आदि-महाकवि वाल्मीकि
औ..र
महाकवि होमर
- विजय रंजन
आदि-महाकवि वाल्मीकि और महाकवि होमर। दो द्युतिंधर महाकवि। एक द्योरिव, नयशील, आर्ष मनीषा और नानृषि कवि-कर्म का आदि-पुरोधा, दूसरा पाश्चात्य भावोर्मियों का चितेरा-प्रपितामह; एक सर्वगुणोपेत सत्त्वशील नयशील प्रतिमानों को जीवन में समग्रतः आचरित करने वाले महानायक का यशः-गायक, दूसरा एक नहीं पाँच-पाँच वीर-नायकों के वीरोचित गुणों का महाकाव्यगत प्रस्तोता; दोनों ही अपने-अपने क्षण, प्रजाति और परिवेश के समानुरूप मानव-कल्याण के वृहत्तर हित के उद्बोधक; दोनों ही शैली, छन्दविधान, भाषा-प्रवणता के साथ-साथ परिदृश्यों की महाकाव्यीय सम्प्रस्तुति में अप्रतिम; दोनों ही ‘सत्त्व/नयत्व’ की राहों के अन्वेषी। कविवर तुलसी से शब्द उधार लेकर सक्षेपतः कह सकते हैं---‘कहा करौं केहि भाँति बड़ाई।’
औ..र, प्रश्न जब मात्र बड़ाई का न होकर दो द्युतिंधर महाकवियों के तुलनात्मक अध्ययन का हो त..ब, मेरे जैसे मतिमंद अल्पज्ञ की साँस फूल जाना अस्वाभाविक नहीं है प..र..न्तु अध्ययन/अनुशीलन के बौद्धिक अभिकर्म को वैयक्तिक अवरोधों के आधार पर त्याज्य भी नहीं माना जा सकता अ..त..ए..व आलोच्य आलेख में देखना तो होगा ही कि महाकवि वाल्मीकि तथा महाकवि होमर तात्त्विक साहित्यिक अवदान में, लोकयात्रा के सुप्रवर्तन में, उच्चतर भाव-दशा प्रदान करने में और बेहतर मनुष्य बनाने में या कि पाश्चात्य विचारक स्पेन्सर जिसे ‘To fashion a gentleman with virtuous discipline’ कहते हैं या कि मिल्टन जिसे Providence to justify the ways of God to man कहते हैं या कि जान ड्रिंकवाटर जिसे To scourge the tyranny and to exalt the underlying tensions of man कहते हैं--- उन क्षितिजों पर कहाँ ले जाना चाहते हैं हमें/हमारे समाज को; और उसमें कितना स..फ..ल हैं वे ?
विदित हो कि प्रख्यात हिन्दी समालोचक और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 सूर्यप्रसाद दीक्षित जिसे ‘कृति-विशेष के विशिष्ट लक्षण के रूप में अध्ययन’ अधिनामित करते हैं--- ऐसे व्यतिरेकी लक्षणों के अध्ययन के क्रम में दोनों महाकवियों का तुलनात्मक अध्ययन समीचीन होगा।
यहाँ आलोच्य महाकवियों और उनकी कृतियों के साहित्यिक सौष्ठव के विस्तृत अध्ययन/अनुशीलन को किसी अन्य अवसर के लिए स्थगित करके आलोच्य कृतियों का केवल तात्त्विक मूल्यपरक (आंटिकल आन्टोलॉजिकल) अन्वेषण किया जाए और तद्नुसार आलोच्य कृतियों का कषन किया जाए तो तद्गत आषेचन साहित्यिक अधिलक्ष्यों के परास तक ही सीमित मानना उचित होगा।
