शनिवार, 23 अगस्त 2025

विजय रंजन की कृति ‘कविता क्या है’ की कतिपय समीक्षाएँ


 कविता का एनसाइक्लोपीडिया है  
                                      ‘कविता क्या है’                                         --शारदा लाल

कविता क्या है’ पुस्तक प्राप्त हुई। विजय रंजन जी की इस पुस्तक को उलट-पलट कर देखा, जिज्ञासा बढ़ी। अंततः पूरी पुस्तक मनोयोग से पढ़ डाली।

पुस्तक को आदि से अन्त तक पढ़ने पर महसूस हुआ कि विजय रंजन जी ने गहन अध्ययन और सर्वेक्षण किया होगा। तब इतनी सामग्री जुटा पाए होंगे। कविता की जाँच-परख के लिए एक विशेष दृष्टि चाहिए, जो लेखक के पास है। 

पुस्तक का नाम बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है। ‘कविता क्या है’ इसका कोई एक उत्तर नहीं है। लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है कि ‘कविता क्या है’ यह बताना बहुत कठिन है। इस विषय का मंथन समय-समय पर विद्वानों ने किया है, परन्तु सफलता आंशिक रूप में ही मिली है। 

पुस्तक का फलक बहुत विस्तृत है। लेखक का प्रयास प्रशंसनीय है। इतनी विस्तृत जानकारी को पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखक को गहन अध्ययन से गुजरना पड़ा होगा। यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि पुस्तक ‘कविता क्या है’ को सरसरी निगाह से नहीं पढ़ा जा सकता है। लेखक की ही तरह पाठक को भी एकाग्र होना होगा।

कविता साहित्य की एक ऐसी विधा है जो मानव-मन को उद्वेलित करती है। बदले में जो अक्षर कागज पर उभर कर आते हैं, वे ही कविता का रूप लेते हैं। भीतर के झंझावातों में फँसा हुआ आदमी अपनी कलम से जो लिख देता है उसमें भाषा-सौष्ठव के अतिरिक्त एक लय होती है, प्रवाह होता है और होता है एक उद्भुत खिंचाव जो पढ़ने वाले को अपने आगोश में ले लेता है। अंततः जो रचना पाठकों के समक्ष आती है, उस पर विचार-विमर्श, सहमतियों और असहमतियों के बीच से ही कुछ निकलता है। कवि की रचना का दृष्टिकोण कितना और किस रूप में उजागर हुआ है, यह पाठक ही तय करता है।

समय के साथ-साथ कविता का स्वरूप बदलता गया। कबीर के दोहे, सूक्तियाँ अनायास ही कण्ठस्थ हो जाया करते थे, जिनमें सीख होती थी और होता था सत्य जो जीवन का आधार बन जाता था। व्यक्ति ऐसे दोहांे को गाँठ में बाँध कर जीवन-नैय्या को विश्वास की पतवार से खेने लगता था। कालान्तर में बदलाव आता गया। यह बदलाव कैसे आया, समाज ने इसे कैसे स्वीकार किया, परिस्थितियाँ कैसे बदलीं, क्रमवार लेखक ने पूरे विश्वास और साहस के साथ इस पुस्तक में पाठकों के सामने रखा है। लेखक को इसमें भरपूर सफलता मिली है, जो प्रशंसनीय है।

कविता को श्रेणी में रखना, उसकी सीमाएँ निर्धारित करना, उनका वर्गीकरण करना एक मुश्किल काम है। पर लेखक ने यह काम बखूबी किया है।

कविता हृदय को आह्लादित ही नहीं करती है बल्कि हृदय को स्वार्थों से मुक्त करके मनुष्यता की सहज भाव-भूमि पर भी ले जाती है। 

लेखक ने कविता की शैली पर भी गुणीजनों के विचारों के उदाहरण दिए हैं। शैली को सजाना-सँवारना कविता के स्वरूप को निखारना है। गेटे तो यहाँ तक मानते हैं कि ”लेखक की शैली उसके मस्तिष्क की सच्ची अनुकृति है।“   

लेखक ने पारिभाषिक आधार पर भी कविता को समझने और समझाने का प्रयास किया है-

”कविता सबल भावनाओं का सतत और उच्छल प्रवाह है।“ 

”कविता कल्पना की सहायता से सत्य को आनन्द के साथ मिश्रित करने की कला है।“

”कविता विरह-वियोग से ही उत्पन्न होती है। उसमें दुःख, निराशा, हताशा जैसे भाव हों।“ (अर्थात् हमारे मधुरतम गीत वही हैं जो हमें हमारी दुःखतम कहानियाँ सुनाते हैं।)

ज्यों-ज्यों पुस्तक के पृष्ठ उलटती गई, पुस्तक गूढ़ और क्लिष्ट होती गई। लोकमत को, कविता के साथ जोड़ते हुए लेखक ने बहुत से ऐसे उदाहरण दिए हैं जिनसे जीवन-पथ पर चलने की कला सिखायी गई है-

साध मेरे सब बड़े अपनी अपनी ठौर,

शब्द विवेकी पारखी वो माथे के मौर !

कविता बन जाए। कविता कागज पर उतर कर आ जाए, यह एक बहुत बड़ा चमत्कार है। आदमी के जीवन में बेरोक-टोक अपनी जगह बना ले और हृदय में स्थान बना ले जाए, यही कविता की सफलता है।

समय आगे बढ़ता गया। समाज भी बदलता गया। कविता का स्वरूप भी बदलता गया। मानव-मन से जुड़ी कविताएँ अपना स्थान बनाने लगीं। सकारात्मक विचारों उत्साह, आशा और उमंग की रचनाओं ने समाज को बचाया। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, रामकुमार वर्मा, महादेवी वर्मा ने इस दिशा में अपनी लेखनी को एक नया मोड़ दिया।

‘कविता क्या है’ पुस्तक में लेखक ने बड़े ही जतन से क्रमवार परिस्थितियों का आकलन करते हुए कविता के विकास और उसमें होने वाले परिवर्तनों को अपने शब्दों में उकेरा है। लेखक ने नागार्जुन की दो पंक्तियों को उद्धृत किया है, यह वह समय था जब देश में इमरजेन्सी लागू की गई थी-

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊँ,

जन कवि हूँ मैं साफ कहूँगा क्यों हकलाऊँ ?

जब जब समय ऐसा आया या जरूरत हुई तो कवि ने शासन को, समाज को, पूँजीपतियों को झकझोरा है। परिणामतः समाज में परिवर्तन की लहर भी आई और कवि ने अपने दायित्व को बखूबी निभाया। 

बार-बार मन कहता है कि कविता भावनाओं, संवेदनाओं और मन की स्थिति का ही तालमेल है। तालमेल बिठा पाने में कवि कितना सफल हुआ है, इसका निर्णय पाठक करता है। कविता तो जन-मन को छू लेने को व्याकुल रहती है। कलम कितनी तीखी होकर कागज पर उतरती है, इसका फैसला करना कठिन है।

कविता क्या है ? रहस्य है ? कारीगरी है ? इन प्रश्नों का उत्तर लेखक ने ‘कविता क्या है’ में बखूबी बड़े अच्छे ढंग से दिया है-

‘अच्छी कविता को दैवीय प्रसाद मानते हैं।’

’काव्य जीवन और प्रकृति का अनुकरण है।’

‘कविता संगीतमय आलंकारिक कल्पना है।’

‘कविता सर्वोत्तम और सर्वाधिक प्रसन्न मन के सुखी क्षणों का लेखा है।’

‘कविता क्या है’ पुस्तक में लेखक ने कविता की वर्तमान दुसर््िथति के साथ-साथ कविता के कथ्य, गुणों, तत्त्वों, जान्मिक, मिथकीय, इतिहास, प्रचलित परिभाषाओं आदि की विस्तार से तर्कशील विवेचना की है। लेखक ने कविता के जान्मिक आधार को लेकर मिथकीय मान्यताओं को अभिनव स्वरूप में व्याख्यायित किया है। 

काव्य में सत्, शिव, सुन्दर के साथ-साथ ऋत् तत्त्व और नय तत्त्व, लोकसंग्रह और लोकहित जैसे तत्त्वों का समावेश आवश्यक बताते हुए लेखक द्वारा स्वयं अपनी ओर से कविता की एक नवीन परिभाषा भी प्रस्तुत की गई है। 

विदेशी कवियों के उदाहरण देकर इस पुस्तक के फलक को एनसाइक्लोपीडिया सदृश और अधिक विस्तार दिया है लेखक ने। इससे ‘कविता क्या है’ कविता का एनसाइक्लोपीडिया बन गई है। 

लेखक का यह प्रयास न केवल पुस्तक को पठनीय, संग्रहणीय बनाता है, साथ ही वह पाठकों के हृदय के करीब कविता को पहुँचाने में सफल भी है। विशेषकर विद्यार्थियों, शोधार्थियों के लिए परम उपयोगी है यह पुस्तक।  विजय रंजन जी को ऐसे सत् प्रयास के लिए साधुवाद एवं शुभकामनाएँ।

 - गोकरननाथ रोड, डालीगंज लखनऊ, दूरभाष: 09935638020,       

                  (अवध-अर्चना, मई-जुलाई 2016 में प्रकाशित।)

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 कविता के यथार्थ स्वरूप की अभिव्यक्ति है     
             ‘कविता क्या है

                           - डॉ॰ रामप्रसाद मिश्र

नितान्तनिर्मलस्वान्त्र गुणगणसविशेषकान्त प्राच्यपाश्चात्यशिक्षाविद् श्री विजय रंजन अभिवादनीय विद्वान् हैं। आपके ग्रन्थ ‘कविता क्या है’ को मनोयोगपूर्वक सम्पूर्णतयानैकशः पढ़ने के बाद मुझे प्रतीत हुआ है कि यह ग्रन्थ साहित्य-चिन्तक, काव्य-मर्मज्ञ, कविजन तथा काव्य के कुशल अध्येताओं के लिए रुचिकर, संग्राह्य और पठनीय है। इस ग्रंथ से कविता का यथार्थ स्वरूप अभिव्यक्त होता है। 

ग्रन्थ का पूर्वार्चिक नामक पूर्वभाग तथा उत्तरार्चिक संज्ञक उत्तर भाग भी युक्तियुक्त है। पूर्वभाग में विभिन्न दृष्टिकोण उपशीर्षकों में बाँटते हुए तदनुरूप विचार प्रस्तुत हुए हैं तथा उत्तरभाग में काव्यज्ञ लोकमत उपनिबद्ध है। ग्रन्थकार श्री रंजन जी ने कितना श्रम किया होगा इस ग्रन्थ को पूर्णता प्रदान करने हेतु इसे विद्वत्जन ही ग्रन्थाध्ययन द्वारा जान सकते हैं।विद्यार्जन का परिश्रम विद्वान् ही जान सकता है। वन्ध्या स्त्री प्रसवपीड़ा क्या जानेगी-  नेव विजानाति विद्वज्जन परिश्रमम्। न हि वन्ध्या विजानाति गुर्वी प्रसववेदनाम्।।

तुलसीदास भी कहते हैं कि ‘बाँझ कि जानै प्रसव कै पीरा।’

भारत तथा विदेशी विद्वानों के विपुल उदाहरण ग्रन्थ में अनुस्यूत हैं। संस्कृत, हिन्दी, उर्दू , अंग्रेजी तथा अन्य अनेक भाषाओं के विद्वानों, काव्यशास्त्रकार आचार्यों, समाजशास्त्रियों, राजनेताओं, कविजनों, कथाकारों, उपन्यासकारों के तथा आर्ष वाङ्मय वेद, उपनिषद् के भी सारगर्भ कथनों को ग्रन्थ में स्थान दिया गया है। भरत, वात्स्यायन आदि विश्व-चर्चित विद्वानों के कथन के साथ असद जैदी, मराठी कवि कुसुमाग्रज, उड़िया कवि हृषिकेश मल्लिक, ग्रीक कवि गार्जियस और हैसिओड के साथ ही प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि होमर, जार्ज इलियट आदि ही नहीं विश्वविख्यात चिन्तक प्लेटो, अरस्तू, रोमन विचारक क्विंटिलियन, इटली के ट्रिसोमो भी इस ग्रन्थ में सहेजे गए हैं। धार्मिक आदर्शवादी मिल्टन का अनुभव दर्शाया गया है। प्रख्यात नाटककार शेक्सपीयर, श्रेष्ठ कवि वर्ड्सवर्थ, इलियट, काण्ट, शोपेनहावर आदि ही नहीं कार्लमार्क्स टालस्टॉय, गोर्की और यहाँ तक कि नेपोलियन जैसे योद्धा का काव्य-प्रेम तथा काव्य-स्वरूप भी इस ग्रंथ में उन्हीं की शब्दावली में प्रदर्शित है। इस प्रसंग में यह संदेह समीचीन लगता है कि रंजन जी को ऐसे उद्धरणों को अपने ग्रन्थ में स्थान नहीं देना चाहिए था जो काव्य और काव्य-सृष्टा को निर्बल मानता है। मेरे संज्ञान में ऐसा एक उद्धरण उपन्यासकार फ्रेंच काफ्का का इस ग्रन्थ के २४४वें पृष्ठ में है। कवि को औसत आदमी से भी हीन और कमजोर कहा गया है। कविता को चीख बताया गया है, कला को यातना माना गया है। कवि को अपने अस्तित्व के पिंजड़े में बन्द परकटा पक्षी कहा गया है। इस कथन में सारगर्भता खोजना बाल में खाल निकालना है।

                                                           कविता क्या है  ?

