‘दर्पण तीरे’
- समीक्षक: डॉ॰ किरण त्रिपाठी
पेशे से अधिवक्ता, बुद्धि से आलोचक और हृदय से विविध आयामी कवि विजय रंजन जी वर्तमान साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।
उन्होंने अपने साहित्यिक एवं पत्रकारिता लेखन का आरंभ 1965 से किया था और तब से निरन्तर सृजनशीलता में लगे हुए हैं।
उनकी अब तक आलोचना, समीक्षा एवं कविताओं की कई कृतियाँ प्रकाशित तथा पुरस्कृत हो चुकी हैं।
रंजन जी की सन् 2021 ई॰ में प्रकाशित कृति ‘दर्पण तीरे’ 60 हिन्दी गजलों, 2 अवधी गजलों और 1 नज्म यानि 63 रचनाओं का संग्रह है। .......
इस संग्रह की प्रत्येक रचना में जहाँ एक ओर छन्द और भाषा का सुसंगठित स्वरूप है, वहीं दूसरी ओर भावों तथा विचारों की प्रौढ़ता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है।
संग्रह में विषय की नवीन इंद्रधनुषी छटा मन को आकर्षित करती है। एक सजग साहित्यकार की भाँति रंजन जी अपने आसपास के वातावरण में घटित घटनाओं का शाब्दिक सजीव चित्रण करने में समर्थ साहित्यकार हैं।...........
विजय रंजन जी का प्रत्येक शेर जीवन का फलसफा बयां करता है।..........विजय रंजन जी भारतीय मिट्टी से जुड़े हुए साहित्यकार हैं। उन्हें ग्रामीण परिवेश की कुप्रथाओं की विशेष समझ है। आज भी गाँव में लड़कियों को बोझ माना जाता है और उन्हें शिक्षित तथा आत्मनिर्भर बनाने के स्थान पर बालविवाह की खाई में धकेला जा रहा है। इस कुप्रथा को समाप्त करने की छटपटाहट को अपने इस अवधी शेर में प्रस्तुत करते हुए लड़कियों के बालविवाह को अवैध बताते हुए दण्ड के प्रावधान का भी उल्लेख रंजन जी करते हैं-
“आठ बरस कै गौरी ब्याहियौ,
जेलवै म जइहौ, रामभरोसे।।”
इस प्रकार ‘दर्पण तीरे’ समाज को सच का आईना दिखाने वाला संग्रह है । इसमें जागरूकता, सजगता और भावुकता की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित है जिसमें पाठक अपनी बुद्धि को स्नान करा कर तरोताजा अनुभव करेंगे।
-विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट (उ॰प्र॰),
दूरभाष: 8960708724
समय और समाज से संवाद : ‘दर्पण तीरे’
- निशेष जार
............प्रसिद्ध चिन्तक, विचारक और ‘अवध-अर्चना’ के यशस्वी सम्पादक विजय जी साहित्य जगत् में परिचित-चर्चित नाम हैं। हिन्दी गजल-सरिता अब अवरोध-तटों को तोड़कर अविरल धाराप्रवाह में चल पड़ी है। ‘दर्पण तीरे’ श्री विजय रंजन के गजलकार का समय और समाज से संवाद है। ‘दर्पण तीरे’ में प्रेम की पावनता से लेकर सामाजिक सरोकार की कहन स्पष्ट दृष्टिगत होती है। संग्रह की गजलें हिन्दीमय हैं जिनमें हिन्दी का संस्कार स्पष्ट दिखाई देता है। संस्कृत-निष्ठ हिन्दी भी है, पर उर्दू और अवधी के सामान्य प्रयोग को रोकने का प्रयास नहीं है। उर्दू , अवधी को भी सहजता से आने दिया गया है, जो भाषा को और अधिक व्यापक व सुग्राह्य बनाता है। ये गजल-संग्रह यदि पाखण्ड पर चोट करता है तो इसमें युगबोध भी है। गजलकार स्वतंत्र और निरपेक्ष है-
यह कैसी आजादी रामराज्य लाने में।।
संविधान कैद हुआ उनके आशियाने में ।।
गजल का व्याकरण उर्दू भाषा का है। एक भाषा से दूसरी भाषा की लिपि और उच्चारण में अंतर होता है। इस दृष्टि से कहीं-कहीं लगता है कि बह्र में बने रहने के प्रयास में गेयता में बाधा है और कहीं बह्र से भारी छूट ली गई है।
समग्र रूप से संग्रह स्वागत-योग्य है। पाठकों को रसानंद प्रदान कर प्रसिद्धि प्राप्त करने में यह अवश्य सफल होगा। आमीन। - दूरभाष : 9027183306
गजलों का गुलदस्ता : दर्पण तीरे
- समीक्षक : डॉ॰ अश्विनी सिंह
.........कवि की नज्में और गजलें और गजलों का गुलदस्ता (दर्पण तीरे) कवि की उत्कृष्टता और उदात्तता का चरम बिन्दु है।......
