वर्णाश्रम-व्यवस्था
पुरुषार्थ चतुष्टय को राष्ट्र का प्रत्येक राष्ट्रिक समुचित रूप में प्राप्त करते हुए सर्वविध उन्नति और मानव-जीवन के प्रमुख लक्ष्य ‘मोक्ष’ को प्राप्त करने की ओर सहज अग्रसर हो सके-- इसके लिए प्राचीन भारतीय मनीषियों ने भारतीय समाज को ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ के अन्तर्गत सुव्यवस्थित किया था औ...र इस प्रकार न केवल व्यक्ति-व्यक्ति को सामाजिक आचार-बन्धन में बाँधा वरन् सामाजिक समरसता को सुदृढ़ता भी प्रदान की थी।
वैश्विक स्तर पर बहुचर्चित ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ के अंतर्गत भारतीय समाज में दो व्यवस्थाएँ हैं-
(क) वर्णव्यवस्था, (ख) आश्रम व्यवस्था। इन दोनों व्यवस्थाओं के अधिलक्ष्य समरैखिक हैं; अतएव, इन्हें प्रायः ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ के रूप में एक साथ समेकित किया जाता है।
प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा उपर्युक्त दोनों व्यवस्थाओं का विनिर्माण मूलतया मनुष्य-जीवन और मनुष्य-समाज में सम्यक् संतुलन स्थापित करने के निमित्त किया गया था, जिससे मानव तथा मानव-समाज के हित में प्रत्येक मनुष्य की सक्षमता का उत्कृष्टतम और अधिकतम उपयोग अधिकतम सद् लक्ष्य से अधिकतम परास में संधानित किया जा सके।
दोनों व्यवस्थाओं को किंचित् विस्तार से देखें-
(क) वर्णव्यवस्था
वर्ण-व्यवस्था के प्रति देशज-विदेशज विद्वानों की रुचि अधिकतम रही है। ख्यात पाश्चात्य विद्वान् जे॰ एच॰ हट्टन ने सन् 1945 में कृति ‘भारत में जाति-प्रथा’ की भूमिका में लिखा था कि (उस समय तक) इस विषय की 5000 से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हो चुकी थीं। आज 1945 ई॰ से 2021 ई॰ तक की समय-यात्रा में तो यह संख्या 50 हजार के आसपास होगी। प्रतीततया ‘जाति-व्यवस्था’ एवं ‘वर्ण व्यवस्था’ अति रुचिकर विषय है भारतेतर एवं भारतीय विद्वानों का। वैसे भी यह व्यवस्था भारतीय सामाजिक ताने-बाने को गहराई से ओत-प्रोत किए हुए है और इसके फलित-दुष्फलित भारतीय समाज को अद्यतन गहराई से प्रभावित करते हैं, तदेव इसका सुचिन्तित अनुशीलन आवश्यक है।
संक्षेपतया ‘वर्णव्यवस्था’ मनुष्यों के कर्म-वर्ण के आधार पर भिन्न-भिन्न ‘वर्ण’ निर्धारित करके समाज के सुचारु संचालन में उनकी उत्कृष्ट भागीदारी सुनिश्चित करती है जबकि ‘आश्रम व्यवस्था’ प्रत्येक मनुष्य (चाहे वह किसी भी वर्ण का हो) के जीवनकाल को सुचारु ढंग से इस प्रकार व्यवस्थित करती है कि प्रत्येक मनुष्य ‘पशु-इतर मानवोचित जीवन-लक्ष्यों (पुरुषार्थ चतुष्टय: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)’ को यथोचित आश्रमों में सहज सरल ढंग से प्राप्त कर सके।
उपर्युक्त दोनों व्यवस्थाएँ भारतीय ऋषिक मनीषियों द्वारा मूलतया मानव की भौतिक-आध्यात्मिक गति-प्रगति प्राप्त करने के निमित्त मनुष्य-जीवन और मनुष्य-समाज में सौहार्द, शान्ति और वांछित संतुलन स्थापित करने के लिए अन्वेषित की गई हैं; जिससे मानव तथा मानव-समाज के हित में प्रत्येक मनुष्य की सक्षमता का उत्कृष्ट और अधिकतम उपयोग करने का सद् लक्ष्य अधिकतम परास में संधानित किया जा सके।
भारतीय मनीषियों द्वारा जिस सामाजिक व्यवस्था को समाज के सुगठन, सुसंचालन के लिए और देश को शक्तिशाली बनाने के लिए मानव के प्रकृतिगत गुण (सत्त्व गुण, रजस् गुण, तमस् गुण) जनित कर्म और कृत-कर्म के वर्ण/रंग पर आधृत बनाया गया था, उसे ही वर्ण-व्यवस्था कहा गया था।
किन्तु अनेकता में एकता वाली राष्ट्रीय मनस्विता से ओतप्रोत भारतीय समाज की स्वयं में परिनिष्ठित अनेकानेक स्वतंत्र गण्य इयत्ताओं वाली संस्कृतियाँ समवेत में विलक्षण ढंग से समन्वित होकर एक राष्ट्रीय संस्कृति वाले अखण्ड भारतत्व का विनिर्माण कर सकती हैं-- ऐसा सोचना अनेकानेक भारतेतर विद्वानों के लिए (उनके अनुगामी अधुना भारतीय विद्वानों हेतु भी) किसी अजूबा से कम नहीं है।
प...र...न्तु , इन व्यवस्थाओं के प्रवर्त्तन और परवान चढ़ने के बाद के कालखण्डों में या कहें कि सांस्कृतिक गिरावट के दुष्काल में ‘कर्मणा’ के बजाय वर्णव्यवस्था को ‘जन्मना’ बनाए/माने जाने के दुष्काल से वर्णव्यवस्था में गम्भीर गिरावटें आने लगीं जो धीरे-धीरे भयावह होती गईं। ‘ब्ंेजमे व िडपदकण्ण्ण्ण्’ में निकोलस डर्क ने लिखा है कि ”भारत में जातिवादी छुआछूत अंग्रेजों ने बढ़ाया।” तथ्य यही है कि मेगस्थनीज से लेकर अलबरूनी तक किसी भी विदेशी इतिहासकार ने यह कहीं नहीं लिखा कि भारत में शोषणवादी छुआछूत की व्यवस्था उनके भ्रमण-समय में थी।
जातीय संस्कृति को महत्ता देने वाले पाश्चात्य विद्वान् और उनके सम-मनस्क कथित बौद्धिक वास्तव में ‘वर्ण-व्यवस्था’ नाम्नी विचक्षण, विलक्षण समंजसित सामाजिक व्यवस्था को वस्तुनिष्ठ स्वरूप में समझ पाने में असमर्थ हैं, इसलिए कि वे जातीय संस्कृति की अहमन्यता से और विजातीय के प्रति घृणा से आग्रस्त होते हैं। त...ब, क्या आश्चर्य कि इस व्यवस्था को आविश्व विद्वानों ने सर्वाधिक व्याख्या का विषय माना है ! वस्तुतः जातिवादी ऊँच-नीच से मूल वर्णव्यवस्था का कोई सरोकार नहीं था अपितु मूल वर्णव्यवस्था में अनेक लोक-कल्याणक गुण विद्यमान थे।
ज्ञात हो कि रूडोल्फ लॉयड एवं एस॰ एच॰ रूडोल्फ भी वर्ण-व्यवस्था के वर्ण (कथित जाति) को सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक सुधार का कारक मानते हैं। उनके अनुसार- “जाति को सम्पूर्ण भारत के स्तर पर आन्तरिक सांस्कृतिक सुधार तथा सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में स्वीकृत किया गया था।”
परन्तु आज की समतावादी 21वीं सदी में ऊँच-नीच विभेदकारी जाति-व्यवस्था (वर्ण-व्यवस्था नहीं) को समर्थन या प्रशंसा के योग्य नहीं माना जा सकता।
वर्ण-व्यवस्था को किंचित् विस्तार से देखें--
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ‘पुरुष सूक्त’ की एक ऋचा से आविर्भूत बताई जाती है वर्णव्यवस्था। इस ऋचा में कहा गया है-
”ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः,
उरू तस्य यत्वैश्यः पदभ्यां शूद्रोऽजायत।”
अति त्रासद है कि उपर्युक्त विषय से सम्बन्धित वास्तविक तथ्यों को नकारते हुए उपर्युक्त ऋचा की अनुचित, त्रुटिपूर्ण एवं अविवेकपूर्ण व्याख्या करके दीर्घकाल से आज तक ‘जान्मिक रूप से ही स्वयं के अति श्रेष्ठ’ होने की ‘अहं-अनुभूति’ से ‘ब्राह्मण’ अभिभूत हैं, वहीं ‘शूद्र’ ‘अति हीन’ या कि ‘निकृष्ट’ बताए/माने जाते हैं, जबकि मूलस्वरूप में संदर्भगत ऋचा में ऐसा कोई मंतव्य प्रकट या प्रच्छन्न स्वरूप में इंगित नहीं है।
जैन ग्रंथों के अनुसार आदि-तीर्थंकर ऋषभदेव ने इस व्यवस्था में असि, मसि, कृषि के धारकों के कृत-कर्म के प्रकृतिगत वर्ण के आधार पर 3 वर्ण क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण ही मूलतः (प्रारम्भ में) प्रस्तावित किए थे। कालान्तर में ऋषभदेव के पुत्र वीर राजा भरत ने कतिपय सद्विचारी, अहिंसक, विचारवान् संवर्ग की सात्त्विक धर्मशील प्रवृत्ति को देख कर ऐसे लोगों को ‘ब्राह्मण’ वर्ण के नाम से संज्ञायित किया। इन आख्यानों से भी वर्ण-व्यवस्था ऊँच-नीच या श्रेणी-विभाजन या कि जाति-व्यवस्था से असम्बद्ध दिखती है।
जहाँ तक महाभारत के ‘ब्राह्मणनां तु सितो क्षत्रियाणाम् तु लोहितः वैश्यानां पीतकोवर्णः शूद्रानामासित तथा’ (महाभारत, 188-5) का प्रश्न है, उस विषय में कहना होगा ‘महाभारत’ एक महाकाव्य है, जिसमें आलंकारिक भाषा भी प्रयुक्त है। उक्त श्लोक के आलंकारिक शब्दों का यदि वस्तुनिष्ठतः वैखरी में उचित ढंग से अर्थान्वयन किया जाए, तो ज्ञात होगा कि ब्राह्मण से शूद्र ‘वर्ण’ तक के जो ‘वर्ण/रंग’ वर्णित हैं, वे उनके कर्म-विशेष के ‘रंग’ के आधार पर आधृत हैं। यह अवधारणा इस तथ्य से भी सुपुष्ट होती है कि किसी भी व्यक्ति की त्वचा का रंग चाहे वह क्षत्रिय हो या राजपूत आदि ‘तांबई’ से अधिक लाल या कि ‘लोहित’ (चटक लाल) हो ही नहीं सकता। प्रकटतया आलोच्य श्लोक काव्य-सौष्ठव में कवि-भाषा में उचारित है जो अभिधा नहीं, अपितु व्यंजना में ही ग्राह्य है। वस्तुतः श्री राम, वासुदेव कृष्ण, पंच-पाण्डव, कौरव, महाराजा बप्पा रावल या पृथ्वीराज चौहान आदि ख्यात क्षत्रियों/राजपूतों के चर्म-रंग को किसी भी ग्रंथ में लोहित या चटक लाल नहीं बताया गया है। हाँ, उनके वीर-कर्म का रंग अवश्य उनकी ‘युद्ध-निरतता’ आदि के आधार पर लाल या लोहित व्यंजित किया जा सकता है। वास्तव में मनुष्य के कर्म चूँकि मूलतया मनुष्य की प्रकृति में सत्त्व, रजस् या कि तमस् गुण की प्रधानता से नियन्त्रित होते हैं, अतएव कहा जा सकता है कि उनकी प्रकृति/स्वभाव में उपस्थित प्रधान (प्रभावी) गुण (सत्त्व, रजस् या कि तमस् )-विशेष के ‘रंग’ का परिचायक है ‘वर्ण-व्यवस्थाधीन वर्ण के उपरिवर्णित रंग’। वस्तुतः ‘सत्त्व’ गुण का वर्ण (रंग) श्वेत, ‘रजस्’ गुण का वर्ण लाल (‘क्षत्रियाणाम् लोहितः’) और ‘तमस्’ गुण का वर्ण काला माना गया है, जबकि मिश्रित प्रभावी गुणों का रंग इनका मिश्रण (यथा रजस् $ तमस् = लाल $ काला = पीला) माना गया-“वैश्य पीतको वर्णः”। तथैव, सम्बन्धित व्यक्ति के शरीर के चर्म का वर्ण/रंग के बजाय उसके कर्म के (प्रकारान्तर से कहें तो उसके कर्म के नेपथ्य में उपस्थित उसकी प्रवृत्ति-प्रकृति के प्रधान गुण: सत्त्व या रजस् या तमस् के या कि प्रधान मिश्रित गुण के) रंग/वर्ण का द्योतक है। इस तरह शूद्र के असित वर्ण को भी उनके असित कर्म का वर्ण ही माना जाना चाहिए। ख्यात भारत-विद् डॉ॰ राजबली पाण्डेय के अनुसार गुणकर्म की प्रवृत्ति-प्रकृति ब्राह्मणवर्णी मनुष्य में सत्त्व-प्रधान, राजन्य/क्षत्रिय में रजस्-प्रधान, वैश्य में रजस्-तमस् प्रधान है जबकि तमस् प्रधान प्रकृति-प्रवृत्ति वाले मनुष्य को शूद्र वर्णी माना जाता था।
कतिपय विद्वान् (?) वर्ण-व्यवस्था को भारतीय समाज-संस्कृति के ‘गर्हित’ स्वरूप में देखते हैं तो कतिपय अन्य विद्वान् इसे जाति-व्यवस्था के मूल के रूप में, तो कुछ विद्वान् उसे बहुजातीय भारतीय समाज के श्रेणी-विभाजन के रूप में देखते हैं। प...र...न्तु , वस्तुस्थिति यह है कि वर्ण-व्यवस्था मूलतया न तो ‘गर्हित’ है, न ही यह जाति-व्यवस्था का मूल रूप है और न ही यह समाज का श्रेणी-विभाजन है। कर्म के वर्ण (रंग) अर्थात् कर्म के ‘प्रकार’ की पहचान के लिए प्रत्युत उच्चतर कोटि के कर्म को बढ़ावा देने के लिए अवधारित ‘वर्ण-व्यवस्था’ का मूलतया ‘जाति’ (अर्थात् समाज के जन्माधारित विभाजन) से कोई लेना-देना नहीं है। तथापि नीर-क्षीर विवेक से ‘वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी प्रचलित (वरन् कहना चाहिए कि कदाशयतः साजिशन प्रचारित की गई) भ्रान्त अवधारणाओं/प्रस्थापनाओं’ की सत्यता के परीक्षण के लिए भारतीय वाङ्मय की तार्किक खँगाल से देखना होगा कि विशुद्ध ‘भारतीय वर्ण-व्यवस्था’ के धरातलीय सत्य क्या हैं ?
