बुधवार, 5 जुलाई 2017

विजय रंजन की कृतियाँ : विद्वानों की शुभाशंसाएँ

  




रामकथा भारतवर्ष की सांस्कृतिक एकता का प्रबल सूत्र रही है। भारत की प्राचीन भाषाओं (पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि) में विस्तृत राम-साहित्य अनेक विधाओं में लिखा गया है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों (बाली, जावा, मलय, हिन्दचीन, स्याम, चीन आदि) में उपलब्ध है। चीन का ‘दशरथ कथानम्’, इण्डोनेशिया का ‘रामायण ककविन’, जावा का ‘सेरीराम’, स्याम का ‘रामकियेन’ आदि इसके कतिपय उदाहरण हैं। 
विश्व-वाङ्मय में वाल्मीकि-रामायण वह प्रथम ग्रंथ है जिसमें नैतिक मूल्यों का काव्यात्मक व्यवहारिक रूप मूर्त्तमान दिखाई देता है। 
वाल्मीकीय रामायण के बाद रामकथा की एक विस्तृत परम्परा का सूत्रपात हो गया। 
फैजाबाद के श्री विजय रंजन व्यवसाय की दृष्टि से विधिवेत्ता हैं किन्तु उनकी लेखनी रामकथा पर अनवरत चलती रहती है। उन्होंने अपनी कृति ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ की पाण्डुलिपि विचारार्थ एवं शुभाशंसा लिखने हेतु दी। 
पाण्डुलिपि को आद्योपान्त पढ़ने के बाद अनुभव हुआ कि श्री रंजन ने जिस विद्वत्तापूर्ण ढंग से वाल्मीकि-रामायण के विविध आयामों पर अपनी कलम चलाई है, उससे वाल्मीकीय कृति की महत्ता में अभिवृद्धि होती है। 
श्री विजय रंजन की इस पाण्डुलिपित कृति को देख कर मुझे एक अन्य     शोध-कृति ‘वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के नैतिक मूल्य और उनका मारीशस के हिन्दू-समाज पर प्रभाव’ की याद आ रही है। इस शोध-कृति का निदेशन पùविभूषण डॉ॰ विद्यानिवास मिश्र जैसे मनीषी ने किया था। इस  शोध-कृति की शोधकर्त्री ‘रामायण सेन्टर, मारीशस’ की मानद उपाध्यक्ष     डॉ॰ विनोदबाला अरुण हैं जिन्होंने मेरे मारीशस-प्रवास के समय अपनी उपर्युक्त     शोध-कृति दिखाई थी। 
डॉ॰ विनोदबाला अरुण जनपद फैजाबाद में जन्मे पं॰ राजेन्द्र अरुण जी की पत्नी हैं। ये राजेन्द्र अरुण जी वही हैं जिन्होंने विदेश में रामकथा को प्रचारित-प्रसारित करने हेतु मारीशस में एक शासकीय संस्थान ‘रामायण सेन्टर, मारीशस’ के माध्यम से एक अधिनियम (एक्ट) वहाँ की संसद से पारित करा के तद्विषयक क्षेत्र में मील का पत्थर स्थापित किया था। डॉ॰ विनोदबाला अरुण ‘महात्मा गाँधी संस्थान’ में संस्कृत और भारतीय दर्शन की वरिष्ठ व्याख्याता भी रह चुकी हैं। 
शोध-कृति ‘वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के नैतिक मूल्य और उनका मारीशस के हिन्दू-समाज पर प्रभाव’ वाल्मीकीय रामायण में वर्णित नैतिक मूल्य तक सीमित है, किन्तु श्री विजय रंजन की प्रस्तुत कृति में तो वाल्मीकीय रामायण के अनेक पक्षों का गम्भीर विवेचन है। इन पक्षों पर अभी तक किसी अन्य साहित्यज्ञ का ध्यान नहीं गया ! 
वस्तुतः श्री विजय रंजन ने ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ कृति में महाकवि वाल्मीकि के विचारों का गहन   अध्ययन कर उन्हें अपनी लेखनी से उजागर करने का अभूतपूर्व कार्य किया है। जिन शीर्षकों के अन्तर्गत महाकवि वाल्मीकि के अद्भुत विचारणीय पक्षों की आपने विवेचना की है, वे अनूठे और अछूते हैं। 
सुनिश्चित है कि लेखक विजय रंजन अपने प्रस्तुत ग्रंथ की विवेचना से पाठकगण को अपने विविधतावादी व्यक्तित्व (अधिवक्ता, लेखक, वक्ता) के साथ ही अपनी वैचारिक मौलिकता एवं विद्वत्तापूर्ण लेखन का स्पष्ट अनुभव करा देगा। 
प्रस्तुत कृति का वास्तविक मूल्यांकन करने में यद्यपि विद्वान् संस्कृतज्ञ ही    अधिक समर्थ होंगे। फिर भी, इस कृति के लेखक ने जिस श्रमपूर्वक आदि-कवि वाल्मीकि के महाकाव्य पर अपने अनूठी लेखनी चलाई है, उससे मेरी दृष्टि में लेखक धन्यवाद एवं बधाई का पात्र सिद्ध है।Û

                                      - बद्रीनारायण तिवारी

                                          मानस संगम, शिवाला, कानपुर (उ॰प्र॰)
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श्री विजय रंजन जी की बहुआयामी साहित्य-साधना प्रकर्ष पर है। उनकी कृति ‘कविता क्या है’ मुझे अत्यन्त प्रीतिकर और आह्लादकारी लगी। 
श्री राम पर लोक-मानस ने बहुत से आक्षेप लगाए। उन आक्षेपों के औचित्य-अनौचित्य पर श्री रंजन ने अपनी कृति ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ में गुरु गम्भीर विचारणा प्रस्तुत की और आदि-कवि वाल्मीकि कृत ‘रामायणम्’ के आधार पर भारतीय समाज एवं भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुष, मर्यादा-पुरुषोत्तम राम पर लगाए जाने वाले निराधार आरोपों का सारगर्भित खण्डन भी प्रस्तुत किया। 
श्री रंजन का सम्पूर्ण साहित्यिक कृतित्व विलक्षण सहित्भावी सोच एवं      शोधपरक गम्भीर अध्यवसाय को साकार करता है। 
रामकथा पर विचार-लेखन श्री रंजन जी का प्रिय विषय रहा है। इस विषय पर आपका सतत चिन्तन केवल आस्थावान् पाठक ही नहीं, ‘प्रगतिशील’ लोगों को भी नए आयामों और नए गवाक्षों से परिचित कराता है। 
प्रस्तुत कृति ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ में श्री रंजन का घोर अध्यवसाय और चिन्तन उद्भासित है जो वाल्मीकि रामायण की अप्रमेयता और उसके निकषों पर नव-चेतना का उन्मीलन करता है। ऐसे लेखक और विचारक दुर्लभ-विरल हैं। 
इस कृति में श्री रंजन ने आदि-कवि वाल्मीकि की ‘रामायणम्’ में साक्षात् किए गए विविध साहित्यिक प्रत्ययों की नए सिरे से सारवान् विवेचना प्रस्तुत की है। 
इन साहित्यिक प्रत्ययों को पाश्चात्य साहित्यकारों ने बिम्बवाद, लोकवाद, मानववाद, नारीवाद, प्रकृतिवाद आदि का नाम देकर पाश्चात्य अवदान बताया है। 
परन्तु प्रस्तुत कृति में श्री रंजन ने संदर्भगत प्रत्ययों का सुसंगत, तथ्यसम्मत स्वरूप में सोदाहरण तर्क प्रस्तुत करके आदि-कवि वाल्मीकि को इनका आविश्व प्रथम प्रयुक्तकर्त्ता सिद्ध किया है। 
आश्चर्य का विषय है कि विगत 100-150 वर्षों में विश्व भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जहाँ आदि-कवि वाल्मीकि के अवदान और सन्दर्भगत साहित्यिक प्रत्ययों/वादों के सन्दर्भ में हजारों शोध प्रस्तुत किए गए, वहाँ श्री रंजन द्वारा प्रस्तुत बिन्दुओं पर किसी शोधार्थी, किसी विद्वान् शोध-निदेशक का ध्यान अब तक नहीं गया ! 
वास्तव में श्री रंजन ने इस कृति में अपनी विशिष्ट शोध-दृष्टि और तर्कसंगतता के बल पर महनीय प्रशंसनीय कार्य किया है। 
इस दुष्कर कार्य के निमित्त श्री रंजन को हृद्-तल से मैं बधाई देता हूँ और उनके चिरायु होने की कामना करता हूँ। 
आशा है सहृदय विद्वत् समाज इस कृति का भरपूर स्वागत करेगा।


                                                 - डॉ॰ प्रभाकर मिश्र

                                          सेवानिवृत्त निदेशक ‘रत्नाकर शोधपीठ’  
                   (डॉ॰ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद अयोध्या)
                                    पूर्व प्राचार्य और पूर्व अध्यक्ष ‘हिन्दी विभाग’, 
                      आ॰ नरेन्द्रदेव पी॰ जी॰ कालेज, बभनान-गोण्डा (उ॰प्र॰)
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ज्ञान के पथ पर चलने वाला अन्वेषक जब बिना थके निरन्तर आगे बढ़ता रहता है, तब वह कुछ अप्रतिम अवदान भी विश्व के ज्ञान-साधकों को भेंटस्वरूप प्रदान कर देता है। श्री विजय रंजन कृत ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ एक ऐसी ही कृति है। 
चिन्तक विद्वान् लेखक श्री रंजन ने इस ग्रंथ को कुल तीन खण्डों में बाँटा है-
पूर्वार्चिक जिसमें मात्र एक अध्याय सम्मिलित है- रामायणम् की विषय-प्रवृत्ति
उत्तरार्चिक जिसमें 10 अध्याय सम्मिलित है-
1. रामायणम् : काव्य-नयवाद का प्रथम महाकाव्य 
2. रामायणम् : प्रथम मानववादी एवं प्रथम मानवतावादी महाकाव्य
3. रामायणम् : प्रथम लोकवादी महाकाव्य
4. रामायणम् : प्रथम नारीवादी महाकाव्य
5. रामायणम् : प्रथम बिम्बवादी महाकाव्य
6. रामायणम् : प्रथम प्रकृतिवादी महाकाव्य
7. रामायणम् : प्रथम राष्ट्रवादी महाकाव्य
8. रामायणम् : नय-रस का प्रथम महाकाव्य
9. रामायणम्: महत् तत्त्वों का प्रथम महाकाव्य
10. रामायणम्: प्रथम मनोवैज्ञानिक महाकाव्य
परिशिष्ट-1 में दो अध्याय हैं -
1. रामायणम् : देशज-विदेशज साहित्यिक निकषों पर 
2. रामायणम्: सर्वथा प्रासंगिक
परिशिष्ट-2 में आधार ग्रंथ एवं संदर्भित पत्रिकाएँ उल्लिखित हैं। कृतिकार का संक्षिप्त परिचय भी परिशिष्ट-2 में ही अंकित है। 
वैचारिक स्तर पर वर्तमान दौर वादों और विमर्शों का दौर रहा है। श्री रंजन ने आदि-महाकवि वाल्मीकि की महाकाव्यात्मक कृति को केवल महाकाव्य के निकषों पर ही नहीं परखा है, बल्कि उसका अनेकानेक साहित्यिक वादों के परिप्रेक्ष्य में गहनतापूर्वक मूल्यांकन भी किया है। विद्वान् लेखक ने वाल्मीकि रामायण में अन्तर्निहित कुछ मौलिक साहित्यिक प्रस्थापनाओं के बीज रूप भी प्रस्तुत ग्रंथ में पहली बार उल्लिखित किए हैं और स्थापित किया है कि पूरे विश्व में इनके प्रथम प्रयोक्ता वाल्मीकि ही हैं। प्रसंगित मौलिक प्रस्थापनाएँ हैं- नयरसवाद, महत्वाद, प्रकृतिवाद, बिम्बवाद, नारीवाद, मानवतावाद, लोकवाद, मनोविज्ञानवाद, राष्ट्रवाद आदि। इनके सन्दर्भ में वाल्मीकि रामायण को परखना एक चुनौतीपूर्ण अकादमिक कार्य है। 
लगभग छः दशक से विजय रंजन जी की कलम अनवरत चलती रही है और साहित्य-पथ के अध्येताओं का मार्ग प्रशस्त करती रही है। 
श्री रंजन जी गत 29 वर्ष से अवध-अंचल के हृदय-क्षेत्र फैजाबाद-अयोध्या से ‘अवध-अर्चना’ त्रैमासिक का सम्पादन-प्रकाशन कर अपनी विलक्षण सकारात्मक साहित्यिक सोच का शंखनाद करते रहे हैं। 
हिन्दी त्रैमासिक ‘अवध-अर्चना’ साहित्यिक पत्रकारिता की दृष्टि से गैर-व्यवसायिक गम्भीर चिन्तनपरक साहित्यिक पत्रिका है। समकालीन भाषायी वातावरण में वैचारिक चिन्तनपरक पठनीय सामग्री उपलब्ध करा कर                    ‘अवध-अर्चना’ ने अपने दायित्व को गम्भीरता से निभाया है। 
साहित्यविद् और साहित्य-सृजनधर्मी श्री रंजन का रचना-संसार व्यापक और बहुआयामी है। प्रस्तुत कृति के पूर्व श्री रंजन-प्रणीत ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ का लेखन-प्रकाशन भी श्री रंजन की विचक्षण उपलब्धि है जो भारतीय वाङ्मय की आदि-महाकवि वाल्मीकि कृत महान् कृति ‘रामायणम्’ (वाल्मीकि-रामायण) का विश्व के सभी काव्य-निकषों के सापेक्ष तुलनात्मक अध्ययन है। 
‘साहित्यिक तुला....’ के बाद श्री रंजन की साहित्यिक यात्रा में अनेक विलक्षण मौलिक प्रस्थापनाओं वाली कृतियाँ भी प्रकाशित हुई हैं- ‘रसवाद और नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ , ‘कविता क्या है’ आदि। ये कृतियाँ समकालीन आलोचनाशास्त्र की अमूल्य निधि हैं। 
उपर्युक्त प्रकाशित कृतियों के अतिरिक्त ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’, ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ तथा ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ भी उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। 
श्री रंजन की सभी कृतियाँ अपने विषय में मील का पत्थर हैं। परन्तु दुर्भाग्य से उच्चतर शिक्षा से जुड़े साहित्य-अध्येताओं ने संभवतः अपने आन्तरिक अहम् के कारण इनकी ओर उचित रूप से ध्यान नहीं दिया है। 
लोक में और बौद्धिक जगत् में आदि-कवि के नाम से प्रतिष्ठित ऋषि वाल्मीकि (जिन्हें श्री रंजन ने अपनी कृति में सर्वत्र आदि-महाकवि कहा है) निस्संदेह महान् कवि हैं। महर्षि वाल्मीकि ने अपनी कृति ‘रामायणम्’ में भारतीय सद्संस्कारों एवं भारतीय संस्कृति के साक्षात्कर्त्ता इक्ष्वाकुवंशीय राम की जीवनगाथा का वर्णन तो किया ही है, अनेक साहित्यिक श्रेष्ठ मानकों का निर्वहन और यथावश्यकता     निर्धारण भी उन्होंने महाकाव्य में प्रस्तुत किया है। 
श्री रंजन-प्रणीत ग्रंथ में अंकित सुतार्किक तथ्यान्वेषण के अनुसार इतना तो मानना ही होगा कि महर्षि वाल्मीकि अनेक विशिष्ट साहित्यिक वादों (उदाहरणार्थ मानववाद, लोकवाद, बिम्बवाद, प्रकृतिवाद, नारीवाद आदि) का सफल रूपांकन करने वाले प्रथम प्रयोक्ता कवि हैं। श्री रंजन ने महत् श्रम करके इन अधुना साहित्यिक वादों को वाल्मीकीय रामायण में ढूँढ निकाला है। उन्होंने इस कृति में वाल्मीकीय ‘रामायणम्’ के सृजन के हजारों वर्षों बाद प्रस्तुत किए गए इन वादों का प्रथम प्रयोक्ता महर्षि वाल्मीकि को सोदाहरण, सुतार्किक एवं सुसंगत स्वरूप में सिद्ध किया है। 
अतएव, मुझे विश्वास है कि श्री रंजन की पूर्व कृतियों के समान आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान समाहित किए हुए यह कृति भी समकालीन युग की एक युगान्तरकारी उपलब्धि होगी। यह ग्रंथ वाल्मीकि-रामायण की अध्ययन-परम्परा को आगे बढ़ाने में एक प्रकाशस्तम्भ का कार्य करेगा और गम्भीर चिन्तकों को विचार करने पर भी मजबूर करेगा। 
मैं इस ग्रंथ के विद्वान् लेखक श्री विजय रंजन को साधुवाद देते हुए उनके ग्रंथ-प्रणयन में नियोजित गम्भीर अकादमिक साहित्यिक अनुशीलन में प्रयुक्त 40 वर्षीय वकालत से अर्जित उनके सुसंगत तर्क-कौशल के साथ-साथ  तत्सम्बन्धी परिश्रम, लेखकीय कौशल और साधना को प्रणाम करता हूँ। 
अंत में महाकवि वाल्मीकि को भी नमन।
                                    
 

                                        - डॉ॰ हेमराज मीणा

                                  पूर्व प्रो॰ पूर्वक्षेत्रीय निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा 
                                                        सम्प्रति विजिटिंग प्रोफेसर 
                                            ओड़िशा केन्द्रीय विश्वविद्यालय, कोरापुट (ओड़िशा) 

                                      










                                                 

यह मेरे लिए हर्ष एवं गर्व का विषय है कि मुझे श्री विजय रंजन जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ की शुभाशंसा लिखने का सुअवसर मिला है।
यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा का विस्तृत एवं सुविवेचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। 
पुस्तक की भाषा-शैली यदा-कदा क्लिष्ट होते हुए भी सुग्राही है। 
कहीं-कहीं पर विजय रंजन जी भावी पाठक से संवाद करते भी दिखते हैं, यथा- 
“जहाँ तक भारतीय राष्ट्रवाद को ‘रूढ़िवादी (Conservative)’, ‘अहम्वादी’, ‘अहंकारी’, ‘साम्राज्यवादी’ या ‘उग्र राष्ट्रवादी’ कहने का प्रश्न है, सत्य तो यह है कि उपलब्ध मानव-इतिहास में भारत के कभी ‘अहम्वादी’, ‘अहंकारी’ या कि साम्राज्यवादी अभीप्सा से ग्रस्त होने का कोई इतिहास कभी दृश्यमान नहीं हुआ। वास्तव में ‘.....ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः’, ’सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ....’, ‘यद् भद्रं तन्न ऽ आ सुव’, ‘उदात्तता’, ‘सहिष्णुता’, ‘समन्वयशीलता’ और ‘सह-अस्तित्व’ का आकांक्षी सत्त्वशील ज्ञान-निरत भारत अपनी प्राचीन उत्कृष्टता का परम्परागत प्रेमी तो हो सकता है (वरन् सशक्त स्वरों में कहना चाहिए कि भारत परम्परा-प्रेमी है, लेकिन भारत की परम्परा-प्रियता में पं॰ विद्यानिवास मिश्र के शब्दों के अनुसार ‘पूर्ववर्ती का समावेश है पर उससे आगे जाने की बात भी है; पूर्ववर्ती का सातत्य है, आधिपत्य नहीं’) यह अंग्रेजी के Traditional भिन्न भी र्है। इस तरह भारत रूढ़िवादी या कि उग्रतया कट्टरतावादी कभी नहीं हो सकता। कभी उन्मादी भी नहीं हो सकता भा$रत का ‘भा$रतीय (ज्ञानोन्मुखी) सह भारती$य (भारतीत्व से परिपूर्ण) समाज, भारतीय संस्कृति और तद्वत् ‘भारतीय राष्ट्रवाद’। त...ब, जब-तब प्रकट किया जाने वाली आशंका, तत्सम्बन्धी काल्पनिक या कि झूठा भय सर्वथा निराधार सिद्ध है। भारत की मूल ऋता, मूल संस्कृति के प्रकृतितया मूलतया सात्त्विकता से, ‘नैतिकतावादी लोकहित सह लोकहितवादी नैतिकता’ से और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ आदि की उदात्त भावना से सतत आप्लावित होने के ब्याज से राष्ट्रवाद की कथित गुणवाचक शब्दावली में ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ को अधिकतमतः ‘उदारवादी राष्ट्रवाद (स्पइमतंस छंजपवदंसपेउ)’ ही कहा जा सकता है। ‘प्रजातान्त्रिक राष्ट्रवाद (क्मउवबतंजपब छंजपवदंसपेउ)’ भी कह सकते हैं इसे, इसलिए कि प्रजाहितरतता एवम् लोक-सम्मान की महत्ता भारतीय संस्कृति की अतिरिक्त विशेषता रही है; भारत से बढ़कर अन्यत्र कहीं दृश्यमान नहीं है लोकवादी प्रजातंत्र। प्रजा को ‘भारती’ स्वरूप (“.........यत्रेयं भारती प्रजा” --वायुपुराण) में देखने वाले भारत का राष्ट्रवाद, औ...र, लोक/प्रजा के लिए निजी सुखों के बलिदान की पराकाष्ठा वाले ‘रामराज्य’ के आदर्शों वाले भारत का ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ यहाँ की प्रजा/जन की अन्तिम सरणि तक सर्वकल्याणक हित-रक्षा हेतु सन्नद्ध है। इस तरह सैद्धान्तिक स्वरूप में ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ वस्तुतः प्रजातान्त्रिक राष्ट्रवाद ही है।” 
विजय रंजन जी ने परिस्थितिजन्य लेखों के सन्दर्भों को भी पुनः सन्दर्भित करने का यत्न किया है। यथा- 
“राष्ट्रवाद-विरोधी अपने पक्ष में रवीन्द्रनाथ टैगोर और प्रेमचन्द प्रभृति मनीषियों के क्रमशः 1916 ई॰ व 1933 ई॰ में लिखे गए कथित राष्ट्रवाद-  विरोधी आलेखों को उद्धृत करते हैं। ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि जापान, जर्मनी आदि में उन दिनों राष्ट्रवाद ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के बजाय उग्र, उन्मादी और आक्रामक ‘नस्लीय राष्ट्रवाद’ के रूप में फैल रहा था जिसके फलस्वरूप विश्वयुद्ध की विभीषिका उत्पन्न हो गई थी। इसीलिए उस उग्र और आक्रामक राष्ट्रवाद का विरोध किया था रवीन्द्रनाथ टैगोर ने और बाद में प्रेमचन्द ने।”
विजय रंजन जी ने चुनौती देते हुए राष्ट्रवाद की वर्तमान आवश्यकता को पुनर्लेखित करने का भी साहस किया है। वे कहते हैं - 
” ‘द रिपब्लिक’ के रचयिता प्लेटो ने जातीय संस्कृति के आधार पर यूरोप में फ्रेंच, पोल, जर्मन, अंग्रेज, ग्रीक, स्लोवाक आदि राष्ट्र-राज्यों की स्थापना की थी; तबसे लेकर आज तक विश्व का कोई राष्ट्र अन्तर-राष्ट्रीयता की कितनी भी हुंकार लगाए, अपने राष्ट्रीय (जातीय) संस्कृति की, राष्ट्रीय/जातीय चरित्र की अवहेलना नहीं कर सका, प्रत्युत वर्तमान विश्व की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था ही ऐसी है कि कोई ऐसा कर ही नहीं सकता। संभवतः इसीलिए आविश्व राष्ट्र अपनी विशिष्ट अस्मिता और अपने राष्ट्रीय हितों की अनदेखी न कर सके हैं, न ही कर सकते हैं; न ही आविश्व किसी भी राष्ट्र में ‘राष्ट्र की अस्मिता’ एवं इस ‘अस्मिता के संरक्षक’ राष्ट्रवाद को विलोपित ही किया जा सकता है; औ...र  न ही किसी भी राष्ट्र का सामान्य बुद्धि वाला राष्ट्रिक भी अन्तर-राष्ट्रीयता के नाम पर अपने राष्ट्र में राष्ट्रवाद को विलोपित कर अपने राष्ट्र को अस्थायी/अन-स्थायी बनाने की दलील स्वीकार कर सकता है। ”
अन्त में, मैं अपने को उनकी इस आशा से अपने को जोड़ता हूँ कि-
“ भा$रतीय एवं भारती$य संस्कृति से ओतप्रोत राष्ट्रवाद (भारतीय राष्ट्रवाद या भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद) को मनसा-वाचा-कर्मणा, इच्छा-ज्ञान-क्रिया के संस्तर पर स्वीकार करने के पश्चात् ही हमारा भारत एक बार और विश्वगुरु बन कर सम्पूर्ण विश्व को एक नया ऋतम्वरिक, ऋतम्भरिक, आदर्शवादी, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ और    ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सदृश सिद्धान्तों से आप्लावित सत्त्वशील राष्ट्रवाद का सार्थक प्रत्यय प्रदान कर सकेगा और इस तरह भारत सम्पूर्ण विश्व को ‘सर्वकल्याणकता’ एवम् ‘सर्वम् शान्ति’ की ओर उन्मुख करके एक नई दिशा प्रदान करने में भी समर्थ सिद्ध होेगा। ”
विजय रंजन जी की यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद पर लिखे गए साहित्य में अपना उच्च स्थान बनाने में सफल होगी, यही कामना है और यही विश्वास है।
इस महत्त्वपूर्ण विषय पर पुस्तक लिखने हेतु उन्हें मेरा साधुवाद।
 

