मंगलवार, 19 अगस्त 2025

विजय रंजन की कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता ’ की कतिपय समीक्षाएँ


                              गागर में समाहित सागर
                        क्या है भारत क्या है भारतीयता

                                                                                            - समीक्षक: राजेश विक्रान्त

विजय प्रताप सिंह ‘रंजन’ कृत ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ विषय से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ व सूचनाएँ मुहैय्या कराती है तथा समस्त सवालों का जवाब देती है। भारत और भारतीयता से जुड़े सभी मुद्दों व पहलुओं को कृतिकार ने इस 158 पृष्ठ के ग्रंथ में समेट कर गागर में सागर भरने का काम किया है। यह कृति उन्होंने देवभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि भारतवर्ष को समर्पित की है। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि भारत को आर्यभूमि कहा गया है। इसका अर्थ ही श्रेष्ठ गुण-कर्म, स्वभाव वाला होता है। प्राचीन यूनान, चीन-रोम से लेकर दुनिया के अन्य देशों में राष्ट्र के लिए जो भी आवश्यक मापदण्ड हैं, वे सभी भारत राष्ट्र में अस्तित्वमान् है। देश का राष्ट्रीय चरित्र सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामय है। यह देश ईश्वर के अनेक अवतारों का अवतार स्थल है। लोक-कल्याण, विषमता का अंत, सभी का मंगल, समन्वयवाद, समग्रता, मर्यादा, सर्जनात्मकता आदि सब भारत के मूल में है अर्थात् भारत ‘भारतत्व’ व ‘भारतीत्व’ से संपुष्ट है। 

.......देश-विदेश के अनेक विद्वानों ..........ने भारत और भारतीयता पर खूब लिखा है लेकिन विजय रंजन का लेखन सबसे अलग है। वे लिखते हैं- 

” ‘भारत क्या है ?’ और ‘भारतीयता क्या है ?’ सदृश प्रश्नों का उत्तर संक्षेप में यूँ है-  ”प्रज्ञा से प्रकाश (ज्ञान) की खोज में सतत निरत रहने वाला राष्ट्र है भारत जिसमें लोक-पोषकत्व, सह राष्ट्र-संघटकत्व वाला ‘भरतत्व’ और पावनता, सात्त्विकता, चिन्मयता, धर्मालुता, तितिक्षाशीलता, दैवचीय रचनाधर्मिता आदि की देवी भारतीके भारतीत्व (देवी भारती के गुण) के साथ सर्वकल्याणक शिवत्व ण्वं वैदिक औपनिषदिक संस्कार आधारभूत रूप में विद्यमान है। फलतः ऋतम्भरिकता, संस्कारसात्त्विकता, चिन्मयता, तितिक्षाशीलता, धर्मालु रचनाधर्मिता एवं सतत ज्ञान-साधना ही भारत की मौलिक ‘भारतीयता’ है। पुस्तक के अध्याय ‘भारत-नामकरण के मूलभूत आधार’, ‘.....अन्य आधार’ तथा ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ के तहत भारत के ‘आर्यभूमि’, ‘ब्रह्मर्षि’, ‘देविका’, ‘ब्रह्मावर्त’, ‘जम्बूद्वीप का भरतखण्ड’, ‘कुमारी अन्तरीप’, ‘हिन्दुस्थान’, ‘हिन्दुग’, ‘इण्डोई’, ‘इण्ड’, ‘इण्डो’, ‘शिन्तु/शिनाऊ’, ‘हिमवर्ष’ आदि नामों की गहन विवेचना लेखक द्वारा की गई है। नामकरण के पीछे के मूलभूत आधारों को शोधपरक तरीके से परखने के बाद ही निष्कर्ष निकाला गया है।

-वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘सामना’ साप्ताहिक पत्र में स्तम्भकार, नागपुर, महाराष्ट्र ,   दूरभाष: 9820120912    

                    (समीक्षा ‘सामना’ में प्रकाशित)

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आत्मसाक्षात्कार कराती कृति 
क्या है भारत क्या है भारतीयता

                                                                           - डॉ॰ निरुपमा श्रीवास्तव
                                                            (प्रबन्ध सम्पादक, अवध-अर्चना त्रैमासिक, फैजाबाद-अयोध्या)
वर्ष 2019 के दिसम्बर माह में प्रकाशित एक नवीन कृति प्रकाश में आई है। शीर्षक है- ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’। कृति विगत 25 वर्षों से गतिमान त्रैमासिक पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ के सम्पादक श्री विजय रंजन द्वारा विरचित है। 
कृति-विरचने का उद्देश्य भारत के निवासियों को मनसा आत्मसाक्षात्कार कराने का एक वैचारिक मंच प्रदान कर भारत और भारतीयता के मूल स्वरूप पर पड़ी उस धूल को साफ करने का एक सफल प्रयत्न है जो काल की गति के चलते विदेशी आक्रमणकारियों ने और विदेशी इतिहासकारों ने डाली थी। ऐसा उन्होंने इस दुराशय से किया था कि भारत के मूल निवासियों की संस्कृति, धर्म-दर्शन आदि का मान-मर्दन, गौरव-पददलन, चरित्र-भंजन और उनके मूल चरित्र भारतीयता को ही विखण्डित किया जा सके और भारत को सर्वतोभावेन दास बना कर उनका हर प्रकार का शोषण कर स्वयं अकूत, अविरल, अबाधित सत्तासुख भोगा जा सके। त्रासद है कि उस तरह की भ्रान्तियों के प्रसार-प्रचार का कार्य अभी भी थमा नहीं है। एक ओर तो बहुत से मतिभ्रमों के द्वारा असत्य तथ्यों पर आधारित अपने कुतर्कों की धूल से सत्य को दृष्टि-ओझल करने का कुचक्र स्वतंत्र भारत में भी चलाया जा रहा है। दूसरी ओर लांछित, मान-मर्दित हो रहा पक्ष किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पड़ा हुआ है। ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ कृति ऐसे किंकर्त्तव्यविमूढ़ों के मार्गदर्शन के लिए भी रचित है। 
अपने उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए कृतिकार ने कृति में सर्वप्रथम भारत नाम की व्याख्या, भारत के निवासियों को भारतीय कहे जाने के कारण की व्याख्या, भारतीयों की भारतीयता की व्याख्या, भारत देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने के कारणों की व्याख्या सविस्तार प्रस्तुत की है। 
कृति में देवी भारती के गुणों और ज्ञानोन्मुखता को ‘भारतीत्व’ कहा गया है। कृति में अनेक स्थानों पर देवी भारती, जिन्हें ही अनेक वाङ्मयों में देवी सरस्वती भी कहा गया है, के गुणों की चर्चा की गई है। ये गुण हैं- तितिक्षा, दकारत्व, चिन्मयता, ऋतम्भरिकता, दैवीयता, कृतज्ञता, वाक्-शक्ति, शम, दम, ज्ञानशीलता, सत्त्वशीलता, ऋतशीलता, सात्त्विक रागात्मक रचनाधर्मिता, शान्तिप्रियता, अहिंसा, उदात्तता, उदारता, श्रद्धा, आस्था आदि-आदि। कृतिकार के अनुसार ये वे गुण हैं जिन्हें मन-वचन-कर्म से धारण करने वाले मानव ही देवी भारती की मनस्-सन्तति ‘भारती’ अर्थात् ‘भारतीय’ कहलाए। इस संदर्भ में सबसे अच्छी बात यह है कि देवी भारती के गुण-वर्णन में कृतिकार ने स्थान-स्थान पर उन गुणों के अन्तर्निहित व्यवहारिक अर्थ कोष्ठक में दे दिए हैं जिससे पाठक को अप्रचलित-से लगने वाले उन शब्दों का निहितार्थ ठीक-ठीक समझने के लिए शब्दकोशों का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं है। उदाहरणार्थ- तितिक्षा (त्याग, सहिष्णुता, क्षमा), दकारत्व (दत्त, दयध्वं, दमयत् अर्थात् दान, दया, दमन=इन्द्रिय-दमन=इन्द्रिय-संयम=जितेन्द्रियता), चिन्मयता (आध्यात्मिक ज्ञान-सम्पन्नता) आदि।
 कृति में बताया गया है कि भरतत्व, भारतत्व एवं भारतीत्व से समेकित आचरण ही भारतीयता है जिसमें समय-समय पर भारत में अवतरित हुए महानुभावों (यथा महादेव, श्रीराम, श्रीकृष्ण, जैन तीर्थंकर आदि-आदि) द्वारा आचरित और निदेशित आदर्श भी साररूप में सम्मिलित होते गए। जैसे महादेव का सर्वकल्याणत्व, श्रीराम का अनृत-विनाशकत्व, श्रीकृष्ण का लोकसंग्रह, जैन तीर्थंकरों की अहिंसा, महात्मा गौतम बुद्ध की करुणा आदि-आदि। इन ‘महानुभावों के सदाचरण-इंगित निदेशनों से आप्लावित भारतीयता’ (‘भरतत्व, भारतत्व, भारतीत्व) को कृतिकार ने भारतीयता-समग्र का नाम दिया है और कहा है कि आधुनिक भारत में यही भारतीयता-समग्र आज भारतीय होने की कसौटी है। कृतिकार के अनुसार इस कसौटी पर आज के भारत का बहुसंख्यक समाज खरा उतरता है। लेखक कहता है- “वास्तव में यही भरतत्व, भारतत्व, भारतीत्व, शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व ही भारतीयता का मूलाधार है जो युग-युगों तक भारत का राष्ट्रीय सांस्कारिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक सम्बल बना रहा और न्यूनाधिक रूप में आज भी बना हुआ है।” (पृ॰99)
‘भारतीय किसे कहा जाए ?’, ‘भारतीय के कर्त्तव्य क्या हैं ?’ इन्हें स्पष्ट करते हुए कृतिकार का विचार है कि ‘भारती की कीर्ति’ का प्रसार करने वाला ही भारतीय है और ‘भारतान्वय का वर्धन’ हर भारतीय का कर्त्तव्य है। इस सन्दर्भ में कृतिकार का स्पष्ट कथन है कि “.... भारतीत्व से जुड़ाव के अभाव में कोई कुछ भी बन जाए पर भारतीय नहीं माना जा सकेगा। आप वेदों मेे श्रद्धा नहीं रखते, न रखें; ईश्वर में भी श्रद्धा/भक्ति नहीं है आपकी, न सही; पूजा/उपासना नहीं करना चाहते आप, न करें; हिन्दू-धर्म को गर्हित मानते हैं आप, आपकी इच्छा; लेकिन ? हाँ, ले...कि...न, देवी भारती से जुड़ाव को, देवी भारती के भारतीत्व से जुड़ाव (देवी भारती के उपरि-इंगित गुणों से जुड़ाव या कि मूल सहयुजन) से विच्छिन्न या वियोजित होने पर ‘भारतीय’ नहीं रहेंगे आप।” (पृ॰ 147) 
हम देखते हैं कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से ही नई पीढ़ी को बचपन से ही यह बताया जाता है कि यहाँ के राजा दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर भारत का नाम भारत पड़ा किन्तु बड़ा होने पर उसके मन में प्रश्न कुलबुलाने लगते हैं कि महाराज दुष्यन्त भारत के ही राजा कहे जाते हैं तब उनके पुत्र भरत के नाम पर भारत-नामकरण क्यों माना जाए ? यदि दुष्यन्त-पुत्र भरत के पूर्व भारत का नाम भारत नहीं था तो फिर उस समय भारत का नाम क्या था ? भारत का अस्तित्व कब से है ? भारत का प्रथम शासक कौन था ? आदि-आदि। इन जैसे सभी प्रश्नों का उत्तर कृतिकार ने वाङ्मयिक प्रमाणों के आधार पर तार्किक एवम् रोचक ढंग से कृति के ‘भारत-नामकरण के मूलभूत आधार’ एवं ‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’ नामक क्रमशः प्रथम व द्वितीय अध्यायों में दिया है। 
इसके अतिरिक्त द्वितीय अध्याय में कृतिकार ने इस गुत्थी को भी सप्रमाण सुलझाया है कि भारत में अनेक ‘प्रथम राजा’ कहे जाने के पीछे आधार क्या है ? द्वितीय अध्याय में ही भारत में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था के उद्भव सम्बन्धी एक अन्य तलस्पर्शी तथ्य का भी उद्घाटन हुआ है। इस विवरण को हृदयंगम करने के बाद इस सम्बन्ध में जनमानस में व्याप्त अनेक भ्रान्तियों का न केवल निवारण होता है वरन् इन भ्रान्तियों से उत्पन्न सामाजिक द्वेष का भी शमन होता है। यह विवरण सामाजिक विषमता को मिटाने का एक सशक्त आधार बन सकता है। परन्तु और अच्छा होता यदि प्रमासम्पन्न कृतिकार ‘ब्राह्मणो मुखमासीत् ....’ उक्ति की भी प्रमासम्मत, ऋतसम्मत यथार्थपरक व्याख्या प्रस्तुत करता जिसके अभाव के कारण दीर्घकाल से समाज में कथित उच्च वर्णों द्वारा कथित निम्न वर्ण के ऊपर जो अनाचार, शोषण-उत्पीड़न आदि-आदि थोपे गए, आज भी थोपे जा रहे हैं और जो सामाजिक वैषम्य के वृक्षों को पोषण प्रदान कर रहे हैं; ऐसी विषमताओं के निवारण करने के लिए भी एक सबल आधार समाज को प्राप्त हो जाता।   
कृति का ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ शीर्षक अध्याय भी अनेकानेक अप्रचलित जानकारियों से भरा है जैसे- भारत कहलाने के पूर्व भारत के कौन-कौन से नाम किन-किन कारणों से प्रदान किए गए ? उत्कर्षवान् भारत विदेशियों की दृष्टि में कैसा था ? वे उसे किन नामों का सम्बोधन देते थे ? कृति में जो नाम बताए गए हैं, उनमें सबसे रोचक और मर्मस्पर्शी नाम हैं प्राचीन चीनियों द्वारा भारत को प्रदत्त नाम- 1. ‘थि-एन्-चु को’ जिसका भारतीय भाषा में अर्थ है ‘देवों का देश’। 2. ‘इन्तु को’ जिसका अर्थ है- ‘अपने उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान, दार्शनिक-आध्यात्मिक ज्ञान, मानवतापूर्ण दैवीय संस्कृति और भौतिक ऐश्वर्य से प्रदीप्त पूर्णिमा के पूर्ण चाँद सदृश देश’। इससे यह भी ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत में आधुनिक भारत के आस-पास देशों की भूमि भी शामिल थी। ये तथ्य भारत को ‘अपना देश’ मानने वाले भारत-निवासियों के मन-मस्तिष्क को आत्मा की गहराईयों तक स्पर्श कर गौरव से दीप्त करने वाले और उनके शीश को गर्वोन्नत कर देने वाले हैं। इसी अध्याय में भारत के ‘हिन्दुस्थान’ नाम की रोचक उत्पत्ति का भी उल्लेख किया गया है जिसकी व्याख्या तत्कालीन भारत के भौगोलिक विस्तार को प्रत्यक्ष कर देती है। इतना ही नहीं, इस अध्याय में ‘हिन्द’ शब्द और ‘इण्डिया’ नामवाची शब्दों की तर्कपूर्ण व्याख्या से उन लोगों को दर्पण दिखाने का प्रयास किया गया है जो इन शब्दों से नामकृत किए जाने में गौरव अनुभव करते हैं। लेकिन कृतिकार ने यह नहीं बताया कि भारत को सर्वप्रथम ‘इण्डिया’ कब और किसके द्वारा कहा गया।
‘भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि’ अध्याय में लोकप्रचलित और निरन्तर दुहराव के कारण जबरन जनमानस में बैठाए गए ‘आर्य’ सम्बन्धी उन सभी भ्रामक तथ्यों की यथार्थपरक, शोधपरक, प्रमाणों पर आधारित व्याख्या की गई है, जिन्होंने समाज में न केवल विषमता के बीज बोए, वरन् भारतीयों का मान-मर्दन भी किया। इसी अध्याय में अनेकानेक प्रमाणों द्वारा यह भी भलीभाँति पुष्ट किया गया कि देवी भारती के गुणों से सम्पन्न भारती-सन्तति कहे जाने वाले ‘आर्यों’ ने ही प्रागैतिहासिक काल में विश्व के अन्यान्य स्थलों पर जाकर भिन्न-भिन्न देश बसाए और मानवों को पशु-आचरण (भोजन, निद्रा और यौनाचरण) से ऊपर उठ कर भारती-कीर्ति के श्रेष्ठ, उदात्त, ज्ञानोन्मुखी आदि आचरणों को अपनाने की प्रेरणा दी। लेखक लिखता है- “भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता के प्रसार के समय आव्रजित भारतीयों द्वारा कोई शत्रुतापूर्ण या घृणापरक कार्य निष्पन्न नहीं किया गया, न ही वहाँ कोई उपनिवेश स्थापित किया गया और न ही वहाँ औपनिवेशिक लूट/शोषण/उत्पीड़न ही कारित किया गया अपितु किया गया तो केवल यह कि वहाँ उन देशों में उन्नत समाजों के निर्माण एवम् विकास में आव्रजक भारतीयों द्वारा सात्त्विक रचनाधर्मी सहयोग ही अवदानित किया गया।” (पृ॰ 69)
इसी अध्याय के अन्त में लेखक ने पूर्व दिशा में स्थित भारतीय भू-भाग में ‘बर्बर जनजातियों का वर्चस्व होने की बात’ कही है। यह शब्दावलि प्रसंगसंगत होने के बावजूद आज अनेक पाठकों के (विशेषकर इन स्थलों के वर्तमान निवासियों के) मन को ठेस पहुँचाने वाली हो सकती है, इस बात का ध्यान लेखक को रखना चाहिए था, जो उसने नहीं रखा। 
‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार’ नामक अध्याय में निष्कर्षित निष्कर्ष अपनी संस्कृति के निरन्तर किए जाते मान-मर्दन से छीजते और विभाजित भारत को देख-देख कर क्षुब्ध होते भारतीयों के मन को अति प्रभावी औषधि सदृश प्रभाव प्रदान करने वाले हैं। कृतिकार ने बताया है कि प्राचीन भारत 160 नदियों, 7 कुल पर्वतों और 9 द्वीप-द्वीपान्तरों तथा उनके मध्य के समुद्रों तक विस्तृत था। लेखक ने लिखा है कि- “प्रकटतः वैश्विक वाङ्मय को ही साक्ष्य मानें तो भारतीयों द्वारा यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अमेरिका महाद्वीप के अधिकांश देश भारतीयों द्वारा ही बसाए जाने सम्बन्धी कथाएँ वैश्विक इतिहास में विद्यमान हैं। इन कथाओं से भी 4000-5000 ई॰ पू॰ की अवधि तक के उन्नत सभ्यता, संस्कृति, कला-कौशल के देश/राष्ट्र के रूप में भारत की श्रेष्ठ-अवस्थिति स्वतः सिद्ध हो जाती है। (पृ॰ 78)”
अध्याय ‘भारत एक प्राचीन राष्ट्र’ में ‘राष्ट्र’ और ‘देश’ के विन्यास-परास के भेद को स्पष्ट करके निष्कर्ष प्रदान किया गया है कि “प्राचीनकाल से भारत एक देश भी है और एक राष्ट्र भी।”
कृति के अध्याय ‘भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ में पुनः भरतत्व, भारतीय, भारतीयता और भारतीयता-समग्र की और अधिक विस्तृत व्याख्या की गई है। यह विवरण इन प्रचलित किन्तु निहितार्थ-अनजान शब्दों के निहितार्थों को प्रकट करके भारतीयों को आत्मसाक्षात्कार हेतु अधिक स्पष्टता प्रदान करता है। 
इसी अध्याय के उपशीर्षक ‘विशिष्ट जीवन-दर्शन’ में भारत एवं भारत-इतर देशों की जीवन-दृष्टि और भौतिकवादी दर्शन का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसी अध्याय में धर्म के भारतीय दृष्टि वाले उदात्त वास्तविक स्वरूप का भी दर्शन कराया गया है। विश्व के अन्य रिलीजन या मजहब (वास्तव में पंथ) से भारतीय दृष्टि वाले धर्म की तुलना करते हुए भारत के बहुसंख्यक समाज के आचरण और अन्य समाजों के आचरण के मूल कारणों की भी गहन, गम्भीर विवेचना प्रस्तुत की गई है। उदाहरणार्थ-   “भारतीय धर्म चाहे वह ‘आर्य (वैदिक)  धर्म’ हो या सनातन धर्म (वैष्णव धर्म) या शैव या जैन धर्म या बौद्ध धर्म या सिक्ख धर्म आदि--- इन सभी के अनुयायियों की धार्मिक आस्था सघन होने पर ‘भक्ति’ में बदल जाती है और सघन धर्मालु यहाँ ‘भक्त’ बन जाते हैं। भक्ति सघन होने पर भक्त अपने आराध्य से सायुज्य की कामना करने लगता है, फलतः अंततः उसका मन निर्विकार/त्रिगुणातीत हो जाता है। दूसरी ओर, अन्यान्य देश-समाज में धार्मिक आस्था सघन होने पर उनमें ‘कट्टरतावाद’ पनप जाता है। अन्य धर्म का धर्मालु कट्टरतावाद के फलित से अपने कथित धर्म/आस्था को अन्य मानव-समाजों में येन-केन-प्रकारेण (हिंसा से भी) फैलाने/थोपने पर कटिबद्ध (प्रत्युत उसी पर आमादा) हो जाता है; यहाँ तक कि इसके लिए वह घोर तमस्शील होने से भी गुरेज नहीं करता ! ‘निर्विकार सात्त्विक धर्मालुता बनाम तमस्शीलता’ का यह अन्तर एक ‘बहुत बड़ा अन्तर’ कारित करता है ‘भारतीय धर्मालुता’ और ‘भारतीयेतर    धर्मालुता’ में। भारतीय धर्मानुयायी/भक्त में धीरे-धीरे सात्त्विकता, शिवशीलता, अहिंसा आदि के भाव बढ़ते जाते हैं, वह भोग-वृत्ति और भेद-भाव वृत्ति (अपना-पराया के भाव) से विमुख होता जाता है। भारतीय धर्मालु भक्त चरम अवस्था में भक्ति में इतना डूब जाता है कि उसे अपने आराध्य के सिवा कुछ और दीखता ही नहीं, वह सिवा अपने इष्ट/आराध्य से सायुज्य के अतिरिक्त कुछ और देखना/सोचना चाहता भी नहीं। यत्र-तत्र-सर्वत्र अपने आराध्य को देखने वाली दृष्टि के फलस्वरूप कामनाशील होने पर भारतीय भक्त ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ की ही कामना करता है।” (पृ॰ 115-116) + + + + “यह सत्त्वशील सम्पृक्ति अन्य देश/समाज में प्रायः न के बराबर है, भले ही भारत-इतर देश/समाज भी देवी सरस्वती की पूजा विविध रूपों में करते हों। सारस्वत सात्त्विकता, सारस्वत तितिक्षा एवं सारस्वत चिन्मयता के अभाव के फलस्वरूप अन्य देश/समाज जहाँ नस्लीय दंभ और नस्लीय खून-खराबा आदि से आग्रस्त हैं, यहाँ तक कि उनका धर्म भी सर्वकल्याण की भावना से वंचित और कहीं न कहीं ‘स्व’ पर संकेन्द्रित है; वहीं, आम भारतीय ऐसी तामस वृत्तियों से मनसा-वाचा-कर्मणा सामान्यतया दूर ही रहता है-- यह दूरी देवी भारती से सहयुजन का ही फलित है। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण भारत-भूमि में परिव्याप्त सघन धर्मालुता, धर्म-कर्म के फलाफल, पुनर्जन्म आदि-आदि के विश्वास जो स्वयं देवी भारती के सारस्वत एवं चिन्मयी (आध्यात्मिक) संस्कारों के फलित हैं।“ (पृ॰ 102) + + + + “औ..र, उपरि-इंगित ‘भारतीत्व’ से भारतीय जन-मन की कथ-अनकथ सम्पृक्ति भारतीय जन के बहुलांशतया सत्त्वशील, ऋतशील, प्रज्ञाशील, तितिक्षाशील, विश्रान्ति-प्रिय प्रकृति से भी स्वतः प्रमाणित है। देवी भारती से जुड़ाव का फलित ही मानना होगा इसे भी कि सात्त्विकता, पावनता, चिन्मयता, तितिक्षा, उदात्तता, नैतिकता आदि के प्रति असामान्य लगाव के फलस्वरूप भारतीय जन की ‘राष्ट्रीय चिति’ सामान्यतया सत्त्वशील, उदात्त और उदार हो गई। इसी सत्त्वशीलता का फलित है कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः ....’  सदृश सर्वकल्याणक दैवीयता, समन्वयवादिता आदि सद्गुणों से कथ-अनकथ रूप में सदा आसिक्त रहता है आम भारतीय।  
औ...र, तमस्हीनता एवम् वैदिक सारस्वत निदेशन आदि के अनुपालन वाली निस्पृह अ-लोलुप सात्त्विक भारती$यता का अतिरिक्त प्रमाण है यह भी कि भारतीत्व के फलित से कारित विशिष्ट जीवन-दर्शन आदि के फलस्वरूप 11वीं सदी तक जब भारतीय भौतिक रूप से अति सशक्त थे, तब भी विश्व के किसी देश को किसी सामान्य भारतीय या भारतीय राजा या भारतीय व्यापारी द्वारा अपना उपनिवेश नहीं बनाया गया और न ही कभी ऐसी कोई कामना ही की गई। “वस्तुतः भारतीयों की सहिष्णुता, उदात्तता, उदारता और ‘जियो और जीने दो’ की सारस्वत सर्वकल्याणक भावना का ही प्रमाण है यह भी कि भारतीयों ने कभी दूसरे धर्म/पूजा-पद्धति के अनुयायियों को लोभ या उत्कोच देकर या बलात् उनके धर्म/पूजा-पद्धति से विमुख नहीं किया; न ही उन्हें अपने धर्म में दीक्षित करने के लिए कोई कला-छला कभी अपनाई वरन् अपनी दैनन्दिनि कठिनाईयों को बढ़ाने वाली विदेशी विपरीत मान्यताओं/कार्यों को भी सहिष्णुतापूर्वक सहन कर ऐसी मान्यताओं के अनुनायियों/कार्यों के कर्त्ताओं को यहाँ अपने ढंग से जीवनयापन का अवसर दिया। ”(पृ॰ 103-104) + + + + “सच तो यह है कि अन्यान्य धर्म/पंथ/ संस्कृति/समाज/देश में ऐसी चिन्तना मात्र निज के वर्ग-विशेष और समुदाय-विशेष तक के लिए सीमित हैं। देश-काल से परे, निजी जातीय धर्म से परे, सर्वजन एवं सर्वप्राणी तक विस्तारित और कल्याणकामी नहीं हैं अन्य धर्मावलम्बी। अपने पंथ/मत/विचार से असहमत की ‘हत्या’ तक का निर्देश कारित करने वाले भारतीयेतर धर्म/सम्प्रदाय/पंथ के पंथी ‘स्व’ से सम्बन्धित के कल्याण की कामना से आगे नहीं बढ़ पाते। वे वस्तुतः ‘सर्व’ के कल्याण की कामना कर ही नहीं सकते क्योंकि ‘सर्व’ का कोई ‘अस्तित्व’ कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, यहूदी या इस्लाम आदि धर्म/सम्प्रदाय में स्वीकार्य नहीं है। ‘सर्व’ के कल्याण की कामना और सर्वहितरतः का आदर्श वही चरितार्थ कर सकता है जो ‘सर्व’ में ‘परम-आत्मन्’ का (ब्रह्म/परब्रह्म का) वास देख सकता हो और ‘सर्व’ को ‘परम-आत्मन् का (ब्रह्म/परब्रह्म का) अंश’ मानता हो। ऐसे सद्भाव भारत-इतर जगत् में प्रायः अलभ्य हैं। ”(पृ॰ 109-110)
कृति में दिए गए भारतीय धर्म और गैरभारतीय धर्मों से सम्बन्धित उपर्युक्त तथ्य तत्सम्बन्धी विभ्रमों का नीर-क्षीर विवेकजनित पूर्ण स्पष्ट चित्र साक्षात् कर देते हैं। यह चित्र देश-विदेश के उन मनस्वियों का वस्तुस्थिति से यथार्थपरक साक्षात्कार करा देता है जो विश्व में शान्ति, सौहार्द और सर्वत्र मानवीयता तथा मानवता का प्रसार देखना चाहते हैं। इस प्रकार मानवीय तथा मानवतावादी दृष्टि से भारतीय धर्म और गैरभारतीय धर्मों के श्रेष्ठत्व-अश्रेष्ठत्व के निर्णय के अप्रकट को प्रकट-सा करते हुए भी निर्णय का ‘बहुत-कुछ’ पाठकों की मति पर छोड़ दिया गया है। 
कृति के अन्तिम अध्याय ‘भारत का वास्तविक स्वरूप’ को दिग्दर्शित कराने में भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि का उपयोग कर भारत राष्ट्र का जो मूर्तिमान चित्र लेखक द्वारा खींचा गया है वह अप्रतिम है। लेखक लिखता है- “विशेष प्रकृति का तत्त्वाभिनिवेशित अन्वेषण करें तो स्पष्ट होगा कि विशिष्ट ऋता और विशिष्ट शील वाले हमारे वर्तमान भारत का नदी, पर्वत, वनसम्पदा, खनिज सम्पदा, पशु-पक्षी आदि जैविक सम्पदा और विशाल जनसंख्या के सहयुजन वाला भू-क्षेत्र जो हिमालय से आसमुद्र, कामरूप से कच्छ, कन्याकुमारी से कश्मीर तक विस्तृत है, वह प्राकृतिक सम्पदायुक्त समस्त भू-क्षेत्र भारत का ‘अन्नमय कोश’ है जिसे ‘मृण्मय भारत’ कहा जा सकता है। यहाँ का भारतत्व (‘भा$रतत्व’ अर्थात् ‘ज्ञान रूपी प्रकाश प्रत्यक्ष करने वाली सतत निरतता वाली प्रवृत्ति’) भारत का ‘प्राणमय कोश’ है। इसी प्रकार यहाँ का ‘भारतीत्व’ (‘भारती+त्व’ अर्थात् ‘भास्वद् सारस्वत चिन्मयता’) भारत का ‘मनोमय कोश’ है और ‘वेदोपनिषद्, दर्शन-योग-अध्यात्म से आच्छादित शिवत्व + रामत्व + कृष्णत्व वाली विशिष्ट ऋता’ वस्तुतः भारत का ‘विज्ञानमय कोश’ है।” (पृ॰ 131)  + + + + “प्राचीनकाल से अद्यतन विद्यमान ‘चिन्मय भारत’ की बीजरूपीय विद्यमानता और तद्गत शाश्वतता के सम्बल से कह सकते हैं कि ‘मृण्मय भारत’ के साथ ही भा+रतत्व सह भारती+त्व से सम्पृक्त ‘चिन्मय भारत’ और भारत की शाश्वत चिन्मयता से सम्पृक्त ‘शाश्वत भारत’ भी सदा अस्तित्ववान् रहा है यहाँ, जिसमें राष्ट्रत्व के प्रायः सभी वांछनीय तत्त्व समेकित रहे हैं।” (पृ॰ 132)
अनेकानेक विभ्रमों और फर्जी मनस्वियों, राजनेताओं आदि के न्यस्त गर्हित स्वार्थों के चलते आज भारत में बहुसंख्यक समाज की मान्यताओं का मान-मर्दन करने, धूल-धूसरित करने, छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में विघटनकारी तत्त्वों को बढ़ावा देने, प्रकारान्तर से देश-राष्ट्र-बहुसंख्यक समाज को खण्ड-खण्ड करने के उद्देश्य से एक वैचारिक आँधी-सी चल रही हैै। इस आँधी को रोकने और कुत्सित मानसिकता भरी कुचालों को खण्ड-खण्ड करने के लिए और सत्य वस्तुस्थिति की रक्षा करने के लिए लेखक ने इस कृति में अपनी पूरी शक्ति, अपनी पूरी प्रज्ञा-क्षमता लगा दी है। साथ ही ऐसी दुःस्थिति में क्या करना उचित होगा इस कर्त्तव्य-दिशा का भी संकेत कर दिया है- 
“परिस्पष्टतः भारत को यदि पुनः गुलाम नहीं बनने देना है, यदि उसे श्रेष्ठ उत्कर्षवान् राष्ट्र बनाना है तो हमें उपरि-इंगित भारतीयता-समग्र को पुनः वाचाल करना होगा भारत के कण-कण में, प्रत्येक भारतीय के मन-वचन-कर्म में। प्रत्युत भारतीय के लिए तो अपरिहार्य है देवी भारती के सद्गुणों से अविच्छिन्न जुड़ाव। शब्दान्तर से कह सकते हैं, व...र...न् कहना ही होगा कि भरतत्व + भारतत्व + भारतीत्व + शिवत्व + रामत्व + कृष्णत्व + जिनत्व + बुद्धत्व से सम्यक् जुड़ाव के अभाव में अर्थात् भारतीयता-समग्र के जुड़ाव के अभाव में भारत उत्कर्षवान् राष्ट्र नहीं बन सकेगा।” (पृ॰ 147)
इसी अध्याय में लेखक ने ‘भारत को बहुसंस्कृतियों का खिचड़ी जैसे स्वरूप वाला देशस्थापित करने की पुरजोर कोशिशों को मूलतः निरस्त करते हुए अपना स्पष्ट मत स्थापित किया है कि अवश्य भारत में अनेक संस्कृति वाले रहवासी हैं किन्तु वे पकी खिचड़ी के समान समरस, समवाय के रूप में सहनिवास करते हैं, कच्ची खिचड़ी के अलग-अलग दानों वाले मिश्रण के रूप में नहीं। अपनी बात को पुष्ट करते हुए कृतिकार लिखता है-   “तितिक्षाशील समन्वयवादिता से संपोषित विशिष्ट समन्वयवादी सामासिकता चूँकि विश्व के अन्य देशों में लभ्य नहींे है; अतएव, वहाँ सैकड़ों वर्षों से साथ-साथ रहने के बावजूद, प्रायः एक उद्भव या एक सदृश उद्भव होने के बावजूद सामी जगत् में यहूदी, ईसाई, इस्लामी आज भी क्रमशः यहूदी, ईसाई, इस्लामी ही हैं और/या इसी तरह जर्मन संस्कृति-समाज आज भी जर्मन है, फ्रेंच फ्रेंच है, स्लाव स्लाव है और अंग्रेज-समाज आज भी अंग्रेज। यदि आपस में मिल जाएँ वे, तो भी वे सब अनपकी खिचड़ी के दानों की तरह अलग-अलग दिखते हैं। (पृ॰144)”
कृति में भारतीयता और भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्वों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है, किन्तु क्या वे प्रसंगित अच्छाईयाँ आज भी बहुसंख्यक भारतीयों में विद्यमान हैं ?  भारत के समाज में आज जो वस्तुस्थिति दिखती है वह लेखक के दावों के विपरीत प्रतीत होती है। इस आपत्ति को भाँपते हुए लेखक ने तत्सम्बन्धी तथ्यों की विवेचना यथावसर प्रस्तुत करते हुए यह मत प्रस्तुत किया है कि आज भी वे सारी विशेषताएँ भारत में विद्यमान हैं भले ही उस विद्यमानता का स्वरूप बीजरूपीय हो। इस संदर्भ में लेखक का कथन है-   “औ..र, भारत के संदर्भ में लोक-सत्य यह है कि भारत की शाश्वतता, भारत की चिन्मयता, ‘भारत+त्व’, ‘भारती+त्व’, ‘भारतीयत्व-समग्र’ औ..र, भारत का ‘राष्ट्रत्व’ आदि ऐसे स्वयंतथ्य हैं जो विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किए जाने वाले अकूत विनाश के बावजूद भारतीय जनमानस में गहरे पैठे हैं। वे पूर्णतया समाप्त होने वाले भी नहीं है, भले ही ऊपरी तौर पर भारतीयता से, भारतीय संस्कारों से आम भारतीय यदा-कदा विच्युत् दिखे, तो भी उसके मन-मस्तिष्क में, उसकी नसों में बहने वाले लहू में भारतीयता के उपरि-वर्णित संस्कार (सुषुप्तावस्था में ही सही) विद्यमान रहते हैं मानों उनके गुणसूत्रों के ‘डी॰एन॰ए॰’ में प्रविष्ट हो गए हों वे।” पृ॰ (145) 
कृति का प्रारूप-स्वरूप ऐसा है जिससे यह भ्रम हो सकता है कि प्राचीनकाल के बहाने भारत के मात्र बहुसंख्यकों के पक्ष की ही बात इस कृति में की गई है, अन्य लोगों की नहीं। किन्तु ऐसा करना कृति-लेखक की यथार्थपरक विवशता प्रतीत होती है। सच तो यह है कि जब प्राचीनकाल में अन्य लोगों का अस्तित्व ही नहीं था, तब उनकी बात कैसे की जाए? 
दूसरे, जब भारतीय बहुसंख्यक समाज से इतर समाज की जीवन-दृष्टि और जीवन-दर्शन सृष्टि और सम्पूर्ण मानवता के हित में नहीं है, तब उसका महिमामण्डनकारी असत्य चित्रण कैसे और किसलिए किया जाए ? 
यद्यपि कृति के तथ्य महत्त्वपूर्ण अनेक बिन्दुओं पर नीर-क्षीर विवेक द्वारा सत्यान्वेषण कर उनसे सम्बन्धित भ्रान्तियों और तमस् का निवारण कर देश में सामाजिक समरसता, एकता, अखण्डता को बढ़ावा देने वाले हैं। वे राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय सौहार्द और विश्वशान्ति को सशक्त आधार प्रदान कराने वाले भी हैं। भारत और इसके निवासियों का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने में भी कृति-समग्र पूर्ण सक्षम है। इसी कारण यह एक अमूल्य थाती के रूप में स्थापित होने योग्य है और सर्वथा प्रशंसनीय है। 
तथापि-
- कृति उन लोगों को नापसन्द होगी जो भारत को टुकड़े-टुकड़े देखना चाहते हैं। 
- कृति उन लोगों की आँख की किरकिरी सिद्ध होगी जो अपनी पीत दृष्टि से भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य को देखते हैं। 
- कृति उन लोगों की भी घृणा और उपेक्षा का पात्र बनेगी जिन्हें देश के बहुसंख्यक समाज के गुणगान में दुर्गन्धित असहनीय ‘बू’ अनुभव होती है। 
- लोकतंत्र में जिस बहुसंख्यक को सम्मान और वरीयता का अधिकार मिलना चाहिए, भारत के उस बहुसंख्यक के लोकतंत्र-प्रदत्त अधिकार का निरन्तर गला घोंटने के लिए जो लोग सत्ता के लालच में सफल प्रयासरत रहते हैं, कृति उन्हें भी अरुचिपूर्ण और असहनीय लगेगी।
किन्तु ?
किन्तु कृति उन्हें अत्यन्त सुखद, प्रेरणास्पद, दिशावाहक और तपती दुपहरी में दग्ध लू के थपेड़ों से बचा कर शीतल छाया प्रदान करने वाले विराट वृक्ष-सी अनुभव होगी जो स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भी अपनी संस्कृति, धर्म, दर्शन, ज्ञान, अध्यात्म, धर्मग्रन्थ, पूजा-पद्धति, पूजास्थल, गौ आदि पूज्य जीव, आदर्श महान् व्यक्तित्व, पशु-जीवनशैली से इतर सर्वथा मानवोचित जीवनशैली आदि-इत्यादि के सम्बन्ध में कुत्सित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बलात् थोपी गई अनेक अयथार्थपरक प्रवंचनाओं से त्रस्त हैं।   
       - 4/14/41 ए, महताब बाग, अवधपुरी कालोनी, फेज-2, फैजाबाद-224001, अयोध्या (उ॰ प्र॰), भारतवर्ष
                                                       ( समीक्षा कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ में प्रकाशित)
                                                             दूरभाष: 8707026283, 8874830492

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भारतीयों के लिए सँजीवनी सा संग्रह है 
   ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता

                     - डॉ॰ बृजेश कुमार गुप्ता 
प्रस्तुत पुस्तक ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ भारतीयों के लिए एक संजीवनी-सा संग्रह है जो भारत की अनकही जानकारी के बारे में बताता है। यह संग्रह भारत की वास्तविकता को दिखाने का एक प्रयास है।
यह ग्रन्थ भारत के बारे में व भारतीयों के विचारों, उनकी सभ्यता, उनकी परंपराओं और उनकी संस्कृति के बारे में बहुत व्यापक सर्वेक्षण प्रदान करता है। अंत में इस ग्रन्थ से जो सीख मिलती है, वह प्रशंसनीय है।
वास्तव में, इस ग्रन्थ में भारत और भारतीयता को परिभाषित करने वाले कुछ विचारों, दृष्टिकोणों और विश्वासों का पता लगाने की कोशिश में लेखक भारत माता को जागृत करना, भारतीय रूढ़िवाद की प्रकृति की पहचान करना और पश्चिमी राजनीतिक विचारों के साथ इसकी समानता और अन्तर की पहचान करना चाहता है। इस ग्रन्थ का उद्देश्य एक विचार की समझ को अधिकाधिक प्रोत्साहित करना है। विजय रंजन ने अपने परिचय में इस विषयवस्तु को बहुतायत से स्पष्ट किया है। 
यह ग्रन्थ राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत दो विपरीत विचारधाराओं को सामने लाता है। एक ओर उन लोगों की विचारधारा थी जो धर्मनिरपेक्ष गणतंत्रवाद के संदर्भ में आधुनिक भारत को देखते थे और दूसरी ओर वे थे जिन्होंने देश की हिन्दू विरासत के साथ तकनीकी आधुनिकता का मिश्रण करना चाहा था। इनके साथ होने वाली बहसों ने कई चिन्ताओं का अनुमान लगाया, जो आज आधुनिक भारत में प्रतिबिम्बित होते हैं। 
सच तो यह है कि भारत और भारतीयता के सम्बन्ध में अति महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ इस ग्रन्थ द्वारा एक साथ पाने के लिए पाठक ग्रन्थकार विजय रंजन के कर्ज में डूबे हुए हैं, जिसका एक विशिष्ट उद्देश्य है। ग्रन्थकार का यह कर्ज तभी उतरेगा, जब अधिक से अधिक पाठक इस ग्रन्थ का गहनता व मनोयोग से पारायण करेंगे और ग्रन्थ में बताए गए ज्ञान को मन, वचन और कर्म से अपनाकर न केवल भारत के प्राचीन गौरव को वापस लाने को कटिबद्ध होंगे वरन् आधुनिक आयामों में भी भारत को विश्व का सिरमौर बनाएंगे।
  - सहायक प्राध्यापक, अंग्रेजी, एकलव्य महाविद्यालय, बाँंदा (उ॰ प्र॰),  
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भारत और भारतीयता की प्रामाणिक प्रस्तुति

                     - डॉ॰ रामेष्वर मिश्र ‘पंकज’
मनीषी लेखक श्री विजयप्रताप सिंह जो विजय रंजन के नाम से लेखन कार्य करते हैं, उनकी कृति ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ एक श्रेष्ठ प्रामाणिक पुस्तक है। इसमें उन्होंने ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण और साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जो इसके वास्तविक स्वरूप को उद्भाषित कर देते हैं। लेखक ने प्रस्तावना में ही इस विषय में अपनी जिज्ञासा तथा शोधयात्रा का संक्षिप्त विवरण दिया है। 
प्रथम अध्याय में उन्होंने भारतीयों की चेतना में निरन्तर प्रदीप्त भारताग्नि का वैदिक संदर्भ स्पष्ट किया है। वस्तुतः यह चिदग्नि है जिसका पुंजीभूत रूप सर्वव्यापी चेतना-सूर्य है, जिसकी आधिदैविक अभिव्यक्ति सौरमण्डल के प्रकाशक सूर्य के रूप में नित्य दिखती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि श्री विजय रंजन ने इस विषय में हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के लेख को भी उद्धृत किया है; जबकि विगत 50 वर्षों से भारतेन्दु से लेकर जयशंकर प्रसाद तक की मनीषा को विकृत रूप में प्रस्तुत करने का काम सरकारी अध्यापकों उर्फ आलोचकों के द्वारा किया जाता रहा है। इन्होंने स्पष्ट किया है कि सूर्य और विष्णु एक ही हैं और ‘विष्णु पूजा’ उच्चतर ‘सूर्य पूजा’ ही है। लेखक ने यह प्रामाणिक तथ्य भी प्रस्तुत किया है कि ‘विश्व भर में सूर्य पूजा भारत से ही गई है’। ‘भा’ का अर्थ ही है ‘सूर्यज्योति’ और उसकी साधना में रत देश ही भारत है। स्पष्ट है कि यहाँ केवल ‘ग्रह के रूप में दिख रहे सूर्य’ की बात नहीं है, अपितु ‘ब्रह्माण्ड-व्यापी और ब्रह्माण्ड की अधीश्वर चेतना सूर्य’ की बात है। इसी चेतना-सूर्य के निरन्तर साधक भारत की विद्या-अधिष्ठात्री देवी ‘सरस्वती’ हैं, जिनका आख्यान पुराणों में तथा दुर्गा सप्तशती में भी है। श्री रंजन जी ने स्पष्ट किया है कि देवी भारती ही पुराणों में देवी सरस्वती के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वे सत्त्वशील, ऋतशील, सर्वकल्याणकारी, शुभ्रता से परिपूर्ण देवी हैं। वे ज्ञान, कला, काव्य, संगीत, छन्द, अभिव्यक्ति-क्षमता एवं शान्ति की प्रदायिनी वाग्देवी हैं। इसीलिए शतरूपा अर्थात् अनन्त विविध रूपों वाली तथा विद्यारूपा, शक्तिरूपा और धीश्वरी के रूप में सामवेद में उनकी स्तुति की गई है। बृहदारण्यक उपनिषद उन्हें ही ‘वाक्’ कहता है और महाकवि वाल्मीकि, कालिदास, माघ, भारवि, भवभूति, बाण, राजा भोज, राजशेखर, हेमचन्द्र, तुलसीदास, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद आदि महाकवियों ने निरन्तर उनकी वंदना की है। जैन और बौद्ध कवियों ने भी उनकी स्तुति की है और इसीलिए प्रारंभ में विलियम जोन्स ने भी देवी सरस्वती की वन्दना करते हुए कविता लिखी थी ताकि उन्हें भारत में विद्या का साधक मान लिया जाए। परंतु कांग्रेस शासन ने योजनापूर्वक भारत के विद्यालयों में सरस्वती पूजा को क्रमशः बंद कराया। यह कांग्रेस का वह महापाप है और जिसका फल उसके बौद्धिक दृष्टि से अक्षम नेतृत्व के रूप में सामने आना अवश्यंभावी था। 
लेखक ने स्मरण दिलाया है कि यूनान, रोम, इटली, फ्रांस, इंग्लैण्ड और मंगोल जगत् में देवी सरस्वती की पूजा किसी न किसी रूप में होती ही है। जापान में वे देवी ‘बेंजाइतेन’, इटली में देवी ‘फेमिना’, एथेंस में देवी ‘म्यूजेस’, रोम में अग्नि देवी ‘वेस्ता’, यूनान में देवी ‘सैफो’, सामी जगत में देवी ‘इन्हेंदुआना’, चीन में देवी ‘नीलसरस्वती’ और तिब्बत में ‘महासरस्वती’, ‘वज्रशारदा’, ‘वज्रसरस्वती’ के रूप में पूजित हैं। स्पष्ट रूप से भगवती का प्रामाणिक रूप-दर्शन वैदिक साहित्य और उसके अनुवर्ती भारतीय साहित्य में ही है। इस प्रकार भारती और सरस्वती पर्याय हैं और भारत माता भी मूल रूप में ज्ञानात्मिका ही हैं। यह तो सभी परंपरागत भारतीय जानते ही हैं कि महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी एक ही चिन्मय सत्ता के विभिन्न आयाम हैं और इसीलिए भारत माता ज्ञान, शक्ति और ऐश्वर्य की देवी हैं। उस देवी की साधना करने वाले ही भारतीयता से संपन्न भारतीय हैं। पूर्वजन्मों के किन्हीं आंशिक शुभ कर्मों के कारण देह से भारत में उत्पन्न होकर भी जो लोग अपने पूर्व कुसंस्कारों के कारण  उस देवी की साधना नहीं करते, वे शरीर से भले भारतीय हों, परंतु चेतना के स्तर पर भारतीय नहीं हैं। 
विजय रंजन जी ने यह भलीभाँति स्पष्ट कर दिया है कि ‘सरस्वती नदी’ के पर्याय ‘भारती’ नाम से भारत का नाम ‘भारत’ नहीं है, अपितु वस्तुतः भगवती सरस्वती (जो महालक्ष्मी और महाकाली भी हैं), के साधकों के नाम से भारत को ‘भा’ ‘रत’ कहा गया है। इस नदी का नाम भी सरस्वती इसीलिए है क्योंकि वह भारत की उत्तर पश्चिमी क्षेत्र की एक विशाल सरिता है, जो किसी समय अपने विस्तार के कारण अत्यंत आकर्षक और चर्चित थी। 
विजय रंजन जी ने यह सही कहा है कि देवी भारती के सत्त्व, ऋत, रचनाधर्मिता, शिवत्व, नय, सार्वसुन्दरम्, दकारत्व, चिन्मयत्व आदि गुणों को समेकित करने वाला और उनका वर्धन अर्थात् प्रसार करने वाला ही भारतीय है। वे कहते हैं- “वस्तुनिष्ठ भारतीय उसे ही माना जा सकता है जो देवी भारती के गुणों का आराधक और उनके प्रति श्रद्धावान् हो।” 
अगले अध्याय में उन्होंने ‘भारत’-नामकरण के अन्य आधार भी दिए हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता में विभिन्न स्थलों पर ‘भारत’ एक ‘चैतन्य ज्ञानोन्मुख सत्ता’ के रूप में कहा गया है। इसी के साथ भरत अर्थात् सबका भरण-पोषण करने वाला भारत है। वस्तुतः अपने मूल रूप में भारत बहुत विस्तृत था और वह सचमुच सबका भरण-पोषण करने वाला ही था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि भरत को वैदिक वाङ्मय में ‘आदित्य’ के पर्याय के रूप में ही वंदित किया गया है। यास्क ने भी ‘भरतः आदित्यः तस्य भा भारती’ कहा है। भरत चिदग्नि तो है ही। वस्तुतः सबका भरण-पोषण करने वाले प्रथम सम्राट मनु को भी इसीलिए भरत कहा गया है। इसी अर्थ में वायुपुराण में लोक का भरण करने वाले राजा को भी भरत कहा गया है। 
लेखक की इसके लिए प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने इस विषय में उपलब्ध 100 से अधिक संदर्भों की विवेचना भली-भाँति की है। इस प्रकार संपूर्ण विषय को सम्यक् रीति से विवेचित किया है। उन्होंने बताया है कि प्लेटो ने जब भारत को ‘इंदोई’ कहा तो उसका अर्थ था ‘पूर्ण चंद्र जैसा निर्मल और शांत ज्योति से ज्योतित देश’। इसी प्रकार मिल्टन ने भी भारत को ‘इंदो’ कहा है। 125 ईस्वी के एक चीनी सेनापति पन्योड् ने भारत को ‘थि-एन-चु-को’ अर्थात देवों का देश कहा है, यह लेखक बताते हैं। अन्य चीनी मनीषी भी भारत को ‘इन्तु’ अर्थात् ‘पूर्ण चन्द्र का देश’ कहते थे। व्हेनसांग ने इसे ‘शिन्तु’ कहा है जो उच्चारण भेद से इन्तु ही है। वे लोग भारत को आस-पास के राष्ट्र रूपी नक्षत्रों से घिरा पूर्ण चन्द्र कहते थे, ऐसा विजय रंजन बताते हैं। (वस्तुतः जापान में भी हिन्दू धर्म ही था, जिसे उच्चारण-भेद में ‘शिन्तो’ कहा गया है)।प्राचीन अरबी कवि (1800 ईसा पूर्व) लबी-बिन-ए-अख्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी कविता में भारतभूमि को हिन्दू देश कहा है। इसी तरह अरबी कवि जरहम बिन तॉई ने भारतीय हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य की प्रशंसा की है। यह कृति इस्ताम्बूल के राजकीय पुस्तकालय में संरक्षित है, यह लेखक बताते हैं। इसी प्रकार पहलवी नरेशों ने भारत को हिन्दू देश कहा है, जबकि ‘बृहस्पति आगम’ में ‘हिमालय से इन्दु सरोवर तक विस्तृत देवनिर्मित पवित्र स्थल’ को ‘हिन्दुस्थान’ कहा गया है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि वस्तुतः प्राचीन समय में भारत और जम्बूद्वीप पर्याय ही थे क्योंकि भारतीयों का शासन संपूर्ण जम्बूद्वीप में था। बौद्ध ग्रंथों में भारत को जम्बूद्वीप ही कहा गया है और तमिल ग्रंथों में भारत और जम्बूद्वीप दोनों को ‘नावलंतीवु’ कहा है, जिसका अर्थ होता है भारत और इसकी अधिष्ठात्री देवी शम्भुदेवी कही गईं हैं जो जगदम्बा पार्वती ही हैं। 
लेखक ने बताया है कि भारतवर्ष के अन्य नाम ‘आर्यभूमि’, ‘देवभूमि’, ‘सप्त-सैंधव प्रदेश’, ‘ब्रह्मर्षि देश’, ‘ब्रह्मावर्त’, ‘कुमारी अंतरीप’, ‘हिमवर्ष’, ‘अजनाभ वर्ष’ आदि रहे हैं। जहाँ सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र जो अरब क्षेत्र तक विस्तृत है, उस क्षेत्र को ही ‘हिमवर्ष’ कहा जाता था। नाभि यहाँ के राजा थे। लेखक ने विस्तार से उन सभी नामों का संक्षिप्त परिचय दिया है, जो स्वयं में एक महत्वपूर्ण कार्य है। 
लेखक ने यह महत्त्वपूर्ण पक्ष भी उठाया है कि कुछ लोग मुअन-जोंदारो में मिली निर्वसन योगमूर्ति को ऋषभदेव बताते हैं, परंतु यदि इसे सही मान लिया जाए, तो भी वैदिक और पौराणिक साहित्य में वर्णित ऋषभदेव और भरत इन मुअन-जोंदारो वाले ऋषभदेव से बहुत पहले के सिद्ध होते हैं। 
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य लेखक यह स्मरण कराते हैं कि जैन ग्रंथों के अनुसार ऋषभदेव और यशस्वती से उत्पन्न पुत्र भरत ने चक्ररत्न की पूजा के उपरांत यवन, पल्लव, काम्बोज, तुरूष्क, सौवीर, कैकय, गांधार, कश्मीर आदि राज्यों को जीत कर दिग्विजय की थी। इससे यह स्मरण हो आता है कि जैन राजा और बौद्ध राजा, सभी भारी सैन्य बल रखते थे और युद्ध भी करते थे। इसलिए युद्ध की हिंसा से विरक्त होने के कारण या विरक्त होने के बाद, कोई राजा जैन या बौद्ध होता था, यह गप्प निराधार है। वस्तुतः जैन और बौद्ध सभी राजा सामान्य हिन्दू राजा ही थे और उनका सब त्याग कर चौथे आश्रम (सन्यास आश्रम) में जाना भी हिन्दू परम्परा का ही पालन है। उसे हिन्दू धर्म के समानान्तर कोई अन्य धर्म दिखाने का प्रयास मूढ़ यूरो ईसाई लोग और उनके उनसे भी अधिक मूढ़ भारतीय चेले ही करते हैं।
लेखक ने यह भी बताया है कि 500 ईसा पूर्व में पारसीक सम्राट दारा के अभिलेख में हिन्दू देश का उल्लेख है और उसके प्रति सम्राट का आदरभाव प्रकट हुआ है; अर्थात् इस्लाम के जन्म से 1200 वर्षों पूर्व से भारत को अरब से पारसीक तक के लोग ‘हिन्दु देश’ ही कहते थे। इसी प्रकार पारसीक धर्मग्रंथ ‘जेन्द-अवेस्ता’ में भी भारतीयों को ‘हिन्दू’ ही कहा गया है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात लेखक ने यह भी बताई है कि पूर्व में ‘हिन्दू’ और ‘इंडो’ शब्द सदा आदरवाचक था। परंतु जब यूरोपियों को भारत में कुछ सफलता मिलने लगी, तो उनमें से कुछ सफल लोग ‘इन (प्द)’ उपसर्ग के वाचक ‘हीन’ अर्थ को उससे जोड़ने लगे। एक ही शब्द परिवेश और परिस्थिति बदलने पर कैसे भिन्न अर्थ देने लगता है, यह तथ्य इसका उदाहरण है।
अगले अध्याय में लेखक ने यह महत्वपूर्ण बिन्दु उठाया है कि ऋग्वेद में कहीं भी ‘आर्यावर्त’ शब्द नहीं है, जबकि ‘आर्य’ और ‘अर्य’ शब्द इसमें 36 बार आए हैं। ‘अर्य’ का अर्थ ‘जितेन्द्रिय’ होता है और ‘आर्य’ का अर्थ ‘जितेन्द्रिय, सदगुणी एवं निष्पाप’ होता है। अथर्ववेद में श्रेष्ठता वाचक अर्थ में आर्य शब्द का प्रयोग है। वाल्मीकि रामायण, महाभारत और अन्य ग्रंथों में भी आर्य शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त है। आर्य शब्द का यही अर्थ श्री अरविन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने भी किया है। स्पष्ट है कि स्वयं को अम्बेडकरवादी कहने वाले अनपढ़ और उद्दण्ड लोग जब आर्य को किसी नस्ल के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं तो वे वस्तुतः अंग्रेज ईसाइयों के विद्यावंश से जुड़े होते हैं, अम्बेडकर से नहीं। ‘आर्य’ शब्द गुणवाचक है, यह सर्वमान्य होने के बाद किसी क्षेत्र-विशेष को, विशेषकर किसी छोटे जनपद-विशेष को ‘आर्यों का मूल निवास स्थान बताना’ स्वतः ही निरर्थक सिद्ध हो जाता है। वस्तुतः प्राचीनतम काल से संपूर्ण भारतवर्ष के सदाचारी लोग आर्य कहे जाते रहे हैं और इस अर्थ में विश्वभर के श्रेष्ठ सदाचारी लोग ‘आर्य’ ही कहे जायेंगे। 
अगला अध्याय है- ‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार’। इसमें लेखक ने दिखाया है कि कम से कम 10,000 वर्षों से भारत एक राष्ट्र के रूप में सुस्थापित है। इसी प्रकार उन्होंने दिखाया है कि दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, यूरोप एवं अन्यान्य महाद्वीप भी कोसल के चक्रवर्तियों की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार करते थे- “ वाल्मीकि कृत रामायणम् के अनुसार कश्मीर से कवाटपुरम् (केरल) और गांधार से प्राग्ज्योतिषपुरम्, लौहित्य प्रदेश तक भारत की ही भूमि थी। रामायणम् के किष्किन्धा काण्ड में वानरराज सुग्रीव सीता की खोज के लिए वानर सेना को जब विश्व के सातों महाद्वीपों में जाने की आज्ञा देते हैं, तो उस समय वे किसी यूथप से किसी अन्य देश के राजा से अनुमति लेने की बात नहीं कहते। इससे अर्थायित किया जा सकता है कि तत्कालीन विश्व के विभिन्न देश/राष्ट्र आन्ध्रालय से अस्ताचल तक, मेरूप्रदेश (जिसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है, न किसी देश की सीमा) तक, तथा उत्तर में कैलाश पर्वत, उसके आगे सोमगिरि प्रदेश ( जिसके चारों ओर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र है अर्थात् उत्तरवर्ती ध्रुवान्त देश) और बीच के तत्कालीन अन्यान्य यूरोप, अफ्रीका, अन्टार्कटिका, अमेरिका, एशिया के विद्यमान देश/राष्ट्र या तो कोसल राज्य से मित्रवत् थे या कोसल के आधिपत्य में थे -- इतना विस्तारित था तत्कालीन भारत का राजनैतिक प्रस्तार।” यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सत्य विवरण है। इसके ही प्रकाश में रामचरितमानस की इस चौपाई का अर्थ प्रगट होता है - ‘भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।’ लेखक         साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने इतने प्रामाणिक ढंग से सत्य तथ्यों को सामने रखा और सत्य लिखने का संकल्प चरितार्थ किया अन्यथा यूरो-ईसाई विद्वता से अभिभूत भारतीय चेले यह सत्य लिखने का साहस ही नहीं कर पाते। 
‘महाभारत में 249 जनपदों का भारतवर्ष के अंग के रूप में वर्णन है। मत्स्य पुराण, वायु पुराण, विष्णु पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि में हिमालय से दक्षिण आसिन्धु भूमि को भारत कहा गया है’-- यह विजय रंजन स्मरण दिलाते हैं। पाणिनि के 200 वर्ष पूर्व रचित तमिल ग्रंथ ‘तोलकप्पियम्’ में उत्तरापथ के विवरण के साथ-साथ समुद्रतटीय कवाटपुरम् (पाण्ड्य देश अर्थात् केरल), चोल प्रदेश और तमिल प्रदेश सभी तमिल संस्कृति के भारतीय क्षेत्र के रूप में वर्णित किए गए हैं। इस प्रकार ईसा पूर्व 9वीं शताब्दी में भी गान्धार से प्राग्ज्योतिषपुरम् तक और कश्यप भूमि से कवाटपुरम् तक विस्तृत भारत था (यहाँ पाणिनि का काल विजय रंजन ने ईसा पूर्व 700 माना है, जो सही नहीं है, परंतु वह इस लेख का विवेच्य विषय नहीं है। इस संदर्भ में इतना ही कहना पर्याप्त है कि पाणिनि का समय इससे बहुत प्राचीन है)।
लेखक ने यह भी सत्य स्मरण कराया है कि- “पाण्ड्य और चोल राजा क्रमशः चन्द्रवंशी और सूर्यवंशी ही बताए गए हैं। कालिदास के ‘रघुवंशम्’ से भी तत्कालीन भारत भूभाग की विशालता का परिचय मिलता है। कालिदास के ‘आसमुद्रक्षितीशानाम्’, हर्ष के ‘चतुरूधि मेखलायां भूवो भर्ता’ और पुराणकारों के ‘अयं तु नवमस्तेषां द्वीप‘ सागर संवृतः’ के अनुसार 9 द्वीपों के बीच के समुद्रों पर भी भारत का आधिपत्य था। उपर्युक्त नौ द्वीप-द्वीपान्तरों को (यथा- जावा, सुमात्रा (श्रीविजय), मलय, कंबुज, चम्पा, स्याम (द्वारावती), केड़ा (कटाहद्वीप), बोर्निया द्वीप (वारूणद्वीप), कुमारी द्वीप एवं उनके मध्य क्षेत्र को) ‘भारतवर्ष’ के अंतर्गत बताते हुए ‘भारत की मौलिक एकता’ में श्री वासुदेवशरण अग्रवाल कहते हैं कि भारतभूमि के समुद्रों से घिरी होने के कारण ही वेदव्यास ने दोनों समुद्रों को ‘भारतमेदिनी’ (भारत के लिए समुद्रों की मेखला/करधनी) कहा है। श्री वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार कुमारी अन्तरीप से गंगा के उद्भव-स्थल तक विस्तीर्ण भारत-भूमि में एक चेतनधारा प्रवाहमान है (‘अंतश्चरित रोचना अस्य प्राणदयानती’)। श्री अग्रवाल ने अपनी कृति ‘भारत की मौलिक एकता’ के ‘भूमि परिचय’ नामक अध्याय में कम्बोज, कपिश (वर्तमानतः काफिरिस्तान), पुष्कलावती, बाल्हीक (बल्ख), बामियान, गांधार, दीर, तीरा, दरद, ब्रह्मावर्त (ब्रह्मर्षि क्षेत्र), हिमक्षेत्र, सुलेमान पर्वत, हिंगुला नदी, हरिहर, विन्ध्य दक्षिण, वर्णपर्वत, कुलपर्वत, नदी-क्षेत्र आदि का विस्तृत ऐतिहासिक भौगोलिक विचारण करते हुए कैलाश से पामीर तक के भूमि-विस्तार को समुद्रपर्यन्त ‘भारतवर्ष’ बताया है।” राजशेखर की काव्यमीमांसा आदि के भी उद्धरण देते हुए लेखक ने लंका स्थित त्रिकूट पर्वत से हिमाद्रि तक के विस्तृत क्षेत्र को भारतवर्ष बताते रहने की प्राचीन परंपरा का उल्लेख किया है। ‘बृहत्संहिता’ में ‘भारतवर्ष’ का जो वर्णन है, उसमें गांधार से लेकर दक्षिण पूर्व के मलाया, जावा, सुमात्रा आदि देश भारत की राजनैतिक सीमा ही बताए गए हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया है-- ”स्वयं मेगस्थनीज के अनुसार ‘सैंड्रोकोटस’ से पहले भारत में राजाओं की 154 पीढ़ियाँ 6451 वर्ष 3 माह राज्य कर चुकी थीं। कल्हण की राजतरंगिणी एक इतिहास-ग्रंथ ही है और उसमें भी भारत की विस्तृत सीमाएँ वर्णित हैं। 1400 ईसापूर्व के बोगाजकोई अभिलेख के       आधार पर भारत का क्षेत्र विस्तार प्राचीन मिस्र साम्राज्य से आगे तक था।” यहाँ तक कि कम्युनिस्ट लेखक और परम सोवियतभक्त राहुत सांकृत्यायन ने भी सांस्कृतिक भारत का विस्तार इंडोनेशिया से पामीर के पठार और उत्तर कुरू तक बताया है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कम्युनिस्टों की स्थापना से वर्तमान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्षस्थ अनेक लोग सांस्कृतिक भारत की ही बात करते हैं; वे भारत के राजनैतिक विस्तार का स्मरण भी नहीं करना चाहते जबकि श्री विजय रंजन और प्रो॰ कुसुमलता केडिया जी जैसे निष्पक्ष गंभीर विद्वान् सदा भारत के राजनैतिक विस्तार का सहज स्मरण करते हैं। संघ के लोगों की कुण्ठा का कारण जान पाना असंभव है, परंतु सत्यनिष्ठ विद्वान् तो सत्य ही लिखेंगे और उसमें संकोच नहीं करेंगे। लेखक ने बताया है कि-- ‘आचार्य चतुरसेन के अनुसार 7000 वर्ष पूर्व आंध्रालय (आस्टेªलिया) से लेकर श्रीलंका, मलाया, मेडागास्कर (वाराहद्वीप) और कुशद्वीप (अफ्रीका) तक की भूमि भारत से संश्लिष्ट थी। पाण्डुरंग वामन काणे ने भी ‘धर्मशास्त्र के इतिहास’ में लिखा है कि ‘प्राचीन भारतवर्ष का केवल 9 वाँ भाग ही आज का भारतवर्ष है।’
लेखक लिखते हैं कि--“ प्रकटतः वैश्विक वाड्मय को ही साक्ष्य मानें तो भारतीयों द्वारा यूरोप, अफ्रीका, आस्टेªलिया, अमेरिका महाद्वीप के अधिकांश देष भारतीयों द्वारा ही बसाए जाने सम्बन्धी कथाएँ वैश्विक इतिहास में विद्यमान हैं। इन कथाओं से भी 4000-5000 ई॰ पू॰ की अवधि तक के उन्नत सभ्यता, संस्कृति, कला-कौशल के देश और राष्ट्र के रूप में भारत की श्रेष्ठ-अवस्थिति स्वतः सिद्ध हो जाती है।” 
इस प्रकार लेखक ने भारत राष्ट्र की प्राचीनता का सांगोपांग निरूपण करते हुए ‘शुक्ल यजुर्वेद’ और ‘अथर्ववेद’ में राष्ट्र के राष्ट्रत्व के लिए वांछनीय तत्त्वों की जो विवेचना है, उसे संक्षेप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है कि “भारत के मनीषी सदा वृहत् राष्ट्र, विराट राष्ट्र और शक्तिशाली राष्ट्र की अभीप्सा करते रहे हैं। 1250 ई॰ पू॰ के विशाल भारत के राजनैतिक नक्शे में वर्णित भारत 16 महाजनपदों वाला होकर भी ‘भारत’ नाम से ही अभिहित है।” यहीं लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि यूरो-अमेरिकी जगत में, यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भी ‘राष्ट्र’ की कोई सर्वमान्य परिभाषा निगमित नहीं है। 
अगले अध्याय में लेखक ने ‘भारत के विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ की मीमांसा की है। अन्तिम खण्ड में ‘भारत के वास्तविक स्वरूप की विशद विवेचना’ की गई है, जो मनन योग्य है। 
कुल मिलाकर लेखक विजय रंजन की यह कृति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है  जो अत्यन्त समयसाध्य परिश्रम तथा शोधपूर्वक रचित है। इसमें समकालीन राष्ट्रजीवन से जुड़े आधारभूत पक्षों की भी गंभीर विवेचना प्रस्तुत की गई है। प्रत्येक व्यक्ति को इस कृति को अवश्य पढ़ना चाहिए।         
- ए 141, आकृति हाईलैण्ड, पोस्ट ऑफिस-फंदा, भोपाल- 462030, दूरभाष:  9691551409
                                                                         (‘अक्षरा’ पत्रिका में मई 2021 अंक में प्रकाशित)
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 भारत-भारतीयता के इतिहास तथा स्वरूप का उद्घाटन करती कृति क्या है भारत क्या है भारतीयता   

                     - डॉ॰ कमलकिशोर गोयनका
           (पूर्व उपाध्यक्ष केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा, भारत सरकार)
आपकी पुस्तक का विषय चुनौतीपूर्ण है और आपने उसे स्वीकार किया है। भारत और भारतीयता शब्द इधर सबसे अधिक चर्चित और विवादास्पद हैं और आपने सप्रमाण इनके इतिहास तथा स्वरूप का उद्घाटन किया है। मेरी बधाई स्वीकार करें।                                          
- ए/98 अशोक विहार, फेज-1, दिल्ली-52,  दूरभाष: 9811052469
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 व्यापक शोध के लिए आधार प्रदान करती कृति 
    ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ 

                                              - राजेश बादल
(पूर्व कार्यकारी निर्देशक, राज्यसभा टेलिविज़न, भारत की संसद नई दिल्ली’, लेखक, पत्रकार, फ़िल्मकार)
भारतीय संस्कृति पर गर्व करना एक बात है और उसे समझना दूसरी बात। यह आवश्यक नहीं कि एक विराट देश के नागरिक अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को गहराई से महसूस करते हों। श्री विजय रंजन का यह प्रयास इस सन्दर्भ में अनूठा और अनुकरणीय है। वे इसके लिए निश्चित तौर पर साधुवाद के पात्र हैं। 
जो भी पाठक इस पुस्तक का अध्ययन करेंगे, उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि लेखक ने अत्यन्त प्रामाणिक और पौराणिक जानकारियाँ एकत्र करने के लिए अनेक वर्षों तक अथक परिश्रम किया है। मुझे यह कहने में कोई झिझक या संकोच नहीं कि मैंने अपने जीवन में भारत की अवधारणा, नामकरण और इसके गौरवशाली इतिहास पर गहन शोध वाला कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं पढ़ा है।
इसे हम कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि लंबे समय तक परतंत्रता में जकड़े रहने की वजह से भारत का अपना ज्ञान-तंत्र बिखरता रहा और परदेसी शैक्षणिक ढाँचा हम अपनाते गए। इस कारण हम अपने ही विद्या-भण्डार से विमुख हो गए। हम उसके प्रति गर्व-बोध से तो भरे रहे, परन्तु उसकी महीन रेखाओं के अध्ययन को भुला बैठे। खेद की बात है कि स्वतन्त्रता के बाद निर्वाचित सरकारों ने भी इस दिशा में ध्यान नहीं दिया और हमारे नियन्ता पश्चिम की परम्पराओं तथा उनके शिक्षा-तंत्र को ही अंगीकार करते गए। इसी का परिणाम है कि आज हमारी वर्तमान पीढ़ी अपनी विरासत से अपरिचित है। वह सुनी-सुनाई मात्र यही बात जानती है कि भारत कभी विश्व गुरु था या भारतीय संस्कृति की रोशनी से सारा संसार जगमगाता था; लेकिन वह यह नहीं जानती कि ऐसा क्यों था ? परिणामतः भारत की खोई प्रतिष्ठा दोबारा प्राप्त करने की ललक या तड़प उसके भीतर नहीं दिखाई देती। इस बात को पुस्तक की भूमिका में डॉक्टर रामकृष्ण जायसवाल ने भी रेखांकित किया है। वे केवल एक पंक्ति में सारी बात कह जाते हैं- ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , न कश्चिद् दुःखभाग भवेत्’ अर्थात् विश्व-कल्याण की भावना ही भारत का राष्ट्रीय चरित्र है। यही भारत की अवधारणा है और यही भारत को समस्त राष्ट्रों में श्रेष्ठ बनाता है।  
श्री विजय रंजन पुस्तक के आत्मकथ्य में भारत को समझने की अपनी जिज्ञासा का विवरण देते हैं। वे अपने अध्ययन-काल के दौरान पाठ्îक्रमों को इस पिपासा को शान्त करने में सक्षम नहीं पाते। कीड़ा कुलबुलाता रहता है। पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने में व्यस्त रहने के कारण श्री विजय रंजन अपनी पिपासा शीघ्र शान्त नहीं कर पाते। लेकिन तीन बार हृदय की शल्य-चिकित्सा भी उनके उत्साह में अवरोध नहीं खड़े कर पाती। वे भारत के बारे में जानने की अपनी उत्कण्ठा को अस्तित्वमान बनाए रखते हैं और एक कसक के साथ अपनी स्मृति में जीवित रखते हैं। हमारे बीच ऐसे कितने लोग हैं, जो सारी उमर किसी साध को समर्पित कर देते हैं ! 
अंततः विजय रंजन भारत को खोजने के प्रयास में समूचे विश्व में उपलब्ध ग्रंथों का पारायण करते हैं। मत्स्य, विष्णु और वायु पुराण के ठोस सन्दर्भों को प्रस्तुत करते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि ‘ज्ञान को खोजने और उसे उभारने के काम में सतत संलग्न रहने वाला राष्ट्र ही भारत है।’ अब बताइए- इस देश की ऐसी कोई परिभाषा आपने आज तक पढ़ी है ? इस एक पंक्ति में वे सबकुछ कह जाते हैं। 
इसी तरह माँ भारती की जितनी सुन्दर व्याख्या इस पुस्तक में प्रकट हुई है, वैसी मैंने आज तक नहीं पढ़ी !
श्री विजय रंजन ने इस पुस्तक में एक अत्यन्त शोधपरक और दिलचस्प अध्याय भी लिखा है। इस अध्याय में भारत के अनेक नामों का विवरण है। अधिकतर भारतवासियों ने इस राष्ट्र के इतने नाम कभी नहीं सुने होंगे। 
भारत का एक नाम तो आर्यभूमि है। इसके अलावा अन्य कुछ नामों का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ। ये हैं- 
अजनाभ वर्ष, हिमवर्ष, ब्रह्मर्षि देश, देविका प्रदेश, ब्रह्मावर्त, देवश्रवा भारत, देवरात भारत, सप्तसैंधव, जम्बूद्वीप, नावलंतीवू , कुमारी अंतरीप, कुमारी द्वीप, हिन्दुस्थान, हिन्दुग, इण्डस, इण्डोई, हफ्तहिन्दुकन, थि-एन्-चु (देवों का देश), शिनाऊ और शिन्तु। इनके जैसे अनेक नए-नए नामों से आप परिचित होते हैं आप इस अध्याय में। श्री विजय रंजन प्रत्येक नाम का स्रोत और उसकी व्याख्या भी करते हैं। 
इसके अलावा यह पुस्तक भारत में आर्य-सभ्यता के बारे में अनेक नए तथ्यों को उद्घाटित करती है। इस राष्ट्र और आर्यों के सम्बन्ध को लेकर संसार के अनेक विद्वानों ने अपनी-अपनी अवधारणाएँ प्रतिपादित की हैं। इस पुस्तक में इन सभी माननीयों की राय का समावेश करते हुए पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी से अपना पक्ष प्रस्तुत किया गया है। लेखक परदेसी प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर यह प्रतिपादित करते हैं कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, यूरोप और एशिया के अनेक राष्ट्र यदि वर्तमान स्वरूप में हैं, तो उन सबके मूल में भारतवर्ष और यहाँ से गए लोगों का बड़ा योगदान है। 
भारत की प्राचीनता वाले अध्याय में वे कहते हैं कि भूमि के किसी टुकड़े के देश और फिर राष्ट्र में परिवर्तन की प्रक्रिया सहज नहीं होती और उससे भी जटिल राष्ट्रीयता की कसौटियों का अवधारण होता है। यदि किसी भू भाग को एक झटके से एक अलग राष्ट्र बना दिया जाए, तो वह अंतर्विरोधों से ग्रस्त रहता है और अंततः विखण्डित हो जाता है। यह एक स्थापित सत्य है। पाकिस्तान नामक देश अभी भी एक राष्ट्र के रूप में नहीं बन पाया है। कब यह नकली मुल्क़ अपने ही कारणों से विखण्डित हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता। 
असल में राष्ट्रीयता का भाव ही प्रधान है। यह भाव आसानी से नहीं पनपता। श्री विजय रंजन इस पर विश्व के अनेक विद्वानों के कथनों का उल्लेख करते हैं। अथर्ववेद के हवाले से वे कहते हैं कि राष्ट्रधर्म ही वास्तविक धर्म है। इसका अर्थ है- ‘अपने देश पर मर मिट जाना।’ इस वेद में लिखा है- “वयं तुभ्यम बलिहतः स्याम” अर्थात् “हम तुम पर सबकुछ बलिदान करते हैं।” हिन्दुस्तान की आजादी के लिए क़ुर्बानी देनेवालों का मूल मन्त्र यही तो था। इसी की बदौलत हम आज स्वतंत्रता प्राप्त कर सके हैं। सिर पर कफन बाँधे वे भी अथर्ववेद की इन पंक्तियों का रूपांतरण कुछ इस तरह करते थे- 
 इश्क़ का नग़मा जुनूं के साज़ पे गाते हैं हम
अपने ग़म की आग को पत्थर से पिघलाते हैं हम  
जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं
 वक्त आ जाए तो अंगारों पे सो जाते हैं हम। 
बस, भारत के अस्तित्व और उसके इसी चरित्र को समझाने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।
हमारे इतिहास के राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक और आध्यात्मिक ढाँचे में समय-समय पर विभिन्न परिवर्तन होते रहे हैं। इन परिवर्तनों ने हिन्दुस्तान को एक ऐसे प्राचीन वृक्ष में बदल दिया है, जिसकी जड़ें हमेशा से गुड़ी-मुड़ी और उलझे हुए वनस्पति रेशों का गुच्छा हैं। इन जड़ों को यह परेशानी कभी नहीं होती कि भूमि से ऊपर उस पेड़ को कितने बार काटा गया है, कितने बार जलाया गया है, कितने बार उसकी कलमें काटकर एक नए पेड़ में बदल दी गई हैं और कितनी बार उस वृक्ष की शक्ल ही कुछ और हो गई है। जड़ें पेड़ का इतिहास लिखने में शायद ही सहायता करती हों, अलबत्ता वनस्पति विज्ञानी भूमि के ऊपर उगे वृक्ष का जीवनवृत अपने-अपने दृष्टिकोण से लिखने के लिए हरदम स्वतंत्र होते हैं। भारत के साथ भी कुछ कुछ ऐसा ही हुआ है।
श्री विजय रंजन का यह प्रयास वास्तव में एक विशद विषय की भूमिका मात्र है। राष्ट्र के विश्वविद्यालयों को असल में इस पर व्यापक शोध के लिए नई पीढ़ियों को प्रेरित करना चाहिए। वैसे हम भारतीय अपने इतिहास के बारे में कुछ-कुछ अलसाए और ऊँघते से रहते हैं। 
परन्तु मेरे नज़रिए से इस पुस्तक को आधार बनाकर कम से कम एक दर्ज़न शोधग्रन्थ रचे जा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो मुझे प्रसन्नता होगी। श्री विजय रंजन को एक अनूठे अंदाज़ में इस शोध पुस्तक के लिए साधुवाद।
-ए 12 एमराल्ड पार्क सिटी, सेवनिया, भोपाल  दूरभाष: 09910068399
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 भारत ज्ञान-कोश का आभास देता ग्रन्थ  
   क्या है भारत क्या है भारतीयता   

