अप्रतिम सांस्कृतिक भारतीय धरोहर योग
'योग' का प्रत्यय भारतीय संस्कृति का अप्रतिम सर्वहित अवदान और भारतीय संस्कृति की अप्रतिम परंपरा है। 21 जून 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देते हुए मा0 प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विश्व मंच से विश्व योग दिवस के रूप में विश्व योग दिवस पर रोक और विविधता की अपील की थी। इस अपील को अंततः 2015 में विश्व-मंच पर संस्कृति प्राप्त हुई और इस भारतीय प्रत्यय की सर्वश्रेष्ठ उपादेयता को ग्लोब ग्लोबल संस्तर पर स्वीकार किया गया। तबसे नए साल के सबसे बड़े दिन 21 जून को मानव-जीवन के आयुष्य को बड़ा करने की सुविधा के साथ 'विश्व योग-दिवस', 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' या कि 'योग दिवस' के नाम से आश्वसन मनाया जा रहा है। तदेव, वैश्विक स्तर पर अरबों की संख्या में लोग भिन्नता 21 जून को तो योगाभ्यास करते हैं, वर्ष के शेष दिनों में भी करोड़ों लोग योग अपनाए का चलन पर चढ़ रहे हैं। भले ही विदेशी अपसंस्कारों के दुष्फलित से मानव-शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा को 'योग' के रूप में जाना जाता है और संप्रति योग के अष्टांगों में से तीसरे अंग 'आसन' (शारीरिक व्यायाम) और चौथे अंग 'प्राणायाम' को हिट किया जा रहा है त...द...पि, इस पत्र में प्रतिष्ठित भारतीय प्रत्यय: योग प्रति विश्व की धारणा तो शामिल है। वास्तव में भारतीय, भारतीय चैतन्य के प्रस्तार-क्रम में परमोपयोगी श्रेष्ठतमशरीरिक, मानसिक उपस्कर अष्टांगिक योग नाम्नी इस भारतीय चैतन्य में स्वयं में इतनी श्रेष्ठताएँ हैं और इसकी क्षमताएँ इतनी मूल्यवान हैं कि देर-सबेर संपूर्ण विश्व योग को इसके अष्टांगों सहित व्यापक आयामों में अपनी अलग तरह से जाना जाता है। सर्व कल्याण सर्वोपयोगी भारतीय वैचारिक धारा के प्रमुख वैश्य 'योग' की वैश्विक स्तर पर आयोजित प्रथमदृष्टया संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रसंग की घोषणा से ही पता चल सकता है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ वैश्विक संस्थान की ऐसी संस्था है जो भारी विचार-विमर्श का उपरोक्त ही है। निश्चित रूप से, संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रसंग में घोषणा की गई है कि नेपथ्य में योग की निज की श्रेष्ठ शक्तियों का तो यही है तद्विश्यक भारतीय श्रेष्ठ संप्रदायों के विश्व स्तर पर आधिमान्य स्थापना में हमारे राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कर्मठ प्रतिष्ठा का और सनातन परंपरा, हरिद्वार, उत्तर प्रदेश, भारत के योगाचार्य स्वामी स्वामीजी के योग-संचार-उपक्रमों का प्रशंसनीय योगदान भी शामिल है।
ज्ञात हो कि भारतीय मनीषा में अष्टांगिक योग की बड़ी महत्ता है। भारतीय वाङ्मय में पतंजल योग दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता, योगवासिष्ठ, बृहदारण्यकोपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, स्कंदपुराण, योगचूड़ामणि आदि ग्रंथों में 'योग' का विष गुणगान निहित है। योग के यहां 6 प्रमुख दर्शन स्थान दिए गए हैं। योग की महत्ता का गान कई महान भारतीय मनीषियों ने भी किया है।
'योग' शब्द के 32 अर्थ वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत-हिन्दी शब्दकोशों और अन्य शब्दकोशों में अंकित हैं, वहीं, 'योग' शब्द से जुड़े हुए हैं या उनके पर्याय रूप में 79 शब्द भारतीय जन-जीवन में खोए-मिले हैं। भारतीय लोकमानस में योग की ऐसी ही एक वैज्ञानिक पद्धति है।