                    - आचार्य डॉ॰ मनोज दीक्षित

                     कुलपति (वर्तमान में सेवानिवृत्त)
               डॉ॰ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, 
                    फैजाबाद-224001 (उ॰ प्र॰), भारत 

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भारतीय राष्ट्र न तो मात्र आर्थिक इकाई है, न भौगोलिक और न राजनीतिक। भारत के संदर्भ में जब राष्ट्र की बात की जाती है, तो पाश्चात्य अवधारणा ‘राज्य’ से अलग करके इसको समझना चाहिए। भारत के संदर्भ में राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है। जब हम देश कहते हैं, तब भूगोल का अर्थ ग्रहण करते हैं। 
प्रत्येक राष्ट्र के अपने कुछ प्रतीक होते हैं; कुछ मान्यताएँ होती हैं। जिसकी जो भी जैसी भी परम्परा हो, वह उससे रस ग्रहण कर अपने को जीवित रखता है। भारतीय परम्परा अपने राष्ट्र के हजारों वर्ष पुराना होने की अवधारणा को मानती है। दस हजार वर्षों का जीवित इतिहास हमारी आँखों के सामने है। पाश्चात्य जगत् अपनी-अपनी वर्जनाओं और अपने इतिहासबोध के कारण इसे पाँच हजार वर्ष पुराना मानता है। कुछ तथ्य अब घोषित सत्य हैं। ऋग्वेद विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। वैदिक संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है। जेन्दावस्ता की भाषा वैदिक संस्कृत के करीब है। विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, शिल्प, संगीत की भारतीय परम्परा तो प्राचीन है ही, इन विषयों के लिखित ग्रन्थ भी संस्कृत भाषा में प्राप्त होते हैं।
रामायण, महाभारत और पुराण भारत के भूगोल की चर्चा करते हैं। आज का भारत महाभारतकाल का भारत नहीं है। यह कटा-छँटा खण्डित भारत है। केवल पश्चिमी हिस्सा ही भारत से अलग नहीं हुआ है, दक्षिण-पूर्व के अनेक क्षेत्र भी आज भारत में नहीं हैं। भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठतम पृष्ठ उन हिस्सों से जुड़े हुए हैं जो आज मध्य एशिया के कई देशों के साथ सम्बद्ध हैं या स्वतन्त्र हैं। रामायण और महाभारत में जिन नदियों और पहाड़ों का वर्णन है, उनमें बहुत से वर्तमान में भारत के अंग नहीं हैं। 
ईरान ‘आर्यान्’ था। आर्य अति पराक्रमी एवं रचनात्मक थे। ‘आर्य’ का अर्थ ही ‘श्रेष्ठ’ होता है। आर्य भारत में बाहर से आए यह मान्यता अब समाप्त हो गई है। कुछ लोग पिष्ट-पेषण के लिए नई खोजों और         अवधारणाओं को न समझने की जिद्द में रटी-रटाई बातें अभी भी कर रहे हैं और विदेशियों द्वारा एक खास मंशा से कही गई बात को दुहराते हुए कुतर्क की सीमा तक आग्रही बने हुए हैं। 
भारतीय संदर्भ में राष्ट्रवाद एक सकारात्मक उद्भावना और दृष्टिकोण है। भारत के संदर्भ में जिन विशेषणों का प्रयोग किया जाता है, वे हैं ‘शाश्वत’ और ‘चिन्मय’। शाश्वतता कुछ जीवन-मूल्यों के संरक्षण के साथ भी जुड़ी हुई है। 
राष्ट्र में जन का निवास है तो निश्चित रूप से एक निश्चित भूगोल भी होगा। इस भूगोल की चर्चा भी पुराणों के अतिरिक्त रामायण, महाभारत और कालिदास प्रभृति कवियों के यहाँ है। 
पश्चिम, पूरब, उत्तर और दक्षिण की भाषाएँ या तो संस्कृत से विकसित हुई हैं या संस्कृत के प्रभाव में विकसित हुई हैं। जनजातीय भाषाओं सहित भारत की अधिकांश भाषाओं में संस्कृत शब्दावली की बहुलता तथा स्वीकार्यता उस प्राचीन भाषा की समृद्धि, प्रतिभा तथा प्रचार-प्रसार को दर्शाता है। दक्षिण भारत के वर्तमान सभी प्रान्तों के आचार्यों तथा विद्वानों ने संस्कृत में रचनाएँ की हैं तथा उसकी ज्ञान-सम्पदा का प्रचार-प्रसार करने में सहयोग किया है। हजार वर्ष पूर्व अपभ्रंश के पहले पालि और प्राकृत का व्यापक प्रसार था। अपभ्रंश की स्वीकार्यता पूरे देश में थी। उसी की क्रोड से आधुनिक आर्य भाषाएँ विकसित हुई हैं। प्राचीन तमिल कवि तिरुवल्लुर हों या आधुनिक कवि सुब्रह्मण्य भारती, इनकी रचनाओं मंे संस्कार और राष्ट्र प्रबल रूप से व्यंजित हुआ है। ‘आनन्दमठ’ में ‘वन्दे मातरम्’ गीत राष्ट्र की चेतना के व्यंजक के रूप में प्रस्तुत हुआ है, परन्तु इसके पूर्व भी अनेक वन्दनाओं में भारतीय ‘राष्ट्र’ को ‘माता’ के रूप में प्रणाम करते रहे हैं। यह भारतीयों की आस्तिकता, श्रद्धा तथा समर्पण की भावना की शाब्दिक प्रणति है। 
‘भारत’ को ‘माँ’ मानने की धारणा भी वैदिक है। ‘माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः’ कह कर मंत्रदृष्टा ऋषियों ने पृथ्वी का वन्दन किया है। जब हम ‘वन्दे मातरम्’ बोलते हैं, तो इसके पीछे भाव क्या है ? क्या यह कुछ अक्षरों का संयोजन मात्र है ? नहीं ! ‘वन्दे मातरम्’ यानी ‘भारत के सुख-समृद्धि की चिन्ता का भाव’, ‘भारत की अखण्डता के साथ ही सभी भारतीयों के सुखी, स्वस्थ व समृद्ध होने की कामना का भाव’, ‘इस पवित्र भूमि के प्रति सर्व समर्पण का भाव’, ‘अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का भाव’। जब भारत सुखी-समृद्ध होगा तो क्या उसमें किसी एक धर्म, एक जाति या एक पंथ की समृद्धि का भाव निहित है ? नहीं। भारत ने सदैव सबके सुख-समृद्धि की कल्पना की है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।
‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ विजय रंजन द्वारा लिखी गई महत्त्वपूर्ण कृति है। भारतीय और पाश्चात्य जगत् के राजनीतिशास्त्र, इतिहास और साहित्य के सम्मान्य विद्वानों की मूल पुस्तकों का उपयोग इसके लेखन के लिए विजय रंजन ने किया है। प्राचीन आर्य ग्रन्थों के साथ ही  आधुनिक विषयों पर लिखी गई लगभग दो सौ से अधिक पुस्तकों का उपयोग इस ग्रन्थ को तैयार करने के लिए किया गया है। अंग्रेजी की महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और सन्दर्भों के साथ ही हिन्दी की उन पत्र-पत्रिकाओं का भी लेखक ने उपयोग किया है। 
भारतीय राष्ट्रवाद पर लिखी गई यह पुस्तक कई मिथ्या धारणाओं को   ध्वस्त करती है तथा नए सिरे से सोचने को बाध्य करती है। पूरी परम्परा के आलोड़न-विलोड़न के पश्चात् लिखी गई यह पुस्तक अवश्य ही पढ़ी जाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
                               

                      - प्रो॰ डॉ॰ नन्दकिशोर पाण्डेय

                        निदेशक (वर्तमान में सेवानिवृत्त)
                         केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा,
                              उ॰ प्र॰, भारत
 




        
          चिन्तयेद् राघवं नित्यं श्रेयः प्राप्तुं य इच्छति।
            श्रावयेदिदमाख्यानं ब्राह्मणेभ्यो  दिने दिने।।
                         - वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड 111/20
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि नारद द्वारा त्रैलोक्य में परमपुरुष या श्रेष्ठतम पुरुष के रूप में ‘इक्ष्वाकुवंश प्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतं’ (बालकाण्ड 1/8) के प्रशस्त वर्णन के पश्चात् लोक-कल्याणार्थ जिस दाशरथ राम का आख्यान प्रत्यक्ष दर्शन, नमन एवं अनुभव के साथ महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत किया, वह ‘रामकथा’ के रूप में लोक में समादृत हुई। इसीलिए आदिकवि ने उत्तरकाण्ड के अन्तिम अध्याय में श्रेयप्राप्ति के लिए राघव (राम) का चिन्तन तथा ब्राह्मणों (ज्ञानियों) को प्रतिदिन लोकहिताय श्रवण कराने का भी निर्देश देकर अपनी आर्ष-मनसा को अभिव्यक्त किया। श्रीराम का जीवन, मर्यादित आचरण, मन को वश में करने वाले, महाबल, कान्ति, धैर्य, जितेन्द्रियता, बुद्धि, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभित, विपुलांसी, महाबाहु, कम्बुग्रीव, महाहनु, महोरस्क, आजानुबाहु, सुशिर, सुललाट, सुविक्रम, समविभक्तौ, स्निग्धवर्ण, प्रतापवान्, पीनवक्षा, विषालाक्षो, लक्ष्मीवान्, शुभलक्षण, धर्मज्ञ, सत्यसंघ, प्रजानांहितेरतः, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, शुचिर्वश्य, समाधिमान्, प्रजापतिसम,    धाता, रिपुसूदन, रक्षिता जीवलोकस्य, धर्मस्य परिरक्षिता, स्वधर्म एवं स्वजन रक्षक, वेदवेदौतत्वज्ञ, धनुर्विद्या में निष्ठित, सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ, स्मृतिमान्, प्रतिभावान् आदि अनेक विशेषणों के साथ इक्कीस श्लोकों में जिस पुरुषोत्तमत्व के निकष पर रखकर प्रस्तुत किया गया है, वह विश्वसंस्कृति का एकमेव विश्वविजयी अपराजेय पुरुषोत्तम श्रीराम का लोकपावनी व्यक्तित्व है। इसीलिए नरोत्तमत्व के प्रतिमान राम के जीवन का यह महाकाव्य तप का महाकाव्य है। शील-सौन्दर्य के चरम प्रतिमान होने के कारण ही श्रीराम भारतीय संस्कृति के मेरुदण्ड हैं और उनका जीवन लोक का नियामक है।
इतिहास साक्षी है कि भारतवर्ष के प्राचीनतम एवं प्रशस्त सूर्योत्पन्न अयोध्या के इक्ष्वाकुवंश की तिरसठवीं पीढ़ी में महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में राम का इतिहास एवं संस्कृति लोकपावनी है। ऐसे मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम पर भी आक्षेप लगाना लोकमर्यादा एवं शास्त्र का ही नहीं, अपितु मनुष्यता का घोर अपमान है। 
वस्तुतः विगत दो सौ वर्षों की विकृत शिक्षा-प्रणाली में शिक्षित, यूरोपीय मानसिकता से प्रभावित विकृत मानसिकता एवं कालुष्यपूर्ण अमर्यादित, असंयमित जीवन जीने वाले लोगों की सोच ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों आदि के माध्यम से राम-विरोध प्रकट कर अपनी बुद्धिहीनता का ही परिचय दिया है, जिसे समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया।
प्रस्तुत कृति ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ के कृतिकार राम-साहित्य के मनीषी, आर्ष-चिन्तक विजय रंजन ने ‘कविता-उत्स’ की गवेषणा के क्रम में लगभग दो दशकों तक वाल्मीकीय रामायण तथा परवर्ती उपजीव्य काव्यों की सामग्रियों का गंभीर अध्ययन, अनुशीलन एवं विश्लेषण कर अपने दिन-ब-दिन परिपक्व बोधानुबोध से विभिन्न रामकथाओं की तुलना कर सत्य के सर्वाधिक सन्निकट वाल्मीकीय रामायण के आधार पर इन आरोपों को आधारहीन बताया है। अपनी ‘पुरावृत्ति’ में लेखक ने अपने मन की बात लिखी है- “ ‘कथित रामद्रोही’ या ‘राम के विरोधी’ राम पर जो आरोप जब-तब विजड़ित करते रहते हैं- वे सभी अनर्गल और सर्वथा अनुचित हैं। सम्भवतः ऐसे आरोप उवाचित इसलिए होते हैं कि कथित आरोपकों ने वाल्मीकीय रामायणम् का सम्मादिट्ठिक अनुशीलन नहीं किया।” वस्तुतः इस कृति का बीजरूप उपरोक्त अवधारणाओं से ही आविर्भूत हुआ है।
भारत, भारतीयता और भारतीय संस्कृति के मूलतत्त्व राम की तात्त्विकता और ऋत, सत्य और धर्म के अधिष्ठान श्रीराम के चिन्तक, रामायण महाकाव्य के गंभीर अध्येता एवं इस पुस्तक के लेखक ने इस कृति को राम पर आक्षेप्य समस्त आरोपों के सत्य की छानबीन को एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर कुल पाँच आक्षेपों पर अपनी पैनी दृष्टि डाली है। हिन्दी जगत् के प्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की ‘शब्द तोड़क शैली’ का अनुकरण कर लेखक ने अपनी साहित्यिक समझ एवं रामकथा के मूर्धन्य लेखकों की शैली का आधार लेकर विवेच्य विषय की प्रस्तुति की है।
प्रस्तुत कृति में ‘पूर्वार्चिक’ और ‘उत्तरार्चिक’ नामक दो खण्ड हैं। 
‘पूर्वार्चिक’ के अन्तर्गत ‘प्रस्तावना’ के अतिरिक्त पाँचों आरोपों को तथ्यतः एवं तर्कतः अनुचित सिद्ध किया गया है। इनमंे राम पर प्रथम आक्षेप: ‘ताड़का वध’, द्वितीय आक्षेप: ‘खर से कायरतापूर्वक युद्ध’, तृतीय आक्षेप: ‘परोक्ष/छù युद्ध में बालि वध’, चतुर्थ आक्षेप: ‘निर्दोष सीता का निर्वासन’ तथा पंचम् आक्षेप: ‘शूद्र तापस शम्बूक का वध’ चयनित हैं। 
उत्तरार्चिक में ‘वाल्मीकि के राम’ पर अत्यन्त उपयोगी सामग्री, विवेचन एवं प्रस्तुति है जो किसी भी पाठक के मानसतंत्री को झंकृत कर राम एवं रामकथा के विस्तीर्ण फलक को अनावृत्त करने में समर्थ है। लेखक का यह स्पष्ट अभिमत है कि “वाल्मीकीय राम सदृश कोई दूसरा नाम, कोई दूसरा सार्वहितू व्यक्ति-चरित्र या कोई दूसरा धर्म-पुरुष इस पुस्तक के लेखक को अपने बीसेक वर्षों के अध्ययन में अब तक दृष्टिगोचर नहीं हुआ।” इसीलिए प्रस्तुत कृति में राम के समकालीन आदि-महाकवि वाल्मीकि कृत ‘रामायणम्’ के सर्व-वरीय मानक के अनुसार, अपितु मुख्यतया उसी के आधार पर, नैयायिक प्रमा से राम पर विजड़ित आरोपों/आक्षेपों को विवेचित कर प्रस्तुत किया गया है। कृति में लेखक द्वारा पाँचों आक्षेपों को न्यायतः असंगत पाया गया है। 
तदनुसार, ताड़का-वध सम्बन्धी प्रथम आक्षेप वस्तुतः राम की पराक्रम-गाथा का प्रथम सोपान है क्योंकि राम वस्तुतः ताड़का का वध करने के इच्छुक नहीं थे किन्तु ताड़का-वध एक महाबलशालिनी, महामायाविनी, महाअत्याचारिणी, मानव-द्वेषी, मानव-उत्पीड़क, मानव-विनाशिनी राक्षसी का लोककल्याणार्थ, आत्मरक्षार्थ, शास्त्रसम्मत, न्यायोचित एवं अपरिहार्य कार्य था जिसे गुरु की आज्ञापालनार्थ उन्हें करना पड़ा। 
इसी प्रकार, द्वितीय आक्षेप ‘खर से कायरतापूर्वक युद्ध’ में राम की कायरता का प्रदर्शन मानना रामविद्रोही स्वर है क्योंकि राम जैसे व्यक्तित्व के जीवन में कहीं भी किसी भी कवि/लेखक ने ऐसा संदर्भ नहीं पाया है। इस पुस्तक में भी सबल तथ्यों के आधार पर इसकी निस्सारता सिद्ध की गई है। 
‘परोक्ष/छùयुद्ध में बालि वध’ नामक तृतीय आक्षेप भी अनुचित तथा दुराग्रह मात्र है। लेखक का अध्ययन बतलाता है कि ‘ऐसी प्रस्थापना प्रतीततः भवभूतिक बौद्ध युग में किसी राम-विरोधी द्वारा वितण्डित की गई। वस्तुतः किसी भी आधार पर इस आरोप/आक्षेप को न्यायोचित नहीं माना जा सकता। 
राम पर चतुर्थ आरोप ‘निर्दोष सीता का निर्वासन’ लगाया जाता है। यह प्रकरण रामाख्यान का सर्वाधिक चर्चित एवं विवादित प्रकरण रहा है। आज भी समाज में सीता एवं राम को अलग-अलग देखने वालों की कमी नहीं है। यही उनकी अज्ञानता का सबसे बड़ा प्रमाण है। वस्तुतः रामायण में सीता पृथ्वी का रूप हैं और राम अनके पालक विष्णु की भगवत्ता के मूर्तिमंत प्रतीक हैं। पुस्तक में सबल तथ्यों के आधार पर इस आक्षेप को भी निरस्त किया है जो सभी के लिए पठनीय, मननीय एवं अनुकरणीय है। 
इसी क्रम में पंचम् आक्षेप के अन्तर्गत गृहीत ‘षूद्र तापस शम्बूक का वध’ को जातीय विद्वेष फैलाने की दृष्टि से आलोचकों ने वाल्मीकीय राम पर लगाया है। यह भी ध्यातव्य है कि परवर्ती लेखकों द्वारा अनेक रामायणीय संस्करणों में यह प्रसिद्ध अंश भी राम के बहाने हिन्दू समाज को कलंकित करने के उद्देश्य से फैलाया गया भ्रमजाल है। इसके सम्बन्ध में भी लेखक की दृष्टि स्पष्ट है, मन निर्मल है तथा राम संस्कृति को समझने में परिष्कृत है। इसीलिए उसके अभिमत में यह आक्षेप भी असत्य, भ्रामक और कदाशयपूर्ण तथ्यों पर आधारित होने के कारण सर्वथा त्याज्य एवं गर्हित है।
पुस्तक के ‘उत्तरार्चिक’ में लेखक ने वाल्मीकि के राम पर अच्छी सामग्री प्रस्तुत की है जो अत्यन्त सराहनीय है। कृतिकार का स्पष्ट अभिमत है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि-प्रणीत रामायणम् समकालीन ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सत्य तथ्यांे पर आधारित एक अप्रतिम साहित्यिक महाकाव्य है।
लेखक ने अपने अध्ययन से यह पाया है कि वाल्मीकीय रामायण साहित्यिक महाकाव्यीय निकषों पर तो अप्रतिम महाकाव्य है ही अपितु, भारतीयेतर अनेक विद्वानों के काव्य-निकषों पर भी अप्रतिम है, अद्वितीय है। इस कृति में यह उद्घोष है कि दाशरथ राम स्वमेव अप्रतिम महानायक हैं, जिनका चित्रांकन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने इस सत्य स्वरूप में किया है कि सम्पूर्ण विश्व के किसी काव्य, कथानक, कथा आदि में उस रूप-स्वरूप का ‘चरित्र’ अलभ्य है। कृतिकार ने अपनी इस मनोरम रचना में सर्वत्र वाल्मीकीय रामाख्यान के वाल्मीकि कृत संस्कृत नाम ‘रामायणम्’ का उपयोग किया है, जो श्लाघनीय है। इसी पृष्ठभूमि में सम्पूर्ण रामायणम् में राम के गुणों, विशेषणों तथा ‘राम’ नाम की महिमा पर भी सामग्रियाँ एकत्र कर पाठकों के लिए सुलभ कर दिया है, जो लेखक की लोकहिताय भावना का निदर्शन है। लेखक की पैनी दृष्टि का परिचय प्रत्येक प्रसंग में सहज ही हो जाता है। कालिदास, भवभूति आदि संस्कृत कवियों के ‘राम’ को भी समीक्षित दृष्टि प्रदान करते हुए वाल्मीकि के राम को उपस्थित किया है। इसी क्रम में राम के नायकत्व को अपनी लेखनी का विषय बनाकर उपकृत होने वाले आचार्य चतुरसेन शास्त्री (वयं रक्षामः), नरेन्द्र कोहली (दीक्षा आदि शृंखलाएँ), कुबेरनाथ राय (त्रेता के वृहत्साम, महाकवि की तर्जनी), सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ (राम की शक्ति पूजा), नरेश मेहता (संशय की एक रात), भगवान सिंह (अपने-अपने राम) को भी समालोचनात्मक संदर्भ के लिए विश्लेषित किया है।
यह सर्वविदित है कि राम एवं रामकथा विश्व-संस्कृति का विषय है क्योंकि ‘रामकथा लोकेषु प्रचरिष्यति’ के कारण विभिन्न कालों में राम का पुरुषोत्तमत्व एवं रामायणम् की कथा की विश्व-व्याप्ति हुई। लेखक ने चीन, तिब्बत, लाओस, जावा, मलेशिया, कम्बोडिया, थाईलैण्ड, इण्डोनेशिया, बाली, न्यूगिनी, अफ्रीका आदि देशों में प्रचलित रामकथा की वैश्विक पृष्ठभूमि का भी विश्लेषण कर उसे राम के आक्षेपांे की निस्सारता को सिद्ध करने के लिए आधार बनाया है। अन्त में, निष्कर्षतः कृति का यह संदेश सभी पाठकों के लिए ‘राम ओषधि’ के रूप में शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य तथा श्रेयपरक जीवन के उपयोगी है कि “अन्यान्य देष-काल के सापेक्ष आज के वर्तमान में वाल्मीकीय राम के रामचरित का सम्यक् अवगाहन सर्वाधिक वांछनीय है। प्रतीततया आज के वर्तमान में वाल्मीकीय राम हमारी राष्ट्रीय आवष्यकता हैं। अतएव, वाल्मीकीय राम को सर्वाधिक वरीय राष्ट्रीय   आराध्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।”
प्रस्तुत कृति के माध्यम से लेखक अपने रामीय भावों को लोकहिताय प्रस्तुत करने में सफल रहा है। रामायण के भावों की प्रस्तुति तथा आक्षेपों के निराकरण में सबल तथ्यों का आधार लेकर तार्किक पुष्टि की गई है जो किसी भी कृति के कीर्तित्व का एक श्लाघनीय पक्ष है। लेखक के शब्द अवधी की माटी की सुगन्धि के साथ शब्द-शिल्पन् की प्रक्रिया से उभरे हैं। ‘ज्ञान-बघार’ जैसे शब्दों के माध्यम से यह कृति वस्तुतः ज्ञान का आगार है। लेखन हेतु आक्षेपों का चयन तथा उनके निराकरण से समाज को नवीन तथ्यों एवं तर्कों के द्वारा श्रीराम, रामसंस्कृति, रामकथा एवं राममयी भारतीय संस्कृति का नया आलोक प्राप्त हुआ है।
मुझे प्रसन्नता है कि राम-कृपा से यह कृति उस समय प्रकाशित हो रही है जब इतिहास, पुरातत्त्व, लोक-परम्परा तथा न्यायालयी प्रक्रिया से परिशुद्ध होकर वाल्मीकीय राम पुरुष से पुरुषोत्तम एवं वैष्णवत्ता की भगवत्प्रक्रिया का आदर्श उपस्थित करते हुए लेखक के अक्षर-पुष्पों द्वारा पुनप्र्रतिष्ठित हो रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि की ऐतिहासिकता, प्राचीनता तथा श्रीराम की भगवत्ता को प्रस्तुत कृति के माध्यम से निर्मल मन द्वारा प्रतिपादित कर लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के उन भावों को सार्थक किया है जो ‘श्री हनुमान चालीसा’ के आरम्भ में प्रस्तुत हैं-
“श्री गुरुचरन सरोज रज निज  मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर विमल जसु, जो दायकु फल चारि।।”
अन्त में, इस नवीन कृति की सर्जना के लिए लेखक को कोटिशः बधाइयाँ देते हुए उनके राममय जीवन की मंगलकामना करता हूँ। रामकथा विश्व-व्यापिनी है, इसीलिए कलिकाल की इस महामारी मंे सम्पूर्ण विश्व इस कृति के तथ्यों का संज्ञान लेकर श्रीराम के तपपूर्ण जीवन से उपजी ‘रामनामी’ ओषधि से स्वस्थ होकर पुनः सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त होगा, ऐसी कामना है।Û

