शनिवार, 23 अगस्त 2025

विजय रंजन के कहानी संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की कतिपय समीक्षाएँ


 इन्द्रधनुषी रंगों की कहानियों का संग्रह उभरते बिम्ब 

            - डॉ॰ अमिता दुबे

17 मई 1949 को उत्तर प्रदेश में जन्में श्री विजयप्रताप सिंह लेखकीय नाम विजय रंजन का लेखन साहित्य की विभिन्न विधाओं में है। 1965 से निरन्तर लेखन आरम्भ करने वाले श्री रंजन 1995 से साहित्यिक पत्रिका ‘अवध- अर्चना’ का सम्पादन निरन्तर कर रहे हैं। इससे पूर्व अक्टूबर 1976 से ‘अवध-अर्चना’ मासिक, 1977-89 तक ‘अवध-अर्चना’ साप्ताहिक का आपके कुशल सम्पादन में प्रकाशित हो रहा था। 

विजय रंजन के कविता-संग्रह ‘हाशिये से’, ‘किर्चें’ का साहित्य-जगत् में स्वागत हुआ। आपकी समालोचनात्मक कृतियाँ ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’, ‘रसवाद औ..र नय रस’, ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ और ‘कविता क्या है’ भी महत्त्वपूर्ण हैं। कहानी संग्रह ‘सूरज की आग’ के बाद ‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह हमारे सामने है।

‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह में 18 कहानियाँ हैं। ‘शुभाशंसा’ के अन्तर्गत वरिष्ठ कथाशिल्पी साहित्यकार डॉ0 कौशलेन्द्र पाण्डेय कहते हैं - “परिवेश के चित्रण में कथा-शिल्पी ने किसी छायाकार की भूमिका निभाई है। परिणामतः अभिव्यक्ति में यथेष्ट जीवन्तता हृदय को सम्मोहित करती है। उनके छोटे-छोटे कथोपकथन अभिव्यक्ति की बुनावट को कसावयुक्त बनाए रखते हैं।”

कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की सभी कहानियाँ श्रेष्ठ हैं लेकिन मुझे कहानी ‘अजूबा’ एवं ‘अलगिया गिलास’ ने विशेष रूप से प्रभावित किया। 

‘अलगिया गिलास’ कहानी में सामाजिक समरसता की बात कही गई है। ‘अलगिया गिलास’ के कथ्य, प्रस्तुत शैली आदि अति प्रशंसनीय है। इसके माध्यम से ‘अछूत समस्या’ जैसी समस्या प्रस्तुत करने के साथ-साथ समस्या के निदान को सम्प्रस्तुत करने के लिए लेखक को हार्दिक बधाई। ‘अलगिया गिलास’ का वर्णन द्रष्टव्य है- “बाबू साहब और उनके साथियों के ही गिलास चमाचम करता हो यादव, ऐसा नहीं था। साफ-सफाई तो वह हर गिलास की ही करता था। सवर्णों के लिए रखे गए बड़े स्टील के गिलास, यादव, कुर्मी, कहार, नाई के लिए तनिक छोटे स्टील-गिलास, दलित ग्राहकों के लिए शीशे के गिलास, मुस्लिम ग्राहकों के लिए कप, केतली, प्लेट....कोई भी बर्तन वह होटल पर ऐसा न रखता जिसे गन्दा कहा जा सके।” इस व्यवस्था से ग्राहक प्रसन्न रहते हैं लेकिन एक दिन कुछ युवकों द्वारा उसके होटल में हंगामा होने पर बाबू साहब ‘अलगिया गिलास प्रथा’ को ही समाप्त करने की बात करते हैं- “मँगरू ! तुम जाति-भेद मिटा कर सामाजिक समरसता लाना चाहते हो ना ! बहुत अच्छी बात है यह। जो चीज गलत है उसे मिटना ही चाहिए। समाज में समरसता तो होनी ही चाहिए, लेकिन उसके लिए तोड़-फोड़ और बल-प्रयोग द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाया तुमने, क्या वह भी ठीक है बेटा ? इस तरह तो सामाजिक प्रेमभाव और समरसता की जगह वैमनस्य, विद्वेष हिंसा और      प्रतिशोध ही फैलेगा।” यह कहानी मेरी दृष्टि में संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है इसलिए नहीं कि यह सामाजिक समरसता की बात करती है बल्कि इसलिए कि रचनाकार-साहित्यकार का काम केवल समस्याओं को बताना-दिखाना ही नहीं बल्कि उसका कुछ सटीक समाधान भी प्रस्तुत करना है। कथाकार विजय रंजन इस कहानी के द्वारा एक सामाजिक समस्या जो आज के पढ़े-लिखे समाज के हस्तक्षेप के बाद भी ज्यों की त्यों या कुछ परिवर्तित रूप में विद्यमान है, का समाधान देते हैं। यह समाधान कोरा उपदेशात्मक नहीं है। वहाँ व्यवहारिकता है। सुन्दर परिष्कृत कहानी के लिए लेखक को बधाई।

