नय रस : क्या....क्यों....कैसे
आचार्य भरत मुनि का कहना था कि बिना ‘रस’ के कविता का कोई अर्थ प्रवर्तित नहीं होता है- “ नहि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते।“ वे तो यह भी मानते थे कि ‘भाव’ से हीन कोई ‘रस’ नहीं होता और ‘रस’ से हीन कोई ‘भाव’ नहीं होता- “ न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः, परस्परकृतासिद्धिः तयोरभिनये भवेत।। ”
आचार्य भरत ने यहाँ तक कह दिया कि ‘रस’ से हृदयसंवादी भाव उत्पन्न होते हैं-
“ योऽर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भवः। ”
आचार्य धनंजय भी कहते थे- “ न रसयादीनाम् काव्येन सह व्यंग्यंव्यंजकभावः तर्हि भाव्यभावकसम्बन्धः। ”
आ0 रुद्रट इन सबसे आगे हैं। उन्हांने ‘काव्यालंकार’(१२: १ व २) में घोषित किया कि ‘काव्य’ के लिए ‘रस’ आवश्यक है; जो कविता रसहीन है वह ‘शास्त्र’ की कोटि में आनी चाहिए, ‘काव्य’ की कोटि में नहीं -
“ ननु काव्येन क्रियते सरसानामवर्गमश्चतुर्वर्गे।
लघु मृदु च नीरसेभ्यः ते हि यस्यन्ति शास्त्रेभ्यः।।
तस्मात्तत्कर्त्तव्यं यत्नेन महीयसा रसैः युक्तम्।।
उद्वेजनमेतेषां शास्त्रवदेवान्यथा हि स्यात्।। ”
आचार्य महिम भट्ट के अनुसार ‘रस’ के अभाव में काव्य में प्रहेलिका आदि ही शेष रह सकती है। उनका मानना था- “ काव्यान्मात्मति संज्ञिनी रसादि रूपे न कस्यचितग्निमितः। ”
आचार्य भट्टनायक कहते हैं कि कृति के संवेदनात्मक व्यंग्य पर पाठक की प्रत्यक्ष प्रतीति का विषय जो आस्वादन के रूप में है, वही ‘रस काव्यार्थ’ के नाम से पुकारा जाता है -
“ संवेदनाख्या व्यंग्यस्व परिसंवित्तिगोचरः।
आस्वादनात्मानुभवो रसः काव्यार्थ उच्यते।। ”
औ..र, ‘भावो रसः’ को मानने वाले आचार्य अभिनव गुप्त मानते थे- “ रसनैन सर्वजीवितम् काव्यम्। ” उनका यह भी मानना है कि- “ काव्यान् भावयन्तीति तत्काव्यार्थो रसः। ”
आचार्य भरत से लेकर आ0 अभिनव गुप्त तक के उपर्युक्त प्रकथनों का समग्र है कि ‘रस’ औ..र ‘भाव’ का एवं ‘रस’ औ..र ‘कविता’ का सम्बन्ध अविच्छिन्न है।
दूसरी ओर, ‘रस-सिद्धान्त’ के प्रथम व्याख्याकार आचार्य भरत का यह भी मानना था -
“ न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला।
न तत्कर्मं न योगोऽसौ नाट्येऽस्मिन्न दृश्यते। ”
आचार्य भामह भी मानते थे-
“ न स शब्दो न तद्वाच्यं न न्यासो न सा कला।
जायते यत्र काव्याङ्गमहो भारो-महाकवेः।। ”
उपर्युक्त दोनों प्रकार के मन्तव्यों का समवेत है कि-
१. हर विषय पर काव्य/नाट्य की प्रस्तुति महाकवि द्वारा संभव है।
२. हर प्रकार के ज्ञान, विद्या, कला, कर्म में काव्य/नाट्य की संस्थिति है।
३. ऐसे काव्य का अर्थ ही ‘रस’ है जो प्रत्यक्ष में संवित्परक, संवेदनापरक, आख्यात्मक हो, जो भावयन् योग्य हो तथा जो आस्वादनयोग्य हो।
४. ऐसे ‘काव्य’ में ‘अर्थ’ होगा एवं ‘रस’ भी।
५. बिना रस के कोई काव्य ‘काव्य’ नहीं हो सकता।
औ..र, सच ही माना जाएगा कि जब ‘काव्य’ का ‘अर्थ’ ही ‘रस’है, जब ‘काव्य’ का ‘भाव’ ही ‘रस’ है तो रसहीन कैसे होगा ‘काव्य’ ? कोई न कोई ‘भाव’ कोई न कोई ‘अर्थ’ होगा ही अवश्य उसमें और तदनुसार होगा कोई न कोई ‘रस’ भी हर ‘काव्य’ में।
नि..स्सं..दे..ह, आ0 भरत, भामह, भट्टनायक, रुद्रट, महिम भट्ट, अभिनव गुप्त न तो झूठे हैं और न ही अविश्वसनीय। त..ब, हर ‘भाव’ की संवित्गोचर संवेदनापरक काव्याख्या में ‘रस’ अस्तित्ववान् होना ही चाहिए।
‘काव्य’ और ‘रस’ की ऐसी पारिभाषिक पृष्ठभूमि में (कि हर विषय पर काव्य-विरचना संभव है और हर ‘काव्य’ में ‘भाव’, ‘अर्थ’ एवं तदनुसार ‘रस’ की विद्यमानता अपरिहार्य है-- ऐसी पृष्ठभूमि में ) यदि कोई आपसे पूछे कि ‘खीरा सिर तें काटिए मलिए लोन लगाय, रहिमन करुए मुखन को चहिए यहै सजाय’ में कौन सा रस है ? तो क्या वर्तमान में जो एकादश रस: ‘शृंगार’, ‘हास्य’, ‘रौद्र’, ‘करुण’, ‘भयानक’, ‘वीर’, ‘बीभत्स’, ‘अद्भुत्’, ‘शान्त’, ‘वात्सल्य’, ‘भक्ति’ का रसघट-पनघट है उससे इस दोहे की रस-निष्पत्ति विवेचित की जा सकती है ? नहीं न ! परन्तु क्यों ? क्या यह दोहा ‘काव्य’ नहीं है ? क्या यह दोहा संवित्गोचर नहीं है ? क्या इसमें कोई ‘भाव’, ‘अर्थ’ या कि तद्गत अनुभावन-वांछा नहीं है ? नहीं ऽऽऽ ! ये सारी विशेषताएँ हैं इन काव्य-पंक्तियों में, परन्तु सत्य यह है कि इसकी विवेचना के लिए वर्तमान का रसघट/रस-पनघट छोटा पड़ रहा है।
औ..र मात्र उपर्युक्त दोहा ही नहीं है जिसके लिए वर्तमान का रस-पनघट छोटा पड़ रहा है अपितु निम्नांकित अनेक काव्य-पंक्तियों की भी सटीक रस-विवेचना वर्तमान के रस-घटों से नहीं की जा सकती। यथा-
* “ स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देख विहंग विचार
बाजि पराए पानि पर तू न विहंगनु मार। ”
बिहारी के उपर्युक्त दोहे में न तो ‘शृंगार’ रस है और न वर्तमान में प्रचलित/मान्य अन्य रसों में से कोई रस।
* ‘तीसरा सप्तक’ में प्रकाशित कवि प्रयागनारायण त्रिपाठी की काव्य-पंक्तियाँ हैं-
“ मेरे हाथों में यह किसका हाथ है
जो न बर्फ है न चिन्गारी ?
मेरी उँगलियों में यह किसकी उँगलियाँ हैं
जो न हथकडि़याँ हैं न रेशम ?.........
इनसे कह दो कि: मैं श्मशान-यात्रा पर नहीं निकला हूँ
मैं जिन्दगी का मुसाफिर हूँ ......... ”
‘हाथों में हाथ’ होने की व्यंजना से क्या इस कविता को ‘शृंगार’ रस की कोटि में रख सकेंगे ?इसी प्रकार,
* ‘तार सप्तक’ में भारतभूषण अग्रवाल का कथन-
“ कवि तोड़ो अपना शब्दजाल,
जो आज खोखला शून्य हुआ
यह है अपने पुरुखों की वैभव-भोगमयी कलुषित वाणी,
मदमत्त, विलासिनी ! त्याग इसे !
बनना है तुझको तो अगुआ
युग का, युग की भूखी, कमजोर हड्डियों का,
जिन का पानी है उठा खौल,
घिर रहा विश्व पर घटाटोप बादल बन कर। ”
आदि-इत्यादि काव्य-पंक्तियों के लिए भी वर्तमान रस-घट अक्षम ही दिखते हैं।
तथ्यतया, आज विरची जा रही एकाध नहीं ऐसी सैकड़ों कविताएँ हैं जिनके लिए वर्तमान प्रचलित रसघट अपर्याप्त हैं। ऐसे ‘काव्य’ को भले ही छायावादी, प्रगतिवादी, नयी कवितावादी, जनवादी, समकालीन कविता आदि-आदि विभिन्न काव्यवाद के खाँचे में बैठा दिया जाए किन्तु ऐसी काव्य-पंक्तियों में जो समावर्त्तक तत्त्व है, उनमें अनय, अनृत का जो इंगित और तद्गत निरोध-निषेध की सदिच्छा है, उनको देखते हुए कहा जाना चाहिए कि ऐसे काव्य में अन्यान्य वाद-तत्त्वों के साथ नयशीलत्व के तत्त्व भरपूर परिलक्षित हैं।
‘रामचरितमानस’ को ही लें। इसकी प्रसिद्ध चौपाई है--
“ दैहिक दैविक भौतिक तापा। रामराज्य नहिं काहुहि ब्यापा। ”
विदित हो कि रामचरितमानस का अंगीरस ‘शान्त’ रस नहीं, बल्कि ‘भक्ति’ रस है किन्तु उद्धृत चौपाई भक्ति रस की नहीं है। त..द..पि, ‘ न यत्र दुःखं न सुखं न द्वेषो नापि मत्सरः, ततः सर्वेषु भूतेषु स शान्तः प्रथितो रसः’ के ब्याज से भले ही इसे खींचतान कर शान्त रस के खाँचे में बैठा दिया जाए परन्तु ‘रामचरितमानस’की निम्नांकित चौपाई को केोई खींचतान कर भी शान्त रस के परकोटे में नहीं बैठा सकता-
“ परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।। ”
ध्यान रहे, ‘शान्त’ का स्थायीभाव ‘निर्वेद’ या ‘शम’ है जबकि इस चौपाई में है ‘नय’ का अंशभूत ‘ऋत’ का इंगित और अनृत का निषेध।
‘रामचरितमानस’ का एक प्रसिद्ध प्रकरण है-
“ निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।। ”
इस दोहे को ‘वीर रस’ का दोहा बता देंगे परम्परागत रसघटवादी, परन्तु प्रश्न उठता है कि ‘वीर’ रस की ‘दयावीर’, ‘धर्मवीर’, ‘दानवीर’, ‘युद्धवीर’ में से किस कोटि में रखेंगे इसे ? आलोच्य प्रसंग में युद्धवीर, धर्मवीर, दयावीर या दानवीर का आलम्बन, उद्दीपन दृश्यमान नहीं है और न ही अंग फड़कने जैसा अनुभाव ही परिलक्षित है यहाँ, जिससे यह प्रकट हो सके कि आलोच्य प्रसंग ‘वीर’ रस का है। उपर्युक्त दोहे की दूसरी पंक्ति में सहजभाव से रामायण-नायक राम मुनियों के आश्रम जाकर उन्हें सुख प्रदान करते हैं, यही दर्शाया है कविवर तुलसी ने।
प्रथमद्रष्टया ‘वीर’ के स्थायीभाव के रूप में दिखने वाला उत्साह वास्तव में आलोच्य दोहे का वास्तविक स्थायीभाव नहीं है वरन् इसका स्थायीभाव है ‘नय’। वन में ऋषियों की हड्डियों का ढेर देख कर उन पर हुए राक्षसों के अनाचार-अत्याचार जान कर राम उस अनाचार-अत्याचार के तिरोहण के लिए उन्मुख होते हैं और तद्गत प्रण लेते हैं। अनाचार-अत्याचार को मिटाने वाला स्थायीभाव उत्साह नहीं, वरन् ‘नय’ भाव ही होता है जो भरपूर मुखर है यहाँ। ‘रामचरितमानस’ में अरण्यकाण्ड के इस दोहे के पूर्व की चौपाईयों में सूचना हैं स्थानीय जनता विश्ेोषकर ऋषियों पर राक्षसों के अत्याचार की। हड्डियों के ढेर के रूप में राक्षसों के अत्याचार-अनाचार का परिवेश दृश्यमान है। अनुवर्ती दोहा-चरण में बिना किसी प्रकार के उत्साह या वीरता का भाव प्रदर्शित किए दाशरथ राम निस्पृह, निरुद्वेग हो संतुलित भाव से ऋषियों की कुटिया में जाते दर्शाए गए हैं कविवर तुलसी द्वारा। आलोच्य दोहा की पूर्ववर्ती एवं परवर्ती चौपाईयों में और इस दोहा के स्वयं के दूसरे चरण में कहीं भी स्थायीभाव ‘उत्साह’ का प्रदर्शन नहीं है। वीतरागी मुनियों को वीरत्व के उद्वेग के बजाय लोकरक्षण के नयशील कार्य से ही सुख प्राप्त हो सकता है। इस तरह, यहाँ ‘उत्साह’ के बजाय ‘नय’ को स्थायीभाव स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार- “ प्रत्ययबोध, अनुभूति और वेगयुक्त प्रवृत्ति-- इन तीनों के गूढ़ संश्लेषण का नाम ‘भाव’ है। मन के प्रत्येक वेग को ‘भाव’ नहीं कह सकते। मन का वही वेग ‘भाव’ कहला सकता है जिसमें चेतना के भीतर आलम्बन आदि प्रत्यय के रूप से प्रतिष्ठित हो। ” देखना होगा कि आलोच्य प्रसंग में आश्रयगत आलम्बन (नायक) के कौन से प्रत्यय हैं जिनमें चेतना समाहित है परन्तु जो क्षणिक मन के वेग मात्र नहीं है। क्या आलोच्य प्रसंग, प्रत्युत सम्पूर्ण रामगाथा, में वीरत्व के बजाय अन्याय-तिरोहण और नय के सुस्थापन का भाव अधिक स्थायी प्रत्ययात्मक, चैतन्य मनस्-आवेग नहीं है ? त..ब, जब सम्पूर्ण रामगाथा में (आलोच्य प्रसंग में भी) वीरत्व के भाव की अपेक्षा नयत्व का भाव अधिक संवेगशील, अधिक स्थायी है, ऐसी दशा में आलोच्य चौपाई को वीररसीय कैसे मान सकते हैं ?
