* पुस्तक को पढ़ते हुए सबसे पहला भाव जो मन में उत्पन्न होता है वो यह है कि ऐसी पुस्तकें बहुत गहन अध्ययन व शंोध के पश्चात् ही लिखी जा सकती हैं।
हजारों वर्ष पहले घटित एक घटनाक्रम में लोकश्रुतियों, विदेशी आक्रमणकारियों व देश में फैले अन्य धार्मिक मतों को मानने वाले लोगों ने जो अशुद्धियाँ प्रचलित कर दी हैं, उन्हें दूर करना बहुत ही दुरुह कार्य है क्योंकि सत्य जानने के बाद भी संकुचित मनोवृत्ति व रुढ़िवादी बुद्धि वाले कुतर्कियों के सामने उस सत्य को प्रमाणित करना अत्यन्त ही दुष्कर कार्य है लेकिन लेखक ने बहुत ही परिश्रम से उस कार्य को सिद्ध किया है।
श्रीराम सहस्त्राब्दियों से भारतीय जनमानस में अपनी गहरी पैठ रखते हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पूजे जाते हैं। वे भारतीय लोकचेतना और लोक-संस्कृति की आस्था के प्रतीक हैं।
राम का सम्पूर्ण जीवन लोक के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
वे पितृभक्त व आज्ञाकारी पुत्र हैं, वे स्नेहिल भाई हैं, वे पत्नी से प्रेम करने वाले एकनिष्ठ पति हैं, वे कर्त्तव्यनिष्ठ राजा हैं, प्रजापालक हैं।
वे मित्रता का मान रखने वाले मित्र हैं और भारत के शौर्य पुरुष हैं जिन्होंने त्रिलोकाधिपति रावण का गर्व धूल में मिला दिया था।
पूरे विश्व में अन्यत्र कहीं ऐसा उदाहरण नहीं मिलेगा जहाँ एक पति ने अपनी पत्नी को मुक्त करवाने के लिए राक्षसराज से टक्कर ली हो।
राम ‘प्रेम में समर्पण की पराकाष्ठा’ हैं, तभी तो कुशी-लवों की परम्परा हजारों वर्षों से रामकथा के रूप में श्रीराम का गौरवगान करती आ रही है।
लेकिन आक्षेप लगाने वालों का क्या किया जाए, जो साक्षात् मर्यादा पुरुषोत्तम पर भी आक्षेप लगाने के लिए तत्पर रहते हैं।
राम पर भी लगे आक्षेपों में से प्रमुख पाँच आक्षेपों के खण्डन पर लेखक ने अनेक ग्रन्थों का अध्ययन व शोध करके विस्तार से अपनी बात का स्पष्टीकरण दिया है कि ये सभी आक्षेप मिथ्या हैं, इनमें कोई सच्चाई नहीं है।
श्रीराम पर लगे वैसे तो सभी आक्षेप हास्यास्पद हैं जिनका कोई भी आधार नहीं है लेकिन खर से कायरतापूर्ण युद्ध का आक्षेप तो एकदम ही निरर्थक है। जिस काल में वह युद्ध हुआ था, युद्ध की जो नीति उस काल में प्रचलित होगी, उसका ज्ञान तो किसी को है नहीं, लेकिन बिना सोचे-विचारे आक्षेप अवश्य लगा देंगे। श्री राम ने अकेले ही खर-दूषण सहित चौदह हजार राक्षसों का वध एक प्रहर में किया था। ऐसा पुरुषत्व किसी वीर योद्धा में ही हो सकता है। विजय रंजन जी ने बहुत ही तर्कपूर्ण विवेचन करके इस आक्षेप का खण्डन किया है।
ताड़का (ताटका) वध पर भी आक्षेप का कोई कारण नहीं दिखाई देता। समाज के लिए जो भी अहितकारी हो, उसे समाप्त करना एक राजा का धर्म है। श्रीराम ने सबके हित के लिए एक आततायी का वध करके शान्ति की स्थापना की। आततायी स्त्री है या पुरुष, इसका प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। जनहित के लिए हर आततायी का वध आवश्यक है।
बाली वध के सन्दर्भ में भी लेखक के तर्क अकाट्य हैं। लेखक ने ऐसे बिन्दुओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है जिन पर सामान्य व्यक्ति सोच भी नहीं पाता। ये श्रीराम के प्रति लेखक की आस्था व विश्वास ही है। बाली की छाती में बाण का लगना ही श्रीराम को (इस सम्बन्ध में) सभी आक्षेपों से मुक्त कर देता है।
यह निर्विवाद सत्य है कि माता सीता के लिए राम कितना विकल हुए थे। अपने प्राण देने को भी उद्धत हो उठे थे और जनस्थान से समुद्र तट तक की यात्रा उन्होंने सीता की खोज में पैदल ही की थी।
रावण जैसे प्रबल, मायावी, व शक्तिशाली शत्रु से पैदल ही लोहा लिया था और सीता को वापस लाए। प्रेम का ऐसा अनुपम, उदात्त उदाहरण अन्यत्र कहीं नहीं है। तब उन पर सीता-निष्कासन का आरोप लगाना प्रेम की अवहेलना करना है।
वास्तव में तत्कालीन समाज व राजनीतिक व बहुजन हिताय से अति विवश होकर उन्हें एक दारुण दुःखद निर्धय लेना पड़ा। वे एकनिष्ठ पति होने के साथ ही कर्त्तव्यनिष्ठ राजा भी थे, यह भी स्मरण रखना होगा।
शम्बूक-वध के सन्दर्भ में श्रीराम व शम्बूक के जो सम्वाद लेखक ने प्रस्तुत किए हैं, वे अपने आप में राम पर लगे आक्षेप का खण्डन करते हैं।
निःसन्देह, इतने अध्ययन के बाद जो सार इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है, वो पाठक को निःशंक कर देता है। इस हेतु लेखक बधाई के पात्र हैं।
सन्दर्भ गं्रथों में भारत के विभिन्न राज्यों की भाषाओं में लिखित रामायण के साथ ही विदेशों की रामायण, यथा- ककविन रामायण- इण्डोनेशिया, रामकियेन- थाईलैण्ड, रामकेर- कम्बोडिया, हिकायत सेरीराम- मलेशिया का उल्लेख आलेख को और बल देता है।
राम सिर्फ भारत ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व की चेतना का उजास हैं और रहेंगे। कोई आक्षेप राम को जनचेतना, संस्कृति और मानव-सभ्यता से विलग नहीं कर सकता।
यह पुस्तक इसका (राम पर लगाए जाने वाले आरोपों का) सशक्त उत्तर है।
पुस्तक की संस्कृतनिष्ठ भाषा पाठक को बाँधे रखती है, तो वहीं लेखक के अकल्पनीय गहन अध्ययन और वर्षों के शोध के प्रति पाठक नतमस्तक हो जाता है।
