शनिवार, 23 अगस्त 2025

विजय रंजन की कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ की कतिपय समीक्षाएँ


   अद्भुत शोधपरक ग्रन्थ है - 
 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                           - डॉ॰ अनुज प्रताप सिंह

विजय रंजन का यह अद्भुत शोधपरक ग्रन्थ है। इसमें सबकुछ नई दृष्टि से कहा गया है। ग्रन्थ की पीठिका में ही  बहुत कुछ दे दिया गया है। 

मैं मानता हूँ कि किसी भी कृति की समीक्षा उसके रचनाकार की मान्यताओं, देश-काल और वातावरण के अनुसार होनी चाहिए। लेखक ने इस मत का अनुगमन किया है। इसी से नए तथ्य सामने आ सके हैं। नहीं तो वाल्मीकि-रामायण पर अनगिनत कार्य हो चुके हैं। 

प्रस्तुत सामग्री को व्यवस्थित करने हेतु इस प्रकार क्रम दिया गया है- 

पूर्वार्चिक: 1. प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा और वाल्मीकि-रामायण,  2. प्रमुख अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषी और वाल्मीकि- रामायण, 3. प्रमुख हिन्दी-इतर भारतीय भाषाओं के काव्य-निकष और वाल्मीकि-रामायण, 4. पाश्चात्य काव्य-मनीषा और वाल्मीकि-रामायण 

उत्तरार्चिक: 1. महाकवि वाल्मीकि और महाकवि होमर, 2. उपसंहार

प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा और वाल्मीकि- रामायण: इस अध्याय में गहन समीक्षात्मक अध्ययन के उपरान्त लेखक ने प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय वाङ्मय के संदर्भ में वाल्मीकि-रामायण को देखा है। विश्व के आदि-ग्रन्थ ऋग्वेद से बात आरम्भ की गई है। आज तक प्रस्तुत विषय पर जो कुछ कहा गया है, उसको दृष्टि में रख कर लेखक ने कार्य किया है। लेखक की स्थापनाएँ अपना विशेष महत्त्व रखती हैं। जैसे - ” “मेरे अभिमत से ऋग्वेद का बहुलांश राम के पूर्व ही रचित किया जा चुका था परन्तु कालान्तर में जब ऋक् का दशम् स्कन्ध रचा गया, उस समय तक वाल्मीकि-रामायण, रामाख्यान और राम की प्रतिष्ठा इस सीमा तक लोकव्याप्त हो गई थी कि बाद के ऋचाकारों/वेदों को तद्गत नाम-गुण का उल्लेख करना अपनी रचना में अनिवार्य हो गया। ” बात पते की है, जो लोग वेद को अपौरुषेक मानते हैं, उनको इस कृति को अवश्य देखना चाहिए। 

कृति में भारतीय वाङ्मय के ‘प्रमाण चतुष्टय’ का आधार लिया गया है। प्रमाण चतुष्टय हैं- वेद, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता। इनके साथ पुरुषार्थ चतुष्टय पर भी विचार है जो काव्य का हेतु कहा गया है।  वाल्मीकि-रामायण में धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष की बातें पर्याप्त हैं। इस संदर्भ में लेखक ने भारतीय साहित्यशास्त्रियों के मतों की तार्किक विवेचना की है। 

आगे लेखक ने अर्वाचीन हिन्दी काव्य मनीषी औ..र वाल्मीकि-रामायण शीर्षक में हिन्दी के सम्बन्ध में कहा गया है। भारतेन्दु काल या नवजागरण काल से आज तक की काव्यसम्बन्धी मान्यताओं को प्रस्तुत किया गया है। इसी काल के आसपास वैश्विक स्तर पर विवेकानन्द, टालस्टॉय, डार्विन, कार्लमार्क्स आदि के विचार भी देश को मिले। सबके लिए हमें राष्ट्रीय चेतना और समरसता की प्राप्ति हुई। काव्य व्यक्ति से अधिक राष्ट्र एवं समाज से जुड़ा है। लेखक ने यहाँ भी काव्य-हेतु को प्रस्तुत किया है। कवितासम्बन्धी मान्यताओं की यहाँ सुन्दर विवेचना है। इसमें साहित्येतिहास से साहित्यशास्त्र की सामग्री सम्पृक्त है। इस तरह अन्तःकरण की उद्भावक क्रिया को कवि-प्रतिभा मानें तो मानना होगा कि ऋषिक कवि वाल्मीकि की नयशील, सत्त्वशील, ऋतशील उद्भावना का स्वाभाविक रूपायन है आलोच्य महाकाव्य। कहीं-कहीं सूचनाधिक्य में मौलिकता दब सी गई है। सबके उपरान्त भारतीय (दक्षिण वाम) और पाश्चात्य मतों को प्रस्तुत करते हुए वे अपना कार्य करते हैं। यह असाधारण कार्य है। लेखन के प्रति लेखक ईमानदार है। 

प्रमुख हिन्दी-इतर भारतीय भाषाओं के काव्य निकष और वाल्मीकि-रामायण :

इस शीर्षक में लेखक ने भारत में प्रचलित अन्यान्य भाषा-साहित्य के प्रमुख मनीषियों के काव्य-निकषों के सापेक्ष आलोच्य कृति का स्थान निरुपित किया है। भारतीय मतों में उर्दू के मत को भी लिया गया है। 

दक्षिण भारत की रामकथा से वाल्मीकि-रामायण की तुलनात्मक समीक्षा सराहनीय है। अनेक दुर्लभ तथ्य प्रस्तुत हैं। संक्षेपतः कह सकते हैं कि - “ असमिया, कश्मीरी/डोगरी, पंजाबी, मराठी, उड़िया प्रायः समस्त हिन्दी-इतर भारतीय भाषाओं की मूल नयशील, सतोमुखी, लोकसंग्रही भाव-भूमि से भी आलोच्य कृति  सर्वथा सुसंगत और समरैखिक है।“(पृ॰ 132) इस तरह सम्पूर्ण भारतीय साहित्यशास्त्रीय मानकों के अनुसार आलोच्य महाकाव्य एक श्रेष्ठ कृति है। 

पाश्चात्य काव्य मनीषा और वाल्मीकि रामायण : 

पाश्चात्य जगत् में देवी इन्हेंदुआना या कि म्यूजेस देवियों की कृपा से आविर्भूत माने जाने वाले काव्य की परम्परा की आरम्भिक कालावधि निश्चित नहीं है। पर यह निश्चित है कि ईसापूर्व नवीं शताब्दि से कुछ ग्रीस (यूनान) में काव्य-रचना हो रही थी। पाश्चात्य जगत् के प्रथम महाकवि ग्रीक होमर (825 या 900 ई॰ पू॰) प्रतिष्ठित हुए। उनकी कविता इलियड और ओडिसी में काव्यशास्त्र का विधान नहीं है। परन्तु अपनी चर्चित कृति ‘हिम टु अपोलो’ में उन्होंने अनुकरण (डपउमेपे) शब्द का प्रयोग किया है।

पाश्चात्य काव्य-निकषों की पर्याप्त चर्चा है। वाल्मीकि-रामायण सबके अनुसार महान् कृति प्रमाणित होती है। समाजशास्त्र की दृष्टि से भी यह कृति महान् है। इसके मनोवैज्ञानिक निकष पर यह कृति खरी उतरती है।           आधुनिकता की दृष्टि से यह प्रासंगिक है। अनेक विद्वानों ने प्रतीक, बिम्ब और प्रकृति-चित्रण की दृष्टि से इसको महान् कृति कहा है। लेखक का निष्कर्ष सर्वथा उचित है-  ” यतः, आदर्शवाद, नैतिकतावाद, शास्त्रवाद, नवशास्त्रवाद, स्त्रीवादी पाठ के निकष हों या बिम्बवाद, प्रतीकवाद, प्रकृतिवाद, मार्क्सवाद के समीक्षा निकष हों अथवा मैथ्यू अर्नाल्ड के ‘जीवन-आलोचना’ वाले साहित्य सिद्धान्त, इलियट के निर्वैयक्तिकता के सिद्धान्त या सुकरात, प्लेटो, होरेस, लांजाइनस के उच्चतर काव्य के काव्यादर्श, नैतिकता, औचित्य, उदात्ततता आदि की अभिवांछाएँ प्रायः सभी लोककल्याणक पाश्चात्य निकषों पर आलोच्य काव्य सर्वश्रेष्ठ ही सिद्ध है जबकि पाश्चात्य मनीषियों के वे काव्य निकष जो मानवीयता, मानवता, शास्त्रोक्त नीति, नैतिकता, लोकहित, नय-न्याय आदि लोक-श्रेष्ठताओं से विच्छिन्न हैं, और जो वैयक्तिक मनोगत सुख या/और रतिक आनन्द तक अति ससीम हैं--- उनसे रामायण का ताल-लय अमेलित है, जो मेरी दृष्टि में रामायण की हेयता नहीं वरन् उसकी सार्वश्रेष्ठता का परिचायक है। “ (पृ0 190)। वाल्मीकि-रामायण की इतनी खुली और तुलनात्मक समीक्षा अन्यत्र दुर्लभ है। 