काल के प्रवाह में अनुभूयमान जगत्-जलधि की ऊर्मियों में ऊपर-नीचे निमज्जन करते दुःखरूप जगत् को सुखरूप मानने वाले भ्रान्त जनों को जगत् का तात्त्विक बोध कराने तथा दुःख मंे भी, सुख में भी, सुख का अनुभव कराने वाली कविता पुरुषार्थचतुष्टय और सत् का समाश्रय देकर, असत् का वर्जन कर, शिवेतर की क्षतिपूर्वक शिव से अध्येता को संयुक्त करती है। यह अन्तर्व्योम में दृष्टिगोचर अज्ञान-तिमिर तथा चंचलतारूप विद्युत का शमन कर ज्ञानसूर्यालोक को प्रकाशित करती है। 

कविता अविद्याजन्य भ्रान्ति दूर कर शाश्वती शान्तिदायिनी है। तभी कविता के आनन्द को पारखियों ने ब्रह्मानन्द सहोदर कहा है। यह संसार सर्वथा नीरस होकर अज्ञानान्ध्कार में डूब जाता, यदि काव्य-ज्योति का सुरम्यालोक जगत् को प्राप्त न होता-

  इदमन्घं तमः कृत्स्न जायेत भुवनत्रयम्।

यदि शब्दात्ह्यं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।।

कविता का यही महत्त्व जान कर कहा जाता है कि जो काव्य में है, वहीं अन्यत्र कहा गया है और जो काव्य में नहीं है, वह अन्यत्र भी नहीं है-            यदि हास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति नतत्क्वचित्।

आज व्यक्ति का जीवन अशान्त है। जीवन-संघर्ष दिनानुदिन बढ़ रहा है। लगता है कि मनुष्य की सारी दौड़ भौतिक समृद्धि के लिए समर्पित हो गई है। धन-वैभव का महत्त्व बढ़ गया है। नैतिकता के मूल्य क्षीण हो रहे हैं। सादगी का सौन्दर्य और गरिमा, जीवन-संघर्ष का आनन्द समता का आस्वाद, आस्था का आनन्द कम हो रहा है। वैचारिकी हीनता अशान्ति की प्रसव-भूमि है। अशान्ति समुत्पन्न होकर पल्लवित पुष्पित हो रही है। कविता वैचारिक अशान्ति को दूर कर देती है। नैतिकता को संजोए रखने वाली कविता आज भी समाज की मार्गदर्शिका है। वह मानव को सदाचरण से सुरभित करती है, विश्व-व्यवस्था का परिज्ञान करा कर स्वात्मावलोकन का मार्ग प्रशस्त करती है। 

संसार की वास्तविकता को समझ लेने पर दुराग्रह-पूर्वाग्रह स्वतः विसर्जित हो जाते हैं, अविद्या का अंधकार तिरोहित हो जाता है, जीवन को उचित दिशा मिल जाती है, जीवन तनाव-मुक्ति प्राप्त कर लेता है, सौम्य भावना का पल्लवन होता है और इन सभी का तात्त्विक अवबोध कविता से प्राप्तव्य है। 

कविता का आनन्द लेने वाला पाठक/श्रोता तथा कवि, अथ से इति तक कर्मठ, निश्छल, निर्लेप रहता है। साथ ही वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन में उत्पन्न असाध्य विकृतियों को भरसक दूर करने के लिए सचेष्ट रहता है। 

मानव-जीवन एक शक्तिशाली प्रवाह है। मन, वाणी और शरीर हमारी शक्तियाँ हैं। जैसे मानव ने विवेक से जलप्रवाह, वायु, विद्युत को नियन्त्रित कर उसे उचित प्रवाह दिया है। उसी प्रकार कविता के माध्यम से हम मानव की तीनों शक्तियों को उचित धारा देकर मानवता को नष्ट होने से बचा सकते हैं-

यह कविता बता रही है कि इन्द्रियसंयम सम्पत्ति का और असंयम विपत्ति का मार्ग है। मानव-शक्ति का दुरुपयोग करने वाला मानव ‘पुच्छविषाणहीन नर पशु’ कहा गया है। अंत में श्री विजय रंजन जी की ‘कविता क्या है’ नाम्नी लोकहितकारी ग्रन्थ के स्वोपज्ञ प्रणयन हेतु भूयशः साधुवाद प्रदान करते हुए रंजन जी की स्वास्थ्ययुक्त दीर्घायु की कामना श्री राम प्रभु की सन्निधि में करके लघु कलेवर आलेख उपसंहृत कर रहा हूँ। महाकवि पीयूष वर्ष जयदेव द्वारा कृत काव्य प्रशंसा यहाँ अवधेय है-

उच्चैरस्यति मन्दतां रसतां जाग्रत् कलैङ्करव।

ध्वसं हस्तयते च या सुमनसामुल्लासिनी मानसे।।

दुष्टोद्यन्मदनाशनार्चिरमला लोकत्रयीदर्शिका।

सानेत्रत्रियतीत खण्डपरशोर्सग्देवता दीव्यतु।।

भगवान् शिव की नेत्रत्रयी के समान सारवती कविता से भाषित सरस्वती विज्ञ जनों के मुख में शोभित हो, तो कविता मूर्खता, नीरसता तथा आलस्य दूर करती है, सहृदय काव्यज्ञों के अन्तःकरण को प्रफुल्लित करती है, दुष्टगर्व को दूर करती है, त्रैलोक्य को प्रदर्शित करती है। तद्वत् शिवनेत्र सूर्य-चन्द्र अग्निरूप हैं जिनसे कमल-कैरव का विकास और काम का नाश होता है। 

(चन्द्रकान्तमणिवत् स्वच्छ, ज्ञानशील, सहृदय काव्यविज्ञ आप काव्य में नव रसों की वृद्धि करें। अरे ओ विचारशून्य कविते ! तू तो स्वेच्छाचारिणी है, तू मेरे पास मत आना। ) व्यंजनाप्रधान, अनुप्रास, श्लेष, पूर्णोपमा माधुर्यगुण तथा शान्तरसवती यह श्लोक रचना उत्तम काव्य है।                                                 

  - उत्तर तोताद्रि मठ, अयोध्या,   दूरभाष: 7275661599, 8840981199

                         (अवध-अर्चना, अंक 98 में प्रकाशित।) 

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 कविता-विकास की सफल यात्रा कविता क्या है

                                  - अजिता त्रिपाठी

परिवर्तन मनुष्य जीवन का सत्य है, अतः कविता भी पल-पल परिवर्तित होती रहती है। मनुष्य और कविता का सम्बन्ध जीवन और जल जैसा अटूट है। मानव-विकास की तरह कविता-विकास का भी अपना एक इतिहास है। इसी विषय को केन्द्र में रख कर काव्यशास्त्रीय कृति ‘कविता क्या है’ की रचना की गई है। इसके माध्यम से कृतिकार विजय रंजन ने कविता के जन्म से लेकर विकास तक की यात्रा को एक सफल यात्री की तरह तय किया है। इस यात्रा में अनेक कठिनाईयाँ आई हैं जिसे लेखक ने हमारे समक्ष रखा है और शोधार्थी की तरह उसका समाधान भी प्रस्तुत किया है।

कृति के पूर्वार्चिक भाग में काव्य को मिथकीय आधार पर परखते हुए लेखक ने कहा है- ”मेरे विचार से तद्गत मिथकीय सत्त्वापेक्षा से मात्र इतना अभीप्सित है कि लोक-कल्याण, लोक-संग्रह, सात्विक जीवन राग, ऋत आदि की जिस रचनाधर्र्मी मूल भावना से काव्य निःसृत हुए थे, उसी अनुभाव से सहयुजित रखा जाए काव्य/कविता को।“ (कविता क्या है,पृ॰ 49) 

मिथकीय आधारों पर माना जाता है कि कविता के उत्स के लिए माँ सरस्वती की कृपा आवश्यक है क्योंकि माँ सरस्वती समस्त कलाओं की अधिष्ठात्री देवी हैं। निराला भी माँ सरस्वती से यह वरदान माँगते हैं-

           “ नव गति, नव लय, ताल, छन्द नव

             नवल कण्ठ, नव जलद-मन्द्र रव, 

            नव नभ के नव विहग वृन्द को

                  नव पर, नव स्वर दे।

                                 वर दे, वीणावादिनी वर दे। ” 

कविता का इतिहास बहुत पुराना है। हिन्दी कविता उसी प्राचीन इतिहास का एक अंग रही है। इतिहास के स्वरूप के साथ-साथ कविता भी अपना रूप बदलती रही है। कविता के माध्यम से हम तत्कालीन इतिहास को जान सकते हैं। कृति में ‘कविता: ऐतिहासिक आधारों पर’ अध्याय मे यही विवेचित है। लेखक ने दिखाया है कि किस तरह एक शिशु के जन्म से ही कविता का एक रूप लोरी उसे सुनाया जाता है। यहीं से हम कह सकते हैं कि एक शिशु में कविता का संस्कार भरा जाता है। कविता का इतिहास वेदों-पुराणो से होते हुए आज अपने नवीनतम रूप में लक्षित है। 

आधुनिक युग में मनुष्य कृत्रिमता की ओर बढ़ता जा रहा है तो स्वाभाविक ही कविता पर भी इसका असर देखने को मिलता है। आज मनुष्य व्यापार-क्रिया की ओर बढ़ रहा है। इस व्यापार के खेल में उसने कविता को भी नहीं छोड़ा, किन्तु मनुष्य को यह समझना होगा कि कविता के अंत के साथ ही उसका अंत भी निश्चित है। कविता का कार्य है मानवता को उद्भासित करना। मानवता को साथ लेकर चलने वाली कविता ही चिरकाल तक समाज में बनी रहेगी। समाज में रह कर ही कविता की सृष्टि की जा सकती है। 

आगामी दो अध्यायों में कविता-स्वभाव की विवेचना है। 

 ‘साधारणीकरण’ कविता का मुख्य स्वभाव है। साधारणीकरण ‘मैं’ और ‘पर’ के भाव को मिटा कर स्थिति के साथ अपनी साम्यता स्थापित करता है। साधारणीकरण के सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मानना है - ”यह सिद्धान्त घोषित करता है कि सच्चा कवि वही है जिसे लोक-हृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को देख सके। इसी लोक-हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है।“ (चिन्तामणि-भाग 1,‘साधारणीकरण और व्यक्ति-वैचित्र्यवाद’, पृ0 155) साधारणीकरण के अतिरिक्त अन्य काव्य-तत्त्वों को लेखक ने विस्तृत रूप में समझाया है। मेरे विचार से काव्य के प्रमुख तत्त्व ‘शब्द तत्त्व’, ‘अर्थ तत्त्व’, ‘भाव तत्त्व’, ‘बुद्धि (विचार) तत्त्व’, ‘कल्पना तत्त्व’, ‘शैली तत्त्व’ आदि हैं। ‘शब्द’ काव्य का शरीर है, ‘अर्थ’ काव्य रस है, ‘भाव’ आत्मा है, ‘बुद्धि’ सत्य और शिव का समन्वय है, ‘कल्पना’ सृष्टि है, तो ‘शैली’ अनुशासन है। इन तत्त्वों की विस्तृत विवेचना कृति में ‘कविता: तात्विक आधार’ अध्याय में हैं।