यह पुस्तक वर्तमान समय की आवश्यकता है। इसे हरेक को पढ़ना चाहिए।
- विनीता राहुरीकर, भोपाल, दूरभाष: 9826044741
रामविषयक जानकारी का कोश है कृति
राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित
- लालसा लाल तरंग
विजय रंजन की अनुपम कृति ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ आद्योपान्त देख गया। सुखद आश्चर्य एवं अब तक अनछुए कुछ पहलुओं को छूने का आनन्द प्राप्त हुआ। विजय रंजन जी ने गजब का समुद्र मंथन किया है।
गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित एक पुस्तक कभी देखी थी। वह अब लगभग विस्मृत है, परन्तु जोर डालने पर स्मृतिपटल के अस्पष्ट फलक पर एक अति लघु प्रकाश दिखता है, जिसमें ऐसे ही कुछ आरोपों के उत्तर हैं। साहित्य के अध्ययन के लिए तीन दृष्टिकोणों को मुक्तिबोध ने रेखांकित किया है- “किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टिकोणों से देखना चाहिए। एक तो यह कि वह किन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शक्तियों से उत्पन्न है अर्थात् किन शक्तियों के कार्यों का परिणाम है, किन सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का अंग है ? दूसरा, यह कि उसका अंतःस्वरूप क्या है, किन प्रेरणाओं और भावनाओं ने उसके आंतरिक तत्त्व रूपायित किए हैं ? तीसरा, उसका प्रभाव क्या है, किन सामाजिक शक्तियों ने उसका उपयोग या दुरुपयोग किया है और क्यों ? साधारण जन के किन मानसिक तत्त्वों को उसने विकसित व नष्ट किया है ?” (मुक्तिबोध रचनावली-5, पृ॰ 293)। यहाँ एक बात और। “प्रतिक्रियाएँ तो मन करता है; पर वे सही हैं या गलत ? इसके लिए कुछ सोचना-विचारना भी पड़ता है। दूसरों के विचारों और अनुभवों को भी इस सम्बन्ध में जानना पड़ेगा। मतलब यह कि इस काम में जितनी देर तक और जितनी गम्भीरता से आगे बढेंगे, आपकी प्रतिक्रियाओं और विचारों में उतनी ही व्यवस्था आती जाएगी” (मुक्तिबोध रचनावली-4, पृ॰ 25 )।
मुझे लगता है कि विजय रंजन ने विभिन्न रामायणों और तत्सम्बन्धी अन्य ग्रन्थों का व्यवस्थित अध्ययन अपने उद्देश्यों के तहत ही जाने-अनजाने किया है ताकि उपर्युक्त दृष्टिकोणों में पसरे प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकें।
मैं बिल्कुल दावा नहीं कर सकता कि कथित पुस्तक की समीक्षा करूँ। कसीदे काढ़ना भी संभवतः तथाकथित कुछ समीक्षकों को खल सकता है, परन्तु यह तो ताल ठोंक कर कह सकता हूँ कि पुस्तक के अंत में आधारग्रंथ, पत्र-पत्रिकाएँ एवं ब्लॉग देख कर ही मेरे उपर्युक्त कथन के प्रति जिद्दी गवाह की भूमिका का पता लग जाता है।
यह सर्वज्ञ है कि राम सबके राम (अपवादों को छोड़ कर) हैं। कवियों और लेखकों में भी राम के रूप पृथक-पृथक हैं (यहाँ मैं सहज ही स्वीकारता हूँ कि अधिकांश संदर्भित ग्रंथों से मेरी भेंट नहीं है)- “हिन्दी जगत् में कबीर के राम भी वाल्मीकीय राम से विलग हैं। कबीर जैसे निराकारवादी भक्त कवि उन्हंे ‘पिउ’ मानते हैं और स्वयं को ‘राम की बहुरिया’ या थोड़ा और आगे बढ़ कर स्वयं को ‘राम की कुतिया’ बताने में गर्व महसूस करते हैं; परन्तु प्रतीततया ‘कबीर के राम’ वाल्मीकीय राम के समरूप नहीं हैं। जायसी के राम, फैजी के राम, श्रीलंकाई ‘जानकीहरणम्’ के राम, मैथिलीशरण गुप्त के राम, महफूज हसन रिजवी ‘पुण्डरीक’ के राम, अल्लामा इकबाल के राम, शमीम कैसर के राम, जुमईखाँ आजाद के राम, रज्जब के राम, सूफी गुलाम किवरिया के राम, रहमत उल्लाह आजमगढ़ी के राम, मौलाना वसाली की ‘मा मुकीमा के राम’, रमानाथ त्रिपाठी के राम, पं॰ राधेश्याम कथावाचक के राम, अधुना कवि उद्भ्रान्त के राम या कि डॉ॰ विद्याभास्कर बाजपेयी की ‘शेष रामकथा’ सदृश रामाख्यानों के अनगिनत राम भी वाल्मीकीय राम से सर्वांगसम नहीं होते हुए भी मूलतया उनसे अनुप्राणित हैं। ” (पृ॰ 150)
उपर्युक्त के बाद भी लेखक ने आचार्य चतुरसेन शास्त्री, नरेन्द्र कोहली, कुबेरनाथ राय, निराला, नरेश मेहता, भगवान सिंह आदि के राम की साहित्यिक तुलना करते हुए बड़े प्रामाणिक एवं प्रभावी ढंग से वाल्मीकीय राम की चर्चा की है, जो राम-विषयक जानकारी का एक कोश कहा जा सकता है।
कभी ‘रामायण’ रामानन्द सागर का एक सीरियल अत्यन्त लोकप्रिय हुआ करता था। रामानन्द सागर ने सीरियल के आरम्भ में बताया था कि उन्होंने लगभग 26 रामायणों की घटनाओं को देख कर रामायण की कहानी चित्रित की। लेकिन विजय रंजन ने अनेक रामायणों, राम-चरित्रों और रामकथाओं की विशद चर्चा की है। मजेदार और उल्लेखनीय बात यह है कि विजय रंजन जी ने रामकथा की चर्चा करते हुए रामकथा से अन्य में भी तल्लीनतापूर्वक झाँका है, जो निश्चिततः प्रशंसनीय है। जैसे - “रामकथा से इतर चर्चित महाकाव्यों के नायकों को देखे तो राम के पूर्वज ‘कामायनी के मनु’ या कि ‘कालिदास के अज’ भी कुछेक उदात्त आदर्शों से समेकित दर्शाए गए हैं, लेकिन उनके कृत-कर्म में भी लोक-कल्याण की भावना वाल्मीकीय राम की लोक-हितैषिता आदि की ऊँचाई को छू पाने में सक्षम नहीं दिखती। अन्यान्य महाकाव्यों के कथित नायक, महानायक (वे देशज हों या विदेशज) इन निकषों पर कहीं भी नहीं टिकते।” (पृ॰ 152)
