कहा है/लिखा है -
(विजय रंजन का कृतित्त्व प्रबुद्ध पाठकों की दृष्टि में )
* आपका हर लेख शोध-लेख होता है। आपको हर लेख पर पीएच0 डी0 मिल सकती है। वाल्मीकि-रामायण का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने के बाद ‘कविता क्या है’ भी आपकी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
-प्रो0 ललितमोहन पाण्डेय, सेवानि0विभागाध्यक्ष (अंग्रेजी), का0सु0साकेत महा0, फैजाबाद (उ0प्र0)
* राष्ट्रवाद तो हमारे संघ का एजेण्डा ही है। विजय रंजन इस विषय पर काम कर रहे हैं और उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ विषयक चार सौ से अधिक पृष्ठों की किताब तैयार की है जिसमें राष्ट्रवाद के लिए भारतीयता को आवश्यक बताया गया है। इसके लिए मैं श्री रंजन को बधाई देता हूँ।
- डाॅ0 अनिल मिश्र, प्रान्त कार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उत्तर प्रदेश, लखनऊ
* एक परिचित के यहाँ गया हुआ था। ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ वहीं देखी थी। पाँच-दस पेज वहीं पढ़ डाले। अपना लोभ संवरण नहीं कर सका। वह प्रति उनसे माँग कर मैं ले आया। मैंने पिछले चार दिन में पुस्तक पूरी पढ़ ली। जब तक पूरी किताब पढ़ नहीं ली, तब तक चैन नहीं आया।
वाल्मीकि-रामायण के बारे में इतनी सुन्दर आलोचना ! अपने 75 वर्षीय जीवन में मैंने अब तक नहीं पढ़ी। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, जर्मन, फ्रेंच और संस्कृत और भारत की तमाम भाषाओं के काव्यशास्त्रियों के सापेक्ष ‘वाल्मीकि’ और ‘रामायण’ का गहन अध्ययन-अनुशीलन ! अयोध्या-फैजाबाद में भी कोई ऐसी किताब लिख सकता है, यह जान कर मन गद्गद हो गया। आपने महर्षि वाल्मीकि की उपेक्षा देख कर एक जरूरी कर्त्तव्य का पालन सम्पन्न कर दिया है। हिन्दी जगत् में संभवतः पहली बार ऐसी कोई किताब सामने आई है। बहुत-बहुत बधाई।
- डॉ0 विश्वनाथदास शास्त्री, महन्त एवं सम्पा0 ‘तुलसीदल’ पत्रिका, अयोध्या-फैजाबाद
* तुलसी-साहित्य के आप मर्मज्ञ हैं। तुलसीदल पत्रिका से आपका जुड़ना आवश्यक है।
-डाॅ0 राजदेव मिश्र, पूर्व कुलपति, काशी विद्यापीठ, वाराणसी एवं प्रधान संपा0 ‘तुलसीदल’, फैजाबाद
* अवध-अर्चना के साथ-साथ आपके द्वारा सम्पादित फैजाबाद के नवकहानीकारों का संकलन ‘नवकहानियाँ’ और आपकी स्फुट रचनाएँ जो इधर-उधर प्रकाशित हो रही हैं और जिन्हें मैंने पढ़ा है, उनसे विश्वास जमता है कि फैजाबाद की साहित्यिक प्रभा में आप कुछ सितारे अवश्य जड़ेंगे।
-डाॅ0 राधिकाप्रसाद त्रिपाठी, सेवानिवृत्त प्रो0, का0सु0साकेत महाविद्यालय, फैजाबाद
* आपने भारतीय विद्वानों की काव्य-कसौटियों के साथ-साथ विदेशी विद्वानों की काव्य-कसौटियों के सापेक्ष भी वाल्मीकि रामायण का अति प्रशंसनीय तुलनात्मक अध्ययन (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ में) प्रस्तुत किया है। आप जैसा साहित्यसेवी ही ऐसी साहित्य-साधना कर सकता है।
- कैलाशचन्द्र मिश्र, सदस्य संवैधानिक एवं संसदीय अध्ययन संस्थान, उ0प्र0, क्षेत्रीय शाखा, लखनऊ (उ0प्र0)
* आपकी कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ वाल्मीकि-रामायण की महत्ता को समझने के लिए विश्वकोश की तरह सहायक है। इस विषय पर ऐसी कोई दूसरी पुस्तक पढ़ने को अब तक नहीं मिली।
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आपकी कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ तथा ‘रसवाद औ..र नयरस’ अपने-अपने विषय की विलक्षण पुस्तकें हैं। मैं रा0 म0 लो0 अवध वि0 वि0 की पाठ्यक्रम समिति के संयोजक के रूप में इन्हें संदर्भग्रन्थ के रूप में अनुशंसित कर रह हूँ। आशा है पुस्तकें समिति की आगामी बैठक में पाठ्यक्रम हेतु स्वीकृत कर ली जाएंगी।
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पुस्तक ‘कविता क्या है’ मिली। कविता से सम्बन्धित सभी पक्षों पर आपने विद्वत् विमर्श प्रस्तुत किया है। अध्येताओं के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।
- डाॅ0 अजीत कुमार सारस्वत, प्राचार्य बी0एन0के0बी0पी0जी0 कालेज अम्बेडकर नगर एवं संयोजक पाठ्यक्रम समिति हिन्दी डाॅ0 रा0म0लो0अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद
* साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण अति श्रेष्ठ कृति है। वाल्मीकि-रामायण का ऐसा तुलनात्मक अध्ययन व दार्शनिक मीमांसापूर्ण प्रस्तुतिकरण अन्यत्र दुर्लभ है। यह एक गम्भीर चिन्तनपरक कृति है जिसमें लेखक (वस्तुतः विद्वान् शोधकर्त्ता) का गहन श्रम समर्पित हुआ है। वाल्मीकि-रामायण का ऐसा तुलनात्मक अध्ययन व दार्शनिक मीमांसापूर्ण प्रस्तुतिकरण अन्यत्र दुर्लभ है। ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य में धैर्य, लगन, निष्ठा व समर्पण की निश्चित रूप से आवश्यकता होती है।
हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, जर्मन, फ्रेंच, संस्कृत और भारत की तमाम भाषाओं के (और साहित्य के भी काव्य-निकषों के) सापेक्ष ‘वाल्मीकि-रामायण’ की तुलनात्मक विवेचना व मीमांसा सच में प्रणम्य है। मैं विजय रंजन जी की साधना को प्रणाम करता हूँ।....
- प्रो0 (डाॅ0) शरदनारायण खरे, विभागाध्यक्ष, इतिहास, शासकीय महिलामहाविद्यालय मण्डला (म0प्र0)
- प्रो0 (डाॅ0) शरदनारायण खरे, विभागाध्यक्ष, इतिहास, शासकीय महिलामहाविद्यालय मण्डला (म0प्र0)
* आपकी कृति ‘रसवाद औ...र नय रस’ मिली थी। ‘कविता क्या है’ भी मिल गई। जो काम हम शिक्षकों का है, वह आप कर रहे हैं, सार्थक गम्भीर विवेचना। ये कृतियाँ छात्रों के लिए ही नहीं, हम शिक्षकों के लिए भी उपयोगी हैं। रसवाद में एक नवीन रस की प्रस्थापना। आजकल ‘रस’ पर ध्यान नहीं दिया जाता; समालोचकों की दृष्टि से यह लगभग बाहर है। लेकिन आपका श्रम सफल है।
- डाॅ0 वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी, बी0एच0यू0, वाराणसी (उ0प्र0)
- डाॅ0 वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी, बी0एच0यू0, वाराणसी (उ0प्र0)
* आपकी पुस्तक ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ बहुत पहले मिली थी। उस पर लिखना चाहती थी। लिख न सकी समय नहीं मिला। पुस्तक ‘रसवाद और नयरस’ देख रही हूँ। शिक्षा-क्षेत्र से जुड़े न होते हुए भी आप साहित्यिक समालोचना का गम्भीर कार्य सम्पन्न कर रहे हैं। पुस्तकें आपके गम्भीर अध्ययन और श्रम को प्रकट करती हैं। अवसर मिला तो आपकी कृतियों को उद्धृत करूँगी।
- डाॅ0 शशिकला त्रिपाठी, प्रोफेसर, लेखिका, वाराणसी (उ0प्र0)
- डाॅ0 शशिकला त्रिपाठी, प्रोफेसर, लेखिका, वाराणसी (उ0प्र0)
* आपने ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ बहुत मेहनत से लिखी है। फैजाबाद तो क्या आसपास के जिलों के डिग्री कालेजों के लेक्चरर-प्रोफेसर भी वाल्मीकि की ऐसी समीक्षा प्रस्तुत नहीं कर सकते। अत्यन्त ही उपयोगी और महत्त्वपूर्ण बन गई है किताब। साधुवाद !
-डाॅ0 एच0एन0मिश्र, विभागाध्यक्ष, अंग्रेजी विभाग, का0सु0साकेत महाविद्यालय, फैजाबाद (उ0प्र0)
* विषय अच्छा है। परिश्रम अद्भुत है। बहुत प्यारी किताब (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) है किन्तु इसकी भाषा कड़ी हो गई है। आगे किताब लिखें तो सरल भाषा में लिखें। मैं पत्रकार हूँ। साहित्य से ज्यादा पत्रकारिता की दृष्टि से कह रहा हूँ।
- हृदयनाराण दीक्षित (सदस्य विधानपरिषद, लखनऊ), लखनऊ (उ0प्र0)
* आपने बहुत दिन बाद याद किया। शायद ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ पर ही व्यस्त रहे होंगे। आपने काम ही इतना बड़ा उठा लिया, खुशी है कि अपना संकल्प सार्थक ढंग से पूरा कर लिया।
- वीरेन्द्र शर्मा (साहित्यकार, पूर्व भारतीय राजदूत, कजाखिस्तान), दिल्ली
- वीरेन्द्र शर्मा (साहित्यकार, पूर्व भारतीय राजदूत, कजाखिस्तान), दिल्ली
* वाल्मीकि और राम पर गम्भीर किताब है यह (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ )। क्या कोई और किताब लिखी गई है जिसमें ऐसी कम्पेरेटिव स्टडी हो ?