औ..र, ‘वीर’ रस के एक प्रकार ‘धर्मवीर’ के लिए भी ध्यान देना होगा कि ‘धर्म’ केवल धारण करने योग्य कर्म ही नहीं होता प्रत्युत उसका मुख्य अधिलक्ष्य आध्यात्मिक और पराभौतिक होता है। परम्परीण अर्थों में ‘धर्म’ का सरोकार भौतिक जगत् से नहीं होता है। परम्परीण अर्थों में ‘धर्म’ निवृत्तिमार्गी ही होता है, प्रवृत्तिमार्गी नहीं। ‘धर्मवीर’ के अन्यान्य विभाव अनुभाव भी विशेष निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति के होते हैं। त..ब, धर्मवीर के धर्म का विन्यास भी क्या अति संकुचित नहीं है ? तदनुसार आलोच्य दोहा को ‘धर्मवीरत्व’ से निबन्धित नहीं किया जा सकता है।
फिर भी, ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा.....’ या कि ‘....भुज उठाइ पन कीन्ह’ को यदि परम्परागत रसघट से परे मानने को तैयार नहीं हों परम्परागत रसघटवादी तो वे बताएँ कि किस तर्क से नयवादी रस: नय रस नहीं माना जाएगा ‘मानस’ के अग्रांकित दोहा एवं चौपाई में -
“ भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।। ”
- बालकाण्ड
और
“ काटइ परसु मलय सुनु भाई।
निज गुन देइ सुगंध बसाई।। ”
“ ताते सुर सीसन्ह चढ़त जगबल्लभ श्रीखंड।
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड।। ”
-उत्तरकाण्ड
‘ताते सुर सीसन्ह चढ़त जगबल्लभ श्रीखंड......’ दोहे में अनय/अनृत/अनुचित के लिए दण्ड भी है, नयत्व-ऋतत्व की झंकृति भी और न्याय का प्रमासम्मत तार्किक आधार भी। आलोच्य पंक्तियों को नय रस का काव्य न माना जाने के लिए कोई सटीक तर्क नहीं है किसी के पास। ‘रामचरितमानस’ में ऐसी काव्य-पंक्तियाँ अनेक हैं।
वास्तव में वे सभी काव्य-पंक्तियाँ जिनमें अपराध की विवेचना के साथ-साथ दण्ड का विधान है--- ऐसी न्यायक्षेत्रज काव्य-पंक्तियाँ नय रस से आप्लावित मानी जानी चाहिए। ऐसे नीति के दोहे हों या प्रगतिवादी, प्रयोगवादी नयी कविता या जनवादी काव्यपंक्तियाँ, जहाँ-जहाँ अनृत, अनीति, दुर्नीति, अत्याचार, अनाचार का प्रकट-प्रच्छन्न विरोध, प्रतिरोध, निषेध, निरोध, तिरोहण मुखर हो या/और जहाँ-जहाँ नीतिसम्मतता, नयसम्मतता, सत्त्वसम्मतता, ऋतसम्मतता आदि का एवं तद्गत आचार-विचार का निदेशन हो, जहाँ ऋत, सत्त्व, आदर्श, शिव आदि नय के विविध उपांग या/और समग्र नय की आराधना हो, वहाँ-वहाँ काव्य में ‘नयवाद’ और काव्य-रस के रूप में ‘नय रस’ की उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता। आषेच्य है कि जो ऋतपरक, नयपरक, सत्त्वपरक, शिवपरक काव्य-पंक्तियाँ है उनकी व्याख्या ‘नयवाद’ के अतिरक्त अन्य किसी काव्य-वाद से सटीकतः हो भी नहीं सकती इसलिए कि उनमें स्थायीभाव ‘नय’ ही होता है। इसी तरह ‘रस’ के नाम पर ‘नय’ रस ही होता है वहाँ। ऐसी काव्यपंक्तियों का संचारीभाव भी मति, बुद्धि से आगे बढ़कर तर्कसम्मत नयशील प्रज्ञा या/और ऋतम्भरा प्रज्ञा ही होती है जो स्वतः एक विशिष्ट भाव होती है। ऐसी काव्यपंक्तियों के विभाव, अनुभाव भी ‘नय’ से ही सम्पृक्त होते हें। उनका स्थायीभाव भी नयाकांक्षा ही होती है जो दुर्योगात् अद्यतन वैखरी में अविचारित है। ‘मति’, ‘बुद्धि’ से आगे ‘ऋतम्भरिेक प्रज्ञा’ से निःसृत ऐसे काव्य का ‘रस’ भी केवल ‘नय’ रस ही हो सकता है, शृंगार, हास्य, रौद्र, वीर, करुण, भयानक, बीभत्स (वीभत्स), अद्भुत्, शान्त, वात्सल्य या भक्ति नहीं।
देखिए, ‘नय-रस’ के नाम पर चौंकने या भड़कने की आवश्यकता नहीं है। ‘नय-रस’ तो वस्तुतः वह नयशील रस है जो हर नयशील कविता का अविच्छिन्न स्वविश्रान्त, अनन्यमुखापेक्षी, संविद्गोचर स्थायी चित्तवृत्ति वाला होता है जिसका स्थायीभाव ‘नयाकांक्षा’ है तथैव, यह एक ‘रस’ है। हर वह कविता जो अनय, अनृत, अनाचार की विरोधी, प्रतिरोधी, निरोधी, निषेधी है और जो तद्गत संघर्ष/संकल्प को मुखर करती है, जो तद्गत प्रेरणा देती है, जो नयत्व या उसके अंशभूत ऋतत्व/शिवत्व/सत्त्व आदि की आकांक्षी है-- ऐसी हर कविता का रस है ‘नय’ रस।
बताते चलें कि सीमित सीमाओं वाली ‘मति/बुद्धि’ को तो आचार्य भरत और राजा जसवन्त सिंह ने संचारीभाव में परिगणित कर लिया परन्तु आश्चर्य है कि इन चिन्तकों ने नयाकांक्षा, प्रमा और प्रज्ञा को क्यों विस्मृत कर दिया ? इस ‘क्यों’ का कोई परिहार उपलब्ध नहीं है। ऐसी दशा में बुद्धिवाद के विकास के साथ-साथ मति/बुद्धि से आगे बढ़ कर ‘मति’/‘बुद्धि’ की ‘विवेक’, ‘प्रज्ञा’, ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा’ आदि जो उच्चतर श्रेणियाँ हैं, क्या उनसे उद्भूत ‘काव्य’ को ‘रस’ के फलक पर अव्याख्यायित रखा जाएगा ? क्या उन्हें रसविहीन माना जाएगा ? नहीं न! त..ब, ‘प्रज्ञा’ या कि ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा’ से उद्भूत होने वाले नयाकांक्षा युक्त काव्य के लिए ‘नय’ रस एकमेव विकल्प है जिसे समुचित स्थान और समुचित मान वैखरी में मिलना ही चाहिए।
आश्चर्यप्रद है यह भी कि हमारे मनीषी कवियों ने काव्य-विरचन में ‘नयत्व’ को, ‘नयत्व की लोकवांछा’ को, प्रबुद्धजन के ‘नयशीलत्व’ की सुमनस् सदिच्छा को यद्यपि भरपूर रेखायित-रूपायित किया, तब भी वैखरी में काव्य-समालोचना में न तो नयवाद को स्थान दिया गया और न ही कथित श्रेष्ठ ‘आर्ष रसवाद’ में ‘नयत्वशील रस’ का अधिष्ठान किया गया। यह स्थिति तब है जबकि कथित सनातन काव्य-बीज: आदि-महाकाव्य वाल्मीकि-रामायण में आदि-महाकवि ने आदि-श्लोक से लेकर अंतिम सोपान तक हर स्तर पर नय/न्याय को वाचालतः रेखायित किया है। वाल्मीकीय रामायण जिसमें आदि-श्लोक अभिवर्णित है, जहाँ से कविता प्रारम्भ हुई और जो आदि-महाकाव्य, आदि-महत् काव्य आदि के रूप में अति महत्त्वपूर्ण काव्य है, वह कृति आद्यन्त नयरसवादी है, ‘‘नय’ रस ही उसका अंगी रस/महारस है। नयरसवादी यही रामायण सनातन काव्य-बीज है। क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ‘काव्य’ को ‘नय रस’ से आसिक्त करने पर उसमें सनातन काव्य-बीज बनने की क्षमता उत्पन्न हो सकती है ?
