दी गई।” 1
डाॅ0 शिवकुमार मिश्र, प्रो0 प्रकाशचन्द्र गुप्त, डाॅ0 नगेन्द्र आदि विद्वानों एवं समीक्षकों ने भी इसी वर्ष को प्रगतिशील माना है। सन् 1936 ई0 में ही प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी। अतः स्पष्ट है कि हिन्दी साहित्य में प्रगतिवादी आन्दोलन का सूत्रपात सन् 1936 में हुआ और यहीं से उसका विकास द्रुतगति से होने लगा।
सन् 1935 में पेरिस में इंग्लैण्ड और फ्रांस के नवसाहित्यकारों के प्रयत्न से एम0 फास्टर की अध्यक्षता में ‘कांग्रेस आॅफ इन्टैलेक्चुअल्स अगेंस्ट वार एण्ड फासिज्म’ नामक एक परिषद की स्थापना हुई थी। इसका लक्ष्य था युद्धों की विकरालता तथा तज्जन्य विषमताओं से मुक्ति पाना और साहित्य एवं जीवन को एक नई दिशा प्रदान करना। इसी वर्ष इंग्लैण्ड में बसने वाले भारतीय तरुण श्री मुल्कराज आनन्द, सज्जाद जहीर, डाॅ0 के0 एस0 भट्ट, डाॅ0 जी0 सी0 घोष, डाॅ0 एम0 सिन्हा आदि ने इस संघ से प्रेरित होकर लन्दन के नानकिंग रेस्त्रां में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन) की स्थापना की। संघ की स्थापना के पश्चात् इन्होंने एक घोषणापत्र जारी किया जिसमें प्रगतिवादी साहित्य-सृजन का सन्देश निहित था। उसे भारत भेज दिया। इससे प्रभावित होकर अगले ही वर्ष सन् 1936 में भारतीय लेखकों की तरुण पीढ़ी ने प्रेमचन्द की अध्यक्षता में इसका प्रथम अधिवेशन मनाया।
सन् 1936 ही वह वर्ष है जिसमें प्रथम साहित्य व राजनीति दोनों में एक साथ ही साधारण मनुष्य को प्रवेश मिला। दोनों क्षेत्रों में आदर्शवादी भावुकता के स्थान पर यथार्थवादी भौतिकता एवं बौद्धिकता को स्थान मिला। इस प्रकार राष्ट्र और जन-जीवन को नवीन प्रेरणा नई धरती मिली। इस युग में साहित्य ने राजनीति को प्रभावित किया और राजनीति साहित्य को पग-पग पर प्रभावित करने लगी। साहित्य भारतीय जीवन में पैदा होने वाली क्रान्ति को स्वर देने लगा और राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर चलाने में सहायक हुआ।
प्रगतिशील साहित्य ने व्यक्ति के स्थान पर समष्टि को महत्त्व दिया। जनवादी बोध को वाणी प्रदान कर, छायावाद की कलापूर्ण व्यंजना से आगे बढ़ कर उसने समाज के यथार्थ स्वरूप को चित्रित किया। उसके काव्य के अवलम्ब थे--समाज के शोषण-चक्र में पीड़ा से कराहने वाले प्राणी। यही नहीं, जीवन के विविध पक्षों का चित्रण भी इस साहित्य में लक्षित होता है। इसने धर्म की आड़ में होने वाले अत्याचारों का खण्डन किया। इसकी दृष्टि में धर्म, ईश्वर आदि शोषकों के सहायक मात्र हैं--- ऐसी धारणा बलवती हुई। अतः इनका प्रगतिवादियों ने खुल कर विरोध किया। प्रगतिवादियों ने अपने काव्य में शोषितों के प्रति हार्दिक सहानुभूति एवं संवेदना को व्यापक स्थान दिया। उन्होंने मानवतावादी मूल्यों का अनुमोदन किया और उसे बढ़ावा दिया जो साम्प्रदायिकता एवं जातिगत संकीर्णता से सदा दूर ही रहे। साहित्य ने एक ओर शोषितों के प्रति सहानुभूति दर्शाई तो दूसरी ओर शोषकों के समूह उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्ति जगाई।2
जिन प्रगतिवादी कवियों ने प्रगतिवादी साहित्य को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया, उनमें सर्वश्री गयाप्रसाद शुक्ल सनेही का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने ‘त्रिशूल’ उपनाम से भी कविताओं का प्रणयन किया है। उन्होंने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ जन-जागरण का गीत गाया और पूँजीवाद के विनाश और समाजवादी नवनिर्माण के लिए क्रान्ति का सन्देश दिया तथा आर्थिक वैषम्य के चित्रों को उजार कर उनकी दयनीय दशा पर खेद प्रकट किया है। इनके अतिरिक्त देवीदत्त मिश्र, जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’, रामेश्वर करुण, छैलबिहारी दीक्षित कंटक, नरेन्द्र शर्मा, दिनकर आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्होंने अपने काव्य के द्वारा नवजागरण का प्रयास किया। सहजता की दृष्टि से साहित्य में प्रगतिशील चेतना को निम्नलिखित सन्दर्भों में अभिव्यक्त किया गया है-
