कविता की रोचक डुगडुगी :‘ कितनी दूर और चलने पर ’
भौतिकतावाद के परवान चढ़ने के आज के युग में हमारे देश में नितान्त असाहित्यिक परिवेश में कविता के लिए अवकाश और अवसर प्रायः विलुप्त सा है। दाल-रोटी की जुगत में लगे रहने वाले श्रमिक/निम्न वर्ग की कौन कहे, मध्य एवं उच्च वर्ग के बहु-बहुलांश जन के लिए भी ‘कविता’ कविता-वविता जैसी चीज़ बन गई है आज। सवा अरब भारतवासियों में से साढ़े बारह हजार लोग भी नहीं मिलेंगे जो कविता के प्रयोजन, कविता की वांछा और कविता के विविध आयामों से सरोकारित हों। जो कथित कविता-प्रेमी कवि दिखते हैं, उनमें भी बहु-बहुलांश कविता को मनोरंजन मात्र का माध्यम मानते हैं। जो कथित विचारशील कवि अत्यल्प संख्या में हैं भी, वे समकालीन कविता के नाम पर कविता को गद्यगीत बनाते हैं। यदा-कदा कथित संवेदनशील कवि जो इतस्ततः दिखते हैं, वे भी कविता के वस्तुनिष्ठ अपेक्षाओं के बजाय कविता को मात्र संवेदना की अभिव्यक्ति तक सीमित मान कर शब्दों की जोड़-तोड़ को ही कविता कहते हैं। साहित्य के ऐसे त्रासद देशकाल में श्रेष्ठ शब्दायन वाले सरस गीत-नवगीत या कि उदात्त मनोभावों वाली गजल के लिए अवकाश कहाँ है ? तब, क्या आश्चर्य कि ‘बंसी और मादल’ या ‘साए में धूप’ जैसी काव्य-कृतियाँ कभी-कभार ही देखने को मिलती हैं। कुमार रवीन्द्र, नईम, नचिकेता, माहेश्वर तिवारी, इसाक अश्क, यश मालवीय, कुमार विश्वास कितने हैं आज ? ऐसी अवस्थिति में नवगीत सह गजल की श्रेष्ठ प्रस्तुति ‘कितनी दूर और चलने पर’ किसी भी सहृदय को एक बार नहीं, दुबारा-तिबारा भी पढ़ने को विवश कर सकती है। मेरी इस टिप्पणी को फतवा न मानें औ..र, स्वयं पढ़ लें आलोच्य कृति ‘कितनी दूर और चलने पर’। संवेदनशील कवि डॉ0 सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी की सद्यःप्रकाशित कृति है यह। निःसन्देह आप भी सहमत हो जाएँगे कि कृति की नवगीत और गजल विधा में अभिरूपित कविताएँ किसी भी काव्य-रसिक का ध्यान अपनी ओर संकेन्द्रित करने में समर्थ हैं।
‘ज्यों ही तने गुलेल तुरत ही मैना का डैना खुल जाए’ जैसी पंक्तियों में सहित भाव का सहज इंगित या कि ‘कुछ ऐसे हो बोल कि पिंकी, सारी वीरानी धुल जाए’, ‘मटमैली हो नदी न अब अपने उद्गम पर’, ‘बज रहे हैं डुगडुगी से वक्त के हाथों सभी’, ‘मित्र हम रोपें हरापन इस कड़े पतझार में’ सदृश काव्य-पंक्तियों के काव्योद्गार,, प्रथम नवगीत से लेकर अन्तिम गजल तक सम्पूर्ण संग्रह में विद्यमान काव्य-पंक्तियों का रसास्वादन करने के पश्चात कोई भी काव्य-रसिक मुग्ध हो सकता है कृति पर। वहीं, सहित भाव, प्रादुष्कृतमन्यथा,शिवेतर की क्षति के दिशाबोध आदि भी भरपूर वाचाल हैं संगृहीत विभिन्न कविताओं में।
प्रकटतः, कृति की बहु-बहुलांश कविताएँ कवि की उत्कट काव्य-भावनाओं की उच्छल तरंगों को मात्र अभिव्यक्ति देने के लिए बेचैन नहीं प्रतीत होतीं, प्रत्युत काव्योचित अनेकानेक सद्गुण उच्छलित दिखते हैं कृति में। यथा --
“ बहुत शोर है, चलो बनाएँ नीड़ किसी बादल में हम तुम......”, “ कुछ तो कम हो उमस घनेरों की, तोड़ो अपने काँच खिड़कियो, घबराना मत इस आँधी में, अगर चटकना पड़े टहनियो ”, “ हाँ बताओ हम करें बर्दाश्त उनको किस तरह, ढोलकों पर आदमी की खाल मढ़वाते हुए ” सदृश पंक्तियों में ‘छन्दांसि यज्ञाः....भूतम् भव्यं....सृजते’ और ऊर्ध्ववाही संचेतना को मुखर करता है कवि। ऐसी लोकमांगलीय काव्य-साधना सर्वत्र परिव्याप्त दिखती है समीक्ष्य कृति में। प्रकट-अप्रकट स्वरूप में उदात्तता, मानवता, मानवीयता जैसे मानवोचित सद्गुणों का कुतुबनुमाई आरेखन आलोच्य कविताओं की विशेषता है।
औ..र, “ कौन कहता है आस्माँ में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों ” की तर्ज पर प्रत्युत उससे भी बढ़ कर आशावादी कर्मशील तमसः परस्तात को साकार करते हुए कवि लिखता है -
मोम की मानिन्द पिघलेगी अचानक जिन्दगी,
एक ठोकर मारिए तो इस कड़ी चट्टान को।
“ आँखों से अधिक रगों में अश्रु रहे हैं तैर ”, “ पाँव तले उभरे हैं देखो कितनी घनी नागफनियाँ ”, “ काट दिया कुछ लोगों ने कल, बस्ती का आखिरी नीम भी ”, ” कमरा है कमरे में घड़ी है रुकी सुईयों वाली ”, “ अरहर के खेतों से जीवन में दुबक गया खरगोश कहीं उल्लासों का ” आदि-आदि के माध्यम से कृतिकार वर्तमान की प्रतिकूलताओं और आसपास विद्यमान मानवीयता-विरोधी दुष्चक्रों को रेखायित करता है फिर भी “ गली-गली दुष्चक्र रचे हैं उच्छंृखल तम ने, किन्तु न अपनी कसम कभी तोड़ी पूनम ने ”, “ शुक्ल पक्ष हैं, अंधकार में हम, विश्वास नहीं रखते हैं ” जैसी व्यवहारविद् पंक्तियाँ रच कर तमोनुबेध का कवि-दायित्व भी निर्वहित किया है कवि ने। “ पृथ्वी के सारे काँटों की नोक और ये पैर, है न हमारी खैर ” लिख कर परिवेश में फैली दुश्वारियों के समक्ष अपनी अल्प सक्षमता को वाचाल करता है कवि। ले..कि..न, ‘स कवि काव्याः पुरुरूपम् द्यौरिव पुष्यति’ के ऋग्वैदिक निदेशन को रूपायित करते हुए “ अद्भुत गंध मिली प्राणों को, हम गुलाब से विहँसे जब तब ”, “ उड़ जाएँ मोर न घबरा कर, चुप रखने हैं आँगन इतने ” सदृश काव्यादर्श भी प्रस्तुत करता है कवि।वस्तुतः ‘न न्यूनम्, न अधिकम्’ के शास्त्रोक्त स्वरूप में कृति में प्रयुक्त शब्द, अर्थ, भाव के प्रायः सभी सद्गुण भीें आद्यन्त समोए हुए हैं इन कविताओं में इस सीमा तक कि प्रायः सभी गीत-नवगीत और गजलें किसी भी कविता-प्रेमी की टकटकी को स्वयं में बाँध लेने में सक्षम दिखते हैं।
वहीं, बिम्बवाद, वक्रोक्ति, अन्योक्ति, औचित्य सदृश काव्य-गुण तो सराहनीय स्वरूप में विजडि़त हैं ही आलोच्य कृति में। मुखपृष्ठ पर मुद्रित बिम्बवादी चित्रांकन और कृति-शीर्षक ‘कितनी दूर और चलने पर’ से लेकर कविता-शीर्षक ‘आए बहेलिए’, ‘पीतल की दृष्टियाँ हमारी’, ‘हम दरख्त हैं’, ‘आखिरी नीम’, ‘चिन्दी चिन्दी हम’, ‘गर्म हवा लिपटी है हमसे’, ‘छुओ उँगलियों से’, ‘तलवारों पर चलना’, ‘ओ दुनिया के कर्ज’, ‘देह सो गई’, ‘दुनिया है रंगोली जैसी’, ‘एक अदद तारा मिल जाए’, ‘सारी धूप पड़ी हम पर ही’, ‘ओ नदी’, ‘हिलती-डुलती मेजें हैं’, ‘साजिश अमावस की’, ‘एक तो शीशम मिले’, ‘हर निःश्वास एक कुबड़ा है’ आदि में कवि ने बिम्बवाद का सफल रूपायन साकार किया है। इस तरह अभिधा के साथ-साथ व्यंजना और लक्षणा की दृष्टि से भी श्रेष्ठ कही जाएंगी आलोच्य रचनाएँ।
प्रकृतिवाद के निकष पर देखें। वस्तुतः प्रकृति के उपादानों के सटीक प्रयोग से आलोच्य कविताएँ इस निकष पर भी सराही जाएंगी। प्रतीततः कवि को पक्षियों से विशेष लगाव है। कपोती, चकोर, सुगना, तोता, चकवी, बया, तीतर, बटेर, गौरेय्या, मैना, बत्तख, पिकी, टिटहरी, श्यामा, बुलबुल पहली कविता ‘आए बहेलिये’ में ही नहीं, बाद की अनेकानेक कविताओं में भी विभिन्न रूपकों में उपभुक्त हैं। गुलाब, नदी, वसन्त, शिला, चाँद, सूरज आदि के सुचारु प्रयोग कविताओं के प्रकृतिवादी होने के गहन साक्षी हैं। तीज-त्योहार से लेकर सड़क, पुल, रेलिंग, लालटेन तक का औचित्यपूर्ण प्रयोग भी है। प्रकृति, परिन्दे आदि का प्रचुर प्रयोग आलोक धनवा की कविताओं में भी है। ‘पहाड़ पर लालटेन’ वाले मंगलेश डबराल में भी प्रतीकात्मकता पर्याप्त है। प्रतीकात्मकता से रचना को गुरु-गम्भीर बनाने का काम नकेनवादी कविताओं के संग्रह ‘पश्पशा’ में भी दृश्यमान है ले..कि..न इन कवियों द्वारा प्रयुक्त प्रतीकात्मकताओं से आलोच्य कविताओं की प्रतीकात्मकता में मुख्य अन्तर है प्रयुक्त बिम्बों का सहज साधारणीकरण। प्रत्युत अन्यान्य कवियों से कहीं अधिक वाग्वैचित्र्य और वाग्वैदग्ध्य मुखर है आलोच्य कृति की कविताओं में ।
सारतः प्रचुर मानवीय संवेदना, मानवता के प्रति सचेतनता औ..र वैश्विक विसंगतियों से जूझने के भाव आलोच्य कृति की अधिकांश गीतिक रचनाओं को गीतांगनी में प्रथम बार निरूपित नवगीतिक निकषों से समेकित सिद्ध करते हैं। खटकने वाली बात है कि स्वयं रचनाकार कवि ने आलोच्य नवगीतों को ‘गीत’ क्यों कहा ?