उत्तरार्चिक के आदि-महाकवि वाल्मीकि और महाकवि होमर अध्याय में लेखक ने दोनों की रचनाओं के अंतःसाक्ष्य को लेकर तुलना की है। नायकत्व, मनुष्यता, उदारता, लोकमंगल, सहिष्णुता आदि की दृष्टि से वाल्मीकि-रामायण को ऊँचा प्रमाणित किया गया है। सबकुछ सप्रमाण प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार नायिका का चरित्र है। रामायण की सीता के कारण लंका युद्ध, दूसरी ओर इलियड की हेलन के निमित्त ट्राय युद्ध में समानता है, सीता और हेलन में साम्य नहीं है। सीता में लोकमंगल की भावना, मानवीय गुण, शील, संस्कार, आदर्श, सतीत्त्व, निश्छल प्रेम, दाम्पत्य-जीवन के प्रति समर्पण, विश्वास, आस्तिकता आदि अनेक आदर्श सुरक्षित हैं; तो हेलन अतिथि पेरिस के रूप-यौवन की आकृष्ट होकर अपने पति-गृह से अपार सम्पदा लेकर भाग जाती है। वह छली, प्रपंची, लोभी और स्वार्थी है। दूसरी ओर दोनों की परिस्थितियों, मान्यताओं और समाज में भी अन्तर है। 

रामायण सभी प्रकार से ऊँचे स्तर की रचना है। लोकमंगल की भावना रामायण में सर्वोपरि है। रामायण का कथा-क्षेत्र भी होमरिक साहित्य से व्यापक है। वाल्मीकि आदर्शवादी, व्यवहारिक, लोकमंगली रचनाकार हैं। वे बड़े ढंग से होमर से ऊँचे उठ जाते हैं। लेखक यह दर्शाने में सफल रहा है। एक महाकाव्य और उत्तम रचना को दृष्टि में रख कर लेखक ने इस कार्य को सम्पादित किया। इसमें उसको पूर्ण सफलता मिली है। कृति की भाषा-शैली उत्तम है। तार्किकता, उद्धरण-प्रणाली सब कुछ सराहनीय है।                           

-विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, आर॰आर॰पी॰जी॰ महाविद्यालय, अमेठी (उ॰प्र॰) ,दूरभाष:9161638532 (‘शिक्षा-साहित्य’, अंक जनवरी-जून 2013 में प्रकाशित)

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 अति उपयोगी कृति है    

साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                             - अशोक पाण्डेय ‘अनहद’

साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ का मैंने अध्ययन किया। आपने दि0 4 नवम्बर को हिन्दी संस्थान में जब पुस्तक मुझे दी थी तो सत्य कहूँ तो आप और इस ग्रन्थ के प्रति वो श्रद्धा कतई मेरे मन में नहीं थी जो अब इसके अध्ययनोपरान्त मेरे अंतःस्थल में जागृत है। सचमुच, आपने तो बहुत ही बड़ा कार्य किया है इस ग्रन्थ को रच कर। आपने विभिन्न उद्भट विद्वानों और उनकी कृतियों का बहुत ही गहनता और विद्वतापूर्ण अध्ययन किया है और हिन्दी ही नहीं वरन् अन्य भाषाओं के ग्रन्थों का भी। वाल्मीकि-रामायण के माहात्म्य का वर्णन कहीं भी भावविभोर होकर आस्था के वशीभूत हो नहीं, वरन् तार्किकता, विद्वता, चिन्तन-मनन, अध्ययन और तुलनात्मक दृष्टिकोण अपना कर किया गया है। 

मैं आपको और आपकी लेखनी को शत-शत नमन करता हूँ और इतने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के प्रणयन पर आपको कोटिशः बधाईयाँ और शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ। पुस्तक निश्चित रूप से अति उपयोगी है। पूर्वाग्रही डॉ0 नामवर सिंह जैसों के सम्बन्ध में तो आपने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है। दरअसल इन जैसों को हमारे यहाँ आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया जाता है न, इसीलिए ये अपनी विद्वत्ता कुछ ज्यादा ही झाड़ने लगते हैं। सम्भव हो तो इस पुस्तक की एक प्रति उन्हें भी अवश्य भिजवाएँ।

   - लखनऊ     (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 71 में प्रकाशित)

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      शोधार्थियों के लिए बहुमूल्य है  
 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण 

                                    - रजनी सिंह  

‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ विद्वान् लेखक विजय रंजन के अधिकाधिक अध्ययन और सृजनात्मक परिश्रम से रचित कृति है। रचनाकार ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की लुप्तप्राय ‘रामायण’ को उसके रचयिता के साथ एक बार पुनः साहित्य-प्रेमियों की स्मरण-वाटिका में भ्रमण करा दिया है। ‘बधाई’ के पात्र हैं लेखक विजय रंजन।

लेखक ने ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ में अनेक प्राचीन, मध्ययुगीन और नवीन भारतीय तथा विश्वस्तरीय काव्य-मनीषियों की कृतियों एवं उनकी समग्र सार्थक विवेचनाओं के प्रमाणित पहलुओं का वाल्मीकि-रामायण पर उतारते हुए तुलनात्मक रूप प्रस्तुत किया है। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् आदर्श सत्यसंध राम के आजीवन आचरणों में व्याप्त हैं, जब लेखक इन आदर्शों को विभिन्न विद्वान् लेखकों और कवियों के रचित ग्रंथों में उद्धष्त उदाहरणों से पेश करता है तो आलोच्य कृति की भारतीय परिवेश में ही नहीं वरन् विश्वस्थल पर भी उपयोगिता और सार्थकता सिद्ध होती है। कृतिकार का काव्य-मनीषियों की विचार-शृंखला को विभिन्न कोणों से अवलोड़न कर ‘रामायण’ को वैश्विक स्तर पर लोककल्याणकारी ‘महाकाव्य’ घोषित करने का पुण्यमयी कदम उठाना प्रशंसनीय है। 

वास्तव में वाल्मीकि-रामायण वेद, पुराण, उपनिषद् और अन्य पौराणिक बहुमूल्य ग्रंथों के समानान्तर काव्य-मीमांसियों की बौद्धिक प्रणालियों पर अपनी मानवीय अस्मिता बनाए रखने में सक्षम है। मेरे विचार में यह निस्संदेह सत्य है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि की आलोच्य कृति एक सर्वश्रेष्ठ काव्यकृति है। आदि-रचना काल से ही जिस आलोच्य कृति को अनेक विद्वान्, काव्य-मनीषी एवं आलोचक अपनी अवधारणाओं पर प्रमाणित करते रहे हैं, उसका ‘सर्वश्रेष्ठ’ होना स्वाभाविक है। यह भारतीय ही नहीं वरन् विश्व-स्तरीय महाकाव्य है।

विचारशील लेखक प्रेमचन्द, प्रख्यात आलोचक नन्ददुलारे बाजपेयी और प्रख्यात समीक्षक शान्तिप्रिय द्विवेदी के विचारों को लेखक ने प्रस्तुत कर यह प्रामाणिकता दर्शाई है कि ‘रामायण’ के नायक राम मानवीय गुणों से ओत-प्रोत सम्पूर्ण विराट महापुरुष हैं। रामायण के सभी पात्र समाज को कुछ न कुछ ‘सार्थक पहल’ देने में समर्थ हैं। यह शाश्वत सत्य अति मानवीय है।

छायावाद युग के कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, अप्रतिम कवयित्री महादेवी वर्मा, समालोचना में युगीन संवेदना के पक्षधर सुमित्रानन्दन पंत, छायावादी युग के काव्य-पुरोधा जयशंकर प्रसाद के सभी सारवान् साहित्यिक निकषों से वाल्मीकि का कवि-धर्म सार्थक दिखाई देता माना है लेखक ने। यह मानव की भावनात्मक और सर्जनात्मक प्रवृत्ति को मुखरित करता है।