कृति में ‘आरोप’ को ‘आक्षेप’ कहा गया है। दरअसल आरोप-प्रत्यारोप-आक्षेप ये बड़े सरल शब्द हैं, जिनके सहारे किसी को भी प्रथमद्रष्टया गलत प्रमाणित किया जाता है। बाद में भले उसे खारिज किया जाए। अगर, मगर, पर, परन्तु, लेकिन--- ये ऐसे संयोजक शब्द हैं, जिनके प्रयोग से अच्छे को बुरा और बुरा को अच्छा प्रमाणित करने में सफलता होती है। वैसे ही ‘आक्षेप’ भी अपनेआप में ‘महत्त्वपूर्ण’ और ‘महत्त्वहीन’ हो जाता है।
राम के ऊपर (मेरी समझ से) दो अवधारणाएँ काम करती हैं। एक रामायण या रामचरितमानस की प्रतियाँ (मनुवादी विचारधारा का आरोप लगा कर) जलाने वाली और दूसरी अवधारणा ‘राम’ को ‘पूज्य’ मानने वाली ! हाँ, एक तीसरी अवधारणा भी जन्माई गई है ‘जय श्रीराम’ की। यह भी अंध- अवधारणा ही है। अब इसे दलगत माना जा रहा है, जो राम के ऊपर किसी भी आरोप का राजनीतिकरण ही करता है, बिना उचित उत्तर ढूँढे।
कृति में राम पर लगाए जाने वाले पाँच आरोपों की विशद चर्चा की गई है। विजय रंजन ने सभी आरोपों के विषय में तर्कसंगत प्रमाणों के आधार पर चर्चा करते हुए उन्हें साहस से खारिज किया है।
किसी विद्वान् ने लिखा है- त्पहीज ज्ञदवूसमकहम पे जीम नसजपउंजम ेवसनजपवद व िंसस वनत चतवइसमउे । मैं इस विचार से पूर्ण सहमत होते हुए विजय रंजन के खारिज करने के तर्क व प्रमाणों से भी सहमत हूँ , जिनको किसीं राजनीति के खम्भों मंे नहीं बाँधा जा सकता है। अब यह बात अलग है कि “रामकथा विश्व-व्यापिनी है, इसीलिए कलिकाल की इस महामारी मंे सम्पूर्ण विश्व इस कृति के तथ्यों का संज्ञान लेकर श्रीराम के तपपूर्ण जीवन से उपजी ‘रामनामी’ ओषधि से स्वस्थ होकर पुनः सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त होगा, ऐसी कामना है” (पृ॰ 14)-- इस कथन से सहमत होना मुझे गवारा नहीं क्योंकि रामकथा सभी रामायणों में भिन्न-भिन्न प्रकार और सन्दर्भों को समेटे है। ‘रामनामी’ औषधि हमारी अपनी अवधारणाओं का ‘मिश्रण’ और ‘अमिश्रण’ है। हालाँकि विजय रंजन जी ने ऐसे किसी मिश्रण को थोपा नहीं है। मैंने देखा कोविड-19 के भीषण प्रकोप के दौर में अनेक स्थानों पर पूजा-पाठ, होम-जाप आदि निष्फल प्रयोग अखबारों की हेडिंग बने। कई-कई बड़े नेताओं को स्वस्थ रहने के लिए भी ऐसे अनेक प्रयोग किए गए। पर बीमारी तो बीमारी है, दवा ही काम करेगी। उल्लेख करना जरूरी लगता है कि विजय रंजन चाहे जिस भी विचारधारा के हों, उन्होंने बड़े ही तर्कपूर्ण साहस के साथ सभी आरोपों को खारिज कर दिया है।
“सभी जानते हैं कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के लेखन में जो महत्त्व ‘तुलसी’ का है, वही महत्त्व डॉ॰ रामविलास शर्मा की आलोचना में ‘निराला’ का है। डॉ॰ शर्मा ने स्वयं स्वीकारा है कि यदि उनके प्रिय कवि ‘निराला’ पर अनुचित आक्षेप नहीं हुए होते, तो वे हिन्दी आलोचना में शायद सक्रिय होते ही नहीं“ (आलोचना 44, जनवरी-मार्च 2012, पृ॰ 73)। विजय रंजन जी को भी शायद राम पर लगाए गए आरोपों के उत्तर की ऐसी ही वांछित अनिवार्यता ने विवश किया और यह पुस्तक आ गई, जिसने उनके आलोचकीय स्वभाव में नया अंक जोड़ा है। प्रमाण अकाट्य है- “विद्वान् लेखक विजय रंजन ने राम के उज्ज्वल चरित्र पर किए जाने वाले आक्षेपों (ताड़का वध, खर से कायरतापूर्वक युद्ध, परोक्ष/छù युद्ध में बालि-वध, निर्दोष सीता का निर्वासन और शूद्र तापस शम्बूक का वध) की गम्भीर संश्लेषण-विश्लेषण तथा मीमांसा करते हुए जो साधार, तर्कपूर्ण और विश्वसनीय निष्कर्ष दिए हैं, वे सम्यक् साक्ष्य एवं मौलिक भाष्य के कारण सहज ग्राह्य हैं” (पृ॰ 17)। डॉ॰ ओंकारनाथ त्रिपाठी के इस रेखांकन से मैं सहमत हूँ।
जो लोग साहित्य में जनता का चित्रण करना चाहते हैं और नहीं भी करना चाहते हैं, दोनों ही तरह के लोगों के लिए यह आवश्यक है कि वे जनता के इस रूप को ध्यान में रखें। जनता कोई सस्ता नुस्खा नहीं है, जिससे राजनीति, अर्थशास्त्र या साहित्य की सभी समस्याएँ पलक मारते ही हल कर दी जाएँ। इसके विपरीत जब हम साहित्य में जनता का चित्रण करने चलते हैं, तो हमारे सामने तरह-तरह की समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। विजय रंजन ने रामचरित्र और उन पर लगे पाँच प्रमुख आरोपों की चर्चा की है। यह चर्चा निश्चित राम और तत्कालीन रावण, बालि, शम्बूक, ताड़का आदि से सम्बद्ध है। लेकिन चर्चाओं का परोक्षतः जनसरोकार तो बनता ही है। तब लेखक के समक्ष समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं ताकि जनसरोकार को अस्वीकार न किया जा सके। समीक्षकों के समक्ष भी एक मानदण्ड खड़ा है जिसके उस पार निष्पक्षतया जाना ही पड़ता है। विजय रंजन ने अपनी लेखकीय सीमा बरकरार रखते हुए समीक्षकों को भी अपनी सीमा में प्रवेश करने का प्रशस्त मार्ग दर्शाया है क्योंकि उन्होंने ‘कितने अनुचित कितने उचित’ दोनों प्रकार के उपकरणों का पुस्तक में सतर्कतापूर्वक प्रयोग किया है।