औ..र, गजलें। ‘आँधियाँ, ज्वालामुखी, चिन्गारियाँ, शोले, अब गजल की हैं यही वंशावली बाबा’ की प्रकृति वाली गजलें, भले ही उनमें महबूबा से बातचीत का रंग-ढंग न दिखे और वे जदीद गजलों की तर्ज पर हों --ऐसी गजलों में से अधिकांश हालात-ए-हाजरा से दो-दो हाथ करने को उद्यत दिखती हैं।
गजल प्रखण्ड (यद्यपि गजल प्रखण्ड का अलग से नामकरण नहीं है कृति में लेकिन सारी गजलें एक साथ समाहित हैं क्रमवार) की गजलों में परम्परागत साकी, सागर, मीना, मय या कि किसी महबूब को प्रायः प्रत्यक्ष सम्बोधन नहीं है। आपवादिक गजल ‘भँवर के बीच आओ तुम’ में भी परम्परागत गजलियात का तसब्बुर नहीं है। दूसरी ओर, ‘रोशनी को रात भर बेचैन रहने दो जरा, एक घायल चाँद का कुछ खून बिखरा है यहाँ’, ‘हर घड़ी नोचे गए हैं पंख मन के, हम समय के हाथ आई तितलियाँ हैं’ जैसी व्यंजनापरक शे’रों की भरमार है आलोच्य कृति में। शायर चरागों का सबक साथ लेकर गजल में आग जलाने की कोशिश करता है। “ हर नगर में एक मुर्दा रोशनी का जिक्र है, जिन्दगी को आज थोड़ा सा चलो जिन्दा करें ” जैसे व्यवहारविद् अनुरोध या सागौन की सूखती टहनियों को शाख को सींचने की सलाह वाले मिसरे ‘वाह’ कहने को विवश कर देते हैं।
गजलों में हिन्दी के साथ उर्दू और यदा-कदा देशी शब्दों का भी सफल प्रयोग किया गया है; लेकिन हिन्दीइतर शब्द-प्रयोग में भी हिन्दी-व्याकरण का ध्यान रखा गया है। फलतः काव्यमय भाषा भी कृति में आम बोलचाल की भाषा बन जाती है। संगृहीत गजलों में उर्दू के प्रचलित शब्द, भाव या कि निचबिन्दी वाले अक्षरों के प्रयोग के बावजूद आलोच्य गजलें प्रथम बार 1965 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हिन्दी गजल के नाम से सुस्थापित और निरन्तर सशक्त बनती हिन्दी गजल की विधा वाली बहुलांश विशेषताएँ उजागर करती हैं। उर्दू/फारसी की गजल-परम्परा से विलग इन गजलों में मकता भी नहीं है।
औ...र ,संगृहीत गजलें हों या गीत-नवगीत, कमोबेश सभी में आचार्य भामह के कथन कि ‘दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे लेकर कविता न की जा सके’ को साकार किया गया है कृति ‘कितनी दूर और चलने पर’ में । वस्तुतः सत् $ शिव $ सार्वसुन्दरम् की समवेत आराधना के साथ-साथ मानव-जीवन की विसंगतियों का, विद्रूपों का आलोच्य कृति में किया गया कवितायन आलोच्य कविताओं को बलशील बनाता है। जीवन में व्याप्त कुण्ठा, संत्रास आदि का चित्रांकन औ..र उतनी ही कुशलता से विविध आयामी त्रास से उबरने का दिशाबोध........ बहुत कुछ रूपायित है आलोच्य कृति में।
संक्षेपतः, आचार्य भामह ही नहीं, कविता से लोकयात्रा के सुप्रवर्तन के दिशावाहक आचार्य दण्डी एवम् आचार्य मम्मट, आचार्य भरत, आचार्य रुद्रट, राजा भोज, आचार्य क्षेमेन्द्र भी आलोच्य कृति की कविताओं के नेपथ्य में यत्र-तत्र-सर्वत्र मुस्कुराते दिखते हैं। उन सभी के काव्य-निकषों का प्रायः सम्यक् अनुपालन दृश्यमान है यहाँ। तथैव, कृति किसी भी शास्त्रीय समीक्षक को (नव्य समीक्षक एवं आधुनिक समीक्षक को भी) आलोच्य कविताओं की प्रतिक्रिया में ‘पुनः क्वापि’ कहने के लिए विवश करेगी अवश्य।
यतः कृति के अंतिम पृष्ठ पर अंकित डॉ0 रविशंकर पाण्डेय की आमुखी आशंसा से भी सहमति जतानी होगी जिसमें आलोच्य कृति को परिवेश संचेतना, सामाजिक संचेतना तथा मानवीय संचेतना के साथ अपने समय का एक गहरा कालबोध, लोकजीवन से गहरा सरोकार, देशज और ठेठ के प्रति लगाव, तीव्र कालबोध और साधारण के प्रति असाधारण प्रतिबद्धता से अभिनामित किया गया है। तदनुसार कृति ‘कितनी दूर और चलने पर’ का मनीषी साहित्यकों द्वारा स्वागत अवश्य किया जाएगा। ऐसी कविता-कृतियाँ यदि पाठक को मिलती रहें, तो निश्चय ही उससे कविता-जगत् से जन के बिलगाव को दूर किया जा सकेगा-- ऐसी आशा जगाने में भी समर्थ है आलोच्य कृति।
समीक्ष्य कृति : कितनी दूर और चलने पर
कृतिकार : डॉ0 सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी(प्रमुख सचिव, उ0प्र0 शासन लखनऊ)
पृष्ठ : 134 , मूल्य : रु0 195/-
प्रकाशक : अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद (उ0प्र0)
दूरभाष : 9415347186, 9415763049
------------------------
नारीवाद का सत्वशील पाठ है ‘आह्वान’
अभिव्यक्ति संस्था के तत्त्वावधान में सुलभ प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित समीक्ष्य कृति ‘आह्वान’ प्रदेशीय राजधानी लखनऊ की 17 चुनिंदा श्रेष्ठ महिला कथाकारों की कहानियों का संकलन है।
कुछेक माह पूर्व इस संकलन की एक प्रति भेंट करते हुए उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान की प्रकाशन अधिकारी आदरणीया डॉ0 अमिता दुबे ने कृति की समीक्षा का अनुरोध किया था।
वस्तुतः समीक्षा/समालोचना एक ऐसी साहित्यिक विधा है कि इसके नाम से अच्छे-अच्छे समीक्षक आगतेय खतरों से सिहर-सिहर जाते हैं। चतुर सुजान लेखक संभवतः इसीलिए समीक्षा की विधा से सिरे से कन्नी काट जाते हैं इसलिए कि समीक्ष्य कृति का प्रणेता स्वयंभू, परिभू होता है। वह माननीय भी होता है। उसे अपनी तनिक सी आलोचना भी प्रायः स्वीकार्य नहीं होती।
औ..र, कृति रचयिता यदि माननीया लेखिका हैं तो.....। एक अकेली मानिनी नारी बहन, बेटी, पत्नी, सखा किसी भी रूप में प्रतिहिंसक बन कर अपने आपा पर आ जाए तो शिकारित पुरुष की ऐसी की तैसी सुनिश्चित है। ‘आह्वान’ में तो सक्षम कलम की धनी 17 माननीया लेखिकाएँ हैं; वह भी प्रदेशीय राजधानी लखनऊ की प्रबुद्ध समाज की सदस्याएँ। त..थै..वः, ‘आह्वान’ की समीक्षा से प्रथमदृष्टया भारी-भरकम खतरे बार-बार बरज रहे थे इन पंक्तियों के लेखक को प..र..न्तु कालिदासीय पर्युत्सकीय भाव के निर्देश उतना ही उकसा भी रहे थे ‘आह्वान’ की साहित्यिक सुरभि से विस्तृत पाठक-वृन्द को आसिक्त करने/कराने के लिए।
औ..र, साहित्यिक दायित्व निर्वहन में कलम के सिपाही को निजी हानि-लाभ से परे तो जाना ही पड़ेगा। त..ब, प्रणेता कथाकारों को प्रिय प्रतीत हो या अप्रिय, समीक्ष्य कृति ‘आह्वान’ की समालोचना से बचने का कोई सारवान् तर्काधार अलभ्य था। अतएव तद्गत काक-दृष्टीय विहंगावलोकन एतद्द्वारा सम्प्रस्तुत है-
‘आह्वान’ के समवीक्षण से प्रारम्भ में ही कई प्रश्न उभरते हैं-
- क्या कृति-कथ्य किसी मुक्ति-कामना की प्रतिध्वनि है ?
