(1)
यमराज की पराजय
तीन दिन से बेहोश था सत्यवान्। लगभग कोमा की स्थिति चल रही थी।
यमराज सिरहाने खड़े थे।अचानक कुनमुनाया था वह बेहोशी में ही।
चलो कर ही लेते हैं मनसा तरंगों के माध्यम से इनसे दो-चार बातें।
सत्यवान् ने स्वयं के चैतन्य को सहेजा था।
“ प्रणाम, यमराज जी ! ”
उसी अवस्था में प्रणाम किया था सत्यवान् ने।
“ तुम्हें स्वयं पर अभिमान हो गया है क्या ? तुमने मेरे दूतों को वापस लौटा दिया यह कह कर कि यमराज आवेंगे लेने, तभी जाऊँगा मैं यमलोक। ”
आक्रोशपूर्ण स्वर में बोले थे यमराज।
“ नहीं, महाराज ! अभिमान नहीं, बल्कि आपके ही हित की बात करनी थी मुझे, जिसके पहले मैं यमलोक चला जाता तो आपका अहित हो जाता। ”
“ मेरे हित की बात ?......मेरा अहित ?? ”
“ क्या यमराज पद से जी भर गया है आपका ? ” सत्यवान् ने प्रतिप्रश्न किया।
“ क्यों ? ”
“ आप जानते हैं कि आजकल मैं एक चैरिटेबिल सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल बनवा रहा हूँ। आप यह भी जानते होंगे कि पूरे जवार में दूसरा कोई नहीं जो यह पुण्य कार्य सम्पन्न कर सके। मेरे यमलोक चले जाने से, अस्पताल का निर्माण और इसे चलाने की सुचारु व्यवस्था....अधबीच में छूट जाएंगे। त..ब असहाय दुःिखयारो का कष्ट-निवारण कैसे होगा ? तब दुःिखयारों की हर आह-कराह से आपको पाप लगेगा या नहीं ? पाप के बढ़ने से आपके पुण्य क्षीण होंगे या नहीं ?”
थोड़ा ठहर गया था सत्यवान् । उस पर भारी पड़ रही थी उसकी बेहोशी। कुछ क्षण रुक कर पुनः बोला था वह-
“ यमराज का पद आपके संचित पुण्यों के बल पर ही मिला है आपको ? पुण्य क्षीण होने पर इस पद पर कैसे बने रहेंगे आप ? ”
यमराज सकपका उठे थे। पुण्य क्षीण होने का भय अन्दर तक हिला गया उन्हें।
सत्यवान् ने भाँप लिया यमराज का भय। उसकी चेतना कुछ बलवती हो गई।
अनुरोध भरे स्वर में पुनः बोला वह -
“ मैं आपके हित की बात सोच रहा हूँ। आपका हित इसी में है कि मुझे यमलोक ले जाने का विचार इसी क्षण त्याग दें। अस्पताल-निर्माण के लिए 3 वर्ष, उसके संचालन की सुव्यवस्था बनाने हेतु बाद के 5 वर्ष ...... कुल 8 वर्ष तक स्वस्थ, सक्रिय, अबाधित जीवन जीने दें मुझे आप। ”
यमराज स्तब्ध खड़े थे।
लेकिन इतनी शीघ्र हार कैसे मान लेते वे।
“ तुमने अब तक के जीवन में क्यों नहीं पूरे कर लिए ये काम ? .... और इस तरह तो एक गलत परम्परा स्थापित हो जाएगी। हर कोई चालबाजी में जीवन के अन्तिम दिनों में कोई न कोई पुण्य का काम करने का बहाना खोजने लगेगा। तब, जीवन-मृत्यु की व्यवस्था भंग नहीं हो जाएगी ? ”
यमराज ने सत्यवान् के अट्ठे पर अपनी समझ से नहला-दहला दोनों जड़ दिया था एक साथ।
सत्यवान् निढाल होने लगा था।
उसने पुनः सचेत किया स्वयं को अन्तिम संवाद के लिए।
पुनः रुक रुक कर बोला वह -
“ नहीं, कोई गलत परम्परा स्थापित नहीं होगी, महाराज ! ...... आप धर्मराज हैं और न्यायाधिकारी भी। न्याय जी0 टी0 रोड पर टहलने जैसा काम नहीं है कि आँख बन्द करके बढ़ते जाओ। न्याय में इसीलिए कर्त्ता की मनोदशा की विवेचना की जाती है; उसके आशय को देखा जाता है। न्यायाधिकारी अपनी प्रमा से, विवेक से इसीलिए प्रकरण-दर-प्रकरण विवेचना करके अलग-अलग निर्णय अवधारित करता है। तब, अनुचित परम्परा का प्रश्न कहाँ उत्पन्न होता है ?...........और आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि अस्पताल-निर्माण जैसे कार्य को निष्पन्न करने के लिए भारी संसाधन आवश्यक होते हैं। अब तक के जीवन में इन संसाधनों को ही तो जुटाता रहा हूँ मैं। संसाधन जुटते ही अस्पताल-निर्माण आरम्भ करा दिया मैंने। कहीं कोई चालबाजी नहीं है मेरे प्रकरण में। शेष आपकी इच्छा। ”
बेहोशी पुनः भारी पड़ने लगी सत्यवान् पर।
यमराज हतप्रभ थे। सत्यवान् के तर्कों में बल दिख रहा था उन्हें।
“ मान लेता हूँ अपनी एक और पराजय। सतयुग में नचिकेता और बाद में सावित्री के तर्कों से पराजित हुआ था मैं औ..र आज कलियुग में तुम्हारे तर्कों से।
चलो 8 वर्ष का जीवन दान दे रहा हूँ तुम्हें। किन्तु आज से ठीक 9वें वर्ष के प्रथम दिन आऊँगा मैं तुम्हें लेने और तब कोई तर्क, कोई बहाना नहीं सुनूँगा मैं। ”
अपनी एक और पराजय स्वीकार करके यमराज विफल मनोरथ लौट पड़े।
सत्यवान् की चेतना लौटने लगी थी। अचानक आँखें खोल दी थी सत्यवान् ने।
(शीघ्र प्रकाश्य कहानी-संग्रह ‘धरती क्षितिज में’ से)
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(2)
हुडु़कचुल्लू
“ अच्छा है, कालोनी में ही ट्रांसपोर्ट-सुविधा भी उपलब्ध हो रही है ! ” मि0 चड्ढ़ा ने व्यंग्य में कहा।
मेरे घर की सीध में 11 वें फ्लैट के सामने जहाँ कल एक था आज दो ट्रक खड़े थे। उन्हीं को लेकर व्यंग्य कस रहा था वह। 4-5 दिन पहले ही आया था उस फ्लैट में नया परिवार।
कहाँ तो निकला था मैं ‘ मार्निंग-वाक ’ पर और कहाँ मि0 चड्ढ़ा का यह व्यंग्य ! मन अनमन-सा हो गया।
“ व्यंग्य क्यों कस रहे हैं आप ? ठीक है कि ‘कालोनी वेलफेयर कमेटी’ का सचिव हॅूँ मगर इसका अर्थ यह नहीं कि यहाँ कहीं कुछ गड़बड़ हो तो मुझे सूली पर लटका दिया जाए। आइए, चल कर बात कर लेते हैं उन सज्जन से। ” मैंने किंचित् रोष से कहा।
“ नहीं ऽ ! मुझे दूसरे जरूरी काम हैं। मैं नहीं जा पाऊँगा। आप सेक्रेटरी हैं, चाहें तो बात कर लें कभी बाद में कि इस तरह कालोनी का आवागमन अवरुद्ध हो सकता है। ”
प्रकट था कि मि0 चड्ढा कन्नी काट रहे थे।
शायद नवांगतुक को बिना ठीक से जाने-समझे उससे उलझाव करने से स्वयं को बचाना चाह रहे थे वे।
मि0 चड्ढा तो चले गए म-ग-र, बात तो करनी ही होगी मुझे, नहीं तो अगली बैठक में बड़ी टाँग खिंचाई करेगा ये चड्ढा।
तो फिर बाद में कभी क्यों ? क्यों न आज ही देख लिया जाए कि कौन सज्जन हैं जो आवासीय कालोनी को ट्रांसपोर्टनगर बना रहे हैं ? मैंने सोचा।
कुछ ही क्षणों में मैं जा पहुँचा उस फ्लैट के सामने।
गेट के सामने वाले दरवाजे के बगल में दीवार पर गोल्डन नेमप्लेट चमक रही थी। नेमप्लेट पर कलात्मक अक्षरों में पहली पंक्ति में लिखा था- ‘एच0 सी0 यादव’ और दूसरी पंक्ति में केवल एक शब्द ‘ट्रांसपोर्टर’।
मैंने कॉलबेल बजा दी।
‘डिंग-डांग’ की स्वरलहरी समाप्त होती उससे पूर्व ही दरवाजा खुला।
दरवाजा खुलते ही एक 17-18 वर्षीय सुघर नौजवान ने ‘नमस्ते’ की और तुरन्त प्रश्न दाग दिया।
“ किससे मिलना है ? ”
“ यादव जी से। ” मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया।
“ साहब अभी पूजा कर रहे हैं। जैसे ही पूजा से उठेंगे, बता दूँगा। आपके बारे में क्या बता दूँ उन्हें ? ”
उसने एक और प्रश्न दाग दिया जिसमें मुझे लगा कि यह प्रश्न भी अन्तर्निहित था कि आप हैं कौन जो इतनी सुबह-सुबह आ धमके ?
