भारत, भारतीयता, संस्कृति तथा प्रज्ञान का रत्नाकर ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
-समीक्षक: डॉ॰ व्यासमणि त्रिपाठी
.....‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ को सृजित करने का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग यानी ककहरा प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि अत्यन्त प्रखर बौद्धिकता के साथ उसका वृहद स्वरूप निरूपण है। विजय रंजन की यह विनम्रता है कि उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ रखा है, जबकि यह भारत, भारतीयता, संस्कृति तथा प्रज्ञान का रत्नाकर है। यह ऐसा ग्रंथ है जिसमें भारत के अतीत का गौरवगान तो है ही, भारत के सम्बन्ध में आधुनिकता का ढिंढोरा पीटने वाले विचारकों की राय भी शामिल है।
भारतेतर राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद की तुलना की प्रणाली है, तो इस गं्रथ के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश भी है कि भारतीय राष्ट्रवाद कोई वायवीय या काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ आधारों पर आधृत एक व्यवहारिक वास्तविकता है। यह बताने की कोशिश है कि भारतीय मनीषा की दृष्टि में राष्ट्रवाद मात्र एक भाव या विचार नहीं है, बल्कि संस्कार का एक रूप भी है। संस्कार भी कैसा ? जो राष्ट्र की अस्मिता, इयत्ता, गरिमा की रक्षा के साथ-साथ राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं की संरक्षा, राष्ट्र के उत्कर्ष के साथ-साथ राष्ट्र जन की सुख-समृद्धि के निमित्त राष्ट्रिक को व्यवहार्यतः सद् आचारी बनाने का उपक्रम है। यह सब बताने के लिए विजय रंजन के पास ज्ञान का अपार भण्डार है तो भाषा का अद्भुत कथन-कौशल भी है। उद्धरणों की भरमार है तो प्रस्तुति की अद्भुत कला भी है। उनके पास अकाट्य तर्क हैं तो भिड़ने का साहस भी है। ........वे उन भ्र्रान्तियों और भ्रमों का जोरदार खण्डन करते हैं जो प्रतिपक्ष की ओर से प्रचारित किए गए हैं। ...
‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ एक विशिष्ट ग्रन्थ है जिसमें पौर्वात्य और पाश्चात्य ग्रंथों के अनुशीलन की आभा है, लोक में प्रचलित मान्यताओं और अनुश्रुतियों की चमक है, ऋषियों/मुनियों की साधना से निष्पन्न विचारों और भावनाओं का आलोक है, नानापुराणनिगमागमसम्मत सम्मत तर्कजाल है तथा लीक से अलग चल कर नवीन विषय के संधान का विधान है। इसीलिए ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ सिर्फ एक सामान्य पुस्तक नहीं बल्कि इसमें वह सबकुछ है जो भारत और भारतीयता को गौरव दिलाने के लिए आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है।...............भारतीय राष्ट्रवाद को लेकर विभिन्न मतवादों और संभ्रमों की ओर भी विजय रंजन ने ध्यान आकृष्ट किया है। उन्हें इस बात का दुःख है कि कुछ पाश्चात्य और देशी विचारक अपनी अल्पज्ञता का परिचय देते हुए ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ को ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’, ‘संकीर्ण धार्मिकतावादी राष्ट्रवाद’, ‘ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद’, ‘जातिभेदी लिंगभेदी राष्ट्रवाद’, ‘कूपमण्डूक राष्ट्रवाद’ सदृश कदर्थक नाम देने से गुरेज नहीं करते। इतना ही नहीं विजय रंजन ने भारतीय राष्ट्रवाद की उत्पत्तिजनक अनेक संभ्रमों का न केवल उल्लेख किया है बल्कि उनका तार्किक निवारण भी किया है। उन्होंने भारतीय जनमानस को अनर्गल उवाचों और संभ्रमों की चिन्ता नहीं करने की सलाह भी दी है और स्वयं को बचाने का उपाय भी बताया है। उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की बाधक शक्तियों की ओर भी इशारा किया है। किन्तु उन्हें विश्वास है कि भारतीय राष्ट्रवाद की प्रगति में चाहे जितनी भी विघ्न-बाधाएँ आएंगी, वे सब नष्ट हो जाएंगी क्योंकि भारतीय राष्ट्रवाद सर्वथा सत्त्वशील, ऋतशील, नयशील, उदात्त, उदार, सात्त्विक, रागात्मक रचनाधर्मी, अहिंसक , शान्तिकामी और लोकसंग्रही है, और इसकी ध्वनियाँ आगामी युग के कानों तक भी पहुँचती रहेंगी।
-एन॰ जी॰ 22, टाइप 5, नया गाँव चक्कर गाँव, पोर्टब्लेयर, अण्डमान-744112, दूरभाष: 9434286189
भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग एक सार्थक प्रयास
- समीक्षक : डॉ॰ रामकृष्ण लाल ‘जगमग’
भारतीयता और राष्ट्रवाद पर पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है.......लेकिन विजय रंजन जी की पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ में नया अन्वेषण दिखाई देता है।.........एक बार जो पाठक इसे पढ़ लेगा वह देश की आत्मा को आत्मसात् कर लेगा। लेखक ने इस कृति के सृजन में अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया है। यह पुस्तक नितान्त मौलिक और शोधपरक है। .......पुस्तक का अध्ययन करने से पता चलता है कि लेखक ने देश के धारा-प्रवाह को निकटता से देखा है। ...... राष्ट्रवाद की धारा के मजबूत हस्ताक्षर हैं विजय रंजन जी। उनकी इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मैं दावे से कह सकता हूँ कि कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ बेहद उपयोगी है।.....यह पुस्तक समाज में नवजागरण पैदा करेगी। इसको अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।......
- सम्पादक ‘शब्द सुमन’, कटरा बस्ती (उ॰प्र॰), दूरभाष: 9792178747
साहित्य-साधक विजय रंजन का अप्रतिम अवदान
भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
- समीक्षक : डॉ॰ सुधा राय
साहित्य-साधक विजय रंजन का एक अप्रतिम योगदान सद्यः प्रकाशित ग्रन्थ ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ के रूप में प्राप्त हुआ है, जो उनकी सातवीं समालोचना कृति है और अति महत्त्वपूर्ण है। .......कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ (2022) उपेक्षा, घृणा, तिरस्कार और हेयता की दृष्टि से देखे जाने वाले राष्ट्रवाद (वस्तुतः पश्चिम-प्रणीत राष्ट्रवाद) के सापेक्ष भारत में आदि-युग ‘ऋग्वैदिक युग’ से अद्यतन प्रचलित राष्ट्रवाद (भारतीय राष्ट्रवाद) का अन्तर गहन गम्भीर रूप से रेखांकित करते हुए भारतीय राष्ट्रवाद की सार्वकालिक, सार्वभौमिक सार्वश्रेष्ठता को निरूपित कर प्रत्यक्ष करती है। ....... ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ की विशेषता यही है कि इसमें सिद्धान्त और तथ्यों के अनुरूप अनेकानेक उद्धरण एवं प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कृतिकार श्री रंजन ने कृति के प्रत्येक वाक्य के रेशे-रेशे से भारतीय राष्ट्रवाद के न केवल सैद्धान्तिक वरन् व्यवहारिक स्वरूप को भी भावक के सम्मुख साक्षात् प्रत्यक्ष कर दिया है जिसे तर्क (वस्तुतः कुतर्क) से नहीं सतर्क होकर समझने-पढ़ने की आवश्यकता है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ की विशेषता यह भी है कि भारत की जनता (वस्तुतः बहुसंख्यक हिन्दू को) धर्म-निरपेक्ष बनाने की कवायद में मूल भारतीय संस्कृति के तत्त्वों को पाठ्यक्रम का हिस्सा न बनने देने और भारतीय संस्कृति के प्रति भारतीय जन के मन में अनास्था उत्पन्न करने सदृश कुत्सित प्रयासों के फलस्वरूप उपजी अनास्था, भ्रान्त अवधारणाओं को यह कृति अपने अकाट्य सतर्क तथ्यपरक सुतर्कों से खण्ड-खण्ड करती है। कहना आवश्यक है कि सर्वोत्कृष्ट, जैविक मानव (मानव रूपी पशु) को पशु से ‘मनुष्य’ बनने का मार्ग दिखा कर मानव की भौतिक ही नहीं, आध्यात्मिक उन्नति को भी प्रशस्त करने वाली किन्तु उपरि इंगित कारणों से भूली-बिसरी (या सत्य कहें तो भुलवा-बिसरवा दी गई) भारतीय संस्कृति के तत्त्वों एवं विशिष्टताओं को यह कृति सांकेतिक रूप में जनमानस के सम्मुख रखती है। यही नहीं, लेखक ने अपनी कृति में भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा ‘जन्मजात ऋण’ की विवेचना करते हुए वर्तमान भारत में भारतीय राष्ट्रवाद को क्षीण करने के कदाशय से किए जाने वाले अपघातों का निराकरण करने के लिए जन्मजात ऋणों की शृंखला में एक नवीन ऋण ‘राष्ट्र-ऋण’ एक नवीन को जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। लेखक का मानना है कि अन्य जन्मजात ऋणों के समान राष्ट्र ऋण से भी उन्मुक्ति आवश्यक माना जाने पर देशवासियों के मन में राष्ट्रवाद सर्वदा स्वतः जीवित और जीवन्त बना रहेगा और तब राष्ट्रवाद के अभाव से होने वाली समस्याओं से स्वतः मुक्ति मिल जाएगी।
भारतीय संस्कृति से उपजे भारतीय राष्ट्रवाद के उत्थान-पतन के साथ-साथ देश, समाज, संस्कृति आदि के उत्थान-पतन का सम्बन्ध विवेचित करके यह कृति भावक के सम्मुख वर्तमान सत्य वस्तुस्थिति को भी प्रत्यक्ष करती है जिससे भारतीय जन वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक राष्ट्रीय समस्याओं के मकड़जाल से मुक्त होने के लिए विचार करे और इसके लिए शीघ्रातिशीघ्र अपनी सक्रिय भूमिका निभाए। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कृति में कृतिकार ने अनेक सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याओं के निदान का मार्ग अपनी ओर से भी सुझा कर अपनी सक्रिय भूमिका निभा दी है।
दीर्घकाल से ही भारतीय संस्कृति की सर्वोत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था ‘वर्ण-व्यवस्था’ को हेय दृष्टि से देखा जाता है और ‘वर्णव्यवस्था’ के आधार पर भारतीय संस्कृति का घोर विरोध, निन्दा आदि की जाती है क्योंकि निन्दक जाति-व्यवस्था के मूल में वर्ण-व्यवस्था को ही उत्तरदायी बताते हैं। ‘वर्ण-व्यवस्था’ के सम्बन्ध में सत्य तथ्य तो यह है कि छठीं शताब्दी में इसके मूलाधार ‘व्यक्ति का गुण-कर्म’ को जबरिया जन्मना बना कर समाज में प्रचलित कर दिया गया। मूल वर्ण-व्यवस्था में जहाँ व्यक्ति के जन्मना वर्ण में गुण-कर्म के आधार पर परिवर्तन कर दिए जाने की सौ प्रतिशत व्यवस्था थी, वहीं, जाति-व्यवस्था में जाति-परिवर्तन की कोई व्यवस्था न पूर्वकाल (इसके जान्मिक काल) में थी और न ही आज है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस आधार -परिवर्तन के अनेकानेक दुष्परिणाम पूर्वकाल से लेकर अब तक अनेकशः जब-तब प्रत्यक्ष होते रहे हैं जिससे आज भी भारत का हिन्दू समाज जाति-व्यवस्था जनित अनेकानेक सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है। इस पुस्तक में लेखक ने अपनी गहन विश्लेषक तर्क-दृष्टि और वाङ्मयिक ज्ञान का सहारा लेकर उपरि इंगित व्यवस्थाओं का नीर-क्षीर विवेकी विश्लेषण करके दोनों व्यवस्थाओं का अन्तर स्पष्ट किया है। ‘ब्राह्मण’ वर्ण की शेष वर्णों (या कि वर्तमान में जातियों) पर श्रेष्ठता स्थापित करने वाले ऋग्वेदीय ‘पुरुष सूक्त’ की ऋचा (”ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः, उरू तस्य यत्वैश्यः पदभ्यां शूद्रोऽजायत।” ) की सुतार्किक विवेचना करते हुए श्री रंजन जी लिखते हैं- ”अब जहाँ तक ‘पदभ्यां शूद्रोऽजायत’ से ‘शूद्र’ को ‘छोटा’ या ‘अपावन’ माना जाने का प्रश्न है, उस फलक पर देखना होगा कि विष्णु के चरण से गंगा निःसृत बताई जाती हैं; लेकिन गंगा को देवीस्वरूपा और पूजनीया ही बताया गया है। विष्णु के पद से निःसृत होने के कारण ‘निकृष्ट, गर्हित, निन्दनीय, असम्माननीय या त्याज्य’ नहीं है गंगा। इसके विपरीत गंगा के जल को उसके कल्याणकारी गुणों के कारण परम पवित्र और महापूजनीय माना जाता रहा है भारतीय मनीषियों द्वारा। (सब समझने और सहजतः स्वीकारने पर चर्चा हो रही है) त..ब, विराट पुरुष के पैर से निःसृत या कि अजायत ‘शूद्र’ को अपावन कैसे माना जा सकता है ?“