- क्या यह कतिपय लेंखिकाओं का बैठे-ठाले का मनोरंजन है ?
- क्या यह किसी सुनियोजित विचार-विमर्श की कृति है ?
- क्या यह कृति साहित्यिक अपेक्षाओं की सम्पूर्ति करती है ?
- क्या यह ऊर्ध्ववाही, ज्ञानवाही है ?
- यदि यह मात्र मनोरंजनवादी या मनोरंजनपरक कृति नहीं, तो क्या इसका विमर्श नारीवादी है ?....... आदि-आदि।
पाश्चात्य विचारक कवयित्री माया एंजिलो की कविता ' Why the Birds Sing ---' की सुधि भी आई आलोच्य परिप्रेक्ष्य में।
तथ्यतया साहित्य ज्ञानवाही हो या मनोरंजनवादी, यह बहस अरस्तू के समय से साहित्य जगत् में गतिमान है। पाश्चात्य अभिमतों से इस फलक पर उभय पक्ष केे पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा चुका है, कहा जा रहा है। अद्यतन परिणाम अनिर्णीत है। हाँ, भारतीय अभिमत से प्रश्नगत प्रश्नचिह्न के समाहार लभ्य है। राजा भोज के शब्दों में कह सकते हैं- “ सः परिष्कारकः। ” आचार्य मम्मट साहित्य/काव्य से व्यवहारविदे और शिवेतर क्षतए आदि कहते हैं। छान्दोग्यकार साहित्य को ‘भूतम् भव्य सृजते.....विश्वमेत’ कहते हैं। यजुर्वेदकार इसे ‘आदित्यवर्णः तमसा परस्तात’ बताते हैं। संयोगात् ‘आह्वान’ में संकलित कहानियों का समग्र महाकथन तमोनुबेधक है, परिष्कारक है, तमसः परस्तात भी। यह व्यवहारविद् एवं शिवेतर क्षतए से समन्वित भी है और भूत (जीव) को भव्य बनाने की दिशा में अग्रसर भी। इस प्रकार ‘आह्वान’ की कहानियों को कतिपय लेखिकाओं का बैठे-ठाले का मनोरंजन मात्र नहीं कह सकते अपितु प्रतीततः वर-विचार से आसिक्त साहित्यिक कृति ही माना जाएगा इसे।
जहाँ तक माया एंजिलो की मुक्तिकामना वाले उपरि-अंकित गीत या कि नारीवादी विमर्श का फलक है, उस फलक से परे है आलोच्य कृति में संकलित बहुलांश कहानियों का कथ और कथ्य।
जाने क्यों लेखिकाओं को जाने-अनजाने अधुना नारी विमर्श से जोड़ दिया जाता है, जबकि नारी के पुरुष-समकक्ष सामाजिक/राजनैतिक अधिकार की माँग से 18 वीं शताब्दि के अन्तिम दशक में उभरी उत्तरी योरोपीय नारियों की माँग से आरम्भित नारी-विमर्श नारी की स्वायत्तता A room for ones own से बढ़ते-बढ़ते नारी की पूर्ण उन्मुक्ति और फिर 20 वीं शताब्दि के उत्तरार्द्ध में उससे भी आगे बढ़ कर यौन-उच्छ्रंखलता के सीमान्त पर जा पहुँचा। सन् 1791 में फ्रेंच नाटककार राजनीतिज्ञ ओलम्पीद गूजे ने महिला-अधिकारों का घोषणापत्र लिख कर जिस नारीवाद को जन्म दिया था, उसका पल्लवन उत्तरी योरोपीय नारी-आन्दोलनों में हुआ और यह सन् 1963 में अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन IVOW -USA तक साकार हुआ। बाद के वर्षों में वही नारीवाद अपरूपित हो गया। नारीवादी आन्दोलन के तीसरे चरण में नारीवाद के अपरूपण की निन्दा भी अनेक विदुषी महिला साहित्यकारों/पश्चिमी नारीवादियों नामतः बेट्टी फ्र्रीडन, मिसेज डेक्टर, फिलिस शेलेफली आदि द्वारा की गई। मोना चारेन, सूसन, ब्राउन मिलर आदि ने उच्छ्रंखल यौनस्वतंत्रता वाले नारी-आन्दोलन को ‘डिप्रेशन’ एवं ‘सामाजिक विकृति’ तक कहा। लेकिन ग्लेरिया स्टीनम हों या हिन्दी जगत् में कृष्णा सोबती, कमलादास, प्रो0 कमलेश कुमारी आदि-- वे सभी नारी-विमर्श के नाम पर कथित यौनक्रान्ति, पुरुष-विरोध आदि को अपने लेखन का मूलाधार बनाए रखने पर अडिग-सी दिखती हैं। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी है कि महिला साहित्यकारों के लेखन में प्रथमदृष्टया ऐसे ही किसी पुरुष विरोधी, पूर्ण स्वच्छन्द यौन-उन्मुक्त नारी के जयकारा की तलाश की जाने लगी है।
संतोषप्रद ही नहीं अपितु हर्षप्रद है कि नारीवाद के ऐसे किसी विकृत अपरूप से परे है ‘आह्वान’ की कहानियाँ।
विदित हो कि दिग्भ्रमित नारीवाद से हमारा साहित्य जगत भी पर्याप्त विभ्रमित हुआ। हमारे देश/समाज में भी भौतिकतावाद, उपभोक्तावाद के पैसार ने ‘नारी’ को देह-केन्द्रित करके विशेषकर उसके बाजारीकरण को बढ़ावा दिया और इसे ही नारीवाद का परचम माना जाने लगा। ग्लेरिया स्टीनम या चार्र्लाेन चुंच न सही तो भी मेरी वोल्सटन के नारी-विमर्श से लेकर हेनरी फ्रिशर के ‘नई सदी में स्त्री: प्रथम सेक्स की माँग’ तक की प्रतिच्छवि तलाशने लगे हमारे विचारशील युवा समीक्षक भी हर नारी-लेखन में। राजकुमार गौतम, मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रभृति अधुना समीक्षक भी बच नहीं सके ऐसी अपरूपता से। ले..कि..न प्रशंसनीय है कि प्रश्नगत अपरूपता के बजाय ख्यात लेखिका आशारानी ह्वोरा के ‘स्त्री सरोकार’ की खाँटी भारतीय नारी के करुणा, ममता, प्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा, सत्त्व, शिवत्व, ऋतत्व आदि से सरोकारित दिखता है आलोच्य ‘आह्वान’। उषा महाजन ने बाधाओं के बावजूद ‘नई औरत’ में भारतीय स्त्री की नैतिकता परम्परा का जो पोषण रूपायित किया है, वह भी वाचालित करती हैं ‘आह्वान’ की कहानियाँ। इन कहानियों में ‘इसको या उसको’, ‘वह जो तुम नहीं हो’, ‘पँख सा’, ‘एक कतरा आसमान’ आदि में नारी की इयत्ता को स्वरित किया गया है, अवश्य, परन्तु वह पाश्चात्यवादी नारी-विमर्श के विकृतरूप-सा नहीं है। ‘पीले गुलाब की हँसी’ (शीला मिश्रा) में मेरी वोल्स्टन प्रणीत पितृसत्तात्मकता का विरोध तो है लेकिन वह भी सकारात्मकता से आसिक्त है। कह सकते हैं कि मनीषा कुलश्रेष्ठ कृत ‘हम सब औरतें’ में 74 स्त्रीपाठ के 74 आलेखों में उकेरित न्याय-अभीप्सा, आत्मबल से वंचित की पक्षधरता आदि अधिलक्ष्यों के बावजूद आलोच्य कृति का पाठ-समग्र नारीवाद के 75वें पाठ की अपेक्षा साकारित करता है।
एक-एक कर देखें-
वयःसिद्ध ख्यात लेखिका स्वरूपकुमारी बख्शी कृत कहानी ‘धड़कन’ में भारतीय नारी के अंतःस्तल में पैठी स्वाभाविक करुणा, ममता भरपूर उकेरित है। अनाम ‘कुली’ की कर्त्तव्यनिष्ठा ईमानदारी भी भरपूर मुखरित है इसमें। कुली को कहानी-नायक बना कर कहानी-नायिका अपनी ममता, करुणा को साकारित करती है। इस तरह डॉ0 श्यामसुन्दरदास के शब्ग्दों में कह सकते हैं कि कहानी आख्यायिका बनते-बनते ‘आख्यान’ बन गई है। यह संकलन की एक सशक्त कहानी है। कहानी का प्रमुख कथ्य वहीं पूरा हो जाता है, जहाँ कहानी-नायिका कुली के द्वारा लौटाए गए चार सौ रूपए कुली के बेटे को पुस्तक खरीदने के लिए भेजने के लिए दे देती है। कुली का कृतज्ञता-ज्ञापन भी स्वीकार किया जा सकता है कुली के चरित्र-चित्रण की दृष्टि से। परन्तु कहानी का अन्तिम दुःखान्त परिच्छेद जिसमें जम्मू स्टेशन पर कुली के दिल की धड़कन बन्द होने का चित्रांकन है, कथ्य की दृष्टि से अनावश्यक है। संभवतः कहानी को कारुणिक बनाने की ललक में लेखिका ने अन्तिम परिच्छेद के निवेशन-औचित्य की ओर ध्यान नहीं दिया।