संग्रह की पहली कहानी ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’ है। यह कहानी तलाक के दंश को रेखांकित करती है। 

‘यूरेका’ कहानी गली-मोहल्लों में क्रिकेट की समस्या है पर केन्द्रित है।

संग्रह की ‘वापसी’, ‘पोस्टमार्टम’, ‘घटती-बढ़ती परछाईयाँ’, ‘समझौता’ जैसी कहानियाँ परिवार, समाज और उससे बढ़कर मनुष्य और मनुष्य के बीच के रिश्तों को रेखांकित करने वाली हैं। 

संग्रह की अन्तिम कहानी है ‘उभरते बिम्ब’। इसी कहानी से कहानी-संग्रह का नाम रखा गया है। यह कहानी कई बिम्ब उभारती है। 

इस कहानी में प्रथम बिम्ब उभरता है जब अस्पताल का सजीव वर्णन करते हुए कृतिकार विजय रंजन कहते हैं- 

”पूरा हॉल ए॰ सी॰ था। यू॰ डी॰ कोलोन की खुश्बू तैर रही थी हॉल के अन्दर। ग्राउन्ड फ्लोर पर ही रिसेप्शन काउन्टर के दाईं ओर के गलियारे के बगल ओ॰ पी॰ डी॰, पैथालॉजी, रेडियोलॉजी विभाग थे। शेष विभागों में जाने के लिए सीढ़ियों के पास दीवार पर तीर के निशान बने थे।“ 

देवेन अपने मित्र दीपेन को देखने आता है जिसकी पाँच दिन पहले ही हार्ट की बाई-पास सर्जरी हुई थी। चार-चार ग्राफ्टिंग हुई थीं उसकी। 

दीपेन को देख कर और उससे बातें करते हुए देवेन के मन में अनेक बिम्ब उभरते हैं। एक बिम्ब उभरता है मित्र देवेन के मन में मित्र दीपेन के प्रति सन् 1981 और 2013 के बीच का...... नितान्त विलग बिम्ब। कभी दीपेन अपने रिश्तेदारों-मित्रों को ऑक्टोपस कहा करता था अब उनके प्रति कृतज्ञता का भाव दिखला रहा था। दीपेन की प्रिय महिला मित्र नीरांजना का बिम्ब भी उभरता है, जो शादी और मित्रता के बीच के अन्तर को समझाते हुए अपने द्वारा इन्टरकास्ट मैरिज करने की सूचना देती है। दीपेन को चारों ओर ऑक्टोपस ही ऑक्टोपस अलग-अलग रूपों में दिखाई देते हैं। तभी अनेकानेक बिम्ब भी उभरते हैं। पत्नी के समर्पण, सेवाभाव, प्रेम का बिम्ब उभरता है, मित्रों के कई-कई बिम्ब उभरते हैं।

समग्रतः कहानी संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की 18 कहानियों में इन्द्रधनुषी रंगों के कई-कई बिम्ब उभरते हैं, जो एक ओर संवेदनाओं के अनेक गवाक्ष खोलते हैं तो दूसरी ओर भाषा-शैली, शिल्प की दृष्टि से कहानी के पारम्परिक बिम्ब को तोड़ते हुए नए बिम्ब का मानक स्थापित करने का प्रयास करते हैं। कहानी संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ के प्रकाशन पर श्री विजय रंजन को कोटिशः बधाई।

- सहा॰ निदेशक उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, दूरभाष: 9415551878

(‘साहित्य भारती’, जनवरी-मार्च 2016 में तथा ‘अवध-अर्चना’ नवम्बर 2015-जनवरी 2016 में प्रकाशित)

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 मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं की कहानियाँ   
              उभरते बिम्ब