“ बता देना कि कालोनी वेलफेयर कमेटी के सेक्रेट्री आर0 पी0 सिन्हा आए हैं। ” मैंने कुछ रुखाई से कहा।
“ जी अच्छा ! ” कह कर नौजवान अन्दर चला गया।
शायद वह यादव जी का नौकर था।
नौकर के अन्दर जाते ही पाँच मिनट के अन्दर यादव जी प्रकट हो गए।
न्यूरान्स में हलचल बढ़ गईं। स्मृतियों की लहरें लहरा उठीं।
“ अरे, इन यादव जी की शक्ल-सूरत तो हुड़ुकचुल्लू से मिलती-जुलती है !.....नहीं ऽऽ ! ये हुड़ुकचुल्लू नहीं हो सकते। ..... कहाँ वो आवारा, अडि़यल, फक्कड़, फुस्कट, बेवकूफ-सा दिखने वाला गँवई छोकरा हुड़ुकचुल्लू औ..र, कहाँ ये सम्भ्रान्त नागर ट्रांसपोर्टर यादव जी ! ” मन ने वितर्क किया।
उहापोह में अभिवादन भी नहीं कर सका था मैं यादव जी को।
“ अरे ! आ ऽऽ प !! मेरे मालिक !!! ” लपक कर मेरे पैर छू लिए यादव जी ने।
“ पूजा करते समय मेरी दायीं आँख फड़क रही थी। तभी लगा था कि कुछ शुभ होने वाला है। पूजा करके उठा तो नौकर ने आपके बारे में बताया। नाम सुनते ही लगा कि ये आर0 पी0 सिन्हा हो न हो मेरे मालिक ही होंगे।
12-13 बरस हो गए आपसे भेंट हुए। मन तड़प रहा था आपसे मिलने के लिए लेकिन आपने घर बदल दिया। आपका नया पता मुझे मालूम नहीं हो सका मुझे लाख प्रयास करने पर भी। लेकिन आज ‘जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू , सो तेहिं मिलहि न कछु सन्देहू’ को सार्थक कर दिया ईश्वर ने। ईश्वर को धन्यवाद कि उसने आज की पूजा का फल तो दे ही दिया मुझे। ”
यादव जी आह्लाद से सराबोर दिख रहे थे। अनवरत बोले चले जा रहे थे वे। उनकी खुशी इतनी उच्छल थी कि खुशी के आवेग में वहीं से आवाज दी उन्होंने -
“ अजी सुनती हो ! मेरे मालिक आए हैं। यहाँ आओ और आशीर्वाद लो। रूपा और शंकर को भी साथ ले आना। ”
गद्गद हो रहा था मैं भी।
उनकी पत्नी, बेटी-बेटे सभी बाहर आए। सभी ने बारी-बारी से मेरे पैर छुए।
“ ये मेरे मालिक हैं। इन्हीं के आशीर्वाद से हमारी शादी हुई बल्कि ये कहो कि आज मैं जो कुछ भी हूँ इन्हीं के मंतर के बल पर हूँ। ” पत्नी से कहा उन्होंने।
“ ये मेरी बेटी है रूपा, तीसरे में है और ये है मेरा बेटा शंकर, छठेे में है और ये है मेरी पत्नी उमा जिसे शायद आप पहचान नहीं पा रहे होंगे। ” उन्होंने उल्लसित स्वर में परिचय कराया था सबका।
“ जाओ, जल्दी से चाय-कॉफी कुछ ले आओ; साथ में कुछ खाने को भी ले आना। ” अपनी पत्नी से बोले वे।
“ और हाँ, बेटा शंकर ! चाय तुम स्वयं लेकर आना। नौकर के हाथ मत भेजना। ”
आदेश सा दिया था उन्होंने अपने बेटे को जिसके पीछे भाव शायद यह था कि मेरे आगे वे अपनी शान नहीं दिखाना चाहते थे।
इतना विनम्र हो गया हुड़ुकचुल्लू !
उसकी पत्नी व बच्चे घर के अन्दर चले गए।
थोड़ी ही देर में शंकर कॉफी ले आया। उसके पीछे-पीछे प्लेटों में बेफर्स, दालमोट, फल आदि से ट्रे सजाए उसकी पत्नी चली आ रही थी गजगामिनी चाल में। बेटी पानी भरा गिलास ला रही थी।
“ अरे, इतना कुछ ! सुबह-सुबह नाश्ता होगा कि डिनर ? ” अनायास कह बैठा मैं।
“ थोड़ा सा ही सही, कुछ ले लीजिए। ” उसकी पत्नी ने याचना सी की।
सब कुछ अप्रत्याशित था, मगर प्रत्यक्ष था।
न जाने क्यों इतनी देर में भी सहज न हो पाया था मैं। विश्वास नहीं हो पा रहा था मुझे इस प्र...त्य..क्ष पर भी।
यादव जी के स्थान पर बार-बार मन की आँखों को दिखने लगता था हुड़ुकचुल्लू।
15-16 वर्ष पूर्व का गोल निस्तेज चेहरे, छोटे माथे, बिखरे बाल, धँसी हुई आँखों वाले अक्खड़-फक्कड़, गवँई हरिश्चन्दर उर्फ हरिसवा को गाँववालों की कौन कहे स्वयं उसके पिता भी नाराज होने पर ‘हुड़ुकचुल्लू’ कह कर पुकारते थेे। ‘हरिसवा’ या ‘हरिश्चन्दर’ नाम था उसका, यह लोग भूल ही गए थे।
आज वही हुड़ुकचुल्लू ‘एच0 सी0 यादव, ट्रांसपोर्टर’ के रूप में मेरे सामने था।
कितना परिवर्तन आ गया था उसके व्यक्तित्व के पाँचों ‘व’कार में। वेश, वस्त्र, वाणी, विचार और व्यवहार सभी कुछ तो बदल गया था हुड़ुकचुल्लू का। मेरे मन में उमड़ने-घुमड़ने लगा 15-16 वर्षों पूर्व का उसका इतिहास।
दिन भर निठल्ला घूमना। न पढ़ना न लिखना, न ही घर-बाहर का कोई काम करना, न खूँटे से बँधी गाय-भैंस का सानी-पानी करना और न ही खेती-खलिहानी से कोई मतलब रखना। आठवें में दो बार फेल होने के बाद पढ़ाई बन्द !