                        - डाॅ॰ ईष्वरशरण विष्वकर्मा

आचार्य (सेवानिवृत्त) प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग,  दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर एवं सम्प्रति, अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग, प्रयागराज।
                  दूरभाष: 9935400244
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  भारतीय साहित्य में रामकथा सर्वाधिक प्राचीन मानी जाती है। ऋग्वेद के दशम् मण्डल और कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में राम का उल्लेख तो मिलता है, परन्तु वाल्मीकि-रामायण में राम की सम्पूर्ण कथा पहली बार सुव्यवस्थित रूप में प्राप्त होती है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि सम्भव है राम का कथानक बहुत पहले से लोककथा के रूप में प्रचलित रहा हो जिसे वाल्मीकि जी ने चैथी शती ईसा पूर्व में ‘रामायणम्’ महाकाव्य में क्रमबद्ध रूप में प्रांजलता प्रदान की। 
कालान्तर में रामकथा भारतीय संस्कृति का ऐसा अभिन्न अंग बन गई कि भारत में जन्में तीन प्रधान धर्मों- वैष्णव, बौद्ध और जैन- ने भी इसे अपने यहाँ प्रमुख स्थान दिया। राम को वैष्णव धर्म में विष्णु के अवतार रूप में, बौद्ध धर्म में बोधिसत्त्व के रूप में तथा जैन धर्म में आठवें बलदेव (त्रिषष्ठि शलाका पुरुषों में से एक) के रूप में प्रस्तुत किया। 
वैष्णव (या ब्राह्मण) परम्परा के ग्रन्थों में महाभारत, ब्रह्मपुराण, विष्णुपुराण, अग्निपुराण तथा वायुपुराण आदि में यत्ंिकंचित् परिवर्तन के साथ प्रस्तुत की गई रामकथा। इनके अतिरिक्त अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण और अद्भुत रामायण में भी रामकथा का वर्णन किया गया। 
रामकथा का प्राचीनतम स्रोत वाल्मीकि-रामायण निस्संदेह बौद्ध धर्म के पूर्व प्रकाश में आ चुकी थी क्योंकि वाल्मीकीय रामायण में बौद्ध धर्म-सम्बन्धी कोई भी उल्लेख प्राप्त नहीं होता; परन्तु बौद्ध-साहित्य में (जातकों में) रामकथा-सम्बन्धी आख्यान प्राप्त होते हैं। ‘अनामकम् जातम्’ और ‘दशरथ जातकम्’ में वैष्णव धर्म पर बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के लिए मूल रामकथा में अनेक विकृतियाँ प्रवेश करा दी गई हैं। वाल्मीकि रामायण का आदिरूप, जो बौद्ध धर्म के बहुत पूर्व निर्मित हुआ था, केवल पाँच (किसी-किसी के अनुसार छः) काण्डों में था और राज्याभिषेक के बाद ही कथा-समाप्ति की फलश्रुति दे दी गई थी, किन्तु बौद्ध धर्म ने रामकथा में जो विकृतियाँ (जिनमें गर्भवती सीता का निर्वासन भी था) डाल दी थीं, उनसे वाल्मीकि रामायण में सातवाँ   अध्याय जोड़ा गया जिसका रचनाकाल बौद्ध धर्म के प्रौढ़काल (श्री सी॰ वी॰ वैद्य और एम॰ विण्टरनिट्ज के अनुसार तीसरी शताब्दी) में प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार वाल्मीकि रामायण के दो रूप सामने आए। प्रथम रूप ‘उत्तरीय संस्करण’ और द्वितीय रूप ‘बंग संस्करण’ है। ‘उत्तरीय संस्करण’ मूल है। लवकुश-काण्ड और शम्बूक-वध के कथानक भी सीता-निर्वासन की भाँति उत्तरीय संस्करण में नहीं हैं। ‘बंग संस्करण’ या ‘पूर्वी संस्करण’ जो तीसरी शताब्दी में बौद्ध धर्म के प्रभाव से विकृत है, वह कथा-भेद तथा प्रक्षिप्त श्लोकों से भरपूर है। इसी में सीता-निर्वासन का प्रसंग प्रचारित है। 
वाल्मीकि रामायण के बाद महाभारत के वनपर्व में भी रामोपाख्यान है, जिसे मार्कण्डेय ऋषि ने युधिष्ठिर को आश्वासन देते हुए कहा है। इसमें भी मूल वाल्मीकीय रामायण के समान राज्याभिषेक के बाद 292वें अध्याय में कथा समाप्त होती है। इसमें भी सीता-निर्वासन का प्रसंग नहीं है। 
वैदिक धर्म के विद्वानों, जैनियों एवं बौद्धों में एक-दूसरे के प्रति उपजी वितृष्णा और असहिष्णुता की एक लम्बी परम्परा मिलती है जिसमें वैदिक धर्मानुयायियों ने जहाँ बुद्ध को ‘बुद्धू’, देवानांप्रियः को ‘मूर्ख’ और लुंचन बाबा को ‘लुच्चा’ बनाया, वहीं बौद्धों और जैनियों ने भी रामकथा की विकृतियों से केवल वैदिक धर्म और साहित्य को ही नहीं, बल्कि लोकजीवन के रीति-रिवाजों में गाए जाने वाले पारम्परिक मौखिक गीतों को भी जिस रूप में प्रस्तुत किया, उससे राम के आदर्श चरित्र या मर्यादापुरुषोत्तम की छवि खण्डित की गई। वे गीत आज भी लोगों (विशेषकर महिलाओं) के कण्ठ से शादी-विवाह जैसे मांगलिक पर्वों पर सुने जा सकते हैं। कौशल्या की हृदयहीनता, लवकुश का युद्ध, सीता की अग्नि-परीक्षा एवं परित्याग के कथानक विविध रूपों में लोकजीवन के ग्रामगीतों में अब भी सुरक्षित हैं। इसीलिए लोकजीवन में रच-बस गए इन गीतों की मर्मभेदी व्यंजना का तिरस्कार तुलसी जैसे महाकवि भी नहीं कर सके। रामचरितमानस में तो नहीं, लेकिन कवितावली और विनयपत्रिका में अग्निपरीक्षा और निर्वासन के प्रसंग उन्हें रखने ही पड़े। 
वाल्मीकि के बाद का राम-साहित्य तत्कालीन कवियों की सोच और उनकी कल्पनाओं के साँचे में कुछ अन्तर के साथ ढलता रहा। इस तरह से भी कथान्तर, चरित्रान्तर, पाठान्तर की रूपरेखा निरन्तर बढ़ती गई। फलस्वरूप पाठालोचन के वैज्ञानिक निष्कर्षों से सम्बन्धित ग्रन्थों के पाठ तथा रामकथा के शुद्ध विकास की संगति अनेक प्रसंगों में बाधित होने लगी। परिणामतः राम के चरित्र पर विभिन्न प्रकार के आक्षेप, प्रक्षेप एवं हस्तक्षेप सुनाई पड़ने लगे। इन बिन्दुओं पर बहुत सी पुस्तकें और आलेख भी प्रकशित हुए। प्रस्तुत ग्रन्थ ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ इसी पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। 
विद्वान् लेखक विजय रंजन ने राम के उज्ज्वल चरित्र पर किए जाने वाले आक्षेपों (ताड़का वध, खर से कायरतापूर्वक युद्ध, परोक्ष/छù युद्ध में बालि-वध, निर्दोष सीता का निर्वासन और शूद्र तापस शम्बूक का   वध) की गम्भीर संश्लेषण-विश्लेषण तथा मीमांसा करते हुए जो साधार, तर्कपूर्ण और विश्वसनीय निष्कर्ष दिए हैं, वे सम्यक् साक्ष्य एवं मौलिक भाष्य के कारण सहज ग्राह्य हैं। 
पुस्तक की प्रस्तावना में लेखक अपनी निभ्र्रान्त दृष्टि का परिचय देता हुआ लिखता है- “सभी आरोपों को ‘क्षेपक’ मात्र कह कर प्रभाव- धूमिल किया जाना तर्कोचित नहीं है। उक्त कथा-प्रसंगों में से अनेक अनेकानेक रामायणों में भी अंकित हैं औ...र लोक-स्मृति में भी व्याप्त हैं। अतएव, इन आरोपों के परिप्रेक्ष्य में प्रमासम्मत गहन सघन छान-बीन अपेक्षित है जिसके सन्दर्भ में वाल्मीकीय रामायण एक सर्वथा विश्वसनीय साक्षी के रूप में न्यायशास्त्ऱीय प्रमा से ग्राह्य है।”
राम के चरित्र पर पहला आक्षेप ताटका/ताड़का वध को लेकर है। स्त्री होने के कारण उसके वध को ‘स्त्री-वध’ बता कर कतिपय आलोचक राम के पराक्रम की निन्दा करते हैं। इस आक्षेप की गहराई में जाकर प्रमाणों और सन्दर्भों की छानबीन करते हुए विद्वान् लेखक की स्थापना है कि महाबलशालिनी एवं अत्याचारिणी ताड़का ने जब राम और लक्ष्मण दोनों पर प्राणघातक हमले किए, तो गुरु की आज्ञा से लोककल्याणार्थ और आत्मरक्षार्थ राम ने ताड़का का वध किया। यह सर्वथा न्यायोचित और अपरिहार्य था। इसलिए उक्त आरोप सर्वथा असंगत है। 
राम पर दूसरा आक्षेप खर के साथ कायरतापूर्ण युद्ध करने का है। विभिन्न पुष्ट प्रमाणों से लेखक सिद्ध करता है कि राम ने रणकौशल की विशिष्ट तकनीक का प्रयोग करते हुए चैदह हजार युद्धरत राक्षसों के नायक खर का संहार किया था, जो उनके कुशल रणनीतिज्ञ होने का प्रमाण है। अतः दूसरे आक्षेप को भी लेखक खारिज करता है। 
इसी तरह, बालि-वध को लेकर राम पर तीसरा आक्षेप लगाया जाता है कि बिना किसी शत्रुता के राम ने पेड़ के पीछे छिप कर बालि का वध क्यों किया ? वाल्मीकि रामायण से अनेक श्लोकों के उद्धरण देकर विद्वान् लेखक ने तीसरे आरोप को इस प्रकार निरस्त किया है- 
“बालि द्वारा अनुजवधू को कामवशात् अपनी भोग्या बनाने के अपराध के आधार पर, मित्र के शत्रु को अपना शत्रु मानते हुए राजपुरुष राम द्वारा सकारण दण्ड के रूप में कारित किया गया था बालि-वध, वह भी अभिमुख (आमने-सामने के) युद्ध के उपरान्त। सत्य का ज्ञान कराए जाने पर बालि अपना अपराध स्वीकार भी कर लेता है। अतएव, इस प्रसंग में राम को दोषी ठहराना अनुचित है।”
रामाख्यान का सबसे अधिक विवादित है चैथा आक्षेप- निर्दोष सीता का निष्कासन। इस विषय में लेखक पूरे आत्मबल से कहता है- 
“अन्यान्य सत्यों के सापेक्ष सीता-निर्वासन प्रकरण को राम-सीता के पारस्परिक अपरिमित प्रेम, अटूट दाम्पत्य आदि के आधार पर निरस्त नहीं किया जा सकता। औ...र, वाल्मीकि के राम स्वयं के प्रति, स्वयं के दाम्पत्य के प्रति, सीता के प्रति जो निर्मम दिखते हैं, वह निर्ममता राम की राजधर्म के प्रति प्रतिबद्धता एवं लोकहित-साधना को सर्वोपरि मानने के फलित के रूप में ही कारित दिखती है। $ $ मुख्यतः लोकधर्म एवम् राजधर्म-निर्वाह की धर्मनिष्ठता के कारण ही कारित हुआ था प्रसंगित सीता-निर्वासन। वहीं, प्रसंगित अभिदोष में राम-पत्नी सीता लोक-धर्म एवम् राजधर्म के आधार पर जब स्वयं राम को प्रसंगित प्रकरण के पश्चात् भी ‘धर्मशील’ ही मानती हैं, त...ब उस विषय में किसी अभियोजक/लोक-अभियोजक को अपनी ओर से कोई आक्षेप/आरोप प्रस्तुत करने का नैतिक अधिकार स्वतः निःशेष हो जाता है।”
राम पर पाँचवाँ आक्षेप किया जाता है शूद्र तापस शम्बूक के वध का। इस प्रकरण की वास्तविकता के लिए विद्वान् लेखक विभिन्न स्रोतों की गहन छानबीन करता हुआ इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि “शम्बूक वध किसी कथित शूद्र-द्वेष में नहीं, अपितु शम्बूक के अनयाचार अर्थात् उसकी ‘देवलोक-जिगीषया’ वाली कदिच्छा के आधार पर लोकाराधन के निमित्त कारित किया गया था।“ इसलिए वाल्मीकीय राम इस आक्षेप से सर्वथा मुक्त हैं।
पुस्तक के सातवें बिन्दु पर ‘वाल्मीकि के राम’ पर गहन चिन्तन-मनन करते हुए लेखक वाल्मीकि रामायण की सार्थकता, आवश्यकता और सन्दर्भगर्भिता को विशेष रूप से रेखांकित करता है। रामकथा के प्राचीनतम, प्रमाणपुष्ट स्रोत महाकाव्य रामायण को ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दस्तावेज का महत्त्व प्रदान करते हुए परिपक्व लेखक द्वारा भारतीय वाङ्मय का आलोक स्तम्भ निरूपित किया गया है। 
भारतीय संस्कृति के शिखर प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र पर लगने वाले अब तक के प्रमुख आक्षेपों की सच्चाई जानने के लिए विजय रंजन ने अनेक ग्रन्थों का गहन अनुशीलन किया है और उपलब्ध सामग्री के आधार पर आलोड़न-विलोड़न करते हुए जिन आधारभूत तथ्यों, तर्कों तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से विश्वसनीय निष्कर्षों को स्थापित किया है, वे उपर्युक्त पाँचों आक्षेपों के निवारण में समर्थ सिद्ध होते हैं। ऐसी गवेषणात्मक कृति के लिए प्रज्ञा-पुरुष विजय रंजन बधाई के पात्र हैं। राम-साहित्य के अनुशीलन में पाठकों को यह पुस्तक अनाविल दृष्टि प्रदान करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। लेखक को हार्दिक शुभकामनाएँ।

                           - डाॅ॰ ओंकारनाथ द्विवेदी

पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सन्त तुलसीदास पी॰ जी॰ कालेज सुल्तानपुर                   
             - सम्पा॰ ‘अभिदेशक’, सुल्तानपुर। दूरभाष: 9848113111
            

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भारत और भारतीयता के सन्दर्भ में रचित कृति क्या है भारत क्या है भारतीयताभारत के सन्दर्भ में उसकी व्युत्पत्ति, क्षेत्र की विशालता आदि विविध आयामों को समेटे हुए एक सम्पूर्ण चित्रण प्रस्तुत करता है।

 भारत के नामकरण के मूल की जानकारी प्राप्त करने हेतु न केवल प्राचीनतम हिन्दू-संस्कृति के ग्रंथों बल्कि मेरे विचार से विश्व के प्रायः लगभग सभी ग्रंथों का अवलोकन, मनन एवं चिन्तन किया गया है। जिन स्रोतों, सन्दर्भों का जिक्र इसमें किया गया है, उसमें लगभग सभी धर्म-ग्रंथों की चर्चा संक्षिप्त रूप से की गई है और उनके विस्तृत विवरण की ओर संकेत भी है।

भारतशब्द कहाँ-कहाँ, कब-कब, किन-किन स्थानों पर उल्लिखित है और उसके आधार कहाँ-कहाँ हैं ? इसका सम्यक् विवेचन करने के पश्चात् ही लेखक ने अपने विचारों को प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। इस सन्दर्भ में भारतीय प्राचीन ग्रंथों जैसे पुराणों, महाभारत, रामायणम्, उपनिषदों, संहिताओं और स्मृतियों का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है। वैदिक वाङ्मय से लेकर आधुनिक संस्कृत के विद्वानों, हिन्दी साहित्य के विद्वानों की कृतियों का भी सहारा लिया गया है। रामधारी सिंह दिनकर’, वासुदेवशरण अग्रवाल, पी॰वी॰काणे, कालिदास, जैन-साहित्य, बौद्ध-साहित्य और अन्यान्य विद्वानों की कृतियों का अवलोकन करके ही भारतनामकरण की बात स्थापित की गई है।

भारतवर्ष को अन्य नामों से विहित करने के सन्दर्भों का उल्लेख करने के क्रम में लेखक ने पुनः यह बताने का सफल प्रयास किया है कि इसकी प्रामाणिकता विदेशी विद्वानों ने भी प्रस्तुत की है जबकि भारतीय संस्कृति तथा भारतीय प्राचीन ग्रंथों में तो इसका उल्लेख है ही। हाँ, इतना अवश्य है कि भारतनाम को इसके पर्याय के रूप में अभिहित किया गया है।

भारतको आर्यभूमिकी भी संज्ञा दी गई है। आर्यशब्द का अर्थ ही श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव वालाबताया जाता है। इसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों और डाॅ॰ भीमराव अम्बेडकर, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि विचारकों ने किया है। विदेशी विद्वानों ने भी इसका उल्लेख किया है।

भारतवर्ष प्राचीनतम राष्ट्र है और विविध प्राचीन साहित्य के अनुसार इसकी विशालता भी प्रमाणित है। वेदों, महाभारत, रामायणम्, रघुवंशम् के साथ-साथ आधुनिक लेखकों के ग्रंथों में भी इसकी विशालता की चर्चा की गई है। भारतको राष्ट्रके रूप में स्वीकृति उसके राष्ट्र बनने की सम्पूर्ण प्रक्रिया एवं आवश्यक तत्त्वों की उपस्थिति के आधार पर मिली है। अर्थशास्त्र से लेकर प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रंथों में राष्ट्र के लिए जिन-जिन आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख किया गया है, वे सारे तत्त्व भारत राष्ट्र में विद्यमान हैं। प्राचीन यूनान, चीन, रोम से लेकर विश्व के अन्य देशों में भी राष्ट्रके लिए जो-जो आवश्यक स्वीकृत/स्थापित मान्यताएँ हैं, वे सब भी भारत राष्ट्र में अस्तित्वमान् हैं।

किसी भी देश के राष्ट्रीय चरित्र में राष्ट्र के प्रति संचेतना, संवेदना, वैचारिकी, संस्कार, आचार आदि समाहित होने चाहिए, जो भारत के राष्ट्रीय चरित्र में विद्यमान हैं। राष्ट्रीय आत्मा, राष्ट्रीय अध्यात्म की चर्चा न केवल भारतीय विचारक करते हैं वरन् विदेशी विचारकों द्वारा भी इसप्रकार का मत व्यक्त किया गया है।

इस कृति में भारत को देवी भारती की संतति के रूप में प्रस्तुत करते हुए उसके दैवीय स्वरूप को चित्रित किया गया है। सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , न कश्चिद् दुःखभाग भवेत्अर्थात् विश्वकल्याण की भावना भारत का राष्ट्रीय चरित्र है। सतयुग से लेकर कलियुग तक ईश्वरके अनेक अवतारों की अवतार-स्थली भारत-भूमि ही रही है, जहाँ अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की बात चरितार्थ होती है।

अनेक मत-मतान्तरों के बावजूद भी भारत में एकरूपता की स्थापना हुई है। सभी धर्मों (पंथ/मजहब नहीं) के मूल में सर्वजनहितायकी भावना का समावेश है। धर्म-ग्रंथों में आदि से लेकर अंत तक कहीं भी विषमता के बीज का उल्लेख नहीं है। सभी का उद्देश्य जन-कल्याण है और सभी एक स्थान पर जहाँ-जहाँ मिलते हैं, उन अनेकानेक क्षितिजों पर एक ही बात है-- विषमता का अन्त और सभी का मंगल। सहनशीलता, नैतिकता, सात्त्विकता, समन्वयवाद, समग्रता, मर्यादा, सर्जनात्मकता आदि सभी भारत के मूल में समाविष्ट हैं। इस प्रकार भारत भारतत्व और भारतीत्व से सम्पुष्ट है। 

भारत का वास्तविक स्वरूप उसकी भौगोलिक सीमा से आबद्ध है। भारत का दर्शन, अध्यात्म ही उसका विज्ञानमय कोश है। पुराणों में इस प्रकार का उल्लेख मिलता है कि देवतागण भी भारत में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं और भारत में जन्म लेने वालों मनुष्यों से स्पृहा करते हैं। आधुनिक लेखकों, कवियों और लगभग सभी भाषाओं के रचनाकार एक स्वर से इस बात को स्वीकारते हैं एवं प्रमाणित करते हैं।

प्रत्येक विदेशी शासनकाल में भारत की समृद्धि की विशालता और वृहत्तर सांस्कृतिक-आर्थिक वैभव को नष्ट करने के अनगिनत दुष्प्रयास हुए हैं किन्तु भारत ने ऐसे सारे दुष्प्रयासों को विफल किया है। भारत की समरसता को हानि पहुँचाने वाले सारे कारण भी स्वयं ही पराभूत हुए हैं। लेखक ने भारत की प्राचीनता से लेकर अद्यतन इसके गुणों को आलोकित करने का सराहनीय प्रयास किया है।

मैं निःसन्देह कह सकता हूँ कि लेखक ने अपने विस्तृत अध्ययन के आधार पर गहन विश्लेषण करके इस विषय को अपने ढंग से प्रस्तुत करने का जो प्रयास किया है, वह आधुनिक काल के पाठकों, चिन्तकों, लेखकों और विद्वानों के लिए प्रकाशस्तम्भ है। भारतको विषय मान कर उस पर इतनी गवेषणा करना, चिन्तन और मनन करना, विश्व के अनेक देशों के साहित्य का अध्ययन एवं विश्लेषण कर तथा प्राचीन भारतीय साहित्य से लेकर आधुनिक भारतीय साहित्य के साथ उसका सामंजस्य स्थापित करके अपने ढंग से प्रस्तुत करना सचमुच एक ऐसा कार्य है जिसे सामान्य लेखक नहीं कर सकता। यह तो एक असाधारण लेखक और मनीषी व्यक्ति ही कर सकता है।