- आफताब रजा रिजवी (शायर/वरिष्ठ अधिवक्ता), फैजाबाद
- आफताब रजा रिजवी (शायर/वरिष्ठ अधिवक्ता), फैजाबाद
* आप बहुत सार्थक साहित्य-सृजन कर रहे हैं।
- डाॅ0 रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’, (कवि, प्रोफेसर), फीरोजाबाद (उ0प्र0)
* निश्चित रूप से दिख रहा है कि आपने इस कृति (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ ) में बड़ी मेहनत की है। आपकी मेहनत सार्थक भी है। वाल्मीकि पर कहीं अलग शायद ही इतना गम्भीर और सार्थक अध्ययन मिले।
- डाॅ0 के0 डी0 सिंह, विभागाध्यक्ष हिन्दी, लखनऊ वि0 वि0, लखनऊ (उ0प्र0)
* पुस्तक मिलने के दूसरे दिन ही मैंने अनेक पृष्ठ पढ़ डाले। पुस्तक अच्छी लगी लेकिन भाषा-शैली ‘रामायण’ से भी अधिक कठिन है। अच्छा होता, आपने सहज भाषा-शैली में लिखा होता।
- डाॅ0 सरला शुक्ल, लखनऊ वि0 वि0, लखनऊ
- डाॅ0 सरला शुक्ल, लखनऊ वि0 वि0, लखनऊ
* वाल्मीकि-रामायण की इतनी गम्भीर तुलनात्मक समालोचना के लिए आपके श्रम, लगन एवं अध्ययन को नमन। - डाॅ0 नित्यानन्द श्रीवास्तव, एसो0 प्रोफेसर, गोरखपुर (उ0प्र0)
* वाल्मीकि के नाम पर कविता के पूरे विश्व के भारतीयेतर एवं भारतीय विद्वानों को एक मंच पर खड़ा कर दिया है। कार्य श्रम-साध्य था लेकिन आप सफल है। बधाई। अवसर मिला तो विस्तार से लिखूँगा।
- डाॅ0 पुष्पपाल सिंह, (साहित्यकार, समीक्षक), पटियाला ( पंजाब )
- डाॅ0 पुष्पपाल सिंह, (साहित्यकार, समीक्षक), पटियाला ( पंजाब )
* मैंने आपकी पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) पढ़ ली। आपने कड़ी मेहनत की है। इस विषय पर शायद यह अकेली पुस्तक है। लेकिन भाषा सहज नहीं है और शब्दों को तोड़ कर लिखने के बजाय अच्छा होता कि आप प्रचलित शैली ही अपनाते। ध्यान उसी पर अटक जाता है।
- नन्द चतुर्वेदी (समालोचक साहित्यकार), उदयपुर (राजस्थान)
- नन्द चतुर्वेदी (समालोचक साहित्यकार), उदयपुर (राजस्थान)
* मैं साहित्यकार तो नहीं, लेकिन साहित्य में रुचि रखता हूँ। पढ़ता-लिखता रहता हूँ। मैंने तो फैजाबाद, गोण्डा ही नहीं लखनऊ तक के पुस्तकालयों में और दूकानों पर भी अब तक नहीं देखी ऐसी कोई किताब (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण सदृश पुस्तक) जिसमें देश-विदेश के इतने सारे साहित्य-मनीषियों के काव्य-सिद्धान्तों का ऐसा अध्ययन प्रस्तुत किया गया हो।
- (ह0 अपठनीय) अवस्थी (साहित्य-अध्येता), बलरामपुर (उ0प्र0)
* आपकी पुस्तक ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ मुझे कल ही मिली है। अभी पढ़ रहा हूँ। वैसे जितना पढ़ा है उसके आधार पर कह सकता हूँ कि एक आवश्यक विषय पर मेहनत से काम किया है आपने।
- डाॅ0 ललित शुक्ल (साहित्यकार), दिल्ली
- डाॅ0 ललित शुक्ल (साहित्यकार), दिल्ली
* पुस्तक (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’) में आपका गहन श्रम झलकता है। आपने बड़ी मेहनत की है।
- डाॅ0 शैलेन्द्र त्रिपाठी, हिन्दी विभागाध्यक्ष, विश्वभारती वि0वि0, शान्तिनिकेतन (प0 बंगाल)
* आपकी कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ की, आपके अध्ययन की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है।
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आपकी पहले वाली कृतियाँ (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘रसवाद औ..र नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’) क्या कम थीं कि एक और गम्भीर चिन्तन की ‘कविता क्या है’ रच डाली ! जो काम हम सब, जो हिन्दी से रोजी-रोटी कमा रहे हैं, नहीं कर सके, वह आप कर रहे हैं। कितनी बधाई दूँ ?
-डाॅ0 सुधा राय, हिन्दी विभाग, मनूचा बालिका पी0 जी0 कालेज, फैजाबाद
* ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ गम्भीर पुस्तक है। गम्भीर अध्ययन की माँग करती है। समय मिला तो समीक्षा लिख कर भेज दूँगी।
- डाॅ0 चन्द्रकला त्रिपाठी, प्रोफेसर, वाराणसी (उ0प्र0)
* कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ मेरे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। वर्षों से वाल्मीकि-रामायण पर एक शोध-ग्रंथ लिख रहा हूँ। इस कृति में जितने विस्तार से देश-विदेश के विद्वानों को विवेचित किया गया है, उससे निश्चित रूप से लाभान्वित होऊँगा। रामायण के हर शोधार्थी के लिए यह कृति उपयोगी है।
- डाॅ0 देेवीसहाय पाण्डेय ‘दीप’, दुराही कुआँ, फैजाबाद (उ0प्र0)
* वाल्मीकि-रामायण जहाँ आज अनेक घरों में उपलब्ध ही नहीं है, वहीं वाल्मीकि-रामायण पर इतना गम्भीर अध्ययन ! आपका प्रयास प्रशंसनीय है। बड़े ही तर्कपूर्ण ढंग से आपने वाल्मीकि को विश्व का श्रेष्ठतम महाकवि सिद्ध किया है, बधाई।
- रामजीत यादव, अधिवक्ता, शायर, फैजाबाद
* महाकवि वाल्मीकि पर आपकी मेहनत सार्थक है। आपने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
- डाॅ0 जरीन ‘नजर’, प्रधानाचार्या, मनूचा डिग्री कालेज, फैजाबाद
* आपकी तीनों कृतियाँ (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘रसवाद औ..र नय रस’) मेरे जैसों के लिए अनूठी कृतियाँ हैं। इनमें बहुत सामग्री है। रुचिकर भी ऐसी हैं ये, कि बिना पढ़े रहा नहीं जाता। आपने बड़ा ही श्रम किया है, इसमें सन्देह नहीं है। जो कहना चाहा है, उसे ऐसा लिखा है कि मानना ही पड़ता है। ऐसी किताबें आपको साहित्य का सच्चा साधक सिद्ध करती हैं।
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श्री विजय रंजन जी वाङ्मय की कालजयी और शास्त्रीय परम्परा के उत्कृष्ट सर्जक हैं जो काव्य, गद्य, सापेक्षिक समालोचना, सामाजिक चिन्तन के क्षेत्रों में शीर्ष स्तरीय लेखन में निष्णात हैं।
- विनोदशंकर चैबे, (सेवानिवृत्त आई0ए0एस0,), पूर्व अध्यक्ष आई0ए0एस0 एसोसिएशन, लखनऊ
* मैंने आपकी कृतियाँ देखीं ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘रसवाद औ...र नय रस’। तीनों एक से बढ़ कर एक। इतने गम्भीर विषयों पर कैसे लिख लेते हैं ! श्रम सराहनीय है।
- डाॅ0 एस0 के0 रघुवंशी, पूर्व गृहसचिव, उ0 प्र0 शासन, लखनऊ
* आपकी पुस्तकें ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ और ‘रसवाद औ..र नय रस’ पढ़ गया हूँ। आपका अध्ययन गहरा है। समग्रता में देखा जाए तो आपके सोच-विचार में नयापन है। निश्चय ही आपका लेखन प्रभावित करता है।
- डाॅ0 दामोदर दत्त दीक्षित, (लेखक, समीक्षक), लखनऊ
*यह (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) इस विषय पर शायद अकेली किताब है। वाल्मीकि-रामायण की ऐसी गम्भीर साहित्यिक समालोचना अन्यत्र दुर्लभ है।
- जगदीश श्रीवास्तव (कवि), सुल्तानपुर (उ0प्र0)
* पहली बार जब आपसे भेंट हुई थी तब यह नहीं जान पाया था कि आप इतना गहन गम्भीर अध्ययन करते हैं। वाल्मीकि की साहित्यिक श्रेष्ठता पर इससे बेहतर कोई काम अब तक देखने को नहीं मिला। तीन प्रतियाँ (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’) मानस भवन, भोपाल को भेज दीजिएगा।
- डाॅ0 ध्रुव शुक्ल, (कहानीकार, अपर निदेशक म0प्र0 सूचनालय), भोपाल (म0प्र0)
* आपको याद होगा कि संभवतः १९९६ में अवध-अर्चना के प्रथम वार्षिक समारोह में मैं भी सम्मिलित हुआ था। तबसे अवध-अर्चना को निकट से मैं देखता आ रहा हूँ। इसके बाद ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ और बाद में ‘रसवाद औ..र नयरस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ और अब यह कविता-विमर्श की अनोखी पुस्तक ‘ कविता क्या है’, सभी में गम्भीर जानकारी है। आपका श्रम बोल रहा है। साधुवाद।
- डाॅ0 विनोदचन्द्र पाण्डेय, पूर्व निदेशक, उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान लखनऊ
* आपने इसे (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) गम्भीर अध्ययन करने के बाद लिखा है। इसे जल्दी में पढ़ कर समाप्त भी नहीं किया जा सकता। भाषा सहज होती तो अच्छा रहता।
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मैं प्रयास कर रहा हूँ कि पूर्वापर का एक अंक कविवर स्वप्निल श्रीवास्तव पर और एक अंक आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर शीघ्र प्रकाशित किया जाए।
- डाॅ0 सूर्यपाल सिंह (संपा0 ‘पूर्वापर’ (हिन्दी त्रैमासिक), गोण्डा (उ0प्र0)
* विजय रंजन ने जिस विद्वत्तापूर्ण ढंग से वाल्मीकि-रामायण के विविध आयामों पर अपनी कलम चलाई है, उससे वाल्मीकीय कृति की महत्ता में अभिवृद्धि होती है। ........ कृति से प्रकट है कि लेखक अपने विविधतावादी व्यक्तित्व यानी अधिवक्ता, लेखक, वक्ता होने के साथ ही अपने मौलिक लेखन की विद्वत्ता की झलक का स्पष्ट अनुभव पाठकगण को करा देगा।
- बद्री नारायण तिवारी, संयोजक, मानस संगम, शिवाला, कानपुर (उ0प्र0)
* विजय रंजन पुराने लेखक हैं। अवध-अर्चना का सम्पादन बीसों वर्षो से कर रहे हैं। समालोचना के क्षेत्र में इनका प्रवेश अपेक्षाकृत नया है। इनकी अन्य कृतियों की समालोचना अनेक विद्वानों ने की है। मैं इनकी समालोचना की मुख्य कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ तक स्वयं को सीमित करूँ तो कहूँगा कि काव्य-समालोचना को नयवाद से जोड़ने का जो तर्क इस कृति में दिया गया है, वह वास्तव में काव्य का मूल आधार ही है। बिना न्याय के कोई कविता श्रेष्ठ नहीं हो सकती। नयवाद के नाम से वर्तमान काव्य-समालोचना में कोई वाद नहीं है। इस तरह श्री रंजन की कोशिश नई है लेकिन सराहनीय है।