पश्चिम के अधुुना विद्वान् ‘तेन’ के अनुसार आशयतः साहित्यिक परास के कारक:क्षण, परिवेश और प्रजाति होते हैं जिनके फलकों पर आलोच्य संदर्भों में उल्लेख्य है कि पाश्चात्य काव्य-जगत् के प्रपितामह होमर ९वीं शताब्दी ई0 पू0 के ऐसे महाकवि हैं जिनके पूर्व पाश्चात्य जगत् में महाकाव्यीय अधिलक्ष्यों के समेकित स्वरूप में किसी सुगठित, सार्थक कृति का विरचन नहीं किया गया। हैसिओड की ‘थ्योगोनी’ भी होमर के बाद की ८वीं शताब्दी ई0 पू0 की कृति है जिसमें होमर के सदृश सत्त्वशीलता, नैतिकता आदि सिद्धान्त रूप में काव्यगत स्वरूप में निरूपित हैं। पिण्डार, गार्जियंस, सुकरात आदि तो और बाद के मनीषी हैं जिन्होंने पश्चिमी क्षितिज पर मानव को ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ की ओर उन्मुख किया जिससे ‘टायरेनी स्कूर्ज’ करने या कि ‘हीरोईज्म ऑफ मैन: मानव के नायकत्व’ को उच्च-पदासीन करने की दिशा में कोई निदेशन लब्ध हो सकता था।
निर्विवादतः होमर पाश्चात्य जगत् में प्रथम प्रपितामह महाकवि हैं जिन्हें संदर्भगत श्रेष्ठ निकषों पर कार्यरत मनस्वी, चिन्तक एवं महाकाव्य-कृति का प्रणेता महाकवि माना जा सकता है।
संयोग से वाल्मीकि जिस आदिम काल (राम-दशरथ के समकाल: आलोच्य रामायण के अंतःसाक्ष्यों के अनुसार उत्तर नवपाषाण काल) के कवि हैं, वह कमोबेश आदिम जंगली उद्दण्ड युग है। यद्यपि उस काल तक कुछ स्थान-विशेष पर उन्नत समाज-सभ्यता स्थापित हो चुकी थी; वहाँ सहजता, सरलता, आदर्श, सदाचार, करणीय कर्म, नय-नीतिबद्धता, कर्त्तव्य-बोध जैसे मानवीय उद्बोधों को लोक/समाज सामान्यतया श्रेयस् मान चुका था तदपि इन मानवीय सद्गुणों को विच्छिन्न किए जाने के राक्षसी-प्रयास भी गहन-सघन थे। अनेक स्थलों पर निजी क्षुद्र स्वार्थ-साधन की अन्यायपूर्ण प्रवृति पनप गई थी और ऐसे प्रयास-प्रवृत्ति का बढ़ाव प्रवाह पर था। यद्यपि ‘लोक’ ऐसे समस्त कुप्रयास-कुप्रवृत्ति की मन ही मन या दबे-छुपे शब्दों से भर्त्सना करता था तथापि उसका खुलकर विरोध नहीं कर पाता था वह, शायद इसलिए कि बलशाली अन्यायकर्त्ता का विरोध करने का ‘बल’ वह अपने में अनुभूत नहीं कर पा रहा था। उदाहरणार्थ, प्रकरण राक्षसी अनाचारों का हो या जनस्थान में निरीह जन/लोक के प्रति अत्याचारों का या बालि-सुग्रीव वैमनस्य का, कैकेयी/मंथरा के स्वार्थी हित-लाभ के कुचक्रों का या लंका में सीता को त्रास दिए जाने का--- कोसल-अयोध्या के राजपुरोहित वसिष्ठ, मंत्री सुमंत्र, प्रयाग/चित्रकूट के निवासीगण, जनस्थान के ऋषिगण, किष्किंधा के वन-नर, लंका के विभीषण, राक्षसी सरमा, त्रिजटा तक सभी अपने-अपने स्थान पर अनय-अत्याचार का निषध-स्वर और अन्यायी की कदर्थना को (धीमे स्वर में ही सही) भरसक स्वरित करते थे म..ग..र रामायण-कालीन परिवेश को देखें तो प्रकट है कि तत्कालीन कतिपय सामर्थ्यवान् व्यक्तियों/सत्ताओं के अनय-अत्याचार, निजी हित-लाभ, क्षुद्र स्वार्थपूर्ति की आकुलता आदि, लोक के सदाचारी-आदर्श बहुजन के समक्ष अत्यंत बलशील सिद्ध थे। ऐसे देश-काल में आलोच्य रामायण का रचना-उपक्रम तत्कालीन परिस्थितियों में अनय-अत्याचार के विरोध में लोक-जन, लोक-मन को जागृत-उन्मुख करने के प्रयाण सदृश था जो ऋषि महाकवि की लोकरक्षक कवि-चेतना के सापेक्ष न्यायोचित था। दूसरी ओर, इलियड/ओडिसी में भी देशकाल की समरूपी परिस्थितियाँ और लोक-मन को जागृत करने का समरूपी उपक्रम है यद्यपि उसका कलेवर सीमित है।