सुनते थे कि तीसरी बार भी स्कूल में उसका नाम लिखवाया था उसके पिता ने लेकिन स्कूल में किसी शिक्षक से हाथापाई कर ली थी उसने इसलिए कि ‘होमवर्क’ न करके लाने पर शिक्षक ने मुर्गा बनने के लिए कह दिया था ‘हुड़ुकचुल्लू’ को।
इसी तरह की बातें सुनने को मिल रही थीं उन दिनों ‘हुड़ुकचुल्लू’ के बारे में।
काफी के प्याले में तैरता सा दिखा मुझे हुड़ुकचुल्लू से अपनी पहली भेंट का दृश्य भी।
पिता के मरने के बाद माँ की तेरहवीं के दिन ही बड़े भाई ने साफ शब्दों में मना कर दिया था हुड़ुकचुल्लू को घर में घुसने से म..ग..र, हुड़ुकचुल्लू पैतृक सम्पत्ति पर अपना अधिकार क्यों छोड़ देता ? विवाद वहीं उत्पन्न हो गया था।
गाँव का सरपंच होने के नाते विवाद मेरे समक्ष आया था। गाँव की पंचायत में दोनों पक्षों को सुनने के बाद मैंने निर्णय दिया था-
“ कोई कितना भी निठल्ला हो, उसे पैतृक मकान, सम्पत्ति आदि से बेदखल नहीं किया जा सकता। हाँ, उसे खाना खिलाने का दायित्व नहीं होगा उसके भाई-भौजाई पर। वो स्वयं कमाएगा-खाएगा। ”
इस तरह हुड़ुकचुल्लू को पैतृक सम्पत्ति में अपना अंश मिल गया था।
याद आ रहा था मुझे।
न्याय किया था मैंने इसलिए या कि मेरे कारण उसके सिर से छिनती हुई घर की छत उसे वापस मिल गई थी इसलिए ... कारण कुछ भी हो, बाद में वह मेरा बहुत सम्मान करने लगा था।
अब वह हर तीसरी-चौथी शाम को नियमित रूप से आने लगा था मेरे पास उसके अपने शब्दों में ‘मुझे नमस्ते करने’।
उन्हीं दिनों उसी ने बताया था मुझे कि अब वह मेहनत-मजूरी करने लगा है दो जून की रोटी की जुगाड़ करने के लिए।
जाने कैसे मेरी भाव-सरणि हुड़ुकचुल्लू के जीवन-इतिहास के साथ-साथ स्वयं अपने इतिहास के साथ भी जुड़ गई।
हाँ, उन्हीं दिनों की ही तो बात है। समय का फेर कहें इसे या कि अपनी जिजीविषा का दबाव कि गाँव का निश्चित सुख-वितान छोड़ कर उन्हीं दिनों शहर आना पड़ा था मुझे भी !
औ..र, तब हुड़ुकचुल्लू ही क्या, अपने गाँव से ही सम्पर्क धीरे- धीरे छूटता-सा गया था मेरा।
पहले सप्ताह में, फिर महीने में, फिर 3-4 महीनों में और अब वर्ष में एकाध बार, शाम को गाँव पहुँचना, रात भर ठहर कर दूसरी सुबह या दोपहर तक वापसी की आपाधापी में हुड़ुकचुल्लू से भेंट करने का अवका्य ही कहाँ था ?
शायद उसे भी मेरे आने की सूचना समय से नहीं मिलती होगी।
मैं यदा-कदा आसपास के लोगों से उसका हालचाल पूछ लेता था।
तभी एक बार ज्ञात हुआ था कि किसी ईंट-भट्टे पर नौकरी करने लगा था हुड़ुकचुल्लू।
“ क्या सोच रहे हैं आप ? कॉफी ठण्डी हो रही है। क्या ‘आइस कोल्ड’ लेंगे ? ” यादव जी ने ही ध्यान भंग किया मेरा।
“ कुछ विशेष नहीं। ” कहा मैंने और चुपचाप कॉफी पीने लगा।
एकाध सिप के बाद न जाने कैसे विचारवीथी फिर जुड़ गई अतीत से।
याद आया, 12-13 वर्ष पूर्व जब मैं दिलकुशा में था, वह आया था मेरे पास।
हाल-हवाल के बाद सीधे ‘मकसद’ पर आ गया था वह।
“ आप तो जानते हैं कि गाँव-घर में कोई शुभचिन्तक नहीं है मेरा ! भट्ठे पर चौकीदारी करके रोटी का जुगाड़ तो हो जाता है, लेकिन रोटी बनाने वाली न होने से मेरा ढेर सारा टैम रोटी बनाने और दूसरे घरेलू कामों में बीत जाता है। गिरहस्ती फिर भी बदहाल रहती है। सच पूछिए तो गिरहस्ती तो बसी ही नहीं। सोचता हूँ कि गिरहस्ती बसा लूँ यदि आपकी किरपा हो जाए। ”
“ मैं ऽऽ ? क्या कृपा कर सकता हूँ मैं ? ” चौंक कर पूछा था मैंने।
“ बहुत कुछ मैंने खुद तय कर लिया है। आपको बस इतना करना होगा कि मेरे ब्याह में मेरे पिता की जगह उनकी जिम्मेदारी उठानी होगी। चाहे लड़की वालों से बातचीत करनी हो या द्वारचार की रस्म अदायगी--- बस, यही जिम्मेदारी निभा दें आप। ”
“ इतने से ही तुम्हारी गृहस्थी बस जाए, तो इससे बढ़ कर खुशी क्या हो सकती है मेरे लिए। ” मैंने सहर्ष सहमति दे दी थी।
फूला नहीं समाया था हुड़ुकचुल्लू।
मगर समस्या दूसरी थी।
उसकी भावी पत्नी इन्टर पास थी और वह आठवाँ फेल। लड़कीवालों की यही हिचक थी।
हुड़ुकचुल्लू को मैंने समझाया था कि या तो इस शादी के बारे में भूल जाए या वायदा करे कि वह चाहे जैसे पढ़ाई करके कम से कम बी0 ए0 अवश्य पास करेगा।
मैंने उससे यह भी कहा था कि “ मजदूरी करो या नौकरी या अपना व्यवसाय, जीवन में सफलता पाने का एक ही मंत्र है: श्रम, कौशल, लगन और ईमानदारी। ‘कौशल’ को निखारने के लिए ही ‘शिक्षित’ होना आवश्यक है। ”
उसने वायदा किया था कि वह पढ़ाई तुरन्त आरम्भ कर देगा और एक दिन बी0 ए0 पास करके जरूर दिखाएगा।
मुझे भरोसा था कि हुड़ुकचुल्लू जैसा अडि़यल जो वायदा करेगा उसे निभाएगा भी।
इसी विश्वास के सम्बल से लड़कीवालों को मैंने शादी के लिए राजी कर लिया था।
विवाह नियत समय पर सम्पन्न हो गया था।
तब से आज 12-13 वर्ष बाद भेंट हुई मेरी उससे।
इस बीच दिलकुशा से मैं इस नई कालोनी में आ गया था।
“ कहीं फिर खो गए आप ? “ मेरे मन की उमड़-घुमड़ को भाँप कर यादव जी बोलेे।