- डाॅ0 रघुवंशमणि, समीक्षक, विभागाध्यक्ष (अंग्रेजी), किसान पी0जी0 कालेज, बस्ती (उ0प्र0)
* ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ और ‘कविता क्या है’ मुझे थोड़े समय पहले ही मिलीं। जितना पढ़ सका मैं उसके आधार कहूँगा कि कृतियाँ साहित्यिक गुणवत्ता से भरपूर हैं। अधिवक्ता और कवि होने के नाते कह रहा हूँ कि कृतियाँ प्रमाणित करती हैं कि विजय रंजन एक सफल अधिवक्ता और मनीषी कवि हैं, तभी वे इतनी तार्किक और गम्भीर साहित्यिक कृतियाँ रच सके।
- मथुरा प्रसाद सिंह ‘जटायु’, कवि/अधिवक्ता, सुल्तानपुर
* ‘कविता क्या है’ मैंने पढ़ा है। ऋग्वेद के उद्धरणों से आरम्भ करके देश-विदेश के सैकड़ों विद्वानों के मतों के आधार पर श्री रंजन ने कविता को नए ढंग से परिभाषित किया है। प्रयास सराहनीय है।
- डाॅ0 ओंकार त्रिपाठी, मिल्कीपुर, फैजाबाद
- डाॅ0 ओंकार त्रिपाठी, मिल्कीपुर, फैजाबाद
* बड़ी मेहनत की है आपने ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ पर। लेकिन आपकी समीक्षा कितना सही है, यह जाँचने के लिए आधी किताब पढ़ने के बाद वाल्मीकि-रामायण खरीद कर लाया लेकिन उसे पढ़ने के बाद भी आपकी किताब में जो फ्रेंच, जर्मन, अरबी, फारसी आदि के विद्वान् उपस्थित हैं, उन सबको कहाँ पढ़ पाऊँगा ? और सबको बिना पढ़े ईमानदारी से समीक्षा कैसे की जा सकती है ? बहरहाल, अच्छी किताब के लिए बधाई।
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‘रसवाद औ..र नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘कविता क्या है’ प्रस्तुत करके वास्तव में बहुआयामी लेखन के कर्मठ लेखक श्री विजय रंजन को जो कुछ करना था, उन्होंने कर दिया। गम्भीर विवेचना के साथ-साथ उन्होंने सोचने की नई दिशाएँ दी हैं। अब इनके कार्य को बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी, खास तौर पर नई पीढ़ी की है।
- डाॅ0 विनयदास, (संपा0 ‘इन्दु’ पत्रिका, समीक्षक), बाराबंकी (उ0प्र0)
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‘रसवाद औ..र नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘कविता क्या है’ प्रस्तुत करके वास्तव में बहुआयामी लेखन के कर्मठ लेखक श्री विजय रंजन को जो कुछ करना था, उन्होंने कर दिया। गम्भीर विवेचना के साथ-साथ उन्होंने सोचने की नई दिशाएँ दी हैं। अब इनके कार्य को बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी, खास तौर पर नई पीढ़ी की है।
- डाॅ0 विनयदास, (संपा0 ‘इन्दु’ पत्रिका, समीक्षक), बाराबंकी (उ0प्र0)
* ‘कविता क्या है’ आपकी सभी किताबों में सबसे मजबूत और सशक्त है। यह छात्रों से बढ़ कर शिक्षकों के लिए उपयोगी है। एक ही स्थान पर (कृति में) कविता सम्बन्धी सभी बातों की जानकारी मिल जाती है। देश-विदेश के विद्वानों का कविता सम्बन्धी विचार भी प्राप्त हो जाता है। यह एक ही कृति आपको अमर करने में सक्षम है।
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आपकी कृति ‘रसवाद औ....र नय रस’ के सम्बन्ध में एकाध स्थानीय लेखकों ने आपके लिए यहाँ तक कहा कि ‘आप आचार्य बनने की कोशिश क्यों कर रहे हैं ?’ मगर जो कार्य आप कर रहे हैं वह बड़े-बड़े कथित आचार्य भी नहीं करते।
- डाॅ0 विन्ध्यमणि त्रिपाठी, प्रवक्ता, सरायरासी, फैजाबाद
- डाॅ0 विन्ध्यमणि त्रिपाठी, प्रवक्ता, सरायरासी, फैजाबाद
* जीवन को हमेशा ठोस परिणाम के रूप में ही नहीं देखना चाहिए.....सात्विक आनन्द तो गहन रचनाधर्मिता से प्रकट होता है। जहाँ तक कविता का प्रश्न है, काव्य का प्रश्न है, कविता जीवन के विविध आयामों से प्रभावित होती है और जीवन के विविध आयामों को प्रभावित भी करती है। कविता हमेशा न्याय की बात करती है। निश्चित रूप से कविता न्याय से विलग नहीं रह सकती। साहित्य और न्याय को एकसाथ साध कर विजय रंजन ने नई प्रस्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं; साहित्य में ‘नयवाद’ को आगे बढ़ाया है; नय रस को प्रस्तावित किया है। विजय रंजन एक अधिवक्ता हैं और एक ईमानदार लेखक के लेखन में उसकी व्यवसायगत विशिष्टता आ ही जाती है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रतीत होता कि लेखक अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार नहीं रहा है। विजय रंजन जो कहना चाहते हैं उसे उन्होंने अनेक आधारों पर सिद्ध भी कर दिया है। जहाँ तक आचार्य बनने या न बनने का प्रश्न है, यदि कोई आचार्यत्त्व का कार्य करता है तो उसके पास ‘आचार्य’ की डिग्री है या नहीं, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। समालोचना की दिशा में कविता के निकष में नयवाद, काव्यरस में नयवाद-- ऐसी प्रस्थापनाएँ नई हैं। लेकिन इन्हें जिस तर्कसम्मत ढंग से प्रस्तुत किया गया है, उन्हें कोई इकबारगी खारिज नहीं कर सकता। ऐसी प्रस्तुतियाँ विचारणीय बन गई हैं। ‘कविता क्या है’ में भी विजय रंजन का श्रम, ज्ञान और तर्कसम्मतता साफ दिखती है। मेरी शुभकामनाएँ।
- डाॅ0 के0 सी0 लाल, समीक्षक, लेखक, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
- डाॅ0 के0 सी0 लाल, समीक्षक, लेखक, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
* अद्भुत पुस्तक (कविता क्या है) है। इस पर कुछ न कुछ जरूर लिखूँगा।
- अरुण कमल, (कवि, पूर्व सम्पा0 ‘आलोचना’ हिन्दी पत्रिका), पटना (बिहार)
* ‘कविता क्या है’, मैंने पूरी पढ़ ली है। कृति सराहनीय है। हमारे वाङ्मय पीठ कोलकाता से इसी कृति के आधार पर आपको ‘साहित्य शिरोमणि’ सम्मान शीध्र प्रदान किया जाएगा।
- प्रो0 श्यामलाल उपाध्याय, कोलकाता (प0 बंगाल)
* ‘कविता क्या है’ पुस्तक नहीं, एक नई दृष्टि है।
- डाॅ0 रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ (साहित्य-भूषण), लखनऊ
* ‘कविता क्या है’ बड़ी अद्भुत किताब है। काफी मेहनत से आपने लिखा है। बधाई !
- डाॅ0 सूर्यकुमार पाण्डेय, लेखक, पत्रकार, लखनऊ
*आपकी कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ मेरे लिए अनिवार्य है। आपके श्रम, अध्ययन और साहित्यिक निष्ठा पर इस पंक्तिकार का निम्नस्थ शे’र मुनासिब लगता है-
आप आ गए हैं तो क्यूँ हैं, इतना बोझल से,
बल मुझे भी मिलता है, आपके मनोबल से।
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‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ किताब को हरेक को पढ़ने की जरूरत है। भारत, भारतीयता पर यह नायाब किताब है। आपको इस किताब को भारत सरकार तक पहुँचानी चाहिए।
- डाॅ0 मधुर नज्मी, निदेशक, काव्यमुखी अकादमी, मऊ (उ0प्र0)
* ‘कविता क्या है’ के अभी 15-20 पृष्ठ ही पढ़ पाया हूँ। अद्भुत कृति है। इस पर झटके से नहीं लिखा जा सकता। अवसर मिलते ही पढ़ कर विस्तार से लिखूँगा।
- डाॅ0 करुणाशंकर उपाध्याय, विभागाध्यक्ष (हिन्दी) मुम्बई, विश्वविद्यालय, मुम्बई (महाराष्ट्र)
*आपने श्रीनाथद्वारा सम्मेलन में मुझे ‘कविता क्या है’ दी थी। वापसी में काफी कुछ पढ़ गया था। आपने जो लिखा है, वह तो कविता के बारे में सारी धारणाएँ बदल देने वाला है। वास्तव में कविता मनमाना प्रलाप नहीं है; उसमें सुविचार होना ही चाहिए। आपकी प्रस्थापनाओं से सहमत हूँ।
- डाॅ0 हरीलाल ‘मिलन’, कवि, लेखक, कानपुर (उ0प्र0)
* ‘कविता क्या है’ मुझे कविता-विमर्श की विलक्षण पुस्तक लगी। इसमें आपका श्रम, आपकी विद्वता झलकती है। मैं बहुत प्रभावित हुआ।
- डाॅ0 राधेश्याम सिंह, प्रो0, के0 एन0 आई0 सुल्तानपुर
* ‘कविता क्या है’ किताब मिल गई है। अभी सरसरी नजर से ही देख पाया हूँ। धीरे-धीरे पढ़ूँगा। आपकी मेहनत दिख रही है। बहुत कुछ सीखने को मिलेगा मुझे इस किताब से।
- पंकज त्रिवेदी, सम्पादक, ‘विश्वगाथा’, सुरेन्द्रनगर, गुजरात
* आप लिखते-पढ़ते रहते हैं, यह तो मालूम था लेकिन बहुत गम्भीर विषय पर लिखते हैं यह ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ को देख कर आज मालूम हुआ।
- शीतला सिंह, सम्पा0 ‘जनमोर्चा’, फैजाबाद
* ‘कविता क्या है’ का ‘कविता : मिथकीय आधारों पर’ वाला अध्याय ही बता रहा है कि कृति में कविता की विवेचना मूल से की गई हैं। - डाॅ0 चक्रधर नलिन, (साहित्य-भूषण), लखनऊ
* आपकी कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की पाण्डुलिपि मैंने पढ़ ली है। यह बहुत गम्भीर विमर्श की कृति है। आपका श्रम सार्थक है।
- नन्दल हितैषी, निदेशक, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद (उ0प्र0)
* अवध-अर्चना और पत्रिका तुलसीदल में मैंने आपका लेखन देखा। बहुत प्रभावित हूँ। हिन्दी भाषा और साहित्य तथा भारतीय संस्कृति के प्रति आपके योगदान के आधार पर मैं अखिल भारतीय हिन्दी भाषा सम्मेलन, भागलपुर की ओर से ‘साहित्य मार्त्तण्ड’ के सारस्वत सम्मान से आपको विभूषित कराने के लिए प्रयासरत हूँ।
- राधा सिंह, महामंत्री, अखिल भारतीय हिन्दी भाषा सम्मेलन, भागलपुर (बिहार)
* फैजाबाद से वापसी पर आपकी पुस्तक (‘कविता क्या है’) रास्ते भर मैं और डाॅ0 किरण मिश्र देखते रहे। बड़ी मेहनत की है आपने। मेहनत सफल है। बधाई !
- डाॅ0 ओमप्रकाश तिवारी, ब्यूरो प्रमुख, दैनिक जागरण, मुम्बई (महाराष्ट्र)
* आपने बहुत अच्छे ढंग से कविता सम्बन्धी विविध प्रश्नों को उठाया है। कविता सम्बन्धी जो भारतीय दृष्टि है, होनी चाहिए, उसे बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत किया है। बधाई !