विषय को सरल बनाने का प्रयास करते हुए भी विद्वान् लेखक ने अपनी सहज प्रवृत्ति के अनुसार शब्दों एवं वाक्यों की क्लिष्टता पर यदा-कदा ध्यान नहीं दिया है, फिर भी कृति को समझने में अधिक प्रयास करना नहीं पड़ता। शब्दों एवं वाक्यों को क्वायन (Coin)करने वाले बहुत ही कम लोग हिन्दी एवं अंग्रेजी साहित्य में हैं, मुझे कृति-लेखक इसी श्रेणी के विद्वान् लगे। मुझे आशा ही नहीं, विश्वास भी है कि प्रस्तुत कृति अपने क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगी और पाठक इसका उपयोग मात्र स्वान्तः सुखाय ही न करके, शोध के क्षेत्र में भी भरपूर करेंगे।Û

                         - प्रो॰ (डाॅ॰) रामकृष्ण जायसवाल    

 सेवानि॰विभागाध्यक्ष राजनीति विभाग, का॰सु॰साकेत कालेज, अयोध्या

-निकट जैन मन्दिर, रायगंज अयोध्या, दूरभाष: 9415722239     

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 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ का आद्योपान्त अवलोकन कर मैं लेखक के वैपश्चित्य, उसके साहित्याराधन एवं वैदुष्य से प्रभूत प्रभावित तो हुआ ही, साथ ही आह्लाद-विकल और विस्मय-विजडि़त भी। प्रस्तुत समीक्षा-कृति का अनुशीलन करने पर यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि लेखक संस्कृत-वाङ्मय का अधीत विद्वान् है या हिन्दी साहित्य का धुरीण विपश्चित्, पाश्चात्य अंग्रेजी साहित्य का विद्या-वारिधि है अथवा उर्दू अदब का अजीम दानिशवर फनकार। ऋग्वैदिक एवं उपनिषद् काल से लेकर प्राचीन आर्ष मनीषियों, महाभारत, भगवद्गीता एवं संस्कृत कविर्मनीषियों तथा भाष्यकारों के काव्य-निकषों का तलस्पर्शी अध्ययन गहन-गवेषण कर लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि महर्षि आदि-कवि द्वारा विरचित वाल्मीकि-रामायण निर्भ्रान्त रूप से ऋतत्व, नयत्व, नानृषित्व तथा सत्यं, शिवं, सुन्दरम् लोकमंगल की कसौटी पर कसने पर समस्त पौर्वात्य एवं पाश्चात्य महाकाव्यों में सर्वोत्कृष्ट है। ऋक्, यजुः और साम वेद के अनुसार महाकाव्य के नायक तथा महाकाव्य के प्रणेता के आचरण भी नयशीलत्व से ऐश्वर्यान्वित होना वांछनीय है। इस परिप्रेक्ष्य में भी लेखक ने वाल्मीकि-रामायण में महानायक के समस्त कार्यकलाप महाकाव्योचित प्रमाणित किए हैं। यही नहीं, आचार्य मम्मट द्वारा उद्घाटित ---‘काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतर क्षतये। सद्यः परिनिर्वृत्तये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे--- के काव्योद्देश्य की कसौटी पर भी जाँच-परख कर तथा महाकवि व्यास केसत्यं, प्रियम् हितम्की प्रतिष्ठा की अभिवांछा को आधारित कर, उपनिषदों, ब्राह्मण-ग्रन्थों स्मृति-ग्रंथों के मानकों एवं आचार्य क्षेमेन्द्र के औचित्य-अवधारण पर कस करवाल्मीकि-रामायणको लेखक ने सर्वतोभावेन श्रेष्ठ उद्घोषित किया है। साथ-ही साथ भवभूति, कालिदास प्रभृति स्वयंभू कविर्मनीषियों द्वारा आदि-महाकवि को प्रणम्य दर्शाया है लेखक ने।
आगे चल कर हिन्दी काव्येतिहास के भक्ति-कालीन किरीटी कवियों में अग्रपांक्तेय तुलसी, कबीर रहीम जैसे सर्वभूत के आत्यन्तिक कल्याण के हिमायती कवियों पर आदि-कवि की महत्ता प्रतिष्ठापित करते हुएवाल्मीकि-रामायणको सर्वथा वांछनीय एवं अनुकरणीय प्रस्थापित किया गया है।रामायणमें वर्णित महानायक के औदात्य-सूचक तमाम श्लोकों की सीधी छाप तुलसी केमानसपर इठलाती दृष्टिगोचर होती है। इसी क्रम में लेखक द्वारा रहीम के राम को भी वाल्मीकीय राम के निकट दर्शा कर रहीम की दृष्टि में भी आदि-कवि को प्रशंसनीय प्रमाणित कर दिया गया है। यह कहना किंचदपि अत्युक्तिपूर्ण होगा कि विजय रंजन एक घोर अध्ययनशील पाठक होने के साथ-साथ एक मौलिक चिन्तक भी हैं। वह लेखकों, कवियों, आलोचकों चिन्तकों के भावोद्गारों में गहराई से डूब कर मोती खोजते हैं और फिर उन्हें अपने मन-मानस के मौक्तिकों की तर्क-तुला पर तौलते हैं। बहुत बार उनके चिन्तन की तराजू पर नामचीन धुरन्धरों के विचारोद्गार बिल्कुल हल्के, फीके और अग्राह्य सिद्ध होते हैं। फलतः लेखक उन्हें निर्भय होकर नकार देता है। उदाहरणार्थ, प्रस्तुत कृति में कबीर और वाल्मीकि के सम्बन्ध में प्रख्यात अत्याधुनिकतावादी प्रगतिशील समालोचक नामवर सिंह की--- कबीर से वाल्मीकि के न्यून होने की--- मान्यता की ऐसी-तैसी कर डाली है कृति-लेखक ने। 
आलोचक-प्रवर आचार्य पं0 रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ0 नगेन्द्र, कवि-प्रवर रामधारी सिंहदिनकर, डॉ0 रामकुमार वर्मा, उपन्यासकार-सम्राट प्रेमचन्द, ‘लघुमानव-वादके संप्रतिष्ठापक विजय देवनारायण साही, लक्ष्मीकान्त वर्मा, डॉ0 जगदीश गुप्त, डॉ0 रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ0 सूर्यप्रसाद दीक्षित, डॉ0 भगीरथ मिश्र, पं0 विद्यानिवास मिश्र, डॉ0 विश्वनाथप्रसाद तिवारी, डॉ0 प्रभाकर श्रोत्रिय, डॉ0 रामविलास शर्मा, डॉ0 रांगेय राघव, डॉ0 परमानन्द श्रीवास्तव, डॉ0 अशोक वाजपेयी, डॉ0 रमेशचन्द्रशाह, नन्दकिशोर आचार्य, डॉ0 शिवकुमार मिश्र, डॉ0 रमेशकुन्तल मेघ, विजयबहादुर सिंह, डॉ0 मैनेजर पाण्डेय, डॉ0 राजेन्द्र मिश्र, डॉ0 वागीश शुक्ल, नन्द भारद्वाज, नरेश मेहता, नरेन्द्र कोहली, डॉ0 भगवान सिंह, लल्लन प्रसाद व्यास, डॉ0 राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन् प्रभृति लोकवादी, समाजवादी, मानवतावादी, नयवादी, ऋतवादी धुरन्धर ही नहीं, मार्क्सवादी द्युतिन्धर पुरोधाओं की भी कृतियों का सम्यक् अनुशीलन करने के पश्चात् इन सभी के वैचारिक निकष पर आदि-महाकाव्य वाल्मीकि-रामायण को कस कर उसे परिणामतः सर्वश्लाघ्य, वन्दनीय एवं अनुकरणीय घोषित किया है लेखक ने।
बात महाकाव्य की चले और दस्तावेज पर महाकाव्यात्मक औदात्य (Epic Sublimity) तथा धीरोदात्त नायकत्व अथवा heroic  grandeur या Miltonic  grandeur  और उससे भी पहले Homeric  grandeur की मोहरंे तस्दीक़ सब्त हो, भला यह कहाँ मुमकिन है ? तो फिर वाल्मीकि के राम जोविष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत् प्रियदर्शनःतथाकालाग्नि सदृशः क्रोधे, क्षमया पृथ्वीसमःहैं--- से महत्तर औदात्यगर्भित कोई दूसरा नायक कहाँ ढूँढे मिलेगा ? ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, लैटिन तथा इंग्लिश-पाश्चात्य काव्य-शास्त्रियों मनीषी समीक्षाकारों के सर्वांगतः अनुरूप और अनुकूल आदि-कवि की रामायण को सिद्ध कर दिया है लेखक ने, वह भी मात्र नामों की गणना करके नहीं, वरन् सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, लांजाइनस, होमर, वर्जिल, होरेस, ब्वाइलो, दान्ते, पेट्रार्क, काण्ट, बर्गसां, बेन्जामिन, शापेनहावर, बेन जानसन, सिडनी, ड्राइडेन, पोप, डॉ0 जानसन से लेकर मैथ्यू अर्नोल्ड, टी0 एस0 इलियट, एजरापाउन्ड, आई0 0 रिचर्डस सरीखे काव्यमर्मी साहित्यशास्त्रियों की उनके सूत्रों सूक्तियों का सांगोपांग अवगाहन करने के उपरान्त। आज के घोर भौतिकतावादी दौर में इतना अधिक बहुमूल्य समय साहित्यालोचन हेतु अवदानित करना कोई मामूली बात नहीं। होमर और वाल्मीकि जैसे कविर्मनीषियों का तुलनात्मक व्यतिरेकी आलोचन-विलोचन सतही अध्ययन के आधार पर कथमपि सम्भव नहीं। उसके लिए तो अहर्निश साधना-वांछित है साहित्याराधक के लिए। जहाँ तक मेरी जानकारी है, फ्लोरेंस विष्वविद्यालय में 1911 में प्रो0 पी0 0 पैवोलिनी के निदेशन में प्रख्यात इटैलियन साहित्यकार मनीषी डॉ0 एल0 पी0 टेसीटरी के डॉक्ट्रेट के शोध-प्रबन्धरामचरितमानस और रामायणसे लेकर अब तक, वाल्मीकि-रामायण से सम्बन्धित जो शोध-प्रबन्ध भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रस्तुत किए गए, उनमें से कोई इतने विस्तृत कलेवर का शोध-प्रबन्ध नहीं रहा है जिसमें एक साथ संस्कृत, हिन्दी आदि प्रमुख भारतीय भाषाओं समेत पाश्चात्य साहित्यशास्त्रियों के सापेक्ष महाकवि वाल्मीकि का विस्तृत साहित्यालोचन प्रस्तुत किया गया हो जितना इस एक कृति में है। 
निर्भ्रान्त रूप से कहना होगा कि श्री विजय रंजन श्रुतेन, शीलेन, मनसा-वाचा-कर्मणा लक्ष्यैक चक्षुष्क होकर इस महायज्ञ में समग्रतः समर्पित हैं। यदि ऐसा होता तो उर्दू अदब की फसाहतो बलागत को समेटे हिन्दी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला, मराठी, उडि़या, डोगरी, पंजाबी, असमिया आदि विविध भारतीय भाषाओं के साथ पाश्चात्य साहित्य एवं संस्कृत वाङ्मय के महार्घ काव्य-ग्रंथों के सापेक्षआदि-महाकाव्यका आकलन भला सम्भाव्य हो पाता क्या ?
मैं हृदय के अन्तरीण गह्वर से साधुवाद देता हूँ अधीत विद्य लेखक को और अंतर्मनः प्रान्त से कामना करता हूँ कि ----   अल्लाह करे ज़ोरे क़लम और जियादह ! इसी शुभाशंसा के साथ,    
                                              - डॉ0 जगन्नाथ त्रिपाठीजलज,                 पूर्व विभागाध्यक्ष, अंग्रेजी-विभाग, 0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फैजाबाद (0प्र0)                                        
                                                           *
सारे व्यसन कुत्स्य हैं, सिर्फ एक विद्या-व्यसन प्रशंस्य है। विद्या के आसंग से ‘व्यसन’ शब्द का अथोत्कर्ष हो जाता है--- ‘पारस परस कुधातु सुहाई !’ विजय रंजन जी बड़े विद्या-व्यसनी हैं। यों नियमतः कक्षागत अध्ययन उन्होंने ‘आटर््स’ के बजाय ‘साइंस’ के विषयों में किया है, यद्यपि उधर अकादमिक बढ़ाव अधिक नहीं हो पाया। बी0एससी0 करने के बाद उधर ही आगे बढ़ने के बजाय वे एल-एल0बी0 हो गए--- हो सकता है अभिभावकों की यही राय रही हो। बहरहाल, विधि-स्नातक होकर वे अधिवक्ता बन गए। अच्छा अधिवक्ता सतत सजग रहता है--- हरदम पढ़ता-लिखता रहता है, परिसीमित होकर भी सीमा का अतिक्रमण करता हुआ (अधिवक्ता रहते हुए ही वृन्दावन लाल वर्मा उतने बड़े कथाकार हुए, केदारनाथ अग्रवाल उतने बड़े कवि बने)। विजय रंजन जी अधिमान्य अधिवक्ता हैं किन्तु वकालत वे ‘वृत्ति’ के लिए करते हैं (जैसा कि केदार जी करते थे) --- प्रवृत्तितः नहीं। प्रवृत्ति-प्रकृति से तो वे साहित्य-स्नेही, संस्कृति-सचेत और मूल्यजीवी हैं। वे सतत स्वाध्यायशील और प्रतत लेखनरत रहते हैं। ‘अवध-अर्चना’ संज्ञक त्रैमासिकी उनकी साहित्यार्चा का प्रतीक-प्रभास है। प्रायः दो दशक हो गए हैं उन्हें उसका संपादन-प्रकाशन करते हुए। उसकी निरन्तरता कभी भंग नहीं हुई। वे कविता भी लिखते हैं, निबन्ध भी; मीमांसा भी करते हैं, विमर्श भी। जो कुछ भी वे लिखते हैं, मन लगा कर लिखते हैं, अपनी समस्त अधिचेतना उससे जोड़ कर। उनका लेखन जीवन-जगत्, साहित्य-संस्कृति, मूल्य-मान से संसक्त है।
विजय रंजन जी कविता/साहित्य के स्वरूप, तत्त्व, प्रयोजन आदि का गम्भीर विमर्श करते हैं। छायावाद-काल से ही, चालीसोत्तर काल से तो एकदम ही, पारम्परिक शास्त्रीय साहित्य-प्रतिमानों की बात बन्द कर दी गई; कविता के, आलोचना के नए प्रतिमान, नए प्रतिदर्श प्रस्थापित हो गए किन्तु विजय रंजन जी भरत, भामह, वामन, कुन्तक, आनन्दवर्द्धन, राजशेखर, मम्मट, विश्वनाथ आदि संस्कृत साहित्याचार्यों और पाश्चात्य साहित्याचार्यों के मतों-अभिमतों के आलोक में साहित्य-मीमांसा तदुन्मुख-भाव से करते रहते हैं।
विजय रंजन जी प्राच्य एवं प्रतीच्य महत् काव्य-ग्रंथों का भी अनुशीलन बड़े मनोयोग से करते हैं। यों अंग्रेजी, हिन्दी भाषा-साहित्य का उनका अध्ययन अकादमिक तौर पर कक्षागत रूप में नहीं हुआ है--- संस्कृत भाषा-साहित्य का तो एकदम नहीं किन्तु हिन्दी अनुवाद के सहारे संस्कृत के प्रथित ग्रन्थों का उनका अभिनिवेशी अनुशीलन सराहनीय है। होमर ने मूलतः ग्रीक में काव्यायन किया था, वाल्मीकि ने संस्कृत में। होमर-काव्य का अंग्रेजी में गम्भीर प्रकृष्ट अनुवाद हुआ है। उसी आधार पर विजय रंजन जी ने वाल्मीकि और होमर का तुलनात्मक अध्ययन, साथ ही अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत व विविध भारतीय भाषाओं के प्रख्यात मनीषियों के साहित्यिक विचारों के सापेक्ष वाल्मीकीय रामायण का अनुशीलन विदग्ध मर्म-प्रवेश के साथ किया है जो इस कृति में सम्प्रस्तुत है।
अपने इस गम्भीर अनुशीलन-ग्रन्थ की पाण्डुलिपि विजय रंजन जी मुझे डेढ़ेक महीने पहले ही दे गए थे। तमाम तरह की व्यस्तताओं के बावजूद मैंने यहाँ से वहाँ तक पाण्डुलिपि पर एक विहंगम दृष्टिपात तत्काल कर लिया। तभी दुर्योगतः मेरे दाहिने हाथ की कलाई के जोड़ पर ठीक बीचोंबीच एक बड़ी सी गाँठ उभर आई। दुष्परिणामतः मेरा लिखना बन्द ही हो गया। बहुत चाह कर भी मैं विजय रंजन जी के इस महार्घ ग्रन्थ पर ठीक से ‘दो शब्द’ नहीं लिख पाया। किसी-किसी तरह से ये कुछ पंक्तियाँ लिख ले गया। इति शम् !
                                                                            - डॉ0 रामशंकर त्रिपाठी

           पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, का0 सु0 साकेत महाविद्यालय, अयोध्या-फैजाबाद                                                                             *




मुझे यह देख कर परम परितोष हुआ कि श्री विजय रंजन ने रस-सिद्धान्त का नया निवर्चन किया है।  रसचिन्तन को बल्कि समूचे काव्यशास्त्रीय विमर्श को इधर अनुपयोगी, अस्तु उपेक्षणीय विषय मान लिया गया है। पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त यह प्रयोजनीय नहीं प्रतीत होता। इसका प्रमुख कारण यह है कि काव्यशास्त्र विशेषतः रस-सिद्धान्त का नवीकरण नहीं किया गया है। कभी भावोच्छ्वासवश यह कह दिया गया कि रस ब्रह्म है (रसो वै सः) और यहाँ तक मान लिया गया कि रस के अभाव में कोई रचना संभव ही नहीं है- ” नहि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते। “ इन अतियों से बचते हुए एक काव्यांग के रूप में रस-निष्पत्ति की युगसापेक्ष समीक्षा अपेक्षित थी, जो डॉ0 नगेन्द्र और डॉ0 कथूरिया के ग्रन्थों के बाद इस कृति में परिलक्षित होती है।
विद्वान् लेखक ने इसमें एक नए रस ‘नय’ रस की स्थापना की है। प्रथमद्रष्टया परम्परावादी आचार्य इस पहल से असहमत हो सकते हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि भरत के रस-सूत्र द्वारा प्रवर्तित 8 रसों से बढ़ते-बढ़ते हम 11 रसों तक मध्यकाल में (16वीं शती तक) पहुँच गए थे। इस बीच जीवन-जगत् में जो परिवर्तन आया है, उससे कई रस-परिकर उपस्थित हो गए हैं। उन्हें भी व्याख्यायित करने की आवश्यकता है। विजय रंजन ने वही कार्य सत्साहसपूर्वक किया है। लेखक ने ‘नय’ रस की निष्पत्ति, उसके उपादान और पक्ष-प्रतिपक्ष पर सप्रमाण चिन्तन किया है, जो हमें पुनश्चिन्तन के लिए आमन्त्रित करता है। मेरा आग्रह है कि रस की उपादेयता और प्रासंगिकता की रक्षा करने हेतु इन स्थापनाओं पर विचार-विमर्श करना समकालीन साहित्य-सर्जना एवं शोध-समीक्षा के वृहत्तर हित में होगा। इसी मंगलाशा के साथ मैं विजय रंजन को बधाई देता हूँ।                                                                                                       डॉ0 (प्रो0) सूर्यप्रसाद दीक्षित
सेवानिवृत्त आचार्य एवं अध्यक्ष हिन्दी तथा आधुनिक भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ0प्र0)

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फैजाबाद के साहित्यिक परिदृश्य में साहित्यकार विजय रंजन एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी पहचान कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, निबन्धकार, आलोचक, सम्पादक, शोधकर्त्ता आदि अनेक रूपों में होती है। अपनी प्रखर आलोचना तथा गहन शोध-दृष्टि के कारण वे साहित्य-जगत् को सदैव नए-नए तथ्यों तथा मौलिक स्थापनाओं से समष्द्ध करते रहे हैं।
‘रसवाद औ..र नय रस’ विजय रंजन की रसशास्त्र सम्बन्धी मौलिक कृति है, जिसे ‘पूर्वार्चिक’ और ‘उत्तरार्चिक’ नामक दो भागों में तथा छः अध्यायों में विभक्त किया गया है। इसमें क्रमशः रसवाद को स्पष्ट करते हुए रसशास्त्र के आदिआचार्य भरत मुनि से लेकर अभिनव गुप्त, भट्टनायक, भट्टलोल्लट, शंकुक, धनंजय, राजशेखर, भोज, रुद्रभट्ट, रुद्रट, महिम भट्ट, क्षेमेन्द्र, विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ आदि संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों के साथ-साथ भिखारीदास, चिन्तामणि, महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ0 नगेन्द्र, बाबू गुलाबराय, डॉ0 भगीरथ मिश्र आदि संस्कृत-हिन्दी के आचार्यों, कवियों एवं पाश्चात्य विद्वानों के अभिमत को गहराई के साथ रेखांकित करते हुए रसवाद की परिभाषा, उसके औचित्य, भरत मुनि के रस-निष्पत्ति सम्बन्धी सूत्र की व्याख्या, ‘रसवाद औ..र आनन्दवाद’, ‘नय रस: क्या, क्यों, कैसे’, ‘रसभेद’ तथा ‘रसदोष’ पर प्रकाश डाला गया है।
इस कृति का चतुर्थ अध्याय सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय है- ‘नय रस: क्या, क्यों, कैसे’। यहाँ भरत मुनि द्वारा आठ स्थायीभावों के आधार पर प्रतिपादित आठ रसों (शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत्) के साथ अभिनव गुप्त प्रणीत ‘शान्त रस’, आचार्य विश्वनाथ प्रतिपादित ‘वात्सल्य रस (वत्सल रति)’ तथा रूपगोस्वामी एवं मधुसूदन सरस्वती द्वारा प्रतिपादित ‘भक्ति रस (भगवत् रति)’ नामक उपर्युक्त ग्यारह रसों के साथ कृतिकार ने बारहवें रस के रूप में ‘नय’ रस को स्थापित किया है, जो उसकी मौलिक उद्भावना है। यहाँ कृतिकार विजय रंजन रसशास्त्र के महान् आचार्यों की परम्परा में खड़े दिखाई पड़ते हैं।
‘नय’ रस विजय रंजन की मौलिक खोज है, जो वस्तुतः न्याय का रस है, जिसका सूत्र इन्हें वाल्मीकीय रामायण से प्राप्त हुआ है। आचार्य भरत तथा आचार्य धनिक-धनंजय भी ‘नय’ का उल्लेख करते हैं। उन्होंने ‘नय’ को मात्र क्रमशः विभाव तथा संचारीभाव मान कर छोड़ दिया था। कृतिकार ने ‘नय’ को स्थायीभाव तथा बारहवें रस के रूप में प्रतिष्ठित किया है। वे ‘वाल्मीकीय रामायण’ के क्रौंच-वध प्रसंग में आदिश्लोक ‘मा निषाद प्रतिष्ठां ..... काममोहितम्’ को ‘नय’ रस का आदि-उदाहरण बताते हैं।
‘नय’ को वे नवप्रस्थापित रस बताते हुए कहते हैं कि   “ जहाँ विभाव आदि से अनय के विरुद्ध अन्याय-तिरोहण या अन्याय-निरोध हो, अन्याय-निषेध के संकल्प या/और तद्गत प्रक्रिया मूर्तमान हो, जहाँ अन्याय का प्रतिकार दृष्यमान हो, जहाँ नयशील सत्त्व का प्रस्तार वाचाल हो, जहाँ अन्यायी को दण्ड देने का कर्म हो या/और जहाँ नयशील सत्त्व का तद्गत प्रयास मुखर हो, वहाँ ‘नय’रस व्यंजित होता है। ”
खीरा सिर तें काटिए मलिए लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को चहिए यहै सजाय।।
                                                    - रहीम
स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखि बिहंग बिचारि।
बाज पराए पानि पर तु न विहंगनु मार।।
                                                       - बिहारी
बकरी पाति खात है, काढि़ जात है खाल।
जे नर बकरी खात हैं ताको कौन हवाल।।
                                                       - कबीरदास
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु।।
                                                                                                      - तुलसीदास
उपर्युक्त दोहों में कृतिकार ‘नय’ रस का दर्शन करता है। उसके अनुसार--   “ अपने समग्र ज्ञान और उपलब्ध रस-सिद्धान्त की अनेक पुस्तकों को खँगालने के बावजूद इन दोहों का रस ज्ञात न होने पर मुझे काव्यरस की परिधि को विशालतर करते हुए उसमें ‘नय’रस समेकित किया जाना वांछनीय प्रतीत हुआ।
कृतिकार ने ‘नय’ रस का स्थायीभाव नयत्व या न्यायशीलता बताया है। आलम्बन विभाव ‘नय’ का प्रस्तोता या कर्त्ता है। अन्याय इसका विषयगत आलम्बन विभाव है। अन्याय, अनृत का परिवेश इस रस का परिवेशगत बाह्य उद्दीपन है। रोमांच इसका अनुभाव है। न्याय-भावना, उचित-अनुचित का न्यायगत विवेक, तद्गत स्थापना, अन्याय का विरोध-निरोध-निषेध-तिरोहण करने की सदिच्छा एवं संकल्प, अन्यायी, दुर्गुणी, दुष्ट व्यक्ति को दण्ड देने का संकल्प और तद्गत अभिकर्म इसके संचारीभाव हें। ‘नय’रस का गुण ‘माधुर्य’ एवं ‘प्रसाद’, इसकी रीति ‘वैदर्भी’ और वृत्ति ‘सात्त्वती’ है। कृतिकार द्वारा इस रस की अधिष्ठात्री दैवीय सत्ता के रूप में ऋत के अधिष्ठाता एवं दोष-प्रक्षालक देवता वरुण को प्रतिष्ठित किया गया है। कृति में रस की वर्ण परम्परा में इसका वर्ण ‘धवल श्वेत’ बताया गया है।
अस्तु, ‘नय’ रस कृतिकार की अभिनव स्थापना है, जहाँ पूर्ववर्ती रसशास्त्र के किसी आचार्य की दृष्टि नहीं पहुँची थी। कृतिकार अपनी मान्यताओं को मनोवैज्ञानिक एवं तार्किक रूप से न केवल पुष्ट करता है, बल्कि उसका सारगर्भित ठोस आधार देते हुए उसके औचित्य को भी प्रमाणित करता है।
कृतिकार ने कृति में ‘नय’ रस की प्रस्थापना के साथ-साथ रसवाद के विभिन्न पक्षों का विशद निरुपण और पूर्व-स्थापित रसों की विस्तृत विवेचना भी प्रस्तुत की है। उन्होंने बारहवें रस के रूप में ‘नय’ रस की स्थापना कर रसशास्त्र में एक नया अध्याय जोड़ा है। उनकी मौलिक दृष्टि से निःसन्देह रसशास्त्र को एक नई दिशा मिलेगी। मेरा विश्वास है ‘रसवाद औ..र नय रस’ नामक इस कृति का हिन्दी जगत् स्वागत करेगा। 
- डॉ0 सत्यप्रकाश त्रिपाठी 
- अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बी0 एन0 के0 बी0 स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अकबरपुर-अम्बेडकरनगर (उ0प्र0)