युद्ध-कौशल में अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं जहाँ ‘युद्ध कला में पीछे जाकर फिर आगे बढ़ना, फिर पीछे हटना और आक्रमण करना’ यह सही है अर्थात् जंग में सबकुछ जायज है। मैंने अपने गाँव (हरइया, खलीफतपुर, आजमगढ़) के एक अखाड़े में लड़ाने वाले नट को देखा था जिसने सीखने वालों को पहले ही बता दिया था कि सामने वाले पर हमला करने से पहले थोड़ा पीछे हट जाओ। लेखक द्वारा दिया गया खुद के विषय में भी लाठी सीखने के समय का प्रमाण सर्वज्ञ है। अब अगर राम ने तीन कदम पीछे हट कर युद्ध किया तो इसमें नाजायज क्या है ? यह विचारणीय है। जाहिर है कि लेखक ने खर से राम के युद्ध के विषय में भरपूर तर्क दिया है (पृ॰ 40-41); हालाँकि सब जगह इस आरोप का जिक्र नहीं है।
इसी तरह, सभी कथित आरोपों को निरस्त करने के तर्कसंगत उचित आधार एवं प्रमाण दिए गए है, जो सहज ही मान्य लगते हैं। कहा जा सकता है कि पुस्तक उपयोगी है, पठनीय है और खासकर रामद्रोही लोगों के लिए मील का पत्थर है जिसके आगे जाना निष्फल दुराग्रही यात्रा होगी जबकि आमजन के लिए यह ज्ञान-वृद्धि का अवसर है।
- 464, राधिका निवास, भोलाघाट मार्ग, एलवल आजमगढ़-276001 , दूरभाष: 09936228250
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आक्षेपकों को चुनौती देती कृति
राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित
- डॉ॰ पुष्पलता
श्री विजय रंजन जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ पढ़ने के बाद एक मुस्कान बरबस होठों पर तैर गई। कितनी गहन और सूक्ष्म अध्ययनशीलता के द्वारा उन्होंने राम पर लगे तमाम आक्षेप निराधार साबित कर निरस्त कर दिए। जो आक्षेप क्षेपक नहीं माने गए, उन्हें भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक, आक्षेपकों के तर्क स्वीकार करते हुए आदि-महाकवि वाल्मीकि की रामायण को आधार बनाकर राम पर लगे तमाम आक्षेप धराशायी कर डाले। सबसे प्रबल आक्षेप सीता-निष्कासन, शम्बूक-वध को उन्होंने ‘राम के द्वारा अतीत में किए कार्यों-व्यवहार’ से निष्कर्षित निष्कर्षांे (कि ‘वे नारी-द्वेषी नहीं थे, शूद्र-विरोधी नहीं थे’) की धार से काट डाला ।
ताड़का-वध स्त्री-हत्या दोष से लेखक ने राम को मुक्त किया। वाल्मीकि-कृत बालकाण्ड के आधार पर लेखक ने राम द्वारा ताड़का-वध को न्यायोचित ठहराया है। उनका कोई भी कार्य स्वयं के निमित्त नहीं था। वाल्मीकि-कृत बालकाण्ड में राक्षसराज विरोचन की पत्नी मंथरा और ऋषि भृगु की पत्नी का उदाहरण देकर विश्वामित्र ने राम को ताड़का-वध के लिए आदेश दिया था-
श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचन सुतां नृप ।
पृथ्वीं हन्तुमिच्छनतीं मन्थरामभ्यसूदयत्।। 20।। सर्ग 25
विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता ।
अनिद्रं लोकमिच्छन्तीं काव्यमाता निषूदिता ।।21।। सर्ग 25
भवभूति-कृत ‘उत्तररामचरितम्’ के प्रमुख सहपात्र राम-पुत्र लव द्वारा दण्डकारण्य में राक्षस-छत्रप खर के विरुद्ध राम के युद्ध की घटना को आधार बनाकर ‘राम द्वारा तीन पग पीछे हट कर युद्ध करने को कायरतापूर्ण युद्ध’ बताए जाने को लेखक ने युद्ध-कौशल बताया। इसे तलवारबाज, लाठीबाज, गदकाबाज की तरह पैंतरा बदलना कहा।
भवभूति-कृत ग्रंथ के लव के राम-कृत धोखे से बालि-वध के आरोप को उन्होंने किष्किन्धा काण्ड सर्ग 21 में तारा द्वारा कहे श्लोक से निराधार साबित किया-
.... शरेण हृदि लग्नेन गात्रसंस्पर्शने तव।।16।।
वार्यामी त्वां निरीक्षयन्ती त्वयि पंचतत्वमागते।.......।।17।।
(आपकी छाती में जो बाण धँसा हुआ है, वह मुझे आपके शरीर का आलिंगन करने से रोक रहा है।.....)
लेखक का आशय है कि धोखे से लगा बाण तो बालि की पीठ पर लगता, इसलिए कायरतापूर्ण वध का आरोप निराधार है।
राम के चरित्र का अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि राम सत्ता-लोभ से परे थे। जो राम अपने वचन के लिए अपने सबसे प्रिय भाई के वध के लिए भी तैयार हो जाए, पिता के वचन के लिए भार्या सहित अपना तमाम जीवन संकटों में झोंक दे, वे राम राजसिंहासन के प्रति आसक्ति तो रख ही नहीं सकते थे। राम ने आजीवन तमाम कार्य लोकहित में या लोकापवाद से बचने हेतु किए। राम ने सूर्यवंश की ‘प्राण जाय पर वचन न जाय’ प्रतिज्ञा का ही निर्वहन किया। भीलनी के झूठे बेर खाने वाले राम शूद्रविरोधी तो हो ही नहीं सकते थे। किसी भी कार्य के लिए वे स्वतंत्र भी नहीं थे। शम्बूक-वध के लिए अगर कोई दोषी था, तो वह अयोध्या की सभा थी। अहल्या-उद्धार करने वाले राम के मन में सीता जैसी पत्नी के प्रति शंका का सवाल ही नहीं था। ‘एक और वैदेही’ खण्डकाव्य की शुरूआत करते वक्त मैंने भी अपनी कलम नारी होने के नाते आक्रोश के साथ उठाई थी। स्वयं ही राम के चरित्र की परतें खुलती गईं और मैं खुद ही उन्हें निर्दाेष सिद्ध कर बैठी थी। वस्तुतः सीता-निष्कासन के लिए अगर कोई दोषी था (जैसा कि लेखक का अभिमत भी है) तो वह अयोध्या का जनमानस था।
राम पर लगाए गए आक्षेप उनकी मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि धूमिल करते हैं। आक्षेप किसने लगाए ? ये बात मायने नहीं रखती। क्यों लगाए ? अगर लगाए तो कितने सही है ? सही हैं तो उनके सही होने के आधार क्या हैं ? आधार अगर हैं तो उन्हें निराधार साबित करने के लिए समुचित आधार तथ्य कौन से हैं ?