औ...र इस क्रम में द्रष्टव्य बिन्दु अग्रांकित हैं। यथा-
Û ऋक् वेद में दशम् मण्डल के पूर्व भी ‘ब्राह्मण’ शब्द प्रयुक्त है। लेकिन वहाँ यह किसी ‘श्रेष्ठता का परिचायक’ या कि ‘वर्ण’ का वाचक नहीं है।
Û ऋक् में ब्रह्मम्, क्षत्रम्, विशम् संवर्ग हैं। ऋक् के ‘पुरुष सूक्त’ में ‘ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य, शूद्र’, शतपथ ब्राह्मण (6.4.4.13) में ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र’, तैत्तिरीय संहिता (4, 3, 10/1/31) में ‘ब्राह्मण, क्षत्र, विश, शूद्र’ और छान्दोग्य उपनिषद् (5.10.7) में ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, चाण्डाल’ वर्ण प्रयुक्त हैं। इस प्रकार से भी ऋग्वेदीय ‘पुरुष सूक्त’ को ‘जातिबोधक’ या ‘जातिनाम बोधक’ या ‘उत्कृष्टता से हीनता का बोधक’ नहीं माना जा सकता।
Û ऋग्वेद के ही पाँचवें मण्डल में स्पष्ट घोषणा है कि यहाँ न कोई छोटा है, न बड़ा- “ अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरा वावृधुः सौभगाय.... ”। इस ऋचा से इंगित है यह भी कि ऋक्कार ऋषिगण ‘परस्पर अ-ज्येष्ठ अ-कनिष्ठ भाइयों के समान मान्यता से ही सौभाग्य की वृद्धि’ संभावित मानते थे औ...र इसी कारण ऐसी ‘अज्येठ-अकनिष्ठ मान्यता’ को वन्दनीय मानते थे तभी वे मरुद्गण के ऐसे गुणों की अभ्यर्थना करते थे।
Û शुक्रनीति में कहा गया है- “न जात्या ब्राह्मणो क्षत्रियः वैश्य एव च न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्माभिः।” ख्(कोई मनुष्य) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या म्लेच्छ के रूप में उत्पन्न नहीं होता (जन्म नहीं लेता), (मनुष्यों में) ये भेद (मनुष्यों के) गुण-कर्म पर आधारित होते हैं। ,
Û महाभारत के ‘भीष्म पर्व’ में ‘चातुवर्ण्यं मया सृष्टम् गुणकर्मविभागशः’ द्वारा ‘गुण-कर्म विभाग के अनुसार चतुर्वर्ण की सृष्टि’ की घोषणा के साथ ही महाभारत के ‘शान्ति पर्व’ (188-10) में कहा गया है-
“न विशेषोऽस्ति वर्णनां सर्वम् ब्रह्ममिदम् जगत्,
ब्रह्मणा पूर्व सृष्टम् हि कर्मभिः वर्णताम् गतः।।”
Û स्कन्दपुराण में कहा गया है-
‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते।
अभ्यासेन विप्रः ब्रह्म जानाति स ब्राह्मणः।।’ (स्कन्दपुराण)
Û अथर्ववेद में पाँच प्रकार के पशुओं की गणना में ‘संस्कारहीन मनुष्य (मानवोचित ऊर्ध्वगामी संस्कारों से रहित मनुष्य)’ को पशु के रूप में गिना गया है।
Û ‘तैतिरीय’ और ‘वाजसनेय’ संहिताओं में भी ‘संस्कारहीन मनुष्य’ को ‘द्विपाद पशु’ कहा गया है।
‘संस्कारहीन मनुष्य’ किस वर्ण या जाति का है-इसका कोई विभेद वर्णित नहीं है अथर्ववेद, तैतिरीय या वाजसनेय आदि में; केवल संस्कार (सद्-संस्कार) पर बलाघात है वहाँं। स्पष्ट है कि वर्ण-व्यवस्था में किसी मनुष्य की जाति या वर्ण को नहीं, अपितु उसकी संस्कारहीनता को हेय माना गया था।
Û हेमचन्द्र के ‘अभिधान चिन्तामणि’ में “अर्याः भूमिस्पर्शः वैश्यः ऊख्या उरुजां विशः” प्रावधानित है।
उपर्युक्तानुसार, स्पष्ट है कि उपर्युक्त देशनाएँ हों या ‘चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः’ (श्रीमद्भगवत्गीता) की देशना--- ऐसी सभी देशनाओं का इंगित यही सुस्थापित करता है कि ऋग्वेदीय ‘पुरुष सूक्त’ की संदर्भगत ऋचा ‘व्यक्ति द्वारा अपने गुणों (सत्त्व, रजस् या तमस्) द्वारा प्रकट अभिरुचि के अनुसार अपनाए गए कर्म की कोटि/रंग/वर्ण को इंगित करने के लक्ष्य से ही’ अधिलक्षित थी। यह मूलतया किसी श्रेष्ठता या निकृष्टता की परिचायक नहीं थी।
यहीं परिस्पष्ट करना वांछनीय है यह भी कि आलोच्य ऋचा ‘ब्राह्मणो मुखमासीद् .....’ से किसी बड़ेपन या छोटेपन का आशय इंगित नहीं है। उसमें बड़प्पन या छोटपन सम्बन्धी कोई उक्ति नहीं है। इसका एक भी अक्षर, वर्ण या मात्रा किसी बड़ेपन या छोटेपन को प्रकट नहीं करती है।
Û अब जहाँ तक ‘पदभ्यां शूद्रोऽजायत’ से ‘शूद्र’ को ‘छोटा’ या ‘अपावन’ माना जाने का प्रश्न है, उस फलक पर देखना होगा कि -
- विष्णु के चरण से गंगा निःसृत बताई जाती हैं; लेकिन गंगा को देवीस्वरूपा और पूजनीया ही बताया गया है। विष्णु के पद से निःसृत होने के कारण ‘निकृष्ट, गर्हित, निन्दनीय, असम्माननीय या त्याज्य’ नहीं है गंगा। इसके विपरीत गंगा के जल को उसके कल्याणकारी गुणों के कारण परम पवित्र और महापूजनीय माना जाता रहा है भारतीय मनीषियों द्वारा।
त..ब, विराट पुरुष के पैर से निःसृत या कि अजायत ‘शूद्र’ को अपावन कैसे माना जा सकता है ? क्या ‘विराट पुरुष की पावनता’ या कि ‘विराट पुरुष के पैर की पावनता’ विष्णु के पैर की पावनता से कमतर है ? किसी धर्मग्रंथ में विराट पुरुष बनाम विष्णु की पावनता में विष्णु की पावनता को विराट पुरुष की पावनता से कमतर नहीं बताया गया है। अतएव, विराट पुरुष के पैर की पावनता या तो विष्णु-पद की पावनता के समान है अथवा अधिक। ऐसी दशा में विराट पुरुष के पैर से जन्में शूद्र को अपावन माने जाने का कोई औचित्य नहीं है।
- ऋक् में ‘पंचजनाः पंचक्षित्वां’ की मान्यता उद्धृत है। वहीं, पृथ्वी (मही) को शूद्र वर्णा माना गया है, लेकिन पृथ्वी को भी ‘देवी’ अर्थात् पूज्या ही माना गया है।
ऐसी दशा में ‘पदभ्यां शूद्रो अजायत’ वाले ‘शूद्र’ को भी ‘नीच’ नहीं अपितु उनके ‘पवित्र अर्थात् सात्त्विक एवं कल्याणकारी गुणों’ के आधार पर ‘पूज्य’ अर्थात् सम्माननीय माना जाना चाहिए।
विदित हो कि ‘रामायणम्’ में “चातुवर्ण्यं स्वधर्मेण नित्य सेवाभिपावनम्” निदेशित है। यतः चारों वर्णों को अपने-अपने वर्ण-धर्मानुसार ‘सेवा-कार्य’ करना अपरिहार्य था रामायणम् के कालखण्ड में। अतएव, जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के लिए ‘सेवा-कार्य’ का प्रावधान ‘गर्हित/हेय’ नहीं बताया/माना जा सकता, उसी प्रकार शूद्रवर्णी के लिए ‘सेवा-कार्य’ का प्रावधान मात्र होने से शूद्र को हेय बताया जाना तर्कोचित नहीं है।
- एक पक्ष और। वस्तुगततः शब्द ‘पदभ्यां’ पद (पैर) का बहुवचन है। इन्हीं पैरों में सभी जीवधारियों के शरीर का सम्पूर्ण भार वहन करने की क्षमता प्रकृतिजन्य मानी जाती है। मानव के व्यक्तिगत जीवन में भी देखें, तो मनुष्य के पैर ही उसके सम्पूर्ण शरीर का भार वहन करते हैं। पैरों पर मानव की समस्त गतिशीलता निर्भर करती है, इसलिए कि पैर ही व्यक्ति की ‘गति’ के क्रियान्वयक होते हैं। त...ब, सतत गतिशील रहने वाले (‘आरादयति इति आर्यः’) आर्यजन ‘पैर’ को कदापि ‘हेय’ नहीं मान सकते। तथैव, ‘पदभ्यां शूद्रो अजायत’ या ‘ब्राह्मणो मुखमासीद् ....’ किसी ‘निकृष्टता’ या ‘उच्चता’ का बोधक या कि ‘जन्मना जाति’ का बोधक नहीं है-- यही माना जाना तर्कसम्मत है।
Û अनेक यज्ञों में (सौत्रामणि आदि में) शूद्र, निषाद आदि कथित हेय बताए जाने वाले जन की उपस्थिति और उनके द्वारा आहुति-अर्पण का आवश्यक निदेशित किया गया है; विचारणीय है कि यदि उन्हंे मूलतया अपावन माना जाता तो ऐसे प्रावधान प्रावधानित क्यों किए गए जाते ?
Û सत्य तो यह है कि ऋक् के जिस दशम् मण्डल में ‘पुरुष सूक्त’ में प्रथम बार अनुस्यूत है ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद...’, वहीं, ऋक् के उसी दशम् मण्डल में (और दशम् मण्डल के बाद के अनेक ऋक्-मण्डलों में भी और अन्यान्य वेदों में भी) अनेक ऐसे ऋषि ‘ऋचाओं के नियामक’ बताए गए हैं, जो जन्मना शूद्र थे। यथा-
- नागजातीय अर्बुद, जात्कर्ण आदि जन्मना शूद्र थे।
- ऐतरेय ब्राह्मण के रचयिता महीदास तथा ऋषि रैक्व, ऋषि मतंग प्रभृति विभिन्न ग्रंथों के रचयिता अन्यान्य ऋषिगण जन्मना शूद्र ही थे।
- एलुषा दासी के पुत्र एलुष और एलुष-पुत्र कवष जन्मना शूद्र ही थे। एलुष और कवष भी वैदिक ऋषि ही हैं।
- अपाला, घोषा, शची, अदिति, आत्रेयी, विश्ववारा सभी जन्मना शूद्रा थीं। वे सब भी वैदिक ऋषिकाएँ ही थीं।
- महाभारत के रचनाकार महर्षि व्यास स्वयं जन्मना संकरज शूद्र थे।
- ऋक् के प्रथम मण्डल की 16-22 ऋचाओं के रचयिता कक्षीवान् जन्मना शूद्रवर्णी थे।
- राजा जानश्रुति स्वयं जन्मना शूद्र थे।
- शूद्रवंशीय आस्तीक ऋषि और जनमेजय का नागयज्ञ कराने वाले पुरोहित सोमश्रवा भी जन्मना शूद्र ही थे, जो ब्राह्मण कर्म करते/कराते थे और जिन्हें ब्राह्मणवत् भरपूर मान-सम्मान प्राप्त था।
- वैदिक मनीषी ऋषि सौति भी जन्मना शूद्रवंशी थे।
- दाशरथ राम के सर्वप्रिय अनुज लक्ष्मण भी जान्मिक दृष्टि से (अधुना जातीय दृष्टि से) शूद्र ही थे।
- स्कन्दपुराण के अनुसार वाल्मीकि जन्मना शूद्र थे परन्तु तपस्योपरान्त कर्मणा महर्षि बनने पर उन्हें ब्राह्मोचित सम्मान प्रदान किया गया।
- गणेशपूजा में जन्मना शूद्र ऋषि द्वारा रचित ‘आयोगव स्तोत्र’ का पाठ अनिवार्य है।
- पौराणिक रोमहर्षण भी जन्मना शूद्र थे जिनके महिमागान से पुराण भरे पड़े हैं। वे शुक्राचार्य के गुरु थे।
- आचार्य भरत को भी जन्म से शूद्र ही कहा जाता है।
- मलूकदास, नामदेव, कबीरदास, रैदास, वीर शैवेन्द्र सर्वज्ञ, संविधानज्ञ डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर--- सभी जन्मना शूद्र थे।
- ‘तिरुक्कुरल’ के रचयिता वल्लुवर और आलवार संत तिरुप्पन नम्मलवार और भक्त-शिरोमणि अण्डाल तथा अन्यान्य भक्तकवि नन्ददास, तिरुमंगई, हरिदास, पुरन्दरदास, कनकदास और एलवा के नारायण गुरु सभी जन्मना शूद्र थे।
- अनेक शूद्र राजाओं को राजन्य का मान दिया गया था। यथा-
¬ 100 अश्वमेध यज्ञ करने वाले आयोगज राजा मरुत जन्मना शूद्र थे।
¬ विक्रमशिला विद्यापीठ के संस्थापक राजा धर्मपाल जन्म से शूद्र थे।
¬ प्राचीन भारत में महाराज महापùनन्द जन्मना जाति से नाई थे।
¬ महाभारत के अनुसार हस्तिनापुर का राज्य मछुआरिन सत्यवती के पुत्र को दिया गया था।
¬ मालवा का राज्य चरवाहा होल्कर को दिया गया था।
¬ अहिल्याबाई होल्कर परिगणित जाति की थीं।
¬ ऐतिहासिक मध्य युग की 17वीं शताब्दी में शूद्रवंशीय शिवाजी को छत्रपति (क्षत्रिय) पद पर प्रतिष्ठित किया गया था।
¬ मध्य युग से लेकर अंग्रेज शासन के कालखण्ड तक में अनेक छोटे-बड़े राजा एवं ताल्लुकेदार जन्मना ‘पासी, दलित, कछवाहा, यादव, कुर्मी आदि जातियों’ से होते रहे हैं।
¬ ‘मृच्छकटिकम्’ में शिल्पी कीरक, नाई तथा चन्द्रानक चर्मकार को सैनिक पदाधिकारी दर्शाते हुए उनकी प्रशंसा की गई है।
ऐसी प्रशंसा से भी सिद्ध होता है कि कमसकम ‘मृच्छकटिकम्’ के रचे जाने के समय तक प्रशंसा या निन्दा जान्मिक वर्ण के आधार पर नहीं, अपितु गुण-कर्म के आधार पर अवधारित होती थी।
Û तथ्यतः सनातन-व्यवस्था की पतनावस्था के पूर्व के कालखण्ड तक शूद्र कभी त्याज्य, निन्दनीय या कि असम्मान-योग्य नहीं माने गए।
वास्तव में प्राचीनकाल में शूद्र अधिकांशतया शिल्पजीवी कलाकार होते थे, जो नागरकला, तक्षणकला आदि में दक्ष होते थे और इन्हें समाज के अन्य वर्णों द्वारा यथोचित सम्मान दिया जाता था। वास्तव में प्राचीन अर्थव्यवस्था में शूद्र शिल्पकार अर्थव्यवस्था के मेरुदण्ड माने जाते थे।
Û प्राचीनकाल में शूद्रों को दिए जाने वाले मान-सम्मान के प्रमाणक के रूप में अग्रांकित तथ्यों का उल्लेख पर्याप्त है कि -
- जैन ग्रंथों में वास्तुकार को 14 रत्नों में सम्मिलित बताया गया है।
- ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में शिल्पकार (जो बहुलांशतः शूद्रवंशीय हैं) को ईश्वर-पुत्र बताया गया है।
- रामायण युग में शूद्रा माता से जन्में लक्ष्मण हों या कि शूद्र निषादराज गुह, शूद्र कोटि की भीलनी शबरी, शूद्र कोटिक वन-नर सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त आदि-- सभी राम को अति प्रिय थे। राम-दरबार में श्रमिक संवर्ग, कलाकार संवर्ग (जो प्रायः शूद्रवर्णी ही होते थे) को समुचित मान दिया जाता था। श्री राम ने वास्तुकार नल-नील को भी भरपूर सम्मान प्रदान किया था।
- महाभारत युग में भी महान् शिल्पकार एवं महान् राजमिस्त्री मयासुर को समुचित मान दिया गया।
- ‘सूत्रधारस्य पूजनम्’ का सूत्र और ‘समरांगण सूत्रधार’ सदृश ग्रंथ एवं अन्यान्य अभिलेख (यथा- देवपाड़ा अभिलेख, चन्देल अभिलेख, महोबा अभिलेख, कन्हेरी गुफा के चैत्य सं॰ 3 के गुफाचित्र 433-438 ई॰ के दामोदर ताम्रपत्र आदि) शिल्पियों (जन्मना शूद्रों) के गुणगान से सुशोभित हैं।
- राजा भोज के राज-काल में चरवाहा भी संस्कृतभाषी विद्वान् था, सुन्दर कविता रच सकता था, लेकिन अपनी व्यवसायगत व्यस्तता से उसके पास काव्यादि-सर्जना के लिए अवकाश नहीं था।
- कौटिल्य भी शूद्रों और शिल्पियों के श्रम को भरपूर मान देते थे।
- पाश्चात्य लेखक व्यूह्लर के अनुसार भी प्राचीन भारत में शिल्पकार (जन्मना शूद्रों) को समुचित मान-प्रदान किया जाता था।
- वर्तमान में भी वास्तुशास्त्र के अनुसार शास्त्रोक्त भवन-निर्माण के समय राजमिस्त्री का भवनस्वामी द्वारा चरण-प्रक्षालन, पूजन आदि शिल्पकारों के अनिवार्य सम्मान के प्रमाणक हैं जबकि आज भी राजमिस्त्री अधिकांशतया जन्मना कथित शूद्रवंशीय ही होते हैं।
- अधुनाकाल में भी स्वतंत्रता-संग्राम के अनेक सेनानी तथा सीमा-रक्षा के अपने कर्त्तव्यपालन में शहीद सिपाही एवं सेना/पुलिस के प्राधिकारीगण को (जो जन्मना शूद्र या दलित या परिगणित/पिछड़ा संवर्ग के थे) भरपूर सम्मान उनके जीवनकाल में और बाद में भी अद्यतन दिया जाता है; दिया जाना चाहिए भी।
- 21वीं शताब्दी में देखें तो ओ॰बी॰सी॰ उमा भारती को ‘महामण्डलेश्वर’ पद पर आसीन किया गया, वे सांसद भी चुनी गई और मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनाई गईं। जगजीवनराम, मीरा कुमार, सुश्री मायावती, मुलायम सिंह, अखिलेश यादव, लालू यादव आदि सैकड़ों राजनेता परिगणित, दलित और पिछड़ी जातियों के हैं जो विधायक, सांसद, लोकसभाध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, केन्द्रीय एवं प्रदेशीय मंत्री, मुख्यमंत्री बन चुके हैं; अनेक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिगण और अनेक शीर्ष स्तरीय से लेकर जनपदीय स्तर के प्रशासक तक परिगणित, दलित और पिछड़ी जातियों के रहे हैं। सर्वजन ने उन्हें सम्मान भी दिया है।
प्रकटतया अपने सत्कर्मों के सम्बल से उपरि-अंकित सभी महानुभाव अति-अति सम्मान के पात्र रहे हैं। उनमें से किसी का भी मान-सम्मान किसी कथित उच्चवर्णी से कभी कम नहीं रहा। तब ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्...’ से कथित ‘ब्राह्मणीय श्रेष्ठता’ को ‘सिद्ध’ कैसे स्वीकारा जा सकता है ?
Û अग्रेतर ध्यातव्य है कि ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् ...’ से ब्राह्मण यदि जन्मना श्रेष्ठ होता तो ‘अभ्यासेन विप्रः ब्रह्म जानाति स ब्राह्मणः’ या कि ‘जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्यते’ सदृश निकष क्यों निर्धारित किए जाते द्विज एवं ब्राह्मण होने के लिए ?