                                  - स्वप्निल श्रीवास्तव

विजय रंजन एक साथ कई विधाओं में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कविताएँं, गीत और कहानियाँ तो लिखी ही हैं बल्कि उन्होंने साहित्य में आलोचनात्मक हस्तक्षेप भी किया है। यह हस्तक्षेप एक असहमति किस्म का हस्तक्षेप है। वे आलोचना के उस इलाके में अवाजाही करते हैं जो कठिन-साध्य है। इसलिए उनके लिए प्राचीनता और आधुनिकता का कोई द्वैत नहीं है। परन्तु यहाँ मेरा अभीष्ट उनके आलोचनात्मक सरोकारों पर केन्द्रित नहीं है। ‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह में कुल छोटी-बड़ी 18 कहानियाँ संकलित हैं। ये कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं, त्रासदियों और निरन्तर बदलते कठिन होते जा रहे जीवन की कहानियाँ हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’ माँ-बेटी के निरन्तर छीजते रिश्तों की कहानी है। यह कहानी व्यक्ति के भीतर सघन हो रहे अजनबीपन को बताती है। अपने अहं के सामने कोई झुकना नहीं चाहता। फलस्वरूप रिश्तों की बलि हो जाती है। पति-पत्नी के अलगाव की पीड़ा बच्चों को ज्यादा सहनी पड़ती है। इस कहानी में तितली का बिम्ब आकर्षित करता है।   

स्त्री का दुःख यहीं तक सीमित नहीं है। विजय रंजन की एक और कहानी ‘पोस्टमार्टम’ में यह त्रासद रूप में सामने आता है। यह रेखा की कहानी है जो एक नर्तकी है। उसकी मुँहबोली मौसी उसका शोषण करती है। यह कहानी हत्या और आत्महत्या के फर्क को मिटाती है। हमारे समाज में हत्या, आत्महत्या और मृत्यु का फासला निरन्तर कम होता जा रहा है। किस तरह पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को बदल दिया जाता है, यह अब सार्वजनिक तथ्य बन गया है। 

हमारे समाज में ऐसे लोग भी हैं जो स्त्री को एक उपभोक्ता सामग्री से ज्यादा महत्त्व नहीं देते। इस मर्म को जानने के लिए ‘प्रतिशोध’ कहानी पढ़ी जा सकती है। इस कहानी का पात्र राज वैभव हासिल करने के लिए अनैतिक ढंग से काम करता है और अपने को पतन पर पहुँचाता है। यह कहानी हमें यह बताती है कि समाज में ओहदा पाने और विलासी जीवनयापन हेतु प्रायः किन रास्तों से गुजरना पड़ता है। इस तरह के लोग समाज में कम नहीं हैं। 

विजय रंजन की कहानी ‘मि॰ अजूबा’ के रणधीर मेहरा लगातार विवाह-संस्था का मजाक उड़ाते हैं और उसका दुरुपयोग करते रहते हैं। शादी उनके लिए एक प्रयोगशाला है लेकिन जब उन्हें अपनी सद्यविवाहिता पत्नी और पूर्व पत्नी के बेटे के परस्पर शारीरिक सम्बन्ध की बात पता चलती है तो उनकी प्रयोगशीलता हवा हो जाती है। मि॰ अजूबा के मिस्टर मेहरा ऐसे चरित्र के रूप में सामने आते हैं जिनके सोचने और करने में लम्बा विभेद है। रणधीर मेहरा अपने कारनामों के जरिये किस तरह अजूबा में परिवर्तित हो जाते हैं और उनकी अतिरेकपूर्ण प्रगतिशीलता किस प्रकार असामाजिक हो सकती है, यह कहानी इन बातों को बा-खूबी बताती है। इस कथा-भूमि से अलग कहानियों में उनकी ‘अलगिया गिलास’, ‘हुड़ुकचुल्लू’, ‘प्रतिमान’, ‘जूतों की चुगली’, ‘साढ़े तीन घंटें’, ‘उभरते बिम्ब’ जैसी कहानियाँ संग्रह की यादगार कहानियाँ हैं।

‘अलगिया गिलास’ का सामन्त अपने स्वभाव से अलग है। वह छुआछूत को नहीं मानता। उसके प्रगतिशील विचारों को जान कर हैरानी होती है। विजय रंजन की यह कहानी इस विचारधारा को निरस्त करती है कि जमीन्दार क्रूर होते थे अपितु यह प्रस्थापित करती है कि जमीन्दारों के भीतर भी मानवीय संवेदना होती थी।

इस संग्र्रह की कहानी ‘हुड़ुकचुल्लू’ का हुड़ुकचुल्लू किस तरह एक ट्रांसपोर्टर एच0 सी0 यादव में तब्दील हो जाता है, यह कथा बहुत ही रोचक ढंग से बयान की गई है। यह कहानी हमें बताती है कि किस तरह परिवार का उपेक्षित लड़का इस सामाजिक परिवेश में पुष्पित-पल्लवित होता है। जाहिर है कि कहानी का पात्र किसी जादू से नहीं बल्कि स्वस्थ सामाजिकता से पूर्ण होकर समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करता है। हमारा समाज आज भी इस तरह के हुड़ुकचुल्लुओं से भरा हुआ है जिनके लिए यह कहानी एक आदर्श प्रस्तुत करती है।     

