ख्यात समीक्षक डॉ0 विजय कुमार तिवारी (उड़ीसा) के ई-मेल पोस्ट से -
शोध-चिंतन का महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’
-विजय कुमार तिवारी
राम की जन्मभूमि अयोध्या में रह रहे हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध व वरिष्ठ रचनाकार, कृतिकार विजय रंजन जी एक सुपरिचित हस्ताक्षर है। मेरा कोई सौभाग्य जागा था, विगत वर्ष अयोध्या रामलला के दर्शन के क्रम में उनसे मिलने का सुअवसर मिला। उनकी पुस्तकों से भरी अलमारियाँ, उनका सहज शान्त व्यक्तित्व, मेरे प्रति उनका स्नेह भाव आदि से अभिभूत होकर लौटा था। उस समय उन्होंने मुझे अपनी अनेक पुस्तकें प्रदान की थीं और अभी-अभी उनकी नवीनतम प्रकाशित पुस्तक ''आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान'' प्राप्त हुई है। विषय सामयिक और आकर्षित करने वाला है, मैंने इसे पढ़ना शुरु कर दिया है। अपनी तरह का यह उनका अद्भुत चिन्तन है और उन्होंने आदि-कवि वाल्मीकि के गहन सृजन से बहुत कुछ निकालने और अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इसमें उनकी गहन दृष्टि देखी जा सकती है,उनका शोध व निष्कर्ष समझा जा सकता है और इसी बहाने बहुत कुछ सीखा-समझा जा सकता है। जहां तक समझ पाया हूँ, वह शोधपूर्ण गहन चिंतन करते हैं, विषय की तह तक जाते हैं और अपने निष्कर्षों के आधार पर सृजन करते हैं। व्यवसाय की दृष्टि से वह विधिवेत्ता हैं और साहित्य लेखन के साथ-साथ साहित्यिक पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ का लंबे समय से संपादन कर रहे हैं। इस तरह उनका बहुआयामी व्यक्तित्व प्रभावित करने वाला है।
इस महत्वपूर्ण कृति के शुरु में ही अपनी 'शुभाशंसा' में कानपुर के बद्रीनारायण तिवारी लिखते है-''पाण्डुलिपि को आद्योपान्त पढ़ने के बाद अनुभव हुआ कि श्री रंजन ने जिस विद्वतापूर्ण ढंग से वाल्मीकि-रामायण के विविध आयामों पर अपनी कलम चलाई है, उससे वाल्मीकीय कृति की महत्ता में अभिवृद्धि होती है।'' उन्होंने आगे लिखा है कि श्री विजय रंजन की प्रस्तुत कृति में वाल्मीकीय रामायण के अनेक पक्षों का गम्भीर विवेचन है। इन पक्षों पर अभी तक किसी अन्य साहित्यज्ञ का ध्यान नहीं गया है और उनके शीर्षक अनूठे और अछूते हैं। इसी संदर्भ में डा० प्रभाकर मिश्र जी की इन पंक्तियों को समझने की जरुरत है, उन्होंने अपने 'दो शब्द' में लिखा है-''इस कृति में श्री रंजन ने आदि-कवि वाल्मीकि की 'रामायणम्' में साक्षात् किए गए विविध साहित्यिक प्रत्ययों की नए सिरे से सारवान् विवेचना की है। इन साहित्यिक प्रत्ययों को पाश्चात्य साहित्यकारों ने बिम्बवाद, लोकवाद, मानववाद, नारीवाद, प्रकृतिवाद आदि का नाम देकर पाश्चात्य अवदान बताया है। परन्तु प्रस्तुत कृति में श्री रंजन ने संदर्भगत प्रत्ययों का सुसंगत,तथ्यसम्मत स्वरुप में सोदाहरण तर्क प्रस्तुत करके आदि-कवि वाल्मीकि को इनका आविश्य प्रथम प्रयुक्तकर्त्ता सिद्ध किया है।‘’ अपने 'पुरोवाक्' में डा० हेमराज मीणा सम्पूर्ण साहित्य जगत का ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखते हैं-''श्री रंजन की सभी कृतियाँ अपने विषय में मील का पत्थर हैं, परन्तु दुर्भाग्य से उच्चतर शिक्षा से जुड़े साहित्य-अध्येताओं ने संभवतः अपने आन्तरिक अहम के कारण इनकी ओर उचित रुप से ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने उनके सुतार्किक तथ्यान्वेषण के अनुसार महर्षि वाल्मीकि को अनेक विशिष्ट साहित्यिक वादों(मानववाद, लोकवाद, बिम्बवाद, प्रकृतिवाद, नारीवाद) आदि का सफल रूपांकन करने वाले प्रथम प्रयोक्ता कवि माना है। श्री रंजन ने महत् श्रम करके इन अधुना साहित्यिक वादों को वाल्मीकीय रामायण में ढू़ँढ निकाला है।‘’
श्री विजय रंजन जी ने अपने लेख ''पुरावृत्ति और विवृत्ति'' में वाल्मीकि रामायण को विविध आयामी अप्रतिम महाकाव्यात्मक ग्रंथ कहा है जो भारतीय संस्कृति,भारतीय संस्कार और भारतीय जीवन-मूल्यों को श्रेष्ठतम स्वरुप में साक्षात कराता है। अपने अनेक अन्वेषणात्मक आधारों पर इस ग्रंथ की विवेचना करते हुए उन्होंने इसे सनातन काव्यबीज या शाश्वत बीजकाव्य माना है। अपने अद्भुत शोधों, गहन अध्ययन-चिंतन के आधार पर उनका कहना है कि वाल्मीकीय कृति ने बाद के सभी रचनाकारों के लिए रामकथा सृजन-लेखन का आधार तैयार किया। इसीलिए महा-कवि वाल्मीकि सभी के लिए प्रणम्य और आदि-कवि के रुप में सर्व-पूजित हैं। श्री विजय रंजन जी का संस्कृत-निष्ठ शब्द भंडार,अद्भुत शोधात्मक-वर्णनात्मक शैली और उनका भक्ति-पूर्ण गहन ज्ञान चमत्कृत करने वाला है। उन्होंने वाल्मीकि को आदि-कवि नहीं,बल्कि आदि-महाकवि स्वीकार किया है। इस कृति में उतरने से पहले पाठकों को उनकी भूमिका स्वरुप इस लेख को खूब ध्यान से पढ़ना, समझना चाहिए।