                   - डॉ॰ प्रणव शास्त्री                 
भारत, भारतीय और भारतीयता देखने में भले ही अलग-अलग शब्द लगते हों, पर हैं एक-दूसरे से गुँथे हुए। भारत की चर्चा आते ही मन-पटल पर जो चित्र उभरता है, वह बड़ा ही मोहक और विराट होता है; भारत अर्थात् विश्व-कल्याण की कामना करता एक देश, भारत अर्थात् पूरे ब्रह्माण्ड को एक कुटुम्ब मानने वाला देश। 
भारतीय शब्द संज्ञान में आते ही आते ही मानवता, ममता, करुणा, प्रेम, बन्धुत्व से परिप्लुत एक मानवी छवि स्वतः ही मन-मस्तिष्क पर उभर आती है। यह छवि क्षण-प्रतिक्षण और गहरी तब होती जाती है जब विश्व-पटल पर कोई भारतीय अपने कीर्तिमन्न हस्ताक्षरों से भारतीय गौरव का सृजन करता है। कभी वह आई॰टी॰ सेक्टर में विश्व-नेतृत्व करता दिखाई देता है तो कभी कोरोना जैसी महामारी के विरुद्ध अपनी संकल्प-शक्ति के बल पर विश्व को दिशा देता प्रतीत होता है। भारतीयता का जिक्र आते ही हृदय आत्मगौरव से छलछला उठता है। इस भारतीयता ने ही विश्व-भ्रमण पर निकले कई विदेशियों को अपने प्रेम-पाश में बाँध लिया, फिर वे सभी यहीं के होकर रह गए। 
सुधी विचारक विजय रंजन जी का ग्रंथ ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ मुझे तो भारत का ज्ञानकोश ही प्रतीत हुआ। ‘भारत’ के नामकरण, क्षेत्र-विस्तार, राष्ट्रीय चरित्र, वास्तविक स्वरूप को यदि प्रामाणिक रूप में किसी को समझना हो, तो यह ग्रन्थ एक संदर्भ ग्रन्थ का काम करेगा। रंजन जी ने वेद, पुराण, उपपुराण, भागवत, गीता, रामायण, महाभारत प्रभृति ग्रंथों का मंथन कर इस ग्रन्थ के रूप में जो ‘नवनीत’ प्रस्तुत किया है वह मनमोहक तो है ही, अपने आराध्य को भोग लगाने हेतु उत्तम सर्जन भी है। भारत के रस-देश तथा रस-वेश के दर्शन के लिए यह ग्रन्थ अपरिहार्य सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।             
    - वसुन्धरा कालोनी, पीलीभीत, (उ॰प्र॰),  दूरभाष: 9837960530
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     ताजा हवा के झोंके की तरह पुस्तक  
      ‘
क्या है भारत क्या है भारतीयता’ 

                                - छाया सिंह
‘इण्डिया दैट इज भारत’ से हमारे संविधान की शुरुआत होती है। अंग्रेजों से हमारे देश के आजाद होने के बाद भी हम अंग्रेजी की मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हो पाए। ‘इण्डिया’ नाम आगे बढ़ता गया और हमारे देश का ‘भारत’ नाम कहीं न कहीं पीछे छूटने लगा। आज लोग खुद को भारतीय के बजाय इण्डियन कहलाने में अधिक गर्व महसूस करते हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब भारत के अन्दर कई भारत बनाने के प्रयास हो रहे हैं। नैतिकता, संस्कृति एवं संस्कारों का ह्रास हो रहा है। भारत की अस्मिता दाँव पर लगी है। ऐसे दमघोंटू समय में विद्वान् लेखक, विजय रंजन जी की पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ एक ताजा हवा के झोंके की तरह आई है। 
किशोरावस्था में लेखक के मन में प्रश्न उपजे- ‘क्या है भारत ? कौन हैं भारतमाता ? इनका सम्यक् उत्तर जिज्ञासु लेखक को न शिक्षकों से प्राप्त हुए और न ही पाठ्यक्रम में शामिल जानकारी से। समय-समय पर ये प्रश्न लेखक के अन्तर्मन को मथते रहे अंततः जीवन की सांध्यबेला में इस महत्त्वपूर्ण विषय पर वर्षों के अध्ययन, शोध एवं अनुशीलन के बाद यह कृति लेकर लेखक पाठकों के सम्मुख आए हैं। 
आज भी कुछ विदेशी लोग भारत को सपेरों, साधुओं एवं कृषकों का देश मानते हैं। परन्तु क्या वास्तव में भारत की यही छवि है ? भारत मात्र एक विशाल भूखण्ड नहीं है। विश्व को 0.....9 तक के अंक, दशमलव जिनके बिना गणना संभव ही नहीं, देवभाषा संस्कृत जो कि विश्व की सभी भाषाओं का मूल है, आदि-आदि देने वाला भारत है। ज्योतिष विज्ञान, आयुष विज्ञान, वास्तुशास्त्र, ललित कलाएँ, संस्कृति, योग, अध्यात्म, धर्म, दर्शन, साहित्य, शान्ति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला भारत प्राचीनकाल में विश्वगुरु के रूप में सम्मानित रहा है। विदेशी आक्रमणकारियों के हमले, लूट-पाट, भाररतीय संस्कृति और सभ्यता पर तमाम घात-आघातों को सहते हुए भी भारतवर्ष अपनी सात्त्विक एवं तितिक्षाशील प्रवृत्ति के कारण विदेशी सभ्यता, संस्कृति को अपने में समाहित करते हुए आज विज्ञान, परमाणु ऊर्जा, अनुसंधान, शिक्षा, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रों में तेजी से विकास करता हुआ विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र एवं विश्व की पाँचवीं अर्थव्यवस्था के साथ सम्मानित है।
कृति में भारत नाम की उत्पत्ति को लेकर ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर सभी प्राचीन भारतीय ग्रंथ जैसे पुराण, उपनिषद्, संहिताओं, रामायण, महाभारत  आदि का विस्तृत अध्ययन, चिन्तन एवं मनन किया गया है। लेखक यह सिद्ध करते हैं कि आदित्य (सूर्य) के प्रकाश का नाम देवी भारती तथा देवी भारती के नाम पर देश का भारत नाम सर्वमान्य है। देवीभागवत, दुर्गासप्तशती, दुर्गासहस्त्रनाम् आदि में देवी भारती को ही देवी सरस्वती कहा गया है। वेद, पुराणों के अनुसार देवी भारती (सरस्वती) के गुणों से युक्त उनकी सन्तानें भारतवासी हैं- ‘भारती तत्र सन्तति।’ 
कृति में सविस्तार विवेचित है कि प्राचीन ग्रन्थों में भारतवर्ष का उल्लेख आर्यभूमि नाम से है, आर्यभूमि अर्थात् आर्य (श्रेष्ठ गुण, कर्म एवं स्वभाव) मनुष्यों की भूमि। देशी-विदेशी ग्रन्थों में भी यह नाम है।
निर्विवाद रूप से भारतवर्ष प्राचीनतम एवं विशाल राष्ट्र है। इसके प्रमाण सभी प्राचीन ग्रन्थों में तथा मध्यकालीन एवं आधुनिक लेखकों की कृतियों में सहज द्रष्टव्य हैं। प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित राष्ट्र के आवश्यक तत्त्वों से लेकर विश्व के अन्य देशों में राष्ट्र होने के लिए स्थापित एवं स्वीकार्य मान्यताओं पर पूर्णतया खरा उतरने के कारण भारत की एक समग्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार्यता है। 
हर राष्ट्र का एक चरित्र होता है जो कि वस्तुतः राष्ट्रीय संचेतना, संवेदना, संस्कार, आचार-विचार तथा संवेगों द्वारा निर्मित होता है। यहाँ लेखक स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण एक लम्बी प्रक्रिया है। प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की मूल भावना तथा सत्त्वशीलता, तितिक्षा एवं चिन्मयता भारत का राष्ट्रीय चरित्र है। ईश्वर-अवतारस्थली भारत आदिकाल से विश्व का पथ-प्रदर्शक रहा है जो अधर्म पर धर्म की जय तथा संस्कृति संस्कारों की रक्षा की पक्षधर है। 
आधुनिक भारत की विभिन्न धर्म-संस्कृतियों में कुछ टकराव एवं मत-मतान्तरों के बावजूद सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की भावना सर्वोपरि है। वास्तव में नैतिकता, सहनशीलता, मर्यादा, सात्त्विकता जैसे गुण तथा भारतत्व और भारतीत्व से भलीभाँति पुष्ट भारत एक समग्र राष्ट्र है। प्राचीनकाल से लेकर वर्तमानकाल तक भारत का भूगोल भले ही समय-समय पर बदलता रहा परन्तु भारतत्व एवं भारतीत्व की शाश्वत चिन्मयता परिवर्तनीय नहीं रही। 
भारत के नामकरण एवं भारतीयता के तत्त्वों पर सभी प्राचीन ग्रंथों, वेदों, पुराणों तथा देशी-विदेशी विद्वानों के मतों का समग्र अध्ययन, चिन्तन, मनन एवं अनुशीलन के उपरान्त विद्वान् लेखक ने यह कृति प्रस्तुत की है। 
किशोरावस्था में मन में उपजे प्रश्नों के उन्होंने बड़े वैज्ञानिक एवं तर्कसम्मत उत्तर दिए हैं जो उनके जैसे विज्ञान एवं विधि के छात्र होने के नाते सहज स्वाभाविक है। 
जैसा कि पुस्तक के आरम्भ में ही उन्होंने रामचरितमानस के बालकाण्ड की एक चौपाई कुछ परिवर्तित रूप में उद्धृत की है- ‘ऐतनेहु पर करिहहिं जे संका। मोहि ते अधिक ते जड़मति रंका।।’ तो मुझे तो इस पुस्तक के गहन अध्ययन के उपरान्त ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता विषय में अब कोई शंका नहीं है। इतने विस्तार एवं तर्कसम्मत रूप से इस विषय में हमारी शंकाओं का समाधान करने के लिए विद्वान् लेखक को हृदय से साधुवाद।
  - सिविल लाइन्स बाँदा (उ॰प्र॰)-210001,   दूरभाष:  9415123008
           (‘अवध-अर्चना’ अंक 101 में प्रकाशित, फेसबुक पर उपलब्ध )
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  भारत सम्बन्धी जिज्ञासा का सुन्दर समाधान 

    ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’

                     - त्रिभुवन नारायण श्रीवास्तव
किसी भी भाषा के गद्य-साहित्य में, सामान्य रूप में नाटक, कहानी, उपन्यास, आलोचना और निबन्ध की विधाएँ ही मुख्य मानी जाती हैं। नाटक की विधा में प्राचीन महानाटक से लेकर आधुनिक एकांकी नाटक, कहानी में लघुकथा, लम्बी कहानी, उपन्यास में लघु उपन्यास और शृंखलाबद्ध वृहद् उपन्यास, आलोचना में समालोचना, समीक्षा, सम्मति इत्यादि के विविध रूप और निबन्ध में सुगठित भाषा के माध्यम से सीमित आकार के वैचारिक संवाद का सम्प्रेषण साहित्यकार और सहृदय के मध्य संभव होता है। इन सभी        विधाओं में भाव और शैली तथा आकार-प्रकार में सम्यक् विभिन्नता होती है। किन्तु वस्तु अर्थात् कथावस्तु या सब्जेक्ट एक प्रकार से कथात्मक, कथापरक अथवा कथ्य-विशेष का आधार लिए होता है। आलोचना को अपवादस्वरूप माना जा सकता है। वर्तमान काल में कुछ और विधाएँ भी विकसित हुई हैं। 
प्रयोग और प्रगति के इस युग में अवतरित हुई नूतन विधाओं में रिपोर्ताज, डायरी, इन्टरव्यू, यात्रा-वृत्तान्त, चलचित्र की पटकथाएँ, अनेक प्रकार के प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आलेख आदि की नई विधाएँ भी प्रचलन में आ गई हैं। इन नवसाहित्यिक विधाओं के मूल तत्त्वों में कथावस्तु का तत्त्व नहीं के बराबर माना जा सकता है। कथा से इतर इन विधाओं को जो साहित्य की मुख्य धारा से थोड़ा हट के प्रवहमान हैं, कथेतर साहित्य के नाम से जाना जाने लगा है। ऐसे ही कथेतर साहित्य की रत्नमंजूषा में सद्यःप्रकाशित एक और रचना-रत्न ने अपना स्थान बनाया लगता है जिसका नाम है- ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’।
आजकल रामनगरी के नाम से विशेष प्रसिद्धि प्राप्त कर रही अयोध्या नगरी से सन् 2019 में प्रकाशित लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों के कलेवर में अपनी मातृभूमि के नामकरण, आधार, विस्तार, संस्कार और राष्ट्र विषयक ठोस सामग्री का जो नवनीत प्रस्तुत किया गया है, वह जिज्ञासु पाठक की जिज्ञासा का शमन करते हुए उसे (पाठक को) आह्लादित करेगा, ऐसा मैं समझता हूँ। लेखक श्री विजय प्रताप सिंह उर्फ विजय रंजन अपनी इस सुकृति के लिए सहृदय पाठकों द्वारा प्रशंसा के पात्र हैं, प्रतिष्ठा के पात्र हैं और धन्यवाद के पात्र तो हैं ही। 
आवश्यक शोध-सामग्री का संकलन, अध्ययन, मनन, चिन्तन-मन्थन करके भगीरथ प्रयास और श्रम द्वारा ज्ञान-गंगा का अवतरण कराना विजय रंजन जैसे सिद्धहस्त लेखक, तर्कसिद्ध वक्ता (अधिवक्ता) और प्रखर पत्रकार का ही विजय-अभियान था जिसने भारत, भारतीयता और उसकी गौरवमयी राष्ट्रीय अस्मिता से जन-मन को परिचित कराया है। अस्तु।
भारत और भारतीयता एक ऐसा व्यापक विषय है कि जिसके बहुरंगी पटल पर अनेकानेक विद्वानों, साहित्यकारों, अनुसंधानकर्त्ताओं, शोधार्थियों एवं इतिहासकारों आदि ने प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक अपने-अपने तर्क-वितर्क, खण्डन-मण्डन और सहमति-विरोध के रंग बिखेरे हैं। पुस्तक के रचयिता विजय रंजन जी ने स्वयं उन देशी-विदेशी प्रबुद्ध जनों का सविस्तार उल्लेख किया है और उनकी मान्यताओं को पुष्ट किया है या तर्कसंगत रूप से उनका खण्डन किया है। विजय रंजन का विजय-रथ अपनी मौलिक उद्भावना की तर्क-पताका फहराते हुए आदि-मनवन्तर के स्वायम्भुव मनु की पाँचवीं पीढी के प्रपौत्र वीर राजा भरत तक पहुँचता है और भरत के मस्तक पर भारत-नामकरण का मंगल-मुकुट सुशोभित करता है जिससे नामकरण की अनेक संभावनाओं का पटाक्षेप हो जाता है।
भारत की चतुर्दिक सीमाओं के विषय में भी इस रचना के कृतिकार ने उदाहरणों और उद्धहरणों के साथ विस्तार से चर्चा की है। रामायण-महाभारत काल, बौद्ध-जैन काल, मौर्य गुप्त साम्राज्य-काल तथा परवर्ती कालखण्डों में ऐतिहासिक और साहित्यिक ग्रंथों, शिलालेखों, शासकों आदि के माध्यम से भारत-भूमि की बढ़ती-घटती सीमाओं का सोदाहरणरूप वर्णन करते हुए वृहत्तर भारत की सीमाओं का भी विवरण दिया गया है। सीमांकन के इस विवरण को संस्कृत उद्धहरणों आदि के संदर्भों से इतना रोचक बना दिया है कि पाठक मानों समय-प्रवाह की उत्ताल तरंगों के मध्य गर्व के साथ संतरण कर रहा हो। प्रासंगिक संदर्भ-ग्रंथों तक पहुँचना और बौद्धिक सूचनाएँ एकत्रित करना कोई सरल कार्य नहीं था। 
वर्तमान समय का भारत जिसमें हम, भारत के लोग, संप्रभुतासम्पन्न जनतांत्रिक देश के, नाना मौलिक अधिकार सम्पन्न, स्वतंत्र नागरिक के रूप में निवास करते हैं, उसकी सीमाएँ कुछ कट-छँट भले गई हों, लेकिन जो भी हैं, वह एकसूत्र (संघ) और एक शासन-प्रणाली के अंतर्गत सर्वतंत्र स्वतंत्र हैं। वैदिक काल में सीमाओं की चर्चा कदाचित इस कारण से नहीं आती कि उस काल में आर्यों का प्रसार उनकी आदि-भूमि सप्तसैंधव प्रदेश से प्राची की ओर बढ़ रहा था और निरन्तर प्रगति हो रही थी। यद्यपि आर्यों का मूल स्थान भारत ही होने की कुछ भारतीय विद्वानों की मान्यता है किन्तु अधिकांश विदेशी विद्वानों और भारतीय विद्वानों की धारणा आर्यों के भारत से बाहर आने की है। कृति के लेखक विजय रंजन ने नवीनतम शोधों को प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत करते हुए आर्यों के बाहर से भारत में आने की अवधारणा का अति प्रभावी ढंग से खण्डन किया है। भारत और भारतीयता पर विस्तार से विमर्श करने के पश्चात् लेखक ने राष्ट्र और राष्ट्रीयता पर बड़ी विद्वत्ता के साथ अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। देश और राष्ट्र का अन्तर, अन्य भाषाओं में राष्ट्र शब्द के पर्यायवाची शब्दों के तुलनात्मक अर्थबोध की व्याख्या और भारत की राष्ट्रीयता तथा राष्ट्रीय संस्कार पर बड़े प्रभावशाली रूप में प्रकाश डाला गया है। 
किसी शब्द के अर्थ और भाव को समझने के लिए केवल शब्दकोश का आश्रय ही पर्याप्त नहीं होगा। शब्द के प्रयोग और प्रभाव को भी समझना आवश्यक होता है। लेखक ने अमरकोश के अनुसार देश, विषय, जनपद --- इन सभी शब्दों को राष्ट्र का पर्यायवाची बतलाया है। साथ ही अन्य अनेक ग्रंथों में राष्ट्र शब्द के प्रयोग की विशिष्टता बताते हुए यह स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रसंगों के अनुसार राष्ट्र शब्द की अवधारणा कितनी व्यापक है। राष्ट्र, राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय, राष्ट्र-भक्ति जैसे विषयों पर प्रायः पचास पृष्ठों का विशद विवरण बड़ा ही रोचक, ज्ञानवर्द्धक और प्रेरणादायक बन पड़ा है। लेखक निश्चित रूप से साधुवाद का अधिकारी है।
प्रत्येक भाषा की अपनी प्रवृत्ति, अपना संस्कार, अपना व्याकरण, अपना मिजाज और अपना लहजा होता है। अतः पर्यायवाची अथवा समानार्थी शब्दों में प्रायः गणितीय समतुल्यता अर्थात् राष्ट्र = नेशन = कौम नहीं होती। विद्वान् लेखक ने हिन्दी के राष्ट्र और अंग्रेजी के पर्याय नेशन का अर्थ-भेद भलीभाँति समझाया है। 
लगे हाथों पाठक-बन्धुओं को यह भी बताते चलें कि हिन्दी/संस्कृत के राष्ट्र शब्द के कथित पर्यायवाची उर्दू/फारसी शब्द ‘कौम’ का अर्थ है गति (ज़ात) के रूप में भी प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए अदालती शब्दावली में परवर्ती मुगल शासक और ब्रिटिश शासन-काल में भी अदालतों और कचहरियों में उर्दू का प्रचलन था और उर्दू शब्दावली आज स्वतंत्रता के बाद भी व्यवहार में प्रचलित है जिसके अनुसार, वादी, प्रतिवादी या गवाह का परिचय फलाँ कौम बरहमन (या कौम ठाकुर या अन्य किसी जाति का नाम) के रूप में भी व्यवहार में आता है; अर्थात् शब्द ‘कौम’ का अर्थ ‘जाति’ से भी लिया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि संस्कृत/हिन्दी के शब्द ‘राष्ट्र’ की ध्वनि/गरिमा अन्य भाषाओं के शब्दों में नहीं पाई गई। लेखक विजय रंजन की प्रस्तुत कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ का वृहद् आलेख अथवा मौलिक ग्रंथ, भारत, भारतीय, भारतीयता, राष्ट्रीयता और राष्ट्र-भक्ति आदि-इत्यादि पर अभिकारिक रूप से प्रखर प्रकाश डाल कर रचना की महिमा बढ़ाते हुए उसे (रचना को) ध्यानपूर्वक पठनीय, मननीय एवं संग्रहणीय बनाता है। लेखक प्रखर अधिवक्ता भी रहे हैं या हैं और संपादक तथा साहित्यकार भी हैं जिसकी पूरी छाप अर्थात् विद्वत्तापूर्ण अकाट्य तर्क, प्रासंगिक उदाहरणों की प्रचुरता तथा नजीरें पेश करने की क्षमता आदि गुणों ने लेखक की वैचारिक संप्रेषणीयता के गुण को द्विगुणित कर दिया है।
इन पंक्तियों का लेखक कोई आलोचक अथवा साहित्यकार कुछ भी नहीं है। मात्र सामान्य साहित्यसेवी पाठक के रूप में विद्वान् रचनाकार का ध्यान कतिपय बिन्दुओं की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ, जो संदर्भगत कृति की  भाषा और शैली से सम्बन्ध रखती है। संस्कृतनिष्ठ अथवा संस्कृतगर्भित शब्दावलि का घटाटोप लेखक की उदात्त भावनाओं और वैचारिक गहनता की सम्प्रेषणीयता में अवरोध उत्पन्न करता है। सुदीर्घ वाक्य-विन्यास जिसमें गढ़े हुए शब्दों  (ब्वपदममक ूवतके) की छटा छाई हो, तत्सम शब्दों की राजहंस-पंक्ति में हठात् किसी विजातीय शब्दरूपी काक की घुसपैठ और जोशीले भाषण जैसी आक्रामक शैली कहीं-कहीं अभिव्यक्ति में आघात पहुँचाने का काम करती हैं। 
सुझाव नहीं, विनम्र अनुरोध है कि विद्वान् लेखक उपर्युक्त बिन्दुओं पर विचार करें जिससे ऐसी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ रीडर्स फ्रेन्डली होकर जन-जन में प्रचलित और प्रसारित हो सकें और मेरे जैसे अल्पज्ञ पाठक भी लाभान्वित हो सकें। ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ की जिज्ञासा का ऐसा सुन्दर सरल समाधान भारतमाता के चरण-कमल की दैवी सुगन्ध के समान भारतीय जनमानस को आह्लादित, उत्साहित और गौरवान्वित करता रहे, ऐसी ही माँ भारती से प्रार्थना है।        
- OC 15/903 इन्दिरापुरम् (अहिंसा खण्ड-2),   गाजियाबाद-201014,              दूरभाष: 9599722085 

 गम्भीर और विचारोत्तेजक कृति  

  ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’

                        - डॉ॰ वेदप्रकाश अमिताभ
विजय रंजन दोनों प्रकार की प्रतिभाओं-- भावयित्री और कारयित्री-- के धनी हैं। ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ उनकी चर्चित कृति है।  वे एक प्रबुद्ध विचारक भी हैं। इसका पता उनकी नई कृति ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ से चलता है। इसमें उन्होंने बहुत शोध करके भारत के नामकरण आदि पर विचार किया है और बलपूर्वक स्थापित किया है कि हमारे देश का ‘भारत’ नाम स्वायम्भुव मनु की पाँचवीं पीढ़ी के प्रपौत्र भरत के नाम पर ऋक् युग से पहले ही प्रचलित हो चुका था। वे निर्भान्त हैं कि “ऋक् में जो भारत (देवरात् भारत आदि) उल्लिखित है, वह भारत आदि-तीर्थंकर ऋषभदेव या कि उनके पुत्र भरत के नाम पर नामकृत बताया जाना असंगत ही प्रतीत होता है।”
विजय रंजन की दूसरी महत्त्वपूर्ण स्थापना भारत को ‘राष्ट्र’ मानने के संदर्भ में हैं। वे उन लोगों का विरोध करते हैं जो राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म सन् ’47 से मानते हैं। उनके अनुसार- “निःसन्देह मात्र भूखण्ड, जन, प्राकृतिक सम्पदा, राजकोष, सेना, स्वयंसंप्रभु सत्ता वाला राष्ट्र ही नहीं, वरन्  प्रागैतिहासिक काल से ही एक विशिष्ट मनस्विता और विशिष्ट संस्कृति का विशिष्ट भू-सांस्कृतिक मृण्मय सह चिन्मय संचेतना वाला राष्ट्र रहा है भारत।”   
आर्यों के मूलस्थान के प्रश्न पर भी विजय रंजन जी ने विस्तार से विचार किया है और पाया है कि बालगंगाधर तिलक, मैक्समूलर, नेहरू, कोशाम्बी आदि के विद्वानों के अभिमत गलत हैं। भारत ही आर्यों की मूल भूमि है। इस अभिमत को रामविलास शर्मा के भाषा-वैज्ञानिक साक्ष्य से भी पुष्टि मिलती है। लेखक की एक विचारोत्तेजक स्थापना बहस की प्रस्तावना हो सकती है कि यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अमेरिका महाद्वीप के अधिकांश देश भारतीयों द्वारा ही बसाए गए हैं। ऐसे कुछ देशों में आर्य सभ्यता-संस्कृति का प्रसार तो संभव है, उनका भारतीयों द्वारा बसाया जाना संदिग्ध माना जा सकता है।    
इस कृति का महत्त्वपूर्ण मंतव्य ‘भारतीयता’ को भारती या सरस्वती से जोड़ना है। विभिन्न साक्ष्यों की परीक्षा करते हुए कहा गया है कि देवी भारती के सत्त्व, ऋत, दकारत्व, चिन्मयता आदि गुणों का संवर्द्धन करने वाला मनुष्य ही भारतीय है। ऐसे भारतीयों के निवासीय भू-भाग को ‘भारत’ नाम देना तर्कसंगत ठहराया गया है। लेखक ने दो टूक लिखा है- “देवी भारती के भारतीत्व से जुड़ाव (देवी भारती के उपरि-अंकित गुणों से जुड़ाव या कि मूल सहयुजन) से विच्छिन्न या वियोजित होने पर भारतीय नहीं रहेंगे आप !” ‘भारतीयता’ की अवधारणा में विजय रंजन ने रामत्व, शिवत्व, कृष्णत्व के साथ जिनत्व और बुद्धत्व को सम्मिलित किया है। सिख गुरुओं का अलग से निर्देशन नहीं है, शायद इसलिए कि वे हिन्दू धर्म में समाहित माने गए हैं। समग्र कृति गम्भीर और भौतिक विचार-विवेचन से समृद्ध है।  यह कृति सभी राष्ट्रवादी पाठकों के लिए आश्वस्तिकारी है। ‘ऋतम्भरिकता, सात्त्विकता’, चिन्मयता, तितिक्षाशीलता, धर्मालु रचनाधर्मिता जैसे अपेक्षाकृत गरिष्ठ शब्द स्थान-स्थान पर हैं किन्तु संस्कृतनिष्ठता के प्रेमी पाठकों का साधुवाद भी इसे प्राप्त होगा।
  -डी-131, रमेश विहार, अलीगढ़-202001, दूरभाष: 0983700411
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गौरवमयी राष्ट्रीय अस्मिता का परिचय देती कृति  
    ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’         

                            - जगदीश श्रीवास्तव                                 
समीक्ष्य कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ भारत और भारतीयता का प्रामाणिक परिचय देती हुई विजय रंजन की एक अलग विषय पर अलग ढंग की पुस्तक है। इसका लेखन बहुत आसान नहीं था। लगभग 200 आधार ग्रंथों यथा धार्मिक, आध्यात्मिक, वैदिक, साहित्यिक आदि का अध्ययन, चिन्तन, मनन के पश्चात् उसका वर्तमान स्वरूप बन पाया है।    
प्राचीन ग्रंथों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत साहित्यिक विद्वानों के साहित्य में जहाँ कहीं भारत सम्बन्धी उल्लेख प्राप्त हुए हैं उनके अध्ययन के पश्चात् ही भारत नाम की स्थापना को प्रमाणित किया गया है।
प्राचीनकाल में इसे जिन नामों से ग्रंथों में अभिहित किया गया है। उसका भी उल्लेख पुस्तक में किया गया है। भारत-भूमि पर ही महापुरुषों, देवी-देवताओं का अवतरण उसकी ऐतिहासिकता एवं भौगोलिक सीमा पर सप्रमाण प्रकाश डाला गया है। भारत के मूल आविर्भाव, उसका राष्ट्रीय चरित्र, नामकरण की तर्कसंगत तलाश का भरपूर प्रयास किया गया है। 
पुस्तक में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि भारत के ऋषियों, मुनियों, महर्षियों के स्थापित ज्ञान, विभिन्न धर्मों की एकरूपता, उदारता इत्यादि की विशिष्टता का समन्वय ही भारत और भारतीयता है। ये विशिष्टताएँ अकारण और अनायास नहीं हैं वरन् विभिन्न ग्रंथों में उल्लिखित व स्थापित हैं। कृति में ‘भारत’ नाम का वैयाकरण के स्तर पर भी परिभाषित करने का प्रयास किया गया है। लेखक ने भारत-नामकरण के उद्भव-काल के इतिहास को खंगालने की भरपूर कोशिश की है। इसी क्रम में पहले भारत के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद से भारत-नामकरण का आधार अग्नि से सहयुजित होना बताया गया है। इस काल में प्रकाश के दो ही माध्यम अग्नि व सूर्य थे- “तस्मा अग्निर्भारतः।” ‘भा’ का एक अर्थ ज्ञान होता है ‘भा$रत’ जो ज्ञान में रत है वह भारत है। ज्ञान (विद्या) की देवी सरस्वती हैं जिन्हें देवी भारती भी कहा जाता है। ‘भारती’ भी भारत से उद्भूत है। भारत-नामकरण को देवी भारती/देवी सरस्वती से प्रत्यक्षतः स्थान इसीलिए दिया गया कि देवी भारती के गुणधर्म प्रकृति आदि से अनूभूत थे। विभिन्न ग्रन्थों यथा महाभारत, विष्णु पुराण, वायुपुराण आदि में भारत की संतति को ‘भारती की संतति’ बताया गया है। देवी भारती के सारस्वत गुणों का संवर्धन करने वाला ही, भारतीय है। 
स्वायम्भुव मनु वाले भरत को भारत के नामकरण का उपयुक्त आधार बताया गया है। विभिन्न पौराणिक ऐतिहासिक ग्रन्थों का हवाला देते हुए भारतवर्ष को लेखक ने आर्यभूमि माना है। आर्य शब्द श्रेष्ठ सात्त्विक रचनाधर्मी गुणों से सम्पन्न मानव के लिए प्रयुक्त होता था। आर्यों द्वारा आवासित भूमि को ही आर्य भूमि (भारतभूमि) कहा गया है। आर्यों के प्रथम निवास की भूमि सिन्धु सरस्वती क्षेत्र ‘अजनाभ वर्ष’, कालान्तर में हिमवर्ष, भरतखण्ड तथा अंततः भारतवर्ष कहलाई। पुस्तक में उल्लिखित विभिन्न ग्रंथों, विद्वानों के अनुसार आर्य अपनी निवास-भूमि/राज्य-सीमा का विस्तार करते समय इस बात का ध्यान रखते थे कि नए राज्य की स्थापना या क्षेत्रविस्तार से अकारण किसी को कष्ट न हो। पुस्तक में भारत के प्राचीन विस्तार का भी विशद विवेचन किया गया है। प्लेटो के अनुसार पाश्चात्य राष्ट्र/राज्य के आविर्भाव से पूर्व भारत विशिष्ट राष्ट्र के रूप में अस्तित्ववान् था। भारतीय नरेश पृथु के इतिहास, रामायण, वायुपुराण, कल्हण की ‘राजतरंगिनी’, धर्मशास्त्र का इतिहास आदि ग्रन्थों के अनुसार सम्पूर्ण पृथ्वी पर भारत राष्ट्र की व्याप्ति हिमालय के दक्षिण कैकेय, गान्धार सहित ब्रह्मपुत्र की घाटी का विस्तार लिए सात पर्वतों एवं 160 नदियों से आच्छादित क्षेत्र की भूमि रहा है। 
भारत की प्राचीनता के सम्बन्ध में लेखक द्वारा कोई भी भूखण्ड कैसे देश, देश से राष्ट्र बनता है इसकी प्रक्रिया का समुचित उल्लेख पुस्तक में किया गया है। इसके तत्त्वों का उल्लेख यजुर्वेद, अथर्ववेद, वाल्मीकि रामायण, शुक्रनीति, अमरकोश, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मनुस्मृति, गौतमसूत्र आदि विभिन्न ग्रन्थों में विभिन्न स्वरूपों में मिलता है। एक विद्वान् के अनुसार इसके चार तत्त्व प्रमुख हैं प्रथम भूमि एवं जन से मिल कर बने प्रदेश, दूसरी इच्छा-शक्ति एवं सामूहिक जीवन-संकल्प, तीसरा नियम (संविधान) एवं चतुर्थ समान जीवन-आदर्श। इन कसौटियों पर भारत प्रागैतिहासिक काल से ही राष्ट्र रहा है।   
पुस्तक में लेखक ने इस बात को भी बताने का प्रयास किया है कि किसी भी राष्ट्र की ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक, सांस्कृतिक-चारित्रिक आदि आधार उसके राष्ट्रीय चरित्र की कसौटी है। किसी भू-क्षेत्र का राष्ट्रीय चरित्र कुछेक दिन में विकसित नहीं हो जाता बल्कि एक भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले जनसमूह के संस्कार, विचार, संस्कृति आदि तत्त्व समान रूप से पुष्पित-पल्लवित होते रहने पर राष्ट्रीय चरित्र आविर्भूत होता है। राष्ट्र में भी आत्मा होती है जिसमें नैतिक मूल्य निहित होते हैं। उनके आचार-विचार में परिवर्तन स्वाभाविक नहीं वरन् कालखण्ड के अनुसार स्वयंभावी होते हैं। कालखण्ड के अनुसार उनके आचार-विचार, रहन-सहन, कला, साहित्य, खानपान परिवर्तित होते रहते हैं। विभिन्नता में एकता भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा रही है। 
भारतीय मनीषियों के अनुसार मानव-जीवन का उद्देश्य मानव द्वारा भौतिक प्रगति, आर्थिक विकास के साथ-साथ बौद्धिक विकास, आध्यात्मिक विकास करना है। जियो और जीने दो की भावना, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ही भारत का जीवन-दर्शन रहा है और यही इस राष्ट्र की विशिष्टता रही है। भौतिक रूप से सशक्त रहते हुए भी कभी इसने किसी देश को अपना उपनिवेश नहीं बनाया जबकि इतर जगत् की मान्यता रही है कि सबलतम ही जीवित रह सकता है। विश्व-कल्याण की भावना, अध्यात्म का मूलाधार ब्रह्म एवं आत्मा का अंतःसम्बन्ध, कर्मवाद, समन्वयवाद भारत के राष्ट्रीय चरित्र में समाहित रहे हैं, यह सब आलोच्य पुस्तक में सविस्तार विवेचित है। भारत का वास्तविक स्वरूप भी पुस्तक में गहन-सफल ढंग से दर्शाया गया है। कुल मिला कर पुस्तक भारतीय राष्ट्रीय गौरव का एक सफल परिचय प्रस्तुत करती है।
पुस्तक की पृष्ठभूमि में लगभग दो सौ संदर्भ-ग्रंथों का शोधात्मक अध्ययन एवं चिन्तन है जो इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करते हैं। मेरी दृष्टि में इस पुस्तक की भाषा में यदा-कदा क्लिष्टता है। ऐसी पुस्तकों की भाषा सहज और सर्वग्राह्म होनी चाहिए। फिर भी क्या है भारत क्या है भारतीयता पुस्तक भारत को जानने की इच्छा रखनेवालों के लिए महत्त्वपूर्ण, पठनीय एवं संग्रहणीय है। 
            - विवेकनगर, सुल्तानपुर , दूरभाष: 9450714759
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 सुष्ठु विचारों का मधुपर्कक्या है भारत .......