इस संग्रह को पढ़ते हुए संग्रह की एक छोटी सी कहानी ‘जूतों की चुगली’ का बरबस ध्यान आता है। यह कहानी लेखक के अवलोकन को हमारे सामने लाती है। पुरानी कहावत है कि अगर किसी आदमी की हैसियत को जानना हो तो उसके जूतों पर ध्यान देना चाहिए। मैडम राका पढ़ाते समय शंकर के जूतों को देखकर जान जाती हैं कि उस दिन शंकर देर से सोकर उठा था।

विजय रंजन की कहानियों में अनेक तरह के अनुभव किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त हुए हैं। निश्चित रूप से ये अनुभव काल्पनिक नहीं हैं बल्कि उन्हंे लेखक ने बहुत निकट से देखा होगा। देखना किस तरह कथाकार का अनुभव बन जाता है और फिर किस तरह एक उम्दा कथा का हिस्सा बन जाता है-- विजय रंजन की कहानियाँ इस तथ्य का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। इन कथात्मक अनुभवों में किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं है बल्कि ये अनुभव वास्तविक जीवन से उठाए गए अनुभव हैं। इन कहानियों में केवल अनुभव ही नहीं, समाज की आलोचना भी है। एक आलोचक अगर कथा-जगत् में प्रवेश करता है तो उसके साथ उसकी आलोचनात्मक दृष्टि भी जाती ही है। 

इसी क्रम में विजय रंजन की एक कहानी है ‘साढ़े तीन घंटे’ जिसे पढ़ना अत्यन्त दिलचस्प है। इस कहानी को पढ़ कर फिल्म ‘सिनेमा-सिनेमा’ की याद आती है। फिल्म देखते हुए इस कहानी का पात्र कई घटनाओं का सामना करता है। सिनेमा देखने के दौरान वह अपनी पूर्व सहपाठिन से मिलता है, कल्लू जैसे दबंग की कारस्तानी के साथ-साथ यह भी देखने को मिलता है कि सिनेमा देखने आए हुए प्रेमी-प्रेमिका किस तरह कोर्ट-मैरिज की बात करते हैं। यह कहानी हमें बताती है कि घटनाएँ सिर्फ फिल्मों में ही घटित नहीं होतीं, हमारे आसपास भी घटित होती हैं। जहाँ मनुष्य है, वहीं घटनाएँ भी हैं। यह कहानी बहुत रोचक और पठनीय है। 

संग्रह की अन्तिम कहानी ‘उभरते बिम्ब’ दीपेन और देवेन के विमर्श की कहानी है। दीपेन हार्ट सर्जरी के लिए एक नर्सिंग होम में दाखिल होता है। अस्पताल में उसके जीवन की प्रतिध्वनियाँ प्रवेश कर जाती हैं जिसमें नीरांजना जैसा स्त्री पात्र है तो बीच-बीच में जीवन की तल्ख सच्चाईयाँ भी हैं। इस कहानी में 32 व 64 वर्ष के बीच का बहता हुआ समय पूरी शिद्दत से मौजूद है।

संग्रह की इन महत्त्वपूर्ण कहानियों के अलावा अन्य कहानियाँ भी उल्लेखनीय हैं। जैसे हमारा जीवन एक-सा नहीं रहता, वैसे ही कहानियाँ भी एक-सी नहीं रहती हैं। असली बात तो यह है कि किस तरह कथा-लेखक अपने जीवनानुभवों को व्यक्त करता है और इस अभिव्यक्ति में वह कहाँ तक सफल हुआ है। विजय रंजन की कहानियों को पढ़ते समय यह पता चलता है कि वे अपने समय के यथार्थ और विडम्बनाओं को शब्द देने में पूरी तरह सफल हुए हैं। कहानियाँ लिखते समय विजय रंजन यदा-कदा काव्य-बिम्बों का प्रयोग करते हैं परन्तु भाषा को इतना सहज बना देते हैं कि वे कहानी पढ़ने में अवरोध पैदा नहीं करते हैं।

विजय रंजन की कहानियाँ पढ़ते हुए हमें यह आश्वस्ति मिलती है कि वे अपने तजुर्बे को अफसाना बनाने में सघन गहन सफल हुए हैं।

                        - आवास विकास कालोनी, अमानीगंज, फैजाबाद,  दूरभाष: 9415332326

                 (‘कथा समवेत’ जनवरी-जून 2015 में प्रकाशित)