- असिस्टेंट प्रो॰, इलाहाबाद वि॰ वि॰, प्रयागराज, उ॰ प्र॰
मूल्यहीनता के विरुद्ध सजग करता
‘दर्पण तीरे ’
-समीक्षक: माधवकृष्ण
........लम्बे समय से साहित्य-साधना कर रहे गजलकार विजय रंजन अपनी पुस्तक ‘दर्पण तीरे’ में कहते हैं: ‘गजल ओढ़ लें गजल बिछा लें/ ऐसे दुष्यन्त बहुत कम हैं/गजलों से सहवास निभाना/ तुम भी सीखो मैं भी सीखूँ’। .....उन्होंने गजलों के दारे में कसीदे, प्रेम, किस्सागोई, चीखें सब कुछ रखा है। महत्त्वपूर्ण विधा नहीं, भाव हैं। यह साहित्यकार का चयन है कि वह किस विधा में अपने युग की आवाज प्रतिबिम्बत करता है। ‘.........जब तब कहती एक गजल ’ दर्पण तीरे’ की प्रथम गजल है और इसमें उनका सीमांकन ही गजल की समूची यात्रा को समझने का एक प्रयास है। .........गजलकार आज के साहित्यकारों के दोहरे जीवन के द्वन्द्व से भलीभाँति परिचित है। वह लिखता है- ‘गीत गोविन्द ऐसे न रच पाओगे/भावना में अगर द्वन्द्व संघात है’। मनुष्यता ही साहित्यकार की पहली कसौटी है। निष्ठा, ईमानदारी, सहिष्णुता जैसे बेमानी होते जा रहे शब्दों और भावों पर गजलकार की पैनी नजर है- ‘किसी सितारे का आमंत्रण /तुम्हें मुबारक हो/ नहीं जरूरी जीने के/सौ हज्जार बहाने ’।पुरस्कारों के लिए सत्य कहने से कतरा रहे और साहित्यिक खेमों में बँधे हुए पशुवत् साहित्यकारों के लिए विजय रंजन जी कहते हैं- ”सिर गिरवी रखने की शर्त को/ कौन भला माने ! /मत आओ तुम पास हमारे/जाने-अनजाने।“ पूँजी, यश, पुरस्कार, प्रसिद्धि का तात्कालिक दबाव हो सकता है और उनके लिए मनुष्य प्रयासरत भी हो सकता है लेकिन इस दौड़ में भी सत्य के साथ खड़ा होना और बुद्धि को सर्वोपरि स्थान देना एक निष्ठावान् साहित्यकार के लिए ही संभव है। .....गजलकार साहित्यकारों को उस धर्म की याद दिलाते हुए परिस्थितियों के विषय में सुकरात बने रहने के लिए प्रेरित करता है- ”हाँ सृजन, बस सृजन/देह का धर्म है/देह के बाद क्या/बाद की बात है......क्यों डरेगा भला/ किसी तक्षक से वो/ लोग कहते हैं /रंजन भी सुकरात है।“ ........आज भी भारत के तमाम अकादमिक व साहित्यिक संस्थान प्रोपगेण्डा और फेक नैरेटिव का सृजन करने में लगे हुए हैं। विजय रंजन के व्यंग्य की धार अचानक तीव्र हो उठती है और एक गजल में वे कह उठते हैं- ”सिंहासन संग गिरते उठते/क्या शेयर बाजार हैं साहब ! “ ..........जीवन के केन्द्र में वित्त के बैठने से ग्रामीण जीवन भी अछूता नहीं रहा........घरों में मनुष्यता का स्थान ब्राण्डेड वस्तुओं, कपड़ों और गाड़ियों ने ले लिया। विजय रंजन जी की गजलों में इस परिवर्तन का दुःख दिखता है- ”तुम कह दो न कैसे उठा/ यह दौर हमारे गाँव से/बहकी नदिया लील गई /सुख ठौर हमारे गाँव से/.....हमरे भाई चले गए हैं/दिल्ली, बम्बे लुधियाना/शायद उनको मिल न सका/ दो कौर हमारे गाँव से/...../ पाँच बरस पहले आए थे /यहाँ पे लेता मत पूछो/क्यों कैसे बन बैठे वे/मुँहचोर हमारे गाँव से....“ इस एक गजल में गजलकार ने उन सभी समस्याओं का कारुणिक चित्रांकन किया है जिनसे गाँव आज त्रस्त हैं। इन पंक्तियों पर ठहरने और सोचने की आवश्यकता है।