समाज का यथार्थवादी चित्रण
प्रगतिवादियों ने यह देखा कि समाज के अधिकतर लोग दुःखी हैं, व्यथित हैं, शोषण की आग में जल-जल कर घुले जा रहे हैं। अतः उन्हें समाज के कटु सत्यों के आगे वैभव, विलास, बसन्त की बयार आदि महत्त्वहीन लगे। जीवन में व्याप्त अनाचार, पीड़ितों का हाहाकार, भूख की पुकार आदि ने उन्हें व्यथित कर डाला। समाज के इस शोषित रूप को देख कर उनका मन क्रान्ति से आन्दोलित हो उठा और शोषक वर्ग के हाथों में पड़ कर कष्ट झेलने वाले किसानों एवं श्रमजीवियों के उन्होंने यथार्थ चित्रों को उभारा। मजदूर और किसान समाज के मूलाधार हैं। उनके परिश्रम पर यह समाज फलता-फूलता है। वे ही ईंट, चूना, पत्थरों को जोड़ कर जग का निर्माण करते हैं। वे ही फल, फूल, अन्न उपजा कर मानव को जीने योग्य बनाते हैं। उन्हीं के ऊपर सारा मानव-समाज निर्भर है पर उसी का विकृत रूप समाज में व्याप्त है-
युग-युग का वह भारवाह, आकटि नत मस्तक,
निखिल सभ्य संसार पीठ का उसके स्फोटक।
वज्र मूढ़, जड़ भूत, हठी, वृष बांधव कर्षक,
धु्रव, ममत्व की मूर्ति, ऋढ़ियों का चिर रक्षक।
कर जर्जर, ऋणग्रस्त, स्वल्प पैत्रिक स्मृति भूधन
निखिल दैन्य, दुर्भाग्य, दुरित, दुःख का जो कारण।3
इस प्रकार प्रगतिवादी कवि को अम्बर, धरती, सागर, यहाँ तक कि कण-कण में गान ही गान दिखाई दिए। उनका दृष्टिकोण विशाल हो गया और सबमें उसे जीवन लहराता हुआ दिखाई दिया। इस प्रत्यक्ष जगत् से प्रेरित व अनुप्राणित होकर उसने हास-विलास, सुख-दुःख, कुरुपता, सुन्दरता आदि को अपने काव्य में स्थान दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवन यथार्थ के प्रति असीम प्रेम होने के नाते शिल्प तत्त्व की ओर उन्मुख न होकर यह जनकवि वस्तु पक्ष को ही विशेष महत्त्व देता रहा। इस कारण प्रगतिवादी काव्य में जीवन की विरूपता एवं विद्रूपता को अधिक मात्रा में स्थान मिला। उसकी यथार्थ दृष्टि ने समाज में उपेक्षित घिसे-पिटे दरिद्रों को पहचाना किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उसने जीवन के सुन्दर पक्षों का विस्मरण कर दिया हो। उसका दृष्टिकोण सर्वांगीण था। अतः उसने प्रकृति, प्रेम आदि के बारे में भी बहुत कुछ लिखा है, पर उसमें उसके प्रगतिशील दृष्टिकोण का पग-पग पर परिचय प्राप्त होता है।
सामयिक समस्याओं का चित्रण
प्रगतिवादी काव्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति है सामयिक समस्याओं का चित्रण और अन्याय व शोषण की प्रवृत्ति के विरुद्ध आवाज उठाना। यह कार्य अत्यन्त साहस का है। प्रगतिवादी कवियों ने अपने यथार्थवादी दृष्टिकोण के सहारे सामयिक समस्याओं के प्रति सदा जागरूकता दर्शायी है। ये कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों से कहीं अधिक साहसी हैं। ये अपनी इस साहसपूर्ण स्पष्टवादिता के कारण बदनाम भी हुए हैं। अतीत की अपेक्षा इन्होंने वर्तमान की अर्थात् अपने समग्र को छूने वाली वर्तमान समस्याओं से जूझने का साहसिक कार्य किया है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि उनके काव्य में अतीत और भविष्य का बोध नहीं है।