राम जनमानस में स्थित एक ऐसा चरित्र है जिसके प्रत्येक कार्य को राम को भगवान मानने वाले आस्था के आधार पर ही सही ठहरा देते हैं। भगवान न मानने वाले उन्हें ताड़का वध, खर से कायरतापूर्वक युद्ध, परोक्ष छù युद्ध में बालि-वध, निर्दाेष सीता का निर्वासन, शूद्र तापस शम्बूक-वध प्रकरणों में दोषी मानते हैं। किन्तु दोष या निर्दाेष वर्तमान युग में आस्था के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। उसके लिए संदर्भित ग्रन्थों का ही सहारा लेना पड़ेगा। उन्हीं के आधार पर तय होगा कि उनका आचरण वास्तव में मर्यादापूर्ण ही था या नहीं था। पुस्तक में लेखक ने वाल्मीकि-कृत ‘रामायणम्’ को आधार बनाकर ही एक-एक आक्षेप को असत्य सिद्ध किया है। इसके लिए लेखक ने अनेक अन्य ग्रंथों को भी आधार बनाया है।
राम को दोषमुक्त सिद्ध करके लेखक ने आक्षेपों की तमाम गेंदे आक्षेपकों के पाले में फेंक दी हैं ! अब उनका दायित्त्व बनता है कि या तो वे सिद्ध करें कि ‘लेखक द्वारा सिद्ध की गई राम की निर्दाेषिता असिद्ध है’ या ‘उनके द्वारा सिद्ध की गई सत्यता को स्वीकार करें’।
लेखक द्वारा लिखी गई ये अद्भुत पुस्तक, जो वास्तव में एक उम्दा शोधग्रन्थ है, तमाम आक्षेपकों द्वारा विशेष समीक्षा की मांग करती है। पुस्तक आह्वान करती है कि आक्षेपक या तो पुस्तक में दिए तथ्यों, तर्कों, उदाहरणों की तथ्यपरक काट प्रस्तुत करें अथवा राम कों निर्दाेष मानें। राम को तमाम आरोपों, आक्षेपों से बरी करने वाले इस अद्भुत शोधग्रंथ के लेखक श्री विजय रंजन जी को साधुवाद देती हूँ। - मुजफ्फरपुर, दूरभाष: 09810350330, फेसबुक पर उपलब्ध।
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लोकरंजक ही नहीं ज्ञानवर्द्धक भी है कृति
राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित
- डॉ॰ अलका सिंघल
‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ विजय रंजन जी द्वारा लिखित पुस्तक एक अत्यन्त सुरुचिकर विषय को अपनेआप में समाहित किए हुए है। भाषा अत्यन्त सुदृढ़ एवं धाराप्रवाह है। स्थान-स्थान पर ‘उत्तररामचरितम्’, ‘रामायणम्’ आदि के उद्धरण विषय को सार्थकता प्रदान करने के साथ-साथ लेखन की गहन प्रबुद्धता को भी प्रमाणित करते हैं। युग-युगान्तर से जनमानस के आदर्श नायक राम पर आरोपित प्रश्न आज भी जनमानस में घनघोर मेघ की तरह उमड़ते-घुमड़ते हैं। पुस्तक में लेखक द्वारा राम पर आरोपित प्रश्नों के समाधान अत्यन्त तर्कसंगत व सारगर्भित हैं।
राम पर प्रथम आक्षेप: ताड़का-वध है क्योंकि ताड़का एक स्त्री है। स्त्री होने के बावजूद ताड़का अबला नहीं थी, अपितु बलशालिनी जनघातक मायावी राक्षसी थी। ऋषि विश्वामित्र के आदेशानुसार लोकरक्षार्थ ताड़का वध ‘न्यायोचित कर्त्तव्य-कर्म’ है- ये तर्कसंगत समाधान लेखक ने प्रस्तुत करके राम के आरोप को पल भर में धूल-धूसरित कर दिया। (द्रष्टव्य पृ॰ 35, 38)
आक्षेप ‘खर से कायरतापूर्वक युद्ध का लेखक ने बड़ी कुशलता से निराकरण इस तर्क से किया है कि ‘तीन कदम पीछे हट कर पुनः आगे बढ़ कर वार करना ... संभवतः ऐसी युद्धकला से परिचित नहीं थे लव। .... यह राम की कायरता नहीं, बल्कि कुशल रणनीतिज्ञ होने का परिचायक .... लेखक के इस तर्कपूर्ण समाधान से सम्भवतः पाठकगण सहमत व सन्तुष्ट होंगे।
राम पर छù युद्ध में बालि-वध के आरोप के प्रसंग में भी लेखक ने राम द्वारा बालि का छù से परोक्ष में पेड़ के पीछे छुप कर युद्ध करने के आरोप का निराकरण अत्यन्त तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है, जो पाठकों के लिए वस्तुतः संतोषप्रद है।
राम पर चतुर्थ आक्षेप: ‘सीता का निर्वासन’ वस्तुतः अत्यन्त गम्भीर है। इस प्रसंग में राम की विवशता, पीड़ा, कर्त्तव्यनिष्ठा और नैतिकता का विस्तृत वर्णन लेखक ने इतने कलात्मक और सुरुचिकर ढंग से किया है कि पाठक राम की पीड़ा और विवशता की ओर भी अभिमुख होने को विवश अवश्य होंगे। लेखक के ये सारगर्भित वचन द्रष्टव्य हैं- “राजा दशरथ भी रघुकुल के महावीर यशस्वी राजा थे परन्तु अति प्रिया पत्नी कैकेयी के सुख एवं अपनी सत्यवादिता-जनित यश-लोभ से उबर नहीं पाए थे वे, तो क्या राम भी गर्हित इतिहास दोहराते ? ....... सीता के संदर्भगत निर्वासन का वास्तविक दोषी अयोध्या के ‘मूढ़ संवर्ग’ का वह ‘लोक’ था, जिसने निर्दोष सीता पर अकारण दोषारोपण करके प्रसंगित लोकापवाद कारित किया।....” (पृ॰ 86, 92)। लेखक का यह मत समीचीन है। राम ने राजधर्म एवं लोकहित-साधना को सर्वोपरि माना है। स्वयं सीता भी लोकधर्म एवं राजधर्म के आधार पर राम को धर्मशील ही मानती हैं। अंततः लेखक का यह कथन मान्य ही है - “रामायणम् में ‘सीतायामचरितम् महत्’ विरचते हुए भी, सीता के प्रति पुत्री-सम सहानुभूति रखते हुए भी आदि-महाकवि वाल्मीकि अपने ग्रंथ का नाम अंततः ‘रामायणम्’ रख कर राम का आद्यन्त प्रशस्तिगान ही करते हैं। फलतः राम आलोच्य प्रसंग में भी लगभग दोषमुक्त ही सिद्ध होते हैं।”
राम पर पंचम आक्षेप है ‘शूद्र जाति में जन्म लेने वाले तपस्वी शम्बूक का वध। इसकी भी लेखक ने प्रबुद्ध विवेचना की है। लेखक ने रामायणम् के दो श्लोकों को इस सन्दर्भ में उद्धृत करके समुचित समाधान प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि शूद्रवर्ण में उत्पन्न शम्बूक का वध राम ने उसके तप के कारण शूद्र-द्वेष वश नहीं किया, अपितु तप द्वारा देवलोक जीतने की उसकी इच्छा के कारण राम ने उसका वध किया। मनुष्य द्वारा देवलोक को जीतने की इच्छा करना (शब्दान्तर से कहें तो तप द्वारा देवलोक जीत कर देवलोकवासियों अर्थात् देवताओं आदि पुण्यात्माओं का दमन-उत्पीड़न करना) कदापि न्यायोचित नहीं है। अतः शम्बूक-वध अपरिहार्यतः वांछनीय था। अन्यथा राम के जीवन में वर्णभेद को तो कहीं भी स्थान नहीं मिलता है। वह तो सामाजिक समरसता का अनुकरणीय पाथेय है।