संकलन की द्वितीय कहानी ‘पीले गुलाब की हँसी’ भी एक सशक्त कहानी है। इसमें मेरी वोल्सटन-प्रणीत पितृ सत्ता पर प्रश्नचिह्न तो उकेेरित है ही, नारी की सक्षमता, आत्मविश्वास आदि भी स्वनित है। परन्तु यह कहानी जैसा कि लेखिका स्वयं मानती है, अपसंस्कृति, अविवाहित मातृत्व आदि को भी वाचालित करती है। ऐसी मान्यता परिवार-व्यवस्था, समाज-व्यवस्था के हित के विपरीत है। कन्या-भ्रूण हत्या के विरोध जैसे विषयों को भी समेटने का प्रयास है कहानी में औ..र, कहना होगा कि आलोच्य प्रयास सबल सफल भी है। त..द..पि कहानी की सशक्त पात्र पल्लवी के कार्यकलाप नारी-समाज या वृहत्तर समाज के वृहत्तर हित-साधन में समर्थ नहीं हैं। पल्लवी का चरित्रांकन बहुत कुछ पाश्चात्य आधुनिकाओं जैसा ही है। ‘दिस इज़ नन ऑफ योर बिजनेस, नाइदर एनीबडीज़। शी इज़ ओनली माइन’ जैसा वाक्य आश्चर्यचकित नहीं करता। पल्लवी के चेहरे पर संकल्प की दृढ़ता, उजास की किरणें और भविष्य के प्रति आशा भी कथानक की दृष्टि से असामान्य नहीं, परन्तु लेखिका ने अधुना आधुनिक (अप)संस्कृति सम्बन्धी जो प्रश्न उकेरे हैं, उनका उत्तर नहीं है प्रश्नगत संकल्प-दृढ़ता आदि। लेखिका वांछनीय उत्तर से कन्नी काट जाती है और आलोच्व्य कन्नी को ढकने के लिए ‘गदबदी बच्ची की किलिकारी’ का सहारा लेती है। ‘गदबदी बच्ची’ का प्रयोग लुभावना है। फिर भी अनसुलझे प्रश्न प्रस्तुत करके उत्तर न देना व्यवहारविदे, शिवेतर क्षतए आदि के विपरीत है।
एक पक्ष और। ‘पीले गुलाब’ का बिम्ब काव्य-रूढि़ से श्रमिक-शोषण के विरोध के रूप में मान्य है। लेखिका ने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया है। फिर भी कमलेश्वर की कहानी ‘पीला गुलाब’ से परिप्रेक्ष्य-इतर होते हुए भी कम सबल नहीं है आलोच्य कहानी कथ्य, कथानक आदि की दृष्टि से। हाँ, ‘वसन्तनुमा वीरानी’ जैसे विरोधाभास की छोटी-मोटी विभ्रमपरक त्रुटियाँ हैं कहानी में। वसन्त में वीरानी नहीं होती। सूखी पत्ती, सूखी नदी आदि भी वसन्त नहीं हेमन्त के प्रतीक माने जाते हैं।
संकलन की तीसरी कहानी ‘अग्निपुष्प’ वर्णनात्मक शैली में लिखी गई सशक्त शीर्षक वाली कहानी है। वर्णन सशक्त है। ले..कि..न, कहानी का कथ्य क्या है, यह अन्त तक स्पष्ट नहीं है। कला फोटोग्राफर अन्ना श्रीमोहन से लेकर शुभम् मानसी और बौद्ध भिक्खु आदि-आदि की छवियों को उभारती ही रह गई है। कथ्य के फलक पर लेखिका की चुप्पी अखरती है।
अग्रेतर, कहानी ‘कोई एक पल’ (लेखिका ऊषा चौधरी) भी संग्रह की एक सशक्त कहानी है। शीर्षक से लेकर कथ्य-कथानक तक चुस्त-दुरुस्त कारुणिक कथानक के बावजूद कहानी-नायिका माला नाटकीय घटनाक्रम में अपंग हो जाती है। अपंग माला के प्रति लेखिका की संवेदना श्लाघनीय है। घुटने के ऊपर से कटे दोनों पैर वाली माला जिस ढंग से आत्मनिर्भर जीवनयापन कर रही है, उससे लेखिका की आशा ‘अमलतास की तरह खिल उठने की आशा’ निराधार नहीं लगती। दुर्योग से यहाँ भी फैजाबाद का लँगड़ा (आम) उपभुक्त है। लेखिका संभवतः भूल गई कि लँगड़ा आम बनारस का है, फैजाबाद का नहीं। तदपि ऐसी भूलें कहानी के आलोच्य कथ-कथ्य आदि की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
सुषमा श्रीवास्तव-प्रणीत ‘कोड़े’ भौतिकतावादी अर्थलिप्सा से आग्रस्त कहानी-नायिका कोइली की कहानी है जो अपने ईमानदार पति सुशील से छुपा कर सूद पर लेनदेन का साहूकारी का कार्य करने लगती है। परन्तु कहानी के घटनाक्रम में गिरवी रखे आभूषण आदि को ‘चोरी का’ जानते ही कोइली छटपटा उठी। गिरवी सामान वापस कर आई। लेकिन एक बुढि़या की विवश गिड़गिड़ाहट के कोड़े से कोइली को अपने बचपन की गरीबी याद आ गई और अपनी शिक्षिका की सीख भी। वह चोरी नहीं .... अपनी पीढ़ी के उसूलों को अपने तरीके से स्थापित करने की सोच से बलशील हो जाती है। कहानी कसे हुए ताने-बाने में ऋतत्व की राह दिखाती है।
निशा गहलौत-प्रणीत कहानी है ‘मैं सुन्दर हूँ’। इसमें सामाजिक कुरीति पर व्यंग्य करने के साथ-साथ चारित्रिक दृढ़ता, औदार्य, करुणा, परहितता आदि को प्रांजल स्वरूप में प्रशंसित किया गया है। इन्हीं आधारों पर सफल कथ के सहारे सुन्दरता के सत्त्व को रेखांकित किया गया है। सशक्त कथानक, सशक्त चरित्र-चित्रण आदि के आधार पर इस कहानी को प्रशंस्य मानना होगा।
अग्रेतर, अलका प्रमोद-प्रणीत ‘सोचा भी न था’ भी एक सफल कथ, कथ्य, कथानक से रची-बसी सशक्त कहानी है। आधुनिक युग में धन की बढ़ती आवश्यकता में पति-पत्नी दोनों नौकरी करने को विवश हैं कि..न्तु इस तरह सन्तान उपेक्षित हो जाती है। ऐसे पति-पत्नी अपनी सन्तान के प्रति अपना दायित्व-निर्वाह कर पाने में प्रायः अक्षम होते हैं। लेखिका ने इस कहानी के प्रथमांश में यही दर्शाया है। वहीं, महानगर में ‘भिक्षा’ को व्यवसाय बनाने वालंे दरिंदे क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं, यह भी सशक्त स्वरूप में उकेरित है इस कहानी में। इससे भी बढ़ कर कहानी में रेखांकनीय है कि ‘परिवार’ में ‘पति-पत्नी और अवयस्क पुत्र-पुत्री तक सीमित अवधारणा’ के बजाय भारतीय पारिवारिक उद्भावना के अनुरूप बाबा-दादी को भी समेकित किया जाना आवश्यक है और उपादेय भी--- कहानी से लेखिका यह सात्विक संदेश सफलतया रूपायित करती है।
ख्यात कहानीकार डॉ0 अमिता दुबे प्रणीत ‘सुखमनी’ नितान्त भिन्न परिवेश, भिन्न कथ-कथानक की कहानी है। इसमें बेटा से बढ़ कर बेटी को दर्शाने का प्रयास दृश्यमान है। रिटायर्ड बलवन्त सिंह की पत्नी रूमाल कौर अपनी युवावस्था से बेटा के बजाय बेटी सुखमनी की चाहत रखती है। बेटी न होने पर पुत्रों की पत्नियों में सुखमनी/सुक्खी को ढूँढती है। बलवंत सिंह स्वाभिमानी और कर्मठ हैं। रिटायरमेंट के बाद वे सुखमनी के नाम से एक ढाबा खोल लेते हैं। रुमालकौर यहाँ भी ग्राहकों में सुखमनी की तलाश करती है। अंततः एक ग्राहक स्नेहा को सुखमनी मान लेती है वह। स्नेहा भी रुमालकौर को माँ का मान देती है। ले..कि..न दुर्भाग्य से विजय सिंह से कहासुनी हो जाने पर स्नेहा चौरसिया आत्महत्या कर लेती है। अखबार से यह जानकारी होते ही रुमालकौर विह्वल हो जाती है। बलवन्त सिंह ने स्नेहा की आत्महत्या की कदर्थना करते हुए रुमालकौर को ढाँढस दिया- ”अवश्य वह स्नेहा चौरसिया थी......हमारी सुखमनी इतनी कायर नहीं हो सकती।“ आत्महत्या की कदर्थना का एक अच्छा सन्देश देती है यह कहानी। नारी-मनोविज्ञान का यह पक्ष भी सबलतया उकेरित है आलोच्य कहानी में। फिर भी ‘सुखमनी द ढाबा’ की रौनक कहीं गुम हो जाती है। यह दर्शा कर लेखिका सुखमनी कहानी के माध्यम से परोक्षतया बेटा के बजाय माँ की बेटी की चाहत को सर्वोपरि बताती हैं।