श्री विजय रंजन जी की यह भूमिका व्याध वाल्मीकि से तपादि के बल पर महर्षि वाल्मीकि और ब्रह्म-स्वरुप वाल्मीकि के रुपान्तरण की कथा बताती है। उन्होंने तत्कालीन समाज का विस्तार से वर्णन, राम का चरित्र चित्रण और लोकहितवादी नैतिकता की व्याख्या की है। उन्होंने वाल्मीकि कृत ग्रंथ के कतिपय सत्वशील, ऋत्शील,नयशील, शिवशील,नैतिकताशील आदि सभी व्यवहृतियों पर प्रकाश डाला है। हर कोई उनके इस शोधपूर्ण अनुशीलन से चकित-चमत्कृत तो होगा ही, देश व दुनिया भर में रचे गए नाना ग्रंथों के उनके गहन अध्ययन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उन्होंने खोज-खोजकर तद्विषयक पुस्तकों का संग्रह किया, उन्हें पढ़ा और अपनी इस पुस्तक के लिए दिव्य व गूढ़ विषय सामग्री एकत्र की। इसमें उनकी लगन,श्रद्धा और उनका श्रम दिखाई देता है। उन्होंने इस ग्रंथ के लिए अपनी रचना-प्रक्रिया,भाव-चिन्तन आदि का विवृत्ति के रुप में विशद उल्लेख किया है। जिस तरह महर्षि वाल्मीकि अपनी महान कृति के लिए प्रणम्य हैं,उसी तरह अपने इस शोध ग्रंथ के लिए श्री विजय रंजन जी को मैं नमन करता हूँ।
श्री विजय रंजन जी ने अपने इस विशद ग्रंथ को पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक व दो परिशिष्टों के रुप में विस्तार दिया है, उत्तरार्चिक प्रखण्ड में उन्होंने अपने शोध के दसों अवदानों को समेटा है और परिशिष्ट-1 में दो महत्वपूर्ण लेख समाहित हुए हैं। पूर्वार्चिक में उनके लेख का शीर्षक 'रामायणम्' की विषय-प्रवृत्ति' इस अर्थ में महत्वपूर्ण है,उन्होंने इसके अन्तर्गत अपने शोध व निष्कर्षों का आधार प्रदर्शित किया है। सुखद व शुभ पक्ष इस ग्रंथ का यह भी है कि रचनाकार ने अपनी कृति को आदि-महाकवि वाल्मीकि को ही समर्पित किया है। लेख के शुरु में लिखित उनकी पंक्तियाँ स्वतः संकेत करती हैं कि प्रयोज्य विषय व उद्देश्य क्या है- ''वाल्मीकि-कृत 'रामायणम्' विविध ज्ञान-विज्ञान, सांस्कृतिक निदेशन, सांस्कृतिक-सामाजिक उत्थान के उच्छल प्रयास तथा इतिहास, राजनीति, धर्म, सदाचार आदि के व्यावहारिक ज्ञान के साक्षात्कार का अप्रतिम ग्रंथ है। इसमें ये सभी अवयव सुष्ठु स्वरुप में रामकथा के माध्यम से सहयुजित हैं।''
उनके विषय चिन्तन को देखकर कोई भी चमत्कृत हो सकता है, मैं भी भावुक हो रहा हूँ, उनके विशद चिन्तन को देखकर, उनकी लेखन शैली,उनका संस्कृतनिष्ठ शब्द सामर्थ्य और ग्रंथ की विशद रुपरेखा का विस्तारित स्वरुप पढ़कर। उन्होंने अपने सृजन का उद्देश्य बताते हुए स्वयं स्पष्ट किया है-''अतएव, वांछनीय है यह देखना कि आलोच्य ग्रंथ की विषय-प्रवृत्ति और तद्गत वाच्यार्थ एवम् प्रतीयमान अर्थ तथा ग्रंथ का महाकथन क्या है?'' उनकी इन पंक्तियों को समझने की आवश्यकता है-''कृति में 'करणीय कर्म के सम्यक आरेखन' वाला धर्म भरपूर रखांकित है। रामायणम् में कृति नायक (महानायक)राम 'विग्रहवान धर्म' और 'सत्य धर्म' के साक्षात् स्वरुप में चित्रांकित है। ऐतिहासिक इतिवृत्ति भी एक नहीं,अनेक आख्यान-उपाख्यानों के रुप में रुपायित है इसमें। राष्ट्रवाद, राजनीति, समाजशास्त्र, आचार-शास्त्र, संस्कार, संस्कृति आदि का सारवान विवेचन भी भरपूर है इसमें।'' आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि इस ग्रंथ में आधुनिक विज्ञान की सभी शाखाएं विशिष्ट ज्ञान के रुप में उपलब्ध हैं।
विषय-प्रवृत्ति के अन्तर्गत विजय रंजन जी ने स्पष्ट किया है-'रामायणम् धर्मग्रंथ मात्र नहीं' है। धर्म की महत्ता रुपायित करते हुए नीति वाक्य लिखा है-''धर्मादर्थः प्रभवति, धर्मात् प्रभवते सुखम्,धर्मेण लभते सर्वम्, धर्म सारमिदम् जगत्।'' साथ ही यह भी कहा है-‘’राम धर्म के साक्षात् विग्रह स्वरुप हैं व सनातनी धर्म पुरुष हैं।‘’ उन्होंने रामायणम् को इतिहास ग्रंथ भी नहीं माना है और न नाराशंसी काव्य-ग्रंथ। इस कृति के नायक राम कोई ‘दैवीय’ नहीं हैं, बल्कि राजा दशरथ और कौशल्या के पुत्र हैं और मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं। उनके लिए रामायणम् राजनीति का ग्रंथ भी नहीं है,न समाजशास्त्र का,न मनोविज्ञान का और न विविध विज्ञानों का ग्रंथ है। उन्होंने इसे आदि-महाकाव्य ग्रंथ कहा है। ऐसा नहीं है कि विजय रंजन जी ने यूँ ही कुछ भी लिख दिया है, बल्कि विस्तार से नाना तर्कों,उद्धरणों व अपनी स्थापनाओं के आधार पर अपने वक्तव्यों व विचारों को प्रमाणित किया है। ऐसा विषय विवेचन और विषय-सागर में गहन अवतरण बिरले देखा जा सकता है। उन्होंने जिस तरह से अपने चिन्तन का प्रतिपादन किया है और गूढ़ तत्वों को खोज निकाला है, हिन्दी साहित्य के लिए किसी धरोहर से कम नहीं है।
अगला खण्ड 'उत्तरार्चिक' इस ग्रंथ के मूल की विवेचना के रुप में प्रतिपादित हुआ है जिसे उन्होंने 10 अप्रतिम अवदानों की श्रेणी में रखते हुए चिन्तन किया है। पाठकों को ऐसा विषय-चिन्तन व गहन-विस्तार शायद ही अन्यत्र कहीं मिले,इसलिए इसका गहन अध्ययन व चिन्तन करना चाहिए। इन 10 अप्रतिम अवदानों को उन्होंने निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत श्रेणीबद्ध किया है-
1-रामायणम् काव्य नयवाद का प्रथम महाकाव्य,
2-प्रथम मानववादी एवम् प्रथम मानवतावादी महाकाव्य,
3-प्रथम लोकवादी महाकाव्य,
4-प्रथम नारीवादी महाकाव्य,
5-प्रथम बिम्बवादी महाकाव्य,
6-प्रथम प्रकृतिवादी महाकाव्य,
7-प्रथम राष्ट्रवादी महाकाव्य,
8-नय-रस का प्रथम महाकाव्य
9-महत् तत्वों का प्रथम महाकाव्य
10-प्रथम मनोवैज्ञानिक महाकाव्य
