साहित्यभूषण श्री विजय रंजन के नाम और काम से मेरा परिचय आदरणीय गुरुवर डॉ॰ महेश दिवाकर ने जिस तरह से दिया था, वह किसी भी संवेद्य नवोदित लेखक के मन में श्री रंजन के प्रति हार्दिक सम्मान भरने को पर्याप्त था। संयोग नहीं, सुयोग कहूँगा मैं इसे, कि विगत वर्ष गुरुवर डॉ॰ दिवाकर जी के साथ अयोध्या-दर्शन के दौरान श्री रंजन से साक्षात् भेंट करने का कार्यक्रम भी बन गया।
1 नवम्बर 2019, समय तकरीबन चार बजे, भारतीय जीवन बीमा निगम, अमानीगंज के सामने की कालोनी में पहुँचने पर गुरुवर जी ने मुझसे ही श्री विजय रंजन जी को फोन करवाया था। पाँच-सात मिनट में ही विजय रंजन जी सादे कुर्ते-पायजामे में आ पहुँचे थे हमें साथ ले जाने के लिए और इस तरह मैं, गुरुवर डॉ॰ दिवाकर और मेरे अनुजवत् सम्बन्धी मनोजचन्द श्री विजय रंजन के आवास पर जा पहुँचे थे। तब वे मुझे एक सहज, सरल मध्यवर्गीय व्यक्ति लगे थे।
कमरा जिसमें हम बैठे थे, पुस्तकालय जैसा लग रहा था। सब ओर अल्मारियों में किताबें ही किताबें सजी हुई थीं। रंजन जी ने बताया था कि अपने घर का नाम उन्होंने ‘आश्रम’ रखा है। वास्तव में उनका घर किसी साहित्यिक तपस्वी के आश्रम जैसा ही लग रहा था।
श्री रंजन जी के घर में प्रवास के पाँच घंटों में गुरु जी और रंजन जी में विभिन्न साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक विषयों पर वार्त्ता होती रही जिसमें मैं और मनोज प्रायः श्रोता बने रहे किन्तु इससे हमें उनके विचारों और कृतित्व से सघनता से परिचित होने का सुअवसर मिला।
वार्त्ता के बीच में मैंने रंजन जी से कहा, “आपका पुराना परिचय तो मुझे गुरुवर जी ने दे दिया था। उसी के आधार पर मैंने अपनी पुस्तक ‘सुधियों के दस्तावेज’ में आपके बारे में लिखा भी है। आपने अपना नवीनतम विस्तृत जीवनवृत्त तैयार कराया हो, तो कृपया उसकी एक प्रति मुझे भी दें।”
मुस्कराते हुए उन्होंने अपने नवीनतम जीवनवृत्त की एक प्रति दे दी थी।
उनसे प्रति लेते हुए मैंने उनकी साहित्यिक यात्रा के सम्बन्ध में भी जिज्ञासा प्रकट की।
मेरी जिज्ञासा का उत्तर देते हुए वे बोले थे, “मैं 1964 से, जब मैं अपने गृहनगर गोण्डा में था, कविता, कहानी, आलेख आदि के लेखन से और वर्ष 1965 से पत्रकारिता से जुड़ा। यह यात्रा आज तक जारी है। पहले गोण्डा में ‘विचारभारती’ साप्ताहिक समाचार-पत्र से, बाद में फैजाबाद आने पर 1970 से यहाँ की अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ा मैं और विभिन्न साप्ताहिक, पाक्षिक पत्रों में सहयोगी पत्रकार, सहसम्पादक रहने के बाद, फैजाबाद में ही 2 अक्टूबर 1976 से अवध-अर्चना मासिक का प्रकाशन मैंने आरम्भ किया, जिसे शीघ्र ही साप्ताहिक कर दिया था मैंने। अवध-अर्चना में एक पृष्ठ साहित्यिक विषयों पर रखता था मैं।
मेरी साहित्यिक अभिरुचि तभी से गझिन हो गई। 1975-80 ई॰ में सैकड़ों रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। आकाशवाणी पर और कुछेक कवि-सम्मेलनों में भी सहभागी रहा मैं। रचना-कर्म निरन्तर बढ़ता रहा 1981-89 तक। वर्ष 1989 में ‘अवध अर्चना’ साप्ताहिक का प्रकाशन अपरिहार्य कारणों से स्थगित करना पड़ा। रामनवमी 1995 ई॰ को अवध-अर्चना त्रैमासिक आरम्भ करने के पूर्व तक पारिस्थितिक दबाव में जब-तब लेखन धीमा हुआ अवश्य, लेकिन बन्द नहीं हुआ कभी। इस तरह विगत 54-55 वर्षों में लिखी-अधलिखी रचनाओं के मोटे-मोटे गट्ठर इकट्ठे हो गए हैं। इनके सुनियोजन से एक दर्जन पाण्डुलिपित, 3 दर्जन अर्धलिखित और एक दर्जन तक सम्पादित पुस्तकें बन गई हैं।” कहते हुए रंजन जी ने मेरे सामने बहुत सी पत्रावलियों का भारी-भरकम गट्ठर रख दिया था।
“ये सभी मेरी स्वरचित अपूर्ण कृतियाँ हैं; सम्पादित 12 कृतियों का बण्डल उधर है। अवध-अर्चना के अनेक अंक, विशेषांक भी अल्मारी में रखे हुए हैं और उधर उस बोरे में अवध-अर्चना के हजारों पाठकों के पत्र रखे हुए हैं। उनमें से अनेक पत्र अवध-अर्चना ब्लॉग और वेबसाइट में उपलब्ध हैं।” अल्मारी में दूसरी ओर रखी पत्रावलियों, अवध-अर्चना के विशेषांकों और नीचे जमीन पर रखे हुए एक बोरे की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा था।
पत्रों का प्रसंग चला तो श्री रंजन जी ने बताया कि एक रचनाकार के लिए उसके रचना-कर्म की प्रशंसा में लिखे-भेजे गए पत्र संजीवनी से कम नहीं होते। उन्होंने बताया कि उन्होंने कमलेश्वर जी और लंदन की विशिष्ट लेखिका डॉ॰ दिव्या माथुर के पत्र अलग से सहेज कर रखे हुए हैं। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारीशस 1977 का आमंत्रण और 1977 से आकाशवाणी के युवमंच में कविता-पाठ का प्रथम आमंत्रण भी किसी अमूल्य निधि के समान वे सहेजे हुए हैं।
“मेरी प्रकाशित, पाण्डुलिपित, अर्धलिखित और सम्पादित प्रत्येक प्रकार की कृति के बण्डल अलग-अलग हैं। अधिकांश सम्पादित कृतियाँ उन विषयों पर हैं जिन पर अवध-अर्चना का विशेषांक प्रकाशित किया जा चुका है। उन प्रकाशित आलेखों में एकाध आलेख और जोड़ कर सम्पादित कृतियाँ तैयार की हुई हैं जिन्हें अवसर मिलने पर प्रकाशित कराया जाएगा। अन्य कृतियाँ स्वरचित आलेखों, कहानियों, कविताओं आदि का संग्रह हैं जिनका काम अभी अधूरा है। चार उपन्यास, साक्षात्कार-संग्रह, समीक्षा-संग्रह भी अधूरे हैं। साक्षात्कार-संग्रह में श्री अमृतलाल नागर, शिवानी, नरेश मेहता आदि से साक्षात्कार सम्मिलित है।”
प्रकाशित साहित्यिक अवदान का प्रसंग आने पर रंजन जी हमारे सामने अपनी मौलिक प्रकाशित पुस्तकों का एक सेट रखते हुए बोले थे, “कुछ सहलेखित पुस्तकें भी हैं। इनमें से दो कृतियों में मेरे आलेख कृति के प्रथम आलेख के रूप में सम्मिलित किए गए हैं। ये कृतियाँ हैं ‘महिला हिंसा का अंत: कल, आज और कल’ जिसकी सम्पादक हैं दिल्ली की डॉ॰ प्रत्यूष वत्सला और ‘भारतीय शिक्षा: एक सैद्धान्तिक विवेचन’ जिसके सम्पादक हैं फैजाबाद के डॉ॰ गौरीशंकर पाण्डेय।” उनके इस कथन के साथ ही ये दोनों सहलेखित पुस्तकें भी हमारे समक्ष उपस्थित थीं।
श्री रंजन जी ने हम तीनों को अपनी स्वरचित कृतियों की 1-1 प्रतियाँ एवं अवध-अर्चना के अनेक अंक भेंटस्वरूप प्रदान किए।
“जो प्रकाशित पुस्तकें आप मुझे दे रहे हैं, उन्हें मैं बाद में देखूँगा। अभी तो आप मुझे अपनी पाण्डुलिपित पुस्तकों और उनमें भी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तकों के बारे में बताएँ।” जीवनवृत्त में 12 पाण्डुलिपित, 4 दर्जन प्रणयन गतिमान पुस्तकों की सूची देख कर मैंने उनसे अनुरोध किया था।
मनोज और गुरुवर दिवाकर जी ने भी इस सम्बन्ध में सहमति प्रदान की थी।
शायद अब उनका अधिवक्ता रूप जाग उठा था। धाराप्रवाह बताया उन्होंने,
“पाण्डुलिपित कृतियों में ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ और ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ प्रकाशन के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अन्य तीन कृतियाँ ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’, ‘भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श’, ‘भारतीय राष्ट्रवाद: क्यों औ...र कैसे’ भी तैयार हैं, जिनके नाम से ही स्पष्ट है कि इनमें राष्ट्रवाद के विभिन्न पक्षों पर विमर्श प्रस्तुत है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ में राष्ट्रवाद विषयक परिभाषा आदि का विवेचन करके भारतीय राष्ट्रवाद को पाश्चात्य राष्ट्रवाद से विलग रूप-स्वरूप में रेखांकित किया गया है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श’ में भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास, संस्कृति, भाषा, साहित्य आदि से अंतःसम्बन्धों की विवेचना है और कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद: क्यों औ...र कैसे’ में राष्ट्रवाद के व्यवहारिक पक्ष का अनुशीलन है।
इसी तरह मेरी एक अन्य पाण्डुलिपित स्वरचित कृति ‘आदि-महाकवि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ है जिसमें मैंने महर्षि वाल्मीकि के ‘महत्वादी प्रथम महाकवि’, ‘प्रथम मानववादी कवि’, ‘प्रथम लोकवादी कवि’, ‘प्रथम नारीवादी कवि’, ‘प्रथम प्रकृतिवादी कवि’, ‘प्रथम बिम्बवादी कवि’, ‘प्रथम राष्ट्रवादी कवि’, ‘प्रथम मनोवैज्ञानिक कवि’, ‘प्रथम नयरसवादी कवि’, ‘प्रथम नयवादी कवि’ स्वरूपों को सोदाहरण प्रस्तुत करते हुए महर्षि वाल्मीकि को ‘आदि-कवि’ नहीं, वरन् ‘आदि-महाकवि’ सिद्ध किया है।
एक अन्य पाण्डुलिपित कृति ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि का कालखण्ड’ में जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, वाल्मीकि जी का कालखण्ड विवेचित है। चूँकि महर्षि वाल्मीकि दाशरथ राम के समकालीन थे, अतएव इसके बहाने से भगवान् श्रीराम का कालखण्ड भी ज्ञात हो जाता है। इस कृति में पुरातात्त्विक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, वाङ्मयिक, जनश्रुतिक, वानस्पतिक/जीववैज्ञानिक आदि साक्ष्यों के आधारों पर उपर्युक्त कालखण्ड लगभग 7000 वर्ष मेरी गणना से अवधारित होता है, जो मिलेनियम साफ्टवेयर आदि से पुष्ट भी है।
पाण्डुलिपित कृति ‘भारतीय शिक्षा-व्यवस्था: सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष’ में शिक्षा का वस्तुनिष्ठ रूपायन करते हुए शिक्षा के मूल अंगों के साथ-साथ शिक्षा का समाज से सम्बन्ध, भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आवश्यकता आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर विवेचन प्रस्तुत है।
पाण्डुलिपित कृति ‘विश्व-विजय पथ पर हिन्दी’ में हिन्दी की वैज्ञानिकता, अपार शब्द-क्षमता आदि आद्यन्त वैशिष्ट्यों का बखान तो है ही, इसके विश्व-व्याप्त होने की सम्भावनाओं को भी विवेचित किया गया है।
कृति ‘रामत्व और हमारा समय’ में रामीय सद्गुणों के उकेरन के साथ-साथ उन गुणों की आज के युग में प्रासंगिकता पर भी बल दिया गया है।
उपर्युक्त के अतिरिक्त अनेक कृतियाँ कविता की विभिन्न विधाओं के संग्रह (यथा- गजल-हिन्दी गजल संग्रह: ‘दर्पण तीरे’, गीत-नवगीत-संग्रह: ‘गीत तुम्हारे नाम’, अकविता-संग्रह: ‘मुट्ठी भर आकाश’), लघुकथा-संग्रह: ‘टुकड़े-टुकड़े’ भी पाण्डुलिपित हैं।
इनके अतिरिक्त ‘हिन्दू संस्कृति श्रेष्ठ क्यों’, ‘..अयोध्या के बहाने से’, ‘भारतीय न्याय-व्यवस्था: सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष’ की विषयवस्तु पर अध्ययन-मनन अभी गतिमान रहने से इनका प्रणयन भी गतिमान है।
मेरे द्वारा विभिन्न विषयों पर विरचित आलेखों के 9 संग्रह भी हैं- 1. वातायन से, 2. गवाक्ष की साक्षी, 3. दृष्टि-उन्मेष, 4. आँगन में, 5. दीवार के पार, 6. आस-पास, 7. फुलवारी, 8. दहलीज पर, 9. झरोखों से; चार उपन्यास भी हैं- 1. आगमन, 2. तलाश, 3. टकराव, 4. नौ बहनें। इन सबको अभी प्रकाशन-योग्य रूप-स्वरूप में पूरा करना शेष है।“
रंजन जी धाराप्रवाह बोलते ही जा रहे थे। मैं उनके विपुल साहित्यिक कर्म को देख कर अभिभूत था। उस समय उपलब्ध अल्प समय में उनकी पत्रावलियों को थोड़ा-बहुत उलट-पुलट करने से प्रथमद्रष्टया इतना स्पष्ट तो हो ही गया कि गद्य-पद्य दोनों पर रंजन जी का लेखन गतिमान है और रंजन जी भारतीय संस्कृति और भारतीयता के यशोगायक हैं। रंजन जी की प्रकाशित और पाण्डुलिपित कृतियों के वे सभी आलेख जिन्हें उस समय जितना मैं पढ़ सका, उससे मुझे सभी आलेख सुचिन्तित, सुस्पष्ट विचारों से सम्बलित दिखे। भारतीय लेखन-शैली की ‘आगमन शैली’ में विषयगत अभिमत के पक्ष-प्रतिपक्ष के सभी पक्षों का समुचित विवेचन, तदन्तर ‘निगमन शैली’ में निष्कर्ष स्वरूप में अपने अभिमत का निरूपण ! यही शैली अपनाते दिखे वे मुझे अपनी पाण्डुलिपित समालोचनात्मक कृतियों में।
मैंने यह भी पाया कि रंजन जी की प्रायः सभी कृतियों में ‘पूर्वार्चिक’ और ‘उत्तरार्चिक’ दो प्रभाग हैं। इस सम्बन्ध में उन्होंने बताया कि ये दोनों शब्द ‘सामवेद’ से लिए हैं उन्होंने।
जितनी देर गुरुवर डॉ॰ दिवाकर एवं श्री रंजन के बीच वार्त्ता होती रही उतनी देर में मैंने और मनोज ने श्री रंजन के द्वारा दीर्घ समय से प्रकाशित पत्रिका अवध-अर्चना त्रैमासिक के अनेक अंकों और विशेषांकांे का भी अवलोकन किया। पत्रिका में देश-विदेश के अनेक ख्यात कवि, लेखकगण के आलेख, कहानियाँ, कविताएँ, समीक्षाएँ आदि प्रकाशित देख कर प्रतीत हुआ कि पत्रिका की प्रतिष्ठा देश के प्रायः सभी नगरों, अंचलों तक ही नहीं बल्कि विदेशों के ख्यातनाम लेखकों तक भी है। इसके विशेषांक ‘पूर्वोत्तर भारत अंक 1 व 2’ सहित पूर्व प्रकाशित अन्य विशेषांक जैसे ‘भारतीय समाजवादी आन्दोलन के तीन शक्तिपुंज’, ‘हिन्दी गजल अंक’, ‘लघुकथा अंक’, ‘बाल साहित्य अंक’, ‘तुलसी अंक’, ‘अयोध्या अंक’, ‘विवेकानन्द अंक’, ‘गाँधी अंक’, ‘आचार्य नरेन्द्रदेव अंक’, ‘विज्ञानकथा अंक’, ‘उपयोगी विज्ञान अंक’ आदि पत्रिका को साहित्यिक सामाजिक वैज्ञानिक सरोकार की श्रेष्ठ पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन अति दुष्कर कार्य है। उस पर भी श्रेष्ठ सामग्रियों वाली पत्रिका का प्रकाशन, वह भी बिना किसी राजकीय या सांस्थानिक सहायता के, मात्र निजी संसाधनों से ! ऐसी साहित्यिक तपश्चर्या तो वही व्यक्ति साकार कर सकता है जो साहित्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो। श्री रंजन जी का साहित्य के प्रति निष्ठापूर्ण समर्पण उनके विपुल लेखनकर्म से प्रकट है।
एक वाक्यांश का प्रयोग मुझे उनके अनेक आलेखों में दिखा- ‘नैतिकतावादी लोकहित सह लोकहितवादी नैतिकता’। प्रतीत होता है कि यह वाक्यांश उनके साहित्यिक समर्पण का प्रेरक तत्त्व और मूलमंत्र है; यही उनकी साहित्यिक साधना का ध्येय है।
अवध-अर्चना की ‘गतिविधि’ शीर्षक स्तम्भ से ज्ञात हुआ कि श्री रंजन अपने आवास पर और फैजाबाद में अन्यत्र भी छोटी-बड़ी साहित्यिक संगोष्ठियों का आयोजन करते रहे हैं। श्री रंजन जी ने बताया कि 1978 में उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ के सहयोग से ‘मण्डलीय युवा सम्मेलन’ भी अवध-अर्चना के तत्त्वावधान में फैजाबाद में आयोजित किया था, जिसमें मण्डल के विभिन्न जनपदों से सहभागी सम्मिलित हुए थे। अपनी साहित्यिक बुभुक्षा के प्रभाव में अपने अकेले दम पर ही श्री रंजन ने ‘हिन्दी गजल’, ’कविता क्यों’ तथा ‘राष्ट्रवाद आवश्यक क्यों’ विषय पर बड़ी संगोष्ठियाँ’ भी आयोजित की हैं।
श्री रंजन जी के निवास से वापस लौटने पर अनेक दिवसों तक मेरे-मनमस्तिष्क में उनकी बातों की अनुगूँज गूँजती रही। उस अनुगूँज ने मुझे उनके द्वारा भेंटस्वरूप प्रदान की गई कृतियों से दूर नहीं होने दिया। उसी की प्रेरणा से मैंने भेंटस्वरूप प्रदान की गई उनकी कृतियों का गम्भीर अध्ययन किया।
श्री विजय रंजन जी से उनके आवास पर हुई विस्तृत भेंट के बाद भी दूरभाष और पत्रिका की प्रकाशित प्रतियों के माध्यम से हमारी भेंट होती रही है। दो-तीन वेबिनारों में भी मुझे उन्हें सुनने का अवसर मिला है।
उनकी पुस्तकों का अध्ययन करने पर मैंने पाया कि उन पुस्तकों में रंजन जी के बहुअधीत साहित्यकार होने के साथ-साथ विज्ञान के स्नातक और विधिवेत्ता अधिवक्ता होने की पूरी छाप है। इन कृतियों में वैज्ञानिक सोच के साथ-साथ नैयायिक भाषा भी दिखती है। मूलतः कवि होने के नाते उनकी भाषा कवित्वपूर्ण स्वयंप्रवाही भाषा है जिसमें बीच-बीच में एक वैयाकरणिक के समान अप्रचलित शब्दविधान में गढ़े हुए शब्द भी हैं। मैंने यह भी अनुभव किया कि वामपंथी बौद्धिकों से हट कर, रंजन जी प्राचीन भारत में, प्राचीन भारतीयता में, प्राचीन भारतीय संस्कार और संस्कृति में जो श्रेष्ठ है, उसे ही अपनी पुस्तकों में अपने गहन, अपरिमित अध्ययन-आधृत वाङ्मयिक साक्ष्यों सहित तार्किक स्वरूप में उद्धृत करते हैं स्वयंसाक्षी अकाट्य तर्कों वाले (ैमस.िबवदजमदकमक) स्वरूप में और वैज्ञानिक (फनंक म्तंज क्मउवदेजतंदकनउ) विवेचना-दृष्टि वाले स्वरूप में प्रत्यक्ष करने का प्रयास करते वे दिखते हैं।
विजय रंजन जी की अब तक कुल मौलिक 10 कृतियाँ प्रकाशित हैं, 11 पाण्डुलिपित हैं। 6 सहलेखित, 2 सम्पादित प्रकाशित और 39 कृतियाँ प्रकाशन-प्रतीक्षित एवं प्रणयन-गतिमान हैं।
रंजन जी द्वारा रचित पुस्तकें उनके बहुअधीत होने का प्रमाण हैं। उनकी पुस्तक ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ हो या ‘कविता क्या है’ या ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘रसवाद औ..र नयरस’, ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ सभी प्रमाण प्रस्तुत करती हैं रंजन जी के गहन अध्ययन का।
वास्तव में विजय रंजन की प्रकाशित सभी समालोचनात्मक कृतियाँ अपनी नवीन प्रस्थापनाओं से साहित्य-जगत् को केवल समृद्ध ही नहीं करतीं वरन् एक शोधपरक नवीन दृष्टि भी प्रदान करती हैं। अनेक प्रबुद्ध समीक्षकों के मत में ‘विजय रंजन के तर्क इतने सशक्त हैं कि उनकी प्रस्थापनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता।’
विजय रंजन की प्रथम समालोचनात्मक कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ (प्रकाशन वर्ष 2012) में प्राचीन-अर्वाचीन भारतीय और यूरोपीय ही नहीं, अपितु अफ्रीकी जगत्, सामी जगत्, दक्षिण-पूर्व एशियाई जगत् , मंगोल जगत् आदि में भी जो काव्य-निकष हैं, उन सभी के सापेक्ष आदि-महाकवि वाल्मीकि का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। लैटिन के महाकवि होमर जो यूरोपीय काव्यजगत् में परम आदरेण्य हैं, जिनके नाम पर ‘होमेरियन युग’ का बखान किया जाता है; इस कृति के आलेख ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि औ...र महाकवि होमर’ में अंग्रेजी, फ्रेंच, लैटिन जगत् के उस महान् कवि होमर से भी आदि-महाकवि वाल्मीकि को श्रेष्ठतर सिद्ध किया गया है, वह भी इस रूप-स्वरूप में कोई अंग्रेजीभक्त, लैटिनभक्त उनके तर्कों पर एक भी लाल निशान लगा नहीं सके। यह कृति महर्षि वाल्मीकि के द्वारा रचित प्रथम रामाख्यान् ‘रामायणम्’ की न केवल अखिल विश्व के साहित्य के ऊपर सार्वश्रेष्ठता को उद्घाटित करती है, वरन् वाल्मीकीय रामाख्यान की उन विशेषताओं को भी प्रकाशित करती है जिनके प्रभाव के कारण यह काव्य सनातन काव्यबीज सिद्ध हुआ। इस कृति का सामाजिक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महाकथन है कि श्री राम के समकालीन महाकवि वाल्मीकि के द्वारा सत्य ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर रचित यह रामाख्यान ही पठनीय है, मननीय है, भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों को प्रकाशित करने से यही रामाख्यान भारत देश की अनेक सामाजिक, राजनीतिक, पर्यावरणिक समस्याओं के निराकरण के लिए अनुकरणीय है और मानव की इहलौकिक और पारलौकिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने वाला है।
विजय रंजन जी की कृति ‘रसवाद औ..र नय रस’ (प्रकाशन वर्ष 2015) में ‘नय रस’ नाम भी चौंकाने वाला है, लेकिन अपने तर्कसंगत लेखन से श्री रंजन ने काव्य-रसवाद की उत्पत्ति, उसकी वैज्ञानिकता, मनोवैज्ञानिकता आदि के आधार पर दोहा ‘खीरा सिर तें काटिए.......’ और ऐसे सम-प्रकृति की कविताओं को जहाँ अपराध की विवेचना के साथ दण्ड की भी व्यवस्था है, उसे न्याय-क्षेत्रज बताते हुए नय-नयत्व के भाव-विभाव को संचारी के बजाय स्वविश्रान्त और स्थायी सिद्ध करके ‘नय रस’ के नाम से एक नया काव्यरस प्रस्तावित किया है। श्री रंजन जी के तर्कपूर्ण निष्कर्ष के अनुसार नय रस की प्रस्थापना वर्तमान में आप्रसंगिक माने जाने वाले आर्ष काव्यरसवाद को युगवांछा के अनुरूप बनाने के लिए अति आवश्यक है।
उनकी पुस्तक ‘कविता क्या है’ में कविता के प्रत्येक पक्ष का गहन, गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करते हुए कविता की आठ सौ से अधिक परिभाषाएँ प्रस्तुत की गई हैं। ऋग्वेदादि से भी ढूँढ निकाली है उन्होंने कविता/काव्य की परिभाषा। इस पुस्तक की एक अन्य विशेषता है इसमें प्रस्तुत वर्तमान में प्रचलित कविता की मान्य परिभाषाओं की तर्कसम्मत व्याख्या करके उनका खण्डन किया गया है। इसके साथ ही रंजन जी ने इस पुस्तक में अपनी ओर से कविता की एक नवीन परिभाषा देने का प्रयास किया है, जो प्रतीततः सर्वथा दोषमुक्त सिद्ध होगी।
विजय रंजन की समालोचनात्मक कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ (प्रकाशन वर्ष 2015) अपने विषय की अनूठी पुस्तक है। इसमें रंजन जी ने एक नैयायिक की भाँति अपने सशक्त तर्कों से काव्य (गद्य-पद्य साहित्य) में समालोचना के लिए नयवाद की आवश्यकता को वांछनीय सिद्ध किया है।
इस कृति का केन्द्रीय विचार है कि काव्य (पद्य-गद्य साहित्य) में ‘नय-निकष’ की प्रस्थापना अति आवश्यक है। श्री रंजन के अनुसार काव्य की समालोचना के लिए अन्यान्य निकषों के अतिरिक्त नयत्व को अपरिहार्यतः प्रथम निकष मानना चाहिए और वस्तुनिष्ठ काव्य वही माना जाना चाहिए जिसमें काव्यतत्त्व ‘नय’ अपने सभी अंशभूत तत्त्वों (सत्, ऋत, शिव, लोक-सुन्दरम्, औचित्यपूर्ण आदर्शवादी सर्वहितकारी नैतिकता, लोक और व्यक्ति की आवश्यकताओं को समंजसित करने वाले लोक और शास्त्र के लोकसंग्रही, लोकमांगलीय विधायन, सर्जनात्मक प्रमा से उद्भूत अनय-निरोधी न्याय-विवेक) के साथ अथवा कम से कम अपने किसी एक अंशभूत तत्त्व के रूप में उपस्थित हो। श्री विजय रंजन के मत से ऐसा होने पर नयशील कविता-सृजन से कविता-सम्बन्धी वर्तमान पाश्चात्य अनयशील दृष्टि के सम्प्रभाव से जो अनयत्व व्याप्त हो गया है सम्पूर्ण काव्य-जगत् में, वह अनयत्व निराकृत हो जाएगा।....तब ‘अनाप-शनाप, ऊल-जुलूल, अशिष्ट, अश्लील, फूहड़, यौनवादी या यौन-कुत्सा को उजागर करने वाली कविताओं’ को या मात्र ‘मनोविनोद के लिए कविता जैसी कविताओं’ को कविता न माने जाने के ब्याज से कविता के वस्तुनिष्ठ अर्थों वाली सुविचारित, ऋतवादी, शिवकारी, सत्त्वशील, अनयरोधी, नयकारी, लोकमांगलीय, लोकसंग्रही कविताएँ ही विरचित की जाएंगी और तद्वत उपर्युक्त जैसी कथित कविता (वास्तव में कुकविता) से छुटकारा मिल जाएगा। इसका परिणाम यह होगा कि काव्य (गद्य-पद्य साहित्य) विशेषकर कविताओं से निर्मित संस्कारों से सहज ही दूर तक और देर तक प्रभावित होने वाला समाज-मन अशिष्टता, अश्लीलता, फूहड़ता, यौन-कुत्सा से भरे विचारों और तज्जनित आपराधिक, असामाजिक, अराष्ट्रीय मनोवृत्तियों और उनसे उत्पन्न होने वाले दुष्कृत्यों से स्वतः ही दूर होकर ऋतशील, सत्त्वशील, नयशील, लोकमांगलीय, लोकसंग्रही कार्यों की ओर मनसा-वाचा-कर्मणा प्रवृत्त होगा। श्री रंजन की इस प्रस्थापना की निश्शंक सत्यता का प्रमाण आदि-महाकवि द्वारा रचित वाल्मीकि-रामायण (रामायणम्) है जो वस्तुतः ऋतशील, सत्त्वशील, नयशील, लोकमांगलीय, नयरसवादी प्रथम महाकाव्य है। रामायणम् वस्तुतः काव्यतत्त्व ‘नय’ के सभी अंशभूत तत्त्वों को अपने में समेकित किए हुए है। सर्वविदित अनुभूत तथ्य है कि इस महाकाव्य के पठन-श्रवण से न केवल अति अनिवर्चनीय सुख की प्राप्ति होती है और जीवनोपयोगी ज्ञान की प्राप्ति होती है वरन् मानव-मन स्वतः ही ऊर्ध्वगामी, उच्चतर भावदशा वाले संस्कारों को सहज ही प्राप्त कर सत्त्वशील, नयशील, लोकोपकारी कार्यों में प्रवृत्त होता है।
मेरा मानना है कि श्री विजय रंजन का उपर्युक्त साहित्यिक अवदान यदि व्यवहार में प्रवृत्त कर लिया जाए तो वह न केवल साहित्य के क्षेत्र में क्रान्ति ला सकता है वरन् भारत राष्ट्र और भारतीय समाज को अनेकानेक सामाजिक, राष्ट्रीय समस्याओं और विसंगतियों से छुटकारा भी दिला सकता है।
तथापि न्यायशास्त्र के अनेक आधारभूत नैयायिक तत्त्वों पर विवेचन प्रस्तुत करने वाली यह कृति विषय की दुरुहता के कारण कुछ क्लिष्ट सी है किन्तु यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए न केवल काव्य-निकषों की गहन जानकारी अपने में समेटे हुए है बल्कि उनके लिए हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में शोध की अपार संभावनाएँ भी प्रस्तुत करती है।
उनकी पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ (2019) और ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ (2020) भी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक अवदान की पुस्तकें हैं जिन्हें बाद में प्रकाशित होने पर रंजन जी ने मुझे डाक द्वारा प्रेषित किया है।
विजय रंजन की वर्ष 2019 में प्रकाशित कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ जैसा कि इसके शीर्षक से ही ज्ञात होता है, सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्यों वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह भारतीयों के समक्ष आत्मसाक्षात्कार कराने में सक्षम है और उनकी सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है। कृति भारतीयों का परिचय उनके स्वयं के देश भारत एवं भारत के विशिष्ट विशेषता ‘भारतीयता’ से कराती है। यह कृति बताती है कि विश्व के प्राचीनतम विशाल भारत के मूल निवासी हम क्या थे, हम क्या हैं और हमें कैसा होना चाहिए। इस कृति में प्रस्तुत भारत, भारतीय, भारतीयता सम्बन्धी गहन, गम्भीर गवेषणायुक्त प्रस्थापनाएँ वर्तमान भारत की अनेक राष्ट्रीय समस्याओं के मूल पर कुठाराघात करने में सक्षम हैं। साथ ही, इसमें धर्म, लोकधर्म, राष्ट्रधर्म और विशिष्ट भारतीय राष्ट्रीय चरित्र की विस्तृत विवेचना के साथ ही अनेक ऐसे गम्भीर तथ्यों का भी दो टूक विवेचन प्रस्तुत किया गया है जिन्हें भारतीय संस्कृति के अस्तित्व को चुनौती देने वाले कारकों के सन्दर्भ में जानना अत्यन्त आवश्यक है। इस पुस्तक में प्रस्तुत तथ्यों के सम्बन्ध में अनेक विद्वान् इस मत के हैं कि इस पुस्तक में उल्लिखित अनेक तथ्यों का ज्ञान प्रत्येक भारतीय को होना ही चाहिए परन्तु ऐसा तभी संभव होगा जब उन्हें शैक्षिक पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए। इस कृति मंे भारतीय एवं भारतीयता की वाङ्मयिक आधार पर सर्वथा नवीन व्याख्या की गई है, जो यदि व्यवहारिक रूप में साक्षात् हो जाए तो भारत-जन का सर्वविध कल्याण हो और भारत का चरमोत्कर्ष भी साकार हो जाए।
