किर्चें
एक सामाजिक आईना
- मनोज चन्द तिवारी
साहित्य-भूषण से सम्मानित, लब्ध -प्रतिष्ठ साहित्यकार एवं सामाजिक चिन्तक विजय रंजन जी द्वारा सृजित पुस्तक ‘किर्चें’ महज एक कविता- संग्रह नहीं, बल्कि एक सामाजिक आईना है। अपने सृजन में कवि ने सामाजिक परिस्थितियों को हू-बहू दर्शाया है। यह गीत, गजल, कविता और देशभक्ति की पंक्तियों के माध्यम से भारत की मुखर आवाज है। यह कृति भारतीयता से रूबरू कराने वाली महत्त्वपूर्ण कृति है।
सरस्वती वन्दना को पहले पृष्ठ पर सँजोए यह कृति आपको विभिन्न पड़ाव से गुजर कर एक सार्थक निष्कर्ष तक ले जाती है जिससे पाठक खुद को एक नए प्रश्नोत्तरों के बीच खड़ा पाता है और अंततः समाज को बेहतर बनाने के निष्कर्ष के साथ अपने कदम आगे बढ़ाता है। सरलता, सहजता और रोचकता की वजह से पाठक इसे बिना पूरा पढ़े चैन नहीं पा सकता है। सरस्वती वन्दना में कवि कहता है-
सुन ले मइया मेरी वंदना, आरत आया द्वार तिहारे ।।
वीणा-वादिनि तुझे पुकारूँ, आरत-मन से साँझ सकारे ।।
माँ सरस्वती से कवि निवेदन कर रहा है कि माँ आपने तुलसीदास, सूरदास, मीरा, जयशंकर, दिनकर, घनानन्द, भूषण, नागार्जुन, बच्चन, नीरज, महादेवी वर्मा को अपने आशीर्वाद से भवसागर पार लगा दिया तो मात हमारे ऊपर भी कृपा करो और हमें भी इस भवसागर के पार लगा दो। अगले ही पल माँ सरस्वती का वरद-पुत्र दिव्य पंक्तियाँ लिखता है-
मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं, गीत के नाम, अगीत के नाम ।।
जीवन का संगीत लिखूँ मैं, हार के नाम या जीत के नाम ।।
विजय रंजन जी की भाषा सहज, सरल और प्रवाहपूर्ण है। इन्होंने शब्दों को प्रसंगों के साथ बड़े ही सलीके से पिरोया है। जो कविता को बेहद जीवन्त बना देते हैं। इस कृति में 18 गीत-नवगीत, 26 गजलें और 36 अकविता-अगीत का संग्रह है जो न केवल पठनीय है बल्कि प्रबल मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाता है। इस पुस्तक में खड़ी बोली हिन्दी और अवधी का प्रयोग देखने को मिलता है।
अंततः मैं यही कहना चाहूँगा कि विजय रंजन जी एक जन कवि भी हैं। समाज को बारीकी से समझ कर उसकी मूक अभिव्यक्तियों को वे बड़ी ही संजीदगी से व्यक्त करते हैं। इनका चिन्तन जन-कल्याण से ओत-प्रोत है। मुझे पूरा विश्वास है कि इनकी कविताएँ समाज को आलोकित करेंगी और एक नया स्वर्णिम भारत बुनेंगी।
- कोच्चि, दूरभाष: 0812778057
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वैविध्यपूर्ण काव्य-संग्रह : किर्चें
- अजय मिश्र ‘अजर’
‘हाशिये सेे’ के बाद ‘ किर्चें ’ अवध-अर्चना के सम्पादक विजय रंजन का दूसरा काव्य-संग्रह है। विधा-वैविध्य से समृद्ध इस काव्य-संग्रह में सरस गीतों का प्रवाह है, गजलों की महकती फुलवारी है और साथ ही है अकविता-अगीत की प्रखरता।
काव्य-कृति का आरम्भ एक मनोहारी गीत से हुआ है, जिसमें विपरीत परिस्थितियों में भी कवि का सत् संकल्प पूरे साहस के साथ अभिव्यक्त हुआ है। कवि ठिठुरी अँगुलियों से भी हिमनद ऋत देवता को प्रणाम लिखने के लिए संकल्पबद्ध है।
वाणी-वंदना के पश्चात् संग्रह का दूसरा ही गीत ‘मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं ........’ अति आकर्षक बन पड़ा है जिसमें प्रतीक पद-विधानों द्वारा एक विशिष्ट भाव-बिम्ब के प्रस्तुतीकरण में कवि सफल रहा है। कवि जीवन की सभी दिशाओं को अपने गीत समर्पित करना चाहता है -
“ दूर कहीं महुआ बन महके
फिर पलाश के जंगल दहके
रतनारे कजरारे नयना
आज लगे कुछ बहके-बहके
नयनों की अनुभूति लिखूँ मैं
रीति के नाम, अरीति के नाम। ”
इसी भाँति अन्य गीतों की भी भाव-सघनता, बिम्बात्मकता, प्रतीकात्मकता द्रष्टव्य है।
ग्रामीण जीवन का वर्तमान कवि को उद्वेलित करता है और कवि मूल्यों, स्वस्थ परम्पराओं आदि के क्षरण पर चिन्तित दिखाई पड़ता है।