विजय रंजन जी ने इसे अनेकानेक विशिष्टताओं का ग्रंथ माना है और अपने गहन चिन्तनात्मक शोधों के आधार पर रामायणम् को नयवाद का प्रथम महाकाव्य कहा है। नयवाद का उद्देश्य किसी एक दृष्टिकोण को अंतिम सत्य मानने से रोकना और विभिन्न मतों के प्रति सहिष्णुता और व्यापकता को बढ़ावा देना है। इस महाकाव्य के नायक/महानायक और सहनायक के आचरण अनेकशः सार्वसुन्दरम, ऋतत्व, नयत्व आदि का सार्थक प्रतिमान प्रस्तुत करते हैं। इस महाकाव्य के महाकथन का संकेत करते हुए विजय रंजन जी संकेत करते हैं कि इसका मूल चरित्र, मूल कथा, वृत्तचित्र आदि सभी नयशीलत्व से ही समेकित दिखते हैं। उन्होंने रामायणम् को प्रथम मानववादी एवं प्रथम मानवतावादी महाकाव्य के रुप में देखा है। साहित्य की किसी भी रचना के बारे में विचार करते समय मानववाद और मानवतावाद की गहन छानबीन होती ही है। अपने गहन शोधात्मक चिन्तन में इन बिन्दुओं के आधार पर उन्होंने उपयुक्त पाया है और इसे उनका प्रथम महाकाव्य स्वीकार किया है। उनके पास खोज के अपने आधार और सम्यक चिन्तन व दृष्टिकोण हैं। कोई भी शोधकर्ता इन अवधारणाओं से असहमत हो,ऐसा संभव नहीं है। उन्होंने अपने चिन्तन के आधारों की पुष्टि के लिए जितने सारगर्भित उदाहरण प्रस्तुत किए हैं,अन्यत्र दुर्लभ हैं। ऐसा विशद चिन्तन और खोज उनकी लगन,मेहनत और विद्वता दर्शाता है।
अगले अप्रतिम अवदान के रुप में विजय रंजन जी ने रामायणम् को प्रथम लोकवादी महाकाव्य माना है, वे लिखते हैं-रामायणम् की विशिष्टताओं की सरणि में अग्रेतर विशिष्टता है 'लोकवाद'। लोकवाद को उन्होंने सारगर्भित तरीके से समझाया है और इसके हर पक्ष को, हर तरह के चिन्तन को, प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक की संगतियों-विसंगतियों को रेखांकित किया है। वह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य उजागर करते हैं-प्राचीन भारतीय शास्त्र-जगत में भी यद्यपि 'लोकशास्त्र' नामक कोई शास्त्र नहीं है,तथापि यहाँ बौद्धिक प्रत्यय 'साहित्य/काव्य' के निकष ही 'लोकसंग्रह', 'लोकमंगल'(लोक कल्याण), 'लोकधर्म', 'लोकश्रान्ति' और 'लोकयात्रा'' के सुप्रवर्तन से सम्बद्ध कर दिए गए। नाना प्रसंगों को विस्तार देते हुए उन्होंने लिखा है-स्वयं प्राचेतस् वाल्मीकि ने भी रामायणम् में व्यापक जनसमुदाय के अर्थ में ही 'लोक' शब्द का अनेकत्र प्रयोग किया है। उन्होंने इसे लोकसंस्कृति से जोड़ा है और अपना निष्कर्ष निकाला है। मुझे नहीं लगता, किसी को भी उनके निष्कर्षों से कोई असहमति होनी चाहिए। ये किसी मनीषी-तपस्वी के शोध हैं, इस ज्ञान को लेकर वर्तमान व अगली पीढ़ी को गम्भीर चिन्तन-मनन करना चाहिए और इसे विराट जनमानस तक पहुँचाना चाहिए।
विजय रंजन जी ने अपनी महत्वपूर्ण कृति में एक और अप्रतिम अवदान का उल्लेख किया है और वह है-'रामायणम् प्रथम नारीवादी महाकाव्य है।' आज के साहित्य में नारीवाद किसी नारे की तरह उभरा है और नारी विमर्श के बिना किसी लेखन पर चर्चा ही नहीं होती। मुझे इससे कोई परहेज नहीं है परन्तु श्रेष्ठ और सार्थक विमर्श की आवश्यकता तो है ही। साहित्य में ऐसे अनेक विमर्श उछाले जा रहे हैं जिनसे साहित्य की गरिमा प्रभावित होती है। स्त्री या नारी के बिना संसार में कुछ भी नहीं है, वह सर्वत्र है और उसको छोड़कर साहित्य-सृजन भला कैसे हो सकता है। विजय रंजन जी स्पष्ट लिखते हैं-''नारी बनाम पुरुष सदृश कोई विभेद प्राचीन आर्ष मनस्विता में कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ।'' उन्होंने दुनिया भर के साहित्य से अनेक निष्कर्षों का संचय किया है और विस्तार से सब कुछ समझाने की कोशिश की है। वह प्रश्न करते हैं-जी हाँ, आदि-महाकवि वाल्मीकि ने नारी गरिमा को मान देने के क्रम में जैसा शब्दांकन किया है,वह उपरि-अंकित लेखकों की किसी कृति में रुपायित नहीं है। ऐसा उदाहरण अन्यत्र आविश्व अद्यतन अनुपलब्ध है। इससे बड़ा और क्या प्रमाण चाहिए आदि महाकवि वाल्मीकि को गरिमाशील नारी-अस्मिता का परचमधारी और प्रथम श्रेष्ठ नारीवादी काव्यकार सिद्ध करने के लिए? उन्होने लिखा है-आदि-महाकवि वाल्मीकि ने सीता एवं अन्यान्य नारी पात्रों के चरित्रों को सम्यक मान-प्रदान के बावजूद रामायणम् में कहीं भी 'पुरुष बनाम स्त्री' का प्रश्न संस्थित नहीं किया और न ही कहीं स्त्री की निस्सीम स्वच्छ्न्दता या कि कथित फेलिकल कामना के समर्थक दिखते हैं। उन्होंने शुर्पणखा के चरित्र को भी कोई ऊँचाई देते हुए अपनी कृति में भिन्न तरीके से समझाने की कोशिश की है कि वह राजनैतिक-सामाजिक अधिकारों से सम्पन्न थी और वह राक्षसराज रावण को भी डाँट सकती थी। इस तरह विजय रंजन जी ने बहुत विस्तार से अपने निष्कर्ष के पक्ष में लिखा है जिससे असहमति की गुंजाइश कम ही हो सकती है।