‘कविता: परिभाषिक आधार पर’ अध्याय में भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को रखते हुए लेखक ने अपना विचार भी रखा है जिसमें मेरी समझ से लेखक ने कविता की सम्पूर्ण विशेषताओं को समाहित करने का प्रयास किया है जो उल्लेखनीय है-- ” निर्दोष गुणों वाले शब्दों से संघटित, सुविचारों से सुसज्जित, सत्-शिव-सुन्दर की ऊर्ध्ववाही, ज्ञानशील, ऋतशील, नयशील, लोकमांगलीय आक्षरिक साधना और तद्गत पावन लोकसंग्रही रचना’ है, ‘साहित्य’ औ..र, ऐसे साहित्य की आह्लादकारी, भाव-प्रवण, कल्पनाशील, सहज, सरस अलंकृत लयात्मक विधा है कविता। “ (पृ॰ 262)

 कृति:‘कविता क्या है’ में लेखक ने अपने विचारों के साथ देश-विदेश के प्रसिद्ध काव्यज्ञों के विचारों को भी रखा है। इस दृष्टि से कृति के उत्तरार्चिक का अध्याय ‘कविता: काव्यज्ञ-लोकमत के आधार पर’ उल्लेखनीय है।

प्रस्तुत पुस्तक में कहीं कहीं भ्रमात्मक तथ्य भी हैं जो मेरे विचार से मुद्रण दोष हैं। इन मुद्रण दोषों को अगले संस्करण में दूर करने की आशा के साथ अन्त में मैं यह कहना चाहती हूँ कि ‘कविता क्या है’ से काव्य-अध्येता अवश्य ही प्रेरणा लेंगेे और अपनी काव्य-ऊर्जा को प्रज्ज्वलित कर साहित्य-सृजन में अग्रसर होंगे।

      - विश्वभारती, शान्ति-निकेतन, प॰ बंगाल-731235

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कविता के प्रारम्भ, विकास एवं आलोचना का अद्भुत सागर  

 ‘कविता क्या है

                                 - डॉ॰ ऊषा चौधरी   

‘कविता क्या है’ शीर्षक पुस्तक में लेखक श्री विजय रंजन जी ने आदिकाल से आधुनिक काल तक की कविताओं के प्रारम्भ, विकास एवं आलोचना का अद्भुत सागर उलीचा है। कविता को वास्तविक रूप में जानने के लिए देश-विदेश के विद्वानों एवं वैदिक काल से पूर्व की अवस्था वाले अर्द्धविकसित मानव (होमो हैबिलिस) से प्रबुद्ध मानव तक की कविता सम्बन्धी चर्चा का सम्पूर्ण इतिहास दिया है।

कविता को अनेक रूपों में परिभाषित करते हुए आज के दर्पण में, मिथकीय आधार पर, देवी सरस्वती के सहयुजन आधार पर ऐतिहासिक, स्वभाव, दैवीय देवत्वशील, तात्त्विक और पारिभाषिक आधार पर काव्य-सृजन को जाँचा, परखा और अनेक विद्वानों, कवियों तथा लोककथाओं के माध्यम से भी अपना मत प्रस्तुत किया। एक स्थान पर वे कहते हैं- ”....... समाज से कविता का सरोकार इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, मनोविज्ञान आदि के सापेक्ष सर्वाधिक सबल है। कविता मनुष्य की पाशविक वृत्तियों को अंकुशित करके उसकी अपराध-वृत्ति को निरोधित करके उसे उदात्त बना कर पशु/अपराधी बनने से न केवल रोकती है वरन् सुमनस्् व्यक्ति को उच्चतर भावदशा प्रदान करके ‘बेहतर मनुष्य’ और समाज को ‘बेहतर मनुष्यों का समुदाय’ बनाती है।“

एक अन्य स्थान पर लेखक की शब्दावली का नमूना द्रष्टव्य है-

“हाँ, संदर्भगत काव्य-प्रलाभ की सम्यक् लब्धि के लिए कविता/साहित्य के संदर्भ में ..... निष्कर्षित परिभाषा और तद्गत ध्वनि-संकेतों को मध्यमा, परा, पश्यन्ती के साथ-साथ वैखरी में पांचजन्य-स्वर में मनसा-वाचा-कर्मणा सर्वस्वीकार्य मानना होगा कि-  ” निर्दोष गुणों वाले शब्दों से संघटित, सुविचारों से सुसज्जित, सत्-शिव-सुन्दर की ऊर्ध्ववाही, ज्ञानशील, ऋतशील, नयशील, लोकमांगलीय, आक्षरिक साधना और तद्गत पावन, लोकसंग्रही रचना है ‘साहित्य’ औ..र, ऐसे ‘साहित्य’ की आह्लादकारी, भाव-प्रवण, कल्पनाशील, सहज, सरस, अलंकृत, लयात्मक विधा है ‘कविता’।“.......कविता-साहित्य मात्र मनोरंजन, सौन्दर्यबोध या कि वैयक्तिक भावों की अभिव्यक्ति या स्वगत और/या समष्टिगत नकारात्मकताओं की अभिव्यक्ति या सतही संवेदना का प्रतिफलन नहीं है, प्रत्युत वस्तुनिष्ठ काव्य के गद्य-पद्य में (साहित्य के समस्त अपररूपों में) उसके अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय कोशों में मौलिक सद्गुण यथा ऊर्ध्ववाहिता, लोकोन्मुखता, परोन्मुखता, लोकमंगल, द-कारशीलता, नयशीलता, ऋतशीलता, सत्त्वशीलता, शिवशीलता, सार्वसुन्दरम्, ज्ञानशीलता आदि-इत्यादि समाहित होते हैं। ......काव्य में इतने सकारात्मक गुण रहते हुए भी, काव्य की उपेक्षा ! काव्य-विरोध ! काव्य-दुर्गति ! ....... प्रश्नगत उपेक्षा/विरोध/दुर्गति वस्तुतः दुर्बुद्धि की दुन्दुभि है !”

‘कविता क्या है’ मात्र एक पुस्तक नहीं है, अपितु मनीषी विजय रंजन जी द्वारा कविता पर लिखा गया शोध-ग्रन्थ है जिसमें अनेक कोणों से कविता को परखा गया है। अनेक लेखकों की चर्चा, अनेक काव्य-कृतियों की मीमांसा, अनेक उद्धरणों से विषय को विस्तार प्रदान किया गया है। 

पुस्तक की भाषा परिनिष्ठित और शैली बहुत अच्छी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक है। भावों के प्रकटीकरण में शब्दों की वाक्यावलियाँ अनुकरणीय हैं। लेखक का गहन अध्ययन उनकी विद्वत्ता की छाप छोड़ जाता है। इसके लिए लेखक को शत-शत बधाईयाँ। इस अमूल्य कृति के द्वारा विजय रंजन जी ने हिन्दी-साहित्य को समृद्ध किया है।...आपकी पुस्तक के लिए बहुत आभार। बहुत अच्छी कृति है। अपरिमित ज्ञानवर्धन हेतु इसे पुस्तकालयों में भी रहनी चाहिए। .... आशा है भविष्य में और कृतियों की सर्जना भी होती रहेगी।  

-सी 68, सेक्टर जे, अलीगंज, लखनऊ (उ॰प्र॰),  दूरभाष: 09839212429

                            (अवध-अर्चना, अंक 89 में प्रकाशित।) 

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                                 कविता का बहुआयामी विमर्श

                                            - डॉ॰ ब्रजेश 

“मेरी कुशल इसी में है कि कहूँ कविता मैं करता नहीं हूँ जरूर मुझे कविता कुछ कर देती है।”   - डॉ॰ रमेशचन्द्र शाह

“वैदिक मनीषी कविता को ’पुरू रूपम् द्यौरिव’ का उपक्रम मानते थे। उपनिषद् युग मंे तो सीधे-सीधे घोषित किया गया था--- छंदांसि यज्ञाः ........भूतम् भव्यम्..... सृजते’।-’कविता क्या है’ -विजय रंजन

यद्यपि इस उत्तर आधुनिक युग के पहले मनुष्य की शब्दमय कलात्मक अभिव्यक्ति के केन्द्र में ’कविता’ ही थी किन्तु आज का साइबरनेटिक समाज कविता को लेकर जितना तटस्थ है, उसमें कविता के बावत विजय रंजन की चिन्ताएँ जायज हैं। उनकी यह चिन्ता उनके गं्रथ ’कविता क्या है’ में देखी जा सकती है। इतिहास बोध से कटी हुई पीढ़ी ऐसी ही होगी, जिसके पाँव तले कोई जमीन नहीं होगी, क्योंकि इतिहास ’काल’ और ’स्मृति’ से विच्छिन्न नहीं होता है। फ्रेंच समाजशास्त्री बाद्रियाँ अपनी पुस्तक सिमुलेशंस (1973) में ठीक ही लिखते हैं- “आज के मॉस मीडिया समाज में जिधर देखो उधर प्रतिकृति (ैपउनसंजपवद) की प्रधानता है और प्रतिकृति या कार्बन कापी उन वस्तुओं की कापियाँ हैं, जिनकी कोई मूल कापी नहीं है।” विजय रंजन लिखते हैं-- “1940 का तारसप्तकी दशक हो या सन् 2000 के बाद का आर्थिक-सामाजिक तनावों वाला समय, स्थितियाँ-परिस्थितियाँ दिन-ब-दिन बोझिल और कष्टकर बनती जा रही हैं। .... तब कविता के प्रति सहृदय मनःस्थिति का अकाल दुःकाल तो दिखेगा ही। “ (कविता: आज के दर्पण में) 

यह दिलचस्प तथ्य है कि विजय रंजन ने कविता सम्बन्धी विमर्श के लिए अपने गं्रथ का शीर्षक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रसिद्ध निबंध ’कविता क्या है’ से उठाया। उस आचार्य शुक्ल के निबंध से जिन पर न संस्कृत का आतंक था न अंग्रेजी का, जिन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र से लेकर पाश्चात्य काव्यशास्त्र तक परम्परा का पूरा आदर करते हुए अपनी सहमति-असहमति व्यक्त करते हुए हिन्दी का अपना शास्त्र खड़ा किया। शुक्ल जी ने जब ’कविता क्या है’ लिखना शुरू किया तो उनका आशय उस कविता को परिभाषित करना नहीं था, जो कविता वेद, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथांे की विधा रही और जो ऐतरेय महीदास से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक सहस्त्राब्दियों तक गंभीर चिंतन का विषय रही। यह स्वतः प्रमाणित तथ्य बन चुका था कि कविता अपरिभाषेय है। लेकिन शुक्ल जी को इसका पूरा भान था कि ऐतिहासिक स्मृति से कटकर वर्तमान के किसी भी यथार्थ पर चिन्तन नहीं किया सकता है। फिर यह अकारण नहीं है कि वह कविता की परिभाषा भी करते हैं और तद्सम्बन्धी शास्त्र भी रचते हैं, कविता क्या है, काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था, साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद, रसात्मक बोध के विविध रूप, रस-मीमांसा से लेकर हिन्दी साहित्य का इतिहास तक। शुक्ल जी के इतिहास ग्रंथ में आधुनिक युग में गद्य के आविर्भाव के साथ-साथ यद्यपि उनका ध्यान काव्येतर विधाओं की तरफ भी जाता है, लेकिन कहना न होगा कि हिन्दी आलोचना के इस पहले प्रामाणिक गं्रथ के केन्द्र में ’कविता’ ही विद्यमान है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के भी आलोचना कर्म के केन्द्र में कविता की उपस्थिति देखी जा सकती है। डॉ. रामविलास शर्मा का पहला आलोचना ग्रंथ ही ’निराला की काव्य साधना रही’। मुक्तिबोध भी ’नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’, ’नई कविता का अत्म संघर्षं’, ’एक साहित्यिक की डायरी’ और ’कामायनी : एक पुनर्विचार’ जैसे गं्रथों के माध्यम से कविता पर ही विचार कर रहे थे। मुक्तिबोध की सभ्यता-समीक्षा की कसौटी पर खरे उतरते हुए डा0 रामविलास शर्मा और डॉ0 नामवर सिंह अपने चिंतन में गद्य की विधाओं और समाज, राजनीति, सभ्यता आदि को केन्द्रीयता देने के बावजूद कविता के कलात्मक सरोकारों पर लिखते रहे, गोया आधुनिक युग में गद्य की केन्द्रीयता के बावजूद रचना कर्म से लेकर पठन-पाठन और चिंतन में कविता की हनक कम नहीं हुई। 