प्रगतिवादी लेखक संघ के डॉ॰ रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, नागार्जुन आदि अन्य मनस्वियों की दृष्टि से भी रामायण में देश-प्रेम, राष्ट्रीयता, ग्राम्य-प्रेम, प्रकृति-प्रेम आदि की सम्पूर्ण उपस्थिति का दर्ज होना सापेक्ष किया गया है। ‘लोकमंगलकामना’ का आधिपत्य आलोच्य कृति की प्रमुखता होना करीब-करीब प्रत्येक युग के कवियों और आलोचकों ने दर्शाया है। डॉ0 रामकुमार वर्मा का दृष्टिकोण है कि ‘वाल्मीकि-रामायण का दृष्टिकोण लौकिक है।’ ”हम न मरैं मरिहै संसारा“ कबीर का कथन और ”अब लौं नसानी अब न नसैहों“ तुलसी के विचार ‘समानता’ की कसौटी पर हैं।

वास्तव में विजय रंजन की सोच और दूरदर्शिता वाल्मीकि रामायण को एक ‘सम्पूर्ण महाकाव्य’ सिद्ध करने में अक्षरशः ऋत है। जीवन के उच्चतम मूल्यों का निर्वहन से लेकर तुच्छ प्राणियों के क्रिया-कलापों से रूबरू कराने में आलोच्य कृति पूर्ण है। सभ्य-असभ्य और धर्मात्मा, राक्षस सभी के जीवन-कर्मों की भली-बुरी घटनाओं को शब्द-पटल के माध्यम से पाठकों को अवगत कराने में रामायण अद्वितीय है। जीवन-पथ पर निर्गमन करते हुए प्रकृति के प्राणियों की प्रतिक्रियाएँ, पथ पर आने वाले झंझावातों और उनसे जूझते हुए गलत और सही का विचार बुद्धि, विवेक और संयम की धुरी पर कसते हुए निर्णय लेकर उन्हें अन्तिम रूप प्रदान करना आलोच्य कृति का गुण है। लेखक का विचार इसे इस प्रकार प्रमाणित करने की पहल करता है--- ” रामायण की कविता भारतीय काव्य-चिन्तन, दर्शन विचारधाराओं के योग का प्रमाण है “।

” रामचरितमानस (तो) क्या समस्त परवर्ती रामायणों में वर्णित रामकथा का प्रेरणास्रोत आदि-कविकृत रामायण ही है “, विद्वान् डॉ॰ राधिका प्रसाद त्रिपाठी के यह विचार मेरी राय में सत्यता की कसौटी पर खरे हैं--” जितनी भी रामकथाएँ लिखी गईं, उनका मूल रूप किसी न किसी रूप में वाल्मीकि रामायण से प्रभावित दृश्यमान है।“ इस प्रकार यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि वाल्मीकि रामायण साहित्यिक तुला पर सुसंगत कृति है।

आश्चर्यप्रद तो यह है कि विश्व के अनेक लेखकों ने अपनी भाषा में रामायण का अनुवाद किया और माना कि रामायण ‘लोकमंगल भावों से प्रतिपूरित नैतिक मूल्यों का ज्ञान प्रदान करने में श्रेष्ठ काव्य-कृति है।’ अंग्रेजी के एक महान् कवि पी0 बी0 शेली द्वारा कविता और नैतिकता में अंतःसम्बन्ध दर्शा करके लेखक विजय रंजन इसे इस प्रकार प्रस्थापित कर और अधिक दृढ़ता प्रदान की है-- ”कविता मनुष्य की उस आन्तरिक शक्ति को समृद्ध करती है जो नैतिक गुणों का मूल आधार हैं।“ अर्थात् रामायण-काव्य नैतिकता का संदेशवाहक है।

साथ ही उर्दू (जिसका जन्म और पालन-पोषण भारत में हुआ है) के कतिपय कट्टरपंथियों ने, जो उर्दू को फारसी की अनुगामिनी बना देने वाले हुए, भी ‘राम को पैगम्बर माना और अल्लामा इकबाल ने अपनी नज्म में ‘है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़, अहले नजर समझते हैं उनको इमामे हिन्द’ से जाहिर है कि उर्दू लेखक भी ‘राम’ से अंतःप्रेरित रहे हैं।

इस प्रकार मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचती हूँ कि लेखक विजय रंजन ने इस पुस्तक की रचना करने के लिए अपने अध्ययन, मनन और चिन्तन की वृहद्ता का सहारा लेकर वाल्मीकि-रामायण को साहित्यिक तुला पर सम्पूर्ण लोकोपयोगी कृति समालोचित कर सार्थक एवं सकारात्मक पहल की है। ऐसा ग्रन्थ शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुमूल्य ग्रन्थ है एवं अवश्यमेव पठनीय है।  

      -रजनीविला, डिबाई- 202393 (उ॰प्र॰), दूरभाष: 9412653980

         (अवध-अर्चना, अंक नव॰ 2012-जन॰ 2013 में प्रकाशित)

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 पाण्डित्यपूर्ण शोध-ग्रन्थ है 
साहित्यक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

               - डॉ॰ सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’

आदि-महाकवि वाल्मीकि द्वारा विरचित ‘रामायणम््’ भारत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक पहचान है। आ॰रामचन्द्र शुक्ल का कथन है-      

”वाल्मीकीय रामायण को मैं आर्य काव्य का आदर्श मानता हूँ।“  

वाल्मीकि-रामायण ने मानवता की सच्ची परिभाषा प्रतिपादित की है। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही कहा है- 

”रामायण ने बाहुबल को नहीं, जिगीषा को नहीं, राष्ट्रगौरव को नहीं, केवल शान्त रसास्वाद गृह-धर्म को ही करुणा के अश्रुजल से अभिषिक्त कर महान् शौर्य-वीर्य के ऊपर प्रतिष्ठित किया है।“ 

रामायणम् का जन्म करुणा की कोख से हुआ है। वाल्मीकि का हृदय एक क्रौंच पक्षी की हत्या से करुणा-विगलित हो गया, वे पक्षी-वध की पीड़ा सह न सके और उनके मुख से अनुष्टुप्् छन्द निकल पड़ा। उन्होंने निषाद व्याध को शाप दिया, ”तुम बहुत दिनों तक निन्दा का पात्र बने रहोगे।“  इस संदर्भ में भारतीय संविधान का अनु0 51 क (छ) उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया है- ” भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, की रक्षा करे, उसका संवर्द्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखे। “ महर्षि वाल्मीकि आज के भारतीय नागरिकों से पूछ रहे हैं कि क्या आप लोग प्राणिमात्र के प्रति दया-भाव रखते हैं ? मैं तो एक पक्षी की हत्या से ही बहुत आहत हुआ था और मैंने उसका पुरजोर विरोध भी किया था, जितना मेरे वश में था। निःसन्देह, वाल्मीकि-कृत रामायणम् अकेला ऐसा ग्रन्थ है जिसकी उद््भूति हिंसा की निन्दा करते हुए हुई है और जो मानव तो क्या पशु-पक्षी तक की पीड़ा को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। 

कालान्तर में वाल्मीकि-रामायण को आधार बना कर बहुत से ग्रन्थ विभिन्न भाषाओं में लिखे गए। इस महाग्रन्थ के विभिन्न पक्षों की अनेक विलक्षण विद्वानों द्वारा अनेक कोणों से मीमांसा भी की जा चुकी है और की जा रही है तथा की जाती रहेगी। वाल्मीकि-रामायण का उद्घोष सत्य ही प्रतीत होता है- 

” जब तक पृथ्वी पर पर्वत तथा नदियाँ रहेंगी, तब तक रामायण-कथा का लोक में प्रचार-प्रसार होता रहेगा। “

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद निवासी विजय रंजन व्यवसाय से अधिवक्ता किन्तु व्यसन से महा विद्याव्यसनी हैं। उनका स्वाध्याय सुविस्तृत, चिन्तन तर्कपूर्ण, मीमांसा तथ्यपूर्ण तथा लेखन औचित्यपूर्ण है। 

शैशवकाल में ही विजय रंजन की दादी ने पौत्र में राम-कथा के संस्कार-बीज का वपन किया जो सम्प्रति सुविस्तृत छायादार वट वृक्ष के रूप में ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ नामक गुरुगवेषणात्मक ग्रन्थ के आकार में समाज को प्राप्त हुआ है। इस ग्रन्थ के लेखन में लेखक के उर्वर विचारशील मस्तिष्क में रामकथा के विविध आयामों के चिन्तन-अनुचिन्तन के पचास सालों का लेखा-जोखा है।

