* 'आदि-महाकवि बाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान' अपने आप में एक विशेष शोध ग्रंथ है । ऐसी पुस्तकें लिखने की काबिलियत , कर्मठता और लगन बहुत कम लोगों में बची है। इन्हें लिखने वालों के साथ-साथ पढ़ने वाले भी बहुत कम बचे हैं । ऐसी पुस्तकें साहित्य की धरोहर हैं जरूर पढ़ें ।
- डॉ॰ पुष्पलता, अधिवक्ता, मुजफ्फरनगर, उ॰ प्र॰
* प्रस्तुत कृति में श्री विजय रंजन का घोर अध्यवसाय और चिंतन उद्भाषित है, जो वाल्मीकि रामायण की अप्रमेयता और उसके निकष पर नव चेतना का उन्मीलन करता है। वास्तविकता तो यह है कि ऐसे लेखक और विचारक दुर्लभ और विरल हैं।
- डॉ. शिवम तिवारी , सेवानिवृत नौसेना अधिकारी, बछरावाँ, रायबरेली, उ॰प्र॰,
दूरभाष : 8318420153
* वाच्यार्थ से इतर प्रतीयमान अर्थ का अवभास
भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रखर प्रवक्ता श्री विजय रंजन जी की सद्य प्रकाशित कृति ‘आदि महाकवि वाल्मीकि के 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ शोध प्रबंध एक ऐसी रचना है जिसमें सारत: काव्य आचार्य आनंद वर्धन के ध्वन्यालोक की परंपरा में ‘वाच्यार्थ से इतर प्रतीयमान अर्थ के अवभास’ की अर्थवत्ता प्रतिपादित हुई है। इस गहन शोध प्रबंध में आदि महाकवि वाल्मीकि के सार्वकालिक सार्वभौम तत्वों का जो गहन विवेचन किया गया है, वह समग्र संसार की साहित्य धाराओं में सर्वथा अभिप्रेत प्रतीत होता है । इसके अंतर्गत काव्यशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित प्रतिमान जैसे महाकाव्यत्व, नयवाद, मानवतावाद, लोकवाद, सर्वहित वाद, स्त्री विमर्श, समाज, राष्ट्र और मनोवैज्ञानिक आदि दस संदर्भों का गवेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। सभी पौर्वात्य और पश्चिमी विचारधाराओं ऐसा समन्वित प्रयोग और उपयोग बहुत विरल ही प्रतीत होता है।
यह प्रश्न उठाया जा सकता है इन आधुनिक अवधारणाों को आदिकवि वाल्मीकि की रामायण से जोड़ना कहाँ तक और क्यों प्रासंगिक है? यह भी पूछा जा सकता है कि इन वर्तमान धारणाओं को आदिकवि पर आरोपित कर उनकी समालोचना क्या संगत मानी जा सकती है? स्वभावतः श्री रंजन जी ने इस प्रश्न का गहन परिशीलन स्वयं किया है। सबसे पहले तो इस संबंध में यही विचारणीय ही है कि आदिकवि वाल्मीकि को हम अतीत की धरोहर मानकर विस्मृत नहीं कर सकते। दूसरे, ऐसे आदिकवि को जो सनातन भारतीय वैदिक और अधुनातन धारणाओं के क्रांतदर्शी, ‘मनीषी, परिभू, स्वयंभू’ कवि हों वे निश्चित ही तथाकथित आधुनिकता मैं कहीं और अधिक स्मरणीय और ध्यातव्य ही हैं ।
महाकवि वाल्मीकि को अप्रतिम मानवतावादी प्रमाणित करते हुए श्री विजय रंजन लिखते हैं’ मानवतावाद का आविश्व कोई भी अन्य रूप रामीय/ वाल्मीकीय मानवतावाद के स्वरूप से श्रेष्ठ नहीं है ।‘ पृष्ठ 88