सृजनात्मक गद्य की चलन आलोचना कर्म में भी देखी जा सकती है, आचार्य शुक्ल के ’हिन्दी साहित्य का इतिहास’ से लेकर डॉ॰ रामस्वरूप चतुर्वेदी के ’हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’ और निर्मल वर्मा के ’शताब्दी के ढलते वर्षो में’ तक और यहाँ तक कि डॉ॰ नामवर सिंह की वाचिक आलोचना में भी इस प्रकार का सृजनात्मक गद्य देखा जा सकता है-  “ लेकिन इस पुनर्जागरण काल में आकर लगा कि रूढ़ि ऐसी चीज है, जो जड़ है और त्याज्य है, इसके विपरीत परम्परा नाम की चीज ऐसी है जो ग्रहण करने योग्य हैं, ग्राह्य है। समूचा इतिहास, जिससे सम्बन्ध टूट गया था, उस इतिहास में चयन का सवाल उठा।” (परंपरा और मूल्यांकन का मार्क्सवादी पक्ष-आलोचना और विचारधारा)। डॉ॰ नामवर सिंह के बाद की बौद्धिक परम्परा में काव्य पर किसी ने मुकम्मल काम किया हो, ध्यान में नहीं आता, देवीशंकर अवस्थी और विजय कुमार कविता पर अपने छिट-पुट लेखों द्वारा जरूर ध्यान खींचते हैं। यद्यपि यथार्थवाद का ऐसा कोई इतिहास नहीं रहा है जो काल के अविच्छिन्न प्रवाह से दूर एक किनारे खड़े होकर वर्तमान पर चिन्तन करने की शिक्षा देता रहा हो। नृविज्ञानी लेविस्ट्रास तक ने अपनी कृतियों ’वर्ड’ (1945), ‘ऐन्थ्रोपॉलोजी स्ट्रक्चरल’ (1958) में मिथक और यथार्थ के बीच की कड़ियों पर विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की; गोया मानव जाति अपनी ऐतिहासिक स्मृति से विच्छिन्न होकर खंडित यथार्थ की ही बात कर सकता है। ऐसी स्थिति में ‘कविता क्या है‘ नामक अपनी कृति में विजय रंजन आश्वस्त करते हैं। उनका कविता-विमर्श महज एक आलोचक का निरा चिंतन नहीं लगता है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस आलोचक के अन्दर में जो कवि बैठा हुआ है वह बहुत सावधानी से सहत्राब्दियों की काव्य-परंपरा को खँगाल रहा है। इतिहास और वर्तमान के बीच उसकी आवाजाही सृजनात्मक संदर्भों का चयन करते हुए उन्हे एक ‘कोश‘ की शक्ल देना चाहता है। यह बात दूसरी है कि शास्त्रीय शब्दों की बोझिलता से उनकी कृति ’कविता क्या है’ की भाषा में गद्य की वह रवानगी नहीं है जो आचार्य शुक्ल से लेकर विजय कुमार तक कविता के विमर्शकारांे में दिखाई पड़ती है। लेविस्त्रास के हवाले विजय रंजन लिखते हैं- “ कविता का अनुशीलन प्रथमतः तर्कणा के विपरीत मिथकीय आधारों पर अपरिहार्य है।” (कविता : मिथकीय आधार पर)

आदि कविता ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं गमः शाश्वती समाः’ के संबध में वह लिखते हैं- “यह शाप एक विशिष्ट निहितार्थ को मुखर करता है- अधर्म के शमन की उद्भावना।” जिसे आचार्य शुक्ल कहते हैं-- कविता मनुष्यता की उच्चभूमि पर ले जाती है, ‘मनुष्यता की उच्चभूमि और लोकमंगल की साधना’ में ही ‘अधर्म का शमन‘ निहित है। विजय रंजन ने भरत मुनि के ’नाट्यशास्त्र’, राजशेखर की कृति ’काव्य-मीमांसा’ और शारदातनय की कृति ‘भावप्रकाशम्‘ से संबंधित मिथकों का भी विस्तार से उल्लेख किया है, ऐसा करके प्रकारान्तर से वह कविता के मिथकीय सौन्दर्यशास्त्र की तरफ ध्यान आकृष्ट करते हैं। ‘नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र‘ और ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष‘ जैसी पुस्तक लिखने वाले मुक्तिबोध कविता को जितने विस्तृत व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक कैनन पर जाँच-परख रहे थे, वही मुक्तिबोध ‘एक साहित्यिक की डायरी‘ में लिखते हैं-- “हिंदी में मन से बाह्य वस्तु को ही वस्तु समझा जाता है, मैं कहता हूँ, कि मन का तत्व भी एक वस्तु है, जिसके साथ तादात्म्यता नहीं, तटस्थता की कल्पना की जा सकती है।” उनकी ‘कला के तीन क्षणों‘ की बात करें तो स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति-मन से लेकर समूह-मन तक के यथार्थ और उसकी सौन्दर्यगत सम्भावनाओं के प्रति मुक्तिबोध काफी सजग थे। वस्तुतः ‘हृदय की मुक्ति की साधना‘ और ’मनुष्य की सामाजिक मुक्ति’ संबंधी सोच में कोई अन्तर नहीं है। जब विजय रंजन कहते हैं- “ ऐसी कविता ही सतत भावदशा प्रदायी होकर मानव के व्यष्टि-समष्टि के अन्नमय से लेकर विज्ञानमय अभिकोशों तक को ब्रह्मा, शिव एवं देवी सरस्वती के सद्गुणों से भरपूर आप्लावित करने में समर्थ सिद्ध होगी।” तो इसमें मनुष्य की सामाजिक मुक्ति की बात स्वतः आ जाती है। 

विजय रंजन प्लेटो के अनुकरण सिद्धांत का खंडन करते हैं, वह प्रश्न उठाते हैं - “ कविता अनुकरण है या  निर्माण ? ” (कविता: स्वभाव के आधार पर)। उनके अनुसार आर्ष मनीषा सामान्यतया कविता को अनुकरण नहीं मानती है। वस्तुतः विजय रंजन अनुकरण का अभिधार्थ ही ग्रहण करते हैं, उसमें निहित वास्तविक आशय पर उनका ध्यान नहीं जाता है, जहाँ तक आर्ष मनीषा की मान्यता का सवाल है, ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद का एकमात्र उपलब्ध ब्राह्मण है, जिसके प्रणेता एतरेय महीदास हैं। यह एक हजार ई0 पू0 से भी पहले की रचना मानी जाती है, ऐतरेय समस्त कलाओं या शिल्प को दो प्रकार का मानते हैं- 1. देव शिल्प  2. मानुष शिल्प। वह स्पष्ट लिखते हैं -  “देव शिल्प की अनुकृति मानुष शिल्प है, जिसमें कविता भी एक है। (एतेषां देवशिल्पानामनुकृतीह शिल्पमधिगम्यते -- ऐतरेय ब्राह्मण 30/1 भाग 3)”

ऐतरेय की यह व्याख्या भरतमुनि से लेकर अभिनवगुप्त तक में देखी जा सकती है। अनुकृति या अनुकरण का संबंध महज कारयित्री प्रतिभा से है, सृष्टि के नाना कार्य-व्यापारों का अनुुभव प्राप्त करने से है, भावयित्री प्रतिभा तो मौलिक सृजन करती ही चलती है। कवि औरों से इसी मायने में भिन्न होते हैं कि उनमें भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा एक ही सिक्के दो पहलू के रूप में विद्यमान हैं, गोया यह उनके स्वभाव में निहित होता है। 

विजय रंजन को कविता में निहित ऋत, सत्, शिव, सुन्दर, लोकसंग्रह और तमस् का निषेध कविता के स्वभाव के रूप में दिखता है, ये वही तत्व हैं जिनकी अनिवार उपस्थिति एतेरेय से कहलवा लेती है - “ वाग्वै समुद्रः। न वै वाक् क्षीयते। न समुद्रः क्षीयते। ” (अर्थात वाणी समुद्र के समान है जो कभी क्षीण नहीं पड़ती है। -- ऐतरेय ब्राह्मण 23/1 भाग 2) लोकसंग्रह और लोकमंगल की साधना के बिना कविता नहीं बनती है। भरतमुनि कहते हैं कि रस कविता में अकेला नहीं आता है, उसके साथ अन्य रस खिंचे चले आते हैं। यहीं वह ’रस विमर्श’ की अवधारणा देते हैं, जिसका आशय ही यही है- “ कविता या कला सपाट न होकर जीवन के सर्वांगीण रूप की अभिव्यक्ति करे।” अनेक कवियों और चिन्तकों की परम्परा के सम्यक् अवगाहन के पश्चात् विजय रंजन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आत्म परिष्कार के साथ-साथ समष्टि-परिष्कार कविता का स्वभाव है। ” संस्कार और परिष्कार में मामूली व्याकरणिक भेद है। संस्कार से ही संस्कृति शब्द आया। साहित्यकारों के यहाँ संस्कृति चिन्तन तो बहुत पुराना है। ऐतरेय महीदास को इसका पहला श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने संस्कृति की अवधारणा कला, शिल्प, कविता से जोड़ी। (भारतीय काव्यशास्त्र की आचार्य परम्परा-डॉ॰ राधावल्लभ त्रिपाठी)-“ आत्म संस्कृतिः वा शिल्पानि, छंदोमयं वा। ” (ऐतरेय ब्राह्मण 6/27, 30/1 भाग-3)

टी॰ एस॰ इलियट नई समीक्षा के प्रमुख सिद्धांतकारों में से एक थे, वह जितने बड़े आलोचक थे, उतने ही बड़े कवि भी थे। 1922 में उनकी प्रसिद्ध काव्यकृति ’द वेस्ट लैंड’ प्रकाशित हुई। इसमें वह योरोपीय सांस्कृतिक संकट का चित्रण करते हैं और यह सामान्य चित्रण नहीं है। कास्मोपॉलिटन कल्चर का गढ़ यूरोप अपनी औपनिवेशिक संस्कृति के परिणाम से विश्वयुद्ध का जो विनाशकारी प्रभाव झेल रहा था, उसमें कवि को लगता है यूरोप बंजर भूमि बनता जा रहा है। सब कुछ खंडहर में तब्दील होता जा रहा है, कारण कि योरोपीय मनीषा में सांस्कृतिक चिन्तन का अभाव है। सांस्कृतिक चिन्तन में एकदेशीयता ओर कालबद्धता नहीं होती है। इसलिए ’द वेस्ट लैंड’ में वह बौद्ध और वेदान्त संस्कृति का सहारा लेते हैं। यह बात दूसरी है कि 1927 में वही इलियट एंग्लिकन चर्च के सदस्य बन गए और ईसाई संस्कृति में ही परिष्कार के प्रश्नों से जूझने लगे।

प्रयोगवाद से कविता में बुद्धिवाद का दौर शुरू हुआ, छायावादी भावुकता से बचने की कवायद शुरू हुई, बावजूद इसके प्रयोगवाद से लेकर नई कविता आंदोलन के कवियों में कविता रचने के लिए पर्याप्त सौन्दर्यबोध मौजूद रहा। समाज और प्रकृति की नाना छवियों के रागात्मक चित्र उकेरने की क्षमता उसमें मौजूद थी। वे जानते थे, चाहे वे रस को नकारें या अलंकार को, धरती की सोंधी वास को वे नहीं छोड़ सकते। प्रकृति के साहचर्य में रूप रंग-रस-गंध का जो इन्द्रियबोध उन्हें प्राप्त होता है, उसे वे नहीं नकार सकते हैं। अनगिनत बिम्बों और प्रतीकों में ढली मानव-मन की रागात्मक स्मृतियों को वे नहीं नकार सकते हैं। इसीलिए बावजूद इसके कि कविता अपने बहुविध ललित रूप-रंग के साथ गद्य के निकट होती जा रही थी, अपनी लयात्मकता, सृजनात्मक सौन्दर्य की उड़ानांे के साथ संजोए रखी। फिर यह अकारण नहीं है कि अज्ञेय, मुक्तिबोध से लेकर गिरिजा कुमार माथुर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, धर्मवीर भारती, त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह आदि कवियों के यहाँ कविता अपनी शानो-शौकत के साथ महफूज रही।