लेखक ने करीब 150 हिन्दी, 12 अंग्रेजी समालोचना ग्रन्थों का आलोडन-विलोडन कर अपने वर्ण्य विषय की गहन एवं गम्भीर विवेचना की है। करीब 23 पत्रिकाओं को सन्दर्भ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ये सारे ग्रन्थ महापण्डितों द्वारा रचित मानक ग्रन्थ हैं। 

भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना के मानकों पर ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ रचा गया है जिसके अध्ययन, मनन एवं चिन्तन के लिए पर्याप्त समय, रुचि तथा प्रभूत सारस्वत श्रम चाहिए। यह ग्रन्थ उन्हें प्रिय प्रतीत होगा जो साहित्य-सागर में गहरे उतरने का साहस रखते हैं।   

लेखक ने विषय को बहुत पढ़ा है तथा गम्भीरता से स्थिरतापूर्वक गुना है। अतएव, उसने अनेक ऐसे विद्वानों के कुतर्कों का करारा जवाब दिया है जिन्हें वाल्मीकि लोकधर्मी नहीं दिखते (पृ॰ 111)। 

ग्रन्थ मुख्यतः 3 भागों में विभक्त है- 1. पूर्वार्चिक 2. उत्तरार्चिक 3. परिशिष्ट

पूर्वार्चिक के अंतर्गत अध्याय हैं-

1. प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा औ..र वाल्मीकि-रामायण

2. प्रमुख अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषी औ..र वाल्मीकि-रामायण

3. प्रमुख हिन्दी इतर भारतीय भाषाओं के काव्य निकष औ..र वाल्मीकि-रामायण

4. पाश्चात्य काव्य मनीषा औ...र वाल्मीकि-रामायण

ग्रन्थ का उत्तरार्चिक 1. ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि और होमर’ 

                 2. ‘उपसंहार’ शीर्षकों से उपनिबद्ध है।

ग्रन्थ के परिशिष्ट में सहायक ग्रन्थ आदि के संदर्भ संकलित हैं।

 ‘प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा औ..र वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक से ग्रन्थ में जिस विषयवस्तु को प्रस्तुत किया गया है उसमें वैदिक वाङ्मय के सार-तत्त्व, काव्यशास्त्र (अलंकारशास्त्र) के सूत्र-तथ्य बौद्ध, जैन आदि भाषाओं में रचित रामकथा का समास-स्वरूप दर्शनीय, पठनीय तथा मननीय है। 

इतने विपुल परिमाण वाले गम्भीर ग्रन्थों से सार-तत्त्व निकालना, वह भी सूक्ष्म रूप में, बहुत कठिन है, पर लेखक ने साधना की यातना सही है या यातना की साधना की है, कोई प्रबुद्ध पाठक तथा समीक्षक ही इसे समझ सकेगा। ये सारे प्रकरण मानों वर्ण्य विषय के कोषागार हैं। 

‘प्रमुख अर्वाचीन हिन्दी काव्य-मनीषी औ..र वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक के अन्तर्गत लेखक द्वारा आधुनिक समालोचकों की रामायण-दृष्टि पर विवेचनात्मक, विष्लेषणात्मक नवीन दृष्टि डाली है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से लेकर डॉ॰ रामचन्द्र तिवारी तक के सम्बद्ध विचारों का समाकलन किया गया है। एक ओर ‘दिनकर’ की कालजयी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के आलोक में वाल्मीकि-रामायण की गुणवत्ता आँकी गई है तो दूसरी ओर स॰ ही॰ वा॰ अज्ञेय की समालोचनात्मक दृष्टि से रामायण की कालजयी मूल्यवत्ता का परिमापन किया गया है। इस अध्याय में उपर्युक्त विचारकों के साथ ही डॉ॰ सूर्यप्रसाद दीक्षित, डॉ॰ विश्वनाथप्रसाद तिवारी तथा प्रभाकर श्रोत्रिय के समालोचनात्मक निकष पर भी कसने के बाद लेखक द्वारा निष्कर्षतः वाल्मीकि-रामायण को ‘श्रेष्ठ’ निरुपित किया गया है। उक्त समीक्षक त्रिवेणी के ज्ञानानुशीलन से सामान्य पाठक को वाल्मीकि-रामायण के विषय में अनेक नवीन उद्भावनाएँ पढ़ने को मिलती हैं।

‘प्रमुख हिन्दी इतर भारतीय भाषाओं के काव्य निकष और वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक के अंतर्गत लेखक द्वारा उर्दू, , तमिल, मलयालम, तेलुगु तथा बांग्ला आदि भाषाओं के लेखकों तथा समालोचकों की दृष्टि में सन्निहित काव्यशास्त्रीय तथा मानवीय मूल्यों की कसौटी पर वाल्मीकि-रामायण को कस कर कसा गया है। अंततः यह निष्कर्ष सारवान् प्रतीत होता है कि- 

”सम्पूर्ण भारतीय साहित्यिक जगत् के सारवान् निकषों से आलोच्य महाकाव्य एक श्रेष्ठ कृति है।“

यह ग्रंथ लेखक की बहुविज्ञता, अमेय सारस्वत श्रम की क्षमता तथा गहन मीमांसापरक योग्यता का पुष्ट प्रमाण बन गया है।

‘पाश्चात्य काव्य मनीषा औ..र वाल्मीकि-रामायण’ शीर्षक से ग्रन्थ में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू , मार्क्स आदि अनेक पाश्चात्य समीक्षकों एवं मनीषियों के काव्य-कला विषयक मानदण्डों पर वाल्मीकीय रामायण का समाकलन किया गया है जिसमें समीक्षा-दृष्टि, विवेचना की पैनी नजर तथा निर्णय की दूर-दृष्टि स्पष्टतः परिलक्षित होती है। लेखक ने स्वाध्याय के बल पर प्रभूत परिमाण में सम्बद्ध समीक्षकों की वर्ण्य विषय के प्रकरण में विवेचना की है। इस प्रकरण को हृदयंगम करने के लिए पाठक को सजग, धैर्यवान्, बहुपाठी तथा सारस्वत-सेवक होना होगा।

ग्रन्थ के उत्तरार्चिक में निबद्ध ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि और होमर’ शीर्षक अध्याय लेखक के पाश्चात्य जगत् के अनेकविध संज्ञानों का सुपरिचायक है जिसमें उसने काफी मशक्कत के बाद सिद्ध कर ही दिया-

”होमर कमोबेश उसी पंथ के हमराही हैं जिसका प्रथम प्रकल्पन आदिमहाकवि वाल्मीकि ने किया था।“ (पृ॰ 133) 

यह अध्याय में लेखक ने काफी सोच-समझ कर लिखा है-

”होमर पाश्चात्य जगत् में प्रथम प्रपितामह महाकवि हैं।“ (पृ॰194)

भारत के आदि-महाकवि वाल्मीकि की रचना तथा उक्त विशेषणों से युक्त होमर की रचनाओं का सह समाकलन बहुत खूबसूरत बन पड़ा है। ‘ओडिसी’ तथा ‘इलियड’ की चर्चा उठा कर अंततः निर्णय दिया गया कि- 

”जब होमर सदृश शीर्षस्थ पाश्चात्य महाकवि रामायण-प्रणेता वाल्मीकि से उदात्तता आदि निकष पर निम्नतर है तो अन्यान्य पाश्चात्य कवि को (हर भारतीय कवि को भी) वाल्मीकि के समकक्ष माने जाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठ सकता।“ (पृ॰ 212)

यहाँ यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि यदि आदि-महाकवि वाल्मीकि हैं तो कविकुल गुरु कालिदास कहे गए हैं।

ग्रन्थ का ‘उपसंहार’ तो वाल्मीकि-रामायण की महत्ता की इयत्ता का सुपरिचायक हैं। 

भारत में भले ही हम वाल्मीकि और राम को महत्त्व न दे रहे हों, पर विदेशों में भारत की पहचान राम तथा रामाख्यान से ही है जिसके प्रथम महागायक वाल्मीकि थे- ”घर का जोगी जोगिया, आन गाँव का सिद्ध।“