” हाँ ! यूँ ही। आपके बारे में ही सोच था। ” मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
“ कम से कम आप तो मुझे ‘आप’ न कहें ! ...... मैं स्वयं चाहता हूँ कि ‘हुड़ुकचुल्लू’ से ‘एच0 सी0 यादव’ बनने की पूरी कहानी आपको सुनाऊँ। मुझे विश्वास है कि मेरी सफलता और अपने द्वारा दिए गए गुरूमंत्र की सफलता देख कर खुश होंगे आप। ” कृतज्ञ भाव से कहा उन्होंने।
“ निश्चित रूप से हार्दिक प्रसन्नता हो रही है मुझे, ले...कि...न ... ”
“ लेकिन सहजता से कल्पना नहीं कर पा रहे होंगे कि ‘हुड़ुकचुल्लू’ ‘एच0 सी0 यादव’ कैसे बन गया ? यही न ! ” कह कर खुल कर हँसे यादव जी ।
“ तो सुनिए मेरी रामकहानी।
मेरा विवाह तो आपने ही कराया था इस शर्त के साथ कि बी0 ए0 पास करना ही होगा मुझे।”
यादव जी अपनी रामकहानी सुनाने के मूड में आ गए।
“ हाँ ! याद है मुझे। ”
“ उसके बाद पास के कस्बे के कॉलेज गया था मैं। कई लोगों से मिला वहाँ। बहुतों ने अनुत्साहित किया लेकिन संस्कृत-शिक्षक श्री आर0 सी0 त्रिपाठी ने मेरा हौसला बढ़ाया था। वही ले गए थे मुझे प्रधानाचार्य डॉ0 पी0 पी0 जैन के पास। डॉ0 जैन ने भी मुझे उत्साहित किया। उन्होंने कहा कि प्रौढ़ शिक्षा वालों के लिए शासन की विशेष योजना का लाभ उठाया जा सकता है। सीधे हाईस्कूल का फार्म भर दो।
उनके निर्देशन में मैंने हाईस्कूल का फार्म भर दिया था। जम कर पढ़ाई भी की थी मैंने। पहले प्रयास में ही सेकण्ड डिवीजन उत्तीर्ण हो गया था मैं।
मेरी पत्नी ने ‘रामचरितमानस’ का गुटका उपहार में दिया था मुझे तभी।
रामचरितमानस पढ़ने के बाद मुझे उसमें कई प्रसंग प्रेरणादायी प्रतीत हुए औ...र तब, कई बार मासपारायण किया था मैंने उसका।
रामचरितमानस में राम-रावण-युद्ध के समय युद्ध-क्षेत्र में हुए ‘राम-विभीषण-संवाद’ जीवन-संघर्ष में विजयी होने के अमोघ मंत्र प्रतीत हुए थे मुझे।
उसके पश्चात् तो मेरी जीवनशैली ही बदल गई थी। अपना काम और भी अधिक श्रम व ईमानदारी से करने लगा था मैं।
उन्हीं दिनों मैंने एक भट्ठे से ईंट सरकशी से लादते हुए दो लोगों का मुकाबला किया और जान पर खेल करके उन्हें पकड़ कर मैं थाने तक ले गया। भट्ठा-मालिक बहुत खुश हुआ था। एक साईकिल ईनाम में दी थी उन्होंने मुझे। मेरी आमदनी बढ़ सके इसके लिए कहा था उन्होंने कि ड्राईवरी सीख लो और रात की ड्यूटी के बाद सुबह-सुबह ट्रॉली से एकाध जगह ईंटें पहुँचा दिया करो, प्रति फेरा 25 रुपए मिल जाएंगे तुम्हें। अपने ट्रैक्टर पर ड्राईवरी सीखने की अनुमति भी दे दी थी उन्होंने। ड्राईवरी सीख लेने पर मेरी आमदनी बढ़ने से मेरा काम मजे में चलने लगा था। ”
यादव जी अपनी आपबीती सुना रहे थेे। सुनते हुए मुझे भी विस्मयमिश्रित हर्ष का अनुभव हो रहा था।
अतीत के पन्ने पलटते हुए थोड़ा ठहर कर फिर चालू हो गए थे वे - “ गाँववाले रामप्रसाद बढ़ई को भूले नहीं होंगे आप। उन्हीं का लड़का हरप्रसाद विश्वकर्मा बहुत शराब पीने लगा था। पिता ने जो ट्रैक्टर उसे लोन से दिलाया था, उसकी किश्तें हरप्रसाद अदा नहीं कर रहा था। अन्ततः कर्जे के एवज में ट्रैक्टर मय ट्रॉली के नीलामी पर चढ़ गया।
कुछ अपनी जमा-पूँजी और कुछ भट्ठा-मालिक से उधार लेकर मैंने वह ट्रॉली व ट्रैक्टर खरीद लिया।
मैंने तय किया था कि दूसरे टैक्टरों की जगह अपने ट्रैक्टर से कम भाड़ा लेकर पहले मैं भट्ठा-मालिक का ऋण अदा कर दूँगा। वही किया भी मैंने। त...ब, ट्रैक्टर व ट्रॉली का पूर्ण मालिक बन गया मैं।
हाँ, तब रात्रि-जागरण वाली नौकरी छोड़ दी मैंने। स्वतन्त्र रूप से दिन भर फेरा पर ईंटों की ढुलाई करने लगा था मैं। गाँववालों के खेतों की जुताई भी कर देता था और भट्ठे पर काम न होने के दिनों में कस्बे के सेठ के माल की ढुलाई भी करता था मैं। इस तरह 250-300 रुपए प्रतिदिन की बचत होने लगी थी मेरी।
इस बीच इण्टर पास कर लिया था मैंने उसी कालेज से। ” वे अतीत में डूबेे हुए थे।
“ तब तो गाँव में तुम्हारा मान-सम्मान बढ़ गया होगा ? ” मैंने पूछा।
“ वह तो मैं नहीं बता सकता। हाँ, इतना अवश्य कहूँगा कि तब कोई मुझे ‘हुड़ुकचुल्लू’ नहीं पुकारता था। भइया-दादा-चाचा कहने लगे थे लोग मुझे। बड़े भाई भी सामने पड़ते तो झेंप से जाते थे। इतना बहुत था मेरे लिए। ..... अब तो बस बी0ए0 की डिग्री तैर रही थी आँखों के सामने। ”
मैंने देखा कि निस्तेज चेहरे वाले हुड़ुकचुल्लू के बजाय आत्मविश्वास से दिपदिपाते चेहरे वाले यादव जी की आँखों से उल्लास फूट पड़ रहा था।
बिना किसी अतिरिक्त भूमिका के पुनः चालू हो गए यादव जी।
“ मैंने बी0 ए0 का प्राइवेट फार्म भी भर दिया। किसी तरह से प्रथम वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली मैंने यद्यपि ‘मार्क्स’ अच्छे नहीं आए।दूसरे वर्ष चिन्ता हुई कि बी0ए0 फाइनल की परीक्षा में अच्छे अंक कैसे आएँ। परीक्षा के दिन पास आने पर परेशानी अधिक महसूस हुई। उन दिनों पढ़ाई करता या ट्रैक्टर-ड्राईवरी ? ड्राईवरी न करने पर आमदनी ठप्प ! तब घर का खर्च कैसे चलता ?
