अति विलक्षण है कि विजय रंजन के लेखन की भूरि-भूरि प्रशंसा प्रत्येक उस साहित्य-सुधी पाठक ने की जिसने उनकी कृतियों अथवा उनके आलेखों का एक बार भी (चाहे सतही सा ही सही) अवलोकन किया।
प्रशंसकों के पूर्व में प्राप्त सभी मंतव्य पूर्व प्रकाशित कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ में प्रकाशित किए जा चुके हैं। इस कृति में उल्लिखित कतिपय मंतव्यों में कुछ प्रशंसक यह आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि हिन्दी साहित्य के नहीं, वरन् विज्ञान और विधि के ज्ञाता तथा जीविकावृत्ति हेतु अधिवक्ता-कार्य करने वाले विजय रंजन किस प्रकार इतने विद्वत्तापूर्ण, शोधपरक और तर्कतः परिपूर्ण नवीन प्रस्थापनाओं को प्रस्तावित करने वाले आलेख एवं कृतियाँ विरच लेते हैं ! एक सुधी पाठक ने तो यहाँ तक लिखा कि विजय रंजन जी द्वारा दिया गया शोध-ज्ञान पाठकों पर कर्ज है जो तभी उतर सकेगा जब वह व्यवहार-जगत् में कार्यरूप में परिणत किया जाए।
विजय रंजन के सम्प्रति प्रकाशित आलेखों पर कतिपय पाठक-प्रतिक्रियाएँ अग्रांकित हैं, जो विजय रंजन के लेखन के प्रति पाठकीय अभिमत एवं दृष्टि को मुखरित करती हैं। यथा-
* श्री विजय रंजन जी का लेख ‘जय भारत जय भारती’ ‘वीणा’ के मई 24 के अंक में पढ़ा। गहरे तक प्रभावित हुआ।
आलेख का मूलाधार ‘इण्डियन’ और ‘भारतीय’ होने के बुनियादी फर्क पर खड़ा है।
इस क्रम में लेखक भारत की प्राचीन संस्कृति का पूरा इतिहास खंगालता चलता है। वह पाण्डित्यपूर्ण ढंग से वेदों, उपनिषदों के सूत्रों पर टिप्पणियाँ करते हुए आगे बढ़ता है।
प्राचीन काव्यशास्त्रियों द्वारा भाषा और व्याकरण विषयक विचारों को भी पाठक के सामने प्रस्तुत करता है। इसमें ठोस ज्ञानप्रद सामग्री है। सामान्य पाठक को आलेख गरिष्ठ लग सकता है।
- डॉ॰ ओमप्रकाश शर्मा ‘प्रकाश’, दिल्ली वि॰ वि॰, आर॰एल॰ए॰कालेज, नई दिल्ली-21, दूरभाष: 9870103433
* आदरणीय विजय रंजन जी, वीणा मई 2024 में आपका बहुत ही अच्छा सुन्दर आलेख ‘जय भारत जय भारती’ पढ़ा। भारती और सरस्वती के अर्थ-सन्दर्भों की गहरी और तार्किक व्याख्या के लिए हार्दिक बधाई।....
- प्रो॰डॉ॰ श्रीराम परिहार, आजाद नगर, खण्डवा, दूरभाष: 9425342748
‘आधारशिला साहित्यम्’ में आपका लेख (‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम् : एक भारतीय अवधारणा’) पढ़ने को मिला। आश्चर्यचकित हूँ कि पाश्चात्य मान्यता के रूप में बहुप्रचारित अवधारणा को आपने भारतीय अवधारणा के रूप में स्थापित करने के लिए कैसे इतने सबल तर्क दिए ! आपके अध्ययन और लेखन को नमन। - डॉ॰ सुधीर बावेजा, चण्डीगढ़, दूरभाष: 9876621441
सच्चिदानन्द के प्रत्यय को ‘सत्यम्, शिवम् , सुन्दरम्’ की आधारभूमि बताते हुए आपने जिस ढंग से सत्यम् शिवम् सुन्दरम् सम्बन्धी प्रचलित अवधारणा के बारे में खण्डन-मण्डन किया है, वह प्रशंसनीय है। प्रशसंनीय ही नहीं उसे स्पृहणीय कह सकता हूँ। मुझे आपसे ईर्ष्या हो रही है कि जीवन भर संस्कृत का अध्येता-व्याख्याता होने के बावजूद आपके तर्क मेरी बुद्धि में पहले क्यों नहीं आए ?