औ..र, ध्यातव्य है कि आचार्य रुय्यक ने अलंकारों की सात श्रेणियाँ दी थीं- 1. सादृश्य गर्भमूलक 2. विरोध मूलक 3. शृंखलाबद्ध 4. तर्क-न्याय मूलक 5. वाक्य-न्याय मूलक 6. लोक-न्याय मूलक 7. गूढ़ार्थ प्रतीति मूलक। आचार्य रुय्यक के अनुसार जब उक्ति को तर्क, अनुमान आदि से प्रभावशाली बनाया जाता है तो ‘तर्क-न्याय मूलक अलंकार’ उत्पन्न होता है; जब उक्ति को तर्कपूर्ण वाक्य से प्रभावशाली बनाया जाए तो ‘वाक्य-न्याय मूलक अलंकार’ उत्पन्न होता है; जब उक्ति में लोक-व्यवहार या नीति के तत्त्वों से प्रभाव उत्पन्न किया जाए तो ‘लोक-न्याय मूलक अलंकार’ उत्पन्न हो जाता है। आश्चर्य है कि उपर्युक्त तर्कों के ब्याज से अलंकारों की उत्पत्ति में तो तर्क-न्याय, वाक्य-न्याय और लोक-न्याय को स्वीकार किया गया किन्तु रस-सिद्धान्त में इन्हें उपेक्ष्य रखा गया। संदर्भगत आश्चर्य बहुगुणित हो जाता है जब हम देखते हैं कि काव्यशास्त्रीय स्तर पर अलंकारवादियों के युग से ‘तर्क-न्याय’, ‘वाक्य-न्याय’, ‘लोक-न्याय’ को अलंकार के रूप में अधिमान्य किया गया परन्तु रसवादियों ने अद्यतन ‘नय’ रस या समनाम्नी किसी ‘रस’ को प्रस्तावित नहीं किया।
जहाँ तक आचार्य भामह के ‘को अलंकारो अनया बिना’ का प्रश्न है, इस उक्ति में ‘अनया’ शब्द ‘असत्य’ के अर्थ में प्रयुक्त है, ‘नय’/‘न्याय’ के अर्थ में नहीं। अलंकारों में ‘अतिश्योक्ति’, ‘वक्रोक्ति’ आदि के अस्तित्ववान् होने से ही आचार्य भामह ने अलंकारों के असत्य होने का इंगित मात्र किया है। उससे ‘नय’/‘न्याय’का निषेेध तात्पर्यित नहीं है।
विदित हो कि ‘नाट्यशास्त्र’ में आचार्य भरत मुनि ‘नय’ को ‘वीर’ के विभाव के रूप में मान्यता देते हैं-
“ अथ वीरो नामोत्तमप्रकृतिरुत्साहात्मकः।
सचासम्मोहाध्यवसायनयविनयबलपराक्रमशक्ति प्रतापप्रभावादिभिर्विभावैरुत्पद्यते।
तस्यस्थैर्यधैर्यशौर्यत्यागवैशारद्यादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः।
भावाश्चास्धृतिमतिगर्वावेगौग्रशामर्षस्मृतिरोमांचादयः। ”
आचार्य भरत ‘नय’ से ‘वीर’ रस की उत्पत्ति स्वीकारते तो हैं किन्तु वे भी ‘नय’ को स्थायीभाव मानने को तत्पर नहीं दिखते। लेकिन ‘नय’ को ‘वीर’ का विभाव स्वीकारने का अर्थ ही है कि आचार्य भरतमुनि की दृष्टि से भी ‘नय’ एक प्रबल ‘भाव’ है।
आचार्य भरत ही नहीं, अपितु आचार्य धनंजय द्वारा भी ‘दशरूपकम्’ के अध्याय चतुर्थप्रकाश: कारिका 72 में ‘नय’ को प्रमुख संचारीभाव के रूप में स्वीकारते हुए बताया गया है कि प्रताप, विनय, उद्योग या प्रयास, सत्त्व (बल), मोह, अविषाद, नय, विस्मय तथा पराक्रम आदि से होने वाले उत्साह स्थायीभाव से वीर रस परिपोषित होता है। यह वीर रस दया, युद्ध और दान रूप अनुभावों के कारण तीन प्रकार का हो जाता है। उसमें मति, गर्व, धृति तथा प्रहर्ष व्यभिचारी (संचारी) भाव होते हैं-
“ वीरःप्रतापविनयाध्यवसायसत्त्वमोहाविषादनयविस्मयविक्रमाद्यैः।
उत्साहभूः स च दयारणदानयोगात् त्रेधाकिलात्र मतिगर्वधृतिप्रहर्षाः।। ”
प्रश्न उठता है कि वाल्मीकीय रामायण सदृश नयशीलत्व का आदि-महाकाव्य विद्यमान होते हुए और आ0 भरत एवं आ0 धनंजय द्वारा ‘नय’ को एक विशिष्ट भाव मान्य करते हुए भी क्या ‘नय’ केवल संचारीभाव बन कर ही विगलित माना जा सकता है ? क्या लोक-न्याय जैसे अलंकार मात्र शाब्दिक अलंकरण है ? क्या ऐसे अलंकरणों से ‘रसवाद’ का कोई लेना-देना नहीं है ? यदि ‘नय’ भाव मात्र क्षणिक हो तो राम-रावण युद्ध को या कि राम के ‘भुज उठाइ पन कीन्ह’ को न्यायोचित कैसे ठहराया जा सकेगा ? तब तो स्थायी नयशील भाव के अभाव में सनातन काव्यबीज वाल्मीकि-रामायण, तुलसी का रामचरितमानस और हिन्दी-संस्कृत जगत् का बहुलांश साहित्य निष्प्राण सिद्ध हो जाएगा।
जहाँ तक ‘वीर’ रस का प्रश्न है, आचार्य भरत हों या आचार्य धनंजय आदि, किसी ने भी ‘वीर’ में ‘न्यायवीर’/‘नीतिवीर’ सम्मिलित नहीं किया। तो क्या ‘नय’ सदृश प्रबल ‘भाव’ इतना दुर्बल माना जा सकता है कि उससे कोई विशेष ‘व्यक्तित्व’, ‘विशेष भाव, ‘विशेष अर्थ’ या कि ‘विशेष रस’ उत्पन्न न हो सके। यदि वास्तव में ‘नय’ इतना निर्बल है तो उसे ‘विभाव’, ‘विशिष्ट भाव’ में रखने का क्या औचित्य है ? परन्तु नहीं, औचित्य है ‘नय’ का स्वत्व स्वीकारने का, इसलिए कि इन पंक्तियों के लेखक की दृष्टि से ‘नय’ इतना निर्बल नहीं होता कि उसमें ‘स्थायीभाव’ बनने की क्षमता न मानी जाए।
विदित हो कि ‘वीर’ रस में न्याय का अन्तर्भाव हो ही नहीं सकता। इसलिए ‘न्यायवीर’/‘नयवीर’ सदृश कोई कोटि अवधारित कर भी नहीं सकते थे आचार्यगण। अन्यथा की दशा में उन्हें शान्तवीर, वात्सल्यवीर, प्रेयस्वीर, भक्तिवीर, करुणवीर आदि-आदि भी प्रावधानित करने पड़ते जो न्यायोचित नहीं होता इसलिए कि इनकी उद्भावना करने पर शान्त, वात्सल्य, भक्ति आदि तिरोहित हो जाएंगे, तभी न्यायवीर की उद्भावना न्यायतः की जा सकेगी। इन पंक्तियों के लेखक की दृष्टि में यह कदापि उचित इस ब्याज से नहीं है कि स्वतंत्र संविद्गोचर अनन्यमुखापेक्षी स्थायीभाव वाले ‘करुण’ आदि को स्वतंत्र रूप से ‘रस’ न मानना अनुचित होता। आ0 भरत ने ‘शान्त’, ‘भक्ति’, ‘वात्सल्य’ को स्वतंत्र रूप से ‘रस’ की मान्यता नहीं दी तो बाद में भूल-सुधार करना ही पड़ा। यूँ भी ‘वीर’ का स्थायीभाव उत्साह है जबकि ‘नय’ भाव निस्पृह न्याय-भावना और लोकमंगल की भावना से कारित होता है। नय/न्याय-भावना स्वतः स्वतंत्र इयत्ता वाला स्वविश्रान्त, अनन्यमुखापेक्षी, संविद्गोचर भाव है।
औ..र, न्याय-भावना/‘नय’ भाव केवल बलवान् वीर में ही हो, यह सत्य नहीं है। न्याय-भाव/ नय-भाव जो वीर नहीं है या जो अक्षम-अशक्त है, उसमें भी हो सकता है। राम के वनवास के अवसर पर कैकेयी की निन्दा अयोध्या का निरीह जन (जो आलोच्य अन्याय का प्रतिकार करने में समर्थ नहीं था) भी करता है। सीता-हरण के समय वृद्ध गिद्ध जटायु ने रावण का प्रतिरोध किया था स्वयं के रावण के सापेक्ष अति निर्बल होने पर भी। वहाँ जटायु ‘वीर’ भाव से नहीं वरन् ‘नय’ भाव से युद्धरत हुआ था-- यही मानना तर्कसम्मत है।
तथ्यतः केवल मनुष्य ही नहीं वरन् प्राणी मात्र दूसरे प्राणियों से अपने प्रति न्यायोचित व्यवहार की वांछा (शब्दान्तर से कहें तो नय की वांछा, नयाकांक्षा) रखता है। तमस्शीलों को छोड़ कर समस्त सत्त्वशील एवं रजस्शील व्यक्ति दूसरों के प्रति भी न्याय भावना रखते हैं और यथावसर उन्हें अपनी सत्त्व/रजस् प्रवृत्ति के समानुपात में प्रदर्शित भी करते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि तमसशील व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों/प्राणियों के प्रति नय भाव स्वयं भले ही न रखें किन्तु वे भी अपने प्रति अन्य मानवों/प्राणियों से नय भाव की अपेक्षा अवश्य रखते हैं। नय’ की वांछा प्रमुख चित्तवृत्तियों में मानी जानी चाहिए इसलिए कि ‘नय’ भाव वस्तुतः मानव के अन्तःभूत स्वभाव का अंग है। मनोवैज्ञानिक जुंग को मानें तो कह सकते हैं कि यह मानव-साइकि के उच्च स्तर से संचालित होता है। यदि नय का मनोवैज्ञानिक अस्तित्व न होता तो आचार्य भरत ‘नय’ को विभाव एवं आचार्य धनंजय इसे संचारीभाव में परिगणित ही क्यों करते ? यही नहीं, मनोविज्ञानी मैक्डूगल ने जिन 14 मूल मानसिक प्रवृत्तियों का वर्णन किया है उनमें से एक मूल मानसिक प्रवृत्ति ‘सामाजिकता’ भी है। ‘सामाजिकता’ और ‘नय’ भाव वस्तुतः एक-दूसरे के प्रति समर्पित से होते हैं। ‘सामाजिकता’ के अन्यान्य कारकों में एक कारक ‘नय’ भाव/नयपरक भाव/नयात्मक भाव भी होता है। औ..र, मैक्डूगल द्वारा परिगणित मूल प्रवृत्तियों का परिगणन अन्तिम क्यों माना जाए विशेषकर तब जब आज ‘नय’ भाव आविश्व स्वतंत्र भाव-विभाव के रूप में दृष्टिगोचर है ? इन पंक्तियों के लेखक का दृढ़ मत है कि संवित् गोचर ‘नय’ भाव मात्र क्षणिक संचारीभाव नहीं, वरन् एक ‘स्थायीभाव’ है जिसकी मूल प्रवृत्ति सर्वत्र नयशील ऋतत्व को प्रस्थापित करने की आकांक्षी होती है। यह प्रवृत्ति भले ही मैक्डूगल द्वारा परिगणित मूल प्रवृत्तियों में ‘नय’ नाम से अधिनामित न हो परन्तु यह सभी सत्त्वशील-रजस्शील मानवों में होती है और यथावसर उन्मुक्त रूप से प्रकट भी होती है। हाँ, इतना अवश्य है कि सत्त्वोन्मुखी प्रबुद्ध में ‘नय’ भाव और नय प्रवृत्ति (नयशील ऋतत्व की प्रस्थापना) अपेक्षाकृत अधिक बलवती होती हैं। तभी हर प्रकार के अनय-अन्याय के विरुद्ध वे मनसा-वाचा-कर्मणा सक्रिय हो जाते हैं। कहना होगा कि भले ही संख्या में सत्त्वोन्मुखी प्रबुद्ध जन कम हों कि..न्तु उनकी संख्या इतनी प्रभावहीन भी नहीं है कि नय भाव/नय प्रवृत्ति को स्थायीभाव के रूप में परिगणित न किया जाए। अन्यथा की दशा में भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम, फ्रांस की राज्यक्रान्ति, सीरियाई जनता का विद्रोह या/और जटायु-रावण युद्ध, राक्षसत्व के विनाश का राम का संकल्प आदि-आदि परिघटनाएँ घटित ही न हो पातीं।
औ..र, कहा जाता हैं कि ‘ईश्वर-अंश जीव अविनाशी।’ जीव जब ईश्वर/विश्वात्मा/सर्वात्मा/ परमात्मा का अंश है और ईश्वर जब स्वयं अर्यमा (न्यायकारी) है; अवतारवाद के अभिमत से ईश्वर अन्याय-तिरोहण के लिए अवतार तक लेता है तो ‘प्रबुद्ध जीव’ बौद्धिक कवि में ‘नय’ भाव न हो-- यह असंभव है। इस तर्क से ‘कवनीय काव्यः’ के आधार पर कह सकते हैं कि ईश्वरांशी बौद्धिक कवि की रचना में नयभाव स्थायीभाव न बन सके या कि वह मात्र क्षणिक संचारीभाव बन कर रह जाए-- यह मानना तर्कसंगत नहीं है। जब ईश्वर अर्यमा (न्यायकारी) है, त..ब, ईश्वरांशी कवि तथा उसकी कविता नय-न्याय से विच्छिन्न कैसे रह सकती है ?