जनकल्याण की उदात्त भावना पर वणिक बुद्धि की विजय से भी कवि दुःखी है। तभी तो वह कह उठता है-
“ दिन बीते वे
जब मुखिया जी बनवाते थे कूप !! ”
अपने गीतों में कवि कहीं रोमानी हो उठता है, तो कहीं गहरी उदासी पसरी दिखाई देती है। पर इस रूमानियत के बावजूद न तो कवि की दृष्टि से यथार्थ ही ओझल हुआ है और न ही उदासी के कारण जीवन-जगत् से उसका विश्वास ही उठा है बल्कि विश्वास टूटने पर कवि दूसरे विश्वास का आश्रय लेने को सहर्ष प्रस्तुत है। कवि का अटूट आत्मविश्वास एक सकारात्मक और आशावादी चेतना का संचार करता है-
“ फिर लिखेंगे हम नदी की धार पर इक नाम
फिर किसी विश्वास की पतवार लेंगे थाम ”
संग्रह के दूसरे प्रभाग में गजलों की बहुवर्णी छटा है। कवि अपेक्षित ताजगी लाने में सफल रहा है। पर ताजगी के प्रबल आग्रह में चूक भी होती गई है। जैसे -
“ अधमरे तन को न सताओ
चील जैसी लगन छोड़ दो। ”
यहाँ पहले मिसरे का प्रवाह बाधित होने और लय को टूटने से बचाया जा सकता था। इसी तरह “ उड़ते गए हैं, उड़े थे चाँद को छूने, व्याकरण उड़ने का शायद रह गए जैसा “ या “ भीड़ से चलो करें बातें दो टूक, तन्हा कहीं बैठ कर, समन्दर किनारे। ” इन दोनों शे’रों में कवि का आशय समझने में कठिनाई होती है। अवधी गजल की छौंक अच्छी बन पड़ी है, जिसकी सहजता ध्यान खींचती है। जैसे- “ हाल न पूछो बड़कऊ। ”
कवि की दृष्टि अलक्षितों, उपेक्षितों की ओर भी है, जो उसकी गुण-ग्राहकता, सौन्दर्य-बोध और साधारण में भी कुछ असाधारण खोजी दृष्टि को रेखांकित करती है। एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा-
“ नीम का यह फूल भी आखिर तो फूल है। ”
संग्रह के तीसरे भाग में अकविताएँ-अगीत हैं। जो कवि के गहरे सामाजिक व मानवीय सरोकारों को अभिव्यक्त करते हैं। कवि स्वयं पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकता और कह उठता है-
“ बताओ कब-कब की तुमने किसी सच की तलाश ? ”
बौद्धिकता के आधिक्य में भी कवि का हृदय पक्ष उपेक्षित नहीं हुआ है। ‘माँ’ शीर्षक कविता इसका अच्छा उदाहरण है, जिसमें माँ एक जीवन्त अरगनी है जिस पर हर कोई अपना दुःख-दर्द टाँगता है और तब तक टाँगता रहता है जब तक वह टूट न जाए। समय को सहेजने के प्रति सचेत कवि एक बेहतर जीवन के प्रति सचेष्ट है। ‘सलाह’ कविता जीवन की सार्थकता तलाश करती हुई आश्वस्त करती है वहीं इस क्रम में ‘जड़-चेतन’ शीर्षक कविता भी लोकमांगल्य हेतु कवि के दार्शनिक दृष्टिकोण का परिचय देती है। अन्य कविताएँ भी अपनी गम्भीरता, विचारशीलता की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं, मसलन-- ‘बामियान के बुद्ध से’, ‘पाब्लो नरुदा से’, ‘मोनालिसा से’, ‘क्षमायाचना मरी चुहिया से’।
- द्वारा ‘पूर्वाकर’ पत्रिका, गोण्डा (उ॰प्र॰), (‘पूर्वापर’ त्रैमा॰ अंक जुलाई-सितम्बर 2011 में प्रकाशित)
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समकालीन सृजन-सन्दर्भों की संवाहक काव्यकृति ‘ किर्चें ’
- डॉ॰ किरन पाण्डेय
‘किर्चें’ विजय रंजन जी की एक विशिष्ट काव्य-कृति है जिसकी रचनाएँ सर्वथा अध्येय और अनुभावनीय हैं। यह सार्थक रूप में समकालीन सृजन-सन्दर्भों की संवाहिका कृति है।
संग्रह में 18 गीत-नवगीत, 27 ग़ज़ल-हिन्दी गजल और 36 अगीत-अकविताएँ समाहित हैं। संग्रह में विशेेष बात यह है कि संग्रह की रचनाओं के द्वारा रचनाकार ने प्रायः सर्वत्र जमीन खोजने और उसे पेश करने का प्रयास किया है जिसमें वह पूरी तौर से सफल नजर आता है। संग्रह की कविताएँ अपनी सहजता, निष्कपटता और भावनात्मक तीव्रता के कारण मन को ‘छूती’ हैं। कवि के जीवन का अनुभव बिना किसी लाग-लपेट के इन रचनाओं में रचा-बसा दिखता है। इस तथ्य का विवेकी-आरेख एक उदाहरण है -
लहुलुहान-सा गूँगा मौसम,
अनचाही हर साँस ढले।।
करवट बदल दिया नदिया ने,
घाट किनारे रेत जले।।
ठहर गए आँखों में बादल,
बरसातें बीमार हो गई !!