- डॉ॰ महाराजदीन पाण्डेय, सेवानि॰ व्याख्याता एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, ए॰ एन॰ डी॰ डिग्री कालेज बभनान, गोण्डा, दूरभाष: 9451027704
वास्तव में विजय रंजन की मौलिक विचारों और नवीन प्रस्थापनाओं युक्त कृतियों एवं कहानी, कविता, गजल आदि अन्यान्य रचनाओं को उनकी भारतीयता, राष्ट्रीयतावादी सोच के कारण न केवल साहित्यिक जगत् में वरन् प्रबुद्ध समाज में भी भरपूर स्वीकार्यता एवं तज्जनित प्रशंसा मिली। इसी ब्लॉग में विजय रंजन की कृतियों की समीक्षाओं और प्रबुद्ध पाठकों की प्रशंसापरक टिप्पणियों सम्बन्धी पोस्टों से इस प्रशंसा को भली प्रकार जाना जा सकता है ।
उपरि-इंगित प्रशंसा का ही परिणाम था कि किसी भी विश्वविद्यालय /महाविद्यालय /माध्यमिक विद्यालय या कि प्राथमिक विद्यालय तक में अध्यापक का पद प्राप्त न करने वाले, मात्र अधिवक्ता-कार्य तथा अवध-अर्चना के प्रकाशन एवं स्फुट लेखन-प्रकाशन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता करने वाले, स्नातक एवं एलएल.बी. डिग्रीधारी विजय रंजन को जनपदीय, प्रदेशीय और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित साहित्यिक समारोहों, विचार-संगोष्ठियों, सेमिनार, वेबिनार में तथा कवि-सम्मेलन, आकाशवाणी आदि के मंचों पर व्याख्यान-वक्तृता एवं रचना-पठन हेतु सहभागिता प्रदान की गई। उन्हें विद्यालयीय, महाविद्यालयीय, विश्वविद्यालयीय स्तर के साहित्यिक व्याख्यान समारोहों में भी सहभागिता का ससम्मान अवसर मिला। यथा-
* विविध व्याख्यान
1. वर्ष 1997 में ‘साहित्य परिषद का॰ सु॰ साकेत पी॰ जी॰ महाविद्यालय फैजाबाद में ‘तुलसी का जीवन-दर्शन’ विषय पर।
2. वर्ष 1997 में अवध-अर्चना प्रकाशन फैजाबाद के तत्त्वावधान में प्रेस-क्लब फैजाबाद में ‘गजल और हिन्दी गजल’ विषय पर।
3. वर्ष 1998 में सेनानी परिषद विद्यालय, हल्द्वानी में ‘आचार्य नरेन्द्रदेव की प्रासंगिकता’ विषय पर।
4. वर्ष 2000 में डॉ॰राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद में ‘सामाजिक विकास में विधि का योगदान’ विषय पर।
5. वर्ष 2003 में डॉ॰ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद में ‘भारतीय इतिहास का विकृतिकरण’ विषय पर।
6. वर्ष 2006 में कबीर संस्थान जीयनपुर में ‘कबीर आज भी उपयोगी’ विषय पर।
7. वर्ष 2008 में अवध भारती हैदरगढ़ बाराबंकी में ‘अवधी भाषा-साहित्य : विविध संदर्भ’ विषय पर।
8. वर्ष 2008 में अवध-अर्चना प्रकाशन फैजाबाद के तत्त्वावधान में फैजाबाद में ‘आज का दौर और कविता’ विषय पर।
9. वर्ष 2012 में रामकथा संग्रहालय अयोध्या में वाल्मीकि के राम विषय पर।
10. वर्ष 2014 में कथा समवेत-संवाद समारोह, सुल्तानपुर में ‘समय, समाज और हिन्दी कहानी’ विषय पर।
11. वर्ष 2015 में फैजाबाद पुस्तक मेला में ग्रेटर रोटरी क्लब के तत्वावधान में ‘लघुकथा-लेखन’ विषय पर।
12. वर्ष 2016 में साहित्य मण्डल श्रीनाथद्वारा, राजस्थान के समारोह में ‘भारतीय संस्कृति की संवाहक विश्वभाषा हिन्दी तथा उसका राजभाषा स्वरूप’ विषय पर।
13. वर्ष 2018 में ‘श्रीभागवत अकादमी’ एवं साहित्यिक संस्था ‘संभव’ फैजाबाद-अयोध्या के तत्त्वावधान में ‘अवध-अर्चना’ कार्यालय पर ‘राष्ट्रवाद आवश्यक क्यों’ विषय पर।
14. वर्ष 2018 में राजा मोहन गर्ल्स पी॰ जी॰ कालेज, फैजाबाद-अयोध्या में राजा मोहन गर्ल्स पी॰ जी॰ कालेज, फैजाबाद अयोध्या के तत्त्वावधान में ‘राष्ट्रवाद की प्रासंगिकता’ विषय पर।