......सियासत को सामान्य भारतीय सन्देह की दृष्टि से देखने लगा है।.......“करने वाले करते हैं/संसद से सड़कों की बातें/बस्ती के बेबस मछुआरे डूब गए बरसात में।“ मतदाता मोहरे बन चुके हैं........”आश्वासन की स्वर्ण अँगूठी/शकुन्तला के सपने/होगा क्या जो लील गई /दिलजानी चढ़ी नदी..../शब्द अथर्र की सीमा रेखा/छोड़ बहुत पीछे/सुबह शाम में गढ़ लेगी/नई कहानी चढ़ी नही।“
......राजनैतिक प्रवक्ताओं और साहित्यकारों न हर उस काम के लिए एक नया नैरेटिव गढ़ लिया है जिसके लिए उनके पास कोई तार्किक उत्तर नहीं। मार्गदर्शक बुद्धिधर्माओं की इस सुप्तावस्था या जनबूझ कर सोने के अभिनय पर गजलकार नए बुद्धिधर्माओं को तैयार करने और खोजने पर बल देता है- ”चेहरों की मत भीड़ लगाओं/सोया दर्पण सो लेने दो/रंजन ढूँढों नए पारखी/जो असली-नकली को छाँटें//“। इस पारखी का एक मानक है विवेक और केवल नीर-क्षीर विवेक।
विजय रंजन जी अपने जीवन के अनुभवों को दार्शनिक की भाँति रखना नहीं भूलते। बाजारवाद से आजीवन संघर्ष करने के बाद उन्हें यही समझ में आता है- ”काश कहीं तुम भी अपना/एक नया बाजार बनाओ/दुनिया सारी खरीदार है/उससे भी सम्बन्ध निभाओं //“। ऐसे ही एक स्थान पर वह अपने जीवन का अनुभव साझा करते हैं : ”मत बढ़ने दो जिद को इतना/पागलपन बन जाए/भँवर बढ़े है डूबे है तब/माँझी कूल-किनारा।।“ यह शे’र सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में अपनाने योग्य है। ..........
विजय रंजन जी लगातार सृजन कर रहे हैं और अभी उनकी एक नयी पुस्तक आई है ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’। ‘दर्पण तीरे’ एक महत्त्वपूर्ण संकलन है, जो अपने समय के साथ सम्वाद करते हुए हमें मूल्यहीनता के विरुद्ध सजग करता है।
- द प्रेसिडियम इण्टरनेशनल स्कूल, गाजीपुर-233001, दूरभाष: 9628130664
समाज को दर्पण दिखाता गजल-संग्रह ‘दर्पण तीरे’
-समीक्षक: डॉ॰ रेनू यादव
विजय रंजन द्वारा सृजित ग़ज़ल संग्रह ‘दर्पण तीरे’ अपने आप में एक गहरा भाव बोध लिए है। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता, जो जैसा है वैसा ही दिखाता है। इस नाम से स्पष्ट है कि यह संग्रह समाज की सच्चाईयों से ज्यों का त्यों रू-बरू करवाएगी। विजय रंजन सीधे-सरल तरीके से अपनी भावनाओं को बयाँ करते हैं। “मेंहदी रचे हाथ से तुमने, एक रात रच दी थी ऋचा” से प्रारंभ होकर “कह दो तुम्हें, जो कहनी हैं राज की बातें” तक ग़ज़लगो प्रेम, अध्यात्म, आत्म-चिंतन, सामाजिक चेतना, व्यंग्य आदि कई पड़ावों से गुजरते हुए समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं।
विजय रंजन के लिए ‘आँख गुलाबी, चुनरी धानी’ के माध्यम से महबूब से या महबूब की बातें मात्र कोमल भावनाओं की बातें नही,ं बल्कि महबूब का हिफ़ाजत करना, उसका सम्मान उतना ही आवश्यक है जितना कि प्रेम। वे प्रत्येक महिला को गाँव, घर में धोखा देने वाले दुष्यंती परिपाटी की कलुषित नज़रिए से बचाने और समाज में हो रहे लगातार महिलाओं के साथ धोखा, अत्याचार, बलात्कार को देखते हुए ‘बंद कर दे नोचना, मासूम तितलियों के पंख’ कहकर समाज को सलाह भी देते हुए दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि जिस दिन आँखों का पानी मर जाएगा, उस दिन इंसानियत भी समाप्त हो जाएगी। वे “मंदिरों की ओट ले, जब खो गईं डगरें” में इंसानियत की राह ढ़ूँढ़ते हैं, तो धर्म, गाँधी, ज्ञान, गीता का अनुसरण करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। साथ ही, मंदिर-मस्जिद के नाम पर आम आदमी को बाँटने वाले तथा राजनीति के रंगीन ठेकेदारों का जनता के साथ पावर गेम खेलने पर कटाक्ष करते हैं तथा उनके मुखौटे को हटाकर असली चेहरा सामने ले आने पर विश्वास करते हैं -
“झूठ नहीं टिकता है ज्यादा,
सच ही असरदार है साहब”
वे कहते हैं कि 15 अगस्त 1947 में देश की आज़ादी के लिए जितनी लड़ाई लड़ी गई थी इन राजनीति के ठेकेदारों के कारण आज़ादी महसूस नहीं हो पा रही। ऐसा प्रतीत होता है कि रामराज्य के नाम पर संविधान भी कैद हो गया है। गाँधी के इस अहिंसक देश में हिंसा की बढ़ती प्रवृति ने आँखों का पानी सोख लिया है तथा राजमुकुट के लिए झूठे वादे आम बन गई हैं। अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए आदर्शों को ताक पर रखने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है-
“जिन्दगी शतरंज जैसी, जीतनी बाजी हमें,
और लग जाए भले आदर्श कोरे, दाँव पर”
विजय रंजन का दर्शन लौकिक-पारलौकिक दोनों को ही सत्य मानते हुए विश्वास पर आधारित मानते हैं।
“’अवगत्’ सत् है तो भी, सत् है ‘वस्तु’, ‘बिम्ब’ नहीं” का रहस्य समझाते हुए वे कहते हैं कि रहस्यवाद में जो दिखाई नहीं देता, वह ज्ञान सत्य है, जिसके अंतर्गत यह संसार परब्रह्म का प्रतिबिम्ब मात्र है, तो इहलौकिक संसार में जो दिखाई देता है यानी वस्तु भी एक सत्य है, जिसकी प्रतीति हृदय में पड़ने वाले बिम्ब से होती है। दोनों ही सत्य अपने-अपने विश्वास पर आधारित हैं। वे ग़ज़लगो शब्द-अर्थ की सीमा को सांसारिकता से परे मानते हैं, लेकिन सांसारिकता में शब्दों के अर्थ और अर्थ के अनुसार शब्दों के निर्माण में सृष्टि का सृजन और संहार बनता है। उनका कहना है कि प्रेम ईश्वर से हो अथवा किसी मनुष्य से, प्रेम प्रेम होता है। जिस क्षण का साक्षात्कार होता है वही क्षण सार्थक है -
कौन कहता है क्षण निरर्थक हैं, जब,
इन क्षणों में हमारी मुलाकात है ।
इन सबके लिए आत्मबल की आवश्यकता होती है। आत्मबल के कारण ही बड़ी से बड़ी लड़ाईयों पर विजय पायी जा सकती है। ठीक वैसे ही जैसे कि बाँसुरी स्वयं में साँस भरने यानी अपनी शक्ति से बजती है, वरना अपने आप में बाँसुरी का कोई महत्त्व नहीं।
इन ग़ज़लों में तुकांत, रदीफ तथा तत्सम शब्दों के साथ का सुन्दर समन्वय हुआ है। छन्दों की विविधता के बावजूद भी सरल भाषा में अभिव्यक्ति इन ग़ज़लों को अत्यंत ग्राह्य बना देती है। ये गज़लें न तो मात्र बौद्धिक जुगाली हैं और न ही मात्र शृंगार रस से पगी बल्कि विजय रंजन जी अपने शायर कर्म निभाते हुए समाज का मार्गदर्शन करने में सफल हुए हैं।
-रिसर्च/फेकल्टी असोसिएट, भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा-201312 (उ.प्र.)

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