विजय रंजन एक अप्रतिम रचनाकार ही नहीं वरन् एक उत्कृष्ट सम्पादक भी हैं। अपनी साहित्यिक यात्रा के आरम्भ के काल से ही वे अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन, सह-सम्पादन/सम्बद्धता से सहयुजित रहे हैं। यथा-
सहसम्पादन / सम्बद्धता
1965-66 में ‘विचारभारती’ (साप्ताहिक), 1975-85 में ‘छात्रमोर्चा (समाचार-पत्र)’, ‘साकेत शोभा’ (दैनिक),‘अवध शोभा’ (दैनिक) एवं ‘सुवर्णी’ (पत्रिका) से सम्बद्ध।
1975 में ‘युगगति’ (साप्ताहिक), 1994 में ‘अवधी’ (पत्रिका), 1995-97 ‘तुलसीदल’ (पत्रिका) में सह-संपादन।
पत्रिका ‘शिक्षा-संवाद’ एवं ‘शिक्षा साहित्य’ (फैजाबाद), ‘लोकमंगल’ (ग्वालियर) के विशिष्ट सहयोगी। वर्तमान में पत्रिका ‘चेतनता’ (गोरखपुर) के परामर्शदाता।
सम्पादन-प्रकाशन
# 2 अक्टूबर 1976 से ‘अवध-अर्चना’ मासिक समाचार-पत्र का संपादन-प्रकाशन।
# जनवरी 1977-1989 में ‘अवध-अर्चना’ साप्ता॰ समाचारपत्र का संपादन-प्रकाशन।
# अप्रैल 1995 से अद्यतन ‘अवध-अर्चना’ त्रैमासिक का अनवरत संपादन।
- अवध-अर्चना त्रैमा॰ के अनेक चर्चित विशिष्ट अंक सम्पादित । यथा:-
- तुलसी अंक, गाँधी अंक, विवेकानन्द अंक, आचार्य नरेन्द्रदेव अंक, लघुकथा अंक, बालसाहित्य अंक, हिन्दी गजल अंक, अयोध्या अंक, कबीर अंक, विज्ञानकथा अंक, उपयोगी विज्ञान अंक, भारतीय समाजवादी आन्दोलन के तीन शक्तिपुंज अंक, राजभाषा अंक, पूर्वोत्तर भारत अंक 1, पूर्वोत्तर भारत अंक 2, नवगीत 2021 अंक एवं लघुकथा 2025 अंक का संपादन।
- पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ R.N.I. , I.S.S.N. द्वारा सूचीबद्ध।
- पत्रिका www.awadharchana.com पर अंक 93 से उपलब्ध।
विजय रंजन के सशक्त एवं कुशल सम्पादन का परिणाम था कि त्रैमासिक पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ को उ॰ प्र॰ हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा सरस्वती पुरस्कार 2014 से पुरस्कृत किया गया।।
प्रबुद्ध पाठकों की दृष्टि और अवध-अर्चना
(कुछेक उदाहरण)
* अवध-अर्चना के प्रथम वर्ष के अब तक के तीनों अंक मैंने पढ़े। बड़े श्रम से आप पत्रिका निकाल रहे हैं। आपकी लेखनी सशक्त है और सोच भी भारतीय संस्कृति के अनुरूप है। इसी तरह लगे रहेंगे तो निश्चित रूप से आप बहुत आगे जाएंगे।
- डाॅ0 यदुवंशराम त्रिपाठी, प्राचार्य (तत्कालीन), का0सु0 साकेत महाविद्यालय, फैजाबाद
* अवध-अर्चना के प्रथम वर्ष में प्रवेशांक के अतिरिक्त तीन विशिष्ट अंक तुलसी अंक, गाँधी अंक, विवेकानन्द अंक और इन अंकों में अति विशिष्ट सामग्री देख कर अवध-अर्चना के भविष्य के प्रति मैं आश्वस्त हो गया हूँ।
- लक्ष्मीकांत वर्मा, उपाध्यक्ष, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, लखनऊ
