वसन्तपंचमी के निहितार्थ
वसन्तपंचमी अर्थात् माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी। यह एक अति विशिष्ट तिथि है। तिथि नहीं वरन् एक महान् पर्व। सांस्कृतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और अन्यान्य आयामों वाला उत्सवधर्मी पर्व है वसन्तपंचमी। यूँ वसंत-पंचमी में पंचमी का महत्त्व नहीं है। महत्त्व है तो वसंत का। यह अव्ययीभाव है। अ-व्ययी भाव ही है यह। वसन्त एक विशिष्ट ऋतु है। वसन्त विशिष्ट हुलास है। वसन्त सर्जनापरकता का विशिष्ट आह्वान है। वसन्त रचनाधर्मिता को साक्षात् करने का अवसर भी है। वासन्तिक अवसर पर मदनोत्सव सह सत्त्वशील रचनाधर्मिता की देवी सरस्वती के अवतरण का एक विशिष्ट इंगित भी है। वासंतिक पर्व वस्तुतः सिसृक्षा सह दिदृक्षा की सम्यक्-दृष्टि, सम्मा-दिट्ठि का सार्थक प्रतिमान है। कहना अनावश्यक है कि हमारी रचनापरकता सकारात्मक और सार्थक हो, मानवहिती और सार्वकल्याणक हो --- ऐसी अपेक्षा सर्वदा विद्यमान रही है भारतीय मनीषा में। इसी का प्रमाण है कि वासन्तिक पर्व को हम दो स्वरूपों में मनाते हैं-
1.सर्जनात्मकता के उत्सव मदनोत्सव के रूप में।
2. सात्विकता, लोक-कल्याण, रचनाधर्मिता, द-कारत्व, ज्ञान-प्रदायिकता और ऊर्ध्ववाही जीवनराग आदि की अधिष्ठात्री परम सत्त्वशील देवी सरस्वती के अवतरण-दिवस के उपलक्ष्य में सरस्वती-पूजन के रूप में।
हमारे यहाँ जो भी पर्व मनाए जाते हैं उनके नेपथ्य में कोई न कोई विशिष्ट नैतिक, प्राकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इंगित अवश्य होता है। इस वासंतिक पर्व के भी तद्गत इंगित हैं जिन्हें सार्थक रूप में समझना आवश्यक है और उपयोगी भी।
कहते हैं सरस्वती-पूजा ज्ञान-कर्म-लोककल्याण के समवेत संवाहक श्रीकृष्ण द्वारा जन-जन में व्यापक रूप से प्रचलित कराई गई थी। यद्यपि ब्राह्मी, इरावती, भारती, सरस्वती और महासरस्वती की पूजा यहाँ वैदिक युग से ही प्रचलन में रही है।
विदित हो कि देवी सरस्वती का पूजन हो या कि मदनोत्सव दोनों ही अकारण या निरर्थक नहीं हैं।
मदनोत्सव जिसका आरम्भ आज वसन्तपंचमी से माना जाता है और जिसका समापन राका होलाका (होली) को प्रत्युत दूसरे दिन उल्लास, हुलास के प्रतीक रंग-अबीर-गुलाल आदि से एक-दूसरे को सराबोर करके सम्पन्न किया जाता है। प्रह्लाद के युग से मनाया जा रहा है यह पर्व।
वसंतोत्सव को मदनोत्सव का रूप कब प्रदान किया गया कहना सहज नहीं है। मदनोत्सव भी वास्तव में सृजनापरकता के सम्मान का उत्सव है।
मदनोत्सव संभवतः यूनानी संस्कृति का अवदान है, यद्यपि यूनान से हमारे देश-समाज का मेलजोल बढ़ने के पूर्व भी यहाँ के अनेक राजाओं सामन्तों के द्वारा मदनोत्सव के विशाल आयोजन किए जाते रहे हैं।