Û भारतीय वर्ण-व्यवस्था अपने विशुद्ध रूप में मानव के गुण-कर्म पर आधारित थी। वर्ण-व्यवस्था में ‘वर्ण’ मूलतया जन्मना या जन्म-आधारित नहींे, अपितु व्यक्ति के गुण-कर्म के अनुसार अवधारणीय थे। शब्दान्तर से कहना होगा कि वर्ण-व्यवस्था अपने आविर्भावकाल से ही गुण-कर्माधृत थी, यह जन्माधारित नहीं थी। अनेक वाङ्मय इसके साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यथा-
- ऋक् के नवम् मण्डल के 9/112/3 में ऋषि कहता है कि वह स्वयं कारू (कवि) है, पिता भिषग है, माता उपलप्रक्षिणी (अर्थात् अनाज पीस कर जीविका अर्जित करने वाली) है। स्पष्ट है कि एक ही परिवार में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र कर्म करने वाले विद्यमान हैं। प्रकट है कि ‘पुरुष सूक्त’ की संदर्भगत व्यवस्था ‘जातिगत’ या कि ‘जन्मना/जन्म-आधारित श्रेष्ठता/अश्रेष्ठता’ के लक्ष्य से अधिलक्षित नहीं थी।
- जैन ग्रंथ ‘उत्तराध्ययन’ (प्राकृत ग्रंथ) 2, 5/33 के अनुसार भी ‘वर्ण’ कर्माधारित व्यवस्था है- “कम्मणा बम्भणो......सुद्दो होइ कम्मणा।”
- बौद्ध ग्रंथ भी जन्मना नहीं, अपितु कर्मणाधृत व्यवस्था को ही मान्यता देते हैं।
- पातंजल महाभाष्य में भी ‘जन्मेन या प्राप्यते सा जातिः’ का जो भाष्य दिया गया है, उससे भी निष्कर्षित है कि जाति ‘जन्मना नहीं’ मान्य थी औ...र वर्ण का तो जन्म से या कि जन्मगत जाति से कोई लेना-देना था ही नहीं।
- पाणिनि शूद्रों में दो भेद मानते थे- निर्वसित और अनिर्वसित। किन्तु ये विभेद भी शूद्रवर्णी मनुष्य के कर्माधृत थे, जन्माधारित नहीं।
- सूत्र ग्रंथों में ‘व्यवसाय के आधार पर जाति’ (वर्ण) अवधारित की गई।
- पाश्चात्य विचारक विन्टरनिट्स भी ‘भारतीय साहित्य का इतिहास’ खण्ड 1 में स्पष्ट करते हैं- “ऋक् युग में जातिपाँत नहीं था। यद्यपि पशुपालन, कृषि, व्यापार आदि के व्यवसायगत कार्य तब तक प्रचलन में आ चुके थे।”
Û विशुद्ध भारतीय वर्ण-व्यवस्था में वर्ण से सम्बन्धित गुण-कर्म का लोप हो जाने पर व्यक्ति उस वर्ण से च्युत कर दिया जाता था। इसके भी अनेक वाङ्मयिक साक्ष्य उपलब्ध हैं -
- मनुस्मृति 10.44 में (सद्) क्रियालोप से ‘शूद्र’ होने की मान्यता घोषित है। मनुुस्मृति 11-28-30 में ‘धर्माधर्म वृतावृते’ कहा गया है।
- शतपथ ब्राह्मण में तो स्पष्ट रूप से ब्राह्मण कर्म से च्युत् व्यक्ति को ‘शूद्र’ घोषित किया गया है।
Û गुण-कर्माधृत होने के कारण वर्ण-व्यवस्था में वर्ण आपस में अन्तःपरिवर्तनीय भी थे। इस तथ्य की पुष्टि करने वाले उदाहरण भी अनेक है। यथा-
- क्षत्रिय से ब्राह्मण (यथा ‘अंगिरस’ से ‘भार्गव’) बनने के उदाहरणों से वैदिक वाङ्मय भरे पड़े हैं।
- ऋक् में तृतीय मण्डल सूक्त 59/8 में “मित्राय पंच (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषाद) ये गमिरे जनाः” कहा गया है। ं
- क्षत्रिय राजवंशी विश्वामित्र के ब्रह्मर्षि बनने और उनके द्वारा गायत्री मंत्र को सम्पूरित करने का आख्यान बहुज्ञात है।
- प्रवाहण जाबालि द्वारा उद्दालक को उपदेशित किया गया था।
- राजन्य देवर्षि अपने ही कुल के शान्तनु के पुरोहित थे।
- ‘हरिवंश पुराण’ में उल्लेख है कि नामावेदिष्ट वैश्य से ब्राह्मण बने थे।
- ‘आपस्तम्ब सूत्र’ और ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ तो ‘शूद्र’ को यज्ञाधिकार भी देते हैं।
- आचार्य कैयट के अनुसार ‘पंच महायज्ञ’ शूद्रों द्वारा भी करणीय हैं।
- कौटिल्य भी वर्ण-परिवर्तन की छूट देते थे।
- राजस्थान के पोखर सेवक ब्राह्मणों के पूर्वज और बंगाल के व्यासोक्त ब्राह्मणों के पूर्वज जन्मना शूद्र थे जिन्हें कर्मणा ब्राह्मण वर्ण का मान मिला।
- राजपूतों के जन्म का इतिहास, पूर्वोत्तर के अनेक ब्राह्मणेतर जातियों द्वारा पुरोहित कर्म, आभीर वसुदेव के वंश से चन्द्रवंशी क्षत्रियों के विवाह सम्बन्ध आदि से वर्ण-परिवर्तन की व्यवस्था की पुष्टि होती है।
- आभीर जब क्षत्रिय कर्म करने लगे तो यदुवंशियों को क्षत्रिय ही माना गया।
- ब्राह्मण पुष्यमित्र क्षत्रिय कर्म करते थे।
- शकों को वृषल क्षत्रिय, पंजाब के ब्राह्मणों के वंशज जब्बालों को राजपूत, ऋंगी ऋषि के वंशज सेगडो को राजपूत, वैष्णविक महाबर (कहार-शूद्र) को राजपूत (देखें क्षितिजमोहन सेन कृत ‘संस्कृति-संगम’), कार्नल शूद्रों को 5-6 पीढ़ी बाद राजपूत का मान दिया जाना सदृश प्रकरण वर्ण-परिवर्तन को पुष्ट करते हैं। प्रकटतः प्रसंगित वर्ण-परिवर्तन में जन्मना शूद्र होना कोर्इ्र बाधा कारित नहीं करता था।
उपर्युक्त सभी उदाहरण भारतीय वर्ण-व्यवस्था को ‘जन्मना जातिगत कथित श्रेष्ठता वाली वर्ण-व्यवस्था’ के बजाय ‘कर्मणाधृत’ व्यवस्था ही सिद्ध करते हैं। ऐसे सभी प्रकरण पुनः-पुनः सिद्ध करते हैं कि संदर्भगत वर्ण-व्यवस्था का आविर्भावक ‘पुरुष सूक्त’ जन्मना जाति-व्यवस्था का परिचायक नहीं था।
प्रकटतः महाभारत काल तक व...र...न् उसके बाद के दीर्घ कालखण्ड तक भारतीय समाज में सिद्धान्ततया और व्यवहारतया उपर्युक्त कर्मणाधृत वर्ण-व्यवस्था ही प्रचलित रही है और तब तक ‘वर्ण’ कर्मणा-परिवर्तनीय भी माने जाते रहे हैं।
निष्कर्षतः सुदीर्घ कालखण्ड तक शूद्र को हीन नहीं माना जाता था। ‘पदभ्यां शूद्रो अजायत’ की मान्यता के बावजूद ‘शूद्र’ ऐतिहासिक मध्य युग तक (जब तक युद्ध और सैन्य कर्म में सक्षमता जीवन की अपरिहार्य आवश्यकता नहीं बनी तब तक) कला संवर्गीय और श्रमिक संवर्गीय ‘शूद्रत्व’ या कि ‘शूद्र होना’ किसी ‘हीनता’ का परिचायक नहीं माना जाता था।
तदनुसार प्रसंगित परिप्रेक्ष्यों का सत्य यह है कि वेबर या कि अन्य पाश्चात्य विद्वान् राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए शूद्रों को आर्यों (अन्य वर्णों के जन) से लड़ाने-भिड़ाने के लिए ही शूद्रों को अनार्य घोषित करते हैं। प्रतीततया शूद्रों का ‘सामाजिक सम्मान कम बताना’ राजनैतिक वितण्डा ही है जिसका मौलिक वर्ण-व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है और न ही प्राचीन भारतीय मनीषियों ने ऐसी किसी भेदशील मान्यता को कभी स्वीकार ही किया है।
वस्तुतः शूद्र संवर्ग के प्रसंगित हीनताबोध को मुगलकाल और यूरोपीय शासकों के राज्यकाल में अपने राजनीतिक स्वार्थाें की पूर्ति हेतु भरपूर बढ़ावा दिया गया। वस्तुतः हीनताबोध के सामाजिक-सांस्कृतिक- राजनैतिक हथियार से एक तीर से कई शिकार साधित किए गए। यथा-
- तत्कालीन जन्मना कथित ‘शूद्र (श्रमिक) संवर्ग’ में हीनता उत्पन्न करके उनका शोषण आसान करना।
- श्रमिक संवर्ग के मन में ‘श्रमिक कौशल’ के प्रति विरक्ति उत्पन्न करना और इस तरह भारत के श्रमिक कौशल को चोट पहुँचा कर श्रम-कौशल को निर्बल करना।
- ‘श्रमिक कौशल’ के प्रति विरक्ति के प्रभावस्वरूप भारत की सुदृढ़ मूल आर्थिक व्यवस्था पर घातक चोट कर उसको क्षत-विक्षत करना इसलिए कि कौशल से भरपूर श्रमिक संवर्ग ही भारतीय अर्थव्यवस्था का प्राणतत्त्व था।
- अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के अन्तर्गत शूद्र संवर्ग में शेष वर्णों को उनका शोषक दर्शा कर सनातनी (वैदिक) संस्कृति के प्रति विरक्ति उत्पन्न करना जिससे इस संवर्ग में सनातनी संस्कृति के अनुयायी शेष समुदाय के प्रति आक्रोश उत्पन्न हो।
- उपरि-इंगित विरक्ति एवं आक्रोश के फलित से भारत के बहु-बहुसंख्य ‘हिन्दू समाज’ की एकजुटता को विभंजित करना।
- हिन्दू-समाज की सनातनी (वैदिक) संस्कृति के मूल संस्कार (अन्याय का प्रतिरोध करना) को हेय और त्याज्य दर्शा कर हिन्दू समाज के प्रतिरोध को मनसा क्षीण कर शूद्र संवर्ग के दासत्व के ‘औचित्य’ और कथित स्वयं-श्रेष्ठता को स्थापित करना।
- सनातनी वर्ण-व्यवस्था को हेय दर्शा कर और सम्पूर्ण सनातनी व्यवस्था को ‘गर्हित’ बता कर न केवल बदनाम (दपबादंउम) करना वरन् बहुसंख्य भारतीय (कथित शूद्र) जन को अपनी सनातनी (वैदिक) संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था आदि से विमुख कर विद्रोही बनाना।
- सनातनी संस्कृति को हेय दर्शा कर हिन्दू समाज के बहुसंख्य शूद्र संवर्ग का धर्म-परिवर्तन कर ईसाई/इस्लामी धर्मावलम्बी तैयार कर एक ओर जहाँ अपनी संख्या बढ़ाने का कुचक्र रच कर सांख्यिक आधार पर हिन्दू समाज को कमजोर करना, वहीं दूसरी ओर, भारतीय समाज के ही जन-संवर्ग को भारतीय सनातनी (वैदिक) संस्कृति को सर्व-उपाय से मिटाने को उद्धत वर्ग के स्वरूप में जन्मित, पल्लवित और पोषित करना (संक्षेप में कहें तो भारत के निवासीगण में से ही भारतीय सनातनी (वैदिक) संस्कृति के शत्रु उत्पन्न करना) ।
- औ....र, उपरि-अंकित लक्ष्यों के साधित होने के समवेत परिणाम के फलस्वरूप अपने शासन को चिरकालीन बनाना।
उपर्युक्तानुसार स्पष्ट है कि नितान्त गर्हित सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक कद्-उद्देश्यों की पूर्ति के हेतुक से ‘शूद्र’ के प्रसंगित ‘हीनता-बोध’ के लिए भारतीय सनातन संस्कृति की वर्ण-व्यवस्था को विद्रूपित स्वरूप में प्रचारित-प्रसारित किया गया जो वस्तुगत सत्य से नितान्त परे पूर्ण असत्य है। यह असत्य इसलिए तथ्य-असंगत है कि मूलतया सन्दर्भगत मूल वर्ण-व्यवस्था में बुराइयाँ नहीं वरन् अच्छाइयाँ ही वाचाल थीं जो कतिपय पथ-भ्रष्टता के बावजूद अद्यतन विद्यमान हैं सम्भवतः इसीलिए समाज-सुधारक, समन्वयवादी सन्त कवि तुलसीदास एवम् अछूतोद्धारक महात्मा गाँधी प्रभृति मनीषी भी वर्ण-व्यवस्था का खुलेआम समर्थन करते थे (क्रमशः द्रष्टव्य: ‘रामचरितमानस एवम् हरिजन सेवक’ दि॰ 14.04.1933, एवं ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’: पी॰ वी॰ काणे, भाग 1-5 )।
परिस्पष्टतया सनातन हिन्दू समाज की संदर्भगत मूल वर्ण-व्यवस्था में ‘जन्मना शूद्र’ या ‘दलित’ के प्रति किसी विद्वेषकारी विभेद के लिए कोई स्थान नहीं था। प्रत्युत जिन शूद्रों/दलितों ने पावन श्रेयस्कर लोकहिती सत्कर्म किए, उन्हें समाज के सभी वर्णों द्वारा सिर-आँखों पर बिठाया गया। अतएव, ‘ईशावास्यमिदम् सर्वम्’ को मनसा-वाचा-कर्मणा अंगीकार करने वाली भारतीय मनीषा द्वारा प्रकल्पित सामाजिक व्यवस्था में ‘जन्माधृत या कि जन्मना जातिगत ऊँच-नीच की विद्यमानता का आरोपण’ भारती$य, भा$रतीय दृष्टि से कथमपि स्वीकार्य नहीं है।
वस्तुतः प्रसंगित विभेद शूद्र या दलित से नहीं अपितु उसके तन-मन की अपावनता वाले शूद्रत्व/दलितत्व या कि नीच गुणों या कि तमस्शील आचरण वालेे नीच कर्म के प्रति है इसलिए कि ऐसे कर्मों को लोक-अहिती मानते हुए अप्रशंसनीय एवं असम्मानजनक माना गया भारतीय संस्कृति में। तथैव, मानना होगा कि निन्दनीय ‘शूद्रत्व-दलितत्व’ वास्तव में मनुष्य के जन्मना-आधार पर नहीं, व..र..न् उसके ‘नीच कर्म’ या कि ‘तमस्शील कर्म’ की ‘अपावनता एवं अ-लोकसंग्रही स्वरूप’ पर आधृत था।
अरे भाई, आप सुअर, मुर्गा, तीतर, बकरी आदि पाल कर या चर्मकार सदृश अभिकर्म करके आजीविका चला रहे हैं, तो कोई आपत्ति नहीं है। इसके बावजूद आप तन-मन से पवित्र होकर हमारे पास आएँ, तो हम आपका स्वागत करने को तत्पर हैं, सदा तत्पर रहे हैं; ले...कि...न यदि आप सुअरबाड़े आदि की गन्दगी लपेटे हुए हमारे पास आना चाहें या हमारे घर-मन्दिर में अपना सुअरबाड़ा घुसाना चाहें, तो उसके लिए ‘पावनता एवम् स्वच्छता का वैयक्तिक सामाजिक स्वास्थ्यगत महत्त्व भली प्रकार जानने-समझने वाले सनातन हिन्दू संस्कार’ हमें आपका अभिनन्दन करने की अनुमति कैसे दे सकते हैं ? सुअरबाड़ा की गन्दगी और अवैध शराब-भट्ठियों का धन्धा ही प्रिय है, तो दक्खिन टोला में तो बसना ही होगा आपको, इसलिए कि दक्खिन टोला की अस्वास्थ्यकर, अशुद्ध वायु से सम्पूर्ण बस्ती का पर्यावरण अशुद्ध होने से बचा रहेगा क्योंकि दक्षिण दिशा से कोई बयार नहीं बहती। त...थै...व, कटु शब्दों में कहें तो कलाली और दल्लाली (दुर्योग से कथित दलित/शूद्र संवर्ग में ऐसे व्यवसाय अधिक प्रचलित हैं) की गन्दगी ही आपको प्रिय है, जिसे आप चौबीसों घंटे गले लगाए रखना चाहते हैं, तो आपको सम्मानपूर्ण सामाजिक समरसता कैसे प्रदान की जा सकती है ? अपनी ऐसी लोक-अहिती मानसिकता छोड़ दीजिए, तो सनातनी आर्य आपका स्वागत पहले भी करते आए हैं, आगे भी करेंगे अवश्य। निष्पक्षतया सम्मादिट्ठि से देखें तो दिखेगा कि आज भी कतिपय अति-विरल अपवादों के अतिरिक्त कथित शूद्र-विभेद विद्यमान होते हुए भी किसी जन्मना शूद्र अधिकारी, प्राधिकारी, शिक्षक, न्यायाधीश, डॉक्टर, वैद्य, इण्जीनियर या तकनीक-सक्षम या शिल्पी या राजनेता, मंत्री, विधायक, सांसद आदि की ‘जाति-आधृत अवमानना’ आभारत कहीं दृश्यमान नहीं है। क्या आज बड़े से बड़ा उच्चवर्णी ब्राह्मण भी आज के देश-काल में जन्मना शूद्र ‘प्राधिकारी’, ‘शिक्षक’, ‘मंत्री’, ‘राजनेता’ आदि के ‘पैर छूता है’ या नहीं ? आप यदि ऐसे प्रश्नों के उत्तर ‘नहीं’ में देते हैं, तो निश्चिततया आप दुराग्रहवशात् ही ‘सत्य’ को नकार रहे है।
औ...र, सन्दर्भगत परिप्रेक्ष्यों में यह भूलने का विषय नहीं है कि आप वेद की ऋचाएँ और मंत्र रचते हैं, स्तोत्र रच रहे हैं तो हम आपके द्वारा रचित मंत्र, ऋचा, स्तोत्र का पाठ-जाप करने को तत्पर हैं, आप सदाशयी तपस्या कर रहे हैं, राम नाम जप रहे हैं, तो हम आपको पूज्य मानने को तत्पर हैं। आप कलाकारी कर रहे हैं, आप लोक को उच्च संस्कारों से आमण्डित करने वाले सांस्कृतिक अभिकर्म के ‘कर्मी’ हैं, लोकहित अभिकर्म के अभिकर्मी हैं, तो हम आपको हार्दिक सम्मान देने को तत्पर हैं; आपकी प्रशस्तिगान को भी तत्पर हैं ले..कि..न यदि आपके प्रकट-प्रच्छन्न कर्म ‘नीच अर्थात् अपावन, राग-द्वेष वाले या/और तमस्शील, लोक-अहिती या लोक-असंग्रही हों, तो भला ‘नीच कर्म’ को श्रेयास्पद कैसे और क्यों अनुमन्य किया जाए या कि उसे आदरेण्य माना जाए ? प्रत्युत प्रतिप्रश्न पूछा ही जाना चाहिए कि संदर्भगत नीचता की अन-अनुमति को/अन-अनुमन्यता/अन-आदरेण्यता को कदर्थनीय कैसे और क्यों माना जाए ? इन तर्कों के नेपथ्य में भी प्रसंगित कर्म-हेयता आदि को जन्मना नहीं अपितु कर्मणा आधृत होने का सिद्धान्त ही मान्य है।
बताना समीचीन है कि इन पंक्तियों का लेखक ‘भारतीय समाज में जन्मना-जाति के औचित्य के पक्ष में’ इस लंगड़े तर्क को भी स्वीकार करने को तत्पर नहीं कि अन्यान्य कथित सभ्य यूरोपीय समाज, ऐंग्लोइण्डियन, इस्लामी समाज आदि में भी जाति-भेद व्यवहार्यतः दृश्यमान है ! बहुसंख्य दुनिया यदि अनय या अपराध करे, तो भी अनय/अपराध को और अनयकर्त्ता/अपराधकर्त्ता को अनयी/आपराधिक कोटि से बाहर कदापि नहीं माना जाना सकता।