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      भविष्य के गर्भ में झाँकती यथार्थपरक कहानियों का संग्रह 

उभरते बिम्ब

                               - डॉ॰ अशोक शर्मा

वरिष्ठ साहित्यकार श्री विजय रंजन के कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ की कहानियाँ यथार्थपरक होने के साथ-साथ भविष्य के गर्भ में झाँकती हुई सी लगती हैं। ‘अलगिया गिलास’ जैसी कहानियाँ सामाजिक विकृतियों के प्रति उनकी चिन्ता को रेखांकित करती हैं और समाज को दिशा देने का प्रयास करती हैं। वे कई कहानियों में सीधे सपाट ढंग से बात कहते हैं तो ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’ और ‘घटती-बढ़ती परछाईयाँ’ जैसी कहानियों में प्रतीकों के माध्यम से बात कह कर बहुत कुछ पाठक के समझने के लिए छोड़ देते हैं।‘कहाँ से कहाँ तक’ जहाँ एक बहुत ही अलग तरह के कथानक को लेकर चलती है, वहीं ‘मि0 अजूबा’ के मि0 अजूबा सचमुच ‘अजूबा’ ही हैं। साढ़े तीन घंटे’ और शीर्षक कहानी ‘उभरते बिम्ब’ संग्रह की लम्बी कहानियाँ हैं। 

भाषा में प्रवाह है और शैली कहानीकार की अपनी और कुछ अलग सी है। कुल मिला कर ‘उभरते बिम्ब’ एक सफल कहानी संग्रह है और लेखक की रचनात्मकता को रेखांकित करता है।

श्री रंजन की दो कृतियाँ मैंने पहले भी पढ़ी हैं, जिनमें समालोचना कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ और ‘किर्चें’ कविता संग्रह हैं। ‘साहित्यिक तुला पर.....’ उनके विशद अध्ययन का प्रमाण है और कविता संग्रह ‘किर्चें’ की अधिकांश कविताएँ मन को भीतर तक छूती हैं और बहुत सशक्त हैं। जितने सुन्दर गीत हैं, उतने ही गहरे भावों वाले अगीत हैं। श्री विजय रंजन एक अध्ययनशील और साहित्य को समर्पित व्यक्तित्व हैं।   

  - 81, विनायकपुरम्, विकासनगर, लखनऊ, दूरभाष: 9044436325

         (अवध-अर्चना, फरवरी-अप्रैल 2015 में प्रकाशित )

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सहज कहानियों का संग्रह   : ‘उभरते बिम्ब

                                      - डॉ॰ विनयदास                                        

अवध की भूमि साहित्य, कला, और संगीत की दृष्टि से सदा उर्वरा रही है। अवध के दो प्रसिद्ध स्थल फैजाबाद और अयोध्या को लोग प्रायः ऐतिहासिक और धार्मिक नगर के रूप में जानते हैं मगर बहुत कम लोग इसके साहित्यिक योगदान से परिचित हैं। अतीत ही नहीं, वर्तमान में भी अन्तर्राष्ट्रीय पुश्किन पुरस्कार से सम्मानित कवि स्वप्निल श्रीवास्तव, प्रखर आलोचक रघुवंशमणि और युवा कवि यतीन्द्र मिश्र इसी शहर के गौरव हैं। इसी परम्परा की एक समर्थ कड़ी कवि-कथाकार विजय रंजन हैं जो ‘अवध-अर्चना’ पत्रिका के यशस्वी सम्पादक हैं। यह पत्रिका उनके जीवन का एक मिशन है। विजय रंजन पेशे से एक अधिवक्ता भले ही हों, किन्तु उनका मन सर्वाधिक साहित्य में रमता है। आज की तारीख में उनका नाम सफल साहित्यकारों में शुमार किया जा रहा है। कहने को ‘हाशिये से’ और ‘किर्चें’ उनके दो कविता-संग्रह और ‘सूरज की आग’ एक कहानी संग्रह प्रकाशित है किन्तु उनको ज्यादा ख्याति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि रामायण’ से मिली। पर निर्विवादित सच है कि उन्हें एक संवेदनशील मन भी मिला है जो उन्हें कहानी-कविता की ओर प्रेरित करता है। यही कारण है कि वे एक बार फिर अपने नए कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ के साथ अपने पाठकों के बीच हैं।

‘उभरते बिम्ब’ कहानी-संग्रह में कुल 18 कहानियाँ हैं जिन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है- एक वे आकार में जो लघु हैं, दूसरी वे जो आकार में लम्बी हैं। किन्तु शिल्प-रचना विधान की दृष्टि से ‘उभरते बिम्ब’ की कहानियाँ इन दोनों में शामिल नहीं की जा सकतीं। वस्तुतः विभाजन से परे इन्हें सहज-सरल के रूप में पढ़ना ही ज्यादा न्यायसंगत होगा। 

इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ एक लम्बी कालावधि में लिखी गई हैं। अतः इनमें पर्याप्त वैविध्य है। किन्तु यह जानना दिलचस्प है कि यह अपने अतीत के समाज की रुचि, मिजाज और समस्या आदि का गहराई से परिचय कराती हैं। सम्पूर्ण कहानियों को बाँधने वाला कोई एक सूत्र भी लगभग अनुपस्थित है। 

‘उभरते बिम्ब’ की कहानियों का मिजाज आज की कहानियों से कम मेल खाता है, विषयवस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर। इन्हीं कारणों से ‘बहुवचन’ के सम्पादक अशोक मिश्र के अभिमत के अनुसार कदाचित उन्हें दूसरे समय की कहानियों की कोटि में रखा जा सकता है।

बावजूद इस अभिमत के, ‘अलगिया गिलास’ कहानी जाति-दंश की तिक्तता को भोगते हुए समाज का एक अत्यन्त संवेदनशील, मर्मस्पर्शी अनुभव सबके सामने लाती है जो वर्तमान का भी सच है किन्तु बड़ी बात यह है कि यह कहानी हमारे समाज को एक सामाजिक समरसता का संदेश भी देती है। बाबू साहब सामान्य गिलास में चाय पीकर इस जातीय दंश से इलाके के नौजवानों को मुक्त कराते हैं। इससे प्रसन्न होकर वे कहते हैं- 

“बाबू साहब ! हमारा विरोध तो सिर्फ जाति-भेद आधारित अन्यायपूर्ण व्यवस्था से था। आपने रोज-रोज के अपमान से एक झटके में उबार लिया।” 

इसी से जोड़ कर ‘हुड़ुकचुल्लू’ कहानी को भी पढ़ा जा सकता है। जहाँ एक छोटे आदमी, जो पढ़ी बातों को जीवन में अमल करता है, की मेहनत उसे एक बड़े मुकाम पर पहुँचाती है। यहाँ पर भी कहानी में एक संदेश है। आर्थिक विकास की ऊँचाईयों को छूते समय घमण्ड, अकड़ नहीं बल्कि शालीनता और विनम्रता ही उसका आभूषण है। मुहल्लेवासियों से बिना किसी कहा-सुनी के वह वहाँ से अगले दिन ट्रकों को हटा कर अपने चरित्र से समाज को एक नया सकारात्मक संदेश देता है। विजय रंजन का कथन कि “प्रत्येक कहानी से कोई न कोई सकारात्मक संदेश अवश्य निःसृत हो” उनकी कहानियों पर पूरी तरह चरितार्थ होता है। ‘साढ़े तीन घण्टे’ कहानी एक फिल्म देखने के दौरान सिनेमाघर के अन्दर-बाहर घटने वाली अनेक मोटी-महीन घटनाओं का ब्यौरा है, जो पाठक को इनसे सावधान तो करता है, मगर लम्बे कलेवर की यह कहानी किसी बड़े सामाजिक यथार्थ-विमर्श या सच की गहराई से पड़ताल नहीं करती। अतः इसका प्रभाव सतही धरातल पर पड़ता है। लघु कलेवर की कहानियों में ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’ और ‘कापुरुष’ को रखा जा सकता है, जो गागर में सागर को भरने का काम करती हैं। 

यहाँ यह कहना भी लाजिमी लगता है कि ‘पुरावृत्ति और विवृति’ में लेखक ने अपनी कहानियों की अच्छी वकालत की है, जो विचारणीय है; अन्यथा इसे कौन नहीं जानता कि आकाशवाणी से प्रसारित या अखबारों में छपी हर कहानी ‘कहानी के निकष’ पर खरी उतरे, यह जरूरी नहीं है। वह कोई समीक्षा तो नहीं होती। ‘उभरते बिम्ब’ की कहानियाँ तमाम विचारणाओं के बाद भी पठनीय तो हैं ही। यह बात दूसरी है कि वे नए तरीके से अपने विवेचन की माँग करती हैं। Û                 -  सम्पादक ‘इन्दुप्रभा’, बाराबंकी (उ॰प्र॰)

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लोकहिती दृष्टि का कहानी-संग्रहउभरते बिम्ब’ 

