शनिवार, 23 अगस्त 2025

विजय रंजन की कृति ‘रसवाद औ...र नय रस’ की कतिपय समीक्षाएँ

   


रस-भेद में नवान्वेषण: ‘नय’ रस                                                                                                                 

                               - डॉ॰ शोभा सत्यदेव

 ‘रस’ भारतीय साहित्य का अत्यन्त पुरातन शब्द है। वैदिक साहित्य में ‘रस’ शब्द का प्रयोग दुग्ध, मधु, सोमरस, ब्रह्म, पारद, वीर्य, शक्ति आदि अनेेक अर्थों में हुआ है। परन्तु ‘काव्य रस’ के शास्त्रीय अर्थ में रस का प्रथम प्रयोग भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है। भरत ने नाटक को वाङ्मय का सर्वश्रेष्ठ रूप मान कर रस को उसका प्राणतत्त्व स्वीकार किया। रस के अवयव, रस-प्रक्रिया, रस का स्वरूप, रस के भेद, वर्ण, देवता, रसों का पारस्परिक सम्बन्ध, रस के अधिकारी आदि सभी विषयों का नाट्यशास्त्र में विशद विवेचन हुआ है। आचार्य भरतमुनि ने रस-निष्पत्ति विषयक ऐसे सूत्र की सृष्टि की जो काल के प्रवाह की गति तोड़ कर आज भी अपने उसी रूप में समादृत है। भरतमुनि के रससूत्र की व्याख्या के लिए भट्टलोल्लट से लेकर अद्यावधि अनेक प्रयास हुए हैं। यद्यपि भरत के पश्चात् वर्षों तक रस की धारा अवरुद्ध रही। परन्तु अन्ततः ध्वनि-सिद्धान्त की स्थापना के साथ ही रस की महनीयता भी स्पष्ट हुई और कालान्तर में प्रायः सभी आचार्यों ने रस को काव्यात्मा के रूप में स्वीकार किया। हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में रस-विवेचन संस्कृत-काव्यशास्त्र के अनुकरण पर ही होता रहा। आधुनिक काल में कतिपय विचारकों ने रस-सिद्धान्त को नूतन दृष्टि से देखते हुए नयी धारणाओं से मण्डित करने का प्रयास किया जिनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ॰ श्यामसुन्दरदास, पं॰ रामदहिन मिश्र, पं॰ विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ॰ नगेन्द्र, डॉ॰ आनन्द प्रकाश दीक्षित आदि उल्लेख्य हैं। भारत की अन्य भाषाओं-- बंगला, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती आदि के मनीषियों ने भी साहित्य-सर्जना के नव्य आलोक में अपने-अपने ढंग से रसवाद को व्याख्यायित किया है। पाश्चात्य मनीषियों ने भी रस-सिद्धान्त के महत्त्व को मान्यता दी है। स्पष्ट है कि रस-सिद्धान्त काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों में अग्रणी और मानवीय गुणों की आकलनात्मक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 

यद्यपि आधुनिकतावादी दृष्टि में प्राचीन सिद्धान्त अनुपयोगी और उपेक्ष्णीय समझे जा रहे हैं तथापि ‘काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्’ उक्ति की सार्थकता सिद्ध करते हुए साहित्य-साधक, चिन्तक विमर्ष के नवीन बिन्दु प्रस्तुत करते ही रहते हैं। ऐसी ही एक प्रस्तुति है ‘रसवाद औ..र नय रस’ जिसके प्रस्तोता लेखक श्री विजय रंजन हैं। 

श्री विजय रंजन ने रस-सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में रस के एक नवीन भेद ‘नय रस’ की स्थापना की है। पुस्तक की अनुक्रमणिका से भी पूर्व कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक के एक श्लोक को उद्धृत करके लेखक ने अपना मन्तव्य स्पष्ट कर दिया है। श्लोक है-

पुराणमित्येव न साधुसर्वम् न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।

सन्तः परीक्ष्यान्यतरदभजन्ते मूढ़ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।।

अर्थात् पुराने होने से ही न तो सब अच्छे हो जाते हैं, न नए होने सब बुरे होते हैं। समझदार लोग दोनों को परख कर उनमें से जो अच्छा होता है, उसे अपना लेते हैं। जिन्हें अपनी समझ नहीं है, उन्हें जैसा दूसरे समझा देते हैं, ठीक वैसा ही मान लेते हैं। 

लेखक श्री विजय रंजन पुरातनता को स्वीकार करते हुए भी नवीनता के प्रति उत्सुकता के आग्रही हैं। यह उनकी प्रखर बौद्धिक चेतना का प्रमाण है। 