सारतः ‘जाति’ (जन्मना/जन्म-आधारित सामाजिक व्यवस्था) वस्तुतः बहुत बाद के कालखण्ड का (संभवतः 7वीं शती ई॰ के आसपास का) अवदान है। वैदिक मान्यताओं से स्खलन के पराकाष्ठा के युग में 7वीं-8वीं शताब्दि के जैनीय ‘पùपुराण’, ‘आदिपुराण’ आदि से जन्माधृत जाति-व्यवस्था को आरम्भित किया गया। पùपुराण में पहली बार ‘जन्मना जायते ब्राह्मणः’ की घोषणा की गई जबकि मनुस्मृति के रचनाकार स्वयं मनु महाराज ‘जान्मिक व्यवस्था’ के पोषक होने बावजूद मनुस्मृति में ब्राह्मण-कर्म से च्युत् होने वाले ‘जन्मना ब्राह्मण’ को ‘शूद्रवत्’ माने जाने की घोषणा करते हैं।
सम्पूर्ण प्रकरण की तर्कसंगत विवेचना से स्वतः सिद्ध है कि प्रसंगित प्रकरण में वस्तुस्थिति (यथार्थ) को छुपा कर, निराधार, नितान्त असत्य ‘सफेद झूठ’ गढ़ कर सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर हिन्दू समाज-संस्कृति को हेय दर्शाने के लिए सदियों से बड़े पैमाने पर सुनियोजित ढंग से प्रसंगित वर्ण-व्यवस्था का प्रश्नगत विभेद (यदि किसी अंश में उसे विभेदकारक माना जाए तो उस दशा में भी) इतने जोर-शोर से प्रचारित किया जाता रहा है कि अब प्रश्नगत झूठ ही आभासी सत्य लगने लगा है, जबकि मूलतया कर्मणाधृत वर्ण-व्यवस्था में कथित जन्मना जातिगत हेयता-उच्चता प्रकल्पित नहीं थी-- यह एक धु्रव सत्य है।
इसी क्रम में इतना और कि वर्ण-व्यवस्था को लेकर भारतीय समाज-संस्कृति का उपहास प्रायः कदाशयतः किया जाता है इसलिए कि किसी विभ्रम में या कि साजिशन वर्ण-व्यवस्था को ‘जन्मना जाति-व्यवस्था’ बता कर प्रसंगित सदाशयी एवं सामाजिक समरसता में समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अनुस्यूत करने वाली वरेण्य ‘वर्ण-व्यवस्था’ को अति गर्हित सिद्ध किया जा सके औ...र भारतीय समाज की समरसता एवं एकता में विघटन कारित करके अपने निजी क्षुद्र स्वार्थों को साधने के निमित्त राजनैतिक रोटियाँ सेकी जा सकें; जबकि ऐसे सभी अभिकथन मूलतया असत्य, तथ्य-असंगत और अतार्किक हैं।
तथैव, कहना होगा कि ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्’ या कि ‘पदभ्यां शूद्रो अजायत’ से अनुस्यूत वर्णव्यवस्था या कि जैन तीर्थंकर द्वारा आविष्कृत कर्मणाधृत वर्णव्यवस्था को सामाजिक श्रेणी विभाजन का परिचायक नहीं माना जाना चाहिए, प्रत्युत जैसा कि उपरि-अंकित प्रस्तरों में सविस्तार विवेचित है, सदाशयतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय मनीषियों द्वारा समाज के सुगठन, सुसंचालन के लिए और राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए वर्ण-व्यवस्था को जन्मना नहीं, अपितु कमर्णाधृत, कृत-कर्म के प्रकार, उसके वर्ण/रंग पर आधृत बनाया गया था। इस वस्तुनिष्ठ सत्य को स्वीकार करते ही संदर्भगत ‘वर्ण-व्यवस्था’ किसी आलोचना या उपहास का विषय नहीं, अपितु भारतीय समाज की एक प्रमुख विशिष्टता के रूप में रूपाभ हो जाएगी औ...र तब प्रसंगित रुपाभा से संदर्भगत परिप्रेक्ष्य का राजनैतिक सांस्कृतिक षड्यन्त्र का दुष्चक्र भी विभंजित हो जाएगा।
अंत में इतना और कि वर्णव्यवस्था का प्रत्यय किंचित् सुदीर्घ अनुशीलन का विषय इसलिए प्रतीत हुआ कि यह विषय राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्यों में अधिक प्रभावशील है। वहीं, कतिपय विभ्रमित कथित विद्वानों द्वारा इस विषय में मूल तथ्यों को महीन-दर-महीन कतरते हुए अनेक अनावश्यक विवाद उत्पन्न कर दिए गए हैं जिनका समाहार उपरि-इंगित विवेचना के आधार पर स्वतः रूपायित हो सकता है, बशर्त प्रसंगित विवेचन में अनावश्यक कदाशय सम्मिश्र नहीं किया जाए। तदनुसार, प्रसंगित विषय के वस्तुनिष्ठ अवगाहन एवं अनुपालन से ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के पल्लवन को समुचिततया बल प्रदान किया जा सकता है-- यह भी सत्य है।
(ख) आश्रम-व्यवस्था
प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा ‘वर्ण-व्यवस्था’ के साथ ही ‘आश्रम व्यवस्था’ का विनिर्माण मूलतया मनुष्य-जीवन को सम्यक् संतुलित, शान्त, ऊर्ध्वगामी उन्नतिशील, सुस्थिर मनुष्य-समाज की स्थापना के निमित्त किया गया था, जिससे मानव तथा मानव-समाज के इहलौकिक और पारलौकिक हित में प्रत्येक मनुष्य की सक्षमता का उत्कृष्टतम और अधिकतम उपयोग अधिकतम परास में संधानित किया जा सके।
प...र...न्तु , अन्यान्य सांस्कृतिक गिरावटों के समरूप हमारी उत्कृष्टतम आश्रम-व्यवस्था की उत्कृष्टता भी कालान्तर में धूमिल होती गई औ...र देश-काल की वर्तमान परिस्थितियों में तो इसे मात्र ‘अप्रवर्त्तनीय’ ही नहीं, अपितु ‘त्याज्य’ मान लिया गया इसलिए कि ‘आश्रम-व्यवस्था’ प्रतीततया कतिपय कठोर अनुशासनों से आबद्ध है। अतएव, सुविधाभोगी बनने के पश्चात् सामान्य भारतीयों में इस व्यवस्था के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गई। फलतः बिरले ही परिवारों में इस व्यवस्था का पालन आज दृश्यमान है, जबकि इस व्यवस्था में निम्नवत् अनेक श्रेष्ठताएँ हैं। यथा--
‘आ $ श्रम’ का शाब्दकोशिक अर्थ है- ‘किसी स्थिति अथवा स्थल पर ‘श्रम’ का निर्विकार और समुचित नियोजन।’ वहीं, ‘श्रम’ का अर्थ है ‘किसी विशेष लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु एकाग्रचित्त युक्त उपयुक्त कर्म करना’ अर्थात् ‘तपस्या करना’। अतएव, ‘आश्रम’ का विशिष्ट अर्थायन निम्न प्रकार से किया जा सकता है -
1. स्थिति अथवा स्थान जहाँ ‘श्रम’ (तपश्चर्या) करना है।
2. कालखण्ड (जीवनावधि) जब तक श्रम करना है।
3. विश्राम स्थान।
उपर्युक्त तीनों ही अर्थों में ‘आश्रम-व्यवस्था’ नामतः अति उपयुक्त प्रतीत होती है इसलिए कि-
- प्रथमतः, जीवन-निर्वहन के विभिन्न चरणों में मनुष्य विभिन्न स्थानों पर कुछेक कालखण्डों के लिए अस्थायी रूप से प्रवासित होता है और वहाँ निवास करके तत्सम्बन्धी श्रम निष्पन्न करता है।
- द्वितीयतः, विभिन्न आश्रमों में रहता हुआ मनुष्य तद्गत दायित्व-निर्वाह निष्पन्न करता है, जो एक प्रकार से ‘तपस्या’ ही होता है। वहाँ व्यक्ति यथावसर विश्राम भी करता है। इस तरह तत्सम्बन्धी कालखण्डीय प्रवास को ‘आश्रम’ का नाम दिया जाना तर्कोचित है।
- तृतीयतः, जैसे ‘आश्रम’ में निवास करते हुए व्यक्ति निस्पृह और निर्मोही भाव से अपने अस्थायी निवास-प्रवासकाल और तद्गत दायित्व निष्पन्न करते हुए वर्तमान आश्रम-निवास के कालखण्ड में भी शीघ्र ही उस आश्रम से अगले आश्रम के लिए प्रस्थान के प्रति कथ-अनकथ रूप में सचेत रहता है- उसी भावानुभाव को कथ-अनकथ स्वरूप में सतत इंगित करते हुए प्रसंगित आश्रम-व्यवस्था भारतीय मनीषियों ने प्रवृत्तमान की थी।
- चतुर्थतः, आश्रमवासी (आश्रम चाहे कोई भी हो) ‘आश्रम’ के प्रति, आश्रम की वस्तुओं/व्यक्तियों के प्रति अनावश्यक राग-द्वेष से, मोह-व्यामोह से स्वयं को विलग रखता है, जिससे उसे उस आश्रम को छोड़ कर दूसरे आश्रम (अस्थायी प्रवास-स्थल) में प्रवेश करने का अवसर उपस्थित होने पर पूर्व आश्रम से किसी मोहासक्ति, हिचक या अवरोध का सामना नहीं करना पड़ता।
वास्तव में धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को जीवन का पुरुषार्थ मानने वाली भारतीय मनीषा के समक्ष यह प्रश्न उठना स्वाभाविक था कि इन पुरुषार्थों को कैसे, कब, और जीवन के किस-किस कालखण्ड में समुचिततः साधा जाए। वैदिक ग्रंथ, पौराणिक ग्रंथ, रामायणम्, महाभारत, संहिता, मनुस्मृति और सूत्रग्रंथ आदि ग्रंथों के सार के अनुसार मानव-जीवन की आयु सौ वर्ष मान कर मानव-जीवन को 4 खण्डों में विभाजित किया गया। प्रत्येक खण्ड को क्रमशः ‘ब्रह्मचर्याश्रम’, ‘गृहस्थाश्रम’, ‘वानप्रस्थाश्रम’, ‘सन्यासाश्रम’ का नाम दिया गया और इस प्रकार मानव-जीवन को उपर्युक्त चार आश्रमों में बाँट कर व्यवस्थित किया गया। तदेव, उपर्युक्त प्रत्येक आश्रम की अवधि 25 वर्ष निर्धारित की गई थी।
बताते चलें कि उपर्युक्त आश्रमों के नाम में विभिन्न भारतीय वाङ्मयिक ग्रंथों में किंचित् नामान्तर भी पाया जाता है। यथा-
- गौतम धर्मसूत्र (3.2) में क्रमशः ‘ब्रह्मचारी’, ‘गृहस्थ’, ‘भिक्षु’ और ‘बैखानस’ नामक 4 आश्रम बताए गए हैं।
- आपस्तम्ब धर्मसूत्र (2.9.21.1) में ‘आचार्यकुल (ब्रह्मचर्य)’, ‘गार्हस्थ’, ‘वानप्रस्थ’ और ‘मौन’ नाम से इसे संज्ञायित किया गया है।
- वसिष्ठ धर्मसूत्र में क्रमशः ‘ब्रह्मचारी’, ‘गृहस्थ’, ‘वानप्रस्थ’, ‘परिव्राजक’ आश्रम नाम से चार आश्रम उल्लिखित हैं।
- मनुस्मृति (4.1) के 5-169, 6. 9. 2, 6-33 आदि में क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास आश्रम संज्ञायित हैं।
उल्लेखनीय है कि भारतीय वाङ्मय के अनुसार इस व्यवस्था में ऊँच-नीच, स्पृश्य-अस्पृश्य, जाति-उपजाति, वर्ण, गोत्र आदि के विभेद अनुपस्थित थे। वस्तुतः ‘आश्रम व्यवस्था’ को समाज के सभी वर्णों, जातियों, उपजातियों आदि द्वारा अनुपालित किया जाना अनिवार्य था।
ज्ञात हो कि वर्ण-व्यवस्था को लेकर तो किसी विभ्रम में यदा-कदा कतिपय विरोधी स्वर उभरते रहे हैं किन्तु अद्यतन किसी प्रबुद्ध सुचित्त भारतीय चिन्तक द्वारा आश्रम-व्यवस्था का विरोध नहीं किया गया है।
वैदिक ग्रंथ, पौराणिक ग्रंथ, रामायणम्, महाभारत, संहिता, मनुस्मृति और सूत्रग्रंथ-- प्रायः सभी ग्रंथ विभिन्न आख्यान-उपाख्यान के माध्यम से आश्रम-व्यवस्था का समर्थन करते हैं। अधुना मनीषी ख्यात धर्मशास्त्री श्री पी॰ वी॰ काणे और समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे, डॉ॰ राजबली पाण्डेय, राजनेता गाँधी आदि भी भारतीय समाज की विशिष्टताओं के रूप में ‘आश्रम-व्यवस्था’ का उल्लेख कर परोक्ष समर्थन करते हैं।
वस्तुतः किसी भी भारतेतर देश में, किसी भी भारतेतर समाज-संस्कृति में श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों (पुरुषार्थों) को लभ्य करने की ऐसी श्रेष्ठ आचरेय जीवनीय व्यवस्था और तद्गत प्रविधि आदि को रूपायित करने की कौन कहे, तद्गत व्यवस्था का अंश मात्र तक इंगित या अभीप्सित नहीं है। ऐसी विलक्षण विचक्षण जीवन-व्यवस्था भारतेतर जगत् में पूर्णतः अनुपलब्ध है। तदेव, बहु-बहुसंख्य भारतीय समाज की विशिष्ट श्लाघ्य व्यवस्था है ‘आश्रम-व्यवस्था’।
अकारण या निराधार नहीं कि डायसेन प्रभृति पाश्चात्य मनीषी भी ‘इनसाक्लोपीडिया: रिलीजन एण्ड एथिक्स’ में कहते हैं- “हम कह नहीं सकते कि मनुस्मृति तथा अन्य स्मृतियों में वर्णित जीवन की यह योजना कहाँ तक व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित हुई, परन्तु हम स्वीकार करने को स्वतंत्र (विवश) हैं कि हमारे मत में मानव-जाति के सम्पूर्ण इतिहास में ऐसी कोई विचारधारा नहीं है जो इस विचार की महत्ता की समता कर सके।”
पंच महायज्ञ
बहु-बहुसंख्य भारतीय सनातन समाज की अन्यान्य विशिष्टताओं में से एक अन्य उल्लेखनीय विशिष्टता है- ‘पंच महायज्ञ’ का प्रत्यय। ‘पंच महायज्ञ’ भी एक ऐसा विशिष्ट प्रत्यय है जो भारतेतर जगत् में उपलब्ध नहीं है।
दूसरी ओर, बहु-बहुसंख्य भारतीय जन-मन में गहरे पैठी है पंच-महायज्ञ की मान्यता और तद्गत अभीप्सा। ‘अथर्ववेद’, ‘तैत्तिरीय आरण्यक’, ‘शतपथ ब्राह्मण’, ‘मनुस्मृति;’, ‘आश्वलायन गृह्यसूत्र’, ‘बौधायन गृह्यसूत्र’, ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’, ‘गोभिल स्मृति’ से लेकर पी॰वी॰ काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ और सेन्ट्रल हिन्दू कालेज, बनारस के न्यासी मण्डल द्वारा वर्ष 1916 में प्रकाशित कृति ‘सनातन धर्म’ नाम्नी पुस्तक तक में इन यज्ञों का महात्म्य अभिवर्णित किया गया है।
ज्ञात हो कि सम्पूर्ण पृथ्वी जगत् पर आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि प्रवृत्तियों में प्रायः मानवेतर जीवों के समान होने के बावजूद मानव सभी प्राणियों में श्रेष्ठतर और उच्चतर श्रेणी का प्राणी इसीलिए माना जाता है कि मानव उपरि-इंगित प्रवृत्तियों के अतिरिक्त अपनी विकसित धी से प्रत्युत अपने विवेक, प्रज्ञा से, प्रत्युत उससे बढ़कर अपनी ऋतम्भरिक प्रज्ञा से परार्थी, परहिती, लोकहिती, लोकसंग्रही और सार्वहिती कार्यकलाप भी आचरित करने में सक्षम होता है। भारतीय वाङ्मय ऐसे सार्वहिती कार्यकलाप की देशनाओं से ओतप्रोत हैं। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः...’ सदृश वैदिक निदेशन से लेकर श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा लोकसंग्रही कार्यकलाप निष्पन्न करने के निर्देश हों या ‘रामायणम्’ के प्रारम्भ से पूर्व आदि-महाकवि वाल्मीकि द्वारा अपने महाकाव्य के लिए ‘साम्प्रतम् लोके सर्वश्रेष्ठ सर्वगुणोपेत नायक’ के लिए अभिवांछित 16 सद्गुणों में ‘सर्वभूतेषु को हितः’ की तलाश वाली अभिवांछा-- इन सभी का सारवान् तत्त्व ‘परहितरतता’ है। ऐसे सभी इंगित भारतीय संस्कृति को एक विशेष श्रेष्ठता से अभिषिक्त करने में सक्षम है।
‘यज्ञ’ का शब्दकोशिक अर्थ होता है- ‘यजन’, ‘पूजन’, ‘सामूहिक विचारविमर्श’, ‘वस्तुओं का वितरण’। सामान्यतया दूसरों के प्रति ‘देने’ का भाव और तद्गत त्याग, बलिदान के क्रियात्मक अभिकर्म को ‘यज्ञ’ कहा जाता है। वस्तुतः व्यक्ति में दूसरे के प्रति कुछ देने का भाव तभी उत्पन्न होगा जब व्यक्ति अपनी ‘निज’ की संकुचित सीमा से ऊपर उठ कर उदात्त और परोन्मुखी होगा। ऐसे भाव के उद्बोध के लिए ‘दूसरे के प्रति सम्मान’ और ‘दूसरे की आवश्यकता-पूर्ण करने में तत्परता के भाव’ भी अनुषंगतः अपरिहार्य होते हैं। इस प्रकार ‘यज्ञ’ ‘त्याग’ करने और ‘बलिदान’ देने वाले व्यक्ति में ‘सात्त्विकता’ और ‘मनुष्यत्व’ से बढ़ कर ‘देवत्व’ के अधिष्ठान का उपक्रम है। यज्ञ-भाव के सुफलित से देवत्व का अधिष्ठान यज्ञकर्त्ता व्यक्ति में सतत पल्लवित होता जाता है और यज्ञ-कर्त्ता शनैः-शनैः परकल्याणक और अंततः सर्वकल्याणक बन जाता है। तथैव, ‘यजन’ या कि ‘यज्ञ’ उपरि-सदृश सार्वहिती सर्वकल्याणक उदात्त अभिवांछा प्रकट करने वाला एक सहज व्यावहारिक सर्वाचरेय उपक्रम है। यजन/यज्ञ की प्रक्रिया, प्रविधि, आचरेयता की सहजता आदि की दृष्टि से प्रसंगित ‘पंच यज्ञ’ श्रेष्ठतम माने गए। इसीलिए इन्हें ‘महायज्ञ’ का नाम दिया गया है।
जहाँ तक यज्ञ के रूप-स्वरूप, उसके प्रकार, प्रविधि आदि के विन्यास का प्रश्न है, सार्वहित के लिए सतत सन्नद्ध ज्ञानशील भा$रत के भारती$य समाज और समग्र भारतीय संस्कृति में तद्विषयक विस्तृत विवेचना विवेचित है। अनेकानेक प्रकार के यज्ञ प्रकल्पित हैं भारतीय वाङ्मय में जिनमें सामान्य जन के लिए सहज आचरेय, सहज करणीय यज्ञ मूलतया 5 प्रकार के हैं, जो वहाँ ‘भूतयज्ञ’, ‘मनुष्य यज्ञ’, ‘पितृ यज्ञ’, ‘देव यज्ञ’, ‘ब्रह्मयज्ञ’ के नाम से अभिवर्णित हैं। ये 5 यज्ञ ही वस्तुतः ‘पंच महायज्ञ’ कहे जाते हैं, यद्यपि कहीं-कहीं 3 या 4 यज्ञों का ही उल्लेख है। यथा-
- ‘शतपथ ब्राह्मण’ (11/5/6/1) में ‘पंचैव यज्ञाः’ कह कर इन्हें पाँच ही बताया गया है।