वर्तमान युग में मार्क्स और एंजिल्स के समाजवादी दर्शन ने समाज और जीवन दर्शन को बहुत प्रभावित किया है। इस परिवर्तनकारी वर्तमान विचारधारा पर गहन विचारोपरांत श्री रंजन की अवधारणा यही है कि ‘रामायणम् प्रथम समाजशास्त्रीय महाकाव्य होने के साथ साथ प्रथम श्रेष्ठ लोकवादी महाकाव्य भी है और आदि महाकवि वाल्मीकि ‘आदि- प्रथम लोकवादी और आदि-प्रथम समाजशास्त्री महाकवि हैं’ । पृष्ठ १०१
ऐसा माना जाता है की बिम्ब विधान कविता का आधुनिक प्रधान समीक्षा निकष है। श्री विजय रंजन ने वाल्मीकि रामायण के संदर्भ में इसकी गहन पड़ताल की है। इसका एक उदाहरण बाल कांड के सर्ग 22 में वहां द्रष्टव्य है जब श्री राम और लक्ष्मण विश्वामित्र जी के साथ यज्ञ रक्षार्थ वन जा रहे हैं । तब उनका स्वरूपांकन वाल्मीकिजी निम्न प्रकार से करते हैं-
कलापिनौ धनुषपाणी शोभयानौ दिशो दश:
विश्वामित्रं महात्मानं त्रिशीर्षाविव पन्नगौ ।
अर्थात राम और लक्ष्मण की पीठ पर तूणीर और हाथों में धनुष ऐसी शोभा पा रहे थे कि वे दोनों महात्मा विश्वामित्र के पीछे तीन फन वाले दो सर्पों के सामान चल रहे हों। (पृष्ठ १३९)
वर्तमान में फ्रायड आदि पश्चिमी विचारकों के विश्लेषण से मनोवैज्ञानिक तत्व भी जीवन के आवश्यक पक्ष प्रकट होते हैं। विजय रंजन जी ने वाल्मीकि जी के सुंदरकांड मैं सीता जी द्वारा अकस्मात हनुमान जी को देखने पर जो आत्म चिंतन किया वह उनके मनोविश्लेषणात्मक चित्रण का ही परिचायक है- स्वप्नो हि नायं नहि मे sस्ति निद्रा शोकेन दुख पीडिताया ।
यहाँ सीता जी विचार कर रही हैं कि इतने शोक संताप की पीड़ावस्था में हनुमान का यह रूप स्वप्न तो कैसे भी नहीं हो सकता ।
यह स्वाभाविक और उचित ही है कि लेखक ने पुस्तक के परिशिष्ट २ में आधारग्रंथ एवं पत्र पत्रिकाओं की एक त्वरित और विस्तृत सूची दी है जिनके इस ग्रंथ में यत्रतत्र संदर्भ दिए गए हैं।
ग्रंथ की भाषा और प्रस्तुतीकरण शैली के संबंध में यह अवश्य कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में अनेक प्रयोग लेखक के अपने और स्वानुभूत हैं तथा वे यत्र-तत्र सामान्य परिपाटी और परंपरा से सर्वथा विलग भी प्रतीत होते हैं। तथापि लेखक का आत्मविश्वास और उसकी अपनी मान्यताओं के प्रति संबद्धता इतनी गहन है कि उसे इस से विच्छिन्न हो पाना जैसे सहज प्रतीत नहीं होता।
पुस्तक सर्वथा समादरणीय और प्रामाणिक संदर्भ स्रोत के रूप में मान्य किए जाने योग्य है ।
-आचार्य प्रभुदयाल मिश्र,
अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम् और प्रधान संपादक तुलसी मानस भारती, श्यामला हिल्स, भोपाल ०२, दूरभाष : 9425079072