विवेच्य ग्रन्थ के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि यह प्रौढ़ प्रकृति, परा-प्रतिभा सम्पन्न कवि तथा समीक्षक के गुणों से सम्पन्न कोई प्रबुद्ध पाठक ही इस ग्रन्थ का समुचित रसास्वादन कर सकेगा। मोती के लिए महासागर में उतरना ही होगा। उड़ान के लिए अनन्त को नापना ही होगा। 

लेखकीय अपार शब्द-सम्पदा, प्रांजल भावाभिव्यक्ति, साम्य तुला की स्थिरता पर लगातार निगाह बनाए रखना इस ग्रन्थ की मौलिक विशेषता है। अनेकशः भाव भारी तथा शब्द हल्के पड़ गए हैं जो कुछ को अच्छे लगेंगे कुछ को नहीं।

कोई भी मानवीय रचना पूरी नहीं कही जा सकती। ग्रन्थ में ‘तदेव’ को   ‘त..दे..व’ लिखा गया है। ऐसा अनेक शब्दों के साथ अनेकशः किया गया है। लेखक ने ऐसा क्यों किया-- इसका स्पष्टीकरण होता तो अच्छा रहता।

कुल मिला कर ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ ग्रन्थ गहन गरिम पाण्डित्यपूर्ण शोध-ग्रन्थ है जो ज्ञान-पिपासुओं और शोधार्थियों के लिए एक अमूल्य ग्रन्थ-रत्न है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

-एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, संत तुलसीदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कादीपुर-सुल्तानपु र (उ॰प्र॰),         दूरभाष: 9532006900

                               (‘अवध-अर्चना’ अंक 77 में प्रकाशित)

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 आलोचना के नए प्रतिमान प्रस्तुत करती कृति 
 साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                    - डॉ॰ महेश ‘दिवाकर’

‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ (कृति में) वाल्मीकि-रामायण की आपने साहित्यशास्त्रीय समीक्षा प्रस्तुत की है। आपके विवेचन एवं विश्लेषण बौद्धिक निकष पर सराहनीय हैं। वाल्मीकि-रामायण के सन्दर्भ में आपने अपनी इस कृति के द्वारा पाठकों के समक्ष नए प्रतिमान प्रस्तुत किए हैं। यह आलोचना-कृति आलोचना-जगत् के लिए वाल्मीकि-रामायण के सन्दर्भ में नए-नए निष्कर्ष प्रस्तुत कर रही है। पाठक अपनी सोच को परम्पराओं से हट कर परिवर्तित करने को बाध्य होंगे। यही नहीं, आपने अपने निष्कर्षों को तथ्यों एवं कथ्यों के सन्दर्भ में बिल्कुल हटकर नवीन धरातल पर प्रस्थापित किया है। समग्र कृति और नए-नए आलोचनात्मक मानदण्ड सराहनीय बन पड़े हैं। 

लेकिन परमादरणीय ! आपने क्लिष्ट हिन्दी प्रस्तुति-शैली को प्रयोग कर एक छोटे से पण्डित-वर्ग के लिए पुस्तक को सीमित कर दिया है जबकि इस प्रकार की कृति आम हिन्दी के प्राध्यापकों हेतु लिखी जानी चाहिए थी और वह तथाकथित पण्डित वर्ग--हिन्दी के ठेकेदार और साहित्य-शौर्य मण्डल के दीप्तिमान नक्षत्र-- इसे खोलकर भी नहीं देखेंगे क्योंकि वे तो ज्ञान-वैभव की उच्च स्तरीय हिमालयीय शृंखलाओं पर विचरते हैं ! 

काश ! इसकी प्रस्तुति आम बोल-चाल की हिन्दी भाषा में होती तो आपका श्रम अत्यधिक सार्थक हो जाता। चलिए, अब जो हो गया सो हो गया। आपने कुछ सोच कर ही विशुद्ध साहित्यिक हिन्दी की भाषा-शैली का प्रयोग किया होगा। मैं तो एक पाठक हूँ और शिक्षक हूँ--- मेरे सोचने-समझने का तरीका पृथक है। असली चिन्तक विचारक तो कृति का सर्जक ही होता है। 

कृति-प्रस्तुति में आपका परिश्रम, सोच, चिन्तन-मनन एवं अध्ययन स्पष्ट झलक रहा है। आपको बहुत-बहुत बधाई।  

     -12, मिलन विहार, दिल्ली रोड मुरादाबाद, दूरभाष: 9927383877

                     (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 72 में प्रकाशित)

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श्रेष्ठ कृति है 
  साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण

                  - प्रो॰ (डॉ॰) शरदनारायण खरे 

यह गम्भीर चिन्तनपरक श्रेष्ठ कृति है जिसमें लेखक (वस्तुतः विद्वान्  शोधकर्त्ता) का गहन श्रम समर्पित हुआ है। 

वाल्मीकि-रामायण का ऐसा तुलनात्मक अध्ययन व दार्शनिक मीमांसापूर्ण प्रस्तुतिकरण अन्यत्र दुर्लभ है। ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य में धैर्य, लगन, निष्ठा व समर्पण की निश्चित रूप से आवश्यकता होती है।

हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, जर्मन, फ्रेंच, संस्कृत और भारत की तमाम भाषाओं के (और साहित्य के भी काव्य-निकषों के) सापेक्ष ‘वाल्मीकि-रामायण’ की तुलनात्मक विवेचना व मीमांसा सच में प्रणम्य है। 

मैं विजय रंजन जी की साधना को प्रणाम करता हूँ।   

- विभागाध्यक्ष, इतिहास, शासकीय महिलामहाविद्यालय, मण्डला (म॰प्र॰),     

     दूरभाष: 9425484382 (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 72 में प्रकाशित)

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 वाल्मीकि-रामायण और विश्वजनीन काव्य-निकष

                           - डॉ॰ प्रभुदयाल मिश्र

श्री विजय रंजन कृत ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ विराट विश्वफलक पर इस ग्रन्थ की सर्वश्रेष्ठता के प्रतिपादन का उपक्रम है। 

इसमें सन्देह नहीं कि इसके लेखक के अध्ययन के आयाम और उसकी अपनी प्रतिबद्धता के प्रति उसका अविचल भाव स्पृहणीय है। 

लगभग सभी प्राचीन और अर्वाचीन काव्य और साहित्य निकषों के आलोड़न द्वारा लेखक अपनी इस उद्घोषणा से निश्चित ही कृत-कृत्यता का अनुभव कर रहा होगा कि-  

 “अपनी अप्रतिम नयवादिता, महत् सद्विचार, चरम उदात्तता के साथ-साथ तद्गत श्रेष्ठतम महाकाव्यात्मक सम्प्रस्तुति-कौशल आदि के आधार पर युग-युग से सफल-सिद्ध महाकवि हैं आदि-महाकवि वाल्मीकि। ऐसे महाकवि की तुलना में होमर तो क्या विश्व का कोई भी कवि/महाकवि टिक पाने में समर्थ नहीं है।” (पृ॰ 212)

किन्तु प्रश्न उठता है कि वाल्मीकि को क्या अपनी महत्ता के लिए इतनी मशक्कत की दरकार है ? 

यदि समालोचक नामवर सिंह ने ‘दूसरी परम्परा की खोज’ का स्रोत वाल्मीकि में नहीं देखा तो इतने से ही इसे उनकी अक्षम्य उपेक्षा का परिणाम मान कर उनके पुरखों के परखच्चे उड़ा देना क्या कोई सचमुच बहादुरी होगी ?  