- श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ की महिमा का बखान तो किया गया (मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः -श्लोक 13 अध्याय 3), परन्तु यज्ञ के चार ही प्रमुख रूप बताए गए हैं वहाँ- 1. द्रव्य यज्ञ, 2. तप यज्ञ, 3. योग यज्ञ, 4. स्वाध्याय ज्ञान यज्ञ (श्लोक 28 अध्याय 4)। इन्हीं यज्ञों के व्रत लेने का निदेशन किया गया है वहाँ। श्रीमद्भगवद्गीता में ही यज्ञ करने वाले को सनातन ब्रह्म की प्राप्ति होना भी बताया गया है (श्लोक 31 अध्याय 4)। इसी अध्याय में श्लोक 30 में यज्ञविद्या को जानने वाले के सभी दोष नष्ट हो जाने का प्रकथन भी किया गया है।
उपरि-अंकित पंच महायज्ञ सर्वजन के लिए नित-प्रति के दैनिक कर्म के रूप में करणीय हैं ही, सभी गृहस्थों के लिए ‘पंच महायज्ञ’ अति आवश्यक और अति उपादेय बताए गए हैं।
इन यज्ञों की विधियों के बारे में विभिन्न श्रौत सूत्र, गृह्यसूत्रों में सविस्तार प्राविधियाँ वर्णित हैं।
पंचयज्ञों के विषय में मनुस्मृति (3/70) में कहा गया है- ”अध्यापनम् ब्रह्मयज्ञं पितृयज्ञस्य तर्पणम् होमो दैवे बलि भवतां न यज्ञोऽतिथिपूजनम् बलिवैश्वदेवयज्ञं।“
पंच महायज्ञ सहज करणीय हैं। ये यज्ञ मानव मात्र के प्रति ही नहीं, प्रत्युत प्रत्येक जीव के प्रति सदाशयी त्याग, बलिदान, सेवाभाव, सम्मान भाव आदि से परिनिष्ठित भी हैं। इसीलिए ये सर्वकल्याणक हैं। इन यज्ञों के वस्तुनिष्ठतः सर्वकल्याणक होने के आधार पर ही कहा गया- “यज्ञो वै श्रेष्ठतमः कर्मः। यज्ञो हि श्रेष्ठतमः कर्मः।।“ प्रतीततया उपर्युक्त पंच महायज्ञ समस्त जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, मानव, वृद्धजन, जीविकोपार्जन में अक्षम मनुष्य तथा अतिथि सभी को भोजन, पोषण, सम्मान तथा समुचित संरक्षण प्रदान करने के उपक्रम के रूप में प्रावधानित किए गए हैं।
पंचमहायज्ञ मनुष्य मात्र ही नहीं, अपितु जीव मात्र और सृष्टि की प्रत्येक जड़-चेतन सत्ता-- सभी के लिए सर्वहितकारी, सर्वोपयोगी हैं। इस तरह पंच यज्ञ/पंच महायज्ञ भारतीय संस्कृति का विशिष्ट सार्वहिती और सार्वोपयोगी वैशिष्ट्य है जो निष्पन्न तो वैयक्तिक स्तर पर किए जाते हैं किन्तु इनका प्रत्यक्ष सुफल सामुदायिक स्तर पर दृष्टिगत होता है।
वस्तुतः प्रत्येक जड़-चेतन जीव, मनुष्य आदि तथा समाज के वृद्धजन (माता-पिता-गुरुजन आदि) के प्रति समादर और उनके पोषण, संरक्षण आदि के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में समर्थ इन पंच महायज्ञों जैसे सर्वोपकारी प्रावधान भारतेतर जगत् में प्रायः अलभ्य हैं।
व्यावहारतया ‘वाजसनेय यज्ञ’, ‘राजसूय यज्ञ’, ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’, ‘अग्निष्टोम यज्ञ’, ‘सौत्रामणी यज्ञ’, ‘सोत यज्ञ’, ‘चातुर्मास यज्ञ’ आदि यज्ञ कतिपय विशिष्ट सक्षम सुपात्र व्यक्ति द्वारा विशिष्ट संकल्पों के साथ विशिष्ट यज्ञानुष्ठान के रूप में विशिष्ट अवसरों पर सम्पन्न किए जाने वाले विशिष्ट यज्ञ बताए गए हैं। इन यज्ञों में भी अति विशिष्ट है ‘सौत्रामणि यज्ञ’; इसलिए कि यह राष्ट्र के सर्व जन (प्रत्येक राष्ट्रिक) द्वारा राष्ट्र-कल्याण हेतु किया जाने वाला राष्ट्रीय महत्त्व का यज्ञ है। इस प्रकार ‘सौत्रामणि यज्ञ’ एक सामुदायिक यज्ञ है जबकि पंचमहायज्ञ वैयक्तिक स्तर पर किए जाने के बावजूद सामुदायिक एवं सामाजिक परास से संधानित किए गए हैं। कुल मिला कर कह सकते हैं कि प्रत्येक गृहस्थ के लिए अपरिहार्य सामान्य दैनिक अभिकर्म बताए जाने और धार्मिकता का सम्पुट प्रदान करते हुए प्रत्येक जन, विशेषकर प्रत्येक गृहस्थ, की दैनिक दिनचर्या में इन पंच-महायज्ञों को समेकित करने का प्रकट लक्ष्य एक ओर मनुष्य को ज्ञान-विकास की ओर उन्मुख करने और उसे सात्त्विक, सद्-सांस्कारिक बनाने के सदाशयी सामाजिक सांस्कारिक सद्-लक्ष्यों से आतृप्त है, दूसरी ओर, प्रसंगित पंचमहायज्ञ मानव-आचरण में वस्तुनिष्ठतया दकारत्व या/और दैवीयता की संस्थापना कर उसे देवत्व की ओर अग्रसर करने की उद्भावना से भी समेकित हैं। पंच-महायज्ञ का प्रत्यय मानव में ऊर्ध्ववाही परोन्मुखता उत्पन्न करने का कारक, परम मानवीय, लोकहिती औ...र, सार्वहिती प्रत्यय है।
कह सकते हैं कि आविश्व परम स्वार्थवादी आपाधापी के वर्तमान युग में पंच यज्ञ का प्रत्यय देश, जाति, धर्म से परे प्रत्येक व्यक्ति को परार्थवादी मानसिकता से ओत-प्रोत करके महान् सदाशयी सात्त्विक क्रान्ति कारित कर सकता है, जो वैश्विक स्तर पर भी सार्वहिती होगा। तेनेव, सनातन भारतीय या कि हिन्दू प्रत्यय होने के बावजूद इस परार्थवादी सर्वकल्याणक ‘पंच महायज्ञ’ प्रत्यय को यथाशीघ्र आविश्व अपनाया जाना चाहिए। निःसन्देह, इस प्रत्यय को सार्वजनीन संस्तर पर आविश्व अपनाए जाने से आविश्व सर्वतोभद्र सर्वकल्याण ही साधित होगा।
जन्मजात ऋण
अनेक ख्यात समाजशास्त्रज्ञ ‘अध्यात्मवाद’, ‘कर्मफल एवं पुनर्जन्म सिद्धान्त’, ‘अवतारवाद’, ‘पुरुषार्थ-चतुष्टय’, ‘वर्ण-व्यवस्था’, ‘आश्रम व्यवस्था’, ‘पंच महायज्ञ’ के समरूप ‘जन्मजात ऋण’ को भी भारत के सनातन धर्म-संस्कृति के वैशिष्ट्यों में प्रमुख वैशिष्ट्य बताते हैं।
वस्तुतः बहुसंख्य भारतीय समाज की उपरि-इंगित विशिष्टताएँ ऐसे भारतीय सांस्कृृतिक वैशिष्ट्य हैं, जो आविश्व अन्य कथित सभ्य समाज/संस्कृति/समुदाय में प्रायः अलभ्य हैं। परन्तु ऐसे वैशिष्ट्य, ऐसे प्रत्यय महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट मात्र इसलिए नहीं हैं कि अन्य देश-समाज में अलभ्य हैं ये, व...र...न् इनकी महत्ता सर्वस्वीकार्य इसलिए हैं कि ये सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, पर्यावरणिक फलकों पर व्यावहारिक रूप में वस्तुगततः सदाशयी, सार्वोपयोगी होने के साथ-साथ आध्यात्मिक फलक पर भी सार्वहिती एवं सार्वकल्याणकारी हैं।
बताते चलें कि भारत की बहु-बहुसंख्यक जनता हिन्दू मतावलम्बी र्है जो सामान्यतया जन्मतः धर्मालु , सात्त्विक, सदाशयी, ऋतशील, नयशील और सर्व-कल्याणक है। हिन्दू धर्म और संस्कृति मोक्षकामी भी हैं।
बहुसंख्यक भारतीय समाज में मनुष्य-जीवन का अन्तिम पुरुषार्थ एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य ‘मोक्ष’ माना जाता है। दूसरी ओर, मोक्ष-प्राप्ति के लिए मानव की जीवात्मा को सर्वदृष्टि से ‘ऋणमुक्त’ होना अति-अति आवश्यक बताया गया है। सभी प्रकार के ऋण मनुष्य के मोक्ष में बाधक होते हैं। इसप्रकार वे ऋण जो प्रत्येक मानव पर जन्मजात आयत्त माने जाते हैं, और जो जन्मकाल से पूर्व के जन्मांे के कृत कर्म के आधार पर जन्मजात होने के ब्याज से उन्मोच्य माने जाते हैं (जिनके बारे में निम्नांकित प्रस्तरों में किंचित् विस्तार से विवेचना प्रस्तुत है)-- उनसे पूरी तरह ऋणमुक्ति मोक्ष-प्राप्ति हेतु वांछनीय हो जाती है। इसीलिए भारतीय वाङ्मय में मानव द्वारा मोक्ष प्राप्त करने के लिए सभी जन्मजात ऋणों से मुक्ति अति आवश्यक मानी गई है। यथा-
ऋक् 8/47/17 में कहा गया है- “ ऋणं सन्नयामसि .....”।
गृह्यसूत्रों में भी ऋण-मुक्ति पर बल दिया गया है।
‘मनुस्मृति’ के छठवें अध्याय में भी ऋण से उन्मोचन अत्यावश्यक बताया गया है- “ऋणानि त्रीण्यपाकृत्यमनो मोक्षे निवेशयेत्। अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः।।35।।” ख्तीनों ऋणों (पितृ ऋण, ऋषि ऋण, देव ऋण) को चुकाने के बाद ही व्यक्ति को मो़क्ष पाने के प्रयत्नों में लगना चाहिए। इन ऋणों से उबरे बिना मोक्ष पाने की इच्छा रखने वाले का अघःपतन हो जाता है,।
‘तैतिरीय ब्राह्मण’ ( 3/7/9/8) में पितृ ऋण एवं ‘अथर्ववेद’ (6/117/3) में ‘पितृ ऋण’ सह ‘देव ऋण’ से मुक्त होने सम्बन्धी विस्तृत चर्चा है।
‘शतपथ ब्राह्मण’ (1/7/2/11), ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ (33/1), ‘तैत्तिरीय संहिता’ (6/3/10/5) आदि में भी उक्त तीनों ऋणों से मुक्ति वांछनीय बताई गई है और इन ऋणों से मुक्ति के उपाय भी बताए गए हैं।
जन्मजात ऋणों से मुक्ति के निदेशन भरपूर परिव्याप्त हैं हमारे धार्मिक कर्मकाण्डों में। सामान्यतया ‘देव ऋण’ से मुक्ति के लिए यज्ञ, तप आदि सत्कर्मों के निष्पादन को, ‘पितृ ऋण’ से मुक्ति के लिए सन्तानोत्पत्ति को तथा ‘ऋषि ऋण’ से मुक्ति के लिए ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन-अध्यापन, तद्गत ज्ञान-विज्ञान के सम्प्रसार का निर्देश प्रमुखतया निदेशित है अनेकानेक भारतीय ग्रंथों में। ‘मनुस्मृति’, अध्याय 6 में इस सन्दर्भ में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं -
“अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः।
इष्ट्वा च शक्ति तो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत्।।36।।”
अर्थात् विधि-विधान के अनुसार वेदाध्ययन करने के बाद विवाह करके संतान को जन्म देकर और अपनी सामर्थ्यानुसार यज्ञों का सम्पादन करके तीनों ऋणों (अर्थात् ‘सन्तानोत्पत्ति द्वारा पितृ ऋण, ज्ञान-प्रसार द्वारा ऋषि ऋण, यज्ञादि के अनुष्ठान द्वारा दैव ऋण’) से मुक्त होने के बाद ही व्यक्ति को मोक्ष हेतु प्रयत्न करने चाहिए।
इतना ही नहीं, अपितु भारत के ‘ऋणमोचन तीर्थ’ एवं प्रायः सभी प्रमुख तीर्थों में नदी-तीर पर ‘ऋणमोचन घाट’ की विद्यमानता, साथ ही, पितृ पक्ष, पितृ यज्ञ, पिण्डदान आदि की अवधारणा एवं तद्गत अभिकर्म और ऐसी समस्त अवधारणाओं आदि की व्यापक जन-संस्वीकृति ‘ऋणमोचन-वांछा’ को और समाज की तद्गत व्यापक व्यावहारिक संस्वीकृति को इंगित करने में सक्षम है। इसी प्रकार पूजन, यजन (यज्ञ), विद्याध्ययन आदि की लालसा एवं तीर्थों, मन्दिरों में दान देने की परम्परा से भी जनमानस में पैठी प्रसंगित ऋण-मुक्ति की अभीप्सा ही मुखरित होती है।
और तो और, संदर्भगत ऋणों से मुक्ति की वांछा को अपरिहार्य मानने का ही प्रमाण है कि फलित ज्योतिष में ‘पूर्वजन्म/पूर्वजर्न्मों में ऋण-अदायगी नहीं किए जाने के दुष्फलित’ के रूप में जन्म-कुण्डली में ‘कालसर्प-योग’ कारित बताया गया है। ज्योतिषज्ञ बताते हैं कि कालसर्प योग से मानव को वर्तमान जन्म में अनेकानेक कष्ट, अनायास धन-हानि, अकारण यश-क्षति, कार्य-निष्पादन में विविध बाधाएँ, असफलताएँ आदि झेलनी पड़ती हैं, जो ऐसे जातक द्वारा पूर्वजन्म में प्रसंगित जन्मजात ऋणों की अदायगी नहीं किए जाने के आधार पर कारित होती हैं। ऐसी अवधारणाएँ भी जन्मजात ऋणों के प्रत्यय और उसकी अदायगी की वांछा को दृढ़ता से सुस्थापित करती हैं।
सिद्धान्ततया ‘जन्मजात ऋ़ण’ वाली अवधारणा भारतीय अध्यात्म के ‘कर्मफल एवं पुनर्जन्म सिद्धान्त’ से सम्बन्धित है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवात्मा को मानव-जन्म उसके द्वारा ‘पूर्वजन्मों में कृत कर्मों के समुच्चय में से कतिपय कर्मों के विपाक के भोग हेतु तथा सत्कर्म-निष्पादन हेतु प्राप्त होता है। मानव ‘सृष्टि’ के जिस स्थल (देश/राष्ट्र) में जन्म लेता है और बचपन से लेकर मृत्यु तक वह सृष्टि की जिन-जिन चेतन-अचेतन सत्ताओं के संपर्क में आता है, उन सभी से उसका ‘विभिन्न जन्मों में कृत कर्मों से उत्पन्न कर्म-बन्धन’ अर्थात् ‘ऋण के लेन-देन का सम्बन्ध’ अवश्य रहता है।
यहीं जानना समीचीन है कि हम ‘ऋण’ शब्द का अर्थ प्रायः दूसरे को उधार दिए गए धन की वापसी की वांछा वाले ‘ऋण’ से ही समझते हैं, परन्तु अध्यात्म की दृष्टि में सृष्टि की जीवित-अजीवित सत्ताओं के साथ द्रव्य (वस्तु/धनादि) के लेन-देन के अतिरिक्त उन सभी मानसिक, वाचिक, संकल्पित एवं शरीर द्वारा कारित कार्यों से उत्पन्न फलित भी ‘ऋण’ अर्थात् ‘कर्म-बन्धन’ होते हैं, जिनके प्रदेय का न्यायोचित प्रतिदान हमारे द्वारा सम्बन्धित जीव/व्यक्ति को पूर्वजन्मों में एवं वर्तमान जन्म में नहीं दिया गया है।
अपरांचतया, जन्मजात ऋण मात्र पूर्वजन्मों के ही नहीं होते, वरन् वर्तमान जन्म में भी मानव मनसा-वाचा-कर्मणा अनेकानेक कार्य निष्पन्न करता है। इन कार्यों के परिप्रेक्ष्य में मानव को अपने पुरुषार्थ के साथ-साथ अनेक व्यक्तियों के सहयोग, वर्तमान ज्ञान के निमित्त पूर्व ऋषिगण के कृत कर्म तथा दैवीय सहायता आदि अनेकशः कथ-अनकथ, चाहे-अनचाहे लेनी ही पड़ती है। हमारे कार्यों के निष्पन्न होने में भी अनेक नकारात्मक और सकारात्मक फलित (कर्म-बन्धन/ऋण) उत्पन्न होते रहते हैं। ये कर्म-बन्धन ही जन्मजात ऋण हैं। द्वितीयतः, मानव के द्वारा विभिन्न कर्म-निष्पादन में पूर्व मनीषियों द्वारा आविष्कृत विविध ज्ञान (जो वर्तमान में उपलब्ध है) के साथ-साथ वर्तमान परिवेश एवं तद्गत पारिस्थितिकी के विनिर्माण आदि के सन्दर्भों में अन्यान्य व्यक्ति, समुदाय, समाज, राष्ट्र एवं राष्ट्रभूमि के भी पूर्वकृत एवं वर्तमान योगदान को नकारा नहीं जा सकता। तृतीयतः, मानव को अपना शरीर भी और इस शरीर हेतु आवश्यक पालन-पोषण एवं विकास भी किसी अन्य जीव (यथा माता-पिता आदि) के माध्यम से ही प्राप्त होता है। जीवनदाता माता-पिता एवम् पूर्वकृत ज्ञान के आविष्कारक मनीषीगण आदि के उपरि-इंगित अवदानों का प्रतिदान यदि उस (सम्बन्धित मनुष्य) के द्वारा प्रतिदानित नहीं किया जाता तो ऐसे सभी जन के प्रसंगित आदान, सहयोग, अवदान मानव पर ‘ऋण’ के रूप में प्रतिदान-योग्य हो जाते हैं। इस तरह, मानव-शरीर के अस्तित्व में आते ही और तदुपरान्त विविध कर्मों के निष्पादन में मानव पर अनेक ज्ञात-अज्ञात ‘ऋण’ जन्मजात आयत्त हो जाते हैं, होते रहते हैं। भारतीय अध्यात्म के अनुसार सभी जन्मजात ऋणों (कर्म-बन्धन) को यदि हम वर्तमान जन्म में ही नहीं चुका देते हैं, तो ऋण-भुगतान के लिए हमें पुनः पुनः जन्म (पुनर्जन्म) लेना पड़ता है। भारतीय मनीषा यह भी मानती है कि मानव-शरीर में जन्म लेना ही जीवात्मा के लिए सृष्टि में उसके पूर्वजन्म के और वर्तमान जन्म के ऋणों की अदायगी का एक अवसर होता है, शेष जीवों के शरीर में जीवात्मा का जन्म तो उसके पूर्वजन्मों में कृत कर्मों के फल को भोगने के लिए ही होता है।
औ...र, हिन्दू धर्म के अनुसार किसी से कुछ प्राप्त करने के पश्चात् प्रतिदान में प्रति-उपकार यदि तत्काल या कालान्तर में अवदानित नहीं किया जाए, तो जब तक प्रतिदान किसी भी रूप-स्वरूप में प्रतिदानित या अवदानित नहीं किया जाता, तब तक की अवधि (जो प्रतिदान न दिए जाने की दशा में पुनर्जन्म तक प्रस्तारित हो सकती है) के लिए उपकृत व्यक्ति ‘सम्बन्धित कथ-अनकथ ज्ञात-अज्ञात कृतित्व’ और तत्सम्बन्धी उपकार के लिए संदर्भगत उपकारकर्त्ता का ऋणी रहता है। तथैव, वर्तमान जन्म में नवीन ‘कर्म-बन्धन’ अर्थात् ‘ऋण’ फलित न हों, इसके लिए भी वर्तमान जन्म में उपकारकर्त्ता के प्रति आभार के रूप में कृतज्ञता-ज्ञापन के साथ-साथ प्रसंगित ऋण का त्वरित प्रतिदान वांछनीय’ माना जाता है हिन्दू धर्म-संस्कृति -समाज में।