भारत की सनातन परम्परा में दण्डवत् चरण-स्पर्श की दावेदारी करता है, सबसे अधिक चलने वाला चरण ही पूजनीय है। भारत में चरण-वन्दना ही श्रेष्ठ वन्दना है जबकि विदेश में ‘माई फुट’ एक गाली के रूप में है। बहुत गम्भीरता से विचार कर सद्ग्रन्थों के माध्यम से समाधान की ओर यह पुस्तक अध्ययनकर्त्ता भावक को सीधा सम्प्रेषित करती है- ”ऐसी दशा में ‘पदभ्यां शूद्रो अजायत’ वाले ‘शूद्र’ को भी ‘नीच’ नहीं अपितु उनके ‘पवित्र अर्थात् सात्त्विक एवं कल्याणकारी गुणों’ के आधार पर ‘पूज्य’ अर्थात् सम्माननीय माना जाना चाहिए।“ (पृ0 135)
किन्तु दुःखद है कि आज जातिगत इतना वितण्डावाद है कि सब तरह से अपमानित हुए शक्तिहीन, दुर्बल, दलित हेतु आरक्षण तक की व्यवस्था सरकार द्वारा कर डाली गई किन्तु जन्मना ब्राह्मण-जातीय, जन्मना क्षत्रिय-जातीय आदि की कथित श्रेष्ठता (शब्दान्तर से कहें तो बाभनवाद, ठाकुरवाद) जनित वैमनस्य का ज्वर आज तक भी शान्त नहीं हुआ।
यह कृति अनेकानेक देशज-विदेशज तथ्यपरक प्रमाणों को प्रस्तुत कर वर्ण-व्यवस्था की श्रेष्ठता को प्रमाणित करते हुए इस भ्रान्ति का भी सफल निवारण करती है कि वर्णव्यवस्था अन्यायपरक, समाज-तोड़क, अधर्मपरक व्यवस्था थी। कृतिकार ने बीसों उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि वर्ण-व्यवस्था में वर्ण-परिवर्तन की छूट थी जो समाज में सर्वमान्य थी (पृ0 136-140)। वास्तव में व्यक्ति के गुण, कर्म के आधार पर उसके जन्मना वर्ण के अन्य वर्ण में परिवर्तन की छूट की अपनी इसी विलक्षण व्यवस्था के कारण वर्ण-व्यवस्था मानव-समाज को एकसूत्र में आबद्ध कर समाज के प्रत्येक मनुष्य की लौकिक, पारलौकिक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त करने का सर्वोत्तम आधार प्रदान करने वाली व्यवस्था है। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लेखक लिखता है- ”नागजातीय अर्बुद, जात्कर्ण आदि जन्मना शूद्र थे। ऐतरेय ब्राह्मण के रचयिता महीदास तथा ऋषि रैक्व, ऋषि मतंग प्रभृति विभिन्न ग्रंथों के रचयिता अन्यान्य ऋषिगण जन्मना शूद्र ही थे। महाभारत के रचनाकार महर्षि व्यास स्वयं जन्मना संकरज शूद्र थे।...अनेक शूद्र राजाओं को राजन्य का मान दिया गया था। यथा- 100 अश्वमेध यज्ञ करने वाले आयोगज राजा मरुत जन्मना शूद्र थे। विक्रमशिला विद्यापीठ के संस्थापक राजा धर्मपाल जन्म से शूद्र थे। प्राचीन भारत में महाराज महापùनन्द जन्मना जाति से नाई थे। महाभारत के अनुसार हस्तिनापुर का राज्य मछुआरिन सत्यवती के पुत्र को दिया गया था। मालवा का राज्य चरवाहा होल्कर को दिया गया था।“
रामायण युग में ”सभी राम को प्रिय थे, राम सभी को अति प्रिय थे। अतः ‘जाति-पाति पूछै नहि कोई। हरि को भजै सो हरि कै होई।।’
इसी प्रकार आज महिला-सशक्तिकरण पर जोर दिया जाता है किन्तु यह पुस्तक बताती है कि अपाला, घोषा, शची, अदिति, आत्रेयी, विश्ववारा सभी जन्मना शूद्रा थीं किन्तु वे सब वैदिक ऋषिकाएँ ही थीं।
वास्तव में आदिकाल से ही भारत में महिला सशक्त रही है किन्तु कालान्तर में मध्यकाल से परवशता के शिकार हम सभी रहे हैं, जिससे इसका पतन हो गया। मानसिक परतन्त्रता से मुक्त होना ही इस पुस्तक की सार्थकता है।
स्वतंत्र भारत में हमारी दूषित मनोवृत्ति और हमारे राजनेता, साहित्यकारों (वामपंथी) ने हमें कहाँ से कहाँ खड़ा कर दिया ! इन सन्दर्भों में भी देखें तो निस्संदेह यह पुस्तक भारत, भारतीयता और सनातन सुचिन्तना का दस्तावेज है, जिसे व्यवहार में अपना कर जाति-बिरादरी, छूत-पाक, छूत-अछूत तमाम तरह की टकराहट एवं विसंगति समाप्त हो सकती है।
इस कृति में देश-विदेश के विद्वानों के राष्ट्रवाद-सम्बन्धी पक्ष-विपक्ष के विचारों को सविस्तार से प्रस्तुत करते हुए पाश्चात्य राष्ट्रवाद के सापेक्ष भारतीय राष्ट्रवाद के अन्तर को महीन-दर-महीन स्पष्ट करते हुए भारतीय संस्कृति पर आधारित भारतीय राष्ट्रवाद को सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक रूप में श्रेष्ठ और सर्वकल्याणकारी बताया गया है।
वास्तव में इस पुस्तक में वह ज्ञान-निहित है जिसकी प्राप्ति के लिए इस पुस्तक का प्रत्येक पाठक श्री रंजन जी का चिर ऋणी रहेगा। यह ऋण उनके इस पुस्तक के मात्र अध्यवसाय एवं आलोचना से नहीं चुकाया जा सकता है। भारतवासी होने के कारण इस ऋण को हम तभी चुका सकते हैं जब हम सभी इस ज्ञान को ‘मात्र ज्ञात नहीं’ वरन् मनसा-वाचा-कर्मणा आत्मसात् कर अपने दैनन्दिनि व्यवहार में ढाल कर देश, समाज, संस्कृति आदि को चिरकालीन अस्तित्वमान बनाने के अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करें।
- प्रोफेसर, राजा मोहन गर्ल्स पी॰जी॰ कालेज, अयोध्या-224001
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राष्ट्रवाद का सम्पूर्ण वर्ण-विन्यास
भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
-समीक्षक: डॉ॰ राजेन्द्र त्रिपाठी ‘रसराज’
‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ आदरणीय विजय रंजन जी द्वारा प्रणीत ......पुस्तक.... के आमुख कलेवर को देखकर ही इसके राष्ट्रीय सद्भावनाओं से ओतप्रोत कृति के होने की अन्तः अनुभूति जागृत हुई। ......वस्तुतः लेखक का चिन्तन-गाम्भीर्य इतना व्यापक और वैविध्यपूर्ण प्रतीत हुआ, जो उसके सहज एवं हृदयस्थ विचारों को अनेकशः अभिनव अनुभूतियों के साथ प्रस्तुत किए जाने पर संप्रेरित करता रहा। ..... लेखक के मन में विलुप्त होती हुई सनातन संस्कृति की चिन्ता है, राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की उदात्त चिन्तन परम्परा में होने वाले विघटन की चिन्ता है। अपने अतीतकालीन भारत की राष्ट्रीयता को लेकर लेखक चिन्तित है। क्या है भारत, क्या है भारतीयता, क्या है राष्ट्र और क्या है राष्ट्रीयता, क्या है इन शब्दों की सच्ची सार्थकता ? लेखक की दृष्टि में ये केवल शब्दमात्र नहीं हैं, अपितु इन्हीं शब्दों में हमारी वैदिक व सनातन संस्कृति के सारे स्रोत निगूहित पाए जाते हैं। ........ लेखक ने कितना गहन अध्ययन और अनुसन्धान किया है, उसके द्वारा प्रस्तुत किए गए सन्दर्भ वस्तुतः विचारणीय हैं। भारतीय और पाश्चात्त्य दोनों प्रकार के महनीय आदर्शों और महापुरुषों के उच्चरित वाक्यों को समुद्धृत कर राष्ट्रीयता की जो मीमांसा की गई है, वह वस्तुतः अत्यन्त प्रशंसनीय है। एक पुस्तक में एक साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता को लेकर भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों की क्या अवधारणा है, इनका कैसे-कैसे विश्लेषण किया गया है और कितने सन्दर्भों को संकलित किया गया है, वास्तव में ये सामान्य कार्य नहीं है। शोधपरक और प्रामाणिक सन्दर्भों के उल्लेखों को उद्धृत कर लेखक ने विषय को न केवल पुष्ट किया है बल्कि हर पाठक के लिए इसमें इतनी सामग्री संकलित कर दी है जिससे राष्ट्रीयता को जितना भी चाहे जी भरके आकलन किया जा सकता है। ......वैदिक युग से लेकर वर्तमान युग तक की उन्नतावनत परिस्थितियों का अवलोकन पूरे ग्रन्थ में द्रष्टव्य है। .......सारे तथ्यों को बहुत ही श्रमसाध्य-अन्वेषण और अनुसन्धानपरक प्रमाणों के साथ संकलित किया गया है। लेखक का यह परिश्रम निश्चित रूप से स्तुत्य और सराहनीय है। .......ऐसे सुधी लेखक की साहित्यिक सपर्या से निःस्यूत यह ग्रन्थ भारतीय राष्ट्रवाद का ऐसा निकष है जिस पर सनातन संस्कृति की अस्मिता को परखा और पहचाना जा सकता है। लेखक का यह ग्रन्थ भारतीय राष्ट्रवाद का न केवल क ख ग है, अपितु समूचा वर्णविन्यास है .......लेखक की सारस्वत साधना का परिचायक यह ग्रन्थ साहित्य-समाज में अत्यन्त लोकप्रिय और उसकी कीर्ति को चिरकाल तक अक्षुण्ण कर सके, यही मेरी मंगल कामना है।
- संस्कृत विभाग, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज,
मोबाइल: 9415645722
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भारत राष्ट्र की पहचान है ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
- समीक्षक: डॉ॰ माया प्रकाश पाण्डेय
विजय रंजन जी के द्वारा लिखित उनकी नवीनतम पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ ...... उनकी राष्ट्र-भक्ति, देश को देखने व सोचने का उनका नज़रिया और राष्ट्र को लेकर उनके चिन्तन-मनन का परिणाम है जो आज एक ग्रन्थ के रूप में हम सबके सम्मुख प्रस्तुत है। इसके माध्यम से राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण भाव का आभास हो जाता है। प्रथमद्रष्टया पुस्तक बहुत ही आकर्षक है और उसमें भी कवर पेज पर माँ भारती स्वयं विराजमान हैं तो सब मंगल ही है।............. भारत-भूमि की मिट्टी से पोषित होकर, पल-बढ़ कर जो विशाल आकार ग्रहण करता है वही है ‘भारतीय राष्ट्रवाद’। संभवतः इसी को विजय रंजन जी ने भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग संज्ञा से अभिहित किया है।
विजय रंजन जी ने रामधारीसिंह ‘दिनकर’ की उर्वशी काव्य-संग्रह से दो पद पुस्तक के प्रारम्भ में दिए हैं जिसमें संभवतः यह कहने का प्रयास किया गया है कि चिंतन की क्षमता मानव में है, वह अपने चिंतन से वर्तमान को सुन्दर बनाने में प्रयासरत रहता है, उसी आधार पर भविष्य का निर्धारण कर लेता है और उसी के द्वारा खड़ी की गई आधारशिला पर टिक कर आगामी पीढ़ी कार्य करने की दिशा में प्रेरणा पाती है। यह संदर्भ इस पुस्तक के भावसौन्दर्य में चार चाँद लगाता है। .......‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पुस्तक में आचार्य डॉ॰ मनोज दीक्षित जी ने शुभाशंसा लिखी है जिसमें उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद के संदर्भ में लिखा है कि ‘यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा का विस्तृत एवं सुविवेचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है।’ .............विजय रंजन जी ने भारतीय राष्ट्रवाद को जहाँ एक ओर भारतीयता के संदर्भ में समझने का प्रयास किया है वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक आधार पर, परंपरागत बोध के आधार पर, सात्त्विक जीवनदृष्टि तथा वैज्ञानिक विवेक आदि के परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया है- .....‘‘ इन परिप्रेक्ष्यों में भारत एवं भारतेतर जगत् की मौलिक प्रकृति-प्रवृत्ति में भारी अन्तर होने से ‘भारतेतर राष्ट्रवाद’ बनाम ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के मूलभूत अन्तर को रूपायित करना कृति की विरचना का प्रमुख कारक रहा है।’’