महर्षि पतंजलि प्रणीत योगदर्शनम् में योगसूत्र ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ के अतिरिक्त श्रीकृष्ण के श्रीमद्भगवद्गीता में ‘समत्वं योग उच्यते’, ‘योगक्षेमम् वहाम्यहम्’, ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ प्रभृति सूत्रवाक्यरूप उवाच् यहाँ के लोकमन में जाने-अनजाने परिव्याप्त हैं। ‘श्रीमद् भगवद्गीता (2/48 ) में ‘सिद्ध्यसिद्धयो समो भूत्वा समत्वम् योगः उच्यते’ उवाचित करते हुए महाज्ञानी श्रीकृष्ण की देशना है कि योगबुद्धि से सिद्धि-असिद्धि की चिन्ता छोड़कर सर्वत्र ‘सम रूप हो जाने पर समत्व की प्राप्ति होती है,उसे ही योग कहा जाता है’। श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न अध्यायों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ‘योगयुक्त योगी को नियत-मानस, बलित-मानस, विगत कल्मष, दुःख-विनष्टकर्त्ता, परम-स्थान प्राप्त करने वाला, उत्तम सु,ख पाने वाला, आत्मा को शुद्ध करने वाला, ब्रह्म-मुनि और संकल्पबद्ध सन्यस्त कर्म-सन्यासी बताते हुए ‘योगयुक्त, योगविद्ध’ होने का निर्देश भी दिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न 18 अध्याय ‘योग के विविध प्रकार’: ज्ञानयोग, कर्मयोग, सन्यास योग आदि से समन्वित हैं।
योग से लभ्य विविध प्रलाभों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता, स्कन्दपुराण, श्वेतावतरोपनिषद्, पातंजल योगदर्शन, ‘योगचूड़ामणि’, महोपनिषद् , ज्ञानेश्वरी, रघुवंशम् आदि ग्रंथों में विस्तृत उल्लेख है। गीता के 7वें अध्याय में योगसिद्ध योगी को ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, निर्लोभी, जितेन्द्रिय और उच्च स्थान में स्थित बताया गया है। स्कन्दपुराण में योगी को विशिष्ट आभा से आमण्डित बताया गया है जिससे अपरिचित आगन्तुक भी योगी के प्रति श्रद्धा और प्रेम से अनुरक्त हो जाता है। योगी को मृदुभाषी, सत्यवक्ता निर्भय और सर्वदा प्रसन्नवदन बताते हैं स्कन्दपुराणकार भी। श्वेतावतरोपनिषद्कार योगी को आरोग्यवान्, मलोलुप्तं, शुभ शरीर-गंध वाला और आभावर्णी बताते हैं। पातंजलयोगदर्शनम् में योगी को ऋतम्भरा प्रज्ञा से समन्वित और ईश्वर-प्राप्ति में सक्षम बताया गया है। योगी को योग के सिद्ध होने पर अष्ट सिद्धियाँ की प्राप्ति भी बताई गई है वहाँ। ‘योगचूड़ामणि’ के अनुसार ‘योगासन’ से रोगों का नाश, ‘प्राणायाम’ से पापों का नाश, ‘प्रत्याहार’ से मन के विकार एवं अचंचलता की शान्ति, ‘धारणा’ से धैर्य की प्राप्ति, ‘ध्यान’ से निर्दिष्ट लक्ष्य पर एकाग्रता, चैतन्य की प्राप्ति और समाधि से परम शान्ति, मोक्ष की प्राप्ति लभ्य हो जाता है। महोपनिषद् में कहा गया है- ‘मनःप्रशममनोपायोयोगः इत्याभि धीयते’ अर्थात् मन के प्रशमन का उपाय योग है, इसीलिए योगी को ‘छिन्न संशय’ भी माना गया है। संत ज्ञानेश्वर भी ज्ञानेश्वरी में योगी को देवों का भी देव कहते हैं। उनके अनुसार योगी उदात्त चित्त और विचार वाला, असंकीर्ण होता है। वह एकेश्वर का साक्षात्-दर्शन करने में सक्षम होता है। महान् योगी भर्तृहरि के अनुसार योगसाधक की स्वरतंत्री में मधुरता आ जाती है, वह विरक्त काम, चिन्तनशील महात्मा, अटूट भक्त और वास्तविक अर्थों में मनसा-वाचा-कर्मणा व्यवहार में सन्यासी हो जाता है। योग के माध्यम से वह सामान्य जीवन-शैली से ऊपर उठ कर कर्मबन्धन से परे हो जाता है और सर्वत्र शिव अर्थात् परमात्मा के दर्शन करता है। ‘रघुवंशम्’ में कविकुलगुरु कालिदास भी योग का गुणगान करते हुए कहते हैं कि रघुवंशी राजा योग के माध्यम से प्राण-त्याग करते थे। ऐसे उल्लेख अनेकानेक हैं। कुल मिलाकर भारतीय वाङ्मय में ‘योग’ की महिमा का भरपूर गुणगान है।