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भाई विजय रंजन न्याय-नय-नीति के माध्यम से जीविकोपार्जन करते हैं। वे फैजाबाद के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। वे विद्या-व्यसनी हैं। उन्होंने काव्य में ‘नय’ रस एवं ‘नयवाद’ की स्थापना के लिए साहित्य-सागर का मन्थन किया है। उनकी कठोर अनथक सुविस्तृत सारस्वत साधना देखकर गालिब याद आ जाते हैं-

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है ?
विजय रंजन की पुस्तक का नाम है- ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’। कृति के शीर्षक में ही कई शब्द ‘तकनीकी’ और अति सारगर्भित हैं- ‘कविता’, ‘पश्यन्ती’, ‘निकष’, ‘नयत्व’। इन शब्दों का विवेचन आवश्यक है। 
‘कविता’ कवि की वह लय-प्रधान साहित्यिक कृति या रचना है जो छन्दों में होती है। कवि त्रिकालद्रष्टा होता है। रचना की विलक्षण क्षमता होती है उसमें। ‘अग्निपुराण’ के मत में अपार काव्य-संसार में कवि ही ब्रह्मा है। उसको जैसा रुचिकर लगता है, उसी प्रकार इस विश्व को वह परिवर्तित कर देता है।
‘पश्यन्ती’ एक प्रकार की वाणी है। ‘वाणी’ मुख से निकलने वाले सार्थक वचन को कहते हैं जिसका आशय सरस्वती से भी होता है। वाणी चार प्रकार की होती है- 1. परा , 2. पश्यन्ती , 3. मध्यमा, 4. वैखरी।
1. परा--- चार प्रकार की वाणियों में पहली जो नादस्वरूपा और मूलाधार से निकली हुई मानी गई है। ब्रह्मविद्या को परा (विद्या) कहते हैं जो ऐसी वस्तु का ज्ञान कराती है जो सब गोचर पदार्थों से परे हो। परा अवस्था में द्वैत बुद्धि का सर्वथा अभाव हो जाता है और परातत्त्व के साक्षात्कार के कारण अधिकार की निवृत्ति हो जाती है। शोडष कलापूर्ण पुरुष में उसे अमृत अर्थात् अक्षय कला कहा जाता है।
2. पश्यन्ती--- दृश् (देखना) धातु से शतृ + ङीप् प्रत्यय करने पर निष्पन्न इस शब्द का आशय है हठयोग में वह सूक्ष्म ध्वनियाँ (नाद) जो वाक् को उत्पन्न करने वाली वायु के मूलाधार से हट कर नाभि में पहुँचने पर उत्पन्न होती है। पश्यन्ती में न भेद है न क्रम है। वह स्वप्रकाष रूप और लोक-व्यवहारातीत है। अन्तस्तल में वह प्रकाश रूप है। उसमें कोई आकार नहीं है। थोड़े में ऐसा भी कह सकते हैं कि यह एक प्रकार की निर्विकल्प समाधि है। 
परा से पश्यन्ती में यही भेद है कि योगीजन पश्यन्ती में तो योग द्वारा प्रकृति-प्रत्ययों का भेद देख लेते हैं किन्तु परा में कुछ भी नहीं देख पाते। वाणी के पश्यन्ती रूप से शब्द में अन्तर्निहित भाव का बोध होता है। 
3. मध्यमा--- उस हृदय-नाद को कहते हैं जो कि अन्तर का संकल्प रूप है जिसका उपादान कारण केवल बुद्धि है जो क्रम-युक्त तथा वाणी से परे है। वह सूक्ष्म है। यद्यपि उसमें क्रमों का संहार है तो भी क्रम-शक्ति से युक्त है। वह अभिव्यक्ति से रहित है। उसमें पदों का प्रत्यक्ष नहीं होता। वह व्यवहार का कारणभूत है।
4. वैखरी--- मुख से उच्चरित होने वाला शब्द वैखरी वाणी के अन्तर्गत आता है। बोलने की शक्ति, सरस्वती तथा वाग्देवी को भी वैखरी कहते हैं। यही वाणी श्रवण का विषय बनती है जो कण्ठ, तालु आदि स्थानों में वायु के विकृत होने पर वर्ण का स्वरूप धारण कर लेती है।
प्रकृति ने मानव को उक्त चारों प्रकार की वाणियों का उपहार दिया है। कौन किसमें कितना पारंगत होता है-- यह उसकी सतत साधना और तपस्या पर निर्भर करता है। 
उत्कृष्ट ग्रन्थ-लेखन के लिए परा, पश्यन्ती का सुयोग मणि-कांचन संयोग के समान होता है। विजय रंजन ने कठोर तथा लम्बी शब्द-साधना कर परा-पश्यन्ती का आशीर्वाद प्राप्त किया है।
‘निकष’ ‘कसने’, ‘घिसने’, ‘रगड़ने’ आदि ‘क्रिया भाव’को कहते हैं। ‘निकष’या कसौटी जिस पर परखने के लिए सोना कसा या रगड़ा जाता है। ‘निकष’परीक्षण को भी कहते हैं। जैसे सुनार सोने को कसौटी पर कसता है, वैसे ही विजय रंजन ने ‘काव्य’ को ‘नय’ तत्त्व के निकष पर कस कर उसे खरे रूप में प्रस्तुत किया है जो मनोहर तथा काव्य-सौन्दर्यविवर्द्धक है।
‘नयत्व’ का मूल शब्द है ‘नय’। ‘नय’ शब्द का आशय है ‘निर्देशन’, ‘बुद्धिमत्ता’, ‘दूरदृष्टि’, ‘नीति, ‘शासन’, ‘नागरिक-प्रशासन’, ‘राज्य-नीति’, ‘नैतिकता‘, न्याय’, ‘ले जाने वाला’, ‘मार्गदर्शक’, ‘व्यवहार’, ‘बर्ताव’, ‘उपयुक्त’, ‘उचित’, ‘किसी को किसी ओर ले जाने वाला’, ‘नम्रता’, ‘अच्छी तरह से काम करने के लिए बनाई गई योजना’। 
उक्त कसौटी पर विजय रंजन की प्रकृत पुस्तक सर्वथा सार्थक सिद्ध होती है। ‘नय-वाद’ का अन्वेषण तथा स्थापना काव्यशास्त्र में एक नवीन मानदण्ड का सुपरिचायक है। विजय रंजन ने काव्यशास्त्र में ‘नय’ तत्त्व (नयत्व) की प्रस्थापना कर ‘कविता’ के एक नवीन मानक की स्थापना की है जिसकी पष्ष्ठभूमि सुनियोजित विचार, अगाध अध्ययन, मत-मतान्तर का विश्लेषण तथा निष्कर्षात्मक वाक्य का उपस्थापन है।
कृति को ‘पूर्वार्चिक’ और ‘उत्तरार्चिक’ नामक दो ख्ण्डों में विभक्त किया गया है। पूर्वार्चिक में आठ उपशीर्षक हैं। उत्तरार्चिक में दो उपशीर्षक हैं।
कृति के प्रथम अध्याय ‘वैदिक संचेतना औ..र काव्य-नयवाद’ के अंतर्गत संहिता-साहित्य मुख्यतः ऋग्वेद, यजुर्वेद और अनेक उपनिषदों की दार्शनिक पृष्ठभूमि में काव्य-नयवाद की अनेक पाश्चात्य तथा भारतीय मनीषियों की मान्यताओं का गहन चिन्तन-मनन कर, विश्लेषण-परीक्षण कर लेखक ने अंततः यह मत स्थापित किया कि वैदिक वाङ्मय में ‘नयवाद’ के सूत्र एवं स्रोत मिलते हैं। आवश्यकता है कि इन स्थलों की पुनः विवेचना की जाए। अथर्ववेद तथा स्मृति ग्रन्थों का समीक्षापूर्ण उद्धरण देकर लेखक द्वारा अपनी मान्यता को परिपुष्ट किया गया है। 
द्वितीय अध्याय ‘नयवादी महत् काव्य का गोमुख : ‘रामायणम्’  के अन्तर्गत बहुपठित तथा सारस्वत तपस्वी लेखक ने आदिकाव्य का विभिन्न कोणों से मन्थन कर यह सिद्ध करने में सफलता पाई है कि वाल्मीकि-रामायण में ‘नय-वाद’ प्रखरता के साथ पल्लवित एवं पुष्पित है। 
तृतीय अध्याय ‘तुलसीदास औ..र काव्य-नयवाद’ के अध्ययन से स्पष्ट झलकता है कि जैसे गोस्वामी जी ने ‘नानापुराणनिगमागम रामायण क्वचिदन्यतोऽपि’का अध्ययन कर अपने कथ्य को परिपुष्ट किया है, कुछ उसी प्रकार लेखक द्वारा तुलसी-वाङ्मय का मौलिक मनन, गम्भीर चिन्तन तथा नीर-क्षीर विवेचन कर तुलसी-काव्य में नय-वाद की मौलिक प्रामाणिक स्थापना की गई है; जो विद्वानों के लिए नवीन चिन्तन के सकारात्मक सन्देश का वाहक है। 
चतुर्थ अध्याय ‘अन्यान्य भारतीय काव्यज्ञ औ..र काव्य-नयवाद’ में विलक्षण अध्येता-लेखक द्वारा हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के रचनाकारों के अनेक उद्धरणों को प्रस्तुत कर यह सिद्ध करने का भगीरथ प्रयास किया गया है कि नय-वाद के तत्त्व इन भाषाओं की रचनाओं में भी विद्यमान है। यह अध्याय पाठकों के ज्ञान-वर्द्धन में विशेष सहायक है क्योंकि पाठक अन्य भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य में नय-वाद का आनन्द प्राप्त करता है। यह अध्याय यह भी सुप्रमाणित करता है कि स्वाध्याय की वैदिक परम्परा आज भी जीवित है क्योंकि गम्भीर एवं विस्तृत स्वाध्याय किए बिना यह अध्याय लिखा ही नहीं जा सकता। 
पंचम अध्याय ‘प्रमुख भारतीयेतर काव्यशास्त्री औ..र काव्य-नयवाद’ अल्पज्ञात अज्ञात ज्ञान के अनेक नवीन क्षितिजों का सुप्रकाशक है। इस अध्याय की विशिष्टता यह है कि यह पाश्चात्य तथा भारतीय मनीषियों की सम्बद्ध मान्यताओं का तुलनात्मक परिशीलन प्रस्तुत करता है जिससे ग्रन्थ की ग्रहणीयता तथा उपादेयता में चार चाँद लग गए हैं। कठिन और जटिल विषय की बोधगम्य तथा सरल शैली में प्रस्तुति भी इस अध्याय की विलक्षणता कही जाएगी। 
समाजशास्त्र औ..र काव्य-नयवाद’ नामक षष्ठ अध्याय में लेखक ने उद्भट विद्वता का परिचय देते हुए समाजशास्त्र की अवधारणा को अनेक लब्धप्रतिष्ठ विचारकों की पृष्ठभूमि में समीक्षा कर उसमें भी काव्य-नयवाद की प्रामाणिक स्थापना की है। यह सिद्ध सत्य है कि ‘नय’ के बिना समाज और काव्य नकारात्मक और निरर्थक हो जाएंगे। 
सप्तम् अध्याय ‘मनोविज्ञान औ..र काव्य-नयवाद’ में लेखक की सूक्ष्म निरीक्षण विषयक प्रतिभा का सुदर्षन होता है। मनोविज्ञान पर पाश्चात्य समीक्षकों ने गहन एवं गम्भीर चिन्तन किया है। उन सबके सार-तत्त्व को अपने चिन्तन के निकष पर कसने में लेखक को विशेष सफलता मिली है। मन ही सारे अर्थों तथा अनर्थों का मूल है। यदि मन में ‘नय’ भाव विद्यमान है तो काव्य ही क्या सर्वत्र ‘नय’ की प्रधानता रहेगी जो स्वस्थ एवं समुन्नत मानव-जीवन का सुलक्षण है। 
अष्टम् अध्याय ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ ग्रन्थ का फल है। न्यायशास्त्र, उपनिषद्-रहस्य तथा संस्कृत भाषा के अनेक महत्त्वपूर्ण महाकाव्यों के आलोक में लेखक द्वारा अपने मन्तव्य की सम्पुष्टि की गई है। सुसंस्कृत वाणी के व्यापक परिप्रेक्ष्यों की विलक्षण एवं सारवान् समीक्षा से यह अध्याय अद्भुत बन पड़ा है। 
उत्तरार्चिक के अन्तर्गत ग्रन्थ का नवम् अध्याय ‘काव्य-नयवाद के फलितार्थ’ शीर्षक से है जिसमें अनेक समीक्षकों के मन्तव्यों का समीक्षण करते हुए सारतः स्थापित किया गया है कि- 
काव्य सिद्धान्ततः संवित् रागात्मक संचेतना है। ...... कविता/साहित्य के लिए ‘नय-नयत्व’ का निकष रागात्मकता और चैतन्य की सम्यक् अन्तःसमन्विति के लिए भी उपयोगी है। ” 
दशम् अध्याय ‘काव्य नयवाद : आपत्तियाँ एवं निदान’ में लेखक के मौलिक मनन, उच्च चिन्तन, ऊहापोह, समीक्षण, विश्लेषण, निरीक्षण तथा तत्त्व, तथ्य स्थापन की परा-प्रतिभा के दर्शन होते हैं; लेखक की ‘पश्यन्ती’ भी मुखरित तथा प्रत्यक्ष हो उठी है। लेखक ने अनेक ऊहापोह के पश्चात् यह सिद्ध करने में सफलता पाई है कि कविता का पश्यन्ती निकष तत्त्व ‘नयत्व’ है। 
अन्ततः लेखक ने आधार ग्रन्थों की सूची प्रस्तुत की है जिनमें अनेक धार्मिक, साहित्यिक, अंग्रेजी तथा पत्रिका जगत् से सम्बद्ध हैं। इनकी संख्या लगभग दो सौ है।
काव्यशास्त्रियों ने काव्य-परीक्षण के अनेक निकष बनाए हैं। यथा- रस, रीति, गुण, औचित्य, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि। इन तत्त्वों की स्थापना किसी विचारक ने की होगी। उस परम्परा को आगे आने वाले समीक्षकों ने आगे बढ़ाया, उसमें कुछ जोड़ा, कुछ घटाया। आचार्य द्रुहिण की परम्परा में आचार्य भरत ने रसों की संख्या आठ बताई- शृंगार, हास्य, करुण, बीभत्स, वीर, रौद्र, अद्भुत तथा भयानक। आचार्य अभिनव गुप्त ने नवम् रस ‘शान्त’ को स्थापित किया। रूपगोस्वामी ने ‘हरिभक्तिरसामृतसिन्धु’  तथा ‘उज्ज्वलनीलमणि’ नामक ग्रन्थों की रचना कर 'भक्ति' रस की स्थापना की। सूरदास, तुलसीदास की रचनाओं में वात्सल्य रस प्रत्यक्ष होता है। आचार्य विश्वनाथ ने 'वात्सल्य' रस की प्रस्थापना को पल्लवित किया। आचार्य भामह ने अलंकारों की संख्या 38, वामन ने 32, रुद्रट ने 62 तथा राजानक रुय्यक ने 82, जयदेव ने 104 तथा विश्वनाथ से 86 अलंकारों का विवेचन किया। आचार्य भरत ने 10, भोज ने 24, जयदेव ने 6, अग्निपुराणकार ने 18 तथा मम्मट ने 3 गुणों की संख्या मानी है। कथ्य यह है कि मौलिक चिन्तक लकीर का फकीर नहीं होता। उसकी रचना-प्रतिभा नवनवोन्मेषशालिनी होती है जिससे वह नवीन तथ्य की स्थापना करता है और उसे लोक-मान्यता भी मिलती है। विजय रंजन ने अनेक पुष्ट प्रमाणों, आधारों तथा विश्लेषणों की पृष्ठभूमि में कविता के पश्यन्ती निकष के रूप में ‘नयत्व’ की स्थापना की है जो विवेकपूर्ण तथा लोकसम्मत है। प्रकृत ग्रन्थ के पारायण की अवधि में मुझे अनुभूत हुआ कि विजय रंजन के कालजयी लेखन में परा, पश्यन्ती, मध्यमा तथा वैखरी के स्पष्ट दर्शन होते हैं। विजय रंजन गृहस्थ सारस्वत साधक हैं जो स्वाध्याय को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं, अतएव, उनकी लेखनी में विलक्षणता एवं विचक्षता का होना आश्चर्य नहीं है। 
ग्रन्थ की भाषा प्रौढ़, शैली परिष्कृत, अनुभूति गम्भीर तथा अभिव्यक्ति प्रांजल है। इस ग्रन्थ से यह आशा बँधती है कि भारतीय समीक्षा-शास्त्र तथा पाश्चात्य समीक्षा-शास्त्र दोनों की दृष्टियों से एक साथ किसी रचना को जाँचा-परखा जा सकता है। इस तरह आचार्य भरत, मम्मट, मतिराम, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ0 भगीरथ मिश्र, डॉ0 मुंशीराम शर्मा ‘सोम’ तथा प्रो0 विश्वनाथप्रसाद तिवारी की काव्य-समीक्षा परम्परा में एक नवीन अध्याय जुड़ गया है। आशा की जा सकती है कि विद्वत् समाज कृति का और कृति के कथ्य का समुचित समादर करेगा।
                                           - डॉ0 सुशीलकुमार पाण्डेयसाहित्येन्दु,
अध्यक्ष संस्कृत विभाग, संत तुलसीदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कादीपुर-सुल्तानपुर (उ0प्र0)
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 कविता क्या है, विषय अत्यन्त गूढ़ और रहस्यमय है। रहस्यमय इसलिए क्योंकि कविता मानव-जीवन और प्रकृति की तरह नित नवीन रूप धारण कर अचम्भित करती है। कविता अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक भाव हमारे सामने आते हैं।
अवध-अर्चनापत्रिका के सजग सम्पादक श्री विजय रंजन जब एक अन्वेषी सम्पादकीय दृष्टि से कविता के भूत, भविष्य और वर्तमान को देखते हैं तब  ‘कविता क्या हैपुस्तक का सृजन होता है।
पुस्तक के 10 अध्याय विजय रंजन की शोधपरक दृष्टि को सामने लाने वाले हैं। कविता : पारिभाषिक आधारों परअध्याय के अंत में उन्होंने स्वयं कविता को परिभाषित किया है।कविता : काव्यज्ञ-लोकमत के आधार परशीर्षक के अन्तर्गत विजय रंजन ने कविता को विभिन्न विद्वानों के शब्दों में परिभाषित किया है। संस्कृत के आदि-ग्रन्थों से लेकर वर्तमान समय के आलोचकों की दृष्टि में  ‘कविता क्या हैपर इस कृति में प्रकाश डाला गया है। विदेशी विद्वानों के विचारों को भी संकलित कर विजय रंजन ने कविता के सम्बन्ध में विश्वव्यापी अवधारणा को पाठकों के समक्ष लाने का सफल प्रयास किया है। परिशिष्ट के रूप में आधार-ग्रन्थ एवं पत्रिकाओं का उल्लेख पुस्तक को और अधिक उपयोगी बनाता है।
समालोचना कृतिसाहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण, ‘कविता का पश्यन्ती निकष  : नयत्व, ‘रसवाद  .. नय रसके बादकविता क्या हैजैसे गम्भीर एवं चिन्तनशील विषय पर विजय रंजन ने महत्त्वपूर्ण विचारों को संकलित कर जिस प्रकार कविता के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला है, वह एक आश्वस्ति देने वाला है जबकि वर्तमान समय में यह चिन्ता की जाती है कि कविता क्यों और किसके लिए लिखी जाए। 
विजय रंजन को इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक के प्रकाशन पर अनेकानेक शुभकामनाएँ।                                                                                                                           उदयप्रताप सिंह
                           कार्यकारी अध्यक्ष, 0प्र0 हिन्दी संस्थान, लखनऊ (0प्र0)                                                                                           .......................................................