कृति स्थापित करती है कि भारत और भारतीयों का अस्तित्व ‘पशु-प्रवृत्ति से इतर, ‘सात्त्विकता, द-कारत्व, चिन्मयता, ज्ञानोन्मुखता आदि मानवोचित गुणों की एवं ज्ञान की प्रदाता देवी भारती’ से गहरे रूप में सम्बद्ध है। कृति का सन्देश है कि वास्तव देवी भारती के गुणों के अभाव में न तो भारत रहेगा, न भारतीयता रहेगी और न ही कोई भारतवासी भारतीय ही रह सकेगा। भारत और भारतीयता की इतनी सुघर, विशद विवेचना किसी अन्य पुस्तक में मैंने नहीं देखी।
कृति में भारतीय होने की पहचान के रूप में भारतीयता के मूलाधार ‘देवी भारती के गुण-धर्र्मों’ से सहयुजित होने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। देवी भारती के वे गुण हैं- भारतत्व (ज्ञानोन्मुखता/ज्ञान प्राप्त करने की प्रवृत्ति), सात्त्विकता, उदारता, दकारता (दान, दया, दमन/जितेन्द्रियता), चिन्मयता (आध्यात्मिक ज्ञान), तितिक्षा (सहिष्णुता, त्याग, क्षमा), रागात्मक रचनाधर्मिता (कल्याणकारी सृजनात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति), नयशीलता (अपने कार्यों द्वारा सृष्टि की किसी भी जड़/चेतन सत्ता के प्रति अन्याय न करने/अन्याय न होने देने की प्रवृत्ति), कृतज्ञता अर्थात् अपना हित करने वाली जड़ सत्ता जैसे देश (देश के प्रति कृतज्ञता भाव को राष्ट्रवादिता, देशभक्ति आदि कहा जाता है)/चेतन सत्ता जैसे व्यक्ति/पशु के प्रति सदाशयता का भाव, शिवशीलता (कल्याणकारी कार्य करने की प्रवृत्ति) आदि-आदि। इन गुणों के अभाव में भारत का कोई भी रहवासी (चाहे वह किसी भी धर्म/पंथ/मजहब का अनुयायी हो) वस्तुनिष्ठ (वास्तविक अर्थाें में) भारतीय नहीं हो सकता (भले ही भारत में जन्म के आधार पर वह अपने को ‘भारतीय’ कहे)। निःसंदेह यदि प्रत्येक भारत-रहवासी में इन गुणों का विकास हो तो भारत देश को सर्वविध उन्नत होकर अपने प्राचीन गौरव प्राप्त करने में कोई विलम्ब न होगा।
उपर्युक्त विशिष्ट अवदान के अतिरिक्त कृति में ‘भारत’ नाम के अर्थ-विन्यास के साथ-साथ भारत-नामकरण के आधारों, भारत के प्राचीन नाम, भारत का प्राचीन राष्ट्रत्व, विशिष्ट भारतीय राष्ट्रीय चरित्र, भारत का वास्तविक स्वरूप आदि भी उकेरित है। कृति में भारत के प्राचीन नाम और भारत की ‘भरतीय’, ‘भा$रतीय’, ‘भारती$य’ प्रवृत्ति के सन्धान में जितना श्रम किया है विजय रंजन जी ंने, वह अन्यत्र किसी पुस्तक में एक लेखक द्वारा अब तक प्रस्तुत नहीं देखा गया।
विजय रंजन की दूसरी सद्यप्रकाशित कृति ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ (प्रकाशन वर्ष 2020) भगवान् श्रीराम पर शरारतन लगाए जाने वाले आक्षेपों का सुतर्क, सशक्त, सप्रमाण विखण्डन प्रस्तुत करके देश की सामाजिक समरसता को विभंजित करने वाले कारकों को निर्मूल करने का रंजन जी का एक सदाशयी प्रयास है। इसके लिए उन्होंने आक्षेपों से सम्बन्धित जिन तथ्यों को अपने सशक्त तर्कों का आधार बनाया है, उन तथ्यों को उन्होंने आदि-महाकवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामाख्यान ‘रामायणम्’ से उद्धृत किया है क्योंकि महर्षि वाल्मीकि श्रीराम के न केवल समकालीन थे, श्रीराम के जीवन की अनेक घटनाओं के स्वयंसाक्षी थे, बल्कि वे श्रीराम के जीवन की विगत अनेकानेक घटनाओं के योगज-साक्षी भी थे। निश्चय ही यह पुस्तक रंजन जी के सदाशय को मूर्त्तमान करने में सक्षम है। शूद्र शम्बूक-सम्बन्धी आक्षेप के सम्बन्ध में वाल्मीकीय रामायण के आधार पर जो सशक्त तर्क विजय रंजन जी ने दिए हैं, यदि वे जन-स्वीकृत हो जाएँ, तो सामाजिक समरसता को बहुत बल मिलेगा और यह भ्रम दूर हो जाएगा कि श्रीराम ने शूद्र शम्बूक का वध उसके तपस्वी होने के कारण किया था। बालि-वध के सम्बन्ध में उन्होंने वाल्मीकीय रामायण से प्राप्त तथ्यों के आधार पर जो अकाट्य तर्क दिए हैं, उनसे जन में व्याप्त भ्रान्ति (कि राम ने धोखे से या पेड़ के पीछे छुप कर बालि-वध किया था), पूरी तरह खण्ड-खण्ड हो जाती है। श्री रंजन जी ने अपने सशक्त तर्कों से सिद्ध किया है कि राम ने बालि-कृत अनीति, अनाचार और कदाचार के कारण बालि को मृत्युदण्ड देने के स्वरूप में ही बालि से अप्रत्यक्ष युद्ध में या धोखाधड़ी से या पेड़ के पीछे छुप कर नहीं वरन् तकनीकीय प्रत्यक्ष युद्ध-रीति का प्रयोग करते हुए बालि से आमने-सामने युद्ध करते हुए बालि के वक्ष पर बाणाघात किया था जिससे कुछ समय बाद बालि की मृत्यु हो गई थी। इसी तरह सीता-निर्वासन को काल्पनिक बताने वालों के समक्ष भी रंजन जी ने सारवान् प्रश्न उठाए हैं। इन प्रश्नों से सिद्ध होता है कि सीता-निर्वासन की घटना काल्पनिक नहीं हो सकती है। रंजन जी के मतानुसार राम द्वारा ऐसा किसी वैयक्तिक दुराभाव में नहीं किया गया था, बल्कि लोक को सर्वोपरि मान देने के उनके सदाशय के कारण मात्र परिस्थितिवशात् ही किया गया था। रंजन जी से इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त किया है कि वस्तुतः सीता-निर्वासन के लिए राम नहीं, वरन् अयोध्या की जनता के बीच के कुछ मूढ़ व्यक्ति ही पूर्ण रूप से दोषी थे जिन्होंने सीता-हरण, रावण की अशोकवाटिका में सीता के कष्टपूर्ण किन्तु पातिव्रत धर्म का पालन करते हुए सन्यासिनी के समान जीवन बिताने एवं रावण-हनन सम्बन्धी समस्त वृत्तान्त को जानने के पश्चात् भी व्यर्थ का लोकापवाद उत्पन्न कर ऐसी परिस्थितियाँ, ऐसा जन-माहौल बनाया जिससे राम को अपने लोकरंजन के संकल्प के कारण मजबूरन सीता-परित्याग जैसा गर्हित एवं भारतीय संस्कृति के नितान्त विरुद्ध कर्म करना पड़ा। निस्संदेह, श्री विजय रंजन जी की यह कृति भारतीय समाज में फैली, वरन् सच कहा जाए तो जानबूझ कर फैलाई गई, राम-सम्बन्धी भ्रान्तियों को दूर कर सवर्ण-अवर्ण (कथित दलित, शूद्र वर्ग) के बीच की कृत्रिम रूप से पैदा की गई खाइयों को पाटने में समर्थ है। यह कृति भारतीय जनमानस में अन्तरतम की गहराईयों तक जड़ीभूत श्रीराम के चरित्र-हनन द्वारा भारतीयों के आत्मगौरव, स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने के दुष्प्रयासों का भी सर्वनाश करने में सक्षम है। निःसन्देह यह कृति भारतीय समाज की एकता को अखण्ड बनाने वाली है।
गुरुवर डॉ॰ दिवाकर जी के साथ जब मैं श्री विजय रंजन जी के आवास पर गया था, तो मैंने उनकी अनेक शीघ्र प्रकाश्य कृतियों की पाण्डुलिपियों का भी विहंगावलोकन किया था। उस अवलोकन की जितनी स्मृति है उस स्मृति के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि-
Û राष्ट्रवाद सम्बन्धी लोककल्याणक प्रत्यय में वर्तमानतः व्याप्त भ्रान्तियों के निर्मूलन के साथ-साथ सात्त्विक भारती$य राष्ट्रवाद की सुस्थापना हेतु शीघ्र प्रकाश्य 3 कृतियाँ: 1. ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’, 2. ‘भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श’, 3. ‘भारतीय राष्ट्रवाद: क्यों औ...र कैसे’ विरचित हैं। इन कृतियों में यूरोपीय राष्ट्रवाद से भारतीय राष्ट्रवाद की प्राचीनतरता को वाङ्मयिक आधारों पर रूपायित करते हुए भारतीय राष्ट्रवाद के विविध पक्षों को सविस्तार विवेचित किया गया है।
कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ में पाश्चात्य राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद का आविर्भूतिक, पारिभाषिक एवं व्यवहारिक अन्तर उकेरते हुए भारतीय राष्ट्रवाद के प्रलाभ तथा उसके अभाव से कारित हानियों की विशद विवेचना है। भारतीय राष्ट्रवाद के उन्नयन के लिए अविलम्बतः क्या करणीय है, इसकी भी सारवान् चर्चा है इसमें। भारतीय राष्ट्रवाद के बाधक तत्त्व और उनके निरोधन के उपाय भी संक्षेप में इंगित करती है यह कृति।
इस कृति में भी विजय रंजन जी ने ‘राष्ट्र ऋण’ नामक एक नवीन ऋण को बैखरी में स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे कि राष्ट्र के प्रति प्रत्येक राष्ट्रिक की प्रतिबद्धता एवं कर्त्तव्यपालन सुनिश्चित हो सके।
‘भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श’ प्राचीनकाल से ही भारत राष्ट्र में परिव्याप्त राष्ट्रवाद ख् जो भारतेतर जगत् के राष्ट्रवाद से सर्वथा विलग, विलक्षण, सृजनात्मक, सार्वकालिक सार्वकल्याणक और किसी को हानि पहुँचाए/किसी का शोषण किए बिना राष्ट्र के लिए उत्कर्षप्रदाता है , की गहन, विशद एवं प्रमाणसहित प्रमापूर्ण तार्किक विवेचना की कृति है। साथ ही इसमें राष्ट्रवाद के इतिहास, भाषा, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और वैश्वीकरण के साथ सहसम्बन्ध की भी विस्तृत एवं गहन तार्किक विवेचना की गई है। कृति के ‘भारतीय राष्ट्रवाद और संस्कृति’ अध्याय में वर्णव्यवस्था बनाम जाति-व्यवस्था सम्बन्धी वाङ्मयिक तथ्यों की प्रस्तुति और उनकी तार्किक विवेचना प्रस्तुत करके तत्सम्बन्धी भ्रमों का निवारण करने का भी प्रयास अवदानित है जिससे समाज के तत्कारण से होने वाली एकता-सौमनस्य के भंजक कारकों का निवारण संभव है।
कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद: क्यों औ...र कैसे’ में भारतीय राष्ट्रवाद के परिचय और भारतीय राष्ट्रवाद (प्रत्युत राष्ट्रवाद) की आवश्यकता के आरेखन के साथ ही वर्तमान में प्रसुप्त-से प्रतीत होने वाले भारतीय राष्ट्रवाद के स्फुरण एवं जनमानस में इसके सतत जागरण को स्थायित्व प्रदान करने के उपायों की विस्तृत चर्चा की गई है। इस कृति में अनेकानेक राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि श्री विजय रंजन जी की भारतीय राष्ट्रवाद सम्बन्धी तीनों कृतियाँ सुस्थापित करती हैं कि यूरोपीय राष्ट्रवाद की अपेक्षा देवी भारती के भारतीत्व से सहयुजित ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ शान्तिशील, सत्त्वशील और सार्वकल्याणक हैं। इसके फासीवादी या हिंसक होने की तनिक भी सम्भावना नहीं है।
Û आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ में आदि-महाकवि वाल्मीकि की कृति ‘रामायणम्’ के आधार पर आदि-महाकवि के अवदानों की तर्कपूर्ण विवेचना करके श्री रंजन जी के द्वारा निर्धारित किया गया है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि ‘प्रथम महाकवि’, प्रथम लोकवादी कवि, प्रथम मनोवैज्ञानिक कवि, प्रथम नारीवादी कवि, प्रथम नयरसवादी कवि, प्रथम प्रकृतिवादी कवि, प्रथम बिम्बवादी कवि, प्रथम राष्ट्रवादी कवि, प्रथम मानववादी कवि और काव्य में नयवाद के प्रथम प्रस्तोता कवि हैं। साहित्य सम्बन्धी प्रस्थापनाओं (यथा लोकवाद, नारीवाद, बिम्बवाद, प्रकृतिवाद, राष्ट्रवाद आदि-आदि) के भारतीय मानस में प्रथम उद्भूत होने के तथ्य को कृति सफलतया उजागर करती है। इस कृति में उल्लिखित तथ्यों के आधार पर इन सत्य तथ्यों को भारतीय जनमानस में यथार्थ रूप से पुनर्स्थापित करके उसमें आत्मगौरव का संचार किया जा सकता है। इस कृति में आदि-महाकवि को अप्रतिम और प्रथम मानववादी, लोकवादी, नारीवादी आदि सिद्ध करने में भी श्री रंजन जी ने उससे सम्बन्धित इतिहास-भूगोल-दर्शन-कर्म-कथ्य की इतनी सारगर्भित सघन विवेचना प्रस्तुत की है कि साहित्य का शोधार्थी उनसे बहुत कुछ सीख ले।
Û श्री विजय रंजन जी की शिक्षा-सम्बन्धी पुस्तक कृति ‘भारतीय शिक्षा-व्यवस्था: सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पक्ष’ (शीघ्र प्रकाश्य) में शिक्षा को उसकी व्युत्पत्ति के आधार पर ‘ ि$ श $ क्ष $ ा’ अर्थात् ‘पावन ईक्षण की शक्ति को आगे लाने वाले’ उपक्रम के रूप में परिभाषित करते हुए शिक्षा से ज्ञान, विद्या, भारतीय संस्कार और जीविकोपार्जन-सामर्थ्य का उपार्जन अभिप्रेय बताते हैं। इसीलिए वे अपनी इस कृति में राष्ट्रवादी, भारतवादी शिक्षा-व्यवस्था की और भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा-नीति के नीति-नियमन की संस्तुति करते हैं। इस तरह यह पुस्तक भी अपने विन्यास परास में क्रान्तिकारी परिवर्तनों को समाहित किए प्रतीत होती हैं। इस कृति में शासन द्वारा अनेकानेक अवसरों पर ‘राष्ट्रीय शिक्षा-नीति के निर्माण‘ की सदिच्छा’ के परिप्रेक्ष्य में कृति में भारतीय वाङ्मय के आधार पर भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की विशद विवेचना प्रस्तुत करके शिक्षा-सम्बन्धी नीति को ‘भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के रूप में निर्माण के लिए अनेकानेक प्रस्ताव प्रस्तावित किए गए हैं। कृतिकार के अनुसार ‘भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के रूप में विकसित शिक्षा-नीति ही भारत की नई पीढ़ी को इस प्रकार से संस्कारित कर सकेगी जिससे भावी भारतीय समाज न केवल अनेकानेक सामाजिक समस्याओं/विसंगतियों से मुक्त होगा वरन् आधुनिक युग की वांछाओं के अनुरूप ढलने के बावजूद अपने प्राचीन गौरव से गौरवान्वित होकर, राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बँध कर राष्ट्र को मिलने वाली सभी चुनौतियाँ का सफलतापूर्वक सामना कर सकेगा।
Û कृति ‘विश्व-विजय पथ पर हिन्दी’ (शीघ्र प्रकाश्य) में भारतीय राष्ट्रभाषा ‘हिन्दी’ की वैश्विक स्थिति की शोधपूर्ण विवेचना प्रस्तुत करते हुए हिन्दी की वैश्विक विजय के उज्ज्वल भविष्य की ओर इंगित किया गया है। साथ ही हिन्दी के विश्व-विजय अभियान में व्यष्टिगत, समष्टिगत, संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर सहयोग किस प्रकार किया जा सकता है, इस पर यथोचित प्रकाश डाला गया है। इस कृति का परास हिन्दी भाषा की विशेषताओं के गान के साथ-साथ हिन्दी को शीघ्रतिशीघ्र राजभाषा और विश्वभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कराने के लिए संधानित है।
विजय रंजन की समालोचनात्मक कृतियों का गहन अवलोकन करते हुए मुझे श्री रंजन की प्रकाशित गद्य-कृतियों में कुछेक समावर्तक तत्त्व देखने को मिले। यथा-
- प्रायः सभी कृतियों में लेखक श्री रंजन ने अपने सुदीर्घ आत्मकथ्य को, जो वास्तव में लेखकीय कथन ही है, ‘पुरावृत्ति और विवृति’ के रूप में प्रस्तुत किया है। इससे सुदीर्घ स्वरूप में कृति की विषयवस्तु की प्रस्तावना, कृति-लेखन की पारिस्थितिकी और कृति-प्रकाशन का औचित्य स्पष्ट हो जाता है।
- ‘प्राक्कथन’, ‘शुभाशंसा’ आदि के नाम से एक या अधिक हिन्दी विद्वानों की सम्मतियाँ भी कृति में सम्मिलित हैं, जो कृति-कथ्य से सम्बन्धित तो होती ही हैं, उन्हें पढ़ने से लगता है कि ये साहित्यिक ईमानदारी से ही लिखे गए हैं।
- पुस्तक कोई भी हो, अपने विषय के उत्स, इतिहास, भूगोल, मूल तत्त्व सम्बन्धी कथ्य-तथ्य तथा पक्ष-विपक्ष के तर्क-वितर्कों का आलोड़न और अंत में तर्कसम्मत निष्पत्ति-- यह अति महत्त्वपूर्ण समावर्त्तक है रंजन जी की कृतियों के आलेखों का।
- प्रथम प्रस्तर कथन के पश्चात् दूसरे प्रस्तर को जोड़ने के लिए प्रयुक्त संयोजक शब्द जिससे दूसरा प्रस्तर पहले वाले से अलग-थलग न दिखे--- ऐसा विशिष्ट लेखन-व्यूह भी रंजन जी के लेखन का एक समावर्त्तक है जो उनकी प्रत्येक गद्यात्मक रचनाओं में देखने को मिलता है।
- आलेखों के बीच में प्रस्तर-दर-प्रस्तर कविता-प्रवाही भाषा, बीच-बीच में लोकोक्ति, मुहावरे और आंचलिक भाषा के शब्द, कुछ नए गढ़े हुए शब्द आदि-आदि के साथ तर्कसम्मत, प्रमासम्मत, हृदयग्राही विवेचन। हाँ, यदि दोष कहा जाए तो वह यही है कि ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक प्रथम कृति में और उसके बाद की कृतियों में भी वे संयुक्त वाक्यों का प्रयोग अधिक करते हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्दों और उद्धरणों के कारण कभी-कभी उनकी भाषा प्रतीतया क्लिष्ट और असहज तो कहीं-कहीं दुरुह हो जाती है। कतिपय विद्वानों ने अपनी समीक्षाओं में इसका संकेत करते हुए आलोचना की है। ऐसी आलोचनापरक प्रतिक्रियाओं और समीक्षाओं को भी श्री रंजन ने पूरी साहित्यिक ईमानदारी से बिना किसी संशोधन के अपने ब्लॉग, वेबसाइट और अवध-अर्चना पत्रिका में प्रस्तुत कर दिया है। अपनी बाद की पुस्तकों में, विशेषकर ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ तथा ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ आदि में श्री रंजन ने संभवतः इन आलोचनाओं को स्वीकार कर छोटे-छोटे साधारण वाक्यों का प्रयोग किया है, जिससे उनकी भाषा की सहजता बढ़ी भी है, किन्तु संस्कृतनिष्ठ शब्दावली त्यागने को वे तैयार नहीं दिखते इन कृतियों में भी।
- श्री रंजन शब्दों को प्रायः तोड़ कर लिखते हैं। उदाहरण के लिए वे ‘और’ को ‘औ...र’, ‘लेकिन’ को ‘ले..कि..न’, ‘तदेव’ को ‘त..दे..व’ लिखते हैं। यह विशिष्ट शैली उनकी सभी पुस्तकों में देखी जा सकती है। कहानी, कविता में भी यदा-कदा यह शैली देखने को मिलती है।
अपनी कृतियों में श्री रंजन जी ने इस विषय में अपना मत प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि उन्होंने इस लेखन-शैली को ‘अज्ञेय’, गिरिजा कुमार माथुर आदि से अनुकृत किया है।
- श्री रंजन की प्रकाशित पुस्तकों में संगृहीत अधिकांश आलेख पुस्तक-प्रकाशन के पूर्व मूलतया उनकी पत्रिका अवध-अर्चना एवं अन्यान्य पत्रिकाओं में प्रकाशित किए जाते हैं; किन्तु पत्रिका में प्रकाशित आलेख और कृति में संयोजित आलेख की तुलना करने पर मुझे ज्ञात हुआ कि उन आलेखों में अनेक बार भारी अन्तर दृष्टिगत होता है। इसी प्रकार, अवध-अर्चना में प्रकाशित उनकी कृतियों के विज्ञापन-विवरणों को देखने पर ज्ञात हुआ कि सम्बन्धित पुस्तकों के अध्यायों के नाम आदि में भी सम्बन्धित विज्ञापित तथ्यों से अनेक परिवर्तन दिखते हैं।
एक दूरभाषीय वार्त्ता में उपर्युक्त तथ्यों के सम्बन्ध में जिज्ञासा करने पर उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि उन्होंने साहित्य का ज्ञान किसी कालेज या पाठ्यक्रम से प्राप्त नहीं किया, बल्कि स्वाध्याय से अर्जित किया है। ज्यों-ज्यों स्वाध्याय बढ़ता जाता है, उनके ज्ञान-कोष में नए-नए ज्ञान-बिन्दु जुड़ते रहने से विस्तार होता जाता है, जिससे वे अपनी पुस्तकों के मूल आलेखों में छोटे-बड़े संशोधन-परिवर्द्धन करके ही उन्हें पुस्तकीय स्वरूप में संयोजित करते हैं। ज्ञान-विस्तार के कारण ही वे कृति की विषयवस्तु, शीर्षक, अध्याय-नाम आदि में भी निरन्तर संशोधन करते रहते हैं। फलतः अनेक बार पत्रिका में प्रकाशित आलेख और पुस्तकों में प्रकाशित आलेख में भारी अन्तर दृष्टिगत होने लगता है। उन्होंने यह भी बताया कि पुस्तक मूल रूप में लिखने के तत्काल बाद वे इसीलिए उसे प्रकाशित नहीं करा पाते। प्रकाशन में पुस्तक देने के अंतिम क्षण तक वे अर्जित ज्ञान के समावेशन द्वारा पुस्तक को संशोधित-परिवर्तित करते रहते हैं और इस तरह पुस्तक-समग्र को सब प्रकार से त्रुटिविहीन करके ही प्रकाशित कराते हैं। यह बार-बार का संशोधन-परिवर्द्धन एक विशिष्ट समावर्त्तक के रूप में उनकी पुस्तकों में विद्यमान है जो अवध -अर्चना में प्रकाशित सम्बन्धित आलेख से तुलना करने पर अधिक स्पष्ट हो जाता है।
विजय रंजन जी एक कुशल, सफल समीक्षक एवं प्रखर समालोचक ही नहीं हैं। वे सकारात्मक समाजधर्मी साहित्य की रचनाधर्मिता से परिपूर्ण एक परिपक्व कथाशिल्पी भी हैं।
श्री रंजन जी का लेखनारम्भ, जैसा कि उन्होंने अपने आवास पर हुई वार्त्ता में बताया था, कविता से हुआ था, पत्र-पत्रिकाओं में भी कविताएँ अधिक प्रकाशित भी हैं। आलेख का प्रथम प्रकाशन उनके कालेज श्रीगाँधी विद्या मन्दिर इन्टर कालेज की पत्रिका ‘ज्योति’ से हुआ था, लेकिन उनकी प्रथम पुस्तक ‘सूरज की आग’ एक कहानी-संग्रह थी जिसका प्रकाशन वर्ष 1981 में हुआ था।
कहानी-संग्रह ‘सूरज की आग’ में इस नाम की भी एक कहानी है। किन्तु इस सग्रह को पढ़ने से लगता है कि इसमें प्रकाशित कहानियाँ चूँकि श्री रंजन जी के लेखनारम्भ काल की हैं, संभवतः इसी कारण उनमें वह प्रौढ़ता एवं सुघरता नहीं है, जो ‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह की कहानियों में हैं। वस्तुतः कहानी-संग्रह ‘सूरज की आग’ की ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’, ‘पोस्टमार्टम’ आदि कुछ कहानियाँ इन्हीं नाम और कथानक से ‘उभरते बिम्ब’ संग्रह में भी हैं। लेकिन कथानक के स्वरूप की अभिव्यक्ति में जो परिपक्वता ‘उभरते बिम्ब’ में है, वह ‘सूरज की आग’ की इन्हीं कहानियों में नहीं है।
वर्ष 2013 में प्रकाशित ‘उभरते बिम्ब’ की अनेक कहानियाँ सामाजिक, वैचारिक विसंगतियों का और उनके निदान को प्रस्तुत करने वाली कहानियाँ हैं। कहना होगा कि ‘उभरते बिम्ब’ की कहानियों का परास लोकहिती नैतिकता से उद्दीप्त है। संग्रह की यूँ तो लगभग सभी कहानियाँ वैयक्तिक और समष्टिगत विसंगतियों का सटीक चित्रण करती हुई समस्या के हल की ओर इंगित करती हैं, किन्तु इनमें से मेरी दृष्टि में कुछ कहानियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं जैसे ‘जूतों की चुगली’, ‘यूरेका’, ‘हुड़ुकचुल्लू’, ‘अलगिया गिलास’, ‘प्रतिमान’। तो जूतों की चुगली’ बालकों को सामाजिक आचार का पाठ पढ़ाने वाली कहानी है। ‘जूतों की चुगली’ बताती है कि किस तरह हमारी छोटी-छोटी समझी जाने वाली आदतें और व्यवहार हमारे व्यक्तित्व को गम्भीर रूप से प्रभावित करने वाली होती हैं। ‘यूरेका’ सामाजिक बाल-समस्या से जूझती कहानी है। ‘यूरेका’ अत्यत खूबसूरती से बिना किसी व्यय के उस समस्या का सहज सरल निदान प्रस्तुत करती है, जिससे शहर, नगर के कालोनीवासी रोज ही दो-चार होते रहते हैं। संग्रह की कहानी ‘हुड़ुकचुल्लू’ शिक्षा की महत्ता जताने वाली कहानी है। ‘हुड़ुकचुल्लू’ बताती है कि यदि संकल्प दृढ़ और सदाशय भरा हो, मेहनत यदि ईमानदारी से की जाए, तो प्रत्येक मनुष्य अपनी दुष्कर परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर उन्नति के नए प्रतिमान गढ़ सकता है। ‘अलगिया गिलास’ सामाजिक सद्भाव से ओतप्रोत है। यह कहानी समाज में (विशेषकर ग्रामीण समाज में) बहुत कुछ अंशों तक अब भी व्याप्त खान-पान में छुआछूत की समस्या का सशक्त निदान प्रस्तुत करती है। इसी प्रकार ‘प्रतिमान’ शीर्षक कहानी में स्वतंत्रता-सेनानी का जुझारुपन दिखाया गया है। ‘प्रतिमान’ का महाकथन यह है कि जब राष्ट्रहित को दूर तक और देर तक प्रभावित करने वाली दुःस्थिति, परिस्थिति हमारे सम्मुख उपस्थित हो जाए, तो हमें अपने देश और राष्ट्र के हित में अपने समस्त धर्मगत, जातिगत, समुदायगत संकीर्णताओं और दुराग्रहों का परित्याग करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए। कहना न होगा कि विजय रंजन की कहानियों में प्रतिबिम्बित उनकी रचनादृष्टि लोकहितकारी नैतिकता से प्रदीप्त है।
संग्रह की अनेक कहानियों के विषय परिवार-व्यवस्था की हामीकार हैं। उदाहरणार्थ ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’, ‘वापसी’ ऐसी ही कहानियाँ हैं। संग्रह की ‘कापुरुष’ और ‘पोस्टमार्टम’ नारी-जगत् पर लिखी गई कहानियाँ हैं। ये नारी-प्रतिभा को, नारी-मन को समुचित मान देने की वकालत करने वाली कहानियाँ हैं। दूसरी ओर, ‘अजूबा’ और ‘घटती-बढ़ती परछाईंयाँ’, ‘इमेज’, ‘दूसरी हार का अहसास’, ‘उभरते बिम्ब’ कहानियाँ पुरुष-मनोविज्ञान को प्रत्यक्ष करने वाली कहानियाँ हैं, जबकि ‘कहाँ से कहाँ तक’ और ‘अजूबा’ में मानव-मन की अकल्पनीय अजब-गजब मति-गति का रेखांकन है।
इसी कहानी-संग्रह की एक अन्य कहानी है- ‘साढ़े तीन घंटे’। इसमें मानव-जीवन के प्रायः सभी प्रमुख पक्षों को साढ़े तीन घंटे के लघु अन्तराल में प्रत्यक्ष होते दिखाया गया है। जीवन की आपाधापी, भागमभाग, पड़ोस का राग-द्वेष, स्वार्थपरता, जन्म-मृत्यु, सिनेमा, मनोरंजन, मित्रों की चुहलबाजी, पारिवारिक दायित्व, विराग, निवृत्ति, दुःख-सुख, आकांक्षा, दैवीय भक्ति, भौतिकतावाद, लूट-खसोट, अपराध, पुलिस-एन्काउन्टर, दण्ड आदि सामान्य नगरीय जीवन के प्रायः सभी पक्षों का सफल रेखांकन करने वाले कथानक को मात्र साढ़े तीन घंटे में समेट कर एक सफल कहानी के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें अंत में सुखद भविष्य-निर्माण में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई हेतु संलग्न दिखा कर मानव-जीवन में विरागयुक्त निवृति नहीं, अपितु प्रवृति को प्रभावी दर्शाया है। यह रचनाकार की सकारात्मक रचनाधर्मिता को अतिरिक्त रूप में रेखांकित करता है। यहाँ उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी लेखक जेम्स ज्वायस ने भी अपने उपन्यास ‘यूलिसिस’ में मानव-जीवन के कुछेक वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया था जबकि ‘यूलिसिस’ और ‘साढ़े तीन घंटे’ की तुलना करें तो हर्षमिश्रित विस्मय होता है कि ’श्री रंजन ने तो ‘साढ़े तीन घंटे’ में मानव-जीवन की विविध उथल-पुथल को मात्र 3.5 घंटे की अवधि और पुस्तक के मात्र 19 पृष्ठों में ही दिखा दिया है।
‘उभरते बिम्ब’ की कहानियों की अन्य उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं- उद्देश्यपूर्ण विषय, विषयानुरूप कथा, कथ्य, पात्र, पात्रों का चरित्रांकन और पात्रों के अनुरूप भाषा। कहानी में यदि देहाती पात्र है, तो ग्रामीण क्षेत्र की लोकभाषा अवधी, अंग्रेज पात्र है, तो अंग्रेज की टूटी-फूटी अंग्रेजी वाली हिन्दी, मध्यवर्गीय पात्र है तो अंग्रेजीमिश्रित हिन्दी। ऐसा देखा जाता है कि प्रायः कथाकार कथा-पात्रों की भाषा का चयन पात्रों के परिवेश के अनुकूल नहीं चुनते। अतः कहानियों में सटीक भाषा का चयन ‘उभरते बिम्ब’ की अतिरिक्त विशेषता है।
निष्कर्षतः ‘उभरते बिम्ब’ की सभी कहानियाँ एक सिद्धहस्त कहानीकार की कहानियाँ प्रतीत होती हैं। अतः कहना अनावश्यक नहीं कि कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की कहानियाँ उद्देश्यपूर्ण और समाज को निकट-दूर से सकारात्मक दिशाबोध देने वाली हैं। संग्रह की सभी कहानियाँ अपने-अपने विषय की परिपक्व कहानियाँ हैं, जिन्हें रंजन जी जैसा प्रौढ़ कहानीकार ही लिख सकता है।
जहाँ तक श्री रंजन जी के लघुकथाकार का प्रश्न है उनका लघुकथा- संग्रह ‘टुकड़े-टुकड़े’ भी पाण्डुलिपित है। इसमें छोटी-बड़ी 51 लघुकथाएँ सम्मिलित हैं। सभी लघुकथाएँ श्री रंजन जी की नितप्रति के जीवन की विभिन्न परिघटनाओं को लेकर नयाचार, सदाचार की वांछा को उकेरती हैं।