बताते चलें कि जटिल भाव-भंगिमा औ किंचित् असहज प्रक्रिया वाले ‘योग’ शब्द का व्यवहारिक एवं सहज ग्राह्य अर्थ है ‘जोड़ना’ अर्थात् दो वस्तुओं को परस्पर इस तरह जोड़ना कि दोनों की स्वतंत्र स्वायत्त इयत्ता एक-दूसरे में समाहित हो जाए। ‘योग’ इसी आशय का अभिवाचक है। जोड़ने की क्रिया को इंजीनियरिंग की तकनीकी भाषा में वेल्डिंग (Welding) कहा जाता है। वेल्डिंग में दो वस्तुएँ चाहे वे दो तार हों, दो छड़ हों, दो पिण्ड हों, उनको आपस में इस ढंग से जोड़ा जाता है कि प्रसंगित योग-अभिक्रिया के समान एक की स्वतंत्र इयत्ता दूसरे में समाहित हो जाए। इंजीनियर बताएंगे कि ‘वेल्डिंग’ तभी पक्की होगी जब जोड़ने वाली वस्तु/पिण्ड परिशुद्ध शब्दान्तर से अशुद्धताओं से पूर्णतया रहित हो। आध्यात्मिक शब्दावली में ‘योग’ ईश्वर-अंश जीवात्मा (मानव आत्मा) को उसके मूलअंशी ईश्वर या कि परम-आत्मा या कि परब्रह्म या कि सर्वात्मा, या कि विश्वात्मा (Weltgiest) से जोड़ने के अर्थ का वाचक है। तदेव, सतत उच्चतर आत्मिक विकास का संसाधन है योग। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने ‘योग’ को मोक्ष-प्रदानक बताया है। अतएव, आध्यात्मिक जगत् में योग से एक विशिष्ट अधिलक्ष्य ‘मोक्ष’ अर्थात् ‘मानव-शरीर में स्थित जीवात्मा’ या कि ‘अनेकानेक अशुद्धियों वाले चित्त से सहयुजित आत्मा’ का योग के माध्यम से शुद्ध हो जाने पर परमात्मा में पूर्ण समेकन अर्थायित है। मानव की जीवात्मा में स्थित आत्मा को यदि परमशुद्ध परमात्मा से जोड़ना है तो वेल्डिंग के नियमानुसार विज्ञान की भाषा में कहें तो जिससे जोड़ा जाना है और जिसे जोड़ा जाना है, उन दोनों के समरूप या कि अशुद्धि रहित या कि परम विशुद्ध होने पर ही सजातीय आकर्षण बल (Cohessive Force) के कारण मजबूत और स्थायी जुड़ाव फलित हो सकेगा। एतदर्थ, आष्टांगिक योग-मार्ग अपना कर चित्तवृत्तियों के निरोध से मन या कि चित्त को निरोधित चित्तवृत्तियों वाला बना कर आत्मा को परमात्मा के समान ही शुद्ध बनाना होगा। वस्तुतः चित्त की वृत्तियाँ ही वे अशुद्धियाँ हैं, जिनसे आग्रस्त मानव का मन, बुद्धि, मस्तिष्क उसके मानसिक, वाचिक, कायिक कार्यों को तो अशुद्ध करते ही हैं, अपितु इन अशुद्धियों के मालिन्य से मानव-शरीर में स्थित विशुद्ध ईश्वरांश वाली आत्मा कलुषित होकर मानव की ‘जीवात्मा’ के रूप में जानी जाती है। योग के माध्यम से इन अशुद्धियों के दूर हो जाने पर मानव की जीवात्मा में स्थित आत्मा शुद्ध हो जाती है और परमात्मा से स्थायी जुड़ाव अर्थात् मोक्ष-प्राप्त करने के योग्य बन जाती है। इसीलिए पतंजलि ने योग अर्थात् परमात्मा से आत्मा के जुड़ाव के लिए चित्तवृत्ति-निरोध को अति-अति आवश्यक बताते हुए चित्तवृत्ति-निरोध को ही ‘योग’ का नाम दिया है।