आचार्य अभिनव गुप्त मानते थे कि ‘काव्यार्थान् भावयन्ति इति रसः।’ तब क्या ईश्वरांशी जीव वाले नयशील कवि की कविता में किसी ‘अर्थ’ का न होना स्वीकार्य माना जा सकता है ? नहीं ना ! ‘शिवेतर की क्षति’ और ‘व्यवहारविदता’ को काव्य के प्रमुख प्रयोजन बताने वाले आचार्य मम्मट ‘ब्रह्मानन्द का भावयन’ ही ‘रस’ मानते थे - ”ब्रह्मास्वादभिवातु भावयन रसः।“ क्या ब्रह्मांशी जीव यदि प्रबुद्ध होकर कवि बन गया तो उसकी ‘नयशील ब्रह्मास्वाद वाली कविता’ को ‘कविता’ नहीं माना जाना चाहिए ? क्या मानना चाहिए कि उसका भावयन निरर्थक है ? प्रश्न है कि आचार्य मम्मट के शिवेतर क्षतए और व्यवहारविदे इन दोनों प्रयोजनों की आपूर्ति भी जब नयरसवादी कविताओं से भलीभाँति हो जाती है, तब ऐसी कविताओं को ‘भावयन’ से परे क्यों मान लिया गया?
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निर्विवादतः वर्तमान युग वैज्ञानिक युग है। वैज्ञानिक प्रगति ने हमारी सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, सांस्कारिक सभी प्रकार की सोच को बहुविध प्रभावित किया है। हमारी सोच का परास भी विस्तृत हुआ है। वैज्ञानिक संसाधनों की निरन्तर वृद्धि के फलस्वरूप ‘अर्थ’ पर बलाघात भी बढ़ गया है। अब मानव के पुरुषार्थ-चतुष्टय में ‘धर्म’ नहीं ‘अर्थ’ प्रथम वरीयता में आ चुका है। धर्म का स्थान यदि है भी तो वह परम्परागत अर्थ से परे व्यापक परिप्रेक्ष्य में और वह भी अर्थ की अभीप्सा के बाद के क्रम में। ‘अर्थ’ की अभीप्सा की अपनी वांछाएँ होती हैं। सम्प्रति, वैज्ञानिक, आर्थिक, भौतिक प्रगति का फलित है कि व्यक्ति वैयक्तिक स्तर पर भले ही एकाकी/एकांतिक हुआ है, सामाजिक स्तर पर व्यक्ति के लिए अधिकाधिक सामाजिक होना अपरिहार्य हो गया है। एकाकी बल पर आप कोई बड़ा कार्य-व्यापार स्थापित नहीं कर सकते। अन्य व्यक्तियों का सहयोग अपेक्षित होगा उतना ही उतना अधिक जितना ही जितना बड़ा कार्य-व्यापार स्थापित करना चाहेंगे आप। आए-दिन राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले सामूहिक संगठन हों अथवा विभिन्न व्यापारिक प्रतिष्ठानों के संगठन, टेªड यूनियन, राजनैतिक दल आदि-इत्यादि या नाटो, सीटो, सेंटो, ब्रिस्क, वारसा संधि के देश, जी-7, सार्क, नाम आदि जैसे अन्तरराष्ट्रीय संगठन; वर्तमान युग में हमारे नित-प्रति की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय आवश्यकता हैं वे। ‘सामाजिकता’ का अपरिहार्य प्रसार हो रहा है अधुना युग में। इसी सम्प्रसार के समानान्तर अपरिहार्य तथ्य यह भी उभरा है कि सूचना-क्रान्ति के अधुना दौर में विश्व के किसी भी कोने में अन्याय होने पर मात्र बौद्धिक ही नही,ं आज का सामान्यजन भी ‘चुप’ नहीं बैठ सकता। अन्याय के विरुद्ध उसे वाचाल होना ही है। इस तरह आज प्रत्येक व्यक्ति का नयशील होना एकमेव विकल्प है।
औ..र, सच है यह कि जैसे-जैसे वैज्ञानिक, आर्थिक प्रगति बढ़ेगी (जो सुनिश्चित है कि 21, 25, 35, 50 वीं सदी तक और आगे भी बढ़ती ही जाएगी) उसी अनुपात में व्यक्ति की चाहे-अनचाहे सामाजिकता और नयशीलता को भी बढ़ना ही होगा। नयशीलता के बिना वस्तुतः कोई सामाजिकता जीवित-जीवन्त नहीं रह सकती।
प्रकटतः आज अधिकाधिक सामाजिक होना और सामाजिक रूप से अधिकाधिक नयशील होना, नयशील दिखना युगीन आवश्यकता है। हीगल अपनी कृति ‘फिलासफी ऑफ फाइन आर्ट्स’ में जिस ‘युगीन प्रवृत्ति’/‘युगीन आवश्यकता’ की बात करते हैं, बहुत कुछ उसी प्रकृति की ‘युगीन आवश्यकता’ है ‘नयशीलता’ और ‘नयशील सामाजिकता’। थ्येन आनमन चौक पर लाखों चीनी युवाओं की भीड़ हो या दमिश्क की गलियों चौराहों पर और तहरीर चौक पर अन्यायी शासक का विरोध करने वालों का हुजूम या कि दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के आन्दोलन में जनसमूह का जुड़ाव-- ऐसे सभी दृष्टान्त हीगलीय युगीन आवश्यकता के समानुरूप आज व्यक्ति-दर-व्यक्ति के नयशील और सामाजिक होने की वांछा चरितार्थ करने में समर्थ हैं। इसी तरह महात्मा गाँधी का सत्याग्र्रह, भगत सिंह आदि की शहादत, जयप्रकाशनारायण का आन्दोलन, नेल्सन मण्डेला का आन्दोलन, सोवियत संघ का बिखराव, वियतनाम का गोरिल्ला-युद्ध, बंगला देश का उदय जैसी अनेक ऐतिहासिक, राजनैतिक परिघटनाएँ भी व्यक्ति और व्यक्ति समूह की नयाकांक्षा के परिपाक के रूप में उद्धरणीय हैं। ऐसे सभी उदाहरणों में व्यक्ति के वैयक्तिक और सामूहिक नयशीलत्व के भाव पूर्णतया वाचाल दिखते हैं।
औ..र सच है यह भी कि ‘नयाकांक्षा’ मात्र अधुना युग का अवदान नहीं है। पहले भी यह आकांक्षा (नयाकांक्षा) वैयक्तिक/सामूहिक स्तरों पर विद्यमान रही है मानव-मन में जिसकी गति इधर आर्थिक- वैज्ञानिक प्रगति के समानान्तर क्षिप्र हो गई है। राम-रावण युद्ध से लेकर भारतीय स्वाधीनता-संग्राम या कि फ्रांस की राज्य-क्रान्ति तक के उदाहरण व्यापक स्तर पर जन की नयाकांक्षा के ही फलित माने जा सकते हैं। इस प्रकार मानना ही होगा कि नयशील सामाजिकता और नयशीलता की विद्यमानता का इतिहास बहुत पुराना है। नित-नूतन वैज्ञानिक, आर्थिक प्रगति के फलित से नयशील सामाजिकता और नयशीलता का भविष्य भी हमारे वैज्ञानिक, आर्थिक प्रगति के हमकदम उज्ज्वल-तर है।
किन्तु यहीं प्रश्न उभरता है कि स्वतंत्रता-संघर्ष हो यथा जयप्रकाशनारायण/अन्ना हजारे आदि के आन्दोलन राष्ट्रीय और सामाजिक (सामूहिक) स्तर पर जब लोग लोक-स्वरूप में अपनी नयाकांक्षा खुल कर व्यक्त करते हैं तो क्या कारण है कि लोग वैयक्तिक स्तर पर स्वयं नयशील नहीं रह जाते। इस प्रश्न को देखते हुए तो काव्य के नयशाली होने की वांछा और बलवती हो जाती है इसलिए कि वैयक्तिक स्तर पर लोग/लोक की कथनी और करनी में अन्तर न रहे, यह संस्कार निर्मित एवं जागृत करने का दायित्व भी तो काव्य को ही निभाना है। इस तरह से तो काव्य में नयशीलत्व की गहरी पैठ अधिक और अधिक वांछनीय दिखती है।
ऐसी दशा में मानव की निरन्तर विस्तारशील ‘सामाजिकता’ और ‘नयशीलता’ से ‘साहित्य’/‘काव्य’ को अप्रभावित मानना युक्तिसंगत/बुद्धिसंगत नहीं होगा। त..ब, क्या नयशीलता वाले काव्य को ‘रस’ की किसी कोटि-विशेष में रखना आवश्यक नहीं है ? क्या किसी जोर-जबरदस्ती से ‘नयशील काव्य’ को वीर रस, भक्ति रस, शान्त रस आदि-आदि के क्षुद्र रसघट में परिभाषित/व्याख्यायित किया जाना या ऐसे काव्य को रस-दृष्टि से अव्याख्यायित रखा जाना उचित होगा ? नहीं न ! संपिंडिततः सर्वथा उपादेय है कि हम काव्य/साहित्य में भी ‘नयशीलता को सम्यक् मान अविलम्ब प्रदान करें, वह भी पश्यन्ती में नहीं वरन् वैखरी में।
दूसरी ओर, ‘इह शिष्टानुशिष्टानाम् शिष्टानामपि सर्वदा वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते’ का जो सूत्र आचार्य दण्डी ने ‘काव्य’ के लिए प्रस्तावित किया वह महत्त्वपूर्ण है। वैदिक युग में ‘कवि’ को ‘विश्पति’, ‘गणपति’, ‘नानृषिक (न $ अन् $ ऋषिक)’, ‘मंत्रद्रष्टारः’ बताते हुए ‘ऋतामतीनाम्’ की सराहना की गई; आचार्य हेमचन्द्र, आ0 भट्टतौत द्वारा ‘कवि’ को ‘नानृषिक’, ‘धर्मांशतत्त्व-प्रख्यानक’ भी कहा गया; आचार्य भामह ‘कविता’ को ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’ बताते हैं; आचार्य मम्मट काव्य में ‘शिवेतर क्षतए’ पर बल देते हैं-- यह सब निरर्थक नहीं है। औ..र, विस्मयपरक है कि ऋक् से लेकर आ0 मम्मट, आ0 हेमचन्द्र तक सभी के निसरण का अन्तिम अधिलक्ष्य ‘काव्य’ को नयशील बनाने के पक्ष में ही है !