श्री विजय रंजन जी एक संवेदनशील कवि भी हैं। श्री रंजन की काव्य-रचनाओं के दो संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनका प्रथम कविता-संग्रह ‘हाशिये से’ वर्ष 1986 में प्रकाशित हुआ था और दूसरा संग्रह ‘किर्चे ं ’ 2009 में। पत्र-पत्रिकाओं में भी श्री रंजन-विरचित शताधिक कविताएँ-- गीत, नवगीत, गजल, हिन्दी गजल, अकविताएँ, मुक्तक, दोहा-- प्रकाशित हैं। श्री रंजन की काव्य-रचनाओं में गीत-नवगीत के साथ-साथ अगीतनुमा विचारशील कविताएँ, हिन्दी वर्तनी, हिन्दी के व्याकरण वाली हिन्दी-गजलें और उर्दू-शब्द, उर्दू के व्याकरण वाली गजलें, रुबाई अर्थात् कविता की अनेक विधाओं में रची गई रचनाएँ हैं जो नित्यप्रति की दैनन्दिनि जीवनानुभवों से उपजी कविमन की विविध भाव-तरंगों से तरंगायित तो हैं, लेकिन कविमन वैयक्तिकता से आबद्ध नहीं है, अपितु इन काव्य-रचनाओं में कवि के वैयक्तिक भावानुभावों को समष्टि से आमेलित करते हुए, वयम् को अहम् में अन्तरित करते हुए, अभिव्यक्त किया गया है।
इन संग्रहों में कविता की कई विधाओं जैसे गीत, नवगीत, गजल-हिन्दी गजल, अकविता, अगीत की रचनाएँ सम्मिलित हैं। कुछ कविताएँ दोनों संग्रहों में सम्मिलित हैं। इन सभी कविताओं में भी सामाजिक, विद्रूपों का चित्रांकन और वक्रोक्ति में उनका निदान इंगित है। श्री रंजन की इन कविताओं में आचार्य मम्मट की शिवेतर-क्षतए और सहित्भावी नैतिकता विद्यमान है। प्रकाशित कविता-संग्रह ‘किर्चें’ में संगृहीत विजय रंजन द्वारा रचित कविताएँ भी सामाजिक कुरीति, अनाचार, उत्पीड़न आदि के विनाश एवं साहित्यिक, सामाजिक उत्थान एवं राष्ट्रीय-अन्तर राष्ट्रीय परिदृश्य से सम्बन्धित हैं। अनेक कविताएँ दिशाबोधक हैं, जैसे ‘सहर न जाव बड़के भइया’, ‘अरे बड़कऊ’, तो अनेक कविताएँ वस्तुस्थिति का यथार्थ चित्रण करने वाली हैं, जैसे ‘हाँ मैं अपने गाँव गया’, ‘नई सदी तेरी जय जय हो’, ‘तुम कहते हो सपने देखें ....’, ‘काश ! कहीं तुम....’, ‘तुम कह दो न...’, ‘मेरे राम जी उसको भी’। कुछ कविताएँ तो विजय रंजन के कवि के सृजनात्मक संकल्पों को अनुगुंजित करने वाली हैं, जैसे ‘फिर लिखेंगे हम’, ‘अभी न लिखना अन्तिम कविता’, ‘तुम भी लिखना मैं भी लिखूँगा’। दूसरी ओर, कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जिनमें शब्दार्थ की गहन अभिव्यंजना के साथ-साथ शब्द-योजना भी अति मनोहर और चित्ताकर्षक है, जैसे ‘अफसाना’, ‘फूल के जैसा’, ‘ठीक’, ‘परिवर्तन’, ‘नाड़ा उवाच’। ‘माँ’, ‘किताब’ और ‘पिता’ शीर्षक काव्य-रचनाएँ जहाँ माँ, किताब और पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व को नए अंदाज में प्रस्तुत करती हैं, वहीं, श्रीरामजन्मभूमि: एक रेखाचित्र शीर्षक कविता रामजन्मभूमि मन्दिर के बहाने से मन्दिर के सामाजिक, सांस्कृतिक दायित्व की विस्तृत कर्मभूमि की गवेषणा करती है।
‘किर्चें’ में संगृहीत गीत, नवगीत अत्यन्त गेय, छन्दपरक सुगठित और सुघटित हैं, तो इसी प्रकार हिन्दी गजलें भी सुघटित हैं। इसमें सामाजिक- सांस्कृतिक विषयों से सम्पृक्त, संतृप्त, राष्ट्रीय विषयों पर, मुक्त अर्थव्यवस्था के विरोध वाले गीत भी हैं, छोटी व बड़ी बहरों वाली उर्दू-भंगिमा की गजलें भी और राष्ट्रीय सामाजिक विषयों वाली गजलें भी हैं। कुल मिला कर ‘किर्चें’ में सांस्कृतिक-सामाजिक गिरावट, अनय, अनाचार, अत्याचार का विरोध करने वाली कविताएँ, विद्रूप एवं विसंगतियों के निवारण की रचनाएँ हैं। साथ ही इसमें नए बिहान, नई आशा वाली रचनाएँ भी हैं।
“दिन सारे बीमार थे पहले, अब रातें बीमार हो गईं” (ं‘रातें भी बीमार...’, किर्चें, पृ॰ 8) $ $ $ “किसे दिखाएँ क्या बाँधा है खुली गाँठ कोरे रुमाल में” (.......‘हारे दिन जीते दिन’, किर्चें, पृ॰ 7) जैसी काव्य-पंक्तियों से श्री रंजन जहाँ निराशा के कवि दिखते हैं, वहीं- “साकी से जहाँ कर लो रिश्ता वहीं वक्त ठहर जाएगा, तब जन्नत से आगे होंगे तुम और तुम्हारे मयखाने” (‘साकी’..., हाशिये से, पृ॰ 43) और “साँस में सुर भरो बाँसुरी गाएगी बाँसुरी की भला कितनी औकात है” (‘साँस में सुर भरो...’, किर्चें, पृ॰ 43) में वे आशावादी हैं और जीवन जीने की कला भी बताते हैं। ‘तेरी आँखों में’ (किर्चें, पृ॰ 22) शीर्षक हिन्दी गजल में “ढाई आखर पनघट रंजन सब रंगीन करे, ऐसा काजर मैंने देखा तेरी आँखों में” लिखने वालंे श्री रंजन जी को निराशावादी कवि नहीं माना जा सकता। वे तो इसके आगे भी लिखते हैं -“कल की काली रात से क्यों डरा रहे हो, इस समय तो है रखैलन चाँदनी अभी” (‘चैन’, पृ॰ 33, किर्चें) $ $ $ “सूरज निकला फूल हँसे है, तुम बैठे क्यों गुमसुम होकर” (‘नदिया कहती....’, पृ॰ 47, किर्चें ) और “फिर लिखेंगे हम नदी की धार पर एक नाम” (‘फिर लिखेंगे हम.....’, पृ॰ 13, किर्चें ) $ $ $ “और देखना, आएगा एक न एक दिन-- वह दिन/होंगे नत हत/बड़े से बड़े सारे विध्वंसक/तुम्हारी निर्विकल्प अहिंसा के समक्ष/होंगे शरणागत/महसूसेंगे वे जरूरत अहिंसा की/चरम शान्ति की/दूर नहीं है ऐसा दिन” (‘बामियान के बुद्ध से’, पृ॰ 100, किर्चें )। इसी तरह ‘किर्चें’ की ‘अनागत’ शीर्षक कविता में “कल गुलाब मेरे आँगन में अपनी गंध लुटाएगा” और ‘कैसे अंगीकार करे मन’ शीर्षक कविता में “आँगन-आँगन सरसों फूली.....सखी सिखाए नैन-सैन में आसन चौरासी” सदृश काव्य-पंक्तियों के रचनाकार विजय रंजन निराशावाद के कवि नहीं हैं। श्री रंजन ने ‘तुम कहते हो सपने देखें....’ शीर्षक कविता में ”..सपने वह भी धानी“ और “नाच रहे थे मगन-मगन यहीं कहीं पिछले सावन में, किससे डर कर भाग गए बनमोर हमारे गाँव से” (‘तुम कह दो न....’ पृ॰ 37, किर्चें ) आदि कविताओं में देश-काल के विद्रूप का निराशाजनक चित्रण अवश्य किया है, परन्तु प्रतीत होता है कि ऐसी कविताओं में निराशा का चित्रण नहीं, अपितु नकारात्मक वस्तुस्थिति का चित्रांकन कर वे जन-मन को सचेत कर रहे हैं।
‘किर्चें’ की अन्य उल्लेखनीय काव्य-पंक्तियाँ हैं-
“भोलू नहीं अब जग्गू दादा बने सिंहासन रिश्तेदार”
(........तुम भी लिखना, मैं भी लिखूँगा, किर्चें, पृ॰ 45)
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“बैलपने को कब तक ढोए रंजन सुख दुःख समझे है,
बैल की गाली मत दिलवाओ मेरे राम जी उसको भी”
(मेरे राम जी उसको भी, किर्चें, पृ॰ 40)
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”तुम कह दो न कैसे उठा ये दौर हमारे गाँव से
बहकी नदिया लील गई सुखठौर हमारे गाँव से”
(तुम कह दो न........, किर्चें, पृ॰ 37)
“बियाबान को छोड़े तो भी बिखरे आँगन तब सन्नाटे
बँद घड़ी घंटाकर वाली जब देखो तब मारे चाँटे”
(......हथेली उगते काँटे, किर्चें, पृ॰ 25 )
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“जिन्दगी की रेल से हम कट गए जैसे”
( जिन्दगी की रेल से...., किर्चें, पृ॰ 26)
ऐसी गजलें भी हैं ‘किर्चें’ में, जो देश-काल के विद्रूपों का चलचित्र प्रस्तुत करती हैं। देशकाल की नकारात्मक स्थितियों का कवितायन प्रस्तुत करते हुए श्री रंजन ने अनेक स्थलों पर व्यंग्य और वक्रोक्ति का भी सुघर प्रयोग किया है ‘नई सदी तेरी जय जय हो’ शीर्षक कविता में जिसका शीर्षक ही वक्रोक्तियुक्त है। इस कविता का सम्पूर्ण कथ्य वक्रोक्ति में ही है। ऐसी कविताएँ भी अनेक हैं।
गाँव-गिराँव से और देश-काल से सरोकारित गीत-गजल अनगिनत हैं इस कविता-संग्रह में। ‘मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं....’ (किर्चें, पृ॰ 2), ‘अभी न लिखना अन्तिम कविता’ ( किर्चें, पृ॰ 20 ) तथा अकविता ‘स्वयं से’ ( किर्चें, पृ॰ 48) में श्री रंजन जी कविता लिखने की आवश्यक तैयारी भी इंगित कर देते हैं। कवित्व के विषय में वे लिखते हैं--
“गजल ओढ़ ले गजल बिछा लें, कम होते ऐसे दुष्यन्त,
गजलों से सहवास निभाना तुम भी सीखो मैं भी सीखूँ।।”
(‘....तुम भी सीखो मैं भी सीखूँ’ , किर्चें, पृ॰ 44)
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“आ पहुँचे जाने-अनजाने दर्पण तीरे,
आओ अब खुद को पहचानें दर्पण तीरे।”
(गजल-संग्रह ‘दर्पण तीरे’ से)
श्री रंजन की काव्य (गद्य-पद्य)-सर्जना के अम्बार देख कर प्रतीत होता है कि सम्भवतः उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ उन्होंने अपने को पहचानने के क्रम में ही लिखी हैं।
इस प्रकार जीवन के विविध रंगों से भरपूर सरोकार रखने वाले काव्य-सर्जक श्री रंजन जी को निराशा का या ‘निकल कर आँखों से चुपचाप बहने वाली कविता’ सदृश विरह वाले विप्रलम्भ का कवि नहीं माना जा सकता। प्रतिकूलताओं, निराशा, अवसाद से एक नहीं, बार-बार उबर कर जीवन जीने के, जीवन को सकारात्मक रचनाधर्मी बनाने के अवसर के रूप में लेते हैं वे। तभी तो अपनी ‘साँस में सुर भरो....’ शीर्षक गजल (किर्चें, पृ॰ 43) में लिखा उन्होंने ”हाँ सृजन बस सृजन देह का धर्म है, देह के बाद क्या, बाद की बात है/क्यों डरेगा भला किसी तक्षक से वो, लोग कहते हैं रंजन भी सुकरात है।“
‘किर्चें’ में संगृहीत एक अकविता ‘क्षमायाचना मरी चुहिया से’ का शीर्षक और उसकी विषयवस्तु भी सामान्य से अलग हट कर है। सबसे पहले मैंने उसे ही पढ़ा। वर्ष 1970 की लिखी हुई अकविता है यह। इसमें संवेदनाशील प्रश्न भी उठाया गया है कि मानव क्यों मान बैठा है कि धरती केवल उसके उपयोग के लिए ही है ? अन्यान्य अकविताएँ यथा ‘बामियान के बुद्ध से’ हो या ‘नाड़ा-उवाच’, ‘कूकड़ा से’ आदि अतुकान्त होते हुए भी वे कवि-मन की संवेदनशीलता को रूपायित करने में समर्थ हैं। ‘कूकड़ा से’ में प्रकारान्तर से जन्मभूमि का गुणगान भी किया गया है। ‘नचिकेता से’ शीर्षक से उनकी एक कविता है प्रश्न-शैली में। इसमें प्रश्न के साथ ही उसका उत्तर भी प्रश्न के रूप में ही दे दिया गया है-
“ मृत्युबोध को किस सम्बल से तुम कर आए परम पराजित ?
अति विराट जीवन-लक्ष्यों के प्रति क्या थे तुम चरम समर्पित ?“
(नचिकेता से, किर्चें, पृ॰ 90)
श्री रंजन-रचित अगीत, अकविता भी लय से विलग नहीं यति, गति और विभिन्न शब्द-बिम्ब की कविताएँ विचारशीलता से परिव्याप्त हैं। ‘किर्चें’ की विभिन्न शीर्षकों वाली अकविताएँ, अगीत आदि, उदाहरणार्थ ‘सलाह’, ‘वस्तुस्थिति’, ‘गुलाब और नागफनी’, ‘चेतावनी’, ‘माँ’, ‘नाड़ा-उवाच्’, ‘ले लिया बढ़ कर सुपारी’, ‘ऋतुराज से’ आदि भी लय, यति, गति से पूर्णतया समन्वित हैं। अलंकारों में उपमा, रूपक, वक्रोक्ति अधिकांश कविताओं में सुझंकृत हैं।
‘सूरज’ और ‘बंजारा’ जैसे बिम्बों का प्रयोग भी अनेकत्र विद्यमान है इन कविताओं में। नए सुखद, प्राणवंत जीवन की आशा को रूपायित करने के लिए नए विहान, नए सूरज का और जीवन की नश्वरता को रूपायित करने के लिए बंजारा जैसे रूपकों का प्रयोग उनकी बहुलांश काव्य-रचनाओं में शीर्षकों से लेकर कविता-कथ तक दिखता है। बहुत कुछ बिम्बवादी रूपक-विधान में विरचित है उनकी कविता-कृतियों में। ‘किर्चें’ संग्रह का शीर्षक स्वतः बिम्बपरक है। वस्तुतः ‘किर्च’ वह छोटा सा टुकड़ा होता है जो पैना होता है, गहरे धँस सकता है और धँसने के बाद निकलता नहीं, टीसता रहता है जब-तब। ऐसे अर्थबोधी शीर्षक की कविताएँ प्रतीकवाद, बिम्बवाद से आभरित हैं तो उसमें आश्चर्य क्या ?
रंजन जी की कविताओं में अभिमन्यु , विश्वामित्र, सुकरात, नचिकेता जैसे चरित्र भी विशिष्ट बिम्ब के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। अपनी ‘परम्परा’ शीर्षक कविता में वे कहते हैं-- “अभिमन्यु को पराजित कहने का साहस न तुममें है, न आने वाले समय में” (‘परम्परा’, किर्चें, पृ॰ 67)। श्री रंजन की कविताओं में सुकरात, अभिमन्यु, विश्वामित्र, सूरज सदृश बिम्बार्थी प्रयोगों से प्रतीत होता है कि इन बिम्बों की परम्परा उनके मन-मस्तिष्क में गहरे पैठी हैं। निष्कर्षतः कविता-जगत् में भी श्री रंजन जी एक श्रेष्ठ कवि सिद्ध होते हैं।
श्री रंजन ने बताया कि कृतियों और अवध-अर्चना के अंकों की प्रशंसा में जो समीक्षा, प्रतिक्रिया आदि प्राप्त होती है, उसे वे पत्रिका में तो प्रकाशित करते ही हैं, साथ ही वे उसे अवध-अर्चना के ब्लॉग और वेबसाइट पर भी दे रहे हैं। इन पर इस समय चार-पाँच सौ समीक्षाएँ और प्रबुद्ध पाठकों की प्रतिक्रियाएँ अंकित हैं। ऐसे प्रशंसकों में स्थानीय साहित्यकार ही नहीं, विदेशों में बसे साहित्य-मनीषी भी सम्मिलित है। प्रकट है कि भारत और विदेशों में श्री रंजन के साहित्यिक अवदान के प्रशंसकों की शृंखला लम्बी हैं। उनकी कृतियों को पढ़ने के बाद प्रसंगित प्रशंसा सर्वथा उचित प्रतीत होती है।
श्री विजय रंजन को 1976 में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन, मारीशस के लिए कार्यकारी उच्चायुक्त मारीशस उच्चायोग नई दिल्ली द्वारा आमन्त्रित किया गया, परन्तु अपरिहार्य निजी कारणों से वे सहभागिता करने से वंचित रहे। बाद में श्री विजय रंजन को नेहरू सेन्टर, भारतीय उच्चायोग, लन्दन की डॉ॰ दिव्या माथुर द्वारा अनेक बार आमन्त्रित किया गया किन्तु तत्समय अस्वस्थ होने के कारण सहभागिता नहीं कर सके। दैनिक समाचार-पत्र हिन्दुस्तान फैजाबाद संस्करण तथा वर्ष 2018 में दैनिक जागरण आगरा संस्करण में एवं दैनिक जागरण की वेबसाइट में साक्षात्कार प्रकाशित हुआ। वर्ष 2020 में ही ‘साहित्यिक सांस्कृतिक शोध-संस्था, मुम्बई’ द्वारा प्रकाश्य रामाख्यान विश्वकोश के 40 खण्डों के लिए श्री रंजन जी का उपसमन्वयक एवं सहसम्पादक मनोनीत किया गया। वर्ष 2020 में विभिन्न वेबिनारों में उनके भाषण, विश्वयात्रा टाइम्स चैनल, हिन्दुस्तान हॉटलाइन न्यूज टी॰ वी॰ चैनल उनके व्याख्यान, ई-टी॰वी॰ चैनल पर साक्षात्कार भी प्रकाशित हुए हैं। ये सभी यू-ट्यूब में अक्सर ही दिखते हैं। इस तरह श्री रंजन जी के जो संवाद यू-ट्यूब में तैर रहे हैं, वे भी रंजन जी की गहन तपश्चर्या, उनके विद्वत् अध्ययन और बहुआयामी साहित्यिक प्रतिभा के उद्घोषक हैं।
श्री विजय रंजन की काव्य-प्रतिभा गहन गम्भीर और बहुआयामी है जिसे विद्वानों द्वारा भरपूर सराहा जा रहा है। इसका प्रमाण उ॰प्र॰हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा प्रदत्त ‘सरस्वती पुरस्कार’ एवं ‘साहित्यभूषण सम्मान, भारतीय वाङ्मय पीठ कोलकाता, द्वारा ‘स्वामी विवेकानन्द पत्रकार रत्न’ एवं ‘साहित्य शिरोमणि’ मानद उपाधि, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर ़(बिहार) द्वारा मानद उपाधि विद्यावाचस्पति’, अयोध्या-महोत्सव 2018 में प्रदत्त ‘फैजाबाद-रत्न’ सम्मान, महाराष्ट्र दलित साहित्य अकादमी, भुसावल (महाराष्ट्र) द्वारा प्रदत्त ‘प्रेमचन्द लेखक पुरस्कार’, भारतीय हिन्दी भाषा सम्मेलन, भागलपुर (बिहार) द्वारा प्रदत्त ‘साहित्य मार्त्तण्ड’ मानद उपाधि, साहित्य मण्डल, नाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ‘हिन्दी साहित्य विभूषण’ मानद उपाधि तथा फैजाबाद एवं अन्य नगरों के विभिन्न साहित्यिक सामाजिक संस्थानों द्वारा प्रदत्त सारस्वत सम्मान एवं मानद उपाधियाँ तो हैं ही, अपितु अनेक वर्षों में अमेरिकन बॉयोग्राफिकल इंस्टीट्यूट, अमेरिका के ‘मैन ऑफ द ईयर’ मानदउपाधि के लिए श्री रंजन का संचयन और अंततः बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में मानद सदस्यता भी सम्मिलित हैं। उपर्युक्त में से अनेक को अपने अध्ययन-कक्ष की अल्मारी में श्री रंजन ने सजाया हुआ है। परन्तु श्री रंजन की सतत, दीर्घकालिक साहित्यिक साधना के विलक्षण, क्रान्तिकारी एवं जनोपयोगी साहित्यिक, सामाजिक परिप्रेक्ष्यों वाले अवदानों को देखते हुए उपर्युक्त उपलब्धियों की शृंखला कम नहीं होते हुए भी मेरी दृष्टि में पर्याप्त नहीं है। वास्तव में श्री विजय रंजन के साहित्यिक अवदान और उनकी साहित्यिक प्रतिभा इन सबसे बहुत आगे है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि श्री रंजन की कृतियों का साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक परास अति गहन और विस्तृत है। उनका समग्र कृतित्त्व साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रक्षेत्रों में क्रान्तिक महत्त्व का है और यह कहना किंचित् अतिशयोक्ति नहीं कि विजय रंजन द्वारा सृजित पुस्तकों को यदि समुचित प्रचार-प्रसार प्राप्त हो सके, तो वे राष्ट्र के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक उत्थान की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान देकर साहित्य और समाज में आमूल-चूल क्रान्तिकारी सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं।
फैजाबाद-अयोध्या सदृश वर्तमान के असाहित्यिक पहचान वाले स्थल पर बैठ कर अगाध साहित्यिक साधना, वह भी श्रेष्ठ, श्रेष्ठतम काव्य-प्रतिभा के साथ ! स+हितभाव साहित्यम् की साधना, वह भी मात्र स्वाध्याय तपः के सम्बल से ! निस्संदेह यह एक दुष्कर कार्य है।
सर्वाधिक आश्चर्यप्रद तो यह है कि रंजन जी स्वयं तो डॉक्टर अर्थात् पीएच॰डी॰ धारी नहीं हैं; वे हिन्दी-साहित्य तो क्या किसी भी विषय में परास्नातक भी नहीं हैं; लेकिन उनके द्वारा रचित एवं अब तक प्रकाशित सभी पुस्तकें इतने शोधपरक तथ्यों और नवीन प्रस्थापनाओं से भरपूर हैं कि उनमें से प्रत्येक के लिए उन्हें पीएच॰डी॰ तो क्या डी॰लिट्॰ भी प्रदान की जा सकती है।
इतना ही नहीं, उनकी प्रत्येक समालोचनात्मक पुस्तक भावी शोध-कार्य हेतु विविध आयाम भी संकेतित करती है।
निःसन्देह अति ‘महत्’ पूर्ण साहित्यिक विमर्श प्रस्तुत कर रहे हैं श्री विजय रंजन जी। उनके अवदान का मूल्यांकन और समुचित मान आज नहीं तो कल अवश्यमेव किया जाएगा।
वास्तव में श्री रंजन जी का अपरिमित साहित्य गद्य हो या पद्य, उनका भारतवादी, राष्ट्रीयतावादी, लोकहितवादी, नैतिकतावादी संस्कार और संस्कृतिवादी विषयों पर मौलिक सारवान अपरिमित लेखन हो या अवध-अर्चना के शताधिक अंकों का अद्यतन प्रकाशन-सम्पादन, अवध-अर्चना के अनेक विशिष्ट अंकों का प्रकाशन-सम्पादन आदि, सभी विशिष्ट, बहुआयामी एवं साहित्यिक दृष्टि से बहु उपयोगी हैं। श्री रंजन के कृतित्व से झंकृत उनकी बहुआयामी काव्य-प्रतिभा को प्रणम्य मानना ही होगा।
ईश्वर करे कि स्वाध्यायी तपःपूत श्री विजय रंजन शतायु हों और उनकी साहित्य-साधना इसी प्रकार अविरल गति से चलती रहे।Û
आधार ग्रंथ:
1. सूरज की आग कृतिकार विजय रंजन
2. उभरते बिम्ब ”
3. हाशिये सेे ”
4. ‘किर्चें’ ”
5. साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण ”
6. रसवाद औ..र नयरस ”
7. कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व ”
8. कविता क्या है ”
9. क्या है भारत क्या है भारतीयता ”
10. राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित ”
11. भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग ”
12. भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श ”
13. भारतीय राष्ट्रवाद: क्यों औ..र कैसे ”
14. आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान ”
15. टुकड़े-टुकड़े ”
16. भारतीय शिक्षा-व्यवस्था:सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पक्ष ”
17. विश्वविजय-पथ पर हिन्दी ”
- नायर कॉटेज-10, नवल स्टेशन, भीमुनीपटनम् ,उपाड़ा, विशाखापत्तनम्
(आन्ध्र प्रदेश)
(स्थायी निवास: नगर पंचायत सतीगंज अंतू , प्रतापगढ़-230501)
दूरभाष: 8318420153, ईमेल: shivamtiwari1129@gmail-com
(आलेख कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ से उद्धृत)
उत्कृष्ट रचनाधर्मिता के समर्थ रचनाकार : विजय रंजन
- प्रो॰ शरदनारायण खरे
सुखद आश्चर्य है कि कुशल व सक्षम कवि, लेखक, कहानीकार, लघुकथाकार, उपन्यासकार, निबन्धकार, समीक्षक, संपादक व साहित्यकार विजय रंजन श्रेष्ठ चिन्तक व कुशल वक्ता भी हैं। मंच व आकाशवाणी से उत्तम काव्यपाठ करने वाले विजय रंजन अनेकानेक राष्ट्रीय सारस्वत सम्मानों से सुशोभित हैं।
विजय रंजन संस्कृतनिष्ठ भाषा-शैली के कारण कुछ विशिष्ट और कुछ खास माने जाते हैं। उनकी रचनाएँ ओजस्वी तेवरों के साथ देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। वे खूब लिखते हैं, खूब छपते हैं, पर अच्छा लिखते हैं।
विजय रंजन एक ईमानदार कलमकार हैं। उनकी लेखनी व वैचारिकता में सत्य और एकात्मकता व्याप्त है। उनकी लेखनी प्रखर है। उनके लेखन में एक खुश्बू है। वे एक ऐसे विशिष्ट रचनाकार है जो गद्य और पद्य दोनों प्रकार के सृजन में निपुण हैं। वे एक समर्थ रचनाकार हैं।
विजय रंजन की साहित्यिक दृष्टि आध्यात्मिक व सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण है। पौराणिक व आध्यात्मिक चरित्रों व विषयों पर मौलिकता व विश्लेषणात्मकता के साथ सृजन करना विजय रंजन की प्रथम पसन्द का विषय है। उनकी लेखनी उनकी चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। उनका चिन्तन सकारात्मक है। वे अपने लेखन में जहाँ एक ओर राष्ट्रीय आध्यात्मिक दिव्यता को प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी ओर वे समय के समानान्तर चलते हुए आम आदमी की भावनाओं/कामनाओं व हालातों को भी अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। वे समय के समानान्तर भी हैं और विसंगतियों के विरोध में भी हैं। इसीलिए विजय रंजन समय के समानान्तर सृजन करने वाले अनूठे रचनाकार हैं। उनके पास पैनापन है, तो सार्थकता भी है, कोमलता है तो तीक्ष्णता भी है, तेजस्विता है तो ओजस्विता भी है। विजय रंजन जी वस्तुतः युग-सापेक्ष चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे गहरे हैं, तो प्रवाहमय भी हैं।
विजय रंजन के सृजन में कलात्मकता, भाव-प्रवणता, उत्कृष्ट रचनाधर्मिता व समर्पण प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। वे लेखक हैं,निबन्धकार हैं, कवि हैं, शोधार्थी हैं व तथ्यान्वेषक भी हैं। यह यथार्थ है कि विजय रंजन एक सजग व संतुलित सर्जक हैं। इसीलिए उनकी हर कृति, हर रचना जादुई प्रतीत होती है। उनका सृजन चिन्ता व चिन्तन का सुखद संयोजन प्रस्तुत करता है। इसीलिए उनकी कृतियों में एक नयापन दिखाई देता है। चाहे कविता, कहानी हो या समीक्षा, शोध-निबन्ध, वे सभी को अत्यन्त संजीदगी से लिखने में यकीन रखते हैं। पूर्ण परिपक्वता व गम्भीरता के कारण ही विजय रंजन की कृतियाँ साहित्य जगत् में बेजोड़ सिद्ध हुई हैं।
व्याप्त सामाजिक विसंगतियों व विद्रूपताओं के विरुद्ध भी विजय रंजन ने अपनी शब्द-मशाल जाग्रत की है। वे समाज को आईना दिखाने का काम बखूबी कर रहे हैं। विजय रंजन की रचनाधर्मिता सामाजिक सरोकारों से परिपूर्ण है। वे सामाजिक संवेदना को लेकर चल रहे हैं। उनके सृजन में समस्याओं की प्रस्तुति है तो समाधान का चिन्तन भी। आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, समसामयिक प्रायः समस्त विषयों पर अधिकारपूर्वक लिखने वाले विजय रंजन गूढ़ रहस्यों व तथ्यों का उद्घाटन करने में सिद्धहस्त हैं। वे हर विषय व तथ्य का विश्लेषणात्मक परीक्षण करके ही लिखते हैं। इसीलिए उनका लेखन मौलिक व शोधपरक है।
पौराणिक व आध्यात्मिक चरित्रों व विषयों पर मौलिकता व विश्लेषणात्मकता के साथ सृजन करना विजय रंजन की प्रथम पसन्द का विषय है। चिन्तक, गहन अध्ययनशील, अध्यवसायी, तथ्य-उद्घाटक व रचनाधर्मी विजय रंजन की प्रकाशित व अप्रकाशित दोनों प्रकार की कृतियों की संख्या बड़ी है। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘रसवाद औ..र नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’, ‘कविता क्या है’, ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ तथा नवीनतम कृति ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ बेहद चर्चित उच्चस्तरीय कृतियाँ हैं जिनमें उनकी अद्भुत मौलिकता, उनकी प्रखर तार्किकता, उनका गहन और विस्तृत अध्ययन, उनका पाण्डित्य स्पष्टतः परिलक्षित होता है।
विजय रंजन एक सधे व मँजे हुए संपादक भी हैं। अप्रैल 1995 से अद्यतन सतत निर्बाध प्रवाहमय प्रकाशित हो रही ‘अवध-अर्चना’ जैसी श्रेष्ठ साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व वैज्ञानिक सरोकार की त्रैमासिक पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ के सम्पादक हैं। इस पत्रिका की सारे देश में एक विशेष पहचान है, पत्रिका का मान-सम्मान है। पत्रिका उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के ‘सरस्वती पुरस्कार 2014’ से पुरस्कृत भी है। इसके विशेषांक न केवल संग्रहणीय होते हैं, बल्कि वे सारे देश में चर्चा भी पाते हैं। विजय रंजन जी के लिए लेखन-कार्य और पत्रिका-सम्पादन, प्रकाशन कोई व्यवसाय न होकर मिशन है।
वस्तुतः विजय रंजन जी चेतनाशील कलमकार हैं, सच्चे सर्जक हैं, सच्चे आराधक हैं, सच्चे साधक हैं। वे अब भी रचनारत हैं। रामकथा से सम्बन्धित, महाकवि से सम्बन्धित, भारतीय राष्ट्रवाद से सम्बन्धित, हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय शिक्षानीति से सम्बन्धित विषयों पर श्री रंजन की अनेक कृतियाँ पाण्डुलिपित हैं, कुछ का प्रणयन गतिमान है। उनकी लेखन-गतिमान एवं सम्पादित कृतियों की सूची बहुत बड़ी है। वे सरस्वती के वरद पुत्र हैं। इसलिए उन्हें साहित्य का पुजारी व अक्षर-सेवक कहा जाए तो कदापि अनुचित न होगा।
लेखन में सजग, रचनाधर्मी श्री विजय रंजन पूर्ण मनोयोग, समर्पण व संकल्प के साथ जिस तरह से सारस्वत सेवा का कार्य बतौर मिशन (व्यवसाय नहीं) सम्पन्न कर रहे हैं, उसे देख कर उनके कार्यों को प्रणाम करना पूर्ण रूपेण उचित है। उनके कृतित्व के सम्मान में यही कहना चाहूँगा कि -
‘विजय’ मिले उनको सदा, जिनके संग ‘प्रताप’
वही ‘सिंह’ हैं जो रखें निज प्रतिभा का ताप
हैं ‘रंजन’ सचमुच ‘खरे’, रखें निराली शान
कदम-कदम पर देश में इसीलिए सम्मान।
आधार ग्रंथ -
1. अवध-अर्चना के अंक 1-100
2. ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ : विजय रंजन
3. ‘रसवाद औ..र नय रस’ ”
4. ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ ”
5. ‘कविता क्या है’ ”
6. ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ ”
7. ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ ”
8. विजय रंजन का जीवनवृत्त
- विभागाध्यक्ष, इतिहास, शासकीय जे॰ एन॰ सी॰ महिला महाविद्यालय, मण्डला- 481661,
दूरभाष: 9425484382, 7049456500
(आलेख कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ से उद्धृत)
भारतीय मनीषा के प्रशंसक विजय रंजन
- डॉ॰ जयति देवी
