शनिवार, 23 अगस्त 2025

विजय रंजन की कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ की कतिपय समीक्षाएँ

 


जड़ और जमीन से जुड़ी वैचारिक संवेदना की अंतःसलिला की पहचान है कृति-  
       ‘कविता का पश्यन्ती निकष  : नयत्व’  

 - डाँ॰ नित्यानन्द श्रीवास्तव

हिन्दी कविता की आलोचना का एक बड़ा हिस्सा वैचारिक स्वराज्य के अभाव में रूपवाद, आत्ममुग्धता, अनायास प्रशंसा-निन्दा, पश्चिमी प्रत्ययों और चन्द गुटबाजियों का शिकार है। रूपवादी विभ्रमों ने भी छांदस रूपों और कविता की अन्य विधाओं को हाशिये पर रखने का काम किया है। 

पिछले सात दशकों की हिन्दी आलोचना का व्यवहारिक पक्ष पाश्चात्य आर्थिक और वैचारिक सम्प्रदायों द्वारा प्रक्षेपित वादों, विवादों और विमर्शों का प्रायः क्रीतदास रहा है। ऐसा भी नहीं कि हिन्दी ने भारतीय साहित्यशास्त्र की परम्परा में अनुवाचन के रूप में ही सही कुछ न जोड़ा हो, पर उसका व्यवहारिक पक्ष पूरी तरह उभर कर सामने न आ सका। भारतीय साहित्यशास्त्र की जमीन पर खड़े होकर पाश्चात्य विमर्शों का निरीक्षण-परीक्षण करने का अतिरिक्त उद्यम भी आचार्य शुक्ल के बाद बहुत कम विद्वानों के  अध्ययन-पथ में रहा। पिछली आधी शताब्दी से भी अधिक समय से लेखक, सम्पादक और आलोचक का त्रिदोष सिद्ध होता रहा। उसने इस महत्त्वपूर्ण कार्य पर एक अवगुंठन-सा डाल दिया। 

पाश्चात्य वादों, विवादों और विमर्शों की ओर त्वरित गति करने वाले महानुभावों को भारतीय साहित्यशास्त्र के इस अभिमत-पल्लवन ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ (कृतिकार विजय रंजन) को अवश्य परखना चाहिए। 

‘नयवाद’ की स्थापना करते हुए इस कृति में विजय रंजन जी लिखते हैं- “ न्याय का आधारभूत तत्त्व ‘ऋत’ एवं ‘लोकमंगल’ होने के ब्याज से ‘नय’ में देश-काल सापेक्ष विवेकसम्मत औचित्य, सदाशयता आदि तो हैं ही, यह (नय) सामाजिक न्याय, सामाजिक सदाचार (Social Ethics) साहित्यशास्त्री साहित्य का सम्बन्ध मन की उदात्त वृत्तियों न बताते। मनुष्य का जो उदात्त मन अन्याय के किसी भी प्रकार से जहाँ भी प्रतिक्रिया करता है, प्रतिकार करता है; वही मन साहित्य में नयवाद का प्रस्तावक भी है। 

हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद, जनवाद या जनपक्षधरता जैसे वादों के पोषक मार्क्सवाद में वस्तुतः जिसका अभाव है, नयवाद उससे इतर भिन्न भावभूमि पर समग्रता की बात करता है। 

मार्क्सवाद में यह ‘अनय’ जहाँ वर्गभेद पर केन्द्रित है और प्रतिकार वर्गहित पर, वहीं नयवाद के केन्द्र में ‘अनय’ का बर्ताव प्रकृति के सभी आयामों को केन्द्र में रख कर है, सिर्फ मनुष्य-केन्द्रित नहीं। 

जल, वायु, मानवेतर जीव तथा वृक्षादि वनस्पतियाँ जहाँ भी अपनी प्रकृतितया अपने अधिवास से उन्मूलित या आक्रान्त किए जाते हैं, वे सब अन्याय कृति-प्रस्तावित नयवाद की वैचारिकी के केन्द्र में हैं। यह समग्रता काव्य की जिस भी अभिव्यक्ति तथा प्रस्तुति में है, वहाँ कवि की वाणी वैखरी के तल पर होते हुए भी चेतना के स्तर पर ‘पश्यन्ती’ तक जाती है; जहाँ-जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ कवि और भावक (पाठक) दोनों सम्प्रेषणीयता की समस्या से जूझते हैं। 

बहरहाल, विजय रंजन जी ने नयवाद की वैचारिकी में सत्, ऋत, कल्याण, लोकसुन्दरम्, नैतिकता, प्रमा आदि तत्त्वों को रखा है। ये सारे शब्द मनुष्य और उसके परिवेश के जीवन-व्यवहारों के आधारभूत तत्त्व हैं जिनको हमने असावधानीवश स्वयं से पृथक-सा कर दिया है। इस प्रकार इस विमर्श में ‘नयवाद’ वैचारिकी के स्वराज्य की आधारभूमि भी बन जाता है।