वस्तुतः हमारे देश के प्रकृति-चक्र के अनुसार वसन्त मधु-माधव मास (चैत्र और वैशाख मास) में आना चाहिए। लेकिन वसन्त आने के 40 दिन पूर्व ही वसन्तपंचमी का उत्सव मनाए जाने का चलन है। कहते हैं ये 40 दिन शेष 5 ऋतुओं ने अपने-अपने अंश की समयावधि से 8-8 दिन काट कर स्वयं वसन्त को दे दिए थे इसलिए कि हेमन्त के पतझड़ जैसे नीरस मौसम के तत्काल पश्चात् वसन्त के आ जाने पर भी सर्जना को तत्काल साकार नहीं किया जा सकता था। तथैव, शेष ऋतुओं ने प्रकृति को वास्तविक वसन्त के आने तक सर्जना के लिए वस्तुगततः तैयार हो जाने के निमित्त, उसके ऋतुमती होने के निमित्त प्रदान किए थे ये 40 दिन। इस तरह प्रकृति की इसी ऋतुमती अवस्था के द्योतक हैं वसन्त के आगमन के पूर्व के ये दिन। ऋतुओं के पूर्वोक्त आदान-प्रदान की कहानी सत्य हो या न हो, इतना तो सत्य है कि हमारे देश में आसेतु हिमालय कामरूप से कच्छ तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रकृति इन दिनों हेमन्त ऋतु के बावजूद सोल्लसित हो जाती है। शिशिर की निष्क्रियता, हेमन्त की उदासी दूर होने से धरती, नदी, पेड़-पौधे, पक्षी, जीव-जन्तु और मनुष्य में उल्लास और हर्ष का संचार हो उठता है इन दिनों पेड़-पौधों पर नई-नई पत्तियाँ आने लगती हैं। पीपल बरगद, नीम जैसे वृक्ष भी नए-नए पत्तों को धारण कर सुन्दर मनभावन दिखने लगते हैं। आम हो या महुआ, सिरिस, नीम, बकाइन, कटहल, पलाश आदि एक के बाद दूसरे पर मंजरियाँ मुस्कुरा उठती हैं। गुलाब सदृश पुष्प-पौधों पर भी कलियाँ हँसने लगती हैं। मेंढक, छिपकली सदृश छोटे जीव भी शीत-निद्रा से जाग जाते हैं। कोयल गुनगुनाने लगती हैं। कबूतर की गुटरगूँ और बटेर, फाख्ता, बुलबुल, ललमुनियाँ, गौरेय्या सभी की चहलकदमी-चहचहाहट बढ़ जाती है। खेतों में सरसों अरहर, मटर, चना, गेहूँ जैसी फसलें किसान के कोठार में जाने को ललक उठती हैं। उतना ही हर्षोन्मत्त हो उठता है किसान। सूरज की गर्मी भी बढ़ने लगती है इन दिनों और उसके प्रकाश की प्रखरता-ऊर्जस्विता भी। विद्यापति इसे ‘विहरति हरिरिहि वसन्ते’ कहते हैं और ‘ऋतुसंहार’ में कालिदास कहते हैं ‘सर्वप्रिये चारुतरं वसन्ते’। ‘मालविकाग्निमित्र’, ‘रत्नावली’, ‘पारिजात मंजरी’, ‘पुरुषार्थ चिन्तामणि’, ‘निर्णयसिन्धु’ ग्रन्थों में, ‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ और ‘वायुपुराण’ में भी वसन्तोत्सव का विस्तृत विवरण अंकित है।
औ..र, प्रकृतिगत उल्लास का फल ही कहेंगे इसे भी कि पशु-पक्षी के साथ-साथ रसिक मानव-मन में भी मादन-भाव अंगड़ाईंयाँ लेना लगता है इन दिनों। भारत ही नहीं वरन् आविश्व हिमपात, हिमशीत से छुटकारा पाकर यूरोप, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, सम्पूर्ण जगत् वासन्तिक प्रभाव से हुलस उठते हैं इन दिनों। प्राचीन संस्कृति के धनी चीन, जापान जैसे पूर्वी देशों में भी वासंतिक हुलास मुखरमान हो जाता है इस ऋतु में। पश्चिम में तो इस ऋतु को स्प्रिंग सीजन कहा जाता है। प्राकृतिक उछाह-उछाल की अभिव्यक्ति स्वरूप हुलास से तद्गत मस्ती को व्यक्त करने के लिए तरह-तरह के फेस्टिवल फंक्शन्स आयोजित होना प्रारम्भ हो जाते हैं वहाँ इस मौसम में। अनेक अंग्रेजी कवियों की कविताओं की कविताओं में स्प्रिंग सीजन का उछाह दृश्यमान है। कहना होगा कि इन देश-समाजों के स्प्रिंग सीजन का स्प्रिंग उनके मनोगत उछाह वाचाल हो उठता है।