और हाँ, आलोच्य कहानी में पंजाबी परिवार में प्रयुक्त सम्बन्धवाचक शब्दों का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण परिवेश, कथानक और परिवेश के अनुरूप पंजाबी शब्दों के सुचारु प्रयोग से कहानी अमिता दुबे की नहीं वरन् किसी अमित कौर की कहानी प्रतीत होती है। यह कहानी लेखिका की सक्षमता का अतिरिक्त परिचायक है।
अग्रेतर, शशि जैन की कहानी ‘वह जो तुम नहीं हो’ को नारी-इयत्ता की उद् घोषक कहानी कहा जा सकता है। नारीवादी विमर्श की कहानी मानी जा सकती है यह। परन्तु यहाँ भी अधुना नारी की प्रतिरूप कथित खुले दिमाग वाली कहानी-नायिका मणिका की उदारता, दयालुता के उकेर के साथ-साथ अधुना युवा नारी जिसके साथ जीवन बिताए उसके व्यक्तित्व की वास्तविकता से विवाह-पूर्व परिचित भी होना चाहती है। और उसमें भी दयालुता, करुणा, उदारता, मानवीय सद्भाव आदि देखना चाहती है। ऐसे मनोविश्लेषण सफल ढंग से रूपायित किया गया है आलोच्य कहानी में। कसे हुए ताने-बाने में कहानी सशक्त कथ के साथ-साथ सबल कथ्य को भी रूपायित करती है।
दीपक शर्मा की ‘बिगुल’ कहानी में लेखिका बिगुल बजाने की कला का आद्यन्त सटीक वर्णन करती है। बिगुल के मन्द, मध्यम, तीव्र एवं प्रबल स्वरग्राम को रेखांकित करके वह इस कला में अपनी निपुणता का परिचय देती है। इस तथ्य को गौण माना जाए तो भी घोर अभ्यास के बल से कला-सक्षमता प्राप्त की जा सकती है--इस तथ्य के सफल उकेर को उपेक्ष्य नहीं माना जा सकता। इस दृष्टि से यह कहानी एक सार्थक संदेश देती है। बिगुलवादक सरनदास जी की अवयस्क पुत्री पुलिस-समारोह में जिस तरह बिगुल का स्वरग्राम बाँधने में सफल रहती है-- वह नारी-सक्षमता का सबल प्रदर्शन है। पुलिस लाइन में अद्यतन पुरुष ही बिगुलवादक होते हैं। परन्तु सरनदास जी की सक्षम पुत्री के बिगुलवादन से न केवल उसके पिता मूँछों पर ताव बढ़ाते जाते हैं अपितु पुलिस-अधीक्षक भी पुलिस में महिला बैण्ड-संस्थापन का सुझाव शासन को देने के लिए तत्पर हो जाती हैं। ऐसी सक्षमता नारी की अपार शक्ति का द्योतन कराने में समर्थ है। नारी अस्मिता, नारी इयत्ता को ऐसे सार्थक भारतीय स्वरूप में मुखर करने के प्रति कहानी लेखिका बधाई की सुपात्रा सिद्ध हैं।
औ..र, ‘प्रवाह’ ! मंजू शुक्ला-प्रणीत इस कहानी को संकलन की सर्वाधिक सशक्त एवं लोकोन्मुखी कहानी कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगा। पर्यावरणीय चिन्ता, प्रकृति के दोहन का परोक्ष विरोध वाचाल करने के साथ-साथ मन्दाकिनी की बाढ़ से विनाशित गाँव के पुनर्वासन के निमित्त घर बनाने का सामान और फलदार वृक्षारोपण हेतु वृक्षों की माँग करके कहानी-नायिका कुसुमा बाढ़-विभीषिका का सार्थक समाधान प्रस्तुत करती है। श्लाघनीय है यह प्रयास। कहानी के कसे हुए ताने-बाने में बाढ़-विनाशित शिवकाशी की कुसुमा की मनोदशा, साथ ही उसकी कर्मठता, मानवता आदि का रूपांकन सशक्त स्वरूप में शब्दांकित किया है लेखिका ने। बीच-बीच में बालक नीलकण्ठ के बालसुलभ कार्यकलाप, राहत-कैम्प की कार्यवाही आदि का चित्रांकन सटीक है। कहानी का पहाड़ी परिवेश और यथावश्यक बोलचाल के पहाड़ी शब्दों का प्रयोग कहानी को स्वाभाविक बनाता है। वहीं, संकट की इस घड़ी में मन्दिर के पुजारी आदि का वर्ष भर की कमाई के लिए केदारनाथ जाना दर्शा कर वक्रोक्ति में शिवेतरक्षतए को साकारित करती है लेखिका।
अग्रेतर सरणि की कहानी है ‘सपना’ जो लेखिका नारायणी-लिखित राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य की कहानी है। स्वतंत्रता-आन्दोलन में शहीद हुए पिता-पुत्र जयकरन और 16 वर्षीय शिवराज के राष्ट्रवादी सपनों की कहानी है यह। जयकरन-शिवराज का ही नहीं, संभवतः 1947 में प्रत्येक भारतवासी की खुली आँखों में पल रहा था यह सपना। सदियों की दासता से देश की मुक्ति का सपना। उसी सपने को साकार करने में भारतमाता की जय बोलते हुए शहीद हुए थे जयकरन-शिवराज ले..कि..न जयकरन की विधवा शिवराज की अम्मा (लछमा) के पास 10-5 रुपए भी नहीं कि वह स्वतंत्रता मिलने की खुशी में 10-5 दिया ही जला सके और लोगों में बताशा बाँट सके। पिता-पुत्र की शहादत के बाद मजदूरी करके अपने दिन काट रही लछमा (अछूत) अपनी गरीबी के बावजूद, पति और पुत्र के शहीद हो जाने के बावजूद देश को स्वतंत्रता मिलने के अवसर पर अपनी झोंपड़ी में 10-5 दिया जलाना चाहती है, लोगों में बताशा बाँटना चाहती है। आख्यान शैली में लिखी छोटी सी यह कहानी स्वतः राष्ट्रवाद के भाव-उद्भाव को वाचाल करती है। कहानी-नायिका ‘माँ’ लछमा को पकवानों का नैवेद्य अर्पित करती है और बताशा बाँटने के लिए उधार नहीं, चढ़ावा के रूप में रुपए भी। इस तरह राष्ट्रवादी भावानुभाव को परोक्ष रूप में प्रशंसित करती है यह कहानी। ऐसी सारवान् कहानी-रचना के लिए प्रशंसा की पात्र है लेखिका।
ख्यात वरिष्ठ लेखिका डॉ0 विद्याबिन्दु सिंह-प्रणीत कहानी ‘पंख सा’ भौतिक वैभव के लिए आकुल सुधा बनाम सात्विक प्रेम की मूर्ति, चित्रकार, कवयित्री, कोमल संवेदनाओं की धनी कल्याणी के विपरीत ध्रुवी चरित्र-चित्रण की कहानी है। प्रशान्त और उसकी पत्नी सुधा के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाया जाता है। ऐसे पात्र कहानी के सहायक पात्र ही हैं। कल्याणी की बेटी के जन्मदिन को बहाना बना कर और उसमें भी नाटकीय मोड़ देकर प्रशान्त से कल्याणी की भेंट करा देती है लेखिका। तब स्वनित हो जाती है सात्विक प्रेम की शक्ति। प्रेम के बिछोह की शक्ति। प्रेम की अलौकिकता की शक्ति। प्रेम-पीड़ा की जीवनदायिनी शक्ति। इन शक्तियों की अनुभूति के उपरान्त आश्चर्य कि प्रशान्त का व्याकुल मन चिडि़या के पंख-सा हल्का हो उठा था। लेखिका द्वारा इस तरह ऊर्ध्ववाही प्रेम का रूपायन प्रेम के सद्-व्यवहारिक स्वरूप का ही रूपायन है।
कहानी ‘एक कतरा आसमान’ में लेखिका विनीता शुक्ला ने कथित उच्चवर्गीय भौतिकतावादी विभवी परिवेश में सिन्डेªला बनी महक के प्रतिपक्ष में परम्परागत भारतीय शालीन संस्कारों वाले सामान्य मध्यम वर्गीय सहेली ऋतु एवं उसके बेटे-बेटी के आत्मीय सम्बन्धों की श्रेष्ठतरता को रूपायित किया है। ‘एक कतरा आसमान’ वाली आत्मीयता से विभोर महक भीड़ में भी अकेलेपन, झूठी वाहवाही मैरिज एनीवर्सरी की दिखावटी मुबारकवाद आदि से उन्मुक्ति अनजाने प्रदान करने हेतु अपने पति देवेश को थैंक्स देती है। प्रकटतः इस तरह लेखिका सन्देश देती है भौतिकतावादी विभव के प्रतिपक्ष में।