                       - डॉ॰ विद्याकेशव चिटको
            ( को-एडवाइजर फास्टर सिटी लाइब्रेरी, कैलिफोर्निया, यू॰एस॰ए॰, 
      सेवानिवृत्त हिन्दी विभागाध्यक्ष, शोधनिर्देशक, हिन्दी अनुसंधान केन्द्र, पुणे )
विजय रंजन द्वारा रचित कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ लिखने की प्रेरणा लेखक को भरत की पुण्यभूमि की वत्सल छाया में पलने-बढ़ने से प्राप्त हुई है और उसी से प्रेरित होकर लेखक ने ‘भारत और भारतीयता’  विषय पर अपना चिन्तन प्रस्तुत किया है। उसकी अनेक वर्षों की दीर्घ साधना, गहन अध्ययन का परिपाक प्रस्तुत कृति है। 
प्रस्तावना सहित विषय को सहज सुगम, सरल और पठनीय बनाने की दृष्टि से कृति में कथ्य को वर्गवार यथा पूर्वार्चिक में ‘भारत नामकरण के मूलभूत आधार’, ‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’, ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’, ‘भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि’, ‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार’, ‘भारतवर्ष एक प्राचीन राष्ट्र’, ‘भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ और उत्तरार्चिक में ‘भारत का वास्तविक स्वरूप’ अध्यायों मंे विभाजित किया गया है। अन्त में आधार ग्रंथों की सूची संलग्न है। 
भारत और भारतीयता के संदर्भ में यह कृति भारत के विविध आयामों को समेटे हुए ‘एक भारत’ का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करती है। भारत और भारतीयता सम्बन्धी चिन्तन को जो विस्तार प्राप्त हुआ है और जो विवेचन प्रस्तुत किया गया है वह ऐतिहासिक तथ्यों के ठोस धरातल पर आधारित है।
‘भारत’ शब्द कहाँ-कहाँ, कब-कब और किन-किन स्थानों पर उल्लिखित है और उसके आधार कहाँ-कहाँ हैं, उसका सम्यक् विवेचन करने के पश्चात् कृतिकार ने अपने विचारों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। 
भारत को ‘आर्यभूमि’ की संज्ञा दी गई है। भारत और भारतीयता इस गहन और गूढ़ विषय पर अब तक श्रेष्ठ दिग्गज विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। ‘नेति-नेति’ वत् भारत क्या है--- यह एक गूढ़ चिन्तन का विषय रहा है और आज भी बना हुआ है। सहस्त्राधिक प्रश्नों के उत्तर, अनेक विचार-चिन्तन के कोन, दृष्टि और दर्शन उसके पीछे हैं। एक वाक्य में या सीमित परिधि में बाँध कर भारत को व्याख्यायित करना एक कठिन कार्य है। अन्धे की गज-अनुभूतिवत् ! फिर भी विजन रंजन जी ने अपनी शक्ति, बुद्धि, अध्ययन, चिन्तन, विचार की पृष्ठभूमि पर इसे व्याख्यायित करने का प्रयास है- “प्राचीन काल में विश्व को शून्य (0) से लेकार नौ तक के अंक, देवभाषा संस्कृत सदृश विज्ञान सक्षम भाषा एवं लिपि प्रदान करने वाला, ज्योतिष विज्ञान, आयुर्वेद, आयुष विज्ञान, वास्तुशास्त्र, कला, संस्कृति, योग, अध्यात्म, धर्म, दर्शन, परम शान्ति और रामराज्य का पाठ पढ़ाने वाला और वर्तमान युग में 104 संचार एपग्रह एक साथ अन्तरिक्ष में भेजने वाला और चन्द्रयान-2 को सफलतया संचालित करने वाला सफल लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाला, विश्व की पाँचवीं अर्थव्यवस्था बनने वाला एक सबल परमाणु-शक्ति सम्पन्न विशिष्ट भू-सांस्कृतिक राजनीतिक इयत्ता वाला स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र है भारत।” 
लेखक के विचार से भारत और भारतीयता की मूल प्रकृति, प्रवृत्ति उसके नाम से ही स्पष्ट है- “शब्द ‘भा$रत’ और ‘भारती$य’ स्वतः बहुत कुछ बता देते हैं।.....‘ज्ञान, कर्म एवं उपासना में समन्वय’ के साथ ‘इच्छा-ज्ञान-क्रिया में समन्वय’ की ऋतम्भरिक तलाश में सर्वदा निरत रहती आई है भारतीय धरित्री; इसीलिए भारतीय मनीषा को ‘भा+रत’ कहा गया है।....सात्त्विक, लयशील, तितिक्षाशील (त्याग, क्षमा, सहिष्णुता के शील वाली) रचनाधर्मिता वाली प्रज्ञा-प्रदायी देवी भारती (सरस्वती) की ऋतम्भरा प्रज्ञा से सहयुजित भारती+य आदिकाल से ही ‘भा+रत’ अर्थात् ‘भा (प्रकाश/ज्ञान) की खोज’ में रत (संलग्न) रहे हैं।......भारतवासी देवी भारती की दैवीय सात्त्विकता, चिन्मयता, पावनता, रागात्मक रचनाधर्मिता आदि को आत्मसात् कर जब उनसे पूर्णतया सम्पृक्त हो गए, तभी वे ‘भारती+य’ बन सके थे। ...... ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा से प्रकाश (ज्ञान) की खोज में सतत निरत रहने वाला राष्ट्र है भारत जिसमें लोक-पोषकत्व सह राष्ट्र-संघटकत्व वाला ‘भरतत्व’ और पावनता, सात्त्विकता, चिन्मयता, धर्मालुता, तितिक्षाशीलता, दैवीय रचनाधर्मिता आदि की देवी ‘भारती’ के ‘भारतीत्व’(देवी भारती के गुण) के साथ सर्वकल्याणक शिवत्व एवम् वैदिक औपनिषदिक संस्कार आधारभूत रूप में विद्यमान हैं। फ...ल...तः, ऋतम्भरिकता, सात्त्विकता, चिन्मयता, तितिक्षाशीलता, धर्मालु-रचनाधर्मिता एवम् सतत ज्ञान-साधना ही भारत की मौलिक ‘भारतीयता’ है।”
कृति के प्रारंभ में विजय रंजन जी ने ‘भारत-नामकरण के मूलभूत आधार’, ‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’ को विस्तृत विवेचना के साथ प्रस्तुत करने के साथ-साथ ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ नामक अध्याय में ‘भारतवर्ष, इण्डिया, हिन्दुस्तान, हिन्दुस्थान, हिन्दोई, इन्डोई (अर्थात् पूर्णिमा के चन्द्र ‘चाँद जैसा देश)’ आदि नामों की व्युत्पत्ति, विकास और विशेषताओं की चर्चा की है, प्रमाणाधिष्ठित तर्क प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने ऐतिहासिक पुरातात्त्विक साक्ष्यों से यह भी सिद्ध किया है- “हमारा प्राचीन ‘राष्ट्र’ भारत आर्यान् (ईरान) के पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी तक, हिमालय से दक्षिण में हिन्द महासागर के उत्तरी क्षेत्र तक विस्तृत रहा है। इस विस्तृत भू-क्षेत्र में विभिन्न स्थलों पर निषाद, द्रविण, किरात संस्कृति के परम्परागत अवशेष विद्यमान रहते हुए भी इन संस्कृतियों के आर्य संस्कृति से समरस हो जाने के फलस्वरूप सम्पूर्ण भारतभूमि ‘आर्यभूमि’ ही मानी जाती रही है, जिसका क्षेत्र-विस्तार व्यापक रहा है।”......... “भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति, भारतीय वाङ्मय भारत की पताका आविश्व फहरा-लहरा रहे थे प्राचीनकाल में।”....“भूखण्ड, जन, प्राकृतिक सम्पदा, राजकोष, सेना, स्वयंसंप्रभु सत्ता वाला राष्ट्र ही नहीं, वरन् प्रागैतिहासिक काल से ही एक विशिष्ट मनस्विता और विशिष्ट संस्कृति का विशिष्ट भू-सांस्कृतिक मृण्मय सह चिन्मय संचेतना वाला राष्ट्र रहा है भारत।......भारतीयता-समग्र या कि मूलतया भरतत्व $ भारतत्व $ भारतीत्व आदि अपने जन्मकाल से अब तक के सुदीर्घ कालखण्ड में सम्पूर्ण भारत-भूमि में गहरे पैठी रही हैं। ......वे निर्मूल कभी नहीं हुईं यहाँ के जन-मन में।”.....“भारतीय राष्ट्रवादी विचारक विपिनचन्द्र पाल हैं जो कहते हैं- “व्यक्तियों की भाँति राष्ट्र में भी आत्मा होती है। राष्ट्र के पृथक व्यक्तित्व में विशिष्ट सांस्कृतिक, मानसिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक मूल्य निहित होते हैं।......भारत राष्ट्र के राष्ट्रत्व में कोई कमी दृष्टिगत नहीं होती।......संस्कार/संस्कृति/आचार/विचार सम्बन्धित राष्ट्र की आत्मा तक (‘आत्मा’ की संज्ञा से गुरेज हो तो कह सकते हैं ‘राष्ट्र के गहनतम अन्तर्मन’ तक) प्रविष्ट हो चुके हैं। तदनुसार, भारत के परिप्रेक्ष्य में कह सकते हैं कि उपरि-इंगित प्रविष्टि के फलस्वरूप आभारत-व्याप्त मनोवैज्ञानिक संवेगों में से अनेक संवेग तो इस सीमा तक आभारत शाश्वत-व्याप्त दिखते हैं कि उन्हें हम ‘भारतीय राष्ट्रिक की आत्मा में प्रविष्ट’ और ‘भारत राष्ट्र की आत्मा में प्रविष्ट’ राष्ट्रीय आत्म-संचेतना का नाम दे सकते हैं। ऐसी शाश्वत संचेतना के धरातल में कतिपय वैदिक संस्कारों के साथ लोक-पोषण सह राष्ट्र-सुगठत्व की सदिच्छा वाले ‘भरतत्व’, सतत ज्ञान-निरतता वाले ‘भा$रतत्व’ और सर्वकल्याणक, धर्मालु, तितिक्षाशील, सात्त्विक रचनाधर्मिता वाले ‘भारतीत्व’ (सारस्वतता) से मूलतया जनित भारतीयता.....ऐसे ही राष्ट्रीय संवेग/संचेतना वाले प्रत्यय हैं जिनमें कालान्तर में व्यापक स्तर पर शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व, जिनत्व और बुद्धत्व भी आमेलित हो गए हैं।......हमारे प्रथम वेद: ऋक् के प्रथम मण्डल की प्रथम ऋचा में और अनेकत्र ‘अग्नि’ की आराधना है। ......ज्ञान की खोज में आगे बढ़ने पर अर्थात् सूर्य के प्रकाश-प्रदान एवं अन्धकार को विनष्ट करने का गुण संज्ञान में आने पर उन्होंने अग्नि की अपेक्षा सूर्य को अधिक कल्याणकर जाना। अतएव, सूर्य से सात्मीकरण स्थापित कर वे सूर्योपासक (भा$रत) बने। ऋक् युग में ही इन्द्र की अभ्यर्थना के फलस्वरूप तत्कालीन अति सीमित आवश्यकताओं के युग में सत्$चित्$आनन्द की  आराधना के साथ-साथ आर्य जन आनन्दप्रिय भी हो गए थे।” आनन्द अखण्ड घना था। फिर भी- “ज्ञान की खोज में थोड़ा और गहरे उतरने पर .......देवी भारती (सरस्वती) की प्रकृति-प्रवृत्ति को अपने सर्वाधिक सानुकूल पाकर देवी भारती के गुणों को आत्मसात् करने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया उन्होंने। कालान्तर में देवी भारती से ‘भारती$य’ वाला सायुज्य प्राप्त करने से भी आगे बढ़ कर देवी भारती के वैशिष्ट्य (भारतीत्व): सत्त्वशीलता, प्रज्ञाशीलता, दैवीयता, पावनता, रागात्मक रचनाधर्मिता, ऋतशीलता, चिन्मयता, तितिक्षा, दकारत्व (दान, दया, इन्द्रिय-निग्रह), सहिष्णुता, शान्तिप्रियता, अहिंसा, उदात्तता, उदारता आदि सारस्वत गुणों से ओत-प्रोत हुए आर्यजन और ‘जानति तुम्हहिं तुम्हहिं ह्वै जाई’ की परम्परा में स्वयं भारती के समरूप ‘भारती तत्र सन्तति’ के प्रतिमान बन गए वे।....ज्ञान की खोज में निरत भारतीय यहीं नहीं ठहरे।.....सत्य की खोज में आगे बढ़ते-बढ़ते अध्यात्म की सुदीर्घ यात्रा भी सम्पन्न की।.....सृष्टि के सर्जक, पोषक, संहारक स्वरूप में ब्रह्म की शक्ति-त्रयी को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु , महेश के रूप में अधिनामित भी कर दिया भारतीय मनीषियों ने। साथ ही जीवन-मृत्यु , मृत्योपरान्त जीवन, कर्मफल सिद्धान्त, परमात्म-साक्षात्कार, आत्मा-परमात्मा का अस्तित्व, सृष्टि-रहस्य आदि तत्त्वों की खोज, मोक्ष, मानव-जीवन के पुरुषार्थ (अधिलक्ष्य) आदि की अवधारणाएँ भी विकसित की उन्होंने। अपनी ज्ञान-पिपासा की यात्रा में अनन्त ज्ञान का छोर मापते-मापते ज्ञानखोजी भारतीय मनीषियों ने इसी कालखण्ड में ज्ञान-विज्ञान के अनेक प्रकल्प: सांख्य, योग, दर्शन, धर्म आदि का भी निरूपण किया।......त्रेता युग में दाशरथ राम की लोकमांगलीय निष्ठा और लोक-मर्यादा की संरक्षा सह अनय-निरोधन की कर्मठता को धर्मस्वरूप में उपास्य माना गया यहाँ। तथैव, लोकहितवादी नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित की प्रावृत्तिक प्रतिष्ठा प्रतिष्ठित हुई भारतीय लोकमानस में। तदन्तर वासुदेव कृष्ण के कालखण्ड में ‘धर्म’, ‘सत्य’ आदि का विचारमंथन परवान चढ़ा। अंततः वासुदेव कृष्ण के लोकसंग्रही कृतित्त्व ने आनन्दवादी भोग को कर्त्तव्य-निष्ठाधीन बता दिया।...इस प्रकार भारत-भूमि पर वैदिक निदेशन, ज्ञानाराधना के साथ-साथ सारस्वतता, शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व की आराधना जन-मन में पैठ गई। इस पैठ के फलस्वरूप भारत के जन-मन में भोगवाद के बजाय धर्मरतता, धर्मालुता, सात्त्विकता, सर्वकल्याण, लोकमंगल, लोकसंग्रह, कर्त्तव्य-निष्ठा, लोकहित-रक्षा लोकमर्यादा-रक्षा आदि के लिए त्याग-बलिदान की भावना भी पल्लवित हुई।.....विविध सद्गुणों का समुच्चय ‘राष्ट्रीय चरित्र’ बन गया भारतीय जन का। वास्तव में यही भरतत्व, भारतत्व, भारतीत्व, शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व ही भारतीयता का मूलाधार है जो युग-युगों तक भारत का राष्ट्रीय सांस्कारिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक सम्बल बना रहा और न्यूनाधिक रूप में आज भी बना हुआ है।” भारतीय राष्ट्रीय संस्कारों के लिए ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः......’ एवं ‘ओ३म् शान्तिः.....’, भारतीत्व तो प्रत्येक वस्तुनिष्ठ भारतीय की रग-रग में व्याप्त है। उससे विलग तो भारती$य हो ही नहीं सकता।....“सत्, चित्, आनन्द और उसके समवेत के प्रति ललक, प्रतीततया पावन, सात्त्विक सारस्वतता के प्रति ललक के फलित से सर्वदा विद्यमान दिखती है जो देवी भारती से भारती$य मन की सम्पृक्तता का अतिरिक्त प्रमाणक है।”
कृति में कहा गया है कि भारतीत्व से सम्पृक्त भारतीय जन प्रायः सत्त्वकामी, अहिंसक, सहिष्णु, ज्ञानप्रिय, शान्तिप्रिय, दयालु , उदार, उदात्त, इन्द्रिय-निग्रही, दानशील, क्षमाशील, त्यागशील, अलोलुप, भेदभावरहित, सर्वकल्याणक, ‘जियो और जीने दो’ तथा सहयोगी प्रवृत्ति वाले, सहअस्तित्व की भावना वाले, बहुलांशतः शान्त और तमस्हीन भा+रतीय आज भी हैं। यहाँ का जन साहित्य, कला, संगीत प्रिय हैं। देवी भारती का मनसा-वाचा-कर्मणा अनुकरण वाले भारत रहवासी जन भारतीय कहलाए। भारती$त्व (सारस्वत) गुण-धर्म को अपनाना ही मूलतया ‘भारती+य+त्व’ है जो कम बेसी मात्रा में आज भी सामान्यतया वस्तुनिष्ठ भारतीय में विद्यमान है इसलिए कि भारतीय आज भी भारती+य है। 
विजय रंजन जी के अनुसार ‘धारय इति धर्म’ और ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस् सिद्धि स धर्म’ भारतीयत्व की गहरी पैठ से सद्धर्म वाली धर्मालुता आस्तिकता श्रद्धा-भक्ति भाव भारतीय जन-मन में पैठे हुए हैं। 
कृति में लिखा गया है कि “देवी भारती की स्वयं की धर्मालुता, दैवीयता आदि से सम्प्रभावित भारतीयों में सात्त्विक गुणों के प्रति ललक और आस्तिकता यहाँ सामान्य स्वाभाविक शील बन गई है जिसके फलित से भारतीय धर्म चाहे वह ‘आर्य (वैदिक) धर्म’ हो या सनातन धर्म (वैष्णव धर्म) या शैव या जैन धर्म या बौद्ध धर्म या सिक्ख धर्म आदि---इन सभी के अनुयायियों की धार्मिक आस्था सघन होने पर ‘भक्ति’ में बदल जाती है और सघन धर्मालु यहाँ ‘भक्त’ बन जाते हैं। भक्ति सघन होने पर भक्त अपने आराध्य से सायुज्य की कामना करने लगता है, फलतः अंततः उसका मन निर्विकार/त्रिगुणातीत हो जाता है। .....भारतीय धर्मालु भक्त चरम अवस्था में भक्ति में इतना डूब जाता है कि उसे अपने आराध्य के सिवा कुछ और दीखता ही नहीं, वह सिवा अपने इष्ट/आराध्य से सायुज्य के अतिरिक्त कुछ और देखना/सोचना चाहता भी नहीं। यत्र-तत्र-सर्वत्र अपने आराध्य को देखने वाली दृष्टि के फलस्वरूप कामनाशील होने पर भी भारतीय भक्त ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ की ही कामना करता है।......इस तरह से ‘भक्ति’ के बहुआयामी सुफलित से भी भारत की एकता और भारतीयता सुबलित ही हुई है।”......“लोक-कल्याणकता की कोख से आविर्भूत होता है लोक-धर्म। लोकधर्म भी भारतीय संस्कृति की अनेक विशिष्ट विशिष्टताओं में से एक है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की कामना में लोक-सुखिनः की कामना स्वतः व्याप्त है।”
उत्तरार्चिक में विजय रंजन जी ने लिखा है- “प्राचीनकाल से अद्यतन विद्यमान ‘चिन्मय भारत’ की बीजरूपीय विद्यमानता और तद्गत शाश्वतता के सम्बल से कह सकते हैं कि ‘मृण्मय भारत’ के साथ ही भा$रतत्व सह भारती$त्व से सम्पृक्त ‘चिन्मय भारत’ और भारत की शाश्वत चिन्मयता से सम्पृक्त ‘शाश्वत भारत’ भी सदा अस्तित्ववान् रहा है यहाँ जिसमें राष्ट्रत्व के प्रायः सभी वांछनीय तत्त्व समेकित रहे हैं।”....“वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत, बृहत्संहिता आदि के रचयितागण ही नहीं, अपितु विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, डॉ॰ राधाकृष्णन्, डॉ॰ सम्पूर्णानन्द प्रभृति अधुना विचारक मनीषी भी शब्दान्तर से विशिष्ट संस्कारों वाले ‘चिन्मय भारत’ के ही प्रशंसक हैं। ‘गायन्ति देवाः किल गीतिकानि’ सदृश प्रशंसा ‘शाश्वत चिन्मय भारत’ की गई है।
कृति में आगे विजय रंजन लिखते हैं- “भारत एक राष्ट्र/देश या समाज के रूप में कोई ‘भोज्य वस्तु नहीं’ अपितु यह बहु-बहु संख्यक सामवयिक मानसिकता के विचार-चेतन, भाव-चेतन, संस्कार-चेतन, संस्कृति-चेतन,धर्म -चेतन, अध्यात्म-चेतन राष्ट्रिकों का विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र है जिसकी संस्कृति, संस्कार, जीवनाचार आदि स्वयं में अति विशिष्ट हैं।” यह भी तर्कोचित ढंग से विद्वान् लेखक ने सिद्ध किया है। विजय रंजन जी इस कृति के लिए साधुवाद के पात्र हैं। 
         - 8,यमाई रोड, नाशिक (महाराष्ट्र),  दूरभाष: 9527313387
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   नए सूर्योदय से कम नहीं 
  ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                       - डॉ॰ शिवम् तिवारी 
सर्वविदित है कि इस आर्यावर्त्ते भरतखण्डे वाले विस्तृत भूगोल को वर्तमान में तीन नामों से जाना जाता है- भारत, हिन्दुस्तान और इण्डिया।  प्रश्न तो यहीं से खड़ा हो जाता है कि हमारे राष्ट्र को इन तीन नामकरणों की आवश्यकता क्यों पड़ी ? नतीजतन आज हमारी अधिकांश युवा पीढ़ी ‘भारत’ को ‘इण्डिया’ कहने में गर्व महसूस करती है, बजाय भारत कहने के। इसके इतर वे भारत एवं भारतीयता के वास्तविक दर्शन-चिन्तन से भी अनभिज्ञ हैं। जबकि हमारे यहाँ वेदों, उपनिषदों, पुराणों, भाष्यों, दर्शनशास्त्रों से लेकर विभिन्न कृतियों का विपुल भण्डार है। नए भारत में यह वैचारिक परिवर्तन इसलिए हो रहा है क्योंकि अतीत के अनेक आक्रान्ता अपने उद्देश्य में सफल हो गए हैं। उनको यह साफ पता था कि अगर भारत को दिग्भ्रमित करना है तो उन्हें उनके मूल ज्ञान और विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र-दर्शन से दूर करना होगा। नतीजतन हमारी शिक्षा-पद्धति, शिक्षा के मूल उद्देश्य और जीवन-शैली में परिवर्तन हो गया। आज स्थिति यहाँ तक आ गई है कि हम भारत और भारतीयता के प्रश्न से ही निरुत्तर हो चले हैं। 
यह अकाट्य सत्य है कि अगर हम भारतीयों को दुनिया की दिशा से अलग और तीव्र गति से प्रवाहित होना है तो ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ  हमें अपने गौरवशाली अतीत को भी जानना-परखना होगा। परन्तु आज अत्याधुनिकता ने हमारे समय को ही निगल लिया है। हम नई पीढ़ी के पास इतना समय ही नहीं है कि हम अधिकाधिक पुस्तकों का पूरी एकाग्रता से पारायण करें। ऐसे दौर में लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकार एवं दार्शनिक विजय रंजन जी की कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ प्रकाशित होना राष्ट्रीय अस्मिता के जागरण के नए सूर्योदय से कम नहीं है। यह कृति तकरीबन 163 आधार ग्रंथों, 17 हिन्दी पत्रिकाओं एवं 25 अंग्रेजी पुस्तकों का सारगर्भित रूप है, जिन्हें विजय रंजन जी ने परिशिष्ट में वर्णित किया है।
ऋतम्भरा प्रकाशन द्वारा मुद्रित एवं आचार्य विश्वनाथ पाठक शोध संस्थान, फैजाबाद-अयोध्या द्वारा प्रकाशित 156 पृष्ठीय इस कृति का आवरण पृष्ठ अत्यन्त आकर्षक एवं कृति-शीर्षक को व्याख्यायित करने वाला है। इस पुस्तक का मूल्य 180/- मात्र है। यह पुस्तक देवभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि भारतवर्ष को समर्पित है।
भारत का परिचय देते हुए विजय रंजन जी ने प्रस्तावना में लिखा है कि “ऊर्ज्वस्विल ज्ञान (प्रकाश) की खोज के साथ-साथ पावन, सात्त्विक रचनाधर्मिता से सम्पृक्ति के अधिलक्ष्यों वाले ‘ज्ञान, कर्म एवं उपासना में समन्वय’ के साथ ‘इच्छा-ज्ञान-क्रिया में समन्वय’ की ऋतम्भरिक तलाश में सर्वदा निरत रहती आई है भारतीय धरित्री; इसीलिए भारतीय मनीषा को ‘भा+रत’ कहा गया है।” इसके आगे भारतीयता को भी परिभाषित करते हुए विजय रंजन जी लिखते हैं कि “ऋतम्भरिकता, सात्त्विकता, चिन्मयता, तितिक्षाशीलता, धर्मालु , रचनाधर्मिता एवम् सतत ज्ञान-साधना ही भारत की मौलिक ‘भारतीयता’ है।” भारत और भारतीयता की इतनी सटीक, सारगर्भित, संश्लिष्ट परिभाषा और कुछ भी नहीं हो सकती है। 
कृति मंे भारत के नामकरण के परिप्रेक्ष्य में मूलभूत आधार के रूप में लेखक के विचार से सूर्य और देवी भारती के गुणों की व्याप्ति इस देश के रहवासियों में देख कर उसी आधार पर भारत का नामकरण किया गया। ‘भारत नाम के अन्य आधार’ अध्याय में 13 भरत के नाम, जिनके नाम पर भारत का नाम भारत रखा गया, की सविस्तार विवेचना करते हुए लेखक ने तर्कपूर्ण ढंग से स्थापित किया कि दौष्यन्ति भरत या जैनीय ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर नहीं बल्कि इस देश का नाम भारत ‘वैदिक युग के आरम्भिक कालखण्ड के स्वायम्भुव मनु की पाँचवीं पीढ़ी के प्रपौत्र भरत’ के नाम पर भारतवर्ष रखा गया था।
‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ तथा ‘भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि’ अध्याय में प्राचीन-अर्वाचीन ग्रन्थों के आधार पर भारतभूमि को लेखक ने आर्यों की मूल निवास-भूमि बताया है और विदेशियों द्वारा दिए गए अनेक नामों से इस भूमि को देवभूमि भी सिद्ध किया है। 
क्षेत्र-विस्तार वाले अध्याय में प्राचीन भारत की विस्तृत सीमाओं की विवेचना अच्छे ढंग से निरूपित की है।  इसी तरह ‘भारतवर्ष एक प्राचीन राष्ट्र’  अध्याय में लेखक ने अनेक प्राचीन, अर्वाचीन कसौटियों को उद्धृत करते हुए भारत को अपने सबल तर्कों से विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र सिद्ध किया है।
लेखक ने भारत के विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र को बड़ी ही बारीकी से उद्घाटित किया है। उसका चिन्तन व्यापक एवं निष्पक्षीय है। वे विभिन्न ग्रंथों के अध्ययन-मनन-चिन्तन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि “कतिपय आपवादिक कालखण्डों को छोड़कर शेष अवधि में सदैव आभारत समरस भ+रतत्व सह भा+रतत्व सह भारती+त्व सह शिवत्व सह रामत्व सह कृष्णत्व सह जिनत्व सह बुद्धत्व से सम्पुष्ट भारतीयता-समग्र (जिसे संक्षेपतः ‘भारतीयता’ कहा गया है) हमारे भारत के विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र के रूप में यत्र-तत्र-सर्वत्र सतत प्रवहमान रही है और न्यूनाधिक रूप में आज भी प्रवहमान है। वास्तव में यह प्रवहमानता ही भारतीयता-समग्र का विशिष्ट राष्ट्रीय चारित्रिक वैशिष्ट्य है।” लेखक ने भारत के राष्ट्रीय चरित्र के आधार पर दो टूक लिखा है कि भारतीय केवल वे हैं जो भारती+य हैं अर्थात् जो देवी भारती के गुणों से आसिक्त हैं। इस अभिमत से असहमत होने वाले बुद्धिजीवी कम नहीं होंगे परन्तु यह अभिमत अति महत्त्वपूर्ण, क्रान्तिक और लेखक के तर्कों के अनुसार भारत एवं भारतीय की मूल राष्ट्रीय प्रकृति से सुपुष्ट है। 
इसी अध्याय में लेखक ने भारत के राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताएँ गिनाते हुए ब्रह्मवाद, धर्मालुता, भक्ति, सारस्वत गुण, तितिक्षाशीलता एवं समन्वयवाद आदि की भी तार्किक विवेचना प्रस्तुत की है, जो स्वयं में क्रान्तिक है। ‘धर्म’ को व्याख्यायित करते हुए लेखक ने सनातन धर्म, आर्य धर्म को श्रेष्ठतर स्थापित किया है। लेखक ने भारतीयेतर धर्मों को एक पंथ-विशेष बताते हुए ‘धर्म’, ‘मजहब’ और ‘रिलीजन’ का अन्तर भी तर्कपूर्ण ढंग से रेखांकित किया है।  
भक्ति को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हुए लेखक ने भारतीय भक्ति को व्याख्यायित करके दो टूक स्पष्ट किया कि यहाँ धार्मिक आस्था सघन होने पर ‘भक्ति’ में बदल जाती है। वे कहते हैं- 
“भक्त अपने आराध्य से सायुज्य की कामना करने लगता है, फलतः अंततः उसका मन निर्विकार/त्रिगुणातीत हो जाता है। दूसरी ओर, अन्यान्य देश-समाज में धार्मिक आस्था सघन होने पर उनमें ‘कट्टरतावाद’ पनप जाता है। अन्य धर्म का धर्मालु कट्टरतावाद के फलित से अपने कथित धर्म/आस्था को अन्य मानव-समाजों में येन-केन-प्रकारेण (हिंसा से भी) फैलाने/थोपने पर कटिबद्ध (प्रत्युत उसी पर आमादा) हो जाता है; यहाँ तक कि इसके लिए वह घोर तमस्शील होने से भी गुरेज नहीं करता ! ‘निर्विकार सात्त्विक धर्मालुता बनाम तमस्शीलता’ का यह अन्तर एक ‘बहुत बड़ा अन्तर’ कारित करता है ‘भारतीय धर्मालुता’ और ‘भारतीयेतर धर्मालुता’ में। भारतीय धर्मानुयायी/भक्त में धीरे-धीरे सात्त्विकता, शिवशीलता, अहिंसा आदि के भाव बढ़ते जाते हैं, वह भोग-वृत्ति और भेद-भाव वृत्ति (अपना-पराया के भाव) से विमुख होता जाता है। भारतीय धर्मालु भक्त चरम अवस्था में भक्ति में इतना डूब जाता है कि उसे अपने आराध्य के सिवा कुछ और दीखता ही नहीं, वह सिवा अपने इष्ट/आराध्य से सायुज्य के अतिरिक्त कुछ और देखना/सोचना चाहता भी नहीं। यत्र-तत्र-सर्वत्र अपने आराध्य को देखने वाली दृष्टि के फलस्वरूप कामनाशील होने पर भी भारतीय भक्त ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ की ही कामना करता है।” ऐसी प्रस्थापनाएँ वास्तव में कृति को बहुत  उपयोगी बना देती हैं। 
विजय रंजन जी भारत के वास्तविक स्वरूप का जिक्र करते हुए लिखते हैं-   “भारतीयता-समग्र के जाज्ज्वलीकरण से भारत की ज्ञाननिरतता, सत्त्व-निरतता और चिन्मय रचनाधर्मी संचेतना वाली शाश्वत ऋतम्वरिक चिन्मयता के साथ-साथ शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व के आचार-विचार के प्रति भारतवासी जनसंकुल की रुचि भरपूर जाग्रत करने पर अज्ञानी-जन का प्रश्नगत अज्ञान तो तिरोहित होगा ही; ‘भारतीय चैत्य के प्रति श्रद्धा, भारत के प्रति ममत्व, भारत सर्वोपरि, भारत के हित के लिए सर्वस्व उत्सर्ग’ आदि के भाव के साथ ही ‘भारतीय राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान, भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव, समस्त भारतीय जन के प्रति आत्मीयता सदृश भावानुभाव और तद्गत आचार-विचार यहाँ के जन-जन में अनुषंगतः स्फुरित हो जाएंगे। त..ब और तभी, वस्तुनिष्ठतः रूपाभ होगा एकात्म भारत, श्रेष्ठ भारत, चिन्मय भारत, शाश्वत भारत और मृण्मय भारत भी। औ..र, तब ही वस्तुनिष्ठतः भारतान्वयित होकर विश्व को पुनः चिन्मयी श्रेष्ठता, सम्यक् ज्ञान और सर्वकल्याणक शान्ति का मार्ग भी दिखा सकेगा हमारा सुसंस्कारित भारत।”
इस अध्याय में लेखक ने प्रसिद्ध शायर फिराक के शे’र ‘सरजमीने हिन्द........’ में ‘काफिले आते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया’ का खण्डन करते हुए ‘काफिले आते गए हिन्दोतां बढ़ता गया’ का संशोधन भी अपनी ओर से प्रस्तुत किया है। इस सबसे बढ़ कर इसी अध्याय में तर्कपूर्ण ढंग से लेखक ने उन बुद्धिजीवियों को सटीक जवाब भी दिया है जो भारत को संस्कृतियों की खिचड़ी का देश कहते हैं। खिचड़ी को विलक्षण रूपक बना कर लेखक ने प्रभावपूर्ण भाषा-शैली में भारत को ‘कच्ची खिचड़ी’ नहीं बल्कि ‘पकी हुई खिचड़ी’ बताया है। वे कहते हैं- “भारत एक राष्ट्र/देश या समाज के रूप में कोई ‘भोज्य वस्तु नहीं’ अपितु यह बहु-बहु संख्यक सामवयिक मानसिकता के विचार-चेतन, भाव-चेतन, संस्कार-चेतन, संस्कृति-चेतन, धर्म-चेतन, अध्यात्म-चेतन राष्ट्रिकों का विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र है जिसकी संस्कृति, संस्कार, जीवनाचार आदि स्वयं में अति विशिष्ट हैं। 
द्वितीयतः इसे आप यदि ‘खिचड़ी’ का रूपक देने पर ही आमादा हैं आप, तो भी मेरे भाई, भारत विविध संस्कृतियांे/समूहों वाले ‘दाल-चावल‘ के मिश्रण/अपमिश्रण वाली ‘कच्ची खिचड़ी’ नहीं है इसलिए कि ‘खिचड़ी’ यदि अनपकी हो तो ही उससे दाल-चावल के दानों को बीन कर अलग करने वाले खिचड़ी के अवयवों को अलग-थलग कर खिचड़ी को विखण्डित कर ही सकते हैं जबकि भारत विविध संस्कृतियांे/समूहों वाले ‘दाल-चावल‘ के मिश्रण वाली ऐसी पकी खिचड़ी है जिसमंे भारत के विविध अंचलों में जन्में-पले-बढे विविध आचार-विचार वाले जन के ‘विविध प्रकारों के चावल और  ‘विविध प्रकारों की दालें (अरहर, मूंग, मसूर, उर्द, चना, मटर, राजमा आदि की दालें)’, विविध स्थानिक समूहों के ‘विविध रीति-रिवाजों के नमक-मसालों’ के साथ मिलकर ‘समन्वय की अदहन’ में ‘समय के ताप’ से पक कर इस तरह ‘एकमेक’ हो चुके हैं कि पकी खिचड़ी के ’भात की प्रत्येक सीत में विविध दालों-नमक-मसालों के रस और दाल के प्रत्येक कण में भात-नमक-मसालों के रस विविध खुश्बू सहित एक दूसरे में रस-भिन गए हैं; विविध संस्कृतियों का ‘तड़का (छौंका)’ लगा है उनमें ऊपर से छौंका लगने के बाद तो खिचड़ी का स्वाद बदल ही जाता है। अब यदि खिचड़ी के अवयव यदा-कदा अलग दिखें तो भी इस पकी खिचड़ी के किसी अंश से उनका एकमेक रस, उनका परस्पर ‘भिनाव’, उनकी सामवायिक सुगन्ध, पौष्टिकता एवम् स्वाद कभी अलग/विवर्णित नहीं की जा सकती इसलिए कि पकी खिचड़ी सुगन्धित, स्वादिष्ट तभी प्रतीत होगी जब दाल-चावल का रस एक-दूसरे में ‘भिन’ जाने से समरस बन चुके हों खिचड़ी के अवयव।”
इस तरह स्पष्ट है कि विजय रंजन का चिन्तन निःसन्देह तर्कसंगत राष्ट्रवादी लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित है। बनी-बनाई परम्परा से हट कर शोधपरक सृजन करना ही विजय रंजन जी के लेखन की विशिष्टता है। ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ जैसे गूढ़ प्रश्नों पर प्रकाश डालने वाली इस कृति से विजय रंजन के दर्शन-चिन्तन एवं विशिष्ट सृजनशीलता को आसानी से समझा जा सकता है। 70 की उम्र में भी विजय रंजन जी की व्यापक अध्ययनशीलता, अद्वितीय लेखन-क्षमता और दायित्व-बोध सचमुच अनुपम और अप्रतिम हैं। युवा पीढ़ी के लिए एक पद-चिह्न भी निर्मित हो रहा है जिसके अध्ययन-अनुसरण से एक विशिष्ट चरित्र वाले भारत का स्वतः निर्माण हो जाएगा और यह स्वर्णिम भारत पुनः विश्वगुरु के पद पर दुनिया के सामने आसीन हो जाएगा। ऐसा मेरा प्रबल विश्वास है।  विजय रंजन जी का सृजन हिन्दी साहित्य एवं भारतीय वाङ्मय के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। इस कृति की प्रासंगिकता समय बीतने के साथ-साथ बढ़ती ही जाएगी और भारत-भारतीयता को समझने के लिए अत्यन्त उपयोगी रहेगी। उनके योगदान का समूचा भारत और हिन्दी साहित्य सदैव ऋणी रहेगा। Û                          
- नगर पंचायत सतीगंज अंतू , प्रतापगढ़-1, दूरभाष: 94044128189
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  भारत-भारतीयता की व्याख्या का स्तुत्य प्रयास है पुस्तक 

क्या है भारत क्या है भारतीयता

                      - डॉ॰ गोविन्दस्वरूप गुप्ता
भारत विश्व का प्राचीनतम सनातन सांस्कृतिक राष्ट्र है। भाषिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक बहुलता प्रधान इस देश को समझना अपनेआप में एक शोध का विषय है। विजय रंजन जी ने इस पुस्तक में भारत और भारतीयता को परिभाषित करने का सफल एवं सार्थक प्रयास किया है। राष्ट्र तथा राष्ट्रीय चरित्र के रूप में भारत और भारतीयता को व्याख्यायित करने का भी स्तुत्य प्रयास लेखक ने किया है। 
भारत के नामकरण को लेकर लेखक ने अनेक साक्ष्यों का अवलोकन किया है। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथों का आधार ग्रहण किया गया है। भारत को आर्यभूमि भी कहा जाता रहा है। इसका उल्लेख भी अनेक ग्रंथों में वर्णित है जिसका उल्लेख कृति में है। 
भारत एक राष्ट्र होने के साथ ही सम्पूर्ण विश्व की मानवता को अपनेआप में आत्मसात किए हुए हैं। भारत की इस विशेषता को लेखक ने बड़े प्रामाणिक एवं तथ्यात्मक स्वरूप में प्रस्तुत किया है। भारत-भूमि में ईश्वर अवतार लेते हैं। मनुष्य रूप में विविध लीलाएँ करते हुए हर युग के मानव-समुदाय के लिए एक जीवनादर्श प्रस्तुत करते हैं। यह भारतीय धर्म-संस्कृति एवं हिन्दू धर्म की मान्यता है। इस धर्मसूत्र को भारत में हिन्दू धर्मसूत्र के नाम से अभिहित किया जाता है और यही भारतीय समाज एवं संस्कृति की पहचान है। विजय रंजन जी ने अपनी इस पुस्तक में इन सारे तथ्यों का सारगर्भित विवेचन, विश्लेषण एवं निष्कर्ष का प्रतिपादन किया है।
भारत के दर्शन, अध्यात्म और विज्ञानमय कोश को इस पुस्तक में समाविष्ट करने का प्रयास उल्लेखनीय है। समय-समय पर विदेशी आक्रमणकारियों ने बृहत्तर भारत की समृद्धि एवं सांस्कृतिक, आर्थिक वैभव को लूटने का अनेकानेक दुष्प्रयास किए किन्तु भारतीय अस्मिता की गहन सांस्कृतिक धरोहर ने सभी विषम परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने अपने गम्भीर अध्ययन तथा शोधपरक विवेचन हेतु भारत की गौरवशाली परम्परा, वेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण, संहिता और स्मृतियों के साथ स्वामी दयानन्द सरस्वती, भीमराव अम्बेडकर, स्वामी विवेकानन्द आदि व्यक्तित्वों के द्वारा प्रणीत सिद्धान्त ग्रंथों का भी संदर्भ ग्रहण किया है।
लेखक ने समस्त ज्ञान-विज्ञान के मूल आधार जिज्ञासा को केन्द्र में रखा है। लेखक के जिज्ञासु मन में यह प्रश्न भी आया कि स्वाधीनता के 70 सालों में भारतमाता की जय और राष्ट्रगान जैसे विषयों पर भी देश में विवाद होता रहता है। क्या हम अभी भारत और भारतीयता को ही परिभाषित नहीं कर सके ? क्या यही हमारी राष्ट्रीय अस्मिता है ? यह कब तक चलता रहेगा ? यह तथ्य किसी भी रचनाकार को उद्वेलित कर सकता है। 
भारत और भारतीयता के वस्तुनिष्ठ तत्त्वों से जन-सामान्य को परिचित होना चाहिए। इसी उद्देश्य को लेकर विजय रंजन जी ने इस पुस्तक की सोद्देश्यता प्रकट की है। वे अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल भी हुए। उन्होंने हर दृष्टि से विषयवस्तु की सार्थकता प्रमाणित की है। आज युवा वर्ग में एक जिज्ञासा बनी रहती है कि भारत के इतने गौरवशाली ऐतिहासिक व्यक्तित्वों तथा सांस्कृतिक धरोहर होने के बाद भी देश लगभग एक हजार साल तक गुलाम क्यों बना रहा ? इस प्रश्न का उत्तर तो अपने में अलग से एक ग्रंथ रचना का विषय हो सकता है किन्तु यदि प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से भारत और भारतीयता को समझा जाए तो पराधीनता के कारणों को भी काफी कुछ समझा जा सकता है। 
आज के सन्दर्भ में बहुत उपयोगी है ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’। विजय रंजन जी की यह पुस्तक युवाओं की जिज्ञासा को भी काफी कुछ संतुष्ट कर सकेगी। 
इस पुस्तक का मूल सन्देश यही है कि भारत एक सनातन विश्व-मानवता के आदर्श का संस्थापक देश है और भारतीयता इस देश के कण-कण में बसी हुई बहुआयामी माननीय सभ्यता, मानवीय सभ्यता एवं मानवीय संस्कृति की लोकमंगलकारी एकात्मता है।       
- फ्लैट सं॰ 212, ब्लॉक आई (प्) सिल्वरलाइन एपार्टमेंट, निकट बी॰बी॰डी॰, लखनऊ-226028  दूरभाष : 9335257117
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 सांस्कृतिक चेतना के नवस्वर का मन्द्र प्रकाश है- 
      ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ 