प्रकटतः, दोनों महाकवि अपने-अपने महाकाव्य से एक ऋषि महाकवि सदृश लोकरक्षण-लोकसंग्रह का अपना कवि-दायित्वनिर्वहन करना चाहते हैं; दोनों ही अनय, अनैतिकता, कदाचार सदृश दुर्गुणों का निरोध करने के प्रति लक्ष्य-निरत दिखते हैं; दोनों का सरोकार मुख्यतः नैतिक है, सामाजिक है; दोनों सुखदतर लोक की सुस्थापना के प्रति केवल इच्छाशील ही नहीं हैं अपितु दोनों महाकवियों ने पर्युत्सुकी भाव से अपने-अपने महाकाव्य में ऐसे नायकीय सद्विचार एवं तद्गत सदाचरणों का साक्षात् उदाहरण (इलियड में वर्णित कतिपय अनयशील प्रवाद/अपवाद को छोड़ कर जो संभवतः पाश्चात्य-जगत् के तत्कालीन क्षण/परिवेश में ‘अनयात्मक’ नहीं माने जाते रहे) महाकाव्यात्मक स्वरूप में सम्प्रस्तुत करके लोक-चेतना को सदाचारक-सद्-आदर्शों की ओर उन्मुख करने का सफल प्रयास भी साकार किया। आलोच्य कृति वाल्मीकि-रामायण और होमर कृत इलियड को ही आगणन में लें और होमर के ओडिसी या कि ‘हिम टु अपोलो’ को अगण्य रखें तो भी कहना होगा कि दोनों महाकवियों के ऋषिक दायित्व के निर्वाह का फलित है कि हीगल, मार्क्स, विको या अन्य कोई महाकवि होमर की कृतियों को किसी दृष्टिविशेष से कमतर प्रभावी दर्शाने की कितनी भी कोशिश करे या कि कतिपय विचारक महाकवि वाल्मीकि को, उनकी कृति ‘रामायण’ को (राम को भी) कितना ही तुच्छ बताएँ, म..ग..र ऐसी सारी कोशिशों को ठेंगा दिखाते हुए ‘लोक’ और सुमनस् सहृदय प्रबुद्धजन होमर से एवं वाल्मीकि से देर तक, और दूर तक, न केवल पूर्वकाल में सम्प्रभावित होता रहा वरन् अद्यतन हो रहा है इसलिए नहीं कि ‘पोयटिक्स’ में अरस्तू द्वारा महाकाव्य हेतु निर्धारित निकष--- ‘श्रेष्ठ चरित्र एवं उदात्त पूर्ण कार्य-व्यापारों का आद्यन्त छन्द-विधान में गंभीर, पूर्ण, वर्णनात्मक सुन्दर शैली में काव्यमय अनुकरण, ऐसा कथ्य-कथानक जिसमें आदि, मध्य व अंत इस प्रकार हों कि आदि और अंत एक दृष्टि में समा सकें, जीवन के किसी सार्वभौम सत्य का प्रतिपादन करने वाली सम्भाषणीय कथा का निकष’--- या/और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के चार महाकाव्यीय तत्त्व वाले निकष-- इतिवृत्त, वस्तु-व्यापार, भाव-व्यञ्जना, संवाद-- ऐसेे सारे महाकाव्यीय तत्त्व भरपूर निरूपित हैं आलोच्य दोनों महाकाव्यों में; औ..र, इसलिए भी नहीं कि इन महाकवियों ने सद्-निरूपण आदि के छन्दात्मक रुचिर समावेशन से अपनी कृति को रुचिर महाकाव्यात्मक कृति बनाया वरन् इ..स..लि..