* अवध-अर्चना के दस-बारह अंक ही अभी प्रकाशित हुए हैं। इतने से ही आपने धाक जमा ली है। बहुत स्तरीय सामग्री दे रहे हैं।
- डाॅ0 कमलाकर मिश्र, प्रो0 हिन्दी विभाग, का0सु0साकेत महाविद्यालय, फैजाबाद
* अवध-अर्चना के उच्च स्तर, औदात्य, प्रसिद्धि एवं विद्वत्जनों द्वारा इसके प्रति सम्मान को दृष्टिगत रखते हुए सम्यक् परीक्षण एवं विचारोपरान्त (डाॅ0 रा0म0लो0 अवध विश्वविद्यालय की) पाठ्यक्रम समिति के संयोजक के रूप में मैं इस पत्रिका को शोधार्थियों के आलेख-प्रकाशन हेतु अनुमोदित करता हूँ।
- डाॅ0 अजीत कुमार सारस्वत, प्राचार्य बी0एन0के0बी0पी0जी0 कालेज अम्बेडकर नगर एवं संयोजक पाठ्यक्रम समिति हिन्दी डाॅ0 रा0म0लो0अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद
*अवध-अर्चना में प्रकाशित राष्ट्रवाद सम्बन्धी आपका आलेख मैंने पढ़ा। आप बड़ा गम्भीर और सार्थक लेखन कर रहे हैं।
- डाॅ0 एस0 के0 रघुवंशी, पूर्व गृहसचिव, उ0 प्र0 शासन, लखनऊ
* आज के सांघातिक दौर में पत्रिका निकालना, वह भी खाँटी साहित्यिक, मुश्किलतरीन काम है। आपके अपने साहित्यिक जुनून से पत्रिका का नैरन्तर्य बना हुआ है। यह निश्चित रूप से किसी पराशक्ति की अनुकम्पा का फल है। निकलने को देश भर से साहित्य के नाम पर ढेरों पत्रिकाएँ हैं, किन्तु अवध-अर्चना की अंतर्लीन सामग्री का तेवर एकदम अलहदा है। साहित्य संरचना के प्रति आपकी दरवेशी दृष्टि भी अन्य पत्रिकाओं के बरक्स बेशकीमत है। किसी भी साहित्यिक या गैरसाहित्यिक पत्रिका की बलन्दी या पस्ती का राज सम्पादक की कलम में पिन्हा होता है। सम्पादक की मानसिकता, विचारधारा पत्रिका की अस्मिता के लिए प्रश्नचिह्न भी बनती है और जेनुइन जवाबदेही का हिस्सा भी। भाई विजय रंजन जी ! तकरीबन तीन-चार दशक से मैं आपसे किसी न किसी रूप में सम्बद्ध रहा हूँ और फिलहाल भी हूँ। अवध-अर्चना मेरे लेखे सभी साहित्य-सरोकारियों के लिए एक अनिवार्य कृति की मानिन्द है। सादगी औ’ पुरकारी की दस्तावेज की भूमिका रचती अवध-अर्चना सद्साहित्य के लिए ‘लीजेण्ड’ पत्रिका है। चाहे आपका सम्पादकीय (आमुख) हो या ‘राष्ट्रवाद औ..र संस्कृति’ संज्ञक आलेख, आपकी पारमिता प्रज्ञा की निशानदेही करते हैं। आएदिन इस पंक्तिकार के पास पत्रिकाएँ देश भर से आती हैं किन्तु ‘अवध-अर्चना’ सी संतुष्टि अन्य पत्रिकाओं से नहीं हो पाती। भाई विजय रंजन जी ! खाकसार साहित्य के हवाले से शीशे के घर में है। जहाँ किसी भी जानिब से संगकारी संभव है। किन्तु हकीकत को किसी भी शर्त पर कह देने के लिए दण्डित हूँ। सम्पादकीय से लगायत राष्ट्रवाद और संस्कृति विषयक आलेख तक की सर्जना नायाब है। प्रकाशित अन्य आलेख भी कहीं से कमजोर नहीं हैं।