* प्रतिष्ठित साहित्यकार विजय रंजन द्वारा वाल्मीकि कृत रामायणम का साहित्यिक दृष्टि से प्रस्तुत अपनी पुस्तक मे विद्वतापूर्ण विश्लेषण किया गया है । उनने अपनी पुस्तक मे यह साबित करने का प्रयास किया है कि रामायणम धार्मिक महाकाव्य से बढ कर साहित्यिक महाकाव्य है । वाल्मीकि लोकवाद के प्रथम प्रस्तोता है तथा वे मानववाद तथा मानवतावाद के प्रथम प्रस्तोता है । रामायणम मे शिष्टतम सर्वकल्याणक नारीवाद की प्रथम प्रस्तुति की गई है । काव्य बिंबवाद, प्रकृतिवाद, श्रेष्ठ राष्ट्रवाद तथा मनोवैज्ञानिकता को पहली बार बाल्मीकि ने अपने महाकाव्य रामायणम मे प्रस्तुत किया है । आदि तथ्यों को विजय रंजन जी ने अपनी पुस्तक मे विस्तार से विश्लेषणात्मक स्वरुप मे प्रस्तुत किया है । इस भांति धार्मिक ग्रंथों का साहित्यिक मूल्यांकन करने की दिशा मे उनने महत्वपूर्ण योगदान किया है । आशा है वर्तमान साहित्य जगत मे उनकी यह कृति सम्मानजनक स्थान प्राप्त करेगी । शुभकामनाएं।
- राजेन्द्र सिंह गहलोत, बुढ़ार, शहडोल, म॰प्र॰, दूरभाष: 9329562110
* डा. हिरेन्द्र प्रसाद साह प्रोफेसर दर्शन शास्त्र, पंजाब वि.वि. चंडीगढ़ कृत
श्री विजय रंजन की कृति
' आदि महाकवि वाल्मीकि के दस अप्रतिम साहित्यिक अवदान ' ---एक समीक्षा
महाकवि महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण ' पर न जाने कितने ग्रंथ लिखे जा चुके और लिखे जा रहे होंगे। श्री विजय रंजन द्वारा लिखित और हाल ही में प्रकाशित ' आदि महाकवि वाल्मीकि के दस साहित्यिक अवदान ' कुछ अलग और नया है।
पहली ही दृष्टि मे य़ह रचना अपनी परिष्कृत हिन्दी के प्रयोग के कारण अलग-सी नज़र आती है।
'तत्सम' शब्दों की बहुलता पाठक को तत्काल आकर्षित करती है। इस तरह की रचनाएं आजकल कम ही देखने को मिलती हैं। इस तरह की रचनाओं को पढ़ते हुए गद्य में पद्य पढ़ने का-सा आनंद मिलता है और विजय रंजन की य़ह कृति इसका एक उदाहरण है ।
'तत्सम ' शब्दों का प्रयोग कृति को सामान्य जन के लिए दुरूह बना सकती थी लेकिन लेखक के विचारों की स्पष्टता उनकी सरल वाक्य-संरचना में जिस तरह प्रकट हुई है वह लेखक के मंतव्य को सबके लिए बोधगम्य बना देती है--- य़ह इस रचना की विशेषताओं में से एक है।
'आदि महाकवि वाल्मीकि के दस साहित्यिक अवदान ' में लेखक ने महाकवि के जिन दस अवदानों को प्रस्तुत और व्याख्यायित किया है उनमें से किसी भी अवदान की मौलिकता पर संदेह तो किया ही नहीं जा सकता क्योंकि महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं , उनसे पूर्व कोई लिखित काव्य है नहीं।
लेकिन य़ह केवल काल खंड में प्रथम होने का आकस्मिक संयोग नहीं वरन आदिकवि की सम्पूर्ण जगत के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता का परिणाम है जो मानवीय संबंधों और परिस्थितियों को उनके सहज स्वरुप में ग्रहण करने की क्षमता देता है।