ए कि वस्तुतः दोनों महाकवि अपनी-अपनी काव्यकृतियों में मूलतः लोकहिताय नयशील सत्त्व/सदाचार के कमोबेश रूपांकन के साथ ही सत्-शिव-सुन्दर के समवेत भाव-विभाव-अनुभाव का भी रूपायन सरस आक्षरिक काव्यात्मक स्वरूप में सम्प्रस्तुत करते हैं जिसके सम्बल से दोनों महाकवियों की कृतियाँ देश-काल की सीमा से परे (अपवादों को नजर-अंदाज कर दें तो) कमोबेश सार्वकालिक, सार्वउपादेय और सार्वहिती काव्य-लक्ष्यों की अक्षरित-सम्प्रस्तुति ही हैं जिनके सम्बल से व्यक्ति/लोक न केवल परिनिवृत्ति और श्रांति प्राप्त कर सकता है अपितु उनके बल-सुबल से बलीकृत होकर सम्यक् सद्-व्यवहारविद् बनकर लोकयात्रा का सुुप्रवर्तन भी न केवल सम्पन्न कर सकता है प्रत्युत उनसे (इंगित क्षुद्रताओं को निराकृत करके) ‘द्यौरिव प्रादुष्कृतामन्यथा’ और ‘शिवेतर-क्षतए’ का साक्षात्कार भी कर सकता है।
कह सकते हैं कि दोनों कवियों में अनेक बिन्दुओं पर समानधर्मी महानता दृश्यमान है।
आदि-महाकाव्य वाल्मीकि-रामायण से स्वतः प्रकट है कि महाकाव्य के सर्वगुणोपेत नायक दाशरथ राम के समकालीन आदिम युग में जब लड़ाईयाँ (चाहे वे सत्त्वशील अधिलक्ष्य से लक्षित हों या रजसशील/तमसशील अधिलक्ष्यों से) बहुलांशतः नितान्त प्राकृतिक उपादान-- यथा शिलाखण्ड, वृक्ष आदि-- के सहारे ही लड़ी जाती थीं और जब नागर सभ्यता विकसित हो रही थी (जगह-जगह नए-नए नगर बसाए जा रहे थे। तक्षशिला, पटना जैसे नगर सुस्थापित हो रहे थे)---ऐसे आदिम युग के मंत्रद्रष्टारः नानृषि-कविकर्म में निरत सर्वहित-रक्षक ऋषि थे महाकवि वाल्मीकि जिन्होंने आदि-श्लोक से लेकर रामायण के अंतिम श्लोक तक यत्र-तत्र-सर्वत्र आद्यन्त ऐसे मानव-हिती, लोकहिती ‘सिद्धान्त/ निदेशन’ अपनी महाकाव्यीय कृति में निरूपित किए जो न केवल ‘हीरोइज्म ऑफ मैन’ को उजागर करने या कि मानव (व्यक्ति/समाज) के ‘टायरेनी को स्कूर्ज करने’ या कि ‘द वेज टु गॉड’ को ‘जस्टीफाई’ करने या कि ‘जेन्टिलमैन’ को ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ से सन्नद्ध करने की दिशा में अग्रसारक हैं बल्कि जिनके सम्बल से यह महाकाव्य मानव को वस्तुगततः ‘बेहतर मनुष्य’ बनने/बनाने की दिशा में और व्यक्ति-समाज को निरन्तर उच्चतर भाव-दशा लब्ध करने/कराने की दिशा में निस्संदेह सर्वदा सफल-सबल सहाय्य लब्ध हो सकता है।
औ..र, मिल्टन, स्पेन्सर आदि की साहित्यिक अपेक्षाओं के फलक पर ही नहीं, अपितु साहित्य के समाजशास्त्रीय फलक (लेनिन के सांस्कृतिक मंत्री प्रख्यात रूसी समालोचक लूनाचार्स्की और अन्यान्य विचारक कृति को ‘सामाजिक सत्त्व’ से आमण्डित होना अनिवार्य मानते हैं) पर भी दिखेगा कि लुकाच, हाईडेग्गर जिन्हंे सम्पूर्ण तथ्यपरकता-मूल्यपरकता (आनटोलॉजिकल-आंटिकल) की कसौटियाँ बताते हैं, इन कसौटियों से और साहित्य के समाजशास्त्रीय समालोचक-निकषों से स्पष्ट है कि ईपालीत तेन प्रणीत ‘विशेष प्रकार की मानसिकता की अभिव्यक्ति’ (तेन की अधिमान्यता: साहित्य कोई वैयक्तिक