                                  - मनोजचन्द तिवारी

इतिहास पर नजर घुमाएँ तो हम अवश्य पाएंगे कि प्रत्येक कालखण्ड में किसी न किसी महान् विभूति का आविर्भाव हुआ है, जिसने जड़-चेतन को संतुलित किया और एक नई राह दिखाई। उन्हीं महान् विभूतियों में कई साहित्यकार भी हुए, जिन्होंने लोकमंगल की भावना से जन-मन को आलोकित किया। विजय रंजन सरीखे लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार उन्हीं में से एक हैं जो आज भी साहित्यिक सत्कार्य में रत हैं। यह बात मैं विशेष रूप से विजय रंजन जी के कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ को लेकर कह रहा हूँ। 

संग्रह की कहानियाँ भारत के मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन-जगत् से सीधे-सीधे जुड़ी हैं, वहीं, उद्दाम भोगवाद से परे लोकहिती सावृत दर्शन को भी व्यक्त करती हैं। 

जगत् वही है, जीवन वही है, मगर जीने का सलीका और देखने का उनका नजरिया हम सबसे बिल्कुल अलग है। प्रथम दृष्टि में इस संग्रह  की कहानियों से एक बात तो साफ झलकती है कि इसके शब्द-शब्द लेखक की अनुभूतियों के दर्पण हैं। 

संग्रह की कहानियाँ यद्यपि अलग-अलग भावभूमि की हैं, तथापि उनमें तारतम्यता देखी जा सकती है। 

संग्रह की कहानियाँ ‘टूटे-अनटूटे रिश्ते’, ‘वापसी’ भारतीय पारिवारिक व्यवस्था से विचलन का निषेध दर्शाती है तो ‘कापुरुष’, ‘घटती-बढ़ती परछाईंयाँ’, ‘समझौता’, ‘इमेज’, ‘दूसरी हार का अहसास’, ‘प्रतिशोध’, ‘उभरते बिम्ब’ व ‘पोस्टमार्टम’ मध्यवर्गीय जीवन में आएदिन उत्पन्न होने वाले तनावों और उनसे मुक्ति की छटपटाहट की राह दिखाती हैं। प्रतीत होता है कि ये कहानियाँ समान्तर कहानी-आन्दोलन से प्रभावित होकर लिखी गई हैं। 

‘अलगिया गिलास’ में सामाजिक समरसता स्थापित करने की दृष्टि से श्रेष्ठ कहानी है। वर्षों से लगातार हो रहे सामाजिक परिवर्तन से पिछड़ा समाज अब पिछड़ा या अछूत नहीं रहा। समय की बागडोर ने उस वर्ग की बैलगाड़ी को खींचकर वर्तमान द्रुतगामी समाज के साथ ला खड़ा किया है। कहानी में लेखक ने इसी ओर इशारा दिया है। खैर ! मेरा भी यही मानना है कि किसी वर्ग को पिछड़ा मानना या ऊँच-नीच का भेद रखना समाज में सर्वथा अनुचित है। 

कहानी ‘हुड़ुकचुल्लू’ शीर्षक नाम, कथ्य, कथानक और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है। 

‘यूरेका’ और ‘जूतों की चुगली’ बाल व किशोर मनोविज्ञान को लेकर लिखी गई कहानियाँ हैं जिनमें ‘जूतों की चुगली’ अति शिक्षाप्रद है। 

कहानी ‘साढ़े तीन घंटे’ भौतिक जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाने वाली कहानी है। इस कहानी में कहानीकार ने आस-पड़ोस सें लेकर मध्यवर्गीय जीवन के लगभग सभी पक्षों को जैसे कि राग-द्वेष, मिलन-बिछोह, जन्म-मृत्यु, अपराध-दण्ड और जीवन से पुनः-पुनः जुड़ने की प्रक्रिया आदि को कुल साढ़े तीन घंटे की अवधि के कथाविस्तार में समेटा है जैसा कि जेम्स ज्वायस ने अपने एक उपन्यास में किया था जिसमें कुछेक वर्षों में जीवन की बहुत सारी घटनाएँ घटित दिखाई गई हैं। कहानी-लेखक ने उसी बुनावट को एक मोटे उपन्यास के बजाय एक छोटी सी कहानी में प्रस्तुत कर दिया। 

कहानी ‘प्रतिमान’ प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से सम्बन्धित युग की कहानी है। लेखक ने इस कहानी में चरित्र-नायक के राष्ट्र-प्रेम को भरपूर सफल ढंग से व्यक्त किया है। 

संग्रह की कहानी ‘मि॰ अजूबा’ पर अश्लीलता का आरोप लग सकता है यद्यपि लेखक ने इस कहानी के माध्यम से आधुनिकता की दौड़ में सम्मिलित होने और आधुनिकतावादी नित नए प्रयोग करने से दूर रहने का संदेश दिया है। 