श्री शमशेर बहादुर सिंह ने अपनी कविता ‘शहीन कहीं हुए हैं’ में सैनिक-विद्रोह के ओजस्वी एवं क्रान्तिकारी स्वरूप को अंकित किया है। यही नहीं, डाॅ0 महेन्द्र भटनागर की कविता ‘नौसैनिक विद्रोह’ में भी नाविकों के दृढ़ विश्वास, अचल देशभक्ति एवं कत्र्तव्योन्मुख त्यागी व्यक्तित्व का चित्रण मिलता है। साम्राज्यवादियों ने इस विद्रोह को दबाने के लिए पुरजोर वकालत की। इस समय अंग्रेजों ने गोलियों से जनता को भून दिया था, पर स्वतंत्रता केे लिए जो आग भड़क उठी थी, भला वह कैसे बुझ सकती थी-
यह साम्राज्यवादी गढ़
विकल हो बौखलाया था
जिसने शक्ति का कण-कण
कुचलने में लगाया था।
लेकिन बुझ न पाई जो
वतन ने आग सुलगाई
बरसों की बढ़ी जिसमें
पुरानी जुड़ गई खाई।।4
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के प्रति असन्तोष
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था आर्थिक वैषम्य पर आधारित है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था शोषण को प्रमुख स्थान दे रही है। अतः प्रगतिवादी कवि इस व्यवस्था से प्रसन्न नहीं हैं। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक व्यवस्था असंतोषजनक थी और स्वतंत्रता के पश्चात् भी निराशाजनक रही। यह देख कर इन कवियों ने पग-पग पर अपना असन्तोष प्रकट किया। यहाँ तक कि विविध रूढ़ियों, रीतियों, अज्ञानता, प्राचीनता के प्रति विशेष लगाव आदि ने सामाजिक व्यवस्था को आक्रान्त कर दिया। ब्रिटिश सरकार की शोषण की नीति ने भारतीय जनता को हर प्रकार से विवश कर दिया। फल यह हुआ कि समाज का मूलाधार नष्ट हो गया। समाज के धनिकवर्ग ही नहीं, धर्माचार्य एवं राजनैतिक नेतागण भी तथाकथित पूँजीवाद के अंग हैं। अपनी स्वार्थपरता के कारण इन सबने समाज में असमानताओं को जन्म देकर प्रगतिशील बनने में कई विघ्न-बाधाओं को उपस्थित किया। परिणाम यह हुआ कि सामाजिक चेतना में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आ सका। प्रगतिवादियों को यह सड़ा-गला, ईष्र्या-द्वेष से पूर्ण असमानताओं से आक्रान्त समाज बहुत ही बुरा लगा और उन्होंने अत्यन्त निर्भीक होकर वर्तमान समाज के प्रति असन्तोष व्यक्त किया जो यथार्थ और प्रभावशाली है।
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय भावना
प्रगतिवाद के अन्तर्गत राष्ट्रीयता का भी समावेश है। राष्ट्र तथा उसकी समस्याओं के प्रति प्रगतिवादी कवि अत्यन्त जागरूक और क्रान्तिकारी विचार-धारा से विलसित थे। इन कवियों ने राष्ट्रीय भावना को विकसित करने के लिए सांस्कृतिक भिन्नताओं एवं रूढ़ि-रीतियों से संघर्ष किया तथा जन-मानस में राष्ट्रीय बोध को प्रतिष्ठित किया। इसमें अन्तरराष्ट्रीय भावनाओं का भी समादर है। डाॅ0 नगेन्द्र ने इनकी राष्ट्रीयता पर विचार करते हुए लिखा है कि - “ प्रगतिवादियों की राष्ट्रीयता साधारण दक्षिण-पक्षीय राष्ट्रीयता से भिन्न है। पराधीनता के उन्मूलन आदि प्रश्नों पर प्रगतिवादी शक्तियों का लक्ष्य भी वही है, जो दक्षिण पक्षीय शक्तियों का है परन्तु इनकी विधि अन्तर है। इनकी विधि पूर्ण क्रान्ति की विधि है जिसका आधार एकान्त भौतिक है। वह अहिंसा आदि आदर्शमय साधनों को कोई मान्यता नहीं देती। इसके अतिरिक्त प्रगतिवाद में राष्ट्र केवल सर्वहारा वर्ग का प्रतीक है। अन्य वर्गों के प्रति उसे सहानुभूति नहीं है। अतएव, इनका राष्ट्रवाद सर्वहारावाद अथवा जनवाद का ही पर्याय है। ” 5
प्रगतिवादी कवि विशेष रूप से रूस की ओर आकृष्ट थे। अतः उन्होंने रूस की प्रशस्ति में अनेक कविताओं का प्रणयन किया है। श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने रूस को ‘नवसंस्कृति का अग्रदूत’, ‘पददलितों की आस’, ‘मानवता का श्वास’, ‘शोषित जनता का स्वर्णिम भोर’ आदि कहा है। मास्को पर जर्मन का आक्रमण हुआ। लाख प्रयत्न किए गए। पर वह अजेय ही रहा। उसकी प्रशंसा में कवि कह उठता है-
चली लाल सेना लहराती
लाल रक्त की धारा।
कौन लड़ेगा ? कौन बढ़ेगा ?
कौन साहसी सूर है ?