स्पष्ट है कि राम को आदर्श नायक के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु लेखक ने राम पर लगे आक्षेपों के निराकरण का श्लाघनीय प्रयास किया है। पुस्तक मात्र लोकरंजक ही नहीं, ज्ञानवर्द्धक भी है।
- राजेन्द्र नगर, फैजाबाद। दूरभाष: 09839810170
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गहन अध्ययन एवं तार्किक चिन्तन की कृति
राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित
- डॉ॰ निरुपमा श्रीवास्तव
अनेक उत्कृष्ट पुस्तकों का लेखन करने वाले रचनाकार एवं अवध-अर्चना त्रैमासिक पत्रिका का संपादन करने वाले विजय रंजन जी सृजनशीलता के चरम को निरंतर छूकर साहित्य में मील के पत्थर साबित होने वाले सत्त्वशील रचनाधर्मिता के साकार विग्रह हैं। ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ यह शीर्षक है विजय रंजन जी की सद्यप्रकाशित उस पुस्तक का जिसमें तर्कशील लेखन द्वारा जनमानस में उठे अनगिनत प्रश्नों का सटीक समाधान प्रस्तुत करने की सफल चेष्टा की गई है। ताटका-वध, शम्बूक-वध, बालि-वध व सीता-परित्याग जैसे प्रसंगों पर नकारात्मक भाव से प्रेरित हो आक्षेप किए गए प्रभु राम पर जिसे पेशे से अधिवक्ता रहे विजय रंजन जी ने विविध पुस्तकों के अध्ययन और स्वचिंतन के आधार पर निराधार साबित किया।
ताटका-वध के आक्षेप पर विजय रंजन जी ने रामायणम् के 24, 25वें श्लोक व सर्ग 25 के श्लोकों को प्रमाणार्थ प्रस्तुत कर तथ्यों द्वारा निराधार सिद्ध किया कि अति बलवती, मायाविनी, दुष्ट, पराक्रमी, राक्षस-कर्म वाली, मनुष्य मात्र की दुर्दम शत्रु ताटका का वध राम द्वारा नारी-द्वेषवश नहीं, अपितु गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से लोक-कल्याणार्थ किया गया।
‘उत्तररामचरितम्’ में उल्लिखित आक्षेप ‘खर से कायरतापूर्वक युद्ध’ को निरस्त करने के लिए लेखक ने युद्ध कला की बारीकियों को प्रस्तुत करते हुए जो तर्क प्रस्तुत किया, उससे आक्रामक पैतरेबाजी, रणनीतिक कौशल पर लेखक का शोथ परिलक्षित होता है।
राम पर तृतीय आक्षेप: ‘परोक्ष/छù युद्ध में बालि-वध’ के प्रसंग में भी लेखक ने सामाजिक नियमों पर दृष्टिपात करते हुए व्याभिचारी के वध से समाज में शांति-व्यवस्था बनाने की बात को प्रस्तुत किया। साथ ही, उसने राम द्वारा बालि का छिप कर वध के आक्षेप का खण्डन करने के लिए रामायणम् के अनेक श्लोक ( किष्किंधाकाण्ड श्लोक 14, सर्ग 17, श्लोक 1, सर्ग 22) उद्धृत किए; जिनमंे से एक श्लोक (श्लोक 1, सर्ग 22) में बालि द्वारा अपने सामने खड़े हुए सुग्रीव को नेत्रों से देखने का वर्णन किया गया है। इस प्रकरण से विजय रंजन जी के गहन अध्ययन व तार्किक चिन्तन-क्षमता का बोध होता है।
राम पर चतुर्थ आक्षेप: ‘निर्दाेष सीता का निर्वासन’ सर्वाधिक विवादित प्रकरण है, जिस पर विविध विद्वानों द्वारा विचार किया जा चुका है। लेखक द्वारा भी इस पुस्तक में रामायणम् के श्लोकों के सतर्क अनुशीलन से संदर्भगत सत्य उद्घाटित करने की चेष्टा की गई है। रामायणम् के उत्तरकाण्ड सर्ग 45, सर्ग 97 का दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए लोकापवाद का समुचित निराकरण लेखक ने किया है और लोककल्याणक लोक-प्रभुता को निजी, वैयक्तिक सुख-दुःख पर वरीयता देने के सदाशय से, तत्कालीन देश-काल की परम्परागत मर्यादा को अधोगत न होने देने के उद्देश्य से और लोकहित-संरक्षण को अक्षुण्ण बनाने के हेतुक से प्रश्नगत सीता-निर्वासन को परिस्थितिवशात् किया गया माना है। लेखक लिखता है कि रामायणम् में ‘सीतायाम् चरितं महत्’ विरचते हुए भी, सीता के प्रति पुत्री-सम सहानुभूति रखते हुए भी आदि-महाकवि वाल्मीकि अपने ग्रंथ का नाम अंततः ‘रामायणम्’ रख कर राम का आद्यान्त प्रशस्तिगान ही करते रहे हैं। यह तथ्य इस लोकापवाद को निराधार सिद्ध करता है।
राम पर पंचम आक्षेप: ‘शूद्र तापस शम्बूक का वध’ के सम्बन्ध में लेखक विजय रंजन का तर्क है कि राम की दृष्टि में शम्बूक का शूद्रवर्णी होकर तप करके देवत्व-प्राप्ति की चेष्टा करना अनृत या अधर्म नहीं था। अमृत या अधर्म कारित वहाँ से हुआ, जहाँ से शम्बूक उग्र तप द्वारा अपरिमित अजेय शक्ति पाकर देवलोक/स्वर्ग को विजित करने की इच्छा से उल्टा लटका कर (हठयोग) उग्र तपस्या के सम्बल से स्वर्ग-जीतने की कदिच्छा को साकारित करने का दुष्प्रयास कर रहा था। अतः शम्बूक वध शूद्र-द्वेष से या कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पक्षधरता से कारित नहीं हुआ था।
अपने तथ्यों के आलोक में लेखक विजय रंजन जी ने राम पर लोकापवाद व आक्षेपों के तमस को दूर करने की पूर्ण चेष्टा की है। हृदय से इस लेखन हेतु साधुवाद देते हुए यह कहना ही होगा कि विजय रंजन जी ने लोकरंजन, लोकसंग्रह और लोकहित-साधना सदृश जीवनमूल्यों की अवधारणा को सशक्त बनाते हुए वाल्मीकीय लोकाभिराम श्रीराम को राष्ट्रीय आराध्य ही नहीं वरन् विश्व आराध्य के रूप में स्वीकारने का न्यायोचित आह्वान किया है।
- सुल्तानपुर (उ॰प्र॰), दूरभाष: 6307453397
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रामाख्यान के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों के पड़ताल की कृति
राम पर आक्षेप : कितने अनुचित कितने उचित
- डॉ॰ वेदप्रकाश द्विवेदी
राम की परिचर्चा आते ही उनका बहुआयामी व्यक्तित्व आँखों के समक्ष नृत्य करने लगता है। इस धरती पर मर्यादा की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले राम केवल दशरथ और कौशल्या के पुत्र ही नहीं हैं, वरन् इस देश की आत्मा हैं।