पूर्वार्चिक के अन्तर्गत लेखक ने प्रस्तावना, भारतीयता का स्वरूप, भारतीयता के प्रमाणक सांस्कष्तिक वैशिट्य के साथ-साथ भारतीय सांस्कष्तिकता और धर्म एवं उसके अनुषंग का विस्तष्त विवरण प्रस्तुत किया है।
मध्यमार्चिक के अन्तर्गत उन्होंने राष्ट्रवाद संबंधी कतिपय प्रत्यय, राष्ट्रवाद और भारतीय मनीषी, राष्ट्रवाद और भारतीयेतर विचारक, राष्ट्रवाद के प्रलाभ, राष्ट्रवाद की उपेक्षा से कारित हानियाँ तथा राष्ट्रवाद के व्यावहारिक स्वरूप को प्रस्तुत किया है। उत्तरार्चिक के अन्तर्गत भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट प्रत्यय, भारतीय राष्ट्रवाद संबंधी संभ्रम, भारतीय राष्ट्रवाद अधोमुख क्यों, भारतीय राष्ट्रवाद की बाधक शक्तियों की चर्चा-विचारणा करते हुए अन्त में लेखक ने उपसंहार दिया है। इसी क्रम में परिशिष्ट के अन्तर्गत आधार-ग्रंथ एवं पत्रिकाएँ तथा कृतिकार का परिचय प्रस्तुत करके इस ग्रन्थ को परिपूर्णता प्रदान की गई है।
भारतीय राष्ट्रवाद के अर्थबोध को विस्तष्त फलक पर रखते हुए विजय रंजन जी ने इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि ‘‘भारतीय राष्ट्रवाद ! .......... इसका वैशिष्ट्य मात्र यह नहीं कि यह ‘भारत’ से सम्बन्धित है, व..र..न् इसका वैशिष्ट्य यह है कि ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ राष्ट्रवाद के उस स्वरूप का परिचायक है, जो सात्त्विक, शान्तिकामी, रागात्मक रचनाधर्मी, सर्वकल्याणक भारतीयता से समेकित एवं सामासित स्वरूप है औ...र जो आविश्व ‘प्राचीनतम, मौलिक और अप्रतिम’ भी है।’’ ........ विजय रंजन जी की पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ निश्चित रूप से उत्कृष्ट कोटि की है। यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद की सही व्याख्या करने वाली और मिथ्या, भ्रमित करने वाले विचारों से लोगों को जागरूक करने वाली है। विजय रंजन जी ने भारतीय परम्परा का विधिवत् अध्ययन किया है और अपने जीवन के अनुभव द्वारा जो शिक्षा प्राप्त की है, उसे आप सबके समक्ष ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक पठनीय तो है ही साथ ही संग्रहणीय भी है क्योंकि ऐसी अमूल्य पुस्तकें कभी-कभी ही आती हैं। विजय रंजन जी इसी तरह से अपने ज्ञान और अनुभव को पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करते रहें जिससे भारत राष्ट्र, भारतीय परम्परा, भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्य समृद्ध होता रहे, यही मेरी मनोकामना है। अस्तु।
- सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, कला संकाय,महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा, गुजरात, चलभाष : 9662676329
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गागर में सागर है : ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
- समीक्षक: डॉ॰ चम्पा प्रिया
वर्तमान समय में जहाँ लोग अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं, वहाँ राष्ट्रहित, जनकल्याण, राष्ट्र पर विचार तथा नई पीढ़ी को सटीक मार्ग दिखाने के लिए अपने राष्ट्र की अवधारणाओं का सुविस्तार विवेचन के लिए सोचना या कार्य करना अत्यंत श्रेष्ठकर लगता है और ऐसा कार्य वही कर सकता है जो अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित हो तथा राष्ट्रहित के लिए चिन्तित हो। माननीय विजय रंजन जी एक ऐसे ही व्यक्ति हैं जिनके राष्ट्रप्रेमी व्यक्तित्व की झलक उनके द्वारा रचित पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ में दिखाई देती है। ......जिस प्रकार वचन, लेखन, पठन के लिए वर्णों का ज्ञान आवष्यक है, ठीक उसी प्रकार भारतीय राष्ट्रवाद को समझने के लिए विजय रंजन जी की यह पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ अति आवष्यक है ।
किसी भी राष्ट्र को जानने के लिए उसके इतिहास को सही-सही जानना अत्यंत आवश्यक होता है। वैसे तो भारतीय इतिहास को जानने के लिए अनेक पुस्तकें हैं, जैसे भारत का संविधान, रामायण, महाभारत, पुराण, हर भाषा-साहित्य का अपना-अपना इतिहास, हर दौर में लिखित हर भाषा के साहित्यकारों की रचनाएँ, देश-विदेश के रचनाकारों द्वारा रचित हमारे तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार तथा अनेकों पत्र-पत्रिकाएँ। यह सारी रचनाएँ अपने-अपने स्थान पर सही हैं और इसके साथ इस बात को भी नहीं झूठलाया जा सकता है कि यह सारी चीजें एक प्रकार की भ्रांति भी उत्पन्न करती हैं। इस भ्रांति को मिटाने का आसान तरीका है ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’।
इस पुस्तक में जिन आधार ग्रंथों तथा पत्र-पत्रिकाओं को लिया गया है, वे इसकी प्रामाणिकता का ठोस आधार हैं। अगर वर्तमान परिस्थितियों को देखें, तो..... इस पुस्तक की प्रायोगिकता वर्तमान समय में अत्यधिक है। इस पुस्तक का हर एक अध्याय हमें अपने राष्ट्र के हित तथा इस पर आनेवाली मुसीबतों से बचने का रास्ता दिखाता है। जैसे- भारतीय तथा भारतीयेतर मनीषियों के विचार, भारतीय सांस्कृतिक वैशिष्ट्î, भारतीय शिक्षा, भाषा, वाणिज्यिक, विदेश, विधान नीति-संशोधन आदि जो एक राष्ट्र की आधारशिला होते हैं। लेखक की भाषा-गठन से उनके साहित्यिक विद्वता का पता चला है जो बहुत ही उच्चस्तरीय है। ......परन्तु विजय रंजन जी ने इस एक ही पुस्तक में भारत, भारतीय, भारतीयता, राष्ट्र , राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति नीति, इसकी चुनौतियाँ, समस्या, समाधान, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, अल्पसंख्यक, वर्णाश्रम तथा ऐसे अनेकानेक विषय तथा ‘यह क्या, क्यों, कैसे है ?’ इन प्रश्नों के उत्तर के साथ रेखांकित किया है। इन सारी बातों को देख यह कहा जा सकता है कि लेखक ने भारतीय राष्ट्रवाद जैसे विशाल सागर को अपनी लेखनी से इस पुस्तक रूपी गागर में भर दिया है।
- बेंगलुरू, दूरभाष: 7002417854
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राष्ट्रवाद सम्बन्धी एक विलक्षण कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
-समीक्षक: डॉ॰ पुष्पलता
‘भारतीय राष्ट्रवाद ...... ऐसा विषय है जिस पर लिखने के लिए जिस विस्तृत एवं सुविवेचनात्मक अध्ययन की क्षमता होनी चाहिए, वह लेखक में पूर्ण रूप से परिलक्षित है। पुस्तक .............जन्मजात ऋण विवेचित, नवीन जन्मजात ऋण ‘राश्ट्र ऋण’ प्रस्तावित आदि की सुग्राह्य विवेचना प्रस्तुत करती है। ...........यह पुस्तक राष्ट्रवाद का व्यवहारिक स्वरूप रेखांकित करती है। भारतीय राष्ट्रवाद क्या, क्यों, कैसे रेखांकित करती है, समझाती है और भारतीय राष्ट्रवाद बनाम भारतेतर राष्ट्रवाद का अंतर रेखांकित करती है। अल्पसंख्यक एवं राष्ट्रीयता के निकष राष्ट्रीय हित में प्रस्तुत करती है। भारतीय राष्ट्रवाद के सम्यक् प्रसार हेतु भारतीयतावादी, राष्ट्रवादी दृष्टि से शिक्षा-नीति संशोधन, भाषा-नीति संशोधन, विदेशनीति-संशोधन, विधान-संविधान संशोधन, वाणिज्यिक नीति संशोधन आदि की अविलम्ब करणीय कार्यवाही प्रस्तावित करती है।.......लेखक ने अपने शोधपूर्ण लेखों से सिद्ध करने का साहस किया है कि ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ ही प्रजातांत्रिक राष्ट्रवाद है।......राष्ट्रवाद के बारे में उठाए गए सभी सवालों, आश काओं, लगाए जाने वाले आक्षेपों के लेखक द्वारा सीधे, तर्कसंगत, सुग्राही उत्तर दिए गए हैं।..........राष्ट्रवाद ऐसा विषय है जिस पर समाज एकमत नहीं है क्योंकि हर व्यक्ति ने उसकी अपने हिसाब से व्याख्या कर ली है।
पुस्तक में उद्धरणों द्वारा लेखक ने .......असली राष्ट्रवाद सम्मुख रखा है। पाठक को पुस्तक में अपने मन की बातें भी मिलेंगी। सहमत भी होगा। ......पूर्वार्चिक, मध्यमार्चिक और उत्तरार्चिक तीन खण्ड में लिखी गई यह पुस्तक प्रत्येक बुद्धिजीवी को अवष्य पढ़नी चाहिए। इसमें हर उस सवाल का जवाब भी है जो उठते रहे हैं।
....पुस्तक में वह राष्ट्रवाद है जो अनेकता को एकता के सूत्र में पिरोकर उसकी कड़ियाँ जोड़ता है। वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं है।
प्रायः पुस्तक लेखक अपने व्यक्तित्व के आईने में बैठकर लिखता है, पाठक अपने व्यक्तित्व के आईने में बैठकर उसे पढ़ता है परन्तु यहाँ लेखक विजय रंजन पाठक को विश्व के अनेक विद्वानों के व्यक्तित्व के आईने में बैठाकर ‘उनके द्वारा भारत के विषय में क्या लिखा गया’ उससे परिचित कराते हैं। ......... जिस राष्ट्रवाद से लेखक ने मुलाकात कराई है, जिसे सराहा-लिखा है, प्रस्तुत किया है, समर्थकों एवं आलोचकों को ही नहीं हर भारतीय नागरिक को पढ़ना चाहिए उसके बिना हम अपने देष के उन्नत भविष्य की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो पाएंगे।
....... लेखक की श्रम-साधना वास्तव में चकित करती है, अतुल्य है, सराहनीय है। पुस्तक अद्भुत शोध ग्रंथ है। लेखक ने ‘राष्ट्रवाद क्या था, क्या हो गया’ इस पर भी अपना नीर-क्षीर विवेक वाला अभिमत प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक एक ऐसा समुद्र है जिसमें एक बार डुबकी लगाकर पाठक कुछ ही रत्न मोती निकाल पाता है।
..... पुस्तक में वर्णव्यवस्था, जातिव्यवस्था, अस्पृश्यता आदि सभी विषयों पर संवादात्मक शैली में इनसे सम्बन्धित हर प्रश्न का उत्तर है। पुस्तक में हर वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने वाली परिपक्व, सुधारवादी, उदार, नयल विचारधारा है, जो सामने वाले की सोच में अपेक्षित सुधार एवं उसकी पूर्वाग्रह से मुक्ति की अपेक्षा रखती है। उसके बाद उसे निस्संकोच गले लगाती है।
पुस्तक में ..... राष्ट्रवाद की उपेक्षा से कारित हानियों की तरफ भी ध्यान खींचा गया है; राष्ट्रवाद का व्यवहारिक स्वरूप भी प्रदर्षित है; भारतीय राष्ट्रवाद सम्बन्धित संभ्रम क्यों हैं, वह अधोमुख क्यों है, भारतीय राष्ट्रवाद की बाधक शक्तियाँं कौन सी हैं, सभी का तर्कसंगत उदाहरणों सहित विष्लेषण प्रस्तुत किया गया है। ...................
- अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, मुजफ्फरनगर
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मानस समान पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
- समीक्षक: डॉ॰ बीना शर्मा
विजय रंजन की पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ ..... पुस्तक को आद्योपांत पढ़ने के बाद मेरा जो विचार बना उसे ........लिखते-लिखते कई बार लगा कि लेखक ने हम सबके मन की ही बात तो नहीं लिख दी है। उन्होंने भारत का एक ऐसा चित्र खींचा है जो संपूर्ण भारतीयता को एक ही दृष्टि में सामने ला देता है। एक ऐसे विषय पर पुस्तक लिखने का साहस लेखक ने किया है जिस पर लेखन सुकर भले ही हो, लेकिन मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना विद्वानों की सभा में एकरूपता और सहमति होना बहुत मुश्किल है। अकेला राष्ट्रवाद ही बहुत व्यापक है। इसी पर लिखना पानी से मक्खन निकालना है और फिर यदि बात भारतीय राष्ट्रवाद की हो तो इसमें तो अन्य-अन्य संदर्भ और जुड़ जाते हैं।........ संक्षेप में निम्न बातें विशेषतः दृष्टव्य हैं -
# ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ के रूप में एक ऐसी पुस्तक जो मानस समान है जिसका ध्यान कर स्वयं के बनाए हुए अंधविश्वासों से मुक्त हुआ जा सकेगा। भारतीयता का सिर अब तक घायल है। विदेशों के कब्जे से भारत भूमि को वापस लेने का सार्थक प्रयास अब फलीभूत होना ही चाहिए।
# भारतीय शिक्षा नीति में भारतीयता पुट की रक्षा होनी चाहिए।
# हमारे पूर्वज जैसे पाठ्यपुस्तकों को पुनः पाठ्यक्रम में ले लेना चाहिए।
# भारतीय परिप्रेक्ष्य में वस्तुगत ऐतिहासिक राष्ट्रहित के सत्य तथ्यों को उकेरने वाला इतिहास लेखन होना चाहिए।
# यह भी विमर्श करना चाहिए कि ‘भारतीय संस्कृति’ बनाम ‘इण्डियन कल्चर’ को साफ-साफ समझा जा सके, प्रतिभा-पलायन को रोका जा सके।
# जो भारतीयता का जयगान नहीं करते, ‘वंदे मातरम्’ नहीं कह सकते, राष्ट्रीय अस्मिता/राष्ट्रीय सम्मान/राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान नहीं कर सकते, ऐसे हर मौन-मुखर दुष्प्रयास को तुरंत कुचल देना चाहिए।
# ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का अर्थ ‘अराजक स्वछन्दता’ कभी नहीं हुआ करता है। भारतीयता-विरोधी आचरण जो भी करेगा, उनसे संबंध तोड़ा ही जाएगा, यह संदेश बहुत स्पष्ट रूप से जाना चाहिए।
‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ एक ऐसी पुस्तक भारतीय पाठकों के समक्ष है जिसका यदि दशांश भी ग्रहण कर लिया जाए और उसे आचरण में ले आया जाए, भारतीय राष्ट्रवाद को समझ लिया जाए तो बहुत सारे षड्यंत्रों का पर्दाफाश हो सकता है, राष्ट्रवाद-विरोधी दुष्प्रवृति में कमी लायी जा सकती है तथा राष्ट्रवाद-विमुखता वाले बौद्धिक तथ्यों को निरोधित किया जा सकता है।
मेरी दृष्टि में इस पुस्तक को हर भारतीय को अवश्य पढ़ना चाहिए और भारतीय राष्ट्रवाद के सच्चे अर्थ को ग्रहण किया जाना चाहिए, तभी महिमावान् भारत और गरिमावान् भारतीय एकात्म भारत, देवो का देश भारत और सोने की चिड़िया वाला भारत के रूप में साक्षात किया जा सकेगा।
-पूर्व निदेशक, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा-282005,
मोबाइल : 9897223940
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भारत-भूमि की आत्मा से जुड़े राष्ट्रबोध का परिणाम भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
- समीक्षक: डॉ॰ के॰ सी॰ अजयकुमार
..............वास्तव में राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद क्या है ? क्या राष्ट्रवाद जिस प्रकार वर्तमान में कुछ विपक्षी पार्टियों द्वारा प्रचारित है, उसके अनुसार केवल हिन्दुत्ववादी और साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है या भारत-भूमि की आत्मा से जुड़े हुए राष्ट्रबोध का परिणाम है ?
श्री विजय रंजन की रचना ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ सच्चे अर्थों में भारतीय राष्ट्रवाद संबंधी सभी परिप्रेक्ष्यों की खोज करती है। इसमें केवल समस्याओं का उत्तर ही नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के मूलभूत तत्त्वों के दर्षन का, उसके आध्यात्मिक और भौतिक आधारों का परिचय भी है।
लेखक राष्ट्रीयता से संबंधित विविध गलतफहमियों व पाश्चात्य चिंतकों के विचारों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए भारतीय राष्ट्रीयता के मूल सिद्धांत के रूप में वैदिक अभिव्यक्ति “माता भूमि पुत्रोऽहम्” को प्रस्तुत करते हैं। इसी दृष्टिकोण के आधार पर जब इस देश की जनता भारतमाता कहती है उसके पीछे जो आत्मसंबंध है, उसके संबंध में सोचने को कृति-लेखक हमें बाध्य करते हैं। हम स्वाभाविक रूप से पूछते हैं कि इस भूमि में व्याप्त पंचभूतों से ही यह शरीर रूपायित है, तो स्वाभाविक रूप से पृथ्वी से उत्पन्न सभी के लिए यह पृथ्वी माँ ही तो है। इसी परिप्रेक्ष्य में लेखक भारतीयता के स्वरूप का भी समग्र विश्लेषण करते हैं। आसेतु हिमाचल विस्तृत इस भू-प्रदेश को सांस्कृतिक, दार्षनिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, आर्थिक, ऐतिहासिक संचेतना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इनमें से प्रत्येक का ऐतिहासिक विश्लेषण करके लेखक समझा देते हैं कि इनका ऐतिहासिक और वर्तमान महत्त्व क्या है। ‘भारत क्या है, भारतीयता क्या है’ जैसे अन्तर्निहित प्रश्नों का विस्तृत विवेचन लेखक के गहन अध्ययन और गरिमामय ज्ञान का निदर्शन करा देता है। ......राष्ट्रवाद पर भारतीयेतर विचारकों के अभिमतों का उल्लेख करते समय लेखक एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका की व्याख्या भी उद्धृत करते हैं, जो विश्व भर के राष्ट्रीयता-संबंधी दृष्टिकोण का भी परिचय देता है- ‘राष्ट्रवाद एक ऐसी मनोदशा है, जिसमें व्यक्ति अपने राष्ट्र-राज्य के प्रति उच्चतर भक्ति-भावना का अनुभव करता है।’ इसमें कोई संदेह नहीं कि माँ के रूप में अपने राष्ट्र के प्रति यह भक्तिभाव ही भारतीय राष्ट्रवाद की मूल चेतना में है। ..........संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय राष्ट्रवाद संबंधी गहन विश्लेषण के माध्यम से इसका विस्तृत परिचय देने में यह रचना सफल हुई है। संभवतः यह हिन्दी साहित्य के लिए ही नहीं, भारत राष्ट्र के लिए भी लेखक की महान देन है। यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद-संबंधी सभी विपरीत, राष्ट्रविरोधी धारणाओं से बचने और ‘राष्ट्रायवर्द्धना’ के आदर्श को आत्मसात् करने के लिए भी पर्याप्त ज्ञान पाठक को प्रदान करती है।
-93 A, Tejus, Kattachal Road, Tirumala, Thiruananthapuram, Pin : 695006 Kerala (India)
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राष्ट्रवाद की सैद्धान्तिकी : भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
- समीक्षक: डॉ॰ बलजीत कुमार श्रीवास्तव
वर्तमान समय में राष्ट्रवाद एक ज्वलंत मुद्दा बनकर भारतीय जनमानस के समक्ष उभरा है। राष्ट्रवाद के संबंध में भिन्न-भिन्न लोगों के भिन्न-भिन्न विचार हैं, लेकिन राष्ट्रवाद क्या है, इसकी सैद्धांतिकी क्या है, इस पर विजय रंजन लिखित पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग गंभीरता से प्रकाश डालती है। .............राष्ट्रवाद के सम्बन्ध में लेखक के विचार उल्लेखनीय हैं- ” ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ राष्ट्रवाद के सात्त्विक स्वरूप का परिचायक है जो सात्त्विक, शान्तिकामी, रागात्मक रचनाधर्मी, सर्वकल्याणक, भारतीयता से समेकित एवं सामासिक स्वरूप है और जो आविश्व प्राचीनतम मौलिक और अप्रतिम है।“ (पृ॰ 37)...... भारतीयता के स्वरूप को परिभाषित करते हुए लेखक लिखते हैंं- ”भारतीयता-समग्र (सात्त्विक वैदिक निदेशन सह भरतत्व सह भारतत्व सह शिवत्व सह रामत्व सह कृष्णत्व सह जिनत्व सह बुद्धत्व के संस्कारों का संश्लिष्ट स्वरूप) ही भारतीय संस्कृति है। .......“ (पृ॰ 57).......लेखक यह संकेत करना चाहता है कि भारतीयता एवं भारतीय संस्कृति केवल पुरातन ही नहीं है, रूढि नहीं है, अपितु भारतीय संस्कृति वैज्ञानिकता से युक्त है और भारतीयता के अंतर्गत ऐसे विज्ञान को महत्त्व दिया गया है जो कि धर्मसंगत हो, विनाशक नहीं, कल्याणकारी हों। ...... देवी भारती के अपररूप देवी सरस्वती के भी अनेकानेक गुणों (सारस्वतता यथा ज्ञान-प्रदान द्वारा ज्ञान-प्रसार, सत्वशीलता, पावनता, रागात्मक रचनाधर्मिता, तितिक्षा, चिन्मयता, धर्मालुता, लोक-कल्याणकता आदि गुणों) का विशेष आरोपण भारत के राष्ट्रीय चरित्र में यत्र-तत्र-सर्वत्र जाज्ज्वलित है। उससे विलग नही है भारतीय। भारतीत्व से भारतीय जन-मन की कथ-अनकथ सम्पृक्ति भारतीय जन के बहुलांशतया सत्त्वशील, ऋतशील, प्रज्ञाशील, तितिक्षाशील, रचनाधर्मी एवम् विश्रांति-प्रिय प्रकृति से भी स्वतः प्रमाणित है।
......पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद यह लगभग स्पष्ट हो जाता है कि भारतीयता, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति इस तरह से अन्तःसंबंधित हैं जैसे दूध में मक्खन। .......
-सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, बाबा भीमराव अम्बेडकर विष्वविद्यालय, लखनऊ,
दूरभाष: 9451087259
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भारतीय मनीषा की खोज का महासमुद्र ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
- समीक्षक: डॉ॰ हरेराम पाठक
हाल के वर्षों में भारतीय राष्ट्रवाद को लेकर काफी चिंतन हुए हैं। भारतीय वामपंथी चिंतकों ........की .....दुष्प्रचारित दुर्भावना का विवेकसम्मत खण्डन करने एवं भारतीय राष्ट्रवाद को गहराई से समझने के लिए विजय रंजन की पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पढ़ना अत्यंत आवष्यक है।
विजय रंजन जी पेशे से वकील हैं अतः उनकी यह पुस्तक विवेक-सम्मत साक्ष्यों, पूर्वाग्रह-रहित तर्कों एवं ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। पूर्वाग्रह युक्त हठधर्मिता, अनावष्यक वाग्जाल, अतिरिक्त विद्वता प्रदर्षन एवं छलकता हुआ अधकचरा ज्ञान इस पुस्तक में नहीं है। ......