15. वर्ष 2019 में डॉ॰ रा॰ लो॰ अवध-विश्वविद्यालय, फैजाबाद में डॉ॰राम मनोहर लोहिया अवध-विश्वविद्यालय, फैजाबाद- अयोध्या (उ॰प्र॰) और कौण्डिन्य साहित्य सेवा समिति, सुल्तानपुर के तत्त्वावधान में ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम् और कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ’ विषय पर।
16. वर्ष 2020 के माह जुलाई में बाबू मुकुटबिहारी जैन महाविद्यालय एवं अन्तर राष्ट्रीय साहित्य कलामंच, भारतवर्ष के तत्त्वावधान में ‘सांस्कृतिक प्रदूषण : समस्या और समाधान’ विषय पर अन्तर राष्ट्रीय वेब-गोष्ठी में व्याख्यान।
17. वर्ष 2020 के माह जुलाई में ‘रामकथा का वैश्विक प्रस्तार’ विषय पर साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था मुम्बई के तत्त्वावधान में आयोजित वेबिनार में व्याख्यान।
18. 25 सितम्बर 2020 को ‘हिन्दुस्तान हॉटलाइन न्यूज’ टी॰वी॰ द्वारा लाइव प्रसारण: ‘रामकथा का वैश्विक प्रस्तार’ विषय पर व्याख्यान। यू-ट्यूब पर भी उपलब्ध।
19. 4 अक्टूबर 2020 को विश्वयात्रा टाइम्स टी॰वी॰चैनल पर ‘रामकथा का वैश्विक प्रस्तार और रामत्व की प्रासंगिकता’ विषय पर व्याख्यान का लाइव प्रसारण। यू-ट्यूब पर भी उपलब्ध।
20. 14 मई 2021 को ‘परीक्षित सेवा संस्थान, अमेठी’ के तत्त्वावधान में आयोजित वेबिनार में ‘परशुराम जयन्ती’ पर वेबिनार में ‘परशुराम जी का अवदान’ विषय पर व्याख्यान। यू-ट्यूब पर भी उपलब्ध।
21. 22 फरवरी 2022 को बी॰ बी॰ सी॰ चैनल के लिए ‘अयोध्या का वर्तमान भारतीय राजनीति पर प्रभाव’ विषय पर बी॰ बी॰ सी॰ संवाददाता सुश्री सुरेखा द्वारा वार्त्ता।
22. 4 अप्रैल 2022 को जम्बू टॉक्स चैनल एवं यू ट्यूब पर ‘राम और रामत्व’ विषय पर ‘रामत्व सर्वाधिक प्रासंगिक’ शीर्षक से आयोजक श्री निधीश गोयल द्वारा आयोजित सुदीर्घ वार्त्ता।
23. 24. 04. 2022 को हंसराज महाविद्यालय, दिल्ली के प्रो॰ डॉ॰ सुधांशु शुक्ल द्वारा आयोजित ‘एक भारत’ व्याख्यान शृंखला में ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ विषय पर व्याख्यान।
24. 17.12.2023 में न्यायमूर्ति श्री महेन्द्र भीष्म के संयोजकत्व में ‘कृति और कृतिकार पं॰ बृजमोहन अवस्थी स्मृति संस्थान लखनऊ, और ‘नेताजी सुभाष संगठन, फैजाबाद’ द्वारा आयोजित कृति और कृतिकार संवाद-3 में ‘साहित्य कैसे’ विषय पर व्याख्यान।
25. 23.06.2024 को चित्रकूट में वैश्विक साहित्यिक सांस्कृतिक एवं ज्योतिष शोध संस्था कानपुर, हिन्दी युनिवर्स फाउण्डेशन नीदरलैण्ड तथा इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के तत्त्वावधान में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘रामत्व का अंगीकार आवश्यक’ विषय पर व्याख्यान।
25. 20.10.2024 को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना के 43वें महा-अधिवेशन के अवसर पर ‘साहित्य के समक्ष नए प्रश्न’ विषय पर व्याख्यान।
26. 29.12.2024 को सोशल एण्ड मोटिवेशनल ट्रस्ट, नई दिल्ली के तत्त्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी अयोध्या में विशिष्ट अतिथि के रूप में ‘साहित्य क्या है’ विषय पर व्यख्यान।
27. 3.1.2025 को हिन्दुस्तानी अकादमी, प्रयागराज के तत्त्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी अयोध्या में विशिष्ट अतिथि के रूप में ‘महात्मा बनादास का अवधी साहित्य में योगदान’ विषय पर अयोध्या में व्याख्यान।