         - डॉ॰ सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
      कहु रहीम ते बिरछ कहँ जिन्ह कर छाँह गभीर।  
       बागन बिच बिच देखिअत सेहुड़ कुटज सरीर।।
 बड़े, घने वृक्षों की छाया दुर्लभ हो रही है। छोटे-छोटे पेड़ जिनसे छाया मिलना मृगमरीचिका ही है, वे अधिक हो रहे हैं। कथनीय यह है कि अब उन लेखकों की अत्यल्पता हो गई है जिनमंे लेखन की मौलिकता, चिन्तन की नूतनता तथा मनन की गम्भीरता है। ऐसे ही विरल तथा दुर्लभ लेखकों में एक आदरणीय नाम है विजय रंजन। मनसा-वाचा-कर्मणा सारस्वत तपस्या को समर्पित विजय रंजन द्वारा सम्पादित शोध-पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ ने पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित की है। जिन विषयों पर लिखने से आधुनिक लेखकों का एक बहुत बड़ा वर्ग कतराता है, जिन विषयों को अनेक वरिष्ठ लेखक भी कठिन, जटिल तथा अनुपयोगी मानते हैं, विजय रंजन की लेखनी उन्हीं विषयों पर विशेष कार्य करती है। विजय रंजन उन विषयों को सरल, सुबोध लोकोपकारी तथा प्रासंगिक बना कर प्रस्तुत करने में निपुण और प्रवीण हैं। उन्होंने वाल्मीकि-रामायण का गहन अध्ययन किया है । भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्रियों का तलस्पर्शी परिशीलन किया है यही कारण है कि वे ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘रसवाद औ...र नयरस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ , ‘कविता क्या है’ शीर्षक कृतियों का प्रणयन कर चुके हैं। ये कृतियाँ प्रकाशित हैं, लेकिन इनकी अनेक कृतियाँ अप्रकाशित हैं। इनकी समस्त कृतियाँ शोधपरक हैं और शोध-ज्ञान पिपासुओं को शोध के नवीन क्षितिजों की ओर संकेत कर रही हैं। सम्प्रति विजय रंजन की नवीन कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ मेरे समक्ष है। यह गम्भीर एवं राष्ट्रीय महत्त्व की पुस्तक है जिसका प्रकाशन किया है आचार्य विश्वनाथ पाठक शोध संस्थान, फैजाबाद-अयोध्या ने। 
आज का युग भोग-प्रधान है, त्याग प्रधान नहीं, राग प्रधान है, विराग प्रधान नहीं है। त्यागपूर्वक भोग की भावना क्षीण हो रही है। आवश्यकता है भारत, भारतीयता, योग, त्याग, विश्व-बन्धुत्व की पुनः समीक्षा की जाए, ताकि हमारा राष्ट्रीय गौरव उच्चपदस्थ बना रहे। ऐसी दुःदशा में भारत की विस्मृत होती सांस्कृतिक चेतना को नवस्वर देता हुआ एक मन्द्र प्रकाश सदृश आया है ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ जिसके लेखक मनीषी प्रवर विजय रंजन हैं।
समीक्ष्य ग्रंथ का श्रीगणेश गोस्वामी तुलसीदास की विनम्रता एवं स्वाभिमानपूर्ण असहमति/आपत्ति के उद्धरण के साथ होता है, जिसमें वे कहते हैं- “एतनेहु पर करिहहिं जे संका। मोहि तें अधिक ते जड़ मति रंका।।” यह चौपाई मानस (गीताप्रेस संस्करण) में इस प्रकार है -
     एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़मति रंका।।  - रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 11-12 के मध्य
गोस्वामी जी ने अपनी अल्पज्ञता स्वीकार करते हुए रामचरितमानस के पाठकों से विनम्र अनुरोध किया है कि वे उनकी विज्ञता को भी जानें-पहचानें। मेरी रचना तथा मेरे विषय में शंका न करें। यदि करते हैं तो वे मुझसे भी अधिक जड़ तथा मति-रंक हैं। इस चौपाई पर मानस-पीयूष में उत्तम टिप्पणी की गई है, जो उदाहरणीय है। बैजनाथ जी लिखते हैं कि ‘यदि कोई अभिमान सहित कोई बात कहता है तो उस पर सबको ’माष’ होता है, चाहे वह बात कितनी ही उत्तम क्यों न हो। और अमान एक साधारण मध्यम बात भी कहता है तो सुनने वाले प्रसन्न होते हैं, सामान्य लोग भी बुराई नहीं करते। अतएव, मेरी बनाई हुई श्रीरामकथा सुन कर कोई दोष न देंगे, श्रीरामचरित तो उत्तम ही है, पर मेरी अमानता भी उत्तम मानेंगे। ‘मोहिं ते अधिक’ का भाव है कि मैं तो अपने ही मुख से अपने को जड़ कह रहा हूँ पर इन सबको संसार बुरा कहेगा।’(खण्ड 1, बालकाण्ड भाग 1, पृ॰ 219)। समास में गोस्वामी जी का यही कथन है कि प्रकृत महाकृति की विषयवस्तु अत्यन्त पवित्र तथा लोकोपकारी है, अतएव, इसके कवि एवं काव्य के विषय में किसी भी प्रकार की शंका निराधार है। फिर भी यदि किसी को शंका हो तो वह मुझसे अधिक जड़ तथा मति रंक है।’ विजय रंजन ने गोस्वामी जी की उक्त चौपाई के माध्यम से स्वयं का जो निहितार्थ, विहितार्थ, लक्ष्यार्थ या व्यंग्यार्थ व्यक्त किया है, वह सुस्पष्ट है। 
आज भारत और भारतीयता के विषय में अनेक प्रश्न उठाए जा रहे हैं। ऐसे विषयों को उठाना साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना कहा जा रहा है। एक समय मगध के महामात्य चाणक्य ने भारतीयों के समक्ष कहा था कि ‘भारत एक राष्ट्र है, भारतीयता उसकी पहचान है। भारत एवं भारतीयता की रक्षा-सुरक्षा-संरक्षा हर भारतीय का प्रथम नैतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक एवं परमावश्यक कर्त्तव्य है।’ इस विचार को आधुनिक काल में पं॰ दीनदयाल उपाध्याय ने बलपूर्वक उठाया था। इस कड़ी में विजय रंजन का नाम आदर के साथ उल्लेखनीय है, उनकी शोधपूर्ण, तर्कसम्मत तथा मनन प्रमाणित पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ की रचना के कारण। 
कोई कृति कितनी सुकृति, कुकृति या अकृति है, इसका समाहार कोई विषय विशेषज्ञ ही कर सकता है। प्रकृत कृति का प्राक्कथन डॉ॰ रामकृष्ण जायसवाल ने लिखा है जो का॰ सु॰ साकेत पी॰ जी॰ कालेज अयोध्या के सेवानिवृत्त राजनीतिविज्ञान विभागाध्यक्ष हैं। डॉ॰ जायसवाल ने राजनीति, साहित्य तथा अध्यात्म क्षेत्र के अनेक सुप्रसिद्ध मनीषियों एवं मानक ग्रन्थों  के आधार पर यह सिद्ध किया है कि प्रकृत पुस्तक की विषयवस्तु चर्चित, उल्लेखनीय एवं सदैव समादरणीय रही है। राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष भारतीयता की पहचान है। विद्वान् आचार्य डॉ॰ जायसवाल ने प्रस्तुत कृति को अपने क्षेत्र में मील का पत्थर कहा है तथा शोधार्थियों के लिए नूतन चिन्तन-मनन का क्षेत्र निरूपित किया है। 
अध्यवसायी ग्रन्थकार ने पुरावृत्ति औ...र विवृति के अन्तर्गत स्वयं की रचनाधर्मिता की प्रारम्भिक पृष्ठभूमि पर समास में ही पर प्रभावकारी प्रकाश डाला है। पारिवारिक संस्कार और गुरू की शिक्षा-दीक्षा ने विजय रंजन में चिन्तन एवं लेखन के अंकुर उत्पन्न किए जो कालान्तर में कई ग्रन्थ तरुओं के रूप में सारस्वत जगत् को महिमामण्डित कर रहा है।
ग्रन्थ को दो भागों में विभक्त किया गया है, पूर्वार्चिक तथा उत्तरार्चिक। संयोग यह कि ‘अर्चिक’ शब्द आप्टे के संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश, हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित मानक हिन्दीकोश तथा डॉ॰ हरदेव बाहरी के राजपाल हिन्दी शब्दकोश में नहीं है। ‘अर्चक’ शब्द का आशय होता है ‘पूजा करने वाला’, ‘अर्चिका’ का अर्थ होगा ‘पूजा करने वाली’। ‘अर्चि’ शब्द का आशय ‘किरण’ तथा ‘ज्योति’ होता है। ‘अर्चिष्यत्’ का तात्पर्य है ‘लपट वाला’, ‘उज्ज्वल’, ‘अग्नि’, ‘सूर्य’। ‘अर्चिक’ का अर्थ ‘प्रकाश’ ही प्रकृत अर्थ में ग्रहण किया जा सकता है। प्रथम प्रकाश, द्वितीय प्रकाश यथा प्रथम दिन, द्वितीय दिन। यदि अर्चिक में ज्वुल् कर्त्ता अर्थ में (क) मानें तो अर्च् + इन् + ज्वुल् =आर्चिक होगा जैसे पावक पू + ज्वुल्। विजय रंजन ने शायद ‘पूर्वार्चिक’ का अर्थ ‘ग्रन्थ के पूर्व भाग के प्रकाश’ और ‘उत्तरार्चिक’ का अर्थ ‘ग्रन्थ के उत्तर भाग के प्रकाश’ के अर्थ में इन शब्दों को सामवेद से गृहीत किया है।
ग्रन्थ का पूर्वार्चिक आठ खण्डों में विभक्त है। उत्तरार्चिक में एक ही शीर्षक है- ‘भारत का वास्तविक स्वरूप’। परिशिष्ट में आधार ग्रन्थ एवं पत्रिकाओं की सूची दी गई है। इनमें हिन्दी भाषा के करीब 160 ग्रन्थ 17 हिन्दी पत्रिकाएँ तथा 25 अंग्रेजी भाषा के ग्रन्थ हैं। किसी भी रचना की प्रामाणिकता एवं उत्कृष्टता में इससे सम्बन्धित संदर्भ ग्रन्थों का विशेष महत्त्व होता है। इस निकष पर समीक्ष्य ग्रन्थ की मौलिकता, प्रामाणिकता एवं विश्लेषणात्मक क्षमता एवं सटीक निष्कर्ष स्थापित करने की अपूर्व क्षमता स्वयंसिद्ध है। साथ ही नवीन पाठकों एवं लेखकों को समर्पित सारस्वत तपस्या का सम्प्रेरक भी है।
ग्रन्थ की ‘प्रस्तावना’ मात्र प्रस्तावना ही नहीं है, उसके सुविचारित तथ्यों एवं तर्कों का प्रामाणिक एवं मौलिक निरीक्षण, अन्वीक्षण तथा परीक्षण भी परिलक्षित होता है। भारत क्या है ? इस शीर्षक के अन्तर्गत उन ‘महानुभावों’ को करारा जवाब दिया गया है जो भारत को साँपों एवं साधुओं का निवासस्थल मानते आ रहे हैं और जिनकी दृष्टि में भारत में यदि कुछ ज्ञान-दृष्टि है तो वह पाश्चात्य जगत् की देन है। विद्वान् लेखक ने स्मरण दिलाया है कि ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व-धरोहर घोषित किया है। अनेक पुराण अति पुराकाल से जिस भारत को ‘ज्ञानाधृत विश्वगुरु’ एवं ‘स्वर्णविहग’ कह कर वैश्विक सम्मान दे रहे हों, जिस भारत को अनेक विदेशी विद्वान् विद्या, ज्ञान, शिक्षा एवं संस्कृति का विश्वकेन्द्र घोषित कर भारतीयों की विचार-सम्पदा को ‘विश्वबन्धुत्व’ का मूलमंत्र स्वीकार कर रहे हों, उसकी महत्ता और गुणवत्ता को अस्वीकार करना अल्पज्ञता, मतिमन्दता और संकीर्ण चिन्तना नहीं तो और क्या कहा जाएगा ?
 भारत की प्रतिष्ठा इसलिए नहीं रही कि यह विशिष्ट प्राकृतिक भूखण्ड है, प्रत्युत इसलिए रही है और रहेगी कि भारत कर्मभूमि है जबकि शेष पृथ्वी के खण्ड-प्रखण्ड, भाग-विभाग भोगभूमि हैं। विष्णुपुराण का कथन है कि ‘हे महामुनि, जम्बूद्वीप में भारतवर्ष सबसे अच्छा है क्योंकि यह कर्मभूमि है और इसके अतिरिक्त शेष भोगभूमि है (विष्णुपुराण, 2.3.22) - 
अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने। 
यतो हि कर्मभूरेषां ह्यतोऽन्याभोगभूमयः।। 
भारतभूमि की महत्ता के विषय में नारदपुराण का अभिमत है कि ‘आज भी देवगण भारतभूमि में जन्म लेने की इच्छा करते हैं (पूर्वभाग 3.52) -  “अद्यापि देवा इच्छन्ति जन्म भारतभूतले।“ 
सरदार पटेल ने भारत की अन्तरात्मा का दिग्दर्शन करते हुए कहा है कि-  “हमारी भारत-भूमि की एक बड़ी विशेषता है कि यहाँ चाहे जितने उतार-चढ़ाव आएँ, तो भी पुण्यशाली आत्माएँ यहाँ जन्म लेती ही है (सरदार की अनुभव-वाणी, पृ॰ 109)।“  भारत में ंजन्मी पुण्यशाली आत्माओं ने विश्व को शान्ति तथा प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया है। भारत एक आयुषदाता के रूप में प्रसिद्ध है। जयशंकर प्रसाद का विचार है -      
“अरुण यह मधुमय देश हमारा, 
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।” 
                                    - चन्द्रगुप्त द्वितीय अंक
अपने सुख के लिए तो सभी जीते हैं, पर दूसरे के सुख के लिए यदि कोई परिश्रम करे तो वह ही धन्य है। व्यष्टि समष्टि का ही प्रतिनिधि है इसीलिए व्यक्ति का विश्व की उन्नति हेतु समर्पित रहना उसका मानवीय गुण है। वृन्दावनलाल वर्मा लिखते हैं कि - “यह हमारे देश का सौभाग्य है कि अति पतनोल्मुखी युग में भी महान् नर-नारी हुए हैं, जो मार्गदर्शन करते हुए अपनी छाप छोड़ गए।”  (देखें ‘माधवजी सिन्धिया’, भूमिका)।
आम लोग भारत को पिछड़ा देश मानते हैं, जिसका कोई इतिहास नहीं, संस्कृति नहीं। परन्तु उन्हें राहुल सांस्कृत्यायन का यह वाक्य सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जिसमें वे कहते हैं कि - “भारत जैसी मातृभूमि पाकर कौन अभिमान नहीं करेगा ? यहाँ हजारों चीजें हैं जिन पर किसी को भी अभिमान होना ही चाहिए (घुमक्कड़शास्त्र)। 
विश्व में अनेक सभ्यताएँ आईं और चली गईं, उन्हें काल ने भुला दिया पर महाकाल ने भारतीय संस्कृति, सभ्यता तथा इस देश को अपने भाल का तिलक बना लिया। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का विचार है कि केवल भारत ही एक ऐसा देश है जिसका अतीत कभी मरा नहीं। भारत का अतीत कल भी जीवित था आज भी जीवित है और आगे भी जीवित रहेगा।” (देखें संस्कृति के चार अध्याय, पृ॰ 83)। 
उदारीकरण और वैश्वीकरण के युग में राष्ट्र-चेतना नगण्य-सी हो गई है जिसे कथमपि उचित नहीं कहा जा सकता। डॉ॰ सम्पूर्णानन्द ने ठीक ही लिखा है कि “भारतीय बुद्धिवादी यदि स्वयं में, अपने राष्ट्र में और समूची मानवता में जिसका कि हमारा राष्ट्र एक अभिन्न अंग है, श्रद्धा उत्पन्न करें तो इस श्रद्धा के सहारे वे अपने राष्ट्र तथा उसके द्वारा सम्पूर्ण विश्व की पुनर्रचना करने में समर्थ हो सकेंगे। “ (अधूरी क्रान्ति, पृ॰ 26)। राष्ट्र के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करना ही राष्ट्रीय चेतना, स्वदेश-प्रेम है।
ग्रन्थ में प्रस्तुत भारत, भारती, भारतीय तथा भारतीयता शब्दों की विविध विधि-विवेचना विद्वानों तथा विद्यार्थियों हेतु सर्वथा उपयोगी है। 
ग्रन्थकार ने ‘भारत-नामकरण के मूलभूत आधार’ की शोधपूर्ण मीमांसा करके यह मत स्थापित किया है कि “भारतवर्ष के नामकरण में अग्नि को स्थान नहीं दिया गया, अपितु अग्नि का तेज और तज्जनित सात्त्विक ऊर्जस्विल प्रकाश सूर्य में पूर्णतया समेकित पाकर ऐसे प्रकाश को सूर्य द्वारा प्रदान किए जाने के आधार पर भारत देश के नामकरण (भा$रत) में सूर्य को न केवल सम्मिलित किया गया, वरन् सम्पूर्ण भारत प्रथमतया सूर्योपासक हो गया।“ (पृ॰ 27) 
‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’ शीर्षक में वैदिक, पौराणिक, दार्शनिक, साहित्यिक ग्रन्थों वाल्मीकि-रामायण तथा महाभारत की परिधि में सम्बन्धित विषयक का गहन एवं गम्भीर परिशीलन किया गया है जो मौलिक चिन्तन, व्यापक स्वाध्याय तथा प्रामाणिक लेखन का प्रमाणपत्र है। 
‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ शीर्षक में उन अनेक नामों का उल्लेख किया गया है, जो भारतवर्ष के लिए प्रयुक्त होते हैं। इन नामों की एक लम्बी सूची है जिस पर यथातथ्य विचार-विश्लेषण की गम्भीरता’ को प्रदर्शित करते हैं। ये नूतन एवं मौलिक सूचनाएँ-जानकारियाँ शोध की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 
‘भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि’ शीर्षक के अन्तर्गत भारतवर्ष के साथ ही ‘आर्य जाति’, ‘आर्य इतिहास’, ‘आर्य संस्कृति’ तथा ‘आर्ष ग्रन्थों’ पर मीमांसात्मक प्रकाश डाला गया है, जो भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। प्रत्येक भारतीय को आर्य सम्पदा की   विविधता पर गर्व होना ही चाहिए। 
‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्रविस्तार’ शीर्षक सुचिन्तित तथा श्रमशील सारस्वत तपस्या का संकेतक है। ग्रन्थकार ने अनेक सुप्रतिष्ठ, अल्पज्ञात तथा अद्भुुत ग्रन्थों का पारायण तथा परिशीलन कर सम्बद्ध विषय का कुशलतापूर्वक प्रतिपादन किया है। यह अध्याय आत्मचिन्तन की प्रेरणा देता है जिसमें वे कहते हैं कि “यदि प्राचीन भारतवर्ष की विशालता को अस्वीकार करें, तो भी प्राचीन यूनानी इतिहासकार मेगास्थनीज़ के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के पूर्व भारत में राजागणों की विभिन्न 154 पीढ़ियाँ 6451 वर्ष 3 माह राज कर चुकी थीं, जिनका राज-विस्तार अति विस्तृत क्षेत्र तक व्याप्त था।” (पृ॰ 74) भारत की भौगोलिक सीमा एवं उसके नाम प्रासंगिक हैं। 
‘भारत एक प्राचीन राष्ट्र’ शीर्षक के अन्तर्गत भारत की प्राचीनता के अनेक प्रामाणिक साक्ष्य मजबूती में प्रस्तुत किए गए हैं। इन साक्ष्यों में भारत तथा विदेशों के विविध ग्रन्थों एवं महापुरुषों के वक्तव्यों का आधार बनाया गया है। ग्रन्थकार ने विविध साक्ष्यों की समीक्षा करने के अनन्तर यह स्थापना सुनिश्चित की है कि “  ‘स्वायम्भुव मनु’ के समय अर्थात् आज से 10,000-11,000 वर्ष पूर्व (या सम्भवतः और अधिक प्राचीन कालखण्ड में) जब विश्व के अन्यान्य देशों/राष्ट्रों का अस्तित्व भी नहीं था, उस समय सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्वरूप में अस्तित्वमान हुआ था भारत राष्ट्र का राष्ट्रत्व।“ (पृ0 126)  भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र उसे सदैव प्रतिष्ठा दिलाता रहा है तथा दिलाता भी रहेगा। इस परिप्रेक्ष्य में ‘भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ शीर्षक नवीन जिज्ञासाओं को जन्म देता है। 
समीक्ष्य कृति का उत्तरार्चिक, ‘भारत का वास्तविक स्वरूप’ शीर्षक से अभिहित है। ग्रन्थकार विजय रंजन की समीक्षाग्राहिणी क्षमता, नीर-क्षीर विवेचिनी प्रतिभा तथा सत्यान्वेषण की योग्यता ने इस प्रकरण को सुरुचिपूर्ण तथा पाण्डित्यपूर्ण बना दिया है। उसकी यह मान्यता मननीय है कि भारत का मृण्मय स्वरूप  भारत का अन्नमय कोश है। यहाँ का भारतत्व (भा $ रतत्व अर्थात् ज्ञानरूपी प्रकाश प्रत्यक्ष करने वाली सतत निरतता वाली प्रवृत्ति) भारत का प्राणमय कोश है। इसी प्रकार यहाँ का भारतीत्व (भारती$त्व अर्थात् भास्वद् सारस्वत चिन्मयता)  भारत का मनोमय कोश है और वेदोंपनिषद्, दर्शन, योग, अध्यात्म से आच्छादित शिवत्व$रामत्व$कृष्णत्व वाली विशिष्ट ऋता वस्तुतः भारत का विज्ञानमय कोश है। (पृ॰ 131)
कृति में प्रदीप्त एक गम्भीर अध्येता, अधिवक्ता विजय रंजन का विशिष्ट प्रवक्ता रूप पाठकों को समाकर्षित करता है। भारतीय नागरिकों में राष्ट्रगौरव की भावना को परिपुष्ट करने में इस ग्रन्थ का कालजयी योगदान रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। निस्संदेह है यह भी कि जो विद्यार्थी भारत तथा भारतीयता पर प्रभूत शोधात्मक नवीन जानकारी चाहते हैं, उनके लिए यह ग्रन्थ प्रकाशस्तम्भ सदृश है। जो विद्वान् भारतीय विद्या, शिक्षा और ज्ञान को आत्मसात् करना चाहते हैं, उनके लिए यह ग्रन्थ मार्गदर्शक है तथा जो भारत को पुनः विश्वगुरु तथा स्वर्णविहग के रूप में प्रतिष्ठिापित करना चाहते हैं, उनके लिए प्रेरणास्रोत है।           
          -पटेल नगर, कादीपुर, सुल्तानपुर, दूरभाष: 9532006900
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 भारतीयता की पहचान बताती
 ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                                 - सुनील कुमार
भारत के इतिहास के अथाह समुद्र में रहस्य एवं ज्ञान के अनगिनत मोती छिपे हुए हैं। यह आज भी अनेकानेक प्रश्नों का विषय बना हुआ है। इन सभी प्रश्नों को स्वस्थ दिशा एवं प्रमाण-प्रमा आधारित तार्किक उत्तरों से हल करने का प्रयास स्वतंत्र लेखक विजय रंजन ने किया है अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ के द्वारा। इस पुस्तक का प्रकाशन आचार्य विश्वनाथ पाठक शोध संस्थान, फैजाबाद, अयोध्या से हुआ है। 
यह पुस्तक ‘भारतीय’ होने के सही अर्थ को समझाती है। भारत के मूल में जन-कल्याण की भावना है। यही भावना यहाँ भारतीयता की नींव रखती हुई नजर आती है। वास्तव में सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की भावना ही भारतीयता को जन्म देती है। इस संबंध में डॉ॰ रामकृष्ण जायसवाल लिखते हैं- “अनेक मत-मतांतरों के बावजूद भी भारत में एकरूपता की स्थापना हुई है। सभी धर्मों (पंथ/मजहब नहीं) के मूल में ‘सर्वजनहिताय’ की भावना का समावेश है। धर्म-ग्रंथों में आदि से लेकर अंत तक कहीं भी विषमता के बीज का उल्लेख नहीं है। सभी का उद्देश्य जनकल्याण है और सभी एक स्थान पर जहाँ-जहाँ मिलते हैं, उन अनेकानेक क्षितिजों पर एक ही बात है- विषमता का अंत और सभी का मंगल। सहनशीलता, नैतिकता, सात्त्विकता, समन्वयवाद, समग्रता, मर्यादा, सर्जनात्मक्ता आदि सभी भारत के मूल में समाविष्ट हैं। इस प्रकार भारत ‘भारतत्व’ और ‘भारतीत्व’ से संपुष्ट है।” (पृ॰ 10)। 
भारत देश में लिखने के लिए सैंकड़ों-हजारों विषय हैं लेकिन भारत को ही विषय बनाकर लिखना सरल काम नहीं है। ऐसे जटिल विषय को ध्यान में रखकर लिखने का साहस भरा महत्त्वपूर्ण बीड़ा लेखक विजय रंजन जी ने उठाया है। लेखक और पुस्तक के सम्बन्ध में डॉ॰ जायसवाल आगे लिखते हैं- ‘भारत को विषय मानकर उस पर इतनी गवेषणा करना, चिंतन और मनन करना, विश्व के अनेक देशों के साहित्य का अध्ययन एवं विश्लेषण कर तथा प्राचीन भारतीय साहित्य से लेकर आधुनिक भारतीय साहित्य के साथ उसका सामंजस्य स्थापित करके अपने ढंग से प्रस्तुत करना सचमुच एक ऐसा कार्य है जिसे सामान्य लेखक नहीं कर सकता। यह तो एक असाधारण लेखक और मनीषी व्यक्ति ही कर सकता है।’ (पृ॰ 11)।
भारत की नींव में सदियों का इतिहास छिपा हुआ है। कई मनीषियों, विद्वानों ने भारत के गूढ़ इतिहास पर से काल की धूल को हटाने का प्रयास किया है। ऐसा ही महत्त्वपूर्ण लेखन-कार्य विजय रंजन जी ने भी इस पुस्तक के माध्यम से किया है।
पुस्तक-लेखन के क्रम में आने वाली समस्याओं से लेखक बहुत अच्छी तरह परिचित नजर आते हैं। पुस्तक-अध्ययन के क्रम में लेखक की सूझ-बूझ एवं गहन अध्ययन को कृति में सर्वत्र देखा जा सकता है। भारत के वैदिक काल से लेकर भारत की आज तक की स्थिति को लेखक ने पुस्तक में स्थान दिया है। इस संबंध में लेखक की स्वीकारोक्ति को देखा जा सकता है- 
“ ‘कृति-विरचना के संबंध में अग्रांकित उल्लेख भी वांछनीय है। यथा-  भारत का आदि-प्रत्यय जो सर्वाधिक तर्कसंगत और सर्वाधिक समुपादेय है, वह वैदिक वाङ्मय में है। आविश्व सर्वप्रथम ऋक् में प्रयुक्त शब्द है भारत। तथैव, वैदिक मनीषियों को नमन करते हुए अपनी पूर्वपरित कृतियों के अनुसरण में इस कृति के विभिन्न अध्याय भी वैदिक परम्परा में ‘पूर्वाचिक’ एवं ‘उत्तरार्चिक’ प्रभागों में प्रस्तुत किए गए हैं।” (पृ॰17)। पुरावृत्ति औ...र विवृत्ति, प्रस्तावना सहित पुस्तक में कुल दस अध्याय हैं। 
प्रथम अध्याय में लेखक ने भारत के नामकरण के मूलभूत आधारों की चर्चा की है। भारत के पूर्व समय में कई नाम थे। उसके बाद इस भूखण्ड का नाम भारत पड़ा। इस सम्बन्ध में लेखक लिखते हैं- “ देवी भारती से भारतवासियों के संयुजन के आधार पर ऐसे निवासीजन (भारती$य) के निवासीय भू-भाग को ‘भारत’ नाम दिया जाना भी तर्कसंगत है औ...र  यह तर्कसंगतता इतनी सबल/सशक्त है कि उसके सम्बल से वस्तुनिष्ठ भारतीय उसे ही माना जा सकता है जो देवी भारती के सद्गुणों से आसिक्त (अथवा कम से कम उनके प्रति सश्रद्ध) हो।” (पृ॰ 33)। लेखक ने इस अध्याय में भारत के नामाधार के इतिहास को विस्तृत रूप से व्याख्यायित किया है। गहन एवं गंभीर अध्ययन के पश्चात् लेखक ने विद्वता का परिचय दिया है। वैदिक ग्रंथों से लेकर पौराणिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथों में वर्णित तथ्यों को लेखक ने सामान्य पाठकों तक इस पुस्तक के माध्यम से प्रेषित किया है। 
भारत एवं भारतीयता की पड़ताल करते हुए लेखक ने इसके क्षेत्र एवं सीमा-विस्तार के बारे में भी लिखा है। सीमा-विस्तार का वर्णन करते हुए उन्होंने इसकी संस्कृति एवं परम्परा की समृद्धि पर भी अपनी पैनी दृष्टि डाली है- “ हमारा प्राचीन राष्ट्र भारत आर्यान् (ईरान) के पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी तक, हिमालय से दक्षिण में हिन्द महासागर के उत्तरी क्षेत्र तक विस्तृत रहा है। इस विस्तृत भू-क्षेत्र में विभिन्न स्थलों पर निषाद, द्रविण, किरात संस्कृति के परम्परागत अवशेष विद्यमान रहते हुए भी इन संस्कृतियों के आर्य संस्कृति से समरस हो जाने के फलस्वरूप संपूर्ण भारतभूमि आर्यभूमि ही मानी जाती रही। ” (पृ॰ 69)। लेखक ने ऐतिहासिक ग्रंथों में वर्णित भारत के यश तथा इतिहास को केवल स्वीकार ही नहीं किया है, वरन् इसका तर्कसम्मत विवेचन भी किया है। तर्क एवं मीमांसा की कसौटियों पर कस कर ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ पुस्तक और भी महत्त्वपूर्ण रूप प्राप्त करती है। 
अकस्मात् एवं अचानक ही कोई भूखण्ड राष्ट्र नहीं बन जाता है। भूखण्ड को राष्ट्र बनने की प्रक्रिया सदियों की होती है। प्राचीन राष्ट्रों की बात की जाए तो भारत विश्व में प्राचीनतम राष्ट्र है। 
भारत की सभ्यता-संस्कृति भी काफी प्राचीन है। इसका प्रमाण हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की सभ्यता है। इन प्राचीन सभ्यताओं ने भारत के गौरवशाली इतिहास को समृद्ध किया है। 
राष्ट्र का गौरव तभी बढ़ता है जब वहाँ पर रहने वाले लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का बराबर संचार होता रहे। उनमें राष्ट्रीयता की भावना का होना आवश्यक है। इन्हीं भावनाओं से मिलकर भारत राष्ट्र की अखण्डता को शक्ति मिलती है। इस पर लेखक लिखते हैं- “ किसी राष्ट्र को राष्ट्र बनाने के लिए, राष्ट्र को राष्ट्र बनाए रखने के लिए मात्र रहवासी/निवासी (कथित नागरिक) ही वांछनीय नहीं है। अपितु सभी रहवासी/निवासी गण (वे कस्बा, नगर महानगर के हों अथवा ग्रामीण अंचल के) के आचार-व्यवहार में सम-मनस्क राष्ट्र-भाव और इस भाव के प्रति मम का बोध आवश्यक है। राष्ट्र सर्वोपरि है का भाव यदि समस्त राष्ट्रवासियों में व्याप्त हो जाए तो राष्ट्र बहुविधि सबल, अटूट एवं स्थायी हो जाएगा।” (पृ॰ 87)। 
भारत एवं भारतीयता के मूल में यहाँ की संस्कृति, परम्परा एवं ओज है। विभिन्न धर्मों एवं मतानुयायियों ने ‘सर्वजन हिताय’ एवं ‘सर्वजन सुखाय’ का मंत्र लेकर भारत को समृद्ध किया है। लेखक की सूक्ष्म दृष्टि इस ओर भी पड़ी है-  
“.....विविध सद्गुणों का समुच्चय ‘राष्ट्रीय चरित्र’ बन गया भारतीय जन का। वास्तव में यही भरतत्व, भारतत्व, भारतीत्व, शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व ही भारतीयता का मूलाधार है जो युग-युगों तक भारत का राष्ट्रीय संस्कारिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक संबल बना रहा और न्यूनाधिक रूप में आज भी बना हुआ है। बाद में जैनतीर्थंकरों के सम्प्रभाव के कतिपय समरैखिक सद्शील: अहिंसा आदि पर तथा गौतम बुद्ध के तपः-प्रभाव में चरम शान्ति एवं परम सौहार्द पर बलाघात से अहिंसा, परम शान्ति, सामाजिक सौहार्द सदृश तत्त्व भी राष्ट्रीय स्तर पर समेकित हो गए भारतीय राष्ट्रीय संस्कारों में।” (पृ॰ 99)। 
लेखक ने इन सभी तत्त्वों को सामने रखकर भारतीयता जैसे विस्तृत विषय पर लेखन किया है। 
प्रस्तुत पुस्तक ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ में लेखक विजय रंजन जी ने भारत एवं भारतीयता से सम्बन्धित गूढ़ एवं अनकहे रहस्यों एवं तथ्यों की ओर संकेत किया है। 
पुस्तक एक ऐसे अभीष्ट की ओर पाठक को ले जाती है जहाँ से भावधारा का वापस आना संभव नहीं होता। उसे लगता है कि इसकी अतल ज्ञान गहराई में और नीचे उतरना है। वाकई में अतल गहराई में अनबुझे पहलुओं का ज्ञान भण्डार समाहित है पुस्तक में। इसीलिए पुस्तक अध्येताओं को अपने से बाँधे रखती है। 
यह पुस्तक भारतीयता एवं राष्ट्रीयता को जानने समझने के लिए उपयुक्त दस्तावेज है। अध्येताओं के लिए यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।
- हिन्दी विभाग, नेहू , शिलांग-793022, मेघालय,  दूरभाष: 8617301842                
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 भारत और भारतीयता को समझने की महत्त्वपूर्ण पुस्तक

                     क्या है भारत क्या है भारतीयता 
                        - अजित कुमार   
‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ मात्र एक विचारपूर्ण ग्रन्थीय साक्ष्यों द्वारा प्रमाणित पुस्तक ही नहीं, बल्कि भारत और भारतीयता को जानने एवं समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जिसके रचनाकार विजय रंजन हैं। 
यहाँ पर पुराने साक्ष्यों से मेरा तात्पर्य प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रन्थों से है। भारतीय धार्मिक ग्रंथ- मत्स्यपुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण, शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद, रामायण, महाभारत आदि कई ग्रन्थों के माध्यम से लेखक ने भारत और भारतीयता समझने एवं समझाने का प्रयास किया है। इस पुस्तक का शीर्षक देख कर ही पता चल जाता है कि लेखक का मन्तव्य क्या है और किस ओर है। 
इस पुस्तक को विजय रंजन जी ने तीन खण्डों में विभक्त किया है- प्रथम-  पूर्वाचिक, द्वितीय-  उत्तरार्चिक और तृतीय-  परिशिष्ट।  
‘भारत-नामकरण के मूलभूत आधार’ शीर्षक में विजय जी ने ‘भारत-नामकरण कैसे और क्यों पड़ा’ पर बल देते नजर आते हैं। लेखक का मानना है कि जिस देश में नामकरण की सुन्दर एवम् पावन परम्परा हो उस देश का नाम अनायास नहीं रखा गया होगा। भारत-नामकरण के पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्य ही होगा। भारत-नामकरण के मूलभूत आधार में भा$रती, भारती$य, भा$रत जैसे शब्दों को केंद्र में रखकर भारत नाम को परिभाषित किया गया है। इस पुस्तक में भारत-नामकरण और इसके भारती होने के पीछे देवी सरस्वती को कारण माना गया है। ज्ञान की देवी सरस्वती से ही इसका नाम भारत पड़ा ऐसा लेखक का मानना है। देवी सरस्वती की आराधना और उनके समतुल्य किन-किन देशों में कौन-कौन सी देवी है इस पर भी प्रकाश डाला गया है। 
भारत का नाम देवी सरस्वती के नाम पर ही रखा गया है, इसे परिभाषित करते हुए विजय रंजन ने अपनी किताब ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ में लिखा है, “भारत राष्ट्र का नाम ‘भारत’ ‘सरस्वती’ नदी के नाम से नहीं, अपितु ‘देवी सरस्वती/भारती’ के गुणों से भारतवासियों के सहयुजन के आधार पर नामकृत किया गया था जिनकी (देवी सरस्वती /भारती की) भरपूर वन्दना आराधना है ऋक् में।”(पृ॰सं॰ 32)। कुल मिलाकर देखा जाए तो देवी सरस्वती से जोड़कर भारत को देवी भारती से सम्बन्धित माना गया है। 
‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’ में भारत-वर्ष का नाम किस भरत के नाम पर रखा गया है, इसके ऊपर बहुत ही सूक्ष्म विवेचन किया गया है। आखिरकार मन के अन्दर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है कि वह भरत कौन हैं जिनके नाम पर भारत का नाम ‘भारत’ पड़ा। सच तो यह है कि बहुत घचपच है भारत नाम को लेकर कि किस भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। कई सारे धार्मिक ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख जम्बूद्वीपे- भरतखण्डे का उल्लेख मिलता है। भारतवर्ष नाम पर विवेचन करते हुए विजय जी लिखते हैं, “... स्वायम्भुव मनु (ब्रह्मा जी के दसवें मानस-पुत्र) के दो पुत्र हुए थे- प्रियव्रत और उत्तानपाद। प्रियव्रत के पुत्र थे अग्नींध्र। अग्नींध्र के पुत्र थे नाभि। नाभि के पुत्र थे ऋषभदेव। ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र का नाम था भरत। पुराणों के अनुसार इन्हीं पौराणिक ऋषभदेव के पुत्र भरत ही प्रथम चक्रवर्ती थे। उन्होंने विशाल भू-क्षेत्र और तत्कालीन विद्यमान केरल, गांधार, केकय, अंग, बंग आदि राज्यों को  जीतकर प्रथम बार विशाल संगठित सार्वभौम राज्य स्थापित/संघटित/सुगठित किया जिसे ‘भारत’ कहा गया।” (पृ॰ सं॰ 38) इस प्रकार ऋषभदेव जो मनु के वंशावली में आते हैं, उन्हीं के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष नाम भारत का रखा गया प्रतीत होता है।
‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ के अन्तर्गत लेखक विजय रंजन ने भारत को अन्य नाम जैसे हिन्दुस्तान, हिन्दूस्थान, हिन्दोस्थान, भारत, इण्डिया, देवभूमि आदि का अवलोकन किया है। लेकिन इन सभी नामों को छोड़कर यदि लेखक का ध्यान कहीं केन्द्रित है, तो वो है हिन्दूस्थान, इण्डिया, हिन्दूस्थान पर। इसके साथ ही भारत को विदेशियों द्वारा प्रदत्त नामों पर भी प्रकाश डाला गया है। विदेशियों द्वारा पुकारे गए नाम को बहुत सूक्ष्मता से तोड़-तोड़ कर उसका मूल्यांकन विजय रंजन ने किया है। वे इण्डिया को छोड़कर बाकी सभी नाम जैसे- आर्यभूमि, हिमवर्ष, अजनाभ वर्ष, ब्रह्मावर्त, देवभूमि, देवकृत योनि क्षेत्र, सप्तसिंधु, याज्ञिक भूमि, सभ्यता की भूमि, जम्बूद्वीप-भरतखण्ड,  देवरात् भारत, देवश्रवा भारत, कुमारीद्वीप, हिन्दूस्थान, हिन्द आदि को भारतवर्ष का पर्यायवाची मानते हैं लेकिन इण्डिया को नहीं। 
‘भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि’ भारत का आर्यभूमि नाम से भी कई धार्मिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है। वैसे ‘आर्य’ शब्द का अर्थ होता है श्रेष्ठ। इसे गुणवाचक माना गया है। ‘आर्य’ शब्द को लेकर कई सारी भ्रांतियाँ भी हैं। इन भ्रान्तियों का निराकरण करते हुए विजय रंजन जी लिखते हैं, “आर्य शब्द मूलतः मानव-समाज की किसी ‘जाति’ के अर्थ में नहीं, अपितु ‘श्रेष्ठ सात्त्विक, रचनाधर्मी गुणों से सम्पन्न मानव’ के लिए प्रयुक्त होता था। किन्तु कालान्तर में रूढ़िगत होने पर ‘आर्य’ शब्द श्रेष्ठतावाचक होने के सम्बल से श्रेष्ठ गुणों वाले मानव-समुदाय के लिए मानव-जाति के सादृश्य अर्थ में उपभुक्त होने लगा।” (पृ॰ सं॰ 65)। विजय रंजन ये भी मानते हैं कि आर्य किसी जाति-विशेष का नाम नहीं है। इसके पक्ष में पाश्चात्य विद्वान् एन॰ सी॰ स्टीफन और भारतीय विद्वान् दयानन्द सरस्वती, डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर आदि के मत प्रस्तुत करते हैं। 
‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार’ में प्राचीन वाङ्मयों के माध्यम से भारत को अन्य देशों के अस्तित्वमान् होने के बहुत पूर्व विद्यमान सिद्ध करते हुए भारतवर्ष के क्षेत्रीय विस्तार को रेखांकित किया गया है। रचनाकार वर्तमान के अनेकानेक देशों को प्राचीन भारत का हिस्सा एवं अनेक देशों को तत्कालीन भारत द्वारा प्रभावित भी बताते हैं। यह सभी तथ्य महाभारत, रामायण, रघुवंशम् आदि ग्रन्थों में उल्लिखित हैं। 
‘भारतवर्ष एक प्राचीन राष्ट्र’ अध्याय में भारतवर्ष को लेखक ने प्राचीनकाल से ही राष्ट्र की संज्ञा से विभूषित होना बताया है। इस संज्ञा के पुष्टि के लिए वे भारतीय एवं विदेशी निकषों को उद्धृत करते हैं। विजय जी मानते हैं कि अन्य देशों के अपेक्षाकृत भारत बहुत पहले से ही एक राष्ट्र का रूप है। राष्ट्र के लिए जो तत्त्व निर्धारित माने जाते हैं, वे सभी भारत में प्राचीनकाल से ही निहित हैं, इसीलिए भारत एक प्राचीन राष्ट्र है। वे राष्ट्र के मजबूतियों को परिलक्षित करते हुए कहते हैं, “ ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’ का भाव यदि समस्त राष्ट्रवासियों में व्याप्त हो जाए, तो राष्ट्र बहुविध सबल, अटूट एवं स्थाई हो जाएगा।” (पृ॰ सं॰ 87) किसी भी देश और राष्ट्र के स्थायित्व और शक्तिशाली होने के लिए ये सभी अवयव आवश्यक हैं। 
‘भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ अध्याय में विश्व में भारत को सर्वश्रेष्ठ बताने का एक सार्थक प्रयास देखने को मिलता है। भारत देश के वे कौन से तत्त्व हैं जिनके नजरिए से अन्य देशों के अपेक्षा इसे उदार और अच्छा बनाता है, उसका रेखांकन इस पुस्तक में देखा जा सकता है। दया, धर्म, संस्कृति और परोपकार आदि भावनाओं का नाम है भारत। इसमंे शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व, बुद्धित्व, जिनत्व के माध्यम से भारतीयता को देखा जा सकता है। भारत के बहुलांश जन-समुदाय जिसमें आस्थावान् हैं, भारतीयता को उसी  दृष्टि से चिह्नित करना चाहिए, ऐसा लेखक का विचार है। वैसे भी भारतवासी भले ही दीनता-हीनता से गुजर-बसर करते हों, लेकिन उनका लगाव भारत राष्ट्र के प्रति सदियों से दृश्यमान है। यहाँ के दलित, आदिवासी और किसान जीवनयापन करने में भले ही अक्षम रहे हों, किन्तु अपने राष्ट्र के प्रति कभी भी विद्रोही नहीं हुए हैं। पूर्णतः सत्य यह तथ्य ही भारत की ताकत है। 
‘भारत का वास्तविक स्वरूप’ में हेलियोडरिस मिनिण्डर, जहाँगीर, दारा-शिकोह, थोरो, शोपेनहावर, एस॰ जॉनसन, विलियम जोन्स, रोम्या रोलां, अबे डर्बोई, कामिल बुल्के, बिल ड्यूरा, कोक्को सोमा, तोशिको बोस (रासबिहारी बोस की पत्नी) मारग्रेट कंजिस, एलिजाबेथ नोबेल आदि अनेक विदेशी लोगों की चर्चा मिलती है, जो भारत के प्रशंसक रहे हैं। इसके साथ ही एकात्म भारत, शाश्वत भारत, चिन्मय भारत, मृण्मय भारत के अस्तित्वमान् होने के तथ्य की स्थापना भी लेखक ने की है। 
इस पुस्तक को विजय रंजन जी ने बहुत ही परिश्रमपूर्वक लिखा है। इसके लेखन के पूर्व लेखक ने भारतीय धार्मिक ग्रन्थों के साथ-साथ भारतीय साहित्य का भी अवलोकन किया है। भारतीय धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन का ही प्रतिफलन है कि इस पुस्तक की भाषा अन्य पुस्तक से भिन्न हो गयी है लेकिन फिर भी इसकी भाषा की बुनावट अच्छी और सार्थक है। भारत-नामकरण और भारत के विषय में विस्तार और गहराई से जानने की दृष्टि से इतिहास के अलावा इस पुस्तक को भी देखा जाना चाहिए, ऐसा मेरा मत है।- - पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग, (मेघालय)
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   क्या है भारत क्या है भारतीयता 
  पुस्तक पढ़ना आवश्यक