नयवाद की प्रस्थापना का लक्ष्य असत् के आधान को प्रश्नांकित करना है। भारतीय परम्परा में असत् को कालिमावर्णी माना गया है। विजय रंजन लिखते हैं-   “वैज्ञानिक अभिमत है कि कालिमा में प्रकाश-किरण को समग्रतः (उसके प्रत्येक अवयव को) सोख लेने की क्षमता होती है। गहरी कालिमा (Z Black) प्रकाश का अंशमात्र भी परावर्तित नहीं करती। वस्तुतः जो वस्तु जितने ही अधिक परिमाण में प्रकाश को सोषती है, वह उतने ही परिमाण में काली दिखती है। इस वैज्ञानिक सत्य को यदि समाजशास्त्रीय कलेवर प्रदान किया जाए तो वैज्ञानिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि समाज में असत्/तमस् को वरेण्यता प्रदान करने पर शोषक/शोषण उत्तरोत्तर चरम तक परिव्याप्त होता जाएगा। वह समाज की समग्र श्रेष्ठ ऊर्जा/ऊर्जस्विता को सोष लेगा जिससे समाज अंततः क्षरित हो जाएगा क्योंकि तब समाज की समग्र श्रेष्ठ ऊर्जा/ऊर्जस्विता को सोषने के प्रतिकार में कुछ भी परावर्तित/प्रत्यावर्तित न करने की दशा में समाज की सारी ऊर्जा जो सबसे ज्यादा तमस्शील होगा उसी के द्वारा सोष/हड़प ली जाएगी। चूँकि विज्ञान मानता है कि ऊर्जा और संहति आपस में परिवर्तनीय हैं अतएव, ऐसी दुःस्थिति भी आ सकती है कि सृष्टि से सारी संहति ऊर्जा के रूप में या संहति के रूप में सर्वशोषक द्वारा सोष ली जाए, तब समाज ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि तक का अस्तित्व मिट जाएगा। अ..त..ए..व, तमस्/असत् की आराधना न वरेण्य हो सकती है और न स्वीकार्य।” 

नयवाद का दूसरा अधिष्ठान है ‘ऋत’। महाभारत और उसके बाद के वाङ्मय में ऋत और सत्य प्रायः पर्यायवाची माने गए हैं लेकिन वैदिक तथा उपनिषदों के साहित्य में दोनों के आभामण्डल में पर्याप्त भिन्नता है। विजय रंजन इसकी सैद्धान्तिक स्थापना करते हुए लिखते हैं-  “प्रख्यात दर्शन-अध्येता डॉ॰ देवराज के अभिमत से ऋत ‘पावन नियमशीलता’ का वाचक है।......पावनता, विशुद्धता, नैतिकता, शाश्वत सद्-व्यवस्था, नियमन की अधिष्ठापना आदि के साथ-साथ अपदूषण-प्रक्षालन जैसे सद्गुण ‘ऋत’ को ‘नयवादी पहचान’ देने में समर्थ हैं। ‘ऋत’ को सघन सत्त्वशील, पावन नियमशीलता का संवाहक, सर्वात्म ब्रह्मत्व के निकटतर, अपावनता का निवारणकर्त्ता एवम् सत्त्वशील पावन ‘नयत्व’ का कारक माना जाना चाहिए।”  

विजय रंजन लिखते हैं- “आक्षरिक काव्य-संयुजन के परिप्रेक्ष्य में तथ्यतया ‘शिव’ के उपर्युक्त गुणधर्म के संवाहक/वाचक अर्थों में शब्द ‘शिवम्’ को भी अर्थायित किया जा सकता है जिसके क्रम में कल्याण को व्यापकता प्रदान करते हुए ‘काव्य’ के ‘शिवत्व’ को लोकमंगल/लोककल्याण का वाचक माना जाता है। दक्षिणात्य विद्वान् एम॰ वी॰ नाडकर्णी ‘शिवम्’ को ‘ईश्वर के नैतिक रूप का निचोड़’ कहते हैं। इसी रूप में वे ‘कविता’ में ‘शिवत्व’ की आराधना के हामीकार हैं।” 

नयवाद की वैचारिकी का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है ‘लोकसुन्दरम्’। सौन्दर्य की समझ और उसके व्यवहार को सामान्यतः संसार में आकर्षक, मनोहर, रम्य और मोहक से अर्थ-सन्दर्भित किया जाता है। इस व्यवहार में यह समझ 