कविता, कहानी, गजल, लेख आदि विभिन्न साहित्यिक वीथिकाओं में विचरण करते हुए लेखक को कुछ ऐसे उद्धरण प्राप्त हुए जिनको प्राचीन रस-भेदों के निकष पर मूल्यांकित करना असंगत-सा प्रतीत हुआ। लेखक का विचार है कि आदि-कवि का आदि-श्लोक: ‘मा निषाद प्रतिष्ठां ......’ से लेकर कबीर, तुलसी, रहीम, बिहारी-अथ च कुछ नव्य कविताओं में भी ऐसे अनेक सन्दर्भ मिलते हैं जिन्हें प्रचलित रस-सिद्धान्त के आधार पर सटीकतः व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। एतदर्थ, रस के भेदों की नवीन सम्भावनाएँ अपेक्षित हैं। इस अपेक्षित सम्भावना को मूर्त्त रूप प्रदान करते हुए श्री विजय रंजन ने एक नवीन रस-भेद की प्रकल्पना की है, जिसे आपने ‘नय’ रस की अभिधा प्रदान कर उसकी महत्ता और आवश्यकता को तर्कसंगत रूप से प्रस्तुत कर रस के बारहवें भेद के रूप में प्रतिष्ठापित करने का साहसपूर्ण सत्प्रयास किया है, जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। 

आलोच्य कृति दो भागों में विभाजित है- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक। 

पूर्वार्चिक में ‘रसवाद क्या और क्यों ?’, ‘रस-निष्पत्ति’, ‘रसवाद और आनन्दवाद’, ‘नय रस: क्या, क्यों कैसे’ इन चार अध्यायों में रस का अर्थ, रसवाद की अवधारणा, रस-निष्पत्ति की विभिन्न व्याख्याएँ, रस का स्वरूप (आनन्दवाद) आदि रस-विषयक विभिन्न बिन्दुओं पर दृष्टि डालते हुए कतिपय काव्य-प्रसंगों को प्रस्तुत किया गया है जिन्हें प्रचलित नौ अथवा ग्यारह रसों में समाहित करना लेखक को दुष्कर प्रतीत हुआ है और उनके लिए रस का एक नवीन भेद अन्वेषित किया है जिसे लेखक ने ‘नय’ रस की अभिधा प्रदान की है। लगभग 28 पृष्ठों के इस चतुर्थ अध्याय में लेखक ने अपने नवान्वेषित ‘नय’ रस को अनिवार्य, अपरिहार्य और स्वीकार्य बनाने की पुरजोर वकालत की है। 

उत्तरार्चिक खण्ड में ‘रस-भेद’ और ‘रस-दोष’ नामक दो अध्याय हैं। ‘रस-भेद’ में रस के पूर्वप्रचलित एकादश भेदों के साथ ही ‘नय’ रस को भी जोड़ते हुए द्वादश भेदों का वर्णन किया गया है।  

‘नय’ रस के अन्वेषक लेखक ने वाल्मीकि, कबीर, रहीम, तुलसी, बिहारी के साथ ही भारतभूषण अग्रवाल, प्रयागनारायण त्रिपाठी, प्रभृति आधुनिक कवियों की काव्य-पंक्तियों को उद्धृत करके उन्हें प्रचलित रसभेदों के किसी भी खाँचे में फिट कर देना असंगत और अनुचित माना है। उनका विचार है कि- ”आज विरची जा रही एकाध नहीं, ऐसी सैकड़ों कविताएँ हैं जिनके लिए वर्तमान प्रचलित रसघट अपर्याप्त है।“

‘नय’ रस के विषय में लेखक का कहना है-  ”हर वह कविता जो अनय, अनृत, अनाचार की विरोधी, प्रतिरोधी, निरोधी, निषेधी है और जो तद्गत संघर्ष/ संकल्प को मुखर करती है, जो तद्गत प्रेरणा देती है, जो नयत्व या उसके अंशभूत ऋतत्व/शिवत्व/सत्त्व आदि की आकांक्षी है --- ऐसी हर कविता का रस है ‘नय’ रस।“

‘नय’ रस की उपयोगिता और स्वीकार्यता को अनिवार्य सिद्ध करने के लिए लेखक ने ‘नयशीलता’ की देश, काल, विषयातीत परिव्याप्ति पर प्रकाश डाला है और वाल्मीकि से लेकर अन्ना हजारे के आन्दोलन तक का उल्लेख करते हुए काव्य, शास्त्र, विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान से जोड़ते हुए नयशीलता को युगीन आवश्यकता बतलाया है। 

काव्यशास्त्रीय चिन्तकों ने समय-समय पर रस के नवीन भेदों की कल्पना की है। अतः लेखक का आग्रह भी ध्यातव्य है, उपेक्षणीय नहीं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रकृति रस की स्थापना की। मराठी में विष्णु शास्त्री चिपलूणकर, रा0 मि0 जोशी तथा वि0 वा0 भिड़े ने उदात्त रस के रूप में प्रकृति रस की स्थापना की। हिन्दी में डॉ0 गुलाबराय और मराठी में श्री शिवरामपंत परांजपे ने देशभक्ति को स्वतंत्र रस की मान्यता दी। श्री जावेडकर ने क्रान्ति रस, विद्याधर वामन भिड़े ने उद्वेग रस और श्री आत्माराम राव जी देशपाण्डेय ने प्रक्षोभ रस की नवकल्पना की है। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘भाव-भेद रस भेद अपारा’ कह कर भाव और रसों के भेद-प्रभेद की प्रकल्पना के द्वार सदा-सर्वदा के लिए उन्मुक्त कर दिए हैं। अतः साहित्य-अध्येता इस दिशा में नवीन अन्वेषण करते रहे हैं और करते रहेंगे। 