विजय रंजन जी ने रामायणम् को प्रथम बिम्बवादी महाकाव्य के रुप में भी मान्यता दी है। वह लिखते हैं-''पश्यन्ती, परा, मध्यमा या कि व्यंजना,लक्षणा में निरुपण होगा ही किसका, यदि काव्य में 'सादृश्य की अभिव्यक्ति वाला भाव' और अन्तःनिहित विभाव-अनुभाव तथा तद्गत बिम्बार्थक 'शब्द-बिम्ब', 'अर्थ-बिम्ब' अनुपस्थित हों? इसीलिए भारतीय काव्य-शास्त्र में 'शब्द' के सीधे-सपाट अर्थ के बजाय उसके प्रतीकार्थों का बिम्बायन वांछनीय माना जाता है।'' उन्होंने आगे लिखा है-''उपरि-सदृश अनगिनत 'शब्द-बिम्बों' का सम्प्रयोग भारतीय काव्य-जगत में सर्वप्रथम आदि-महाकवि वाल्मीकि ने अपने लौकिक आदि-महाकाव्य रामायणम में सफलतम रुप में रुपायित किया है।'' इसे उन्होंने विश्व साहित्य की दृष्टि से भी प्रथम ही माना है और इसके निरुपण या सिद्धि के लिए नाना उदाहरणों के साथ विस्तार दिया है। बिम्ब को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है, यह पदार्थों के आन्तरिक सादृश्य की अभिव्यक्ति है,बिम्ब अवचेतन की सृष्टि-कला है,बिम्ब अमूर्त विचार अथवा भावना की पुनर्रचना है आदि-आदि। अपनी इस स्थापना के लिए विजय रंजन जी ने जिस तरह का शोध प्रस्तुत किया है, नाना तरीके से उद्धरण दिया है,किसी को भी संदेह प्रकट करने लिए अवसर मिलने वाला नहीं है। मेरा तो बार-बार पाठकों से, विद्वतजनों से आग्रह है,इसका परायण करें और देश-दुनिया तक इन निष्कर्षों को पहुँचाने का सद्प्रयास करें।
अपने अगले प्रसंग में उन्होंने रामायणम् को प्रथम प्रकृतिवादी महाकाव्य भी कहा है। साहित्य के आधुनिक दौर में, विशेष रुप से पाश्चात्य साहित्य में प्रकृतिवादी संभावनाओं को लेकर खूब लिखा गया है और साहित्य का प्रकृतिवादी होना अत्यन्त महत्वपूर्ण समझा जाता है। विजय रंजन जी लिखते हैं-''रामायणम् की विशिष्ट विशिष्टताओं में प्रमुख है यह भी कि शालीन प्रकृतिवाद का,सुरम्य प्राकृतिक सौष्ठव का, प्रकृति के प्रति सदाशयी आह्लादकारी प्रेम का कुल मिलाकर श्रेष्ठ साहित्यिक प्रकृतिवाद का अनुपम ग्रन्थ है यह।'' उन्होंने दर्शन जगत में प्रकृतिवाद,पाश्चात्य प्रकृतिवाद और आधुनिक प्रकृतिवाद जैसे वर्गीकरण के साथ इसके भावार्थ को समझने की कोशिश की है। उनका कहना है कि साहित्य में प्राकृतिक सुषमा और प्रकृति के गुण निधेयन का उत्फुल्ल-गान संस्कृत कवियों व हाल के बांग्ला कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के सृजन में प्रचुरता से विद्यमान है। विजय रंजन जी जोर देकर लिखते हैं-''आदि महाकवि वाल्मीकि प्राकृतिक वर्णन में कालिदास या किसी अन्य कवि से किंचित कम नहीं,अपितु पूर्वपरित और श्रेष्ठतर हैं।'' वैसे भी रामायणम् काव्य साहित्य का प्रथम ग्रन्थ है, साहित्य में वर्णित सभी तत्वों के लिए इसे प्रथम मान लेने में कोई विरोध होना ही नहीं चाहिए। वैसे भी मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन प्रकृति के साथ रचा-बसा होता है और वह प्रकृति के सारे उपादानों के प्रति मानवीकरण का भाव रखते हुए सृजन करता है और सुखी होता है। गहन शोध करते हुए विस्तार से उन्होंने अपनी खोज को सामने रखने का प्रयास किया है और नाना प्रसंगों में इसे सिद्ध किया है।
राष्ट्रवादी विचार शायद साहित्य सृजन में बहुत बाद में आया होगा या इसे भी कुछ लोग पाश्चात्य से जोड़कर देखते होंगे। विजय रंजन की यह स्थापना स्वयं में बड़ी और महान है। लोकधर्म,राष्ट्रधर्म, लोकाचार,सदाचार आदि पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा है-''इसी अनुक्रम में विचक्षणतया देशहिती, राष्ट्रहिती, सात्विक, ममत्वशील 'भारतीय राष्ट्रवाद' सदृश सार्वहिती भावाचार की देशना भी दृश्यमान है रामायणम् में। यह देशना निस्संदेह आदि-महाकवि वाल्मीकि कृत महत्वपूर्ण सांस्कारिक,सांस्कृतिक विशिष्ट अवदान है।'' राष्ट्रवाद की उन्होंने विशद व्याख्या की है, उसे गहराई से समझाने की कोशिश और नाना प्रसंगों,उदाहरणों के साथ इसके मर्म को छूने का सफल प्रयास किया है। विजय रंजन जी ने गहन अध्ययन किया है,उसे सम्पूर्ण तार्किकता की कसौटी पर कसा है और सब कुछ अपनी इस महत्वपूर्ण कृति में उड़ेल कर रख दिया है। किसी एक व्यक्ति के द्वारा किया हुआ यह असाधारण कार्य है। उन्होंने स्वयं लिखा है-यह देखकर कुतूहलजनित आश्चर्य होता है कि आज से लगभग 7000 वर्ष पूर्व के कालखण्ड में जब आविश्व राष्ट्रवाद नामक वाद का कही नाम-निशान तक नहीं था, तब रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का चित्रांकन करते समय आदि-महाकवि वाल्मीकि ने राष्ट्रवाद के विविध मौलिक अवयवों को रुपांकित किया। विजय रंजन जी के द्वारा लिखे गए इन सारे प्रसंगों को पढ़ते हुए निर्विवाद समझा जा सकता है कि तत्वतः यह ग्रन्थ राष्ट्रवाद का प्रथम महाकाव्य ग्रन्थ ही है।
शुरु में ही प्रथम अप्रतिम अवदान के रुप में विजय रंजन जी ने रामायणम् को नयवाद का प्रथम महाकाव्य के रुप में विस्तार से उल्लेख किया है। इस खण्ड में उन्होंने इसे नय-रस का प्रथम महाकाव्य कहा है। काव्य में रस का होना आवश्यक है। आचार्य रुद्रट,आचार्य भरत आदि मनीषियों के अनुसार 'रस' के अभाव में कोई काव्य विरचित नहीं किया जा सकता। विजय रंजन जी लिखते हैं-''रामायणम् में कहीं 'करुण' की प्रधानता है,तो कहीं 'वीर', 'अद्भुत' या 'शान्त' की। 