- डाॅ0 भारत यायावर, (लेखक, समीक्षक, संपा0 ‘प्राची’ पत्रिका), जबलपुर (मध्य प्रदेश)
* आपकी ‘कविता क्या है’ पहली दृष्टि में ही गम्भीर विवेचनात्मक पुस्तक लगती है। इसे गहराई से पढ़ने की आवश्यकता है। - यश मालवीय, (कवि, साहित्यकार), इलाहाबाद (उ0प्र0)
* आपकी कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ पर कुछ लिखना मेरे बस का नहीं है। इतनी सामग्री है कि बड़े से बड़ा अध्येता भी चकरा जाएगा। + + + ‘कविता क्या है’ के बहाने कविता को भारतीय परम्पराओं से जोड़ने का आपका प्रयास सराहनीय है।
- महेश पुनेठा (समीक्षक, साहित्यकार), पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड)
- महेश पुनेठा (समीक्षक, साहित्यकार), पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड)
* किर्चें कविता-संग्रह कई वर्ष पहले आपने दिया था। अब मैंने पढ़ा। उसमें कई कविताएँ ‘बोलती कविताएँ’ हैं। संग्रह से एक कविता ‘जनमोर्चा’ के ‘बोलती कविता’ स्तम्भ में प्रकाशित करने के लिए ले रहा हूँ।
- कृष्णप्रताप सिंह, कार्यकारी संपा0, ‘जनमोर्चा’, फैजाबाद
* आपकी किताब (कविता क्या है) मैंने दो बार पढ़ी है। आप विश्वास नहीं करेंगे कि मैंने नोट्स भी बना लिए हैं। उस पर लिखना चाहता हूँ सहमति-असहमति का प्रश्न अलग है। लेकिन ‘कविता क्या’ को आपने बहुत अच्छे ढंग से समझाया है, अपने ढंग से। आपकी मेहनत साफ झलकती है।
- डाॅ0 कुमार अनुपम, साहित्य अकादमी, दिल्ली
*‘कविता क्या है’ जैसी कृति जीवन भर की कमाई को निचोड़ कर ही लिखी जा सकती है, फिलहाल इतना ही कहूँगा आपका श्रम सार्थक दिखता है कृति में।
- डाॅ0 ओमप्रकाश सिंह, विभागाध्यक्ष, के0 एन0 आई0 सुल्तानपुर (उ0प्र0)
* आपकी कृति ‘कविता क्या है’ मिल गई। आपने कविता के प्रत्येक पक्ष की गवेषणा की है। पुस्तक बहुत उपयोगी है, पसन्द आई। समीक्षा अवसर मिलते ही विस्तार से लिखूँगा।
- डाॅ0 चन्द्रभाल सुकुमार (गजलकार, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति), वाराणसी (उ0प्र0)
* ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ साहित्य-समालोचना को नई दिशा देने वाली गम्भीर कृति है। इस पर सतही ढंग से चर्चा नहीं की जा सकती। गम्भीर चिन्तन करना होगा। आपने जितनी गहराई से मनन चिन्तन करके लिखा है, उतनी गहराई तक जा पाना आसान नहीं है।
- डाॅ0 मिश्कात आबिदी, प्रवक्ता, अलीगढ़ (उ0प्र0)
*कल दोपहर में प्रतापगढ़ में सम्मान-समारोह के बाद आपने किताब (कविता क्या है) दी थी। वापसी में दिल्ली तक की यात्रा में देर रात्रि तक जाग कर पूरी किताब पढ़ डाली। अद्भुत किताब है। ‘कविता क्या’ के सभी पक्षों पर आपने भारतीय और भारतीयेतर विद्वानों के मत एकत्र कर दिए हैं। इन मतों की विवेचना भी अति गम्भीर है। आपने कविता की जो नई परिभाषा दी है, उससे सौ प्रतिशत सहमत हूँ।
- डाॅ0 कपिलदेव मिश्र, सेवानिवृत्त कमिश्नर, नई दिल्ली
- डाॅ0 कपिलदेव मिश्र, सेवानिवृत्त कमिश्नर, नई दिल्ली
* पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) का मुखपृष्ठ और अनुक्रमणिका ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि वाल्मीकि-रामायण का अध्ययन आपने शोध-दृष्टि से किया है। शेष, पुस्तक पढ़ने के बाद बताऊँगी।
- डाॅ0 माधुरीबाला यादव, एसो0 प्रोफेसर, कानपुर (उ0प्र0)
* ‘कविता क्या है’ में आपका गहन अध्ययन आपका गम्भीर श्रम साफ दिखता है । आ0 शुक्ल, डाॅ0 नामवर सिंह ने एकाध अध्याय ही लिखा था परन्तु आपने कविता के सभी पक्षों की विवेचना की है। श्रम सफल है।
- डाॅ0 बजरंग बिहारी तिवारी, नई दिल्ली
* साहित्य-प्रेमियों को जो साहित्य की समग्र समालोचना और अध्ययन के सिद्धान्त तथा अनुशीलन की खोज में हैं, उन्हें जरूर इस पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण ) को पढ़ना चाहिए। निश्चित ही जैसा कि भूमिकाकार विद्वानों ने पुस्तक में लिखा है, लेखक विश्वकोष को अपनी वर्तनी की स्याही में घोल कर चला है। उसके अध्ययन और अनुशीलन की सामथ्र्य चमत्कारी है।
-- प्रभुदयाल मिश्र, भोपाल (म0प्र0)
* ‘कविता क्या है’ कोई साधारण पुस्तक नहीं बल्कि शोध-ग्रंथ है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी कविता के इतने ढेर सारे पक्षों पर काम नहीं किया होगा। पुस्तक ‘रसवाद औ..र नय रस’ में एक नवीन रस प्रस्तावित करके आपने रसवाद की एक बहुत बड़ी कमी दूर करने का कार्य किया है। श्रम सार्थक है। अभी व्यस्त हूँ। समय मिलते ही समीक्षा लिख कर भेजूँगा। + + + + समीक्षा अभी लिख नहीं पाया लेकिन मैं आपके लेखन का सम्मान करता हूँ। आपका लेखन है ही ऐसा। + + + + + कार्याधिक्य के कारण बहुत व्यस्त हूँ। फैजाबाद आने पर आपसे भेंट करना चाहता हूँ लेकिन हर बार मन में कसक रह जाती है। आपके लेखन की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। + + + + +‘कविता क्या है’ तीन-चार बार पढ़ चुका हूँ। कविता-विमर्श पर इससे अच्छी पुस्तक मैंने नहीं पढ़ी। आपने तो कोई अनुरोध भी नहीं किया लेकिन जहाँ तक मुझे याद पड़ रहा है, आचार्य शुक्ल का इसी नाम का लेख, डाॅ0 विश्वनाथ त्रिपाठी की इसी नाम की पुस्तक और आपकी यह कृति को मैंने अवध विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में संदर्भग्रंथ के रूप में जोड़ने की अनुशंसा कर दी है। अन्तिम रूप से स्वीकृति पाठ्यक्रम समिति की आगामी बैठक में मिल जाएगी।
- प्रभाकर मिश्र, हिन्दी विभागाध्यक्ष, आ0 नरेन्द्रदेव पी0 जी0 कालेज, बभनान-गोण्डा (उ0प्र0)
* आपकी पुस्तक ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ के बाद अब ‘कविता क्या है’ भी मिली। मैंने एक ही बैठक में पढ़ डाली। यह पुस्तक भी शोध-ग्रंथ ही है। पुस्तकें विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में रखवा दी हैं।
-डाॅ0 जितेन्द्र श्रीवास्तव, प्रोफेसर, इग्नू , दिल्ली
* आपकी पुस्तक (कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व) मुझे मिल गई है। अभी पूरी नहीं पढ़ सका हूँ। आपने काव्यालोचना के सिद्धान्तों को नए ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रयास अच्छा दिख रहा है। ऐसी पुस्तक जल्दबाजी में पढ़ी-समझी नहीं जा सकती। पूरी पुस्तक पढ़ कर समीक्षा लिखूँगा।
- ए0 अरविन्दाक्षन, प्रोफेसर, कवि, काव्य-समीक्षक, पलक्कड, केरल
* ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ काव्य-समालोचना की बहुत गम्भीर पुस्तक है। समीक्षा लिख रही हूँ। - डाॅ0 नीतू शर्मा, एसो0 प्रोफेसर, आईजाबेला थोबर्न महिला कालेज, लखनऊ
*‘कविता क्या है’ में कविता के विभिन्न पक्षों पर आपने अच्छा विवेचन किया है। इसके विभिन्न अध्यायों की विषयवस्तु पर और इसी आधार पर स्वयं आप पर भी शोध कराया जाना चाहिए।
- डाॅ0 जितेन्द्र कुमार सिंह, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, किशनगढ़, राजस्थान
*अरे वाह ! कविता पर इतनी अच्छी किताब (कविता क्या है) ! यह तो शोध-ग्रंथ है !
- डाॅ0 के0 एम0 मालती, एसो0 प्रोफेसर, कक्कमचेरी, कालीकट, केरल
* पूरी किताब (कविता क्या है) पढ़ ली। मेरे विचार से आपने कविता के सारे पक्षों की विवेचना की है। बहुत जानकारी भरी किताब है। इससे बहुत प्रेरणा भी मिल रही है। अवसर मिला तो इसका अनुवाद मैं अवश्य करूँगा।
- एम0 रंगैय्या ‘अनुवादश्री’, (कवि, तेलुगु अनुवादक), सिकन्दराबाद (आन्ध्र प्रदेश)
* समीक्षा के लिए प्राप्त आपकी पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण, लेखक विजय रंजन) पुस्तकालय में (Accession N0. 109624/31.1.2013 ) रखवा दी गई है।
- अवैतनिक सचिव, भण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे (महाराष्ट्र)
*वाल्मीकि को आजकल कौन पढ़ रहा है ? लेकिन आपने वाल्मीकि पर भी इतना गहरा अध्ययन किया। शोध-ग्रन्थ (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) लिखने के लिए बधाई।
- डाॅ0 अशोक श्रीवास्तव, अध्यक्ष, सजपा, फैजाबाद
* श्री विजय रंजन के अधिवक्ता और साहित्यकार दोनों रूपों से मैं लम्बे अर्से से परिचित हूँ। वे जितने अधिक प्रखर अधिवक्ता हैं उससे अधिक प्रखर साहित्यकार हैं। लगभग 24 वर्षों से वे ‘अवध-अर्चना’ नामक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में इन्होंने मौलिक सोच वाली कई पुस्तकें हिन्दी जगत् को प्रदान की हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में उनका मौलिक, तार्किक चिन्तन प्रतिबिम्बित है।
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पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) का पन्ना-पन्ना बता रहा है कि गहरे अध्ययन के बाद इसे आपने बड़े परिश्रम और लगन से लिखा है।
- डाॅ0 निर्मला सिंह, भाजपा-नेत्री, पूर्व अध्यक्ष, नगरपालिका, फैजाबाद
* वाल्मीकि पर श्रम-साध्य कार्य करने के बाद अब ‘कविता क्या है’ जैसा शोध-ग्रंथ ! सराहनीय है आपकी साहित्य-साधना।
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श्री विजय रंजन राजनीति से अलिप्त रह कर वे अनवरत साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक साधना की अलख जगाए हुए हैं। इनकी कृति साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण और कविता क्या है साहित्य-जगत् में काफी चर्चित रही हैं। अभी हाल ही में मैंने श्री रंजन की शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद की मूल प्रति पढ़ी है। निश्चय ही यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी।
- जयशंकर पाण्डेय, प्रदेश सचिव, समाजवादी पार्टी (उ0प्र0) लखनऊ
* वाल्मीकि पर इतना अच्छा काम ! आपकी पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण) आचार्य नरेन्द्र देव पुस्तकालय में रखवा दूँगा।