बहरहाल यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भारतीय राष्ट्रवाद को समझना हमारे लिए क्यों आवश्यक है ? ...... इन प्रश्नों पर गहन चिंतन कर उत्तर प्रस्तुत किए हैं। लेखक ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रवाद की उपेक्षा-भाव से ही राजा आम्भि ने पोरस को नीचा दिखाने के लिए सिकंदर को उस पर ( पोरस पर ) आक्रमण करने के लिए बुलावा भेजा था। उस समय से लेकर आज तक किसी न किसी रूप में ‘आम्भि’ वर्तमान है। केवल आक्रमणकारी ही नहीं, इस देश के राष्ट्रवाद को उन लोगों ने भी काफी क्षति पहुंचाई है जिन्होंने भारतीय शिक्षा पद्धति का काफी दुरुपयोग किया। ब्रिटिष सत्ता से मिलकर राजाराम मोहन राय ने संस्कृत की पढ़ाई तक बंद करवा दी थी। इतिहास गवाह है कि ‘राष्ट्रवादी संस्कारों की कमी’ के कारण ही विदेशी आतंकवादियों को हमारे पंचमांगियों से शरण व सहायता भी मिलती हैं। लेखक ने इस बात को बहुत गहराई से अनुभव किया है कि ‘जिस देश के सेवानिवृत सैनिकों को अपने पेंशन आदि के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, वहाँ के शासन में राष्ट्रवादी दृष्टि के अभाव को ढूंढने के लिए किसी श्रम की आवश्यकता नहीं।’ अर्थात् राष्ट्र के प्रति समर्पित सैनिकों को भरपूर सुविधाएँ प्रदान करना भी राष्ट्रवाद ही है।.....विजय रंजन जी ने राष्ट्रवाद को धर्म एवं दर्शन के साथ जोड़ कर देखा है। ..........भारतीय वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-व्यवस्था का मूल्यांकन करते हुए उसके सकारात्मक पहलुओं को लेखक ने राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा है। दुर्भाग्य यह है कि वर्ण-व्यवस्था की बहुत भ्रामक व्याख्या कर प्रचारित किया गया इससे हमारा राष्ट्रवाद आहत भी हुआ .....सारांश...है कि विवेच्य पुस्तक प्राक् वैदिक काल से लेकर अब तक की भारतीय मनीषा की खोज का महासमुद्र है। लेखक ने भारतीय राष्ट्रवाद के बरक्स भारतीय दर्शन, समाज, संस्कृति, धर्म, राजनीति, इतिहास आदि का प्रामाणिक अनुशीलन किया है। इसका अनुषीलन हम सबके लिए अपेक्षित है।
-सारिका विहार, गली नं0 1 बी, मकान नं0 17, दिनपुर, Goyala More नजफगढ़, नई दिल्ली-43, दूरभाष: 9435137624
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पठनीय कृति : भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
- समीक्षक: डॉ॰ किशोर वासवानी
(भारत सरकार, शिक्षाविभाग, के॰ हि॰ नि॰, सि॰ ं.परिषद, पूर्व-निदेशक- भारतीय भाषा संस्कृति सं.गूज़.वि-पीठ तथा कई वि॰वि॰ में अतिथि व्याख्याता)
भारतीय संदर्भों में व्याप्त, सदियों से चली आ रही भारतीय राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद से संबंधित मूल अवधारणा को, “हिटलरी राष्ट्रवादी” अवधारणा ने पुरज़ोर तरीक़े से काफी विकृत कर नुकसान पहुँचाया .......इस दिशा में, सम्प्रति भारत मंें चल रही वैचारिक उठापटक के आलोक में इस मुद्दे पर खुल कर विमर्श करना ज़रूरी हो गया है। ऐसे में, विद्वान विचारक विजय रंजन द्वारा रचित विस्तृत वैचारिक कृति “भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग” ..... का आना काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। ............ विज्ञान और विधि में स्नातक होने के बावज़ूद उनकी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी चकित करती है। ......निष्कर्ष के रूप में कहा गया है कि अगर भारत को ज्ञानशील और गतिशील बनाए रखना है तो भारतीय राष्ट्रवाद को सर्वदा जीवंत बनाए रखना होगा (पृ॰ 362)। इस प्रकार विद्वान लेखक ने बहुत ही श्रमसाध्य तरीक़े से तर्कसहित अपनी बात रखी है।... कृति निश्चित रूप से गंभीरतापूर्वक पठनीय है।
- बी-12/703 मार्गाेसा हाइट्स, मोहम्मद्वाड़ी ; पुणे - 411060 (महाराष्ट्र), दूरभाष: 02041245558
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अद्भुत एवं अपूर्व कृति है
‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
- समीक्षक: हरीलाल ‘मिलन’
देश की अनेक सुप्रसिद्ध संस्थाओं द्वारा सम्मानित साहित्यकार एवं कुशल सम्पादक विजय रंजन जी का कविता, कहानी, समालोचना आदि विधाओं में विशिष्ट योगदान है। साहित्यिक-सामाजिक-वैज्ञानिक सरोकार की चर्चित त्रैमासिकी ‘अवध-अर्चना’ के कुशल संपादकत्व एवं विविध व्यस्तताओं के मध्य भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी लगभग 500 रचनाएॅ प्रकाशित हुई हैं। हर रचना में साहित्यिक, वैज्ञानिक एवं शोधपरक दृष्टि रही है। जब-जब जिस-जिस विधा में आपकी लेखनी चली है, यथार्थतः कहीं-न-कहीं नव्यता के दर्शन अवश्य हुए हैें। समालोचना की छः चर्चित कृतियों ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’, ‘रसवाद और नयरस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ एवं ‘कविता क्या है’, ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ के पश्चात् सातवीं कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ के रूप में हमारे समक्ष आई है। .......उसका (लेखक का) स्पष्ट विचार है कि भारतीय राष्ट्रवाद भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पर्याय है। कृतिकार वाङ्मयी सातत्य से यह भी प्रमाणित करता है कि पाश्चात्य संस्कृति से बहुत पहले भारतीय मन में राष्ट्रीय संस्कार और संस्कृति के रूप में राष्ट्रवाद समाविष्ट हो चुका था। अपनी भूमिका में लेखक कृति-सृजन की अपरिहार्यता के कारणों का स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत करता है। वह स्पष्ट करता है कि कृति का उद्देश्य भारत एवं भारतीयता से सघन परिचय कराना, राष्ट्रवाद-सम्बन्धी भ्रान्ति-निवारण एवं तद्गत जागरूकता के लिए जन-मानस को प्रेरित करना है, इसका उद्देश्य किसी प्रकार की कट्टरतावादी मानसिकता का समर्थन करना नहीं है। भूमिका में लेखक के रचनात्मक-उत्सर्ग का भी परिचय मिलता है। हृदय की तीसरी शल्य-चिकित्सा के पश्चात् अधिवक्ता-वृत्ति से अवकाश ले लेने के उपरान्त भी लेखक शोध, अनुशीलन एवं सृजन-पथ से विचलित नहीं होता। एतदर्थ उसकी सतत साधना की सार्थक एवं स्तुत्य प्रस्तुति है-‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’। ........ लेखक भारतीय संस्कृति के संघर्ष की चर्चा करते हुए भारत का वंशज होने की पहचान, भारत मॉ की संतान होने का अभिमान, भारत-भूमि की मिट्टी से इस शरीर की रचना होने का अहसास, भारतवर्ष की सीमाओं की रक्षा करने का उत्तरदायित्व और भारत का होने के नाते इसके सम्पन्न साहित्य, उदात्त दर्शन और गहन चिन्तन से लगाव ही भारतीय होने का प्रमाण बताता है। ..........मैक्समूलर का यह कथन कितना सार्थक है, ’’अगर मुझसे पूछा जाए कि किस देश के आकाश के नीचे मानवीय मस्तिष्क का अनुपम विकास हुआ, जीवन की महानतम समस्याओं पर सर्वाधिक विचार और मनन हुआ, उनका हल भी निकाला गया तो मैं भारत का नाम लूॅगा।’’ भारतीयता-सम्बन्धी भारतीय एवं पाश्चात्य मनीषियों के मत की चर्चा में लेखक की लेखनी किंचित उग्र भी हो जाती है, ’’आप वेदों में श्रद्धा नहीं रखना चाहते न रखें, ईश्वर में भी श्रद्धा/भक्ति नहीं है आपकी, कोई बात नहीं, पूजा उपासना नहीं करना चाहते, आप न करंे, हिन्दू धर्म को गर्हित मानते हैं, आपकी इच्छा....लेकिन देवी भारती से जुड़ाव, देवी भारती के उपरि इंगित गुणों से जुड़ाव से विच्छिन्न या वियोजित होने पर अर्थात् ‘भारतीय’ से ‘भारती’ के वियोजित होने पर ‘भारतीय’ ही नहीं रहेंगें आप।’’ ...........उत्पीड़ित व्यक्ति और समुदाय के लिए भारत और भारतीय शरणस्थली रहे हैं। हजरत अली के नवासे हजरत हसन और हुसैन अलैह॰ भी वजीद से पीड़ित होकर भारत आना चाहते थे। उन्होंने कर्बला की लड़ाई में भारतीयों से सहायता मॉेगी थी। इसी प्रकार स्वयं हजरत मोहम्मद साहब ने भी हिजरत के समय तत्कालीन परमार राजा से सहायता की याचना की थी।........... यहॉ एकता एवं अखण्डता का भाव पूर्व से ही सर्वोपरि था। भारत की मान्यता ही थी कि प्रत्येक समुदाय को उखाड़े बिना समग्र शरीर का राष्ट्रीय अंग मानकर सभी को स्वयं विकसित होने के लिए स्वतन्त्र रहने दिया जाए। .............. उसके अनुसार भारतीय-जन की राष्ट्रीय संवेदना, राष्ट्रीय संचेतना, राष्ट्रीय-चरित्र के आधार पर ही उनकी राष्ट्रीयता/नागरिकता अवधारित किया जाना चाहिए। वह सावधान भी करता है कि भारत को यदि पुनः गुलाम नहीं बनने देना है तो भारत के कण-कण में, भारत के जन-जन में मन-वचन-कर्म से भारतीयता-समग्र के गहन जुड़ाव को जीवन्त बनाए रखना होगा। लेखक ...... स्पष्ट विचार प्रस्तुत करता है कि भारतीय राष्ट्रीय चरित्र की कम-अधिक कमियॉ मुख्यतया दासता के सुदीर्घ काल-खण्ड में विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा भारतीय संस्कृति एवं भारतीय संस्कारों को उच्छेदित करने के दुष्प्रयास का दुष्परिणाम है।..... यहॉ लेखक की आध्यात्मिक -दृढ़ता भी अवलोकनीय है जिसमें उसका मानना है कि भारतीय ईश्वर ‘पैगामदाता’ या पैगाम लाने वाले पैगम्बर नहीं थे अपितु वे स्वयं सक्रिय होकर दुष्ट-दलन करने वाले निजी राग-द्वेष से परे सकारात्मक सात्त्विकता से ओत-प्रोत रूप-स्वरूप में रूपायित सर्वशक्तिमान अस्तित्व थे। .........वर्ण-व्यवस्था प्रसंग में जे॰ एच॰ हट्टन, निकोलस डर्क, रुडोल्फ लायड एवं एस॰एच॰ रुडोल्फ आदि पाश्चात्य विद्वानों के मन्तव्य पर प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के श्लोक ‘ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। उरु तस्यद्वैश्यः पदाभ्याम् शूद्रो अजायत् ’’ की घोर निन्दा की जाती है। ....... निन्दकों द्वारा जाति-व्यवस्था के मूल में वर्ण-व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ......... इस कृति में लेखक ने अपने ज्ञान, गहन चिन्तन, तर्कदृष्टि एवं स्वमेधा से विश्लेषण कर दोनों व्यवस्थाओं का अन्तर स्पष्ट कर दिया है; ........लेखक स्वयं कहता है कि प्रसंगित प्रकरण मे यथार्थ को छुपाकर, निराधार सफेद झूठ (जाति-व्यवस्था के मूल में वर्ण-व्यवस्था) गढ़कर बड़े पैमाने पर सुनियोजित ढंग से इतने जोर-शोर से प्रचारित किया जाता रहा है कि अब प्रश्नगत झूठ ही आभासी सत्य लगने लगा है, जबकि मूलतया कर्मणाधृत वर्णव्यवस्था में कथित जन्मना जातिगत हेयता-उच्चता प्रकल्पित नहीं थी, यह ध्रुव सत्य है। कृति मंे भारतीय आश्रम-व्यवस्था में आश्रम को श्रम के अर्थ में पूर्णतः समुचित नियोजन बताया गया है। लेखक ने भारतीय संस्कृति में अवधारित जन्मजात-ऋणों की शृंखला में एक नए महत्त्वपूर्ण ऋण ‘राष्ट्र-ऋण’ की संकल्पना की है जो उसकी प्रखर मेधा का परिचायक है। जन्मजात ऋणों के समान ही राष्ट्र-ऋण है जो देशवासियों में सर्वदा जीवन्त बना रहता है। .......सारतः यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि भारतीय और पाश्चात्य दोनों प्रकार के महनीय आदर्शो और महापुरुषों के उच्चरित मन्तव्यों को उद्धृत कर जो मीमांसा लेखक ने की है वह लेखक के गहन अनुशीलन, तार्किक विचारणा एवं अनुसंधान का प्रतिफल है और सर्वथा स्तुत्य, सराहनीय एवं सार्थक है। कृति में राष्ट्रवाद के बारे मंे ज्वलन्त सामाजिक प्रश्नांे, आपत्तियांे एवं आक्षेपों का लेखक द्वारा सुग्राह्य निवारण भी किया गया हैे। स्वस्थ राष्ट्र के लिए स्वस्थ राष्ट्रवाद का होना अत्यन्त आवश्यक है। .........आदरणीय विजय रंजन जी की साहित्यिक साधना प्रणम्य है। वास्तव में ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ कृति में इतनी सामग्री संकलित है कि किसी भी बिन्दु से राष्ट्र , राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को सरलता से समझा जा सकता है। निश्चय ही यह कृति उनकी कीर्ति में चार चॉद लगाएगी।