औ...र, योग द्वारा साधक में किस प्रकार के सर्वदा प्रासंगिक परिवर्तन कारित होता है इसे समझने के लिए जानना होगा कि आइंस्टीन प्रभृति वैज्ञानिक द्रव्य (Matter) एवं ऊर्जा (Energy) के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। वे द्रव्य और ऊर्जा को परस्पर अन्तर्परिवर्तनीय मानते हैं। तदनुसार, वैज्ञानिक शब्दावलि में कहें तो कहना होगा कि परमात्मा में ऊर्जा का परिमाण अर्थात् क्वान्टम मानवात्मा की ऊर्जा के परिमाण अर्थात् क्वान्टम के सापेक्ष अत्यधिक होता है औ...र मोक्ष या कि परमात्मा से आत्मा का जुड़ाव तब तक नहीं हो सकता जब तक कि दोनों के क्वान्टम -ऊर्जा स्तर एकसमान या लगभग एकसमान न हो जाएँ। इस प्रकार, योग के आध्यात्मिक लक्ष्य ‘मोक्ष-प्राप्ति’ की इस पृष्ठभूमि में कह सकते हैं कि छोटे से ऊर्जापुंज को बहुत बड़े ऊर्जा पुंज से समेकित करने की प्रविधि योग है। तदेव, जिस तरह बड़े ऊर्जा पिण्ड से योगित होते ही छोटे ऊर्जा पिण्ड की ऊर्जा एवं शक्ति बढ़ जाती है, कुछ वैसी ही अभिक्रिया होती है योग से योग-साधक के तन-मन में। योग से मानव के ईश्वर से जुड़ने की प्रक्रिया में न केवल मानव के मन-तन को वरन् उसके मन और आत्मा को भी अपार शक्ति प्राप्त होती है। इस अपार शक्ति से आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ वाणी में माधुर्य, शरीर में आकर्षक गंध, व्यक्तित्व में प्रभावशीलता और चुम्बकीय आकर्षण सदृश अनेक शारीरिक, मानसिक लब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ये लब्धियाँ मानव के लिए व्यक्तिगत ही नहीं, वरन् सामाजिक महत्त्व भी रखती हैं। फलतः आधुनिक भौतिकतावादी युग में भी योग की प्रासंगिकता सर्वस्वीकार्य हैं भले ही आज कतिपय कथित विद्वान् विज्ञान के नाम पर अध्यात्मवाद आदि के नाम से बिदकते रहें।
योग-प्रविधि: जहाँ तक योग की प्रविधियों का विन्यास है, इस फलक पर महर्षि पतंजलि ने ‘चित्तवृत्तियों के निरोध’ के क्रम में योग के आठ अंग बताए हैं। ये अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। इसे ही ‘अष्टांग योग’ या कि अष्टांगिक योग कहा जाता है। इन अंगों को क्रमानुसार सिद्ध करने करने वाला योग-साधक अंततः जीवन्मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर मोक्ष का अधिकारी बनता है।
अष्टांग योग के प्रथम अंग ‘यम’ पाँच हैं। ‘यम’ के अंतर्गत है ’अहिंसा’ अर्थात् अकारण अन्य प्राणियों का मनसा-वाचा-कर्मणा उत्पीड़न, शोषण, हानि न करना, ‘असत्य न बोलना’ अर्थात् सदा सत्य बोलना, अस्तेय अर्थात् चोरी न करना, ब्रह्मचर्य अर्थात् इन्द्रिय-निग्रह और अपरिग्रह अर्थात् आवश्यकता से अधिक उपभोग्य भौतिक साधनों, सामग्रियों आदि को संग्रहित न करना। इनके समवेत से यति-मनस्विता जाग्रत हो जाती है।
अष्टांग योग के द्वितीय अंग नियम भी पाँच हैं- प्रथम है शौच अर्थात् तन-मन की शुचिता बनाए रखना, द्वितीय है सन्तोष अर्थात् लोभरहित वृत्ति, पराकाष्ठा तक किए गए परिश्रम के पश्चात् कृत कार्य के प्राप्त परिणाम में प्रसन्न रहना, तृतीय है तप अर्थात् भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वों को संयमपूर्वक सहन करना, चतुर्थ है स्वाध्याय अर्थात् लोकहितकारी शिक्षा, उपदेश, विचारणा देने वाले एवं आप्तजनों द्वारा सृजित शास्त्रादि का अध्ययन करना और प्रणव-जप करना अर्थात् ईश्वर को कभी विस्मृत न करना और पाँचवाँ ईश्वर-प्रणिधान अर्थात् अपने समस्त कर्मों को ईश्वरार्पण करते हुए निष्पन्न करना। इसे ही गीता में योगेश्वर कृष्ण ने निष्काम कर्मयोग कहा है।
योग की प्रासंगिकता के क्रम में समीचीन है यह बताना कि यम-नियम का जुड़ाव मानव के लौकिक जीवन की उन्नति से भी है।