कह सकते हैं कि नई सर्जना के लिए नई रचनापरकता के लिए जड़ से लेकर चेतन तक प्रकृति केवल भारत में ही नहीं अपितु आविश्व जाग्रत हो जाती है इन दिनों।
औ..र सुयोग संयोग देखें कि प्रकृृतिगत सर्जनात्मकता सत्त्वशील रहे सर्वकल्याणक रहे ऊर्ध्ववाही रहे संभवतः इन इंगितों को चरितार्थ करने की निमिति से वसन्तपंचमी के दिन अवतरण होता है एक सर्वथा विशिष्ट द-कारशील, सत्त्वशील, रचनाधर्मी, सर्वकल्याणक, ऊर्ध्ववाही संचेतनाप्रदायी, ज्ञानप्रदायी, विद्याप्रदायी, प्रज्ञाप्रदायी, शुभप्रिय, शुभ्रप्रिय, साहित्य-संगीत-कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का, जो रजस् तमस् से सर्वथा परे केवल और केवल सत्त्व की देवी हैं। सत्त्व ही जिनका सुरत्व है और सुरत्व ही जिनका सत्त्व है ऐसी हैं देवी सरस्वती। देवी सरस्वती के चित्र को देखें---
श्वेतवस्त्रधारी, शुुभ्रानना देवी सरस्वती श्वेेताभ, शतदलीय कमल पुष्प पर कमलासन में सत्त्वगुणोन्मुखी ब्राह्मी मुद्रा में विराजमान होती हैं। आर्यों हिन्दुओं के अन्यान्य देवी-देवता जहाँ अस्त्र-शस्त्रधारी भी हैं वहीं चतुर्भुजी देवी सरस्वती के हाथों में सत्त्व एवं भक्ति की प्रतीक स्फटिक माला, दो हाथों में वीणा और चतुर्थ हाथ में आशीर्वाद--- इतना ही दृश्यमान है। देवी सरस्वती गले में कुमुदिनी का हार पहनती हैं। देवी सरस्वती अपने हाथों में वीणा, पुस्तक और माला धारण किए रहती हैं। प्रायः उनकी एक भुजा वरदान देने की मुद्रा में होती है। देवी सरस्वती के समीप ही उनका वाहन श्वेत राजहंस विद्यमान रहता है। देवी सरस्वती का वाहन राजहंस भी नीर-क्षीर विवेकी और सत्त्वशील है।
देवी सरस्वती के श्वेतवस्त्र श्वेेत कमल पुष्प का आसन, कमलासन में ब्राह्मी मुद्रा और कुमुदिनी विनिर्मित माला-धारण भी उनकी सत्त्वशीलता और उनकी सत्त्वगुणोन्मुखी प्रवृत्ति का प्रतीक हैं। देवी सरस्वती के हाथ की पुस्तक ज्ञान का और वीणा उनकी स्वरसाधना का, संगीतप्रियता का और जीवनरागात्मकता का प्रतीक है।
देवी सरस्वती की मुद्रा भी देखें। अति महत्त्वपूर्ण है देवी सरस्वती की ब्राह्मी मुद्रा। आसनकारी योगियों के अनुसार कमलासनी ब्राह्मी मुद्रा में ऊर्जा तरंग मूलाधार चक्र से लेकर सहस्त्रार चक्र तक अविशृंखलित होकर पैर के नख से लेकर सिर की शिखा तक सम्पूर्ण तन-मन को ऊर्ध्वरेतः सत्त्वशील कर देती है। उससे विचार, बुद्धि, विवेक सभी सात्विक हो उठते हैं। किसी भी कमलासनी योगी को देखिए तो दिखेगा कि उसकी मुख-दीप्ति, ललाट-दीप्ति और सम्पूर्ण शरीर की आभा (।नतं) देदीप्यमान होती रहती है जिसमें सत्त्वशीलता की आभा झलकती है। गुणग्राही बताएंगे कि स्फटिक की माला और कुमुदिनी के हार से भी विचार सत्त्वशील और विश्रान्तिजनक हो उठते हैं और धारक में सत्त्वोन्मुखता प्रस्तारित हो जाती हैं। देवी सरस्वती की ब्राह्मी मुद्रा से भी उनके प्रमुखतम अवदान कविता को आषेचित किया जा सकता है।