गुरुवर साहित्य-भूषण डॉ॰ महेश दिवाकर ख्यात साहित्यसेवी और शताधिक पुस्तकों के लेखक, सम्पादक तो हैं ही, वे अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ‘अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच’ के संस्थापक भी हैं और वे देश-विदेश के जेनुइन साहित्यकारों के कृतित्व को आगे लाने हेतु भी प्रयत्नशील रहते हैं।
विगत दिनों मुझे गुरुवर डॉ॰ ‘दिवाकर’ के सौजन्य से अयोध्यावासी श्री विजय रंजन कृत अनेक पुस्तकें एवं उनका जीवनवृत्त प्राप्त हुआ। उन कृतियों के माध्यम से मुझे श्री विजय रंजन की साहित्य-सर्जना का अवलोकन करने और तदन्तर उनसे दूरभाषीय वार्त्ता का भी अवसर प्राप्त हुआ।
दूरभाषीय वार्त्ता में श्री रंजन ने साहित्य सर्जना के विषय में अपना मत प्रकट करते हुए बताया-
“साहित्य की बहुमान्य परिभाषा है ‘सहित् भाव साहित्यम्’; ले..कि..न, हित किसका ? कैसे ? किस रूप में ?--- ऐसे प्रश्नों की विवेचना से स्पष्ट है कि उसी अक्षर-आराधना को ‘साहित्य’ की संज्ञा दी जा सकती है जिसमें लोकहितवादी नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित और राष्ट्रहित, सात्त्विक ज्ञानार्चन, सांस्कारिक सरोकार तथा मानवीय संवेदना वाचाल हो और जो न केवल व्यवहारविदे एवम् शिवेतर-क्षति को अपितु , प्रादुष्कृतमन्यथा को भी साकार कर सके।”
अनुरोध करने पर श्री रंजन ने अपनी नवीनतम प्रकाशित दो कृतियाँ मुझे व्हाट्सएप्प पर भेज दीं।
श्री रंजन की कृतियों से गुजरते हुए मुझे लगा कि उनके लेखन में उनके उपरोक्त विचार हावी हैं। जैसे-
* श्री विजय रंजन जी की वर्ष 2019 में प्रकाशित कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ का परास प्राचीन भारतीयता के गौरवगान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को उसके मूल तत्त्व देवी भारती की सात्त्विकता से सहयुजित करने हेतु संधानित है। इस कृति में जिस ढंग से प्राचीन भारत का गौरवगान किया गया है, अकेले वही श्री विजय रंजन को भारतीयतावादी लेखक की कोटि में अग्रगण्य स्थापित कर देने में सक्षम है।
* ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ं शीर्षक कृति में भारतीय संस्कृति-पुरुष राम पर लगाए जाने वाले आरोपों के औचित्य-अनौचित्य की वाल्मीकीय रामायण के आधार पर तर्कपूर्ण जाँच-पड़ताल की गई है। कृति में आरोपों की निस्सारता को प्रकाश में लाकर सामाजिक सौमनस्य एवं राष्ट्रीय-सामाजिक समरसता को विभंजित करने वाली लोकव्याप्त भ्रान्तियों को निर्मूल करने का प्रयास भी साफ दिखता है।
इसके अतिरिक्त इन कृतियोें में मैंने देखा कि सामवेद के शब्द ‘पूर्वार्चिक’ और ‘उत्तरार्चिक’ से लेकर प्राचीन ग्रंथों (वेद, उपनिषद, रामायणम् आदि) से भरपूर उद्धरण उद्धृत किए गए हैं और भुवनेश्वर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा की परम्परा में श्री रंजन की कृतियों में पाश्चात्य विचारकों के विचारों का, उनके उद्धरणों का भी यथोचित यथास्थान समावेश है। विजय रंजन अपनी किसी भी गद्य-कृति के किसी अध्याय में पाश्चात्य विद्वानों के उल्लेख से अध्यायारम्भ नहीं करते। वे भारतीय मनीषियों को सर्वाेपरिता प्रदान करते हैं। कुल मिला कर वे भारतीय मनीषा के अप्रतिम प्रशंसक कहे जा सकते हैं। भारतवादियों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
रंजन की उपर्युक्त कृतियों को पढ़ने के पश्चात् उनकी विद्वत्ता से अभिभूत हो जाना स्वाभाविक था। अतएव, जब मुझे डॉ॰ दिवाकर की ओर से श्री रंजन के कृतित्व पर आधारित प्रस्तुत कृति: ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ के संपादन में सहयोग के लिए कहा गया, तो मैंने इसे अपना सौभाग्य माना। एतदर्थ मैंने अपनी सहर्ष स्वीकृति तत्काल दे दी।
श्री रंजन अभी रचनारत हैं। आशा करती हूँ कि भारतीयतावादी राष्ट्रीयतावादी साहित्य का विपुल भण्डार श्री रंजन के लेखन से हिन्दी जगत् समृद्ध होगा और श्री रंजन का रचना-समग्र साहित्य के शोधार्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी साहित्य-सेवियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा।
- प्रिंस कालोनी, बिजलीघर के पीछे, चन्द्रनगर, मुरादाबाद (उ॰प्र॰)
दूरभाष: 9359395622
(आलेख कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ से उद्धृत)
विजय रंजन का साहित्यिक कृतित्व
एक अनुशीलन
- डॉ0 रोहित श्रीवास्तव
“साँस में सुर भरो, बाँसुरी गाएगी, बाँसुरी की भला कितनी औकात है ” , “कमरे की छोटी खिड़की से भी मिलती धूप, रंजन लिखते रहे वहीं पर सौ हजार अफसाने ” और “गजल ओढ़ लें गजल बिछा लंे ,कम होते ऐसे दुष्यन्त, गजलों से सह-वास निभाना, तुम भी सीखो मैं भी सीखूँ ” जैसी श्रेष्ठ काव्य-पंक्तियाँ रचने वाले विजय रंजन विगत लगभग 50 वर्षों से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद-अयोध्या जनपद में अपने एक छोटे से घर में अपने लेखन को ओढ़ते-बिछाते हुए साहित्य-साधना की अलख जगा रहे हैं।
मेरे पिताजी श्री उमाशंकर श्रीवास्तव ‘अंकल’ जी (वर्तमान में स्वर्गीय) भी कवि थे। वे श्री रंजन जी के बहुत पुराने मित्र थे। वे रंजन जी से कई पीढ़ी पहले से अपना पट्टीदारी का सम्बन्ध बताते थे। वे श्री रंजन जी की कर्मठ साहित्यिक तपस्या से बहुत प्रभावित थे। पिताजी अपने गृह-पुस्तकालय में श्री रंजन जी की पुस्तकें और त्रैमासिक पत्रिका अवध-अर्चना के अंक सहेज कर रखे हुए थे।
कुछ दिनों पूर्व श्री रंजन ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तकें ‘दर्पण तीरे’, ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ और डॉ॰ महेश दिवाकर डी॰लिट्॰ एवम् उनके तीन सहयोगियों द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ मुझे भेंटस्वरूप प्रदान की थीं। मैंने भी उन पुस्तकों को अपने पुस्तकालय में आगे की अलमारी में रख कर सहेज दिया है।
मेरे पिताश्री रंजन जी के निवास पर अक्सर जाया करते थे। अनेक अवसरों पर मैं भी वहाँ अपने पिता के साथ होता था और साहित्यिक चर्चा में भाग लिया करता था। पहले भी जब कभी मैं उनके घर जाता था (और आज भी जब कभी मैं श्री रंजन के आवास पर जाता हूँ ) हर बार उन्हें पुस्तकों से घिरे हुए साहित्य-साधना में निरत पाता हूँ।
एक दिन बस ‘कुछ पढ़ने की इच्छा’ के चलते मैंने अपने गृह-पुस्तकालय से ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ पुस्तक उठा ली। इस कृति में एक अध्याय है- ‘प्रबुद्ध पाठकों की दृष्टि में विजय रंजन का लेखन’। इस अध्याय को पढ़ने के पश्चात् मुझमें श्री रंजन के लेखन को स्वयं पढ़ने-समझने की उत्कण्ठा उत्पन्न हो गई। बार-बार उनकी रचनाओं को पढ़ने पर मैं उनसे इतना अधिक प्रभावित हुआ कि मेरी कलम स्वयं ही उनके विलक्षण साहित्यिक कृतित्व को दूसरे अध्येताओं तक पहुँचाने के लिए इस आशा में क्रियाशील हो उठी कि इससे भावी पीढ़ी के लेखकों को कुछ सार्थक प्रेरणा मिल सकेगी। आइए, श्री रंजन के काव्य (पद्य-गद्य) को हम-आप भी गहराई से देखें कि क्या सत्य ही श्री रंजन का लेखन उस कोटि का है जिसके लिए डॉ॰ शिवम् तिवारी पुस्तक ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ में अपने आलेख ‘बहुआयामी काव्य प्रतिभा के धनी विजय रंजन’ में लिखते हैं-
”सर्वाधिक आश्चर्यप्रद तो यह है कि रंजन जी स्वयं तो डॉक्टर अर्थात् पीएच॰डी॰धारी नहीं हैं; वे हिन्दी-साहित्य तो क्या किसी भी विषय में परास्नातक भी नहीं हैं; लेकिन उनके द्वारा रचित एवं अब तक प्रकाशित सभी पुस्तकें इतने शोधपरक तथ्यों और नवीन प्रस्थापनाओं से भरपूर हैं कि उनमें से प्रत्येक के लिए उन्हें पीएच॰डी॰ तो क्या डी॰लिट्॰ भी प्रदान की जा सकती है। इतना ही नहीं, उनकी प्रत्येक समालोचनात्मक पुस्तक भावी शोध-कार्य हेतु विविध आयाम भी संकेतित करती है। निःसन्देह अति ‘महत्’ पूर्ण साहित्यिक विमर्श प्रस्तुत कर रहे हैं श्री विजय रंजन जी। उनके अवदान का मूल्यांकन और समुचित मान आज नहीं तो कल अवश्यमेव किया जाएगा। “
डॉ॰ महेश दिवाकर एवम् 3 अन्य डॉक्टरों द्वारा संपादित इस पुस्तक में अनेक विद्वानों द्वारा भी ऐसी ही प्रशंसापरक टिप्पणियाँ अंकित हैं। वास्तव में श्री रंजन के साहित्यिक कृतित्व को देखते हुए ऐसी प्रशंसाओं को अतिशयोक्ति कह कर नकारा नहीं जा सकता।
जिज्ञासा बढ़ने पर हाल ही में एक दिन मैं उनके घर चला गया। ढेर सारी बातें हुईं उस दिन और चलते चलते उनका जीवनवृत्त भी मांग लिया मैंने।
अपने निवास-गृह को श्री रंजन ‘आश्रम’ कहते हैं। बाहरी कमरा जो सम्भवतः उनका अध्धयन-कक्ष है, उसमें दीवालों पर सजी अलमारियाँ और अलमारियों में और टाँड पर ठुँसी किताबें ही किताबें, फाइलें ही फाइलें। सोफे के सामने रखी मेज के ऊपर किताबें, मेज के नीचे किताबें। शयनकक्ष में भी टाँड़ पर किताबें। कुरेदने पर उन्होंने बताया कि उनके यहाँ दो बड़े बक्से हैं, उनमें भी किताबें ही रखी हुई हैं, क्योंकि छोटे से घर में अब अलमारी रखने की जगह नहीं बची है।
शयनकक्ष में पलंग पर एक किनारे लैपटॉप और कुछ फाइलें दिखीं। श्री रंजन ने बताया कि लैपटॉप पर लिखता रहता हूँ। थक जाने पर यहीं पलँग पर लेट जाता हूँ और आराम करने के बाद स्वस्थ होते ही फिर लैपटॉप खोल लेता हूँ। शायद अगाध साहित्य-साधना का सुफल ही है कि वे विपुल साहित्य रच सके हैं जिसमें बहुत सा महनीय है।
विजय रंजन का मौलिक साहित्यिक कृतित्व श्री रंजन के जीवनवृत्त के अनुसार उनकी साहित्यिक यात्रा वर्ष 1964-65 से उनके गृह-जनपद गोण्डा से प्रारम्भित हुई थी। विगत के 57-58 वर्षों में रंजन ने भारी परिमाण में साहित्य सृजित किया है ।
विगत 28 वर्षों से सम्पादित-प्रकाशित अवध-अर्चना त्रैमासिक के सम्पादक श्री रंजन मुख्यतया कविता, गीत, नवगीत, गजल, हिन्दी गजल, लघुकथा, कहानी, उपन्यास, आलेख (निबन्ध), समीक्षा, समालोचना, फीचर, सम्पादकीय आदि अनेक साहित्यिक विधाओं के रचनाकार हैं। उनकी स्वरचित मौलिक 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं-
1. ‘सूरज की आग’ (कहानी संग्रह, 1981),
2. ‘हाशिये से’(कविता संग्रह, 1986),
3. ‘किर्चें’(कविता संग्रह, 2009),
4. ‘उभरते बिम्ब’(कहानी संग्रह, 2013),
5. ‘दर्पण तीरे’ (गजल संग्रह, 2021)।
उनकी अग्रांकित 7 समालोचना की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं-
1. ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ (2012),
2. ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’(2014),
3. ‘रसवाद औ...र नय रस’(2014),
4. ‘कविता क्या है’ (2015),
5. ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’(2019),
6. ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’(2020),
7. ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’(2022)।
उनकी अग्रांकित 10 पुस्तकें पाण्डुलिपित हैं जो प्रकाशन के लिए तैयार हैं-
1. आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान,
2. भारतीय शिक्षा-व्यवस्था: सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पक्ष
3. विश्वविजय-पथ पर हिन्दी
4. गोस्वामी तुलसीदास का स्वान्तःसुखाय
5. भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श,
6. ‘भारतीय संस्कृति: एक विशिष्ट दृष्टि,
7. रामत्व और हमारा समय,
8. सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ क्यों
9. वातायन से (आलेख-संग्रह)
10. भारतीय संस्कृति के आदि-महागायक वाल्मीकि का कालखण्ड
उनकी अनेक मौलिक पुस्तकें अभी अपूर्ण हैं।
इनके अतिरिक्त अनेक प्रतिष्ठित सम्पादकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकें भी हैं, जिनमें श्री रंजन की रचनाएँ सम्मिलित की गई हैं। कुछेक सम्पादकों ने श्री रंजन के आलेखों को अपनी कृति में प्रथम स्थान पर प्रकाशित किया है। उनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। जून 2022 की ‘राष्ट्रधर्म’ में भी उनका आलेख ‘भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक सात्त्विक आवश्यकता’ पत्रिका में प्रथम स्थान पर प्रकाशित है।
व्यक्ति से अधिक व्यक्तित्व, व्यक्तित्व से अधिक कृतित्व और कृतित्व से अधिक नैतिकतावादी, लोकहिती, लोकसंग्रही और लोकोपयोगी कृतित्व को महत्त्वपूर्ण मानने वाले श्री रंजन न तो कहीं प्रोफेसर हैं और न ही प्रवक्ता या शिक्षक और न ही वे पीएच॰डी॰उपाधिधारी हैं; लेकिन स्वाध्याय तप के बल पर उन्होंने अपने विद्वत् अवदानों से हिन्दी साहित्य-जगत् को समृद्ध किया है । उनके साहित्यिक अवदानों की विद्वत्ता और गुणवत्ता की प्रशंसा बड़े-बड़े हिन्दी विद्वान् कर चुके हैं (द्रष्टव्य: 1.पुस्तक ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’, सम्पा॰ डॉ॰ महेश दिवाकर एवं अन्य, 2. पत्रिका पूर्वापर अंक 60, 3. स्फुट आलेख डॉ॰ साहित्येन्दु एवम् अन्य)।
श्री रंजन जी ने पुराने साहित्य-सृजन के बारे में बताया कि उनके सृजन की 1965 से 1976 तक की रचनाएँ (एकाध रचना को छोड़ कर) उनके पास उपलब्ध नहीं है। तब तक किराए वाले छोटे से कमरे में वह जखीरा नहीं रख पाने की मजबूरी में परिस्थितिवश श्री रंजन अपने एक मित्र के घर पर अपने लेखन का जखीरा रखे हुए थे जिसमें उनकी 1965-’76 की अवधि में विरचित कविताओं, कहानियों, आलेखों, कुछ कृति-पाण्डुलिपियों और तब तक संचित पत्र-पत्रिकाओं तथा महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का बण्डल भी शामिल था। दुर्योग से उनके उस मित्र के भाई द्वारा घर से भाग कर बम्बई जाने के लिए रेल-किराया जुटाने की जुगत में श्री रंजन का सम्पूर्ण जखीरा रद्दी में बेंच कर ‘अपनी बम्बई यात्रा के किराया जुटा लिया गया’- उसमें श्री रंजन का तब तक का ढेर सारा विरचित साहित्य भी विनष्ट हो गया। पुस्तक ‘किर्चें’ आदि में भी यह विवरण प्रकाशित है।
विजय रंजन रचित पद्य साहित्य
अब तक श्री रंजन की स्वरचित मात्र 3 पद्य-कृतियाँ ही प्रकाशित हैं- ‘हाशिये से’ (1986), ‘किर्चें’ (2009), ‘दर्पण तीरे’ (2021)। ‘गीत तुम्हारे नाम’ (गीत-नवगीत संग्रह), ‘एक मुट्ठी आकाश’ (वैचारिक कविताओं का अकविता-संग्रह) अप्रकाशित हैं।
कविता-संग्रहों में प्रथम संग्रह ट्रेडिल पर मुद्रित ‘हाशिये से’ में श्री रंजन की कुछ कविताओं का आद्य-रूप विद्यमान है। इसमें प्राक्कथन भी स्वयं श्री रंजन द्वारा ही लिखित है। बाद में इसकी अधिकांश रचनाएँ परिवर्तित-परिवर्द्धित स्वरूप में किर्चें आदि में समाहित की गई हैं। यह संग्रह श्री रंजन के मूल नाम विजय प्रताप सिंह रंजन (जो बाद में क्रमशः वी॰पी॰एस॰ रंजन, वी॰ पी॰ रंजन और विजय रंजन बना) से प्रकाशित किया गया था।
वास्तव में श्री रंजन का मूल नाम ‘विजयप्रताप सिंह’ है। ‘सिंह’ पारिवारिक उपाधि है जो सिसोदिया वंश के संस्थापक महाराजा बप्पा रावल द्वारा इनके तत्कालीन पूर्वज-प्रपितामह को असाधारण वीरता के लिए दी गई थी।
श्री रंजन का वंश देशभक्त वीरों का वंश रहा है। श्री रंजन के एक प्रपितामह सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम में गोण्डा के राजा देवीबख्श सिंह के साथ मिल कर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे।
द्वितीय कविता-संग्रह ऑफसेट-मुद्रित ‘ किर्चें ’ है। इसमें 18 गीत-नवगीत, 27 ग़़ज़ल-हिन्दी गजल और 36 अकविता-अगीत के रूप में पद्य रचनाएँ प्रकाशित हैं। ‘मन कहता कुछ गीत लिखूँ’, ‘हारे दिन जीते दिन’, ‘फिर लिखेंगे हम’, ‘अभी न लिखना अन्तिम कविता’, ‘लेकर रेखा से कुछ बिन्दु’, ‘तेरी आँखों में’, ‘तुम भी सीखो मैं भी सीखूँ’, ‘तुम भी लिखना मैं भी लिखूँगा’आदि इत्यादि सफल भावाभिव्यक्ति की श्रेष्ठ गीत, नवगीत, ग़ज़ल, हिन्दी गजल रचनाएँ हैं। किर्चें की ‘स्वयं से’, ‘गुलाब और नागफनी’, ‘नाड़ा उवाच’, ‘क्षमायाचना मरी चुहिया से’, ‘बामियान के बुद्ध से’, ‘पाब्लो नेरुदा से’, ‘रामजन्मभूमि मन्दिर: एक रेखाचित्र’ आदि अकविताएँ ‘विचार कविताएँ’ हैं जिनमंे कवि-संवेदना से विचारों को एक तरतीब दिया गया है।
वर्ष 2021 में कविता-संग्रह ‘दर्पण तीरे’ हिन्दी गजल संग्रह के रूप में प्रकाशित है। इसमें हिन्दी गजल विधा की 60, अवधी गजल 2 और एक मार्मिक नज्म ‘शाम थोड़ी और....’ सम्मिलित हैं। इसकी प्रथम रचना हिन्दी गजल ‘मेंहदी रचे हाथ से तुमने...’ है। इसके अतिरिक्त ‘बड़के साहब आप ही बोलें’, ‘दिखते क्यों बेजार हैं साहब’, ‘सुबह हुई फिर शाम ढली’, ‘आँसू के शरारती बच्चे’, ‘मौसम बदले दर्पण बदले’, ‘दर्पण तीरे’ आदि इस संग्रह की चर्चित गजलें हैं।
अप्रकाशित गीत संग्रह ‘गीत तुम्हारे नाम’ में संगृहीत गीत किसी व्यक्ति-विशेष के नाम नहीं, अपितु जीवन की विसंगतियों के नाम लिखे गए प्रतीत होते हैं। इसमें मुख्यतया वर्ष 1977-2021 की अवधि में विरचित गीत संगृहीत हैं।
अप्रकाशित अकविता संग्रह ‘एक मुट्ठी आकाश’ में श्री रंजन द्वारा विरचित 90 विचार-कविताएँ संगृहीत हैं। इन सभी में महत्त्वपूर्ण विचार समेकित हैं। पुस्तक की ‘रोटी’ शीर्षक की दो कविताओं सहित समकालीन महत्त्वपूर्ण विषयवस्तु से सम्बन्धित अनेक कविताएँ हैं। ऐसी कविताओं में विचार और संवेदनाएँ दोनों ही अति महत्त्वपूर्ण हैं।
इस संग्रह की कविताएँ न केवल अनूठी शैली की हैं, अपितु वे प्रायः वर्तमान में ‘समकालीन कविता’ के नाम से जानी जाने वाली कविताओं से गेयता, लय, यति और गति के धरातल पर अति विलग हैं। ऐसी कविताएँ अनगिनत हैं।
श्री रंजन की कविताओं का कला पक्ष, भाव पक्ष एवं विचार पक्ष
कला पक्ष : कविता को निश्चित रूप से भावाभिव्यक्ति के साथ-साथ काव्य-सौष्ठव, सुष्ठु भाषा, सम्प्रेष्य भाव के साथ ही काव्य रस, छन्द, अलंकार, वक्रोक्ति, वाक्-वैदग्ध्य आदि के सुन्दर समायोजन से सहयुजित होना ही चाहिए। ‘दधिः उज्ज्वलाः’ के बजाय ‘दधिः चन्द्रिकोज्ज्वलाः’ की व्यंजना सदृश अभिव्यक्ति ही कवि-अभिव्यक्ति को ‘काव्य’ बनाती है। कविता के लिए ऐसी व्यंजना, ऐसी भंगिमा और ऐसी भावभूमि अपरिहार्य है। इस संदर्भ में एक भेंट में श्री रंजन ने बताया कि कविता में सहज भावाभिव्यक्ति वाली सम्प्रेष्य भाषा, सुन्दर शब्दयोजना, रस, वक्रोक्ति, वाक्-वैदग्ध्य, लयशील गेयता, सुगठित वाक्योजना, विचारों की श्रेष्ठता, सार्वसुन्दरम् वाले सौन्दर्यशील रूप आदि को काव्य-रचना हेतु प्रथम वांछनीय माना जाना चाहिए। उनके अनुसार कविता को या कि काव्य (पद्य-गद्य) को विशुद्ध कला नहीं, अपितु ‘सत्यम् सह शिवम् सह सार्वसुन्दरम्’ के समवेत की ऐसी सहित्भावी अक्षर-आराधना माना जाना चाहिए जिससे ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’, ‘शिवेतर क्षतए’, ‘व्यवहारविद्ता’, सदृश अधिलक्ष्य साकारित हो सकें जो व्यवहारविद् बनाने एवं लोकयात्रा के प्रवर्तन को बेहतर स्वरूप में प्रवर्तित करने और सर्वानन्द को सर्वसुलभ बनाने जैसे प्रत्ययों (विचारों) की ओर उन्मुख हों। श्री रंजन के अनुसार ‘सर्वानन्द’ के दृष्टिकोण से काव्य को सौन्दर्यबोध से विच्छिन्न नहीं किया जा सकता और सौन्दर्यबोध कहीं न कहीं कला से स्वतः सम्पृक्त होता है; अतः, काव्य के कलापक्ष को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस निकष पर श्री रंजन की कविताओं का कलापक्ष अर्थात् रस, छन्द, अलंकार, बिम्ब- विधान आदि देखें, तो स्पष्ट होगा कि उनकी सभी कविताएँ सफल सम्प्रेषणीय भावाभिव्यक्ति, वाक्-वैचित्र्य, औचित्य, उदात्तता, गति-यति और मात्रा में संतुलित छन्द और टटके बिम्बविधान आदि और यदा-कदा ग्रामांचलीय एवं क्षेत्रीय भाषा, तत्सम, तद्भव शब्द युक्त सहज भाषा में रची-पगी प्रायः सरस, गेय और लयबद्ध रचनाएँ हैं। उनमें अलंकारों का भी भरपूर सुन्दर प्रयोग किया गया है।
‘किर्चें’ की अलग-अलग कविताएँ प्रायःअलग-अलग काव्य-रस वाली हैं। ‘किर्चें’ के गीत खण्ड की प्रथम कविता ‘वन्दना’ हो या गजल खण्ड की प्रथम कविता के आरम्भिक शे’र, ये ‘भक्ति रस’ के हैं। गीत ‘हाँ मैं अपने गाँव गया’, ‘खबरदार खबर’ सदृश विचार कविताएँ या देश-गाँव की रामकहानी वाली अन्य गजलें ,वे देश-गाँव की दुःखद स्थितियों से सरोकारित होने से करुण रस का उद्रेक करने में समर्थ हैं। तुम कहते हो सपने देखें...., दीपशिखा की पीड़ा आदि ऐसी ही कारुएिाक रचनाएँ हैं। उनकी कुछेक निजी परिप्रेक्ष्यों वाली रचनाएँ भी और इकलौती नज्म ‘शाम थोड़ी और....’ ( जिसे कविता-संग्रह ‘किर्चें’ और ‘दर्पण तीरे’ गजल-संग्रह दोनों में सम्मिलित किया गया है) मार्मिकता से ओत-प्रोत है ं जो करुण रस का गम्भीर उद्रेकन करती हैं। देखें-
“आओ करें न पूरी, हम, आज की बातें ।।
कह दो तुम्हें, जो कहनी ह® राज की बातें।।
खुश्बू, गजल, माशूक, परवाज की बातें।।
जाने ‘रंजन’ फिर कभी मुलाकात हो न हो,
शाम थोड़ी और मुरझाए तो घर चलें।। ”
- ‘दर्पण तीरे’ से
शंृगार रस की एकाध कविताएँ भी दिखती हैं इन कविता-संग्रहों में। प्रकृति वर्णन और पर्यावरणीय संचेतना से सम्बन्धित रचनाएँ भी समेकित हैं उनमें ।
अलंकारों के फलक पर देखें तो श्री रंजन की कविताओं में रूपक और उपमा अलंकार की बहुतायत है। देखे-ं
“ बियाबान को छोडे़ं तो भी, बिखरे आँगन तक सन्नाटे।।
बंद घड़ी घंटाघर वाली, जब देखो तब मारे चाँटे।।
खिली-खिली सी जूही होगी, होंगे लाल गुलाब किसी के,
ऐसे होते पेड़ मगर कुछ, जिनकी हथेली उगते काँटे।।
लम्बे चौड़े आसमान से, हम क्यों करें शिकायत कोई
तिनकों की तन्हाई आखिर, कोई कब तक कैसे बाँटे ।।” - ‘दर्पण तीरे’, ‘... हथेली उगते काँटे’
“भीड़ से चलो करें बातें दो टूक,
इकला कहीं बैठ कर, समन्दर किनारे।।
लहरें बिखरनी थीं-- रंजन वे बिखरी,
आँख क्यों आई भर, समन्दर किनारे।।”
- ‘दर्पण तीरे’, ‘कैसा है ये शहर’
“ कितनी अगिनि प्यास में बाँधें ?
प्यास कहाँं आकास में बाँधें ??”
- ‘किर्चें’, ‘कितने क्रूर अक्रूर ......’
इस पुस्तक में संगृहीत ‘तेरी आँखों में’ शीर्षक गजल में उपमा अलंकार (“ढाई आखर पनघट ‘रंजन’ सब रंगीन करे, ऐसा काजर मैंने देखा तेरी आँखों में”) और रूपक अलंकार (“ कोसल, लंका, वैशाली के सत् तम रज इतिहास, हर इक खण्डहर मैंने देखा तेरी आँखों में ”) का प्रयोग प्रशंसनीय है। रूपक अलंकार का श्रेष्ठ प्रयोग उनकी एक अन्य कविता ‘मन कहता कुछ गीत लिखूँ’ में मनमोहक ढंग से अभिरूपित है। इसमंे ‘महुआ वन’, ‘पलाश के जंगल’ आदि श्रेष्ठ रूपक रूप में प्रयुक्त हैं। इसी तरह देखें-
“चैती दुपहरिया से फगुआइ रात तक
ओठों मे रेंग रही बेकल हर बात तक
मौसम बेमौसम जो जी भर के बरसे
मन के झरोखें में ठहरी बरसात तक
छूकर तुम देखना सेम्हर के फूल में
काँटे उगाए रे बौरी वो नील परी।”
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“विषकन्या को चूम-चूम कर बोलो कौन जिए !”
आदि में भी रूपक अलंकार भरपूर विद्यमान हैं।
‘किर्चें’ की ‘अभी न लिखना अन्तिम कविता’ शीर्षक कविता में शब्द-दर-शब्द, पद-दर-पद रूपक ही रूपक है। देखें-
“ उधर परिन्दों की पलकों में, थम कर बैठा है भीगापन।।
कैद न कर ले, मावस कारा, बाल-समय सूरज आजीवन।।
अभी से सरगम मौन तो कैसे, परभाती गाए सविता ??
अभी न लिखना अन्तिम कविता!! ”
इसी तरह किर्चें की ‘फिर लिखेंगे हम’ शीर्षक गीत में --
“शोख मौसम ने बिखेरा संदली यौवन।
फिर युगों के बाद जागे बंसरी मधुबन।।
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फिर किसी गंगोत्री से एक गंगा झर रही।
फिर किसी कैलाश पर साँझ अब उतर रही।।“
ऐसी काव्य-पंक्तियों में एक विशिष्ट दृश्यावली का शब्द-चित्र रूपकों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह दृश्यावली अभिधा में तो अच्छी लगती ही हैं, व्यंजना और लक्षणा में भी श्रेष्ठ है।
गीत-नवगीत संग्रह ‘गीत तुम्हारे नाम’ की ‘सहर न जाव बड़के भैय्या’, ‘नई सदी तेरी जय जय हो’ और ‘भाग रहा बनजारा’ शीर्षक गीतों में ग्रामीण अंचल की भाषा, ग्राम्य बिम्ब आदि का हृदयग्राही प्रयोग किया गया है, वे रूपक के श्रेष्ठ प्रयोग से इतर नहीं हैं। ‘भाग रहा बनजारा’ में ‘बनजारा’ और कुछ अन्य कविताओं में ‘सूरज’ का भरपूर बिम्बार्थी प्रयोग विद्यमान है। जैसे-
“सूरज बनने का ये हौसला अच्छा तो है लेकिन
मेरे सूरज तब जीवन भर तुझको जलना है।”
ऐसे प्रयोग अनेक हैं।
रंजन जी की अनेक कविताओं में मानवीकरण भी दृश्यमान है। उदाहरणार्थ अग्रांकित कविता में बैल नामक पशु का मानवीकरण किया गया है-
“ता-ता ता-ता, नो नो सुनते, गाय का बेटा बुढ़ा गया,
पेट भरे वो दिन दिखलाओ, मेरे राम जी उसको भी।।”
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कैसे पहचाने बेचारा ---मई दिवस के पीले फूल ”
- ‘दर्पण तीरे’, ‘मई दिवस के पीले फूल’
इसी प्रकार, ‘दर्पण तीरे’ की कविता ‘जल उठे न’ की पंक्ति ‘जल उठे न कहीं चाँद भी, इससे पहले गगन छोड़ दो’ में चाँद का मानवीकरण और कविता ‘जिन्दगी’ की पंक्ति ‘हमसे रहती है क्यों तू खफा जिन्दगी’ में ‘जिन्दगी’ का मानवीकरण किया गया है। ऐसी काव्य-पंक्तियाँ भी श्री रंजन के काव्य में बहुतायत से हैं।
जहाँ तक रंजन जी की पद्य रचनाओं में लय और गेयता का प्रश्न है, उनके गीत, नवगीत, गजल में तो लय और गेयता है ही, उनकी अतुकान्त कविताएँ भी लय से विरहित नहीं हैं। ‘किर्चें’ और ’ मुटठी भर आसमान’ की ‘नापाक घुसपैठियों से’, ‘पाब्लो नरुदा से’ आदि रचनाएँ अकविताएँ होते हुए भी गेयता, लय, यति और गति से सम्पन्न हैं। स्वयं से शीर्षक कविता ‘कविता क्यों ’ जैसे प्रश्नो से जूझती है। ऐसी कोशिश ‘अभी न लिखना अंतिम कविता’ आदि में भी देखी जा सकती है। ‘ले लिया बढ़ कर सुपारी’ जैसी कविताएँ नवगीत विधा में भी नवीन नवगीतात्मक लयात्मक काव्य रचना का स्वयं में एक अनूठा उदाहरण हैं।
श्री रंजन विज्ञान एवं विधि के छात्र रहे हैं। अतएव, कविता में भी वह ‘कविता क्या, क्यों, कैसे’ की तलाश करते हैं। ‘किर्चें’ की ‘स्वयं से’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-
“क्यों लिखोगे तुम कविता ?? .......
कौन सा है मंत्र-संदेश तुम्हारे पास
किसी को देने के लिए ?
कहाँ सँजोई तुमने ऐसी ऊर्जा/सघन संवेदना
कब किया तुमने कोई ईक्षण/कि कर सको सर्जना ...
नहीं ज्ञात तुम्हें
झूठे सच का आधा-अधूरा भी इतिहास .........
भोरहरे स्कूल जाने के बजाय
क्यों जुटे किशोर-किशोरियाँ/घूरे पर
करने को जुगत/पाने को दो जून की रोटी
क्यों बसी यहाँ स्लम डॉग की बस्ती-दर-बस्ती .........
कब-कब मचाया इन संदर्भों में
तुम्हारे मन ने हाहाकार ?
कितना है क्षुद्र ---
तुम्हारा सरोकार-विन्यास !! ..........
नहीं जानते तुम अब तक --
क्या है जीवन का हुलास ??”