प्राचीन भारतीय वाङ्मय में आरम्भतया उपरि-अंकित तीन प्रमुख ऋणों (देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण) की ही चर्चा है। इन ऋणों को त्रिदेवों से सम्बन्धित बताया गया है। ‘देव ऋण’ सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा से, ‘पितृ ऋण’ सृष्टिपालनकर्त्ता विष्णु से और ‘ऋषि ऋण’ सृष्टि में ज्ञान-विज्ञान के प्रसारकर्त्ता महेश (महादेव) से सम्बन्धित है। इनकी समुचित अदायगी नहीं होने से सम्बन्धित देवता के कुपित होने की आशंका भी भारतीय वाङ्मय में वर्णित है। कालान्तर में, भारतीय वाङ्मय में अन्य अनेक प्रकार के जन्मजात ऋणों का भी उल्लेख मिलता है, यथा- गुरु ऋण, मातृ ऋण, मातृभूमि ऋण, ब्रह्मा ऋण, विप्र ऋण, अतिथि ऋण, मानुष ऋण/मनुष्य ऋण, भूत ऋण आदि जबकि ऋक् युग में मानव पर जन्मजात दो ही ऋण --देव ऋ़ण और पितृ ऋण-- स्वीकार किए गए थे। बाद में प्राचीन भारतीय मनीषी प्रमुख ऋण मात्र तीन मानने लगे थे- ‘पितृ ऋण’, ‘देव ऋण’, ‘ऋषि ऋण’। प्रतीततया आरम्भतः शेष उपर्युक्त ऋणों को इन्हीं तीन ऋणों में से किसी न किसी एक ऋण में पश्यन्ती स्वरूप में अन्तःभावित माना गया था। समय-समय पर आवश्यकता अनुभूत होने पर इन्हें वैखरी में स्वतंत्रतया बढ़ाया भी जाता रहा है।
तथ्यतया सन्दर्भगत ‘ऋणों की व्यवस्था’ सामाजिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और मनुष्य में मानुष भाव एवम् परोन्मुखता, सामाजिकता, ऊर्ध्ववाहिता आदि के भावानुभाव बनाए रखनेे सदृश परिप्रेक्ष्यों में महत्त्वशील भी है, अतएव संदर्भगत जन्मजात ऋणों को किंचित् विस्तार से देखें -
देव ऋण: वैदिक ग्रंथ, ब्राह्मण ग्रंथ, सूत्र-ग्रंथ और प्रायः सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय में देव-ऋण की अदायगी प्रथमतः आवश्यक बताई गई है जिसके लिए ब्रह्म/परमात्मा/ईश्वर पर आस्था रखते हुए कल्याणकारी कर्म, यज्ञ-कर्म आदि सात्त्विक अभिकर्मों का निष्पादन वांछनीय होता है। देव ऋण की अदायगी को प्रथम वरीयता संभवतः इस आधार पर प्रदान की गई कि भारतीय मान्यता के अनुसार सभी पुरुषार्थ देवकृपा के सम्बल से ही निष्पन्न किए जा सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार मानव के प्रसंगित कर्मक्षेत्र में वांछित सफलता हेतु 5 तत्त्व ‘कारक’ की भूमिका का निर्वहन करते हैं। इन कारकों में ‘दैवकृपा’ प्रधान है। हिन्दू धर्म में ‘देव’ की परिकल्पना अत्यन्त विशद है। ये देव सर्वाधिक सत्त्वशील और द-कारी होने से ईश्वर/ब्रह्म के निकटतम एवं उसके समरूप पूज्य माने जाते हैं। संसार सुचारु रूप से प्रगतिमान रह सके इस निमित्त भी सत्त्वशील सर्व-कल्याणक दैवीय शक्तियों का जीवन्त बना रहना आवश्यक माना गया यहाँ। डॉ॰ विद्यानिवास मिश्र की कृति ‘हिन्दू-धर्म: जीवन में सनातन की खोज’ के अनुसार- “देवता की भावना जिस रूप में हिन्दू धर्म में है, वह जीवन के प्रत्येक क्षण के साथ जुड़ी हुई है। प्रत्येक स्थान, प्रत्येक परिधि, प्रत्येक बाह्य और आभ्यान्तर क्षमता का एक देवता होता है और प्रत्येक क्षण या प्रत्येक कण के साथ आदमी जब अपने को इस भाव से जोड़ना चाहता है कि उस क्षण और कण के आगे वह छोटा है, उस क्षण और कण में भी कोई विशेषता है, जिसे उसे पाना है और विनम्र होकर छोटा होकर ही यह पाना संभव है, तब वह देव-सत्ता को महत्त्व देता है और तब वह देव-ऋण चुकाने को तत्पर होता है।” वास्तव में देव सत्ता ही वह इयत्ता है, जो दकारी (दान, दया आदि के गुण वाली) है, दूसरे को कुछ देने को तत्पर होती है; और जो कुत्सादि-दमन के साथ-साथ सत्त्वशीलता, ऋतशीलता, नयशीलता आदि सद्गुणों से भी सहयुजित है -- ऐसी देव-सत्ता से प्रेरित होकर मानव भी दूसरे को कुछ देने एवं कुत्सादि मनोविकारों का दमन करने को तत्पर होता है। प्रतीततया प्रसंगित दैवीय गुणों को अपरिहार्यतया अंगीकार करने और तद्गत दैवीयता के समुचित प्रसार के हेतुक से ‘देव ऋण’ का प्रत्यय स्थापित किया गया है।
पितृ ऋण: ऋक् युग-प्रणीत द्वितीय ऋण है ‘पितृ ऋण’। समस्त सांसारिक कर्मों के निष्पादन के लिए प्रथमतः मानव-शरीर की आवश्यकता होती है, जो मानव को माता-पिता के माध्यम से ही प्राप्त होता है। इस शरीर का प्रारम्भिक पालन-पोषण भी सामान्यतया माता-पिता द्वारा ही किया जाता है। इस प्रकार माता-पिता द्वारा कृत अनकथ उपकार के प्रतिदान की आवश्यकता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। तथैव, नैतिक दृष्टि से ‘पितृ ऋण’ भी प्रथम कोटि में महत्त्वशील हो जाता है। ‘पितृ ऋण’ के सम्बन्ध में डॉ॰ विद्यानिवास मिश्र अपनी कृति ‘हिन्दू धर्म: जीवन में सनातन की खोज’ में लिखते हैं- “पितृ ऋण का वास्तविक अर्थ है ‘परिवार के प्रति दायित्व-बोध’। आदमी अपने आप में (सामाजिक) इकाई नहीं है। वह परिवार में संयुत होकर ही (सामाजिक) इकाई बनता है। हिन्दू ‘परिवार’ को समाज की सबसे छोटी इकाई मान कर चलता है, ‘व्यक्ति’ को नहीं।” इसीलिए माता-पिता को सम्मान, भरण-पोषण आदि के प्रदान के साथ-साथ सामाजिक दृष्टि से ‘परिवार’ को भी प्रमुखता दिए जाने के क्रम में ‘पितृ ऋण’ की अदायगी हेतु पुत्रोत्पत्ति को महत्त्व प्रदान किया गया यहाँ, जिससे वंश-परम्परा और मानव-अस्तित्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी अस्तित्वमान रहे। प्रतीततया पुत्रोत्पत्ति के साथ ही पुत्र को पारिवारिक दायित्व वहन करने योग्य क्षमतावान् बनाने के साथ-साथ सम्पूर्ण परिवार के प्रति दायित्व-निर्वहन को नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना गया। इसीलिए ‘पितृ ऋण’ से समुचिततः उऋण होने के लिए पितृ-धर्म (पुत्रोत्पत्ति के साथ-साथ सन्तान का समुचित पालन-पोषण, साथ ही परिवारीजन के प्रति कर्त्तव्यों का समुचित निर्वहन) आपूर्त्त करना वांछनीय माना गया जिससे पारिवारिक दायित्व-निर्वहन एवं परिवारीजन जन के भरण-पोषण की व्यवस्था व्यवस्थित रूप में चलती रहे। प्रकटतया ‘पितृ ऋण’ में ही पितृ गण (पूर्वजगण) के ऋण को भी अर्थात् उनके बकाया ऋणों की अदायगी और पूर्वजों के प्रति सम्मान, कुल परम्परा आदि के सम्मान को भी समेकित माना गया यहाँ। इस प्रकार, पुत्रोत्पत्ति और उत्पन्न पुत्र/सन्तान के भरण-पोषण, शिक्षा आदि के प्रति दायित्व-निर्वहन करने के साथ-साथ परिवार के सभी सदस्यगण के प्रति दायित्व-निर्वहन और कुल-परम्परा, कुल-देवता आदि का समुचित सम्मान एवं अपने परिवार के एवं परिवार से इतर समाज के वृद्ध-जन के प्रति भी समुचित सम्मान अर्पित करके पितृ ऋण से उन्मोचन को अपरिहार्य प्राप्तव्य बताया गया है यहाँ। तथ्यतया पूर्वजगण, वृद्धजन (दादी-बाबा, नानी-नाना और उनके पूर्वजगण आदि), माता-पिता, कुल परम्परा आदि के संरक्षण के साथ-साथ पुत्रोत्पत्ति एवं उसका समुचित पालन-पोषण समाज की प्रथम आवश्यकता है, जिससे प्रसंगित समाज-व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी निर्बाध रूप में गतिमान रह सके।
औ...र, ‘पितृ ऋण’ प्रत्यय से आगे बढ़ने पर वैदिक युग में ही ‘मातृ पूजा’ प्रतिष्ठित होने के देशकाल में ‘मातृ ऋण’ भी प्रत्ययित किया गया। भारतीय मनीषा में जन्मदात्री माता के साथ-साथ अनेक प्रकार की ‘माता’ की कल्पना भी है। यथा- देवमाता (देवताओं की माता), धात्री माता, ज्ञान-प्रदायिनी माता, पोषण-दात्री माता (गौमाता), विमाता (सौतेली माता), धाय (जन्मदात्री स्त्री के स्थान पर दुग्ध-पोषण देने वाली स्त्री), वृद्धा माता, गुरु-माता (गुरु की पत्नी), राजमाता (राजा की माता), कुल-माता (आश्रम-कुल के कुलपति की पत्नी), माता के समवयी स्त्रियाँ यथा- मौसी, मामी, बुआ, चाची, ताई आदि तथा पूर्वज स्त्रियों में नानी (‘माता की माता’), दादी (पिता की माता) आदि। इन माताओं के प्रति सम्मान, उनके प्रति दायित्व-निर्वहन आदि में कोई भेद नहीं रखने का कथ-अनकथ विधान भी चलन में था। वाल्मीकीय रामाख्यान में राम अपनी विमाताओं में कोई भेद करते नहीं दिखते हैं। पाषाणरूपिणी शापित‘ अहल्या का उद्धार वे ‘माता’ कह कर ही करते हैं। इसप्रकार त्रेता युग तक मातृ-महत्ता पूर्णतया सुस्थापित दिखती है।
वस्तुतः, सन्तान के जन्म में पिता के साथ-साथ माता का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। गर्भधारण, शिशु-पोषण, लालन-पालन, प्रारम्भिक शिक्षा, परम्परा ज्ञान आदि के परिप्रेक्ष्योें में माता का अवदान अधिक महत्त्व का होता है। इसीलिए माता की पूजा (माता का समुचित सम्मान और उसके समुचित भरण-पोषण और संरक्षण द्वारा उसे संतुष्ट रखना) को कम महत्त्व का नहीं माना गया यहाँ। इसीलिए भारतीय ऋषियों ने पिता के साथ ही माता को भी देव-स्थान प्रदान किया है- “मातृ देवो पितृ देवो भव.....।” ऋग्वेद में ‘देवी सूक्त’ की विद्यमानता से भी प्रकट है कि ऋक् युग में देवि-सत्ता का स्वतंत्र अस्तित्व और उन्हें सम्यक् सम्मान, पूजा आदि का पूज्य स्थान दिया गया है। प..र..न्तु , प्रतीतितया पिता से माता को अविभाज्य माने जाने के ब्याज से माता को देवी समान पूज्या मानने के बावजूद तत्कालीन देश-काल में ऋग्वैदिक मनीषियों ने ‘मातृ ऋण’ की स्वतंत्र इयत्ता घोषित नहीं की थी और मातृ ऋण को ‘पितृ ऋण’ में अन्तर्भावित मान लिया। मातृ की इयत्ता को पितृ के साथ समेकित मानने के अनेक उदाहरण हैं। यथा- कर्मकाण्डीय व्यवस्था में पितृपक्ष में पिता एवं पूर्वजों के तर्पण के साथ-साथ माता के लिए भी तर्पण अर्पित किया जाता है। गया तीर्थ क्षेत्र में पिण्डदान में पिता हेतु पिण्डदान के समय मातृ-पिण्डदान की भी परम्परा है। वर्ष-गणना में आश्विन कृष्णपक्ष को पितृपक्ष तो कहा जाता है, लेकिन मातृ पक्ष नामक पक्ष, मास या दिन स्वतंत्रया प्रकल्पित नहीं है प्रत्युत पितृपक्ष में ही माता तथा मातृकुल-पितृकुल के पूर्वजों का तर्पण आदि भी प्रावधानित है। इसी तरह ‘पितृ दोष’ में ‘मातृ दोष’ को भी परिगणित किया जाता है। मातृसत्ता की प्रधानता वाले समाजों में भी पितृसत्ता से अविभाज्य मानी गई है मातृ सत्ता। वास्तव में ऐसे प्रकरणों में मातृ सत्ता विलोपित नहीं, वरन् पितृसत्ता में अन्तर्भावित इयत्ता मानी गई थी। तदनुसार ‘मातृ ऋण’ को स्वतंत्रतया आरम्भतया गण्य नहीं किया गया था। कालान्तर में परिस्थितियाँ बदल गईं औ..र उसके फलित से ‘देवी सूक्त’, ‘मार्कण्डेय पुराण’, ‘देवी भागवत’ आदि में और बौद्ध सम्प्रदाय के तंत्र-ग्रंथों में मातृ पूजा/शाक्त पूजा को सविस्तार प्रावधानित किया गया, जिसका प्रारम्भ ऋक् के उत्तरकाल से प्रारम्भित माना जा सकता है। ऋग्वैदिक ऋषि पराशर वैदिक-शाक्त सम्प्रदाय के थे। संभवतः उन्हीं के काल में आरम्भित हो गई थी ‘शाक्त पूजा’ या कि ‘मातृ पूजा’। डॉ॰ राजबली पाण्डेय के अनुसार भारतवर्ष में एक समय ऐसा भी था, जब सारा भारत शाक्त मत (वैदिक-अवैदिक तांत्रिक शाक्त मत) का अनुयायी था (देखें ‘शाक्त’: हिन्दू-धर्म कोश: डॉ॰ राजबली पाण्डेय)। संभवतया उसी कालखण्ड में ‘शाक्त पूजा’ का सात्त्विकीकरण एवं सामाजीकरण करने के देशकाल में ‘मातृ-ऋण’ नामक ऋण स्वतंत्र ऋण के रूप में वैदिक शाक्त मनीषियों द्वारा प्रकल्पित किया गया।
औ...र, सघन गहन अनुशीलन से स्पष्ट होगा कि वैदिक ऋषि आरुणि उद्दालक के पितामह ऋषि-प्रवर अरुण द्वारा रचित ‘अरुण संहिता’ (जो वर्तमान में ‘लाल किताब’ के नाम से उपलब्ध है) में ‘पितृ ऋण’ के साथ-साथ ‘मातृ ऋण’ के बारे में विशद स्वतंत्र उल्लेख है। महर्षि अरुण लंकापति रावण के गुरु थे। प्रतीतितया महर्षि अरुण के देशकाल में ‘मातृ पूजा’ स्वतंत्र रूप में भरपूर प्रचलित थी। ‘मातृ शक्ति’ की स्वतंत्र उपासना दैत्य कुल एवं राक्षस कुल में बहुप्रचलित भी थी। दैत्य कुल और राक्षस कुल के इतर भी मिथिला के राजा जनक की भूतल-दुहिता जनकसुता सीता द्वारा माँ भवानी की पूजा करने के वाङ्मयिक साक्ष्य भी हैं। मिथिला में मातृ-शक्ति के केन्द्र ‘देवी मन्दिर’ की विद्यमानता के वाङ्मयिक साक्ष्य लभ्य हैं। तदेव, प्रतीततया मातृपूजा भारत में अति प्राचीनकाल से प्रचलित मानी जा सकती है।
ध्यातव्य है कि ऋक् में देवी पूजा और त्रिदेवियों की अभ्यर्थना वर्णित है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विचारक, कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के अभिमत के अनुसार भी आर्य-अनार्य के बीच समन्वय स्थापित करने के युग में अनार्याें की मातृ-शक्ति को प्रमुखतया पूजित करने की प्रथा को आर्यों द्वारा स्वीकार किया गया। इस तरह मातृशक्ति-पूजा सर्वस्वीकार हुई (देखें प्रतिनिधि निबन्ध: रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली)। इस तरह ‘मातृ पूजा’ का इतिहास अति प्राचीन सिद्ध होता है। ‘मातृ-पूजा’ के प्राबल्य के कालखण्ड में मातृ-शक्ति के प्रति सम्मान को अति महत्त्व दिया जाना, तथैव, ‘मातृ-ऋण’ की स्वतंत्र प्रकल्पना स्वाभाविक है।
औ...र देखें -
- तैत्तिरीय उपनिषद् में स्वतंत्र रूप में ‘मातृ देवो भव’ का निदेशन है। प्रतीतया उस समय तक मातृ सत्ता स्वतंत्र रूप से सुस्थापित हो चुकी थी।
- सूत्र ग्रंथों में भी माता-सम्बन्धी कर्त्तव्यों के निर्वहन के क्रम में प्रभावकारी निदेशन हैं। ऐसे निदेशनांे से कभी अन्तर्भावित स्वरूप में, तो कभी स्वतंत्र स्वरूप में, प्रभावशील माना गया ‘मातृ ऋण’ को।
- शैव-जगत् के अनुसार शक्ति (मातृ-शक्ति के आदिरूप: आदिशक्ति) के अभाव में (प्रतीक रूप में छोटी इ की मात्रा ‘ ि ’के अभाव में) शिव भी शव बन जाते हैं।
- शाक्त जगत् में तो आदि-शक्ति को माता-स्वरूप में पूज्या माना गया और उसे सृष्टि का कारक भी कहा गया।
- ‘मनुस्मृति’ के अनुसार माता के प्रति कर्त्तव्य-निर्वहन, सम्मान, पोषण, संरक्षण, सेवा-सुश्रूषा आदि अभिवांछित है।
- महाकवि कालिदास माता-पिता दोनों की वन्दना करते हैं। ऐसी वन्दनाएँ, वन्दनागत भावनाएँ और मातृशक्ति की महत्ता मातृ-ऋण के प्रकल्पन को पुष्ट करने में समर्थ है।
- गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में तीन ऋणों की स्पष्ट घोषणा करते हैं- “मातहिं पितहि उऋण भए नीके। गुरु ऋण रहा सोच बड़ नीके।।”
उपर्युक्त चौपाई में संतकवि तुलसीदास ऋषि ऋण के बजाय गुरु ऋण को स्थानिक करते हैं, वहीं, वे देव ऋण के बजाय पितृ ऋण के साथ मातृ ऋण को स्वतंत्र इयत्ता प्रदान करते दिखते हैं।
- वर्तमान में भी सामान्य हिन्दू परिवारों में सन्तान के विवाह के समय परम्परा-क्रम में ‘कूप-परिक्रमा’ के समय माता द्वारा अपने ‘ऋण’ की याद दिलाना बहुसंख्यक परिवारों में पारिवारिक प्रथा के रूप में अद्यतन विद्यमान है। इस प्रकार भी मातृ-ऋण की महत्ता स्वतः सिद्ध है। 12वीं सदी से यहाँ मुस्लिमों का राजनैतिक-सामाजिक आधिपत्य स्थापित हो गया। संयोगात् मुस्लिम समुदाय में भी ‘दूध का कर्ज’ अदा किए जाने का प्रावधान और तद्गत सामाजिक चलन है, जो शब्दान्तर से मातृ ऋण के सम्प्रत्यय को बल प्रदान करता है।