अब यदि वैखरी में ‘नय’ सम्बन्धी अवधारणाओं की अनुपस्थिति का या कि ‘अब तक प्रस्तावित क्यों नहीं’ का कुतर्क प्रस्तुत हो तो कहना होगा कि प्राचीनकालीन देशकाल में ‘सत्य’ और ‘ऋत’ का क्षेत्र व्यापक था। ब्रह्म की स्तुति में सत्य और ऋत की प्रतिष्ठा उपनिषद् युग तक व्याप्त रही थी। ऋक् के पंचजन ही नहीं अपितु उपनिषद् युग के सभी ज्ञानी जन इतने विद्वान् और धर्मवान् हुआ करते थे कि वे अधर्म-अनय को कारित करने के लिए सोच भी नहीं सकते थे। प्रतीततः आदि-महाकवि वाल्मीकि से लेकर आचार्य भरत, भामह, दण्डी, हेमचन्द्र आदि के युग तक ‘धर्म’ से ‘नय’ की सत्ता-इयत्ता विलग न थी। तब ‘नय’ सत्य, धर्म और ऋत का अविच्छिन्न अंग हुआ करता था। दैनिक राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित अधुना वेदज्ञ पं0 श्रीराम शर्मा के अनुसार ‘ऋक्’ में ‘ऋत’ शब्द ‘नय’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। फलतः तत्कालीन देशकाल में ‘नय’ को ‘धर्म/ऋत’ से अलग स्वतंत्र रूप में प्रतिष्ठित किए जाने की आवश्यकता न थी। वैदिक ऋषि ‘छन्दांसि यज्ञाः’ कह कर या/और ‘काव्य’ के संघटक ‘शब्द’ के अक्षर-अक्षर के समवेत संस्कार को अक्षर-ब्रह्म से संयुत करके संतुष्ट हो गए थे। तब, ‘सत्य’ भी ‘एको सद् विप्रं बहुधा वदन्ति’ माना जाता था। आचार्य भरत से लेकर आचार्य भामह, आनन्दवर्द्धन, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, हेमचन्द्र, मम्मट तक काव्यार्थक रस को, तद्गत भाव को ब्रह्मास्वाद से ही संयुत् किया जाता था। इसलिए तत्कालीन देशकाल में ‘नय’/‘न्याय’ को स्वतंत्र रूप से वैखरी में प्रतिष्ठित करने की वांछा/अनिवार्यता न थी। प..र..न्तु कालान्तर में जब ‘सत्य’ भी ‘आभासी सत्य’, ‘सापेक्षिक सत्य’ आदि के स्वरूप में प्रकट किया जाने लगा और लोक में अधर्म, अनय, अनाचार का वर्चस्व बढ़ता गया; अनाचारी और अत्याचारी ही सत्तासीन होने लगे; तब से अभिनय, अभिनेय और नायक को स्पष्ट रूप में नय-विभूषित किया जाना आवश्यक हो गया जो सम्प्रति घोर अनाचार के युग में तो अति वांछनीय है, विशेषकर तब जब वर्तमान में नय-अनय की भेदक-रेखा बहुत धूमिल दिख रही है।
विदित हो कि मध्ययुग में अनयाचार, अत्याचार का बोलबाला हो जाने से जब तत्कालीन देश-काल में कमोबेश आज की तरह की ही परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थीं; तब तत्कालीन देशकाल की वांछा स्वीकार करते हुए कविवर तुलसी ने लिखा था -
“ बिमल बिबेक धरम नय साली।
भरत भारती मंजु मराली।। ”
- अयोध्याकाण्ड/269/8
“ जदपि कही कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी।। ”
- सुन्दरकाण्ड/23/1
स्पष्टतः कविवर तुलसी ‘धर्म’ और ‘नय’ की दो अलग-अलग सत्ताएँ स्वीकारते हैं और ‘विमल विवेक’ एवं ‘भगति विवेक’ को नयशील होना अभीप्सित करते हैं। इस प्रकार हिन्दी जगत् में कविवर तुलसी प्रथम मुखर प्रयोक्ता हैं ‘नयवाद’ के। हिन्दी-जगत् में सर्वप्रथम उन्होंने ही ‘नयशील भारती’, ‘नयशील विवेक’, यहाँ तक कि ‘नयशील भगति’ तक की वांछा वैखरी में वाचाल की।
उक्त नयवादी ‘नयसाली’, ‘नयसानी’ शब्द-बंधों के साथ-साथ संतकवि तुलसी ने ‘एतना कहत नीति रस भूला...’ में ‘नीति रस’ भी प्रस्तावित किया जिससे उनका तात्पर्य नीति सम्बन्धी काव्य के रस-मापन में रस का समुचित नामधेयन प्रतीत होता है। परन्तु ‘नीति’ को ‘नी + ईति’ से उद्भूत माने या मूलतः ‘नी’ धातु से,, इसके अधिलक्ष्य से विशालतर है ‘नय्’ धातु से निःसृत ‘नय’/न्याय का परास। जीवन के मूलभूत संसाधनों के सापेक्ष संधानित ‘नीति’ की अपेक्षा विशालतर होता है अधिक उदात्त, अधिक ऋतपरक, अधिक शिवशील, अधिक सत्त्वशील, अधिक लोकमांगलीय नय का अधिलक्ष्य। ‘नय’ में जीवन के मूलभूत संसाधनों की संरक्षा के साथ-साथ ऊर्ध्ववाहकता भी अधिक होती है। इस प्रकार नय रस की अपेक्षा तुलसी-प्रणीत ‘नीति रस’ का विन्यास संकुचित दिखता है, तो भी संतकवि तुलसी-प्रणीत ‘नीति रस’ के प्रणयन से इतना तो निर्विवादतः सिद्ध है कि प्रचलित एकादश रस का रस-पनघट संकुचित और अपर्याप्त है।
एक पक्ष औ..र। आ0 भरत के समय तक नय को धर्म में ही समाविष्ट मान कर या कि कवि देव और महाराजा जसवन्त सिंह आदि के सामन्तीय दृष्टिबोध को मात्र पुरुषोचित नायकीय निकष (महानायक या/और पुरुषोत्तम नायक के निकष नहीं) तक सीमित मान कर त..द्..ग..त ‘चूक’ को नजर-अंदाज कर दें या/और थोड़ी देर के लिए मान लें कि बहुत से मनुष्यों का मानस ‘परहित’ या ‘सर्वहित’ की चिन्ता से परे रहता है तो भी प्रश्न है कि हर जीव को सत् $ चित् $ आनन्द (परमात्मा) का अंशभूत मानने वाली मनीषा ने मानव-मन/अंतर्मन में विद्यमान ‘न्यायवादी ललक’ को सर्वथा उपेक्ष्य क्यों मान लिया ? परमात्मा तो न्यायकारी है। सामी जगत् में उसे ‘हक्’ का सर्वोच्च रूप माना जाता है। पाश्चात्य विद्वान् मिल्टन भी ‘पैराडाइज़ लास्ट’ में परमात्मा के न्यायकारी स्वरूप की प्रशंसा करते हैं। तब उसी परमात्मा के अंशभूत मानव को न्याय से विलग मानना उचित कहाँ है ? चलिए थोड़ी देर के लिए मात्र तर्क (कुतर्क) के लिए मान लें यह भी कि बहु-बहुलांश मानवों के मन का स्थायी-भाव ‘न्याय-व्याय’ से आसिक्त नहीं होता (यद्यपि यह विचार स्वतः असत्य है)। उस दशा में भी लोकहित और सार्वहित में हमारे काव्यनीति-नियंताओं को मानना ही होगा कि न्याय-शून्य जन को न्याय-पथ पर चलने को प्रेरित करने की आवश्यकता पहले भी थी और आज भी है। वैयक्तिक स्तर पर हो या सामूहिक/लोक स्तर पर प्रादुष्कृति, शिवेतरत्व और अद्यौरिनत्व को निरोधित-निषेधित करने का दायित्व ‘काव्य’ को ही निर्वहन करना होगा और तद्गत संस्कार कवि को ही सम्प्रस्तुत करना होगा अपने कवनीय कर्म से। इसी दायित्व-निर्वहन की पूर्ति के लिए वैखरी में नयवाद को काव्य-समालोचना की आधार-दृष्टि बनाया जाना औ..र तदनुक्रमीय ‘रसवाद का निरूपण’ करके किसी नयवादी नयत्वशील रस की प्रस्थापना अनिवार्यतः अपेक्षित है।
उपर्युक्त तर्कों के ब्याज से बलपूर्वक कहना होगा कि नय-न्याय को रसवाद में स्थान न दिया जाना और नय/न्याय के स्थायीभावाधारित किसी नयशील रस का समावेशन आर्ष रसवाद में न किया जाना सर्वथा अनुचित है। एतद्द्वारा उचित होगा कि हम सारतः जान लें, मान लें कि नय’ रस की संस्वीकृति से ‘कविता’ अधिक लोकोन्मुखी, अधिक जनवादी और तथैव अधिक लोकप्रिय होगी। ऐसी प्रत्याशा कोरी कल्पना नहीं है प्रत्युत आलोच्य प्रत्याशा का सुतार्किक आधार है कि जिस तरह न्यायशास्त्र, न्यायालय, न्यायाधीश को प्रतिष्ठा प्राप्त होना अकारण/निराधार नहीं वरन् इस आधार पर है कि उससे सर्वहित की निस्पृह सम्पूर्ति होती है। वैसे ही ‘काव्य’ के ‘नय’ रसवादी होने पर लोकापेक्षाओं की अधिक सम्पूर्ति होने से लोक में काव्य की संप्रतिष्ठा स्वयमेव प्रतिष्ठ हो जाएगी। तब कविवर ‘फिराक’ जिस ‘बड़े जतन’ से ‘रात का जूड़ा (तमस् का आगुम्फन)’ खोलने की बात करते हैं या कि ‘मुक्तिबोध कविता को लालटेन का रूपक देते हैं या कि कविवर ‘निराला’ ‘तिमिर पार’ करने की बात करते हैं, वे सारी कवि-अभीप्साएँ सहजता से आपूरित की जा सकेंगी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का उच्चतर भावदशा और लोकमंगल का निकष एवं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का बेहतर मनुष्य बनने का काव्य-निकष भी ‘नय’ रसवादी कविताओं से भलीभाँति संतुष्ट किया जा सकेगा। तथ्यतः नयवादी/नयरसीय कविताओं में ये सारे तत्त्व स्वतः सम्पूर्त्त हो जाएंगे इसलिए कि नि-ईति वाली नीति (जिसमें लोकजीवन के आधारभूत संघटक को क्षति न पहुँचाने का निर्देश हो) के साथ-साथ सत्त्वशील, शिवकारी, ऋतकारी न्याय से सुसम्मततः स्वतः विभूषित होंगी नयरसीय कविताएँ इसलिए कि ये तत्त्व वस्तुतः ‘नय’ के अंगीभूत तत्त्व होते हैं। ‘नय’ रस के आग्रहण से हमारे कविगण भी रतिज मांसलता वाली अनयी कविता के बजाय नयशील कविता विरचने को स्वतः उन्मुख होंगे जो अभी ऐसी कविताओं का कोई मानक/मान वैखरी में न होने से प्रायः दिग्भ्रमित हो जाते हैं।
कुतर्की तर्क (कुतर्क) कर सकते हैं कि नयवादी नयरसीय कविताओं में आनन्दानुभूति नहीं होती। यह प्रस्थापना मूलतः गलत है। भले ही रतिज आनन्द के तलाशकों को नयरसीय कविताओं में कोई विशिष्ट आनन्दानुभूति न मिले परन्तु ऐसे बुधिवन्तनि भी कम नहीं हैं जिन्हें नयरसीय कविताओं में अनिवर्चनीय नयवादी आनन्द की अनुभूति होती है। वाल्मीकीय रामायण की लोकप्रियता से लेकर जनवादी कविताओं का विगत 50 वर्षों से मुख्यधारा में बने रहना इसका प्रमाण है कि नयरसीय कविताओं में भी आनन्द लेने वाले लोग काव्यजगत् में विद्यमान हैं। ‘रामचरितमानस’ में तो तुलसीदास साधिकार घोषित ही कर देते हैं कि ” सम्बुक भेक सिवार समाना, इहाँ न विषय कथा रस नाना। “ तो क्या ‘विषय रस’ की अनुपस्थिति के ब्याज से ‘रामचरितमानस’ को काव्य न माना जाए ? हो सकता है कि ‘ रस्यते इति रसः ’ वाले कतिपय आनन्दवादी आनन्द में ‘बुद्धिवाद’ की उपयोगिता या कि लोकमंगल अथवा उचित-अनुचित के न्यायसंगत विवेक का दखल स्वीकार करने को तत्पर न हों इसलिए कि आनन्दवादी निरंकुश या/और उच्छ्रंखल आनन्दवाद के हामीकार हो बैठे। तब भी कथित आनन्दवाद के मूल्य पर भी ‘काव्य’ में नयवाद/नयरसीय काव्य को स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि आलोच्य विषय में दोष ‘नयवाद’ या कि ‘नयरसीय कविताओं का नहीं, ऐसे आनन्दवादियों के उच्छ्रंखल आनन्दवाद का ही होगा।