सामाजिक-राजनीतिक इंद्रियबोध को कविता में ठस्स वैचारिक रूप में ढालने की जद्दोजहद में कविता हाशिए पर चली गई। नई कविता के ही दौर में छायावादी भावुकता से दूर रहने का एक मुहावरा चलन में आ गया। सौन्दर्य बोध के प्रति एक नकारवादी रवैये का यह सांस्कृतिक कुपरिणाम होना ही था कि कविता में जिन-जिन तत्वों की सर्वाधिक जरूरत होती है, उनसे दूर जाकर तमाम लोग कविता का प्रतिरूप तैयार करने लगे। जो लोग कल्पना, सौन्दर्य, बिम्ब, छंद, लय, इंद्रियबोध आदि दृष्टियों से छायावादी प्रभाव नहीं छोड़ पाये थे उन्हें मुख्यधारा से अलग-थलग मान लिया गया। 

अंबेडकर नगर जनपद के मालीपुर के निकट सेठवा ग्राम में एक कवि सत्यनारायण द्विवेदी ’श्रीश’ हुए। उनका महज एक काव्य-संग्रह ’गीतिकल्प’ (137 गीतों का संग्रह) 1990 के आस-पास प्रकाशित हो पाया था। यह उन गीतों का संग्रह था जो वे 1950 के दशक से ही रचते आ रहे थे ’गीतिकल्प’ के गीत ऐसे हैं कि यदि रचनाकार का नाम हटा दिया जाए तो साहित्य के पाठक यही कहेंगे कि ये तो ‘निराला’ के गीत प्रतीत होते हैं। उन पर ‘निराला’ का इतना प्रभाव था-

बकुल-शिरीष तले

फागुन मिले गले

गले हुए वन से किसलय-

दल ढले-ढले निकले।

                       (‘गीतिकल्प’-सत्यनारायण द्विवेदी ’श्रीश’)

लेकिन इतनी ललित कविता लिखने वाले को कौन जानता है ? नई कविता के भी दौर में श्रीश जी जो निराला जैसा गीति रच रहे थे, यही उनका दोष माना गया। दूसरे, लोकप्रिय पत्रिकाओं में रचना का प्रकाशित न हो पाना। विजय रंजन, सत्यनारायण द्विवेदी श्रीश से परिचित रहे होेंगे।

आज का जो गद्यात्मक कविता का रूप है, उसमें भी जब स्त्री-सौन्दर्य और प्रेम का सघन चित्रण मिलता है, तो उसमें भावुकता, अतिकल्पनाशीलता, रीतिकालीन प्रभाव और जाने क्या-क्या दोष निकालकर उसे अच्छी कविता मानने से इनकार कर दिया जाता है। जब इस बात की जरूरत महसूस की जाने लगी है कि कविता में छंद की वापसी होनी चाहिए, कोरी गद्यात्मकता से कविता की लोकप्रियता घट रही है, तब यह सांस्कृतिक आलोचना का प्रश्न है कि कविता का कैनवास कैसा हो, एक कवि की सृजनात्मक तैयारी कैसी हो, उसमें वैयक्तिक रागात्मकता से लेकर प्रकृति के नाना क्षेत्रों के रूप-रंग-रस-गंध को कविता में ढालने की कल्पनाशीलता है या नहीं । इलियट इसीलिए ’ट्रेडीशन एण्ड टैलेंट’ की बात करता है। महज भावयित्री प्रतिभा का होना ही पर्याप्त नहीं है, परम्परा का अध्ययन है या नहीं ? यदि हम कविता के माध्यम से सामाजिक मुक्ति की तलाश करना चाहते हैं तो सामाजिक, राजनीतिक सरोकारों को सभ्यता के जिस परिप्रेक्ष्य में हम जांचना चाहते हैं उसके लिए पर्याप्त भावबोध है या नहीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि जिस साहित्य को हम सभ्यता-समीक्षा कहते हैं उसमें कविता की भूमिका किसी भी तरह कमतर नहीं है। बहुत से समकालीन कवि अशोक बाजपेई, अरूण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका, वीरेन डंगवाल, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई, लीलाधर जगूड़ी, कात्यायनी आदि बहुत अच्छा लिख रहे हैं। इसके बावजूद जैसे ज्ञानादेय के दौर से मोहभंग हुआ है, तमाम विचारकों के लिए वह पुनर्परीक्षा का विषय है, वैसे ही ज्ञानोदयी दौर की हमसफर कविता भी तमाम सांस्कृतिक प्रश्नों से घिर गई है।

साहित्य में सांस्कृतिक आलोचना आज एक अनुशासन ही है। ब्रिटेन में बर्मिंघम यूनिवर्सिटी में 1964 में ’सेन्टर फॉर कल्चरल स्टडीज’ की स्थापना हुई, जिसके पहले निदेशक बने रिचर्ड होगार्ट। सांस्कृतिक अध्ययन में स्टुअर्ट हॉल, होगार्ट, रेमंड विलियम्स, लीविस, ई0 पी0 थामसन आदि विद्वानों का प्रमुख योगदान रहा। ग्राम्शी का ’प्रिजन नोटबुक्स’ और एडवर्ड सईद का ’वेस्ट एंड द रेस्ट’, ’वी एंड द अदर’ सांस्कृतिक अध्ययन की प्रमुख पुस्तकंे हैं, हिन्दी में दिनकर ने बाकायदे गं्रथ ही लिखा-’संस्कृति के चार अध्याय’, लेकिन यह साहित्य की सांस्कृतिक आलोचना नहीं है, जहाँ-तहाँ साहित्य का संदर्भ जरूर आता है। सांस्कृतिक आलोचना की मुकम्मल पुस्तक कही जाएगी डॉ0 रामविलास शर्मा की पुस्तक ’भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’ (1999)।

 किन्तु जहाँ संस्कृति शब्द नहीं है वहाँ सांस्कृतिक आलोचना नहीं है, ऐसा सोचना बहुत बड़ी भूल होगी, वस्तुतः हिन्दी में सांस्कृतिक आलोचना सभ्यतालोचन में समाहित है, जो आचार्य शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर बहुत से आलोचकों के आलोचना-कर्म का विशिष्ट औजार रहा। आचार्य शुक्ल ने ’कविता क्या है’ में बहुत पहले ही इस बात की घोषणा कर दी थी-- “ ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।”

विभिन्न देशी-विदेशी विद्वानों के मतों की विवेचना करते हुए विजय रंजन की मूल चिन्ता सभ्यतागत है- 

’आज कविताओं की कद्र बहुत कम हो गई है, अच्छी लिखी भी कम जा रहीं, कम छप भी रहीं हैं, उनकी चर्चा भी बहुत कम हो रही है, गोया कविता का मेटानैरेटिव स्पेस घट रहा है, महावृत्तांतीय प्रभामंडल क्षीण हो रहा है और इसका सीधा सरोकार मनुष्य की बदली हुई प्रकृति से है।” (कविता क्या है) 

मैं अपनी कविता में यही बात कहूँ तो -

    यह पूरी सदी गद्य में मरेगी

    इसे कविता की जरूरत है

कविता नहीं होगी तो 

उजाड़ और जिन्दगी के बीच

फर्क कौन करेगा।

 -  ई-64 साउथ सिटी, लखनऊ-25, दूरभाष: 9452826656 

                             (अवध-अर्चना, अंक 90 में प्रकाशित।)

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 काव्यालोचना की नयी दृष्टि ‘कविता क्या है

                               - सुनील कुमार 

विजय रंजन कई वर्षों से साहित्य के लगभग सभी विधाओं में सक्रिय रहे हैं। पिछले दिनों इनकी पुस्तक ‘कविता क्या है’ मेरे हाथ लगी। पुस्तक में एक ऐसी ताकत है कि वह पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती है। यह पुस्तक केवल एक नहीं, कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इसकी विषयवस्तु पर विचार किया जाय तभी इसके महत्व को समझा जा सकता है। ‘कविता क्या है ?’ शीर्षक से रामचंद्र शुक्ल की भी कालजयी कृति है। हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम आचार्य शुक्ल ने कविता के गूढ़ एवं मार्मिक रहस्यों का उद्घाटन किया था। यह उद्घाटन इस हद तक फैला कि साहित्य के क्षेत्र में यह मील के पत्थर साबित हुआ। कविता के मर्म को उद्घाटित करने वाले आलेख साहित्य में मिल जाते हैं परंतु कविता के तात्विक विवेचन को लेकर लिखी गई मुकम्मल पुस्तकों का लगभग अभाव है। विजय रंजन की यह पुस्तक कविता के रहस्यों से पर्दा हटाकर पाठक को एक नई दिशा प्रदान करती है। आलोचना, कहानी और उनकी अन्य प्रकाशित पुस्तकों पर नजर दौड़ाई जाए तो यह जान पड़ता है कि कविता के तत्व और गूढ़ रहस्य सब जगह उनके साहित्य में विद्यमान हैं। 

लेखक की यह कृति दस अध्यायों की है। इन दस अध्यायों में लेखक ने कविता के पारिभाषिक तत्वों से लेकर कविता की नई परिभाषा तक का विशद विवेचन किया है। कविता को मिथक की कसौटी पर कसने के बाद लेखक ने कविता को वर्तमान परिदृश्य में भी परिभाषित किया है। वर्तमान समय की माँग के अनुसार कविता कहाँ आकर खड़ी होती है, और कविता के गुण-दोष की अभिव्यंजना इस पुस्तक में देखते ही बनती है। पुस्तक के आरंभ में पुस्तक तथा लेखक के प्रयासों की ओर इशारा करते हुये स्वप्निल श्रीवास्तव लिखते हैं ‘विजय रंजन की यह आलोचना कृति दस अध्यायों में विभक्त है। कृति में उन्होंने कविता का विवेचन कई कोणों से किया है। उनकी दृष्टि से कोई पक्ष ओझल नहीं हुआ है। इस व्याख्या में वह शास्त्रीय, मिथकीय, दैवीय, ऐतिहासिक, तात्विक एवं पारिभाषिक लक्ष्यों के द्वारा कविता के कई अवयवों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। इस विश्लेषण में वह भारतीय काव्य अवधारणाओं को ही नहीं अभिव्यक्त करते हैं बल्कि पश्चिमी विद्वानों और कवि गुरुओं के कविता-विषयक सिद्धांतों और विचारों से भी हमें परिचित कराते हैं। कविता की उत्पत्ति जैसे गूढ़ और जटिल विषय को वे अपनी दृष्टि से सहज बनाते हैं’ (‘कविता क्या है’, भूमिका से)।

 भला दैवीय या देवत्वशील भी काव्य-आलोचना का आधार हो सकता है क्या ? हिन्दी साहित्य में इस आधार को मानक बनाकर या          पुस्तकाध्याय के रूप में बहुत कम जगह ही देखने को मिलता है। इस जैसे विषय को भी विजय रंजन ने काफी सहजता से व्याख्यायित किया है। इनकी यही आदतें इन्हें सहजता का लेखक सिद्ध करती है। सहज लेखक या कवि वह होता है जो गूढ़ से गूढ़ रहस्यों एवं तथ्यों को भी काफी आसानी से एवं सरलता से बयाँ करे। यह गुण एवं माधुर्य लेखक को नैसर्गिक रूप में प्राप्त है। लेखक का यही गुण उसके आलोचनात्मक कृतियों में देखने को मिलता है। ‘कविता आज के दर्पण में’ अध्याय में लेखक लिखते हैं- “ वस्तुतः कविता स्वतः इतनी भाव-गरिम्न, महीम्न है कि जब तक श्रोता, पाठक, सहृदय, सुमनस न हो तब तक वह कविता का सम्यक् आस्वाद पा नहीं सकता। इसलिए जब-तब कविता-विरोध का हिन-हिन उचरता रहा है। ठोस भौतिक लब्धि की प्रधानता वाले आज के युग में सारस, सहज संप्रेषणीय और लोकप्रिय साहित्य विधा होने के बावजूद आज भावपूर्ण सद्भावपूर्ण कविता दुर्गत अवस्था में दिखती है। ” (कविता क्या है, विजय रंजन, पृ0 29)। आज कवित और कवियों की क्या दशा है उस ओर लेखक ने इस अध्याय में इंगित किया है। उन्होंने कवियों के बारे में भी लिखा है कि आज कविता को जिस तत्व की अपेक्षा होती है वह उसे नहीं मिल पाता है। कविता के दिनोंदिन होते ह्रास की पीड़ा को पुस्तक के इस अध्याय में बखूबी देखा जा सकता है। लेखक उस पीड़ा से आतंकित है जो कविता को प्रतिदिन नष्ट करती जा रही है। एक सजग लेखक के अन्तर्मन में इस पीड़ा का होना स्वाभाविक है।  