जहाँ तक देवी सरस्वती की वीणा का प्रश्न है, उनकी विपंची नाम की वीणा 9 तार की वीणा है। 9 तारों में से प्रथम सात तार संगीत के सात सुरों का अर्थात् स (षड्ज), रे (ऋषभ), ग (गांधार), म (मध्यम्), प (पंचम्), ध (धैवत्), नि (निषाद्) का, आठवाँ तार आधिभौतिकता का तथा नवाँ तार आधिदैविकता का प्रतीक है। संगीत के सुरों के प्रतीक सात तारों में प्रथम तार षड्ज ‘योग-साधना की षट्क सम्पत्ति (शम, दम, श्रद्धा, आस्था, तितिक्षा और समाधान)’ का भी प्रतीक है। देवी सरस्वती विपंची (वीणा) को केवल धारण ही नहीं करतीं, उसे बजाती भी हैं। इन निर्जीव तारों से आकर्षक सबल सुर सुझंकृत एवं प्रस्तारित करती हैं देवी सरस्वती; अर्थात् षड्ज के साथ-साथ सभी 9 तारों पर पूर्ण नियंत्रण है उनका। इस तरह देवी सरस्वती की शक्ति से सम्पन्न संगीत और को विशेषकर कविता को (कविताराधक कवि को भी) षड्ज गुण से, संगीत-सुरों के गुण से और आधिदैविकता के साथ आधिभौतिकता से सम्पन्न होना तथा इन गुण-विशेषों पर पूर्ण नियंत्रण रखना ही चाहिए।
औ..र, देवी सरस्वती जिनसे शक्ति/प्रेरणा प्राप्त करके कविता विरचित होना बताया जाता है वे सुर-साधिका हैं और सुर की अधिष्ठात्री भी। अतएव, देवी सरस्वती से सहयुजित कविता को ‘सुर’ (लय) से विमुख नहीं होना चाहिए। इसीलिए तुकान्त या अतुकान्त के साथ-साथ मुक्त छन्द में भी राग और लय से विच्युत नहीं होनी चाहिए कविता।
ध्यातव्य है कि हर वाद्य यन्त्र की अपनी प्रकृति होती है। जिस तरह श्मशान में वंशी या कि विवाह-मण्डप में करताल नहीं बजाई जाती, उसी तरह देवी सरस्वती की ‘वीणा’ का भी विशिष्ट इंगित है। यह सत्त्वोन्मुखी झंकार का वाद्ययन्त्र है। वीणा विशेषकर विपंची वीणा के सत्त्वोन्मुखी स्वर का साक्ष्य शतपथ ब्राह्मण सुधाकलश वाजसनेयी संहिता संगीतोपनिषद् सारोद्वार’ आदि से प्रमाणित होता है।
इस प्रकार देवी सरस्वती के चरित-समग्र की व्यंजना से निष्कर्षित है कि अपने वाहन और वाद्ययन्त्र सहित देवी सरस्वती आपादमस्तक सत्त्वशील हैं।
10,000 वर्षों से अधिक प्राचीन माने जाने वाले वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद में (अन्यान्य भारतीय वाङ्मय में भी) देवी सरस्वती के सत्त्वशील, नयशील, ऋतशील, सत्-शिव-सुन्दर सद्गुणों का रूपायन है। ऋग्वेद में प्रथम मण्डल की ऋचा 13/9 में इला (इड़ा) सरस्वती मही तीन देवियों को उच्चासन पर आसीन किया गया है (इला सरस्वती मही तिस्त्रः देवीर्मयो भुवः)। ऋक् 2/3/8 में कहा गया है-सरस्वतीः साध्यन्ति धियं न इड़ा (इड़ा या इला नहीं बल्कि सरस्वती बुद्धि का विकास करती हैं)। ऋक् 2/41/19 में कहा गया है कि माता अम्बा के रूप में यह (देवी सरस्वती) अकिंचन को भी समृद्ध कर देती हैं। ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल में कहा गया है कि सरस्वती की कृपा से प्राप्त बुद्धि से मनुष्य विप्र (विशिष्ट प्रज्ञान युक्त ज्ञानी) बनता है--धियो विप्रः अजायत। ऋग्वेद (प्रथम मण्डल/3/30) में कहा गया है--- महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियः विश्वाः विराजति। (सरस्वती ज्ञान से जगत् रूपी महासागर की गह्वरता का बोध कराती हैं, समस्त बुद्धियों को प्रकाशित करती हैं)। ऋक् में ही सरस्वती निदःपातु (सरस्वती निन्दकों से बचाती हैं) ......पावकाः न सरस्वती (अग्नि नहीं सरस्वती पवित्रता की देवी हैं) यज्ञं दधे सरस्वती (यज्ञ/याग सरस्वती प्रदत्त होता है) यः रत्नधा वसुविद यः सुदत्राः सरस्वती सुनृतां चेतयन्ती आदि प्रशंसात्मक सूक्त भी हैं जो देवी सरस्वती के अन्यान्य सत्त्व गुणों को रूपायित करने में समर्थ हैं। देवी सरस्वती के इन गुणों के आधार पर ही ऋक् में सरस्वती यज्ञं वष्टु धियावसु का निदेशन किया गया है। डॉ0 भगवान सिंह ने अपने एक आलेख (नया ज्ञानोदय फरवरी 2012) में ऋक् की कतिपय ऋचाओं का अर्थायन करते हुए सरस्वती को यज्ञ की कामना के अर्थ में अर्थायित किया है। ऋक् में सरस्वती नः सुभगा मयस्करात् पंचजना वर्धयन्ती उल्लिखित है जिसका अर्थायन डॉ0 भगवान सिंह ने ही अर्थायित किया है-- देवी सरस्वती हमें सौभाग्यवान् और सुखी बनाएँ। इस तरह देवी सरस्वती सौभाग्य एवं सुख की प्रदाता भी मानी गई हैं।
ऋक् में ही देवी सरस्वती को दैवीय बताते हुए उन्हें इसी नाम की नदी के स्वरूप में भी शब्दांकित किया गया है। नदीतमा भी कहा गया है इस नदी को। इस नदी का प्रवाह-पथ, प्रवाह-क्षेत्र आदि भी विवेचित है वहाँ--
एको चेतति नदीं शुचिर्मती गिरिभ्यः आ समुद्रात।
+ + + + + +
आ नो दिवं ब्रहतः पर्वतात् आ सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम्।
द्यु लोक, पर्वतीय क्षेत्र और मैदानी भागों में एक साथ समान पावन भाव से प्रवाहित होने जैसे गुण बताए गए हैं सरस्वती नदी के। नदीतमा के रूप में भी सरस्वती लोक-कल्याणक ही हैं।
सामवेद में उत्तरार्चिक के मंत्र 14.61 में देवी सरस्वती को पूज्या एवं स्तुति-योग्य बताया गया है-
सरस्वती स्तोम्या भूत्।
देवी सरस्वती की प्रकृति-परास के अनुशीलन-क्रम में उल्लेख्य है मार्कण्डेय पुराण देवी भागवत् और दुर्गासप्तशती में देवी सरस्वती/महासरस्वती की प्रशंसा भी। दुर्गासप्तशती’ में महालक्ष्मी के श्रीमुख से सरस्वती का काम और नाम निर्धारित करते हुए कहा गया है-
तामित्युक्त्वा महालक्ष्मीः स्वरूपमपरं नृप।
सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेन्दुप्रभं दधौ।।
अक्षमालांकुशधरा वीणापुस्तकधारिणी।
सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ।।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।
आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा च धीश्वरी।।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार सरस्वती-पूजा से मूर्ख भी पण्डित हो जाता है-
आदौ सरस्वतीपूजा श्रीकृष्णेन विनिर्मिता, यत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ मूर्खोभवति पण्डितः।
बृहदारण्यक उपनिषद् में वाक् (वाक् = वाणी = देवी सरस्वती) का गुणगान करते हुए कहा गया है कि वाक् ही सबकुछ जानने वाली हैं और वे सब पदार्थों में ज्ञान के रूप में व्याप्त होकर सर्वत्र परिव्याप्त है। तभी तो वाक् (सरस्वती) को महाविद्या महावाणी और धीश्वरी भी कहते हैं। कविकुलगुरु कालिदास कहते हैं -
संस्कारवत्एव गिरा मनीषी तया स पूतश्च विभूषितश्च
+ + + + + + +
बभूवकृत संस्काराः चरितार्थेव भारती।
कवि माघ देवी सरस्वती को शुद्धवर्णा कहते हैं।
औ..र क्या आश्चर्य कि ऐसी देवी सरस्वती को ईक्षण तप-निष्ठ सर्जनाशील बहुज्ञ चतुर्मुख ब्रह्मा के साथ सहयुजित कर दिया आर्ष मनीषा ने। चतुर्मुख ब्रह्मा की रचना : सृष्टि को भी सत्त्वशील रखना था न !
तथ्यतया देवी सरस्वती की सत्त्वशीलता और ज्ञान-प्रदान प्रभृति अवदान इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि वैदिक वाङ्मय ही नहीं अपितु आदि-महाकाव्य रामायणम् (वाल्मीकीय रामायण), कालिदास, माघ, वसुबंधु, राजशेखर से लेकर भारतविद् विलियम जोंस, महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ वरन् अद्यतन समस्त विज्ञजन देवी सरस्वती की आराधना करते आए हैं। विलियम जोंस ने देवी सरस्वती पर जो कविता लिखी उसमें भी देवी सरस्वती के सत्त्वशील गुणों का ही अभिवन्दन है। तीन महान् वैदिक देवियों में सर्वश्रेष्ठ देवी सरस्वती को इरावती, ब्राह्मी भारती और महासरस्वती स्वरूप में भी पूजित किया गया।
आदि-महाकवि वाल्मीकि तो कविता को सीधे-सीधे शक्तिरूपा विद्यारूपा सरस्वती से जोड़ते हैं। वृहद्धर्मपुराण में भी कहा गया है कि ब्रह्मा ने सरस्वती को कविता-शक्ति बनने का वरदान दिया था-- भवतु कविताः शक्ति कवीनाम् वदनेषु। आचार्य राजशेखर-उद्धृत मिथक में भी काव्यपुरुष को देवी सरस्वती का पुत्र बताया गया है। सुबन्धु भी कविता को सरस्वती-दत्त प्रसाद कहते थे। कालिदास हों या भवभूति माघ भारवि या हिन्दी जगत् के बीसलदेव रासउ के रचयिता कवि नरपति नाल्ह कविश्रेष्ठ तुलसीदास अधुना प्रगतिशील कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला आदि-- प्रायः सभी मनीषी कवि कविता-आविर्भाव के लिए देवी सरस्वती की कृपा को जोहते दिखते हैं। ध्वन्यालोक की लोचनटीका में आचार्य अभिनव गुप्त ने सरस्वत्या तत्त्वं कवि सहृदयाख्यं विजयते भी लिखा है। जैन मत में देवी सरस्वती संरचना की देवी और वाग्देवी’ के रूप में पूज्य हैं। बौद्ध नीलदेवी के रूप में पूजते हैं उन्हें।