और ‘तलाश’ ! ख्यात लेखिका शारदा लाल ने छोटी सी कहानी ‘तलाश’ में भी महानगरी बाम्बे की आवासीय समस्या के बहाने से महानगरी में पनप रही कुटिलता, स्वार्थवृत्ति भीड़ में भी अकेलापन आदि को उकेरा है। कहानी में दिनेशचन्द्र के समक्ष अन्तस्तल में पैठे दिनेश-अस्तित्व को प्रस्तुत करके लेखिका ने आज के व्यक्ति के विभाजित व्यक्तित्व में अंतस्तलीय अस्तित्व को अधिक सत्त्वशील अधिक सत् शील दर्शाया है जो सत्व को अधिक स्पष्टता से अनुभूत कर सकता है और उवाचित भी। कहानी में घर की तलाश प्रतीकात्मक है।
शीला पाण्डे की कहानी ‘इसको या उसको’ भी एक सशक्त कथानक की स्यक्त कथ की कहानी है। ग्रामांचल में वर्तमान में पनपते माफियाओं की आपराधिक वृत्ति को भी उकेरती है यह कहानी। मध्यवर्गीय चन्द्रेश बहुत दिनों बाद अपनी पत्नी और बहन के साथ किसी रिश्तेदार के घर शादी में गाँव जाता है। विदाई के बाद वापसी में गाँव की सड़क पर पहुँचते-पहुँचते ढले शाम कुछ दादा किस्म के 4-5 लोग बैठे थे जो चन्द्रेश से ‘इसको या उसको’ को रात भर के लिए छोड़ जाने के लिए कहते हैं। विवशतः बहन को बचाने के लिए चन्द्रेश पत्नी को छोड़ जाता है। दूसरे दिन जाकर वह पत्नी को ले आता है। मगर पत्नी इस अपघटना को भुला नहीं पाती। चन्द्रेश को अनकथ रूप में दोषी मान लेती है वह कि क्लीव की तरह उसे अपराधियों के हवाले कर दिया उसने। पत्नी सीता उसे तलाक देकर मायके जाना चाहती है। वह बहन साक्षी के अनुरोध को भी अनसुना कर देती है। अंततः मायके के बजाय कहीं और चली जाती है वह। चन्द्रेश निर्जीव सा हो जाता है। दुखांतिक है यह कहानी। बहुत कुछ अनकहे भी बहुत कुछ कहने में समर्थ है यह।
संकलन ‘आह्वान’ की अन्तिम कहानी है ‘पर अब क्या हो’। कहानीकार रीता पंकज की छोटी सी किन्तु अति गम्भीर कहानी है यह। कहानी आख्यानक स्वरूप में है। इसमें मनोभावों का अंकन प्रभावशील है। कहानी-नायिका ऋतु की उदारता, परहित-कातरता आदि को उकेरने के क्रम में रिक्शाचालक वृद्ध की कर्मठता, आत्माभिमान आदि को शालीन ढंग से उकेरा गया है, दहेज की बढ़ती माँग के कारण बेटी के विवाह में असमर्थ वृद्ध रिक्शाचालक जो किसी कालेज से रिटायर हुए और अब मजबूरी में रिक्शा चला रहे हैं। ऋतु उन्हें मदद करने को तत्पर है परन्तु वे गायब-से हो गए। मदद लेने कभी नहीं आए। इस तरह कर्मठता, आत्मनिर्भरता के साथ-साथ परहित कातरता का निर्देश देती है आलोच्य कहानी जो साहित्यिक सदाशय से सार्थक ही है।
परिस्पष्टतः छिटपुट अपवादों को छोड़ दें तो आलोच्य कहानी-संकलन की प्रायः सभी कहानियाँ हितेन सह कीे साहित्यिक अभीप्सा से आप्लावित हैं। संकलन की बहु-बहुलांश कहानियों में सम्बन्धित लेखिका ने सहज भाषा में सुष्ठु शैली में कहानी के आख्यायिका, आख्यान, या आख्यानक स्वरूपों में अपने लेखकीय सदाशय सफलतया रूपायित किए हैं। लेखिकाओं के भावानुभाव सहजतया साधारणीकृत हो जाते हैं।
आलोच्य कहानियाँ आकार में लघु हैं। एडगर एलन पो, एच0 जी0 वेल्स आदि जीवित होते तो कहानी-आकार के अपने निकषों पर इन कहानियों को सफल ही घोषित करते। इससे भी आगे बढ़ कर है यह कि आलोच्य कहानियाँ प्रायः आपबीती नहीं हैं। वे जगबीती को ही रूपायित करती हैं। इस तरह इलियटीय निकष ‘डिपर्सनलाइजेशन’ के सापेक्ष भी कहानियाँ प्रशंसनीय हैं।
हाँ, एक बात समझ से परे है कि आलोच्य कृति में जब विविध 17 लेखिकाओं की एक-एक कहानियों का संकलन किया गया है तो इसे ‘कहानी-संग्रह’ क्यों कहा गया ? आवरण पृष्ठ और अंतः मुखपृष्ठ पर भी इसे ‘कहानी-संग्रह’ बताया जाना खटकता है विशेषकर तब जब प्रधान सम्पादिका ने ‘आत्मकथ्य’ में इसे ‘कहानी-संकलन’ ही कहा है। आश्चर्य है कि प्रबुद्ध लेखिकाओं के संगठन की ओर से प्रकाशित आलोच्य कृति में इस तथ्य को क्यों अनदेखा कर दिया गया कि ‘संग्रह’ किसी एक लेखक/लेखिका की रचनाओं का होता है। अनेक लेखक/लेखिकाओं की संकलित रचनाओं के एकीकृत प्रकाशन को ‘संकलन’ नाम ही दिया जाना साहित्यिक दृष्टि से उचित है।
तदपि ‘फैजाबादी आम’, वसन्तनुमा वीरानी या कि ‘कहानी संग्रह बनाम कहानी-संकलन’ जैसी छोटी-मोटी भूलों को अनदेखा कर दें तो आलोच्य कृति ‘आह्वान’ लोकशास्त्रीय समवीक्षण दृष्टि से प्रशंसनीय ही माना जाएगा।
ईश्वर करे कि जीवन-धड़कन को रूपायित करने से लेकर चुनौतियों से रुबरू होने की छटपटाहट, विषमता से परिचय और उससे निबटने के सार्थक साहस वाले जिस लेखन की अभीप्सा प्रधान सम्पादिका ने कृति के आरम्भ में व्यक्त की, उस अभीप्सा के समानुरूप ही नहीं अपितु सहित भाव साहित्यम् , स परिष्कारकः, ‘भूतम् भव्यं...सृजते... विश्वमेत’, प्रादुष्कृतमन्यथा आदि-इत्यादि साहित्यिक अधिलक्ष्यों को भी साकारित करने वाला लेखन ‘अभिव्यक्ति’ की प्रबुद्ध महिला साहित्यकारों द्वारा सतत रूपायित किया जाता रहे। ‘आह्वान’ की विहंगावलोकित समालोचना के सर्वान्त में इन पंक्तियों का लेखक यही शुभाशंसा अर्पित कर सकता है।
समीक्ष्य कृति : ‘आह्वान’ (कहानी-संकलन)
संपादिका : डॉ0 अमिता दुबे
संस्करण : प्रथम, 2014, मूल्य: रु0 150/-
प्रकाशक : सुलभ प्रकाशन, 17 अशोक मार्ग, लखनऊ (उ0प्र0 )
---------------------
शब्द का सार्थक परास है - शब्द कहे आकाश
कौण्डिन्य साहित्य सेवा समिति, कादीपुर सुल्तानपुर, के तत्त्वावधान में प्रकाशित दोहा-संग्रह ‘शब्द कहे आकाश’ अध्येता ,साहित्यसेवी, कविर्मनीषी डॉ0 सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ की नवीनतम काव्य-कृति है। ले. .कि..न , इतना भर नहीं है इस कृति का परिचय इसलिए कि यह काव्य-कृति ‘शब्द’ और ‘आकाश’ दोनों को अभिनव स्वरूप में रेखायित करने में समर्थ है।
शब्द ! संघटक अक्षरों के संस्कार-समवेत को वाचाल करने वाली इयत्ता के परिचायक होते हैं। ‘शब्द’ ही अर्थ से सहभाव मुखर करके साहित्य की सम्प्रस्तुति करते हैं। ‘शब्द’ ही हितेन सह स्वरूप में लोकचेता लोकसंग्रही ऊर्ध्वमुखी विवेक, प्रमा, प्रज्ञा प्रदान करने में कुतुबनुमा बन जाते हैं। ‘शब्द’ ऋतम्भरिक प्रज्ञा उजागर करने में समर्थ होते हैं। ‘शब्द’ संचेतना को मुखर करते हैं। उपनिषदों को मानें तो जब कोई सहायक न हो तो ‘शब्द-समुच्चय’: वाक् ही परम सहायक बन कर अप्रतिम सहायता प्रदान करते हैं। वाक् हो या काव्य के विविध अंग-उपांग, वे सभी शब्दों के उपादान से मूर्त्तमान होकर उच्चतर भावदशा प्रदान करते हैं, भूत (जीव) को भव्य बनाते हैं और धरा को स्वर्गिक पावन पुण्य-प्रकाश से पोषित करते हैं। अक्षरों के संघटक अक्षरों का समुच्चय ‘शब्द’ वास्तव में ब्रह्म समुच्चय का साक्षात्कार कराने में भी सक्षम है। ब्रह्म जो सर्वशक्तिमान है, सर्वहिती है, दैवीय गुणों से सुसम्पन्न है, उदार, उदात्त है और परम न्यायी, विराट भी। ऐसे ब्रह्म को अपने संघटन में समोए ‘शब्द’ की महिमा असीम है।