इसका हल भी शीघ्र निकाल लिया मैंने।
मेरे बड़े भाई अपने लड़के की पढ़ाई नहीं करा पा रहे थे रुपयों के अभाव में।
एक दिन मैंने अपने भतीजे को बुलाया और अपना उदाहरण देते हुए उसे मैंने अपने बल पर पढ़ाई करने की सलाह दी और आपका दिया गुरु-मंत्र भी। अपनी टैक्टर व ट्रॉली मैंने उसे 200 रुपए प्रतिदिन के किराए पर देने की पेशकश भी कर दी कि अतिरिक्त बचत करके वह अपना पढ़ाई का खर्च निकाल ले। वह मान गया था। इस तरह मुझे पढ़ने का भरपूर समय मिल गया और उसे आय का साधन।
इस बार परीक्षा समाप्त होने पर भी मैंने ट्रैक्टर व ट्रॉॅली उससे वापस नहीं लिया क्योंकि तब उसकी आय का स्रोत बन्द हो जाता और पढ़ाई में रुकावट पैदा हो जाती।
अब मेरे सामने प्रश्न था कि अपने खाली समय का मैं क्या करुँ ? निठल्ले घूमने की आदत मैं वर्षों पूर्व छोड़ चुका था। ” यादव जी थोड़ी देर के लिए ठहरे।
“ जिस भाई ने तुम्हें पीडि़त किया था उसी के लड़के के प्रति उदारता दिखा कर तुमने अपनी महानता का परिचय दिया ! ” मैंने कहा।
“ नहीं ! इसे मैं अपनी महानता नहीं बल्कि अपने संकल्पों की कसौटी ही कहूँगा जिसकी प्रेरणा मुझे कवि मनीषी महामहिम राज्यपाल विष्णुकान्त शास्त्री जी से मिली थी। ”
एक नया रहस्य प्रकट करने के अन्दाज में कहा यादव जी ने।
“ उन्हीं दिनों सम्पन्न हुए मेरे डिग्री कॉलेज के दीक्षान्त समारोह में शास्त्री जी आए थे। अपने भाषण में उन्होंने एक कविता की चार पंक्तियाँ सुनाई थीं जिनके भाव था कि ‘बड़ा काम’ करने के लिए ‘बड़ा लक्ष्य’, ‘बड़ी तपस्या’, ‘बड़ा हृदय’, ‘मृदु वाणी’, ‘छोटा अहम्’ और ‘कल्याणी प्रवृत्ति’, ‘अपने दोष-स्वीकार करने की भावना’ तथा ‘ईश्वर के प्रति समर्पण का भक्ति-भाव’ आवश्यक है।
इसी कविता के सम्बल से मैंने कुछ संकल्प किए थे।
औ..र, तमाम अच्छाईंयाँ होने के बावजूद चूँकि गाँव के सीमित ‘कैनवास’ में बड़ा लक्ष्य साधित करना मेरे लिए सहज सम्भव नहीं था इसीलिए शहर आ गया मैं। ”
प्रतीत हो रहा था कि निस्पृह शब्दावली में अपनी आत्मकथा के पन्ने-दर-पन्ने वाचाल कर रहे थे वे।
“ थोड़ी-सी और शेष रह गई है मेरी कहानी। ” वे बोले।
“ मैं रुचि से सुन रहा हूँ। रोमांचक तो है ही, प्रेरणास्पद भी है यह। ” मैंने कहा तो उत्साहित होकर पुनः मुखर हो गए वे।
“ 4 वर्ष हो रहे हैं मुझे यहाँ आए हुए। यहाँ आकर सबसे पहले मैंने एक ट्रक बैंक से फाइनेंस कराने का जुगाड़ बनाया जिससे आय का स्रोत बना रहे। इस तरह मैं यहाँ बन गया एच0 सी0 यादव, ट्रांसपोर्टर।
उसके बाद जन-कल्याण के निमित्त एक एन0 जी0 ओ0 ‘ज्वाइन’ कर लिया मैंने जो पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक है। उसने 3 वर्षों से देश के विभिन्न नगरों में निःशुल्क वृक्षारोपण का अभियान चला रखा है। इस अभियान में मैं भी तन-मन-धन से जुटा हूँ ।इस कालोनी में सपरिवार पिछले सप्ताह ही आया। इसके पूर्व गाँव में ही रख रखा था मैने अपना परिवार। .... दूसरी ट्रक कल खरीदी है। ”
कल तक की अपनी गति-प्रगति का लेखा-जोखा प्रकट कर अपनी वाणी को विराम दिया उन्होंने।
घड़ी ने टनटना कर 9 घंटे बजा दिए।
“ अरे ! 9 बज गया। बड़ी देर हो गई। चलना चाहिए। ” मैंने कहा।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“ चले जाइएगा। जल्दी क्या है ? इतने दिनों बाद तो भेंट ... ”
“ कालोनी में हैं तो भेंट होती ही रहेगी। मुझे ऑफिस जाना है और यादव जी आपको भी तो... ” उनकी बात बीच में ही काट दी मैंने।
“ फिर ‘आप’ ? ” मेरी बात भी बीच में ही काट दी उन्होंने, “ मेरा यह अनुरोध नहीं मानेंगे आप ? अगर ‘हुड़ुकचुल्लू’ या ‘हरिसवा’ नहीं कहना चाहते तो ‘हरिश्चन्द्र’ तो चलेगा ही। ”
“ अरे हाँ, यह तो बताया ही नहीं आपने कि कैसे आए थे आप यहाँ ? ” पूछा उन्होंने। जैसे कुछ याद आ गया था उन्हें अचानक।
“ आया तो था एच0 सी0 यादव ट्रांसपोर्टर की तलाश में पर जो व्यक्ति श्रम, कौशल, लगन और ईमानदारी के मंत्र को साकार करके ‘हुड़ुकचुल्लू’ से ‘एच0 सी0 यादव ट्रांसपोर्टर’ बन चुका हो और जिसे तुलसी से लेकर विष्णुकान्त शास्त्री तक की सीखें याद हों उससे कुछ कहना उचित नहीं लगता मुझे। ऐसा व्यक्ति ऐसा कोई काम करेगा ही नहीं, जो किसी को अकारण कष्टप्रद हो।”
मैंने निर्विकार शब्दों में उत्तर दिया।
“ देखिए ! ट्रकें यदि यहाँ खड़ी रहेंगी तो मेरा काम कैसे चलेगा ? कल ही दूसरी ट्रक भी ट्रांसपोर्ट पर लग जाएगी। परसों तक पहली ट्रक का ड्राईवर भी वापस लौट आएगा। घर गया है तीन दिन के लिए। ” उन्होंने सफाई दी।