दोनों ही अर्थों में स्वर की चरम नियंत्रिका संगीत-स्वर वाची और प्राणामयी साँस-संधानक देवी सरस्वती की प्रतिष्ठा आर्यजन में तो इतनी परिव्याप्त थी कि स्वर-साधिका देवी सरस्वती के आराधक को ही सुर (देवता) कहा जाने लगा और जो ऐसी स्वर-साधिका देवी सरस्वती के आराधक नहीं थे उन्हें असुर कहा गया। हमारे देश में स्वर-अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के पूजक, स्वर-आराधक धीरे-धीरे स्वयं ‘सुर’ बन जाते हैं-- इतनी प्रतिष्ठा है देवी सरस्वती की।
देवी सरस्वती की प्रकृति आदि की विस्तृत विवेचना के लिए यहाँ अवकाश उपलब्ध नहीं है तथापि संक्षेप में बताना होगा कि सरस्वती वाग्देवी ह®, आर्ष मनीषा से सर्वदा वंद्य भी हैं। यहाँ शिक्षालयों को ‘सरस्वती मन्दिर’ ही माना/कहा जाता है। अपने देश में अनेक नगरों में देवी सरस्वती के मन्दिर हैं। उ0प्र0 के पूर्वांचल सदृश पिछड़े प्रदेश के जनपद /नगर गोण्डा में एस0 के0 बालिका इन्टर कालेज के परिसर में भी देवी सरस्वती का भव्य मन्दिर विनिर्मित है। तभी तो पिहोवा अजमेर के विशाल सरस्वती मन्दिरों से लेकर हमारे देश के अनेक नगरों में देवी सरस्वती के मन्दिर विद्यमान है। ऐसे बहुत से विद्यालय और अन्य धार्मिक स्थल हैं जहाँ देवी सरस्वती के मन्दिर विनिर्मित हैं। दाशरथ राम के वंशज महाराज पृथु द्वारा हरियाणा के कुरुक्षेत्र में पिहोवा (पृथु नगर) में विनिर्मित अति प्राचीन सरस्वती मन्दिर 895 ई0 पूर्व0 में विनिर्मित बताया जाता है जिसे कनिंघम 882 ई0 पू0 में निर्मित मानते थे। राजपूत राजाओं ने अजमेर में भी भव्य सरस्वती मन्दिर बनवाया था, जिस पर आज ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ विद्यमान है लेकिन उसकी दीवारों पर सरस्वती महिमा अंकित है। मस्जिद केरल में सरस्वती-पूजा धूमधाम से मनाई जाती है। हमारे यहाँ केरल जैसे क्रिश्चियन बहुसंख्या वाले प्रदेश में भी देवी सरस्वती की पूजा बहुत धूमधाम से की जाती है, औ..र, केरल ही नहीं, आ-भारत (अपने उत्तर प्रदेश में भी) बंगाल की दुर्गा पूजा की शैली में सरस्वती-पूजा का आयोजन किया जाने लगा है।
भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में किसी न किसी रूप में देवी सरस्वती की आराधना होती है। मिल्टन ‘पैराडाइज लास्ट’ में म्यूजेस देवियों की वन्दना करते हैं। होमर भी अपने महाकाव्य के आरम्भ में देवी वन्दना करते हैं। संयोगात् जापानी जगत् में देवी बेंजाइतेन, सामी जगत् में देवी इन्हेंदुआना, इटैलियन जगत् में देवी फेमिना, ग्रीक और अनेक योरोपीय देशों में देवी डोरोसियस, एथेंस में देवी म्यूजेस, चीन में देवी नीला/नीलसरस्वती और तिब्बत में महासरस्वती वज्रशारदा, वज्रसरस्वती की कृपा से सम्पृक्त माना जाता है कविता-आविर्भाव को, कविता-शक्ति को भी। ये सभी देवियाँ देवी सरस्वती की प्रतिमूर्ति हैं या उनकी अंशभूत। यूनान में देवी सैफो से कविता का आरम्भ माना जाता है। यूनानी देव-द्वादशी की देवी एथेना को (जिन्हें ज्यूस के मस्तक से उत्पन्न बताया जाता है--- ऐसी देवी एथेना को) देवी सरस्वती के समतुल्य माना जाता है जिनकी कृपा से कवित्व शक्ति की प्राप्ति संभव मानी जाती है। यूनानी काव्य-जगत् में सहृदयता, ज्ञान और सौन्दर्य की देवी वीनस को भी कविगण अपनी आराध्या मानते हैं--- उनके गुणधर्म भी देवी सरस्वती के समतुल्य है। और तो और, प्लेटो भी मानते थे कि सुन्दरतम कविता देवियों का प्रसाद है।