योग का तृतीयांग है ‘आसन’ अर्थात् शरीर की विविध मुद्राओं में बैठना, लेटना आदि। अधुना युग में ‘आसन’ योग का सर्वाधिक प्रचलित स्वरूप है। आसन से जीव-विज्ञान के अनुसार विविध अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों (एण्ड्रोक्राइन ग्लैण्ड्स्) से निःसृत हारमोन्स, साथ ही अनेकानेक अंगों यथा अनेक आमाशयी पैप्टिक ग्रन्थियों, ड्यूओडिनम, लीवर, पैंक्रियाज, आईलेट्स ऑफ लैंगरहैन्स आदि-आदि से निःसृत होने वाले अनेक पाचक रस आदि स्वतः निःसृत होते रहते हैं जिनके अनियमित या कम-अधिक होने से अनेकानेक बीमारियाँ घेर लेती हैं। इनका उत्पादन एवं स्रवण शरीर की विविध मुद्राओं अर्थात् आसनों के अभ्यास से घटाया-बढ़ाया जा सकता है। योगासन व्यवहारर्यतया शारीरिक व्यायाम हैं जो मानव के शरीर के चयापचय (मेटाबोलिज्म) को सुचारु बनाता है। तदनुसार योगासनों के कुछेक दिन, कुछेक माह के अभ्यास से अनेक रोग स्वतः निरोधित हो जाते हैं। इस प्रकार योगासन की उपयोगिता और तद्वत् उसकी प्रसंगिकता भी सहज देख्य है।
योग का चतुर्थ अंग है ‘प्राणायाम’। लोक में सम्प्रति ‘आसन’ के बाद सर्वप्रचलित योगांग है ‘प्राणायाम’। प्राणायाम वस्तुतः ‘श्वास-प्रश्वास’ पर नियंत्रण करने की अभिक्रिया है जो भौतिक रूप से आक्सीजन की अधिकतम मात्रा को शरीर के अन्दर पहुँचाती है और शरीर में उत्पन्न कार्बन-डाई-ऑक्साइड आदि विषाक्त वायु को शरीर से बाहर करती है। प्रकट है कि शरीर को समुचित आक्सीजन युक्त वायु मिलेगी तो शरीरांगों के समुचित सक्रिय होने पर अंतःस्त्रावी ग्रंथियों आदि से निःसृत होने वाले हारमोन एड्रीनेलिन, डोपामीन, सोरोटिन आदि का निःसरण भी संतुलित हो जाएगा, तदेव, प्राणायाम के सुफल से अनावश्यक चिन्ता, नैराश्य, कुण्ठा आदि से छुटकारा मिल जाता है जिससे साधक में आत्मविश्वास बढ़ता है और उसका मन प्रफुल्लित होने से उसके शरीराभा, मुखाभा में आशातीत चमक बढ़ जाती है।
योग का पाँचवाँ अंग ‘प्रत्याहार’ है जिसका अर्थ है ‘मन का निरोध होना’ जिससे इन्द्रियाँ अर्थात् आँख, नाक, कान, स्वादेन्द्रिय जिह्वा, स्पर्शेन्द्रिय त्वचा अपने-अपने विषयों से आसक्ति-रहित होकर व्यवहार करें। प्रत्याहार द्वारा साधक एकाग्रता द्वारा अपने मन को इस प्रकार का बनाता है कि नेत्र दृश्य को, कान ध्वनि को, नाक गंध को, जिह्वा स्वाद को, त्वचा स्पर्श को आसक्तिरहित होकर ग्रहण करे, इन्द्रिय-विषयों की मोहकता से आसक्त होकर बँध कर अपने कर्त्तव्य और ईश्वर से विमुख न हो । ऐसा तभी संभव है जब साधक सात्त्विक आहार द्वारा अपने विचार और आचार को सात्त्विक रखे। प्रत्याहार प्रकारान्तर से साधक द्वारा सात्त्विक आहार, विहार, विचार को अपनाने का निर्देश होता है । वास्तव में अनेक शारीरिक भौतिक आधि-व्याधि का कारण, दुःख का कारण मानव-मन की प्रत्युत चित्त की अस्थिरता एवं चंचलता होती है जबकि प्रत्याहार भी मन या चित्त को शमित करने का सक्षम उपाय है जिससे योगी को आधि-व्याधि से छुटकारा स्वतः लभ्य हो जाता है।
योग के छठें अंग को ‘धारणा’ कहते हैं। ‘चित्त को किसी भी विषय पर स्थिर करके चित्त की वृत्तियों को स्थिर अर्थात् चंचलतारहित करना’ ही धारणा है। वह विषय जिस पर चित्त स्थिर करके चंचलतारहित बनाया जा सकता है, वह अपने ही शरीर का कोई अंग यथा मूर्धा, मस्तक, हृदय, नासिकाग्र, नाभि आदि अथवा कोई बाह्य विषय जैसे दीपक की लौ, चक्र, ओंकार-जप, गायत्री मंत्र आदि का जप आदि हो सकता है। तदेव, ‘धारणा’ में साधक को मन-वचन-कर्म से विशिष्ट आत्मिक, आध्यात्मिक उन्नयन के अधिलक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मन को वश में करके एकाग्र करना होता है। धारणागत एकाग्रता मात्र योग-मार्ग हेतु ही नहीं, अपितु जीवन के अन्यान्य परिप्रेक्ष्यों में भी लाभकारी और सर्वदा प्रासंगिक है।