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विजय रंजन, मेरी जानकारी के अनुसार, विगत 50 से अधिक वर्षों से सांस्कृतिक, सामाजिक सरोकारों वाले साहित्य की साधना कर रहे हैं। श्री रंजन की अनेक कृतियाँ विशेषकर ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘कविता क्या है’ और ‘रसवाद और नय रस’ साहित्य जगत् की अमूल्य निधियाँ हैं। इनकी नवीनतम कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की पाण्डुलिपि भी मैंने देखी है। उसमें व्यक्त अभिमतों के पक्ष-विपक्ष से स्वयं को अलग रखते हुए भी कहना चाहूँगा कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी सन्दर्भों में कुतुबनुमा सदृश है यह कृति।
- निर्मल खत्री, पूर्व सांसद, अयोध्या-फैजाबाद संसदीय क्षेत्र, पूर्व राज्यमंत्री उ0प्र0 शासन, लखनऊ, पूर्व अध्यक्ष: उ0 प्र0 कांग्रेस कार्यसमिति, लखनऊ (उ0प्र0)
*40 वर्षों से अधिक समय बीता जब मुझसे श्री विजय रंजन का परिचय हुआ था। तब वे एक साप्ताहिक अवध-अर्चना का प्रकाशन-संपादन करते थे। तब से अब तक वे अनवरत साहित्य-साधना करते चले आ रहे हैं। रामनवमी 1995 से वे इसी नाम की त्रैमासिक पत्रिका का लगातार संपादन कर रहे हैं। श्री रंजन किसी राजनैतिक दल से जुड़े नहीं हैं फिर भी राष्ट्रीय विचारधारा वाले सांस्कृतिक, शैक्षिक, समाजसेवी साहित्य का सृजन कर रहे हैं। भारतीय राष्ट्रवाद नाम की इनकी एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रेस में है। इसकी पाण्डुलिपि मैंने देखी है। फैजाबाद-रत्न 2018 से विभूषित श्री विजय रंजन को स्थानीय, प्रदेशीय, राष्ट्रीय स्तर के अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है जिनका समाचार अक्सर ही समाचार-पत्रों में पढ़ने को मिलता रहता है। श्री रंजन उ0प्र0 हिन्दी संस्थान के माध्यम से भी दो बार सम्मानित किए गए हैं। निश्चय ही वे जो कार्य कर रहे हैं, उसके आगे सारे सम्मान फीके हैं।
- वेदप्रकाश गुप्त, विधायक (भाजपा), अयोध्या-फैजाबाद
* किताब ‘कविता क्या है’ वास्तव में पढ़ने वाली किताब है। आपने कविता को समझाने के लिए बड़ी मेहनत की है। - ओमप्रकाश वर्मा, जिला संयोजक, बसपा, फैजाबाद
*मैंने पूरी किताब पढ़ डाली। वाल्मीकि-रामायण की ऐसी तुलनात्मक समीक्षा मेरी जानकारी में किसी और ने नहीं लिखी।
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अभी तक आपकी पहचान कवि, कहानीकार और गम्भीर समालोचक की है। आपकी कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि अब आपकी पहचान एक गम्भीर विचारक लेखक की बन जाएगी।
- उमाशंकर श्रीवास्तव ‘अंकल’ (कवि, अभियन्ता), फैजाबाद
*यह पुस्तक (भारतीय राष्ट्रवाद) राष्ट्रवाद की अवधारणा का सुविवेचनात्मक अध्ययन कराती है। विजय रंजन की यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद पर लिखे गए साहित्य में अपना उच्च स्थान बनाने में सफल होगी-- यही कामना है और यही विश्वास है।
- आचार्य डाॅ0 मनोज दीक्षित, कुलपति डाॅ0 रा0म0लो0 अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद
* (अवध-अर्चना में प्रकाशित) राष्ट्रवाद के ऊपर लेख विचारोत्तेजक है, अच्छा हो कि वामपंथी विचारक इसमें उठाई गई आपत्तियों पर अपने तर्क मय साक्ष्य प्रस्तुत करें और यह विचार राष्ट्रव्यापी चिन्तन का विषय बनें ताकि सच्चाई सामने आ जाए। - संजीव गौतम, आगरा
* राष्ट्रवाद और इतिहास पर मैंने आपका लेख कल पढ़ा। इतनी जानकारी अन्य लेखों में कहाँ मिलती है। बधाई भरी प्रतिक्रिया देने के लिए विवश हो गया हूँ ! - आनन्द बिल्थरे, बालाघाट, म॰ प्र॰
* आपका कविता का क ख ग... लेख मैंने बहुत पहले पढ़ा था। तभी से आपके लेखन का प्रशंसक हूँ।
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आपकी यह पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) भी गहन गम्भीर है। यह भारत विषय के पाठकों के लिए विशेष उपयोगी है। आपने बड़ा ही कठोर श्रम किया है। ऐसी पुस्तक लिखने के लिए बधाई। -डाॅ॰ ओंकारनाथ द्विवेदी, के0 एन0 आई0 सुल्तानपुर
* विजय रंजन का एक लेख ‘राष्ट्रवाद आवश्यक क्यों’ मैंने पढ़ा, अच्छा लगा, मैंने उसे अपनी पत्रिका ‘मंगलप्रभा’ में प्रकाशित भी किया था। श्री रंजन की कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की पाण्डुलिपि देख कर लगता है कि वह बिरवा अब बड़ा भारी वृक्ष बन गया है। ऋग्वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत से लेकर जैन ग्रंथ, बौद्ध ग्रंथ और आज तक के देशी-विदेशी विद्वानों के राष्ट्रवाद सम्बन्धी विचार इस ग्रंथ में समेट कर श्री रंजन ने राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय जीवन के लिए आवश्यक सिद्ध कर दिया है। इसके लिए इन्हें हार्दिक बधाई।
- डाॅ0 जनार्दन उपाध्याय, पूर्व विभागाध्यक्ष (हिन्दी), का0सु0साकेत पी0जी0 कालेज फैजाबाद
* विजय रंजन की कृति ‘रसवाद औ..र नय रस’ रस-भेद में नवान्वेषण करती है और रस-सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में रस के एक नवीन भेद ‘नय रस’ की तार्किक स्थापना प्रस्तुत करती है। काव्यशास्त्रीय चिन्तकों ने समय-समय पर रस के नवीन भेदों की कल्पना की है। अतः लेखक का आग्रह भी ध्यातव्य है, उपेक्षणीय नहीं।
- डाॅ0 शोभा सत्यदेव, सेवानिवृत्त, प्रवक्ता, हिन्दी विभाग, का0सु0साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फैजाबाद
* कहीं नहीं है कोई दूसरी ऐसी पुस्तक ( ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ जैसी पुस्तक ) जिसमें वाल्मीकि-रामायण का इतना गम्भीर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया हो। बहुत-बहुत बधाई।
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फैजाबाद के साहित्यिक परिदृश्य में साहित्यकार विजय रंजन एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी पहचान कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, निबन्धकार, आलोचक, सम्पादक, शोधकर्त्ता आदि अनेक रूपों में होती है। अपनी प्रखर आलोचना तथा गहन शोध-दृष्टि के कारण वे साहित्य-जगत् को सदैव नए-नए तथ्यों तथा मौलिक स्थापनाओं से समृद्ध करते रहे हैं। ‘रसवाद औ..र नय रस’ विजय रंजन की रसशास्त्र सम्बन्धी मौलिक कृति है। कृतिकार ने बारहवें रस के रूप में ‘नय’ रस को स्थापित किया है, जो उसकी मौलिक उद्भावना है। उन्होंने ‘नय’ रस की स्थापना कर रसशास्त्र में एक नया अध्याय जोड़ा है। यहाँ कृतिकार विजय रंजन रसशास्त्र के महान् आचार्यों की परम्परा में खड़े दिखाई पड़ते हैं। ‘नय’ रस विजय रंजन की मौलिक खोज है, जो वस्तुतः न्याय का रस है, जिसका सूत्र इन्हें वाल्मीकीय रामायण से प्राप्त हुआ है। उनकी मौलिक दृष्टि से निःसन्देह रसशास्त्र को एक नई दिशा मिलेगी।
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कृति ‘रसवाद औ..र नय रस’ में प्रस्तावित नवीन न्यायशास्त्रीय ‘नय रस’ की सम्प्रस्तुति से विगत 500 वर्षों से लगभग यथास्थान अवरुद्ध ‘भारतीय रसवाद’ की जड़ता दूर हुई है।
- डाॅ0 सत्यप्रकाश त्रिपाठी, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बी0 एन0 के0 बी0 स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अकबरपुर-अम्बेडकरनगर (उ0प्र0)
*सार्थक कार्य कर रहे हैं आप। कविता-कहानी के बजाय अब ऐसी ही (‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ सदृश) सारवान् समीक्षात्मक कृतियाँ लिखिए।
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श्री विजय रंजन ने रस-सिद्धान्त का नया निवर्चन किया है। रस-चिन्तन को बल्कि समूचे काव्यशास्त्रीय विमर्श को इधर अनुपयोगी, अस्तु उपेक्षणीय विषय मान लिया गया है। पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त यह प्रयोजनीय नहीं प्रतीत होता। इसका प्रमुख कारण यह है कि काव्यशास्त्र विशेषतः रस-सिद्धान्त का नवीकरण नहीं किया गया है। एक काव्यांग के रूप में रस-निष्पत्ति की युगसापेक्ष समीक्षा अपेक्षित थी, जो डाॅ0 नगेन्द्र और डाॅ0 कथूरिया के ग्रन्थों के बाद इस कृति (‘रसवाद औ..र नय रस’) में परिलक्षित होती है। विद्वान् लेखक ने इसमें एक नए रस ‘नय’ रस की स्थापना की है। प्रथमद्रष्टया परम्परावादी आचार्य इस पहल से असहमत हो सकते हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि भरत के रस-सूत्र द्वारा प्रवर्तित ८ रसों से बढ़ते-बढ़ते हम ११ रसों तक मध्यकाल में (१६वीं शती तक) पहुँच गए थे। इस बीच जीवन-जगत् में जो परिवर्तन आया है, उससे कई रस-परिकर उपस्थित हो गए हैं। उन्हें भी व्याख्यायित करने की आवश्यकता है। विजय रंजन ने वही कार्य सत्साहसपूर्वक किया है। लेखक ने ‘नय’ रस की निष्पत्ति, उसके उपादान और पक्ष-प्रतिपक्ष पर सप्रमाण चिन्तन किया है, जो हमें पुनश्चिन्तन के लिए आमन्त्रित करता है। मेरा आग्रह है कि रस की उपादेयता और प्रासंगिकता की रक्षा करने हेतु इन स्थापनाओं पर विचार-विमर्श करना समकालीन साहित्य-सर्जना एवं शोध-समीक्षा के वृहत्तर हित में होगा।
- डाॅ0 (प्रो0) सूर्यप्रसाद दीक्षित, सेवानिवृत्त आचार्य एवं अध्यक्ष हिन्दी तथा आधुनिक भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
* पुस्तक (कविता क्या है) को आदि से अन्त तक पढ़ने पर महसूस हुआ कि विजय रंजन जी ने गहन अध्ययन और सर्वेक्षण किया होगा, तब इतनी सामग्री जुटा पाए होंगे। कविता की जाँच-परख के लिए एक विशेष दृष्टि चाहिए, जो लेखक के पास है। कविता को श्रेणी में रखना, उसकी सीमाएँ निर्धारित करना, उनका वर्गीकरण करना एक मुश्किल काम है। पर लेखक ने यह काम बखूबी किया है। काव्य में सत्, शिव, सुन्दर के साथ-साथ ऋत् तत्त्व और नय तत्त्व, लोकसंग्रह और लोकहित जैसे तत्त्वों का समावेश आवश्यक बताते हुए लेखक द्वारा स्वयं अपनी ओर से कविता की एक नवीन परिभाषा भी प्रस्तुत की गई है।... विदेशी कवियों के उदाहरण देकर इस पुस्तक के फलक को एनसाइक्लोपीडिया सदृश और अधिक विस्तार दिया है लेखक ने। इससे ‘कविता क्या है’ कविता का एनसाइक्लोपीडिया बन गई है। लेखक का यह प्रयास न केवल पुस्तक को पठनीय, संग्रहणीय बनाता है, साथ ही वह पाठकों के हृदय के करीब कविता को पहुँचाने में सफल भी है। विशेषकर विद्यार्थियों, शोधार्थियों के लिए परम उपयोगी है यह पुस्तक।