दस हफ्ते दस साल बन गए,
मास्को अब भी दूर है। 6
वर्ग चेतना
माक्र्स के अनुसार ‘आदिम समाज-व्यवस्था’ को छोड़ कर अब तक का मानव-समाज का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास ही है। अब तक का यह समाज दो वर्गों में बँटा हुआ है- शोषक और शोषित। इसका कारण पूँजीवाद की शोषण प्रवृत्ति ही है। मैक्सिम गोर्की इसे ‘क्रान्तिकारी सर्वहारा का मानवतावाद’ कहते हैं। पूँजीपति वर्ग ने सामन्ती शासन का अन्त कर उत्पादन शक्तियों का अपूर्व विकास किया और वर्ग-संस्कृति को अनेक कदम आगे बढ़ाया किन्तु यह व्यवसायी संस्कृति ‘अर्थ’ को ही सर्वस्व मानती है। अतः शोषण को प्रश्रय मिला। परिणाम यह हुआ कि समाज दो वर्गों में विभाजित हो गया। एक वर्ग विलासी बना तो दूसरा सर्वस्व खोकर असहाय अवस्था में तड़पता रह गया। इस अन्तर को मिटाने के लिए समाजवादी विचारधारा कटिबद्ध है। समस्त मानवता के लिए प्रगतिवादी कवि शोषितों का पक्ष लेता है और शोषकों को मानवता का दुश्मन समझता है। कवियों ने सभी शोषितों के प्रति सहानुभूति दिखायी है और उनकी लेखनी से करुणा शत-सहस्त्र विधाओं से उमड़ पड़ी है। मानवता के धरातल पर परिवेष्ठित होने के कारण जगह-जगह पर उनकी करूणा और सहानुभूति शोषितों को प्राप्त हुई है। उनकी दृष्टि में यही सर्वहारा वर्ग है। इनके हित की कामना सर्वत्र व्यंजित हुई है।
नूतनता एवं परिवर्तन प्रियता
पिछले युग के मृत आदर्शों और जीर्ण रूढ़ि-रीतियों को समाप्त करके प्रगतिवादी कवि नूतन और शोषण-मुक्त समाज की स्थापना का प्रबल आकांक्षी है अर्थात् वह परिवर्तन की अभिलाषा रखता है। परिवर्तन सभी क्षेत्रों में हो, यही उसकी कामना है क्योंकि जहाँ परिवर्तन के लिए राह है, वहीं प्रगति सम्भव है। भारत में अशिक्षितों के आधिक्य के कारण रूढ़ि-रीतियों, अन्धविश्वास, सड़ी-गली मान्यताओं का बोलबाला है। इनसे आक्रान्त जनता का कल्याण असंभव है। अतः परिवर्तन आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इस परिवर्तन से प्राचीन अस्वस्थ परम्परा मिट जाएगी और उसके स्थान पर नवीन युग का उदय होगा। यह ऐसा युग होगा जिसमें रूढ़ि-रीति, एवं पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं का अन्त हो जाएगा। अब तक का समाज वर्गों में विभाजित है। यह पूँजीवादी ही हैं जिन्होंने शोषण को प्रमुख स्थान दिया गया है। असमानता सर्वत्र विराजमान रही है। अतः कवि इस सामाजिक व्यवस्था को मिटा कर वर्गहीन समाज को स्थापित करने को आतुर है। वह अब अनुचित ताड़न और रीति-नीतियों के निर्मम शासन के आगे नतमस्तक होने को प्रस्तुत नहीं है। प्रगतिवादी कवि के अनुसार भावी समाज का स्वरूप कुछ और ही होगा। निराला ने कहा-
आज अमीरों की हवेली
किसानों की होगी पाठशाला
धोबी, पासी, चमार, तेली
खोलेंगे अँधेरे का ताला
एक पाठ पढ़ेंगे टाट बिछाओ।
ईश्वर एवं धर्म के प्रति क्षोभ की भावना
प्रगतिवादी काव्य-साहित्य मनुष्य से परे किसी शक्ति में विश्वास नहीं रखता। वे ईश्वर को सृष्टिकत्र्ता के रूप में स्वीकार न करके द्वन्द्व को सृष्टि के विकास का कारण मानते हैं। उन्हें परलोक, स्वर्ग, नरक, आत्मा, भाग्यवाद, नियति, धर्म पर किंचित् भी विश्वास नहीं है। मानव की महत्ता ही उनकी दृष्टि में सर्वोपरि है। ब्रह्म कोई और नहीं, सामाजिक चेतनता का ही दूसरा नाम है। धर्म उनके लिए अफीम का नशा तथा प्रारब्ध एक प्रवंचना है। अतः ये कवि ईश्वर, धर्म, स्वर्ग-अपवर्ग आदि को शोषण का केन्द्र मानते हैं। प्रगतिवादी कवि की ईश्वर के प्रति अनास्था का कारण बुद्धिजीवी दृष्टिकोण भी है। वर्तमान विषम व्यवस्था को देख कर उनका मन क्रोध से भर जाता है और वह ईश्वर के अस्तित्व पर अविश्वास करने लगता है। उसे केवल मनुष्य के सर्वाधिक शक्तिशाली स्वरूप पर विश्वास है। पन्त ने मानव को भूदेव की संज्ञा से अभिहित किया तो निराला ने साक्षात् ब्रह्म ही कहा। कवि केदारनाथ अग्रवाल ने मनुष्य को संघर्ष के द्वारा रोटी प्राप्त करने की प्रेरणा दी। साथ ही उनके भाग्यवादी स्वरूप की भर्त्सना की-