व्यक्तिगत रुचि-अरुचि का विधान करती है जिससे व्यक्तिभेद से एक ही तत्त्व सुन्दर और असुन्दर कहा जाता है। इस मनोवृत्ति का विस्तार साम्प्रदायिक उन्माद तथा धर्मयुद्ध जैसे अभियानों में देखा जा सकता है और कुटिल राजनैतिक अभियानों में भी। सुन्दर-असुन्दर की मीमांसा करते हुए विजय रंजन लिखते हैं- “‘सुन्दर’ बनाम ‘असुन्दर’ के विभेद के क्रम में बताते चलें कि मिथक कथा है कि राजा जनक के दरबार में अष्टावक्र के शरीर-विकृति पर हँसने वाले सभासदों से अष्टावक्र ने प्रश्न पूछा जिसका सार था- ” मोहिं का हँसेसि कि हँसेसि कोंहरहि ?“औ..र, तब उन सभासदों को सन्न रह जाना पड़ा था। अंततः उन्हीं अष्टावक्र का भारी सम्मान हुआ था राजा जनक के दरबार में। इस मिथक से भी सिद्ध है कि मात्र ‘रूपवादी सौन्दर्य’ हमारे यहाँ अन्तिम प्रेय नहीं रहा कभी।”

नयवाद में एक सशक्त उपस्थिति ‘प्रमा’ की है। विजय रंजन जी इसे निरुपित करते हुए कहते हैं-“ ‘प्रमा’ वस्तुतः नैयायिकों की शब्दावली का शब्द है। ‘प्रमा’ का सहज अर्थ ‘प्रमाणाधारित वस्तुनिष्ठ ज्ञान’ के अर्थ में अर्थायित किया जाता है।....जहाँ तक ‘सर्जनाशील प्रमा’ का फलक है उस फलक पर कहना होगा कि प्रमाण-आधारित यथार्थ ज्ञान से जब हमारी सिसृक्षा (सर्जनाशीलता) मुखर हो जाती है तो ऐसी सिसृक्षा स्वतः नयत्वशील हो जाती है।” प्रमा यानि प्रमाण आधारित यथार्थ ज्ञान कोरे बुद्धिवाद की क्रिया नहीं है। पिछले सात दशकों में हिन्दी-साहित्य में वामपंथ और दक्षिणपंथ की क्रिया- प्रतिक्रिया के विवर्त में बौद्धिक कुण्ठाओं के दृश्य लेखक-सम्पादक-आलोचक की त्रिगुण फाँस में खूब दीखते हैं। यथार्थवाद और यथार्थबोध के नाम पर स्थूल और सतही दृश्यबोध का क्षैतिज फैलाव बहुत हुआ है। इसलिए तात्कालिकता कवि-विवेक पर भी हावी होती गई है। विमर्शों और वादों के दबाव ने सर्जनाशील प्रतिभा के सहज व्यवहारों को एक सिरे से नकारने का दुस्साहस भी किया है। इन परिस्थितियों में ‘प्रमा’ का प्रत्यय साहित्य-विवेक को मुखर कर सकता है।

बौद्धिक अतिवाद कई बार हिंसक-प्रतिहिंसक मनोग्रंथियों का कारण भी बनता है। व्यापक फलक पर देखें तो यह बुद्धिवाद   अवधारणाओं के संकट का प्रतिफल है। अवधारणाएँ जो जीवन-शैली का निर्धारण करती हैं, उन पर औपनिवेशिक प्रचार-तंत्र का गहरा असर तो है ही साथ ही एक विशेष प्रकार की आत्मविस्मृति और कुछ हद तक आत्मद्रोह की स्थितियाँ प्रभावी होती दिखती हैं। यह विचलन साहित्यालोचन और सृजनशीलता के सरोकारों में प्रसारित न हों, इसके लिए आवश्यक है कि नयवाद जैसे वैचारिक प्रस्थानों के साथ ही अपनी जड़ और जमीन से जुड़ी संवेदना की अंतःसलिला की पहचान की जाए। 

 -दिग्विजयनाथ पी॰जी॰ कालेज, गोरखपुर (उ॰प्र॰),दूरभाष: 7800989398

                           (अवध-अर्चना अंक 102 में प्रकाशित)

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 व्यापक चिन्तन-मनन-अध्ययन की परिणति है-  
   ‘कविता का पश्यन्ती निकष  : नयत्व’ 

                                  - डॉ॰ शिवम् तिवारी            

लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकार विजय रंजन की उत्कृष्ट अध्येतावृत्ति, गहन मंथन एवं सहज दर्शन ही इनके सृजन को विशिष्टता प्रदान करती है। 