लेखक ने आदिकवि के जिन मौलिक अवदानों को प्रस्तुत किया है उनमे सभी बहुत महत्व के हैं लेकिन समसामयिक परिवेश में 'न्याय संगत होने का मह्त्व', ' लोक का मह्त्व' और 'नारी का मह्त्व' जैसे विषय विशेष महत्व रखते हैं।
'न्याय युक्त बुद्धि से व्यवहार करने का गुण ही वह विशेषता है जिसने सभी भारतीय के मन आदिकवि रचित 'रामायण ' के नायक की छवि
मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हमेशा के लिए उकेर दी है । लेखक ने न्यायपूर्ण चरित्र के मौलिक रचयिता के रूप में आदिकवि के अवदान को जो रेखांकित किया हैं वह उन की मौलिक दृष्टि का परिचय देती है। राम के न्याय पूर्ण चरित्र पर ऊंगली उठाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों की आलोचना का लेखक ने जो युक्तियुक्त प्रत्युत्तर दिया है वह सबके पढ़ने योग्य है और सराहनीय है।
लेखक द्वारा इस प्रकार की आलोचना के प्रत्युत्तर या 'आलोचना की समालोचना ' में सिर्फ
आलोचक के तर्कों का खण्डन नहीं वरन चिंतन के ऊंचे तल (higer order thinking) पर पाठकों को ले जाने का प्रयास भी है जो लेखक के चिंतन-प्रविधि (Methodology of Contemplation) की गहरी समझ का परिचय देता है । उनकी यह समझ उनके उस चिन्तन में भी प्रकट होती है जो उन्होंने नारी की महत्ता और लोक की महत्ता के सन्दर्भ मे रखा है।
अगर कोई आदिकवि की लोक की महत्ता और नारी की महत्ता के विचारों की आलोचना किसी पश्चिमी विचारधारा से प्रेरित हो कर करता है तो उसकी समालोचना में सिर्फ उसके विचारों का खंडन पर्याप्त नहीं होता । यह स्पष्ट करना भी जरूरी होता है कि इस तरह की आलोचना प्रविधि (Methodology) की दृष्टि से भी दोष पूर्ण है । लेखक ने इस उच्च तल (Second Order या Higher Order) की समालोचना को सर्वत्र अपनाया है और इसका सशक्त प्रयोग किया है ।
आधुनिक पश्चिमी विचारधारा में नारी की महत्ता को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की घोषणा के रूप में समझा गया है जो पुरुषों के उपभोगवादी प्रवृत्ति को चुनौती देता है। पहली दृष्टि में यह विचार बड़ा क्रांतिकारी और सराहनीय लगता हैं लेकिन अंततः यह स्वतंत्र नारी को अनजाने ही स्वयं को मात्र एक भौतिक शरीर और उपभोग की वस्तु स्वीकार कर लेने की जाल में फ़ंसा देती है। नारी महत्ता की पश्चिमी विचारधारा की इस दुर्दशा से नज़रे चुराना ही इस विचारधारा के समर्थकों की नियति है। लेखक ने रामायण के नारी चरित्र के उन आलोचकों की बहुत युक्तियुक्त समालोचना की है जो पश्चिमी दृष्टिकोण से इनमें दोष निकालते हैं।
'लोक' की महत्ता के विषय में आदिकवि के विचारों को समझे बिना आलोचना और दोषारोपण करने की प्रवृत्ति को भी लेखक ने बखूबी रेखांकित किया है और उसकी समुचित आलोचना की है।