औ..र, जहाँ तक कविता के आनन्दवादी होने का प्रश्न है, इस परिधि में देखना होगा कि ‘आनन्दवाद’ से हमारा अभिप्रेत क्या है ? क्या व्याभिचारी/बलात्कारी की नन्दतिक वांछा को हम कविता के आनन्दवाद में समेकित कर सकते हैं ? नहीं ना ! आर्ष मनीषा से कविता का ऋतामतीनाम् होना, कविता का मधुमतिक होना, कविता का लोक-यात्रा एवं लोकाश्रय प्रवर्त्तक होना अनिवार्य है। अनुचित या/और समाजविरोधी आनन्द की या कि लोक को अधोगामी बनाने वाले आनन्द की अनुमति आर्ष मनीषा कदापि नहीं दे सकती है। आर्ष मनीषा से ब्रह्मानन्द, प्रज्ञानन्द के बजाय ऐन्द्रिक सुख या कि रतिज सुख प्रदायी आनन्द को काव्यानन्द का प्रसाद बनाया जाना अनुमन्य नहीं होगा। आज के वैज्ञानिक विकास के युग में निरन्तर निकट आते समाज और व्यक्ति की परस्पर घटती दूरी के युग में ऋतकारी बुद्धि, विवेक की उपेक्षा अनुमन्य नहीं है। ऐसे देश-काल में ‘काव्य’ को भी ऋतत्व से, नयत्व से शून्य मान लेने पर ‘काव्य’ से लोकयात्रा का सुष्ठु प्रवर्त्तन संभव नहीं होगा। अतएव, युगीन अनिवार्य विवशता भी है कि आज ‘काव्य’ को रीतियुगीन रतिज-मनोविनोद के बजाय ऋतकारी ऋतामतीनाम् का विवेक-प्रसाद बनाया जाए। इन सभी अपेक्षाओं की सम्यक् पूर्ति हो सकती है यदि हम परम्परीण आर्ष रसवाद के वर्तमान प्रचलित एकादश रसघटों में 12 वें रस ‘नय’ रस को वैखरी में मान्य कर लें। त..ब, ‘कविता’ की धारा निश्चितरूपेण लोकोन्मुखी, नयशील और ऊर्ध्ववाही अक्षराराधना की ओर मुड़ जाएगी और त..ब कविता निश्चित रूप से आनन्दवादी होने के बावजूद रतिज आनन्द के बजाय प्रज्ञानन्द की ओर बढ़ चलेगी।
तैत्तिरीयोपनिषद् की ब्रह्मानन्द वल्ली के सप्तम् अनुवाक् के अनुसार “ जो परमात्मा है वह सुकृत है, सत्कर्म है। वह रस ही है। इस रस को प्राप्त करके ही जीवात्मा आनन्दमय होता है (‘य द्वै तत्सुकृतं। रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति’)। ” आर्ष मनीषा की इस अवधारणा में ‘सः’ (वह) रतिज या ऐन्द्रिक सुख का अभीप्सु कदापि नहीं है। कविता के संघटक ‘शब्द’ की अक्षर-दर-अक्षर संस्कार प्रदान करने वाले अक्षर-ब्रह्म से सहयुजित होने की अपनी विशिष्ट परिधि होती है। अतएव, हमें अंततः काव्य को ‘रसो वै सः’ से या/और कमसकम ब्रह्म की रचनाधर्मी प्रज्ञा से, (सद्रचना की संरक्षणशील प्रज्ञा से भी) तथा तद्गत प्रज्ञानन्दतिक भाव-विभाव-अनुभाव से जोड़े रखने के लिए ‘नय’ रस या समकक्षीय सत्त्वशील ऋतशील शिवशील नयशील ‘रस’ की अवधारणा अनिवार्यतः प्रकल्पित करनी ही होगी। ऐसी दशा में देर करने की क्या आवश्यकता ? अच्छा हो कि हम अविलम्ब ‘नय’ रस अथवा समकक्षीय सत्त्वशील ऋतशील शिवशील न्यायशील रस की माँग को, काव्य में नयवाद की माँग को, वैखरी में स्वीकार कर लें।
पुनश्च देखें-
आचार्य भरत मुनि ने 8 स्थायीभावों के आधार पर मूलतः आठ रसों को व्याख्यायित किया परन्तु बाद में आचार्य अभिनवगुप्त-प्रणीत ‘शान्त’ रस, आचार्य रूपगोस्वामी-प्रणीत ‘भक्ति’ रस, आचार्य विश्वनाथ पल्लवित ‘वात्सल्य’ रस के बाद कहना होगा कि आज 11 स्थायीभावों के आधार पर 11 रसों की विद्यमानता स्वीकार की जा चुकी है।
समय-समय पर आर्ष काव्यज्ञों ने अन्यान्य रसों का प्रेयान् प्रेयस..... आदि-आदि का प्रस्थापन किया परन्तु वे अनन्यमुखापेक्षिन् संवित् गोचर स्वविश्रान्त स्थायी चित्तवृत्ति न होने के कारण या तो सर्वमान्य नहीं हुए या मात्र गौण रस माने गए। परन्तु ‘नय’ भाव तो स्थायी भी है और संविद्गोचर, स्वविश्रान्त, अनन्यमुखापेक्षिन् तथा स्थायी चित्तवृत्ति होने के सद्गुणों से सम्पृक्त भी। त..ब, ‘नय’ भाव को ‘स्थायीभाव’ मानने या/और ‘नय’ रस को 12वाँ रस मानने में आपत्ति क्या है ? कोई स्थायीभाव क्यों और कैसे ‘रस’ बनता है --- इस विषय में संक्षेप में मात्र यही कहा जा सकता है कि यदि स्थायीभाव ही ‘रस’ के कारकरूप में व्याख्यायित हों तो आज मनोविज्ञान में दिनानुदिन अनुसंधान के कारण अनुसंधानित प्रत्येक नूतन स्थायीभाव के आधार पर नवीन रस को मान्य करना होगा बशर्ते उसमें स्वतंत्र, स्वविश्रान्त अनन्यमुखापेक्षिन् संवित् शक्ति समाहित हो। औ..र, चूँकि ‘नय’ रस में तद्गत इंगित समस्त अभिवांछाएँ और तद्गत समस्त नयशील शक्तियाँ सुसमाहित हैं, अतएव, उसे स्वतंत्र, स्वविश्रान्त, संविद्गोचर स्थायीभाव होने के सम्बल से एक स्वतंत्र नयशील रस के रूप में अधिमान्य करना ही होगा। शुभस्य शीघ्रम् !
ध्यातव्य है कि आचार्य भरत ने ‘शम’ को स्थायीभाव तथा ‘निर्वेद’ को संचारीभाव मानते हुए भी ‘शान्त’ को प्रमुख रस नहीं माना था और ‘अष्टरसाः’ से ‘शान्त’ रस को बाहर कर दिया था। परन्तु बाद में ‘शान्त’ रस एक प्रमुख रस माना गया। ‘भक्ति’, ‘वात्सल्य’ भी तो ‘अष्टरसाः’ से बहिष्कृत हैं किन्तु बाद में उन्हें प्रमुख रस माना गया। इसी समरूपता में ‘नय’ रस को भी प्रमुख रस माना जाना चाहिए। आचार्य भरत, आचार्य धनिक-धनंजय प्रभृति विद्वत्गण ने जहाँ ‘नय’ को केवल विभाव/संचारीभाव मान कर छोड़ दिया, प्रतीततः आलोच्य संदर्भ में उनसे भूल वहीं हो गई। वास्तव में ‘नय’ एक ऐसा सार्वकालिक, सार्वजनीन सशक्त स्वविश्रान्त संविद्गोचर ‘भाव’ है कि हर युग में सत्त्वशील मनःस्थिति ‘नय’ से विमुख कभी नहीं रही। सत्त्वशील मनस्वी आज भी ‘नय’ विमुख नहीं हो सकते। अतएव, यदि नाट्य/काव्य का अधिलक्ष्य ‘धर्म्यं यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धिविवर्धनम्, लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति’ (नाट्यशास्त्र) लब्ध करना है, यदि नाट्य/काव्य को ‘लोकधर्मी भवेत् त्वन्या नाट्यधर्मी तथा परा, स्वाभावो लोकधर्मी तु विभावो नाट्यमेव हि’ (नाट्यशास्त्र) के अनुसार लोकधर्मी होना है, तो उसे वर्तमान युग में ‘नय’ रस को स्वीकारना ही होगा। भले ही ‘नय’ को धर्म में समेकित मानें या नहीं।
निर्विवाद है कि हर युग में ‘नय’ का स्वत्व सर्वदा, सार्थक रहा है। हाँ, इतना अवश्य माना जा सकता है कि धर्मवान् युग में जब सभी लोग नयशील थे, जब धर्म में ‘नय’ मनसा, कर्मणा समेकित था तब उसे अलग से अभिवचनीत करने की आवश्यकता अनुभूत न हुई होगी। प..र..न्तु, आज जब अनय, अऩृत, अनाचार बढ़ता जा रहा है, तब नय की लोकांक्षा, लोक की नयाकांक्षा को गौण नहीं वरन् प्रमुख भाव में पश्यन्ती ही नहीं, वैखरी में भी वाचाल करना और काव्य/साहित्य में भी ‘नय’ की वांछा के समानुपात में ‘नय’ की आवश्यकता को वाचाल करना अपरिहार्य हो गया है। अन्यथा साहित्य ‘सहित-भाव’ से विच्युत हो जाएगा। यतः, उपरिअंकित तर्कों के ब्याज से ‘कविता’ में ‘नय’ रस का पुरश्चरण वांछनीय है।
और जहाँ तक लोकमंगल का प्रश्न है, आ0 रामचन्द्र शुक्ल लोकमंगल की साधनावस्था को लेकर चलने वाले काव्यों का बीज भाव ‘करुण’ को और लोकमंगल की सिद्धावस्था को लेकर चलने वाले काव्यों का बीजभाव प्रेय को बताते हैं किन्तु इन पंक्तियों के लेखक की दृष्टि में लोकमंगल की साधनावस्था प्रणीत करने वाले काव्यों का बीजभाव ‘उचित-अनुचित का विवेक’ है और लोकमंगल की सिद्धावस्था का बीजभाव ‘न्याय-भावना’ है। न्याय-भावना से विरहित प्रेय लोकमंगल से असम्बद्ध रहने वाले शृंगार आदि का कारक हो सकता है। इसी तरह करुणा यदि उचित-अनुचित के विवेक से निरपेक्ष है तो वह मोहजनित विकार ही उत्पन्न करेगी, लोकमंगल नहीं। लोकमंगल की विभिन्न अवस्थाओं के अधिलक्ष्य की प्राप्ति हेतु आचार्य शुक्ल ने प्रेम, करुणा आदि को जो आधार बनाया, वहाँ इन शब्दों के स्थान पर क्रमशः प्रबुद्ध मानव की न्यायभावना और उचित-अनुचित के विवेक को प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए; तभी वास्तविक लोकमंगल कारित हो सकेगा।
बतातें चलें कि सतही तौर पर नयरसीय अधिक्षेत्र समरूपी दिखने के बावजूद सत्य यह है कि निवृत्तमार्गी मोक्षकामी लक्ष्य से समन्वित होने से शान्त रस का अधिक्षेेत्र लोक-ऋत, लोक-सत्त्व और प्रवृत्तिमार्गी ‘नय’ रस से सर्वथा विलग है। प्रायः किसी विभ्रम में ‘शान्त’ रस का क्षेत्र अति विस्तृत मान लिया जाता है। इसी विभ्रम से लोक-कल्याण जैसे तत्त्व जो न्याय-क्षेत्रीय हैं, उन्हें भी घेरघार कर शान्त’ में समाविष्ट करने का प्रयास यदा-कदा दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः दोनों का परास अलग-अलग है। न्याय का अधिलक्ष्य ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ बता कर यदि दैहिक दैविक भौतिक ताप से रहितता को शान्तभावी माना जाए तो यह उचित नहीं होगा इसलिए कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की इच्छा न निर्वेद है और न ही शम की अवस्था। शम में मोक्षकाम के अतिरिक्त जब सभी इच्छाएँ शून्य हो जाती हैं, तभी मोक्षकामी होता है साधक, परन्तु सर्वे भवन्तु सुखिनः में इच्छाएँ निष्काम नहीं होतीं। नय-न्याय में अन्याय का विरोध मुख्य भाव/इच्छा होती है। तद्गत सक्रियता वांछनीय है नय-न्याय के लिए। ‘अभिनव भारती’ में आचार्य अभिनव गुप्त स्वयं लिखते हैं- “ धृतिप्रभृतिरपि प्राप्तविषयोपरागः कथ शान्ते स्यात ? ” डॉ0 वी0 राघवन तो ‘नागानन्द’ सदृश निर्वेदकामी बौद्ध नाटक को भी शान्त रसीय मानने को तत्पर नहीं, क्योंकि ‘नागानन्द’ का प्रधान बलाघात मोक्षकामी नहीं। उसमें विद्याधरों के ऊपर सम्प्रभुता अभीष्ट है। इस तरह मोक्षकाम ही अभीष्ट है ‘शान्त’ रस का।