योग का सातवाँ अंग है ‘ध्यान’। किसी अंतः या बाह्य विषय पर एकाग्र कर चंचलतारहित किए हुए चित्त से सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म या कि परमेश्वर में अपने मन की वृत्ति अर्थात् अपनी चित्तवृत्ति को सतत् बाँधे रखना ही ‘ध्यान’ कहलाता है। इस प्रकार ध्यान में साधक किसी विशिष्ट निर्दिष्ट लक्ष्य पर अपना ‘ध्यान’ प्रकारान्तर से अपनी मनस्-क्रिया या कि अपने विचार को संकेन्द्रित करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस योगांग से साधक में एकाग्रता बढ़ती है, कर्म-कुशलता प्राप्त होती है और मानसिक शान्ति और आनन्द की अनुभूति बढ़ती है।
‘समाधि’ योग का अन्तिम और आठवाँ अंग है। ‘ध्यान’ का स्वतःप्राप्त परिणाम होती है ‘समाधि’ अर्थात् बाह्य संसार से पूरी तरह विमुख होकर मानव की चित्तवृत्तियों का पूरी तरह अन्तर्मुखी और अचंचल होना। कहते हैं समाधि अवस्था में ही योगी को परमपिता परमात्मा परब्रह्म परमेश्वर और अपनी आत्मा के विशुद्ध स्वरूप की साक्षात् अनुभूति होती है। समाधि के द्वारा साधक ‘निर्वाण या कि मोक्ष की प्राप्ति हेतु आवश्यक चित-स्थिति’ अर्थात् ‘जीवन्मुक्ति’ प्राप्त कर लेता है। जीवन्मुक्ति की स्थिति में देह त्यागने पर साधक को मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है। इस स्थिति में ही साधक की बुद्धि अति परिष्कृत होकर ऋतम्भरा प्रज्ञा की अवस्था प्राप्त कर लेती है जिससे साधक को अनेक सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। योगदर्शन में समाधि के 4 पाद अर्थात् चरण या कि अवस्थाएँ बताई गई हैं जिन्हें ‘साधन पाद’, ‘समाधि पाद’, ‘विभूति पाद’ और ‘कैवल्य पाद’ का नाम दिया गया है। महर्षि पतंजलि के ‘योगदर्शनम्’ के अनुसार योग की सिद्धावस्था के तृतीय चरण में ‘विभूतिपाद’ नामक अवस्था में साधक को अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं। समाधि के चौथे चरण में भी साधक को अनेक सिद्धियाँ और कैवल्य की सिद्धि प्राप्त होती है। समाधि से फलित ‘जीवन्मुक्ति’ की दशा में साधक पंचक्लेशों से मुक्त हो जाता है। उसके मनोमस्तिष्क में अतीव शान्ति और आनन्द की अनुभूति रहती है। उसके चित्त में लोभ, राग, द्वेष, व्यग्रता, कुण्ठा, हताश, नैराश्य, क्रोध, हिंसा-भाव आदि-आदि नकारात्मक भावनाएँ पूर्णतया विलोपित हो जाती हैं। इसीलिए वह सबके प्रति निष्पक्ष एवं न्याययुक्त व्यवहार करता है। कहना न होगा कि मानव-समाज का प्रत्येक सदस्य यदि समाधि के अभ्यास से प्राप्त जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त कर राग-द्वेष आदि नकारात्मकताओं से विमुक्त हो जाए तो समाज में अपराध-वृत्ति स्वतः कम होगी और तब सामाजिक शान्ति स्वयमेव प्राप्त हो जाएगी। इस तरह ‘समाधि’ की भी विशिष्ट प्रासंगिकता है।