संभवतः श्री रंजन महाभारत की उस स्थापना से अनुप्राणित हैं जिसमें कहा गया है कि सत्य केवल उतना ही है जितना उस ग्रन्थ में है, उससे इतर कुछ है ही नहीं, यही मानना होगा। 

ठीक वैसे ही शोध-संश्लिष्ट रंजन वाल्मीकि के वैशिष्ट्य के रेखांकन के लिए साम्यवादी और फ्रायड दर्शन का भी आलोड़न कर डालने से नहीं चूकते- 

”महीन विभेदों को यदि अनदेखा कर सकें तो कह सकते हैं कि समाजवादी विचारधारा के दृक्-बिन्दुओं पर मार्क्सवादी अपेक्षा (सामाजिक नय आदि की सुचारु व्यवस्था) का रामायणीय व्यवस्था से अधिक चारुतर सार्वहिती उदाहरण अन्यत्र अलभ्य है।“ (पृ॰ 163)

आगे लेखक ने फ्रायड और जुंग के अवचेतन को चीर कर उसमें वाल्मीकीय चेतना खोजी है- 

”यह ग्रंथ और इसके नायक-सहनायक से लेकर कृति-प्रणेता तक का आचरित ‘चरित’ फ्रायडीयन मनोग्रंथियों- ‘इडिपस’ या कि ‘इलेक्ट्रा का औ..र फ्रायड-प्रणीत ‘लिबिडो’- का फलित नहीं है; न ही यह ग्रंथ अल्फ्रेड एडलर की हीनता की ग्रंथि/श्रेष्ठता की ग्रंथि का ही प्रतिफलन है बल्कि रामायण अधिकतमतः गुस्ताव जुंग प्रणीत एनीमस और एनीमा की अंतर्मुखी व बहिर्मुखी शक्तियों से समेकित (कवि के अचेतन नहीं प्रत्युत) सर्वथा चेतन मन के विचार, भाव एवं संवेदन से आविर्भूत ‘चेतना-उद्बोधी’ रचना है.....। (पृ॰ 171)

निश्चित ही जैसा कि भूमिकाकार विद्वानों ने पुस्तक में लिखा है, लेखक विश्वकोष को अपनी वर्तनी की स्याही में घोल कर चला है। उसके अध्ययन और अनुशीलन की सामर्थ्य चमत्कारी है, किन्तु यह चमत्कार जब भाषा के स्तर पर भी उतरता चलता है, तो यह गहन विचार सरणि उफनते बरसाती नाले के अधिक निकट खिसक जाती है। वैसे संसार की बिखरी शब्द-संपदा को अब कम्प्यूटर सटीकता से समेटने लगा है। 

अतः विचारवान् लेखकों का गम्भीर और मौलिक होना ही उन्हें उनके लेखकीय दायित्व के निकट पहुँचाता है, मेरी ऐसी मान्यता है। 

इतना मैं अवश्य कहूँगा कि ऐसे साहित्य-प्रेमियों को जो साहित्य की समग्र समालोचना और अध्ययन के सिद्धान्त तथा अनुशीलन की खोज में हैं, उन्हें जरूर इस पुस्तक को पढ़ना चाहिए। 

एक बात के लिए मैं और बधाई दूँगा कि रंजन जी ने श्री मनोज श्रीवास्तव की तरह सुन्दरकाण्ड के 10 दोहों में 2000 पृ0 भर देने का बीड़ा न उठा कर पाठकों के संयम की परीक्षा नहीं ली है, अतः वे बधाई के पात्र हैं।

- 35 ए, ईडेन गार्डन, कोलार रोड, भोपाल (म॰प्र॰), दूरभाष: 9425079072

(समीक्षा पत्रिका ‘तुलसी मानस भारती’ (भोपाल) अंक मई 2013 में एवं कृति ‘अर्द्धालियों के पूर्णाकार’ में प्रकाशित) 

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            नतशिर

                              - केवल गोस्वामी

विजय रंजन धारा के संग-संग बहने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वह धारा के विरुद्ध जाते हैं, ऐसा भी नहीं है, पर यथासंभव वह धारा को चीर कर अपनी अलग राह बनाने की चेष्टा करते हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा उन्हें कभी वांछित परिणाम मिलते हैं, कभी-कभी भ्रमित भी हो जाते हैं। अपनी मौलिकता के सुख को वह प्रायः हजारों से बाँटना चाहते हैं। पाठकों का एक समूह उन्हें अपनी सद्भावना प्रदान जरूर करता है किन्तु हर आलोचक उनकी कृति के लिए ऐसा नहीं कर पाता। यह क्षोभ उन्हें कभी-कभी असह्य मालूम होता है परन्तु वह तुरन्त हिसाब चुकता करने की चेष्टा करते हैं। 

विजय रंजन ने साहित्य के मुख्य द्वार से इसमें प्रवेश नहीं किया। मनीषियों के कथन के अनुसार विजय रंजन अधिवक्ता हैं, किन्तु वकालत उनकी वृत्ति है प्रवृत्ति नहीं। उसकी पुष्टि के लिए वृन्दावनलाल वर्मा, और केदारनाथ अग्रवाल के उदाहरण भी प्रस्तुत किए जाते हैं। कहना न होगा कि वृत्ति और प्रवृत्ति में मूल्यों का भयंकर टकराव है। साहित्य के मूल्यों के द्वारा वकालत नहीं चलती और वकालत के मूल्यों द्वारा श्रेष्ठ साहित्य की रचना नहीं की जा सकती। वकालत के मूल्यवान् तर्क साहित्य के लिए कुतर्क सिद्ध कर सकता है ? 

उनकी वृत्ति के दायरे से मैं उतना परिचित नहीं हूँ , किन्तु प्रवृत्ति द्वारा रचित उनकी कतिपय रचनाओं का अवलोकन मैंने अवश्य किया है। उनकी त्रैमासिक पत्रिका अवध-अर्चना में उनके सम्पादकीय और टिप्पणियों के द्वारा जाना-समझा। वह अपनी अवधारणाओं के द्वारा बड़े आत्मविश्वास से पाठकों तक पहुँचते हैं, सहमति-असहमति अपनी जगह है। 

‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ कृति उनकी अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी कृति है। यह अपूर्व, अद्भुत, अनूठी रचना है, इसे सिद्ध करने के लिए लेखक को सुदीर्घ मानसिक ऊहा-पोह से गुजरना पड़ा है और ऐसा करते हुए वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि सुधि पाठकों के अपने तर्क हो सकते हैं। जिस अभिव्यक्ति को वह अन्तिम सत्य मान कर चल रहे हैं उससे पूर्व भी ऐसे अनेक प्रयास हो चुके होंगे।

हिन्दू कालगणना के अनुसार रामायण का समय त्रेता युग माना जाता है। भारतीय कालगणना के अनुसार समय को चार युगों में बाँटा गया है- सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलि युग। कलि युग 4,32,000 वर्ष का, द्वापर 8,64,000 वर्ष का, त्रेता 12,96,000 वर्ष का तथा सत युग 17, 28,000 वर्ष का होता है। इस गणना के अनुसार रामायण का समय न्यूनतम 8,70,000 वर्ष है। वर्तमान कलि युग के 5,250 वर्ष बीते, द्वापर के 8,64,000 वर्ष। कुछ विद्वान् इसका तात्पर्य ईसा पूर्व 8000 से भी लगाते हैं। कहा जाता है कि संसार के समूचे साहित्य में इस प्रकार का लोकप्रिय काव्य जातीय-गं्रथ नहीं है। सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का आधार इस महाकाव्य से अनुप्राणित है। इसलिए विजय रंजन के लिए तुलना करने के बहुत कम क्षेत्र बचते हैं। सर्वथा सिद्ध को बार-बार सिद्ध करके आप कोई चमत्कारी अर्थ पैदा नहीं कर सकते। फिर रामकथा का एक स्रोत तो है नहीं और हर ग्रंथ की एक ही परिणति भी नहीं है। इसलिए तुलना के अवसर और भी कम हो जाते हैं। यदि अतिरिक्त आग्रह के वशीभूत होकर ऐसा किया भी जाता है तो वह रिपीटीशन के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता। प्रो॰ ए॰ के॰ रामानुज का आलेख ‘ तीन सौ रामायणै: पाँच उदाहरण और अनुवाद पर तीन तरह के विचार’ दिल्ली विश्वविद्यालय के बी॰ ए॰ (आनर्स) इतिहास के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा था। 2008 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अभिभूत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जो हंगामा किया, उस टोली के किसी सदस्य ने यह लेख पढ़ा नहीं था और न ही वे रामकथा की समृद्ध परम्परा के विभिन्न पाठान्तरों से परिचित थे। उन्हें हिन्दू धर्म की आस्था की चिन्ता थी। इस सारे प्रकरण का जिक्र आलोच्य कृति को नहीं मिलता। जब हम इलियड और ओडिसी को इस संदर्भ में स्मरण करते हैं (रचनाकाल 850 ई0पू0) से पहले प्रचलित वाचिक परम्परा में ट्राय समाहित ट्राय युद्ध की दंतकथाओं और किंवदन्तियों का अनेक प्रकार से विश्लेषण, इतिहास, लेखन, साहित्यिक समालोचना और सांस्कृतिक नृतत्त्वशास्त्र के क्षेत्र में अनेक प्रकार से विश्लेषण किया गया। विद्वान् इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि कोई एक कृति अन्तिम रूप से निर्णायक और प्रामाणिक नहीं रही है।