परिस्पष्टतया प्राचीन भारती$य सत्त्वशील मनीषा द्वारा ‘मातृ-ऋण’ का प्रत्यय भारतीय समाज-संस्कृति में वैखरी में अनामित रहने के बावजूद ऋक् युग से ही स्वीकार्य रहा है। त...थै...व, मातृ ऋण को पितृ ऋण में समेकित मानें या स्वतंत्र गण्य स्वरूप में आगणित करें, भारतीय मनीषा के अभिमत से मातृ ऋण की समुचित अदायगी अपरिहार्य है, इसलिए कि वास्तव में मानव-भ्रूण को गर्भ में धारण करने के साथ ही सन्तान का पालन-पोषण करके सृष्टि को उपकृत करने का मूल अभिकर्म माता ही निष्पन्न करती है; साथ ही, शिशु-पोषण से लेकर सन्तान की प्रारम्भिक शिक्षा आदि का तथा पारिवार-संचालन का अवदान माता ही अवदानित करती है, और केवल सन्तान या परिवार के प्रति ही नहीं, अपितु समस्त जीव मात्र के प्रति ममता, करुणा, वात्सल्य, त्याग, प्रेम आदि के कर्त्तव्य-निर्वहन का, साथ ही व्यक्ति एवं समाज को शक्ति-प्रदान, चारित्रिक बल-प्रदान आदि का दायित्व ‘मातृस्वरूपा नारी’ ही आजीवन अवदानित करती है, उसके सापेक्ष ‘नारी जगत् के प्रति सम्मान की भावना’, तथैव ‘मातृ ऋण की उद्भावना’ अति बलवती हो जाती है। इस भावना को निरन्तर सबल बनाया जाना आवश्यक और सर्वथा उपादेय है। तथैव, केवल अपनी जननी माता के प्रति ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण नारी-जगत् के प्रति पुरुष द्वारा समुचित सम्मान के भाव वस्तुनिष्ठतः संस्कारित करने के निमित्त भी उपयोगी है ‘मातृ ऋण’ संज्ञक प्रसंगित जन्मजात ऋण। यतः वर्तमान युग में जब आए-दिन नारी-उत्पीड़न, बलात्कार आदि की बाढ़ बढ़ोत्तरी पर है-- ऐसे युग में ऋण के सम्प्रत्यय से ऋण की अदायगी एवं कारक, आधार आदि के जो नैतिक एवं शास्त्रोक्त तर्क हैं, उनके आधार पर ‘मातृ ऋण’ को स्वतंत्र रूप से आकलित किया जाना और सम्यक् मान देना अति आवश्यक है और सर्वथा उपादेय भी।
ऋषि ऋण/गुरु ऋण: तैत्तिरीय ब्राह्मण के एक मंत्र में जन्मजात ऋणों में ‘पितृ ऋण’, ‘देव ऋण’ के साथ ‘ऋषि ऋण’ भी नामित किया गया। इस ऋण की अदायगी हेतु ऋषिगण (शब्दान्तर से विद्वत्गण) का समुचित सम्मान, स्वाध्याय द्वारा स्वयं का ज्ञानार्जन एवं विद्या-दान (अध्यापन) द्वारा ज्ञान-प्रसार करके निष्पन्न किया जाना प्रावधानित था। ज्ञान-विस्तार होने की दशा में इस यथार्थ को गम्भीरता से अनुभूत किया गया कि मानव अपने पुरुषार्थ चतुष्टय को प्राप्त करने हेतु उपलब्ध पूर्वकृत विविध आयामी ज्ञान एवं पारिवेशिक अवस्थितियों के ज्ञान से लाभान्वित होता है। ज्ञान के विविध आयामों के ऐसे अवदान तत्कालीन देश-काल में ऋषिगण द्वारा ही अवदानित किए जाते थे। तथैव, प्रसंगित ज्ञान (सांसारिक ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान, सभ्यता-विकास के भौतिक ज्ञान आदि) को अवदानित करने वाले ज्ञात-अज्ञात ऋषिगण का ऋण ‘ऋषि ऋण’ के नाम से मानव पर जन्मजात आयत्त होना प्रकल्पित किया गया। और, वहीं मानव को प्रायः लभ्य ज्ञान को व्याख्यायित करके वस्तुनिष्ठतया समझने और आत्मस्थ करने की प्रविधि बताने के लिए किसी वरिष्ट ज्ञानवान् व्याख्याता की आवश्यकता होती है जो स्वयं में गुरु-गम्भीर ज्ञान से संतृप्त होता है। ऐसे व्याख्याता/शिक्षक के को ‘गुरु’ की संज्ञा दी गई है। कालान्तर में, ऋषि-परम्परा का निर्वहन एक सीमा तक उपरि-इंगित ‘गुरु जन’ द्वारा किया जाने लगा। तेनेव, ‘ऋषि ऋण’ का अन्तर्भाव ‘गुरु ऋण’ के रूप-स्वरूप में स्वतः अन्तर्भावित हो गया। महाभारत युग में गुरु-ऋण की महत्ता सर्व-स्वीकार मानी गई थी। ‘गुरु ऋण’ का समुचित प्रतिदान भी ज्ञानीजन, गुरुजन के प्रति समुचित सम्मान और अध्ययन के साथ-साथ ज्ञान-प्रसार करके ही प्रतिदानित किया जा सकता है। इस तरह, ‘गुरु ऋण’ वास्तव में ‘ऋषि ऋण’ का ही अपर-रूप है। तेनेव, ‘ऋषि ऋण’ या कि ‘गुरु ऋण’ की अदायगी के लिए उपदेशित ज्ञान का अंगीकार, उपदेशित ज्ञान-ग्रहण की प्रविधि का अनुपालन और अपने संस्तर से ज्ञान-प्रसार अध्ययन-अध्यापन आदि का समुचित प्रसार करना ही उपादेय है।
वास्तव में भौतिक, पराभौतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक ज्ञान के अन्वेषण और लभ्य ज्ञान-प्रसार के सतत प्रवहमान बने रहने में गुरु की महत्ता सर्वथा उपादेय है। तथैव, गुरु-ऋण की उपरि-इंगित अदायगी के अतिरिक्त गुरु का समुचित सम्मान, संरक्षण भी ‘गुरु-ऋण’ से मुक्ति हेतु अपेक्षित है।
अन्य ऋण
उपरि-अंकित प्रमुख जन्मजात ऋणों के अतिरिक्त कतिपय अन्य ऋण (ब्रह्मा ऋण, विप्र ऋण, मानुष ऋण, भूत ऋण, अतिथि ऋण) से उऋण होना भी वांछनीय माना है ऋषिक भारतीय मनीषा ने। यथा-
ब्रह्मा ऋण: कतिपय भारतीय मनीषी सृष्टि-रचयिता ब्रह्मा के नाम से ‘ब्रह्मा ऋण’ नामक एक स्वतंत्र ऋण की भी संकल्पना प्रस्तुत करते हैं। भारतीय मनीषियों के अनुसार सृष्टि-निर्माता एवं ज्ञान के प्रथम प्रदाता स्वयं सृष्टि-रचयिता चतुर्मुख ब्रह्मा जी हैं। इस प्रकार ब्रह्मा जी का ऋण तो सृष्टि के प्रत्येक जड़-चेतन पर जन्मतः आयत्त है। यह ऋण वस्तुतः ‘देव ऋण’ का ही एक अपररूप है; तदनुसार उसी में समाहित माना जा सकता है।
विप्र ऋण: ‘विप्र ऋण’ नामक एक अन्य ऋण का उल्लेख महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है। ‘अभ्यासेन विप्रः’ के अनुसार ब्रह्म/ब्रह्मत्व (सत्त्वशीलता, रचनाधर्मिता, उदात्तता, वैराट्य, दैवीयता, ऋतशीलता, शिवशीलता, नयशीलता, ज्ञानशीलता आदि) को अभ्यास में लाने वाले ‘विशिष्ट प्रज्ञायुक्त मानव’: ‘विप्र’ के पास अध्ययन-अध्यापन में निरत रहने के कारण जीवन-निर्वाह हेतु आजीविका उपार्जित करने का अवकाश नहीं था, जबकि मानवीय सद्गुणों का विकास और तद्वत सभ्य मानव-समाज का विकास इसी विप्रत्व से सम्भव था। अतएव, विप्र के भरण-पोषण के लिए और तद्गत चिन्ता से विप्र को मुक्त करने के लिए, साथ ही, लभ्य प्रलाभ के लिए विप्र के प्रति कृतज्ञता प्रतिदानित करने के लिए ‘विप्र ऋण’ प्रावधानित किया गया था।
प्रतीततः यह ‘ऋषि ऋण’ का ही एक अपररूप है ‘विप्र ऋण’ और तदनुसार ‘ऋषि ऋण’ में ही समाहित माना जाने लगा इसे।
मानुष ऋण: वैदिक औपनिषिदिक युग से आगे बढ़ने पर महाकाव्य युग आते-आते भारतीय समाज-व्यवस्था में भारी परिवर्तन आ चुका था। तब तक मानव-पुरुषार्थों के लिए एकल कर्म के साथ-साथ ‘मानव-समूह’ अर्थात् ‘समाज’ की आवश्यकता भी वांछनीय प्रतीत होने लगी थी। त्रेता के दाशरथ राम ने लोक की महत्ता को प्रथमतः हृदयंगम किया था। इसके पहले राजतंत्र में ‘लोक’ या कि ‘सामान्य मनुष्य’ की महत्ता प्रायः नगण्य थी। महाकाव्य ‘महाभारत’ में भी ‘मानुष महत्ता’ को भरपूर मान दिया गया है। गोवर्धन पर्वत-प्रकरण से लेकर स्वयं के प्राणान्त प्रसंग में व्याध के तीर-बेध को स्वीकारने तक श्रीकृष्ण ने सामान्य मानव को उसके कृतकर्म को (व्याध को क्षमा-प्रदान तक में) पर्याप्त मान दिया। महाभारत युग तक वैदिक-औपनिषिदिक ऋषिगण से लेकर अनेक ज्ञानीजन द्वारा विभिन्न ज्ञानानुशासनों का विकास भी हो चुका था, जिसका भरपूर उपयोग एवं उपभोग तत्कालीन समाज में प्रचलित हो चुका था। इस प्रकार मानुष एवं मानुष-समाज की महत्ता महाभारतकाल तक भरपूर सुस्थापित हो चुकी थी। संभवतः इसीलिए महाभारत में ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरो...’ की अवधारणा भी विकसित हुई। महाभारत के आदिपर्व में ही ‘मानुष ऋण’ नामक जन्मजात ऋण भी मानव पर आरोपित किया गया। इसे ही कहीं-कहीं ‘मनुष्य ऋण’ का नाम भी दिया गया है। शतपथ ब्राह्मण 1/7/2/1-6 में भी ‘मानुष ऋण’ का उल्लेख किंचित् विस्तार से उल्लिखित है। ‘साबार ऊपरो मानुष....’ सदृश उक्तियाँ भी मनुष्य की अहमन्यता और मानुषिक इयत्ता को समुचित मान देने के अर्थ की ही द्योतक हैं।
ज्ञात हो कि मानुष गण से ही मानुष-लोक विनिर्मित होता है। लोक से ही हमें जीवननिर्वाह की प्रविधि, परम्परा, मिथक, अनेक संस्कार, अनेक ज्ञान एवं जीवन-निर्वाह में सहायता प्राप्त होती है। ऐसे में व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वरूप में ‘मानुष’ महत्त्वपूर्ण है। ‘मानुष ऋण’ से उऋण होने के लिए मानव-कल्याण वांछनीय बताया गया। भारतीय मनीषा के अधुना प्रतिनिधि डॉ॰ विद्यानिवास मिश्र प्रभृति विद्वानों ने ‘मानव मात्र के प्रति सेवाभाव, दूसरों के प्रति करुणा, व्यापक सद्भाव आदि के अभिकर्म’ को ‘मानुष ऋण’ की अदायगी में वांछनीय बताया है। वस्तुतः लौकिक यात्रा के सुप्रवर्तन और बहुआयामी विकास आदि के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से भी ‘मानुष ऋण’ अति महत्त्वशील है।
ज्ञात हो कि ‘मानुष ऋण’ मनुष्य को भरपूर मान-सम्मान देने, उसका कल्याण करने के क्रम में आयत्त किया गया है प..र..न्तु प्रसंगित ऋण की चुकताई में सुनिश्चित करना आवश्यक है कि व्यक्ति जिसे हम सम्मानित कर रहे हैं, वह मानुष है या अमानुष। वास्तव में तामसी/दुष्कर्मी/अमानुष मानुष के प्रति उदारता हानिप्रद हो सकती है, इसीलिए हमारे वाङ्मयों में ‘मानुष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार सम्मान मानुष भाव को देना है।
भूत ऋण: कतिपय ग्रंथों में ‘भूत ऋण’ भी प्रकल्पित है। वस्तुतः ‘मानुष ऋण’ का व्यापक स्वरूप है ‘भूत ऋण’ इसलिए कि ‘भूत ऋण’ में ‘मानुष ऋण’ का विन्यास-परास वृहत्तर हो जाता है।
प्रसंगित ‘भूत ऋण’ के ‘भूत’ वस्तुतः ‘प्रेत-योनि वाले भूत’ नहीं हैं जिनका ऋण मानव पर आयत्त बताया जाता है। चर-अचर जगत् के सभी सजीव-निर्जीव इयत्ताएँ यथा- मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, जलीय जीवजन्तु, जलीय वनस्पति, स्थलीय वनस्पति, जीवाणु-विषाणु, धरती, नदियाँ, पर्वत, सागर, महासागर, अन्तरिक्ष और ‘जल-थल-नभ में निवास करने वाली समस्त जड़-चेतन भौतिक सत्ताएँ’ संक्षेप में कहें, तो ‘सम्पूर्ण पर्यावरण’ ‘भूत’ माना गया हैं भारतीय वाङ्मय में। ऐसी भौतिक सत्ताओं के अवदान से मानव बहुविध लाभान्वित होता है। इसी आधार पर इनसे सम्बन्धित प्रदेय को ‘भूत ऋण’ का नाम दिया जाना और इस भूत ऋण की अदायगी को अपरिहार्य बताया जाना सारवान् एवं सार्थक है।
ज्ञात हो कि वैदिक मनीषा इस दिशा में पहले से ही जाग्रत थी। वहीं, भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बोस द्वारा पेड़-पौधों को भी ‘जीव’ सिद्ध कर देने के उपरान्त वैज्ञानिक दृष्टि से भी ‘जीव’ की परिधि बहुत बढ़ गई जिससे उसमें प्रथमद्रष्टया अचेतन दिखने वाली सत्ताएँ भी समाहित मानी जाने लगीं। वर्तमान में उपलब्ध एवं निरन्तर वृद्धि-प्राप्त ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से मानव-जीवन के सुरम्य निर्वहन के लिए ‘सुरम्य पर्यावरण’ और अनेकानेक जड़-चेतन इयत्ताओं का होना अपरिहार्य पाया गया है। इस प्रकार, अपने सहज जीवन-निर्वाह के लिए मानव प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण भूत-जगत् (पर्यावरण की समस्त जड़-चेतन इयत्ताएँ) का ऋणी होता है। अतएव, भारतीय मनीषा ने ‘मानुष ऋण’ से भी अधिक आवश्यकता ‘भूत ऋण’ की अदायगी को माना है। संभवतः इसीलिए ख्यात समाजशास्त्री डॉ॰ विभा अग्निहोत्री ने अपनी कृति ‘भारतीय संस्कृति का धार्मिक स्वरूप और वैज्ञानिकता’ में महाभारत-युगीन ‘मानुष ऋण’ से बड़ा कलेवर बताया है ‘भूत ऋण’ का।
तथ्यतः प्रसंगित ‘भूत ऋण’ के प्रति सचेतता के मूल भारतीय संस्कृति में वैदिक युग से ही विद्यमान हैं। प्रत्येक सनातनी/वैदिक/आर्यसमाजी आदि सभी हिन्दू पूजा-अनुष्ठान के आरम्भ में विभिन्न नदियों आदि का आवाह्न करते हैं जबकि पूजा-अनुष्ठान के अन्त में ‘वैदिक शान्ति पाठ’ (‘ओ३म् द्यौः शान्तिः अन्तरिक्ष ँ् शान्तिः पृथिवी शान्तिः आपः शान्तिः ओषधयः शान्तिः; वनस्पतयः शान्तिः विश्वेदेवाः शान्तिः ब्रह्म शान्तिः सर्व ँ् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।’ -- यजुर्वेद, 36/17) के रूप में उवाचनेय है। यह शान्ति-पाठ वर्तमान मंे भी प्रचलित है। यह निरर्थक नहीं है। भूतगत प्रत्येक सत्ता के लिए सम्मान, सर्वं शान्ति की कामना औ...र, प्रकारान्तर से, पर्यावरण सचेतता के साथ प्रत्येक जीवमान के प्रति सद्भाव देखा जा सकता है संदर्भगत ‘शान्ति पाठ’ और अन्यान्य हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों में।
औ...र, वहीं, प्रतिदिन भोजन के समय नियमित रूप से किया जाने वाले ‘बलिवैश्वदेव यज्ञ’ के माध्यम से भी प्रसंगित भूत ऋण (समस्त जीवों के ऋण) का प्रतिदान किया जाना प्रावधानित है।
अतिथि ऋण: महाभारत के अनुशासन पर्व में ही ‘अतिथि ऋण’ नामक ऋण भी उल्लिखित है। ‘अतिथि ऋण’ की आवश्यकता संभवतः इस आधार पर अनुभूत की गई कि बिना पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अचानक आ गए मानव (अतिथि) का भी समुचित सत्कार आवश्यक है। ऐसा न होने पर दुःकाल प्रत्यक्ष होता है। ‘अतिथि-अपमान’ या कि ‘अतिथि का समुचित सत्कार न होने’ के अनेक दुष्परिणामों से ‘भारतीय वाङ्मय’ भरा पड़ा है। प्रतीततया इसी आधार पर अतिथि के समुचित सम्मान के लिए ‘अतिथि ऋ़ण’ की परिकल्पना की गई है। ‘अतिथि देवो भव’ के अनुसार अतिथि तो देवतुल्य माना गया है यहाँ। अतिथि का समुचित सम्मान करके अतिथि-ऋण से उऋण हुआ जा सकता है। व्यावहारतया ‘अतिथि ऋण’ को ‘मानुष ऋण’ प्रत्युत ‘भूत ऋण’ में समाहित माना जा सकता है; माना जाना चाहिए भी। इस ऋण का प्रतिदान करने में सावधानी अपेक्षित है, इसलिए कि ‘अतिथि देवो भव’ का लाभ लेकर कोई भी तमस्शील व्यक्ति या कि आतंकवादी आदि आपके घर या आसपास अतिथि बन कर गम्भीर वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्षति कारित कर सकता है। इसके साक्ष्य इतिहास में लब्ध हैं। त्रेता में दण्डकारण्य में सीता जी को हरने के लिए रावण साधु-वेश में अतिथि बन कर ही आया था। मध्य युग में भी राणा रत्नसेन के अतिथि-सत्कार का लाभ उठा कर ही अचानक उन्हें धोखे से अलाउद्दीन खिलजी ने कैद कर लिया था औ...र शिवाजी यदि चाक-चौबन्द न होते तो अतिथि-शिष्टाचार के नाम पर धोखेबाज मुगल सेनापति अफजल खाँ ने शिवाजी का काम तमाम ही कर दिया होता। इस प्रकार अतिथि ऋण को मानुष ऋण में समाहित मानते हुए वर्तमान के छल-छù के प्रसार के युग में तद्गत ऋण-मुक्ति में भरपूर सावधानी अपेक्षित है।
राष्ट्र ऋण : प्रतिदान-वांछित ऋण-सरणि में एक और महत्त्वशील ऋण है- ‘राष्ट्र ऋण’। नामधेयतः अभिधा में नया होने के बावजूद ‘राष्ट्र ऋण’ एवं तद्गत ऋण भाव जन्मजात ऋणारोपण-सरणि में सर्वथा नया नहीं माना जा सकता इसलिए कि भारतीय मनीषा ने सदैव ‘जन्म-भूमि’ को ‘मातृभूमि’ के रूप में जननी के समकक्ष स्वीकारा है और जननी के समान ही मातृभूमि को भी सम्माननीय एवं पूजा-योग्य माना है। भारतीय मनीषी भारतभूमि/मातृभूमि को माता समान पूज्या की इयत्ता (पूज्या=सम्माननीय, संरक्षणीय, संवर्द्धनीय इयत्ता) प्रदान करने के साथ-साथ मातृभूमि और स्वराष्ट्र के प्रति अनेक कर्त्तव्यों के अनुपालन की स्पष्ट देशनाएँ प्रदान करते रहे हैं। ऋक् में ‘मही’ (धरती) को पूज्या माना गया है। जनजातीय क्षेत्र त्रिपुरा में ‘मही की देवी रूप में पूजा’ आज भी प्रचलन में है। अथर्ववेद स्पष्ट रूप से ‘जन्म देने वाली माता’ के साथ-साथ ‘मातृभूमि’ को भी माता की इयत्ता प्रदान करता है- ‘माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः’। आदि-महाकवि वाल्मीकि माता और जन्मदात्री मातृभूमि को स्वर्ग से भी बढ़ कर महिम्न मानते हैं- ‘जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’। वे ‘देशधर्मस्तु पूजताम्’ की भी बात करते हैं। प्रतीततः प्राचीन भारतीय वाङ्मय में मातृभूमि के प्रति ऋण (मातृभूमि ऋण) या कि ‘राष्ट्र ऋण’ को पश्यन्ती में मातृ-ऋण में अन्तःभावित माना जाता रहा है; जिसे धार्मिक कर्म (धारणीय कर्म) के रूप में स्वीकार किया गया था यहाँ। यहाँ ‘राष्ट्रधर्म’ की इयत्ता/सत्ता भी बहुस्वीकार्य रही है, जो शब्दान्तर से राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्यपालन का बोधक है। इसी का एक वैखरी स्वरूप है ‘राष्ट्र ऋण’।