राम को न मानने वाले लोग भी रामराज्य की स्थापना चाहते हैं। राम विश्व-मनीषा के मानबिन्दु हैं। राम व्यक्ति नहीं ‘व्यक्तित्व’ हैं। राम चित्र नहीं ‘चरित्र’ हैं। ऐसे मनस्-व्यापी राम के विषय में कहा गया है - ’’रामौः विग्रहवान् धर्मः’’। राम धर्म के विग्रह हैं। धर्म के स्वरुप हैं। विद्वान् और सूक्ष्म साहित्यिक दृष्टि रखने वाले लेखक विजय रंजन जी ने कृति ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ में राम पर लगाए जाने वाले पाँच आरोपों की रामाख्यान् के प्रथम आधिकारिक ग्रन्थ ‘राम के समकालीन ऋषि-कवि आदि-महाकवि वाल्मीकि कृत ‘रामायणम्’ के आधार पर पड़ताल की है और राम को प्रत्येक आक्षेप-प्रकरण में निर्दोष पाया है। कृति के अन्त में विजय रंजन जी ने वाल्मीकीय रामाख्यान के आधार पर ही राम का भी विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
पहला आक्षेप ताड़का-वध में राम को स्त्री-वध का दोषी माना जाता है। इस आरोप के प्रतिकार में लेखक का मत है कि आदि-महाकवि वाल्मीकि-रचित बालकाण्ड के सन्दर्भगत सर्ग 25 में राम-गुरु विश्वामित्र राम से कहते हैं कि प्रत्येक स्त्री अवध्य नहीं होती है, अनेक महामनस्वी राजकुमारों ने भी पापाचारिणी स्त्रियों का वध किया है। अतएव, दया अथवा घृणा को त्यागकर तुम मेरी आज्ञा से लोक-कल्याण (‘गौ, ब्राह्मण हितार्थाय देशस्य च हिताय च’- (बालकाण्ड सर्ग 26 श्लोक 5) के लिए भारी विनाशकारी राक्षसी ताड़का का वध कर डालो-
“श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचन सुतांनृप।
पृथ्वी हन्तुमिच्छन्ति मन्थरामभ्यसूदयत्।। सर्ग 25।।”
गुरु विश्वामित्र द्वारा ताड़का और राक्षसों द्वारा किए जाने वाले भारी विनाश को जानकर गुरु की आज्ञा से गौ, ब्राह्मण और देश हित के लिए ही राम ताड़का-वध हेतु तत्पर हुए।
राम पर द्वितीय आरोप है कि खर से तीन पग पीछे हटकर कायरतापूर्ण युद्ध किया। उत्तररामचरितम् के उपर्युक्त आरोप को रामद्रोही राम के उपहास का केन्द्र बना लेते हैं, जबकि वे रणकौशल की नीति से अनभिज्ञ हैं। युद्ध-भूमि में तीन पग पीछे हटकर युद्ध करना युद्ध-कौशल का ही एक भाग है। लेखक ने अपने किशोरावस्था में लाठी भाँजना सीखते समय इस विशिष्ट रणकौशल ‘पैतरा भाँजना’ का अनुभव किया था, जिसमें विशिष्ट ढंग से पहले पीछे जाकर पुनः शीघ्रता से आगे बढ़कर वार करने की क्रिया रणनीति का हिस्सा रही है। इस प्रकार लेखक ने शास्त्रो के द्वारा दिये तर्क के आधार पर और अपने किशोरावस्था के अनुभव के आधार पर राम द्वारा खर से कायरता पूर्ण युद्ध के आरोप को निराधार और पूर्वाग्रह युक्त माना है।
राम पर तृतीय आक्षेप है कि उन्होने बिना किसी निजी दुश्मनी के किष्किन्घानरेश बालि का वध परोक्ष युद्ध में पेड़ के पीछे छुपकर किया। बालि ने प्राणघाती बाण लगने के पश्चात् कई ज्वलन्त प्रश्न राम से किए। राम ने उसके सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर तत्काल प्रस्तुत किए, जिनसे किसी के दबाव में न आने वाला महाबली बालि सन्तुष्ट होकर वानरराज बालि राम के समक्ष हाथ जोड़कर कहता है- नरश्रेष्ठ आप जो कुछ कह रहे हैं, बिल्कुल ठीक है इसमें संशय नहीं है -
प्रत्युवाच ततो रामं प्रांजलिर्वानेरश्वरः।
यत् त्वमात्य नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशयः।।45।।
- किष्किंधाकाण्ड, सर्ग 18
बाद में बालि कहता है, मैंने आपके प्रति जो अनुचित वचन कहे, उन्हंे आप क्षमा कीजिएगा। मैं आपसे प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। इस संदर्भ में लेखक का स्पष्ट मत है कि राम को बालि के वध का दोषी मानने वाले बालि द्वारा प्रयुक्त किए गए विनयाभाषी, धर्मभाषी अर्थभाषी और हितभाषी कुतर्की श्लोकों और वाल्मीकि रामायण में जो संदर्भगत एकाध श्लोक प्रक्षिप्त किए गए हैं, उन अनमेल श्लोकों को भी आधार बनाकर तथा इससे पूर्व के वाल्मीकीय साक्ष्य-श्लोकों की जानबूझ कर अवहेलना कर प्रसंगित आक्षेप उछालने वाले वास्तव में अपनी तर्कहीनता और अपठनीयता का ही परिचय देते हैं। अतएव, बालि-वध को अनुचित, अवैधानिक या अनयशील कहना दुराग्रह मात्र है।
चतुर्थ आक्षेप ‘निर्दोष सीता का निर्वासन’ ऐसा प्रसंग है, जिसके बारे में यथार्थ तथ्यों का ज्ञान परम आवश्यक है। इस प्रसंग में लेखक ने महान विचारक, साहित्यकार डॉ॰ रामविलास शर्मा जी के कथन को उद्धृत किया है- “नैतिकता की कसौटी पर राम सीता को वन भेज देते हैं और इसी नैतिकता के कारण राम स्वयं वन जाते है।”
उपर्युक्त आक्षेप के सम्बन्ध में लेखक ने गहन साहित्यानुशीलन के पश्चात् जो तर्क प्रस्तुत किए हैं, वे इस बात को सिद्ध करते हैं कि इस प्रकरण में राम प्रसंगित दोष से पूर्णतया मुक्त नहीं हैं।
तथापि लेखक का अभिमत है कि जब सीता स्वयं इस विषय में राजा राम को कहीं भी दोषी नहीं मानते हुए इस प्रसंग को राजधर्म के पालन हेतु वांछनीय मान रही है और उक्त प्रसंग की वस्तुनिष्ठ शिकार सीता ही राम को अनकथ क्षमा प्रदान कर रही हैं; ऐसी दशा में किसी और को उन पर आक्षेप प्रक्षेपित करने का कोई अधिकार नहीं है।
अन्तिम आक्षेप है ‘शूद्र तापस शम्बूक का वध। मन में कलुषित विचार रखने वाले पूर्वाग्रही लोग लोकप्रिय राम की सामाजिक समरसता की छवि को धूमिल करने के लिए राम द्वारा कृत शूद्र शम्बूक-वध को आधार बना कर को राम को शूद्र-विरोधी बताते हैं। अनेक राजनेता अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के लिए ‘राम नहीं हत्यारा है, शम्बूक ऋषि को मारा है’ की नारेबाजी करके राम को शूद्र-विरोधी बताते हैं जबकि उन्हीं लोगों के द्वारा इससे पहले ये आरोप लगाया गया था कि राम का अस्तित्व कभी था ही नहीं। ये दोनांे बातें विरोधाभासी हैं। ये सब हिन्दू-समाज में विद्वेष फैलाने का षड्यन्त्र मात्र है। अब इसी विषय को हम लेखक विजय रंजन जी की पुस्तक ’राम पर आक्षेप ......’ के सन्दर्भ में देखते हैं। वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड में यह घटना वर्णित है, जिसमें राम से कहा जाता है, आप अपने राज्य में खोज कीजिए और जहाँ दुष्कर्म हो रहा हो, उसे रोकने का प्रयत्न कीजिए। राम पुष्पक विमान पर सवार होकर अपने राज्य में हो रहे दुष्कर्म की खोज के लिए चारों दिशाओं में गए। दक्षिण दिशा में जाने पर राम ने शैवाल पर्वत के उत्तर भाग में अवस्थित एक विशाल सरोवर के तट पर स्थित श्रीमाल वृक्ष का अवलम्बन लेकर सिर को नीचा किए हुए एक व्यक्ति को तपस्या करते हुए देखा। राम उसके पास आए और उससे उसका परिचय और कठिन तपस्या का कारण पूछा। परिचय में वह तापस अपना परिचय ‘शूद्र शम्बूक’ बताता है, जिसे सुनने के पश्चात् राम द्वारा शम्बूक का वध न किए जाने से स्पष्ट है कि शूद्र शम्बूक के तपस्वी होने पर राम को कोई आपत्ति नहीं थी। परन्तु जब राम ने शम्बूक से उसके तप का उद्देश्य पूछा, तो शम्बूक ने कहा कि मैं शरीर सहित स्वर्ग जाकर देवलोक को विजित करना चाहता हूँ। तप का उद्देश्य ‘आत्मकल्याण और लोककल्याण’ होता है, न कि किसी स्थापित देवलोक को जीतकर वहाँ के देवताओं का दमन कर उनको अपने आधीन कर दास बनाना। स्पष्ट है कि शम्बूक का तप ‘लोककल्याण’ या ‘आत्मकल्याण’ के लिए नहीं था, बल्कि अपने अहंकार-तुष्टि और देव-दमन के लिए था। उसके इस कुत्सित उद्देश्य की पूर्ति न हो, इसीलिए राम ने तलवार से उसका वध कर दिया, इसमें जाति-विशेष की कोई भूमिका नहीं है। इससे राम तापस शूद्र के वध के आरोप से मुक्त हैं।
पुस्तक का अन्तिम अध्याय है ‘वाल्मीकि के राम’। लेखक ने पर्याप्त साहित्य के अध्ययन, अनुशीलन से प्राप्त निष्कर्ष को ‘वाल्मीकि के राम’ में प्रस्तुत किया है। लेखक ने पाया कि वाल्मीकि के राम की उपादेयता मोक्ष की प्राप्ति के बजाय धर्म की स्थापना के लिए है।
पुस्तक को आद्योपान्त पढ़कर यह अनुभव हुआ कि लेखक ने यह पुस्तक लिखने के लिए वाल्मीकीय रामायण के साथ-साथ राम पर विभिन्न पुस्तकों का भी अध्ययन-अनुशीलन एवं मनन किया है। किन्तु वाल्मीकी रामायण में दिए गए तथ्यों और तर्कों के आधार पर निष्कर्षित किया है कि राम पर कोई भी दोष सिद्ध नहीं होता है। लेखक के कहीं-कहीं कुछ क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग को छोड़ कर पुस्तक सरल, सुबोध और भावप्रधान है। लेखक ने राम के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों को ही पुस्तक का विषय बनाया है। अतः इसके कलेवर में अनावश्यक विस्तार नहीं आने पाया है। मेरा विश्वास है कि लेखक विजय रंजन जी की यह रचना बहुपठित और बहुप्रचारित होगी।
- शिक्षक/साहित्यकार, अयोध्या (उ॰प्र॰),, दूरभाष: 9984727993
* मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम पर दुष्ट निन्दक समूहों के आक्षेपों का खण्डन (कृति: ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’) !
तीखी तीक्ष्ण शैली में, वकीलों की शैली में लिखी गई हैं। मन गद गद हो गया कि किस बारीकी से किस मेहनत से यह काम किया गया है। -प्रो॰ कुसुमलता केडिया, यू-ट्यूब पर उपलब्ध।
* बहुत महत्त्वपूर्ण किताब है सर ! भगवान् श्रीराम पर लगे आरोपों का इतने तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचन से निरस्तीकरण पहली बार मेरे सामने है। श्री राम के उदात्त जीवन में कलंक स्वरूप ये आक्षेप लगाए किसी ने हों, अपनी भावमयी तार्किक धारा से धोए आपने हैं। .... यह पुस्तक रामकथा के मर्मज्ञ लोगों और आलोचकों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। आपके श्रम और संधान को नमन करते हुए बहुत-बहुत हार्दिक बधाई ! - केशवशरण, एस 2/564 सिकरौल, वाराणसी - 221002, दूरभाष: 9415295137
* लेखक आदरणीय विजय रंजन जी हार्दिक बधाई के पात्र हैं। ऐसे क्लिष्ट एवं विवादास्पद विषय पर लेखनी चलाने के लिए !
लेखक ने वाल्मीकि रामायणम्, तुलसीकृत रामायण, कृतिवास रामायण, कश्मीरी रामायण, कन्नड़कोशिक रामायण आदि का अध्ययन कर श्रीराम चन्द्र जी पर लगे आक्षेेपों का बड़ा तार्किक उत्तर प्रस्तुत किया है। सभी शंकाओं को निर्मूल सिद्ध करने में वह सफल हुए हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के लोक-कल्याणकारी स्वरूप के पक्ष में लेखक के वक्तव्य सटीक हैं। भाषा, शैली, शब्द-संयोजन, भाव-प्रवणता उत्कृष्ट कोटि की है। एक बार पुनः विजय रंजन जी को उनकी इस कृति के लिए बधाई देती हूँ।
- मंजु श्रीवास्तव ‘मन’ अध्यक्षा, महिला काव्य मंच, वर्जीनिया, अमेरिका
* आपकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राम पर आक्षेप: कितने अनुचित कितने उचित’ को http://vtlibrary.com में रखना चाहता हूँ। - विजय तिवारी, अहमदाबाद (गुजरात)
* ‘राम पर आक्षेप ..........’ अनमोल किताब है। - डॉ॰ हरेराम पाठक, नई दिल्ली
* आप उत्कृष्ट लेखक हैं। ‘राम पर आक्षेप.......’ पुस्तक की पी॰डी॰एफ॰ मै एक अन्तर्राष्ट्रीय चैनल पर डाल रहा हूँ। - डॉ॰ उमापति दीक्षित, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा (उ॰प्र॰)
* बहुत-बहुत बधाई ! तार्किक ढंग से निरुत्तर कर देने वाली किताब ! राम पर लगे धब्बों को धोने वाली किताब ! - डॉ॰ व्यासमणि त्रिपाठी, पोर्ट ब्लेयर, अण्डमान-निकोबार, भारत
* अवश्य पठनीय एवं चिन्तनीय पुस्तक (‘राम पर आक्षेप ......’) है। - शकुन्तला त्रिपाठी, अयोध्या
* अत्यन्त उत्कृष्ट सृजन। - डॉ॰ देवकीनन्दन शर्मा, बुलन्दशहर । दूरभाष:9837573250
* अत्यन्त उत्तम शोध-प्रधान कृतित्व ! - विनय विक्रम सिंह, मिर्जापुर, दूरभाष: 8376099007
* आपने अपने आलेख ‘निर्दोष सीता का निर्वासन’ में बहुत सुलझा कर अपना पक्ष रखा है और सत्य कहने से भी नहीं चूके हैं। बढ़िया ! मेरा भी मत ऐसा ही है। -डॉ॰अंजना वर्मा, बंगलुरु (कर्नाटक)
( कृति ‘समीक्षा के निकष पर विजय रंजन’ एवं कृति ‘अप्रतिम साहित्यसेवी विजय रंजन’ से उद्धृत)

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