पुनः देशज वाङ्मय की ओर लौटें तो कहना होगा कि वाल्मीकीय रामायण एवं वृहद्धर्मपुराण के अंतःसाक्ष्य से कहा जा सकता है कि ईक्षणतपी बहुज्ञ ब्रह्मा ने तद्गत उत्प्रेरणा हेतु देवी सरस्वती को प्रेरित किया। अब यहीं प्रश्न उभरेगा कि आदि-श्लोक के उद्भव के संदर्भ में भी और देवी सरस्वती के ही कविता-शक्ति बनने के संदर्भ में भी कि 33 कोटि दैवीय शक्तियों में से मात्र देवी सरस्वती को ही क्यों चयनित किया ईक्षणतपी चतुर्मुख बहुज्ञ ब्रह्मा ने ? उत्तर स्पष्ट है कि कविता-प्रकृति और देवी सरस्वती की प्रकृति में कोई विपर्यय नहीं दिखा बहुज्ञ ब्रह्मा को। तभी तो 33 कोटि दैवी शक्तियों में से मात्र देवी सरस्वती को उत्प्रेरित किया उन्होंने आदि-श्लोक के उद्भव हेतु और कविता-शक्ति बनने हेतु। सारतः वासंतिक पर्व पर सर्जनोन्मुखता और प्रकृतिगत हुलास-उछाह के आज की पावन वसन्तपंचमी के अवसर पर देवी सरस्वती के अवतरण को अकारण या निरर्थक न मानते हुए हमें अपनी सर्जनापरकता को स्वरित करने के क्रम में ध्यान रखना होगा कि हमारी सकल सर्जना, सकल सर्जनापरकता, सकल रचनाधर्मिता को सारस्वत तत्त्वों से पूर्णतया अभिमण्डित रखा जाए--- आज के प्राकृतिक वासंतिक हुलास के पर्वारम्भ की तिथि को ही देवी सरस्वती के अवतरण का सकल प्राकृतिक निर्देश यही है। तदनुसार काव्य (कविता सहित साहित्य की समस्त विधाएँ) ही नहीं, अपितु हमारी प्रत्येक सर्जना को शुद्ध (पावन) सत्त्वशील, ऋतशील, शिवशील, नयशील, विप्र-बुद्धिसम्मत ज्ञानप्रदायी, प्रचेतस्, प्रभासक, द-कारशील, कलाशील, सुन्दरम्शील, धीमान्, वेदगर्भी, शान्ति-उन्मुखी, पावन अभिकर्मकारी, रचनाधर्मी, षड्जगुणसम्पन्न, सरस, लयशील और जीवनरागसम्पन्न होना ही चाहिए। प्रकृतिगत सत्य को अंततः विज्ञान भी स्वीकारता ही है। तदनुसार सत्त्वशीला देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था वसन्तपंचमी को। इसी तिथि को वासंतिक पर्व के आरम्भ में यह अवतरण प्रकृति के इंगित-विशेष का अर्थवाचक है। ऐसे प्राकृतिक सत्य का निहितार्थ मनसा-वाचा-कर्मणा अनुशीलित कर लिया जाए तो हमारी सिसृक्षा सह दिदृक्षा वस्तुनिष्ठतः सत्त्वशील और लोक-कल्याणक हो जाएगी त..ब हमारा जीवनराग भी सारस्वत गुणों से आसिक्त हो जाएगा।
काश ! हमारे विद्वान् संस्कृतिचेता सनातनधर्मी हों या नास्तिक या आधुनिक कथित धर्मनिरपेक्षवादी, आज के वासंतिक पर्व पर प्रकृति के इस इंगित को मनसा-वाचा-कर्मणा स्वीकार कर सकें।
(प्रकाश्य आलेख-संग्रह ‘ वातायन से ’ से)
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