लेखक ने 'मानववाद' और 'मानवतावाद' के भेद को रेखांकित करते हुए 'रामायण ' को इन दोनों ही अवधारणाओं का प्रथम महाकाव्य बताया है। इस विषय पर भी लेखक ने महर्षि वाल्मीकि की रचना में मानववाद और मानवतावाद का वह रूप प्रस्तुत किया हैं जो पश्चिमी अस्तित्ववादी मानवतावाद की तरह कुंठा और जीवन की निरर्थकता में समाप्त नहीं होता । हो भी नहीं सकता । भारत आध्यात्मिक खोज की भूमि है जिसमें वैयक्तिक चेतना ऐतिहासिक परिस्थितियों का अतिक्रमण करती हुई सार्वभौम शाश्वत चेतना से अपने तादात्म्य संबंध को पहचानती है । भौतिक सीमाओं में बंधे होने की मजबूरी अस्तित्ववादी मानवतावाद को इस दुर्दशा में धकेल देती है कि जीवन में विकल्पों के बीच के चुनाव की स्वतंत्रता भी वरदान नहीं वरन अभिशाप (condemned to be free) बन कर सामने आती है । उस पर विडंबना यह कि इस अभिशाप मानने की प्रवृत्ति को परोक्ष रूप से उच्चस्तरीय बौद्धिकता का लक्षण माना जाता है । मतलब जो जीवन में निराशा देखे वह बुद्धिमान और जो इसमें आशा की किरण देखे वह पिछड़ा ! इस तरह की रुग्ण मानसिकता को मापदंड मान कर महर्षि वाल्मीकि द्वारा प्रस्तुत उदात्त मानवतावाद का मूल्यांकन करने पर इसमें कपोल काल्पनिकता और मानसिक पिछड़ापन दिखाई देना स्वाभाविक ही है। एक रुग्ण मानसिकता की दृष्टि से स्वस्थ्य मानसिकता विकृति तो दिखाई देगी ही । इस सहज तथ्य को रेखांकित करते हुए लेखक ने पश्चिमी मानवतावादी विचारधारा को आइना दिखाया है।
'नय-रस ' , ' महत् तत्व ' , ' मनोविज्ञान ' इत्यादि के विषय में भी आदिकवि के अवदानों का वर्णन और विश्लेषण करते हुए लेखक ने तथ्यों की गहरी समझ का परिचय दिया है और आलोचना की समालोचना की अपनी तीक्ष्ण प्रविधि को भी उजागर किया है।
कुल मिलाकर विजय रंजन द्वारा लिखित-'आदिकवि वाल्मिकी के दस साहित्यिक अवदान' एक अभिनव प्रयास है आदिकवि द्वारा रचित 'रामायण ' महाकाव्य पर जमी पूर्वाग्रह पूर्ण आलोचनाओं की धूल हटा कर उन मौलिक विचारों को फिर से यथा रूप प्रकट करने का जिसने भारतीयों को उनकी पहचान दी और उन्मुक्त हो कर जीवन की ऊचाईयों को पाने का मनोबल दिया।
विजय रंजन जी की -- 'आदि महाकवि वाल्मीकि के दस साहित्यिक अवदान ' सभी वर्ग के पाठकों के लिए रोचक और नए चिंतन की ओर ले जाने वाली रचना है ।
----- एच पी साह
‘आदि-महाकवि वाल्मीकि के दस अप्रतिम साहित्यिक अवदान’ मेरे छोटे से पुस्तकालय में महीनों पूर्व आ गयी थी। जीवन और जगत के झंझावात की उलझन और कुछ-कुछ इस पुस्तक को अत्यधिक धैर्य से पढ़ने के संकल्प से इसे पढ़ने में अन्य पुस्तकों की अपेक्षा अधिक विलम्ब हुआ।