डॉ॰ कामिल बुल्के ने अपनी पुस्तक ‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ में यह लिखा है कि आदि-कवि वाल्मीकि ने 12 हजार श्लोकों में इस आख्यान की रचना की थी। कई शताब्दियों तक यह आदि-काव्य मौखिक रूप से ही प्रचलित रहा। फलतः श्रोताओं की अभिरुचि को ध्यान में रख कर इसमें नई-नई घटनाएँ जोड़ी जाती रहीं। कनकमृग का वृत्तान्त, लंका दहन, हनुमान द्वारा औषध-पर्वत लाना, सीता की अग्नि-परीक्षा आदि। बुल्के के अनुसार जनसाधारण की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से बालकाण्ड के प्रारम्भिक रूप की रचना लोक-कल्पना की परिणति मानी जाएगी। 

बहुत से विद्वान् वाल्मीकि-रामायण के लिखित, मुद्रित तीन पाठ मानते हैं- दक्षिणात्य पाठ (गुजराती प्रिंटिंग प्रेस, बम्बई का संस्करण), गौड़ीय पाठ (गौरेसियों द्वारा सम्पादित एवं रेरिस में 1842 में प्रकाशित), पश्चिमोत्तरी पाठ (दयानन्द महाविद्यालय लाहौर का संस्करण)। इसके अतिरिक्त दशरथ जातकम्, अनाम जातकम् तथा दशरथ कथानम् भी रामकथा पर आधारित हैं। इन ग्रंथों में हिन्दू रामकथा जैसे मूल्य नहीं हैं। देशकाल-भौगोलिक परिस्थितियों का प्रभाव काव्य-रचना पर पड़ना अनिवार्य है और ऐसी स्थिति में जीवन-मूल्यों में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है इसलिए इसके पठन-पाठन का दृष्टिकोण भी बदलेगा। इसलिए लोकमंगल किसका, किसके द्वारा और क्यों के प्रश्न भी शाश्वत नहीं माने जा सकते। वाल्मीकि-रामायण पर गद्गद होना एक बात है और आधुनिक दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्त्व पहचानना दूसरी बात है। विवेक का रास्ता श्रम-साध्य है। सरलीकरण की कोई भी पद्धति, चाहे वह रूढ़िवादी हो या क्रान्तिकारी, इस दिशा में अपर्याप्त सिद्ध होती है। 

जैसा कि मैंने पहले कहा, इस पुस्तक के लेखक ने इन तुलनाओं में अधिकतर अनुवाद का सहारा लिया है और अनुवाद कितना सार्थक और ग्राह्य है, इसकी प्रामाणिकता को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया, लगता है इसलिए अपने मत को सिद्ध करने के मोह से वह कुछ ऐसे नामों और उद्धरणों का सहारा लेता है, जो इस दिशा में अल्पज्ञ ही नहीं, अप्रासंगिक भी हैं। 

पुस्तक की भाषाशैली भी लोकप्रियता की सीमाओं से छिटक गई है। अतः कहीं-कहीं अपठनीय हो जाती है। लेखक के धैर्य की और हठ की प्रशंसा की जानी चाहिए अन्यथा इस रूप में इस पुस्तक का आविर्भाव संभव नहीं था। एक अधिवक्ता के रूप में भी विजय रंजन ने अपने मुवक्किल के हितों का ध्यान हर हाल में रखा है। पर इस अदालती बहस का अन्तिम निर्णय पाठक के बुद्धि-विवेक पर निर्भर करता है।    

  - जे 363, सरिता विहार, मथुरा रोड, दिल्ली, दूरभाष: 9871638634,       

               (‘अक्षर पर्व’ जून 2013 में प्रकाशित)

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वाल्मीकि-रामायण के उद्गम की खोज है

      साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण
                  - स्वप्निल श्रीवास्तव    
हम सब जानते हैं कि वाल्मीकि-रामायण, रामकथा का आदि-ग्रंथ है। उसका समय और समाज अलग है। रामकथा को लेकर 250 से अधिक रामकथा के ग्रंथ अनेक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। रामकथा के प्रणयन में कवियों की दृष्टि अलग है। रामकथा के चरित्रों को लेकर उनकी व्याख्याएँ अलग हैं लेकिन जब हम राम के जीवन-चरित से टकराते हैं अथवा उस पर विचार करते हैं तो हमारे सामने वाल्मीकि  की रामायण जरूर रहती है। वाल्मीकि जैसे दलित कवि ने सीता को जितना दृढ़ दिखाया है वह यह सिद्ध करता है कि वे स्त्री को एक स्वायत्त और प्रगतिशील भूमिका में देखना चाहते थे। सीता की तुलना में राम का चरित्र कमजोर है। कहीं न कहीं राम की लोकनायक की छवि खण्डित होती है।
‘वाल्मीकि-रामायण’ को ‘साहित्य की तुला’ पर तौलने का कार्यभार कवि, कथाकार, सम्पादक विजय रंजन ने उठाया है। इस कार्य को संभव करने के लिए तत्कालीन ग्रंथों और सूत्रों का अवगाहन किया है। यह कठिन और दुस्साहसिक कार्य है। कठोपनिषद, सामवेद, अथर्ववेद, मुण्डकोपनिषद, यजुर्वेद के साथ आचार्य दण्डी, भामह, भवभूति, राजशेखर एवं आचार्य मम्मट की स्थापनाओं और उद्धरणों से टकराते हैं वे। उन्होंने कालिदास, कबीर तथा रामकथा के विवादास्पद उपन्यासकार डॉ0 भगवान सिंह का भी अनुशीलन किया है। उनका यह कृत महाकवि तुलसीदास के रामचरितमानस के बिना अधूरा है। तुलसीदास ने रामकथा को अवधी भाषा में लिख कर उसे जन-सामान्य को सुलभ कराया है यानी वाल्मीकि-रामायण की जाँच-परख के लिए उनके पास औजारों की कमी नहीं है।
इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में ‘प्राचीन एवं मध्ययुगीन आर्ष भारतीय काव्य मनीषा और वाल्मीकि-रामायण’ विषय पर प्रकाश डाला गया है। लेखक ने अपनी स्थापनाओं की पुष्टि के लिए विश्वसनीय स्रोतों का सहयोग लिया है। यह इस पुस्तक का आधार अध्याय है और महत्त्वपूर्ण भी है। लेखक ने इस अध्याय में सम्यक् विवेचना की है।
दूसरा अध्याय ‘अर्वाचीन हिन्दी काव्य मनीषी और वाल्मीकि रामायण’ शीर्षक के अंतर्गत है। लेखक लिखता है कि “ आचार्य शुक्ल ने महर्षि और रामायण के बारे में हिन्दी साहित्य के इतिहास में संक्षिप्त चर्चा की है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। आचार्य शुक्ल ने रामचरितमानस में लोकमंगल जैसे लोकतत्व की खोज की है। कितना अच्छा होता कि वे रामचरितमानस की व्याख्या के साथ वाल्मीकि रामायण का उल्लेख करते।  ” लेकिन आलोचक अपनी स्थापना के अनुसार काम करता है। इस अध्याय में विजय रंजन ने जयशंकर प्रसाद, बाबू गुलाबराय, अज्ञेय के काव्य- उद्देश्यों की चर्चा की है, उसे अपने विषय के साथ जोड़ा है। उन्होंने मुक्तिबोध का बहुपठित वाक्य उद्धृत किया है, जिसमें वे कहते हैं - “  जनता का साहित्य का अर्थ जनता को तुरन्त समझ में आने वाले साहित्य से हर्गिज नहीं है। अगर ऐसा होता तो किस्सा तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य का प्रधान रूप होता। ” इसी तरह रामविलास शर्मा का वाक्य पठनीय है-  “ लेखक स्थायी (कालजयी) साहित्य तभी दे सकता है जब वह अस्थायी लगने वाली परिस्थितियों का चित्रण करे। ”
लेखक ने अपनी स्थापनाओं की पुष्टि केे लिए डॉ0 रामकुमार वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, जगदीश गुप्त, डॉ0 रघुवंश के विचारों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। कितना अच्छा होता वे वाल्मीकि-रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंगों को हमारे सामने लाते, तो इससे लेखक का मूल उद्देश्य स्प्ष्ट हो जाता। आगे चल कर लेखक कहता है-- ‘पूर्वाग्रह’ के 109 अंक में वागीश शुक्ल ने वाल्मीकि-रामायण की बेबाक व्याख्या दी है। उनका महत्वपूर्ण  वाक्य है- उन्होंने बताया है कि वाल्मीकि-रामायण रामकथा की आलोचना है। यह कथन महत्त्वपूर्ण है। वाल्मीकि-रामायण के पात्र दिव्य-पोषित नहीं हैं। उनके भीतर गुण के साथ कमजोरियाँ भी हैं। यह विवाद का बिन्दु भी है। प्रायः महाकाव्यकार या खण्डकाव्यकार अपने नायकों को ऐसा स्वरूप देते हैं जो यथार्थ से भिन्न वायवीय होता है। उसे देवताओं की कोटि में पहुँचा कर चरित्र की स्वाभाविकता को नष्ट कर देते हैं। चाहे वाल्मीकि-रामायण हो या रामचरितमानस दोनों के रचनाकारों ने अपने समय और उद्देश्यों को ध्यान में रख कर इच्छित ग्रंथों की रचना की है। वाल्मीकि का यथार्थ रामचरितमानस के लोकमंगल से अलग है। बड़ी से बड़ी कृतियाँ आलोचना के लिए स्पेस (स्थान) छोड़ती हैं और नए विमर्श को जन्म देती हैं। किसी भी कृति के मूल्यांकन के लिए असहमतियाँ नव्य-आलोचना के लिए प्रेरित करती हैं।
विजय रंजन ने भगवान सिंह की कथा असहमति और जैनसाहित्य के विद्वान (!) पुष्पदंत के इस मत का उल्लेख किया है जिसके अनुसार वाल्मीकि और व्यास ने लोगों को गुमराह किया है। यह मत अपनेआप में पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। असहमति का अर्थ पूर्णतः नकार नहीं है। पुष्पदंत ने आगे चल कर राहुल के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वोल्गा से गंगा तक’ में वाल्मीकि को राजभक्त चाटुकार कहा है। ऐसे सिनिकल लोग साहित्य और इतिहास के प्रति घोर अज्ञानी होते हैं और बिना सिर-पैर के वाक्यों के जरिये सनसनी पैदा करते है। ऐसे लोगों का उल्लेख ही व्यर्थ है।
विजय रंजन ने कृति का पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को साथ-साथ प्रस्तुत कर लोकतांत्रिक दृष्टि का परिचय दिया है। यह एक तरह से आलोचकीय उदारता है।
वाल्मीकि लोकधर्मी कवि हैं या नहीं ? इस हेतु लेखक ने डॉ0 राधावल्लभ त्रिपाठी की कृति ‘संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा’ की समीक्षा में वाल्मीकि-रामायण को लोकधर्मी परम्परा का काव्य मानते हुए अपनी कृति में इस कृति को बड़ा सम्मानपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने आगे यह भी बताया है कि नामवर सिंह ने अपने सम्पादकीय (आलोचना-83) में केवल दूसरी परम्परा के कवियों और उनकी कविताओं की चर्चा की है जबकि राधावल्लभ त्रिपाठी ने स्वीकार किया है कि वाल्मीकि, भास और कालिदास के नाटकों तथा बाण की रचनाओं में लोकधर्मी चेतना है।
किसी भी ग्रंथ में सम्बन्धों की अलग-अलग दृष्टि होती है। इस पर किसी को किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए बल्कि उनके मत की सम्यक् रूप से जाँच करने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का धैर्य आवश्यक है। इस अध्याय में लेखक ने डॉ0 राममनोहर लोहिया के वाल्मीकि रामायण पर टिप्पणी को स्थान दिया है-  “ राम का चरित्र ऐसा है जिनके पीछे चलने का मन होता है। राम आगे हैं तो आश्वासन है कि कोई आगे है जो राह बताएगा। जिस राह पर चलेगा, वह राह अच्छी होगी।  ” राममनोहर लोहिया ने राम के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण कथन किया है। निश्चित रूप से रामकथा नायक नहीं लोकनायक हैं। वे शब्दों में नहीं लोककण्ठों में जीवित हैं। उनकी अनन्त व्याख्याएँ होंगी। कहा भी गया है - ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।’
रामकथा संस्कृत और हिन्दी भाषा तक सीमित नहीं है। अन्य भाषाओं में रामकथा की रचना हुई है। राम के लोक की सीमाएँ देश की सीमा का अतिक्रमण करती हैं। उर्दू कवियों के यहाँ राम काव्य-विषय बने हुए हैं। अल्लामा इकबाल की नज्म को लेखक ने उद्धृत किया है- ‘है राम के वजूद पर हिन्दोस्ताँ को नाज। अहले नजर समझते हैं, उनको इमामे हिन्द।’ निश्चित रूप से यह काव्यांश बँटवारे के पहले का लिखा हुआ लगता है। बशीर बद्र, कैफी आजमी, मुनव्वर राना और बेकल उत्साही जैसे शायरों ने भी अपनी शायरी में किसी न किसी रूप में राम का उल्लेख किया है। यह मानना चाहिए कि राम हिन्दू के ही आराध्य नहीं है, वे मनुष्यता के नायक हैं। उर्दू लेखक डॉ0 एस0 आबिद हुसेन ने कहा है - ‘यथार्थ में कहा जाए तो वाल्मीकि-रामायण धार्मिक काव्यग्रंथ नहीं है बल्कि उसे चिरन्तन काव्य का पहला उदाहरण माना जा सकता है।’ संस्कृत हिन्दी भाषा से इतर कम्बन रामायण (तेलुगू), ‘रामचरितम्’ (मलयालम) के अलावा कन्नड़ और उडि़या भाषा में रामायण की रचना हुई है। इसी तरह गोविन्द रामायण पंजाबी भाषा में लिखा गया है।
इस पुस्तक का अन्तिम अध्याय का शीर्षक ‘पाश्चात्य काव्य मनीषा और वाल्मीकि-रामायण’ है। यह अध्याय काव्य की सैद्धान्तिकी पर रोशनी डालता है। इस अध्याय में यह बताया गया है कि पश्चिमी काव्य-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में वाल्मीकि-रामायण की अवस्थिति क्या है ? इस अध्याय में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू के महाकाव्य और काव्य के सम्बन्ध में विचार-विमर्श है जिसके जरिये वाल्मीकि-रामायण के काव्य-तत्त्वों और संरचना की जाँच की गई है। लेखक का मत है कि वाल्मीकि रामायण त्रासदी का काव्य नहीं है। मेरा अपना विचार है कि पाश्चात्य और भारतीय मूल्य अलग हैं। हम पश्चिमी वैचारिकी को पूर्व के महाकाव्यों के संदर्भ में लागू नहीं कर सकते। लेकिन विजय रंजन ने विवेचना का खतरा उठाया है। यह आलोचकीय दुस्साहस विजय रंजन का मुख्य भाव है। इसी प्रकार पश्चिम के प्रमुख विचारकों, टी0 एस0 इलियट, रिचर्ड की प्रकारान्तर से चर्चा की गई है। मिल्टन के पैराडाइज़ लास्ट का संदर्भ दिया गया है।
इसमें सन्देह नहीं कि लेखक ने वाल्मीकि-रामायण के स्थापत्य और मूल भाव को समझने के लिए उसका गहन अध्ययन किया है जो इस पुस्तक को पढ़ कर सहज ही जाना जा सकता है। अपनी बात कहने के लिए आप भाषा की जगह सैद्धान्तिक भाषा का उपयोग करते हैं लेकिन अगर ठीक से विचार किया जाए तो इस तरह के ग्रंथ के विवेचन के लिए आमबोलचाल की भाषा पर्याप्त नहीं है। यह पुस्तक पाठकों को किसी न किसी रूप में अवश्य विचलित करेगी और पाठक संस्कृत के वाङ्मय से लेकर अधुनातन विचारधाराओं से परिचित हो सकेंगे। वाल्मीकि जैसे मनीषी कवि का भाष्य और व्याख्या अपने आप में कठिन कार्य है। यह विमर्श का सामान्य विषय नहीं है। इसमें अवगाहन के लिए गहरी दृष्टि और विचार की आवश्यकता है। लेखक ने यह कठिन चुनौती स्वीकार कर वाल्मीकि-रामायण को चर्चा के केन्द्र में लाने का महती कार्य किया है। देखें इस कार्य को आगे कौन बढ़ाता है ?        

                           - आवास विकास कोलोनी, अमानीगंज, फैजाबाद (उ0प्र0)            
                                       (अवध-अर्चना, मई-जुलाई 2013 में प्रकाशित)

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