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा। 8
नारी तथा प्रकृति के प्रति नवीन दृष्टिकोण
प्रगतिवादी कवि भौतिकवादी है। उसने नारी के सामाजिक, व्यक्तित्व का मूल्यांकन मानवीय धरातल पर किया है। नारी उनके लिए माया या पथ-बाधा नहीं है। वह पुरुष की चिरसंगिनी एवं सहगामिनी के रूप में अवतरित हुई है। वह अब अबला नहीं रही और न ही अप्सरा। वह यथार्थ और सामाजिक धरातल पर विचरण करने लगी है। प्रगतिवादी कवियों ने चिर शोषित एवं दमित नारी के उत्थान के लिए प्रयास किया। पंत जी ने नारी को देवि, माँ, सहचरी, प्राण कह कर उसके उदात्त रूप की अभिव्यंजना की। नारी की मुक्ति की स्थान-स्थान पर उद्घोष्णा की। उसके मानवी स्वरूप की सराहना की। पंत ने वर्तमान नारी का वित्रण करते हुए कहा-
हाय ! मानवी रही न नारी, लज्जा से अवगुण्ठित
वह नर की लालसा-प्रतिमा, शोभा-सज्जा से निर्मित
युग-युग की बन्दिनी देह की कारा में निज सीमित
वह अदृश्य अस्पृश्य विश्व की गृह-पशु सी जीवित।9
आशा और आस्था
प्रगतिवादी कवि की सबसे बड़ी विशेषता जीवन के प्रति उसकी अचल आस्था है। उसका मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रति दृढ़ विश्वास है। वह मनुष्य के भविष्य से निराश नहीं है। वह संघर्ष करता है, ध्वंस का आह्नान करता है। वह संगठित होकर समाज की रूढ़ि-रीतियों के शोषण की प्रक्रिया को समाप्त करना चाहता है। पर इसके पीछे उसका संत्रास, कुण्ठा, निराशा आदि न होकर नवनिर्माण की, समता से परिपूर्ण कल्याणकारी सामाजिक व्यवस्था की प्रबल आकांक्षा है। वह अपने दुःख के लिए आँसू नहीं बहाता, बल्कि समस्त समाज को सुख पहुँचाने के लिए आकुल है। मानवता की भावभित्ति पर आधृत होने के कारण प्रगतिवादी कवि मानवता के पथ को कंटक रहित प्रगतिशील और मंगलमयी बनाना चाहता है। इस प्रकार वह समाज के भविष्य केे प्रति अधिक आश्वस्त है। वह अमर पथिक परिवर्तन का विश्वासी जीवन का अधिकारी एवं अमरता का स्वामी है। वह जीवन-संघर्ष से भागना अपमान समझता है और चिर संघर्ष के जिए सदा सन्नद्ध रहता है।
अतः प्रगतिवादी कविता काव्ययुगीन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप कुण्ठित, जड़, वायवी हो जाने वाले वातावरण की सहज परिणति है। इसने व्यक्ति के स्थान पर समाज-कल्याण, निराशा के स्थान पर आस्था, विश्वास, उत्साह, स्वस्थ प्रेम की दिशा में साहित्य को अग्रसर किया। उसने हिन्दी कविता को जो प्रशस्त पथ दिया, कर्मण्य मार्ग का अनुसरण कराया तथा जीवन्त चेतना प्रदान की वह सर्वथा प्रशंसनीय एवं विकासोन्मुख है।
सन्दर्भ ग्रन्थ-
1, 5. आधुनिक हिन्दी साहित्य की प्रवृत्तियाँ: डाॅ0 नामवर सिंह, पृ0 50; प्रगतिवाद, पृ0 103
2. मुद्दुकृष्णा: तेलुगुतल्ली - अप्रैल, 1945 पृ0 28
3. युगवाणी: पन्त, पृ0 51
4. बदलता युग, पृ0 16
6. प्रलय-सृजन, पृ0 63
7. वेला: वहीं, पृ0 78
8. हंस, फरवरी, 1951, पृ0 11
9. नारी:युगवाणी, पृ0 84
- प्राचार्य, भभूति प्रसाद स्मारक महाविद्यालय, धारा रोड, परिक्रमा मार्ग, फैजाबाद
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साक्षात्कार-सुमनों का गुलदस्ता :
21 वीं सदी में साहित्य, संस्कृति और समाज
- साधु शरण वर्मा ‘सरन’