28. 11.5.2025 को पूर्वापर संस्थान गोण्डा के तत्त्वावधान में लालबहादुर शास्त्री पी॰ जी॰ कालेज गोण्डा में आयोजित संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में ‘आतंकग्रस्त विश्व और साहित्य’ विषय पर व्याख्यान।
॰ कवि-सम्मेलन में सहभागिता
कानपुर, लखनऊ, बाराबंकी, ग्वालियर, आगरा, इलाहाबाद, गोण्डा, फैजाबाद, सुल्तानपुर, चित्रकूट, पटना आदि में विभिन्न काव्य मंचों पर काव्यपाठ।
॰ रचना-प्रसारण
- 1977-1985 आकाशवाणी लखनऊ से अनेक रचनाएँ प्रसारित।
- 1996-2024 आकाशवाणी अयोध्या से कविता, कहानी, ‘साहित्य और सेवायोजन’ सदृश आलेख प्रसारित।
आकाशवाणी अयोध्या से 19 जून 2023 को ‘वर्तमान युग में योग की प्रासंगिकता’ विषय पर, नवीनतमतया 21 मार्च 2024 को ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम् : विशुद्ध भारतीय अवधारणा’ विषय पर और 21 नवम्बर 2024 को ‘शान्तिकामी, सात्त्विक भारतीय राष्ट्रवाद’ विषय पर वार्त्ताएँ प्रसारित।
विजय रंजन के कृतित्त्व की साहित्यिक एवं सामाजिक स्वीकार्यता का प्रमाणक है यह तथ्य भी कि वर्ष 1978 से ही समय-समय पर साहित्यिक सामाजिक जनपदीय, प्रदेशीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा विजय रंजन अब तक निरन्तर सम्मानित होते रहे हैं ।
विजय रंजन के कृतित्त्व की साहित्यिक एवं सामाजिक स्वीकार्यता का प्रमाणक है यह तथ्य भी अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में वसुधा (कनाडा), भारत दर्शन (न्यूजीलैण्ड), स्पाइल (नार्वे ) , राष्ट्रीय पत्रिकाओं अक्षरा (भोपाल), तुलसी मानस भारती (भोपाल), मंगलायन (भोपाल), आधारशिला (चण्डीगढ़), चिन्तन सृजन (दिल्ली), साहित्य भारती (लखनऊ), उत्तर प्रदेश (लखनऊ), राष्ट्रधर्म (लखनऊ), हिन्दुस्तानी (प्रयागराज), अभिदेशक (सुल्तानपुर), पूर्वापर (गोण्डा), शुभोदय (बुलन्दशहर), चेतनता (गोरखपुर), हिन्दी विवेक (मुम्बई) आदि, भारतीयता पर संकेन्द्रित अनेक आलेख प्रकाशित।
विजय रंजन के कृतित्त्व की साहित्यिक एवं सामाजिक स्वीकार्यता का अतिरिक्त प्रमाणक है अग्रांकित विशेष उपलब्धियाँ भी ।
॰ श्री विजय रंजन को द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन, मारीशस के लिए कार्यकारी उच्चायुक्त मारीशस उच्चायोग नई दिल्ली द्वारा आमन्त्रित किया गया परन्तु अपरिहार्य निजी कारणों से वे सहभागिता करने से वंचित रहे।
॰ श्री रंजन को नेहरू सेन्टर, भारतीय उच्चायोग, लन्दन की डॉ॰ दिव्या माथुर द्वारा अनेक बार आमन्त्रित। तत्समय अस्वस्थ होने के कारण सहभागिता नहीं।
॰ दैनिक समाचार-पत्र हिन्दुस्तान फैजाबाद संस्करण तथा वर्ष 2018 में दैनिक जागरण आगरा संस्करण में एवं दैनिक जागरण की वेबसाइट में साक्षात्कार प्रकाशित।
॰ वर्ष 2020 में हिन्दी दिवस पर ई-टी॰वी॰ भारत द्वारा विजय रंजन के सम्बन्ध में एक फीचर प्रकाशित।
॰ वर्ष 2020 में ‘साहित्यिक सांस्कृतिक शोध-संस्था, मुम्बई’ द्वारा प्रकाश्य ‘श्रीरामकथा विश्वकोश’ में उपसम्पादक एवं उपसमन्वयक मनोनीत।
॰ विजय रंजन के साहित्यिक अवदान पर शोध-छात्र मोहन गिरि द्वारा पीएचडी॰ उपाधि हेतु शोध-कार्य गतिमान।
॰ विजय रंजन के साहित्यिक अवदान पर डॉ॰ शिवम् तिवारी द्वारा डी॰ लिट्॰ उपाधि हेतु शोध प्रस्तावित।
॰ विजय रंजन के साहित्यिक कृतित्व पर विकास पाण्डेय (छात्र, लाल बहादुर शास्त्री पी॰ जी॰ कालेज, गोण्डा) आदि के लघु शोध-प्रबन्ध अवध वि॰वि॰द्वारा स्वीकृत।