प्रस्तुत कृति में नय रस की पूर्ण प्रतिष्ठा के लिए लेखक ने उसके आधारभूत तत्त्वों का भी स्पष्टीकरण कर उसे सर्वांगयुक्त रस के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार ‘नय’ रस का ‘स्थायीभाव’ नयत्व या न्यायशीलता की आकांक्षा/संकल्प है। ‘नय’ रस का ‘आश्रय विभाव’ नयत्व का प्रस्तोता है। इसका ‘आलम्बन विभाव’ अन्याय है। अन्याय का परिवेश इसका ‘उद्दीपन’, रोमांच, मानसिक उद्वेग इसके ‘अनुभाव’ तथा अन्यायी को दण्ड देने का संकल्प, उसके लिए किए जाने वाले प्रयत्न, संघर्ष, सक्रियता इसके ‘संचारीभाव’ होंगे। ‘नय’ रस का ‘गुण’ माधुर्य एवं प्रसाद, ‘रीति’ वैदर्भी और ‘वृत्ति’ सात्वती मानी जानी चाहिए। नय रस का ‘वर्ण’ धवल श्वेत और ‘देवता’ वरुण निर्देशित किए गए हैं। इस प्रकार ‘नय’ रस काव्यशास्त्रीय मानकों पर स्थापित किया गया है। 

श्री विजय रंजन जी की प्रस्तुत कृति रस विषयक काव्यशास्त्रीय विमर्श में एक नया द्वार खोलती है। सुधीजन इसे पढ़ेंगे और इस नव्य भेद की अनिवार्यता/उपयोगिता पर चिन्तन-चर्चा कर इस नवीन रस ‘नय’ रस को रस-भेदों में द्वादश रस के रूप मान्यता देंगे--- इस मंगलाशा के साथ लेखक को साहित्यशास्त्र के दुर्गम पथ पर चलने और नए रास्ते खोजने के साहसिक कृत्य के लिए अनेकशः साधुवाद। सर्वथा पठनीय, चिन्तनीय इस पुस्तक का हिन्दी जगत् में स्वागत होगा-- ऐसा विश्वास है।

-सेवानिवृत्त, प्रवक्ता, हिन्दी विभाग, का॰सु॰साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फैजाबाद,दूरभाष: 9415139988 (अवध-अर्चना फरवरी-अप्रैल 2017 में प्रकाशित)

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 गहन, सूक्ष्म और व्यवहारिक विचारणा की कृति- 
        रसवाद औ...र नय रस

                 - डॉ॰ नित्यानन्द श्रीवास्तव 

भारतीय साहित्यशास्त्र में एक प्रभावशाली उपस्थिति रस-सिद्धान्त की है। हिन्दी-साहित्य में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के बाद डॉ॰ नगेन्द्र और गणपतिचन्द्र गुप्त जैसे विद्वानों ने इस विमर्श में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी सरणि में फैजाबाद (अयोध्या) निवासी विजय रंजन ने ‘नयत्व’ को एक नए रस-विमर्श के रूप में सम्मिलित किया है। विजय रंजन जी भारतीय और पाश्चात्य चिन्तन परम्परा की विविध कसौटियों पर नयत्व को परखते हुए समन्वित भावभूमि पर कृति ‘रसवाद औ...र नय रस’ में ‘नय रस’ की उद्भावना करते हैं। रस के किसी एक भेद पर इतनी गहन, सूक्ष्म और व्यवहारिक विचारणा बहुत कम देखने में आई है। आचार्य शुक्ल ने कविता के मुख्य विधायक तत्त्व के रूप में लोकमंगल की बात की थी। यह तत्त्व उन्हें भक्ति-साहित्य के अनुशीलन से प्राप्त हुआ था। कहना न होगा कि विजय रंजन काव्य में ‘नय रस’ के अन्तर्गत जिस शिव तत्त्व की बात करते हैं वह अपने निहितार्थों में लोकमंगल ही है। अन्तर सिर्फ रस के प्रकार का है। भक्ति-साहित्य में उसकी उपस्थिति ‘भक्ति रस’ के आयाम में है तो अधिकांश हिन्दी-गजलों का वर्तमान सन्दर्भ इसे ‘नय रस’ से जोड़ता है। 

              - दिग्विजयनाथ पी॰जी॰ कालेज, गोरखपुर (उ॰प्र॰),

       दूरभाष: 7800989398  (अवध-अर्चना अंक 102 में प्रकाशित)

            




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