वर्तमान समय में कविता की स्थिति-परिस्थिति और उसकी विसंगतियों पर विस्तार से चर्चा कर लेखक ने सुधार की दिशा में एक लंबा कदम बढ़ाया है। जिस केंद्रीय कथ्य परिधि पर उनका लेखन क्रियाशील रहा है वह है प्रश्न और प्रश्न। ये प्रश्न निजी भी हैं और सार्वजनिक भी। साहित्य जब रचित हो जाता है तब वह सार्वजनिक हो जाता है। इस कृति के अध्ययन के दौरान यह पता चलता है कि लेखक साहित्य के ह्रास से इतने सजग हैं कि लगता है कभी वे समस्याओं के जाल में फँसे होते हैं, कभी मानसिक उद्वेलन से जुड़े होते हैं। लेखक इस पुस्तक की परिधि पर हर स्थिति में विचारशील दिखते हैं और कभी-कभी उनकी कशमकश की अभिव्यक्ति भावोद्रेक की जगह वक्तव्य, सुभाषित या परामर्श की शक्ल अख्तियार कर लेती है। इनके कृतित्व पर इनके नैतिक मन का पंछी हावी रहता है और वे भावालोड़न की लहरों में तैरने बजाय अठखेलियाँ करते दिखते हैं। 

आज हमारे समाज और साहित्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यथार्थ के ऊपर लेखक की पकड़। इसी कारण आज साहित्यिक विधाएँ यथार्थ से कोसों दूर होती जा रही है। लेखक ने इसी कमजोरी को पहचाना है और उस पर गंभीरता से विचार किया है। इन यथार्थ को तात्विक रूप में विवेचित कर उसे साहित्य जगत् में स्थापित करना कोई इनसे सीखे। लेखक लिखते हैं-- “ हिन्दी जगत में 1990 के आसपास ‘समकालीन कविता’ के नाम से प्रत्युत ‘नई कविता’ के युग से नया हुमहुमा भरने वाले अधुना कवियों ने छंद, लय, रस आदि को लगभग नकार दिया और वे काव्य में मात्र ‘संवेदना’ पर बल देने लगे। तथ्यतः प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता और जनवाद की कविताओं के युग से संवेदना काव्य का तत्व यहाँ माना जाता है। इसी प्रकार संवेदना को भी कवि का आवश्यक अंग माना जाने लगा। यह संवेदना स्वतः भाव तत्व का और मूलतः सद्विचार रूपी भाव का अपरूपी फलित है” (कविता क्या है, विजय रंजन, पृ0 111)। यह तो केवल एक उदाहरण मात्र है इस तरह के सैंकड़ों उदाहरण एवं तथ्य इस पुस्तक में भरे पड़े हैं जो काव्य के तत्वों पर विचारणार्थ सक्षम हैं। 

विजय रंजन की यह पुस्तक सिद्धांत और व्यवहार दोनों में खरी उतरती है। साहित्य में एक नए तरह की आलोचकीय भाषा और नए तेवर को अभिव्यक्त करती यह आलोचनात्मक पुस्तक अपने आप में अद्वितीय है। कुल मिलाकर यह कहा जाए तो ज्यादा सटीक होगा कि यह पुस्तक साहित्यिक लोकधर्मी चेतना का नया प्रतिमान है।                    

- हिन्दी विभाग, नेहू, शिलांग, मेघालय,   दूरभाष : 09402516681

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  समकालीन कविता का परिप्रेक्ष्य  :  ‘कविता क्या है’ 

                               - डॉ॰ नीतू शर्मा    

काव्य मानव-मन के भीतर स्नेह, माधुर्य और बौद्धिकता का विकास करके उसे सौन्दर्य-दृष्टि देता है। काव्य अपनी परिसीमा में जितना व्यापक है, उतना ही सूक्ष्म है। काव्य का  अस्तित्व जीवन से जुड़ा है और इसीलिए यह जीवन की भंगिमाओं की तरह विशाल एवं बहुआयामी है। काव्य और कविता के लिए भारतीय साहित्य में कोई ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यं’ कहता है, तो कोई ‘उक्ति का वैचित्र्य’ मानता है; कोई ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः’ कहता है, तो कोई उसे ‘कल्पनाप्रसूत’ बताता है। काव्य वस्तुतः हृदय से सबसे अधिक सम्बन्धित है अर्थात् यह अपने मूल रूप में अनुभूति की ही वस्तु है। जिसने हृदय पक्ष का स्पर्श प्राप्त कर लिया, वही सच्चा कवि बन गया।

‘कविता क्या है’ विजय रंजन की बहुचर्चित आलोचनात्मक कृति है जो कविता को ताजगी और मार्मिकता से आधुनिक पटल पर रखती है। यह कृति दस अध्यायों में विभक्त है। कृति में कविता का विवेचन कई कोणों से किया गया है। उनकी दृष्टि से कोई पक्ष ओझल नहीं हुआ है। इस व्याख्या में वे शास्त्रीय, मिथकीय, दैवीय, ऐतिहासिक, तात्त्विक एवं पारिभाषिक लक्षणों के द्वारा कविता के कई अवयवों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। इस विश्लेषण में वे भारतीय काव्य-अवधारणाओं को ही नहीं अभिव्यक्त करते बल्कि पश्चिमी विद्वानों और काव्य-गुरुओं के कविता विषयक सिद्धान्तों और विचारों से भी हमें परिचित कराते हैं। 

आलोच्य कृति ‘कविता क्या है’ के ‘पूर्वार्चिक’ और ‘उत्तरार्चिक’ प्रखण्डों में दस अध्यायों में यथा ‘कविता : आज के दर्पण में’, ‘कविता : मिथकीय आधार पर’, ‘कविता : देवी सरस्वती से सहयुजन के आधार पर’, ‘कविता : ऐतिहासिक आधार पर’, ‘कविता : स्वभाव के आधार पर’, ‘कविता : दैवीय या देवत्वशील’, ‘कविता : तात्त्विक आधार पर’, ‘कविता: पारिभाषिक आधार पर’, ‘कविता : काव्यज्ञ-लोकमत’ के आधार पर और ‘उपसंहार’ में सम्प्रस्तुत की गई है।

कवि या कलाकार अपने समय का अत्यन्त संवेदनशील मानव होता है। उसे देश-काल अपने पाश में बाँधने में असमर्थ सिद्ध होता है। ‘कविता : आज के दर्पण में’ शीर्षक में विजय रंजन का स्पष्ट मत है कि - “कविता समाजशील भी होती है और व्यक्ति को समाजोन्मुखी भी करती है। तथैव, अधुनातन भौतिक चाकचिक्य के युग में भी कविता से मानव-मन का जुड़ाव अद्यतन पूरी तरह टूट नहीं पाया है; कभी टूट पाएगा भी नहीं।” विरोधी परिस्थितियों के समक्ष भी कवि अपना हिमालयी व्यक्तित्व लेकर अडिग खड़ा रहता है। जैसे रात्रि का घोर अन्धकार सूर्योदय की आहट मात्र से सूर्य के आगमन से पूर्व ही कूच कर जाता है। वैसे ही मानव-हृदय/मन में काव्य भाव के भलीभाँति आगमन से पूर्व ही आशा के प्रकाश के आगमन की आहट मात्र से घोर निराशा का अन्धकार भी मानव-मन से कूच कर जाता है। कवि की कला सृष्टि की पुकार पर अतीत का विसर्जन कर देती है, युग को धर्म देती है, समय को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। लेखक ने प्रस्तुत अध्याय में वैदिक मनीषी के काव्य सम्बन्धी रूप, गुण, अलंकार, रस, छन्द, वक्रोक्ति-वैदग्ध्य आदि की चर्चा करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ0 नामवर सिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बाबू गुलाबराय, अज्ञेय आदि काव्यमनीषियों द्वारा अद्यतन कविता के विविध पक्षों को उजागर किया है। समग्र रूप में लेखक ने प्रस्तुत अध्याय में इस तथ्य की पुष्टि की है कि कविता की संरचना महज शब्दों का संयोजन नहीं होता, बल्कि यह शब्दों के सामर्थ्य को गहरे तक उकेरती और उजागर करती है। यह कवि के अन्तर्मन की वैचारिक अनुगूँज होती है, जिससे वह दूसरों को झंकृत करना चाहती है। लेखक का मत है कि - “त..द..पि, जीवन में प्रतिकूलताएँ कितनी भी सघन हों, कविता के दुःकाल पर मर्सिया गाने भर से काम नहीं चलेगा। हमें देखना होगा कि क्या विगत समय में कविता ने किसी न किसी रूप-स्वरूप में हमें कभी कोई शक्ति (चाहे न्यून ही सही) दी है मानव-जीवन की जटिलताओं/दुश्वारियों/बोझिल स्थितियों के बोझ को हल्का करने हेतु ? हमें सोचना चाहिए कि क्या कविता के कारण ही उत्पन्न हो रही हैं आज बोझिल जीवन-स्थितियाँ ? क्या आश्वित्ज के नरसंहार में ‘कविता’ की कोई भूमिका थी ? इन प्रश्नों के उत्तर यदि किंचित् भी कविता के पक्ष में हों तो, सोचना होगा कि क्यों उत्पन्न हो गई कविता-दुर्गति की वर्तमान स्थिति ?” इस रूप में समीक्ष्य कृति में लेखक की संघर्षशील चेतना और काव्य के उत्तरोत्तर विकास को समझने का अवसर मिलता है, जिसमें काव्य के यथार्थ की अभिव्यक्ति में लेखक की सहजता और तरल संवेदना गहरे तक घुली है।

‘कविता मिथकीय आधार पर’ शीर्षक में लेखक ने कविता के जन्मना संस्कार के सम्बन्ध में विभिन्न मत प्रस्तुत किए हैं। विजय रंजन का मत है कि - “ कविता का अनुशीलन प्रथमतः तर्कणा के विपरीत मिथकीय आधारों पर (।दजपसवहवे  डलजी के आधारों पर) अपरिहार्य है इसलिए भी कि कविता का जन्म उस प्रागैतिहासिक युग में हुआ जब होमोहैबिलिस (अर्द्धविकसित मानव) से होमोसैपियन्स (प्रबुद्ध मानव) बना था मानव और जब मानव-चेतना बौद्धिक विकास की डगर पर अग्रसर हो रही थी। उस कालखण्ड का क्रमवार ऐतिहासिक विवरण न उपलब्ध है और न ही पूरी तरह उपलब्ध हो सकता है; अतएव, कविता के जन्मकाल के तत्कालीन कारक-कारण, अवस्थिति-परिस्थिति के तार्किक विवरण लभ्य कर पाना सम्भव नहीं। कविता सम्बन्धी कुछ मिथक हैं जो कविता के उत्स और उसके जन्म, विकास आदि को सार्थक रूप में रूपायित करने में सक्षम हैं। ” 

तमसा के पावन तट पर आदि-कवि क्रौंच की वियोगजन्य पीड़ा को न सँभाल सका और उसके मुख से जो वाणी फूटी, वही समष्टि में कविता के नाम से अभिहित हुई। अस्तु , काव्य का स्रोत वेदना है, पीड़ा है, आह है, कराह है और है मधुर भावनाओं में डूबी अतीत की स्मृति जो कवि के हृदय में समय की पुकार पर उत्पन्न होकर समाज के चिरन्तन प्रश्नों का समाधान करती है। कविता के उद्भव और उसके मौलिक सद्गुणों पर सहज रूप से व्याख्यायित करते हुए विजय रंजन आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र में ‘कविरहस्य’ को इंगित करते हैं, जिसमें कविता- उत्पत्ति को शिव से तदन्तर ब्रह्मा से सम्बन्धित बताया गया है। संस्कृत आचार्यों के अतिरिक्त पाश्चात्य समीक्षकों यथा ए0बी0कीथ भी आचार्य भरत के मिथकीय आविर्भाव से सहमत दिखते हैं। कविता को मूलतः शिव एवं ब्रह्मा से सहसयुजित दर्शाने वाले मिथक भी प्रस्तुत अध्याय में विस्तार से वर्णित हुए हैं। 