अनुज विजय रंजन के अनेक आयामी व्यक्तित्व से मैं एक लम्बे अरसे से परिचित रहा हूँ। परिचय के माध्यम थे श्री अशोक मिश्र जो वर्तमान में ‘बहुवचन’ पत्रिका के सम्पादक हैं। मिश्र जी जब भी मिलते, किसी न किसी रूप में विजय रंजन चर्चा में आते किन्तु विशेषकर साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकार के रूप में ही। उन दिनों विजय रंजन ‘अवध-अर्चना’साप्ताहिक का प्रकाशन कर रहे थे। बाद में इसी नाम से इन्होंने त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया जो अद्यतन जारी है। 
अवध-अर्चना त्रैमासिकी की प्रतियाँ भी यदा-कदा मुझे देखने को मिलीं। इनमें अन्तर्निहित सामग्री प्रत्येक अंक में मुझे स्तरीय लगी किन्तु स्वयं को मैं इस बात का दोषी मानता हूँ कि इसके शिल्पियों को शाब्दिक प्रोत्साहन या कि लक्ष्य के प्रति दृढ़ता प्रदान करने की बात मेरे जेहन में इसके पूर्व कभी आई नहीं। 
विजय रंजन में व्याप्त शालीनता के संस्कार ही कहिए-- लगभग 20 वर्ष बाद वह मुझसे मिलने मेरे आवास पर आए। उनके सौहार्द से अभिभूत कुछ देर तक सारस्वत विमर्श करते-करते सहसा ही मुझे चाणक्य-प्रणीत एक श्लोक का स्मरण हुआ जिसके माध्यम से चाणक्य ने कहा था कि किसी व्यक्ति के प्रति कोई निश्चित धारणा उसके कनक-परीक्षणोपरान्त ही बनाना चाहिए। मेरे विचार से असमीचीन नहीं होगा उस श्लोक का यहाँ पर उल्लेख - 
“ यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते। निघर्षणच्छेदन ताप ताड़नैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषम् परीक्ष्यते त्यागेन्, शीलेन्, गुणेन् कर्मणाः। ”
मुण्डकोपनिषद् के अंतर्गत वर्णित एक तत्त्ववेत्ता पक्षी के स्तर से अपनी मादा पक्षी के संज्ञान में लाई गई श्रेष्ठ मनुष्य की पहचान भी तभी याद आई तो स्वगत भाषण भी मैंने किया था- “ विजय रंजन प्रधानतः मस्तिष्कजीवी हैं- कबन्ध मानसिकता से नितान्त शून्य; अर्थातः लोकोपकारी ! निश्चित रूप से अपने जीवन में ये किसी भी सारस्वत कर्म में यथाभिलषित सफलता पाएंगे।
समय-चक्र और कृतिकार की कलम साथ-साथ चलती रही अपनी-अपनी गति से-- कभी निर्बाध, तो कभी सांसारिक दुरुहताओं से उलझते-उलझते।
सन् 1981 में रंजन जी की प्रथम कृति ‘सूरज की आग’ आई थी। कहानी-संग्रह है यह। इसकी कहानियों से ये कथा-शिल्पी के रूप में चर्चित ही नहीं, सुख्यात भी हुए। 
अनन्तर अपने मानस महासिन्धु में काव्य-सर्जना का उद्वेग सुनामी की विकरालता ग्रहण कर ले-- उससे पूर्व 1986 व सन् 2009 में इन्होंने ‘हाशिये से’ व ‘किर्चें’ नाम के दो काव्य-संग्रह भी क्रमशः अपने पाठकों को सुलभ करा दिए। 
तात्पर्यतः ‘उभरते बिम्ब’ इनकी दूसरे क्रम की कथाकृति है कथाभिरुचि-सम्पन्न पाठकों के दृष्टि-पथ पर जो कृतिकार द्वारा चयनित विषयवस्तु, आशिल्पन, शैली, संक्षिप्तता, सोद्देश्यता, सम्प्रेषणीयता प्रभृति अन्यान्य विशिष्टताओं से संबलित होने के कारण पाठकों का स्तरीय मनोरंजन कराने में काफी कुछ दमदार दिखती हैं। इस धारणा को कुछ विस्तार देना आवश्यक तो है, किन्तु उतना ही अपरिहार्य प्रतीत होता है, इस तथ्य का पूर्वोल्लेख कि शोध-मानसिकता वाले विजय रंजन की पौराणिक ग्रन्थों में रुचि कम नहीं है। इसके फलस्वरूप ही उनकी लेखनी से निसृत एक समालोचना ग्रन्थ: ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, यही कोई वर्ष-डेढ़ वर्ष पूर्व पारायणार्थ सुलभ हुई जिसके अंतर्गत महर्षि की नारीवादी दृष्टि का भी निरूपण हुआ है; नारी-अस्मिता, इयत्ता, क्षमता के प्रबलतम पक्षधर होने के कारण उन्होंने उसकी निर्बाध एवं सतत सम्पूज्यता का संदेश भी सार्वजनीन किया है।
आसन्न कथा-संग्रह की कथा-रचनाएँ विषय-वैविध्य की विशिष्टता से रंजित हैं। एक कहानी अभिभावक वर्ग को दृष्टि देती है कि अपने दाम्पत्य को पारस्परिक कलह से विरत बनाए रक्खें जिससे कि संतति का भविष्य सुरक्षित रहे; एक कथा-रचना में इस लोक-विश्रुत सत्य को ऊष्मान्वित किया गया है कि प्रत्येक पुरुष के उत्कर्ष के मूल में कोई न कोई नारी ‘भाग्यरेखा’की भूमिका में होती है। 
जूतों की चुगली’ में आत्मरंजन और लोकरंजन के साथ-साथ बाल-मनोविज्ञान ही नहीं, सभी आयुवर्ग वालों के लिए एक सदुपदेश भी है कि घर से बाहर कहीं भी जाने से पूर्व स्वयं को सुषमाईसम्पन्न बनाने के साथ-साथ अपनी पादुकाओं के सुघरीकरण की भी परवाह कर लिया करें जिससे कि कभी किसी विरूप स्थिति से सामना न हो; जूते या चप्पल दीर्घकालोपयोगी हों; विशेषकर बच्चों में अनुशासनबद्धता की आदत बने। 
संगृहीत कहानियों की एक अन्य विशिष्टता भी ध्यातव्य है, वह यह कि परिवेश के चित्रण में कथा-शिल्पी ने किसी छायाचित्रकार की भूमिका निभाई है। परिणामतः अभिव्यक्ति में यथेष्ट जीवन्तता हृदय को सम्मोहित करती है। मुख्य कथा ‘उभरते बिम्ब’इस परिप्रेक्ष्य में सर्वथा पारायणीय है। कई रचनाएँ इसलिए भी रोचक लगेंगी कि उनके छोटे-छोटे कथोपकथन अभिव्यक्ति की बुनावट को कसावयुक्त बनाए रखते हैं। असलियतन कथा के आशिल्पन की प्रक्रिया के दौरान यही सतर्कता पाठकों को किस्सागोई से आद्यन्त जोड़े रखती है, उन्हें अवरीय ऊब से बचाती भी है। कथासूत्र के संक्षिप्त होने की स्थिति उसके पल्लवन को विजातीयता के दोष से भी मुक्त करती है।
सार्थक होगा संग्रह में प्रयुक्त भाषायी उपयुक्तता विषयक मेरा मंतव्य भी। कथाशिल्पी की अनेक रचनाएँ अंग्रेजी के शब्दों से सम्मिश्रित हैं। आम बोलचाल में इस्तेमाल होने वाले उर्दू शब्द भी हैं। मेरे विचार से वर्तमान में कविता और कहानी को सर्वसुग्राह्य अभिव्यक्ति और स्वरूप न देने में उनकी कोई सार्थकता नहीं। अतीत की बात हो गई जब संस्कृतनिष्ठ भाषा में कविताएँ जन्मतीं, कहानियाँ और नाटक भी। आज उर्दू को भारतीय भाषा लगभग माना ही जा चुका है। ये वह धातु है जिसके सम्मिश्रण से संस्कृत-जन्य हिन्दी की प्रांजलता को तरल बना कर लेखन की किसी भी भंगिमा वाला मनचाहा आभूषण निर्मित किया जा सकता है। पाश्चात्य जीवन-शैली, तज्जन्य सोच एवं उदर-पोषण के निमित्त दैनन्दिन भागमभाग वाले समस्तवर्गीय भारतीयों के भाग्य में यही अंकित दिखता है कि वे अपनी सारस्वत भूख को शान्त करने के लिए त्वरित ग्राह्य, त्वरितरूपेण पाच्यापाच्य साहित्य का सेवन करें। कथनार्थ यह कि कथा-शिल्पी वर्ग अथवा कवियों की यह विवशता ही कही जाएगी कि वह कथ्य में सम्प्रेषणीयता और युगानुरूप स्वाभाविकता लाने के लिए हिंग्लिश के माध्यम से ही रचना-कर्म सम्पन्न करें। मेरी इस मान्यता के मूल में है सम्पूर्ण देश के हिन्दी समाचार-पत्र, चलचित्रों और दूरदर्शन के शतशः चैनलों में अहर्निश प्रयुक्त होने वाली भाषा और स्वदेश के भाग्य-निर्माताओं की भाषा, आशनाई है जिन्हें विदेशी भाषा से। पाठकों से भी निवेदन ही संभव है कि भले ही युगीन खिन्नताओं को उन्होंने खिन्न मन से ही स्वागत-योग्य माना हो। अतएव, पाठकगण ‘कथा-रचनाओं’ में हिंग्लिश के प्रयोग के लिए लेखकीय विवशता को समझने का प्रयास करेंगे। आखिर अपने पाठकों के लिए ही तो सृजनरत रहता है कोई भी लेखक ! अधिकाधिक कर भी क्या सकता है वह सिवा इसके कि वह यथासंभव कथाभिव्यक्ति की चाय में इंग्लिश की चीनी का सीमित प्रयोग करे। 
बहरहाल, इस दूसरे कहानी-संग्रह के लिए अनुजवत् कथाशिल्पी को अशेष शुभकामनाएँ एवं बधाईयाँ !
- डॉ0 कौशलेन्द्र पाण्डेय 
                                               (कहानीकार, उपन्यासकार, साहित्यभूषण), लखनऊ, दूरभाष: 09236227999

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आत्माभिव्यक्ति मानव की सहज वृत्ति है। मानव अपने मन की भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभूतियों और आकांक्षाओं को व्यक्त करने के लिए सदैव आकुल रहता है। वह कभी रोकर, कभी हँस कर, कभी गाकर, कभी लिख कर, कभी चित्र बना कर, कभी मूर्ति बना कर अपनी अभिव्यक्ति के मार्ग को खोजता रहता है। यह हमारा मानव-स्वभाव है कि हम चाहते हैं कि हमारी भावनाएँ दूसरों तक पहुँचें और इसीलिए हम साहित्य, संगीत, कला (चित्र, मूर्ति, नृत्य आदि) के माध्यम से अपनी अनुभूतियों को दूसरों तक सम्प्रेषित करते रहते हैं।    
साहित्य हमारी अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है क्योंकि भाषा की सम्प्रेषणीयता निर्विवाद है। साहित्य की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि विधाओं की विविधता इसे सर्वग्राह्य और रंजक बना देती है। साहित्य के दो रूप -- गद्य और पद्य- तथा इनके भी अनेक रूप और प्रकार अभिव्यक्ति के लिए अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देते हैं।
पहले महाकाव्य और नाटक अभिव्यक्ति के स्यक्त माध्यम थे, परन्तु आज उपन्यास और कहानी अधिक लोकप्रिय माध्यम हैं। इनमें भी कहानी अपनी लघुता और प्रभविष्णुता के कारण लोकरुचि के अधिक अनुकूल पड़ती है। कहानी को आज भले ही पश्चिम से प्रभावित आधुनिक साहित्य की विधा माना जा रहा है परन्तु यह सत्य है कि कहानी कहना और सुनना मानव की सहज प्रवृत्तियों में से एक है। आदिम युग से ही मानव अपनी इस प्रवृत्ति की तृप्ति के लिए कहानी कहता और सुनता रहा है।  सभी प्राचीन भाषाओं में कथात्मक तत्त्व किसी न किसी रूप में विद्यमान मिलते हैं। भारतवर्ष में पुराण, उपनिषद्, बौद्ध-जैन साहित्य, संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तक में प्राचीन कथा-साहित्य के सूत्र बिखरे हुए हैं। आधुनिक साहित्य में कहानी के वर्ण्य-विषय, रचना-विधान, शब्द-संयोजन आदि में कितना भी परिवर्तन-अभिवर्द्धन हो गया हो परन्तु उसके मौलिक स्वरूप और उद्देश्य में प्राचीन मानव-वृत्ति सुरक्षित है। इसीलिए गद्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कहानी अधिक लोकप्रिय है।
उभरते बिम्ब’ भाई विजय रंजन का द्वितीय कथा-संग्रह है। इससे पूर्व 1981 में ‘सूरज की आग’ शीर्षक से एक कथा-संग्रह प्रकाशित हो चुका है। इन दोनों के मध्य के अन्तराल में वे अपने अन्दर के कवि, शायर, शास्त्रीय साहित्यकार, पत्रकार और अधिवक्ता रूप को माँजने, सँवारने, निखारने में व्यस्त रहे। फलतः ‘हाशिए से’ और ‘किर्चें’ जैसे काव्य-संग्रह, ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ जैसे चिन्तनपूर्ण विचारशील, समीक्षात्मक-कृति, ‘अवध-अर्चना’ जैसी साहित्यिक- सांस्कृतिक पत्रिका का अनवरत प्रकाशन करने के साथ ही अनेक वैदुष्यपूर्ण लेखों, सम्पादकीय वक्तव्यों और कविताओं-गजलों के यत्र-तत्र प्रकाशन से व्यक्तिगत सृजनशीलता को तो ‘धार’ देते ही रहे-- पाठकों और साहित्य-मर्मज्ञों की मानसिक क्षुधा को भी तोष देने में सफल रहे।
‘अनुभूतियाँ ही रचनाशील भावना से अनुरंजित होकर कहानी बन जाती हैं ’--- प्रेमचन्द का यह कथन कहानी और लेखक के सम्बन्ध सूत्र को स्पष्ट कर देता है। श्री रंजन का कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ भी उनकी यथार्थपरक अनुभूतियों का स्वाभाविक प्रकाशन है। 
संग्रह में 18 कहानियाँ हैं जो विषय-वैविध्य, चरित्र-वैविध्य, शब्द-संयोजन और सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से लेखक की सृजन-क्षमता की व्यापकता का बोध कराती है। सभी कहानियों के विषय आज के सामाजिक यथार्थ को आईना दिखाते हैं-
टूटे-अनटूटे रिश्ते’ में टूटते दाम्पत्य में दबे बच्चों की सिसकी है।  तो ‘अलगिया गिलास’ में समाज में व्याप्त वर्ण-भेद और छुआछूत की समस्या का समाधान है। 
कापुरुष’ में पुरुष-मानसिकता की क्षुद्रता का प्रकाशन है तो ‘समझौता’ में नारी-मन के कोमल-सूत्रों को परखने का प्रयास। 
कहाँ से कहाँ तक’ एक व्यक्ति के मनोविज्ञान की जटिलता को व्यक्त करने वाली मनोविश्लेषणात्मक कहानी है, तो ‘हुड़ुकचुल्लु’ में सामान्य व्यक्ति समय पर उचित दिशा-निर्देशन पाकर कितनी प्रगति कर सकता है, इसको व्याख्यायित किया गया है। 
इमेज’ अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए, बनी-बनाई इमेज को टूटने से बचाने के लिए भावनाओं को कुचलने की मजबूरी पर व्यंग्य करती है तो ‘घटती-बढ़ती परछाईंयाँ’ स्त्री-पुरुष के अहं के टकराव को व्यक्त करती है। 
जूतों की जुगली’ में बच्चों के साथ ही अप्रत्यक्षतः बड़ों के लिए भी व्यवहारिक शिक्षा दी गई है कि जूतों से व्यक्तित्व की अनेक विशेषताएँ उद्घाटित होती हैं, इसलिए जूतों की उपेक्षा उचित नहीं। 
मि0 अजूबा’ में नए प्रयोगों के नाम पर परम्पराओं और संस्कारों से खिलवाड़ करने वालों पर व्यंग्य है, तो ‘प्रतिशोध’ और ‘दूसरी हार का अहसास’ में असफल प्रेम की मनोदशा का विश्लेषण है। 
कहानी ‘साढ़े तीन घंटे’ में साढ़े तीन घंटे जैसी अत्यल्पावधि में मानव-जीवन में सामान्यतः घटित होने वाले विभिन्न घटनाक्रमों से एक व्यक्ति के साक्षात्कार का वर्णन है। 
अन्तिम कहानी संग्रह की शीर्षक कथा है - ‘उभरते बिम्ब’ जिसका मूल उद्देश्य जीवन में पुस्तकों और अध्ययन-मनन के द्वारा होने वाले उदात्त परिवर्तनों का रेखांकन करना है। वस्तुतः विद्या-व्यासंगिता ऐसा व्यसन है जो व्यक्ति को सात्विक उदात्तता प्रदान करता है। पुस्तक-मैत्री व्यक्ति के लिए ऐसी संजीवनी है जिससे मनुजता के सौन्दर्य का अमृत-लाभ होता है। लेखक ने इस कहानी के द्वारा इसी भाव को अर्थ दिया है। अन्य कहानियाँ भी सोद्देश्य और पठनीय है।
विषय-वैविध्य के साथ ही कहानियों में भाव और चरित्रों में भी विविधता है जिनका उचित रेखांकन और उपयुक्त विकास प्रस्तुत किया गया है। संवाद सहज और सम्प्रेषणीय है। छोटे-छोटे संवादों की योजना से रचनाकारों में कसावट बनी रहती है। कहानियों की भाषा को स्वाभाविक बनाए रखने के लिए हिन्दी के सरल, तद्भव शब्दों के साथ अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों का प्रयोग प्रायः किया गया है। लेखक अधिवक्ता भी हैं, पत्रकार भी, कवि भी हैं, शायर भी-- अतः उनका शब्द-संयोजन तदनुरूप वैविध्यपूर्ण है, इसमें कोई वैमत्य नहीं है कि भाषा पर उनका अच्छा अधिकार है। पात्र और अवसर के अनुरूप देशज शब्दों और स्थानीय भाषा का प्रयोग भी हुआ है कहानियों में।
संग्रह की सभी कहानियाँ यथार्थपरक (सत्य), कल्याणकारी उद्देश्य (शिव) और भाव-व्यंजना के सौन्दर्य (सुन्दर) से परिपूर्ण हैं और साहित्यिक प्रयोजन की दृष्टि से सार्थक हैं। 
अंततः, मैं ‘उभरते बिम्ब’ के रचनाकार विजय रंजन को उनकी सकारात्मक सोच और मांगलिक उद्देश्य वाली इन कहानियों के लिए साधुवाद देती हूँ। 
अपने अनुजवत् विजय रंजन को आशीर्वाद देती हूँ इस शुभकामना के साथ कि उनकी लेखनी अनवरत् क्रियाशील रहे, वे स्वस्थ रहें और साहित्य को ऋद्ध-समृद्ध करते रहें। इति शुभम्। 

                                                                               - डॉ0 शोभा सत्यदेव                                सेवानिवृत्त आचार्या एवं अध्यक्ष,हिन्दी विभाग, का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,अयोध्या-फेजाबाद 

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      ‘ किर्चें ’ : एक परिदृष्टि
 - दयानन्द सिंह ‘मृदुल’                                
किर्चें’ कवि, कहानीकार, आलोचक एवं ‘अवध-अर्चना’ त्रैमासिकी के सम्पादक विजय रंजन का सद्यःप्रकाशित कविता-संग्रह है।
 इस संग्रह में प्रभागानुसार क्रमशः गीत-नवगीत, गजल-हिन्दी गजल एवं अकविता-अगीत हैं। इसमें अनेक रस-रंग की रचनाएँ संगृहीत की गई हैं।
शृंगारपरक रचनाओं के अतिरिक्त वर्तमान परिवेश की मूल्यहीनता, अमानवीयता, यांत्रिकता, संवेदनशून्यता, सामाजिक विषमता एवं स्वार्थपरक भ्रष्टता से क्षुब्धित रचनाएँ भी हैं जो कवि की निश्छल हृदय की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन रचनाओं में संवेदनशील कवि अपने आन्तरिक एवं बाह्य परिवेश से अपनी रचना का उपजीव्य ग्रहण करता दिखता है।
इन रचनाओं में उर्दू और यदा-कदा अंग्रेजी के शब्दों का भी भावानुरूप प्रयोग है जिससे भावों की सहज अभिव्यक्ति हुई है।
संग्रह में अवधी का एक गीत एवं एक ग़ज़ल भी है जिनसे कवि के अवधी के प्रति लगाव की पुष्टि होती है। कवि की अनेक कविताएँ निराशावादी हैं लेकिन अनेक कविताओं में वे आशावादी भी दिखते हैं। ध्यातव्य है -
“ और देखना
आएगा एक न एक दिन--वह दिन
होंगे नत/हत
बड़े से बड़े सारे विध्वंसक
तुम्हारी निर्विकल्प अहिंसा के समक्ष
होंगे शरणागत,
महसूसेंगे वे जरूरत अहिंसा की
चरमशान्ति की
दूर नहीं है ऐसा दिन।।  ” 
कवि की समसामयिक संदर्भों पर आधारित रचनाएँ निश्चित रूप से पाठकों को प्रभावित करके उन्हें एक नई दिशा प्रदान करेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह श्री रंजन की रचनाशीलता को अनाहत ऊर्जा के साथ चिरकाल तक गतिशील बनाए रखे।
समीक्षक का पता   :   संस्थापक अध्यक्ष,
                                ‘रजनीगंधा’ साहित्यिक संस्था, 325, कन्धारी बाजार, फैजाबाद