“ मैंने कहा न कि उस सम्बन्ध में तुमसे कुछ कहने का औचित्य प्रतीत नहीं होता मुझे। मैं कालोनीवासियों को समझा दूँगा। ”
पुनः शीघ्र आने का वायदा करके वापस चला आया मैं।
हाँ, उसे सपरिवार अपने घर आने का निमन्त्रण देना नहीं भूला था मैं।
( कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ से)
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(3)
अलगिया गिलास
अति की सीमा तक सफाई-पसन्द थे बाबू साहब। निजी जीवन में सामन्ती कुलीनता वाला आचरण आचरित करते थे वे। सफाई-पसंदगी का हाल यह कि उनका निजी पलंग, बिस्तर, तौलिया, पानी का गिलास, पेन और इसी तरह की उनकी अन्यान्य निजी चीजों का प्रयोग पत्नी-सन्तानों के लिए भी अनुमन्य नहीं था।
बाबू साहब स्वयं को बहुत सीमित भी रखते थे कि कहीं से उनके मान-सम्मान में कमी न आने पाए। सामन्ती अवशेष कहें या कुछ और, उनका अपना मानना था कि अधिक मिलने-जुलने पर घरौटन बढ़ जाता है जिससे समुचित सम्मान में चूक हो जाती है।
गाँव-बाजार जाते थे वे इसलिए नहीं कि कोई खरीदारी करनी होती थी उन्हें। उसके लिए तो कारिन्दे थे ही। गाँव-बाजार का मोह था उन्हें इसलिए कि 45-50 वर्ष पूर्व उन्हीं के पिताजी ने अपनी निजी बगिया में साप्ताहिक बाजार लगवाना आरम्भ किया था। तब से प्रति बुधवार बाजार लगती आ रही थी उसी बगिया में।
इसी बुध-बाजार में बर्क-ओ-बर्क चुन्नटदार महीन सफेद धोती, उतना ही सफेद चुन्नटदार आस्तीन वाला कुर्ता, काली टोपी, नागरा जूती पहने हुए अपनी डिजाइनदार चाँदी की मूठ वाली छड़ी लेकर लगभग 2 बजे 5-10 कारिन्दों के साथ अपनी हवेली से बाजार के लिए निकलते थे सत्तर-बहत्तर वर्षीय बाबू साहब जो जब हाथी जैसी मस्त चाल से चलते थे तो साठ के भी नहीं लगते थे।
आलोक के बाबा थे वे। प्रायः आलोक भी उनके साथ ही बाजार जाता था। बाजार जहाँ से शुरु होती थी उसी कोने पर सड़क के किनारे उनकी बगिया के 4-5 पेड़ सूख गए, तो वर्षों तक एक-एक करके उन पेड़ों की लकडि़याँ आसामियों की लड़की के ‘ब्याह का पीढ़ा’ बनाने या किसी आदमी के दाह-संस्कार की लकडि़यों के लिए दान में काम आई थीं। गाँववालों को इसके लिए बाबू साहब से केवल अनुमति लेनी पड़ती थी बस, ले..कि..न क्या मजाल कि बिना अनुमति कोई एक पत्ती भी छू ले। त..ब, बाबू साहब के कारिन्दे तो दूर गाँववाले ही उसकी मरम्मत कर देते थे-- इतना ‘रौब-दाब’ था बाबू साहब का।
उसी सूखे पेड़ वाली खाली जगह पर दस गुणे बीस हाथ जमीन माँग ली थी बाबू साहब से गरीब किशोर यादव ने अपने परिवार की दाल-रोटी का जुगाड़ करने के नाम पर चाय का होटल चलाने के लिए।
बाबू साहब ने एक भी रुपया लिए बिना लाख-रुपया की जमीन मुफ्त में ही दे दी थी यादव को।
होटल क्या, वह एक छपरिया टी-स्टॉल था लेकिन गाँव वाले उसे होटल ही कहते थे।
होटल वाला यादव इतना अवश्य करता कि बाजार वाले दिन जैसे ही उसे बाबू साहब दूर से आते दिखते, वह एक मेज के चारों तरफ 12-15 कुर्सियाँ झाड़-पोंछ कर ‘रिजर्व’ कर देता था उनके लिए और अपने घर से फूल का डिजायनदार भारी-भरकम गिलास भी मँगवा कर माँज-मूँज कर चमचमा करके रख लेता था 12-15 स्टील के गिलासों के साथ कि चलते-चलते एक ‘चाह’ तो पियेंगे ही बाबू साहब और उनके साथ गाँव वाले।
बाबू साहब आसपास खड़े लोगों को भी चाय पिलाना कभी नहीं भूलते थे।
यादव पैसा लेने में ना-नुकुर करता तो वे कहते, “ चाय नहीं, यह तो तुम्हारी उस मेहनत केे चार पैसे हैं जो तुम गिलास चमचमाने में करते हो। ” ऐसा कह कर हो-हो कर हँसने लगते थे वे।
बाबू साहब और उनके साथियों के ही गिलास चमाचम करता हो यादव, ऐसा नहीं था। साफ-सफाई तो वह हर गिलास की करता था। सवर्णों के लिए रखे गए बड़े स्टील के गिलास, यादव, कुर्मी, कहार, नाई के लिए तनिक छोटे स्टील-गिलास, दलित ग्राहकों के लिए शीशे के गिलास, मुस्लिम ग्राहकों के लिए कप, केतली, प्लेट--- कोई भी बर्तन वह होटल पर ऐसा न रखता जिसे गंदा कहा जा सके। साफ-सफाई के लिए ही तो उसने सवर्ण, अवर्ण, मुसलमान, दलित सबके गिलास अलग-अलग कर दिए थे।
होटल आने वाले ग्राहक चूँकि प्रायः उसी गाँव और आसपास के निवासी होते थे इसलिए सबकी जाति-बिरादरी मालूम थी उसे। यदि कभी कोई अपरिचित आ गया तो विनम्रता से पूछ लेता-
“ आप पण्डित हो या.... वैसेई बर्तन में चाह दिया जाय आपको। ”
वर्षों से सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था बँधे-बँधाए ढर्रे पर, म..ग..र उस दिन !