किर्चें: ‘रातें भी बीमार.......,’ पृ॰ 8
कहने की आवष्यकता नहीं कि यहाँ भाव और भाषा का मणि-कांचन योग दिखायी पड़ता है और शब्दों की अर्थ-गुरुता तथा प्रकृति की चाल और रहनी सहजतया आरेखित है। यहाँ उभरा बिम्ब कवि की काव्य-कला की विशेषताओं का निदेशक है।
प्रस्तुत कविता-संग्रह के गजल संग्रह-खण्ड में हमें युग-समाज की समस्याओं के प्रति कवि की छटपटाहट की गन्ध ही नहीं मिलती, अपितु विद्रोही स्वर की अनुगूँज भी सुनाई देती है। कवि ने उस पर अपनी कलम बड़ी बेबाकी से चलाई है।
आज समाज वस्तुतः कदाचार का कारखाना बन चुका है; धर्म प्रदूषित हो चला है; पर्यावरण और जीवन से खिलवाड़ हो रहा है। ऐसी सामाजिक संरचना में श्री विजय रंजन के कवि ने अपनी असंतोष भरी लेखनी चलाई है। इस सत्य के प्रमाण हेतु नीचे अवतरित कतिपय पंक्तियाँ देखिए-
सच है तुम्हें-हमें आज नहीं ज्यादा वास्ता
नदी की कल-कल से
आम-महुआ की बौराई डाली से
भौंरे की गुन-गुन से/कमलिनी की झलमल से
औ..र, ऐसे ढेर सारे प्राकृतिक उपादानों से !
किसी को गिला अब कहाँ/बूढ़े पीपल से ?
विहँस रही है बेबसी जिसकी
टूटे बिखरे पत्तों की तरह !!
सरस पुरवा से अब मिलता कहाँ
छटपटाहटों को दूर करने का रास्ता ?
किर्चें: ‘चेतावनी’, पृ॰ 62
संग्रह की कविताएँ कवि की जीवन-दृष्टि, उसकी सौन्दर्य-वैशिष्ट्य दृष्टि की कविताएँ हैं। उसने जीवन-व्यापारों को अपनी दृष्टि से देखा और उसे अपने समय के द्वन्द्व से जोड़ा है। उससे निकल कर आई कविता पाठक को हिला कर रख देती हैं। देखें-
काश ! बेवफा कसमों के नाम ही सही
मत टकराओ अपनी बेशर्म आँख/मेरी भरी आँखों से !
अपनी वहशी बेदिली छोड़ो ;
तूफानी सैलाब अपनी तरफ मत मोड़ो !!
संभव है तुम्हारी आँख हो बेपानी
मेरी आँख का पानी अभी मरा नहीं !!
मेरे धीरज का बाँध मत तोड़ो !!
किर्चें: ‘चेतावनी’, पृ॰ 63
वह कुत्सित ईप्सा का विरोध करता है, लोगों की स्वार्थी मनोवृत्ति का प्रतिरोध करता है, साथ ही ऐसी वीभत्स स्थिति से कुढ़ता नजर आता है -
होने लगता है हावी स्वार्थी-निजत्व/समष्टि पर
बढ़ जाती है बहुत ईप्सा-लिप्सा उसकी
त...ब/कर पाती कहाँ सहन.....यह वीभत्स स्थिति
एक विशिष्ट प्रकृति-प्रवृत्ति
हो उठती जो विवश
करने को भरसक
प्रतिरोध-विरोध ...... हर ईप्सा-लिप्सा का !