- 300ए/2 प्लाट-16 दुर्गावती सदन, हनुमन्त नगर, नौबस्ता, कानपुर-208021, दूरभाष: 993529993
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भारतीय मनीषा, राष्ट्रवाद व संस्कृति की परख
‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’
-समीक्षक: डॉ॰ रेशमी पाण्डा मुखर्जी
..........’क्या है भारत क्या है भारतीयता’, ’राम पर आक्षेप कितने अनुचित कितने उचित’ जैसे गंभीर विमर्शमूलक ग्रंथों के प्रणेता श्री विजय रंजन ने 2022 में ’भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पुस्तक अपने पाठकांे को सौंपी। यह ग्रंथ अपने अध्यायों में राष्ट्रवाद संबंधी भारतीय मनीषा की देशनाओं को प्रस्तुत करता है। राष्ट्रवाद संबंधी अपनी सारवान् दृष्टि व विचारात्मक उर्वर भूमि को आपने उक्त ग्रंथ में नाना संदर्भाें के माध्यम से व्यक्त किया। आपका प्रौढ़ ऐतिहासिक ज्ञान आपको राष्ट्रवाद के तलस्पर्शी अन्वेषण की सामर्थ्य प्रदान करता है। ...........आप परिपूर्ण निकष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ‘भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ’, ’हिंदू राष्ट्रवाद’ नहीं है। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के विषय में आपका स्पष्ट कथन है- ’इसमें संदेह नहीं कि हिंदुओं की (जिनमें जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि सभी गैर-ईसाई, गैर मुस्लिम, गैर पारसी संवर्ग मूलतः सम्मिलित हैं) आदिभूमि, जन्मभूमि, कर्मभूमि, धर्मभूमि भारत ही है, कतिपय मतभेदों के बावजूद हिंदुओं के अन्याय संवर्गाें में सिद्धांततया परस्पर कोई संघर्ष की स्थिति कभी अवस्थित नहीं रही है, सर्वसहिष्णु, सह-अस्तित्ववादी, सत्त्वशील, समन्वयशील, तितिक्षाशील हिन्दू यहाँ अब भी बहुसंख्यक हैं, अतएव बहुमत आधृत जनतंत्रीय भारत में ’बहुसंख्यकांे की संस्कृति वाला सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ या ’भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत भारतीय राष्ट्रवाद’ यदि सात्त्विक, तितिक्षाशील ’हिन्दू राष्ट्रवाद’ से ओतप्रोत हो, तो भी यह अन्य धर्मावलम्बियों के लिए क्षतिकारक या चिन्ताकारक नहीं है, इसलिए कि वास्तव में कट्टरतावाद के लिए हिन्दूवाद में कोई स्थान नहीं है।’ (भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग, पृ॰-24)।........आपने ‘भारतीयता’ को प्रज्ञापूर्वक विश्लेषित करते हुए लिखा है कि ऋतम्वरा प्रज्ञा से ज्ञान की खोज में सतत निरत रहने वाला प्राचीन राष्ट्र भारत है- ”इस भारत के निवासीगण में वैदिक संस्कारों समेत राष्ट्र-संघटनत्व सह लोक-पोषणत्व वाला ’भरतत्व’ साथ ही सत्त्वशील, ऋतशील, चिन्मयशील, पावन, रचनाधर्मी ज्ञान की आराधिका देवी भारती के ’भारतीत्व’ से संस्कारगत संपृक्तता का भाव एवं तद्गत सांस्कारिक आचार ही मौलिक ’भारतीयता’ है।’ (भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग, पृ॰-52)
आपने भारतीयता का जो सर्वसमावेशी विन्यास प्रस्तुत किया है, उससे आपकी साधनापरक चिंतन-शैली का बोध होता है। आपके प्राणों में एक भावुक, विचारशील, अध्ययनशील प्रगाढ़ विद्वान् श्वास ले रहा है। भारतीयता का मूल तत्व आपने भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को माना है जिसमें सह-अस्तित्व व सहजीविता को आत्मसात् करते हुए समन्वयवादी सर्वकल्याणक शिवत्वपूर्ण पावनता व्याप्त है। आप अपने ग्रंथ में जहाँ अपने मौलिक विचारों की सशक्त भूमि निर्मित करते हैं, वहीं किसी विषय के परीक्षण-निरीक्षण हेतु देश-विदेश के महान्तम व कालजयी विचारकों, दार्शनिकों, मनीषियों की तत्संबंधी विविधस्तरीय विचारणा को भी प्रस्तुत करते हैं। ........आपके अनुसार ’स्वराष्ट्रवर्द्धनम्‘, ’भारतवर्द्धना’ सदृश प्रत्यय ’भरतत्व’ की भावभूमि हैं। भारतवासियों के द्वारा ’राष्ट्र-सुगठन, ’राष्ट्र-कल्याण’ एवं ’राष्ट्र-प्रगति’ के पोषक भाव ही भरतत्व है।
भारतत्व की महत्ता स्थापित करते हुए आप लिखते हैं कि भारतीयों की भाँति किसी भी अन्य देश के प्राचीन युगीन बाशिंदों ने इतने खुलेमन से वैज्ञानिक नवीनता को नहीं अपनाया था। भारतत्व से आप्लावित होकर हमने सदियों से वैदिक धर्म के अनुयायी होते हुए भी शैव धर्म, शाक्त धर्म, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि धर्माें से भी अनेक वादों को सहृदयतापूर्वक अपनाया।
भारतीत्व के विषय में चर्चा करते हुए ज्ञानान्वेषण-निरंतरता, सात्त्विकता, आस्तिकता, चिन्मयता आदि में अगाध विश्वास को आप भारतीत्व के गुण मानते हैं। आपके शब्दों में-’भारतीत्व’ से भारतीय जन-मन की कथ-अनकथ सम्पृक्ति भारतीय जन के बहुलांशतया सत्त्वशील, ऋतशील, प्रज्ञाशील, तितिक्षाशील, रचनाधर्मी एवं विश्रांति-प्रिय प्रकृति से भी स्वतः प्रमाणित हैं। ..... भारतीत्व से सम्पृक्त बहु-बहुलांश जन प्रायः सत्त्वकामी, अहिंसक, सहिष्णु, ज्ञान-प्रिय, शांन्ति-प्रिय, दयालु, उदार, उदात्त, इन्द्रियनिग्रही, दानशील, त्यागशील, क्षमाशील, भेदभावरहित, सहयोगी प्रवृत्ति वाले, सर्वकल्याणक और सह-अस्तित्व को मानने वाले ऋतशील, रचनाधर्मी, अलोलुप और बहुलांशतः शांत और तमस-हीन, धर्मालु ’भा़रतीय’ हैं।’(वही, पृ॰-95-96).........आप भारतीय मनीषियांे के विशिष्ट जीवन-दर्शन के साथ भारतेतर विद्वानों के जीवन-दर्शन की तुलना करते हुए विभिन्न मुद्दों पर खुलकर बहस छेड़ते हैं। चिन्तन की सूक्ष्म बुनावट का परिचय देते हुए आप सुस्पष्ट उपशीर्षकों में एक सुलझे हुए मानस की प्रौढ़ समझ का प्रमाण देते हैं। आपने भारतीय दर्शन के विभिन्न अंगों को बड़ी विशदता से समीक्षित करने में अद्भुत दक्षता का परिचय दिया।
ब्रह्मवाद या अध्यात्मवाद के विषय में भारतीय मनीषा की उस धारणा को आप खंगालते हैं जिसमें यह कहा गया है कि आत्मा मूल रूप से वस्तुतः परम चैतन्य शक्ति ’परमात्मा’ का ही अंश है किंतु आध्यात्मिक उत्कर्ष के अभाव के कारण आत्मा को परमात्मा से विलग होकर ’जीवात्मा’ का स्वरूप धारण करके सृष्टि के विभिन्न स्वरूपों में अवतरित होना पड़ता है। ........आपने अध्यात्मवाद को कोरी कल्पना मानने से अस्वीकार करते हुए उसके वैज्ञानिक आधार के साक्ष्य सामने रखे हैं। भारतीय अध्यात्मवाद पर आपकी यह गवेषणा इस ग्रंथ के महात्म्य को कई गुणा बढ़ा देती है। ........समन्वयवाद पर प्रकाश डालते हुए आप लिखते हैं कि जिस प्रकार मधुमक्खी विभिन्न फूलांे के पराग को लेकर सबको संचित करके ’मधु’ के रूप-स्वरूप में इस प्रकार प्रस्तुत करती है कि उसमें विभिन्न फूलों के परागों के तत्पुरुषीकरण नहीं होता बल्कि मधुमक्खी का स्वतःजन्य श्रम प्रतिफलित होता है। भारतीय संस्कारों में समन्वयवाद भी उसकी सामासिक संस्कृति की निर्मिति का आधार बना।......... भारतीय संस्कृति में ओत-प्रोत वर्ण-व्यवस्था के संबंध में विजय रंजन जी ने ........उसके काम्य, समाज-हितैषी रूप को प्रस्तुत किया है। वर्णव्यवस्था के संदर्भ में आपने ....... ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में समाज को विभक्त करने की पृष्ठभ्ूामि को आपने सशक्त प्रमाणों के साथ पाठक के विश्वास को अर्जित करते हुए प्रस्तुत किया है। रामायण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, कौटिल्य-नीति, जैन ग्रंथ ’उत्तराध्ययन’, पातंजल महाभाष्य, पाणिनी कृत अष्टाध्यायी, सूत्र ग्रंथों, शतपथ ब्राह्मण, हरिवंश पुराण आदि ग्रंथों में वर्ण-व्यवस्था संबंधी मतों को खंगालने के साथ-साथ आदिकाल से आधुनिक काल तक महत्त्वपूर्ण व सम्माननीय पदों पर सुशोभित शूद्रजनों के विषय में भी आपने लिखा है। .......आप मानते हैं कि प्राचीन भारतीय मनीषियों ने मानुष-जीवन को संतुलित, सम्यक्, शांत, उर्ध्वगामी, उन्नतशील, सुस्थिर बनाने हेतु वर्ण-व्यवस्था व आश्रम-व्यवस्था का प्रतिपादन किया था। ये दोनों संस्कार भारतीयता से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। ................समीक्ष्य ग्रंथ में भारतीय धर्म-संबंधी आपका अध्याय अत्यंत महत्त्वपूर्ण व रोचक हैं .......आपके शब्दों में- ’भारतीय दृष्टि से धर्म कोई जड़ीभूततया रेखांकित परिधि-बद्ध उपासना पद्धति नहीं है, अपितु मानवोचित कर्म/आचरण ही धर्म है। धर्म के भारतीय स्वरूप को वस्तुनिष्ठतया शब्दांकित करने के लिए यह कहना अधिक सटीक है कि भारतीय दृष्टि से मानव के लिए देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप करणीय या कर्तव्य रूप कर्म ही धर्म है।’(वही, पृ॰-187)। इसी प्रकार आपने लोकधर्म को लोकहितवादी नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित व लोकमंगल के गुणों से आपूरित माना है। आपने कर्त्तव्यपरायणता, राष्ट्र के प्रति समुचित कृतज्ञता, राष्ट्रहित संरक्षा, राष्ट्राभिमान और राष्ट्र-रक्षा के भावानुभाव को भारतीय राष्ट्रधर्म का वैशिष्ट्य माना है। ......
राष्ट्रवाद के प्रलाभों की गणना करते हुए आपने निम्नलिखित बिंदुओं पर फोकस किया है-
- राष्ट्रवाद राष्ट्रिक को राष्ट्र-चेता बनाने के साथ ही संकुचित ’निज’ की घेरेबंदी से उठाकर ’मैं’ से विशालतर परिवेश ’हम’ की ओर उन्मुख करता है।
- राष्ट्रवाद राष्ट्रहिती उत्सर्ग हेतु राष्ट्रिक को प्रेरित करता है।
- राष्ट्रवाद राष्ट्रिक को बहु-आयामी विकास हेतु अबाधित पारिवेशिक सहयोग प्रदान करने में समर्थ बनाता है। राष्ट्रवाद की प्रखरता से ही राष्ट्र की अस्मिता का संरक्षण संभव है।
- राष्ट्रवाद राष्ट्रिक में राष्ट्र के लिए कुछ करने का कर्त्तव्य-बोध उत्पन्न करता है।
- राष्ट्रवाद की प्रखरता से राष्ट्र भौतिक व आर्थिक उन्नति व समृद्धि प्राप्त करता है।
तत्पश्चात् आपने राष्ट्रवाद की भावना के फलस्वरूप भारत के स्वाधीनता आंदोलन के सुपरिणाम, द्वितीय विश्वयुद्ध में महाक्षति का भागीदार होने पर भी जापान की कुछ ही वर्षाें में उन्नति, संयुक्त राज्य अमरीका की सबल-सफल संघर्ष करने में सक्षमता, जर्मनी का एकीकरण आदि की प्राप्ति मानी है। राष्ट्रवाद की उपेक्षा के फलस्वरूप होने वाली हानियों को गिनाते हुए उसके प्रति आपने घोर चिंता व्यक्त की है। भारतीय राष्ट्रवाद का समेकित मूल्यांकन प्रस्तुत करने हेतु आपने प्रतिभासम्पन्न, मेधायुक्त मनीषियों की चिंतना को प्रस्तुत किया है। आपने भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक, नैतिक, आर्थिक व राजनैतिक क्षेत्र में राष्ट्रवाद के प्रतिफलन की सर्वांगीण समीक्षा की है। भारतीय राष्ट्रवाद संबंधी कतिपय संभ्रमांे तथा उसकी बाधक शक्तियों पर भी विशद लेख लिखकर उक्त कृति में एक सम्यक् सारभूत उपसंहार जोड़कर उसे समाप्त किया गया है।
निष्कर्षतः कह सकते हैं कि ’भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ क ख ग से आरंभ कर क्ष, त्र, ज्ञ तक पहँुच पाया है। विजय रंजन जी की समीक्षात्मक दृष्टि की गतिशीलता अनिर्वचनीय है। ये अध्याय किसी महर्षि के सारगर्भित व्याख्यान से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। भाषा में अद्भुत दक्षता के साथ शैली की मौलिकता पाठकों को बाँधे रखती है। इस ग्रंथ को राष्ट्रवाद का ज्ञानकोश कहा जा सकता है। मनीषियों की विचार सरणियों को गुम्फित करने में आपकी तात्त्विक व ऐतिहासिक दृष्टियों ने स्फूर्ति प्रदान की है। भाषा की प्रांजलता व पुष्टता के जाज्वल्यमान प्रमाण उपलब्ध हैं। आपके अध्ययन के प्राणों में भारतीयता के प्रति अटूट निष्ठा बसती है। आप साहित्य के साथ ज्ञान, धर्म, इतिहास, समाज-शास्त्र का एक पुख्ता पुल निर्मित करते हुए आलोच्य ग्रंथ में भारतीयता के प्रति अपनी अगाध आस्था व विश्वास को प्रमाणित करने में कृतसंकल्प रहे। आपका महत् प्रयास सार्थक व सुफलित रहा।
- 2-ए, उत्तरपल्ली,सोदपुर, कोलकाता-700110 (पश्चिम बंगाल)
दूरभाष-9433675671
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भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
- समीक्षक: भास्कर मिश्र
.................... पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ विजय रंजन जी द्वारा रचित अत्यन्त सुचिन्तित, अर्थ-गाम्भीर्य के साथ-साथ भाव-प्रवण भी है। भाषायी क्लिष्टता के बावजूद भी यह पाठक वर्ग को सहज ही आकृष्ट भी करती है। मेरा ऐसा मानना है कि जब गम्भीर विषय का संवाद स्थापित हो, तो पाठक वर्ग को बौद्धिक कसरत के लिए तैयार रहना चाहिए। ......जब कभी भी ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की बात होती है तो तथाकथित लोग इस पर अहंकारी, साम्राज्यवादी तथा विभाजनकारी नीति वाला होने का आरोप लगाते हैं। किन्तु ये आरोप कहीं से भी सत्य प्रतीत नहीं होते। ऐसे लोगों के लिए यह पुस्तक बुद्धिप्रदायी सिद्ध होगी। ...............इस पुस्तक का उद्देश्य भारतीय परम्परा और राष्ट्रवाद का केवल जयघोष करना ही नहीं, अपितु वास्तविक धरातल पर भारतीय चिन्तन परम्परा को पुनर्गठित करना है, क्योंकि वर्तमान का भारत खण्डित भारत है। यह पुस्तक रामायण, महाभारत युगीन अखण्डित भारत को देखने का एक सार्थक प्रयास करती है क्योंकि भारत के कई महत्त्वपूर्ण हिस्से उसके मानचित्र से गायब हैं जबकि भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठतम पृष्ठ उन हिस्सों से जुड़े हुए हैं। .......यह पुस्तक यह बताने का प्रयास करती है कि भारतीय राष्ट्र और राष्ट्रवाद में सबके लिए समान स्थान, समान अधिकार प्राप्त है। भारत का राष्ट्रवाद उदार प्रकृति का है। यह सबको समेकित रूप से साथ लेकर चलने का जयघोष करता है।
उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की आँधी में हमने भारत, भारतीयता, राष्ट्र और राष्ट्रवाद को बहुत पीछे छोड़ कर स्वार्थलोलुपता को आगे रखा। यह पुस्तक राष्ट्रवाद के प्रति बनाई गई नकारात्मक धारणाओं को तोड़ती है क्योंकि भारत में तथाकथित कूटनीतिज्ञों का एक ऐसा वर्ग है जो प्रत्येक विषय को पश्चिम के चश्मे से देखता है और वहीं की कसौटियों पर कस कर उसका परीक्षण करता है। राष्ट्रवाद के साथ भी उन्होंने यही किया। .........भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में जब बात करते हैं तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तस्वीर उभर कर सामने आती है। इस तस्वीर को और अधिक स्पष्ट करती है यह पुस्तक। यह राष्ट्र और राष्ट्रवाद की प्राचीन अवधारणा को यह रूपायित करती तो है ही, साथ ही साथ आधुनिक संदर्भ में किए जा रहे प्रयास को भी रेखांकित करती है।....‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ विजय रंजन द्वारा लिखी गई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृति है। इस पुस्तक में विजय रंजन जी ने विभिन्न विचारकों के मतों को उद्धृत करते हुए अपने विचारों की पुष्टि की है। वे सार्थक तर्कसम्मत बात को रखते हुए भारतीय चिन्तन-परम्परा को न केवल प्रतिष्ठित करते हैं, बल्कि नए शोधों का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। यह पुस्तक कई भ्रान्तियों का खण्डन करते हुए भारतीय चिन्तन पक्ष का मण्डन करती है। कई विभिन्न आकर्षक अध्यायों में विभक्त पुस्तक पाठक वर्ग को आकृष्ट करने के साथ-साथ पुस्तक के अंतनिर्हित विषयों पर गम्भीरता से सोचने पर भी विवश करती है। यह रूढ़ चिन्तन को नकारती हुई सहज और बोधगम्य चिन्तन को प्रश्रय देती है।.... यदि किसी को राष्ट्र , राष्ट्रवाद, भारत, भारतीयता की चिन्तन- परम्परा पर सुदीर्घ ज्ञान प्राप्त करना हो, तो यह पुस्तक उन शोधार्थियों के लिए कई अनसुलझे पहलुओं को सुलझाती है।
- शोध छात्र, विष्वभारती शान्तिनिकेतन, प॰बंगाल, दूरभाष : 7017580533
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भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग के निहितार्थ
- समीक्षक : डॉ॰ ओमप्रकाश सिंह
साहित्य-भूषण श्री विजय रंजन की शोधपूर्ण एवं ऐतिहासिक कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ ......की भूमिका-भाग में कृतिकार ने ‘पुरावृत्ति और विवृति’ शीर्षक से अपनी बात की शुरुआत करते हुए लिखा है -
”भारत एवं भारतेतर जगत् की मौलिक प्रकृति-प्रवृत्ति में भारी अन्तर होने से ‘भारतेतर राष्ट्रवाद’ बनाम ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के मूलभूत अन्तर को रूपायित करना कृति की विरचना का प्रमुख कारक रहा है।“
........ इस प्रकार, भारतीयता का स्वरूप, सांस्कृतिक वैशिष्ट्य, सांस्कृतिकता और धर्म, राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद का व्यवहारिक स्वरूप, भारतीय राष्ट्रवाद एक विशिष्ट प्रत्यय, संभ्रम एवं बाधक शक्तियाँ इत्यादि अनेक विषयों पर अत्यन्त शोधपूर्ण और ऐतिहासिक लेखन द्वारा विजय रंजन ने पाठकों की आँखें खोल दी हैं। इसके साथ ही उन्होंने समसामयिक और सार्थक विषय पर वर्तमान सुधी पाठकों एवं चिन्तकों को राष्ट्रवाद पर विमर्श का अवसर भी प्रदान किया है। .....
- 259, शान्तिनिकेतन, साकेतनगर, लालगंज रायबरेली, उ॰प्र॰, दूरभाष: 8400026555
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भारतीय राष्ट्रवाद का पुनर्मूल्यांकन
-समीक्षक: प्रो॰ आनंद कुमार सिंह
पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ .......में लेखक ने अपने गहन शोधांे के आधार पर यह स्थापित करने का प्रयत्न किया है कि ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ मूलतः सांस्कृतिक राष्ट्र-चिन्तन का ही नया और सात्त्विक कल्प है जिसमें प्रारम्भ से लेकर आधुनिक काल तक बहुमुखी राष्ट्रीय समावेशिता का गुण विद्यमान है। ..
.....लेखक भारत एवं भारतेतर जगत् की मौलिक प्रवृत्ति और प्रकृति में भारी अन्तर मानते हुए “भारतेतर राष्ट्रवाद बनाम भारतीय राष्ट्रवाद” को विवेचित करना अपनी कृति के प्रणयन का ‘प्रमुख कारक‘ मानता है । .........
लेखक का यह स्पष्ट मत है कि राष्ट्रवाद की चेतना के अभाव में मजहबी जुनून पनपता है जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तालिबान में देखा गया। राष्ट्रवाद के बरक्स मजहबी जुनून को वरीयता देने का परिणाम है अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी आतंकवाद का उदय और वहाँ के निरीह नागरिकों की हत्या। ....