डॉ0 भगीरथ मिश्र अपनी कृति ‘काव्य रस.......’ में ‘शान्त’ को निर्विकृति और आत्मरति का भाव बताते हुए शान्त रस की पैरवी करते दिखते हैं। इस तर्क से भी ‘नय’ रस को ‘शान्त’ में अंतर्भावित नहीं किया जा सकता। निर्विकृति के साम्य के बावजूद नय में आत्मरति के बजाय लोक-रति की प्रधानता होने से नय रस को स्वतंत्र इयत्ता वाला स्वविश्रान्त, संवित् गोचर स्थायी चित्तवृत्ति मानना ही न्यायोचित है।
‘काव्यालंकार सार-संग्रह’ के प्रणेता आचार्य उद्भट ‘शान्त’ को अधिमान्य करते थे। प्रकटतः आचार्य भरत शान्त रस को स्वतंत्र रूप में गणनीय नहीं मानते। उनके अनुसार सभी रस विश्रान्तिजनक होते हैं। वे लिखते हैं- “ दुःखार्त्तानां श्रमार्त्तानां शोकार्त्तानां तपस्विनाम्, विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद्भविष्यति। ” आचार्य अभिनव गुप्त भी अंततः ‘शान्त’ पर आग्रह छोड़ देते हैं और अंततः स्वीकार करते हैं कि शान्त अप्रधान होता है, वह कोई प्रमुख उद्देश्य नहीं है- “ शान्तस्य स्थायित्ववे अप्यप्राधान्यम्। ” नय-न्याय को अप्रधान मानने पर लोक की संरक्षा आक्षेपित हो जाएगी।
न्याय-सूत्र १..१.२ में आ0 गौतम तत्त्वज्ञान के उदय को दोष के अपक्षय से, वैराग्य के जन्म से जोड़ते हैं किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर भले जीव के दोष-अपक्षय से वैराग्य का जन्म होता हो किन्तु सांसारिक राग के स्तर पर दोष का अपक्षय विराग नहीं वरन् नयशील राग-उत्पन्न करेगा। सृष्टि इसी सत्त्वशील नयशील ऋतशील राग से संचालित होती है, विराग से नहीं।
‘भगवद्गीता’ (3/22) में कहा गया-” न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिशु लोकेषु किंचन, नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।। “ (जो जीव मुक्त है, कृतकृत्य है, वह भी सृष्टि की कल्पावधि तक कर्मों की पूर्ति से स्वयं को व्यवच्छिन्न नहीं करता )। तब निवृत्तिमार्ग या कि निर्वेद मात्र से लोक का काम कैसे चलेगा ? ‘काव्य’ तो लोकयात्रा-प्रवर्तन हेतु सार्थक उपादान है। ऐसी दशा में निर्वेद, शम के बजाय सात्विक रागात्मकता उपादेय है लोकयात्रा के लिए। ‘काव्य’ के लिए भी यह ऋतम्भरिक रागात्मकता ‘नय’ से ही लभ्य है ‘शान्ति’ के विराग से नहीं।
जहाँ तक अधुना मनीषी डॉ0 गणपतिचन्द्र गुप्त प्रणीत कथित ‘बौद्धिक’ रस का प्रश्न है वह भी तथ्यतया अधुना काव्यापेक्षाओं को सम्पूर्त्त करने में अपने लघुकायत्व के कारण वस्तुतः अक्षम ही सिद्ध होगा इसलिए भी कि ‘बुद्धिवाद’ व्यवहार्यतः अंततः स्वार्थसिक्तता और निकृष्ट शिश्नोदरी संस्कृति से ही जुड़ कर रह जाता है बस ! उसमें परार्थवादिता या कि लोकमंगल, लोकसंग्रह, शिवेतर क्षतए, नीति-न्याय, व्यवहारविद्ता सदृश भाव-विभाव अंततः कहीं न कहीं कभी न कभी विलुप्त हो जाते हैं और सब कुछ ‘स्व’ पर संकेन्द्रित हो जाता है।
बताते चलें कि प्रथम आधुनिक बुद्धिवादी देकार्त ने ‘प्रकृति पर स्वामित्व’ का जो नारा बुलन्द किया उससे बुद्धिवाद का पर्यवसान ‘प्रकृति बनाम मानव’ के अंतःसम्बन्धों में 36 के स्वरूप में हो गया। व्यक्ति बनाम शेष समष्टि’ के मध्य सम्बन्धों के फलक पर न्यायशील रागात्मक सम्बन्ध 63 के बजाय 36 के स्वरूप में पर्यवसित होने से प्रकृति के शोषण-दोहन से लेकर भोगवाद, सम्पत्तिवाद से बढ़ते-बढ़ते साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, अधुना भौतिकतावाद, उपभोक्तावाद तक, अपितु थोड़ा और आगे बढ़ कर शिश्नोदरी निजी सुख-लाभ तक सीमित कर गया ‘बुद्धिवाद’ व्यक्ति की बुद्धि को। रही-सही कसर पूरी कर दी फायरबाख ने। इस तरह बुद्धिवाद अंततः भोगवाद, स्वार्थवाद, छल-प्रपंच, राग-द्वेष, कुण्ठा-कुत्सा, ईर्ष्या, संघर्ष, प्रकृति-द्रोह और युद्ध सदृश अपसंस्कारों के रूप-स्वरूप में ही पर्यवसित हुआ जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में तमस्-वृत्ति का फलित मान सकते हैं। यह ‘फलित’ फलित हुआ इसलिए भी कि देकार्त ने ‘बुद्धिवाद’ की सर्वोपरिता के नाम पर ‘प्रकृति पर स्वामित्व’ का जो नारा उछाला था उसमें व्यक्ति की तमस् प्रकृति पर नियंत्रण एवं आत्मसंयम जैसे नियमन का सर्वथा अभाव था।
संभव है देकार्त ने ‘श्रीमद्भगवत्गीता’ और नयशीलत्व के प्रथम महाकाव्य ‘वाल्मीकीय रामायण’ सदृश आर्ष ग्रंथों का अध्ययन-अनुशीलन न किया हो परन्तु आर्ष मनीषा का वर्ग-चरित्र (जो जन्मजात परिवेशगत सम्प्रभाव से उक्त आर्ष ग्रंथों के प्रति श्रद्धावनत् रहता है वह वर्ग-चरित्र) ‘तमस् बनाम सत्त्व’ के संचयन के अवसर पर तमस्-आरोहण को स्वीकार करने को कदापि तत्पर नहीं होता। ऐसी मनीषा के लिए एकमेव ‘बुद्धिवाद’ स्वीकार्य नहीं हो सकता है। दूसरी ओर, बुद्धिवाद को न्याय-नियमन से समेकित कर देने पर बुद्धि धीरे-धीरे प्रज्ञा-प्रमा-ऋतम्भरा प्रज्ञा से समन्वित होती जाती है। यह प्रज्ञासमन्विता स्वतः तमस् के बजाय सत्त्व और ऋत जैसे तत्त्वों से बलशील होने से आर्ष मनीषा को स्वभावतः ‘स्वीकार्य’ होगी।
औ..र, बुद्धि को ऋतम्भरा प्रज्ञा से एकबारगी ही समन्वित नहीं किया जा सकता है; उसके लिए गम्भीर ‘साधना’ अपेक्षित होती हैं और वह ‘साधना’ सर्वसाधारण के लिए सहज नहीं होती। वहीं, गम्भीर प्रज्ञा साधना करने वाले की दिशा, उसकी मनोदशा उच्चतर स्तर पर पहुँचते ही प्रायः निवृत्तिमार्गी हो जाती है। तब साधना-पथ चाहे कंटकाकीर्ण हो या नयनाभिराम, उससे प्रायः अधबीच में ही भटक जाते हैं प्रवृत्तिमार्ग के आरोही। अतएव, गम्भीर साधना के भटकाव भरे अधिलक्ष्यों के बजाय न्याय के पाथेय के सहारे प्रवृत्ति-मार्ग पर पथ-संचरण सहज होगा और सहज लभ्य भी।
उपर्युक्तानुसार आलोच्य परिप्रेक्ष्य में बुद्धिवाद को न्याय तत्त्व से सम्मिश्र कर दिया जाना अपरिहार्य है। सृष्टि के सम्यक् संचरण के लिए लोकयात्रा का सम्यक् निर्वहन आवश्यक है। नय-न्याय सर्वजन के लिए ग्राह्य भी है और उपादेय भी। फलतः आलोच्य परिप्रेक्ष्य में डॉ0 गणपतिचन्द्र-प्रणीत ‘बौद्धिक रस’ को अग्राह्य मानते हुए ‘नय रस’ को सर्वथा संग्राह्य माना जाना चाहिए इसलिए कि डॉ0 गणपतिचन्द्र गुप्त-प्रणीत ‘बौद्धिक रस’ की अपेक्षा ‘नय रस’ का प्रक्षेत्र बहुविध कहीं अधिक व्यापक, कहीं अधिक विस्तृत है। संदर्भगत रस-विस्तार में 12वें रस के रूप में डॉ0 गणपतिचन्द्र-प्रणीत ‘बौद्धिक रस’ के नामधेय से कथित रस-विस्तार स्वीकारने से मात्र बौद्धिकता, वैचारिकता जैसे सीमित विन्यास कथित विस्तारित रस-विन्यास में सुलभ हो सकेंगे, उपर्युक्तानुसार जिनके व्यवहार्यतः अंततः क्षुद्र मनोवृत्ति में परिणत होने की संभावना बलशील है। कथित ‘बौद्धिक रस’ व्यापकता के फलक पर अक्षम सिद्ध होगा इसलिए भी कि प्रायः सामान्य लोक/जन कथित बौद्धिकता से असम्पृक्त (एक सीमा तक अननुबद्ध) रहना चाहता है जबकि न्याय लोक/जन को सर्वदा प्रिय होता है। आज काव्य (कविता-साहित्य) से जन/लोक को असम्पृक्त रखा जाना वस्तुतः न्यायोचित एवं उपादेय भी नहीं है।
इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि आधुनिक समाज में नयसंगतता एक अपरिहार्य सामाजिक मनोवैज्ञानिक अवस्थिति है। अतएव, नयसंगतता या कि तद्गत संचारी न्याय-भावना या कि तद्गत न्यायसंगत उचित-अनुचित विवेक को ‘नय’ रस का संचारीभाव माना जाना चाहिए। तदनुसार, 33 या 34 ‘संचारीभाव’ वाली सूची को संशोधित करके ‘नय भावना’ को 35वें क्रम पर रखना अनिवार्यतः वांछनीय होगा।
जहाँ तक ‘नय’ रस या अन्य किसी भी ‘रस’ की अधिमान्यता का प्रश्न है, निर्विवादतः किसी भी स्थायीभाव के ‘रस’ बनने के लिए आर्ष काव्यज्ञों ने जो वांछाएँ --स्वविश्रान्त, संवित् गोचर, अनन्यमुखापेक्षिन् स्थायी चित्तवृत्ति वाले भाव (स्थायीभाव) आदि वांछनीय बताई, जिनके आधार पर अन्यान्य अमान्य रसों की अधिमान्यता को नकारा गया-- उन वांछाओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है तदपि डॉ0 अभयकुमार गुहा की एक व्याख्या के आधार पर कह सकते हैं कि प्रख्यात आलंकारिक और रस-सिद्ध आचार्य भोज के अनुसार समस्त 49 भावों में मूलभूत रस अहंकार का विश्वव्यापी गुण विद्यमान होता है। इस तरह नय-सुस्थापना सह अन्याय-निषेध की न्याय-भावना से आसिक्त नयरस को उसके स्वविश्रान्ति, संवित् गोचरत्व, अनन्यमुखापेक्षिता स्थायी चित्तवृत्ति वाला स्थायीभाव बनने की बलशीलता के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