किर्चें: ‘परम्परा’, पृ॰ 67
यदि कविता का कार्य मनुष्य की चेतना में परिवर्तन लाना है तो ये कविताएँ उसका मापदण्ड हैं और राष्ट्र के नागरिकों के लिए चुनौती है। कविता का एक अंश दर्शनीय है -
तब.... हाँ ! त....ब/अपनी मिट्टी से जुड़ाव
यति-गति...............निरन्तर प्रगति
बिना पहुँचाए किसी को क्षति
सतत विकास/सुधार
बिना प्रतिदान के निष्कलुष प्रदान/त्याग/अपरिग्रह,
लोकमांगल्य की साधना का साकार प्रतिमान ;
क्या नहीं हैं ये/लक्षण चरम चेतना के ???
फिर भला/ क्यों मानते हैं आप
वृक्षों को मात्र जड़ ???
आप मानें तो मानें ..... मैं नहीं मानता !!!
किर्चें: ‘जड़-चेतन’, पृ॰ 71
काव्यत्व और कल्पना के धनी श्री विजय रंजन ने श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर विषयक एक रेखाचित्र भी आरेखित किया है। यहाँ भाव और भाषा दोनों की चारुतर कल्पनाशीलता, यथार्थता और उनकी अपनी दृष्टि की मौलिकता सहज दर्शनीय है, जहाँ वह अप्रत्यक्षतः लोक को सचेत कर रहा है -
मेरे भाई !/ बनवाया यदि तुमने-
अनाचार सम्पृक्त मन्दिर या मात्र मन्दर
वह भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के नाम पर
तब.... हाँ, त....ब, /है संभव
ऐसी प्रायोजना के प्रतिकार के लिए
उठा लें स्वयं राम जी अपना धनुष
बरसाने लगें/फव्वारे से फूटती पानी की धार सदृश
अपने अमोघ बाण अनवरत् !
नहीं सहते हैं अन्याय वे, अधिक दिनों तक ??
तीन ही दिन किया था विनय,/समुद्र-बंधन से पूर्व, उन्होंने सागर से
किर्चें: ‘एक रेखाचित्र’ पृ॰ 78-79
श्री रंजन का कवि काव्य-बिम्बों को उभारने एवं नए-नए प्रतीकों-उपमानों के प्रयोग में सिद्धहस्त है, इस दृष्टि से ‘रातें भी बीमार’, ‘कैसे अंगीकार करे मन’, ‘तुम सम्हाल रखना’, ‘अनागत’ आदि कविताएँ विशेष उल्लेखनीय हैं।
इसी प्रकार कवि की दृष्टि प्रचलित वर्तमान उपभोक्तावाद और अपसंस्कृति पर भी गई है जिससे सम्बन्धित काव्यांश हमारे मर्म को छूते हैं।
संग्रह की कविताओं का मूल्य इसलिए भी विशेष है कि जब तमाम कवि भटकाव एवं चमत्कार के शिकार हो रहे हैं, ऐसी दशा में ये कविताएँ एक दिशा तय करती हैं और पाठकों को विकृतियों से दूर रहने का संदेश देती हैं। आशयतः श्री विजय रंजन का रचनाकार कवि स्थितियों और विद्रूपताओं के आरेखन और उन पर करारी चोट करने से कहीं नहीं चूका है। उसे अपने काव्यत्व में महारथ हासिल है।
संग्रह की कविताएँ जितनी दमदार हैं उतनी ही कलात्मक हैं। उसकी कविताओं में जीवन का संघर्ष अंतर्निहित है।
संग्रह को दर्द और संघर्ष का, मौलिक दृष्टि और कल्पना का एक जीवन्त दस्तावेज भी कहा जा सकता है। इस दस्तावेज की सभी रचनाएँ सच्चे अर्थों में ‘कविता/काव्य’ हैं, नवगीत हैं।
संग्रह की कविताओं के अनुभावन से यह भी ज्ञात होता है कि श्री रंजन एक न्यायविद् होने के साथ-साथ एक गम्भीर चिन्तक और समीक्षक भी हैं। उनकी आस्था डगमगाती नहीं है।
संग्रह की रचनाएँ कवि की चेतनशीलता, सजगता, संवेदनमयता, अनाहत जिजीविषा और विशिष्ट तथा गहन सम्प्रेषणीयता का परिचय देती हैं।
ऐसे विशिष्ट-संग्रह के विरचन हेतु मैं उन्हें भूरिशः बधाई देती हूँ। विश्वास है संग्रह पाठकों का मनोरंजन तो करेगा ही साथ ही यह उनके लिए मनस्-रंजक भी सिद्ध होगा।
- प्रवक्ता, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, महिला महाविद्यालय, गोसाईंगंज- फैजाबाद (उ॰प्र॰), (‘अवध-अर्चना’ फरवरी-अप्रैल 2011 में प्रकाशित)
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