विजय रंजन जी की चेतना-क्षमता अद्भुत है। इस ग्रंथ को आद्योपांत पढ़ने के बाद जो अनुभव हुआ वह यह कि विजय रंजन दिखने में जितने सरल,सहज हैं अन्दर से वे उतने ही अधिक सघन और अभाष्य हैं।
वाल्मीकि-रामायण पढ़ने के बाद जब विजय रंजन जी को यह महसूस हुआ कि वाल्मीकि-साहित्य की तमाम टीकाएँ आयीं, तमाम भाष्य लिखे गये। हजारों वर्ष पूर्व रचे गये इस ग्रंथ का असंख्य बार पुनर्पाठ हुआ लेकिन आजतक कुछ तथ्य पर विद्वत-समाज की दृष्टि ही नहीं गयी तो इस पुस्तक के सृजन -हेतु श्री विजय रंजन जी ने स्वयं संकल्प लिया।
विजय रंजन जी स्वयं ‘पुरावृत्ति औ…र विवृति’ में लिखते हैं–
"ज्ञात हो कि आदि- महाकवि वाल्मीकि की रामायणम् को काव्यबीज बनाकर और रामायणम्- वर्णित राम कथा को उपजीव्य भी बनाकर शताधिक रामकथाएं विरचित की जा चुकी हैं। अद्यतन उन पर विभिन्न विश्वविद्यालय में अनेकानेक शोध-पत्र भी प्रस्तुत किये जा चुके हैं।आभारत अनेकानेक विद्वानों ने रामायणम् पर ख्यात टीकाएं भी लिखी हैं। रामायणम् आदि- महाकवि वाल्मीकि का ‘प्रथम महत् काव्य’ होने के साथ-साथ प्रथम मानववादी एवं प्रथम मानवतावादी महाकाव्य, प्रथम नारीवादी, प्रथम नयवादी (न्यायवादी),प्रथम बिम्बवादी, प्रथम प्रकृति वादी, प्रथम मनोवैज्ञानिक, प्रथम नयरसवादी, प्रथम राष्ट्रवादी औ..र, सामाजिक सत्व से समेकित प्रथम लोकवादी महाकाव्य’ भी है। इन प्रत्ययों का लौकिक काव्य जगत् में सम्प्रयोग करने वाले प्रथम महाकवि थे आदि महाकवि वाल्मीकि। तदनुसार आदि-महाकवि वाल्मीकि हैं ‘रामायणम्’ में ऊपरि-अंकित महनीय, लोकहिती, सार्वहिती, सहित्भावी तत्वों के सफल समावेशन करने के ब्याज से काव्य जगत को प्रथम 10 अप्रतिम साहित्यिक अवदान अवदानित करने वाले महाकवि भी। दुर्योग से आदि- महाकवि वाल्मीकि के संदर्भगत अप्रतिम अवदानों की ओर अद्यतन हमारे प्राचीन, मध्ययुगीन और अर्वाचीन काव्यज्ञों और हमारे कथित बौद्धिकों ने सम्यक् ध्यान निवेशित नहीं किया। वहीं वाल्मीकीय राम- गाथा से अनुप्राणित ‘सत कोटि अपारा’ वाले रामाख्यान जहां तक विरचित किये जा चुके हैं, अब भी किए जा रहे हैं’ और जहां रामायणम् की रामानुजीय व्याख्या, धार्मिक व्याख्या, आध्यात्मिक व्याख्या आदि- इत्यादि भरपूर उपलब्ध है, उस भीड़ में प्रस्तुत कृति में उकेरित रामायणम् की विशिष्टताओं की ओर विद्वानों की दृष्टि नहीं गई ! यह नितांत आश्चर्यप्रद है !! ऐसे अनदेख का निवारण अपेक्षित है। इतना ही नहीं, रामायणम् के गहन अध्ययन-अनुशीलन के क्रम में संज्ञान में आया कि रामायणम् के अद्यतन उपलब्ध अनेक संस्करणों में और तद्गत व्याख्याओं में भी अनेक भ्रान्तियां परिव्याप्त हैं जो प्रतीततया कदाशयतः प्रक्षेपित या कि राग-द्वेष से अभिरूपित हैं ‘रामायणम्’ में और तद्गत कथित कतिपय व्याख्याओं में भी। अतएव, प्रसंगित भ्रान्तियों के तिरोहण के साथ-साथ रामायणम् की दुर्लभ विशिष्टताओं को प्रभासमान करने के सदाशय से भी विरचित है प्रस्तुत कृति।”