कल्पना-क्रीड़ा या कि उत्तेजित मानस की भटकी तरंग नहीं बल्कि समसामयिक आचरण की प्रतिलिपि होता है जिसे हम एक विशष प्रकार की मानसिकता की अभिव्यक्ति कह सकते हैं) या कि ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अभिमत वाली ‘निरन्तर उच्चतर भाव-दशा की ओर प्रक्षेेपक की मानसिकता’ या कि ‘सामाजिक नयोन्मुखता की ओर निरन्तर अग्रसारित करने वाली मानसिकता’ सदृश मानसिकताओं की कसौटियों से तथ्यपरकता/तत्त्वपरकता (आनटोलॉजिकल, आंटिकल) के स्तर पर औ..र सम्पूर्णता के स्तर पर अवश्य ‘दीपित’ होना चाहिए किसी भी कृति को।
पाश्चात्य विचारक लावेन्थल जिसे ‘अर्थ का मर्म’ कहते हैं और रेमण्ड विलियम्स जिसे ‘भाव की संरचना’ कहते हैं--- इन सभी भावानुभावों को संकरित करके मानना होगा कि संदर्भगत ‘मर्म/संरचना भाव’ किसी भी साहित्यिक कृति के ‘श्रेष्ठ’ होने के लिए उसमें उपरिअंकित अपेक्षाओं के साथ वस्तुनिष्ठतः आलोकित होना ही चाहिए।
उक्त अवधारणाओं के आलोक में आलोच्य अध्ययन में देखना होगा कि आलोच्य कृतियाँ रचनाकार की कोई वैयक्तिक कल्पना-क्रीड़ा या कि उत्तेजित मानस की भटकी हुई तरंग तो नहीं है या/और समाजोन्मुखता, नयोन्मुखता या/और सत्त्वोन्मुखता की ओर मनुष्य को उन्मुख करने में आलोच्य कृति का ‘आंटोलॉजिकल-आंटिकल’ अवदान किस सीमा तक सारवान् सहायक है या कि आलोच्य कृतियाँ उपरिअंकित अन्यान्य निकषों पर कितना सटीक-सार्थक हैं ?
प्रख्यात साहित्यकार डॉ0 कुँवरचन्द्र प्रकाश सिंह ने अपने एक आलेख में (देखें ‘नैवेद्य’: संपा0 यदुवंशराम त्रिपाठी एवं डॉ0 शोभा सत्यदेव, प्रकाशक:साहित्य परिषद, का0 सु0 साकेत पी0 जी0 कालेज, फैजाबाद) वाल्मीकि और होमर दोनों के महाकाव्य को ‘मौखिक परम्परा का महाकाव्य’ कहा है। कतिपय विद्वान् होमरकृत ‘इलियड’ को ‘युद्ध का वेद’ बताते हैं जबकि अनेक विद्वान् वाल्मीकि कृत रामायण को निर्वेद का-- ‘अशान्ति के पूर्ण शमन’ का--- ग्रंथ मानते हैं।
वाल्मीकि कृत रामायण, जैसा कि पूर्वतः अभिलिखित है, आद्यन्त सत्त्व, नयत्व के सम्यक् रेखांकन का प्रथम महाकाव्य है जिसमें कतिपय भावातिरेकी समालोचक इलियड से मात्र इतना साम्य ढूँढ़ सकते हैं कि रामायण-वर्णित राम-रावण युद्ध भी नारी के लिए अनयकर्त्ता के गढ़ में जाकर लड़ा गया था जहाँ अनयकर्त्ता की केवल हार ही नहीं होती है वरन् अनय पक्ष का महाविनाश भी दृश्यमान होता है और अंततः नय, न्याय, सत्य और सत्त्व की ही जय होती है।