                - डॉ॰ ममता तिवारी
कृतिकार विजय रंजन की उपर्युक्त कृति का शीर्षक लुभाता है। कृति के पूर्व कथन में यह स्पष्ट हो गया कि लेखक ने अपने महत्त्वपूर्ण दिनों में जटिल पुस्तकों, ग्रंथों का न सिर्फ अध्ययन किया बल्कि उन्हें आत्मसात् भी किया। भारत के भारत-नामकरण के मूलभूत कारण को उन्होंने इतने सलीके और विस्तृत तरीके से वर्णित किया है कि आपको ‘इण्डिया’ और ‘हिन्दोस्तान’ से परहेज करना होगा। लेखक ने भारत नाम में जो सूर्य को स्थान देकर नामकरण स्प्ष्ट किया है, वह विचारणीय है। शायद इसीलिए अनजाने में ही सही, सूर्य के लिए हम भारतीय खिंचाव महसूस करते हैं। भारतीयता के लिए ऋक्-वंद्य देवी सरस्वती को स्थान को स्थान दिया गया। लाला सीताराम का ‘अवध का इतिहास’ भारतीय नागरिकों को ‘भारत गण’ सम्बोधित करता है; दुष्यन्त के पुत्र भरत, दशरथ-पुत्र भरत के नाम पर कुछ विचारकों ने भारत का नाम भारत सिद्ध करने की कोशिश की है; मनु ने भारत की जनता को भारती-प्रजा कह कर सम्बोधित किया है; हालाँकि आर्य जनजाति भरत उत्तरापथ तक बिखर गई थी; पुराणों के अनुसार ऋषभदेव के एक पुत्र का नाम भरत था; बौद्ध मनीषी भारत को जम्बूद्वीप कहते थे; विदेशियों ने भारत को इण्डस नदी से शुरु करके कैसे हिन्दुस्तान और इण्डिया में परिवर्तित किया; आदि-आदि। इनके लिए लेखक ने प्रमाणों के साथ अद्भुत एवं विस्तृत प्रमाण पेश किए हैं। 
इसके पश्चात् भारत को आर्यभूमि क्यों कहा गया, इसका भी प्रामाणिक उदाहरण पेश किया गया है। ‘आर्य’ का अर्थ ‘श्रेष्ठ गुणों वाला’ माना गया है; 10-11 हजार वर्ष पूर्व ऋक् काल से ही भारत एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुका था; प्रथम राष्ट्राध्यक्ष पृथु थे-- जैसी गहन गम्भीर अज्ञात बातों से रूबरू होना अद्भुत है। 
लेखक ने अपनी अग्रांकित बातों को भी प्रमाणों से प्रमाणित करने की सफल कोशिश की है। जब सीता की खोज सात महाद्वीपों में करने के लिए सुग्रीव वानरों को आदेश देते हैं, उससे तत्कालीन भारत का विस्तार समझा जा सकता है; महाभारत, कालिदास का रघुवंशम् ‘आसमुद्रक्षितीशानाम्’ के अनुसार 9 द्वीपों के बीच के समुद्री क्षेत्र पर भी भारत का ही आधिपत्य था; आचार्य चतुरसेन शास्त्री, रोमिला थापर ने प्रामाणिक तौर पर भारत के विस्तार का उल्लेख किया; अन्य देशों की संस्कृति का समाहित होना, उनको स्थान देना भारत में एक नई संस्कृति को जन्म देता है। लेखक के अनुसार इन सभी संस्कृतियों के समागम से एक नई संस्कृति का जन्म हुआ, जो हमारी भारतीयता है। लेखक ने इनका विस्तृत विवरण दिया है। उन्होंने केवल भूमि नहीं बल्कि संस्कृति, रीति-रिवाज, वेशभूषा, भाषा, भूगोल, नदियों, पहाड़ों, राजनीतिक परिवर्तनों, धार्मिक एकता, भारत की सहृदयता, करुणा, सबको विस्तृत ढंग से बताने की कोशिश की है और ‘गागर’ में सागर भर दिया है। गाँधी जी की अंग्रेज शिष्याएँ, ऐनी बेसेन्ट, मोहम्मद बिन शहरयार, तमाम सूफी संत, शायर फिराक साहेब, अज्ञेय ना जाने कितने ज्ञानियों का वास हुआ भारत की धरती पर। अंत में लेखक ने राजी करवा ही लिया कि हमारा देश भारत है और हमारी संस्कृति भारतीयता है। 
यह कहना आवश्यक है कि उपर्युक्त समस्त बातों को स्पष्ट जानने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन आवश्यक है। 
सच तो ये है कि बिना पढ़े आप पुस्तक की महत्ता समझ नहीं सकेंगे क्योंकि इसमें तथ्यों को प्रामाणिक प्रमाणित करने के लिए गं्रथों के सुबूत इतने पक्के हैं कि मेरा इस पुस्तक की उपयोगिता और महत्त्व बताने के लिए कुछ लिखना कोई मायने नहीं रखता। पूरी पुस्तक इस छोटे से कथन में समा नहीं सकती। एक श्रेष्ठ कृति के लिए विजय जी को साधुवाद।
    - भोपाल (म॰ प्र॰),     दूरभाष: 9300033522
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   भारत का अर्थ समझाती कृति 
     क्या है भारत क्या है भारतीयता 

                           - डॉ॰ रामदेव शुक्ल
कृति में कृतिकार ने वैदिक साहित्य से लेकर विश्व के सभी धार्मिक, दार्शनिक, भाषा वैज्ञानिक, पुरातात्त्विक आदि ग्रंथों से लेकर अद्यतन साहित्य का अध्ययन इस तरह से किया है, जिस तरह कोई नहीं करता। सभी भाषाओं के प्रत्यय, उपसर्गादि का ऐसा मेल किसी अन्य लेखक की भाषा में नहीं मिलता। 
पेशे से वकील होने के कारण कृतिकार पुनुरुक्ति को गुण के रूप में विकसित कर चुके हैं। नाटकीयता उसकी भाषा-शैली की अद्भुत विशेषता है, इसलिए ‘और’ की जगह ‘औ...र’ लिखते हैं। भारत का अर्थ कृतिकार ने इतनी तरह से इतनी बार समझा दिया है कि कैसा भी अज्ञ हो, विशेषज्ञ बन ही जाएगा।   
       - राप्ती चौक, गोरखपुर (उ॰प्र॰),   दूरभाष: 9956585193
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 राष्ट्रीय अस्मिता की खोज का प्रयास
कृति क्या है भारत क्या है भारतीयता 

                    - डॉ॰ विजय कुमार वेदालंकार
रचनाकार युग का दर्पण देखते हुए शब्द की साधना करता है। उसकी साधना में स्वजीवन की पीड़ा के साथ युग की विसंगति भी रहती है। जैसे दर्पण सच बोलता है, उसी प्रकार ईमानदार लेखक यथार्थ के धरातल पर स्वानुभूति को अभिव्यक्ति देता है। 
अभिव्यक्ति का अर्थ है- खुलकर प्रदर्शन करना। पाठक को जब अपनी- सी बात, आत्मीय भाषा और पहचाना-सा स्वर नज़र आता है, तो यह लेखक की सफलता कहलाती है। इससे रचना व्यक्तित्व के भीतर दूर तक जाने वाली वस्तु हो जाती है। अतः उसे कोई छोटी भूमिका नहीं दी जा सकती है। व्यक्ति और समाज के संदर्भ में उसका दायित्व बहुत बड़ा है।
प्रस्तुत आलोच्य कृति में निष्ठावान लेखक और शोधक विजय रंजन ने भारत की प्राचीनता से लेकर अद्यतन विशेषताओं के आधार पर उसकी अस्मिता को स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया है।
लेखक ने भारत के नामकरण की जानकारी के लिए प्राचीनतम प्रामाणिक ग्रन्थों का अवलोकन कर, अपने चिंतन-मनन द्वारा यथार्थ को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। उन्होंने भारत शब्द के अन्वेषण में अपनी मेधा बुद्धि का व्यवहार करते हुए संहिताओं, उपनिषदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि का उल्लेख किया है। वैदिक वाङ्मय, संस्कृत, बौद्ध, जैन साहित्य के साथ अन्यान्य विद्वानों की रचनाओं का अवलोकन करते हुए ‘भारत’ नाम को प्रतिपादित किया है। (पृ॰ 24)
भारत को अन्य नामों से भी अभिहित किया गया है। लेखक ने इस संदर्भ में भारतीय संस्कृति एवं प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए पाश्चात्य विद्वानों के मतों का भी सहारा लिया है और अपने मत की प्रामाणिकता को पुष्ट करने का प्रयास किया है। (पृ॰ 60-61)
अनेकत्र भारत को ‘आर्यभूमि’ की संज्ञा से अभिहित किए जाने के संदर्भ में लेखक ने वैदिक वाङ्मय के साथ-साथ नवीनतम वैज्ञानिक साक्ष्यों का गहन अवलोकन किया है। 
लेखक का कथन है कि भारत के विभिन्न नाम-  आर्यभूमि, ब्रह्मावर्त, देवभूमि, हिन्दुस्तान आदि विभिन्न प्रवृत्तियों के आधार पर पर्याय के रूप में ग्रहण किए जा सकते हैं केवल ‘इण्डिया’ को छोड़कर शेष विदेशज सभी ‘भारत’ नाम मूलतया सम्मानित अर्थों वाले हैं। (पृ॰ 62) 
‘आर्य’ शब्द के विशिष्ट अर्थ के आधार पर (विशिष्ट ज्ञान वाले आर्य) श्रेष्ठ संस्कार वाले वैदिक भरत के देश ‘भारतवर्ष’ को उनके वंशजों की मूल निवास भूमि को ‘आर्यभूमि’ कहा जाना तर्कसंगत है, जिसमें अनेक संस्कृतियों का समावेश है। (पृ॰ 69) इस संदर्भ में डॉ॰ अम्बेडकर, महर्षि दयानंद सरस्वती, डॉ॰. भगवानदास गिडलानी और डॉ॰ अविनाशचंद दास का मत संदर्भित है। 
‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे भवन्तु निरामयाः’’ की भावना भारत के राष्ट्रीय चरित्र को व्यक्त करती है जिसमें उसका दैवीय स्वरूप चित्रित है। यहाँ जन-कल्याण हेतु गीता के उपदेश को प्रस्तुत किया गया है जिसमें अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की बात चरितार्थ होती है।
सुधि लेखक विजय रंजन का मत है कि भारत का वास्तविक स्वरूप उसकी भौगोलिक सीमा में आबद्ध है जो हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्रपर्यन्त क्षेत्र तक विस्तृत है। लेखक के अनुसार ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में ईरान, ईराक, मिश्र, जर्मनी, अफ्रीका, हालैण्ड, रूस आदि देशों तक आर्यों (भारतीयों) के पारगमन करने का आख्यान मिलता है। परवर्ती वाङ्मय को साक्ष्य मानते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि भारत का भू-क्षेत्र विस्तृत हिंद महासागर, अरब सागर, उत्तर में हिमालय से घिरे धारित्रिक क्षेत्र को स्वतंत्र संप्रभु ‘भारत’ के रूप में जाना जाता है। (पृ॰ 78)
प्रख्यात विचारक विजय रंजन ने भारत को एक प्राचीन राष्ट्र के रूप में अभिहित करते हुए उसके आधारक तत्त्व संस्कृति, भाषा, साहित्य आदि विषयों के विन्यास पर विचार किया है और राष्ट्र के मूल में देश, इच्छाशक्ति, व्यवस्था और जीवन आदर्श आदि चार तत्त्वों के समुच्चय पर बल दिया है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रन्थों में राष्ट्र के लिए जिन-जिन आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख किया गया है वे सारे तत्त्व भारत राष्ट्र में विद्यमान है। 
लेखक की दृष्टि में भारत मात्र भूखण्ड, जन, प्राकृतिक सम्पदा, राजकोष, स्वयंसंप्रभु सत्ता वाला राष्ट्र ही नहीं, अपितु प्रागैतिहासिक काल से ही एक विशिष्ट मानसिकता, संस्कृति एवं चिन्मय संचेतना वाला राष्ट्र रहा है। संस्कृति के निकषों और राष्ट्रत्व के सभी प्राचीन-अर्वाचीन निकषों पर भारत प्राचीनतम राष्ट्र सिद्ध होता है। इसी से लेखक ने भारत के अद्यतन गुणों को आलोकित करने का सराहनीय प्रयास किया है।
सुधि विचारक विजय रंजन ने अपने विस्तृत अध्ययन के आधार पर इस महत्वपूर्ण और गंभीर विषय को अपनी शैली में प्रस्तुत किया है। भारत और भारतीयता को एक विषय मानकर लेखक ने गवेषणापूर्ण कार्य कर आधुनिक पाठकों, लेखकों और चिन्तकों को एक दिशा दी है। मनीषी चिंतक विजय रंजन ने प्राचीन भारतीय साहित्य से लेकर आधुनिक भारतीय साहित्य के साथ पश्चिम के विचारकों का सामंजस्य स्थापित करने का महत् कार्य किया है। वस्तुतः यह असाधारण लेखक का असाधारण कार्य है।
रचना का शिल्प पक्ष क्लिष्टता से अछूता नहीं है। सहृदय पाठकों के लिए विषय को सरल बनाने पर कम ध्यान दिया गया है। पाठक को विषय के साथ तारतम्य बैठाने में बौद्धिक क्रीड़ा करनी पड़ती है। असाधारण रचना-कौशल के आग्रह ने लेखक को सहजता और सरलता से दूर कर दिया है। 
स्पष्टतः प्रस्तुत कृति पाठकों, अध्येताओं और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा विश्वास है। महत्वपूर्ण कृति के लिए लेखक विजय रंजन जी को बधाई और शुभकामनाएँ।
- 486, सेक्टर-23, सोनीपत-131001 (हरियाणा), दूरभाष -9896262488
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भारत के वर्तमान और भविष्य को नई दिशा देती 
   कृति क्या है भारत क्या है भारतीयता

             - डॉ॰ बृजेश कुमार शुक्ल (पद्मश्री)
(प्रोफेसर (पूर्व विभागाध्यक्ष संस्कृत एवं प्राकृत भाषाएँ, लखनऊ वि॰ वि॰), निदेशक, ‘अभिनवगुप्त इंस्टीट्यूट ऑफ एस्थेटिक्स एण्ड शैव फिलॉसफी, लखनऊ वि॰ वि॰’, संयोजक, ‘ज्योतिर्विज्ञान विभाग, लखनऊ वि॰ वि॰ लखनऊ’, अतिरिक्त सचिव, ‘अखिल भारतीय संस्कृत परिषद, लखनऊ’, सदस्य, प्रशासनिक समिति ए॰ओ॰आई॰सी॰पुणे के 44-49 वे सत्रों में।)
श्रीविद्वत्सन्मूर्धन्य स्वनामधन्य विजय रंजन द्वारा लिखित ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ नामक पुस्तक का मेरे द्वारा आलोड़न किया गया। पुस्तक प्राक्कथन तथा पुरावृत्ति के अतिरिक्त आर्चिकद्वय में विभक्त है। इसके व्यतिरिक्त अन्त में परिशिष्ट भी संलग्न किया गया है। पुस्तक के विभाजन में ही लेखक ने भारतीय संस्कृति के उत्स स्वरूप सभी वेदों में प्रधान सामवेद की सरणि को अपनाया है। यथा सामवेद के पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक दो भाग हैं, विजय रंजन ने भी शब्दशः पुस्तक के इन्हीं दो विभाजनों को आत्मसात् किया है। यह उपक्रम प्रथमतया भारतीयता का प्रतीक है। लेखक ने प्राचीन भारतीय साहित्य यथा वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, ध्रर्मशास्त्र, रामायण, महाभारत, पुराण तथा काव्यादि से सम्यक् प्रमाणोद्धरण ग्रहण करके भारत देश के नामकरण, अन्य नाम, भारतवर्ष के प्राचीन क्षेत्र, आर्य परम्परा तथा देश का एक राष्ट्रीय चरित्र का चित्र चित्रित किया है, जो ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक दृष्टि से परमोपादेय है। ये पूर्वार्चिक के विषय हैं। उत्तरार्चिक में लेखक ने भारतवर्ष के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला है। यहाँ न केवल भारतीय मनीषा के दर्शन होते हैं अपितु विश्व की अन्य भाषाओं तथा चिन्तकों के विचार ग्रन्थ में अनुस्यूत हैं। 
प्रस्तुत पुस्तक भारतवर्ष एवं भारतीयता को जानने के लिए नितान्त उपयोगी है। इसके अध्ययन से भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान अपेक्षित है। वास्तव में भारतवर्ष की दार्शनिक परिस्थिति का भी प्रकारान्तर से यहाँ उल्लेख दृष्टिगत होता है। हमारे प्राचीन साहित्य यथा विष्णुपुराण में भारतवर्ष की यह परिधि प्रमाणस्वरूप समुल्लिखित है-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम्।   
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।
देवतागण भी भारतवर्ष के गीत प्रशंसास्वरूप गाते रहते हैं। ऐसी भारत वसुन्धरा धन्यता की पदवी को अधिगत कर रही है- गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे।
इस प्रकार लेखक ने भारतवर्ष पर लेखनी चला कर राष्ट्रीयता का परिचय दिया है तथा भारतवर्ष को जानने हेतु देश-विदेश के अनेकानेक विद्वानों के मत उपस्थापित किए हैं। एतदर्थ लेखक साधुवाद तथा धन्यवाद का पात्र है। 
आशा है श्री विजय रंजन शीघ्र ही किसी अन्य विषय पर अपनी लेखनी का सूत्रपात करके विद्वन्मनीषियों को अपनी प्रतिभा से आप्लावित करेंगे। शुभास्ते पंचानः सन्तु।
  - मातृश्रीचन्द्रकलानिकेतनम्, 529 ज्ञ 1450 पंतनगर, खुर्रम नगर, लखनऊ-226022,   
दूरभाष: 9415425834, 9794512990
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 गम्भीर गवेषणा का प्रतिफलन है 
  ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                         - डॉ॰ व्यासमणि त्रिपाठी
यह पुस्तक आपके अध्ययन-अनुसंधान और गम्भीर गवेषणा का प्रतिफलन है। यह भारत और भारतीयता को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण साधन है। इसमें पौर्वात्य और पाश्चात्य विचारों को तर्कों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है जिससे इसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता असंदिग्ध हो गई है। ‘हम कौन थे और क्या हैं’ को सविस्तार उपस्थित कर आपने भारतीयों पर उपकार किया है। आपके भीतर के सवाल और उनके समाधान ने इस पुस्तक को रोचक बना दिया है। किन्तु इसे दिल्ली से प्रकाशित करने पर इसके प्रचार-प्रसार में और वृद्धि हुई होती। शुभमस्तु।                                                  
          - पोर्ट ब्लेयर, भारत।    दूरभाष: 9434286189
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 भारत की आत्मा को खोजने का सार्थक प्रयास 
     ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ 

                            - डॉ॰ नवकांत शर्मा
आपके द्वारा लिखित आचार्य विश्वनाथ पाठक शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ शीर्षक ग्रंथ का अध्ययन किया। कुल नौ अध्यायों में विभाजित 158 पन्ने के इस ग्रंथ में भारत की आत्मा को खोजने का सार्थक प्रयास किया गया है।
प्रस्तुत ग्रंथ में भारतवर्ष की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक दिशाओं पर आलोकपात किया गया है। विदेशी इतिहासकारों द्वारा लिखित भारत के इतिहास कितने निरपेक्ष और यथार्थ हैं- यह भी नयी नजर से देखना जरूरी है।
  ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ ग्रंथ में देश की अस्मिता को खोजने का प्रयास हुआ है। यहाँ ज्ञान निरंतरता, सत्त्वगुण, शिवत्व, रामत्व, लीलाबिहारी वासुदेव आदि-आदि के भी जिक्र हुए हैं।
एकाधिक स्थानों में एकात्म भारत, श्रेष्ठ भारत, चिन्मय भारत, शाश्वत भारत, मृण्मय भारत आदि पर भी चर्चा हुई है। कुल मिलाकर परिदृश्य यह है कि प्रस्तुत ग्रंथ में भारत सम्बन्धी अनेक अनछुए पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है जिससे भारत के वर्तमान और भविष्य को नयी दिशा मिलेगी।
             - गुवाहाटी (असम),  दूरभाष: 9864190199
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 उत्तराधुनिक मनुष्य के लिए मार्गदर्शक कृति 
     ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                        - डॉ॰ ए॰ प्रिया 
वैश्विक या भूमण्डलीकृत हो रहे वर्तमान समय में भारत और भारतीयता के सवाल विशिष्ट चर्चा का विषय बन रहे हैं। इक्कीसवी सदी के अत्याधुनिक समय में भारत और भारतीयता का परिदृश्य बदल गया है एवं जटिल हो गया है। अन्तरराष्ट्रीयता के सारे प्रयासों के ऐसे परिवेश में भारत और भारतीयता की ठोस अवधारणा निर्णायक महत्त्व रखती है। ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ कृति में भारत की सांस्कृतिक विविधता को सम्पन्नता और समृद्धि के स्रोत के रूप में व्याख्यायित करने का प्रयास हुआ है। 
भारत और भारतीयता के अन्तःसम्बन्ध की गहराई को परखने की वैचारिकी के कारण ही यह किताब अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है। देवभूमि भारत के नामकरण, उसकी व्युत्पत्ति, क्षेत्रीय विशालता, पौराणिक-ऐतिहासिक महत्त्व, सभ्यता एवं संस्कृति से सम्बन्धित बहुमुखी आयामों को आत्मसात करते हुए एक समग्र रूप का चित्रण इस कृति में किया गया है। 
कृति में भारत के नामकरण सम्बन्धी मूल तत्त्व का अवलोकन वैदिक, सांस्कृतिक धार्मिक एवं पौराणिक पक्षों से जोड़ कर चिह्नित है जिससे कृति वास्तव में ग्रंथ बन गई है। हम भारतीयों को अपनी संस्कृति व मूल स्वत्व की पहचान से सरोकारित रखने का प्राणतत्त्व इस ग्रन्थ में विद्यमान है। त्याग, क्षमा, सहिष्णुता, अहिंसा, प्रेम जैसे श्रेष्ठ भावों के परिप्रेक्ष्य की ओर हमें दिशा-निर्देश देने वाली भारतीय संस्कृति की खोज इसमें लक्षित है। रचनाकार ने ज्ञान, उपासना और कर्म का रास्ता अपना कर  पाठकगण को भारतीयता से सम्पृक्त अनेक घटनाक्रमों से अवगत  कराने का दायित्व निभाया है। भौगोलिक विशेषताओं के साथ-साथ भारत-भारतीयता के आविर्भाव की तलाश सम्बन्धी अभियान का  विस्तृत उल्लेख इसमें मिलता है। भारतीयता की सांस्कृतिक धरोहर को ज्योतिष, आयुर्वेद, आयुष विज्ञान, वास्तुशास्त्र, कला, योग, अध्यात्म, धर्म, दर्शन आदि से जोड़ कर भारत-नामकरण के मूलभूत आधारों का स्पष्टीकरण दिया गया है। हिंसात्मक मूल्यच्युति के समकालीन परिवेश में यह कृति वैदिक, आर्य, वैष्णव, सनातन, हिन्दू, शैव, बौद्ध, जैन धर्मों की विशिष्ट संचेतनाओं का भी चित्रण प्रस्तुत करती है। 
देवगुरु आचार्य बृहस्पति, महर्षि वाल्मीकि, आचार्य जर्मनी, वेदव्यास, शंकराचार्य, वसवेश्वसरानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि अरविन्द जैसे महान् मनीषियों के लोककल्याणकारी  गुणों से युक्त विचारों को लेखक ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान समय में हम प्राकृतिक पारिवेशिक प्रतिकूलताओं से जूझ कर जीवन बिताते हैं। ऐसे मनुष्य-विरोधी समय में यह ग्रन्थ प्राकृतिक स्रोत सूर्य के समान उत्तराधुनिक मनुष्य के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है। ऋग्वेद, सामवेद, विष्णु पुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण आदि पौराणिक ग्रन्थों के माध्यम से भारत नामकरण के मूलभूत आधारों को स्पष्ट किया है। ब्राह्मी, भारती, सरस्वती, महासरस्वती को भारतीय संस्कृति में शक्तिस्वरूपा और सृष्टि का कारक तत्त्व माना जाता है। ज्ञान, कला, काव्य, संगीत, छन्द, अभिव्यक्ति की क्षमता एवं शान्ति की प्रदायिनी वाग्देवी के बहुमुखी रूपों से जोड़ कर भारतीयता की अवधारणा को सम्प्रेषित करने का कार्य किया है। 
भारतीय संस्कृति में साहित्य-सृजन के महत्त्व को स्पष्ट करने का प्रयास भी रचनाकार के चिन्तन हेतु संभव हुआ है। देवी भारती को विषय बना कर रचना करने वाले महाकवि वाल्मीकि, कालिदास, माघ, भारवि, बाण, राजा भोज, राजशेखर, हेमचन्द्र, तुलसीदास, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद आदि ख्यात कवियों की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख भी इसके अन्तर्गत किया गया है। भारतवर्ष के अन्य नातों को अभिहित करने के सन्दर्भों के साथ-साथ विदेशी विद्वानों की नाम सम्बन्धी व्याख्या भी प्रस्तुत की गई है। भारतीय संस्कृति और भारतीय प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर तथ्यात्मक उल्लेख किया गया है। 
भारतवर्ष प्राचीनतम राष्ट्र है और विविध प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर इसकी प्राचीनता के साथ प्राचीन विशालता भी प्रमाणित की गई है। वेदों, पुराणों, महाभारत, रामायणम्, रघुवंशम् के साथ-साथ आधुनिक लेखकों के ग्रन्थों में भी इसकी विशालता की चर्चा की गई है। 
भारत को राष्ट्र के रूप में स्वीकृति और उसके राष्ट्र बनने की सम्पूर्ण प्रक्रिया और  आवश्यक तत्त्वों की उपस्थिति के आधार पर मिली है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रन्थों में एवं अर्थशास्त्र में राष्ट्र के लिए आवश्यक सभी तत्त्वों का सन्निवेश भारत राष्ट्र में दिखाई देता है। 
भारत के राष्ट्रीय चरित्र में राष्ट्र के प्रति संचेतना, संवेदना, वैचारिकी, आचार-विचार, संस्कार सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं। ‘भारत’ को ‘आर्यभूमि’ की भी संज्ञा दी गई है। भारतीय विद्वानों और विदेशी विद्वानों के विचारों को भी इसके आधार पर अभिहित किया गया है।
भारतीय विचारकों के अलावा विदेशी विचारकों के द्वारा की गई राष्ट्रीय आत्मा, राष्ट्रीय अध्यात्म की चर्चा भी इस ग्रन्थ में की गई है। सात्त्विकता एवम् विश्व-कल्याण की भावना ही भारत का राष्ट्रीय चरित्र है। अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की बात पर बल देने की भावना इसमें विद्यमान है। अनेकता में एकता’ भारतीयता की विशेषता है। सभी भारतीय धर्मों के मूल में ‘सर्वजनहिताय की भावना’ ही लक्षित होती है।सहनशीलता, नैतिकता, सात्त्विकता, अहिंसा, समग्रता, मर्यादा सर्जनात्मकता जैसे श्रेष्ठ भाव भारतीय संस्कृति में समाविष्ट हैं। इन गुणों की संपुष्टि से भारत व भारतीयता सम्पन्न है। प्रत्येक विदेशी शासन में भारत की विशालता और समृद्धि को हानि पहुँचाने के प्रयास हुए हैं, पर भारत ने ऐसे सारे दुष्प्रयासों को विफल किया है।  भारत की प्राचीनता से लेकर इसके मौलिक गुणों तक को चिह्नित करने का प्रयास इस ग्रन्थ में हुआ है। रचनाकार ने भारत की प्राचीनता से लेकर अद्यतन समय तक के गुणों को स्पष्ट करने का कार्य किया है। 
भारत का वास्तविक स्वरूप इसकी भौगोलिक सीमा से आबद्ध है। आधुनिक लेखकों, विद्वानों, कवियों और सभी भाषाओं के रचनाकारों ने भारत की सुन्दरता एवं विशिष्टता का गुणगान किया है।अपने इस ग्रन्थ के माध्यम से रचनाकार ने भारत के वास्तविक गुणों एवं वास्तविक स्वरूप को इक्कीसवीं सदी के भारतीय समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। विश्वास है कि उनका यह प्रयास जरूर कालजयी सिद्ध होगा।
- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, के॰ जी॰ कालेज पाम्पाडी, कोट्टयम, केरल-686502, दूरभाष:  9946318613 (‘अवध-अर्चना’, अंक 103 में प्रकाशित)   
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भारतीय अस्मिता पर विमर्श की दिशा में...........’ 
 ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ 

                       - डॉ॰ किशोर वासवानी  
(विशेषज्ञ:  सिनेमाई, श्रव्य-दृश्य भाषा, हिंदी, राजभाषा-उद्योग, शिक्षण-सामग्री निर्माण प्रशिक्षण, पूर्व-उपनिदेशक/निदेशक (भाषाएँ) भारत सरकार, शिक्षाविभाग, कें॰ हि॰ नि॰ सिं॰ परिषद, पूर्व-निदेशक ‘भारतीय भाषा संस्कृति सं॰ गूज॰ विद्यापीठ अतिथि व्याख्याता कई विश्वविद्यालय में)
किसी भी काल में, किसी भी देश की अस्मिता को उसकी प्राचीन वैचारिक, निरंतर प्रवाहित संस्कृति तथा दार्शनिकता के वैमर्शिक मानदण्डों के आधार पर समझना तथा संप्रेषित करना होता है। विद्वान् कृतिकार विजय रंजन की कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ भारत को लेकर, केवल एक भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक अथवा धार्मिक विषयक सूचनात्मक विवरण न होकर, एक सारगर्भित वैचारिक-वैमर्शिक दर्शन (च्ीपसवेवचीपबंस     कपेबवनतेम) 21वीं सदी (2019) में प्रस्तुत करती है। ज़ाहिर है, इस तरह का वैचारिक संवाद बिना प्राचीन ग्रंथों (पुराणों, रामायण/महाभारत, उपनिषदों आदि) के सटीक उद्धरणों के स्थापित नहीं हो सकता। हम समझ सकते हैं, प्राचीन भारतीय मनीषा के महासागर को एक ‘जादुई गागर’ में भरना कितना दुष्कर कार्य है ? परंतु लेखक ने अपनी रचना-तकनीक से इसे संभव करने का पूरा प्रयास किया है। 
आज के बिखराव और केवल ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ जैसे अहंकारी व्यवहार के बीच, भारत के सर्वग्राही खुले विचारों वाले ‘दर्शन’ को संदर्भित कृति में गहराई से रेखांकित किया गया है। गहरे भारतीय-ज्ञान की विराट थाती को, प्राचीन मनीषियों से लेकर ईश्वरचन्द्र विद्यासागर/दयानंद सरस्वती आदि से होते हुए विद्यानिवास मिश्र/श्यामाचरण दुबे आदि उद्भट विद्वानों तक, संभाल कर लाते हुए आधुनिक पाठकों के सामने संप्रेषणीय भाषा में रखना अपनेआप में प्रशंसनीय प्रयास है। 
हम जानते हैं, भारत भूमि ने, कई विदेशी आक्रांताओं के सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक थपेड़ों को झेलते हुए, अपनी सांस्कृतिक विरासत की पहचान को सँभालते हुए, अन्य संस्कृतियों (इस्लामिक या क्रिश्चियन)/कथित धर्मों के, मानवतावादी मूल्यों से मेल रखने वाले उनके दार्शनिक सिद्धांतों को अपने में समाहित करते हुए सामासिक (ब्वउचवेपजम) भारतीय विचारधारा को जिस तरह से निखारा है, वह अपनेआप में अद्भुत मिसाल है। यह कृति इस महत्वपूर्ण विचार की ओर और भी ठोस संकेत करती है। कृति में        संस्कृत में व्याप्त भाषिक विश्लेषणात्मक व्युत्पत्ति सिद्धांतों के आधार पर ‘भारत’-संज्ञा पदबन्ध की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक व्याख्या की गई है। इसी संदर्भ में ‘सरस्वती’ की अवधारणा को यूनान, रोम, इटली, फ्रांस, इंग्लैण्ड, मंगोल आदि के संदर्भों में प्रस्तुत करना एक ठोस वैचारिक कदम है। गंगा, यमुना के साथ-साथ ‘सरस्वती’ आज भी भारतीय आत्मा में समाहित है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि कई विद्वानों ने समय-समय पर वेदों से लेकर अब-तक के सांस्कृतिक, दार्शनिक संदर्भों, विवरणों में इन मुद्दों को उजागर किया है, परंतु यह कृति सरल भाषा में साफ-सुथरे तर्कों, वैमर्शिक विचारों के साथ अपनी बात पाठकों के सामने रखती है।  
“क्या है भारत क्या है भारतीयता” कृति अपनी बात को, एक “लाइट हाऊस” की भाँति एक विशेष वैचारिक घेरे में रखकर चलती है, जो प्राचीन, मध्य और अंग्रेजों के शासनित भारत को हमारे सामने रखते हुए इन सबके ऊपर, शाश्वत भारतीय संस्कृति को, तालाब में तैरते कमल के पुष्प की तरह सतह पर स्थापित कर, आगे बढ़ाती है। 
परंतु आज जब हम, अपने ही दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की वैश्विक अवधारणा को, भूमण्डलीकरण/वैश्विकीकरण के संदर्भों को, 21वीं सदी की पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए नई व्यापक सोच/अवधारणा के साथ रख रहे हैं, तब हमें वहाँ “21वीं सदी के भारत की भारतीयता” की सोच को भी नए समीक्षात्मक टूल्स के साथ व्यावहारिक बनाकर रखना होगा....हाइपर मीडिया ( भ्लचमत डमकपं ) के युग में, वैश्विक-नागरिक (ळसवइंस ब्पजप्रमद) की सोच (जिसमें बहुसंख्यक युवा शामिल हैं) को ध्यान में रखकर मजबूत मूल्यों वाली वैश्विक भारतीयता को आगे बढ़ाना होगा।
क्या संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस उपर्युक्त दिशा में बढ़ता हुआ क़दम नहीं है ? 
-28,साकेत, वेजलपुर बाज़ार, पो॰आ॰जीवराज पार्क, अहमदाबाद-380051 (गुजरात)। 
          दूरभाष: 09979851770, 079-26824012
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  भारत और भारतीयता को समझाती कृति 
    ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ 