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साहित्य-जगत् में सृजन-क्रिया प्रमुखतः दो रूपों में होती आई है प्रथमतः कविता के रूप में और द्वितीयतः गद्य के रूप में। आदिकवि वाल्मीकि का सारस्वत् भाव गद्य में नहीं, अपितु कविता में प्रवाहित हुआ। वेदमंत्र एवं उपनिषदों का चिन्तन काव्य में अवतरित हुआ पर परवर्ती काल में उनके अनुवाद गद्य में हुए। उनकी व्याख्याएँ गद्य में लिखी गईं। गद्य का विकास क्रमशः गद्यकाव्य के रूप में भी हुआ। इससे भी ‘काव्य’की महत्ता का द्योतन होता है। आशयतः मानव की अभिव्यक्ति के रूपों में ‘काव्य’ को महत्तर मान्यता मिली। ललित कलाओं में भी ‘काव्य-कला’किंवा ‘कविता’ को वरीयान् माना गया।
कविता अपनी चारुता से मन-मानस और हृदय-तल को सीधे-सीधे भेदती है। निश्चय ही कविता अपने में एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। कवि के भाव एवं कल्पनाओं की समवेत अभिव्यक्ति होती है- कविता। कविता की यह अभिव्यक्ति अलंकारों से विभूषित होकर छन्दों की झंकृतियों में नर्तन करती है। कविता की भाषा में चयनित गुरु-गम्भीर सहज तीखे पर ललित शब्दों का प्रयोग होता है। भाव-प्रवणता, गेयात्मकता, कल्पना-सौन्दर्य जैसे विशिष्ट गुणों से युक्त पदावली ‘कविता’होती है।
संस्कृत काव्यशास्त्रकारों ने काव्य की वरीयता को स्वीकारा है और उसे विविध रूपों में परिभाषित किया है। भामह ने ‘शब्दार्थे सहितौ काव्यम्’ लिख कर काव्य -शरीर को शब्दार्थमय कहा है। भरत मुनि ने रस को ही काव्य का प्रधान तत्त्व माना है- “ रसः काव्यार्थः। ”
आ0 दण्डी ने काव्य में शोभा की उत्पत्ति अलंकारों से मानी है-  “ काव्यं शोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते।” 
साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने ‘रसात्मक वाक्य’ को ही काव्य माना है-  “ वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। ”
पण्डितराज जगन्नाथ रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले ‘शब्द (शब्दों)’ को ही काव्य मानते हैं-                                                                        “ रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यः । ”
इस प्रसंग में काव्यप्रकाशकार मम्मट की काव्य-परिभाषा नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। वे शब्द तथा अर्थ दोनों की समष्टि को ‘काव्य’मानते हैं। शब्द और अर्थ किस प्रकार के होने चाहिए इसे स्पष्ट करते हुए वे ‘अदोषौ’, ‘सगुणौ’ तथा ‘अनलंकृती पुनः क्वापि’ पदों का प्रतिपादन करते हैं -       
                                         “ तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनःक्वापि। ”
अर्थात् दोषों से रहित, गुणयुक्त और कहीं-कहीं अलंकाररहित शब्द और अर्थ (दोनों की समष्टि) काव्य है। 
इसी भाँति अनेक काव्य-मनीषियों ने ‘काव्य’को परिभाषित किया है। अभिप्राय यह है कि ‘काव्य’में काव्यत्व तो होना ही चाहिए शेष धर्म गौण हैं। ‘काव्य’में ‘लोकोत्तर आह्लादकता’वांछनीय है। यही ‘कविता’का काव्यत्व है। रमणीयता शब्द और अर्थ दोनों ही की वांछित है। जब रमणीयता होगी तो वह मन को रुचेगी और इसी दशा में रस का उद्रेक होगा। स्पष्टतः शब्द और अर्थ दोनों की रमणीयता चारु ‘कविता’ के लिए आवश्यक गुण है।
‘काव्य’ यश का जनक, अर्थ का उत्पादक, व्यवहार का बोधक, अनिष्ट का नाशक, पढ़ने के साथ ही परम आनन्द को देने वाला और स्त्री के समान उपदेश प्रदान करने वाला होता है -
                                        “ काव्यंयशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतर क्षतये। 
                                           सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।। ”
                                                                          -‘काव्यप्रकाश’, प्रथम अध्याय, कारिका-2 पृ0 10
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के व्यंजित लक्षणों का निहितार्थ यह मानना तर्कसंगत प्रतीत होता है कि एक तो ‘काव्य’का लक्ष्य ‘मन का रंजन’है, दूसरा ‘मंगल का प्रेरण-विधायन’है, तीसरे ‘अनिष्ट-अमंगल का विनाशन’ है, चौथे इसकी ‘उपदेशात्मकता’है, पाँचवें इसका ‘लोक-राष्ट्र-मानवता से सरोकार’ है, छठवें ‘यश का विस्तार’ है, सातवें इसकी ‘सर्वविधप्रियता’, ‘अर्थकारिता अथवा चारुता’है। मेरा मत है- ‘काव्य’के ‘लोक-समाज-राष्ट्र-मानवता से सरोकार’तथा ‘मंगलविधायन और विबोधन’पहलू सर्वोपरि हैं।
समय के साथ-साथ छांदसिक कविता के रूप-स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है। छांदसिक कविता का अधुनास्वरूप ‘गीत’समकालीन कविता का एक आवश्यक पक्ष है। प्रायः लोग ‘गीत’का अर्थ केवल गाए-बजाए जाने से लेते हैं पर गीत मात्र इतना ही नहीं है। ‘गीत’का एक पक्ष तो गेयता से जुड़ता है पर उसे सदैव मनोरंजन की दृष्टि से ही जाँचा-परखा जाना उचित नहीं है। कथ्य की दृष्टि से भी गीत आज उतना ही भरा-पूरा है जितना कि समकालीन कविता का स्वरूप। गीत पहले व्यक्तिगत सुख-दुःख का ही अनुगायन किया करते थे, संयोग-वियोग और राग-विराग ही उनका मूल कथ्य था किन्तु आज ‘गीत’ ने गजलों की तरह ही अपने तेवर और भंगिमा में गुणात्मक बदलाव किए हैं। वह जीवन के खुरदुरे यथार्थ, विसंगतियों और राजनैतिक सामाजिक मानवीय सरोकारों को पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त कर रहा है। गीतों का राग-बोध अपनी जगह है, पर उसके शिल्प में पिछले दिनों क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। एक भरे-पूरे गीत में समूचे आन्दोलन की शक्ति समायी दिखती है। गीत वस्तुतः आत्मविश्वास की कविता है। यह कागज पर तो शक्तिमान है, काव्य-मंच पर भी प्रभविष्णु है। इसमें कवि-हृदय के उर्वरभाव, ललित भाषा-शिल्प में अभिव्यंजित होते हैं। नागार्जुन, कैलाश बाजपेयी, गिरधर गोपाल, भवानीप्रसाद मिश्र, शलभ श्रीराम सिंह, रमेश रंजक, माहेश्वर तिवारी, नीरज, रामावतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी आदि गीतकार इस प्रसंग में उल्लेखनीय हैं। 
गीत के उत्तरवर्ती के रूप में ‘नवगीत’आया। निराला की ‘नवगति नवलय ताल छन्द नव’की परिकल्पना ‘नवगीत’की पीठिका बनी। बच्चन के गीत-शिल्प में अधुनातन भाव-बोध दर्शित होता है। भरत व्यास, नरेन्द्र शर्मा आदि ने गीत की भाषा को एक नया संस्कार दिया। गीत में गद्य-शब्द समावेषित हुए। ‘गीतांगिनी’में सर्वप्रथम डॉ0 राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने ‘नवगीत’ संज्ञा का प्रयोग किया। साठ के दशक में भदौरिया, उमाकान्त मालवीय, नईम, डॉ0 ओम प्रभाकर, नरेश सक्सेना, कुमार रवीन्द्र जैसे गीतकार प्रतिदिन के ‘कन्टेन्ट’ पर ध्यान देने लगे। ‘नयी कविता’ के समानान्तर ‘नवगीत’ ने आन्दोलन की शक्ल ले ली। नवगीत के गर्भ से ही ‘जनगीत’ का जन्म हुआ।
स्पष्टतः ‘नवगीत’ नए मानव-मन की प्रतिक्रिया है, निर्मम नियति की अभिव्यक्ति है। जाहिर है कि आज हम अगर कहीं इससे जुड़ते हैं तो संवेदन की वजह से नहीं वरन् समस्याओं की समानता की वजह से जुड़ते हैं। आज का गीत अपने पूर्ववर्ती गीतों से अलग है और नया यदि है तो इसीलिए कि वह आज की जिन्दगी के खुरदुरे धरातल पर खड़ा है, सोनार देश की समतल भूमि पर नहीं। दूसरे, इसके शब्द भी अजनबी नहीं हैं। 
‘ग़ज़ल’ गीत की विधा से एकदम भिन्न और अलग प्रकार की विधा है। अपनी शैली, संरचना, अभिव्यक्ति के अंदाज आदि प्रत्येक दृष्टिकोण से ग़ज़ल अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। 
ग़ज़ल के स्वरूपण के लिए आवश्यक है कि सबसे पहले इसके छन्दों या बहरों का पर्याप्त ज्ञान हो। पुस्तकीय ज्ञान न भी हो तो ग़ज़ल की वे सारी बहरें (छन्द) जिसके अंतर्गत कोई शायर अपने ‘अशआर’रच रहा है उसके अवचेतन में विद्यमान हों, वह अनुभव करे कि शे’र कहते हुए वह बहर से बाहर तो नहीं चला गया है। यदि बहर (छन्द) नहीं है तो ग़ज़ल भी नहीं होगी। छन्द की व्यवस्था को खण्डित करके बहर के अरकान को घटाकर या बढ़ा कर अथवा ग़ज़ल को छन्दविहीन बना कर उसे ग़ज़ल के रूप में बनाए रखना संभव नहीं है। इसलिए ग़ज़ल के ढाँचे के साथ छेड़छाड़ करना उचित नहीं है। ग़ज़़ल की एक और विशेषता है उसमें शब्दों का किफायत के साथ प्रयोग। ग़ज़ल वास्तव में कम से कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात कहने की विधा है।
स्पष्ट है कि ‘काव्य’हृदय और बुद्धि की संश्लिष्टि है। ‘गीत’और ‘नवगीत’में हृदयपक्ष की प्रधानता होती है जबकि ‘अकविता’और ‘अगीत’में बुद्धि पक्ष की। अकविता-अगीत में विचारमूलकता का प्राधान्य होता है। वाग्वैदग्ध्य एवं परिहास भी इनमें प्रायः दिखाई पड़ता है। अकविता-अगीत इन दिनों ज्यादातर सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों की अभिव्यक्ति करते दिखाई पड़ते हैं। इनमें प्रायः शब्द-चित्र मिलते हैं। ये शब्द-चित्र काव्य-रसिकों को आनन्द देते हैं।
गीत-ग़ज़ल-अकविता की उपर्युक्त अपेक्षाओं के अनुशीलन के उपरान्त काव्य-संग्रह ‘किर्चें’में संगृहीत गीत-ग़ज़ल-अकविता-अगीत को देखें तो साफ दिखेगा कि ‘किर्चें’के कृतिकार विजय रंजन एक कुशल सम्पादक, लेखक, मौलिक सर्जक, रचनाकार, एक श्रेष्ठ गीत-नवगीतकार, एक सिद्ध ग़ज़ल-हिन्दीगजलकार, एक प्रतिष्ठित अकविताकार-अगीतकार, एक तीखे आलोचक और जनचेतना के आरेखी साहित्यकार हैं। श्री रंजन जी की रचनाधर्मिता से परिचित हर सुमनस् मानता है कि शास्त्रीय-काव्यशास्त्रीय विषयों में उनकी अच्छी पैठ है। अपने सम्पादन-कार्य में वे प्रायः नया तेवर भरने के पक्षधर हैं। उनकी कविताओं-कहानियों आदि में मौलिक कथ्य-तथ्य के दर्शन होते हैं क्योंकि वे एक तेज-तर्रार अधिवक्ता हैं, अतएव उनकी दृष्टि और सृष्टि दोनों में ही तार्किकता समाई दिखती है। वे समाज और राष्ट्र की स्थितियों-दशाओं के सच को बराबर अपनी कलम से उघारते रहते हैं। जीवन और जगत् की उनकी परख निराली है। ‘अवध-अर्चना’त्रैमासिकी से उनकी मौलिक प्रतिभा प्रभूत प्रचरी-पसरी है।
इसके पूर्व इनके एक-एक कविता-संग्रह और कहानी-संग्रह आए हैं। सम्प्रति लगभग दो दशकों बाद उनका संदर्भगत प्रस्तुत कविता-संग्रह ‘किर्चें’ है। 
संग्रह में 18 गीत-नवगीत, 27 ग़ज़ल-हिन्दी गजल, और 36 अगीत-अकविता समाहित हैं। ये सभी समकालीन सृजन-सन्दर्भों के अभिव्यंजक हैं। संग्रह की रचनाओं द्वारा वे अपनी जमीन खोजते और पेश करते नजर आते हैं। उनकी कृति ‘किर्चें’की शुरुआत एक मनहर गीत से हुई है। कवि हिमनद पर ऋत लिखने के लिए और उसके आराधन के लिए संकल्पित है, यद्यपि उसकी अंगुलियाँ ठिठुरी हैं। यहाँ भाषा और भाव का लालित्य दर्शनीय है -
शब्द ... देहरीदीप ..... मन-तन
चुक रहे अनाम
शालवन में घिर रही है
अँधियारी शाम
ठिठुरी तर्जनियाँ हैं ; पर
‘रंजन’ अक्षर में
लिखना है हिमनद पर ऋत
- देवता प्रणाम !
इस संग्रह का दूसरा ही गीत ‘मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं’ मनोहारी बन पड़ा है। गीत के छन्दों में इस ढंग का प्रतीक विधान है जिससे एक विशिष्ट भावबिम्ब उभरता है। इसमें प्रयुक्त ‘नैनों की अनुभूति’, ‘अभिलाषा के क्वाँरे सपने’, ‘रिश्ते बाँस बबूल हो गए’ सरीखे प्रतीक-पदविधान निश्चय ही भावक का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। कवि सुखद किंवा दुःखद सभी दशाओं के नाम अपने गीत लिखना चाहता है। निम्नांकित छन्द यहाँ उद्धृत करना संगत प्रतीत होता है - 
दूर कहीं महुआ बन महके।
फिर पलाश के जंगल दहके।।
रतनारे कजरारे नयना,
आज लगे कुछ बहके-बहके
नयनों की अनुभूति लिखूँ मैं,
रीति के नाम, अरीति के नाम।।
इस गीत में प्रयुक्त पदों की अर्थव्यंजकता कितनी गुरु-गम्भीर है, यह सहज द्रष्टव्य है।
इस खण्ड का तीसरा गीत ‘हाँ ! मैं अपने गाँव गया !’ भी उपरिअंकित विशेषताओं से मण्डित-अभिमण्डित दिखता है, जिसका प्रत्येक छन्द अर्थ की गुरुता का संवाही है। यहाँ प्रयुक्त पद लालित्यपूर्ण होते हुए अर्थ की गुरुता का प्रकाशन करते हैं, साथ ही वर्तमानकालिक गाँवों की रहनी-सहनी और उनकी गतिविधियों का बिम्बायन करते हैं। ये कवि के लोक-प्रेम और उसकी पैनी पर्यवेक्षण-दृष्टि के गम्भीर अर्थों की सृष्टि करने में यथेष्ट सक्षम दिखते हैं। 
इसी भाँति ‘गीत-नवगीत’ प्रखण्ड के अन्यान्य गीत-नवगीत जैसे ‘....... हारे दिन जीते दिन’, ‘रातें भी बीमार ......’, ‘विषकन्या को चूम-चूम कर बोलो कौन जिये ??’, ‘फिर लिखेंगे हम.....’, ‘ ....... तुम सम्हाल रखना’, ‘अनागत’आदि भी अपनी विशिष्ट प्रतीकात्मकता, बिम्ब-योजना, अर्थोत्कर्ष की सृष्टि और ललित शब्द-पदयोजना के लिए ज्ञेय, ध्येय और अनुभावनीय हैं।
दुष्यन्त के बाद ग़ज़ल के क्षेत्र में हिन्दी काव्य-जगत् में ग़ज़ल-सर्जना एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ के रूप में दिखायी पड़ती है। इस टर्निंग प्वाइंट को उपस्थित करने वालों में राही मासूम रजा, कैफी आजमी, शमशेर बहादुर सिंह, मुगन्नी तबस्सुम, परवीन शाकिर, शहरयार, निदा फाजली, बशीर बद्र के नाम पूर्वतः उल्लेखनीय हैं। इसी शृंखला में अब श्री विजय रंजन का नाम जोड़ा जा सकता है। 
प्रस्तुत संग्रह की उनकी 27 ग़ज़लें उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि करती नजर आती हैं। इस सत्य का उद्घाटन करने वाले अशआर यहाँ उद्धृत हैं। श्री रंजन ने महकते बेला-केतकी आदि की तुलना में नीम के फूल की महत्ता का प्रतिपादन किया है जिससे कवि की दृष्टि की सूक्ष्मता के साथ-साथ उसकी गुणग्राही दृष्टि का पता चलता है -
पत्ते उदास हैं, कहीं आँगन में धूल है।।
चन्दन खमोश है, कहीं हँसता बबूल है !
मुझसे बेला केतकी की बात मत करो,
नीम का यह फूल भी आखिर तो फूल है !!
निश्चय ही यहाँ ग़ज़लकार की अभिव्यक्ति और अंदाज ध्यातव्य है।
श्री रंजन का ग़ज़लकार बहरों (छन्दों) का ज्ञाता प्रतीत होता है। तभी वह वस्तुवैशिष्ट्य के साथ ग़ज़ल की संरचना के प्रति सजग दिखता है और अपनी ग़ज़लों का सम्यक् रूपायन करता है। ‘जि़न्दगी’शीर्षक ग़ज़ल इस तथ्य का जीवन्त प्रमाण है -
स्वप्न के गाँव में हम हुए दर-ब-दर,
कौन बतलाएगा - अब पता जि़न्दगी ??
हम चले थे जहाँ से, वहीं हैं अभी,
अपना हासिल है बस रास्ता जि़न्दगी !!
रिश्ता काजर का सुन्दर करे आँख को,
हमको ऐसा दिखा आईना जि़न्दगी !! 
आदि।
ग़ज़ल में व्यक्तिगत शैली, ग़ज़लकार के निजी एवं सशक्त लहजे का विशेष महत्त्व है। श्री रंजन की ग़ज़लें इस निकष पर भी खरी उतरती हैं। कुछ उदाहरण विशेष ध्यातव्य हैं -
एक समुन्दर मैंने देखा तेरी आँखों में।।
शीशे का घर मैंने देखा तेरी आँखों में।।
गुमसुम मौसम, चुपचुप खुश्बू, सहमी हुई नदी,
एक दो-पहर मैंने देखा तेरी आँखों में।।
                                                                ........ ‘तेरी आँखों में’

हर चौराहा पीछा करते,
सुधियों का इतिहास मिला।।
...... ‘सन्दर्भों की बात नहीं’
टूटे हुए कगारों तुम भी,
सोच-सोच खुश हो लेना,
शायद कभी बाढ़ का पानी आए,
खालीपन पाटे।।
                                                          ........... ‘हथेली उगते काँटे’
इसी भाँति ‘आपात्काल में’, ‘कौन देखे पीछे मुड़ के’, ‘मौसमी बयार दिन’, ‘आप भी हम भी’, ‘जल उठे न’, ‘फूल ने कहा’ आदि शीर्षकों की गजलें अपनी नवता, नयी प्रतीकात्मकता युक्त ग़ज़लियत के लिए ध्यातव्य हैं।
कहा जा सकता है कि श्री रंजन की ग़ज़लें ‘हिन्दी गजल’के धरातल के साथ उसकी ‘टोन’ को भी उत्कर्षित करती दृष्टिगत होती हैं।
श्री रंजन की अकविताएँ और अगीत भी उनकी सूक्ष्म दृष्टि, उनकी कल्पनाशीलता, उनकी व्यंग्यात्मकता और उनकी चिन्तनशीलता का निदर्शन कराती हैं। इनमें उन्होंने विभिन्न कोटिक विसंगतियों और सामाजिक मानवीय सरोकारों को पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी इन कविताओं में आधुनिक ‘काव्य-भाषा’के दर्शन होते हैं। श्री रंजन की ‘स्वयं से’शीर्षक प्रथम अकविता ही इन तथ्यों को पुष्ट करती है। उसके एक-दो अंश यहाँ अवलोकनार्थ उद्धृत हैं-
क्या कभी सुनी तुमने
नदी की कलकल, फूलों की हँसी, भौंरों का गुनगुन;
रहे निहारते देर तक क्या कभी ---
चाँद ..... तारे ...... धरती ..... आकाश ?
बताओ कब-कब की तुमने किसी सच की तलाश ??
+ + + + +
मेरे भाई देखो/समझो ---
उपरि इंगित शब्दों की ध्वनि-प्रतिध्वनि,
लोक-शास्त्र के आवेक्षण-स्वर
सुनो-गुनो भाव-विभाव-अनुभाव की यति-गति
और भावक की नयत्वशील त्वरा।
होगा कवि वही
की साधना जिसने
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की अ-क्षरा।
श्री रंजन जीवन को बेहतरी के साथ जीना चाहते हैं। वे अपनी मुट्ठी में आकाश को समेट लेना चाहते हैं। यहाँ उनकी आकांक्षा के स्तर की ऊँचाई का ज्ञान होता है। वे अतीत और वर्तमान में मनसा विचरण करते हैं। वे समय को सहेजने अथवा अतीत को वर्तमान में साकार करने की संभावना को काव्यात्मकता से व्यक्त करते नजर आते हैं। उनकी निम्नांकित पंक्तियों से यह सुस्पष्ट है -
काश !
किताब की जगह मैं
औ..र, बेला-पँखुरी की जगह तुम
होते सक्षम समय को सहेजने में !
बना सकते हम भी, काश !
अतीत को वर्तमान ;
या फिर बनने ही न देते
तत्समय वर्तमान को रीता-तीता अतीत !!
श्री रंजन की ये अकविताएँ और अगीत प्रायः अपनी अनूठी काव्य-शैली का विबोधन करते हैं। वे कहीं प्रश्न-शैली का सहारा लेते हैं तो कहीं गद्य-गीतात्मकता का सहारा लेते हैं। इन सभी स्थानों पर उनके काव्य-चित्र भावक का ध्यान अपनी ओर बरबस आकृष्ट करते हैं, देखें -
प्रश्न शैली में काव्य-चित्र -
क्या-क्या की तुमने तैयारी ?
यम के घर जाने की
तुमने तय की कौन सवारी ??
क्या कर लिया था तुमने निर्मित ---
योग-ज्ञान का/कोई सक्षम तंत्र-वितन्त्र ?
                                                                             ...... ‘नचिकेता से’
गद्य-गीतात्मक शैली में काव्य-चित्र -
जिन क्षणों में मुखर थीं
वाचाल पहेलियाँ
घुटन ..... कुण्ठा ... त्रास से
कूजते मारण-मुखी अभिचार
जाने क्यों मुझको लगा
जीवित कहीं है जिजीविषा
ले लिया बढ़ कर सुपारी
खिलखिलाती रंगोली ने
मोहनी वितान में, यूँ,
औ....र, बस तब
सज गई
                                        इक नई दीपावली !!
                                                                         ........ ‘ले लिया बढ़ कर सुपारी !!’
निषेध-शैली में काव्य-चित्र -
मेरी आँख का पानी अभी मरा नहीं है
धीरज का बाँध मत तोड़ो !
तूफानी सैलाब अपनी तरफ मत मोड़ो !! 
                                                     ................. ‘चेतावनी’
ऐसे ही उनकी अकविता ‘सलाह’जीवन की सार्थकता को तलाशती, ‘इच्छाशक्ति-स्फुरण के लिए’ जिजीविषा का उद्बोधन करती, ‘जड़-चेतन’ उनके दार्शनिक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करती, ‘किताब’ जीवन की मंजिल तलाशती, ‘श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर : एक रेखाचित्र’ बहुचर्चित रामजन्मभूमि-मन्दिर के विवाद की प्रतिध्वनि को निनादित करती एवं तत्सम्बन्धी सचमुच के करणीय के परिदृश्य का आरेखन करती और ‘पिता से’अतीत के विश्रुत राजर्षि महामुनि विश्वामित्र के विजय-मंत्र की अभ्यर्थना करती दिखाई पड़ती है। इस खण्ड की अन्य कविताएँ भी गम्भीर हैं। वे कवि के दृष्टिकोण की विबोधिनी और उसकी युग-मूल्यों और राष्ट्र के प्रति चिन्ता का अभिज्ञान कराती दृष्टिगत होती हैं।
आशयतः श्री रंजन का ‘किर्चें’कविता-संग्रह वास्तव में एक गम्भीर, भाव-प्रधान, विचार-तर्क का संकुल और कवि की निजता-काव्यात्मकता से मण्डित कविता-नन्दन है जिसमें एक ओर तो गीत-नवगीतों का मनहर कुंज है तो दूसरी ओर ग़ज़ल-हिन्दी गजलों का महकता उपवन है, तो वहीं तीसरी ओर चुभनशील अकविता-अगीतों का शस्य श्यामल बाग है। एक लम्बे अन्तराल के बाद इनका यह संग्रह निश्चय ही काव्य-रसिकों को अनुभावन एवं अनुचिन्तन के लिए बाध्य करेगा, ऐसा मेरा मानना है। संग्रह की रचनाओं में प्रायः बौद्धिकता के दर्शन होते हैं। इनमें ‘हृदय-पक्ष’की तुलना में ‘बुद्धि-पक्ष’ की छाप अधिक दिखाई पड़ती है। संग्रह की समाज, राष्ट्र और आज के आदमियों की रहनी-सहनी, चिन्तना और कार्य-व्यवहार की विसंगतियों पर प्रहार करने वाली अनेक कविताएँ सभी भावकों और काव्य-प्रेमियों को पुनर्चिन्तन के लिए जागृत करती दृष्टिगत होती हैं। श्री रंजन के कवि रचनाकार ने यहाँ हिन्दी भाषा के संस्कारों को उत्कर्षित करने का पूरा प्रयास किया है। वह रचनात्मक समाज का आकांक्षी है, संग्रह की कविताएँ यह प्रमाणित करती हैं। कवि का ज्ञान-लोक गहन और व्यापक है, इसकी झलक भी संग्रह में दिखाई पड़ती है। शैली की निजता और कथ्य की मौलिकता के धनी अनुजवर श्री रंजन को ऐसे उत्कृष्ट संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई।
- डॉ0 गौरीशंकर पाण्डेय ‘अरविन्द’, 
                            संपा0 ‘शिक्षा-साहित्य’, पूर्व उपाचार्य, का0 सु0 साकेत पी0 जी0 कालेज अयोध्या-फैजाबाद
              