उस दिन आलोक के कारण बाबू साहब को बाजार पहुँचने में कुछ देर हो गई थी। जब वे लोग बाजार पहुँचे तो ढाई बज चुके थे।
अरे, यह क्या ? वे लोग बाजार से थोड़ी दूर ‘स्कूल’ तक ही पहुँचे थे कि बड़ा शोर-शराबा सुनाई पड़ने लगा।
बाबू साहब ने जान लिया कि आज कुछ गड़बड़ अवश्य है वहाँ। चाल कुछ तेज कर दी उन्होंने। लपक कर बढ़े घटनास्थल की ओर। वहाँ लाठीबाजों की दो-तीन टोलियाँ दिख रही थीं।
सड़क-पार से ही कड़क कर बोले थे वे, “ यह क्या हो रहा है ? ”
भीड़ जहाँ की तहाँ ठिठक गई। सन्नाटा पसर गया था।
सूरज अपनी पूरी गरमाई पर था।
बाबू साहब ने देखा कि ठाकुर-ब्राह्मणों के 30-40 नवजवान सिर पर गमछा बाँधे तेल पिलाई लाठियाँ लिए एक ओर; दूसरी ओर 40-50 दलित जाति के युवा लाल-लाल आँखों से एक-दूसरे को घूरते खड़े थे।
“ बाबू साहेब, आपका आवे मा दसौ मिनट की देर हुई जात, तौ इहाँ सौ-पचास कै मूँड़ फूट चुका होत। ”
यादव रूआँसा-सा होकर बोला था।
“ क्यों ? ”
उत्तर देने के बजाय उनके लिए कुर्सी लाने लपका वह।
“ पूरी बात क्यों नहीं बताते.....बात क्या है ? ” बाबू साहब पुनः कड़के थे।
दोनों गुटों से भीड़ छँटनी शुरु हो गई थी।
यादव को बताना ही पड़ा था।
“ लगभग एक घंटा पहिले दुइ-दुइ, चार-चार कइके 40-45 दलित लड़कवै आए, जेमा यहू गाँव कै रहे अउर आसपास कै भी। सबै चाय कै आर्डर दिहिन। हम उनहिन के गिलासन मा चाय दिहेन। मुला कोऊ चाय पिहिन नाहीं। सबै हथवा में गिलास पकड़े रहि गय। कोही कै इन्तजारी करत होंय जइसे। तनिक बाद मा आपन कुछ साथिन कै साथे मँगरूआ आवा। उहौ चाह क आर्डर दिहिस। हम होटल क आखरी पचसवाँ गिलास धोय-पोंछ कर मँगरूऔ का चाह दिहेन। तो मँगरूआ आँख तरेर कै कहिस, “ चाह ई गिलासन मा काहे देत हौ ? ”
अउर बाबू साहेब ! हम कउनो जवाब देतेन, एकरे पहिलेन मँगरू अउर सबै दलित लड़कनै चाह समेत सबै गिलास जमीन पर बड़ा जोर से पटक दिहिन। गिलास टूटि गय। ”
“ फिर ? ” बाबू साहब ने पूछा था।
“ पहिले तौ हम समझन नाहीं। मगर मँगरूआ झगरै लाग कि ठकुरन-बभनन का स्टील गिलास औ हमरन तईं शीशे क गिलास काहे राखत हौ ? होटलौ मा जात-बिरादरी ? तबै ओकरे साथी नारा लगावै लाग-- जाति-भेद नाहीं चलेगा... नाहीं चलेगा। ” बाबू साहब सबकुछ समझ गए फिर भी उन्होंने पूछा था, “ फिर क्या हुआ ? ”
“ बीस-बाईस अउरन जाति कै मनईं चाह पियत रहेे, पण्डत समझावै क कोसिस किहिन मँगरूआ क, तौ पण्डत जी से झगरै लाग मँगरू। कुछ अउर लड़कवै आय गए। बाद मा गोलबन्दी होय गय। बाकी तौ आप देखबै किहिन। ”
“ हुँ ! ” पूछने को अब कुछ नहीं बचा था।
“ हाँ, बाबू साहब ! मँगरूआ ही गिटपिट-गिटपिट कर रहा था। इन्टर में पढ़ रहा है। शहर से यही बदतमीजी सीख कर आया है। ” रामलाल पण्डित बाबू साहब के पास आकर बोले थे।
“ पण्डित जी ! जबान सम्हाल कर बात करो। बदतमीजी मैं नहीं कर रहा। सारी कारस्तानी आप और आपके पूर्वजों की है। ” आगे आकर मँगरू ने दाँत पीस कर कहा था।
बाबू साहब ने मँगरू की ओर रुख किया लेकिन उनके कुछ पूछने के पूर्व ही मँगरू बोल उठा था- “ आप बताओ बाबू साहब ! क्या झूठ कह रहा हूँ मैं ? क्या इन पण्डितों ने ही शूद्र नहीं बनाया हमें ? क्या शास्त्रों में नहीं लिखा इन्होंने ही कि बाभन भगवान के सिर से पैदा हुए और हम पैर से। हमारा उपजाया अनाज खाय लेंगे ये, लेकिन हमारे हाथ का पानी नाहीं पिएंगे, हमें अछूत कहेंगे ! ई हमार अपमान नाहीं है का ? ”
बाबू साहब कुछ बोलते उसके पहले मँगरू फिर चालू हो गया था, “ परसों नेता जी आए थे गौरा बजार। उन्होंने चेताया तो हम सबकी आँख खुल गई। अब ई अलगिया गिलासबाजी नाहीं चलेगी। ”
दोनों टोलियों में खुसुर-पुसुर शुरु हो गई थी। ठाकुर रमेसर सिंह, पं0 दीनानाथ और गबरू मिसिर आगे बढ़ आए थे।
पं0 दीनानाथ ने कहा था-- “ शास्त्रों में गलत लिखा है तो पहले शास्त्र सुधरवा दो न ! सही शास्त्र लिख कर लाओ और उसे सही साबित भी करो। हंगामा खड़ा करने से शास्त्र थोड़े ही बदलेंगे। ”
रमेसर सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था उससे नहीं रहा गया। बाँह चढ़ाते हुए बोला था वह भी, “ हंगामा करना तुम्हीं नहीं जानते हो। हम भी कर सकते हैं। अभी इतना गए-गुजरे नहीं हुए हम। और अलगिया गिलास--- वह तो साफ-सफाई के लिए अलगिया किया गया है। तुम भी साफ-सफाई से रहना सीखो, तब बात करो। ”
बाबू साहब समझ गए थे कि किसी टोली को समझाना सहज नहीं था। दोनों ओर अधकचरे ज्ञान का सैलाब उमड़ रहा था। मँगरू किसी नेता के भड़काऊ भाषण के प्रभाव में आ गया था। उससे अधिक वाद-विवाद किया जाए तो शम्बूक से लेकर एकलव्य तक की कथा सुनाएगा वह। शायद उसे ज्ञात न हो कि ऋषि रैक्व, मतंग, मातंगी देवी से लेकर रैदास, महात्मा फुले, ज्योति बा, डॉ0 अम्बेडकर तक सभी अछूत कहे जाने पर भी अपने गुणों और ज्ञान के कारण ही सम्मान्य माने गए। यूँ भी बात से बात तो हारती नहीं। तब व्यर्थ का शास्त्रार्थ करने से क्या लाभ ? बाबू साहब ने सोचा था।
यादव इस बीच अस्त-व्यस्त कर दी गई कुर्सी-मेज व्यवस्थित कर चुका था।
“ मैंने सुन लिया तुम दोनों को। अब मेरी सुनो। ” कुछ तेज आवाज में ही कहा था बाबू साहब ने एक कुर्सी पर बैठते हुए।
टोलियों की खुसुर-पुसुर शान्त हो गई थी। भीड़ में से अनेक लोग परे सरक लिए थे। बाबू जी की आवाज ही इतनी असरदार थी कि उसी से दोनों प्रतिपक्षियों की नकेल कस गई थी।
आसमान के सूरज की गर्मी अभी अधिक कम नहीं हुई थी।
“ मँगरू ! मैं यह नहीं कहूँगा कि तुम्हारी सब बातें गलत हैं लेकिन यह बताओ कि इस बेचारे यादव को तुमने कितना बड़ा नेता, कितना बड़ा समाज-सुधारक मान लिया कि इसकी बात सभी मान लेंगे। ... तुम चाहते हो कि तुम लोगों को अलगिया गिलास न दिया जाए। तुम यदि समझते हो कि अलगिया गिलास न देने से सामाजिक क्रान्ति हो जाएगी तो आज से ही यादव तुम सबके लिए अलगिया गिलास नहीं रखेगा। समस्या का एक हल दे रहा हूँ मैं। यादव ! आज तुम मँगरू को मेरे वाले गिलास में चाय पिलाओ। बाद में उसकी साफ-सफाई ठीक ढंग से कर देना। मँजाई-सफाई ठीक-ठाक हो तो कोई किसी भी बर्तन में खाए-पिए क्या अन्तर पड़ेगा। ”
“ म..ग..र....” पण्डित दीनानाथ ने कुछ कहना चाहा था।
“ पण्डित जी ! रमेसर ठीक कहता है। अलगिया बर्तन पकाई-सफाई के लिए ही अलगिया किए गए थे। बताइए आपके कौन से शास्त्र में लिखा है कि बर्तन अलग किए जाएँ। ”
“ लेकिन बाबू साहब ! .....”