'रौद्र', 'श्रृंगार', 'हास्य' आदि की रससिक्तता भी यथावसर विद्यमान है वहाँ।'' उन्हें इसमें अंगीरस या प्रधान रस की खोज की भावना है। उनका मत है कि अधिकांश विद्वतजन इसमें 'करुण' रस को ही प्रधान रस के रुप में मानते हैं और इसके लिए उनका कहना है कि इस ग्रन्थ में आदि से अन्त तक प्रचुर शोक-प्रसंग विद्यमान हैं। हालांकि इसके विरोध में अनेक सबल आपत्तियाँ भी हैं। अनेक उप-शीर्षकों के अन्तर्गत उन्होंने इसे समझाने की कोशिशें की है-रामायणम का अंगी रस 'करुण' नहीं, 'वीर' रस नहीं, 'अद्भुत' रस नहीं, 'शान्त' रस नहीं, 'भक्ति' रस भी नहीं, बल्कि रामायणम् का अंगी रस 'नय' रस है। अपनी इस स्थापना के लिए उन्होंने लिखा है-'रामायणम़ में विशिष्ट कथ्य, विशिष्ट कथानक, विशिष्ट पात्र, चरित्र और सबसे बढ़कर वैखरी, परा, मध्यमा एवं पश्यन्ती में अति विशिष्ट काव्य-लक्ष्य का निदेशन 'नय-निदेशन' के रुप में विद्यमान है। उन्होंने इसे विस्तार से समझाया है और गूढ़ातिगूढ़ विवेचना की है। कई बार इस ग्रन्थ के भीतर अवतरण करना सहज नहीं लगता और सारे प्रसंगों को जोड़ना दुरुह हो उठता है। पाठकों को यह बोझ उठाना ही पड़ेगा यदि ऐसा विशद चिन्तन समझना है। हमारे आदरणीय रचनाकार विजय रंजन जी ने गहन शोध किया है, उनकी मेधा अपार है और निष्कर्ष चमत्कृत करने वाले है। ऐसी संस्कृतनिष्ठ, भाव-संवेदनानिष्ठ और श्रेष्ठ भाषा-शैली की कृति भविष्य के लेखकों के सामने चुनौती है और यह प्रेरित करने वाला कोई महा-ग्रन्थ है।
उन्होंने रामायणम् को 'महत् तत्वों के प्रथम महाकाव्य के रुप में भी स्वीकार किया है। हमारी प्राचीन आर्ष मेधा कभी कम नहीं रही है और इसका प्रमाण हमारे सारे वैदिक व सनातन ग्रन्थ हैं। वह लिखते हैं-''रामायणम् जहाँ अन्यान्य विशिष्टताओं से आभरित है,वहीं इसकी एक प्रमुख विशेषता है यह भी कि कथ,कथानक ही नहीं,अपितु कथ्य की दृष्टि से भी यह महत् तत्वों का अप्रतिम ग्रंथ है। 'महत् उद्देश्य की सिद्धि का तत्व', 'महत् उद्देश्य की महत्प्रेरणा से परिचालित होने का तत्व', 'महत् उद्देश्य के महत्वपूर्ण कार्य-व्यापार आदि के तत्व रामायणम् में तत्वतः इस स्वरुप में भरपूर समाहित हैं कि रामायणम् का प्रमुख कार्य-व्यापार,तद्गत उद्देश्य और मुख्यतम् अधिलक्ष्य किसी नायक का वैयक्तिक चरित्-गायन नहीं,वरन् नायक के महत्त्व एवं सर्वगुणोपेतत्व का रेखायन ही दिखता है इस कृति में।'' उन्होंने आगे लिखा है-''महत् तत्व में उदात्तता, सर्वकल्याणकता, लोकहित-संरक्षण, लोकसंग्रह, आदर्शवादिता, लोकहिती नैतिकता सदृश तत्व आवयविक एकांश के रुप में समाहित होते हैं, जो वस्तुनिष्ठतया भरपूर समावेशित दिखते हैं वाल्मीकीय राम के व्यक्तित्व में और तदेव, रामायणम् में भी।'' इतना ही नहीं उन्होंने विस्तार से हर तत्व की विवेचना की है अपनी कृति में और सारे प्रसंग उनकी शोध क्षमता को दिखाते हैं।
विजय रंजन जी ने अपनी कृति में रामायणम् को प्रथम मनोवैज्ञानिक महाकाव्य मानते हुए लिखा है-''मन के क्रियाकलाप आदि का वैज्ञानिक अध्ययन 'मनोविज्ञान' नाम्नी अधुनातन ज्ञानानुशासन में किया जाता है। वहीं, माना जाता है कि काव्य 'मनस्-संवेग' से उत्पन्न होता है। इसे 'मनसो जातः' भी कहते हैं। 'आर्ष काव्य-रस' हों या 'काव्य के भाव-सम्प्रभाव' सदृश प्रत्यय--वे सभी काव्य से मानव-मनोविज्ञान का सम्बन्ध अविच्छिन्न मानते हैं। तथैव, काव्य में मनस्-सम्प्रभावों को नकारना तर्कसंगत नहीं है।'' साहित्य का सम्बन्ध मनुष्य से है और काव्य का सीधा सरोकार मानव-मन से जुड़ता है। उन्होंने लिखा है-''साहित्य में मानवीय संवेदनाओं(करुणा, लोकोन्मुखता, मनोरंजन,अभीप्सा, ज्ञानाभीप्सा, बौद्धिक संवेग, नैतिकता बोध, सद्विचार आदि) के स्पंदन प्रायः बहुतायत से विद्यमान रहते हैं। ऐसे स्पंदन साहित्यिक सर्जनात्मकता को बढ़ावा देते हैं और स्वयं भी उससे बढ़ावा पाते हैं। वहीं, मनोविज्ञान में इन भावानुभावों के अतिरिक्त स्वाभिमान, कुण्ठा, प्रतिशोध, संत्रास,पीड़ा, दमित इच्छा, अन्तर्द्वन्द्व आदि का भी अध्ययन वांछनीय है।'' सुखद है, विजय रंजन जी ने रामायणम् महाकाव्य में मनोविज्ञान के तत्वों,प्रसंगों को खोज निकाला है और सार्थक अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों के चिन्तन-मनन के आधार पर भी महाकवि वाल्मीकि की कृति की गहरी छानबीन की है और अपने निष्कर्षों को सामने रखा है। ऐसा शोधपरक विस्तारित अध्ययन सहज नहीं है। हिन्दी साहित्य का कोई सौभाग्य ही है कि हमारे बीच ऐसा कोई ज्ञानी,विद्वान शोधकर्ता है जिसने इस महाकाव्य से जगत हित में नवनीत निकाला है और साहस व स्वेच्छा-पूर्वक सौंप दिया है। ऐसे गहन अनुशीलन और मनोवैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर इस महत्वपूर्ण कृति को प्रथम मनोवैज्ञानिक महाकाव्य मान लेने में किसी को भी कोई शंका नहीं होनी चाहिए।
अपनी कृति में विजय रंजन जी ने परिशिष्ट-1 एवं 2 को जोड़ा है जिसके अन्तर्गत महत्वपूर्ण संदर्भों को रेखांकित किया है। परिशिष्ट-2 में आधार ग्रंथ एवं पत्रिकाओं का उल्लेख है। परिशिष्ट-1 में दो महत्वपूर्ण लेख शामिल हैं। पहले लेख का शीर्षक है-'रामायणम्ःदेशज-विदेशज साहित्यिक निकषों पर' और दूसरा है- 'रामायणम्ःसर्वथा प्रासंगिक'।
विजय रंजन जी लिखते हैं-आदि-महाकवि वाल्मीकि के इस महाकाव्य की अनेक आधारों पर सभी प्रमुख पुरातन एवं अधुना भारतीय काव्यज्ञों एवं सुधी पाश्चात्य काव्यशास्त्रियों ने प्रशंसा की है। इसकी विवेचना उन्होंने निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत विस्तार से किया है-
1-वैदिक, औपनिषदिक, पौराणिक मनीषियों की दृष्टि से रामायणम्,
2-महाभारत प्रणेता की दृष्टि से रामायणम्,
3-अन्य प्राचीन रामकथा-प्रणेताओं की काव्य-दृष्टि से रामायणम्,
4-दूत काव्यकारों की काव्य-दृष्टि से रामायणम्,
5-टीकाकारों की दृष्टि से रामायणम्
इसके साथ ही उन्होंने निकषों के आधार पर भी विशद और व्यापक विवेचनाएं की हैं-
1-प्राचीन काव्याचार्यों के निकषों पर रामायणम्,
२-आर्ष मान्यता के शैल्पिक काव्य-निकषों पर रामायणम्,
3- मध्ययुगीन निकषों पर रामायणम्,
4-अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषियों की दृष्टि से रामायणम्,
५-अन्य विचारशील लेखकों के काव्य-निकषों पर रामायणम्,
6-हिन्दी-इतर भारतीय भाषा-जगत की दृष्टि से रामायणम्,
7-पाश्चात्य काव्य-शास्त्रियों के काव्य-निकष और रामायणम,
8-समाज-शास्त्रीय साहित्यिक निकषों पर रामायणम्,
पाठक व सुधीजन जब इस खण्ड का अवगाहन करेंगे, उन्हें विजय रंजन जी के ज्ञान,श्रम व गहन चिन्तन की झलक दिखाई देगी। अपने दूसरे लेख ''रामायणम्ःसर्वथा प्रासंगिक'' को उन्होंने अपनी कृति का निचोड़ माना है। आज का युग वैज्ञानिक युग है,भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी, चाकचिक्य के प्रस्तार के साथ-साथ अनास्थावादी तर्कसंगतता आदि का युग है। उन्होंने लिखा है- यही समीचीन है बताना भी कि रामायणम् सर्वकल्याणक श्रेष्ठतम जीवन-मूल्यों के साथ-साथ भारतीय संस्कारों या कि भारतीत्व(देवी भारती के गुणों यथा-परम सात्विकता, सत्वोजनित कृतज्ञता, ज्ञानान्वेषण, ज्ञान-प्रदान, धर्मशीलता, पावनता, सतत रचनाधर्मिता, लोकहितैषिता, तितिक्षा = दया,उदारता,क्षमा,सहिष्णुता आदि) के संस्कारों का श्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण है।
कुल मिला कर समीक्ष्य कृति आदि-महाकवि वाल्मीकि के विभिन्न महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों का महत्त्वपूर्ण लेखा प्रस्तुत करने में समर्थ है, पठनीय और संग्रहणीय है।
समीक्षित कृति आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम अवदान
कृतिकार विजय रंजन
मूल्य रु 995/-
प्रकाशक विकल्प प्रकाशन, दिल्ली
विजय कुमार तिवारी
(कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-2 फ्लैट-201
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190
विशिष्ट गवेषणा की कृति
आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान
-डॉ0 विजय कुमार वेदालंकार (डी॰लिट्)
श्री विजय रंजन सुधी अध्येता, शोधक, तर्कशास्त्री, लेखक और विधिवेत्ता तो हैं ही, साथ ही भारतीय ज्ञान परम्परा के महनीय ज्ञाता भी हैं। उन्होंने कृति ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ की रचना कर अद्भुत विचारणीय पक्षों की विवेचना की है जो अद्यतन अनूठे और अछूते थे। निष्ठावान लेखक और शोधक विजय रंजन जी ने प्रस्तुत आलोच्य कृति में उन्हीं अचर्चित पक्षो ं को उजागर करने का प्रयास किया है।
‘काव्य’ त्रिकालदर्शी हो या न हो, भविष्य को गढ़ने और काल-आबद्ध यथार्थ के संकुचित क्षणो ं से अतिक्रमण करने की कला तो है ही। संवेदना की तरलता और वैचारिकता की गहनता, मूल्यबोध और स्वप्नानुकूलता एक साथ जिस बिन्दु पर केन्द्रित हो जाते हैं, वहीं से अंतर्दृष्टि उपजती है। यही अंर्तदृष्टि लेखक को अपने समय, समाज और व्यक्ति को पढ़ने, सुनने और पुनर्सृजित करने का विवेक देती है।
आलोच्य कृति के माध्यम से बहुमुखी प्रतिभा के धनी, प्रखर आलोचक, विजय रंजन ने ‘रामायणम्’ के अप्रतिम बिन्दुओं को उजागर करते हुए सहज स्वीकृति दी है कि ‘भारतीय सद्संस्कारों के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परम्परा की साहित्यिक सापेक्षताओं को मुखरमान करने वाला महाग्रंथ है रामायणम्। संभवतः इन्हीं आधारों पर ‘रामायणम्’ सनातन काव्यबीज या कि शाश्वत बीज काव्य बन सका है।’’ (पृ॰ 15)
यह दुर्योग ही है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि के संदर्भगत अप्रतिम अवदानों की ओर अद्यतन हमारे प्राचीन मध्ययुगीन और अर्वाचीन काव्यज्ञों और हमारे कथित बौद्धिकों ने सम्यक् ध्यान निवेशित नहीं किया। यह सुयोग है कि तत्त्वान्वेषी शोधक विजय रंजन ने व्यावर्तक गुण-धर्म का पालन करते हुए वाल्मीकि रामायण के अप्रतिम अवदानों को सुधी पाठकों के सामने लाने का महनीय स्तुत्य प्रयास किया है।
भावयित्री प्रतिभा से सम्पन्न विजय रंजन ने रामायणम् की विषय-प्रवृत्ति के अंतर्गत करणीय कर्म के सम्यक् आरेखन वाला धर्म, वर्तमान के ज्ञान-विशेष से विशिष्ट ज्ञान की पहचान, अनेक साहित्यिक वाद-प्रत्यय आदि का व्यावहारिक सम्प्रयोग और समुपयोगी लोकहिताय की प्रासंगिकता को भी विवेचित किया है।
प्रबुद्ध प्रमाता ने पूर्वार्चिक में स्पष्ट किया है कि उसने ‘सारवान् सार्वोपयोगी देशनाओं के महत् फलित से रामायणम् को साहित्यिक महाकाव्य’ माना है। विद्वान् लेखक का स्पष्ट मत है कि- “ रामायणम् एक धर्मग्रंथ या इतिहास या इतिवृत्ति या भूगोल या राजनीति या सामाजिकशास्त्र का ग्रंथ या कि विविध ज्ञान-विज्ञान विषयक ग्रंथ न होकर अनेकानेक ज्ञान-विज्ञान से समेकित पूर्वकाल में घटित सत्य घटनाओं की साहित्यिक अभिव्यक्ति करने वाला श्रेष्ठ महत् काव्य का उत्कृष्ट महाकाव्यीय साहित्यिक ग्रंथ है।” सर्वप्रथम विद्वान लेखक का स्पष्ट मत है कि सत्-शिव-सुन्दरम् की समवेत नयशील, सत्त्वशील, सार्वसुन्दरम्शील, लोकसंग्रही महाकाव्यात्मक आक्षरिक आराधना का, साथ ही सार्वहिती महनीय विचारों वाले सहित्भावी अक्षर-आराधना का अप्रतिम साहित्यिक आदि-महाकाव्य मानना और इसके प्रणेता को आदि-महाकवि मानना विवेकसम्मत, तर्कसंगत और तथ्यसंगत होगा।”
उत्तरार्चिक में लेखक ने रामायणम् का प्रणेता होने के कारण से आदि-महाकवि वाल्मीकि को काव्य-नयवाद का प्रथम पुरस्कर्ता माना है। उनकी दृष्टि से “यह महाकाव्य नयशील संदेश से सुसम्पृक्त, ऐतिहासिक सत्य तथ्यों की श्रेष्ठ साहित्यिक महाकाव्यीय अभिव्यक्ति-रूप आदि-महाकाव्य ‘रामायणम्’ लोकमंगलमय, सर्वकल्याणक, महत् लोकहिती एवं नयशीलत्व से युक्त है। साथ ही इसमें कविता के क्षेत्र-विस्तार, कविता-प्रयोजन और कविता-निकष जैसे फलकों पर ‘नयत्व’ को प्रथम आधार बनाने का प्रथम पश्यन्ती निर्देश भी है। अतः स्पष्ट है कि रामायणम् का मूल चरित्र, मूलकथा, वृत्तचित्र आदि और बोलती बात-सभी नयशीलत्व से ही समेकित दिखते हैं।”
विद्वान् लेखक ने पौर्वात्य एवं पाश्चात्य चिन्तकों की मूल संकल्पनाओं पर भी तर्कपूर्ण ढंग से विमर्श किया है। भावयित्री प्रतिभा के धनी विजय रंजन ने ‘रामायणम्’ के बौद्धिक कोष में समरैखिक अर्थ-बोध के तीन अलग-अलग प्रत्ययों से सृजित मानववाद, मानवतावाद और मानवीयतावाद को रामायणम् की प्रमुख विशेषता माना है। उनका मत है कि ‘मानववाद’ वस्तुतः ‘मानव-गरिमा के जयघोष’ के साथ ‘मानवी सक्षमता के स्वीकार’ का वाद है। जबकि ‘मानवतावाद’ महनीय सद्गुणों का समवेत में संवाहक है और द्योतक भी है। स्पष्टतः ‘मानव-सक्षमता’, ‘मानव-गौरव’, ‘मानव-गरिमा’ और ‘मानव-इयत्ता’ का जो गौरवशील रूपायन ‘रामायणम्’ महाकाव्य में अक्षरांकित है, वैसा अंकन आविश्व अन्यत्र अलभ्य है। वास्तव में आर्ष मानवीय संस्कार, आर्ष मानवीय संस्कृति, श्रेष्ठ मानवीय सद्गुण ऐसे सद्गुणों का गौरवगान रामायणम् में भरपूर गुंजरित है। ‘रामायणम्’ मानववाद के मूल-प्रकल्पित स्वरूप से लेकर मानवीय संस्कार और मानवीय संस्कृति की कसौटी पर शत-प्रतिशत ‘मानववादी’ ठहरती है। एतदर्थ, वाल्मीकीय मानववाद पाश्चात्य मानववाद से भी श्रेष्ठतम है। इससे उनका महाकाव्य प्रथम आविश्व मानववाद तथा मानवतावादी महाकाव्य सिद्ध होता है।”
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी विजय रंजन ने ‘लोकवाद’ पर भी सुष्ठु विमर्श किया है। उनके मतानुसार ‘लोकवाद’ रामायणम् की विशिष्टताओ ं में अग्रेतर विशिष्टता है। विद्वान् लेखक ने प्राचीन भारतीय शास्त्र-जगत और भारतेतर मनीषियों की दृष्टि का अनुशीलन कर रामायण को साहित्य के लोक-संस्कृति, लोकहित-संरक्षण, लोकसंग्रह आदि के निकषों पर सिद्ध करने का तर्कसम्मत प्रयास किया है कि रामायणम् अप्रितम लोकवादी महाकाव्य है। अतः इसे आविश्व प्रथम लोकवादी महाकाव्य माना जाना ही तर्कसंगत है।
प्रख्यात विचारक विजय रंजन व्यवसाय से अधिवक्ता हैं, परन्तु वे एक संवेदनशील लेखक भी हैं। उनका रचना-कर्म हृदय और बुद्धि दोनों से संपृक्त है। विद्वान् लेखक ने आज के नारीवाद पर भी चिन्ता व्यक्त की है। उनके अनुसार ‘नारी ईश्वर की विलक्षण किन्तु महनीय कृति है, जो अनेकानेक सद्गुणों में और अनेक परिप्रेक्ष्यों में नर से श्रेष्ठ है। भारतीय मनीषा में इसीलिए माना गया है कि ”नारी नर से भारी“। किन्तु यह कथन आज के पाश्चात्योन्मुखी नारेबाजी में फँसकर रह गया है और भारतीय आदर्शशीलता का तिरोभाव हो गया है।
भारतीयता के उपासक विजय रंजन के मतानुसार वस्तुनिष्ठ नारीवाद का आदर्शशील स्वरूप आदि-महाकवि वाल्मीकि द्वारा प्रणीत ‘रामायणम्’ के सात्त्विक आदर्श नारीवाद में निहित है। यह रामायणम् प्रणेता का विशिष्ट अवदान है। विद्वान् लेखक ने पौर्वात्य और पाश्चात्य दार्शनिकों, कवियों, साहित्यकारों और लेखकों के विचारों के पक्ष-विपक्ष का मंथन कर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि समुचित नारी-सम्मान वाले और सदाशयी अर्थों में नारी-गरिमा के समुचित मान-प्रदानक सार्वहिती ‘गरिमाशील नारीवाद’ को रामायणम् में वस्तुनिष्ठतः वाचाल करने वाले आदि-महाकवि वाल्मीकि को ‘आदि-नारीवादी महाकवि’ मानना पूर्णतः न्यायोचित है। इसी से आदि-महाकवि वाल्मीकि नारीवाद के प्रथम प्रयोक्ता सिद्ध होते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
विद्वान् साहित्यकार विजय रंजन की मान्यता है कि शब्द-बिम्बों का सम्प्रयोग भारतीय काव्य-जगत् में सर्वप्रथम आदि-महाकवि वाल्मीकि ने अपने लौकिक आदि-महाकाव्य रामायणम् में सफलतम रूप में रूपायित किया है। इस संदर्भ में लेखक ने भारतीय काव्यशास्त्र के मूर्धन्य आचार्यों, उनकी मान्यताओं का भी म ंथन किया है और सिद्ध करने का प्रयास किया है कि काव्य में बिम्बवाद का आविश्व प्रथम सम्प्रयोग निश्चयतः आदि-महाकवि वाल्मीकि का अवदान है।
संवेदनशील साहित्यकार विजय रंजन ने आधुनिक लेखक और लेखिकाओं द्वारा प्रस्तुत प्रकृतिवाद के विकृत स्वरूप को भी उजागर किया है। संस्कृत और हिन्दी के अनेक कवियों ने प्रकृति को कल्पना के आवरण में लपेटकर प्रस्तुत किया है जबकि आदि-महाकवि वाल्मीकि ने ब्राह्यप्रकृति के साथ अन्तःप्रकृति के निरूपण में भी पटुता दिखाई है। स्पष्टतः प्रकृति के विभिन्न उपादानों का जैसा यथार्थपरक यथातथ्य प्राकृतिक वर्णन और सार्थक, सात्त्विक, मनोहारी वर्णन ‘रामायणम्’ में है, वह यथातथ्य होने के बावजूद प्राकृतिक सुषमा का रूपांकन है। इसी शालीन सात्त्विक प्रकृतिवाद के आविश्व सर्वप्रथम प्रयोक्ता आदि-महाकवि वाल्मीकि हैं और उनकी कृति ‘रामायणम्’ प्रकृतिवाद का आविश्व सर्वश्रेेष्ठ महाकाव्य है।
भारतीयता के प्रबल पोषक विजय रंजन जी का मत है कि भारतीय मनीषा में ‘राष्ट्रवाद’ को वायवीय ‘भाव या विचार’ मात्र के बजाय नित-प्रति के जीवनाचार का राष्ट्रीय आचार माना गया है। इसी से ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ भारतेतर राष्ट्रवाद से विशिष्ट है। यह कुतूहलजनित आश्चर्य का विषय है कि जब सहस्त्रों वर्ष पूर्व के कालखण्ड में आविश्व राष्ट्रवाद नामक ‘वाद’ का कहीं नाम-निशान तक नहीं था, तब रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का चित्रांकन करते समय आदि-महाकवि वाल्मीकि ने राष्ट्रवाद के विविध मौलिक अवयवों को रूपायित किया था।
विद्वान् लेखक ने ‘रामायणम्’ के प्रत्येक काण्ड में संकेतित राष्ट्रवाद के बिन्दुओं को संकेतित कर स्पष्ट कर दिया कि किसी भी ‘वाद’ का उल्लेख न होते हुए भी भारतीय सांस्कृतिकता के आश्लेष के ब्याज से ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ का श्रेष्ठतम व्यावहारिक सम्प्रयोग रामायणम् में रूपायित है। अतः निर्विवादतः लेखक का मत है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि को प्रथम राष्ट्रवादी महाकवि और रामायणम् महाकाव्य को ‘राष्ट्रवाद’ का प्रथम लौकिक महाकाव्य मानना तर्कसंगत है।
आद्याचार्य भरत से लेकर अद्यतन आचार्यों द्वारा अनुमोदित ‘रस’ के अभाव में कोई भी ‘काव्य’ विरचित नहीं हो सकता। इस परिप्रेक्ष्य में विद्वान् लेखक ने ‘रामायणम्’ के अंगीरस पर विचार करते हुए अपनी मौलिक प्रतिभा से रामायणम् के नयरसीय आधार पर प्रधान रस (अंगीरस) ‘नय रस’ को माना जाना तर्कोचित और तथ्यसम्मत स्वीकार किया है। इसे महाकवि का अति विशिष्ट अवदान माना जाना चाहिए। यह भी ध्यातव्य है कि यह महाकाव्य कथ और कथ्य आदि के माध्यम से काव्य के वस्तुनिष्ठ महत् तत्त्वों को साकारित करने वाला आविश्व अप्रतिम प्रथम महाकाव्य है।
आधुनिक मनोवैज्ञानिक मनीषियों के मतों का अनुशीलन कर विद्वान लेखक ने जो निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं उनमें रामायणम् को मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं के श्रेष्ठ स्वरूप में विद्यमान होने के ब्याज से इसे निर्विवादतः श्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक कृति माना जा सकता है।
तत्वज्ञ अध्येता विजय रंजन जी ने देशज-विदेशज साहित्यिक निकषों पर भी ‘रामायणम्’ को देखा-परखा है। उन्होंने वैदिक, औपनिषदिक, पौराणिक मनीषियों, रामकथा-प्रणेताओं की दृष्टि, प्राचीन काव्याचार्यों के निकषों, अर्वाचीन हिन्दी काव्यमनीषियों, लेखकों तथा हिन्दी-इतर भारतीय भाषा-जगत् की दृष्टि से रामायणम् का आलोड़न-विलोड़न कर अपने मंतव्य को प्रस्तुत किया है। साथ ही, पाश्चात्य काव्यशास्त्रियों के काव्य-निकष पर रामायणम् का अनुशीलन और मूल्यांकन किया है। विद्वान् तर्कशास्त्री विजय रंजन ने यह सिद्ध करने का विनम्र प्रयास किया है कि सभी श्रेष्ठ काव्य-दृष्टियों से ‘रामायणम्’ आविश्व गरिमा और महिमा से उत्कृष्टतम कृति सिद्ध होती है।
स्पष्टतः कहा जा सकता है कि आज के भौतिकतावादी युग में, जहाँ अनेक वाद-विवाद धक्कम-धुक्की वाली वैचारिक धुंधी में उलझ रहे हैं, वहाँ विद्वान् लेखक विजय रंजन ने ‘श्रेष्ठतर मानव’ और ‘श्रेष्ठतर समाज’ बनाने के लिए आवश्यक जीवन-दृष्टियाँ प्रदान करने वाले ‘रामायणम्’ ग्रंथ की प्रासंगिकता सिद्ध की है।
सुधी विचारक विजय रंजन ने अपने विस्तृत अध्ययन के आधार पर इस महत्त्वपूर्ण और गम्भीर विषय को अपनी शैली में प्रस्तुत किया है। आदि-महाकवि वाल्मीकि के अप्रतिम अवदान को एक विषय मानकर लेखक ने गवेषणापूर्ण कार्य कर आधुनिक पाठकों, लेखकों और चिन्तकों को एक दिशा दी है। मनीषी चिन्तक विजय रंजन ने पौर्वात्य साहित्य के साथ पाश्चात्य विचारकों का सामंजस्य स्थापित कर यह महत् कार्य किया है। वस्तुतः यह असाधारण लेखक का असाधारण कार्य है।
रचना का शिल्प-पक्ष क्लिष्टता से अछूता नहीं है। एक दृष्टि में रचना शब्दशः अनुवाद-सी प्रतीत होती है। सहृदय पाठकों के लिए विषय को सरल बनाने पर कम ध्यान दिया गया है। पाठक को विषय के साथ तादात्म्य बैठाने में बौद्धिक क्रीड़ा करनी पड़ती है। असाधारण रचना-कौशल के आग्रह ने लेखक को सहजता और सरलता से दूर कर दिया है।
स्पष्टतः प्रस्तुत कृति पाठकों, अध्येताओं और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा विश्वास है।
मैं, मित्रवर विजय रंजन को गम्भीर, अनुप्रेरक, व्यावहारिक चिन्तन-आधारित पारायणयोग्य पुस्तक के सृजन पर हार्दिक बधाई देता हूँ और कामना करता हूँ कि आप स्वस्थ, प्रसन्न रह कर वीणा-पाणि सरस्वती की सतत साधना करते रहें।
सम्पर्क 486, सेक्टर 23, सोनीपत- 131001 हरियाणा, दूरभाष: 9896262488, vvedalankar2@gmail.com