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कवि अपार काव्य-संसार का प्रजापति कहा गया है। उसकी अनुभूतियों की तीव्रता, सामाजिक चिन्तन-बोध तथा अभिव्यक्ति की क्षमता जो सजीव चित्रांकन करती है, वह समाज का दर्पण बन जाती है। प्रस्तुत कृति ‘दर्पण तीरे’ विजय रंजन रचित गजलों का काव्य-संग्रह है, जो उनकी काव्य-साधना को निरूपित करता है।
गजल अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है- प्रेमिका से वार्त्तालाप। यह अरबी-फारसी-उर्दू की एक विशेष काव्य विधा है जिसका अपना शास्त्रीय छन्दशास्त्र है। आज स्वभाव-परिवर्तन के साथ गजल कोठों से मैदान में आ चुकी है; तेवर बदल चुके हैं -
कोठों पर रो चुकी गजल है
दर्द बहुत पी चुकी गजल है
अब इसके तेवर बदले हैं
नया जन्म ले चुकी गजल है।
आज गजल सारी विसंगतियों को चुन-चुन कर अपना वर्ण्य-विषय बना रही है। वह गुस्से में भी है; चुपचाप सितम सहन करने के मूड में नहीं है। 
हिन्दी में भारतेन्दु युग के पूर्व से ही गजल-लेखन का शुभारंभ हो चुका था। हिन्दी के विकास के साथ यह विधा भी विकसित होती रही। छायावाद काल में गजल का स्वरूप व्यवस्थित ही नहीं समृद्ध भी हुआ। अद्यावधि गजल की अभिव्यक्ति का साम्राज्य गाँव-गरीब से लेकर सत्ता के ठिकाने तक फैला है। 
गजल की समझ रखने वाला शायद ही कोई कवि बचा हो जिसने गजल लिखने का प्रयास न किया होगा। नित्य नये प्रयोग भी हो रहे हैं किन्तु चुुनौतियाँ भी बड़ी हैं। इस दृष्टि से गजल-संग्रह ‘दर्पण तीरे’ अपनी बात कहने और समाज को आईना दिखाने में बहुत हद तक समर्थ है। 
‘दर्पण तीरे’ के गजल गो विजय रंजन सिद्ध साधक और माँ शारदा के वरद पुत्र हैं। वे पद्य ही नहीं, बहुत अच्छा शोधपरक गद्य भी लिखते हैं। अपनी साहित्य-साधना को लेकर वे साहित्य जगत् में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 
भाषायी कट्टरता के वे हिमायती भी नहीं हैं। ‘दर्पण तीरे’ की गजलों में लोकभाषा के साथ उर्दू तथा संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के शब्दों का संतुलित प्रयोग करने में वे नहीं चूके हैं। अन्योक्तियों, वक्रोक्तियों तथा मुहावरों के माध्यम से भी उन्होंने अपनी बात जनसामान्य तक पहुँचाने की कोशिश की है। 
उन्होंने नौसिखिये अप्रातिभ गजल लिखने वाले कवियों पर भी प्रहार किया है। 
जाति और मजहब से ऊपर उठकर कवि की रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर मुखर है। 
इतिहास को भी बडी खूबसूरती के साथ वर्तमान से जोडने में उनकी रचनाएँ सफल हैं। 
‘दर्पण तीरे’ में कवि की निर्भीकता और सचबयानी ही उसकी कलम की ताकत है; पौरुष और पुरुषार्थ ही उसका सत्य है, जो जीवन को रंगों और उमंगों से भर देता है।
पाठक जब कृति में प्रवेश करेंगे तो मेरी बात से अवश्य सहमत होंगे। 
मैं गजल संग्रह ‘दर्पण तीरे’ का स्वागत करता हूँ और रचनाकार को बधाई देता हूँ। 

                          -डॉ॰ रामसहाय मिश्र ‘कोमल शास्त्री’ 

(साहित्य-भूषण ,  फिराक सम्मान   से सम्मानित)

                               आशा निलयम् ,  इन्द्रलोक कालोनी, शहजादपुर अकबरपुर, अम्बेडकर नगर-224122 (उ॰प्र॰),     दूरभाष: 9628588015

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सुप्रसिद्ध चिन्तक-विचारक और चर्चित त्रैमासिक ‘अवध अर्चना’ के संपादक श्री विजय रंजन से हिन्दी-साहित्य जगत् बखूबी परिचित है। वे हिन्दी गजल के सुपरिचित हस्ताक्षर भी हैं। उनकी गजलों की पाण्डुलिपि ‘दर्पण तीरे’ देखने का अवसर मिला जिससे यह ज्ञात होता है कि वे गजल के मिजाज को समझते हैं और हिन्दी की तत्सम शब्दावली को गजल जैसी विधा में प्रयुक्त करने में सिद्धहस्त हैं।
हिन्दी गजल का कथ्य जहाँ प्रेम, अध्यात्म और जनचेतना के विस्तार के लिए जाना जाता है, वहीं वह तत्सम शब्दावली और देशज मुहावरेवाली भाषा के लिए भी जानी जाती है। यही विशेषता उसके शिल्प को समृद्ध करती है। विजय रंजन जी की गजलें तत्सम शब्दावली से सजी तो हैं ही, उनमें भारतीय संस्कृति की झलक भी रोचक ढंग से विद्यमान हैं। पौराणिक और साहित्यिक संदर्भ भी उनमें देखने को मिलते हैं। उनके कथ्य में प्रेम और उद्बोधन के अतिरिक्त युगबोध और कविधर्म का प्राचुर्य है, तो शिल्प की दृष्टि से नये-नये तुकांत और रदीफ भी मिलते हैं। इससे उनकी गजलों की चमक बढ़ जाती है। उनके यहाँ, जो रदीफ हैं, वे चौंकानेवाले ही नहीं हैं, अर्थपूर्ण भी हैं, जैसे ‘माचिस की तीली’, ‘जब तब कहती एक गजल’, ‘मेरे राम जी उसको भी’, ‘एक फूल के जैसा’, ‘मैंने देखा तेरी आँखों में’, ‘ओ पंडित जी !’ तुकांत में भी अर्थपूर्ण प्रयोग हैं, जैसे ‘तत्कार’, ‘झंकार’, ‘कंकर’, ‘व्यंजन-स्वर’, ‘रहिमन’। 
हिन्दी गजल की खूबसूरती इसी में है कि उसमें नये तुकांत और रदीफ आएँ और बोलचाल के शब्दों के उसके डिक्शन में उर्दू की जगह तत्सम के वे शब्द स्थान लें जिनमें देसीपन और रवानी हो और जो व्यंजना को विस्तारित कर सकें। इस लिहाज से विजय रंजन जी की गजलें आश्वस्त करती हैं और हिन्दी के गजलकारों के लिए एक नए पथ का निर्माण करती हैं। कुछ शेर देखिए....
* जल उट्ठे तो पल ही में, स्वाहा कर देती है,
  जले मगर कैसे बिनु ठोकर, माचिस की तीली।।

* जीवन की परतीति कराओ, मेरे राम जी उसको भी,
 राह मुक्ति की कोई सुझाओ, मेरे राम जी उसको भी।।

* कैसे पहचाने बेचारा-- ‘मई दिवस’ के  पीले फूल,
      ‘मई दिवस’-खूबी समझाओ, मेरे राम जी उसको भी।।

* गाँव...गली...नगर...जिला, एक फूल के जैसा,
  तुम चलाओ सिलसिला, एक फूल के जैसा।।

* युग की अब तो सुनो पुकार, ओ पंडितजी !!
  कुछ तो खुद में करो सुधार, ओ पंडितजी !!

* राग असावरि बहुत दिनों से, रहे बजाते,
  सुन लो परभाती-झंकार, ओ पंडितजी !!
यहाँ, यह जान लेना आवश्यक है कि राग असावरी में कोमल स्वरों का प्रयोग होता है और वह दिन के दूसरे प्रहर में गाया जाता है। गजलकार ने सूक्ष्म संकेत में सांस्कृतिक जागरण की बात कही है और समाज में खाए-पिए-अघाए लोगों द्वारा जमायी हुई पाखण्डी प्रवृत्ति पर प्रहार भी किया है। गजल में ऐसा प्रयोग मैं पहली बार देख रहा हूँ।
इसी गजल में एक तुकांत प्रयोग हुआ है- प्रेमचन्द-तत्कार। ‘तत्कार’ का अर्थ गूढ़ है। यह कथक नृत्य में लय से सम्बन्धित है, जो पैर से चलने से सधती है। शेर प्रेमचन्द की कहानी ‘मोटेराम शास्त्री’ को संदर्भित करता है। इस कहानी में प्रेमचन्द ने जिस तौर पर पाखण्ड की खिल्ली उड़ाते हुए यह स्थापना दी थी कि अब साहित्य का रुख क्या हो ? वह तौर इस शेर में न केवल समाहित हो गया है, बल्कि यह शेर यह भी कह रहा है कि आज स्थितियाँ और दुर्वह हो रही हैं। शेर देखिए......
  काश ! न आएँ आज सामने मोटू शास्त्री,
   बदली प्रेमचन्द-तत्कार, ओ पण्डित जी !!
शायर का ऐतिहासिक संदर्भों को देखने का अलग-ही दृष्टिकोण मिलता है। एक शेर देखिए........
कोसल, लंका, वैशाली के सत्-तम-रज-इतिहास,
   हर इक खण्डहर मैंने देखा तेरी आँखों में।
अब उस गजल का मत्ला देखिए, जिस पर कृति का शीर्षक आधारित है। यह चिन्तन-मनन को प्रेरित करता है-
    आ पहुँचे जाने-अनजाने, दर्पण - तीरे,
  आओ, अब खुद को पहचानें, दर्पण - तीरे।।
काव्य का कार्य पाठकों या श्रोताओं को आत्मचिन्तन हेतु प्रेरित करना होता है जो उसमें समुचित प्रबोधन के समावेश से सम्भव होता है। विजय रंजन जी की गजलों में अनेक ऐसे शेर हैं जो इन बातों को बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत करते हैं। दो शेर देखिए जो बहुत ही छोटे मीटर में सरल शब्दों में हमें आशावान् बनने और गतिमय रहने की प्रेरणा देता है। इनकी दृश्यात्मकता और ध्वन्यात्मकता भी द्रष्टव्य है-
    सूरज निकला, फूल हँसे है, 
    तुम बैठे क्यों, गुमसुम होकर ?
    चलते रहो, चलो तुम, आओ,
   नदिया कहती हहर-हहर कर।।
साहित्यिक परिवेश से निकले दो शेर देखिए जो शायर के चरित्र और शायरी के औचित्य को जैसे परिभाषित करते हैं-
कबिरा, तुलसी, प्रेमचन्द से कब तक आँख चुराओगे ??
गीत निराला जैसा कोई, बोलो, तुम कब गाओगे ?? 
पढ़ करके दो-चार किताबें, नई गजल तुम कहते हो,
दीन-दुःखी का दर्द न लिखते, क्या शायर कहलाओगे ??
कविता वह चाहे गजल ही क्यों न हो, उसमें न केवल युगीन बोध का आना आवश्यक है, बल्कि कवि को ऐसी अभिव्यक्तियाँ देनी होती हैं जिससे उसके कवि-कर्म को सार्थकता मिले। जीवन के संघर्ष को लेकर शायर की अभिव्यक्ति देखिए--
* यह कैसी आजादी, रामराज्य लाने में।।
   संविधान कैद हुआ, उनके आशियाने में।

*  सिर कहीं औ’ धड़ कहीं पर जा पड़े,
   जिन्दगी की रेल से हम कट गए जैसे।।

* हम  चले  थे  जहाँ  से वहीं हैं अभी,
   अपना हासिल है बस, रास्ता जिन्दगी ।
प्रेम मनुष्य को जीवनी-शक्ति देता है, लेकिन जब प्रेम में वह उष्मा न रह जाए अथवा जीवन-संघर्ष इतना बढ़ जाए, तो प्रेम का बिरवा सूख ही जाता है। हृदय की ऐसी अवस्था को चित्रित करते दो शेर देखिए....
* गाल गुलाबी, नयन कटीले, जाने कब से बिसर गए,
  अरसा बीता, मन के आँगन, महकी नहीं रात की रानी।

* मधुबन जाने कहाँ खो गया,
  राधा ने भी दर्पण बदले ।।
  सूर बन गए सारे सपने,
  तुलसी....मीरा...रहमन बदले।।
संग्रह में एक अवधी गजलें भी हैं जो अत्यंत रुचिकर हैं और पाठक को आस्वाद-परिवर्तन का आनंद देती हैं। एक नज्म भी है, जिसे ‘हिन्दी नज्म’ कहा गया है। हालाँकि ‘नज्म’ हिन्दी के ‘गीत’ का ही उर्दू नाम है, पर दोनों में विधागत भिन्नता है। जब कई शेर एक विषय पर केंद्रित होते हैं, तो उसे ‘नज्म’ कहा जाता है जैसा कि उर्दू में यह प्रचलित है, जबकि हिन्दी में ‘गीत’ का ढाँचा अलग प्रकार का होता है। रंजन जी की नज्म का कथ्य हमें आकर्षित करता है।
संग्रह की गजलें जहाँ भाषिक सौंदर्य से पगी हुई हैं, वहीं, उनमें छन्द-वैविध्य भी है, जिससे पाठक की रुचि सतत बनी रहती है। इनमें हिन्दी के जातीय छन्दों की प्रधानता है। वर्णिक छन्दों में भुजंगप्रयात भी कई स्थलों पर देखा जा सकता है। मात्रिक छन्दों में, संग्रह में 14 से लेकर 32 मात्राओं के छन्द देखने को मिलते हैं। इनमें जगण का प्रयोग कम-से-कम है, जिससे ये उर्दू विधान की दृष्टि से भी खरी उतरती हैं। इनमें मानव, विष्णुपद, सार, ताटंक, लावनी, कुकुभ और समान सवैया की प्रचुरता है। गजलकार ने ऐसा कर यह संकेत दिया है कि छन्द की दृष्टि से भी हिन्दी गजल को देखे जाने की आवश्यकता है।
संक्षेप में, ‘दर्पण तीरे’ यह सिद्ध करने में सफल है कि हिन्दी गजल का भाषिक पथ स्वतंत्र है, पर उसका कथ्य काव्य के प्रयोजनों को पूरा करने में सक्षम है। 
रचनाकार को मेरी शुभकामनाएँ !                    

     - राजेन्द्र वर्मा             

                                                                                                - 3/29 विकास नगर, लखनऊ-226022 
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‘हिन्दी गजल’ हिन्दी की आदिकालिक विधा है, जो खड़ी बोली के आदि कवि अमीर खुसरो की गजल ‘जब यार देखा नैन भर, दिल की चिन्ता गई उतर, ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर’ से अंकुरित होती हुई हिन्दी साहित्य के    मध्यकाल के संत कवि कबीर की गजल ‘हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या, रहे आजाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या’ जैसे गजल-बिरवों से विस्तार पाती हुई   आधुनिक काल के भारतेन्दु, बदरीनारायण उपाध्याय, प्रताप नरायन मिश्र, मैथिलीशरण गुप्त, विद्रोही कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के समय तक शाखामय और वर्ष 1961 में शमशेर बहादुर सिंह की ‘कुछ और कविताएँ’ शीर्षक से प्रकाशित कविता-संग्रह में संगृहीत सात हिन्दी गजलों से फलवती होती है और वर्ष 1975 में दुष्यन्त कुमार के गजल संग्रह ‘साये में धूप’ के बाद स्वयं नए प्रतिमानों के वृक्ष तैयार करने लगती है; उसका सीधा सम्बन्ध विचार और अभिव्यक्ति के साथ-साथ लोक के दुःख-दर्द से सरोकारित हो जाता है। इस संदर्भ में पùश्री गोपालदास ‘नीरज’, बालस्वरूप ‘राही’, ‘शलभ’ श्रीराम सिंह, शिव ओम ‘अम्बर’, चन्द्रसेन विराट, अदम गोण्डवी, डॉ॰ उर्मिलेश, हरेराम समीप, ज्ञानप्रकाश विवेक, अशोक अंजुम आदि नाम उभर कर आते हैं। इन्हीं में एक उल्लेखनीय नाम है    ‘अवध-अर्चना’ के सम्पादक एवं समाज को उच्च कोटि का साहित्य प्रदान करने वाले विजय रंजन का, जिनकी गजल-कृति ‘दर्पण तीरे’ पाठक के कर-कमलों में पहुँच रही है। इस कृति में 2 अवधी गजलों को जोड़ कर 62 गजलें हैं। एक नज्म भी है। लगभग सभी गजलें ‘छन्द’, ‘समान अक्षर’ या ‘अक्षरों से पूर्व आए वर्णों में स्वर साम्य’ और इसके बाद आए ‘शब्द या शब्द-समूहों से पुष्ट हैं, उन्हें उर्दू में ‘बह्र’, ‘काफिया’ और ‘रदीफ’ भी कहा जा सकता है। संग्रह की विशिष्ट उपलब्धि ‘शाम थोड़ी और....’ हिन्दी नज्म है। 
‘दर्पण तीरे’ की गजलों का आरम्भ ‘मेंहदी रचे हाथ से तुमने...’ गजल से होता है। इस गजल में प्रेम की पावनता है, सौन्दर्य-वर्णन है, बिंधी गजाला हिरनी की चीख है, प्रेम की पराकाष्ठा है। सौन्दर्य-वर्णन है तो मेंहदी रचे हाथ से ऋचा रच देने की शुचिता है। 
‘कालर सफेद रखना, रोटी के दो निवाले’ गजल जीवन में उच्चतम मूल्यों की स्थापना के लिए संघर्ष-पथ पर रत रहने के लिए प्रेरित करती है और सावधान भी-
“करना तुझे हवन है, कुछ दूर से हवन कर,
 ऐसा न हो हवन में, तू उँगलियाँ जला ले।।”
सत्य तो यह है कि रंजन जी का जीवन और साहित्य एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। जिन्दगी और गजल दोनों इस तरह से घुले-मिले हैं कि कहीं ‘जिन्दगी’ गजल का मार्ग प्रशस्त करती है, तो कहीं ‘गजल’ जिन्दगी को दिशा-निर्देश देती है। 
रंजन जी की गजलें शब्दों के छù नहीं ओढ़तीं, बल्कि सहज, सरल भाषा में गजलकार के अन्तर्मन की पूर्ण भावाभिव्यक्ति करती हैं। गजलकार प्रश्न करता है-
हमसे रहती है तू  क्यों खफा जिन्दगी ??
पहले  हमको  तू  इतना, बता जिन्दगी !!
वह आगे कहता है -
कितनी  दिलकश  है बन्दिश, तेरे सामने,
कैसे  तुझको  कहूँ ,  बेवफा जिन्दगी ??
उत्कृष्ट गजल का विशिष्ट गुण है ‘सांकेतिक प्रस्तुतिकरण’ अर्थात् ‘इशारों में बातें करना’। आँसू वेदना में भी आते हैं और अधिक गुदगुदी लगाने से भी आते हैं। गजलकार का नजरिया देखें -
“गुलमोहर के फूलों से तुम, नागफनी को मत सहलाओ,
मौसम को ऐसे मत छेड़ो, कोइ दूसरी गजल सुनाओ।।
सूरज चाँद सितारों को तुम, कैद कर सको तो अच्छा है। 
रो न पड़े भूखा भिखमंगा, इतना मत गुदगुदी लगाओ।।
इस श्रेणी में ‘...तुम भी लिखना, मैं भी लिखूँगा’, ‘बड़के साहब आप ही बोलें...’, ‘काश समझ लेते साहब भी...’, ‘तुम कह दो न...’ गजलें रखी जा सकती हैं।
गजलकार गाँव की सोंधी माटी की महक को नहीं भूलता। शे’र में उसकी तड़प देखी जा सकती है-
“हमरे भाई चले गए हैं, दिल्ली...बम्बे....लुधियाना,
शायद उनको मिल न सका, दौ कौर हमारे गाँव से।।”
यही तड़प ‘कैसा है ये शहर’ गजल में भी है-
“लहरें बिखरनी थीं--- ‘रंजन’, वे बिखरीं, 
आँख क्यों आई भर समन्दर किनारे।।”
रंजन जी आम मानव की भाँति जन्में हर मानव को हताशा, निराशा और अभावों में कभी न झुकने की सत्प्रेरणा देते रहे हैं। वे हर पल विवश व मूक सामाजिक जिन्दगी को भी शब्द व स्वर देते रहे हैं। उनकी गजलें मानव-जीवन की वेदना को पूरी तरह उभारने वाली और अन्तिम निर्णायक युद्ध तक सचेत रहने की प्रेरणा देने वाली हैं। ‘कमरे की छोटी खिड़की से भी...’ गजल के शे’र देखें-
“महलों के सौदागर हो, महल खरीदो बेचो,
झोपड़ियों की जिद्दत को, क्यों आए अजमाने ??
देशज मिट्टी और कलम को, बढ़ कर करो प्रणाम,
कहीं आन पर आ न जाएँ, ये भी सबक सिखाने।।”
इसी प्रकार, रंजन जी की सुदृढ़ लेखनी ज्वलन्त विषयों-- कुत्सित राजनीति, शोषण, उत्पीड़न, अभाव, संघर्ष, घुटन आदि युगीन विसंगतियों के चित्रांकन से नहीं चूकती। 
मुझे स्मरण है, उन्होंने हिन्दी गजल पर ‘अवध अर्चना’ का विशेषांक निकाला था। उस अंक में रंजन जी के ‘सम्पादकीय’ के साथ देश के कई विद्वानों के आलेख भी प्रकाशित हुए थे।  उसमें स्पष्ट कहा गया था कि एक साहित्य के व्याकरणिक मापदण्डों को दूसरे साहित्य के व्याकरण पर थोपना उपयुक्त नहीं है क्योंकि दोनों साहित्य एक ही समाज में रोपित, पल्लवित  और पुष्पित होते हुए भी परम्परा, लिपि और कहन-विशेष के  कारण व्याकरण एवं उच्चारण में विशिष्ट अन्तर रखते हैं। हाँ, प्रचलित एवं अन्तर्निहित शब्द अपवाद हो सकते हैं। जोधपुर से प्रकाशित ‘गजल गरिमा’ भी अपने हर अंक में हिन्दी गजल को हिन्दी छन्दानुशासन से पुष्ट रहने का ही समर्थन करती रही है। 
रंजन जी बलात् आयातित शब्दों के मोहजाल में नहीं फँसे, इसीलिए उनकी गजलें हिन्दीनुमा हैं, हिन्दीमय हैं और हिन्दी संस्कारों में पूरी तरह पली-पुषी व ढली हैं। इस तथ्य की पुष्टि में ‘कौन ठिकाना कब दल बदलू...’, ‘ता...थैय्या’, ‘खोज लेता मेरा कोलम्बस...’, ‘गीत सुनाए वीत राग का...’, ‘शून्य के घेरे...’, ‘नदिया कहती’, ‘कबिरा की झंकार’, ‘देखेंगे तुम अपनी कलम से...’, ‘पूजा के व्यंजन-स्वर’, ‘अभिशाप धो डाला’ और अन्य गजलें देखी जा सकती हैं। 
संग्रह की अवधी गजलें ‘अरे बड़कऊ’ एवं ‘रामभरोसे’ भी तीव्रानुभूतियों एवं संवेदनाओं से सिक्त हैं।
‘दर्पण तीरे’ की एक और विशिष्ट व अनोखी उपलब्धि है ‘शाम थोड़ी और...’ शीर्षक से रचित हिन्दी नज्म। शाम का ‘गहराना’, ‘गदराना’, ‘मुरझाना’, ‘ढल जाना’ और ‘अलकें लहराती रात का आना’ स्वप्न से जीवन्त चित्र पाठक को उस ऊँचाई पर ले जाकर रोमांचित करते हैं, जिस ऊँचाई पर जाकर रंजन जी नज्म की रचना करते हैं। इसीलिए इस नज्म से जो आनन्द रचनाकार को अपने सृजन में आता है, वही आनन्द पाठक को भी आता है। मेरे विचार से किसी रचना की सफलता भी यही है।
रंजन जी लब्ध-प्रतिष्ठ संपादक व साहित्यकार हैं। उन्होंने लगभग हर विधा में लेखन किया है। आपकी कृतियाँ चर्चित हैं। देश की अनेक संस्थाओं ने उन्हें पुरस्कृत एवं अलंकृत किया है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ ने भी उन्हें साहित्य-सेवा के लिए ‘साहित्य भूषण’ और उत्कृष्ट पत्रिका-संपादन के लिए ‘सरस्वती पुरस्कार’ से सम्मानित किया है। 
निश्चय ही गजल-संग्रह ‘दर्पण तीरे’ भी उनकी अन्य कृतियों की ही भाँति प्रसिद्धि पाएगा।

                        - डॉ॰ हरीलाल ‘मिलन’

                            300 ए/2, प्लॉट 16, 
                        दुर्गावती सदन, हनुमन्तनगर, 
                         नौबस्ता, कानपुर - 208021
                            दूरभाष: 9935299939






  

   
 



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