कविता को देवी सरस्वती से सहयुजन के आधार पर विश्लेषित करते हुए लेखक ने लिखा है- “औ..र, देवी सरस्वती जिनसे शक्ति/प्रेरणा प्राप्त करके कविता विरचित होना बताया जाता है वे सुर-साधिका हैं और सुर की  अधिष्ठात्री भी। अतएव, देवी सरस्वती से सहयुजित कविता को भी ‘सुर’ (लय) से विमुख नहीं होना चाहिए। इसीलिए तुकान्त या अतुकान्त के साथ-साथ मुक्त छन्द में भी राग और लय से विच्युत नहीं होनी चाहिए कविता।” ‘रामायणम्’ में ‘सत्’ की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की प्रेरणा से आदि-श्लोक के आविर्भाव-प्रकथन का तथा आदि-श्लोक में अधर्म के शमनार्थ वधिक को शाप दिए जाने का प्रकथन भी है। भारतीयेतर जगत् में भी ‘कविता’ को देवी म्यूज, देवी इन्हेंदुआना, देवी बेंजाइतेन आदि की प्रेरणा से आविर्भूत माने जाने के मिथक हैं। इस रूप में यह अध्याय देवी सरस्वती पर आधारित कविता सम्बन्धी मिथकों का तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 

‘कविता : ऐतिहासिक आधार पर’ के अन्तर्गत विजय रंजन कविता के विस्तृत परिचय के रूप में व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध एवं उसके फलित की आलोचना करते है। उनका स्पष्ट मत है कि वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में वैचारिक विविधता एवं नवोन्मेषी भाषिक संरचना के साथ शैलीगत विशिष्टता आश्वस्तिकारक है। आलोच्य परिप्रेक्ष्य में कविता के इतिहास को प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद से लेकर संस्कृत आचार्य भरत, भामह, दण्डी, अभिनव गुप्त, भर्तृहरि से लेकर पश्चिम साहित्य में कविता के ऐतिहासिक आधार को विस्तृत रूप में व्याख्यायित किया है। लेखक ने कविता और काव्यशास्त्र के ज्ञात इतिहास से कविता, कवि, काव्यशास्त्र आदि के परम्परागत अर्थों से कविता-विन्यास आदि से कविता को सार्थक रूप से निरूपित किया है। इस रूप में कविता और काव्यशास्त्र के प्राचीनतम ज्ञान को उत्कृष्ट रूप से व्याख्यायित किया है।

‘कविता : स्वभाव के आधार पर’ विश्लेषित करते हुए विजय रंजन कविता के सार्वभौमिक अवयवों की विस्तार से चर्चा करते हैं। काव्य मानव-मन के भीतर स्नेह, माधुर्य और बौद्धिकता का विकास करके उसे सौन्दर्य-दृष्टि देता है। काव्य अपनी परिसीमा में जितना व्यापक है, उतना ही सूक्ष्म है। काव्य का अस्तित्व जीवन से जुड़ा है और इसीलिए यह जीवन की भंगिमाओं की तरह विशाल एवं बहुआयामी है। काव्य को एक निश्चित परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता। समय-पविर्तनशील है और हर युग का कवि या साहित्यकार अपने युग के आलोक में काव्य की परिभाषा निश्चित करता है। भारतीय साहित्य में कोई ‘वाक्यम् रसात्मकं कहता है तो कोई इसे ’उक्ति-वैचित्र्य’ मानता है। कोई रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः। कहता है तो कोई कल्पनाप्रसूत बताता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कविता को ‘जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिम्ब बताते हुए ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ कहा है। साथ ही प्रस्तुत अध्याय कई काव्यमनीषी, चिन्तक और विचारकों यथा तुलसीदास, कबीर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, बालमुकुन्द गुप्त से लेकर सुकरात, प्लेटो, मैक्डूगल आदि के विचारों का विश्लेषण करता है जिनसे संस्कृत और हिन्दी में कविता के स्वभावगत स्वरूप को विस्तार मिला है। विजय रंजन ने संस्कृत विद्वानों की परम्परा का अवगाहन करते हुए आधुनिक पद्वतियों के परिप्रेक्ष्य में काव्य-सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया है। 

‘कविता : दैवीय या देवत्वशील’, ‘कविता : तात्त्विक आधार पर’, ‘कविता: पारिभाषिक आधार पर’, ‘कविता : काव्यज्ञ-लोकमत के आधार पर’ अध्यायों में लेखक के काव्य-सिद्धान्त जीवन के  विविध भावों, विचारों और कल्पनाओं के पुंज हैं। जीवन के प्रति आस्था तथा तज्जन्य सम्पृक्त संस्कृति उनके काव्य का मूल है। उनकी दृष्टि में जीवन की व्यापक परिधि में साहित्य में समन्वय अपेक्षित है। सत्य-सौन्दर्य, शिव-सौन्दर्य, बुद्धि-हृदय, काव्य-दर्शन, आदर्श-यथार्थ, शाश्वत-सामयिक आदि कविता के विकासात्मक कल्याण हेतु अपेक्षित हैं। 

लेखक का स्पष्ट मत है कि साहित्य/कविता का शास्त्र उसका प्रमुख अंग होता है। ठीक उसी प्रकार भाषा का प्रमुख अंग उसका व्याकरण होता है। जिस भाषा का व्याकरण पक्ष जितना ही प्रौढ़ होगा, वह भाषा उतनी ही परिष्कृत और महान् मानी जाएगी। इसी प्रकार जिस कविता का शास्त्रीय पक्ष जितना अधिक विकसित एवं पूर्ण होता है, वह कविता भी उतनी ही महान् होगी। हिन्दी काव्यशास्त्र का भवन संस्कृत काव्यशास्त्र की नींव पर आधारित है। रीतिकालीन कविता का महत्त्व इसलिए नहीं है कि उसमें नायक-नायिकाओं का सुन्दर चित्रण है अथवा कविता रसिकों का मनःप्रसादन करती है बल्कि इसलिए है कि रीतिकालीन कवियों ने संस्कृत की काव्यशास्त्रीय मान्यताओं को पहली बार हिन्दी में प्रस्तुत किया। ये एक प्रकार से संस्कृत काव्यशास्त्र का हिन्दी में पुनरुद्धार था।

हिन्दी साहित्य में काव्यशास्त्र के अनेक ग्रंथ रचे जा चुके हैं। ‘कविता क्या है’ भी इसी परम्परा की कड़ी है। इस पुस्तक में विजय रंजन का दृष्टिकोण संस्कृत, हिन्दी और पाश्चात्य साहित्य के प्रमुख कवियों, आलोचकों, लेखकों और विचारकों के काव्य-सिद्धान्त का सन्तुलित एवं वैज्ञानिक विवेचन रहा है। काव्य सम्बन्धी विभिन्न विचार सरणियाँ और आन्दोलन लेखक को प्रभावित करते रहतंे हैं और इनके आधार पर साहित्यमान और समीकरण बदलते रहते हैं। सम्पूर्ण काव्यशास्त्रीय चिन्तन इन्हीं विचारसरणियों और आन्दोलनों का एक क्रमिक विकास है। कवियों के शास्त्रीय पक्ष पर विचार करते समय राष्ट्र के जनजीवन में उदित होने वाली विचारधाराओं और आन्दोलनों का विस्तृत विवेचन एवं इस विवेचन का शास्त्रीय पक्ष का विवेचन भी अपेक्षित होता है क्योंकि बिना उसको समझे साहित्य के नए-नए रूपों और उसके विकासमान प्रतिमानों को समझना असम्भव है। 

कोई भी चिन्तनधारा एकाएक उदित नहीं होती। सामाजिक, सामयिक व्यवस्था के बीज उसके उदय होने के मूल में छिपे रहते हैं। सामाजिक विषमताएँ नए विचारों को जन्म देती है। पुराने विचारों का संशोधन करती हैं और यही संशोधित एवं परिवर्द्धित विचार साहित्यशास्त्र में अभिव्यक्त होने लगते हैं। इन्हें समझने के लिए साहित्यशास्त्रीय अध्ययन आवश्यक हो जाता है। यही विचारधारा इस पुस्तक के मूल में कार्यरत है। 

निष्कर्षतः विजय रंजन इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि- “कविता-साहित्य मात्र मनोरंजन सौन्दर्य- बोध या कि वैयक्तिक भावों की अभिव्यक्ति या स्वगत और समष्टिगत नकारात्मकताओं की अभिव्यक्ति या सतही संवेदना का प्रतिफलन नहीं है, प्रत्युत वस्तुनिष्ठ काव्य के गद्य-पद्य में उसके अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय कोशों में मौलिक सद्गुण तथा ऊर्ध्ववाहिता, लोकोन्मुखता, परोन्मुखता, लोकमंगल, द-कारशीलता, नयशीलता, ऋतशीलता, सत्त्वशीलता, शिवशीलता, सार्वसुन्दरम् ज्ञानशीलता इत्यादि समाहीत होते हैं।” 

‘कविता क्या है’ के सम्बन्ध में पुस्तक के प्राक्कथन में स्वप्निल श्रीवास्तव कहते हैं कि-   “ यह पुस्तक विजय रंजन की पूर्व पुस्तकों का विस्तार है। इसे पढ़ते हुए लगता है कि वे शास्त्रीय तत्त्वों को आज की कविता के लिए अनिवार्य मानते हैं। इस तथ्य की पुष्टि के लिए वे मिथकों और प्राचीन काव्यों से उदाहरण देते हैं। संभव है बहुत से लोगों की उनकी इस अवधारणा से असहमति हो लेकिन साहित्य का विमर्श सहमतियों और असहमतियों के बीच से निकलता है। कविता के मूल्यांकन के लिए सहिष्णुता को नजरंदाज नहीं नहीं किया जा सकता है। उनकी इस कृति से गुजरते हुए प्रारम्भ में एक बार ये लग सकता है कि वह पुराने समय में ठहरे हुए हैं और अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए साहित्य और शास्त्र का आलम्बन लेंते हैं,  लेकिन ऐसा नहीं है। इस पुस्तक के पूर्ण अवलोकन के बाद यह आरोप अपने आप निरस्त हो जाता है।” संक्षेप में ‘कविता क्या है’ पुस्तक का केवल शैक्षिक महत्त्व ही नहीं है बल्कि यह उन सुधी पाठकों के लिए भी परम उपयोगी है जो कविता के उद्गम स्थलों को जानना चाहते हैं।               

- एसोसिएट प्रोफेसर, आई॰टी॰ कालेज, लखनऊ, दूरभाष: 8299236874

                           (अवध-अर्चना, अंक 95 में प्रकाशित।)  

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वैचारिक मंथन की उदात्त परिणति 
           ‘कविता क्या है’

                        - डॉ॰ जयसिंह ‘नीरद’

‘कविता क्या है’ एक निरन्तरता में चला आने वाला यक्ष-प्रश्न है जिसका अन्तिम निर्णायक और सर्वस्वीकार्य उत्तर अब तक संभव नहीं हो सका है। इसका एक कारण हमारी अतिवादी मानसिकता में भी विद्यमान है। इसके महत्त्व-गायन की परम्परा इतनी अति व्याप्तिपूर्ण है कि फिर एक नया प्रश्न उभर कर सामने आता है कि कविता क्या नहीं है ? ‘अंध गज-न्याय’ से प्रेरित कविता की परिभाषाएँ विविध और बहुआयामी (कहीं-कहीं अन्तर्विरोधी भी) हैं कि कविता की समग्र अवधारणा आज भी दूर की कौड़ी प्रतीत होती है। फिर भी, जिस प्रकार परमसत्ता ईश्वर का स्वरूप-निर्धारण न हो पाने के बावजूद उसको परिभाषित करने के प्रयास निरन्तर किए जाते रहे हैं, उसी प्रकार कविता को परिभाषित करने के प्रयत्न होते रहे हैं और होते रहेंगे। इसी क्रम में भाई विजय रंजन की महत्त्वपूर्ण आलोचना-कृति (‘कविता क्या है’) मेरे सामने है जिस पर टिप्पणी करना मेरे लिए कविता की पड़ताल का एक दुर्लभ अवसर है।