प्रश्न-दर-प्रश्न की शैली में रचित इस कविता के प्रश्न में ही उत्तर निहित है और कवि बनने के लिए क्या वांछाएँ आवश्यक हैं-- इसका इंगित भी है। ‘किर्चें’ की ‘कवि से’ नामक कविता में भी श्री रंजन कवियों को अनल पक्षी बनने की सलाह देते हैं। ‘किर्चें’ की ही ‘देखेंगे तुम अपनी कलम से’ नामक गजल में वे कविता रचने के ‘क्या, क्यों, कैसे’ को इंगित कर देते हैं; गजल ‘तुम भी लिखना, मैं भी लिखूँगा’ में भी ऐसी ही कोशिश है। किर्चें के गीत ‘अभी न लिखना अन्तिम कविता’ शीर्षक में अंकित नियामक भी उन परिस्थितियों को उजागर कर देते हैं जिनके आधार पर वास्तविक कविता रची जानी चाहिए। इसी प्रकार ‘दर्पण तीरे’ में प्रकाशित पहली गजल ‘मेहंदी रचे हाथ से तुमने ....’ में भी गजल के विन्यास-परास अंकित हैं।
छन्द-विधान : रंजन रचित किर्चें और अन्यान्य कवितासंग्रहों के गीत गजलों में गेयात्मकता और छंदात्मकता भरपूर विद्यमान है। गजल-छन्द के ख्यात गजलकार डॉ॰ राजेन्द्र वर्मा ने श्री रंजन की गजलों में कई हिन्दी छन्द ढूँढ निकाले हैं। वे लिखते हैं- ”संग्रह की गजलें जहाँ भाषिक सौंदर्य से पगी हुई हैं, वहीं, उनमें छन्द-वैविध्य भी है, जिससे पाठक की रुचि सतत बनी रहती है। इनमें हिन्दी के जातीय छन्दों की प्रधानता है। वर्णिक छन्दों में भुजंगप्रयात भी कई स्थलों पर देखा जा सकता है। संग्रह में 14 से लेकर 32 मात्राओं के छन्द देखने को मिलते हैं। इनमें जगण का प्रयोग कम-से-कम है, जिससे ये उर्दू विधान की दृष्टि से भी खरी उतरती हैं। इनमें मानव, विष्णुपद, सार, ताटंक, लावनी, कुकुभ और समान सवैया की प्रचुरता है। गजलकार ने ऐसा करके यह संकेत दिया है कि छन्द की दृष्टि से भी हिन्दी गजल को देखे जाने की आवश्यकता है।“
एक अन्य साहित्य-भूषण गजलकार डॉ॰ कोमल शास्त्री के अनुसार ”भाषायी कट्टरता के वे (श्री विजय रंजन) हिमायती भी नहीं हैं। ‘दर्पण तीरे’ की गजलों में लोकभाषा के साथ उर्दू तथा संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के शब्दों का संतुलित प्रयोग करने में वे नहीं चूके हैं। अन्योक्तियों, वक्रोक्तियों तथा मुहावरों के माध्यम से भी उन्होंने अपनी बात जनसामान्य तक पहुँचाने की कोशिश की है। उन्होंने नौसिखिये अप्रातिभ गजल लिखने वाले कवियों पर भी प्रहार किया है। जाति और मजहब से ऊपर उठकर कवि की कुछ रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर मुखर है। इतिहास को भी बड़ी खूबसूरती के साथ वर्तमान से जोड़ने में उनकी कुछ रचनाएँ सफल हैं।“ इस प्रकार देखा जा सकता है कि बिम्ब विधान, रूपक अलंकार, उपमा अलंकार, मानवीकरण, छन्द-विधान, विभिन्न काव्यरस, सफल भावाभिव्यक्ति, सम्प्रेष्य भाषा आदि काव्य-सौष्ठवों से सज्जित श्री रंजन की कविताएँ कला पक्ष की विभिन्न कसौटियों पर खरी हैं।
भाव पक्ष: श्री रंजन के कविता-समग्र को देखते हुए कहा जाए कि वे गहन संवेदना, सोद्देश्य कविता और लोक-सरोकार के कवि हैं, तो यह कथन अतिशयोक्ति नहीं होगा। इनकी कविताएँ जीवन की विसंगतियों, विद्रूपों से दो-चार होती हैं, जूझती हैं, फिर भी निराशा, अवसाद या कुण्ठा को बार-बार दूर झटक कर वे ‘नव-निर्माण’ के लिए सचेष्ट होते हैं। ‘मुझसे रहती है क्यों तू खफा जिन्दगी’, ‘दे न दे उनको सफे दर सफे, दे दे उनको मगर हाशिया जिन्दगी ’, ‘दिन सारे बीमार थे पहले, अब रातें बीमार हो गईं, कहीं छू सके जो अन्तर्मन, वे बातें बीमार हो गईं’, ‘मुग्धा उलझी रूप जाल में, बड़ी मछरिया गई ताल में’, ‘मुझसे बेला केतकी की बात मत करो, नीम का यह फूल भी आखिर तो फूल है’ जैसी काव्य-पंक्तियाँ परिस्थितियों-जनित हताशा, निराशा को व्यक्त अवश्य करती हैं, लेकिन श्री रंजन निराशा, अवसाद, निष्क्रियता के कवि नहीं हैं। वे इनसे बहुत आगे चले जाते हैं-
* कैसे अंगीकार करे मन मधुबन, पंथ उदासी
* फिर लिखेंगे हम नदी की धार पर इक नाम
फिर किसी विश्वास की पतवार लेंगे थाम
* आओ हम उड़ चलें ऊपर, जरा सा और ऊपर
और ऊपर.....और ऊपर फरफराते हुए अपने डैने
जब तक पा न सके क्षितिज का लिए
भर सके हम जहाँ/कमसकम
एक मुट्ठी आकाश अपनी मुट्ठी में
* म..ग..र मेरे मित्र मत घबराओ नुकीली कील बनने से
कि/कील बनने पर
चाहे जितनी चोट पड़े तुम्हारे सिर पर.....
तुम्हारा सिर रहेगा सदैव उठा ऊपर
* और देखना/आएगा एक न एक दिन वह दिन
होंगे नत / हत
बड़े से बड़े सारे विध्वंस ......
महसूसेंगे वे जरूरत अहिंसा की
चरम शान्ति की
दूर नहीं है ऐसा दिन।
* भोर हुई है, फूल हँसे हैं
तुम बैठे क्यों गुमसुम होकर
* कल गुलाब मेरे आँगन में अपनी गंध लुटाएगा
......मेरे नाम कल वहीं पुजारी लेकिन मन्दिर बनवाएगा।
ऐसे सकारात्मक दृष्टि-बिन्दुओं वाली कविताएँ भी श्री रंजन के कविता-संग्रहों में प्रचुर परिमाण में हैं।
‘किर्चें’ की ‘श्री रामजन्मभूमि मन्दिर’ शीर्षक कविता हो या ‘ऋतुराज से’ या ‘ले लिया बढ़कर सुपारी’ और ‘चरैवेति’ शीर्षक की अकविताओं में और ‘मौसमी बयार दिन’, ‘कौन देखे पीछे मुड़ के’, ‘फूल के जैसा’, ‘ओ पण्डित जी’, ‘काश न आए आज सामने मोटू शास्त्री, बदली प्रेमचन्द तत्कार’ सदृश गजलों में व्यवहारविद्ता भी भरपूर विद्यमान है। ‘इच्छाशक्ति के स्फुरण के लिए’ में भी शब्दान्तर से रचनाधर्मिता के लिए संसाधन के आँगन का छोटा-बड़ा होना वे महत्त्वहीन बताते हैं। प्रकारान्तर से यह कविता भी व्यवहारविद्ता से आवृत्त कविता है। प्रश्नोत्तर शैली की ही है कविता ‘नचिकेता से’ भी, जिसमें जीवन और इस जीवन के बाद की दुश्वारियांें से उबरने के उपाय भी सुझाए गए हैं यद्यपि श्री रंजन ‘जीवन के बाद वाले जीवन की’ चिन्ता करने वाले कवि नहीं हैं। वे स्वयं लिखते हैं-
‘हाँ, सृजन बस सृजन देह का धर्म है,
देह के बाद क्या बाद की बात है’।
देश-प्रेम की झलक, देश-भूमि के प्रति आदर भाव और देश का रूप-रंग किस रूप में समरस हो-- इन विषयों पर भी कविताएँ हैं कृति ‘किर्चें’, ‘दर्पण तीरे’ आदि में। इमराना जिसने नारी-शोषण के प्रति प्रशंसनीय साहस प्रदर्शित करके एक कालखण्ड में सरनामी प्राप्त किया था; उस इमराना के गाँव ‘कूकड़ा’ को नमन करने के बहाने से श्री रंजन ने अपने देश की भूमि, देश की हवा, पानी, मिट्टी को प्रशंसनीय रुप में नमन किया है। देश-प्रेम को झलकाने वाली एक अन्य रचना ‘अफसाना’ में बेला, जूही, गुलाब के माध्यम से देश की विभिन्न संस्कृतियों को सहजीवन का पाठ पढ़ाते हुए वे कहते हैं-
“रूप अलग हैं, रंग अलग है यहाँ मगर एक अफसाना,
दर्द से भीगी रामकहानी बेला, जूही और गुलाब,
कितना अच्छा लगे वो गुलशन जिसमें सब एक साथ हँसें।
“ सिरिस, कमल, रात की रानी, बेला जूही और गुलाब।”
श्री रंजन देश-गाँव की रामकहानी से, तत्सम्बन्धी विसंगतियों से आहत दिखते हैं -
“भोलू नहीं अब जग्गू दादा, बने सिंहासन-रिश्तेदार
देश गाँव की रामकहानी, तुम भी लिखना मैं भी लिखूँगा ”
‘15 अगस्त 1947 से’ गजल में श्री रंजन कहते हैं-
“ नया क्षितिज छूने को कोई उड़ा था खंजन डैने खोले
तितलियों के संग क्यों हम जी भर कर मुस्करा न पाए? ”
डब्ल्यू॰ टी॰ ओ॰ के उदारीकरण के बारे में वे लिखते हैं-
* “ देखो फिर से उघर रहा है ढाई आखर वाला मुखौटा
अरे राम सौगात लिए फिर परदेसिया बनजारा लौटा
आहट है आया टामस रो बजेंगी जंजीरें झन-झन-झन ”
* “नई सदी तेरी जय जय हो.....कहाँ ये टूटे राम मड़ैय्या
आ जा तुझको दिखला दें हम तेरा रूप-विरूप
--- अलस्सुबह सिर धुनते बैठे जाँता मूसल सूप। ”
+ + +
......टुकड़ा-टुकड़ा सपन बटोरे मध्य वर्ग तक अब धत् बोला
अलस्सुबह सिर धुनते बैठे जाँता मूसल सूप।
घाट के पत्थर, नदी किनारे डूब गए बरसात मंे
+ + +
एक बार फिर बने बिचारे डूब गए बरसात में। ”
* “ चैती दुपहरिया से फगुआइ रात तक
ओठों मे रेंग रही बेकल हर बात तक
मौसम बेमौसम जो जी भर के बरसे
मन के झरोखें में ठहरी बरसात तक
छूकर तुम देखना सेम्हर के फूल में
काँटे उगाए रे बौरी वो नील परी।”
* “ विषकन्या को चूम-चूम कर बोलो कौन जिए !”
* “कौन सुनाए तुम्हें कहानी।”
* “हादसों के इस शहर में आप भी हम भी
आ फँसें उलझी भँवर में आप भी हम भी”
* “ नाच रहे थे मगन मगन यहीं कहीं पिछले सावन में
किससे डर कर भाग गए वन मोर हमारे गाँव से
हमरे भाई चले गए बाम्बे दिल्ली लुधियाना
शायद उनको मिन न सका दो कौर हमारे गाँव से”
*“ बड़ी हवेली राजा वाली सूनी थी विधवा की माँग सी
चमचम थी जिनकी बन्दूक उनके ही थे ठाठ राजसी
.....लगता था कोई तातारी जीत यहाँ हर दाँव गया।”
*“ सिर कहीं औ धड़ कहीं पर जा पड़े,
जिन्दगी के रेल से हम कट गए जैसे ”
* “निर्वसना सी इस गोरी को कौन ब्याह लाया
जहाँ-जहाँ डोली ठहरी है, सहम उठा है बाग ”
- किर्चें
उपर्युक्त सदृश काव्य-पंक्तियाँ देश-गाँव की विसंगतियों की दर्दीली कहानी कहने में समर्थ हैं।
‘नाड़ा उवाच’ जैसी कविताएँ भी संग्रह में हैं जो उत्पीड़न, अन्याय के विरोध की कवि-संवेदना को झंकृत करती हैं। नाड़ा जैसे उपेक्षित प्रतीक के माध्यम से उपेक्षित, शोषित, दलित समुदाय के प्रति मानवीय संवेदना का समाहार इंगित है इस कविता में।
इन संग्रहों में कुछ कविताएँ नारी-जगत् से सम्बन्धित भी हैं। ‘मोनालिसा से’ कविता में वे नारी की उच्छृंखलता का विरोध करते दिखते हैं किन्तु ‘तुम कहते हो सपने देखें’ शीर्षक कविता में वे साधनहीन, गरीब परिवार की बालिका के प्रति हमदर्दी रखते प्रतीत होते हैं। वक्रोक्ति शैली में गीत संवेदनहीन समाज पर व्यंग्य भी है और उसे सही दिशा में उद्बोधित करने का एक प्रयास भी। इसी तरह ‘स्वतंत्र भारत सुमन’ में 80 के दशक में प्रकाशित (जो ‘गीत तुम्हारे नाम’ के पाण्डुलिपित गीत-संग्रह में है) ‘सपन सुंदरी समझ मुझे’ में कवि नारी के उत्सर्गमय जीवन को और उसके प्रति अपनी संवेदना एवं वेदना को रेखांकित करने में सफल दिखता है।
श्री रंजन कवि हैं तो ऐसा नहीं कि वे प्रकृति के संवेग या युवा मन के संवेग विशेषकर प्रेम आदि से अनभिज्ञ रहे हों। शृंगार के संयोग-वियोग पक्ष वाली एकाध कविताएँ भी हैं इनके कविता-संग्रहों में। उदाहरणार्थ ‘संदर्भों की बात नहीं’, ‘एक बार मैं और दे रहा मन दर्पण तुमको’ (किर्चें, ‘तुम सम्हाल रखना’), ‘कितने क्रूर अक्रूर हो गए’ (किर्चें, ‘गुलाब बनाम नागफनी’) और ‘शायद मुझको प्रेमपत्र तुम भेज रही हो फिर से’ शीर्षक गीत में प्रकृति की संवेदनाओं से आलोड़ित और शृंगार-सिक्त दिखता है रचनाकार कवि का मन। श्री रंजन ने एक भेंट में बताया था कि ‘शायद मुझको प्रेमपत्र तुम भेज रही हो फिर से’ कविता उन्होंने 72 वर्ष की अवस्था में लिखी थी। इसे वे स्वयं ‘72 में 22’ की कविता कहते हैं। फिर भी कहना आवश्यक है कि ‘गीत तुम्हारे नाम’ गीत-संग्रह में और उनके अन्यान्य काव्य-संग्रहों में गीत, गजल आदि किसी व्यक्ति-विशेष से आबद्ध नहीं हैं। इन कविताओं में चाहे वे ‘मैं’ की शैली में कही गई हों या ‘तुम-आप’ या ‘वे’ की शैली में-- प्रायः उनकी व्यक्तिनिष्ठ दिखने वाली कविताएँ भी समष्टिनिष्ठ कविताएँ ही हैं। इससे भी बढ़ कर उल्लेखनीय है कि श्री रंजन के कविता-संग्रहों में गीत, गजल, अगीत आदि से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण आलेख भी सम्मिलित हैं, जो गीत, गजल आदि के क्या, क्यों, कैसे को रूपायित करने में समर्थ हैं। व्यक्तिनिष्ठ दिखने वाली कविताओं में टी॰एस॰इलियट-प्रणीत डिपर्सनलाइजेशन का विशेष ध्यान रखा गया प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ, अग्रांकित पंक्तियाँ व्यक्तिनिष्ठ दिखने के बावजूद समष्टि से सरोकारित उदात्त भावों को दर्शाने वाली काव्य-पंक्तियाँ हैं-
“ मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं,
गीत के नाम अगीत के नाम
जीवन का संगीत लिखूँ मैं
हार के नाम या जीत के नाम।। ”
कुल मिला कर श्री रंजन की कविताओं का भाव अति सफल संवेदनशील है जो जीवन की विसंगतियों, विद्रूपों से जूझते हुए भी देश-दुनिया एवं व्यक्ति को बेहतर बनाने के ऊर्ध्वगामी प्रयाण और लोकयात्रा के सुप्रवर्तन में निरत दिखता है। इस प्रकार रंजन जी की सभी काव्य-रचनाएँ लोकयात्रा के सुप्रवर्तन में ‘संवेदनशील संवेग’, ‘मानवता’, ‘व्यापक अनुभूति वाला सत्य’, ‘सार्वसुंदरम् (जो सबके लिए सुंदर हो ऐसा सुन्दरम्), ‘सार्वकल्याणक शिवकारिता’ सदृश तत्त्वों से सीधे-सीधे सहयुजित दिखती हैं। उनकी पद्य-रचनाएँ स्वप्न-सम्मोहन, कल्पना आदि से भी यदा-कदा सम्पृक्त हैं। इनमें व्यक्ति और लोक के यथार्थ का खुरदरापन, अनुभूति और कल्पना, आशा और निराशा, आनन्द और सक्रियता आदि बहुत कुछ रूपायित है। स्वयं श्री रंजन के अनुसार उनकी कविताएँ विभिन्न क्षणों, परिवेशों के विभिन्न संवेगों की कविताएँ हैं। ठीक भी है, 1965 से आरम्भित कविता-जीवन में 2022 तक परिवेश और परिस्थितियों में अनेक मोड़-दर-मोड़ आए होंगे, ऐसे में किसी संवेदी कवि-मन की कविता स्वभावतः एक-आयामी हो भी कैसे सकती हैं ?
विचार पक्ष: रंजन जी कविता, गीत, नवगीत, गजल आदि के रचनाकार हैं अवश्य, परन्तु छायावादी एवं प्रकृतिवादी कवियों के विपरीत उनका लेखन आत्माभिव्यक्ति का माध्यम नहीं दिखता। एकाध अपवाद को छोड़ कर वे प्रेमगीत भी प्रायः नहीं रचते। अपनी कविताओं में वे प्रायः युगबोध और सामाजिक-सांस्कृतिक विद्रूपों एवं विसंगतियों को ही रेखांकित करते हैं। श्री रंजन प्रकृतिवादी कोमलकान्त पदावली के महान् छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पंत आदि की तरह छायावादी या प्रकृतिवादी कविताएँ प्रायः नहीं रचते; परन्तु पन्त जी की भाँति उनकी साहित्यिक दृष्टि संस्कृति, परम्परा, विचार आदि के स्तर पर सुस्पष्ट दिखती है। वैचारिक धरातल पर पंत जी एवं श्री अज्ञेय जी की तरह लोकहित, दर्शन, धर्म, अध्यात्म, समाज, राजनीति, राष्ट्रवाद, भारतीयता, शिक्षा, संस्कृति, सद्संस्कार, विज्ञान, नीति, विधिविधान और इसी तरह के अन्यान्य फलकों पर रंजन जी के विचार पूरी तरह सुदृढ़ हैं।
विजय रंजन कृत गद्य साहित्य
कविताओं के अतिरिक्त रंजन जी ने गद्य साहित्य में कथा साहित्य (कहानी, उपन्यास, लघुकथा आदि) में और कथेतर साहित्य की विभिन्न विधाओं में भी प्रचुर लेखन किया है। यथा-
कथा साहित्य : कहानी, लघुकथा, उपन्यास
कहानियाँ : अवध अर्चना मासिक एवम् साप्ताहिक के होमप्राडक्शन के अतिरिक्त 1978 में श्री रंजन की पहली कहानी ‘विश्वामित्र की हार’ किसी बाहरी बड़े प्रकाशन:गाण्डीव समाचार पत्र के कहानी विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। बाद में 1980 में पत्रिका ‘फिल्मी दुनिया ’में कहानी ‘प्रतिशोध’ प्रकाशित हुई थी;तबसे अब तक श्री रंजन का कहानी-लेखन और उसका प्रकाशन निरन्तर गतिमान है। बाद में अनेक पत्र पत्रिकाओं में अद्यतन उनकी कहानियाँ प्रकाशित होती आ रही हैं। इनका प्रथम कहानी-संग्रह ‘सूरज की आग’ 1981 में तत्कालीन फैजाबाद में ट्रेडिल मशीन पर मुद्रित होकर अवध-अर्चना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था, जिसमें कुल 9 कहानियाँ थीं। इन कहानियों में श्री रंजन का नजरिया सामाजिक सरोकार से सरोकारित एवं लोकहितवादी था (द्रष्टव्य कहानी: ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’, ‘कापुरुष’, ‘पोस्टमार्टम’ आदि)।
इस संग्रह की ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’ में तलाकशुदा माँ से मिलने के लिए कलपती किशोरी बेटी के मनोभावों का अंकन है। ‘कापुरुष’ में शंकालु पति के सशंकित मन की कदर्थना उसे ‘कापुरुष’ कहते हुए की गई है। कहानी ‘पोस्टमार्टम’ उदीयमान नारी कलाकार के कला-विकास को बाधित करने वाली मानसिकता पर गहरी चोट करती है। कहानी ‘एक्सीडेंट-रिएक्सीडेंट’ एक भावुक संवेदनशील व्यक्ति के मनोभावों की कहानी है। ‘फिल्मी दुनिया’ पत्रिका में 1981 में प्रकाशित कहानी ‘प्रतिशोध’ भी अपने ढंग की विलक्षण कहानी है। कहानी ‘रग्घू’ का कथ्य तो अच्छा है, किन्तु रग्घू का सटीक चित्रांकन नहीं हुआ है। इसी तरह इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी कहानी कम कहानी का प्रोटो टाइप मात्र अधिक हैं, जो परिमार्जन के बिना ही संग्रह में प्रकाशित कर दी गई हैं। फिर भी संग्रह की प्रायः सभी कहानियाँ पात्र-चयन, कथोपकथन, कथानक एवं तकनीक में विलग दिखने के बावजूद प्रभवण प्रतीत होती हैं।
श्री रंजन का दूसरा कहानी संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ वर्ष 2013 में प्रकाशित हुआ था। आकर्षक गेटअप के मुखपृष्ठ वाले इस संग्रह का मुद्रण ऑफसेट प्रिटिंग प्रेस से कराया गया है। इस संग्रह की सभी 18 कहानियाँ कथ, कथ्य, कथोपकथन, चरित्र-चित्रण, पात्र-चयन आदि की दृष्टि से पहले की अपेक्षा अति परिमार्जित और श्रेष्ठ है। इस संग्रह की कहानियों में पारिवारिक सामाजिक सद्भाव आदि के सन्देश अधिक प्रांजल स्वरूप में हैं। प्रथम संग्रह की ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’, ‘पोस्टमार्टम’, ‘कापुरुष’ और ‘प्रतिशोध’ कहानियाँ ‘उभरते बिम्ब’ संग्रह में पुनर्मुद्रित हैं; लेकिन इस बार उनका रूप अधिक सँवरा हुआ है। ‘उभरते बिम्ब’ की शेष कहानियाँ भी विशेष प्रभावी हैं। ‘अलगिया गिलास’, ‘जूतों की चुगली’, ‘यूरेका’, ‘वापसी’, ‘इमेज’, ‘हुड़ुकचुल्लू’, ‘प्रतिमान’, ‘साढ़े तीन घंटे’, ‘कहाँ से कहाँ तक’ और लम्बी कहानी ‘उभरते बिम्ब’ सामाजिक सरोकारों से सार्थक स्वरूप में सरोकारित हैं। उनमें किस्सागोई भी गजब की है। इनके कथ, कथ्य, कथानक में भी विलक्षणता और सहित्भावी साहित्यिकता दृश्यमान है। संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ लोकहितैषिता आदि की कसौटियों पर भी खरी उतरती हैं। ये कहानियाँ अपनी अलग-अलग विशेषताओं के कारण अति चर्चित रही हैं। जैसे-
- प्रभावशाली कथोपकथन शैली में अभिव्यक्त कहानी ‘अलगिया गिलास’ छुआछूत की समस्या के सर्वस्वीकार्य निदान को प्रस्तुत करती है।
- बालकहानी ‘यूरेका’ पलक झपकते जितने अनूठेपन से बालकों की खेल-समस्या का निदान प्रस्तुत करती है, उतने ही जोर-शोर से देखते ही देखते गली-मोहल्लांे में क्रिकेट आदि खेलते बच्चों की गेंदों से आए-दिन टूटते खिड़की के शीशों की आम समस्या से ग्रस्त गृहस्वामियों की परेशानी का भी हल प्रस्तुत कर देती है।
- ‘जूतों की चुगली’ भी बालकहानी है जो जितनी शिक्षाप्रद बच्चों के लिए है, उतनी ही रोचक और मार्गदर्शक बड़ों के लिए भी है।
- ‘प्रतिमान’ कहानी स्वतंत्रता-सेनानियों की कहानी है जो बताती है कि कैसे देशहित में ब्राह्मण परिवार ने अपनी छुआछूत की धारणा को तिलांजलि दे दी थी। यह कहानी वास्तव में कहानी नहीं अपितु श्री रंजन के एक पूर्वज की आपबीती है जिसे लेखक विजय रंजन को उसके पिता ने बताया था। उस मूल आपबीती को श्री रंजन ने व्यक्ति, स्थान आदि का नाम परिवर्तित करके घटनाक्रम को कल्पनामिश्रित विवरण के माध्यम से प्रस्तुत किया है जो अति प्रभावकारी है।
- कहानी ‘हुड़ुकचुल्लू’ का ताना-बाना इस सकारात्मक ढंग से बुना गया है कि यह किशोरों और युवाओं के लिए अति शिक्षाप्रद बन गई है।
- कहानी ‘साढे़तीन घंटे’ जीवन की विविध परिघटनाओं को बड़े ही रोचक एवं प्रशंसनीय तारतम्य से मात्र साढ़े तीन घंटे की अवधि में घटित प्रस्तुत करते हुए जीवन के प्रत्येक रंग को पाठकों के सम्मुख बिखेरती है। ‘युलिसिस’ मंे जेम्स ज्वायस ने जीवन की विविध परिघटनाओं का कालखण्ड ‘तीन वर्ष’ दर्शाया था जबकि श्री रंजन की कहानी ‘साढ़े तीन घंटे’ मात्र साढे़ तीन घंटे की अति अल्पावधि में जन्म-मृत्यु, राग-द्वेष, मनोरंजन, अवसाद, संघर्ष, पुलिस, गोलीबारी से लेकर अवसाद से उबर कर पुनर्निर्माण और जीवन की कर्मठता तक जीवन के प्रायः सभी प्रमुख पक्ष प्रस्तुत कर देती है।
- कहानी ‘अजूबा’ प्रयोगवादी मानसिकता पर करारा व्यंग्य है। एक समीक्षक ने इस कहानी को 50 वर्ष बाद के भविष्य की कहानी बताया है।
- कहानी ‘वापसी’ में श्री रंजन ने महिला संवर्ग के लिए समाज-सेवा आदि करने से अधिक उपयुक्त पारिवारिक दायित्व को निबाहना बताया है। इस कहानी की आलोचना कुछ अधुना नारीवादियों ने यह कह कर की है कि इस तरह की कहानियाँ नारी को ‘घर की चहारदीवारी में कैद रखने’ के पुरुष-कदाशय को व्यक्त करती हैं। इस कहानी के कारण स्थानीय बौद्धिकों के बीच श्री रंजन पर नारी-विरोधी होने का दबा-खुला आरोप हुमकता रहा है, परन्तु इसी संग्रह की अन्य नारी-प्रधान चरित्र वाली ‘कापुरुष’, ‘पोस्टमार्टम’, ‘समझौता’ आदि कहानियांें ने (जिनमें नारी के प्रति पुरुष संवर्ग के कदाशयों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कदर्थना मुखर है) इस आरोप को कभी मुखर नहीं होने दिया। विभिन्न कविता-संग्रहों में संगृहीत श्री रंजन की अनेक कविताओं, अनेक लघुकथाओं और सम्प्रति अपूर्ण परन्तु नारीवादी सशक्त उपन्यास ‘नौ बहनें’ का कथानक भी नारी-जगत् के प्रति सद्भाव से सम्पन्न है, जो नारी जगत् के प्रति श्री रंजन के सम्मान, सद्भाव, सहानुभूति को ही मुखर करता है।
श्री रंजन के अन्य दो कहानी-संग्रह ‘धरती क्षितिज में’ और ‘प्रतिशोध’ अभी अपूर्ण हैं।
लघुकथा: ‘टुकड़े-टुकड़े’ श्री रंजन का पाण्डुलिपित लघुकथा-संग्रह है। यह भी अभी अप्रकाशित है। इसमें संगृहीत 51 लघुकथाओं में जीवनानुभवों के विविध रूप-रंग से सम्बन्धित लघुकथाएँ हैं, जो ‘शिवेतर की क्षति’ के साथ-साथ व्यक्ति को ‘व्यवहारविद’् बनाने में सक्षम हैं। इनमें अनेक लघुकथाएँ व्यंग्यपरक हैं। इस कृति में लघुकथाओं के साथ ही सुदीर्घ आलेख ‘लघुकथा का क ख ग’ भी सम्मिलित है। श्री रंजन के ही शब्दों में ‘लघुकथाओं में जीवन की विसंगतियों और विद्रूपों का उकेर है।’ वास्तव में यह लघुकथा-संग्रह ‘लघुकथा’ नामक साहित्यिक विधा की सभी विशेषताओं यथा ‘लघुता’ और ‘कथा’ से सुसज्जित है।
उपन्यास: श्री रंजन के 4 उपन्यास ‘आगमन’, ‘तलाश’, ‘टकराव’ और ‘नौ बहनें’ अभी प्रणयन-गतिमान की प्रारम्भिक अवस्था में हैं।
कथेतर साहित्य
निबन्ध-संग्रह : श्री रंजन ने कथेतर लेखन में निबन्ध विधा में भी अपनी पटु लेखनी का परिचय अनेकशः प्रस्तुत किया है। इनका प्रथम निबन्ध गाँधी विद्या मंदिर इन्टर कालेज की पत्रिका ‘ज्योति ’में तब प्रकाशित हुआ था जब वे उसी कालेज में इन्टर मीडिएट कक्षा के छात्र थे। बाद में भी उनके निबन्ध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अवध अर्चना, जनमोर्चा से लेकर अमृत-प्रभात, चिन्तन सृजन, राष्ट्रधर्म, मानस भारती, अक्षरा आदि में ससम्मान प्रकाशित होते रहे हैं। श्री रंजन के 9 आलेख-संग्रह अर्थात् निबन्ध-संग्रह हैं, जिनमें पूर्ण प्रणयित अभी निम्नांकित एक ही है -
* पाण्डुलिपित निबन्ध-संग्रह ‘वातायन से’ में ‘साहित्य’, धर्म, हिन्दी, भारत के प्राचीन नाम, भारत के प्राचीन गौरव तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण आलेख संगृहीत हैं।
‘वातायन से’ में ही ‘उपयोगधर्मी साहित्य’ (साहित्य की नई विधा), नवीन काव्य-रस ‘नय रस’, नवीन काव्यवाद ‘काव्य-नयवाद’ से सम्बन्धित आलेख और धर्म-अध्यात्म, संस्कृति सम्बन्धी आलेख भी हैं, जो अति महत्त्वपूर्ण हैं।
* निबन्ध-संग्रह ‘गवाक्षों से’ भी अर्ध-पाण्डुलिपित है। इसमें भी श्री रंजन द्वारा लिखे गए साहित्य, धर्म, संस्कृति, भारत, भारतीयता आदि से सम्बन्धित 18 निबन्ध हैं। इन निबन्धों में निबन्धकार श्री रंजन के अति महत्त्वपूर्ण विचार समाहित हैं, जो अपने-अपने स्तर पर सम्बन्धित विषयवस्तु के धरातल पर अति क्रान्तिक हैं।
श्री रंजन के निबन्ध आगमन और निगमन दोनों शैलियों के हैं, जिनमें विश्लेषणात्मकता, तार्किकता, लोकदृष्टि, सांस्कृतिकता, सामाजिकता और राष्ट्रीयता आदि की प्रधानता दृश्यमान है। प्रवाहपूर्ण भाषा, व्यंजनात्मकता, लोकहितैषिता, नैतिकतावादी लोकहित सह लोकहितवादी नैतिकता आदि की दृष्टि से भी उनके निबन्ध महत्त्वपूर्ण हैं।
समालोचना: कथेतर लेखन में समालोचना विधा में श्री रंजन निष्णात हैं। अब तक उनकी 7 समालोचना पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये सभी अति चर्चित रही हैं। पूर्व प्रकाशित 6 समालोचना कृतियों में से 5 को अनेक समीक्षकांे ने अपने विषय का इन्साइक्लोपीडिया बताया है जबकि सातवीं समालोचना कृति - भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग को ‘अपने विषय का राम चरितमानस’ कहा गया है।
* श्री रंजन की प्रथम समालोचना पुस्तक है ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’। ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ वाल्मीकि रामायण को सनातन काव्यबीज कहने का सुतार्किक आधार और प्राचीन, अर्वाचीन, अधुना भारतीय काव्यज्ञों और भारतेतर काव्यशास्त्रियों के विभिन्न काव्य-निकषों के सापेक्ष वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन हिन्दी में प्रस्तुत करने वाली अनूठी पुस्तक है। इस पुस्तक में वाल्मीकि रामायण को सम्पूर्ण विश्व में उत्कृष्टतम ग्रन्थ सिद्ध किया गया है। इतना ही नहीं, इस पुस्तक में श्री रंजन ने पाश्चात्य जगत् के साहित्यिक प्रपितामह कहे जाने वाले होमर के कृतित्व के कथ्य आदि के सापेक्ष वाल्मीकि रामायण के कथ्य आदि का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है। पाश्चात्य जगत् में होमर की इतनी अधिक प्रतिष्ठा है कि होमर के लिए अलेक्जेण्डर पोप कहते थे- “रीड (होमर) इन द डे एण्ड मेडिटेट (हिम) इन द नाइट ” किन्तु श्री रंजन के तत्सम्बन्धी निष्कर्ष आदि-महाकवि वाल्मीकि को होमर के सापेक्ष उच्चतर (होमर को वाल्मीकि के सापेक्ष हीनतर) सिद्ध करते हैं और आदि-महाकवि को सारे विश्व में सर्वोत्कृष्ट महाकवि के रूप में स्थापित करते हैं। श्री रंजन के तत्सम्बन्धी तर्क इतने सशक्त हैं कि ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ के वर्ष 2012 में प्रकाशन के उपरान्त से अब तक श्री रंजन की प्रस्थापनाओं को निरस्त नहीं किया जा सका, जबकि शताधिक विद्वानों द्वारा इस कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है।