बाबू साहब ने देखा कि रमेसर कुछ और प्रतिवाद करना चाहता है। रमेसर सिंह की ओर पलट कर बोले थे वे, “ औ..र रमेसर सिंह ! तुम तो स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हो न ? कल नौकरी करोगे और तुम्हारा अफसर अगर दलित हुआ तो क्या उसे ‘सर’ नहीं कहोगे तुम ? ”
रमेसर सिंह की सारी प्रतिवाद-शक्ति निस्सार कर दी थी उन्होंने। पुनः पण्डित टोली की ओर मुड़ गए थे बाबू साहब।
“ जाति-बिरादरी के नाम पर सम्मान की बात बेमानी है पण्डित जी ! समय पहचानिए। अपने बेटवा से पूछिए। वह तो प्रोफेसर रामअवध का छात्र है। उनकी बड़ाई कर रहा था वह। पूछिए कि वह दलित प्रोफेसर अवधराम के चरण-स्पर्श करता है या नहीं। तब यह दोमुँहा बर्ताव क्यों? ”
पण्डित टोली निर्वाक् हो गई थी।
“ और गबरू पण्डित तुम बोलो ? तुम भी तो एलएल0 बी0 की पढ़ाई शहर में कर रहे हो। बताओ छुआछूत कानूनन अपराध है या नहीं ?.... इसे छोड़ो .... यह बताओ कि अगर गिलासों की साफ-सफाई ठीक ढंग से हो तो तुम कैसे पहचानोगे कि कौन से गिलास में तुमसे पहले किसने चाय पी थी। अभी भी तुम रोज एक ही स्टील के गिलास में चाय कहाँ पीते हो। तुमसे पहले उस गिलास में दूसरे किस बाभन, ठाकुर या किसी अन्य सवर्ण ने कब-कब चाय पी, कैसे पहचान पाओगे तुम ? ”
“ आप ठीक कह रहे हैं। ” गबरू पण्डित ने भी हथियार डाल दिए थे।
बाबू साहब पुनः पलटे थे मँगरू की ओर।
“ मँगरू ! तुम जाति-भेद मिटा कर सामाजिक समरसता लाना चाहते हो ना। बहुत अच्छी बात है यह। जो चीज गलत है उसे मिटना ही चाहिए। समाज में समरसता तो होनी ही चाहिए लेकिन उसके लिए तोड़-फोड़ और बल-प्रयोग का, हिंसा का रास्ता अपनाया तुमने ! क्या वह ठीक है बेटा ? इस तरह तो सामाजिक प्रेम-भाव और समरसता की जगह वैमनस्य, हिंसा और प्रतिशोध ही फैलेगा। ”
मँगरू की गर्दन झुक गई थी।
शाम ढलाव की ओर बढ़ चली थी। सूरज की गर्मी लगभग समाप्त हो रही थी।
फिर बोल उठे थे बाबू साहब, “ मँगरू ! तुम्हारी बात जिस सीमा तक उचित है, उस सीमा तक ही उसे मानेगा समाज ले..कि..न, तुमने जो गलती की है उसका दण्ड तुम्हें भोगना पड़ेगा। तुमने पहले यादव से कहा भी नहीं कि शीशे के गिलास में चाय न दी जाए तुम्हें और तुम्हारे साथियों को। सीधे तोड़-फोड़ कर डाली तुमने....बेचारे गरीब यादव का इतना बड़ा नुकसान कर दिया तुम सबने ! .....यादव तुम्हें मेरे वाले गिलास में चाय पिलाएगा अवश्य, लेकिन तुमने और तुम्हारे साथियों ने इस बेचारे गरीब के 50 गिलास और 50 चाय का जो नुकसान किया और इसकी आज की दूकानदारी का हर्जा किया उसका हर्जाना 100 चाय और 100 शीशे के गिलासों का मूल्य देकर तुम्हें चुकाना होगा। .....उसी धन से यादव स्टील के और गिलास खरीद लाएगा और फिर बिना भेदभाव के तुम सबको भी स्टील के ही गिलास में चाय दी जाएगी। यह हर्जाना तुम अपनी जेब से दो या अपने साथियों से चन्दा करके लेकिन हर्जाना तुम्हें हर हाल में देना ही होगा।
यादव ! तुम सारे अलगिया गिलास हटा दो। बिना किसी भेदभाव के सबको एक जैसे गिलास में चाय दो। पर हाँ, सारे गिलासों की मँजाई-धुलाई, साफ-सफाई ठीक तरह से हो इसका पूरा-पूरा ध्यान रखना है तुम्हें। आज से जाति-भेद बताने-दिखाने वाले अलगिया गिलासों की कहानी खत्म। ”
मँगरू को अपनी गलती समझ में आ गई थी। थोड़ी ही देर में चन्दा इकट्ठा करके सौ शीशे के गिलास और सौ चाय का मूल्य दे दिया था उसने यादव को।
भीड़ छिन्न-भिन्न हो गई थी।
तभी यादव ने बाबू साहब के फूल वाले गिलास में चाय लाकर मँगरू को पकड़ा दिया लेकिन मँगरू ने वह चाय पी नहीं बल्कि उसे बाबू साहब की ही ओर बढ़ा दिया था बड़ी विनम्रता के साथ।
“ इस गिलास में तो चाय आप ही पियेंगे बाबू साहब! आप हम सबके सम्मान के पात्र हैं इसलिए नहीं कि आप सवर्ण हैं बल्कि इसलिए कि आप सही मायनों में जाति-भेद से दूर हैं। .... बाबू साहब ! हमारा विरोध तो जाति-भेद आधारित अन्यायपूर्ण व्यवस्था से था जिससे अपनी नीची जाति, दलित जाति होने का अहसास हमारे मन को कचोटता था। ”
“ हाँ-हाँ बाबू साहब ! मँगरू ठीक कह रहा है। ” मँगरू के साथी भी सहसा बोल पड़े थे।
“ अरे भई, गिलास से सम्मान को जोड़ कर, भेदभाव अब तुम पैदा कर रहे हो ! ” बाबू साहब ठठा कर हँस पड़े थे।
कुछ हल्के, कुछ भारी, कुछ दबे, कुछ खुले बहुत से ठहाके एक के बाद एक उनके चारों ओर उठने-गिरने लगे थे।
आँखों ही आँखों में चाय पीने का इशारा करते हुए मुस्कुराते हुए बाबू साहब ने चाय के गिलास को मँगरू के होंठों से लगा दिया था।
उस समय आसमान पर लालरी निखर आई थी।
उस रात गाँव के आसमान पर जो चाँदनी फैली थी वह कुछ ज्यादा ही दूधिया थी।
( कहानी-संग्रह ‘उभरते बिम्ब’ से)
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