                     - डॉ॰ जंगबहादुर पाण्डेय 
     (पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची, पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर, जोहान्स गुटैनबर्ग, विश्वविद्यालय, मेंज, जर्मनी)
किसी साहित्यकार की सुदीर्घ सारस्वत साधना का आकलन या मूल्यांकन करना आसान काम नहीं है। विशेषतः ऐसे साहित्यकार की साधना का आकलन या मूल्यांकन तो और भी कठिन कार्य है, जिसका व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी हो, जिसके चिन्तन का आकाश बहुत व्यापक एवं विस्तृत हो और जो एक साथ कई मामलों में दक्ष एवं निष्णात हो। ऐसे साहित्यकार का बहिरंग जितना अधिक व्यापक होता है, अंतरंग उससे कहीं अधिक गहरा। विजय रंजन सरस्वती के ऐसे ही वरद पुत्र हैं जिन्होंने ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ जैसी पुस्तक लिखी है।
आलोच्य कृति को मनोयोग पूर्वक आद्योपान्त पढ़ गया। आलोच्य कृति दो भागों में विभक्त है- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक में सात अध्याय हैं और एक प्रस्तावना। प्रथम और द्वितीय अध्याय में विद्वान् लेखक ने भारत के नामकरण के मूलभूत आधारों पर गहन प्रकाश डाला है। लेखक ने लिखा है कि - “ वस्तुतः ऊर्ज्वस्विल ज्ञान (प्रकाश) की खोज के साथ-साथ पावन, सात्त्विक रचनार्धिमता से सम्पृक्ति के अधिलक्ष्यों वाले ज्ञान, कर्म एवं उपासना में समन्वय के साथ इच्छा, ज्ञान, क्रिया में समन्वय की ऋतम्भरिक तलाश में सर्वदा निरत रहती आई है भारतीय धरित्री इसीलिए भारतीय मनीषा को भा$रत कहा गया।”
चतुर्थ अध्याय में भारत के अन्य नामों पर एवं पंचम् अध्याय में आर्यभूमि के रूप में भारत का मूल्यांकन किया गया है। लेखक ने बताया है कि ‘आर्य’ शब्द का अर्थ ‘श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव वाला’ होता है। इसीलिए शास्त्रों में भारत को ‘आर्यभ़ूमि’ कहा गया है। 
षष्ठ अध्याय में इसके प्राचीन क्षेत्र-विस्तार पर, सप्तम् अध्याय में भारत की प्राचीनता और अष्टम् अध्याय में भारत के विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र पर प्रकाश डाला गया है। 
उत्तरार्चिक में भारत के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है और यह बताया गया है कि भारत केवल स्थान का वाचक नहीं है अपितु गुणों का समुच्चय है। राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ ने भी  भारत एवं भारतीयता के संदर्भ में लिखा है-
“भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण धर्म विशेष न नर का है।
एक देश का नहीं शील यह भूमण्डल भर का है। ”
आलोच्य कृति की प्रस्तावना डॉ॰ रामकृष्ण जायसवाल ने लिखी है और आशा व्यक्त की है कि प्रस्तुत कृति अपने क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगी और पाठक इसका उपयोग मात्र स्वान्तःसुखाय ही न करके शोध के क्षेत्र भी इसका भरपूर उपयोग करेंगे। 
पुरावृत्ति एवं विवृति का प्रारम्भ नाटकीय ढंग से किया गया है-
“द्वार पर खट्-खट् हुई थी। कौन ? यही जानने आया हूँ। अन्दर आ जाओ। तुम्हारा नाम ? मूलशंकर। क्या चाहते हो ? आत्मतत्त्व का ज्ञान।
उत्तर विलक्षण थे। स्वामी विरजानन्द प्रभावित हुए थे आगंतुक से। कहते हैं कि अपना सारा ज्ञान स्वामी विरजानन्द ने दे दिया था मूलशंकर को जो दीक्षित होकर बाद में स्वामी दयानन्द सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए।”
आलोच्य कृति में संस्कृत के अनेक उद्धरण दिए गए हैं। पेशे से अधिवक्ता विजय रंजन ने पूरी कोशिश की है कि वे भारत और भारतीयता को समझा सकें। एतदर्थ लेखक को साधुवाद। हमारी कामना है- 
मिलें सदा शुभ हर्ष आपको नहीं कभी आए अपकर्ष, 
सतत् सुधी साहित्य प्रवाहित लिखे लेखनी यश उत्कर्ष।
- लक्ष्मीनगर, पिस्का मोड़, रातू रोड, राँची-834008 (झारखण्ड),      
             दूरभाष: 9431545818, 8789825456          
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 देश व समाज को अभिनव आयाम देने वाली कृति 
क्या है भारत क्या है भारतीयता 

               - डॉ॰ शम्भुनाथ त्रिपाठी ‘अंशुल’
                   (महामंत्री, रामायण मेला समिति, प्रयागराज, उ॰प्र॰)
अवधभूमि के अति प्रभावी व ख्यातिलब्ध कृतिकार श्री विजय प्रताप सिंह ‘रंजन’, जिन्हें सामासिक रूप में विजय रंजन के नाम से अभिहित किया जाता है, की कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ का आलोड़न-विलोड़न करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। एतदर्थ सर्वप्रथम मैं कृतिकार विजय रंजन को इस अभिनव, विलक्षण एवं शोधपरक कृति के प्रकाशन हेतु भूयोभूयः बधाई समर्पित करते हुए आर्तज्ञ ज्ञापन करना भी स्वधर्म मानता हूँ। वस्तुतः कृति के नामकरण से दो जिज्ञासाओं की प्रसृत प्रसूति होने लगती है। वाचन या पढ़ने की अवधि में अतीत की अनन्त दीर्घाओं के अन्तर-प्रत्यन्तर की अगाधता की अनुभूति स्वतः स्फूर्त्त होने लगती है। 
आचार्य विश्वनाथ पाठक शोध संस्थान, फैजाबाद, अयोध्या द्वारा प्रकाशित यह कृति मौलिक रूप से पृष्ठ 21 से प्रारम्भ होकर 149 पृष्ठ पर्यन्त कुल 128 पृष्ठों में सुगुम्फित है। इसके पूर्व में ‘प्राक्कथन’, ‘पुरावृत्ति और विवृति’ तथा अन्त में परिशिष्ट के रूप में आधार ग्रन्थ एवं पत्रिकाओं का विवरण  सन्निहित है। सन्दर्भ ग्रन्थों की सुदीर्घ शृंखला द्वारा ही यह पुष्ट प्रमाणित हो जाता है कि लेखक ने इस कृति के प्रणयन से पूर्व कितना श्रम, समय व बुद्धि का प्रयोग किया होगा। निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि लेखक ने क्वचिद्न्यतोऽपि के अन्वेषण व संग्रहण में अथक प्रयास किया है। परिणामतः समग्र कृति में भारत तथा उसकी भारतीयता से सम्बन्धित समस्त संकल्प-विकल्प, शंका-समाधान व निर्मूल भ्रान्तियों का उपवृंहण करते हुए कृतिकार ने सुस्पष्ट अवबोध कराने का सार्थक श्लाघनीय कार्य किया है। 
कृति दो भागों में अनुप्रमाणित है- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक नाम उपखण्डों में संग्रहीत कृति के पूर्व भाग में प्रस्तावना, भारत-नामकरण के मूलभूत आधार, भारत-नामकरण के अन्य आधार, भारतवर्ष के अन्य नाम, भारतवर्ष और आर्यभूमि, भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार, भारत एक प्राचीन राष्ट्र तथा भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र कुल आठ उपशीर्षक समन्वित हैं। उत्तरार्चिक के अन्तर्गत मात्र ‘भारत का वास्तविक स्वरूप’ एक ही शीर्षक विद्यमान है। इस उपभाग में लेखक ने वास्तविक भारत का चित्रांकन विविध प्रामाणिकताओं के साथ किया है। अधिवक्ता, पत्रकार एवं साहित्यकार के त्रिवर्णिक स्वरूप को संतुलित करते हुए लेखक विजय रंजन ने इस कृति को उन समस्त वैशिष्ट्यों से संचयित किया है, जो भारत और उसकी भारतीयता की अमित एकल पहचान को चिरंतन जीवन्त बनाए रखने में सतत सहकारी सिद्ध हुए हैं। इस उपखण्ड को पथ देते हुए लेखक ने लिखा है- “एशिया महाद्वीप के दक्षिणी प्रभाग में हिमालय के दक्षिण आसमुद्र पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी से पश्चिम के पंजाब, राजपूताना, गुजरात, दमन-दीव द्वीपसमूहों तक के विस्तार में फैले भारत का अस्तित्व प्रागैतिहासिक काल से एक विशाल राष्ट्र के रूप में अस्तित्वमान रहा है। प्रत्युत प्राचीनकाल का ‘जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे’ वाला भारत आज की अपेक्षा विशालतर रहा है भूखण्डीय आकार की दृष्टि से, राष्ट्रत्व की दृष्टि से, राष्ट्रीय संचेतना की दृष्टि से और इसी प्रकार की विभिन्न निकषों की दृष्टि से-- इन बिन्दुओं पर किसी सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं है।”  
लेखक की यह सम्पुष्ट अवधारणा इस बात का द्योतन करती है कि नीर-क्षीर विवेकिनी मेधा द्वारा कृतिकार भारत का प्राचीन मूल स्वरूप  गुरु-गरिम्ना के साथ पहचान सका है तथा भारत के वैशिष्ट्य व उसकी भारतीयता की महत्ता से अभिभूत लेखक गौरव की अनुभूति करता प्रतीत होता है। यहाँ के जीवन-दर्शन, जीने की कला, सार्वभौमिक सद्भाव, सार्वदेशिक संवेदना एवं सार्वकालिक सहिष्णुता ही भारत को अक्षुण्ण सिद्ध करने की साधिका शक्तियाँ हैं। यहाँ की आध्यात्मिक चेतना, आर्ष ऋषियों का अलौकिक ज्ञान-बोध आभूमण्डल, मानव मात्र को आकृष्ट करने हेतु पर्याप्त रहा है और है भी। भारतवर्ष की मेदिनी से न केवल मानव मात्र को अपितु देवताओं को भी अत्यन्त लगाव था, वे भी यहाँ के सुख-वैभव व संस्कृति के प्रति सदैव लालायित होकर यहाँ का गुणानुवाद गाया करते थे- 
 “गायन्ति देवाः किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे। 
 स्वर्गाऽपवर्गास्यपदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषः सुरत्वाद्।।”
जहाँ तक इस कृति के समीक्षण का प्रश्न है, तो इसके लिए शीर्षकवार विश्लेषणात्मक विवेचन करना ही अधिक समीचीन प्रतीत होता है क्योंकि लेखक ने इस ग्रन्थ के निर्माण हेतु तत्त्वपरक सम्पूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थों का आश्रयण ग्रहण कर स्वानुभूत तथ्यों का सुगुम्फन किया है। सन्दर्भस्वरूप समस्त भारतीय प्राचीन ग्रन्थों जैसे पुराणों, महाभारत, रामायण, संहिताओं और स्मृतियों का विशेष रूप से सहयोग दृष्टिगत होता है। इस प्रकार वैदिक वाङ्मय से लेकर आधुनिक संस्कृत एवं हिन्दी के मनीषी विद्वानों द्वारा प्रणीत सद्ग्रन्थों का समाश्रयण इस कृति को सांगोपांग बनाने में सार्थक हुआ है। भारत के राष्ट्रत्व के सन्दर्भ में लेखक का स्पष्ट मानना है कि भारत को राष्ट्र के रूप में स्वीकृति उसके राष्ट्र-निर्माण की समग्र प्रक्रिया एवं आवश्यक तत्त्वों कर समाविष्टि के आधार पर ही सुलभ हुई है। मानक ग्रन्थों में एक राष्ट्र के लिए जिन-जिन आवश्यक तत्त्वों या गुणों की अन्विति आगणित है, वे सभी तत्त्व भारत राष्ट्र में सन्निहित हैं।
पूर्वार्चिक खण्ड के प्रथम शीर्षक प्रस्तावना के अन्तर्गत विद्वान् लेखक न प्रारम्भ में ‘भारत’ की अभिकल्पना में स्वतः अनेक विकल्पों की प्रतिस्थापना प्रश्नात्मक विधि से करते हुए शनैः-शनैः पौराणिक उद्धहरणों के माध्यम से भारत का भा$रत और भारती$य द्वारा भारत और भारतीयता की मौलिक प्रवृत्ति का संकेत किया है। यहाँ पर कृतिकार ने प्रच्छन्न रूप से इस तथ्य का प्रकाशन किया है कि राजा भरत के नाम पर ही भारत का नामकरण हुआ था-  “ भारतवासी देवी भारती की दैवीय सात्त्विकता, चिन्मयता, पावनता, रागात्मक रचनाधर्मिता आदि को आत्मसात कर जब उनसे पूर्णतया सम्पृक्त हो गए, तभी वे ‘भारती$य’ बन सके थे। इन्हीं आधारों पर भा$रत, भारती$य मनस्विता के ज्ञानवान् , याज्ञिक, जनपोषक एवं प्रथम वीर राजा भरत ने ऋक् युग में ही हिमालय से दक्षिण आसमुद्र प्रक्षेत्र में जम्बूद्वीपे भरतखण्डे प्रथम बार सुगठित, सुघटित, संघटित किया था ‘भारत’ को -
“हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। 
  तस्माद् भारतं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।”    
                                    - वायुपुराण”
लेखक ने प्रस्तावना में ही अक्षरान्वय माध्यम से अक्षर ब्रह्म की अवधारणा द्वारा ‘भारत’ नामकरण की सार्थकता को परिपुष्ट कर दिया है।
द्वितीय शीर्षक ‘भारत नामकरण के मूलभूत आधार’ के अन्तर्गत कृतिकार ने नामकरण के आधारभूत तत्त्वों के अन्वेषण में भारत के राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्रीय वैशिष्ट्य और उसके ऐतिह्य परिप्रेक्ष्यों को सुसंगत रूप से अभिनिविष्ट किया है। विवेचना के माध्यम से लेखक ने ऋग्वैदिक आधार अग्नि के नाम पर भारत को अभिहित करने की परिकल्पना को नकारते हुए सूर्य की जैविक शक्ति, सूर्योपासना, सूर्य के प्रकाशरूप ज्ञान-राशि को संगुम्फित करते हुए भा$रत अर्थात् प्रकाशान्वित भारत को सुप्रतिष्ठित किया है, जो निर्भ्रान्त एवं सुसंगत प्रतीत होता है। इस सन्दर्भ में कृतिकार ने विविध ग्रन्थों का प्रामाणिक आधार भी उपवंृहत किया है, जो समीचीन है। भारत के साथ भारतीयता का भी समीकरण सार्थक बन सका है। 
तृतीय शीर्षक ‘भरत-नामकरण के अन्य आधार’ द्वारा लेखक ने विभिन्न सन्दर्भों को व्याख्यायित करते हुए अन्यान्य विद्वानों के मत-मतान्तरों का खण्डन करते हुए स्वायम्भुव मनु जिन्हें वायुपुराण में भरत की संज्ञा से अभिहित किया गया है, की पाँचवीं पीढ़ी के प्रपौत्र राजा भरत को ही भारत-नामकरण का आधार मान्य किया है। यहाँ लेखक ने कालावधि का ध्यान रखते हुए अपना तथ्य प्रतिस्थापित कर प्रतिपाद्य निर्विवाद कर दिया है। 
इसके अनन्तर चतुर्थ शीर्षकान्तर्गत ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ पर ग्रन्थाधारित विश्लेषणात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से लेखक ने अपनी अभिव्यक्ति दी है। लेखक ने भारत के प्राचीन नामों में आर्यभूमि, देवभूमि, सप्तसिन्धु,, योनिक्षेत्र,  भरतखण्ड, जम्बूद्वीप, नावलंतीवु, कुमारी अन्तरीप, हिमवर्ष, अजनाभ वर्ष, हिन्दुस्थान आदि नामों का उल्लेख किया है, जो भारतीय मनीषियों द्वारा परिचर्चित हैं। इसी क्रम में विदेशियों द्वारा प्रदत्त नामों का भी संकेत किया है। इन्डोस, इन्दोई, इन्दु, इन्द, इण्डो, इन्तु, शिन्-तु, थि-एन्-चु , हफ्तहिन्दुकन, हिन्द देश, हिन्दूस्थान, हिन्दोस्तान आदि नाम विदेशियों द्वारा दिए गए हैं। इस प्रक्रम में विद्वान् लेखक ने एक-एक नाम का विश्लेषण कर उसकी उपयुज्यता को संकेतित भी किया है जो लेखक के ज्ञान-वैविध्य एवं विवेचना कौशल का द्योतन करता है। निःसन्देह, इस दृष्टि से लेखक भूयो भूयः स्तुत्य का समादर्य है।
‘भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि’ शीर्षकान्तर्गत ‘और’ शब्द की लेखन शैली हिन्दी जगत् के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी का अनुकरण है, जो शब्द के बलाघात को प्रभावित करती है, अर्थात् यहाँ प्रतिस्पर्धात्मक सम्बन्ध संस्थापन के उद्देश्य से और शब्द के दोनों में किंचित् अन्तराल कर दिया गया है, अर्थात् भारतवर्ष तथा आर्यभूमि समतुल्य हैं किन्तु तुल्यवत् विरोध की प्रतिस्थापना का परिचायक और शब्द की यह विशेष शैली है। लेखक ने कृति में ऐसी विलक्षण शैली का अनुप्रयोग कर भारतवर्ष के साथ आर्यभूमि का औचित्य विश्लेषित किया है। यथार्थतः हमारे भारतीय संस्कारों में श्रेष्ठ जनों को आर्य कहने की परम्परा रही है। यह समस्त भारत भूमण्डल ब्रह्मावर्त का भरतखण्ड कहा जाता रहा है। इस शब्द की सायुज्य का परिज्ञान कराने के लिए श्री रंजन ने ऋग्वेद, अथर्ववेद, वाल्मीकि रामायण, वशिष्ठ स्मृति, महाभारत, गीता, गौतमधर्मसूत्र, विदुरनीति, चाणक्यनीति, अर्थशास्त्र, शब्दकल्पद्रुम, रत्नावली शब्दकोश, अमरकोश आदि प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर आर्य शब्द की व्युत्पत्तिलब्ध व्याख्या करते हुए इसके प्रयोगार्न्तगत का विवेचन किया है। अन्य विशिष्ट स्वदेशी एवं विदेशी विद्वानों के अभिमतों का भी निर्वचन अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत करते हुए अन्त में निष्कर्षतः स्वानुभव की अभिव्यक्ति इस प्रकार करता है- 
‘आरादयति इति आर्यः’ (द्वेषरहित, गतिशील, जितेन्द्रिय आर्य) एवं ‘विज्ञानीध्यार्यान मे च’ (विशिष्ट ज्ञान वाले आर्य) जन के देश को जिसका आरम्भिक सीमान्त सिंधु-सरस्वती क्षेत्र हो, ऐसे सिंधु-सरस्वती प्रक्षेत्र के मूल निवासियों की निवासभूमि को ‘भ$रत$त्व’ या/और ‘भा$रत$त्व’ एवं ‘भारती$य$त्व’ के सार्वहिती श्रेष्ठ संस्कार वाले वैदिक भरत (प्रजाजन के भरण-पोषणकर्त्ता) के देश ‘भारतवर्ष’ को आर्य जन एवं उनके वंशजों की मूल निवासभूमि को ‘आर्यभूमि’ कहा जाना तर्कसंगत है। परिस्पष्ट है कि हमारा प्राचीन ‘राष्ट्र’ भारत आर्यान् (ईरान) के पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी तक, हिमालय से दक्षिण में हिन्द महासागर के उत्तरी क्षेत्र तक विस्तृत रहा है। इस विस्तृत भू-क्षेत्र में विभिन्न स्थलों पर निषाद, द्रविण, किरात संस्कृति के परम्परागत अवशेष विद्यमान रहते हुए भी इन संस्कृतियों के आर्य संस्कृति से समरस हो जाने के फलस्वरूप सम्पूर्ण भारतभूमि ‘आर्यभूमि’ ही मानी जाती रही है।
आगामी शीर्षक ‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार’ के द्वारा लेखक ने अन्यान्य पौराणिक एवं ऐतिह्य साक्ष्यों का प्रस्तुतिकरण करते हुए प्राचीन क्षेत्र-विस्तार का सम्यक् उपस्थापन किया है। विभिन्न कालावधियों एवं अधिपतियों के शासन, शासन-कौशल के अनुरूप प्राचीन क्षेत्र-विस्तार का वैविध्य दृग्गत होता है किन्तु यदि विश्वस्तरीय साहित्य को ही साक्ष्य के रूप में स्वीकार करें तो यह स्वतः प्रमाणित होता है कि भारतीयों द्वारा यूरोप, अफ्रीका, आस्टेªलिया, अमेरिका महाद्वीप के अधिकांश देश भारतीय निदर्शन में बसाए जाने की घटनाएँ वैश्विक इतिहास में विद्यमान हैं। इन कथाओं के अनेक सहस्र वर्षों पूर्व की अवधि में भी उन्नत सभ्यता, संस्कृति, कला-कौशल के समृद्ध राष्ट्र के रूप में भारत की श्रेष्ठ अवस्थिति स्वतः सत्यापित हो जाती है। निष्कर्षतः लेखक ने प्राचीनकाल में भारत के प्रस्तार को विस्तीर्ण एवं महनीय मान्य किया है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अत्यन्त समीचीन होगा कि प्राचीन भारत के क्षेत्र-विस्तार की अपेक्षा कथित भारत का भौगोलिक परिवेश नितान्त लघुतम है। प्राचीन भारत क्षेत्र-विस्तार की दृष्टि से वैश्विक वर्चस्व गहन स्थापित था।
इसी प्रकार, ‘भारत एक प्राचीन राष्ट्र’ शीर्षक द्वारा लेखक ने भारत राष्ट्र की अति प्राचीनता को स्थापित किया है। इस प्रसंग में कृतिकार ने अनेक प्राचीन ग्रन्थों, मनीषी विचारकों एवं वैदिक सूक्तों व ऋचाओं का उद्धरण देते हुए राष्ट्र के लिए वांछनीय अति महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्वों के निकष पर भारत की प्राचीनता का आकलन किया है। संयोगातः भारत विश्वमान्य अधिकतम कसौटियों पर भी प्राचीनकाल  से अद्यतन राष्ट्र-विषयक समग्र अपेक्षाओं से परिपूर्ण है। लेखक ने यहाँ स्पष्ट संकेत किया है कि “ राष्ट्र के राष्ट्रत्व के लिए मुख्यतया वांछनीय उपरि-इंगित तत्त्व (यथा 1. मृण्मयिक स्तर पर भूखण्ड, जन, सेना, प्राकृतिक सम्पदा, कोष 2. राजनैतिक स्तर पर ‘स्वयं संप्रभु वैधानिक सत्ता’ और वैचारिक स्तर पर ‘आराष्ट्र निवासी जन की ‘समरस संस्कृति’ अर्थात् ‘समरस राष्ट्रीय संचेतना’ ) वांछनीय है। यही संचेतना राष्ट्रीय स्तर पर परिव्याप्त होकर ‘राष्ट्रीय चरित्र’ बन जाती है त...ब राष्ट्र का राष्ट्रत्व अति बलीकृत हो जाता है। तथ्यतया यह बलीकृत सम्बल विद्यमान होने की दृष्टि से भी एक सुदृढ़ सांस्कृतिक, सांस्कारिक, राजनैतिक राष्ट्रत्व से बलीकृत प्राचीनतम राष्ट्र रहा है भारत।” कृतिकार के निष्कर्षानुसार सतत प्रवहमान राष्ट्रीय वैचारिकी, राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्रीय संस्कार/संस्कृतियों के निकषों और राष्ट्रत्व के सभी प्राचीन-अर्वाचीन निकषों पर भी भारत विश्व के अन्यान्य राष्ट्रों के सापेक्ष निःसन्देह प्राचीनतम राष्ट्र सिद्ध होता है।
पूर्वार्चिक के अन्तिम शीर्षक के रूप में ‘भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ सन्निहित है, जिसके अन्तर्गत लेखक ने विशिष्ट जीवन दर्शन, उदात्त वैश्विक दृष्टि, ब्रह्मवाद/अध्यात्मवाद, धर्मालुता, भक्ति, लोकधर्म, राष्ट्रधर्म आदि उपशीर्षकों के माध्यम से भारतीय आन्तरिक वैशिष्ट्यों का प्रतिपादन किया है। इसी प्रक्रम में कृतिकार ने भारतीय संस्कृति के मूलाधार तत्त्वों का उपवृंहण भी किया है। वस्तुतः भारतीय मनीषा शाश्वत रूप से ‘धर्मं चर, सत्यं वद्, स्वाध्यायान्माप्रमदः’ का परिपालन करती हुई मानव-कल्याणार्थ पितृ देवो भव, मातृदेवो भव, आचार्य देवो भव आदि उदात्त भावों का प्रचार-प्रसार करती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ हमारा सूत्रवाक्य है। ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ हमारी परम्परा है। ‘जीवेम शरदः शतम्’ हमारी इच्छा है। ‘वयं राष्ट्रे जागृयामः’ हमारी अवधारणा है। ‘राष्ट्रे वसूनि संगमनी’ हमारा आदर्श है। ‘संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जायताम्’ हमारा लोकधर्म है। इसतरह के अनेकानेक विलक्षण वैशिष्ट्यों के कारण ही वैश्विक पटल पर भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र लोकविख्यात है। 
इन सभी तात्त्विक विवेचनों के आधार पर कृतिकार विजय रंजन ने भारत एवं भारतीयता का सम्यक् परिचयात्मक स्वरूप उजागर कर देश व समाज को एक अभिनव आयाम दिया है। गूढ़ से गूढ़तम तथ्यों का उद्घाटन करते हुए प्रतिपाद्य तथ्य का निरूपण निर्विवाद रूप से संस्थापित कर लेखक ने अपने देश के प्रति आसक्ति एवं गौरव का प्रतिभास कराया है। इस नवीनतम अनुसंधानात्मक कृति के प्रणयन के सन्दर्भ में “शिवा को सराहौं कि सराहौं छत्रसाल को” की उक्ति चरितार्थ होती है। कृति भारत विषय की बहुत ही ज्ञानवर्द्धक पुस्तक है। कृति एवं कृतिकार दोनों ही श्लाघनीय हैं। 
मैं इस कृति की अनन्त लोकप्रियता की कामना करते हुए कृतिकार मनीषी विजय प्रताप सिंह ‘रंजन’ को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद समर्पित करता हूँ। आशा करता हूँ कि भविष्य में भी इसी तरह की शोधात्मक कृतियों से लेखक भारती-भण्डार को नित्यशः आच्छादित करता रहेगा।         
-‘ऋचायतन’, 350 बी, नया बैरहवा, प्रयागराज-211003 (उ॰प्र॰),  
                दूरभाष: 9919409727
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     भ्रान्तियों से मुक्त कराती कृति  
  ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                      - डॉ॰ मधु संधु  
  (पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग, गुरुनानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर)
कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ बहुपठित विद्वान्, अपूर्व चिन्तक, प्रबुद्ध मनीषी श्री विजय रंजन का अनुसंधानात्मक शोधपरक ग्रन्थ है। लेखकीय अध्ययन-क्षेत्र पुराण, महाभारत, रामायणम्, वेदों, उपनिषदों, संहिताओं, स्मृतियों आदि धर्मग्रन्थों तक ही नहीं, वैश्विक ग्रन्थों तक फैला हुआ है। बौद्ध और जैन साहित्य ही नहीं, कल्हण, कालिदास, संविधान-निर्माता डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर, इतिहासकार, साहित्यकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’, वासुदेवशरण अग्रवाल, समाज सुधारक धर्मगुरु स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि अरविन्द और अनेकानेक ग्रन्थों पर उनका अध्ययन गहन और गम्भीर है। 
पुस्तक ‘देवभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि’ को समर्पित है। ‘भारतमाता कौन’, ‘भारत कौन’, ‘भारतीयता क्या’ जैसे प्रश्न और तत्सम्बन्धी जिज्ञासा ही यहाँ सृजन का मूल रही है और इसका लक्ष्य इसी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर से जनमानस को अवगत कराना और भ्रान्तियों से मुक्त करना हैं। ‘प्राक्कथन’, ‘पुरावृत्ति औ...र विवृति’ के बाद पूर्वार्चिक में आठ शीर्षक मिलते हैं- प्रस्तावना, भारत-नामकरण के मूलभूत आधार, भारत-नामकरण के अन्य आधार, भारतवर्ष के अन्य नाम, भारत औ...र आर्यभूमि, भारत का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार, भारतवर्ष एक प्राचीन राष्ट्र, भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र।
लेखक बताता है कि इतिहास भारत के दो रूप हमारे सामने लाता है। एक है कोलम्बस, वास्कोडिगामा, मेगस्थनीज और दूसरे आगन्तुकों का भव्य तेजस्वी भारत, वैश्विक स्तर पर सपनों का भारत और दूसरा कुटिल लोगों और उनके मन्द बुद्धि चमचों द्वारा उकेरा गया बेचारा, दीन-हीन, पिछड़ा, कुप्रथाओं में धँसा निस्तेज भारत। लेखक ने स्पष्ट किया है भा = प्रकाश/ज्ञान और रत = संलग्न। यानि भारत का अर्थ है प्रकाश/ज्ञान की खोज में संलग्न। 
प्रकाश अर्थात् अग्नि और सूर्य के बाद देवी सरस्वती को देवी भारती के रूप में भारत-नामकरण में स्थान दिया गया है। यही गुण भारतवासियों की भारतीयता का मूल है। इसमें सतयुग में शिवत्व, त्रेता में रामत्व, द्वापर में लोकसंग्र्रह के गुण सम्मिलित होते गए। बौद्धों के बुद्धत्व और जैनियों के जिनत्व को भी इसने समाहित किया गया। वायुपुराण का उद्धरण देते हुए लेखक लिखता है- “ ऋक् युग में राजा भरत ने प्रथम बार जम्बूद्वीपे भरतखण्डे को संगठित, सुघटित, संघटित किया था। उन्हीं के नाम पर भारत का नाम प्रथम बार ‘भारतवर्ष’ हुआ।” वासुदेवशरण अग्रवाल मानते हैं कि यज्ञकर्त्ताओं का क्षेत्र होने के कारण इसे भारत कहा गया। गीता में भारत का नामाधार भारत की चैतन्य ज्ञानोन्मुख सत्ता है। 
भरत का अर्थ है भरण-पोषण करने वाला। यह नाम ‘अग्नि’, ‘प्रथम प्रबुद्ध मानव स्वायम्भुव मनु’, उनकी पाँचवीं पीढ़ी के प्रपौत्र, जैनीय आदि तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र, दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत, आर्य जनजाति भरत, जड़भरत, दशरथ-पुत्र भरत, नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत आदि-आदि के नाम को भी भारत-नामकरण का आधार माना जाता है। परन्तु लेखक समय, स्थान, स्थिति, धर्म, वैयाकरणिक प्रयोग, इतिहास, नृतत्व विज्ञान,  कार्यक्षेत्र, कृषि, शिल्प आदि पर आधारित अनेकानेक विसंगतियों-विरोधाभासों का तार्किक उल्लेख करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि वैदिक-पौराणिक वंशावली वाले स्वायम्भुव मनु की पाँचवीं पीढ़ी के प्रपौत्र  भरत के नाम पर भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा। 
विजय रंजन ने भारत-भूमि के अन्य अनेक नामों का भी उल्लेख किया हैं- जम्बूद्वीप, सप्तसिन्धु, देवभूमि, आर्यावर्त्त, आर्यभूमि, भरतखण्ड, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षि देश, कुमारी अन्तरीप, देवश्रवा भारत, अजनाभ वर्ष। विदेशियों ने भी इसे अनेक नाम दिए- शिन्तु, शिनाऊ, हिन्दुस्तान, हिन्दोस्तान, इण्डो, इण्ड, इण्डोई, इण्डिया आदि। 
वेदों में भारत की सीमाओं का उल्लेख नहीं मिलता (क्योंकि तब पृथ्वी पर कोई अन्य देश था ही नहीं), लेकिन वैदिक ग्रन्थों में इसकी विशालता का वर्णन है। 
आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगला देश, जावा, सुमात्रा, मलाया आदि देश प्राचीन भारत का ही हिस्सा थे। सागर पार के भी बहुत से देश इसका हिस्सा थे। महाभारत में तत्कालीन भारत की 160 नदियों और सात कुलपर्वतों का अंकन है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री तो श्रीलंका, मेडागास्कर (वराहद्वीप), कुशद्वीप (अफ्रीका), आन्ध्रालय (आस्ट्रेलिया) को भी 7000 वर्ष पूर्व भारतभूमि से संश्लिष्ट और इसके अनुद्वीप मानते हैं। आज का भारत तो प्राचीन भारत का मात्र नौवाँ भाग है। आज भारत-भूमि में 28 राज्य और 9 केन्द्रशासित प्रदेश हैं। यह भू-क्षेत्र 3267590 वर्ग कि॰मी॰ तक विस्तृत है।
भारतीय और पाश्चात्य विद्वान्, आर्ष और आधुनिक ग्रन्थ, इतिहासकार और वैश्विक विचारक, नवीनतम वैज्ञानिक खोजें, पुरातात्त्विक साक्ष्य भारतभूमि को आर्यभूमि ही बताते हैं। जनता के सम् संस्कार और सम् संस्कृति, ऐतिहासिक भाषायी एकता, सम आदर्श, नियम, संविधान किसी देश या भूभाग को राष्ट्र बनाते हैं। लेखक ने सिद्ध किया है कि भारत विश्व के प्राचीन राष्ट्रों में भी प्राचीनतम राष्ट्र है। यूनान, रोम, चीन तथा विश्व के लगभग सभी देशों की राष्ट्र को लेकर रूढ़ मान्यताओं पर भी भारत खरा उतरता हैं। इसके पास सुगठित भूगोल, राष्ट्रभावी नागरिक, सांस्कृतिक सम-मनस्कता, स्वयंसंप्रभु राष्ट्रीय सत्ता प्राचीनकाल से ही रही है। 
भारत का राष्ट्रीय चरित्र विश्वकल्याण की भावना हृदयंगम किए हुए है।
इस तथ्य के अनुमोदन के लिए विजय रंजन जी ने भारतीय ही नहीं विश्व भर के विचारकों के अभिमत प्रस्तुत किए हैं। यहाँ भारत का दैवीय, अलौकिक, उदात्त भव्य रूप है और यहाँ का जन देवी भारती की संतति हैं। सतयुग से लेकर कलयुग तक यहाँ होने वाले ईश्वरावतारों ने अधर्म पर धर्म की पताका फहराई हैं। भारत अनेकता में एकता का देश है। अनेक मत-मतान्तरों के बावजूद यहाँ एकरूपता है। सभी धर्म, मत-मतान्तरों  के बावजूद यहाँ एकरूपता है। सभी धर्म, मत सर्वजनहिताय का मूलमंत्र सँजोए हैं। विदेशी आक्रान्ताओं ने भले ही यहाँ के सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक वैभव को नष्ट करने के कुप्रयास किए हों, पर वे इसमें विफल ही रहे हैं। लेखक ने माना है कि आज एकात्म भारत, चिन्मय भारत, श्रेष्ठ भारत, मृण्मय भारत, शाश्वत भारत, सुसंस्कृत भारत, सर्वकल्याणकारी भारत, सर्वोपरि भारत के लिए उत्सर्ग के भाव, राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान, भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव, उच्च आचार-विचार और आत्मीयता अनिवार्य है।
विद्वान् लेखक के पास देवभाषा संस्कृत का भाषिक कौशल भी है और सूक्ष्म विश्लेषण दृष्टि भी। जैसे- ‘भारत’ शब्द ‘भा$रत’ = ‘भ $ ा $ र $ त’ का समुच्चय है। इसमें ‘भ’ प्रतीकाक्षर है प्रकाश का। प्रकाश एक ऐसा अवयव है जो ऊर्जास्वरूप भी है और ऊर्जाप्रदायी भी; जो सत्त्व भी है और सत्त्व का उद्गाता भी; जो अंधकार-वेधक भी है और तमस्-वृत्ति का निवारक भी। प्रकाश का एक अर्थ ज्ञान भी होता है इसलिए कि ‘ज्ञान’ बुद्धि को ज्योतित/प्रकाशित कर अज्ञानान्धकार को दूर करता है। ऐसे ‘भ’ के ‘भ-त्व’ (ज्ञान रूपी प्रकाश) को उभारने (प्रत्यक्ष करने, खोजने) का अर्थवाचन करने वाली ‘आ की मात्रा (ा)’ से संयुक्त करने के पश्चात् उसे ‘रत’ से संयुजित करके विनिर्मित होता है शब्द ‘भारत’। वहीं, उपर्युक्ततः ‘रत’(र $ त = रत) में ‘वैराट्य’ के प्रतीकार्थी ‘र’ से ‘तल्लीनता’ का प्रतीकार्थी ‘त’ संयुत है। संदर्भगत ‘वैराट्य’ में ज्ञान के अनन्त विस्तार के साथ सार्वहिती कल्याण की भावना और तद्गत पावन, सात्त्विक, चिन्मय, उदात्त रचनाधर्मिता समेकित है। इस प्रकार वैराट्य में तल्लीनता वाले ‘रत’ से संयुत् ‘भा’ से विनिर्मित (भा$रत = भारत) हुआ भारत। तदनुसार ‘भारत’ का अर्थ है ‘प्रकाश (ज्ञान) को उभारने/प्रत्यक्ष करने/खोजने के सर्वकल्याणक, पावन, सात्त्विक, चिन्मय, रागात्मक रचनाधर्मी विराट कर्म में सतत तल्लीन रहने वाला राष्ट्र (पृ॰ 25)। 
लेखक शब्दों की गहराई जानता है। एक-एक शब्द पर शोधपरक दृष्टिकोण पुस्तक को ज्ञान की वृहद् ऊँचाईयों तक ले जाता है। जैसे सरस्वती शब्द के लिए विजय रंजन जी वेद-पुराणों तक जाते हैं, धर्म और साहित्य की यात्रा करवाते हैं, इतिहास तथा वैश्विक महत्ता के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसे संगीत, योग साधना, प्रज्ञा साधना का मूल बताते हैं, पुरातत्त्वों का हवाला देते हैं। ग्रन्थ में सटीक उद्धरणों  का प्रयोग, स्रोतों का समुचित विवरण आश्चर्यचकित करते हैं- 
हिन्दी - ‘जानति तुम्हहिं तुम्हहिं होइ जाइ।’ (पृ॰ 31)
संस्कृत - भरतः आदित्यः तस्य भा भारती। (पृ॰ 34)
लेखक का विस्तृत अध्ययन और गहन विश्लेषण क्षमता पाठक को भाव-विभोर और आश्चर्यचकित कर देती है। प्राचीन और आधुनिक, भारतीय और विदेशी धर्म और इतिहास ग्रन्थों तथा वैज्ञानिक और पुरातात्त्विक मंथन का लेखकीय विवेक इस ग्रन्थ को अद्वितीय बनाता है।
               - अमृतसर, पंजाब,  दूरभाष  : 62808980398
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  भारतीय अंतरात्मा की पूर्ण यात्रा  
   ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                    - डॉ॰ संगीता सक्सेना
भारत की भौगोलिक-स्थिति-विवेचन रूपी प्रस्थान-बिंदु (प्रस्तावना से) से आरम्भ हुई भारत-भारतीयता अनुसन्धान की यह दुर्गम-यात्रा पौराणिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भौतिक पड़ावों व आयामों से गुजरती हुई सर्वाेच्च परिपाक-बिंदु (उत्तरार्चिक) तक पहुँचती है। विविध विद्वानों की पुस्तकों में वर्णित भारत का चित्रण करते हुए, भारत के बारे में नकारात्मक व सकारात्मक तथ्यों पर की जाने वाली टिप्पणियों को दोहराकर उन पर खड़े प्रश्नचिन्हों का उत्तर आगामी अध्यायों में मिलने का आभास पाठक को जाग्रत और उल्लसित करता है। ऋकयुग से यजुर्युग तक की यात्रा में विभिन्न धर्मों, देवगुरुओं और सद्गुणों की प्रवाहित समरस धारा का आद्योपांत विवेचन ही भारतीयता की आत्मा है। श्री रंजन ने ‘भारत’ का अन्वयाधारित अर्थ और उसकी विवेचना इतनी तार्किकता, सत्यता और संपूर्णता के साथ की है कि मस्तिष्क चकाचौंध हो जाता है कि यह पहले द्रष्टिगत व मनोगत क्यों नहीं हुआ -  “ज्ञात हो कि भारत शब्द ‘भा $ रत’ = ‘भ $ा $ र $ त’ का समुच्चय है। इसमें ‘भ’ प्रतीकाक्षर है प्रकाश का। प्रकाश एक ऐसा अवयव है जो ऊर्जास्वरूप भी है और ऊर्जाप्रदायी भी ........” (पृष्ठ 25) 
एतदर्थ ‘भारत’ के नामकरण के आधार-अन्वेषण के लिए भारत के उद्भव काल से अधुनातन इतिहास का नीरक्षीर विश्लेषण लेखक का रचना धर्म हो गया। ऋक् के आरंभिक चरण में, सृष्टि के आरम्भ में अग्नि की महत्ता, सीमितता और उद्दण्डता पर विचार करते हुए सूर्य-प्रशस्ति, वस्तु-सत्य-ज्ञान ऊर्जस्वित प्रकाश सूर्य ने आर्यजन को वशीभूत किया और वह सूर्य-उपासक हो गए। उन्होंने संपूर्ण विश्व को सूर्य का महत्त्व निर्यातित किया। देवी भारती के रूप में सरस्वती को शक्तिरूपा के पद पर तर्कसहित प्रतिष्ठित किया जाना और न केवल संस्कृत-हिंदी के विद्वतगणों द्वारा बल्कि प्राचीन संस्कृति-समाज में भी उन्हें किसी न किसी रूप में पूजा जाना हमारी संस्कृति की विराटता और गहनता को स्वरूपित करता है। मां सरस्वती के पर्यायवाचियों और उनके सात्त्विक गुण-अस्तित्व की व्याख्या के उपरांत लेखक ‘भारतीय’ का अस्तित्व ‘भारती’ से समेकित करते हैं, “मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि के अनुसार देवी भारती की ही मनसा-वाचा-कर्मणा संतति-प्रसंतति हैं भारतवासी इसलिए कि भारत के निवासियों में सारस्वत संस्कार के रूप में परिव्याप्त हैं देवी भारती; देवी भारती के गुणों से सह्युजित/समेकित होने के कारण ही भारतीय कहे जाते हैं वे।” (पृष्ठ 33) 
अध्याय के अंत में अनेकानेक प्राचीन ग्रंथों, पुराणों के दर्शन को आधार बना कर सूक्ष्म व्यंजना करते हुए निष्कर्ष निकलता है कि सच्चा भारतीय उसे ही माना जा सकता है जो ‘भारती’ के सद्गुणों में आसक्ति रखता हो, श्रद्धा रखता हो और उन्हें जीवन में ग्रहण करता हो। 
‘भारत’-नामकरण के अन्य आधारों में वैदिक ग्रंथ, जैन ग्रन्थ, विद्वत्-मत और साहित्य-कला क्षेत्र से प्राप्त अवधारणाओं का गहन विश्लेषण किया गया है। ‘भारत’ बना है ‘भरत’ से। ‘भरत’ का अर्थ होता है भरण-पोषण करने वाला। दस हज़ार से ग्यारह हज़ार वर्ष प्राचीन राष्ट्र भारत का नामकरण विविध अवधारणाओं, महानुभावों में से किसके नाम पर है, किस अवधारणा पर आधारित है-- यह बहुत ही विश्लेषणात्मक तरीके से क्रमवार विवेचित किया गया है। किंचित् भी विषयान्तर नहीं होने पाया है। भारत-नामकरण के अन्य आधार अध्याय में वैदिक ग्रंथों में जिन-जिन अर्थों, सह-अर्थों, व्यापक-अर्थों में भारत शब्द का प्रयोग किया गया है, उनको आद्योपान्त सतर्कतः विवेचित किया गया है। भारतवर्ष के अन्य नाम यहाँ उद्धृत किए गए हैं-- आर्यभूमि, सप्तसैंधव प्रदेश, देवभूमि, देवकृत योनिक्षेत्र, ब्रह्मावर्त, जम्बूद्वीप का भरतखण्ड, कुमारी अंतरीप, हिन्दुस्थान। विदेशियों ने अपने-अपने स्वार्थ के वशीभूत भारत को विविध नाम दिए - “इंडोस, इन्दोई , इन्दु , इन्द , इन्डो, इन्तु , शिन-तु , थि-एन-चु , हफ्तहिन्दुकन , हिन्द देश, हिन्दूस्थान, हिन्दुस्तान, हिन्दोस्तान आदि।” (पेज 58)। यहाँ लेखक स्पष्ट स्थापना करता है कि “सभी नामकरण सम्मानजनक थे, ले..कि..न, जब अंग्रेज/यूरोपीय यहाँ के शासक बने तो उन्होंने भारतीयों को हत-तेज करने के लिए भारत को ‘प्दकपं’ कहना आरम्भ कर दिया।” (पृष्ठ 59) 
‘भारतवर्ष औ..र आर्यभूमि’ अध्याय में आर्यभूमि अथवा आर्यावर्त शब्द व अवधारणा के उद्गम का क्रमिक अनुसंधान किया गया है। सर्वदारेण्य ग्रंथ ऋग्वेद में 36 बार ‘आर्य’, वह 88 बार ‘अर्य’ शब्द का प्रयोग होने के बावजूद कहीं भी आर्यावर्त शब्द का प्रयोग नहीं है। आर्य शब्द का प्रयोग अथर्ववेद के मंत्रों में दृष्टिगत होता है। एल॰डी॰कल्ला, एफ॰ ई॰ पर्जिटर, डॉ॰ अम्बेडकर, स्वामी दयानंद सरस्वती, एन॰ सी॰ स्टीफन सरीखे विदेशी विद्वानों के दृष्टिकोणों व शब्दयुग्मों के उद्भव पर सविस्तार विचार व पारगमन के कारणों, संसाधनों व उद्देश्य को लेकर किए गए आर्यावर्त के प्रसार को स्पष्ट करते हुए विजय रंजन इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि- ”भारतभूमि आर्यभूमि ही है, “हमारा प्राचीन ‘राष्ट्र’ भारत आर्यान (ईरान) के पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी तक, हिमालय से दक्षिण में हिन्द महासागर के उत्तरी क्षेत्र तक विस्तृत रहा है इस विस्तृत भू क्षेत्र में विभिन्न स्थलों पर निषाद, द्रविण, किरात, संस्कृति के परंपरागत अवशेष विद्यमान रहते हुए भी इन संस्कृतियों के आर्य संस्कृति से समरस हो जाने के फलस्वरूप सम्पूर्ण भारतभूमि ‘आर्यभूमि’ ही मानी जाती रही है।” (पृष्ठ 69)।
भारतीय होने में असीम गौरव गरिमा का अवगाहन कराता है अध्याय ‘भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार’ के अकाट्î विचार-बिंदु। इस अध्याय में भारत की विस्तारित सीमाएं ग्रंथों, पुराणों से उद्धृत प्रमाणों के द्वारा प्रत्याख्यायित की गई हैं- “वैदिक ग्रंथों के अनुसार भारतवर्ष में हिमालय से लेकर हिमालय के दक्षिण में समुद्र-पर्यन्त क्षेत्र, पश्चिम में सिन्धु-सरस्वती क्षेत्र प्रत्युत केकय तक, पूर्व में ब्रह्मपुत्र के क्षेत्र-विस्तार तक के विस्तृत भूखण्ड को समाहित माना जाता था।” (पृष्ठ 70)। महाभारत में 160 नदियों, 7 कुलपर्वतों के नाम तक वर्णित होना, प्रमाण को ठोस प्रमाणिक सत्य साबित करने हेतु पर्याप्त है। इतना ही नहीं, श्री रंजन ने मत्स्यपुराण, वायुपुराण, मार्कंडेय पुराण, विष्णु पुराण आदि का भी परायण कर उनके स्पष्ट मतों को बोधगम्य भाषा में पाठक के लिए सुगम्य बनाया है। इस अध्याय में जो सब प्रमाण तथ्य विविध इतिहास-ग्रंथों, पुराणों, शासकों, शासनों आदि से प्रस्तुत किए गए हैं और विविध देशों ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, इण्डोनेशिया, सुमात्रा, बोर्नियो, जावा, श्रीलंका, कम्बोडिया, थाईलैण्ड, म्यांमार, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, मेसोपोटामिया, बेबीलोनिया, सुमेरिया, मिस्र तक, हित्तीमित्ती साम्राज्य तक, मॉरीशस व फिजी को सांस्कृतिक, राजनीतिक आधार पर भारत का बृहत्तर विस्तारित क्षेत्र माना गया है। इसकी पूर्ण ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता स्वयंसिद्ध हो जाती है।
‘भारत एक प्राचीन राष्ट्र’ में श्री रंजन सुस्थापित करते हैं यह तथ्य कि “काल-प्रवाह में दीर्घकाल तक परंपरागततः रूढ़ होने से उस क्षेत्र-विशेष के निवासियों की वह विशिष्ट प्रकृति, प्रवृति, मनोवृति, संस्कार, आचार, आदि उस क्षेत्र-विशेष की विशिष्ट संस्कृति बन जाते हैं।”(पृष्ठ 79)। राष्ट्रत्व विस्तार में किन घटकों का समावेशन होता है, यह पुरा ग्रंथों- ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, रामायणम्, वाजसनेही संहिता, शुक्रनीति, गौतम सूत्र, कामण्दक, अग्नि-पुराण, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, अमरकोश के राष्ट्र-सम्बन्धी आप्त वाक्यों से श्री रंजन स्पष्ट करते हैं। राष्ट्र और राष्ट्रत्व को पश्चिमी तत्सम्बन्धी निकष पर निष्पक्ष हो कसा है लेखक ने। यहाँ राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्त के अंग्रेजी-हिंदी पर्यायों की कठिनाइयों पर भी विस्तार से की गई चर्चा मुझ जैसे हिन्दी सेवाकर्मी के अनुवाद-कर्म की कठिनाइयों को स्वीकारती है। 
देश और राष्ट्र के विन्यास-परास पर विचार करते हुए श्री रंजन कहते हैं- “हमारे राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में यह संकेन्द्रण बिंदु ‘भारतीय राष्ट्रीय वैचारिकी’ अर्थात् ‘भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिकी’ ही मानी जा सकती है इसलिए कि प्राचीनकाल से भारत एक देश भी है और एक राष्ट्र भी।” (पृष्ठ 86)। राष्ट्र के प्रमुख वांछनीय संगठन तत्त्वों- सुगठित भूगोल, राष्ट्रवादी नागरिक, सांस्कृतिक सम्-मनस्कता, सम्प्रभु सक्षम राष्ट्रीय वैधानिक सत्ता के आधार पर लेखक द्वारा भारत को कठोरता से परखा और निष्कर्षित किया गया है कि “भारत विश्व-मान्य आधुनिकतम कसौटियों पर भी प्राचीनकाल से अद्यतन ‘राष्ट्रत्व की सभी अपेक्षाओं’ को पूरा करता है।” (पृष्ठ 91)। 
भारत के विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र पर विचार करते हुए लेखक का मानना है कि शाश्वत संचेतनायुक्त भारत राष्ट्र के राष्ट्रीय चरित्र में ‘लोक-पोषण सह राष्ट्र सुगठत्व की सदिच्छा वाले भरतत्व’, ‘ज्ञान-निरतता वाले भारतत्व’, ‘धर्मालु, कल्याणक भारतीत्व के साथ शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व, जिनत्व और बुद्धत्व’ भी आमेलित हो गए हैं। भारतीयों की करुणार्द्र प्रवृत्ति उन्हें अन्य देशों के निवासियों से पृथक करती है। भारतीयता के सभी गुणों का आस्वादन सहित किए गए विस्तृत विवेचन में लेखक की कलम न कहीं ठिठकी की है, न ही विचार-प्रवाह कहीं थका है और न ही हृदय संकुचित हुआ है। उसका मन तो लबालब हो रहा है भारतत्व से, भारतीयता के विविध रूपों से। 
हिंदी-साहित्य में कथेतर विधाओं में सबसे कठिन इस गवेषणत्क विधा को नवजीवन दिया है इस पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ ने। प्रांजल, संस्कृतनिष्ठ, परिष्कृत भाषा इस पुस्तक का बहुमूल्य आभूषण है। पुस्तकीय नवप्रयोग में प्रथमतः दो शब्दों का योजन कर प्रयुक्त किए गए शब्द कथ्य में नव अर्थ भर जाते हैं-- अवध-अर्चना सम मनस्क, कृति-विरचना, विन्यास-परास, दकारत्व इत्यादि। द्वितीयः ‘.....’ का प्रयोग शब्दों की अर्थवत्ता में द्विगुणित वृद्धि करता है यथा- ‘ले..कि..न’, ‘औ...र’ आदि। इसके बारे में लेखक ने स्वयं भी प्राक्कथन में स्पष्ट किया है। लेखक को अन्य भाषा के प्रयोग से सर्वथा परहेज हो, ऐसा भी नहीं है। शब्द के अर्थ को स्पष्टतः जनमानस तक पहुँचाने के लिए वह अंग्रेजी पर्याय भी यथास्थान देते हैं यथा-     ‘त्ंजपवदंसम - त्मंेवदंइसम’ (सुसंगत एवं तर्कसंगत)।
सभी निबन्धों की शैली विवेचनात्मक व विश्लेषणात्मक है। रचनाकार प्रथमतः संदर्भित ग्रंथों, पुराणों, विद्वत्गणों से उद्धरण, प्रकरण व संदर्भ लेकर उनकी दृष्टि सम्मुख रखता है, विवेचना करता है और अध्याय के निष्कर्ष भाग तक पहुँचते-पहुँचते अपना स्पष्ट व सुदृढ़ मत स्थापित कर देता है जिससे पुस्तक-रचना के उद्देश्य को सुदृढ़ता प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में यत्र-तत्र शैली विवरणात्मक भी हो गई है। भाव-साम्यता क्रम में भारतीयता की परिभाषा व व्याख्या करते हुए एक स्थान पर श्री नन्द चतुर्वेदी जी कहते हैं कि “भारतीयता के प्रसंग की सबसे जटिल ग्रंथि तो उसको पहचानने की है, उन विशेषताओं को रेखांकित करने की है, जो मौलिक हैं और संशय रहित हैं।” (‘गद्य-लेखन का हौसला’, ‘भारतीयता की तलाश’, पृष्ठ 144) 
कुछ अन्य विशिष्ट तथ्य भी दृष्टिगत होते हैं, कुछ निष्कर्ष निकलते हैं जैसे --इसमें पूर्ण तार्किकता है किंतु विचार-असहमतियों को भी नकारा नहीं गया है। इतिहास-लेखन की तमाम त्रुटियों के बावजूद ऋग्वेद युग से ही भारतीय दर्शन, साहित्य, शिक्षा, विचाराभिव्यक्ति वस्तुतः सटीक तर्क और कल्याणकारी युक्ति पर आधारित है। विश्व की अन्य सभ्यताओं, समाजों में उनकी उत्पत्ति व व्यवहार को लेकर मिलने वाली कथाओं वह विचार शृंखलाओं में तर्कसंगतता व वैज्ञानिक सुसंबद्धता का अभाव है। सत्यतः भारतीयता ऊपरी वस्तु है ही नहीं, यह सतह पर न्यून और अपनी गहराई में सम्पूर्ण है। किसी कवि का सत्य कथन है कि- “इतिहास तो सिर्फ मौत बताता है बाकी की बातें तो जिंदगी को ही तलाश करनी पड़ती हैं।”
 भारत-भारतीयता की तलाश में यह पुस्तक भारत-भारतीयता को सिंधु सम अम्लान-विस्तार देती है। गहन स्वाध्याय व विचार विनिमय से जन्मी यह गद्य रचना “क्या है भारत क्या है भारतीयता’ श्री रंजन की भारत सम्बन्धी भाव गहनता और गद्य-अनुभव का सत्व है। 
वस्तुतः श्री रंजन मात्र मृण्मय भारत के चितेरे नहीं, भारतत्व और भारतीत्व के शाश्वत चिन्मय के विद्वत् गर्वित पुजारी हैं। पुनः पुनश्च..वह सार्थक, सटीक, अकाट्य तर्कों से भारत के पुण्य-गौरव को प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं। इसे वे पुस्तक ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ में किए गए अपने अथक श्रम से करने में सफल भी हुए हैं। परिशिष्ट में अनेकानेक ग्रंथों, पुस्तकों की बृहद सूची उनकी अध्येतावृत्ति, भारत के प्रति एकनिष्ठा और अटूट लगन की पुष्टि करती है। 
समेकित रूप से कहें तो यह पुस्तक बहुत ही गहन, सटीक व अकाट्î तथ्यपरक है। लेखक ने भारत और भारतीयता पर जिस प्रकार से लिखा है, वह भावसाध्य और श्रमसाध्य दोनों ही है। यह पुस्तक भारतोत्पत्ति के इतिहास को सस्नेह समेटे हुए है। यह पुस्तक भारत राष्ट्र के सुदृढ़ीकरण में अपनी महती भूमिका वहन करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। यह अनुसन्धानपरक पुस्तक कालजयी हो; यह पुस्तक सदा ही भारत का इतिहास पुष्ट करती रहे; इस पुस्तक का राष्ट्रवादी मंचों से व्यापक प्रचार-प्रसार हो-- ऐसी मेरी सदिच्छा है। - 72/12 नीड़, पटेल मार्ग, मानसरोवर, जयपुर (राज॰), दूरभाष: 9413395928 (‘अवध-अर्चना’, अंक 103 में प्रकाशित)   
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 चिन्तनपरक एवं सोद्देश्य लेखनधर्मिता से सरोकारित 
    कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता

                          - डॉ॰ कौशलेन्द्र पाण्डेय
इन क्षणों में मेरी दृष्टि-पथ पर है वरिष्ठ साहित्यधर्मी श्री विजय रंजन विरचित एक सौ छप्पन पृष्ठीय राष्ट्रचिन्तनपरक कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’। 
विजय रंजन मूलतः कथाशिल्पी हैं, अनन्तर कवि और समालोचक। समग्रतः सम्प्रति उनके वाङ्मय में कुल 16 कृतियाँ प्रकाशित और पाण्डुलिपित हैं-
प्रकाशित: कहानी-संग्रह सूरज की आग, उभरते बिम्ब, कविता-संग्रह हाशिये से, किर्चें तथा समालोचक कृतियाँ साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण, कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व, कविता क्या है, रसवाद औ..र नय रस)
अप्रकाशित : भारतीय राष्ट्रवाद: एक विशिष्ट विमर्श, भारतीय राष्ट्रवाद: क्या, क्यों औ..र कैसे, आदि-महाकवि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान, राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित, भारतीय शिक्षा-व्यवस्था: सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष, विश्व-विजय के पथ पर हिन्दी, आदि-महाकवि का कालखण्ड। 
आचार्य विश्वनाथ पाठक शोध संस्थान, कोशलपुरी, फैजाबाद-अयोध्या के स्तर से यथेष्ट मनोयोग से प्रकाशित बहुविध संस्कारित कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ का हृदय है इसके पृ॰ 7 की अनुक्रमणिका के पूर्वार्चिक (पृष्ठ 21 से 130) एवं उत्तरार्चिक (पृ॰ 131 से 149) शीर्षकान्तर्गत पाठकों को सुलभ कराया गया इतिवृत।
प्राक्कथन (पृ॰ 9-11) के लेखक पूर्व विभागाध्यक्ष राजनीति विभाग, का॰ सु॰ साकेत पी॰ जी॰ कालेज, अयोध्या से गति ग्रहण करती 156 पृष्ठीय कृति ‘क्या है भारत, क्या है भारतीयता’ का वास्तविक प्रारम्भ ‘पुरावृत्ति औ..र विवृति’ से होता है तत्त्वतः नाटकीय शैली में। दरवाजे पर हुई थपथपी से अन्दर से प्रश्न होता है- “कौन ?” उत्तर मिलता है- “यही जानने आया हूँ।” “तुम्हारा नाम ?” उत्तर होता है- “मूलशंकर।” पुनर्प्रश्न- “चाहते क्या हो ?” उत्तर था- “आत्मतत्त्व का ज्ञान।” उत्तर से प्रभावित होकर स्वामी विरजानन्द जी आगन्तुक से बहुत प्रभावित हुए थे। 
जनश्रुत्यानुसार त्वरित रूप से उन्होंने उसे अत्युत्तम शिष्य की मान्यता सहर्ष प्रदान की। कालान्तर में वही स्वामी दयानन्द के नाम से लोकविश्रुत हुए। इसके आगे कृतिकार लिखता है-
“1960-‘61 में ‘आर्यसमाज मन्दिर, गोण्डा (उ॰प्र॰) में ’स्वामी दयानन्द सरस्वती-जयंती समारोह के अवसर पर मंच से वक्ता महोदय (नाम याद नहीं) ने बालक मूलशंकर के स्वामी दयानन्द बनने की गाथा इन्हीं शब्दों में सुनाई थी। उन्होंने आगे कहा था-- “ब्रह्मसूत्र में आदिशंकराचार्य ने ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ पर बल दिया है। इसी जिज्ञाासा के सम्बल से ही विश्व का सारा ज्ञान-विज्ञान आविर्भूत हुआ है। 
व्यक्ति में जिज्ञासा-भाव समुचित स्वरूप मंे जाग्रत हो जाए और वह स्वयं को पहचानने लगे तो बहुत सारे गलत काम वह स्वयं छोड़ देगा। जब व्यक्ति को अपने कुल, गोत्र, वंश-गौरव, इतिहास, आत्म-गौरव आदि का ज्ञान हो जाता है तो वह अपकर्मो से बचने का स्वतः प्रयास करता है कि उसके कुल-सम्मान को या कि उसके स्वयं के मान-सम्मान को ठेस नहीं लगे।” 
प्रातःकालीन स्कूल-प्रार्थना के बाद ‘भारतमाता की जय’ के नारे लगवाए जाने पर कृतिकार के मूलशंकर के मानस में कतिपय प्रश्न स्फुरित हुए- ‘भारत क्या ?’ और ‘भारतीय कौन ?’ 
इन प्रश्नों को पूछने पर कक्षाध्यापक ने उन्हें बताया- 
“15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ हमारा भारत; यह एक नवस्वाधीन राष्ट्र है। प्राचीनकाल में यह बहुत वैभवशाली था, विश्वगुरु था; विश्व के सभी देश भारत का लोहा मानते थे। शेष किताब में जो लिखा है, वह पढ़ लो। उससे ज्यादा जानने की जरूरत नहीं है अभी। बड़ी कक्षाओं में जाओगे तो सब समझ में आ जाएगा।” 
कृति में कृतिकार ने महाभारत, मत्स्य, वायु, विष्णु तथा मार्कण्डेय पुराणों को संदर्भित करते हुए बताया है कि भारत देश की सन्तति को भारती तथा देवी भारती के सत्त्व, ऋत, दकारत्व, रचनाधर्मिता आदि वैशिष्ट्य को समेकित करने वाला मानव ही भारतीय (वस्तुनिष्ठ भारतीय) है। इसी व्यवस्था के नित्यत्व को सार्वकालिकता प्रदान करने के लिए लेखक ने पृ॰ 34 से 56 तक प्रसरित एक अतिरिक्त अध्याय ‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’ सृजित किया है जिससे कि पाठक वर्ग किसी भी स्थिति में लेखक की श्रमजन्य व्यवस्थाओं के प्रति अकारण ही शंकालु न हो। 
अपने निर्णय को सार्वजनीन करने के क्षण तक ‘शब्द’ को ‘ब्रह्म’ का पर्याय मानने वाली भारतीय मनीषा किसी भी प्रकार के नामकरण के अन्तर्गत अक्षर शब्द का अतार्किक अथवा निराधार उपयोग न करे। भारत-नामकरण के अन्य आधारों को पाठक वर्ग के संज्ञान में लाने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता, ऋग्वेद की ऋचा 2-7-1 एवं 5, 4/75/4, 6/6/19-45, शतपथ ब्राह्मण (1/4/2), वाल्मीकि-रामायण, वायुपुराण लाला सीताराम विरचित अवध का इतिहास आदि-आदि ग्रन्थों को संदर्भित किया गया है।  
‘भारतवर्ष और आर्यभूमि’ अध्याय संसूचनात्मक है। आसेतु हिमालय ब्रह्मपुत्र से सिन्धु तक का भूक्षेत्र, सारस्वत संस्कार वाले या कि श्रेष्ठ आर्यों की जन्मभूमि रही है। प्रमाणित भी हो चुका है यह ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक साक्ष्यों से। कृति के पृ॰ 69 के अन्तिम प्रस्तर से स्थिति को तथ्यपरकता प्रदान करने के लिए आर्यभूमि विषयक लेखकीय मंतव्य तर्काधारित हैं। 
चिन्तनपरक एवं सोद्देश्य लेखनधर्मिता से सरोकारित विजय रंजन जी वर्तमान में भी पाठकों की सोच को सार्थक दिशा देने वाले ग्रन्थों की रचना में लीन हैं। लेखक के ही शब्दों में-
 “ प्रस्तुत कृति से भारत/भारतीयता के विषय में विविध विद्यमान भ्रान्तियों से उबर कर हम भा+रतीय, भारती+य आवृत्त-चक्षु हो सकेंगे और त...ब हममें से अनेक मूलशंकर स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि से भी आगे जाकर भारत/भारतीयता को नित नए एवरेस्ट-शिखरों पर आसीन कर सकेंगे।”                                 - 130 मारुतिपुरम् , लखनऊ। दूरभाष: 9236227999
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                      धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे

                                     - डॉ॰ प्रभुदयाल मिश्र
विष्णु पुराण में कहा गया है -
 गायन्ति देवाः किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे।
 स्वर्गापवर्गास्पदमार्ग भूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।
 अर्थात् देवता भी यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के मार्गभूत भारत में जन्म लिया है, वे पुरुश हम देवताओं से भी अधिक धन्य हैं! 
ऐसे भारत और उसकी भारतीयता पर सर्वांगीण विचार सर्वथा और सर्वदा समीचीन ही है। अब जब भारत के संविधान के प्रारम्भ के उद्घोष ‘इंडिया जो कि भारत है’ के संशोधन की माँग भी उठ खड़ी हुई है, भारत और भारतीयता की मौलिक पहचान की चेष्टा निश्चित ही बहुत अधिक प्रासंगिक हो गई है। इसी सुसंगत और समकालिक प्रश्न को राष्ट्रवादी चिन्तक और विचारक श्री विजय रंजन ने अपनी इस शोधपूर्ण कृति में सशक्त रीति से उठाया है। 
इस अनुसन्धान में लेखक ने जिन संदर्भ ग्रन्थों की सहायता ली है, उनकी सूची पाँच पृष्ठों में पुस्तक के अन्त में दी गई है। इसके अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि लेखक ने शायद ही विषय से सम्बन्धित किसी आधार सामग्री को छोड़ा होगा। राष्ट्रवादी विचारकों, वक्ताओं और लेखकों को इसमें वे सभी सन्दर्भ और समाधान आसानी से मिल जाएंगे जिनकी उन्हें इस तरह के लेखन, संभाषण और राष्ट्रगौरव के भान के लिए प्रायः आवश्यकता प्रतीत होती है। 
पुस्तक की अनुक्रमणिका में मुख्यतः दो भाग हैं: पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक। एक प्रकार से ये दो भाग भारत के अतीत और वर्तमान की झलक देने के लिए हैं। सबसे पहले भारत के नामकरण के प्रश्न और प्रासंगिकता पर लेखक ने अनेक आन्दोलित और उद्वेगपूर्ण धाराओं- तेज, धीमी, बड़ी, छोटी, लुप्त और प्रकट सभी को समेटा है। मोटे तौर पर हम दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत अथवा ऋषभदेव के पुत्र भरत को लेकर भारत के नामकरण का सन्दर्भ ग्रहण करते हैं। यहाँ लेखक ने जैन तीर्थंकर ऋषभदेव और वैदिक-पौराणिक राजा ऋषभदेव के पुत्र भरत के अन्तर को भलीभाँति स्पष्ट किया है। अब भारत चाहे प्रकाशक ‘भ’ धातुमूल से बना हो, वाणी की देवी सरस्वती, माँ भारती का प्राकट्य हो अथवा किसी इतिहास पुरुष की प्रतिच्छाया हो, प्रकाण्ड पण्डित रमाकान्त शुक्ल के लोकविश्रुत संस्कृत गीत के अनुसार प्रत्येक भारतीय के अन्तर्मन से तो यही अनुगूँज देता है- ‘भाति मे भारतम्’ (भारत मुझे बहुत भाता है, सदा ही भाता है)’। भारत ने काल के इतने थपेड़े सहकर जैसे अपनी कान्ति को और भी निखारा और प्रदीप्त किया है। अतः जो सीमित इतिहास-बोध से समर्पण की मुद्रा में हैं, उन्हें रंजन अनुरंजित कैसे करेंगे ? पुस्तक के पृष्ठ 138 में लेखक ने रघुपतिसहाय फिराक की यह शेर उद्धृत किया है- 
सरजमीने हिन्द पर आवाम-ए-आलम के फिराक 
काफिले बसते गए हिन्दोस्ता बनता गया। 
इस पर लेखक की यह टिप्पणी काबिलेगौर है -
“नवीनतम अन्वेषित पुरातात्त्विक साक्ष्यों की साक्षी से जब यह सिद्ध है कि 1250 ईस्वी पूर्व, 1400 ईस्वी पूर्व, 8000 हजार ईस्वी पूर्व या कि आज से 10000-11000 ईस्वी पूर्व काफिलों की कथित आवाजाही से बहुत-बहुत पूर्व भारत, भारतीय समाज और भारतीय संस्कृति का अस्तित्व इसी भूमि पर विद्यमान था, तब काफिलों के आते जाने से हिंदोस्तां बनने वाला प्रकथन सत्य से आँख चुराने जैसा है।”
लेखक ने पुस्तक में भारत के साथ भारतीयता के विग्रह का भी जो स्वरूप अवधारित किया है, उसके अनुसार इसकी भौगोलिकता के अतिरिक्त इसकी संप्रभुता, संस्कृति, भाषा, चरित्र, मर्यादा, उदारता और विश्वकल्याण की उदात्त भावना की परिचायक है। 
लेखक ने भारत के राष्ट्रीय चरित्र और प्राचीनकाल से गतिमान राष्ट्रत्व पर भी प्रामाणिकता के साथ विस्तार से लिखा है। अन्त में मैं लेखकीय भूमिका के इस उद्गार को पुस्तक के संदेश के रूप में रेखांकित करना अभीष्ट पाता हूँ-   “प्रस्तुत कृति से भारत/भारतीयता के विषय में विविध विद्यमान भ्रान्तियों से उबर कर हम भा+रतीय ‘भारती+य’ आवृत-चक्षु हो सकेंगे और तब हममें से अनेक मूलशंकर स्वामी दयानन्द सरस्वती से भी आगे जाकर भारत/भारतीयता को नित नए एवरेस्ट शिखरों पर आसीन कर सकेंगे।                                   
   -35 ईडन गार्डन, कोलार रोड, भोपाल-16 ,दूरभाष: 9425079072
                                       (पत्रिका ‘अक्षरा’ अगस्त्य 2020 अंक में , ‘मानस संगम भारती’ में प्रकाशित)
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 भारतीय होने का गौरव जगाती कृति  
    क्या है भारत क्या है भारतीयता

                              - डॉ॰ प्रगति श्रीवास्तव
 पुस्तक क्या है भारत क्या है भारतीयता लेखक विजय रंजन की जीवट क्षमता, गहन अन्वेषण एवं अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता दर्शाने का सफल प्रयास करती है। ‘पुरावृत्ति औ...र विवृति’ के अतिरिक्त पुस्तक में 9 अध्याय हैं - 1. प्रस्तावना, 2. भारत-नामकरण के मूलभूत आधार, 3. भारत-नामकरण के अन्य  आधार, 4. भारतवर्ष के अन्य नाम, 5. भारतवर्ष औ...र आर्यभूमि,     6. भारतवर्ष का प्राचीन क्षेत्र-विस्तार, 7. भारतवर्ष एक प्राचीन राष्ट्र, 8. भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र, 9. भारत का वास्तविक स्वरूप।
‘पुरावृत्ति औ...र विवृति’ में मैं लेखक की हिम्मत एवं ईमानदारी की दाद देती हूँ कि जिसमें उन्होंने यह खुल कर स्वीकारा है कि - “दुनियादारी में तमाम बौद्धिक सवाल कहीं दब कर रह जाते हैं।” वकालत के पेशे में रहते हुए तीन बार हृदय की शल्य-चिकित्सा के बाद भी उनकी लेखन की जीवट क्षमता एवं जिजीविषा वन्दनीय है। 
लेखक ने ‘औ...र’ केे बारे में यह स्वीकार किया है कि उन्होंने शब्दांकन की यह शैली कविवर ‘अज्ञेय’ जी से ली है जो अपने आप में अनूठी है। 
अध्याय ‘भारत-नामकरण के मूलभूत आधार’ में सभी वेदों (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद), सभी पुराणों (मत्स्य पुराण, मार्कण्डेय पुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण आदि) और सभी उपनिषदों के विभिन्न उद्धरण को संदर्भित  करते हुए भारत-नामकरण की व्याख्या इस प्रकार की है- भारत = भा $ रत, भा = प्रकाश, रत = तल्लीनता। भारत = प्रकाश को उभारने/प्रत्यक्ष करने/खोजने में तल्लीन रहने वाला राष्ट्र। 
लेखक ने अपने अन्वेषण के द्वारा यह भी बताया है कि भारतीय कवियों, साहित्यकारों एवं चिन्तकों जिनमें वाल्मीकि, कालिदास, माघ, भवभूति, बाण, राजा भोज, राजशेखर, तुलसीदास, निराला, जयशंकर प्रसाद आदि तो देवी सरस्वती के उपासक रहे ही हैं, साथ ही जैन कवि, बौद्ध कवि सुबन्धु, अंग्रेज लेखक जोन्स भी माँ भारती के उपासक रहे हैं। भारत-नामकरण माँ भारती (सरस्वती) के गुणों- महानता, लोककल्याणता आदि के आधार पर पड़ा एवं माँ सरस्वती के गुणों को मनसा-वाचा-कर्मणा अपनाने से उत्पन्न भास्वर व्यक्तित्व वाले जन भारतवासी हैं, इसीलिए वे भारतीय कहे गए। 
अध्याय ‘भारत-नामकरण के अन्य आधार’ में लेखक ने विभिन्न उद्धरणों में स्वप्न का भी उल्लेख किया है। फ्रायड एवं अन्य मनोवैज्ञानिकों ने भी स्वप्नों के विश्लेषण में अचेतन मन के अस्तित्व और स्वप्न की सार्थकता को स्वीकारा है। 
अध्याय ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ में लेखक ने इण्डिया (प्दकपं) नाम को अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए दिया गया नाम बताया है जिसका अर्थ है - प्दकपं त्र ;प्द ़ कपंद्ध अर्थात् एक निश्चित व्यास में रहने वाले अर्थात् कूपमण्डूक। लेखक ने सबूत दिया है कि पुरातन विद्वानों ने इसे इन्डोस (प्दकवे), इन्ड (प्दक), इन्डो (प्दकव) और ‘इन्तु को’ कहा था। ‘इन्तु को’ अर्थात् ‘पूर्ण चाँद जैसी उज्ज्वल छवि वाला राष्ट्र’ भारत को कहा गया। परन्तु अंग्रेजों ने इसे प्दकपं  जैसा गर्हित नाम दिया। 
अध्याय ‘भारतवर्ष के अन्य नाम’ में ही लेखक ने समाजशास्त्री बोगार्ड्स की अवधारणा व्यक्ति, समूह एवं हम जो समुदाय का निर्माण करते हैं, को महत्त्वपूर्ण तत्त्व बताया है। 
अध्याय ‘भारतवर्ष एक प्राचीन राष्ट्र’ में लेखक ने राष्ट्र के आवश्यक तत्त्व स्व॰ दीनदयाल के शब्दों में बताए गए तत्त्व देश = भूमि $ जन, सामूहिक जीवन का संकल्प, नियम या संविधान, जीवन आदर्श को आवश्यक बताया।
अध्याय ‘भारत का विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र’ में मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्री मैक्डूगल के सामान्य मन (ब्वउउवद डपदक ) पर बल डालते हुए कहा है कि हमारे संवेग (सुख-दुःख, क्रोध, प्रसन्नता आदि) ही राष्ट्रीय संचेतना का निर्माण करते हैं और हमारी राष्ट्रीय संवेदना पर ही हमारा राष्ट्रीय व्यक्तित्व निर्भर करता है।
अध्याय ‘भारत का वास्तविक स्वरूप’ जो धार्मिक एवं दर्शन पर आधारित है, का जिक्र करते हुए लेखक कहता है कि हर वह कार्य जिससे किसी को अकारण कष्ट न हो, प्रकृति को क्षति न पहुँचे, वही धर्म है। धर्म में नैतिकता, सात्त्विकता, सदाचार, सर्वकल्याण, लोकहित एवं लोकसंग्रह आदि गुण समाहित होने चाहिए। कुल मिला कर लेखक कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ के द्वारा भारतवर्ष के प्रत्येक व्यक्ति के मन में भारतीय होने का गौरव भाव जगाने के साथ ही भारत की उन्नति चाहता है। लेखक चाहता है कि भारत का प्रत्येक व्यक्ति अपनेआप को भारत का अंश मान कर, अपने को भारतमाता की संतान मान कर भारतवर्ष की उन्नति में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे ताकि कोई भी बाहरी शक्ति जाति, पंथ, आदि के नाम पर देश को बाँट न सके। मैं लेखक के इस भावपूर्ण सन्देश को साहित्य के पुरोधा राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में कहना चाहूँगी-
जो भरा नहीं हैं भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का व्यार नहीं।।
                 - प्राध्यापक, बरदह, पी॰जी॰ कालेज, आजमगढ़ (उ॰प्र॰),   दूरभाष: 8318552064
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      भारत के विषय में एक सम्पूर्ण ज्ञानकोश 

                         ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’                                                                                                                                                                             - कल्पना कौशिक

‘क्या है भारत और क्या है भारतीयता’ कोई साधारण पुस्तक नहीं वरन् एक ऐसा ग्रन्थ है जो वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर उन्हें भारत के नामकरण के आधार, अन्य नाम, क्षेत्रफल की विशालता, राष्ट्रीय चरित्र, भारत का वास्तविक स्वरुप आदि विभिन्न आयामों का परिचय देगा। 
‘भारत क्या है’ विषय के अंतर्गत भारत के बारे देशी और विदेशी दार्शनिकों की दृष्टिकोण में-- जिसमें भारत समुद्रयात्रियों का सपना, दुःखी हिन्दु देश, चरवाहों के गीत गाने वालों और सती प्रथाओं जैसी कुप्रथाओं का देश, सामाजिक, सांस्कृतिक इयताविहीन, टूटा बिखरा देश रहा है। वहीं लेखक ने उसका पुरजोर खण्डन भारत कीे पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा संस्कृत, वेद, उपनिषद्, वास्तु और कला संस्कृति, आध्यात्म, विज्ञान, सांस्कृतिक राजनैतिक इयता वाले राष्ट्र के रुप में उपस्थित कर किया है। 
लेखक का कथन पूर्णतः सत्य है कि भारत ऋतम्भरा प्रज्ञा से प्रकाश की खोज में सतत निरत रहने वाला राष्ट्र है। ‘भारत’ शब्द का विस्तृत अर्थ आज की भ्रमित, तथाकथित आधुनिक और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित युवा पीढ़ी के अज्ञानांधकार को दूर करने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध होगा। 
भारत के नामकरण के मूलभूत आधार के अंतर्गत दिए गए चारों वेद -ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद, पुराणांे और उपनिषदों के सूक्त और ऋचाओं के उदाहरण, श्रीमद्भगवद्गीता के द्वारा चैतन्य ज्ञानोन्मुख सत्ता के रूप में प्रोक्त वैदिक और लौकिक संस्कृत के विद्वानों के आलेख तथा मनसा-वाचा-कर्मणा की व्युत्पत्ति को चरितार्थ करती है। 
इस अनुपम और अद्भुत पुस्तक द्वारा पाठकों को न सिर्फ भारत के नामकरण और क्षेत्रफल का ज्ञान होगा वरन् भारत की अनुपम वैदिक और पौराणिक सांस्कृतिक वाड़मयों में वर्णित ऐतिहासिक वंशावली, धार्मिक साहित्यिक परम्परा, पुरातात्विक साक्ष्य आदि सभी का समन्वय मिलेगा। 
‘भारतीयता’ से तात्पर्य उस विचार या भाव से है जिसमें भारत से जुड़ने का बोध होता हो या भारतीय तत्त्वों की झलक हो या जो भारतीय संस्कृति से संबंधित हो। भारतीयता का प्रयोग राष्ट्रीयता को व्यक्त करने हेतु होता है। 
इस पुस्तक में उपरोक्त सभी तथ्यों के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रत्व के अनिवार्य तत्त्वों की जैसे- भारतीय भूमि, जन, संप्रभुता, भाषा एवं संस्कृति आदि की भी सम्पूर्ण विवेचना है। भारत के अन्य नाम और भारतीयता के अंतर्गत वैदिक वाड़मयों में वर्णित साक्ष्यों के साथ-साथ वैज्ञानिक साक्ष्यों का एक साथ अवलोकन एक ही स्थान पर देकर लेखक ने पाठकों को एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। भारत के विषय में कुछ भी जानने के लिए यह पुस्तक एक सम्पूर्ण कोश की अपेक्षा को पूर्ण करेगी और यह न सिर्फ ज्ञानवर्धन हेतु वरन् प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता के लिए भी यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। अन्त में -
नमन तव लेखनी को है, लिखा है वाङ्मय उत्तम। 
सहायक हों सदा ही आपके भगवान् पुरुषोत्तम।। 
मधुर कंठी तुम्हारे नाम का कोकिल करे गुंजन। 
यही है कल्पना मेरी, यशस्वी हों विजय रंजन ।। 
                                                                      -  गाजियाबाद, उ॰ प्र॰,  दूरभाष 9717045628









(  कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ एवं कृति ‘अप्रतिम साहित्यसेवी विजय रंजन’ से उद्धृत)

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