* वर्ष 2014 में प्रकाशित दूसरे क्रम की चर्चित समालोचना पुस्तक है ‘रसवाद औ...र नय रस’। इसमें पूर्वार्चिक प्रखण्ड में ‘रसवाद क्या और क्यों’, ‘रस-निष्पत्ति’, ‘रसवाद और आनन्दवाद’ और उत्तरार्चिक में ‘रस-भेद’, ‘रसदोष’ अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में सम्बन्धित विषयवस्तु यथाशीर्षक सुधीर्घ सुचिन्तित विवेचना से विवेचित है जिससे काव्य-रस और भारतीय काव्य-रसवाद के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष भरपूर विवेचित दिखते हैं। पुस्तक में आर्ष काव्य-रसवाद की श्रेष्ठताओं और अपेक्षाओं का भरपूर विवेचन करते हुए उसमें वर्तमान की अपेक्षानुरूप यथोचित संशोधन की मांग प्रस्तुत की गई है। श्री रंजन के अनुसार ‘खीरा सिर ते काटिए मलिए लोन लगाय....’ सदृश काव्य-पंक्तियों में निहित काव्य रस को वर्तमान प्रचलित 11 काव्यरस वाले काव्य-रसवाद से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता जबकि आचार्य भरत, भामह, रुद्रट आदि के अनुसार ऐसी काव्य-पंक्तियाँ चूँकि काव्य हैं, अतएव, उनके लिए कोई न कोई काव्य ‘रस’ होना ही चाहिए। पुस्तक में ‘खीरा सिर ते काटिए मलिए लोन लगाय....’ सदृश काव्य-पंक्तियों में जहाँ अपराध की विवेचना और दण्ड का विधान दोनों एक साथ हैं-- वहाँ ऐसी काव्यपंक्तियाँ वास्तव में ‘न्याय क्षेत्र’ की ही पंक्तियाँ हैं अतः उनके रस-निमीलन के लिए 12 वें काव्य रस के रूप में नवीन न्यायशील रस के रूप में मान्य किया जाना चाहिए। इसे श्री रंजन ने अपनी ओर से ‘नय रस’ का नाम दिया है। इस प्रकार इस पुस्तक में श्री रंजन ने ‘नय रस’ नाम्नी एक नवीन रस की उद्भावना सविस्तार और सतर्क स्वरूप में प्रस्तुत की है। श्री रंजन ने नयरस के संदर्भ में उसके स्थायी भाव, संचारी भाव, विभाव, उद्दीपन के साथ ही नय रस के देवता, रंग (वर्ण) आदि को भी नामित किया है। यह पुस्तक भी रसवाद की आधुनिक इनसाइक्लोपीडिया है जिसमंे श्री रंजन ने ‘नय रस’ के आविर्भाव के बहाने से काव्य-रस सम्बन्धी आर्ष सिद्धान्त, रस-निष्पत्ति, रस के प्रकार, रस के गुण-अवगुण, रस-दोष आदि की तर्कसंगत साहित्यिक मनोवैज्ञानिक विवेचना आदि भी प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में अधुना विद्वान् डॉ॰ गणपतिचन्द्र गुप्त-प्रणीत ‘बौद्धिक रस’ की भी विस्तृत विवेचना करते हुए उसके स्थान पर ‘नय रस’ को वरीय सिद्ध किया गया है। इस पुस्तक की भूमिका लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉ॰ सूर्यप्रसाद दीक्षित प्रभृत बहुअधीत काव्यज्ञ ने लिखी है।
* समालोचना पुस्तक ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ भी वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक हिन्दी में समालोचना विधा की समालोचना है, जिसमें समालोचना का नवीन काव्य-निकष ‘काव्य-नयवाद’ (नयत्व) प्रस्तावित किया गया है और उसे वैदिक साहित्य, आदि-महाकवि वाल्मीकि, कविकुलगुरु कालिदास, कविश्रेष्ठ तुलसीदास की विचार-सरणि से जोड़ा गया है और नय-नयत्व को सामाजिक न्याय तक सीमित रखने के बजाय समग्र न्याय तक विस्तारित करने पर बल दिया गया है। यह कृति पाश्चात्य नव्य समीक्षावाद के बजाय प्राचीन भारतीय साहित्यिक निकष ‘काव्य-नयवाद’ को हिन्दी जगत् में पुनर्स्थापित करने का प्रयास करती है यह हिन्दी समालोचना जगत् में सामाजिक न्याय से आगे बढ़कर समग्र न्याय का निकष वैखरी में लागू करने की माँग करती है। पुस्तक में वैखरी में समालोचना का प्रभवण काव्य-निकष ‘काव्य-नयवाद’ को बनाने पर सम्पूर्ण काव्य-जगत् के लाभान्वित होने की आशा भी प्रकट की गई है।
पुस्तक में न्याय के विभिन्न आधारभूत अवयवों की पर्याप्त विवेचना है और नय-न्याय के विविध रूपों का रेखांकन भी है। परन्तु आश्चर्यजनक है कि पुस्तक के आधार ग्रंथों की सूची में ‘न्याय सूत्र’ या ‘न्याय दर्शन’ नामक पुस्तक का उल्लेख नहीं है। संभवत किसी हड़बड़ी में न्याय के आधारभूत ग्रंथों का उल्लेख प्रकाशित ‘आधार ग्रंथ-अनुसूची’ से छूट गया है। पुस्तक के उत्तरार्चिक प्रखण्ड के दो अध्यायों में हिन्दी समालोचना विधा में प्रत्युत काव्य-समग्र में नयवाद (न्याय तत्त्व) के समेकन से उत्पन्न होने वाले प्रलाभ तथा तत्सम्बन्धी आपत्तियों का समाहार भी सुतार्किक एवं सुसंगत स्वरूप में उल्लिखित हैं। यह पुस्तक भी महत्त्वपूर्ण है परंतु अज्ञात कारणों से इस पुस्तक की अधिक समीक्षाएँ ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ पुस्तक में प्रकाशित नहीं हैं।
* समालोचना की श्री रंजन कृत तृतीय पुस्तक है ‘कविता क्या है’ (प्रकाशन-वर्ष 2015)। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डॉ॰ नामवर सिंह आदि ने ‘कविता क्या है’ शीर्षक से मात्र आलेख ही लिखे थे, परन्तु श्री विजय रंजन ने ‘कविता क्या है’ शीर्षक से एक पुस्तक ही रच डाली जिसमें कविता को विविध आयामों (यथा कविता आज के दर्पण में, मिथकीय आधार, देवी सरस्वती से सहयुजन, ऐतिहासिक आधार, स्वभाव, पारिभाषिक आधार, लोकमत आधार आदि) में जाँचा-परखा गया है। कविता विषयक 800से अधिक परिभाषाएँ देशज- विदेशज अभिमत के रूप में उद्धृत हैं इस पुस्तक में। कविता की वर्तमान में मान्य 17 परिभाषाओं की सशक्त तर्कों द्वारा विवेचना करके उन परिभाषाओं को निरस्त भी किया गया है इसमें। इसी पुस्तक में श्री रंजन ने काव्य और कविता की आर्ष मान्यताओं से सुसंगत, सर्वथा दोषमुक्त, सार्वकालिक नवीन परिभाषा प्रारूपित की है। इस पुस्तक में श्री रंजन ने ‘कवि और कविता’ की परिभाषाएँ ऋग्वेद एवं अन्य प्राचीन भारतीय वाङ्मय से भी ढूँढ कर उद्धृत की हैं। श्री रंजन ने कविता को भारतीय मिथकों के आधार पर , कविता की मूल प्रकृति के आधार पर , देवत्वशीलता या दैवीयता और देवी सरस्वती से सहयुजन के आधार पर विवेचित करते हुए स्थापित किया कि कविता को (काव्य के अन्यान्य सभी अपररूपों को भी) दैवीय नहीं, मानुषिक मानने के साथ-साथ देवत्वशील सद्गुणों से (विशेषकर देवी सरस्वती की सात्त्विकता, सद्संस्कारी तितिक्षा आदि से) परिपूर्ण होना वांछनीय है। इस पुस्तक को भी अनेक समीक्षकों ने अपने विषय का इनसाक्लोपीडिया कहा है। श्री रंजन जी की पुस्तक ‘कविता क्या है’ की आ॰ शुक्ल आदि के आलेखों से केवल शीर्षक में ही समानता है; श्री रंजन की पुस्तक का वर्ण्य विषय इन महान् लेखकों के आलेखों के वर्ण्य विषय से नितान्त भिन्न है।
* श्री रंजन की पांचवीं समालोचना पुस्तक 2019 में प्रकाशित ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ है। यह विशुद्ध रूप से साहित्यिक कृति नहीं है; अपितु इसका स्वरूप सांस्कृतिक और राष्ट्रीय है। समीक्षकों ने इस पुस्तक को भारत और भारतीयता विषय पर इनसाक्लोपीडिया कहा है।
पुस्तक में प्राचीन वाङ्मयिक आधारों पर भारत के प्राचीन नाम, नामकरण-सम्बन्धी आधार आदि की तलाश करते हुए श्री रंजन ने भारत-नामांकन के आधार-पुरुष ‘भरत’ नाम के 13 ‘भरत’ का उल्लेख किया है और अंततः स्थापित किया कि वैदिक युग के प्रारंभिक चरणों में एशिया महाद्वीप के जम्बूद्वीप के प्रखण्ड के रूप में प्रथम मनवन्तर के वैदिक ऋषि स्वायम्भुव मनु की पाँचवीं पीढ़ी के पुत्र भरत के नाम पर नामित हुआ था भारत देश का नाम। भारत का ‘भारत’ नाम दुष्यन्त-पुत्र भरत या जैनीय ऋषभदेव-पुत्र भरत के नाम पर (जैसा कि अब तक प्रचारित-प्रसारित किया जाता रहा है) स्थापित नहीं हुआ था, क्योंकि महाराज दुष्यन्त और जैनीय राजा ऋषभदेव दोनों ही स्वायम्भुव मनु के प्रपौत्र भरत के कालखण्ड के बाद के कालखण्डों में भारत के ही शासक बताए जाते हैं जबकि इनके आविर्भाव के पूर्व ही इस देश का नाम भारत स्थापित हो चुका था।
इसी तरह ‘भारत’ एवं ‘भारतीय’ की शब्द-व्युत्पत्ति रेखांकित करते हुए वायु पुराण, विष्णु पुराण, महाभारत आदि के उदाहरणों से श्री रंजन ने इस पुस्तक में भारत एवं भारतीय की प्रकृति-प्रवृत्ति और तत्सम्बन्धी क्रमिक विकास आदि को रेखांकित कर भारत-भारतीयता को देवी भारती से मूलतया सहयुजित सिद्ध किया है।
ज्ञातव्य है कि कतिपय विद्वान् भारत को ‘खिचड़ी’ का रूपक देते हैं जबकि श्री रंजन ने इस पुस्तक में इस खिचड़ी रूपक को ‘पकी खिचड़ी’ के रूप में बड़े सुंदर रूप में रेखांकित कर विपक्षियों को अकाट्य एवं सटीक उत्तर दे दिया है। साथ ही, इस पुस्तक में श्री रंजन द्वारा भारत के मनोमय कोश आदि आध्यात्मिक कोशों का रूपायन करते हुए भारत राष्ट्र के शाश्वत चिन्मय स्वरूप को मुखर स्वरूप में स्थापित किया गया है।
*श्री रंजन की छठवीं समालोचना पुस्तक है ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ (प्रकाशन-वर्ष 2020)। श्री रंजन ने इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति, भारतीय संस्कारों और भारतीय धर्म (सनातन धर्म, वैदिक धर्म, जिसे सामान्यतया हिन्दू धर्म, सनातन हिन्दू धर्म भी कहा जाता है) के साक्षात् विग्रह श्री राम पर लगाए जाने वाले आरोपों को विभंजित कर उन्हें निराधार एवं निस्सार सिद्ध किया है। धर्म-पुरुष श्री राम के प्रति जन-श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो, इस कदाशय से कतिपय धर्म-विद्वेषी और सनातन हिन्दू धर्म-विरोधी कथित विद्वानों के द्वारा लगाए जाने वाले समस्त आरोपों को राम के समकालीन आदि- महाकवि वाल्मीकि की अमर कृति ‘रामायणम्’ में वर्णित तथ्यों के आधार पर इस पुस्तक में निस्सार सिद्ध किया गया है। साथ ही, श्री रंजन ने इस भ्रान्ति का भी खण्डन इस पुस्तक में किया है कि सीता-निर्वासन क्षेपक या काल्पनिक है। उनके अनुसार यह दुःखद प्रसंग घटित हुआ था अवश्य। अपनी प्रस्थापनाओं के पक्ष में श्री रंजन के तर्क इतने सशक्त और इतने सुसंगत है कि एक समीक्षक ने लिखा कि श्री रंजन ने तो राम पर लगाए गए आरोपों को निराधार सिद्ध कर दिया है। अब दायित्व विपक्षियों का है कि वे अपने आरोपों को सत्य सिद्ध करें या श्री रंजन के सत्य कथन को स्वीकार करें। इस पुस्तक की अतिशय प्रशंसा केवल साहित्य जगत् में ही नहीं वरन् समाज के सामान्य जन में भी हुई है। वास्तव में यह कृति वर्ण्य विषय का सुविस्तृत, सतर्क, सुतर्क अनुशीलन प्रस्तुत करती है कि इसे भी अपने विषय का इनसाइक्लोपीडिया कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं माना जा सकता है।
* श्री रंजन की सद्य-प्रकाशित (प्रकाशन-वर्ष 2022) 7वीं आलोचना पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ भारतीय राष्ट्रवाद विषय पर बेमिसाल पुस्तक है। बेमिसाल इस अर्थ में कि अब तक किसी एक लेखक द्वारा लिखित ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के विविध पक्षों को उकेरती कोई अन्य पुस्तक विश्व भर में उपलब्ध नहीं है। सच तो यह है कि भारत में ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ विषय पर पुस्तकें रची ही नहीं जा रही हैं। विदेशों में भी अंग्रेजी, लैटिन, फ्रेंच आदि में ही अधिकांश पुस्तकें राष्ट्रवाद (Nationalism) से सम्बन्धित विरचित की जाती रही हैं। परन्तु वे पुस्तकें प्रायः ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ विषय पर नहीं, अपितु ‘भारत में राष्ट्रवाद’ विषय पर ही छिटपुट रूप में प्रकाशित की जाती रही हैं। डॉ॰ रविकान्त या कृष्णदत्त द्विवेदी द्वारा संपादित पुस्तकें या इसी तरह की एकाध पुस्तकें यदि आईं भी हैं, तो उनमें एक नहीं, अनेक लेखकों के आलेख संगृहीत हैं। डॉ॰ रविकान्त आदि की सम्पादित पुस्तकें ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के विविध पक्षों के बजाय ‘भारत में राष्ट्रवाद के विरोध पक्ष’ से ही सम्बन्धित दिखती हैं। वास्तव में देशी-विदेशी लेखक ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ पर प्रायः नहीं लिखते क्योंकि भारतीय राष्ट्रवाद ‘भारतीय संस्कृति’ पर आधारित है, जिसमें कथित लेखकों को श्री रंजन के शब्दों में ‘हिन्दूवाद की बू’ आती है। प्रतीत होता है कि इसी कारण वामपंथी लेखक भारतीय राष्ट्रवाद के विषय से बचने का सायास यत्न करते हैं। उनके स्फुट लेख भी वामपंथ-विशेष के चौखटे से बाहर नहीं आते। इस प्रकार एकल लेखक की भारतीय राष्ट्रवाद के विविध पक्षों को, विशेषकर उसके सांस्कृतिक राष्ट्रीय स्वरूप को आधार बनाकर लिखी पुस्तकों की सरणि में ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ अकेली और अनूठी पुस्तक है।
368 पृष्ठों की ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पुस्तक भारतीय राष्ट्रवाद और आनुषंगिक विषयों पर, भारतीयता, भारतीय संस्कृति और संस्कृति आधारित आविश्व प्राचीनतम वैदिक युग से आविर्भूत भारतीय राष्ट्रवाद के विभिन्न विषयों पर वास्तव में किसी भी श्रेष्ठ वाङ्मयिक ग्रंथ से अधिक श्रेष्ठ और उपास्य योग्य ग्रंथ है जिसका अध्ययन करने पर निःसन्देह भारतीयता और राष्ट्रवाद के सम्बन्ध में अपरिमित ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इस पुस्तक की भी ढेर सारी समीक्षाएँ आई हैं।
आगे बताना आवश्यक है कि रंजन जी के कृतित्त्व की सम्पूर्ण विशेषताओं पर कुछ लिखने से पूर्व मुझे उनके उस कृतित्व को जानना भी उचित लगा जो पाण्डुलिपित तो है किन्तु अभी पुस्तकाकार में प्रकाशित नहीं हो सका है। इस सम्बन्ध में उनसे मैंने विस्तार से चर्चा की और उनकी पाण्डुलिपित कृतियों का भी अध्ययन किया जिससे ज्ञात हुआ कि साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, धर्म, भाषा, राष्ट्रवाद आदि विषयों से सम्बन्धित सन्दर्भगत पाण्डुलिपित पुस्तकें भी अति महत्त्व की हैं। यथा-
* पाण्डुलिपित पुस्तक ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ में श्री रंजन ने वाल्मीकीय रामायण ‘रामायणम्’ के आधार पर वाल्मीकि को ‘आदि महाकवि’ सिद्ध करने के साथ-साथ उन्हें बिम्बवाद, लोकवाद, मानवतावाद, नारीवाद, नयवाद, नयरसवाद, प्रकृतिवाद, मनोविज्ञानवाद, राष्ट्रवाद आदि को प्रथम लौकिक महाकाव्यीय महाकवि सिद्ध किया है। वर्तमान में मान्य कथित अनेक प्रत्यय यथा बिम्बवाद, लोकवाद आदि को श्री रंजन ने अपनी इस पुस्तक में क्रमशः पाश्चात्य विद्वान् टी॰ ई॰ हुल्मे, एजरापाउण्ड, सिसरो आदि के बजाय आदि-महाकवि वाल्मीकि का आदि-अवदान स्थापित किया है। इस तरह, इस पुस्तक के विरचन द्वारा श्री रंजन ने सम्प्रति साहित्य-जगत् में तत्सम्बन्धी विभ्रम और भ्रामक अवधारणाओं का निराकरण कर प्रथम भारतीय महाकवि वाल्मीकि के उत्कृष्ट साहित्यिक अवदानों को प्रकाश में लाने का महान कार्य सम्पन्न किया है। यह पुस्तक प्राचीन भारत के साहित्यिक गौरव की पुनर्स्थापना करने में सक्षम है। निश्चित रूप से जिस प्रकार से अब तक पौर्वात्य-पाश्चात्य साहित्यिक निकषों के सापेक्ष ‘रामायणम्’ को परखने वाली प्रकाशित पुस्तक ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ (रचनाकार विजय रंजन) सदृश कोई अन्य कृति प्रस्तुत नहीं हो सकी है, उसी प्रकार अब तक वाल्मीकि की रामायणम् पर उपरि इंगित ‘..... 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ सदृश कोई अनुशीलन भी न तो भारतीय जगत् में और न ही भारतीयेतर जगत् में किसी अध्येता द्वारा प्रस्तुत किया गया है। परिणाम यह हुआ कि अब तक अज्ञानतावश लोकवाद, बिम्बवाद आदि का श्रेय यूरोपीय काव्यकारों को ही दिया जाता रहा है। श्री रंजन की आदि-महाकवि वाल्मीकि सम्बन्धी दोनों पुस्तकें भ्रामक अवधारणाओं को तार्किक रूप से चूर-चूर कर देती हैं।
* श्री रंजन द्वारा विरचित पाण्डुलिपित पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति के आदि-महागायक वाल्मीकि का कालखण्ड’ भी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें आदि-महाकवि का कालखण्ड वाङमयिक, पुरातात्त्विक, नक्षत्रीय, ऐतिहासिक, राजनैतिक आदि आधारों पर सतर्क सुसंगत प्रमा से विवेचित है और इन आधारों पर यह कालखण्ड आज से 7000 वर्ष पूर्व (5000 ई॰पू॰) अवधारित किया गया है। ऐसी अवधारणाएँ राष्ट्र, समाज, संस्कृति आदि की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।
* श्री रंजन कृत पाण्डुलिपित पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद : एक विशिष्ट विमर्श’ के पूर्वार्चिक एवं उत्तरार्चिक प्रखण्डों के विभिन्न अध्यायों में भारत के इतिहास, संस्कृति, शिक्षा, भाषा, साहित्य आदि को भारतीय राष्ट्रवाद का कारक बताया गया है। ऐसे कारकों का अध्ययन राष्ट्रहित में उपयोगी है।
* अग्रेतर, पाण्डुलिपित समालोचनापरक पुस्तक है ‘रामत्व और हमारा समय’ पुस्तक में पूर्वार्चिक प्रखण्ड में ‘रामत्व क्या है’, ‘राम के जीवनाचारों का सारतत्त्व’ सदृश अध्याय हैं। उत्तरार्चिक प्रखण्ड में ‘रामत्व की सार्वकालिक प्रासंगिकता’ और ‘मानव मात्र के सर्वतोभद्र कल्याण में रामत्व की उपयोगिता’ अध्यायों में विषयवस्तु का धीर-गम्भीर एवं विशद विवेचन है। श्री रंजन के शब्दों में ‘रटे जा मेरी जिभिया रामै राम’ के बजाय ‘रामत्व’ की वस्तुनिष्ठ उपयोगिता सार्वकालिक है। रामत्व राम के काल में ही उपयोगी नहीं था। वर्तमान युग में भी मानव की जीवन-यात्रा सह लोकयात्रा को न केवल भौतिक अपितु आध्यात्मिक स्तर पर भी सुप्रवर्तित करने हेतु रामत्व अति-अति उपयोगी है।
* समालोचना की पाण्डुलिपित पुस्तक ‘तुलसी का स्वान्तः सुखाय’ के पूर्वार्चिक प्रखण्ड में कविश्रेष्ठ तुलसीदास के ‘स्वान्तः सुखाय’ से लेकर उनकी भाषा, काव्य-निकष आदि की विवेचना नए ढंग से प्रस्तुत है। इसमें भी श्री रंजन ने अपनी तार्किक क्षमता का प्रयोग करके अनेक ऐसी प्रस्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं जो अब तक प्रायः अज्ञात या अल्प चर्चित हैं। इस दृष्टि से कविवर तुलसी के परिप्रेक्ष्य में और सम्पूर्ण साहित्यिक जगत् के लिए श्री रंजन की यह पुस्तक विशेष महत्त्व की है।
* पाण्डुलिपित समालोचनात्मक पुस्तक ‘भारतीय शिक्षा व्यवस्था: सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पक्ष’ में ‘शिक्षा’ को ‘ ि+ श + क्ष + ा’ के रूप में में परिभाषित करते हुए शिक्षा की एक क्रांतिक परिभाषा प्रदान की गई है। साथ ही, पुस्तक में शिक्षा के ज्ञान + विद्या + संस्कार + जीविकोपार्जन सक्षमता के चार आयामी अधिलक्ष्य भी निरुपित किए गए हैं।
* इसी तरह पाण्डुलिपित ‘भारतीय न्याय व्यवस्था : सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पक्ष’ में प्राचीन और अर्वाचीन भारतीय न्याय व्यवस्था के अनेक अनकथ पक्ष उन्मीलित हैं। इस कृति का प्रणयन अभी प्रारम्भिक चरण में है।ं
* श्री रंजन की पाण्डुलिपित समालोचना पुस्तक ‘विश्वविजय पथ पर पर हिन्दी’ में हिन्दी की विशेषताओं, उसकी सक्षमताओं को उकेरते हुए हिन्दी की वैश्विक विजय को रेखांकित किया गया है। पुस्तक में हिन्दी को आभारत संपर्क भाषा सह राष्ट्रभाषा सह राजभाषा अविलम्ब घोषित करने के पक्ष में सार्थक दलीलें भी प्रस्तुत की गई हैं।
* पांडुलिपित समालोचनापरक पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति: एक विशिष्ट दृष्टि’ भारतीय संस्कृति विषयक विशिष्ट पुस्तक है।
इस कृति के पूर्वार्चिक प्रखण्ड में ‘भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ’ अध्याय और उत्तरार्चिक प्रखण्ड में ‘संस्कृति की दैनन्दिनी जीवन में उपयोगिता’ अध्याय विशेष आकर्षण के अध्याय हैं।
* श्री रंजन की अन्य पांडुलिपित पुस्तक ‘सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ क्यों’ भी महत्त्वपूर्ण है। पुस्तक के पूर्वार्चिक प्रखण्ड में धर्म-सम्बन्धी शास्त्रोक्त प्रकथन, उनकी यथावश्यक विवेचना और उत्तरार्चिक में अन्यान्य भारतीय धर्मों में समापवर्तिता, साम्य और मुख्य विभेद आदि का उल्लेख ह,ै जो सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) को अधिक मानवीय, अधिक वस्तुनिष्ठ धर्मालु, अधिक शांतिकामी और सर्वाधिक श्रेष्ठ ही नहीं अपितु उत्कृष्टतम धर्म सिद्ध करती हैं।
उक्त के अतिरिक्त कुछेक अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकें भी हैं, परन्तु उनका लेखन अभी प्रारम्भिक अवस्था में है।
उपर्युक्त महनीय पुस्तकों की रचना के साथ-साथ श्री रंजन ने सम्पादकीय, पत्रकारिता आदि प्रक्षेत्रों में भी प्रशंसनीय और सारवान् लेखन प्रस्तुत किया है। यथा-
सम्पादकीय
2 अक्टूबर 1976 से आरम्भित अवध-अर्चना (मासिक, साप्ताहिक और तदन्तर 110 अंक त्रैमासिक) के प्रत्येक अंक में निरन्तर सम-सामयिक सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक विषयों पर और मनसेवाद, फूलनवाद के निरोधन आदि राजनैतिक विषयों पर श्री रंजन जी के अनेक सम्पादकीय अविरल प्रशंसित होते रहे हैं।
इसके अतिरिक्त दो सम्पादित प्रकाशित पुस्तकें और 12 अप्रकाशित पुस्तकें भी हैं जिनमें विभिन्न विषयों पर श्री रंजन कृत प्राक्कथन एवं आलेख समाहित हैं। अब तक प्रकाशित 12 मौलिक कृतियों में पुरावृत्ति एवं विवृति के नाम से जो आलेख हैं, वे भी एक तरह से प्राक्कथन या सम्पादकीय ही हैं। वे सब अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं।
पत्रकारिता
श्री रंजन लम्बे अरसे से पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। सन् 1965 में गोण्डा के साप्ताहिक ‘विचारभारती’ से उन्होंने पत्रकारिता का आरम्भ किया। फैजाबाद आने पर वे ‘स्वप्न रेखा’, ‘युगगति’ आदि अनेक स्थानीय समाचारपत्रों से जुड़े। इसप्रकार 1965-66 में ‘विचारभारती’ (साप्ताहिक), 1975-85 में ‘छात्रमोर्चा (समाचार-पत्र)’, ‘साकेत शोभा’ (दैनिक), ‘अवध शोभा’ (दैनिक) एवं ‘सुवर्णी’ (पत्रिका) से वे सम्बद्ध रहे। पत्रिका ‘शिक्षा-संवाद’ एवं ‘शिक्षा साहित्य’ (फैजाबाद), ‘लोकमंगल’ (ग्वालियर) के वे विशिष्ट सहयोगी रहे और वर्तमान में पत्रिका ‘चेतनता’ (गोरखपुर) के वे परामर्शदाता हैं। 1975 में ‘युगगति’ (साप्ताहिक), 1994 में ‘अवधी’ (पत्रिका), 1995-97 ‘तुलसीदल’ (पत्रिका) से वे सह-संपादन द्वारा जुड़े रहे। इसके अतिरिक्त 2 अक्टूबर 1976 से ‘अवध-अर्चना’ मासिक समाचार-पत्र का संपादन-प्रकाशन और जनवरी 1977-1989 में ‘अवध-अर्चना’ साप्ता॰ समाचारपत्र का संपादन-प्रकाशन भी उन्होंने किया। तदन्तर अप्रैल 1995 से अद्यतन ‘अवध-अर्चना’ त्रैमासिक का अनवरत संपादन उनके द्वारा जारी है। उनके सम्पादन में अवध-अर्चना त्रैमा॰ के अनेक चर्चित विशिष्ट अंक रहे हैं। यथा-- तुलसी अंक, गाँधी अंक, विवेकानन्द अंक, आचार्य नरेन्द्रदेव अंक, लघुकथा अंक, बालसाहित्य अंक, हिन्दी गजल अंक, अयोध्या अंक, कबीर अंक, विज्ञानकथा अंक, उपयोगी विज्ञान अंक, भारतीय समाजवादी आन्दोलन के तीन शक्तिपुंज अंक, राजभाषा अंक, पूर्वोत्तर भारत अंक 1, पूर्वोत्तर भारत अंक 2 एवं ‘नवगीत 2021 अंक’ का प्रकाशन का कीर्तिमान भी श्री रंजन ने स्थापित किया है। ‘अवध -अर्चना’ त्रैमासिकी न केवल R.N.I., I.S.S.N. द्वारा सूचीबद्ध है वरन् उ॰ प्र॰ हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा ‘सरस्वती पुरस्कार 2014’ से पुरस्कृत भी है। पत्रिका www.awadharchana.com पर उपलब्ध है।
* स्फुट प्रकाशन एवं प्रसारण: 1965 से साहित्यिक लेखनारम्भ करने वाले श्री रंजन की प्रथम रचना (आलेख) 1965 में ही जी॰वी॰एम॰ इण्टर कालेज, गोण्डा, उ॰प्र॰ की कालेज-पत्रिका ‘ज्योति’ में प्रकाशित हुई थी। तबसे अब तक वे लगातार स्फुट लेखन एवं प्रकाशन में भी निरत हैं। अवध-अर्चना समाचारपत्र, नवजीवन, कुबेर टाइम्स, जनमोर्चा, चौथी दुनिया, गाण्डीव, स्वतंत्र भारत, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, आज, अमृत प्रभात, नए लोग, साकेत शोभा, विश्वसेतु, आज की सभ्यता, टाण्डा-दर्पण, युगगति, जनसंदेश टाइम्स आदि समाचारपत्र एवं अवध -अर्चना त्रैमा॰, भारतीय रेल, उत्तर प्रदेश, योजना, नूतन कहानियाँ, भाषा, साहित्य भारती, छायाकार, विवेकवाणी, फिल्मी दुनिया, सूरज, अमिता, ज्ञानवापी, मंगलदीप, सुवर्णी, तुलसीदल, समकालीन अभिव्यक्ति, समान्तर, शब्दशिखर, अक्षरपर्व, शिक्षा-साहित्य, शुक्रवार, स्वतंत्र भारत सुमन, पूर्वापर, अभिनव प्रसंगवश, मानस संगम, खोज, सोच विचार, वागर्थ, साहित्य अमृत, राष्ट्रभाषा सन्देश, चिन्तन सृजन, मधुमती, वीणा, कंचनलता, प्राची, भावक, शैक्षिक उन्मेष, राष्ट्रधर्म, अक्षरा, स्पन्दन, स्पाइल (नार्वे) आदि विभिन्न पत्रिकाओं में लघुकथा, कहानी, कविताएँ (गीत, नवगीत, ग़ज़ल, हिन्दी गजल, अगीत, अकविता), आलेख, समीक्षा, रिपोर्ताज, फीचर आदि विभिन्न विधाओं की 500 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। श्री रंजन के आलेख, कहानी, कविता आदि आकाशवाणी लखनऊ एवं फैजाबाद एवं विभिन्न टी॰वी॰चैनलों से और विभिन्न काव्यमंच एवं विचार- संगोष्ठियों के माध्यम से भी अनेकानेक बार प्रसारित होते आए हैं।
स्फुट लेखन
उपर्युक्त विपुल गम्भीर लेखन के अतिरिक्त श्री रंजन ने यथावसर विविध स्फुट लेखन भी प्रचुर परिमाण में किया जो निम्नानुसार है-
* समीक्षा: श्री रंजन का एक समीक्षा-संग्रह ‘आर-पार’ है। यद्यपि श्री रंजन 1976 से जब-तब विविध समीक्षाएँ लिखते आए हैं, किन्तु इसमें अभी पर्याप्त संख्या में समीक्षाएँ संगृहीत नहीं हो सकी हैं। अवध-अर्चना साप्ताहिक में नाटक ‘फफोले’ की समीक्षा और एक कवि-सम्मेलन की समीक्षा ‘अहले अदब कितना बेअदब हैं’ तथा 1997 में अवध-अर्चना त्रैमासिक में प्रकाशित डॉ॰ रमाशंकर तिवारी, डॉ॰ सत्यप्रकाश त्रिपाठी, डॉ॰ सुधाकर अदीब, डॉ॰ सत्येन्द्र रघुवंशी, डॉ॰ रामबचन वर्मा, डॉ॰ सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’, डॉ॰ गौरीशंकर पाण्डेय ‘अरविन्द’ आदि की कृतियों की समीक्षाएँ चर्चित रही हैं। श्री रंजन अपनी समीक्षाओं में नीर-क्षीर विवेक से अति तार्किक ढंग से कृति के गुण-दोषों का परीक्षण करते हैं, बिना इस बात का विचार किए कि समीक्ष्य कृति का कृतिकार कितने प्रभावशाली पद पर आसीन है। उनकी समीक्ष्य दृष्टि में समीक्ष्य कृति का साहित्यिक सौष्ठव दूसरे क्रम का विषय है, प्रथमतः कृति को लोकोपयोगी और कल्याणक होना चाहिए। इसी कारण वे समीक्षक के रूप में न्यायिक दृष्टि से कृति की लोकोपयोगिता को परखते हैं। फलतः अधिकांश कृतिकार उनके द्वारा कृत समीक्षा से उनसे प्रसन्न नहीं रहते।