विजय रंजन का साहित्य न केवल गुणवत्ता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है बल्कि अपनी बहुआयामिता और विविधता के कारण भी विशिष्ट है। वे केवल मर्म को छूने वाले एक संवेदनशील कवि और यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़े कवि-कहानीकार ही नहीं हैं, बल्कि ‘अवध -अर्चना’ नाम की जानी-पहचानी पत्रिका के स्वनामधन्य सम्पादक भी हैं। किन्तु उनकी साहित्य-साधना के मूल में कविता है जिसे वे रचते हैं, महसूस करते हैं और उसको तत्त्वतः और मूलतः जानने और समझने का प्रयास भी करते हैं। दरअसल कविता क्या है, उनके लिए कोई शास्त्रीय उपक्रम नहीं, बल्कि यह प्रश्न रक्त की तरह उनकी धमनियों में बहता है। कविता को उसकी समग्रता में रीझ-बूझ लेने की छटपटाहट उन्हें शास्त्र की परम्पराओं से लेकर अद्यतन अवधारणा-जगत् तक की यात्रा के लिए विवश करती है। उनकी यह कृति काव्य-चिन्तन का वह तीर्थ है जिसके घाट पर बैठ कर अवगाहन करते हुए आप कविता के सम्पूर्ण वैचारिक परिदृश्य का अन्तरंग साक्षात्कार कर सकते हैं।

ग्रंथ का विभाजन मुख्यतः दो खण्डों में किया गया है- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक के अन्तर्गत आठ आधारों पर कविता को समझने का प्रयास किया गया है। इन आधारों पर की गई लेखक की विवेचना को तब पूर्णता मिलती है जब उत्तरार्चिक के अन्तर्गत काव्यज्ञ लोकमत के आधार पर काव्य-मीमांसा कर ली जाती है। 

पूर्वार्चिक के अन्तर्गत ‘कविता: आज के दर्पण में’ आज के परिदृश्य को दृष्टि में रखते हुए कविता के  विरोधी पक्ष की चर्चा करते हुए लेखक ने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है-  ” भौतिकतावादी चाकचिक्य में इस देश के निवासियों की अर्थ-लिप्सा भी बलवती हो गई। यह दुष्प्रभाव 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के बाद भी आज तक इस रूप-स्वरूप में हावी है कि अन्यान्य सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों की तरह कविता-परिप्रेक्ष्य में भी हम पश्चिम का ही मुँह जोहते हैं “- (कविता क्या है, पृ0 31)। यही कारण है कि अपनी परम्पराओं से प्रायः पूर्णतः विच्छिन्न होकर हमारे आधुनिक युग के विद्वानों मंे अब तक कविता को लेकर कोई वस्तुनिष्ठ समझ विकसित नहीं हो सकी। 

तदन्तर लेखक ने कविता के मिथकीय आधार की चर्चा की है। आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि के जिस श्लोक से हम कविता का उद्भव मानते हैं, उसका तलस्पर्शी तर्कसंगत विश्लेषण करते हुए इस अभूतपूर्व मिथकीय परिघटना की विद्वत्तापूर्ण मीमांसा के अनन्तर लेखक द्वारा कविता और मिथक के अन्तर्सम्बन्ध को प्रामाणिक साक्ष्यों के साथ रेखांकित किया गया है। 

‘कविता: देवी सरस्वती के सहयुजन के आधार पर’ शीर्षक सतही तौर पर विचित्र प्रतीत हो सकता है, किन्तु वस्तुतः कविता की प्रेरक शक्ति के रूप में परम्परागत साक्ष्यों के आधार पर लेखक ने माना है कि-  

“ तथैव, देवी सरस्वती की सत्त्वशीलता, शिवशीलता, सुन्दरम्शीलता, ऋतशीलता, ज्ञानशीलता, शान्तिप्रियता, सहृदयता, दकारशीलता आदि गुणों से सम्पन्न होना ही चाहिए कविता को भी और तदनुसार कविता-रचनात्मकता को भी।” (‘कविता क्या है’, पृ॰ 55) 

‘कविता : ऐतिहासिक आधार पर’ शीर्षक के अन्तर्गत कविता के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की गम्भीर पड़ताल की गई है। यहाँ कविता के उöव और विकास को विद्वत्तापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। 

तदन्तर अध्याय में स्वभाव के आधार पर कविता की पारम्परिक सारगर्भिता के अनुरूप गम्भीरता से विवेचित किया गया है। 

एक अन्य अध्याय में तात्त्विक आधार पर कविता की मीमांसा करते हुए प्रायः काव्य के उन सभी आधारभूत तत्त्वों का मंथन किया गया है, जो किसी न किसी रूप में कविता को संघटित करते हैं।

‘कविता पारिभाषिक आधार पर’ शीर्षक के अन्तर्गत लेखक ने कविता की पारम्परिक परिभाषाओं की गम्भीर तलस्पर्शी विवेचना करते हुए कविता की अपनी परिभाषा इन शब्दों में प्रस्तुत की है-  “ निर्दोष गुणों वाले शब्दों से संघटित, सुविचारों से सुसज्जित, सत्-शिव-सुन्दर की ऊर्ध्ववाही, ज्ञानशील, ऋतशील, नयशील, लोकमांगलीय, आक्षरिक साधना और तद्गत पावन, लोकसंग्रही रचना है ‘साहित्य’ औ..र, ऐसे ‘साहित्य’ की आह्लादकारी, भाव-प्रवण, कल्पनाशील, सहज, सरस, अलंकृत, लयात्मक विधा है ‘कविता’। ” (‘कविता क्या है’, पृ॰ 164)

ग्रंथ के उत्तरार्चिक खण्ड के अन्तर्गत काव्यज्ञ और लोकमत के आधार पर कविता की परिभाषाओं के संग्रह के साथ-साथ उनकी तर्कसंगत समीक्षा भी प्रस्तुत की गई है। यहाँ उन कविता-विरोधियों की अवधारणाओं को प्रस्तुत कर उनका सशक्त प्रतिरोध किया गया है, जो येन-केन-प्रकारेण अपने नकारात्मक दृष्टिकोण से कविता के विराट् और उदात्त फलक को धूमिल और प्रदूषित करने पर तुले हैं। 

निश्चय ही ‘कविता क्या है’ विजय रंजन जी की विराट साहित्य-साधना का स्वाभाविक प्रतिफल है। हिन्दी में कविता को लेकर इतना गम्भीर, शास्त्रनिष्ठ चिन्तन कम से कम मेरे देखने में नहीं आया। यह कविता को उसकी अंतरंगता से समझने का भगीरथ प्रयास है। लेखक ने कविता को लेकर परम्परा के उत्तुंग शिखरों से लेकर आधुनिकता के रेगिस्तानों की जो श्रमसाध्य यात्रा की है, वह अद्भुत है। सचमुच, इस गौरव ग्रंथ की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। 

साहित्य का छोटा सा विद्यार्थी हूँ। कोशिश करने पर भी बड़बोलापन जाता नहीं। पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि कविता को जिया जा सकता है; महसूस किया जा सकता है किन्तु उसे किसी अन्तिम परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता। जैसे नदी के प्रवाह में जल अँजुरी में भर कर जब तक हम उसे समझने का प्रयास करते हैं तब तक प्रवाह में नया जल आ जाता है। हमें काल की नदी में कविता-जल के प्रवाह को बार-बार अँजुरी में भर कर उसे रीझना-बूझना होता है। 

मुझे लगता है कि प्रतिमान काव्य को नहीं गढ़ते, बल्कि काव्य बदलते समाज की चेतना के अनुरूप प्रतिमानों को गढ़ता है। इसलिए काव्य की विशिष्टताओं (जो निरन्तर और अनन्तिम हैं) का संग्रह तो किया जा सकता है किन्तु उसकी परिभाषा नहीं की जा सकती क्योंकि अन्तिम परिभाषा होते ही कविता मंथर होती-होती जड़ता को प्राप्त कर लेगी। कविता हमारी धमनियों में रक्त की तरह बह सकती है। हम उसे तितली की तरह कैद नहीं कर सकते। न हम काल और परिवेश की समानान्तर यात्रा को परिभाषा में जकड़ सकते हैं और न कविता को। इसलिए इस ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए भी ‘दिनकर’ की इन पंक्तियों की गूँज मुझे अस्थिर करती है-  “फिर दिशाएँ मौन, फिर उत्तर।”

- पूर्व कला संकाय अध्यक्ष एवं पूर्व निदेशक, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, डॉ॰ बी॰ आर॰ अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा (उ॰प्र॰),      

दूरभाष: 8859359855  (अवध-अर्चना फरवरी-अप्रैल 2017में प्रकाशित)                                      

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 ‘ कविता क्या है ’  :  एक समाधान

                                          - केशव शरण

विजय रंजन बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। वे कवि, कथाकार और संपादक के साथ-साथ समालोचक भी हैं। 

समालोचना की यह उनकी चौथी समालोचना कृति है- ‘कविता क्या है’। 

साहित्यिक विषयों की समालोचना में कविता की समालोचना सबसे अधिक जटिल है। यह गहरे अध्ययन, सूक्ष्म अंतर्दृष्टि और रागपूरित मगर तटस्थ विश्लेषण बुद्धि की मांग करती है। 

विगत युगों की अपेक्षा आज की कविता विविध रूपों और जटिल विन्यासों से भरी है। किसी रूप और विन्यास वाली कविता को कुछ लोग बहुत सराहते हैं, तो कुछ लोग उसे कविता ही नहीं मानते। यह आज की कविता का बहुत बड़ा बवाल है। 

कविता को लेकर ऐसा पहले कभी नहीं था। विपरीत युगों और धाराओं के बीच भी कविता की पहचान का संकट नहीं था। 

रस, अलंकार, छन्द और लोकरंजक उद्देश्यों वाली पुरानी आलोचना-विधियों से आज की कविता की समालोचना संभव नहीं है। 

तो क्या यह पुस्तक आलोचना की नयी विधियों और औजारों को उपलब्ध कराती है ? 

जी नहीं, लेकिन यह पुस्तक भारतीय और पाश्चात्य काव्य परिभाषाओं की अलग-अलग अध्यायों में सविस्तार चर्चा करती है। दो सौ पचास पृष्ठों में विस्तृत इस एक विषय के उभार में जितने ग्रंथों का आधार लिया गया है, उनकी सूची पूरे सात पृष्ठों में है। इससे इस विषय के निरूपण में कृतिकार के अध्ययन और लेखकीय परिश्रम को समझा जा सकता है।

किसी महाकाव्य की तरह काव्य को समझने-समझाने वाली इस पुस्तक में नौ खण्ड है- 

पहला- कविता: आज के दर्पण में, दूसरा- मिथकीय आधार पर, तीसरा- देवी सरस्वती के सहयुजन के आधार पर, चौथा- ऐतिहासिक आधार पर, पाँचवाँ- स्वभाव के आधार पर, छठा- दैवीय या देवत्वशील, सातवाँ- तात्त्विक आधार पर, आठवाँ- पारिभाषिक आधार पर नवाँ है- लोकमत के आधार पर। 

सूचीबद्ध उपर्युक्त अध्यायों पर एक दृष्टि दौड़ाकर कविता और उसकी आलोचनाओं की सामग्री और आयामों को समझा जा सकता है। 

कृति के हर अध्याय में कविता संबंधी परिभाषाओं और सूक्तियों के उद्धरण भरपूर संख्या में हैं जिन्हें लेखक ने अपने शब्द देकर संयोजित कर दिया है।

फिर प्रश्न उठेगा कि लेखक के परिश्रम और काम का महत्व क्या है ?

महत्त्व यही है कि लेखक ने एक स्थान पर कविता सम्बन्धी सभी परिभाषाओं, सिद्धांतों, विश्वासों, लक्षणों और लक्ष्यों को उपलब्ध कराया है वैदिक काल से आज तक के संस्कृत, हिंदी से लेकर अंग्रेजी के कवियों और समालोचकों के कथन और स्थापनाओं के साथ। 

उपर्युक्त समस्त आधारों पर यह पुस्तक एक अच्छी कविता को पहचानने की पैनी दृष्टि देती है।  

इस पुस्तक के द्वारा जिस चीज को पाठक प्राप्त करेगा वह इसके लेखक के पास होनी ही है। इसके आधार पर ही विजय रंजन जी यह कह रहे हैं-- 

“भावक को सामाजिक मानव बनाने की दिशा में समाज से कविता का सरोकार इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, मनोविज्ञान आदि के सापेक्ष सर्वाधिक सबल है।....आश्चर्य का विषय है कि प्रबुद्धजन, समाजशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिवेत्ता और उच्चपदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता ?” कविता की काया और आत्मा को देखने-समझने के लिए यह पुस्तक जो आधार रखती है, वे सनातन हैं और हैं आज की और भविष्य की भी कविता को जानने के लिए सहायक।  

- एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी - 221002, दूरभाष:  9415295137

(अवध-अर्चना अंक 91 में प्रकाशित)

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