कविता : एक दृष्टि यह भी
कविता क्या है --- इस विषय को ऋक् युग से अब तक भारतीय और भारतीयेतर काव्यज्ञ बराबर विमर्शित करते चले आ रहे हैं। अरस्तू के समय से इस बिन्दु पर विवाद रहा है कि कविता मनोरंजन, सौन्दर्यबोध, वैयक्तिक भावों की अभिव्यक्ति या स्वगत/समष्टिगत नकारात्मकताओं से प्रतिजनित मानवीय संवेदनाओं का प्रतिफलन है या कुछ और। अनेक काव्यज्ञ यथा इलियट कविता को ‘अच्छी कविता बनाम महान् कविता’, आचार्य भामह ‘अच्छी कविता बनाम बुरी कविता’, डि क्विंसी के शब्दों में ‘शक्ति की कविता बनाम ज्ञान की कविता’ सदृश विभाजनों में विभाजित करते रहे हैं। होरेस और आचार्य क्षेमेन्द्र आदि औचित्यवादी कविता की वकालत करते हैं, वहीं, लांजाइनस कविता में औदात्य पर बल देते हैं। आदि-महाकवि वाल्मीकि कविता में ‘महत् क्व’ की आवश्यकता उकेरते हैं जिसमें औदात्य स्वतः समाहित है। कविता से स्पेन्सर ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ और मिल्टन ‘पाथ ऑफ गॉड टु मैन’ की अपेक्षा करते हैं, तो जॉन ड्रिंक वाटर कविता का लक्ष्य ‘टु स्कूर्ज द टायरैनी’ बताते हैं। आचार्य भरत कविता से श्रान्ति के उपासक हैं। भक्तकवि संत तुलसीदास ‘सुकवि’ और ‘कुकवि’ का रेखांकन प्रस्तुत करते हैं जिसके लिए वे सर्वहित और नयवादी सात्विक सुविचार के निकष प्रस्तावित करते हैं। जबकि प्लेटो सदृश अनेक पाश्चात्य विद्वान् कविता की उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हैं। बीसवीं शती ई0 के अन्तिम दशक में कविता की मृत्यु की घोषणा भी कुछेक मतिभ्रमों द्वारा की जा चुकी है।
प..र..न्तु , सच यह है कि कविता ‘द्यौरिव पुष्यति’, ‘छन्दांसि यज्ञाः भूतम् भव्यं सृजते’ (हर जीव को ‘भव्य’ सृजित करने) सदृश पावन आक्षरिक अभिकर्म का उपादान है। कविता परम शिष्ट के द्वारा लोकयात्रा के सुसम्पन्न करने का संसाधन है। कविता ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’, ‘शिवेतर क्षतए’ एवं ‘व्यवहारविदे’ प्रयोजनों से लक्षित है। कविता ‘रागात्मक संवित् संचेतना’ की प्रेरक है। कविता ‘तमोनुबेधक’ है। कविता सत्, शिव, सुन्दर की ऋतशील, नयशील, ज्ञानशील, ऊर्ध्ववाही, लोकसंग्रही अक्षराराधना है। कविता ‘नानृषिक कवनीय कर्म’ है। कविता उच्चतर भावदशाप्रदायी और मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने का उपक्रम है। कविता ऐसे ही अन्यान्य लोकमांगलीय सर्वहितकारी अधिलक्ष्यों के अणोरणीयाम् अनुस्मरण का माध्यम है।
कविता के उपर्युक्त सद्गुणों का प्रमाण ही है कि मानव-इतिहास के ज्ञात विगत 10,000 वर्षों में कोई वस्तुनिष्ठ साहित्यसेवी, लेखक या कवि चोर/डकैत/बलात्कारी नहीं हुआ। आ0 रामचन्द्र शुक्ल अकारण नहीं कहते कि कविता सतत उच्चतर भावदशा की प्रदाता है। आ0 हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कथन भी निराधार नहीं है कि कविता से मनुष्य बेहतर मनुष्य बनता है। जोसेफ ब्राडस्की का भी कहना निरर्थक नहीं है कि कवितासेवी मनुष्य स्वतः ही छल-छद्म से दूर होता जाता है।
फिर भी कविता/साहित्य की उपेक्षा ? इस उपेक्षा से तो व्यक्ति और समाज का गम्भीर अहित ही होगा !