* साक्षात्कार: श्री रंजन ने साक्षात्कार विधा पर भी कलम चलाई है। उनकी साक्षात्कार पुस्तक ‘आमने-सामने’ अभी अपूर्ण है यद्यपि इसमें सर्वश्री गंगाप्रसाद मिश्र, नरेश मेहता, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर आदि से लिए गए साक्षात्कार सम्मिलित हैं।
* संस्मरण: श्री रंजन सामान्यतया नाराशंसी लेखन से बचते हैं; फिर भी कुछेक स्थानीय साहित्यसेवीजन के निधनोपरान्त जो अनेक संस्मरण ग्रंथ प्रकाशित हुए, उनमें श्री रंजनकृत संस्मरण देखे जा सकते हैं, जो अनूठे हैं।
* प्राक्कथन : अनेक अन्य लेखकों की कृतियों के विविध प्राक्कथन भी श्री रंजन द्वारा लिखे गए हैं। कविवर अपर जिला जज फैजाबाद श्री नरेशचन्द्र, डॉ॰ हरिप्रकाश श्रीवास्तव ‘हरि अवधी’, डॉ॰ गौरीशंकर पाण्डेय ‘अरविन्द’, डॉ॰ शिवम् तिवारी, बुन्देलखण्ड के श्री सुधाकान्त मिश्र बेलाला, भोपाल डॉ॰ आनन्द कुमार सिंह, स्थानीय साहित्यकार डॉ॰ सुमति दुबे, विचारक लेखक डॉ॰एल॰के॰ सिंह आदि की कृतियों के प्राक्कथन भी कृति-प्रणेताओं के आग्रह पर श्री रंजन ने लिखे हैं।
* व्याख्यान : अपनी साहित्यिक विद्वत्ता के बल पर का॰ सु॰ साकेत महाविद्यालय, डॉ॰ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या शोध संस्थान, लखनऊ विश्वविद्यालय, मनूचा महिला महाविद्यालय फैजाबाद, ग्रेटर रोटरी क्लब फैजाबाद के ‘लघुकथा कार्यशाला’, बी॰एन॰के॰बी॰पी॰जी॰ कालेज अकबरपुर अम्बेडकर नगर और अन्य नगरों में विभिन्न साहित्यिक संस्थानों के तत्त्वावधान में विविध सामाजिक साहित्यिक सांस्कृतिक विषयों पर उन्होंने विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किए जिनकी समुपस्थित विद्वत् समाज ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।
श्री रंजन के गद्य काव्य का कला पक्ष, भावपक्ष एवं विचार पक्ष
कला पक्ष : श्री रंजन के गद्य काव्य में मुख्यांश कथा-साहित्य और समालोचनापरक साहित्य है। इनकी भाषा में तत्सम, तद्भव हिन्दी शब्द, हिन्दी शब्दों के साथ आंचलिक भाषायी शब्द और यदा-कदा संस्कृत भाषा-शब्द यथावसर यथास्थान उल्लिखित हैं। इसके अतिरिक्त श्री रंजन के गद्य़-साहित्य की भाषा में यथावसर अंग्रेजी, लैटिन, फ्रेंच, उर्दू के शब्द (जिनके हिन्दी अर्थ प्रायः आस-पास उल्लिखित रहते हैं) उनके सम्पूर्ण गद्य-साहित्य की विशेष विशेषताएँ हैं। श्री रंजन की गद्य रचनाओं में (पद्य रचनाओं में भी) यदा-कदा अवधांचल में बोली जाने वाली अवधी, भोजपुरी शब्दों का और ग्राम्यांचल में प्रयुक्त बिम्ब, प्रतीक आदि की बिम्बार्थक भाषा का प्रयोग बहुतायत से किया गया है। श्री रंजन के गद्य-साहित्य का कविता की तरह बहता हुआ भाषा-प्रवाह हृदयग्राही ही नहीं है, अपितु यह उनके गद्य को एक लय, एक विशिष्ट यति गति से सम्पन्न और आकर्षक बनाता है।
श्री रंजन की कुछेक आरम्भिक कृतियों उदाहरणार्थ ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ की भाषा पर एकाध विद्वान् समीक्षकों ने ‘कठिन भाषा’ का आरोप लगाया था। उन कृतियों में वाक्य-विन्यास बड़े-बड़े और संयुक्त वाक्यों के रूप में थे जबकि बाद की कृतियों में श्री रंजन ने वाक्य साधारण रखे हैं। बाद के इन ग्रंथों की भाषा को समीक्षकों ने कठिन नहीं बताया है। कृतियों की भाषा ‘कठिन’ कहे जाने के सम्बन्ध में श्री रंजन कहते हैं- “मैं विषयवस्तु के अनुसार भाषा का चयन करता हूँ और प्रायः शुद्ध हिन्दी शब्दों का ही प्रयोग करता हूँ । उदाहरणार्थ, मैं ‘कोर्ट’ या ‘कचहरी’ के बजाय ‘न्यायालय’ और ‘हॉस्पिटल’ के बजाय ‘चिकित्सालय’ का प्रयोग पसन्द करता हूँ। मैं चलताऊ या सरल भाषा के नाम पर हिन्दी में विजातीय शब्दों (जिनके हिन्दी विकल्प ज्ञात हैं) के प्रयोग को यथासम्भव अनुमन्य नहीं करता और मैं ही नहीं, राजा लक्ष्मण सिंह, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त से लेकर मुक्तिबोध तक सरल भाषा के नाम पर हिन्दी को अपदूषित करने की अनुमति नहीं देते। ऐसा किया जाना चाहिए भी नहीं।’’
श्री रंजन जी अपनी कृतियों एवं आलेखों में संस्कृतनिष्ठ नहीं, तो भी तत्सम शब्दावली में जहाँ तक सम्भव हो हिन्दी शब्दांे का ही प्रयोग करते हैं। वे विकल्पहीन होने पर ही विदेशी भाषाओं यथा अंग्रेजी, लैटिन, फारसी, उर्दू शब्दों का, मुहावरों का प्रयोग करते हैं। श्री रंजन के कथा-साहित्य में परिवेश एवं पात्र की भाषा के समानुरूप अंग्रेजी, उर्दू शब्दों का भरपूर प्रयोग भी है। उनकी कुछेक कहानियों के शीर्षक भी अंग्रेजी में हैं, जैसे ‘इमेज’, ‘पोस्टमार्टम’ आदि। श्री रंजन के अनुसार इसका कारण यह है कि इनका सटीक हिन्दी पर्यायवाची उपलब्ध नहीं है, जबकि ऐसे प्रयोग से कहानी के कथानक और कथ्य की सफल अर्थच्छवि का सम्प्रेषण संभव हो जाता है।
यथावश्यकता शब्दों को हिन्दी-व्याकरणानुसार नए रूप में गढ़ने के अनेकानेक उदाहरण भी श्री रंजन की प्रायः सभी कृतियों में विद्यमान हैं, यथा- जन्म से जान्मिक आदि। ऐसे उदाहरण अन्य लेखकों में विरल हैं। स्थानीय का॰सु॰साकेत पी॰जी॰कालेज के डॉ॰ आर॰के॰जायसवाल इस सम्बन्ध में लिखते हैं- ”शब्दों एवं वाक्यों को ‘क्वायन (ब्वपद)’ करने वाले बहुत ही कम लोग हिन्दी एवं अंग्रेजी साहित्य में हैं, मुझे कृति-लेखक (विजय रंजन) इसी श्रेणी के विद्वान् लगे।“ (द्रष्टव्य कृति: ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’)।
अग्रेतर, श्री रंजन के भाषा-सौष्ठव के परिप्रक्ष्य में कहना होगा कि वे प्रवाहपूर्ण सहित्भावी साहित्यिक भाषा-सौष्ठव के साथ अपने स्पष्ट विचार वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, तार्किक स्वरूपों में प्रस्तुत करते हैं।
श्री रंजन की कृतियों की भाषा में गणितीय मुहावरों का प्रयोग भी देखने को मिलता है। उदाहरणार्थ ‘2$2=4 मानने के बजाय 2+2=5 मानने’ का प्रयोग। ऐसे प्रयोग उनके लेखन-शैली को बाधित नहीं करते, अपितु ऐसे प्रयोगों से श्री रंजन के प्रकथनों को बल मिलता है और उनके प्रकथनों का आकर्षण बढ़ जाता है।
श्री रंजन की कथ-शैली भी अपने ढंग की अनूठी एवं हृदयग्राही होती है।
भाव पक्ष: कथा-साहित्य और उससे बढ़ कर कथेतर साहित्य विशेषकर समालोचनापरक आलेखों में साहित्यिक-सांस्कृतिक तथ्यों के निगमन में समाजशास्त्र, विज्ञान, मनोविज्ञान के तथ्यों का विवेचन और बीच-बीच में नैयायिक तर्क का प्रस्तुतिकरण भी श्री रंजन के निष्कर्षात्मक निगमन को बल प्रदान करता है। श्री रंजन के आलेखों में साहित्य, भारतीयता, भारतीय संस्कृति की ओर लगाव सुस्पष्ट होने के बावजूद आलेखों में सम्प्रस्तुत सुदीर्घ, सुतार्किक तथ्यसम्मत विवेचन के बल पर, साथ ही इन विवेचनाओं का आधार समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक सत्यों के बल पर उनके आलेख तर्कसम्मतता (Reasonability) एवं सुसंगतता (Rationality) से सर्वग्राह्य हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय सनातनी आदर्शों और भारतीय आचार-विचार-संस्कार की सार्वश्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए प्रतिबद्ध लेखन के लेखक श्री रंजन अपने आलेखों में यथार्थवादी तथ्यशील, सुसंगत साक्ष्यों के सापेक्ष प्रमा-आधारित निष्कर्षों को सुस्पष्ट रूप में प्रस्तुत करते हैं।
श्री रंजन के गद्य-साहित्य में उद्धरणों की भरमार रहती है। उनके आलेखों में हिन्दी या संस्कृत के ही नहीं, विदेशी विद्वानों यथा अंग्रेजी, लैटिन, फ्रेंच, शेष यूरोप, अमेरिकी, सामी, चीनी, जापानी विद्वानों के प्रचुर उद्धरण मिल जाएंगे जिनके हिन्दी अनुवाद या अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध है। इतना ही नहीं, श्री रंजन देशज-विदेशज विद्वानों के कथनों की समीक्षा-समालोचना (भारतीय मनीषा से विपरीत होने पर उनकी यथावश्यक कटु आलोचना भी) करते हैं और संदर्भगत देशज-विदेशज अभिमतों से अपनी सहमति- असहमति भीे रेखांकित करते चलते हैं। किसी देशी-विदेशी विद्वान् की भारत, भारतीयता, भारत-गौरव, भारतीय संस्कृति, भारतीय संस्कार, भारतीय आदर्श, भारतीय सनातनी दर्शन, सनातनी सदाचार-आचार-विचार आदि के विपरीत अवधारणा के वे यथावसर तथ्यसम्मत प्रमाशील सुतार्किक खण्डन से चूकते नहीं हैं। विदेशज विद्वानों को श्री रंजन प्रायः बाद में उद्धृत करते हैं। साहित्यिक सांस्कृतिक विषयों के छोटे-बड़े निबन्धों में ऐतिहासिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक प्रकथनों की यथावसर विवेचना समेकित होने के कारण श्री रंजन अपने निबन्धों को ‘आलेख’ कहते हैं क्योंकि श्री रंजन के अनुसार ‘निबन्ध’ किसी विशेष विषय या विचार से ही निबन्धित होना चाहिए, आलेख के लिए यह विन्यास विस्तृत होता है।
विचार पक्ष : वास्तव में साहित्यकार के विचार पक्ष, उसके ज्ञान और चिन्तना में निहित होता है, जो उसके कृतित्व में अभिव्यक्त होता है। किसी भी प्रबुद्ध लेखक के विचार पक्ष की समीक्षा में उस लेखक के चिन्तन और अनुभूति के साथ-साथ क्रियात्मक पक्ष में व्यवहार अथवा आचार का आकलन अपेक्षित होता है। अतएव, विजय रंजन जैसे लेखक के साहित्यिक सांस्कृतिक संभार के आकलन के लिए उनके कृतित्व के विचार पक्ष का अनुशीलन करना आवश्यक है।
श्री रंजन के विचार-पक्ष को समुचिततया अलग-अलग देखा जाना चाहिए इसलिए कि अब तक श्री रंजन की जो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं या प्रकाशन के लिए बिल्कुल तैयार (पाण्डुलिपित) हैं, उनमें श्री रंजन के लेखन का विचार पक्ष स्पष्ट और सशक्त रूप से अभिव्यक्त है, जो अति महत्त्वपूर्ण, सारवान् और समाजोपयोगी है। श्री रंजन के कृतित्व का विचार पक्ष विशेष रूप से निम्नांकित विचार-सरणियों से प्रमुखता से सम्बन्धित है-
* साहित्य-सम्बन्धी विचार, * संस्कृति-सम्बन्धी विचार, * भारतीयता-सम्बन्धी विचार, * राष्ट्रवाद-सम्बन्धी विचार, * धर्म-अध्यात्म सम्बन्धी विचार, * भाषा-सम्बन्धी विचार, * शिक्षा-सम्बन्धी विचार, * नीति-सम्बन्धी विचार। उनके आलेख-संग्रह ‘वातायन से’ आदि में अनेक निबन्ध हैं जिनमें उपर्युक्त विषयों पर भी गम्भीर विवेचना अंकित है।
श्री रंजन की सभी कृतियों में उनका वैचारिक पक्ष न केवल सतर्क, सुदीर्घ विवेचनापरक शैली में सबल दिखता है, वरन् उनमें श्री रंजन के विचार सुस्पष्ट, सुतार्किक, लोकहित से सुसंगत और तथ्यसम्मत दिखते हैं। उनकी समग्र दृष्टि भी पूर्णतया साहित्यिक, सांस्कृतिक, सांस्कारिक और ‘भारती + य + ता’ से सरोकारित रहती है, जिनमें उनका विचार पक्ष, उनकी नैयायिक वैज्ञानिक तार्किकता से सुसज्जित उनका वैचारिक पक्ष अति मुखर रहता है।
श्री रंजन के कृतित्व के विचार पक्ष को लोकोपयोगिता एवं लोकयात्रा- सुप्रवर्तन में सहायक की कसौटी पर देखें तो दृष्टिगत होता है कि विजय रंजन की कृतित्व का विचार पक्ष (शब्दान्तर से कहें तो उनका मानस पक्ष, संस्कार पक्ष और सांस्कारिक पक्ष) अति सबल है।
श्री रंजन की कृतियों में निहित विचार-तत्त्वों का समुचित अनुपालन यदि किया जा सके तो हिन्दी जगत् ही नहीं, अपितु साहित्य जगत्, सांस्कृतिक जगत्, शिक्षा जगत् और राष्ट्रीय फलक पर अनेक लोकहिती क्रान्तिक परिवर्तन साक्षात् हो जाएंगे, इसमें सन्देह नहीं है।
यहाँ यह कहना आवश्यक है कि श्री रंजन के विचार पक्ष के सुस्पष्ट और सुदृढ़ होने का आधार उनका बहु-अधीत होना तो है ही, विज्ञान के छात्र एवं नैयायिक व्यवस्था में अधिवक्ता-कार्य में दीर्घकाल तक निरत रहने से उनकी दृष्टि मूलतया वैज्ञानिक, नैयायिक, सुतार्किक, तथ्यसम्मत और सुसंगत हो गई है। इसीलिए श्री रंजन अपने विचारों को दृढ़ता से प्रस्तुत करने में सफल रहते हैं और इसी दृढ़ता के फलस्वरूप वे अपनी कृतियों एवं आलेखों में बड़े से बड़े लेखक का खण्डन करने में हिचकते नहीं। किसी भी विषयवस्तु के ‘क्या, क्यों, कैसे’ का तर्कसंगत विवेचन करके अंततः एक सुनिश्चित निष्कर्ष का अकाट्य आरेखन विजय रंजन के लेखन की अतिरिक्त विशेषता है।
ध्यान देने योग्य है कि श्री रंजन के लेखन का खण्डन किसी सूरिभि विद्वान् ने अब तक नहीं किया है। इसके विपरीत उनके द्वारा रचित साहित्य को हजारों विद्वानों ने प्रशंसित किया है।
वस्तुतः श्री रंजन अपने लेखन में तर्कसंगतता, तथ्यसम्मतता, शास्त्रोक्त उद्धरणों को इतना आभरित कर देते हैं कि विद्वत्जन उनके लेखन और पुस्तकों की प्रशंसा ही करते हैं। इस सम्बन्ध में गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ॰ के॰ सी॰ लाल ने एक संगोष्ठी में अपना अभिमत प्रकट किया था कि-
“...... इन्हें (श्री रंजन द्वारा प्रस्थापित प्रस्थापनाओं को) जिस तर्कसम्मत ढंग से प्रस्तुत किया गया है, उन्हें कोई इकबारगी खारिज नहीं कर सकता। ”
विजय रंजन के लेखन के विशिष्ट पक्ष
श्री रंजन की पुस्तकों की समावर्त्तक विशिष्टताओं के सन्दर्भ में कहना होगा कि-
# श्री रंजन की समालोचनात्मक कृतियाँ अधिकांशतया पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक प्रखण्डों में विभाजित है। अभी तक प्रकाशित कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ ही केवल एक ऐसी कृति है जिसमें पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक के मध्य मध्यमार्चिक प्रखण्ड भी है। श्री रंजन के अनुसार अपने लेखन को वैदिक पावनता प्रदान करने हेतु उन्होंने ये तीनों शब्द सामवेद से अनुकृत किए हैं।
# भाषायी समावर्त्तक के अनुशीलन-क्रम में कहना होगा कि-
॰ श्री रंजन भाषा-सौष्ठव, अज्ञेय, गिरिजा कुमार माथुर आदि के अनुकरण में शब्दों को तोड़ कर (उदाहरणार्थ ‘और’ को ‘औ...र’ के रूप में) लिखते हैं। वे शब्द या अक्षर पर विशेष बलाघात दर्शाने के साथ-साथ यथावसर ‘दो शब्द’, दो तत्त्वों के परस्पर प्रतिस्पर्धी स्वरूप और बनामियत को दर्शाने के लिए (यथा ‘राम औ...र श्याम’ अर्थात् ‘राम बनाम श्याम’ या ‘राम प्रतिपक्षी श्याम’ के भाव को परिस्पष्ट करने के लिए) श्री अज्ञेय आदि की शब्दों को तोड़ कर लिखने की विशेष शैली अपनाते हैं। इस सम्बन्ध में स्पष्टीकरण उनकी पुस्तकों में अंकित रहता है।
॰ अज्ञेय जी ‘विवृत एवं पुरावृत्ति’ पदबन्ध का प्रयोग कृति में अपने सम्पादकीय कथ्य के लिए प्रयोग किया था किन्तु श्री रंजन श्री अज्ञेय से उधारित इस पदबन्ध को ‘पुरावृत्ति और विवृति’ के परिवर्तित स्वरूप में अंकित करते हैं।
# कथ्य-समावर्त्तक के रेखांकन में रेखांकनीय है कि-
* पाश्चात्य वैचारिकता से या धर्मद्वेषी मार्क्सवाद या भारत के प्रति असम्मान दर्शाने वाले कार्लमार्क्स से लेकर कथित यूरोपीय श्रेष्ठता के परचमधारी सैमुअल हटिंग्टन आदि की कटुतम आलोचना को श्री रंजन-प्रणीत कृतियों में प्रचुर परिमाण में देखा जाता है। धर्म को कार्लमार्क्स ने अफीम बताया था जबकि धर्म को विवेकानन्दीय परम्परा में श्री रंजन भारतीय जनजीवन का लाइफ ब्लड अपितु उससे भी आगे बढ़ कर धर्म को भारतीय जीवन, भारतीय मन का प्रोटोप्लाज्म (जीवद्रव्य) बताते दर्शाते हैं। इसी तरह मार्क्सवाद और उसके अनुयायी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्रमुखता देते हैं, जबकि भारतीय मनीषा द्वन्द्व नहीं, शान्ति, लोकविश्रान्ति को वरीयता देती है। मार्क्सवाद और उसके अनुयायी मुख्यतया अर्थवाद को वरीयता देते हैं जबकि इसके विपरीत भारतीय मनीषा अर्थासक्ति को धर्म के बाद की वरीयता में सीमित परिमाण में धर्मासिक्त स्वरूप में स्वीकार्य मानती रही है। अतएव, श्री रंजन प्रसंगित निकृष्टताओं के आधार पर अपनी प्रायः सभी कृतियों, आलेखों में मार्क्स ही नहीं वरन् सम्पूर्ण मार्क्सवादी जगत् को सिद्धान्ततया एवं व्यवहारतया हीनतर मानते/ बताते हैं।
* भारतीयता, भारतीय संस्कार, भारतीय संस्कृति, भारतीय जीवन-मूल्य, भारतीय धर्मालुता आदि के प्रति श्री रंजन का लेखकीय लगाव स्पृहणीय है। इसीलिए श्री रंजन अपनी पुस्तकों में कृति-कथ्य और कृति-कथ में भारतीय श्रेष्ठताओं को रूपांकित करते हैं, जो उनकी प्रायः प्रत्येक कृति में प्रखरता से दृश्यमान है।
* श्री रंजन के साहित्य-समग्र में प्रायः ‘नैतिकता’ के स्थान पर ‘लोकहितवादी नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित’ का प्रत्यय प्रयुक्त रहता है। इस सम्बन्ध में श्री रंजन का तर्क है कि नैतिकता और लोकहित परस्पर अन्योन्याश्रित होने चाहिए। वह नैतिकता जो लोकहित की पोषक न हो या वह लोकहित जो नैतिकता के अनुरूप न हो, वस्तुतः मानव और साहित्य-जगत् के लिए भी कल्याणकारी नहीं है।
* ‘सुन्दरम्’ के सम्बन्ध में भी श्री रंजन का तर्क है कि काला-कलूटा, बदसूरत बच्चा भी अपनी माँ को सुन्दर लग सकता है, लगता भी है लेकिन उसे वास्तव में सुन्दर नहीं माना जा सकता क्योंकि वह प्रत्येक व्यक्ति को सुन्दर नहीं लग सकता। अतएव, श्री रंजन ‘सत्यम्, शिवम् सुन्दरम्’ प्रत्यय में ‘सुन्दरम्’ के स्थान पर ‘सार्वसुन्दरम्’ का प्रयोग करते हैं, क्योंकि सार्वसुन्दरम् वही होगा जो सबको सुन्दर लगे। इसीलिए वे अंग्रेजी के बहुश्रुत मुहावरा ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ (The True / The Truth, The Good, The Beauty) को संशोधित करके अपने आलेख में ‘सुन्दरम्’ के स्थान पर ‘सार्वसुन्दरम्’ प्रयुक्त करते हैं। आकाशवाणी से प्रसारित और पत्रिका भारत दर्शन में प्रकाशित उनके एक आलेख में सत्यम् शिवम् सुन्दरम/सार्वसुन्दरम् कोमूलतया भारतीय प्रत्यय बताया गया है।
* श्री रंजन साहित्य के माध्यम से लोकयात्रा के सुप्रवर्तन को साक्षात् करने के पक्षधर दिखते हैं। आचार्य दण्डी का साहित्यिक अधिलक्ष्य ‘काव्य से लोकयात्रा का प्रवर्तन’ है, लेकिन श्री रंजन उसे ‘सुप्रवर्तन’ के रूप में प्रवर्तित करते हैं। इस तरह आचार्य दण्डी की काव्य-परिभाषा में प्रयुक्त ‘लोकयात्रा-प्रवर्तन’ को वे ‘लोकयात्रा के सुप्रवर्तन’ के रूप में स्वीकारते हैं। उनके अनुसार साहित्य के माध्यम से व्यक्ति और समाज को बेहतर बनाने के क्रम में सामान्य प्रवर्तन से काम चलने वाला नहीं है, वरन् इसके लिए ‘लोकयात्रा के सुष्ठु प्रवर्तन’ अर्थात् ‘सुन्दर प्रवर्तन’ के संकेतात्मक स्वरूप में ‘सुप्रवर्तन’ का प्रयोग अधिक सार्थक है।
श्री रंजन की कृतियों में ऐसे अनेक विशिष्ट समावर्त्तक जगह-जगह पर भरे पड़े हैं।
* श्री रंजन का कथा-साहित्य और कथेतर साहित्य भी उद्देश्यपूर्ण और भारतीय संस्कृति एवं भारतीय समाज के लोकहिती संस्कारों एवं आचारों आदि के पल्लवन के लिए विरचित हैं। अपवादों को छोड़ दें, तो कविता हो या कथासाहित्य या कथेतर साहित्य श्री रंजन मात्र कौतूहल के लिए, मनोरंजन के लिए या मैं भी कवि-लेखक हूँ-- यह जताने के लिए लेखन करते प्रतीत नहीं होते। अश्लीलता, अशिष्टता अशालीनता आदि भी श्री रंजन के लेखन में दृश्यमान नहीं हैं। उनकी अधिकांश कविताएँ, कहानियाँ, लघुकथाएँ आदि प्रायः सभी किसी न किसी स्तरीय पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, जिसका अर्थ है कि उनकी कविता, कहानी आदि को विद्वान् सम्पादकों और उनके पाठकों ने श्रेष्ठ माना है।
श्री रंजन का लेखन और अन्य साहित्यिक मनीषी
भारत, भारतीयता और भारतीय संस्कृति के घोर प्रशंसक श्री रंजन की वास्तविक अकादमिक योग्यता तो हिन्दी साहित्य में स्नातक, परास्नातक नहीं, अपितु बी॰एससी॰, एल॰एल॰बी॰ है। हिन्दी साहित्य की अकादमिक योग्यता के नाम पर श्री रंजन साहित्यिक हिन्दी के छात्र हाई स्कूल या इन्टर भी नहीं, वस्तुतः मात्र आठवीं कक्षा तक ही रहे थे क्योंकि श्री रंजन की विद्यालयी शिक्षा के समय हाई स्कूल से विज्ञान-वर्ग के छात्र ‘साहित्यिक हिन्दी’ नहीं, अपितु ‘सामान्य हिन्दी’ का अध्ययन करते थे।
सबसे अधिक आश्चर्य का विषय तो यह है कि हिन्दी साहित्य का कोई अकादमिक प्रमाणपत्र प्राप्त न होने पर भी श्री रंजन का स्वाध्यायगत हिन्दी भाषा-साहित्य और विविध विषयों का ज्ञान-प्रज्ञान श्रेष्ठ ही नहीं, विलक्षण भी है। श्रेष्ठ भाषायी सौष्ठव, प्रवाहमयी काव्यात्मक शैली आदि से संतृप्त श्री रंजन का लेखन इतना वैचारिक, इतना सोद्देश्य, इतना गम्भीर और चमत्कृत कर देने वाला है कि पाठक अनायास ही ‘वाह-वाह’ कर बैठता है।
स्वतंत्र, मौलिक सुचिन्तना के लेखक श्री रंजन वास्तव में संस्कृत जगत् में आदि-महाकवि वाल्मीकि, हिन्दी जगत् के कविवर तुलसीदास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, वासुदेवशरण अग्रवाल, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ॰ रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द, निर्मल वर्मा, नरेन्द्र कोहली, जयशंकर प्रसाद, बाबू गुलाबराय, बालमुकुन्द गुप्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, बांग्ला के बंकिमचन्द्र, तमिल के सुब्रह्मण्य स्वामी, उर्दू के फिराक और अंग्रेजी के टी॰एस॰ इलियट के प्रशंसक हैं। अंग्रेजी के इपालीत तेन आदि साहित्यिक समाजशास्त्रियों से भी बहुत प्रभावित हैं वे। भारतीयतावादी लेखकों के लेखन के घोर प्रशंसक होने के साथ-साथ श्री रंजन उनसे अनुप्राणित भी दिखते हैं।
वास्तव में स्वाध्यायगत हिन्दी का साहित्यिक ज्ञान, भारतीय संस्कृति का ज्ञान, विज्ञान के अकादमिकीय अध्ययन से प्राप्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रखर नैयायिक योग्यता तथा तीक्ष्ण अकाट्य तर्कक्षमता के बल पर श्री रंजन का लेखन वैचारिकता एवं श्रेष्ठताओं के क्षितिज पर अनेक आचार्य लेखकों के समतुल्य बल्कि सच कहें तो अनेक बार उनसे भी श्रेष्ठ प्रतीत होता है। यथा-
* आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्य की मौलिकता पर, श्रेष्ठ साहित्य की रचना पर, रचना में ‘ज्ञानराशि के समेकन’ आदि पर बल देते थे। आदि-महाकवि वाल्मीकि के काव्य में भी विविध ज्ञान-विज्ञान का प्रचुर समेकन विद्यमान है। श्री रंजन के लेखन में भी ऐसे समेकन भरपूर दृश्यमान हैं।
साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री रंजन ‘अवध-अर्चना’ पत्रिका के माध्यम से आ॰ द्विवेदी की ही तरह समर्पित हैं। आचार्य द्विवेदी जिस तरह पत्रिका ‘सरस्वती’ के लिए प्राप्त रचनाओं का समुचित परिष्कार करने के पश्चात् ही उसे प्रकाशित करते थे; उसी परम्परा में श्री रंजन भी प्रकाशनार्थ प्राप्त रचनाओं का शोधन-परिष्कार करने के पश्चात् उन्हें प्रकाशित करते हैं। अपनी पत्रिका अवध-अर्चना में मेरे सहपाठियों के आलेखों का प्रकाशन भी उन्होंने परिष्कृत करने के बाद ही किया।
* डॉ॰ रामविलास शर्मा, पं॰ विद्यानिवास मिश्र, बाबू गुलाबराय, जयशंकर प्रसाद, कुबेरनाथ राय, नरेन्द्र कोहली, निर्मल वर्मा, बंकिमचन्द्र, सुब्रह्मण्य भारती अपने लेखन में कथ-अनकथ रूप से ‘भारतीयतावाद’, ‘राष्ट्रीयतावाद’, ‘भारतीय संस्कृति’ आदि पर बल देते थे। श्री रंजन के लेखन का बहुलांश इन्हीं बिन्दुओं पर केन्द्रित है, परन्तु नितान्त विलग स्वरूप में।
*श्री रंजन अपनी कृतियों में तार्किक वैज्ञानिक विवेचना में, देशी-विदेशी विद्वानों के उद्धरणों की प्रस्तुति में, विपर्ययग्रस्त कुतर्कों की काट-छाँट में और अपनी भारतीयतावादी राष्ट्रवादी अवधारणाओं की सम्प्रस्तुति में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ॰ रामविलास शर्मा आदि की परम्पराओं की नकल या अनुकरण नहीं, अपितु अनुसरण करते हुए प्रायः उन सबसे आगे निकल जाते हैं। जहाँ-जहाँ आचार्य शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, डॉ॰ रामविलास शर्मा आदि स्तम्भित दिखते हैं, वहाँ से प्रश्नगत स्तम्भन को विलोपित करके श्री रंजन सनातनी लोकहिती विचार-शृंखला को आगे बढ़ाते हैं।
* भारतीयतावादी, राष्ट्रीयतावादी और संस्कृतिशील लेखक होने से इस परिप्रेक्ष्य में श्री रंजन कविवर जयशंकर प्रसाद, निर्मल वर्मा, कुबेरनाथ राय, वासुदेवशरण अग्रवाल, पं॰ विद्यानिवास मिश्र आदि की परम्परा के रचनाकार दिखते हैं। श्री प्रसाद ही की भाँति श्री रंजन का लेखन भी वाङ्मयिक प्रामाणिकता के साथ ही मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, सांस्कारिक अपितु सद् सांस्कारिक विवृति से ओतप्रोत रहता है। श्री रंजन की कृतियों के आलेखों से स्थापित होता है कि श्री रंजन भी कविवर प्रसाद एवं श्री कुबेरनाथ राय आदि की तरह श्रेय भारतीय ज्ञानधारा को शाश्वत चेतनता और चिन्मयी चेतनता की पावन चिन्तनधारा से जुड़ा मानते हैं और अपने लेखन में उसे ऐसा ही सिद्ध भी करते हैं। श्री प्रसाद की तरह वे भी साहित्य को इस पावन चिन्मयी धारा को प्रसारित करने का उपकरण मानते हैं, किन्तु श्री प्रसाद और श्री रंजन के लेखन में अन्तर यह है कि प्रसाद जहाँ घूम फिर कर ‘आनन्द’ और ‘दर्शन’ पर आ जाते हैं, वहीं रंजन जी ‘आनन्द के वागानन्द, प्रज्ञानन्द, परमानन्द स्वरूप के आराधक’ दिखते हैं और दर्शन के बजाय प्रायः साहित्यिक सीमाओं तक ही सीमित रहते है। देशीयता, राष्ट्रीयता, भारतीयता, भारतीय संस्कृति एवम् भारत के गौरवगान के फलक पर वे आ॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबू गुलाबराय, जयशंकर प्रसाद, डॉ॰ राम बिलास शर्मा, नरेन्द्र कोहली, पं॰ विद्या निवास मिश्र आदि की सरणि के लेखक हैं।
* श्री रंजन की लेखन से प्रकट है कि वे साहित्य को लोकयात्रा के सुप्रवर्तन का उपस्कर मानते हैं। वे साहित्य को ‘व्यक्ति’ से नहीं, अपितु मुख्यतया ‘लोक’ से सरोकारित मानते हैं। इसीलिए श्री रंजन की कृतियों एवं आलेखों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की लेखन-भंगिमा अनुप्राणित देख कर उन्हें आ॰ शुक्ल की तरह का लोकमंगल का तत्त्वज्ञ, लोकवादी चिन्तक, लोकवादी समाजशास्त्री माना जा सकता है।
श्री रंजन की कृतियों में समेकित अध्यायों के निबन्धात्मक आलेखन में लेखक के विचारों से सुसंगत स्वरूप में पाठक के विचार भी एक रूप हो जाएँ, इसके लिए श्री रंजन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की तरह प्रायः निगमनात्मक पद्धति में बड़ी स्पष्ट क्रमबद्धता से अपनी प्रस्थापनाएँ प्रस्तुत करते हैं। वे प्रस्थापनाएँ मौलिक तो होती ही हैं, वे साहित्य के पूर्वसूरिभ साहित्यज्ञों के संकथनों से, साथ ही विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र आदि के बहुमान्य प्रकथनों से भी समर्थित होती हैं।
