विजय रंजन की सभी कृतियों में ( विशेषकर समालोचनात्मक कृतियों में ) कोई न कोई विशिष्ट नवीन प्रस्थापना है जो राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि परिप्रेक्ष्यों से जुड़ी है। इसे अग्रांकित विवरण से स्पष्टतः समझा जा सकता है।
* कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ में भारतीय राष्ट्रवाद के विविध पक्षों के तर्कसंगत विवेचन समेत शान्तिकामी, सात्त्विक ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ की सैद्धान्तिकी सम्प्रस्तुत। भारत के प्रत्येक राष्ट्रिक में राष्ट्रभावना और राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्यभावना रोपित करने के लिए राष्ट्र ऋण नामक नवीन जन्मजात ऋण का प्रत्यय प्रस्तावित।
* कृति ‘क्या है भारत क्या है भारतीयता’ में भारत, भारतीयता के नामकरण का आधार, प्रकृति, प्रवृत्ति आदि की सैद्धान्तिकी सम्प्रस्तुत। विदेशियों द्वारा प्रदत्त एवं प्राचीन वांऊमय में उद्धृत भारत के सभी नाम भी प्रस्तुत ।
* कृति ‘राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित’ में भारतीय संस्कृति और भारतीय संस्कारों के आप्तपुरुष, मर्यादा पुरुषोत्तम और अंततः ‘भगवान्’ बनने वाले दाशरथि श्री राम पर विजड़ित आरोपों का सतर्क खण्डन सम्प्रस्तुत।
* कृति ‘राम सरिस कोउ नाहीं’ में मानव-इतिहास के अद्यतन मान्य जननायकों के सापेक्ष श्री राम की अप्रतिमता रेखायित।
* कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ में देशज-विदेशज काव्य-निकषों पर वाल्मीकि की श्रेष्ठता रेखांकित।
* कृति ‘रसवाद औ...र नयरस’ में काव्य-रसवाद की अद्यतन विसंगतियों का निवारण करते हुए ‘खीरा सिर ते काटिए....’ जैसे अपराध-विवेचन सह दण्ड का विधान एक साथ प्रस्तुत करने वाली नयवादी कविताओं के लिए एक नवीन काव्यरस ‘नय रस’ प्रस्तावित।
* कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ में पाश्चात्य नव्य-समीक्षा आदि के बजाय काव्य-नयवाद की पश्यन्ती भारतीय संचेतना को साहित्यिक समालोचना का आधार बनाने का प्रस्ताव सम्प्रस्तुत, जिससे काव्य (गद्य-पद्य साहित्य) जगत् में अश्लील, अनर्गल, समाज के लिए अहितकारी, गर्हित साहित्य का सृजन रोका जा सके और प्रेरणादायी सौम्य, शालीन, उच्च संस्कारों को प्रदान करने वाले काव्य का सृजन प्रोत्साहित किया जा सके।
* कृति ‘कविता क्या है’ में कविता के ‘क्या, क्यों, कैसे’ समेत कविता-सम्बन्धी 850 परिभाषाओं के विवेचन तथा कविता की नवीन सारवान् परिभाषा सम्प्रस्तुत। विजय रंजन द्वारा प्रस्तुत कविता की परिभाषा के काव्य जगत् में सर्वमान्य और प्रचलित हो जाने पर केवल सुसंस्कार उत्पन्न करने वाले समाजोपयोगी और उच्च भावों वाले काव्यों का ही सृजन प्रोत्साहित होगा क्योंकि तब इस परिभाषा से इतर सरोकार रखने वाली कविता ‘कविता’ ही नहीं मानी जाएगी।
* कृति ‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ में ‘बिम्बवाद’, ‘लोकवाद’, ‘मानववाद’, ‘नारी-विमर्श’, ‘प्रकृतिवाद’, ‘राष्ट्रवाद’ आदि प्रत्ययों के प्रथम प्रयोक्ता के रूप में आदि-महाकवि वाल्मीकि के अवदानों का तर्कसंगत रेखायन। इस कृति के कथ्य द्वारा भी वाल्मीकि, उनकी रचना ‘रामायणम्’ तथा काव्य जगत् के अनेकानेक साहित्यिक प्रत्ययों के साथ ही ‘नारी-विमर्श’, ‘प्रकृतिवाद’, ‘राष्ट्रवाद’ आदि के सम्बन्ध में जन-प्रचलित अनेक भ्रमों का सबल तार्किक निवारण होगा।
* कृति ‘तुलसी का स्वान्तः सुखाय’ में लोकमंगल के महाकवि तुलसी के साहित्यिक सांस्कृतिक अवदान और उनसे सम्बन्धित अति विवादित प्रश्न ‘तुलसी की जन्मभूमि’ पर निष्कर्षात्मक आलेख सम्प्रस्तुत।
* कृति ‘वातायन से’ में धर्म, दर्शन, संस्कृति, शिक्षा, राष्ट्रवाद, साहित्य आदि विषयों पर प्रतिमानक आलेख सम्प्रस्तुत।
* दो कहानी-संग्रहों में, 1. सूरज की आग 2. उभरते बिम्ब में, उद्देश्यपरक, दिशाबोधक कहानियाँ संगृहीत।
* तीन कविता-संग्रहों में 1. हाशिये से, 2. किर्चें, 3. दर्पण तीरे में राष्ट्रीय, सामाजिक, साहित्यिक एवं मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं से आभरित गीत, नवगीत, गजल, हिन्दी गजल, अकविता संगृहीत।
* स्फुट लेखन में साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रवादी विषयों पर संकेन्द्रित लेखन।
* पत्रिका ‘अवध-अर्चना’ में साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर आलेख सम्पादित, प्रकाशित। ऐसे विषयों पर बीसेक विशेषांक प्रकाशित।
* सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक विषयों पर अनेक संगोष्ठी, सम्मेलन आदि का आयोजन।
*अन्य विद्वानों/संस्थानों द्वारा आयोजित सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक विषयों पर आयोजित अनेक संगोष्ठियों में सक्रिय सहभागिता।
* विजय रंजन ने साहित्य को सर्वथा एक नवीन प्रत्यय ‘लोकोपयोगी समुपयोगी साहित्य’ में ढालते हुए लोक से सरोकारित समस्याओं के निदान हेतु एक नवीन विधा विधायित की। ‘आलेख समेत ज्ञापन’ नाम्नी इस विधा के अन्तर्गत लोक से सरोकारित समस्या के ‘क्या, क्यों, कैसे’ से सम्बन्धित आलेख समेत ज्ञापन भेजना उदाहृत किया।
साहित्य की इस नई अवदानित शृंखला में विजय रंजन ने स्वयं शिक्षा-नीति, राष्ट्रवाद, धर्मोत्थान, स्वच्छ प्रशासन, साहित्यिक उत्कर्ष आदि विषयों से सम्बन्धित अनेक ‘आलेख समेत ज्ञापन’ भारत सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार एवं सम्बन्धित प्राधिकारीगण को प्रेषित किए। कुछेक अन्य विषयों से सम्बन्धित ‘आलेख समेत ज्ञापन’ प्रेषित का क्रम गतिमान है।
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