- शारदालाल, कहानीकार, समीक्षक, गोकरननाथ रोड, डालीगंज, लखनऊ
* कृति:‘कविता क्या है’ में लेखक ने अपने विचारों के साथ देश-विदेश के प्रसिद्ध काव्यज्ञों के विचारों को भी रखा है। इस दृष्टि से कृति के उत्तरार्चिक का अध्याय ‘कविता: काव्यज्ञ-लोकमत के आधार पर’ उल्लेखनीय है। ‘कविता क्या है’ से काव्य-अध्येता अवश्य ही प्रेरणा लेंगेे और अपनी काव्य-ऊर्जा को प्रज्ज्वलित कर साहित्य-सृजन में अग्रसर होंगे। -अजिता त्रिपाठी, विश्वभारती, शान्ति-निकेतन, प0 बंगाल
*‘कविता क्या है’ मात्र एक पुस्तक नहीं है, अपितु मनीषी विजय रंजन जी द्वारा कविता पर लिखा गया शोध-ग्रन्थ है जिसमें अनेक कोणों से कविता को परखा गया है। अनेक लेखकों की चर्चा, अनेक काव्य-कृतियों की मीमांसा, अनेक उद्धरणों से विषय को विस्तार प्रदान किया गया है। ....पुस्तक की भाषा परिनिष्ठित और शैली बहुत अच्छी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक है। भावों के प्रकटीकरण में शब्दों की वाक्यावलियाँ अनुकरणीय हैं। लेखक का गहन अध्ययन उनकी विद्वत्ता की छाप छोड़ जाता है। इस अमूल्य कृति के द्वारा विजय रंजन जी ने हिन्दी-साहित्य को समृद्ध किया है। बहुत अच्छी कृति है। अपरिमित ज्ञानवर्धन हेतु इसे पुस्तकालयों में भी रहना चाहिए। - डाॅ0 ऊषा चौधरी, लखनऊ
* ‘कविता क्या है’ कविता का बहुआयामी विमर्श है। इस कृति में कविता-विमर्श महज एक आलोचक का निरा चिंतन नहीं लगता है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस आलोचक के अन्दर में जो कवि बैठा हुआ है वह बहुत सावधानी से सहत्राब्दियों की काव्य-परंपरा को खँगाल रहा है। इतिहास और वर्तमान के बीच उसकी आवाजाही सृजनात्मक संदर्भों का चयन करते हुए उन्हे एक ‘कोश‘ की शक्ल देना चाहता है।
-डाॅ0 ब्रजेश, संपा0 ‘सृजन-संवाद’, लखनऊ
-डाॅ0 ब्रजेश, संपा0 ‘सृजन-संवाद’, लखनऊ
* प्रोफेसर डाॅ0 भरत प्रसाद जी ने आपकी पुस्तक (‘कविता क्या है’) दी है मुझे। समीक्षा लिख रहा हूँ। पुस्तक के हर अध्याय में आपने गहन शोध प्रस्तुत किया है। पढ़ कर कविता सम्बन्धी दृष्टि को नई दिशा मिल जाती है। मैं सर (डाॅ0 भरतप्रसाद) से कहूँगा कि पुस्तक के विषयों पर शोध कराएँ। पुस्तक हिन्दी के छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है ।
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विजय रंजन कई वर्षों से साहित्य के लगभग सभी विधाओं में सक्रिय रहे हैं। पिछले दिनों इनकी पुस्तक ‘कविता क्या है’ मेरे हाथ लगी। यह पुस्तक काव्यालोचना को नई दृष्टि प्रदान करती है। पुस्तक में एक ऐसी ताकत है कि वह पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती है। यह पुस्तक केवल एक नहीं, कई मायनों में महत्वपूर्ण है। विजय रंजन की यह पुस्तक कविता के रहस्यों से पर्दा हटाकर पाठक को एक नई दिशा प्रदान करती है। आलोचना, कहानी और उनकी अन्य प्रकाशित पुस्तकों पर नजर दौड़ाई जाए तो यह जान पड़ता है कि कविता के तत्व और गूढ़ रहस्य सब जगह उनके साहित्य में विद्यमान हैं। विजय रंजन की यह पुस्तक सिद्धांत और व्यवहार दोनों में खरी उतरती है। ...साहित्य में एक नए तरह की आलोचकीय भाषा और नए तेवर को अभिव्यक्त करती यह आलोचनात्मक पुस्तक अपने आप में अद्वितीय है। कुल मिलाकर यह कहा जाए तो ज्यादा सटीक होगा कि यह पुस्तक साहित्यिक लोकधर्मी चेतना का नया प्रतिमान है।
विजय रंजन कई वर्षों से साहित्य के लगभग सभी विधाओं में सक्रिय रहे हैं। पिछले दिनों इनकी पुस्तक ‘कविता क्या है’ मेरे हाथ लगी। यह पुस्तक काव्यालोचना को नई दृष्टि प्रदान करती है। पुस्तक में एक ऐसी ताकत है कि वह पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती है। यह पुस्तक केवल एक नहीं, कई मायनों में महत्वपूर्ण है। विजय रंजन की यह पुस्तक कविता के रहस्यों से पर्दा हटाकर पाठक को एक नई दिशा प्रदान करती है। आलोचना, कहानी और उनकी अन्य प्रकाशित पुस्तकों पर नजर दौड़ाई जाए तो यह जान पड़ता है कि कविता के तत्व और गूढ़ रहस्य सब जगह उनके साहित्य में विद्यमान हैं। विजय रंजन की यह पुस्तक सिद्धांत और व्यवहार दोनों में खरी उतरती है। ...साहित्य में एक नए तरह की आलोचकीय भाषा और नए तेवर को अभिव्यक्त करती यह आलोचनात्मक पुस्तक अपने आप में अद्वितीय है। कुल मिलाकर यह कहा जाए तो ज्यादा सटीक होगा कि यह पुस्तक साहित्यिक लोकधर्मी चेतना का नया प्रतिमान है।
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मैंने आपकी कहानी ‘हुड़ुकचुल्लू’ अक्षर पर्व में पढ़ी। कहानी बहुत ही सहज स्वाभाविक से लगने वाले चरित्र, कथाक्रम समेटे हुए है। लगता है, सबकुछ आसपास घटित हो रहा है। गम्भीर समालोचना के साथ-साथ इतना अच्छा कहानी-लेखन भी करते हैं आप, मैं यह सोच कर अचम्भित हूँ ।
- डाॅ0 सुनील, नेहू, शिलांग (मेघालय)
- डाॅ0 सुनील, नेहू, शिलांग (मेघालय)
* समालोचना कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘रसवाद औ..र नय रस’ के बाद ‘कविता क्या है’ जैसे गम्भीर एवं चिन्तनशील विषय पर विजय रंजन ने महत्त्वपूर्ण विचारों को संकलित कर जिस प्रकार कविता के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला है, वह एक आश्वस्ति देने वाला है जबकि वर्तमान समय में यह चिन्ता की जाती है कि कविता क्यों और किसके लिए लिखी जाए।
- उदयप्रताप सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, लखनऊ
* पूरी पुस्तक (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) से महसूस हो रहा है कि आपने वाल्मीकि को गम्भीरता से और अभिनव-दृष्टि से परखा है।
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विजय रंजन के कविता-संग्रह ‘हाशिये से’, ‘किर्चें’ का साहित्य-जगत् में स्वागत हुआ। आपकी समालोचनात्मक कृतियाँ ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘रसवाद औ..र नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ और ‘कविता क्या है’ भी महत्त्वपूर्ण हैं। कहानी संग्रह ‘सूरज की आग’ के बाद ‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह हमारे सामने है। ... कहानी संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की १८ कहानियों में इन्द्रधनुषी रंगों के कई-कई बिम्ब उभरते हैं, जो एक ओर संवेदनाओं के अनेक गवाक्ष खोलते हैं तो दूसरी ओर भाषा-शैली, शिल्प की दृष्टि से कहानी के पारम्परिक बिम्ब को तोड़ते हुए नए बिम्ब का मानक स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
-डाॅ0 अमिता दुबे, सहा0 निदे0 उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान, लखनऊ
* विजय रंजन का ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ अद्भुत शोधपरक ग्रन्थ है। इसमें सबकुछ नई दृष्टि से कहा गया है। यह असाधारण कार्य है। गहन समीक्षात्मक अध्ययन के उपरान्त लेखक ने प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय वाङ्मय के संदर्भ में वाल्मीकि-रामायण को देखा है। इसमें अनेक दुर्लभ तथ्य प्रस्तुत हैं। वाल्मीकि-रामायण की इतनी खुली और तुलनात्मक समीक्षा अन्यत्र दुर्लभ है।
- डाॅ0 अनुज प्रताप सिंह, विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, आर0 आर0 पी0 जी0 महाविद्यालय अमेठी (उ0प्र0)
* ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ का मैंने अध्ययन किया। आपने दि0 4 नवम्बर को हिन्दी संस्थान में जब पुस्तक मुझे दी थी तो सत्य कहूँ तो आप और इस ग्रन्थ के प्रति वो श्रद्धा कतई मेरे मन में नहीं थी जो अब इसके अध्ययनोपरान्त मेरे अंतःस्थल में जागृत है। सचमुच, आपने तो बहुत ही बड़ा कार्य किया है इस ग्रन्थ को रच कर। आपने विभिन्न उद्भट विद्वानों और उनकी कृतियों का बहुत ही गहनता और विद्वतापूर्ण अध्ययन किया है और हिन्दी ही नहीं वरन् अन्य भाषाओं के ग्रन्थों का भी। वाल्मीकि-रामायण के माहात्म्य का वर्णन कहीं भी भावविभोर होकर आस्था के वशीभूत होकर नहीं, बल्कि तार्किकता, विद्वता, चिन्तन-मनन, और तुलनात्मक दृष्टिकोण को अपना कर किया गया है।
मैं आपको और आपकी लेखनी को शत-शत नमन करता हूँ और इतने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के प्रणयन पर आपको कोटिशः बधाईयाँ और शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ। पुस्तक निश्चित रूप से अति उपयोगी है। पूर्वाग्रही डॉ0 नामवर सिंह जैसों के सम्बन्ध में तो आपने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है। दरअसल इन जैसों को हमारे यहाँ आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया जाता है न, इसीलिए ये अपनी विद्वत्ता कुछ ज्यादा ही झाड़ने लगते हैं। सम्भव हो तो इस पुस्तक की एक प्रति उन्हें भी अवश्य भिजवाएँ।
- अशोक पाण्डेय ‘अनहद’, लखनऊ
* आपके कुशल सम्पादन में ‘अवध-अर्चना’ विभिन्न आलेखों, कविताओं एवं अन्य स्तम्भों से भरपूर अपनी गुणवत्ता और विविधता को शत-प्रतिशत संजोने में सक्षम रहती है। मेरी इसके प्रकाशन के लिए हृदय से शुभकामनाएँ।- अशोक पाण्डेय ‘अनहद’, लखनऊ
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‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुमूल्य ग्रन्थ है एवं अवश्यमेव पठनीय है।
- रजनी सिंह, डिबाई, बुलन्दशहर (उ0प्र0)
*‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ कृति में लेखक ने वाल्मीकि-रामायण की साहित्यशास्त्रीय समीक्षा प्रस्तुत की है। लेखक का विवेचन एवं विश्लेषण बौद्धिक निकष पर सराहनीय हैं। यह आलोचना-कृति आलोचना-जगत् के लिए वाल्मीकि-रामायण के सन्दर्भ में नए-नए निष्कर्ष प्रस्तुत कर रही है। पाठक अपनी सोच को परम्पराओं से हट कर परिवर्तित करने को बाध्य होंगे। यही नहीं, लेखक ने अपने निष्कर्षों को तथ्यों एवं कथ्यों के सन्दर्भ में बिल्कुल डटकर नवीन धरातल पर प्रस्थापित किया है। समग्र कृति और नए-नए आलोचनात्मक मानदण्ड सराहनीय बन पड़े हैं। - डाॅ0 महेश दिवाकर, मुरादाबाद (उ0प्र0)