* श्री रंजन जी का आलोचनात्मक साहित्यिक सांस्कृतिक लेखन चिन्तन का क्षेत्र अति व्यापक और विविध विषयों से परिपूर्ण है। यथा- साहित्य के साथ-साथ भाषा-विषयक, इतिहास-विषयक, शिक्षा-विषयक, भारतीय संस्कृति-विषयक, राजनीति-विषयक, भारतीय राष्ट्रवाद विषयक, धर्म एवं धर्मपुरुष विषयक सदृश विविध आयामी होने से श्री रंजन के लेखन को डॉ॰ रामविलास शर्मा की सरणि का अपितु अनेक धरातलों पर डॉ॰ शर्मा से बढकर गम्भीर लेखन माना जा सकता है। राष्ट्रीय, जातीय गौरव के प्रति सचेतता भी डॉ॰ शर्मा की तरह ही श्री रंजन के लेखन का विशिष्ट बिन्दु है। सचेत सटीक तर्कों से अपने प्रकथन की सफल निष्पत्ति भी श्री रंजन डॉ॰ शर्मा की तरह ही निष्पत्त, उपपत्त करते हैं, परन्तु विषय-वैविध्य आदि में डॉ॰ रामविलास शर्मा से विलग परन्तु महत्त्वपूर्ण है रंजन जी का लेखन।
* ख्यात कवि, विचारक एवं लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की तरह कविता से साहित्यिक यात्रा प्रारम्भ करके समालोचना निबन्ध आदि की विधाओं में पदार्पण करने वाले विजय रंजन के लेखन में अज्ञेय जी की तरह ही चिन्तन-प्रधान लेखन एक ओर भारतीय आत्मबोध को वाचाल दिखाता है, तो दूसरी ओर उसमें विदेशी-भावभूमि की आलोचना भी रहती है। श्री रंजन के आलेखों में अज्ञेय जी की तरह काव्यात्मकता का, साथ ही भाव-वैदग्ध्य का पुट भी दिखता है। वैचारिकीअमें भी अनेक बिन्दुओं पर श्री रंजन अज्ञेय जी के समतुल्य दिखते हैं।‘अज्ञेय’ जी की ही तरह श्री रंजन मार्क्सवादी विचारों के घोर आलोचक और देशीयता के प्रबल समर्थकं हैं।
* अधुना ख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली जहाँ रामकथा को नए सिरे से अधुना सन्दर्भों से जोड़ते हुए नए रूप-स्वरूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते दिखते हैं, वहीं, विजय रंजन अपने लेखन में रामकथा या राम पर ही नहीं, अपितु ‘रामत्व’ और ‘रामत्व के समुचित प्रसार-प्रचार’ पर बलाघात करते हैं। उनके एकाधिक प्रकाशित निबन्ध और पाण्डुलिपित कृति ‘रामत्व और हमारा समय’ के अध्याय ‘रामत्व का प्रसार आवश्यक’ में रामकथा के बजाय रामत्व को अधुना जीवन में भी समुपादेय बताते हुए रामत्व के प्रसार की वांछा को रेखांकित किया गया है। श्री रंजन के एकाधिक टी॰वी॰ चैनलों पर प्रसारित और यू-ट्यूब पर उपलब्ध एकाधिक संभाषण भी रामत्व के प्रसार की वांछा गंुजरित करते हैं।
इसी तरह उनकी सुप्रसिद्ध कृति ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ में नितान्त विलग रूप-स्वरूप में समकालीन आवश्यकता के समानुरूप, तत्सम्बन्धी भ्रान्तियों का निवारण करते हुए राम का यशोगान अंकित है, जो किसी रूप में श्री कोहली या अन्य किसी लेखक की अनुकृति नहीं है। जाने क्यों श्री कोहली दाशरथ राम के व्यक्तिगत जीवन को आक्षेपित करने वाले आरोपों पर ध्यान नहीं दे पाए, जबकि श्री रंजन ने यह सांस्कृतिक साहित्यिक दायित्व भलीभाँति निर्वहन किया है।राम पर आक्षेप विषयक उनकी कृति रामत्व की लोकहिती समुपयोगिता की दृष्टि से भी उपयागी है।
* श्री रंजन की कृतियों में भारतीयता-बोध और भारतीयता से प्रेम के बिन्दु पर निर्मल वर्मा को भी याद किया जा सकता है, किन्तु रंजन जी के लेखन में भारतीयता-बोध व भारतीयता से प्रेम श्री निर्मल वर्मा की अपेक्षा अधिक वाचाल दिखता है।
* आचार्य नन्द दुलारे बाजपेयी साहित्य को सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते थे। उनसे भी आगे बढ़ कर श्री रंजन साहित्य को सांस्कृतिक प्रक्रिया के साथ साथ सांस्कारिक प्रक्रिया का भी आक्षरिक उपस्कर बताते हैं (द्रष्टव्य आलेख ‘ राष्ट्र ,जीवन और साहित्य’, पाण्डुलिपित पुस्तक: ‘वातायन से’)।
* प्रेमचन्द ने गाँधीवादी विचारधारा से ओत-प्रोत कहानियाँ और गाँधीवादी ग्राम-विकास पर आधारित ‘रंगभूमि’ एवं ‘सेवासदन’ उपन्यास आदि विरचे, जबकि श्री रंजन की कहानियाँ सोद्देश्यपूर्ण और नितप्रति के आधुनिक मध्यवर्गीय जीवन की समस्या एवं समाधान से सम्बन्धित होती हैं। वे ग्राम्य विकास पर भी ‘आगमन’ नाम से उपन्यास लिख रहे हैं, परन्तु राष्ट्रवाद सदृश अनेक बिन्दुओं पर वे श्री प्रेमचन्द का खुला विरोध भी करते हैं। प्रेमचन्द ने 1933 में ‘राष्ट्रवाद’-विषयक अपने आलेख में राष्ट्रवाद को गर्हित बताया था। श्री रंजन ने अपनी कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ में राष्ट्रवाद विशेषकर भारतीय राष्ट्रवाद की प्रशंसा की है और उसे भारत राष्ट्र के लिए अति आवश्यक दर्शाया है। उन्होंने प्रेमचन्द के सन्दर्भगत कथित राष्ट्रवाद-विरोध को पश्चिमी संकुचित राष्ट्रवाद तक सीमित दर्शाने की सफल चेष्टा की है (द्रष्टव्य:श्री रंजन कृत ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’)।
* भारतीय मनीषियों की श्रेष्ठता पर अगाध आस्थावान् होने के बावजूद श्री रंजन उन्हें वस्तुतः ज्यों का त्यों अनुकृत नहीं करते। यथावसर वे उनका खण्डन-मण्डन भी करते हैं। इसके अनेक उदाहरण हैं।
* अनेक साहित्यिक प्रत्ययों को तर्कसंगत सुसंगम नए रूप-स्वरूप में प्रस्तुत और यथावसर परिभाषित किया है श्री रंजन ने। अपनी कृति ‘साहित्य का क ख ग’ में आ0 दण्डी की साहित्य विषयक परिभाषा में ‘लोकयात्रा प्रवर्तते’ के स्थान पर उन्होंने ‘लोकयात्रा सुप्रवर्तते’ स्थानापन्न करके अपने विशिष्ट सर्जनात्मकता का परिचय दिया है। इसी तरह साहित्यिक मुहावरा ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ को सत्यम् शिवम् सार्वसुन्दरम् के रूप में प्रयुक्त करने की तर्क देते हैं वे। उनके अनुसार ‘काना, काला लड़का’ भी अपनी माँ को ‘सुन्दर’ दिखता है किन्तु वास्तव में साहित्य में ‘सुन्दर’ वह है जो सबको ही ‘सुन्दर’ (नयनाभिराम) दिखे और ‘सबके लिए’ सुन्दर (सार्वहिती और सर्वकल्याणकारी) हो।
इसी तरह, साहित्य में शब्द ‘नैतिकता’ के स्थान पर श्री रंजन ‘नैतिकतावादी लोकहित सह लोकहितवादी नैतिकता’ को आवश्यक निकष बताते हैं।
श्री रंजन के ऐसे प्रयोग अनेक हैं।
श्री रंजन आदि-महाकवि वाल्मीकि के अनन्य प्रशंसक हैं, लेकिन आदि-महाकवि वाल्मीकि ने सुरा का सेवन करने वाले को ‘सुर’ और सुरा से परहेज करने वालों को ‘असुर’ बताया है। श्री रंजन के अनुसार यह प्रस्थापना सत्य तथ्यों के विपरीत, अतएव अग्राह्य है। श्री रंजन का तत्सम्बन्धी तर्क है कि प्राणायाम, योग, स्वर-साधना आदि में प्रवीण और ‘स्वर की अधिष्ठात्री’ देवी सरस्वती की आराधना में निरत आर्य ही ‘सुर’ और इनके विपरीत कार्याचरण करने वाले ‘असुर’ थे।
- श्री रंजन ने आदिश्लोक प्रकरण में बहुमान्य मान्यता: ‘आदिश्लोक करुण रस से उद्भूत’ को सिरे से विखण्डित करते हुए आदिश्लोक को नय-न्याय से आविर्भूत बताया। अपनी इस प्रस्थापना में उन्होंने आचार्य आनन्दवर्द्धन से लेकर कुबेरनाथ राय तक का खण्डन करने में कोई हिचक नहीं दिखाई और सतर्क सुतर्कों से सिद्ध किया कि आदिश्लोक एवं पृष्ठभूमिक श्लोकों में करुणा या शोक की एक भी मात्रा, वर्ण, अक्षर नहीं है अपितु आदिश्लोक वास्तव में एक नैयायिक की भाँति अपराध की विवेचना सह दण्ड का विधान एक साथ उवाचित करता है, जो न्याय क्षेत्रज है (द्रष्टव्य: अवध -अर्चना त्रैमासिक के विविध अंक एवं पुस्तक: ‘वातायन से’)।
- कविश्रेष्ठ तुलसीदास के शब्द-बन्ध ‘स्वान्तः सुखाय’ का प्रायः सभी बौद्धिक ‘अपने मन के सुख के लिए’ अर्थ में भरपूर प्रयोग करते हैं। परन्तु श्री रंजन ने ‘स्वान्तः सुखाय’ को शेष पद-बन्ध ‘तुलसी रघुनाथगाथा’ से सहयुजित करते हुए उसे अपने सुदीर्घ आलेख में ‘अन्तःकरण को परम शक्तिमान परम नैयायिक परमात्मा का अंश बताते हुए ‘स्वान्तः सुखाय’ को ‘मनस् सुख का या मनमाने सुख का नहीं’ अपितु ‘अन्तरात्मा के सात्त्विक न्यायोचित सुख का’ द्योतक बताया है (द्रष्टव्य: पत्रिका तुलसीमानस भारती अंक 2022)।
- पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ में भारत के नामकरण के विषय में जैनीय भरत के नाम के बजाय वैदिक ऋषि स्वायम्भुव मनु के प्रपौत्र भरत के नाम पर ‘भारत’ नामकरण होने का तर्क प्रस्तुत करते हुए श्री रंजन ने अनेक जैन ग्रंथों से उद्धरण देते हुए जैनीय मान्यता को विखण्डित किया। इसी पुस्तक में श्री रंजन भारत का नामकरण ‘दौष्यन्ति भरत के नाम पर होने की मान्यता’ और भारतविद् वासुदेवशरण अग्रवाल आदि की मान्यता को भी विखण्डित करते हैं। इसी पुस्तक में भारतविद् विचारक लेखक जयशंकर प्रसाद की उस मान्यता का भी विखण्डन है जिसमें श्री प्रसाद वैवस्वत् मनु को मानव का आदिपुरुष बताते हैं। श्री रंजन के अनुसार सृष्टि के आदिपुरुष प्रथम मनु ‘स्वायम्भुव मनु’ थे।
श्री रंजन के लेखन में ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं, जो उनकी मौलिक सोच के सक्षम प्रमाण हैं।
वास्तव में भारतीयता, राष्ट्रवादिता, लोकोपयोगिता, लोकहितवादी नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित (यह मुहावरा श्री रंजन द्वारा गढ़ा गया है) के साथ-साथ लोकयात्रा के प्रवर्तन आदि के फलकों पर उत्कृष्ट कुतुबनुमाई लेखन करने वाले श्री रंजन की साहित्यिक दृष्टि, नीतिगत दृष्टि, सांस्कृतिक दृष्टि स्वच्छ हो चुकी है। इसी के प्रकाश में वे अधिवक्ता होने के नाते प्रमासम्मत तर्कसंगत स्वरूप में और विज्ञान का स्नातक होने के नाते वैज्ञानिक दृष्टि से सुसंगत स्वरूप में अपने निगमित प्रकथनों को तर्कसम्मत विशेष ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि वह प्रभावशील बन जाता है और पाठक उससे अभिभूत हो उठता है।
कहना होगा कि पश्चिमी विचारक अवर क्राम्बे ‘गुड लिटरेचर’ और ‘ग्रेट लिटरेचर’ की बात करते हैं। तुलसीदास भी सुकवि, कुकवि और वर-विचार की तथा आ॰ भामह साधुकाव्य की कसौटी प्रस्तुत करते हैं। इन कसौटियों पर श्री रंजन का कृतित्व-समग्र साधुकाव्य तो ही है, वह श्री रंजन को वरेण्य विचारों वाले गद्य-पद्य का सुकाव्य-कारक सिद्ध करने में भी समर्थ है। श्री रंजन का सम्पूर्ण साहित्यिक अवदान चूँकि उत्कृष्ट साहित्यिक सौष्ठव के साथ-साथ सम्प्रेषणीयता, प्रभावशीलता, समाजहिती दृष्टियों से सबल है, अतएव, उसे अवर क्राम्बे-प्रणीत ‘गुड लिटरेचर’ की कसौटी पर खरा ही माना जाएगा और श्री रंजन का साहित्य-समग्र सद्संस्कारी, ज्ञानशील, सदाचार-प्रेरक, ऊर्ध्ववाही उच्चतर भावदशा का नियामक और नैतिकता (श्री रंजन के शब्दों में ‘नैतिकतावादी लोकहित सह लोकहितवादी नैतिकता’) का पोषक है और वह मनुष्य को बेहतर मनुष्य, समाज को बेहतर समाज बनाने के सफल आक्षरिक उपक्रम के रूप में विरचित है, अतएव, वह अवर क्राम्बे-प्रणीत ‘ग्रेट लिटरेचर’ भी है। गुड लिटरेचर और ग्रेट लिटरेचर दोनों एक साथ विरले ही लेखक विरचित कर पाते हैं। श्री रंजन की कृतियों का कृतिवार विश्लेषण यह प्रमाणित करने में समर्थ है कि श्री रंजन का कृतित्व साहित्यिक दृष्टि से ऐसे विरले साहित्यकारों की श्रेणी का ही है।
कुल मिला कर श्री रंजन का लेखन हिन्दी जगत् के अनेक महान् स्वनामधन्य लेखकों की परम्परा में (उनकी नकल या अनुकरण में नहीं) श्रेष्ठ सरणि का लेखन है। विषय-संचयन से लेकर कथ्य-कथ और लेखन शैली तक में स्व-विकसित स्वरूप में और ख्यात देशी-विदेशी लेखकों को बहुतायत से उद्धृत करते हुए तथा उनसे यथावसर सहमति-असहमति व्यक्त करते हुए श्री रंजन का लेखन-समग्र उपरि इंगित महान् लेखकों की मूल ज्ञान-धारा को आगे बढ़ाने में समर्थ है। कह सकते हैं कि श्री रंजन ‘साधु काव्य’, ‘सुकाव्य’, ‘गुड लिटरेचर’ सह ‘ग्रेट लिटरेचर’ आदि की दिशा में सार्थक लेखन का प्रतिमान प्रस्तुत करते दिखते हैं।
रंजन जी की कृतियों में इंगित शोध-बिन्दु
मौलिक चिन्तन के धनी श्री रंजन की प्रत्येक पुस्तक में बहुत कुछ ऐसा है जो तार्किकता से सुपुष्ट, सर्वथा नवीन और विशिष्ट है। उसे विविध आयामी शोध का आधार बनाया जा सकता है। उनमें अनेक ऐसे प्रत्यय भी हैं जो साहित्यिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और सांस्कारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के साथ-साथ ‘क्रान्तिशील’ भी हैं। स्वयं श्री रंजन के अनुसार ऐसे प्रत्यय (विचार, प्कमं ए ज्ीवनहीज) मूल रूप में प्राचीन भारतीय वाङ्मय में अस्तित्वमान हैं, उन्होंने अपने साहित्यिक सद्संस्कारों के प्रभाव में सहित्भावी श्रम करके ‘लोकहिती नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित’ एवं ‘लोकयात्रा के सुप्रवर्तन’ को साकार करने के लिए अपने सशक्त तर्कों से उन प्रत्ययों और विशिष्टताओं के अस्तित्व को सत्य प्रमाणित कर उन्हें प्रत्यक्ष कर दिया है। श्री रंजन के अनुसार ऐसा उन्होंने अधुना विद्वानों का ध्यान लोकोपयोगी भारतीय प्रत्ययों की ओर आकृष्ट करने के लिए किया है क्योंकि अज्ञात कारणों से या किसी भूल-भ्रम वश आज के अनेक विद्वान् ऐसे श्रेष्ठ भारतीय प्रत्ययों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। सच जो भी हो, श्री रंजन के लेखन-समग्र पर और उसके निम्नांकित सशक्त विचारपक्षीय बिन्दुओं पर भी शोध कराया जा सकता है-
* विजय रंजन की साहित्यिक दृष्टि और उसकी लोकोपयोगिता
* विजय रंजन के संस्कृति सम्बन्धी विचार
* विजय रंजन का भारतीयतावादी, राष्ट्रीयतावादी लेखन और उसकी राष्ट्रीय समुपयोगिता
* विजय रंजन की समग्र सांस्कृतिक संचेतना
* विजय रंजन का लेखन-समग्र कितना लोकसंग्रही, कितना लोकोपयोगी।
* विजय रंजन के लेखन-समग्र का भाव पक्ष
* विजय रंजन के लेखन-समग्र का विचार पक्ष
* विजय रंजन के लेखन-समग्र का कला पक्ष
आदि-इत्यादि।
उपर्युक्त के अतिरिक्त श्री रंजन जी की रचनात्मक साहित्य और नैबन्धिक पुस्तकों के सभी आलेख तथा समालोचनापरक प्रत्येक पुस्तक के प्रत्येक अध्याय के वर्ण्य विषय के परिप्रेक्ष्य में शोध-अनुसंधानित्सुओं को शोधार्थ विशिष्ट प्रत्ययों के विविध आयाम उपलब्ध हो सकते हैं, जिन पर विस्तृत शोध होना ही चाहिए। श्री रंजन के कृतित्व में समाहित शोध-बिन्दुओं को पुस्तकवार देखें तो स्पष्ट होगा कि-
॰ श्री रंजन के ‘दर्पण तीरे’, ‘गीत तुम्हारे नाम’ और ‘एक मुट्ठी आकाश’ कविता-संग्रहों में क्रमशः गजल विधा, गीत-नवगीत विधा और अकविता विधा के ‘क्या, क्यों, कैसे’ से सम्बन्धित आलेख भी शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी हैं। इनसे भी शोध-बिन्दु प्राप्त किए जा सकते हैं।
॰ श्री रंजन के ‘किर्चें’, ‘दर्पण तीरे’, ‘गीत तुम्हारे नाम’ और ‘एक मुट्ठी आकाश’ काव्य-संग्रह और कथा-साहित्य वैयक्तिक कम लोक से सरोकारित अधिक हैं। इनके भाव पक्ष, कला पक्ष और विचार पक्ष महत्त्वपूर्ण हैं, जो शोध के विशेष विषय-बिन्दु बन सकते हैं। इन सभी रचनाओं की सामाजिक उपयोगिता पर भी शोध किया जा सकता है।
॰ निबन्ध-संग्रह ‘वातायन से’ के अनेक वर्ण्य विषय भी शोध एवं विमर्श के विषय हैं। श्री रंजन द्वारा लिखे गए साहित्य, धर्म, संस्कृति, भारत, भारतीयता आदि से सम्बन्धित निबन्धों में निहित क्रान्तिक विषयवस्तुओं पर और सम्बन्धित क्रान्तिक विचारों की उपयुक्तता पर शोध किया जाना साहित्य जगत् के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।
॰ ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ तथा ‘आदि-महाकवि के 10 अप्रतिम साहित्यिक योगदान’ पुस्तकों के वर्ण्य विषय के सापेक्ष शोध हेतु वाल्मीकि रामायण की काव्यगत विशेषताएँ, आदि-महाकवि वाल्मीकि की श्रेष्ठता या कि इनके समानान्तर हिन्दी, अंग्रेजी, फारसी, उर्दू आदि के विभिन्न कवियों का तुलनात्मक अध्ययन सम्प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसका बीजरूपीय प्रतिदर्श श्री रंजन ने प्रथम बार प्रस्तुत कर दिया है।
॰ पुस्तक ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ का महाकथन है कि वर्तमान हिन्दी काव्य में जो विसंगतियाँ हैं, वे काव्य-नयवाद से तिरोहित हो जाएंगी। अतएव, सन्दर्भगत विषय के सभी पक्षों पर विस्तृत शोध केवल हिन्दी जगत् के लिए ही वरन् सम्पूर्ण काव्य-जगत् के लिए लाभकारी होगा।
॰ ‘कविता क्या है’ पुस्तक में काव्य के विविध पक्षों की विवेचना करते हुए कविता-आविर्भाव को कतिपय भारतीय मिथकों से जोड़ा गया है और कविता में मिथकीय सम्प्रभाव आदि की उपेक्षा से सम्पूर्ण काव्य-जगत् की क्षति, वर्तमान काव्य से अरुचि आदि उत्पन्न बताई गई है। अतएव, इन दृष्टि-बिन्दुओं से समुचित विमर्श, शोध आदि किया जाए तो उससे हिन्दी कविता-जगत् ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण काव्य-जगत् लाभान्वित होगा।
॰ ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ पुस्तक में भी अनेक क्रांतिक सोच के बिंदु हैं, जिन पर शोध करके अग्रिम विमर्श प्रस्तुत किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- ‘भारत का नामकरण ‘भारतवर्ष’ क्यों और कैसे हुआ’, ‘भारत-नाम के आधार-पुरुष भरत कौन से थे’, ‘भारत का प्राचीन गौरव क्या है’, ‘भारत एक प्राचीन राष्ट्र कैसे है’, ‘धर्म के साथ-साथ विज्ञान को साधने वाली भारतीयता का वर्तमान स्वरूप’ क्या है, ‘भारतीय संस्कृति के विविध आयाम क्या हैं’, ‘भारतीय संस्कृति अनपकी खिचड़ी की तरह है या पकी खिचड़ी की तरह’, ‘भारत का भौतिक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप’ क्या है, ‘भारतीयता के प्रति जन-अज्ञानता एवं अरूचि का निराकरण कैसे’, ‘भारतीयता का प्रचार कैसे’ सदृश विचार-बिन्दुओं पर विस्तृत शोध सम्पन्न किया जाना वांछनीय है जिनके बीज-तत्त्व श्री रंजन ने अपनी पुस्तक में उकेर दिए हैं। ऐसे शोधों से 755 वर्षों की दासता के दुष्प्रभाव से भारत और भारतीयता के विषय में जो भ्रांति फैली हुई है या कदाशयतः फैलाई गई है, उससे छुटकारा भी मिल सकेगा।
॰ पुस्तक ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ के रचनाकार श्री रंजन के अनुसार श्री राम पर लगाए जाने वाले आरोपों की छानबीन और तत्सम्बन्धी समुचित शोध आवश्यक है। श्री राम जैसे धर्म-पुरुष, संस्कृति-पुरुष, संस्कार-पुरुष पर अश्रद्धा उत्पन्न होने पर न केवल हिन्दू समाज को, अपितु संपूर्ण भारतीय समाज और शेष विश्व को गंभीर सांस्कृतिक क्षति अवश्यंभावी है। ऐसी क्षति को रोकने हेतु श्री राम पर लगाए जाने वाले आरोपों से सम्बन्धित शोध को जितना शीघ्र प्रकाश में लाया जाए, उतना अच्छा होगा जिसका बीज रूप श्री रंजन की कृति में रेखांकित है।
॰ ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पुस्तक में श्री रंजन ने ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ (देवी भारती के सात्त्विकता, तितिक्षा, सर्वकल्याण आदि शान्तिप्रदायी गुणों से पूर्णतया सम्बन्धित भारतीयता वाले राष्ट्रवाद) को केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व भर के लिए उपयोगी सिद्ध किया है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ पुस्तक के ‘उपसंहार’ अध्याय में राष्ट्रीय समस्याओं के उल्लेख एवं उनके निराकरण के साथ-साथ ‘भारतीय राष्ट्रवाद का प्रसार कैसे’ विषय पर अनेक सुझाव भी अंकित हैं जो पुस्तक के अंतिम आवरण पृष्ठ पर ‘कृति के नवरात्निक बिन्दु’ शीर्षक से अंकित हैं। इन बिन्दुओं पर भी समुचित शोध-विमर्श राष्ट्रहित की दृष्टि से उपयोगी होगा।
श्री रंजन ने इस पुस्तक में आविर्भाव, कारक, प्रकृति-प्रवृत्ति आदि के धरातल पर ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की इयत्ता को ‘पश्चिमी राष्ट्रवाद’ से विलग सिद्ध किया है। ऐसे कथन दूरगामी प्रभाव में उपयोगी हो सकते हैं और वे भारतीय राष्ट्रवाद के विभिन्न धरातलों पर भारतीय समाज की सोच में क्रान्तिक परिवर्तन भी ला सकते हैं। वास्तव में इस पुस्तक में अंकित प्रायः सभी बिन्दु स्वतंत्र रूप से गहन गंभीर विस्तृत विमर्श और शोध की माँग करते हैं। ऐसा करने पर राष्ट्रवाद के सम्बन्ध में फैले भ्रम को तो दूर किया ही जा सकेगा, साथ ही सर्वकल्याणक शान्तिकामी ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ को राष्ट्रवाद की एक स्वतंत्र, अति प्राचीन प्रजाति के रूप में स्थापित करके इस दिशा में भी भारत को विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
॰ ‘रामत्व और हमारा समय’ उनकी एक अन्य अर्ध पाण्डुलिपित पुस्तक में रामत्व को समझने-समझाने का सहित्भावी अभिनव प्रयास है। पुस्तक में अंकित विचारों की प्रासंगिकता आदि पर शोध यदि किया जाए, तो उससे केवल भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का अनयरोधी वास्तविक कल्याण साकार किया जा सकेगा।
॰ पुस्तक ‘तुलसी का स्वान्तः सुखाय’ के विभिन्न अध्यायों मंे इंगित प्रस्थापनाओं पर भी विस्तृत विमर्श, शोध कराया जा सकता है, जो हिन्दी जगत् और वैश्विक साहित्य के लिए लाभकारी होगा।
॰ कृति ‘भारतीय शिक्षा व्यवस्था : सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पक्ष’ में इंगित विचार-बिंदुओं पर और पुस्तक में बताए गए शिक्षा के विन्यास-परास पर शोध यदि किए जाएँ, तो भारत में शिक्षा-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है जो न केवल शिक्षा जगत् के लिए अपितु राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य के लिए लाभकारी होगा।
॰ ‘विश्वविजय पथ पर पर हिन्दी’ में इंगित हिन्दी की क्षमताओं और विशेषताओं सदृश बिन्दु भी शोध द्वारा प्रकाश में लाए जाएँ तो इससे अनेक विभ्रमों का निवारण हो जाएगा और हिन्दी के प्रस्तार और उसे राजभाषा पद पर वास्तव में प्रतिष्ठित करने में सहजता होगी।
॰ ‘भारतीय संस्कृति: एक विशिष्ट दृष्टि’ पुस्तक में इंगित प्रस्थापनाओं को शोधपरक विमर्श द्वारा और अधिक विस्तार दिया जाना न केवल विश्व की अप्रतिम मानवीय संस्कृति (भारतीय संस्कृति) के सम्बन्ध में अनेक भ्रामक अवधारणाओं को विखण्डित करेगा वरन् सम्पूर्ण विश्व के मानव-समाज के सम्मुख सर्वकल्याणकारी जीवन-पद्धति को सुस्पष्ट करेगा जो मानव मात्र ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जगत् के लिए शान्तिप्रदायी और हितकारी सिद्ध होगा।
॰ ‘सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ क्यों’ पुस्तक में भी अनेक ऐसे बिन्दु हैं जो विस्तृत विमर्श-योग्य और शोध के लिए उपयुक्त है।
ऐसे शोध-निष्कर्ष भी धर्म, मजहब, पंथ आदि के सम्बन्ध में विभ्रमों का नाश करके सर्वकल्याणक सिद्ध होंगे।
* अर्धपाण्डुलिपित पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति के आदि-महागायक वाल्मीकि का कालखण्ड’ में आदि महाकवि वाल्मीकि का, प्रकारान्तर से, भारतीय संस्कृति के साक्षात् धर्म-पुरुष दाशरथ राम का कालखण्ड वर्तमान से 7000 वर्ष पूर्व का स्थापित किया गया है। सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक दृष्टियों से ऐसे निष्कर्ष अति महत्त्वशील हैं। अतएव, पुस्तक के निष्कर्ष-बिन्दुओं पर विस्तृत शोध वांछनीय है।
उपर्युक्त शोध-बिन्दुओं पर किए जाने वाले शोध-विमर्शाें से साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, भाषा, राजभाषा, भारत, भारतीयता, राष्ट्रवाद आदि के प्रक्षेत्रों में निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण, जीवनोपयोगी, सर्वकल्याणक निष्कर्ष प्राप्त होंगे, जो लौकिक, साहित्यिक, सांस्कारिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्यों में हितकारी सिद्ध होंगे।
साफ दिखता है कि श्री रंजन द्वारा रचित पद्य या गद्य काव्य के कला पक्ष, भाव पक्ष, विचार पक्ष और अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक सौष्ठव आदि सशक्त हैं, जिनके सम्बन्ध में यदि शोध हो तो उससे भी बहुत कुछ सकारात्मक प्राप्त किया जा सकता है जो नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक और लाभकारी सिद्ध होगा।
श्री रंजन द्वारा रचित पुस्तकें मात्र हिन्दी साहित्य ही नहीं, अपितु शिक्षा, भारतीय संस्कृति, भारतीय राष्ट्रवाद, समाज-नीति, राजनीति आदि के परिप्रेक्ष्यों में प्रकाशस्तम्भ सरीखी हैं। इन पुस्तकों में ज्ञान, आदर्श, सद्संस्कार आदि का सोद्देश्य निरूपण प्रचुर परिमाण में अंकित है। इन पुस्तकों की साहित्यिकता, सांस्कृतिकता आदि भी साहित्य-जगत् के लिए महत्त्वपूर्ण है। साथ ही, इन पुस्तकों के प्रायः प्रत्येक आलेख अति गहन गरिम्न शोधपरक ज्ञान से महिम्न हैं जिनके कथ्य आदि पर कृतिवार अध्यायवार शोध बहुविध उपयोगी सिद्ध होगा।
उपसंहार
सारतया श्री रंजन कृत पुस्तकों के साथ-साथ विद्वान् समीक्षकों से प्राप्त प्रशंसाओं के अनुशीलन से स्पष्ट है कि उनकी पुस्तकें सोद्देश्य पूर्ण सहित्भावी ऋषिक मनस्विता से वास्तविक साहित्यिक लक्ष्यों को प्रत्यक्ष करने की भावभूमि में रची गई हैं। चूँकि हमारे समाज में काव्य-समालोचना से लेकर संस्कृति, शिक्षा, भारतीय राष्ट्रवाद आदि के विषय में अनेक विभ्रम विद्यमान हैं (जिनसे सामान्य जन ही नहीं, अपितु प्रबुद्ध जन, राजनेता आदि भी किसी विभ्रम से विभ्रमित हैं), ऐसे विभ्रमों का श्री रंजन अपनी पुस्तकों में सुतार्किक, सुसंगत, सात्त्विक निवारण करने के लिए कटिबद्ध दिखते हैं। श्री रंजन की समालोचनापरक पुस्तकों में जो संस्कृति, सदाचार, सात्त्विकता आदि का भारतीयतावादी, राष्ट्रीयतावादी चिन्तन प्रस्तुत है, वह लोकोपयोगी तो है ही, साथ ही, वह श्री रंजन के सार्थक, सबल, सकारात्मक सात्त्विक मानस पक्ष को भी प्रदर्शित करने में समर्थ है।
बहुआयामी सहित्भावी नैतिकतावादी लोकहित सह लोकहितवादी नैतिकता के पोषक, ‘हितेन सह’ आदि के सुप्रवर्तक साहित्यिक सेवाभावक, सत्यम् शिवम् सह सार्वसुन्दरम के समवेत के आराधक, साहित्य-साधक, ज्ञान-शोधक, ‘गुड लिटरेचर’ एवं ‘ग्रेट लिटरेचर’ के रचनाकार विजय रंजन की पुस्तकें बताती हैं कि श्री रंजन भारतीय सांस्कृतिक संचेतना के जागरूक साहित्याराधक भी हैं। साहित्यिक भाव-भूमि को ओढ़ने-बिछाने वाले विरले साहित्यसेवियों में वे अग्रगण्य हैं। उनके साहित्यिक कृतित्व से आगत पीढ़ी को स्वाध्यायगत वस्तुनिष्ठ साहित्य-साधना के श्रेष्ठ रचनाकर्म की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा प्राप्त हो सकेगी।
-एसो॰ प्रोफेसर, लखनलाल शरण सिंह महाविद्यालय, विश्नोहरपुर, नवाबगंज-गोण्डा (उ॰प्र॰), दूरभाष: 9450886006
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