- डाॅ0 मधुर नज्मी, निदेशक, काव्यमुखी अकादमी, मऊ (उ0प्र0)
* ‘अवध-अर्चना’ के ‘गाँधी अंक’ से ही आपकी कलम का लोहा मान रहा हूँ। गाँधी पर यदि मुझे कहीं भाषण देना होता है, तो भाषण के लिए जाने से पहले मैं अवध-अर्चना का गाँधी अंक अवश्य पढ़ता हूँ।
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श्री विजय रंजन राजनीति से अलिप्त रह कर वे अनवरत साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक साधना की अलख जगाए हुए हैं। इनकी पत्रिका अवध-अर्चना के गाँधी अंक, आ0 नरेन्द्रदेव अंक, भारतीय समाजवादी आन्दोलन के तीन शक्तिपुंज अंक, विवेकानन्द अंक, अयोध्या अंक, राजभाषा अंक आदि को मैं मील का पत्थर मानता हूँ।
- जयशंकर पाण्डेय, प्रदेश सचिव, समाजवादी पार्टी (उ0प्र0) लखनऊ
*श्री रंजन पहले ‘अवध-अर्चना’ साप्ताहिक का प्रकाशन करते थे। वर्तमान में वे 24 वर्षों से इसी नाम की त्रैमासिक पत्रिका सम्पादित कर रहे हैं। इस पत्रिका के आचार्य नरेन्द्रदेव अंक, गाँधी अंक, विवेकानन्द अंक, अयोध्या अंक आदि अनेक विशिष्ट अंक अति श्रेष्ठ और चर्चित रहे हैं। हमारी संस्था ‘सेवा’ द्वारा भी श्री रंजन को सम्मानित किया जा चुका है।
- निर्मल खत्री, पूर्व सांसद, अयोध्या-फैजाबाद संसदीय क्षेत्र, पूर्व राज्यमंत्री उ0प्र0 शासन, लखनऊ, पूर्व अध्यक्ष: उ0 प्र0 कांग्रेस कार्यसमिति, लखनऊ (उ0प्र0)
* मैंने आपका राष्ट्रवाद सम्बन्धी आलेख अवध-अर्चना में पढ़ा। आप जो कुछ भी लिखते हैं, बड़ी मेहनत से लिखते हैं। लेकिन लगता है कि राष्ट्रवाद के विषय में अब आप अन्तर्मुखी आलोचना से दूर हो रहे हैं। यह सकारात्मक नहीं है। फिर भी आप न्यायक्षेत्र से सम्बन्धित रहे हैं, और आपका लेखन न्याय से अलग नहीं होता, इसलिए आप संकीर्ण राष्ट्रवाद की बात नहीं करते हैं, करेंगे भी नहीं, यही आशा है।
- डाॅ0 बजरंग बिहारी तिवारी, नई दिल्ली
* अवध अर्चना का लघुकथा विशेषांक प्राप्त हुआ इसके संपादक विजय रंजन जी एवं अतिथि संपादक राम यतन यादव जी रहे । इन दोनों का परिश्रम इस विशेषांक में स्पष्ट दिखाई देता है लघुकथा पर केंद्रित अनेक आलेख और फिर एक से बढ़कर एक लघुकथाएं और उनके साथ-साथ लघुकथाओं की पुस्तकों की समीक्षाएं इस अंक में दी गई है।संपादक महोदय ने मेरी भी दो लघुकथाएं जिनमें 'सम्मान' और 'सजा' को प्रकाशित कीं साथ में मेरे द्वारा डॉक्टर अशोक भाटिया जी के लघुकथा संग्रह 'सूत्रधार' की समीक्षा भी प्रकाशित की । उसके लिए भी बहुत-बहुत आभार। वास्तव में ही यह अंक बहुत शानदार बना है, सभी को पढ़ना चाहिए।
- राधेश्याम भारतीय, घरौंडा, करनाल हरियाणा, दूरभाष: 9315382236
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