लेखक ने सोदाहरण यह समझाया है कि भारत की राष्ट्र के रूप में संकल्पना ऋग्वैदिक काल से ही होने लगी थी। इस क्रम में उन्होंने ऐंथ्रोपोलोजी द्वारा प्रयुक्त ‘होमोसेपिएंस‘ को प्रथम प्रबुद्ध मानव या “मनु” स्वीकार किया है जो आगामी अध्येताओं के लिए भी रोचक प्रस्थान बिंदु हो सकता है। वहाँ से पाँचवी पीढ़ी को गणना में लेकर लेखक ने बताया है कि स्वायम्भुव मनु की छठवी पीढ़ी में उन्हीं के प्रपौत्र भरत द्वारा “आसेतु-हिमाचल” विशाल भूभाग को प्रथम बार ‘भारत‘ कहा गया। ........
अंत में ........राष्ट्रवाद की उपेक्षा से कारित हानियों का भी समुचित विवरण प्रस्तुत किया है।.....‘‘भारतीय इतिहास तो राष्ट्रवाद के अभाव से कारित हानियों का साक्षात् उदाहरण है‘‘ (पृ॰ 263)। ......
‘‘दुर्भाग्य से आजादी मिलने के बाद से ही भारतीय राष्ट्रवाद की ज्वाला अतिमंद हो गयी, प्रत्युत कहना होगा कि मंद कर दी गई।‘‘ (पृ॰ 268) । राष्ट्रभाषा की स्वीकार्यता के प्रश्न को भी लेखक ने इसी मूल बात से जोड़कर देखा है ..... राष्ट्रवाद की भावना के अभाव में ही भारत में अंग्रेजियत को चलने दिया गया और भारतीय भाषाओं को विकृत किया गया। .....
‘‘राष्ट्रवादविहीन कान्वेंटी शिक्षा हमारे युवाओं को स्वार्थी, भौतिक सुखाकांक्षी और आत्मकेन्द्रित बना रही है कि मातृभूमि, स्वदेश, समाज, परिवार आदि के प्रति कर्त्तव्य/ऋण जैसी बातें उनके लिए अर्थहीन हो गयी हैं।‘‘ (पृ॰ 271)। अध्याय ‘भारतीय राष्ट्रवाद अधोमुख क्यों ? .......
भारतीय राष्ट्रवाद की पतनशीलता के लिए लेखक ने इस्लाम और सूफीमतों तथा विदेशियों के आगमन को ही प्रधान कारण बताया है। उसने कहा हैं कि ‘‘इन विदेशी मौलानाओं ने और ईसाई मिशनरी के पादरियों ने प्रकट-प्रच्छन्न रूप से अपने धर्म अपने समाज-संस्कृति का प्रसार करने के प्रयास में भारत की सांस्कृतिकता को ठेस-दर-ठेस लगाकर भारतीयता को नेस्तनाबूत करने का प्रयास किया‘‘ ( पृ॰ 325)। इसी के सापेक्ष लेखक का यह भी कथन मननीय है कि ‘‘भारत की विदेशी गुलामी से मुक्ति तभी संभव हुई जब भारतीय राष्ट्रवाद पुनः जीवन्त होकर सघन-सबल हुआ....‘‘ (पृ॰ 327)।
यह कथन सत्य के अत्यंत निकट प्रतीत होता है।
इसके साथ ही लेखक ने ‘भारतीय राष्ट्रवाद की बाधक शक्तियाँ‘ नामक लेख में कहा है कि राष्ट्रवाद के विकास में सर्वाधिक बाधक साम्प्रदायिकता है। उसने अनेक मुस्लिम नेताओं का भी हवाला दिया है जो इस्लाम की असुरक्षा का हौवा खड़ाकर तथा धार्मिक भावनाओं को भड़का कर राष्ट्रवाद को विकसित ही नहीं होने देना चाहते। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के मुद्दे से भी इस बिन्दु पर लेखक ने समकालीन भारत की विद्वेषपूर्ण संभावनाओं का विश्लेषण किया है। तमिल, असम, नागालैण्ड, बोडोलैण्ड, मराठा मानुस, अकालिस्तान, जाट अस्मिता, सोनार बांग्ला आदि के सभी पृथकतावादी आन्दोलन क्षेत्रवाद की ही उपज हैं जो अपनी अस्मिता को भारत की महाराष्ट्रीयता से अलग कर देखना चाहते हैं। वर्तमान राजनीति भी इसी क्षेत्रीयतावाद का वोट-बैंक के कारण पोषण कर रही है। इस विषय पर पर्याप्त चिंतन कर लेखक ने अनेक सुझाव ‘उपसंहार‘ में दिए हैं जिसमें मदरसा शिक्षा पर अंकुश लगाना, विदेशियों के कब्जे से भारत-भूमि को मुक्त करना, प्रतिभा पलायन को रोकना, राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन, राष्ट्रभाषा की मान्यता, संविधान में आवश्यक संशोधन आदि जरूरी तथ्य विस्तार से बताए गए हैं।
.............यद्यपि प्रस्तुत पुस्तक सहज पठनीयता के गुणों से न्यून जान पड़ती है किन्तु विषयवस्तु के औचित्य-प्रतिपादन और कतिपय नवीन उद्भावनाओं के परिप्रेक्ष्य से मूल्यवान सिद्ध होती है।
- चूना भट्टी, कोलार रोड, भोपाल (म॰प्र॰), दूरभाष: 8839786715
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राष्ट्रवाद की विस्तृत गहन विवेचना
भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
-समीक्षक: प्रो॰ हौसिलाप्रसाद सिंह,
विजय रंजन जी ने अपनी इस पुस्तक (भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग) में जितने विस्तार से राष्ट्रवाद को समझने-समझाने का प्रयत्न किया है, वह उनके परिश्रम, अध्ययनशीलता, विवेकशीलता, चिन्तन-मनन को प्रदर्शित करता है। पुस्तक की सामासिक शैली में तत्त्वों और तथ्यों को संयोजित करने की कला में लेखक सिद्धहस्त है। ....राष्ट्रवाद के जितने पहलू भारतीय परिप्रेक्ष्य में विकसित हो सकते हैं, उन सभी पक्षों को सकारात्मक ढंग से, वह भी विवेक के साथ निरुपित किया गया है। ....उन्होंने समालोचना की एक सामासिक पद्धति विकसित की है, जो सर्वथा नवीन है।...
- पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग एवं दूरसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, डॉ॰ हरि सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर
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भारतीय संस्कृति से आप्लावित राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
-समीक्षक: ओम धीरज
...... सैकड़ों पुस्तकों का अन्वीक्षण एवं परिशीलन यथानुकूल सन्दर्भ एवं व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हुए ऐसे गूढ़ वैचारिक विषय ( ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’) का विस्तृत विवेचन किया गया है, जो विद्वान् लेखक के विविध पठन-पाठन तथा तात्त्विक विश्लेषण की विलक्षण शक्ति-सर्जना का प्रमाण है।........लेखक ने ‘उपसंहार’ के अंतर्गत .......निष्कर्षात्मक सुझाव भी दिया है जिसके अनुपालन में हर एक नागरिक के लिए अपनी-अपनी भूमिका में करने के लिए कुछ न कुछ करने योग्य है। यही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के लिए भी कुछ न कुछ निर्देश प्रस्तुत किया गया है। ......मेरी .... कामना है कि लेखक का परिश्रम रंग लावे और हर भारतीय नागरिक ‘भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के मर्म को समझे और अपने जीवन में ढाले, कतिपय विद्वानों का मतिभ्रम दूर हो और भारत विश्व-फलक पर अपना पुराना गौरव और गुरु-गाम्भीर्य भूमिका को प्राप्त कर सके।........
- वाराणसी, दूरभाष: 9415270194
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एक अहम मसले की शोधपूर्ण विवेचना
भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
-समीक्षक: डॉ॰ राजेन्द्र सिंह गहलौत
भारत की स्वाधीनता के बाद से ही राष्ट्र, राष्ट्रीयता, राष्ट्र-भक्ति, राष्ट्र-धर्म, भारतीय, भारतीयता आदि.......शब्दों पर वर्तमान लेखकों में से किसी ने न तो गंभीरता से विचार किया है और ना ही बौद्धिकता से विश्लेषण। संभवतः पहली बार बौद्धिकता, गंभीरता एवं शोधपूर्ण ढंग से इन सबका विश्लेषण वर्तमान लेखकों में से विजय रंजन ने अपनी पुस्तक “भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग” में किया है तथा भारतीय राष्ट्रवाद के तहत “भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” की अवधारणा को स्थापित करने की भी पुरजोर कोशिश की है।......
उनकी पुस्तक “भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग” को पुस्तक न कह कर शोधग्रंथ कहना अधिक उचित होगा क्योंकि ......राष्ट्रीय, राष्ट्रवाद, राष्ट्र-धर्म, राष्ट्र-भक्ति, भारतीय, भारतीयता आदि को काफी विस्तार से एवं तार्किक स्वरूप में विश्लेषित किया है तथा इनकी ऐतिहासिकता पर भी चर्चा की है, साथ ही “भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद”.....की स्थापना में परिलक्षित बाधक शक्तियों पर भी गंभीरता से विचार किया है।.....
उनने बहुत ही गंभीर एवं महत्त्वपूर्ण विषय को गहन अध्ययनशीलता एवं विद्वता के साथ विश्लेषित किया है....बौद्धिक जन को पुस्तक न सिर्फ प्रभावित करेगी, अपितु चिंतन के लिए भी प्रेरित करेगी।
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आपकी पुस्तक (भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग) का सभी जगह स्वागत हो रहा है। पटना बिहार से प्रकाशित ‘साहित्य यात्रा’ के अगले अंक में उक्त पुस्तक पर लिखी समीक्षा प्रकाशित होगी। ‘नवनिकष’ ने पहले ही अपनी स्वीकृति दे दी है। दिल्ली से प्रकाशित ‘साहित्यनामा’ में आलेख विचाराधीन है। - डॉ॰ राजेन्द्र सिंह गहलौत, शहडौल, मध्य प्रदेश
-बुढार-484110,शहडोल (म.प्र.), दूरभाष: 9329562110
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भारतीयता का परिपूर्ण विश्वकोश है
भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग
-समीक्षक : राजेश विक्रान्त
अयोध्या निवासी और देशभर में भारतीय मनीषा के चर्चित लेखक विजय प्रताप सिंह ‘रंजन’ कृत ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ राष्ट्रवाद विषय से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ व सूचनाएँ मुहैय्या कराती है तथा समस्त सवालों का जवाब देती है। भारतीय राष्ट्रवाद के सभी मुद्दों व पहलुओं को कृतिकार ने इस 372 पृष्ठ के ग्रंथ में समेट कर गागर में सागर भरने का काम किया है। ......
इसमें भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़े सभी मुद्दों पर लेखक ने विस्तार से प्रकाश डाला है।......
विजय रंजन का लेखन सबसे अलग है। वे लिखते हैं- ”हमारे भारत का राष्ट्रवाद (भारतीय राष्ट्रवाद) राष्ट्रवाद का वह सात्त्विक संस्करण है जो आविश्व प्राचीनतम, परम सत्त्वशील, शिवशील, ऋतशील, नयशील और सर्वथा मौलिक है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ राष्ट्र के स्थायित्व, संरक्षण एवं सम्यक् संवर्द्धन का सांस्कृतिक प्रत्यय और उससे बढ़ कर दायित्वबोधक संस्कार और उससे बढ़ कर राष्ट्रीय आचार है जो राष्ट्र से एकात्मकता हो जाने पर उद्भूत होता है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ राष्ट्रीय आवश्यकता भी है और राष्ट्रीय मूल्यमान भी।“ ....
उनकी आशा है कि ‘भारतीय संस्कार एवं भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत राष्ट्रवाद (भारतीय राष्ट्रवाद या भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद) मनसा-वाचा- कर्मणा इच्छा-ज्ञान-क्रिया के संस्तर पर स्वीकार करने के बाद ही हमारा भारत एक बार और विश्वगुरू बन कर सम्पूर्ण विश्व को एक नया ऋतम्वरिक, ऋतम्भरिक आदर्शवादी, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’् सदृश सिद्धान्तों से आप्लावित सत्त्वशील राष्ट्रवाद का सार्थक प्रत्यय प्रदान कर सकेगा। इस तरह भारत सम्पूर्ण विश्व को सर्वकल्याणकता एवं सर्वम् शान्ति की ओर उन्मुख करके नई दिशा प्रदान करने में भी समर्थ सिद्ध होगा। -वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘सामना’ साप्ताहिक पत्र में स्तम्भकार, नागपुर, महाराष्ट्र दूरभाष: 9820120912
(समीक्षा ‘सामना’ में प्रकाशित)
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