॰ विजय रंजन के कृतित्व पर एक कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ (2021) संपादकगण डॉ॰ महेश दिवाकर, डॉ॰ शिवम् तिवारी, डॉ॰ जयति देवी, डॉ॰ स्वाति रस्तोगी, प्रकाशक: विश्व पुस्तक प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
॰ विजय रंजन के कृतित्व पर एक कृति ‘अप्रतिम साहित्यसेवी विजय रंजन’ (2024), संपादक पवन बख्शी (इतिहासज्ञ) द्वारा प्रकाशित।
॰ तत्सदृश एक अन्य पुस्तक कोलकाता की प्रोफेसर डॉ0 रेशमी पाण्डा मुखर्जी प्रणयनाधीन।
॰ विजय रंजन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पत्रिका ‘चेतनता’ में आलेख प्रकाशित।
॰ विजय रंजन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पत्रिका ‘पूर्वापर’ (सम्पादक डॉ॰ सूर्यपाल सिंह) का अंक संख्या 60 प्रकाशित।
॰ विजय रंजन की कृति ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ पर भोपाल की प्रोफेसर डॉ॰कुसुमलता केडिया द्वारा दो एपिसोड समीक्षात्मक विवेचना जम्बो टॉक चैनल पर प्रसारित। यू॰ट्यूब पर उपलब्ध।
॰ केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के डॉ॰ उमापति दीक्षित द्वारा विजय रंजन की कृति ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ की प्रशंसा अन्तर्राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित ।
॰ अहमदाबाद गुजरात के ख्यात लेखक डॉ॰ विजय कुमार तिवारी द्वारा ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ अन्तर्राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी के माध्यम से प्रसारित ।
॰ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा विजय रंजन की प्रेरणा से वर्ष 2024 में एक सेमिनार भारतीय राष्ट्रवाद विषय पर आयोजित।
॰ कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ का अनुवाद बंगाली और तेलुगु भाषा में गतिमान बताया जाता है।
यहीं उल्लेखनीय है यह भी कि अनेक समीक्षकों ने विजय रंजन की कृतियों को अपने विषय की एनसाक्लोपीडिया कहा है।
केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की पूर्व निदेशक डॉ0 बीना शर्मा ने कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ को ‘राष्ट्रवाद का मानस’ कहा है।
कृति ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ के सम्बन्ध में डॉ0 कुसुमलता केडिया का कथन था- “यदि यह पुस्तक सौ-दो सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई होती तो भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य आज से कहीं अधिक भिन्न और सकारात्मक होता।’’
कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ के सम्बन्ध में डॉ0 बृजेश कुमार गुप्ता (बाँंदा , उ॰ प्र॰) का कहना है कि ‘‘ सच तो यह है कि भारत और भारतीयता के सम्बन्ध में अति महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ इस ग्रन्थ द्वारा एक साथ पाने के लिए पाठक ग्रन्थकार विजय रंजन के कर्ज में डूबे हुए हैं, जिसका एक विशिष्ट उद्देश्य है। ग्रन्थकार का यह कर्ज तभी उतरेगा, जब अधिक से अधिक पाठक इस ग्रन्थ का गहनता व मनोयोग से पारायण करेंगे और ग्रन्थ में बताए गए ज्ञान को मन, वचन और कर्म से अपनाकर न केवल भारत के प्राचीन गौरव को वापस लाने को कटिबद्ध होंगे वरन् आधुनिक आयामों में भी भारत को विश्व का सिरमौर बनाएंगे।’’
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