योग को मोक्षप्रदाता कहा जाता है इसलिए कि ‘योग’ के अष्टांगों द्वारा अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा जीवात्मा, जो प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश एवं आनन्दमय कोश नामक चार सूक्ष्म आवरणों से आवृत्त ईश्वरांश विशुद्ध आत्मा है, उस जीवात्मा की अशुद्धियों को पर्त दर पर्त निराकृत कर जीवात्मा को अपने विशुद्ध आत्मिक स्वरूप को प्राप्त कराने में और तदनुसार अंशी को अंश से योगित करने में समर्थ सिद्ध होता है। इस प्रकार ‘योग’ वास्तव में वह उपक्रम है जिसके द्वारा तन-मन, बुद्धि की अशुद्धियों को निराकृत करके मानव-देह में स्थित जीवात्मा का परिष्कार किया जाता है। ऐसा परिष्कार मानव-जीवन को उच्चतर, श्रेष्ठतर बनाने के क्रम में भी सर्वथा उपयोगी है। अतएव, ‘योग’ भारतीय या कि सनातनी चिन्तन धारा का आध्यात्मिक प्रत्यय है, इस आधार पर पाश्चात्य अपसंस्कारों के दुष्प्रभाव में नाक-भौं सिकोड़ कर योग को त्याज्य मानने के बजाय श्रेयस्कर होगा कि योग की वस्तुनिष्ठ सार्थकता को तद्गत वस्तुनिष्ठ सर्वोपयोगिता को स्वीकार किया जाए जो नितान्त सुतार्किक और सर्वथा सुसंगत स्वयंसिद्ध है।
बताते चलें कि उक्त पातंजलि योग-सूत्र के अष्टांगिक योग प्रविधियों के अतिरिक्त योग के सन्दर्भ में भारतीय मनीषा में दो अन्य प्रमुख सूक्त-कथन भी उल्लेख्य हैं- 1. योगक्षेमम् वहाम्यहम्, 2. योग: कर्मसु कौशलम् । दोनों सूक्त श्रीमद्भगवद्गीता में अध्याय 9 में महाज्ञानी योगिराज विराट् पुरुष श्रीकृष्ण द्वारा प्रकथित हैं। ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ का अर्थ है- योगी द्वारा योगमार्ग में प्राप्त उत्तरोत्तर यौगिक स्थितियों का क्षेम अर्थात् रक्षण का दायित्व विराट्पुरुष या कि परमात्मा स्वयं निर्वहित करते हैं। कहने का आशय यह है कि योग-मार्ग में प्रवृत्त साधक शीघ्र ही परमात्मा की इतनी कृपा एवं निकटत्व प्राप्त कर लेता है कि साधक की यौगिक उपलब्धियों का रक्षण करने के लिए अर्थात् साधक को योग-मार्ग से स्खलित न होने देने वाली स्थितियाँ प्रदान करने की आश्वस्ति परमात्मा स्वयं प्रदान करता है।
दूसरा सूक्त ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ में श्रीकृष्ण ने कर्म को कुशलता से सम्पन्न करना भी योग कहा गया है। इसका वैखरी, लक्षणा और व्यंजनापरक अर्थ विचक्षण है। वास्तव में कुशलता से कर्म करना तभी सम्भव है जब चित्त की वृत्तियों की पूर्ण चंचलता को अर्थात् चित् के इधर-उधर भटकाव को अंकुशित और निरोधित कर पूर्ण एकाग्रता एवं तन्मयता से कर्म किया जाए। इस विधि द्वारा कर्म करने से ही कर्म में न केवल सुघरता और कुशलता आती है, वरन् तभी कर्म करने का उद्देश्य भी पूर्ण होता है। इस सूक्त की भी वैयक्तिक एवं सामाजिक उपादेयता अपरिमित है।
समीचीन है यहीं यह कहना भी कि ‘योग’ शब्द और उसकी प्रक्रिया सहज सरल नहीं है, अपितु अति निगूढ़ है। तदपि योग को व्यवहारतया मनसा-वाचा-कर्मणा अपनाना असम्भव नहीं है और यह सर्वथा मानव-समाज के लिए परमोपादेय है इसलिए कि ‘योग’ चित्तवृत्तियों का निरोध करता है। यह निरोध आवश्यक इसलिए है कि चित्तवृत्तियाँ पाश्चात्य मनोविज्ञानी मैक्डूगल द्वारा इंगित 14 मानी जाएँ अथवा भारतीय मनीषियों द्वारा प्रणीत 49, वे सभी ऐन्द्रिक ज्ञान से पल्लवित तदेव, ऐन्द्रिक ऐषणाओं से आभरित होती हैं। साथ ही, वे ऐन्द्रिक ऐषणाओं को प्रज्ज्वलित करने में भी समर्थ होती हैं। चित्तवृत्तियाँ प्रायः रजस्, तमस् प्रवृत्तियाँ कारित करती हैं। फलतः मानव-मन अविद्या, अहंकार, राग-द्वेष, अभिनिवेश आदि पंचक्लेश तथा पंचविकार आदि से ग्रसित होकर सतत अधोगामी होता जाता है। वहीं, ऐसी प्रवृत्तियों से प्रसूत मनस्-अवरोह मानव से अनेक नैषध कर्म, हेय कर्म, अपकर्म, पाप कर्म, हिंसा आदि भी करा लेने में समर्थ होता है। दूसरी ओर, वे चित्तवृत्तियाँ जो प्रकटतया सात्त्विक दिखती हैं, वे भी व्यक्ति में अहम् उत्पन्न करने में सक्षम होती हैं। अहम्वादी व्यक्ति भी अंततः रजस्, तमस् से आक्रान्त हो जाता है। अतएव, परम शुद्ध, परम सात्त्विक और राग-द्वेषादि चित्तवृत्तियों से सर्वथा रहित, परम शान्त परमात्मा से मानव-शरीर में स्थित आत्मा या कि मानव की जीवात्मा के योगित होने के लिए चित्तवृत्तियों का समुचित निरोध वैयक्तिक, सामाजिक एवं सांस्कारिक हितसाधन हेतु अपरिहार्य है, जो योग से ही फलित होता है।
परिस्पष्टतया ‘योग’ न तो मात्र आसन या कि शारीरिक व्यायाम है और ना ही यह मात्र प्राणायाम ही है। हाँ, योग के उपरि इंगित अन्यान्य अंग के मनसा-वाचा-कर्मणा पालन के साथ ही आसन और प्राणायाम आदि को भी सिद्ध किया जाए, तो योग मानव के लौकिक जीवन में बहुविध उत्कर्ष प्राप्त करने का अप्रतिम संसाधन तो है ही, साथ ही यह मानव की आध्यात्मिक उन्नति को भी प्रशस्त कर देता है। योग के अष्टांगों से साधक के तन-मन-बुद्धि, चित्त, जीवात्मा आदि की शुद्धता, सात्त्विकता, पावनता आदि सतत उत्कर्षित होती जाती है जिससे साधक को कल्पनातीत वैयक्तिक और सामाजिक प्रलाभ प्राप्त होता है।
इसप्रकार, अष्टांंिगक योग सुचारु वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक हितकारी प्रक्रियापरक प्रविधि है जिससे साधक मनुष्य को यति-मनस्विता अर्थात् राग-द्वेष रहित, निस्पृह, निर्लोभी, परोन्मुखी, सर्वकल्याणक मनस्विता और तन-मन-बुद्धि की निर्मलता प्राप्त होती है। तदेव, वर्तमान के भौतिकतावादी बाजारवादी युग में लोभ-मोह स्वार्थ आदि से ऊपर उठ कर यति-मानसिकता प्रदान करने वाले भारतीय मनीषा के अप्रतिम अवदान भारतीय संस्कृति की अप्रतिम धरोहर ‘योग’ को वर्तमान युग में (और प्रत्येक आगत युग में भी) अनेकानेक आकांक्षाओं की झंझाओं से घिरे मानव के लिए वैयक्तिक एवम् समष्टिगत संस्तरों पर बहुशः अति प्रासंगिक स्वीकारना ही वस्तुगत सत्य का स्वीकार होगा। वास्तव में योग की प्रासंगिकता मात्र वर्तमान तक ही सीमित नहीं है, अपितु योग की प्रासंगिकता सार्वकालिक, सार्वदेशिक और सार्वजनीन है-- इसमें कोई सन्देह नहीं है।
हर्षप्रद ने कहा कि विश्व योग दिवस के माध्यम से भारतीय खनिज योग को उनके सर्वजनीन सर्वोपयोगिता के स्वीकार एवं अंगीकार की दिशा में विश्व योग जोन द्वारा कदम आगे बढ़ाया गया है। सम्प्रति आशा की जा सकती है कि शीघ्र ही वह दिन भी साकार हो जाएगा जब विश्वास जन-जन द्वारा अष्टांग योग के सर्वसिद्ध महत्ता को स्वीकार किया जाएगा और योग के नाम पर मात्र आसन और प्राणायाम द्वारा 'योग' न करके योग के संपूर्ण आठ अभ्यासों को मनसा-वाचा-कर्मणा अपना कर सात अर्थों में पूर्णता छोड़ दी जाएगी। शुभस्य शीघ्रम्।
आधार पाठ -
* ईशादि नौ उपनिषद: भाष्यकार: शंकर:
*पतंजलि योग-दर्शन: व्याख्याकार राजवीर शास्त्री
* बृहदारण्यक उपनिषद: भाष्यकार:आचार्य शंकर्य
* योग एवं न्याय दर्शन: संहिताकार श्रीरामाचार्य शर्मा
*योग तत्व-दर्शन: कृतिकार: डॉ. कुमार पैवेलियन 'साहित्येंदु'
* श्रीमद्भगवद्गीता: संपादक पं. सत्यानन्द जी वेद वागीश
* www.Wikipedia.org
विशेष: अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: 21 जून के सिद्धांत में आकाशवाणी जापान-अयोध्या से 19 जून 2023 को मूल दर्शन का परिवर्द्धित संस्करण प्रसारित किया गया।
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