विश्व की प्राचीन भाषाओं में हमारी संस्कृत भाषा भी है जिससे अनेक भाषाएँ निकलती हैं। हमारी साहित्य-परम्परा सनातनी है और आज भी गतिमान है। उदाहरण के लिए हिन्दी को ही लें। यह आज इतनी समृद्ध हो गई है कि अब विदेशों में भी आकर्षण का केन्द्र बन गई है। हिन्दी साहित्य ने अब विश्व की कई भाषाओं में अनूदित होकर अपना वर्चस्व स्थापित किया है। हिन्दी में काव्य विधाओं की भाँति ही गद्य की विधाएँ भी विस्तार पा रही हैं। गद्य अब जीवनियों, उपन्यासों, कहानियों और कथाओं तक ही सीमित नहीं रह गया है। उदाहरण के लिए डाॅ0 मृदुला झा का एक अभिनव प्रयोग हिन्दी जगत् में हलचल मचा रहा है। साक्षात्कार का यह अभिनव प्रयोग निश्चित रूप से हमारी संस्कृति, समाज और साहित्य को नए मोड़ पर लाकर ‘मेट्रो’ का रूप प्रदान करेगा। इस कृति में अनेक महान् विभूतियों का साक्षात्कार हमारी हिन्दी भाषा और परम्परा को और अधिक समृद्ध करेगा। हिन्दी जगत् में साक्षात्कार अपने में एक उपयोगी एवं लोकप्रिय विधा बन गई है। उसमें सोने में सुहागा करती है यह कृति। साक्षात्कार में विद्वान् लेखक अपने जीवन और समाज तथा संस्कृति के उन तमाम पहलुओं को उजागर करता है जिन्हें वह न तो खुल कर साहित्य में प्रयोग कर पाता है और न ही उसकी आवश्यकता को व्यक्त कर पाता है। जीवन के अनेक वैयक्तिक प्रसंग जो समाज के सामने नहीं आ पाते किन्तु समाज के लिए उपयोगी होते हैं, साक्षात्कार में वे कमल की भाँति विकसित होकर अपनी सुगन्ध सब ओर बिखेरते हैं। बचपन, युवा और वृद्धावस्था के अनेक अनुभव-सुमन जो बिना खिले मुरझा जाते हैं, वे साक्षात्कार में ही खिलते हैं और समाज के मेरुदण्ड बन जाते हैं। पहले लेखक या रचनाकार न तो अपना नाम उजागर करता था, न ही अपने निवास का पता देता था, सब गोपनीय रहता था। अब वह परम्परा लुप्त हो गई है। अब वह स्वयं सबकुछ लिखता है और बचा-खुचा साक्षात्कार में आ जाता है। आने वाले समय में 21वीं सदी का साहित्यिक इतिहास पढ़ते समय कम से कम यह समस्या नहीं रहेगी क्योंकि साक्षात्कार पर आधारित साहित्य का महत्त्वपूर्ण सृजन हो रहा है।
ऐसे महत्त्वपूर्ण सृजन की ही एक कड़ी प्रस्तुत कृति ‘21 वीं सदी में साहित्य, संस्कृति और समाज’ एक ऐसे व्यक्तित्व डाॅ0 मृदुला झा के हाथों सृजित हुई है जो अपने आप में एक महान् साहित्यिक संस्था हैं, जिन्होंने बिहार की विद्वत्त परम्परा को पुनर्जीवित तथा संरक्षित करते हुए बाबू राजेन्द्र प्रसाद की तरह बिहार का नाम रोशन किया है। शिक्षाजगत् की ऊँची उड़ान में विश्वविख्यात हैं वे। अनेक देशों उज्बेकिस्तान, वियतनाम, कम्बोडिया, थाइलैण्ड, मारीशस, श्रीलंका, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस तथा जर्मनी की साहित्यिक यात्राएँ इनके जीवन की उत्कर्ष-गाथा कहती हैं। काव्य और कहानी-संग्रहों, यात्रा-प्रसंगों, गजल-संग्रहों से सुशोभित इनकी लेखनी इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुकी है। प्रस्तुत कृति भी एक ऐसा ही दुर्लभ कार्य है जो डाॅ0 मृदुला झा के अथक परिश्रम, लगन और साहित्य सेवा का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसमें पहले हर साहित्यकार का परिचय दिया गया है, बाद में साक्षात्कार का विवरण अंकित किया गया है।
कृति का आरम्भ वयोवृद्ध साहित्यकार डाॅ0 कौशलेन्द्र पाण्डेय के साक्षात्कार से किया गया है। अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी डाॅ0 पाण्डेय का आकाशवाणी एवं दूरदर्शन ऋणी हैं। डाॅ0 पाण्डेय ने श्रेष्ठ कृतियों की झड़ी लगा दी है। वह व्यक्ति जो आगन्तुक को अपने हाथ से चम्मच लेकर खिलाता हो, वह कितना विनम्र और स्नेह से भरा होगा, अनुमान लगान सहज है। डाॅ0 पाण्डेय ऐसे ही स्नेही व्यक्ति हैं और उतने ही बड़े रचनाधर्मी लेखक भी विभिन्न स्तरीय संस्थाओं से प्रदत्त सम्मानों का अम्बार लगा है। डाॅ0 मृदुला झा ने इनसे बड़े़ ही विचित्र सवाल किए हैं लेकिन उनका उत्तर उनसे भी अधिक रुचिकर हैं। प्रश्न साहित्य, संस्कृति और समाज पर चैतरफा पूछे गए हैं जिनका विस्तृत उल्लेख संभव नहीं है। एक प्रश्न के उत्तर में वे कहते हैं- “ कथा-सरिता में मैंने धर्म, जाति और भाषाओं के शब्दों से मज्जन कराया है। उनकी चूनर में मैंने देश के अधिकाधिक लोगों द्वारा बोले जाने वाले शब्दों के सल्में-सितारे टाँके हैं।......‘श्यामली’ में उर्दू के सम्मिश्रण से स्थान-स्थान पर अभिव्यक्ति जायकेदार हुई है। नारी पात्रों के गर्म संवाद और बिन्दास बोल सृजन कला में विख्यात हैं। ईश्वर ने अवसर दिया तो फिर कभी ऐसी ही चर्चा में समय का सदुपयोग करेंगे। ”
‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो’--जैसे गीतों के जनक डाॅ0 बुद्धिनाथ मिश्रा ऐसे विद्वान् हैं जो अपने परिश्रम और लगन के बल पर विश्व भर में छाए हैं। वे अनेक कृतियों के प्रणेता, साहित्य की अनेक विधाओं के सर्जक तथा अनेक उपाधियों एवं सम्मानों से विभूषित हैं। इनसे साहित्यिक, विशेष रूप से काव्य के सम्बन्ध में 24 ज्वलन्त प्रश्न पूछे गए हैं। इनका उत्तर पठनीय एवं मनन-योग्य है।
इसी क्रम में अग्रिम विद्वान् डाॅ0 शिववंश पाण्डेय के सम्बन्ध में अधिक न कह कर केवल इतना कहना ही पर्याप्त है कि प्रस्तुत कृति की भूमिका के रूप में ‘मेरे वात्र्ताओं का एक दर्शनीय गुलदस्ता’ उनका लेखन ही पढ़ना पर्याप्त है। इनसे भी बड़े गम्भीर एवं चुनौती भरे प्रश्नों की झड़ी लगाई गई है। उनका उत्तर भी उन्होंने बड़ी ही विद्वत्तापूर्ण शैली में कलात्मकता से सजा कर दिया है। इनमें नए-नए साहित्यिक तथ्यों का समावेश है। इनसे किए गए एक प्रश्न का ही मैं उल्लेख करना चाहूँगा-
प्रश्न : “ साहित्य में सौन्दर्य, शृंगार और संवेदना पर आपकी क्या राय है। क्या साहित्य को शृंगार-विहीन होना चाहिए ? ”
उत्तर- “ सौन्दर्य, शृंगार और संवेदना तो साहित्य के प्रेरक तत्त्व रहे हैं ..... क्रौंच-वध की करुणा परिस्थिति से उत्पन्न संवेदना ही आदि-कवि के काव्य की प्रेरणा बनी है।....स्थूल सौन्दर्य जहाँ कर्मेन्द्रियों को कर्म में प्रवृत्त करने का कारण बनता है, वहीं सूक्ष्म सौन्दर्य उज्ज्वल वरदान की चेतना का आलम्बन बनता है। प्रसाद जी के शब्दों में- ‘उज्ज्वल वरदान चेतना का सौन्दर्य जिसे सब कहते हैं, जिसमें असंख्य अभिलाषाओं के सपने जगते रहते हैं। ”
कृति में एक ऐसी विचित्र प्रतिभा के धनी साहित्यकार का साक्षात्कार भी लिया गया है जो पेड़-पौधों से बातें करते हैं और उनके वे पेड़-पौधे आपस में भी बातें करते हैं। वे समस्त मानवीय कार्य मिल कर करते हैं। ऐसे एकमात्र विद्वान् साहित्यकार हैं डाॅ0 महेन्द्रप्रताप सिंह जो वन-विभाग में एक उच्च पद पर आसीन अधिकारी हैं। जब वह सातवीं कक्षा के विद्यार्थी थे, उस समय उन्होंने गीता का अनुवाद पद्य में किया था। डाॅ0 सिंह को साहित्य के साथ प्रकृति और पर्यावरण, हरी-भरी धरती, जंगल तथा पर्वतों से बड़ा लगाव है। इनकी लिखी पुस्तकों में ‘गाँधी और कृष्ण’, ‘गीता और कबीर’, ‘नारी’, ‘जिजीविषा’, ‘प्रेम-पथ’, ‘नारद की भू-यात्रा’, ‘अभिव्यक्ति’, ‘मानस में प्रकृति विषयक सन्दर्भ, ‘वन और मन’, ‘प्रायश्चित’, ‘तुलसी की अन्तर्दृष्टि’, ’भारत के संरक्षित वन-क्षेत्र’, ‘पांचाली’ तथा ‘भारतीय वन उपज’ के रूप में प्रकाशित हैं। इन 14 कृतियों के अतिरिक्त वाल्मीकि का दृष्टिकोण लेकर पर्यावरण सम्बन्धी लगभग पाँच कृतियाँ अप्रकाशित हैं। इनसे प्रश्न किया गया- “ आपकी सभी कृतियाँ पर्यावरण पर आधारित हैं। ऐसा क्यों ? ”
उत्तर- “ प्रदूषण दूर करने हेतु प्रयास आवश्यक है। अन्य माध्यमों के साथ साहित्य भी इस विषय पर अच्छा कार्य कर सकता है। .....‘प्रायश्चित’ उपन्यास में पर्यावरण-संरक्षण के प्रति समाज के सभी वर्गों के मनोभावों को रेखांकित किया गया है।......पीपल इस उपन्यास का महानायक है। ”
प्रश्न- “ जिस प्रकार से दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श पर लेख लिखे जा रहे हैं, क्या पर्यावरण-विमर्श भी हिन्दी-साहित्य का विषय हो सकता है ? ”