*विजय रंजन का साहित्य न केवल गुणवत्ता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है बल्कि अपनी बहुआयामिता और विविधता के कारण भी विशिष्ट है। वे केवल मर्म को छूने वाले एक संवेदनशील कवि और यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़े कवि-कहानीकार ही नहीं हैं बल्कि ‘अवध-अर्चना’ नाम की जानी-पहचानी पत्रिका के स्वनामधन्य सम्पादक भी हैं। किन्तु उनकी साहित्य-साधना के मूल में कविता है जिसे वे रचते हैं, महसूस करते हैं और उसको तत्त्वतः और मूलतः जानने और समझने का प्रयास भी करते हैं। दरअसल ‘कविता क्या है’, उनके लिए कोई शास्त्रीय उपक्रम नहीं, बल्कि यह प्रश्न रक्त की तरह उनकी धमनियों में बहता है। कविता को उसकी समग्रता में रीझ-बूझ लेने की छटपटाहट उन्हें शास्त्र की परम्पराओं से लेकर अद्यतन अवधारणा-जगत् तक की यात्रा के लिए विवश करती है। ..उनकी यह कृति यह गहन वैचारिक मंथन की उदात्त परिणति है। .. ‘कविता क्या है’ काव्य-चिन्तन का वह तीर्थ है जिसके घाट पर बैठ कर अवगाहन करते हुए आप कविता के सम्पूर्ण वैचारिक परिदृश्य का अन्तरंग साक्षात्कार कर सकते हैं। ...निश्चय ही ‘कविता क्या है’ विजय रंजन की विराट साहित्य-साधना का स्वाभाविक प्रतिफल है। हिन्दी में कविता को लेकर इतना गम्भीर, शास्त्रनिष्ठ चिन्तन कम से कम मेरे देखने में नहीं आया। यह कविता को उसकी अंतरंगता से समझने का भगीरथ प्रयास है। लेखक ने कविता को लेकर परम्परा के उत्तुंग शिखरों से लेकर आधुनिकता के रेगिस्तानों की जो श्रमसाध्य यात्रा की है, वह अद्भुत है। सचमुच, इस गौरव ग्रंथ की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।
- डाॅ0 जयसिंह ‘नीरद’, पूर्व निदेशक, आचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, डाॅ0 बी0 आर0 अम्बेडकर वि0 वि0 आगरा (उ0प्र0)
* विजय रंजन बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। वे कवि, कथाकार और संपादक के साथ-साथ समालोचक भी हैं। समालोचना की उनकी पूर्व कृतियाँ हैं- ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘रसवाद औ ...र नय रस’ और ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’। यह उनकी चौथी समालोचना कृति है- ‘कविता क्या है’। साहित्यिक कृतियों की समालोचना में कविता की समालोचना सबसे अधिक जटिल है। यह गहरे अध्ययन, सूक्ष्म अंतर्दृष्टि और रागपूरित मगर तटस्थ विश्लेषण बुद्धि की मांग करती है। यह पुस्तक एक अच्छी कविता को पहचानने की दृष्टि देती है।
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‘कविता क्या है’ कृति में आपने पाश्चात्य मनीषियों के साथ ही भारतीय मनीषियों के विचारों को एक स्थान पर एकत्र सलीके से प्रस्तुत किया है। भाषा भी सहज है। आपका प्रयास सराहनीय है। आप वैचारिक विषयों का बहुत तार्किक विवेचन करते हैं।
- केशव शरण, (साहित्यकार, समीक्षक), वाराणसी (उ0प्र0)
* विजय रंजन एक साथ कई विधाओं में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कविताएँं, गीत और कहानियाँ तो लिखी ही हैं बल्कि उन्होंने साहित्य में आलोचनात्मक हस्तक्षेप भी किया है। ‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह कीे कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं, त्रासदियों और निरन्तर बदलते कठिन होते जा रहे जीवन की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में केवल अनुभव ही नहीं, समाज की आलोचना भी है।
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अवध-अर्चना में प्रकाशित राष्ट्रवाद सम्बन्धी आलेख में आपने डाॅ0 शमसुल इस्लाम का (डाॅ0 शमसुल के कथनों का) बड़ी मेहनत से खण्डन किया है।
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‘राष्ट्रवाद और इतिहास’ लेख में आपका अध्ययन बोल रहा है। वामपंथी यदि कर सकें तो उन्हें आपके विचारों का आधिकारिक खण्डन करना चाहिए। लेकिन शायद ही कोई आपके इन विचारों का खण्डन कर सके।
- स्वप्निल श्रीवास्तव, फैजाबाद
*श्री विजय रंजन एक अध्ययनशील और साहित्य को समर्पित व्यक्तित्व हैं। ‘साहित्यिक तुला पर.....’ उनके विशद अध्ययन का प्रमाण है और कविता संग्रह ‘किर्चें’ की अधिकांश कविताएँ मन को भीतर तक छूती हैं और बहुत सशक्त हैं। जितने सुन्दर गीत हैं, उतने ही गहरे भावों वाले अगीत हैं। उनका कहानी-संग्र्रह ‘उभरते बिम्ब’ भविष्य के गर्भ में झाँकती यथार्थपरक कहानियों का संग्रह है।
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वाल्मीकि पर ऐसी पुस्तक अब तक तो नहीं मिली। इतना गम्भीर अध्ययन अन्यत्र देखने को नहीं मिला। भाषा सहज होती तो कृति बहु-उपयोगी बन जाती। फिर भी कहूँगा कि विषयवस्तु की दृष्टि से यह कृति (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) कालजयी सिद्ध होगी। हम लोगों की कविता, कहानी की कृतियाँ तो मन-बहलाव वाली हैं, अल्पजीवी हैं। बहुत-बहुत बधाई।
- डाॅ0 अशोक शर्मा (उपन्यासकार), लखनऊ
* विजय रंजन प्रधानतः मस्तिष्कजीवी हैं- कबन्ध मानसिकता से नितान्त शून्य; अर्थातः लोकोपकारी ! निश्चित रूप से अपने जीवन में ये किसी भी सारस्वत कर्म में यथाभिलषित सफलता पाएंगे। उनके कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की संगृहीत कहानियों की विशिष्टता ध्यातव्य है, वह यह कि परिवेश के चित्रण में कथा-शिल्पी ने किसी छायाचित्रकार की भूमिका निभाई है। परिणामतः अभिव्यक्ति में यथेष्ट जीवन्तता हृदय को सम्मोहित करती है।
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श्री विजय रंजन प्रदेश के ही नहीं, इनका लेखन पूरे भारत में प्रस्तरित है। ........ ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘रसवाद और नयरस’ और ‘कविता क्या है’ पाठकों के लिए मनोरंजन करने वाली कृतियाँ नहीं-- ये साम्प्रतिक रचनाधर्मियों के लिए दृष्टिदा भी हैं। हिन्दी कविता के स्तरीय उन्नयन के लिए ये कृत-संकल्प (दिखती) हैं।
- डाॅ0 कौशलेन्द्र पाण्डेय, लखनऊ
* ‘हाशिये सेे’ के बाद ‘ किर्चें ’ अवध-अर्चना के सम्पादक विजय रंजन का दूसरा काव्य-संग्रह है। विधा-वैविध्य से समृद्ध इस काव्य-संग्रह में सरस गीतों का प्रवाह है, गजलों की महकती फुलवारी है और साथ ही है अकविता-अगीत की प्रखरता। - अजय मिश्र ‘अजर’, गोण्डा (उ0प्र0)
* श्री रंजन एक न्यायविद् होने के साथ-साथ एक गम्भीर चिन्तक और समीक्षक भी हैं। उनकी आस्था डगमगाती नहीं है। ‘किर्चें’ विजय रंजन जी की एक विशिष्ट काव्य-कृति है जिसकी रचनाएँ सर्वथा अध्येय और अनुभावनीय हैं। यह सार्थक रूप में समकालीन सृजन-सन्दर्भों की संवाहिका कृति है। संग्रह की कविताएँ कवि की जीवन-दृष्टि, उसकी सौन्दर्य-वैशिष्ट्य दृष्टि की कविताएँ हैं जो उनकी चेतनशीलता, सजगता, संवेदनमयता, अनाहत जिजीविषा और विशिष्ट तथा गहन सम्प्रेषणीयता का परिचय देती हैं।
- डाॅ0 किरन पाण्डेय, प्रवक्ता हिन्दी, परमहंस डिग्री कालेज, फैजाबाद
* विजय रंजन एक कुशल सम्पादक, लेखक, मौलिक सर्जक, रचनाकार, एक श्रेष्ठ गीत-नवगीतकार, एक सिद्ध ग़ज़ल-हिन्दीगजलकार, एक प्रतिष्ठित अकविताकार-अगीतकार, एक तीखे आलोचक और जनचेतना के आरेखी साहित्यकार हैं। श्री रंजन जी की रचनाधर्मिता से परिचित हर सुमनस् मानता है कि शास्त्रीय-काव्यशास्त्रीय विषयों में उनकी अच्छी पैठ है। अपने सम्पादन-कार्य में वे प्रायः नया तेवर भरने के पक्षधर हैं। उनकी कविताओं-कहानियों आदि में मौलिक कथ्य-तथ्य के दर्शन होते हैं क्योंकि वे एक तेज-तर्रार अधिवक्ता हैं, अतएव उनकी दृष्टि और सृष्टि दोनों में ही तार्किकता समाई दिखती है। वे समाज और राष्ट्र की स्थितियों-दशाओं के सच को बराबर अपनी कलम से उघारते रहते हैं। जीवन और जगत् की उनकी परख निराली है। ‘अवध-अर्चना’ त्रैमासिकी से उनकी मौलिक प्रतिभा प्रभूत प्रचरी-पसरी है।
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‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ वाल्मीकि और रामायण पर आपकी तार्किक वैज्ञानिक दृष्टि, गम्भीर साहित्यिक अध्ययन, गहन श्रम, लगन का परिचायक है। ‘वाल्मीकि’ और ‘रामायण’ दोनों पर आपने बहुत अच्छी विवेचना प्रस्तुत की है।
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इस कृति (कविता क्या है) में लेखक ने साहित्य में वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता को एकसाथ जोड़ते हुए कविता, साहित्य की सर्वथा नई व्याख्या प्रस्तुत की है।
इस कृति (कविता क्या है) में लेखक ने साहित्य में वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता को एकसाथ जोड़ते हुए कविता, साहित्य की सर्वथा नई व्याख्या प्रस्तुत की है।
नय रस की प्रतिष्ठा और काव्य में नयवाद सम्बन्धी प्रस्थापना की दृष्टि आधारगत स्वरूप में भले ही प्राचीन हो लेकिन श्री रंजन ने इन्हें बिल्कुल नए स्वरूप में प्रस्तुत किया है।
इनकी तार्किक दृष्टि की उद्देश्यपरकता कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ में भी बोलती है।
इनकी तार्किक दृष्टि की उद्देश्यपरकता कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ में भी बोलती है।
-डाॅ0 गौरीशंकर पाण्डेय ‘अरविन्द’ (सम्पा0 ‘शिक्षा-साहित्य’, पूर्व उपाचार्य बी0एड0 विभाग, का0सु0साकेतपी0जी0 कालेज), फैजाबाद
* विजय रंजन जी अधिमान्य अधिवक्ता हैं किन्तु वकालत वे ‘वृत्ति’ के लिए करते हैं (जैसा कि केदार जी करते थे) --- प्रवृत्तितः नहीं। प्रवृत्ति-प्रकृति से तो वे साहित्य-स्नेही, संस्कृति-सचेत और मूल्यजीवी हैं। वे सतत स्वाध्यायशील और प्रतत लेखनरत रहते हैं। ‘अवध-अर्चना’ संज्ञक त्रैमासिकी उनकी साहित्यार्चा का प्रतीक-प्रभास है। प्रायः दो दशक हो गए हैं उन्हें उसका संपादन-प्रकाशन करते हुए। उसकी निरन्तरता कभी भंग नहीं हुई। वे कविता भी लिखते हैं, निबन्ध भी; मीमांसा भी करते हैं, विमर्श भी। जो कुछ भी वे लिखते हैं, मन लगा कर लिखते हैं, अपनी समस्त अधिचेतना उससे जोड़ कर। उनका लेखन जीवन-जगत् , साहित्य-संस्कृति, मूल्य-मान से संसिक्त है। विजय रंजन जी कविता/साहित्य के स्वरूप, तत्त्व, प्रयोजन आदि का गम्भीर विमर्श करते हैं। छायावाद-काल से ही, चालीसोत्तर काल से तो एकदम ही, पारम्परिक शास्त्रीय साहित्य-प्रतिमानों की बात बन्द कर दी गई; कविता के, आलोचना के नए प्रतिमान, नए प्रतिदर्श प्रस्थापित हो गए किन्तु विजय रंजन जी भरत, भामह, वामन, कुन्तक, आनन्दवर्द्धन, राजशेखर, मम्मट, विश्वनाथ आदि संस्कृत साहित्याचार्यों और पाश्चात्य साहित्याचार्यों के मतों-अभिमतों के आलोक में साहित्य-मीमांसा तदुन्मुख-भाव से करते रहते हैं। विजय रंजन जी प्राच्य एवं प्रतीच्य महत् काव्य-ग्रंथों का भी अनुशीलन बड़े मनोयोग से करते हैं। ...हिन्दी अनुवाद के सहारे संस्कृत के प्रथित ग्रन्थों का उनका अभिनिवेशी अनुशीलन सराहनीय है। होमर ने मूलतः ग्रीक में काव्यायन किया था, वाल्मीकि ने संस्कृत में। होमर-काव्य का अंग्रेजी में गम्भीर प्रकृष्ट अनुवाद हुआ है। उसी आधार पर विजय रंजन जी ने वाल्मीकि और होमर का तुलनात्मक अध्ययन साथ ही अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत व विविध भारतीय भाषाओं के प्रख्यात मनीषियों के साहित्यिक विचारों के सापेक्ष वाल्मीकीय रामायण का अनुशीलन विदग्ध मर्म-प्रवेश के साथ किया है जो इस कृति (साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण) में सम्प्रस्तुत है।
-डाॅ0 रामशंकर त्रिपाठी, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी-विभाग, का0सु0साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फैजाबाद
*‘ किर्चें ’ कवि, कहानीकार, आलोचक एवं ‘अवध-अर्चना’ त्रैमासिकी के सम्पादक विजय रंजन का सद्यःप्रकाशित कविता-संग्रह है।....शंृगारपरक रचनाओं के अतिरिक्त वर्तमान परिवेश की मूल्यहीनता, अमानवीयता, यांत्रिकता, संवेदनशून्यता, सामाजिक विषमता एवं स्वार्थपरक भ्रष्टता से क्षुब्धित रचनाएँ भी हैं जो कवि की निश्छल हृदय की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन रचनाओं में संवेदनशील कवि अपने आन्तरिक एवं बाह्य परिवेश से अपनी रचना का उपजीव्य ग्रहण करता दिखता है।
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वेद, पुराण, उपनिषदों के साथ-साथ दो सौ से अधिक साहित्यिक पुस्तकों के अध्ययन, इल्मी पुस्तकों के उल्लेख, उद्धरण के साथ प्राचीन, आधुनिक, अंग्रेजी, हिन्दी आदि के विद्वानों को उद्धृत करते हुए कृति: ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ बहुत उपयोगी पुस्तक बन गई है। ऐसी पुस्तक आज तक मेरी दृष्टि से नहीं गुजरी। यह पुस्तक जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। अतिश्योक्ति न समझा जाए तो कह सकता हूँ कि यह कृति अमर कृति बनेगी।
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‘साहित्यिक तुला .........’ से कुल मिला कर आप यही कहना चाहते हैं न, कि कविता में अनाप-शनाप बकवास के बजाय लोकहित और लोक-न्याय का तत्त्व होना चाहिए। इसी बात को पुष्ट करने के लिए आपने सुकरात से लेकर रेने वेलेक तक और वैदिक मनीषियों से लेकर डाॅ0 राधावल्लभ त्रिपाठी तक के मतों के आधार पर वाल्मीकि को श्रेष्ठ महाकवि सिद्ध किया है। डाॅ0 नामवर सिंह के मत की तो एैसी की तैसी कर दी है आपने !
- दयानन्द सिंह ‘मृदुल’, कवि/गीतकार, संस्थापक/अध्यक्ष, रजनीगंधा’, फैजाबाद (उ0प्र0)
*मैं रामप्रसाद मिश्र बोल रहा हूँ। आपने डॉ॰ रामानन्द शुक्ल के यहाँ मुझे पुस्तक ‘कविता क्या है’ दी थी। तब मैंने इसे हल्के में लिया था। लेकिन प्रथम अध्याय पढ़ने के बाद मैंने इसे आद्योपान्त पढ़ा। लगातार दो बार पढ़ा। कविता-निकष पर ऐसी दूसरी पुस्तक मैंने अब तक नहीं देखी। आपने इस पुस्तक में अद्वितीय श्रम किया है। आपने देश-विदेश के विद्वानों को एक साथ समेट कर कविता को वास्तव में ही परिभाषित कर दिया है। ‘कविता क्या है’ समाज को आपकी बहुत बड़ी देन है। आपकी विद्वत्ता पुस्तक के हर पृष्ठ पर बोल रही है। मैं झूठी प्रशंसा करने का आदी नहीं।आपने इस पुस्तक के रूप में शोध कराए जाने लायक लेखन प्रस्तुत किया है, ईश्वर आपको और आपकी लेखनी को दीर्घायु करे। मेरा आशीर्वाद।
- डॉ॰ रामप्रसाद मिश्र, सेवानिवृत्त प्राचार्य, त्रिदण्डिदेव संस्कृत महाविद्यालय, अयोध्या (उ0प्र0)
* अभिदेशक में मैंने आपकी कहानी ‘हुड़ुकचुल्लू’ पढ़ी। पात्र, कथानक, लेखनशैली सब बेमिसाल हैं। आप इतनी अच्छी कहानी लिखते हैं, यह मुझे मालूम नहीं था। मैं अभिदेशक के सम्पादक डाॅ॰ द्विवेदी से कहूँगा कि आपसे ऐसी ही कहानियाँ लेकर प्रकाशित करते रहें। - डाॅ॰ रामदेव शुक्ल, गोरखपुर
*आपकी पुस्तक ‘कविता क्या है’ कविता सम्बन्धी विवेचन का कोश है। आपने पुस्तक में ढेर सारी परिभाषाएँ संगृहीत किया है। यह पुस्तक विद्य़ार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है।
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पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ भारत और भारतीयता सम्बन्धी जानकारी की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। बड़ा श्रम किया आपने।
- प्रो॰ डाॅ॰ कुमुद शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
* आपकी किताब ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ मैंने तभी पढ़ ली थी जब आपने इसे मुझे दिया था। किताब बहुत अच्छी है, बहुत ही उपयोगी। -डाॅ॰ योगेन्द्र प्रताप सिंह, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
*पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) में आपका गम्भीर श्रम, आपका ज्ञान बोलता है। अपने विषय पर गम्भीर पुस्तक है यह। - डाॅ॰ कृष्णा जी श्रीवास्तव, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
*‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ बहुत ही उपयोगी पुस्तक है। बधाई।
- प्रो॰ डाॅ॰ दिग्विजय शर्मा, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा
*कैसे इतना लिख लेते हो यार ! इतनी जानकारी कि बड़े-बड़े भारत-पण्डित भी बहुत कुछ सीख सकते हैं इस पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) से। समीक्षा बाद में भेजूँगा।
- डाॅ॰ किरण मिश्र, फिल्मी गीतकार, मुम्बई (महाराष्ट्र)
*आपकी ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ मेरे प्रिय विषय की पुस्तक है। आपने इसमें बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं। आपकी पुस्तक लेक्चर देने में बहुत काम आएगी। आपको बहुत-बहुत बधाई। - डाॅ॰ प्रेमशंकर त्रिपाठी, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
*‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ कृति भारत और भारतीयता के विषय में बहुत स्पष्ट और सारवान् जानकारी देती है। आपका श्रम सार्थक है। - डाॅ॰ इन्दुशेखर तत्पुरुष, जयपुर (राजस्थान)
*लोकार्पण के समय जितना देख सका उसके आधार पर कह सकता हूँ कि यह पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) बहुत गम्भीर और अपने विषय की बहुत उपयोगी पुस्तक है। पढ़ करके बाद में समीक्षा लिखूँगा। - डाॅ॰ सत्यप्रकाश पाल, ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश)
*आपकी अन्य पुस्तकों की तरह ही यह पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) भी आपके गम्भीर लेखन की पुस्तक है। इस पर समीक्षा मैं अवश्य लिखूँगा।
- प्रो॰ डाॅ॰ शैलेन्द्र मिश्र, लालबहादुर शास्त्री पी॰ जी॰ कालेज, गोण्डा
*आपने भारत और भारतीयता विषय पर बहुत श्रम किया है। श्रम सार्थक है। ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) आपको दिल्ली के प्रकाशक से प्रकाशित करवाना चाहिए था। तब पुस्तक की उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती। आजकल बिना ब्रान्डिंग के अधिक प्रचार-प्रसार नहीं होता। - प्रो॰ डाॅ॰ शिवप्रसाद शुक्ल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज
*‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ एक गम्भीर पुस्तक है। सावधानी से पढ़ने की माँग करती है। अब तक मैंने जितना पढ़ा है उससे प्रतीत होता है कि आपने पुस्तक लिखने में बहुत श्रम किया है। बधाई। - डाॅ॰ सिकन्दरलाल, ढिझुई, प्रतापगढ़़
*यह (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) बहुत सार्थक, ज्ञानवर्द्धक है। विस्तृत समीक्षा बाद में भेजूँगा। - प्रो॰ डाॅ॰ बलजीत श्रीवास्तव, लखनऊ
*‘क्या है भारत और क्या है भारतीयता’ जैसी अनुपम पुस्तक समाज को समर्पित कर विजय रंजन जी का उद्देश्य नवयुवकों के भीतर देशप्रेम की भावना को जागृत करना और भारत-भारतीयता को समझाना है। - मनोज चन्द तिवारी, भारतीय नौसेना, कोच्चि (केरल)
*मैंने पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) के कतिपय अंश पढ़े। अत्यन्त विद्वत्ता एवं श्रम से इस ज्ञानवर्द्धक ग्रन्थ की रचना की है आपने। इस कालजयी शोध-ग्रन्थ हेतु बधाई। मेरी कामना है कि आपकी यह पुस्तक जनसामान्य को भारत और भारतीयता का ज्ञान कराए और सोचने को उद्वेलित करे। - महेशचन्द्र द्विवेदी, सेवानिवृत्त डी॰ जी॰ पी॰, यू॰ पी॰, लखनऊ
*आपने बहुत ही सारगर्भित विश्लेषणात्मक पुस्तक लिखी है। भारत के नामकरण पर ही आपने विभिन्न ग्रन्थों कथनों को प्रस्तुत कर एवं उन्हें विश्लेषित करने जानकारियाँ प्रस्तुत की हैं। पुस्तक (‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’) शोधपरक है। बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ।
- राजेन्द्र सिंह गहलौत, दूरभाष: 9329562110
* राष्ट्र और राष्ट्रवादी साहित्य पर आपकी अच्छी पकड़ है। प्राचीनकाल के भारत और भारतीयता पर आपके आलेख शोधपूर्ण होते हैं। आपका श्रमसाध्य लेखन कालजयी हो, शुभकामनाएँ।
- हर्दन हर्ष, दूरभाष: 9785807115
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