रामकथा भारतवर्ष की सांस्कृतिक आत्मा है। चूंकि भारतीय पूरे विश्व में किन्हीं न किन्हीं कारणों से फैले तो वे अपने साथ-साथ रामकथा भी पूरे विश्व में ले गये। वाल्मीकि-रामायण का अनुवाद विश्व की लगभग भाषा में हुआ। तमाम विद्वानों ने रामायण पर,रामकथा पर अपनी-अपनी कलम चलाई है लेकिन श्री विजयरंजन जी की दृष्टि जहाँ पहुंची वहाँ आजतक किसी विद्वान की दृष्टि नहीं गयी थी। एक प्रकार से कह सकते हैं कि “आदि-महाकवि वाल्मीकि के दस अप्रतिम साहित्यिक अवदान” एक पूर्ण और सम्यक शोध ग्रंथ है।
श्री विजय रंजन जी पेशे से विधि-व्यवसायी हैं,लेकिन उनका व्यक्तित्व विविधरंगी है। वे एक कुशल वक्ता हैं, वरिष्ठ साहित्यकार हैं, अद्भुत शोधार्थी हैं, खोजी पत्रकार हैं और किसी भी तथ्य पर अपनी मनीषा और निरन्तरता के आलोड़न से नवनीत निकालने की कला में दक्ष हैं।
आलोच्य ग्रंथ का समग्र मूल्यांकन करने में, मैं स्वयं को सहज रूप में नहीं पा रहा हूँ । सच्चा और वास्तविक तथ्य तो यह है कि इस अद्भुत कृति का यथार्थ मूल्यांकन कोई संस्कृत भाषा का व्याकर्णाचार्य ही करने में समर्थ होगा। आलोच्य कृति की भाषा सर्वग्राह्य नहीं है। इतनी क्लिष्ट और संस्कृतनिष्ठ भाषा आपके विद्वता का बखान तो कर सकती है। आपकी यशगाथा के झण्डे को फहरा सकती है, विद्वतसमाज में आपको सर्वश्रेष्ठ के सिंहासन पर बैठा सकती है लेकिन जो आप लोगों को देना चाहते हैं वह नहीं कर सकती है। आलोच्य ग्रंथ की भाषा ऐसी ही है। मैं सामान्य पाठक की बात नहीं कर रहा, विद्वान पाठक भी आलोच्य पुस्तक पढ़ते समय बगल में शब्दकोश रखने को विवश होंगे। मैं समझता हूँ कि हमारी भाषा ऐसी हो जो हमारे श्रम को निष्फल न होने दे। हमारा साहित्य सिर्फ शोधार्थियों, पुस्तकालयों और विद्वानों तक ही होकर न रह जाए।
यद्यपि मैं इस पुस्तक का वास्तविक मूल्यांकन करने में स्वयं को असफल मानता हूँ फिर भी एक तथ्य यह है कि दादा विजय रंजन जी ने इस पुस्तक के प्रणयन में अत्यन्त श्रमसाध्य कार्य किया है। (भाषागत नहीं, भाषा पर तो आपका अबतक इतना अभ्यास हो चुका है कि उसे आप अत्यंत सहज भाव में लिखते हैं ।आपका वास्तविक श्रम उन शोधित-प्रसगों पर अधिक है जो आजतक विद्वानों द्वारा अनछुए रह गये थे) वह श्रम सदैव स्वागत योग्य है। मैं इस अद्भुत कृति की सफलता की कामना करता हूँ ।
पुस्तक -आदि-महाकवि वाल्मीकि के दस अप्रतिम साहित्यिक अवदान
लेखक– विजय रंजन
प्रकाशन-विकल्प प्रकाशन दिल्ली-९०
संस्करण- अप्रैल, २०२५
मूल्य-९९५ रुपये
- राजेश ओझा, गोण्डा (उ०प्र०)


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