औ..र आकाश ! असीम निस्सीम आकाश भी वैराट्य का पर्याय माना जाता है। सांख्य में आकाश तत्त्व का भरपूर गुणगान किया गया है। सनातनधर्मी हर जीव को क्षिति, जल, पावक, समीर के साथ-साथ गगन (आकाश) तत्त्व से विनिर्मित मानते हैं। आकाश तत्त्व के अभाव में जीव क्षुद्र, क्षुद्रतर, क्षुद्रतम होता जाता है। कह सकते हैं कि आकाश (वैराट्य तत्त्व) ही वह सारभूत तत्त्व है जो मानव जैसे जीव की मानवीयता मुखर करता है। प्रकारान्तर से यही तत्त्व शेष जीव जगत् से विलग करके मानव को विशिष्ट सचेतन प्राणी की संज्ञा प्रदान करता है। मानव जितना ही जितना क्षुद्रता त्याग कर वैराट्य की ओर अग्रसर होता है, उतना ही उतना उच्चतर श्रेष्ठतर जीव बनता जाता है वह। आदि-महाकवि वाल्मीकि जिस महत् तत्त्व की औ..र, पाश्चात्य मनीषी लांजाइनस जिस औदात्य की वांछा प्रकट करते है वे तत्त्व भी तत्त्वतः ‘आकाश’ तत्त्व से इतर नहीं है।
प्रकट है कि स्वभावतया वैराट्य का साक्षात्कार कराने वाले तत्त्व: आकाश तत्त्व का समेकन जब ‘शब्द’ में साक्षात् हो और वह शब्द भी ‘स कविः काव्या पुरुरूपम् द्यौरिव पुष्यति’ को साकार करने वाले डॉ0 ‘साहित्येन्दु’ सदृश कवि के काव्य में अभिरूपित हों तो मणि-कांचन सुयोग स्वतः साक्षात् हो जाएगा। संदर्भगततः यह सुयोग इन पंक्तियों के लेखक की कोरी कल्पना नहीं है। ‘शब्द कहे आकाश’ के रचनाकार कवि की समरैखिक मान्यता का ध्वन्यार्थ भी यही है। कृति-प्रणेता कहता है-
सरल श्रव्य शुभ अर्थ का मणि कांचन संयोग।
ललित छन्द रस पाक जब कहें सुकविता लोग।।
‘शब्द कहे आकाश’ के प्रणेता तो और भी आगे जाकर दो टूक लिखते हैं-
वह प्रकथन निस्सार है बस कोरी बकवास।
अर्थ अतल का हो रहा ‘शब्द कहे आकाश’।।
निश्चय ही हर सुधी काव्यज्ञ को अतल-वितल के अर्थान्वयन से ऊपर उठ कर शब्द को आकाश में रूपायित करना ही चाहिए। कृति-प्रणेता के इस प्रज्ञासम्मत वचन को सारवान् मानना ही होगा।
औ..र, ‘शब्द’ के परास को व्याख्यायित करने के साथ-साथ प्रणेता कवि ने कविता/काव्य के विन्यास को भी रेखांकित कर दिया है-
जनमै कविता-कोख से मानव के अधिकार।
न्याय शान्ति सद्भावना इसके मूलाधार।।
+ + + + +
कविता मन की शक्ति है, उर का है विश्राम।
मीमांसा यह जगत् की शाश्वत सत्य ललाम।।
+ + + + + +
कविता सम्बल निबल की, कविता मित्र समान।
क्षमता की तो उत्स है, वह है ज्ञान-निधान।।
ऐसे रेखांकन अप्रतिवाद्य हैं।
संयोगात् नहीं, अपितु काव्य-विवेक का परिपाक माना जाना चाहिए यह कि ‘शब्द कहे आकाश’ के प्रणेता आलोच्य कृति में वायवीय आकाशीय उड़ान के साथ-साथ धरातलीय यथार्थ को भी काव्य के व्यवहारविदे एवम् शिवेतरक्षतए अधिलक्ष्यों के समानुरूप रूपायित करने में सफल दिखते हैं।
माँ वाणी की वन्दना से आरम्भित आलोच्य कृति में प्रारम्भ में ही कवि माँ वाणी के साथ-साथ वाणी-सपूत वाल्मीकि, कालिदास, कबीर, तुलसी, रैदास, मीरा, रहीम, गालिब, जयशंकर प्रसाद, दुष्यन्त, प्रेमचन्द, स्थानीय कविजन प्रगतिराम किशोर, मानबहादुर सिंह, मथुराप्रसाद जटायु, आद्यासिंह प्रदीप तक और वहीं, राणाप्रताप, चेतक, मंगल पाण्डेय, लक्ष्मीबाई, विपिन, बिस्मिल, अश्फाक आदि को नमन करता है---उससे उद्भासित है कि प्रणेता कवि के कवि-मन का आकाश वैराट्य औदात्य आदि के साथ-साथ सत्त्वशील शिष्ट आचार और राष्ट्रवाद आदि से आप्लावित भी है। इस तरह कविता के आकाश का ईशान बखूबी रेखायित कर दिया है प्रणेता कवि ने।
तदन्तर , दोहा सं0 95 से लेकर कृति के अनन्तिम चरण के दोहा सं0 578 तक जग बीती का यथार्थ आरेखित है आलोच्य कृति में। पाश्चात्य समाजशास्त्रीय आलोचक इपालीत तेन की वांछा वाले क्षण, प्रजाति, परिवेश का रेखांकन रेखांकित दिखता है प्रस्तुत्य आरेखन में। वर्तमान देश काल परिवेश के विद्रूपों के कुशल चित्रांकन देखें-
कौए अब करने लगे, सामवेद का गान।
सुग्गे सब डरने लगे क्या होगा भगवान।।
+ + + + +
कैंची अब सिलने लगी दलितों के पैबन्द।
अब सियार पढ़ने लगे जोर जोर से छन्द।।
+ + + + +
डॉट बेर कहने लगा अब चुप रह बे आम।
नौ दो ग्यारह बन निकल तेरा क्या है काम।।
+ + + + +
सच चम्पक मुरझा गया मधु ऋतु में इस बार।
उस पर बैठा प्रेत है दोनों पाँव पसार।।
+ + + + +
दहशतगर्दों से भरा, हजरतबल दरगाह।
जला उसी घर को दिया जिसमें लिया पनाह।।
+ + + + +
आलू जब रूपया किलो चिप्स बिके छत्तीस।
कम्पनियाँ परदेस की रहीं देश को पीस।
+ + + + +
जिन्हें पकड़ना चाहिए, खडि़या, कलम दवात।
वे होटल में धो रहे हैं बरतन दिन रात।।
+ + + + +
ईटों के भट्ठे बढ़े सूख नीम रसाल।
वक्ष धौंकनी बन गया अब तो हाल-बेहाल।।
+ + + + +
बच्चा बाँधे पीठ पर सिर पर ईंटे बीस।
बुढि़या जैसी चल रही किन्तु उमर उन्नीस।।
+ + + + +
काला हांडी क्षेत्र में भूखे मरते लोग।
राजतंत्र है कह रहा इनको कोई रोग।।
+ + + + +
अब जंगल को काट कर, मंगल की है चाह।
होगी क्रोधित प्रकृति जब तब निकलेगी आह।।
+ + + + +
दरवाजे पर दिख गई रखी किलो भर प्याज।
भीषण डाका पड़ गया उसके घर में आज।।
+ + + + +
अकथ गरीबी भार से वे बेबस लाचार।
वे रैली के नाम पर फूँकैं विभव अपार।।
+ + + + +
धुरहू चुप सहता रहा देख रहा था गाँव।
वे प्रहार करते रहे उस पर ठाँव कुठाँव।।
+ + + + +
फटी बिवाई खोह सी, माथे शिकन हजार।
पंजा गिनने योग्य है , धँसे नयन लाचार।।
+ + + + +
पाले से अरहर गई फर्रे से सब धान।
माहू से सरसों गई, बिटिया हुई सयान।।
+ + + + +
वे अलकतरा पी गए, खाया पशु आहार।
भरा पेट फिर भी नहीं, करते हाहाकार।।
+ + + + +
बिच्छू गोजर ही रहे उनके परमादर्श।
बाज गोहटों से करें , सतत विचार-विमर्श।।
+ + + + +
जब भी डसा करैत ने, रहा सुरक्षित प्रान।
अबकी तुमने छू लिया निश्चित हुआ मसान।।
+ + + + +
वर्षों से करते रहे सत्य न्याय का जाप।
सत्ता सुख के मोह में सब कुछ भूले आप।।
इस तरह आतंकवाद, महँगाई, बालश्रम, पर्यावरण-चिन्ता, किसान-मजदूर, राजनैतिक भ्रष्टाचार, पुलिस-लेखपाल, प्रशासन के अनाचार आदि के विरुद्ध, वर्तमान की प्रायः सभी समस्याओं के विरुद्ध वक्रोक्ति में अपना आक्रोश व्यक्त करते हैं आलोच्य कृति के प्रणेता। आलोच्य दोहों में यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रशस्त रूपकों का प्रयोग कृति को कांतिमान बनाता है।
औ..र, प्रणेता कवि की चेतावनी भी ध्यातव्य है -
हवा उलटती देख यदि, बुधजन होंगे मौन।
कुटिया उजड़ेंगी सभी, होगा रक्षक कौन ??