अतएव, यदि व्यक्ति/समाज में सत्, न्याय, शिवत्व, ऋतत्व आदि काव्य-नयत्व के अंगभूतों का विलोप दिखता हो, तो हर सहितभावी कवि का दायित्व है कि वह व्यक्ति और समाज को सार्वहितकारी नयसाली कविकर्म की ओर उत्प्रेरित करे।
जहाँ तक कविता की उपयोगिता का फलक है, उस फलक पर बताते चलें कि हजार वर्ष पहले जब हमारे देश का स्वर्णकाल था राजा भोज के राजकाल तक, राज्य का श्रमिक बुनकर संवर्ग भी कविता कर सकता था, प्रयत्न करने पर श्रेष्ठ कविता भी बुन सकता था। राजा भोज स्वयं कविताप्रेमी थे। वे कविता को निरर्थक नहीं अपितु परिष्कारक मानते थे। गोपालकों और स्त्रियों तक सम्प्रेषित हो जाए जो कविता, कविता-मीमांसक राजशेखर उसे ही वास्तविक कविता मानते थे। उनके युग में कविता की ऐसी परिव्याप्ति थी।
तब....अब क्या हो गया कि कविता करने की कौन कहे, कविता पढ़ने से ही अरुचि उत्पन्न होती जा रही है आज। फेसबुकी या इसी प्रकार के कतिपय अन्य कवियों/लेखकों को भी गिन लें तो सवा अरब की भारतीय जनसंख्या में 12,500 लोग (0.00001 प्रतिशत) भी नहीं मिलेंगे जिनका कविता/साहित्य से अधिक लेना-देना आज के युग में शेष बचा हो। समाचार-पत्रों में साहित्यिक पृष्ठों का और बुद्धू बक्से से साहित्यिक कार्यक्रमों का लगभग विलोप इसी का प्रतिफल है।
कविता/साहित्य की ऐसी दुर्गति वह भी ‘भा + रत’ भूमि पर ! औ..र, वह भी तब जबकि साहित्य/कविता से लभ्य होने वाली ऊर्ध्ववाही उच्चतर भावदशा और परोन्मुखता, समाजोन्मुखता अन्यान्य किसी भी विषय यथा विज्ञान, तकनीकी विज्ञान, मनोविज्ञान, खगोलशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, नृतत्वशास्त्र, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, वाणिज्यशास्त्र आदि-आदि से लभ्य नहीं हैं। वस्तुतः सर्वहितवादी नैतिकता एवम् नैतिकतावादी सर्वहित का समुचित भान कराने वाले ‘साहित्य’ (काव्य) का पद्य रूप है कविता।
औ...र, काव्य से अभिप्रेय ‘साहित्य’ के लिए सारतः कह सकते हैं कि निर्दोष गुणों वाले शब्दों से संघटित, सुविचारों से सुसज्जित, सत्-शिव-सुन्दर की ऊर्ध्ववाही ज्ञानशील, ऋतशील, नयशील, लोकमांगलीय आक्षरिक साधना और तद्गत पावन लोकसंग्रही रचना है ‘साहित्य’। ऐसे साहित्य की ही आह्लादकारी भाव-प्रवण कल्पनाशील, सहज, सरस, अलंकृत लयात्मक विधा है ‘कविता’।
अस्तु ‘कविता क्या है’ के विषय के ‘क्या, क्यों, कैसे’ को सही परिप्रेक्ष्य में विमर्शित किया जाना आवश्यक है, तभी कविता के सार-तत्त्वों तक पहुँचा जा सकता है। इस क्रम में सारे विभ्रम और सारे पूर्वाग्रह को परे झटक कर भारतीय और भारतीयेतर काव्यज्ञों के सारवान् निष्कर्षों को नए सिरे से कषित किया जाना उपादेय है और समीचीन भी। इस विषय में पाश्चात्यमुखापेक्षा उचित नहीं है।
विदित हो कि भारतीय काव्य-विमर्श विश्व के प्राचीनतम दस हजार वर्ष पुराने काव्य-ग्रंथ ऋक् वेद के समय से प्रारम्भित हुआ है जिसमें ‘स कविः काव्या पुरुरूपम् द्यौरिव पुष्यति’ और ‘छन्दांसि यज्ञाः .... भूतम् भव्यम् सृजते ....विश्वमेत’ सदृश श्रेष्ठ काव्य-निकष निकषित हैं। तेनेव, किसी पूर्वाग्रह में केवल पाश्चात्य काव्य-निकषों के आधार पर आर्ष भारतीय काव्य-निकषों को उपेक्षित नहीं किया जा सकता उसी प्रकार वैश्विक ग्राम (ग्लोबल विलेज) बनती आज की दुनिया में भारतीयेतर काव्य-विमर्शों का अनुशीलन कदापि त्याज्य नहीं है।
तथैव, ‘कविता’ के ‘क्या, क्यों, कैसे’ को उसके जान्मिक, मिथकीय, दैवीय, ऐतिहासिक, तात्विक, पारिभाषिक आधारों पर साथ ही देश-विदेश के कवि-जगत् के 800 से अधिक प्रख्यात कवि लोकमत के आधारों पर समझने-समझाने के लिए इन पंक्तियों के लेखक द्वारा कृति ‘कविता क्या है’ (प्रकाशक: सरिता लोकसेवा संस्थान, सुल्तानपुर) विरचित की गई है।
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