वस्तुतः रसाचार्य राजा भोज की उपर्युक्त मान्यता को महीन कतरने वाले भी निरस्त नहीं कर सकेंगे कि 49 प्रकार के मनोभावों के आधार पर 49 रस निरूपित किए जा सकते हैं। मनोशास्त्र में दिनानुदिन बढ़ते अनुसंधान के फलस्वरूप् 49 मनोभावों की संख्या बढ़ भी सकती है। यदि स्थायीभाव ‘रस’ रूप में व्याख्यायित हों तो ऐसी दशा में 49 तो क्या 490 स्थायी मनोभावों के आधार पर (यदि हों तो) 490 रसों को मान्यता देनी होगी; शर्त बस यही होगी कि उनमें स्वतंत्र एवं स्थायी चित्तवृत्ति स्थायीभाव वाली स्वविश्रान्त अनन्यमुखापेक्षिन् संवित् शक्ति समाहित हो।
ध्यातव्य है कि हर अन्यायपरक अभिक्रिया का विरोध/निरोध (शिवेतर-क्षतए का काव्यगत अधिलक्ष्य), ‘अन्याय-तिरोहण के प्रति संकल्प/संघर्ष’, ‘अन्यायी को दण्ड देने का संकल्प’ और तद्गत ‘अभिकर्म/सक्रियता’ नय-रस का संचारीभाव है और ‘नयशीलत्व’ की सदिच्छा (नयाकांक्षा) इसका स्थायीभाव है। नय’ रस के संदर्भ में आश्रयगत आलम्बन तो ‘न्यायकर्त्ता’ होगा परन्तु उद्दीपन ‘अनय-अनृत के शिकार निरीहजन, तद्गत परिवेश’ एवं ‘अन्यायशील स्थिति’ होगी। नयरसीय अनुभाव को ‘सात्विक’ माना जाना चाहिए जिसके अंतर्गत रोमांच अनुभाव नयरसीय भावों का अनुवर्ती हो सकता है। इसके अतिरिक्त अन्याय/अनृत की अवस्थिति देख कर प्रतिक्रियास्वरूप ‘मानसिक उद्वेग’ भी नयरसीय नायक का अनुभाव हो सकता है; जैसा कि वाल्मीकि-रामायण में हड्डियों के ढेर (उद्दीपन) को देखने पर उद्वेलित होकर रामायण-नायक राम कृत अन्याय-तिरोहण के संकल्प से उदाहृत है।
संपिंडिततः संदर्भगत 12वाँ रस ‘नय रस’ के नामधेय से ही स्वीकार किया जाना चाहिए इसलिए कि बुद्धि से उच्चतर स्थान होता है विवेक का, विवेक से बड़ी होती है प्रमा, प्रमा से बड़ी होती है प्रज्ञा और प्रज्ञा से उच्च स्थान होता है ऋतम्भरा प्रज्ञा का। प्रकटतः विवेकशील ऋत के सापेक्ष बुद्धि का प्रभाव-क्षेत्र संकुचित है। ‘नय’ रस ऋतम्भरिक होने से अंततः ऋतम्भरा प्रज्ञा जाग्रत करने में भी समर्थ होगा। न्याय, वैशेषिक और योग-दर्शन में यही ऋतम्भरा प्रज्ञा उपास्य है। वैदिक दर्शन में भी ऋतम्भरा प्रज्ञा की ही भरपूर आशंसा निगमित है। ऋतम्भरा प्रज्ञा वस्तुतः प्रज्ञा एवं नय का (नय की भाववाचक संज्ञा न्याय का भी) अन्योन्याश्रित फलित ही है। आचार्य गणपतिचन्द्र गुप्त-प्रणीत बौद्धिक रस के सापेक्ष ऋत-भावित नय रस का विन्यास कहीं अधिक विस्तीर्ण है तथैव बौद्धिक रस की अपेक्षा न्यायशील नय रस को ही स्वीकार्य मानना होगा।
संक्षेपतःः यदि वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक विकास के सापेक्ष आर्ष रसवाद को जीवंत बनाए रखना है तो ‘शान्त’, ‘वात्सल्य’ और ‘भक्ति’ रस-वृद्धि की परम्परा में ‘नय’ रस को भी स्वीकारना होगा जिसका स्थायीभाव ‘नय भाव‘/न्याय-भाव’/‘न्यायसंगत उचित-अनुचित के लोकमंगलीय भाव (नयाकांक्षा)’ को मानना हा़ेगा।
औ..र वस्तुतः यदि ‘काव्य’ को ‘सत्, शिव, सुन्दर की ऋतशील, नयशील, शिवशील, सत्त्वशील ऊर्ध्ववाही लोकसंग्रही अक्षराराधना’ मानना स्वीकार्य हो तो तद्गत ‘काव्य’ के निमित्त वर्तमान युग में नय की भरपूर संप्रतिष्ठा अति वांछनीय इसलिए भी होगी कि वर्तमान दौर में भौतिकतावाद की ललक से केवल मानव ही नहीं, वरन् मानव-रचित काव्य/साहित्य/गद्य/पद्य सब आग्रस्त हो चुके हैं; अब वर्तमान में सत्य, ऋत में ‘नय’ अंशभूत नहीं वरन् नय-न्याय में सत्य, ऋत, शिव, सत्त्व वर्तमानतः अंशभूत हैं; इसी आधार पर अधुना न्यायशास्त्र प्रकल्पित है। तथैव, जिस तरह समाज और राष्ट्र को समुचित दिशा प्रदान करने हेतु ‘न्याय-विधान’, ‘न्यायशास्त्र/नयशास्त्र’ की प्रथम आवश्यकता है; उसी परिपाटी में ‘काव्य’ को भी सद्-दिशा प्रदान करने हेतु ‘सहितस्य भाव’ की प्रथम वांछा ‘साहित्यिक नयवाद’ है और उसी परिमाण में काव्य-परिमापन के लिए आवश्यकता है ‘नय’ रस की।
विदित हो कि आचार्य भरत-प्रणीत आर्ष रसवाद को पहले भी अनेक बार सर्वमान्य रूप में परिमार्जित किया जा चुका है और उसमें अनेकानेक रसों यथा ‘भक्ति, ‘शान्त’, ‘वात्सल्य’ का परिवर्धन पहले भी किया जा चुका है; परन्तु अज्ञात कारणों से नय-न्याय से सम्बन्धित किसी रस की प्रतिष्ठापना अब तक किसी विचारक ने प्रस्तुत नहीं की। संतकवि तुलसी ने ‘नीति रस’ और अधुना विद्वान् डॉ0 गणपतिचन्द्र गुप्त ने ‘बौद्धिक रस’ प्रस्तावित किया अवश्य परन्तु मिलते-जुलते गुण-धर्म होने के बावजूद नीति रस या कि बौद्धिक रस न्याय-क्षेत्रीय काव्य-पंक्तियोें को सटीक स्वरूप में रस-दृष्टि से व्याख्यायित नहीं कर सकते। संभवतः वे भी प्राचीन रसवादियों की तरह ही नय-न्याय की उद्भावना को स्वविश्रान्त संवित् स्वरूप में स्थान प्रदान करने में असमर्थ हैं; जबकि पुनुरुक्ति होने के बावजूद पुनः-पुनः कहना होगा कि नय-न्याय भाव सर्व विद्यमान, स्वविश्रान्त, संवित् गोचर एक स्थायी भाव है जो एक स्वविश्रान्त संवित् गोचर न्यायशील काव्य रस : न्याय रस उत्पन्न करने में सर्वथा समर्थ है। न्याय भाव चूँकि मूलतया नय भाव पर आधृत है, अतएव ऐसे रस को ‘नय’ रस की संज्ञा दिया जाना उचित है। नय रस के नए रस-घट से न्यायभावी समस्त काव्य-पंक्तियाँ, चाहे वे उपरि-अंकित दोहे हों अथवा समकालीन, जनवादी, प्रगतिवादी, नयी कविता आदि की बहुबहुलांश न्यायवादी कविताएँ (जिनमें अपराध की विवेचना और दण्ड का विधान हैं) भी रस-दृष्टि से व्याख्यायित की जा सकेंगी।
ज्ञात हो कि ‘नीति रस’ जहाँ नीतिगत जीवन-यात्रा वाली काव्यपंक्तियों से समेकित है, वहीं, बौद्धिक रस देकार्त्तवादी बौद्धिकता या कि बेन्थमवादी उपयोगितावादी बुद्धिवाद तक सीमित रहेगा। जबकि न्याय रस/नय रस प्रादुष्कृतमन्यथा वाले न्यायशील जीवन-व्यवस्था को रूपायित करने वाली काव्यपंक्तियों के काव्यरस को व्याख्यायित कर सकेगा। सारतः न्याय रस/नय रस में नीति और बौद्धिकता दोनों का औचित्य समेकित है और नीति एवं बौद्धिकता दोनों का सार्वहिती अन्तर्भाव नय रस में परिष्कृत न्यायशील रूप में समाहित है। तथैव पुनः-पुनः कहना होगा कि कविता (काव्य) के मौलिक लक्ष्य ‘स कविः काव्या पुरु रूपम् द्यौरिव पुष्यति..’ या कि ‘छन्दांसि यज्ञाः...भूतम् भव्यम्...सृजते’ या किे ‘इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सर्वदा वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते’ या कि ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’, ‘शिवेतर क्षतए’ आदि ही माने जाते हैं, माने जाने चाहिए भी; अतएव ‘लोकयात्रा के सुप्रवर्तन’, ‘पुरु रूपम् द्यौः इव पोषण’ एवं ‘हर जीव का भव्य सृजन’ तथा ‘ऊर्ध्ववाही उच्चतर भावदशा प्रदान कर आदमी को बेहतर आदमी बनाने’ के लिए हमें काव्य से न्याय (नय) की उद्भावना को बढ़ावा देना ही होगा। इसके लिए काव्य/कविता को नय-न्याय से विलग किया जाना कदापि न्यायोचित नहीं है। तेनेव, काव्य (कविता) में नय-न्याय से सम्बन्धित रस को वैखरी में अधिनामित और स्वीकार किया जाना अपरिहार्य है।
सारतः ‘नय रस’ से समेेकित 12 रस वाले रस-विन्यास से अधुना मानव व मानव-समाज के वैयक्तिक एवं समूहगत मनोविज्ञान को अधिक सुसंगत, अधिक सक्षम ढंग से काव्य में रूपायित किया जा सकेगा। ‘नय रस’ समेकित द्वादशीय रस-घट मानव व मानव-समुदाय को व्यक्तिगततः व समष्टिगततः उच्चतर भावदशा की ओर वस्तुनिष्ठतः अग्रसारित करने में भी समर्थ सिद्ध हो सकेगा यदि नय रस का रूपायन महाकाव्य वाल्मीकि-रामायण में प्रणीत दृष्टान्त-सिद्धान्त के समानुरूप किया जाए। ‘नय’ रस के काव्य-रसवाद में समावेशन से काव्य मधुमतीय नहीं मधुमतिक हो जाएगा। तब काव्य के ऋतुमती होने के बजाय ऋतकारी होने की संभावना भी बलवती हो जाएगी। चूँकि काव्य को भी ऋतामतीनाम् होना ही चाहिए और ऋत-नय के अंतःसम्बन्ध के ब्याज से नयरसीयता चूँकि ऋतामतीनाम् के अधिक निकट होती है इसलिए प्रभावतः नयरसीय कविता आर्ष काव्याभीप्सा को अधिक परिमाण में संतुष्ट कर सकेगी। तब प्राचीन काव्यशास्त्रियों का मत ही नहीं, वरन् अधुना आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आ0 रामचन्द्र शुक्ल, आ0 हजारीप्रसाद द्विवेदी, गुलाबराय, डॉ0 नगेन्द्र, फिराक, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ आदि-आदि सभी सत्त्वशील, ऋतशील कविगण की काव्यगत अभीप्साएँ भी वस्तुनिष्ठतः संतुष्ट की जा सकेंगी।
उपर्युक्तानुसार आलोच्य रसानुसंधान को न केवल वस्तुनिष्ठ बनाने के निमित्त प्रत्युत आर्ष-रसवाद को अधुनातन काव्य-अपेक्षाओं से सुसंगत बनाने के सदाशय से, तत्त्वतः हिन्दी कविता-जगत् को सत्-शिव-सुन्दर की ऋत रागोन्मुखी सर्वहितकारी सतत ऊर्ध्वोन्मुखी, नयशील, ज्ञानशील, लोकमांगलीय आक्षरिक आराधना से सुसम्पृक्त करने और इन जैसे अन्यान्य करणीयों को वैखरी में मुखर करने के लिए ‘नय’ रस नाम्नी नए रस का प्रकल्पन अपरिहार्य है।
(ब्लाग में किंचित् परिवर्धन के साथ प्रस्तुत यह आलेख कृति ‘रसवाद औ...र नय रस’ में मूल रूप में इसी शीर्षक से प्रकाशित ।)
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