वास्तव में वर्तमान दौर में लोग लगातार सृजन तो कर रहे हैं परन्तु शोधपरक एवं समीक्षात्मक सृजन यदा-कदा ही देखने को मिलता है। ऐसे में विजय रंजन जी की यह विद्वत्तापूर्ण समीक्षात्मक कृति देश-विदेश में साहित्य-प्रेमियों एवं शोधार्थियों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। 100 से अधिक पुस्तकों के मंथन के उपरान्त विरचित, विजय रंजन की यह कृति सचमुच हिन्दी साहित्य में एक प्रतिमान है। 

पुरावृत्ति और विवृति के प्रारम्भ में विजय रंजन जी ने बड़ी सहजता से लिखा है- 

“34 वर्ष पश्चात् 1999 के अन्तिम चरण में या कि वर्ष 2000 के प्रारम्भिक माह में भान हुआ मुझे कि कविता, गजल, साहित्य के ‘क्या’ से परिचय ही नहीं है मेरा। इनकी सटीक परिभाषा तक ज्ञात नहीं थी मुझे तब तक।” 

इस कथन से कृतिकार के हृदय की निश्छलता और स्वीकारोक्ति साफ दिखाई देती है। 

उम्र के इस पड़ाव में भी वयोवृद्ध कृतिकार के अन्दर का जागृत विद्यार्थी ही ऐसी कृतियों का प्रेरणास्रोत है। 

लेखक ने प्रसंगित कृति में बड़े ही सैद्धान्तिक एवं तथ्यात्मक रूप से कविता, पश्यन्ती, नयवाद और निकष आदि विभिन्न पहलुओं को समाहित किया है। 

कृति के अध्ययनोपरान्त यह ज्ञात होता है कि यह कृति वैदिक, आधुनिक एवं वैज्ञानिक साहित्यिक अध्ययन का एक समन्वित अनूठा दस्तावेज है। लेखक ने भविष्य को इंगित करते हुए दूरदृष्टि से बिल्कुल सटीक और सार्थक लिखा है- “यह अभीप्सा समग्रतः तभी सम्पूर्त्त हो सकती है जब सिद्धान्ततः एवं व्यवहार्यतः ‘काव्य’ से नयशीलता को, नय-न्याय को वैखरी में सहयुजित कर दिया जाए।” आधुनिक प्रासंगिकता के मद्देनजर कृतिकार ने बड़े ही सलीके से कविता के मूल को विश्लेषित एवं उद्घाटित किया है । 

निष्कर्षतः उसने बिल्कुल ठीक कहा है- “अच्छा होगा कि हम वैचारिक स्वराज शीघ्र प्राप्त करते हुए कमसकम आलोच्य प्रसंग में अधुना दार्शनिक के॰ सी॰ भट्टाचार्य को स्वीकार करके पश्चिम को, पश्चिमी काव्य-निकषन को, भारतीय दृष्टि से देखें और भारतीय देशना के समानुरूप काव्य-निकष के रूप में ‘काव्य-नयवाद’ को प्रथम वांछा के रूप में स्वीकार करें।”

पुस्तक-अनुक्रमणिका के पूर्वाचिक के विभिन्न अध्यायों में -

1. वैदिक संचेतना औ...र काव्य-नयवाद, 2. नयवादी महत् काव्य का गोमुख: रामायणम्, 3. तुलसीदास औ...र काव्य-नयवाद, 4. अन्यान्य भारतीय काव्यज्ञ  औ...र  काव्य-नयवाद, 5. प्रमुख भारतीयेतर काव्यशास्त्री औ...र काव्य-नयवाद, 6. समाजशास्त्र औ...र काव्य-नयवाद, 7. मनोविज्ञान औ...र काव्य-नयवाद, 8. कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व  हैं।

पुस्तक के उत्तरार्चिक में हैं- 1. काव्य-नयवाद के फलितार्थ,  2.   काव्य-नयवाद: आपत्तियाँ एवम् निदान 

इन अध्यायों के रूप में काव्य-नयवाद के विभिन्न पक्षों पर गम्भीर विवेचना प्रस्तुत है कृति में। भारती पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, फैजाबाद से वर्ष 2014 में प्रकाशित 271 पेज की यह कृति काव्यशास्त्र को समझने के लिए वर्तमान की चुनिन्दा कृतियों में से एक है। मूल्य इसका रु॰ 550/- मात्र है। इस कृति के सम्पादक संस्कृत के आचार्य, अनेक पुस्तक के लेखक डॉ॰ सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ जी हैं। कुल मिला कर विजय रंजन की लेखनी अद्भुत एवं अद्वितीय है। यही आपको लेखकों की भारी-भरकम  भीड़ में अलग पहचान देती है।                           

- नगर पंचायत सतीगंज अंतू , प्रतापगढ़-230501, दूरभाष: 9403067212

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