+ + + + +
मेरे माथे की शिकन मेरा दस्तावेज।
यदि तू पढ़ सकता नहीं और किसी को भेज।।
अप्रतिम बिम्ब विधान में कवि ने उपरि-इंगित समस्याओं का हल भी सुझाया है-
चाहे जितने हों कठिन उठते आज सवाल।
हल कर सकते हैं उन्हें मिल कर कलम कुदाल।।
कलम और कुदाल अर्थात् विवेक और श्रम यदि मिल जाएँ, तो निश्चित ही अनेक कठिन समस्या रूपी सवालों का हल निकल सकता है।
कृति में राष्ट्रवादी दोहे भी हैं-
जाति धर्म समुदाय से किसका उच्च स्थान।
होता है सबसे अधिक अपना राष्ट्र महान् ।।
+ + + + +
हम विभक्त होंगे नहीं, हम सब मिल हैं एक।
ग्यारह बनता है तभी, जब रहे एक संग एक।।
और तो और, नारी विमर्श सदृश विमर्श भी है कृति में-
नारी कविता मूल है, प्रीति छन्द रस सार।
कल्पवृक्ष का फूलवट अमिय कलश साकार।।
+ + + + +
जो बस देती ही रही लिया नहीं प्रतिदान।
उस जननी को मिल सका नहीं उचित प्रतिदान।।
और देखें-
कहते हैं शिखर-आसीन पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है। उस उक्ति को मर्यादा में ढाल कर कृति प्रणेता कहता है-
जीवन-सारथि बन जभी नारी आती पास।
अकथ प्यार को वार कर ले जाती आकाश।।
यहाँ आकाश का श्लेष सफलता की ऊँचाई का दिग्दर्शन भी कराता है।
औ..र अन्यान्य अलंकारों के साथ ही आलोच्य कृति में रसराज शृंगार भी उपभुक्त किया है कृतिकार ने। देखें-
अधर हँसे आँखें झुकीं खिले फूल ही फूल।
जो कल तक पत्थर रहे, आज हो गए तूल।।
+ + + + +
विकल कली मुसकान पर मधु मधुकर गुंजार।
ललित फलित लोचन दिखें मधुरस पारावार।।
+ + + + +
कंचन के दिन हो गए रजत राजती रात।
जब उर से होने लगी, थोड़ी-थोड़ी बात।।
कवि का शृंगारिक मन इतने पर ही ठहरा नहीं। थोड़ी-थोड़ी बात करते-करते कवि-दृग प्रिया के आँचल वायु से उड़ जाने पर अनावृत प्रिया को देख कर अपना धीरत्व खो बैठते हैं, उसकी कल्पना के दृग-विहग भी उड़ने लगते हैं। वे उसके किसी वक्ष-वारिधि के तीर पर जा बैठते हैं। शृंगार के ऐसे प्रयोग को अशालीन नहीं माना जा सकता है। प..र..न्तु कतिपय आलोचक आगे वाले दोहे में ”अवयव के प्रति तन्तु में बढ़ने लगा कसाव, और उधर कन्दर्प का भारी हुआ दबाव“ की भाव-योजना में शृंगार के नाम पर अभिसार के चरम को परोसने की आलोचना कर सकते हैं। यहाँ भी मर्यादा, शालीनता का उल्लंघन न किया जाता तो अच्छा था। कवि जो कभी युवा/किशोर रहा होगा संभवतः उसी वय की आभिसारिक स्मृतियों का अवदान है यह दोहा जिसे प्रणेता-कवि ने जीवन-यथार्थ के समग्र उद्घाटन के हेतुक से अथवा कृति नीरस न हो जाए इस हेतुक से ‘शब्द कहे आकाश’ में समेकित किया होगा। कह सकते हैं कि तन्तुओं का तनाव दर्शाने वाला दोहा ‘शब्द कहे आकाश’ जैसी कृति में न रखा जाता तो श्रेयस्कर होता। यह सुस्वादु खीर में कंकड़ सदृश खटकता है। कृति के कथ्य से असंगति भी वाचाल करता है यह। तदपि एकाध कृति-असंगत दोहा के सम्बल से सम्पूर्ण कृति को अश्लाघनीय नहीं बताया जा सकता।
कृति का अन्तिम दोहा (सं0 582) स्वस्तिवाचन सदृश है-
जन जन को मिलता रहे भोजन वस्त्र मकान।
विश्ववंद्य फिर से बने अपना हिन्दुस्तान।।
जहाँ तक काव्यकला का प्रश्न है, दोहा-छन्द से, छन्द-प्रवाह से, गेयता से, सरस रस-अलंकार से कहीं भी विरहित नहीं हैं कृति के दोहा शैली में संगृहीत दोहे।
यत्र-तत्र-अनेकत्र प्रणेता कवि ने कैंची, बेंत, सुग्गा, प्याज सदृश बिम्बों से प्रयोज्य रूपकों का सार्थक सफल रूपायन भी किया है। प्रायः सम्पूर्ण कृति में सहज सरस शैली में वक्रोक्ति में, व्यंग्योक्ति में सफल भावाभिव्यक््ित की गई है। प्रयुक्त व्यंग्य इतने साधारणीकृत हैं कि वैखरी वाले कवि-वचन ही नहीं, कृति-समेकित दोहों के अभिधा, व्यंजना, लक्षणा वाले कवि-वाच्य भी परा, मध्यमा, पश्यन्ती में पाठक के मन-मष्तिष्क में सहजतया पैठ जाते हैं। श्लाघ्य कहेंगे इसे भी कि प्रस्तुत कवि-वचन और/या तद्गत कवि-वाच्य उपदेश-शैली या प्रवचन शैली में नहीं हैं। परन्तु यदा-कदा ही सही, अति सहजता के फेर में प्रणेता कवि ने जहाँ-जहाँ मात्र अभिधा में अपनी बात कहने का यत्न किया है, वहाँ-वहाँ विवसना नायिका-तुल्य तद्गत दोहे काव्य-कोटि से विलग हो गए हैं। काव्य में अन्यूनाधिकम् अलंकरण तो होना ही चाहिए।
एक और बात। ‘कौण्डिन्य’, ‘अगस्त्य’ सरीखे प्रबन्ध-काव्य के प्रणेता क्षमतावान् कवि इस श्रेष्ठ दोहा-संग्रह में 582 दोहों पर ही क्यों ठहर गए ? उन्होंने ‘सतसैय्या’ क्यों नहीं बनाया इस कृति को ? इस तथ्य का का स्पष्टीकरण नहीं है कृति में।
कुल मिला कर कृति ‘शब्द कहे आकाश’ जहाँ शब्द की, शब्द-कहन की विराटता को रूपायित करने में सक्षम है, वहीं, यह ऋक् निदेशन से लेकर तमोनुबेध, प्रादुष्कृतमन्यथा, शिवेतर क्षतए, व्यवहारविदे सदृश काव्य-परास तथा शास्त्रोक्त काव्य-लक्षणों से समेकित रस, सहज काव्य शैली आदि के निकषों पर सौ फीसदी टंच मानी जाएगी। काव्यरसिक इसे पठनीय और सराहनीय ही मानेंगे।
समीक्ष्य कृति : ‘शब्द कहे आकाश’ (दोहा-संग्रह)
कृतिकार : डॉ0 सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
संस्करण : प्रथम, 2014 , मूल्य : रु0 150/-
प्रकाशक : कौण्डिन्य साहित्य सेवा समिति, कादीपुर-सुल्तानपुर (उ0प्र0)
(शीघ्र प्रकाश्य समीक्षा-संग्रह ‘ आर-पार ’ से)



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें