सोमवार, 26 जून 2023

नवगीत वाटिका - 1 (अवध-अर्चना, अंक 107 : नवगीत अंक में प्रकाशित नवगीतों में से चयनित प्रमुख नवगीत)

              (1)

नदी: एक परम्परा

        एक नदी  

रहती है मुझमें  .

अक्सर लड़ती  

और झगड़ती  

तटबंधों पर 

गुस्सा करती।

एक नदी  

बहती है मुझमें   

           पल पल झरते  

           पत्ते पीले।

           सूने तट बालू के टीले  

           बूँद बूँद सहती है मुझमें  

           सिर्फ नदी है 

           नाम नहीं है 

           उत्स नहीं है  

           धाम नहीं है  

           आकर बस

           ढहती है मुझ में 

 नदी एक 

 परम्परा है  

 अग्रधा विकास

 सहज त्वरा है  

 कुछ सुनती 

 कहती है मुझमें।

- माहेश्वर तिवारी 

नवीन नगर, कांठ रोड, मुरादाबाद-244001 (उत्तर प्रदेश)   दूरभाष: 94656689998

                *

               (2)

       अक्षर ज्ञान

बिन पंखों के बादल उड़ते 

बिना पैर के दौड़ें साँप

एक बुझाता प्यास सभी की

एक बाँटता विष अभिशाप


कालिदास को बादल प्यारे

शिव को प्यारे हैं विषधर

हुई कवित्व शिवत्व की चर्चा

ये दोनों हैं अजर अमर

विरह की करूणा में कवि डूबा

शिव ने सहा गरल का ताप


बादल गए रामगिरि ऊपर

शिव छाये हिमगिरि पर

कविवर यक्ष कथा के गायक

बने शम्भु ‘नटराज’ नृत्य कर

आत्मदरश के कृत्यकलाप


संवेदित है कविवर रोये

सती विरह में शिव रोये

दोनों के आँसू अक्षर हैं

धुलें न कालचक्र के धोये

‘अक्षर’ ज्ञान के हो जाने से 

मिट जाते सारे संताप।

                - गुलाब सिंह 

        (उ0प्र0 हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान प्राप्त  , 

      शम्भूनाथ सिंह न्यास से प्रथम नवगीतकार पुरस्कार  प्राप्त)

ग्राम बिगहनी, पो0 शुकुल बाजार, प्रयागराज-211001 


                *

               (3)

बाजारें सिर चढ़ कर बोलें

बाजारें -

अब अर्थ-व्यवस्था के 

             सिर चढ़ कर बोलें।

कहीं बिक रहे लोटा-थाली

सोना-चाँदी, हीरे/कहीं मोटरें

फ्रिज, फिल्टर तो

बिकते ढोल-मंजीरे

जीने के

आकर्षक साधन

           मन कहता है छू लें।

बिकते रहते मछली, चिड़ियाँ 

फूल, पत्तियाँ, पौधे/बिकें जानवर

और आदमी

मुर्गे, बकरी अण्डे

रिश्ते-नाते

और आचरण बिके

              सत्य को खोलें।

देशभक्ति, ईमान बिक रहा

बिकी संस्कृतियाँ

देश द्रोह

करने की ठाने

ये पैसे की दुनिया

बिके हुए सिंहासन

घर घर

           अधरों पर विष घोलें।

वैश्विक नीति ,न्याय, दलबन्दी

बिकी हुई सत्ताएँ

यह बाजारवाद

विष बोये

तोड़ रहा सीमाएँ

मानवता

घायल होती है

               धरती, अम्बर डोलें।

- डॉ0 ओमप्रकाश सिंह 

259, शान्ति-निकेतन, साकेतनगर, लालगंज, रायबरेली (उ0प्र0)

दूरभाष: 8400026555

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               (4) 

जाने कहाँ गए

कच्चे आँगन, पक्के रिश्ते

जाने कहाँ गए ?


बूढ़ी पगड़ी पूरा गाँव

बाँध कर चलती थी

गैया, गौरैया घर की

रोटी से पलती थी

चाकी की घर-घर/जीवन-संगीत सुनाती थी

हरहारे की तान /सुरीले राग जगाती थी

महँगी इज्जत, पर दिल सस्ते

जाने कहाँ गए? 


खोया बुआ त्रिवेणी का

धर्मार्थ औषधालय

लोकज्ञान का विश्वकोश

वह बूढा विद्यालय

पेटपीर की दवा अचार/सलोना खोया है

अगिहानों पर सन्नाटा यह/किसने बोया है

मिलकर रोते, मिलकर हँसते

जाने कहाँ गए ?  


द्वारे से श्यामा गैया का

उखड़ गया खूँटा

दादाजी का सच्चा अनुभव

लगता अब झूठा

चौपालें दिव्यांग हो गयीं/लट्ठ हुआ तगड़ा

एक नहीं है गाँव, हो गया/अगड़ा या पिछड़ा

दिल तक जाने वाले रस्ते 

जाने कहाँ गए ?


मुट्ठी भर था चना-चबैना

सबमें  बँट जाता

अब सोने का कौर

किसी के काम नहीं आता

दो पैसे में पट्टी पुजती/गुनिया होने को

तुतली पीठ न दुहरी होती/सपने ढोने को

ढैया रटते , छोटे बस्ते

जाने कहाँ गए ?

- डॉ0 रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’

86 तिलक नगर, बाईपास मार्ग, फिरोजाबाद- 283203 (उ0प्र0)

दूरभाष: 9412316779

        *

        (5)

घाट का पत्थर                    

कितना पथराया हुआ है 

                घाट का पत्थर 


छू रही है देह उसकी 

देह जल की 

किन्तु सिहरन

तक नहीं होती है हल्की 

देखने में ठोस है वह 

                खोखला भीतर


हो चुकी हैं

लहरें 

निर्वासित नदी से 

गंदे नाले कम नहीं हैॅ 

त्रासदी से

कौन जीये 

हर घड़ी-हर पल 

                जहर पीकर


अम्ल डूबा 

क्षार लिपटा गल रहा है 

जल-चिता में

धीरे-धीरे जल रहा है 

शव सरीखा 

है पड़ा अब तो 

                विवश होकर ।।

  - गणेश ‘गम्भीर’

  घास की गली, वासलीगंज, मीरजापुर-231001 (उ0प्र0)

            दूरभाष: 9335407539

                        ’*

                       (6)

गीत नहीं बंजारे होते

गीत नहीं बंजारे होते

होते इनके ठाँव,

बस्ती होती इनकी अपनी

अपने होते गाँव।


हुए कभी यायावर तो भी 

चिट्ठी पाती भेजें,

नेह छोह अपनी माटी की 

गन्धी भाव सहेजे,

उड़ें गगन लेकिन धरती पर,

रखना चाहें पाँव।


गोत्र हुआ करता है इनका

शाखा सूत्र सजाए,

भाई-बन्धु छन्द सुर-लय के

मंगल गान सुनाएँ,

शब्द-अर्थ सत फेरे लेकर

रचते भाव-विभाव।


कभी घिरे कुरुओं से तो भी

पाण्डव जैसे रहते,

कई बरस बनवास बिता कर 

फिर सिंहासन चढ़ते,

महाविनाश बचाने को वे 

पाँच माँगते गाँव।                                                                                                                                                                                                                                                                                            संवेदन की मरी चेतना

सिर्फ दिखाऊ खबरें।।

     - ओम धीरज

 सारंगनाथ कालोनी, सारनाथ वाराणसी

           दूरभाष: 8887952004

                  *

                (7)

  क्यों दुनिया खारी की हमने ? 

    अपनी प्यास बताए बिन ही

    झीलों से यारी की हमने।


                अपनी लहर छिपा कर हमने 

                रखने चाहे कूल सरस-से

                जैसे कोई जब्त करे दुःख

                रुक-रुक कर सिगरेटी कश से

                अपनी नदी सिन्धु तक भेजी

                क्यों दुनिया खारी की हमने ?


    अपनी पँखुड़ियाँ बिखेर कर 

    हमने लाल किये नाते कुछ

    रोक रहे हों हठी बारिशें

    उड़-उड़ कर मानों छाते कुछ

    रच कर फूलों की कहानियाँ 

    हर धड़कन क्यारी की हमने।


                खुद के इर्द-गिर्द खाई-सी

                आईं नजर बन्दिशें हमको

                फिर भी इन्द्रधनुष-सा हमने

                खुशगवार रखा मौसम को।

                मन को शाखों सा फैलाकर 

                विस्मित हर आरी की हमने।

               - डॉ0 सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी 

              (पूर्व गृहसचिव, उ॰प्र॰ शासन)

14/34, इन्दिरानगर, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

             दूरभाष:  9918165747 

                           *

                        (8)

          बूढ़ी अम्मा          

हीरा मोती सोना चाँदी

जमींदार से खेत छुड़ाया

अब क्या मजबूरी

मनरेगा दे रही गाँव को

ऊँंची हीरा मजदूरी

बँटवारा  ही कलह-क्लेश में

चला रहा फरसे

बूढ़ी अम्मा पड़ी खाट पर

रोटी को तरसे


परदेसी दामाद व बेटी

अपने में खोए

नई सभ्यता में क्यों बासी

परम्परा ढोए

चिंता दाह देख हर रिष्ते

दूर हुए दर से

बूढ़ी  अम्मा पड़ी खाट पर

रोटी को तरसे


सूनापन को दूर भगाती

खैनी की ताली

रात-रात भर खांसी करती

घर की रखवाली

दूर खड़ी है मौत 

साहसी जीवन के डर से

बूढ़ी अम्मा पड़ी खाट पर

रोटी को तरसे।

- डॉ॰ हरीलाल ‘मिलन’ (साहित्यभारती)

दुर्गावती सदन, हनुमन्तनगर, मछरिया रोड, नौबस्ता, कानपुर-21

      दूरभाष: 9935299939

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           (9)


    अभी समय है

 मुँह फेरे बैठे घरवाले

माथे पर हैं बल

घोर अनादर की मुद्रा में

प्रश्न बहुत, कम हल


बात-बात पर तू-तू-मैं-मैं 

दंगल होते हैं 

अर्थहीन संवाद दिलों में

जंगल बोते हैं 

संबंधों के मानचित्र पर 

फैला केमिकल 


आलीशान कोठियाँ लेकिन 

गुमसुम दीवारें 

कड़ुवाहट के पड़ जाते हैं 

छींटे-बौछारें 

कौन किसे दे प्रेम-पँजीरी  

बाँटे तुलसीदल 


रातों-से दिन सन्नाटों में 

होने वाले हैं 

हमी स्वयं को और स्वजन को 

खोने वाले हैं 

अभी समय है आओ मिलकर 

कर लें सही पहल।

- प्रो॰ डॉ॰ अवनीश सिंह चौहान

पीलीभीत बाईपास रोड, बरेली- 243006 (उ0प्र0) 

चलभाष: 09456011560


                  









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