उत्तर- “ आज के युग की प्रमुख समस्या पर्यावरण-प्रदूषण से समाज के साथ-साथ साहित्यकार को भी जूझना ही पड़ेगा।...पर्यावरण-विमर्श को हिन्दी साहित्य का मुख्य विषय बनाना ही होगा। ”
प्रस्तुत कृति में ‘भोर अंजोर के नहाइल’ के रचयिता डाॅ0 किशोरीशरण शर्मा, डाॅ0 भरत मिश्र प्राची व श्री रामनिवास पाण्डेय के अतिरिक्त अन्य जिन साहित्यकारों का साक्षात्कार है, वे हैं-
श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक, डाक सेवा) लेखन को साहित्य के प्रचार-प्रसार का माध्यम मानते हैं।
डाॅ0 दीनानाथ सिंह अनेक ग्रन्थों के प्रणेता हैं जिनके बारे में भूमिका में लेखक का कथन है कि तपस्या से ही साहित्यिक साधना होती है।
डाॅ0 खगेन्द्र ठाकुर पत्रकारिता और साहित्य को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं।
श्री अशोक अंजुम हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर है।
कृति में अनेक महिला साहित्यकारों के भी साक्षात्कार हैं। इनमें प्रमुख हैं सुधा सिन्हा जिनका परिचय और वात्र्ता सँजोई गई है। उपन्यास, नोबल साहित्य, अनुवाद साहित्य के साथ 500 से अधिक कहानियाँ व संग्रहों में उनका रचना-संसार समाया है। वे कहती हैं- “ समय कोई अव्यय नहीं है कि उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 10-10 वर्षों का आकलन करें तो पाएंगे कि किस तरह सभी मुकामों पर स्त्री-पुरुष के बीच अन्तर थमता जा रहा है। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है .....। ”
सुधा सिन्हा जी से पूछा गया एक प्रश्न देखें-
“ क्या आप मानती हैं कि उपभोक्ता संस्कृति का सबसे अधिक प्रभाव नारी के व्यक्तित्व और अस्मिता पर पड़ रहा है ? ”
उत्तर - “.....उपभोक्ता संस्कृति सर्वभक्षी दैत्य है। इसके प्रभाव से कोई अछूता नहीं है। संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ और सुन्दर है, उसे भोग के स्तर तक गिराना इस अपसंस्कृति का पहला एजेण्डा है। नारी का सौन्दर्य, उसकी कोमलता, उसकी सहनशीलता सबको बाजार में ‘सेलेबल आइटम’ बनाने का काम अश्लीलता की हदें पार करता जा रहा है। लेकिन यहाँ भी स्त्री के साथ पुरुष को भी अपनी सीमा खोते देखा जा सकता है। चड्ढी का विज्ञापन करने वाला हट्टा-कट्टा लड़का लगभग नंगा खड़ा होता है तो क्या वह किसी निर्वस्त्र स्त्री से कम भोंडा लगता है ?”
अन्य साक्षात्कार-प्रदाता महिला साहित्यकार हैं-
डाॅ0 मिथिलेश कुमारी, श्रीमती आकांक्षा यादव अपने को दुर्गा, लक्ष्मी एवं भवानी मानने वाली रचनाकार हैं। डाॅ0 उषा किरण जो स्त्रीवादी रचनाकार हैं। डाॅ0 अमिता दुबे स्वान्तःसुखाय के स्थान पर सर्वान्तःसुखाय की प्रतिनिधि रचनाकार हैं। कथा में स्थान बना लेने वाली मालती जोशी कहानियों में बोल्डनेस की पक्षधर हैं। डाॅ0 अहिल्या भी महिलावादी हैं। उनकी दृष्टि में महिला ही समाज की सुदृढ़ नींव है। नारी-जीवन की वैयक्तिक भावनाओं की गहरी पैठ नारी साहित्यकार को ही सरलता और सबलता से होती है। उन्हें ही साहित्य को पगदण्डी से राजपथ पर ले जाने का श्रेय जाता है। इस दृष्टि से सभी महिला साहित्यकारों का साक्षात्कार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। डाॅ0 मृदुला झा का समीक्ष्य कृति में किया गया परिश्रम भारतीय साहित्य, संस्कृति और समाज के लिए एक राजपथ के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा। साक्षात्कारों पर आधारित इस कृति के माध्यम से इन्होंने समाज को एक नया उपहार प्रदान किया है।
- लखनऊ (उ0 प्र0) दूरभाष : 9450400792, 9389297770
समीक्ष्य कृति : 21 वीं सदी में साहित्य, संस्कृति और समाज
कृतिकार : डाॅ0 मृदुला झा
संस्करण : 2015
प्रकाशक : वातायन (पटना, बिहार)