जिस मही पर हम आवासित हैं, जहाँ से आवास के साथ ही पोषण, संरक्षण आदि भी कथ-अनकथ स्वरूप में प्राप्त करते हैं, उसके प्रति कृतज्ञता-ज्ञापनस्वरूप कतिपय कर्त्तव्य-निर्वहन वांछनीय ही नहीं, अपितु अपरिहार्य माना सात्त्विक भारतीय मनीषा ने। प...र...न्तु उस देश-काल में जब प्राचीनकालीन भारतीय राजा पृथु सम्पूर्ण पृथ्वी के राजा माने गए थे और ‘राष्ट्र’ की इयत्ता में सम्पूर्ण पृथ्वी समाहित थी, तब तत्कालीन देशकाल में ‘मातृभूमि ऋण’ या कि ‘राष्ट्र-ऋण’ के रूप में सम्पूर्ण मही की पूजा और मही को सुरक्षा-संरक्षा एवं मान-प्रदान पर्याप्त था। तथैव, तत्कालीन भारतीय मनीषा ने ‘राष्ट्र-ऋण’ या तत्सदृश किसी ऋण का प्रत्यय वैखरी में प्रत्यक्षतः प्रस्तुत नहीं किया, प्रत्युत राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्यपालन को ‘धारय इति धर्मः’ वाले राष्ट्रीय धर्म: ‘राष्ट्रधर्म’ के ‘करणीय आचार’ में विहित मान लिया था। त..द..पि, कालान्तर में पृथ्वी में अनेकानेक राष्ट्रों की सरहदें सुस्थापित होने के बाद औ...र विदेशी राष्ट्रिकों की गिद्ध-दृष्टि के सापेक्ष वर्तमान परिस्थितियों में ‘भारत राष्ट्र के संरक्षण हेतु ‘राष्ट्र-ऋण’ की वैखरिक अवधारणा ही नहीं, अपितु अपरिहार्य आवश्यकता भी घनीभूत रूप में प्रत्यक्ष है। यतः अपने ‘राष्ट्र/मातृभूमि के प्रति कतिपय कर्त्तव्यपालन’ को स्वतंत्र जन्मजात ऋण: ‘राष्ट्र ऋण’ के रूप में आगणित किया जाना आज की परिस्थितियों में वांछनीय भी है और अति उपादेय भी।
तथ्यतया ‘अहम् राष्ट्री संगमनी....’, ‘राष्ट्र मा भ्रंशत’, ‘राष्ट्राय वर्धय’ और ‘राष्ट्र भृत सूक्त’ सदृश वैदिक निदेशनों वाले देशकाल में ‘राष्ट्रीय संचेतना वाला कर्त्तव्य-पालन’ भारत-भूमि का एक विशिष्ट विशेषत्व रहा है। ‘राष्ट्राय वर्धय’ एवं ‘स्वराष्ट्ररंजनम्’ काम्य रहा है प्राचीनकाल में हमारे यहाँ। ‘राष्ट्राय वर्धय’ में राष्ट्र का सीमा-प्रस्तार नहीं, अपितु राष्ट्र के सांस्कृतिक, सांस्कारिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक विकास की ही कामना की थी प्राचीन मनीषियों ने। यजुर्वेद में ‘राष्ट्राय वर्धय’ के लिए ‘ब्राह्मणाः ब्रह्मवर्चसी, राजन्यो शूराः......’ आदि की देशना में कतिपय उपस्करों के रूप में ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण, शूर राजन्य आदि को राष्ट्राय वर्धय के लिए वांछनीय इंगित किया गया है। ऐसी वांछनीयता ‘राष्ट्राय वर्धय’ की सात्त्विकता स्पष्ट कर देती है। तत्कालीन सात्त्विक देशकाल में राष्ट्र-हित संरक्षण के विरुद्ध किसी सोच के लिए स्थान नहीं था। परमवीर राजा भरत का अपने भाई से युद्ध हो या आर्य-अनार्य युद्ध, इन्द्र-शम्बरासुर युद्ध, दाशराज्ञ युद्ध आदि-- भारतीय संस्कृति-समाज में राष्ट्रघात कहीं भी दृश्यमान नहीं है। ऐतिहासिक रूप से कौटिल्यकाल के पूर्व तक यहाँ के राजागण में (सामान्य राष्ट्रिक में भी) वैयक्तिक राग-द्वेष चाहे जितना परवान चढ़े हों, परन्तु ‘राष्ट्रघात’ नामक पातक या ‘राष्ट्र-विघटन’ सदृश दुष्कर्म प्रत्यक्ष नहीं हुए थे। सर्वज्ञात है कि महाव्रती भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य आदि राष्ट्र-संरक्षण की निष्ठा से बँधे होने के कारण ही चाह कर भी पाण्डवगण को सहयोग नहीं दे सके थे।
परन्तु वैदिक मान्यताओं के अपघात के युग में वैदिक मान्यताओं में आस्था के अधःपतन के फलस्वरूप 12वीं सदी में ‘जयचन्द’ का राष्ट्रीय अपघात प्रत्यक्ष हो चुका है औ...र एक नहीं अनेक पंचमांगी जयचन्द सक्रिय हैं हमारे वर्तमान देश-काल में। इतिहासतया महाभारत-काल के बहुत-बहुत-बहुत बाद, ईस्वी सन् प्रारम्भ होने के आसपास के कालखण्ड में पंजाब के राजा आम्भि से प्रारम्भित राष्ट्र-घात सदृश एक दुष्प्रवृत्ति भारतीय राजाओं में पनप गई, जिसका भयावह स्वरूप 12वीं शती के अंतिम चरण में जयचन्द के कार्यकलापों में देखा जा सकता है। आम्भिक और जयचन्दी अ-राष्ट्रीय कृतघ्नतास्पद कुत्सा वर्तमान भारत में बढ़ते परिमाण में परवान पर है-- यह एक कटु सत्य है। बीच-बीच में अनेक अवसरों पर भारतीय मन में उठती राष्ट्रवादी हुलस और राष्ट्रवादी हुंकार के बावजूद, 21वीं शताब्दि के वर्तमान देशकाल में आभारत प्रश्नगत कुत्सा जब-तब दुर्योधनी-घोष निनादित करने लगती है, जिसका रणन-अनुरणन वर्तमान में वीभत्स स्वरूप में जब-तब मुखर होता रहता है। ऐसी कुत्साओं के अपरिहार्य निवारण हेतु भी ‘राष्ट्र-ऋण’ नामक उपरि-इंगित प्रत्यय सर्वथा स्वीकार्य माना जाना चाहिए।
‘राष्ट्र-ऋण’ का प्रत्यय ‘राष्ट्रवाद’ विशेषकर ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के सांस्कृतिक, सांस्कारिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक पल्लवन की दृष्टि से भी वांछनीय है। तेनेव, वर्तमान में राष्ट्र-हित रक्षण के प्रति, राष्ट्र के गौरव-रक्षण के प्रति, राष्ट्र के सर्वविध संवर्द्धन के प्रति कतिपय कर्त्तव्यों को राष्ट्रधर्म में विहित मानने से भी किंचित् आगे बढ़ कर ‘मातृ ऋण’ के समरूप जन्मजात ऋण के रूप में ‘राष्ट्र ऋण’ संज्ञक एक अन्य ऋण वैखरी में स्वतंत्र रूप में प्रकल्पित किया जाना चाहिए जिसका मूल तत्त्वतः भारतीय मनीषा में वैदिक युग से विद्यमान है किन्तु जिसे प्राचीन भारतीय मनीषा ने ‘मातृ ऋण’ के व्यापकीकरण में अन्तःभावित मान कर अलग से वैखरी में उवाचित नहीं किया था।
ज्ञात हो कि पितृ ऋण में मातृ ऋण की अन्तर्भाविता के समरूप समान्तरतः ‘मातृभूमि ऋण’ को भी स्वतंत्रतया प्रकल्पित न करके ‘मातृ ऋण’ में और तदनुसार प्राचीनकाल में ऋक्-प्रणीत ‘पितृ ऋण’ में पश्यन्ती में अन्तर्भावित माना जाना तत्कालीन देश-काल में तर्कसंगत रहा होगा, परन्तु जिन तर्कों से ‘मातृ ऋण’ को भारतीय मनीषा ने प्रथमतः ‘पितृ ऋण’ में अन्तःभावित और कालान्तर में स्वतंत्र रूप में स्वीकार किया, उन्हीं तर्कों के सम्बल से ‘मातृभूमि ऋण (जननी समान भरण-पोषण, संरक्षा आदि प्रदान करने वाली ‘भूिम/धरती’ माता के प्रति कर्त्तव्यपालन, पोषण-संरक्षण-प्रदान आदि)’ को पश्यन्ती स्वरूप में ‘मातृ ऋण’ में आरम्भतः अन्तर्भावित मानते हुए, भी वर्तमान में ‘मातृभूमि ऋण’ को ‘राष्ट्र ऋण’ के रूप में स्वतंत्र रूप में वैखरी में स्वीकार किया जाना अपरिहार्य है।
वस्तुतः आदिवासी कबीलों के जन में कबीला-निष्ठा के नाम पर जो आस्थाएँ पाई जाती हैं या जन्मभूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ मानने की जो भावना प्राचीन भारतीयों में भरपूर पाई जाती थी, तत्सदृश राष्ट्रवादी निष्ठाएँ वर्तमान में ‘वैयक्तिक राग-द्वेष’ में और अधुना युग के ‘मार्क्सवाद’, ‘अन्तर-राष्ट्रीयतावाद’ आदि के नाम पर (जो स्वतः नितान्त फर्जी छल-छù से इतर नहीं हैं) और उससे बढ़ कर ‘भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी लालसाओं’ के नाम पर विश्व के बहुलांश क्षितिजों पर दम तोड़ रही हैं, वर्तमान भारतीय भी उसका शिकार बन गए हैं। ऐसी भाव-दशा में राष्ट्र की संरक्षा और तथैव, राष्ट्र की अस्मिता के कमजोर पड़ने की आशंका बलवती होती जा रही है। तदनुसार ‘राष्ट्रायवर्द्धय’, ‘स्वराष्ट्ररंजनम्’, ‘राष्ट्रभृत सूक्त’ और ‘राष्ट्री संगमनी’ सदृश प्रत्ययों वाले राष्ट्र-धर्म की संकल्पना तथा ‘सौत्रामणी यज्ञ’ (जो राष्ट्र-रक्षण के साथ-साथ राष्ट्र-संवर्द्धन के लिए भी प्रत्येक राष्ट्रवासी द्वारा ‘राष्ट्रहित में आहुति’ या कि ‘राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्यों के निर्वहन’ को रेखायित करने में सक्षम है) सदृश सक्रियताओं की अनिवार्यता (जो हमारे भारत मंे प्राचीनतम राष्ट्रीय कर्त्तव्य माने गए हैं) की वर्तमान उपेक्षा को देखते हुए ‘राष्ट्र ऋण’ की वैखरी में प्रकल्पना आज अपरिहार्य है। अतएव, प्राचीन भारतीय वाङ्मय में राष्ट्र के सम्बन्ध में निदेशित ‘राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य-भावना’, ‘संगमनं’, ‘संवध्वं’, ‘राष्ट्रायवर्धय’, ‘सुराष्ट्ररंजनम्’, ‘देशधर्मस्तु पूजताम’् आदि के प्रत्यय प्राचीन भारतीय मनीषा की अप्रतिम धरोहरें हैं, जिनके स्वन-स्वरों को वर्तमान देशकाल में वैखरी में स्वीकारना अपरिहार्य बन गया है।
औ...र, जन्मजात ऋणों की भारतीय अवधारणा को कर्मफल सिद्धान्त से अनुप्राणित मानें, तो किसी राष्ट्र-विशेष में वह भी भारत जैसे संस्कारशील सत्त्वशील, सर्वकल्याणक, सर्वशान्तिप्रदायी अबाधित आश्रय, सुखपूर्ण प्रवास, पोषण आदि की सर्वसुविधा से सम्पन्न राष्ट्र में जन्म लेना मानव के पूर्वजर्न्मों में कृत पुण्यकर्मों का ही फलित माना जाना चाहिए। तथैव, इस मानव-जन्म में वर्तमान एवं भावी कर्मों के निष्पादन में सर्वसहायक सर्वसुविधा-प्रदानक राष्ट्रभूमि अपितु समग्र राष्ट्र-हित के प्रति सत्त्वशील कृतज्ञता-ज्ञापन के क्रम में समुचित करणीय कर्म को ‘राष्ट्र-ऋण’ के रूप में अंगीकृत किया जाना वांछनीय है। इस तरह, तद्गत निष्पाद्य राष्ट्रीय कर्त्तव्यों के सम्यक् निर्वहन द्वारा ‘राष्ट्र-ऋण’ से उऋण होने को अपरिहार्य माना जाना कर्म-विपाक की भारती$य दृष्टि से भी स्वीकार्य माना जाना चाहिए।
औ...र, प्रातः उठकर धरती पर पैर धरने के पूर्व धरती/मही को मातृरूप में नमन करने वाली मही-पूजक भारती$य मनीषा मातृभूमि का कोई ऋण या कि तद्गत ‘राष्ट्र ऋण’ स्वीकार नहीं करे --ऐसा सम्भव नहीं है।
औ...र, मनोविज्ञानतया सत्त्वशील ही नहीं वरन् रजस्शील मानव भी हर प्रकार के ऋण से शीघ्रातिशीघ्र उऋण होना चाहता है जबकि सम्प्रति राष्ट्र- धर्म के प्रति सचेतता प्रायः राष्ट्रिकों के सत्त्वशील संवर्ग तक ही परिव्याप्त है औ...र वर्तमान के देशकाल में जब भौतिकतावादी सुख-संसाधन और उनकी प्राप्ति के प्रति रजस् लालसा परवान पर है, भौतिकता से आलिप्त रजस्शील राष्ट्रिकों के लिए प्रसंगित राष्ट्रीय कर्त्तव्यों के निर्वहन की ललक प्रायः नेपथ्य में जाती दिखती है। तेनेव, ऐसे देशकाल में ‘राष्ट्र ऋण’ से भी उऋण होने की वैखरी उद्भावना वर्तमान की अपरिहार्य आवश्यकता है इसलिए कि ‘राष्ट्र-ऋण’ या ‘राष्ट्र के प्रति ऋण’ की संज्ञा वाला ऋण प्रत्येक राष्ट्रिक के मन में राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य-पालन की भावना को सबलतर स्वरूप में राष्ट्र-धर्म की करणीयता को बलवानतर स्वरूप में उन्मुख करने में सफल होगा। संदर्भगत मनोवैज्ञानिक तथ्य है यह भी कि जब तक बाध्यता नहीं होती, तब तक किसी के प्रति कर्त्तव्य-पालन की भावना प्रायः उपेक्ष्य बनी रहती है। परन्तु बाध्यता होने पर सत्त्वशील व्यक्ति की कौन कहे, रजस्शील मानव भी ‘राष्ट्र ऋण’ की अदायगी के लिए सचेष्ट हो उठता है। तेनेव, राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य-निष्पादन के माध्यम से राष्ट्र के ऋण से ‘अनिवार्यतया उऋण होने की भावना’ को या कि ‘राष्ट्र-ऋण’ की वैखरी संज्ञा को सर्वसंस्वीकृति प्रदान करना आज अतीव आवश्यक है।
प्रकटतः वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में तथा भारत में बाह्य और आन्तरिक विघटनकारी शक्तियों के परवान चढ़ने के देश-काल में राष्ट्र और राष्ट्रहित-संरक्षण सदृश आचार आज वरीयता में आचरित किए जाने की वांछा सतत रणित-अनुरणित भी हो रही है जिसके क्रम में राष्ट्र-ऋण को वैखरी में साकार किया जाना अपरिहार्य है।
तथैव, समयावश्यकता को देखते हुए जिस प्रकार भारतीय मनीषा ने जन्मजात ऋणों की संख्या में समय-समय पर वृद्धि करके अन्यान्य ऋण को वैखरी में स्वीकार कर लिया था, उसी प्रकार, वर्तमान में राष्ट्रीय अपेक्षाओं के समुचित निर्वहन हेतु ‘राष्ट्र ऋण’ संज्ञक ऋण को पश्यन्ती के बजाय स्वतंत्र रूप से वैखरी में गणनीय और उऋणीय माना जाना अनिवार्य है।
एतावत मुख्य रूप से उपरि-अंकित कुल 6 जन्मजात ऋण हैं- पितृ ऋण, मातृ ऋण, देव ऋण (इसमें ब्रह्मा ऋण अन्तःभावित है), गुरु ऋण (इसमें ऋषि ऋण एवं विप्र ऋण अन्तःभावित हैं), भूत ऋण (इसमें मानुष ऋण/मनुष्य ऋण एवं अतिथि ऋण अन्तःभावित हैं) और ‘राष्ट्र ऋण (मातृभूमि-ऋण जिसमें राष्ट्रवासी मानवों के प्रति सद्भावादि समेकित तथैव मानुष ऋण समाहित माना जा सकता है)। इन ऋणों से समुचिततः उऋण होना वर्तमान परिस्थितियों में अपरिहार्य है इसलिए कि इन छः ऋणों से उऋण होना वैयक्तिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, पर्यावरणिक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्यों में वांछनीय है और सर्वोपादेय भी।
परिस्पष्टतया, भरतत्व सह भारतत्व सह भारतीत्व आदि भारतीयता-समग्र वाले उपरि-इंगित विशिष्ट जीवन-दर्शन से लेकर जन्मजात ऋण तक भारतीय सांस्कृतिक वैशिष्ट्यों से भारती+य सांस्कृतिकता या कि प्रसंगित भा$रतीय सांस्कृतिक रूपाभा से परिव्याप्त चिर-शाश्वत भारतीयता को औ...र तद्गत भारत के वस्तुनिष्ठ स्वरूप को साधिकारिक स्वरूप में पहचाना जा सकता है। यह पहचान या कि भारतीयता का सन्दर्भगत सांस्कृतिक स्वरूप( जिसमें आगामी अध्याय मंे विवेचित ‘भारतीय धर्म एवम् उसके अनुषंग’ भी समेकित हैं ) वर्तमान में कतिपय प्रकट-प्रच्छन्न दुष्प्रयासों से यदा-कदा कम प्रदीप्त भले दिखंे, परन्तु संदर्भगत सांस्कृतिक प्रदीप्ति न्यूनाधिक आसेतु हिमालय कामरूप से कच्छ तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक अद्यतन दृश्यमान है। यह दृश्यमानता भारत की भारतीयता को भारतीय संस्कृति को, भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रीय चरित्र को और तद्वत् भारत के वास्तविक स्वरूप को रूपायित करने में समर्थ है बशर्त हम लाल, पीले, नीले, हरे रंग के चश्मे से या कि धुन्धी वाली आँख से या कि मोतियाबिन्दी आँख से देखने के बजाय निरभ्र दृष्टि से इसे देखने का प्रयास सदाशयता से साकार करें।
(उपर्युक्त आलेख विजय रंजन की कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग’ के अध्याय ‘भारतीयता के प्रमाणक सांस्कृतिक वैशिष्ट्य’ का एक अंश है । )
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