कहानी ‘कहाँ से कहाँ तक’ भी अन-अंकुशित मन की विभीषिका को दर्शाया है, अन-अंकुशित मन का दुष्परिणाम पढ़े-लिखे ज्ञानी व्यक्ति को भी पागल तक बना सकता है। इस तरह यह कहानी भी सोेद्देश्य लिखी गई कहानी है।        

संग्रह की कहानियों से प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं लेखक अपने जीवन का लम्बा सफर पार करने के बाद भी आज के समाज से संतुष्ट नहीं है। उसकी भी वजह है, जिसका जिक्र लेखक ने बखूबी किया है। 

हम सब बेहद भाग्यशाली हैं कि हमारे समाज में ऐसे भी प्रबुद्ध लोग हैं जो हमारा मूल्यांकन करके हमें आईना दिखाते हैं। 

यह कहानी-संग्रह साहित्य-भूषण से सम्मानित विजय रंजन जी की अट्ठारह कहानियों का संग्रह है जिसका प्रकाशन सरिता लोकसेवा संस्थान (सुल्तानपुर) द्वारा किया गया है। 

लगभग 136 पृष्ठों वाली इस पुस्तक को लेखक ने उन चरित्रों को समर्पित किया है जिनकी प्रेरणा से इस पुस्तक को रचने की शक्ति मिली। 

इस कृति द्वारा लेखक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व दोनों का अवलोकन किया जा सकता है। 

विजय रंजन जी सात दशक की अपनी जीवन-यात्रा में अपनी लेखनी से लगातार समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास करते रहे हैं। इस पुस्तक की प्रत्येक कहानी एक नया अनुभव कराती है और प्रायः सभी कहानियाँ आदर्शवादी लोकहिती चिन्तन से ओत-प्रोत हैं। मेरा यह प्रगाढ़ विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों को अत्यंत रोचक लगेगी और उनको नई राह दिखाने में भी कामयाब रहेगी। 

पुरावृत्ति और विवृति में लेखक के मंतव्य से यह साफ झलकता है कि लेखक का अध्ययन अत्यंत समृद्ध है। 

पुरोवाक् डॉ॰ शोभा सत्यदेव ने लेखक की अनुभूतिक कहानियों की जो प्रशंसा की है, उससे सहमत होना पड़ेगा परन्तु पुरोवाक् विदुषी डॉ॰ सत्यदेव ने संग्रह की कुछेक कहानियों के अंग्रेजी नामों पर आपत्ति की है, परन्तु कहानियों के कथानक को देखते हुए अंग्रेजी-उर्दू के शब्द जो शीर्षक आदि में प्रयोग किए गए हैं, वे आज के मध्यवर्गीय समाज में प्रचलित बोलचाल में सामान्य प्रयोग के शब्द बन चुके हैं। चूँकि संग्रह की कहानियाँ आज के मध्यवर्गीय समाज से सम्बन्धित हैं, अतएव ऐसे प्रयोगों को अनुचित नहीं माना जाना चाहिए।    

शुभाशंसा में डॉ॰कौशलेंद्र पाण्डेय जी ने लेखक को मस्तिष्कजीवी और लोकोपकारी बताया है। पुस्तक हेतु यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है-   

            संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे। 

         सुभाषित रसास्वादः सङ्गतिः सुजने जने।।

अर्थात् संसार रूपी कड़ुवे पेड़ से अमृततुल्य दो ही फल उपलब्ध हो सकते हैं, एक ‘सुभाषित चिंतन का आस्वादन’ और ‘दूसरा सज्जनों की संगति’। यह दोनों बातें इस पुस्तक में एक साथ चरितार्थ होती हैं। 

अंत में मैं यही कहूँगा कि साहित्य-भूषण विजय रंजन जी वर्तमान साहित्यकारों में एक अलग पहचान रखने वाले ऐसे विद्वान् हैं जो अपनी विद्वत्ता से सम्पूर्ण राष्ट्र को एक नई राह दिखा रहे हैं। इनका साहित्य-प्रेम अद्वितीय है। 

‘उभरते प्रतिबिम्ब’ कहानी-संग्रह के लिए लेखक को अशेष शुभकामनाएँ। प्रभु, विजय रंजन जी को सदैव ऊर्जावान् रखें ताकि विजय रंजन जी हम सभी को अपने लोकहिती चिंतन से सदैव सिंचित करते रहें।Û       

       - भारतीय नौसेना, कोच्चि (केेरल),  दूरभाष: 8127780577

                      (‘‘अवध-अर्चना’ अंक 101 में प्रकाशित)


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