होमर और वाल्मीकि दोनों ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ आदि का निदेशन करते हैं; प्रत्युत मेरी तात्त्विक अनुशीलन-दृष्टि में ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ या कि ‘वेज टु गॉड’ सदृश निदेशनों के फलक पर कहीं अधिक सघनता, गहनता से महाकाव्यीय स्वरूप में निदेशित करने के क्रम में रामायणीय निदेशन मात्र इलियड या ओडिसी ही नहीं बल्कि विश्व के किसी भी अन्य महाकाव्य की अपेक्षा अधिक सबल-सफल है इसलिए ंकि रामायणकार ने आदि-श्लोक से लेकर रामायण के अंतिम चरण तक, ‘सत्त्वशीलत्व’ के गुणगान के साथ-साथ ‘नयशीलत्व’ की जो दृष्टि उद्भासित की है उससे व्यक्ति/समाज केवल ‘निरन्तर उच्चतर भाव-दशा’ प्राप्त करने में ही सफल नहीं होता प्रत्युत रामायणीय महानायक के आचरणों के अनुसरण से वह शीर्षस्थ नयशील ऋतम्भरा प्रज्ञा का सांगोपांग हस्तामलक करने में और तद्वत् सत्-शिव-सुन्दर की सार्वकालिक सार्वहिती साधना के वस्तुनिष्ठ साक्षात्कार में भी सक्षम सिद्ध हो सकता है जबकि इलियड (जो महाकवि होमर की सर्वश्रेष्ठ कृति कही जाती है), ओडिसी (जो इलियड का उत्तरकाण्ड सदृश है), हिम टु अपोलो (जिसमें कवि की आस्थावादी नैतिकता पर विशेष बल दिया गया है) और उनके प्रणेता होमर इस निकष पर क्रमशः रामायण व उसके प्रणेता रामायणकार से बहुत-बहुत पीछे दिखते हैं। देखें--
महाकवि होमर की ‘ओडिसी’ ट्राय-विजय के पश्चात् एक्लीज, आगामेम्नान एवं उसकी सेना की वापसी के कथानक से सम्बद्ध है। इसे इलियड का उत्तरार्चिक कह सकते हैं यद्यपि ओडिसी के कथानक को इलियड से स्वतंत्र और स्वतः एक सम्पूर्ण कथानक के रूप में प्रस्तुत किया है ओडिसी के महाकाव्यकार होमर ने। इसे ‘विस्तार’ मिल गया इसलिए कि ट्राय-युद्ध के पश्चात् घर-वापसी में विजयी योद्धाओं द्वारा अनेक नगरों का परिभ्रमण, बीच-बीच में विभिन्न नगरों के ऐश्वर्य-वर्णन और विजयोन्मत्त योद्धाओं के विभिन्न कार्यकलाप का सविस्तार वर्णन का अवकाश/अवसर लब्ध हो गया है ओडिसी में। ‘ओडिसी’ की अपेक्षा ‘इलियड’ में ‘वेज़ टु गॉड’ को ‘जस्टीफाई’ किए जाने या कि ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ के हेतुक से निदेशन प्रदान करने या कि मानव की ‘टायरेनी’ को ‘स्कूर्ज’ किए जाने का अवसर/अवकाश अधिक उपलब्ध है, ‘हिम टु अपोलो’ तो आलोच्य परिप्रेक्ष्य में और भी निम्नतर श्रेणी की कृति है; तथैव, इलियड ही मुख्यतः वह ग्रंथ माना जा सकता है जिसे उक्त अधिलक्ष्य: ‘टायरेनी-स्कूर्जिंग’ या ‘वर्चुअस डिसिप्लिन’ आदि के निमित्त होमर कृत महाकाव्यात्मक प्रयास का मूल माना जा सकता है।
प्रस्तुत कृति के अन्यान्य अध्यायों से रामकथा के सारत्व के अनुशीलनोपरान्त इलियड की संक्षिप्त कथा ध्यातव्य है जो निम्नवत् है --
स्पार्टा के राजा मेनेलाओस के यहाँ ट्राय के राजा प्रियम के पुत्र ऐश्वर्यवान् आकर्षक युवा राजकुमार पेरिस अतिथि बन कर आए थे। वे अतिथि-धर्म, अतिथि-नैतिकता, सदाचार को धता बता कर मेनेलाओस की अति सुन्दर युवा पत्नी हेलेन को अपने धन-ऐश्वर्य, रूप-यौवन के सम्बल से अपनी ओर आकर्षित कर लेने में सफल हो गए यहाँ तक कि हेलेन पेरिस के साथ मेनेलाओस की धन-सम्पत्ति लेकर ट्राय चली गई जिससे क्रुद्ध होकर सारे यूनानी एकजुट होकर यूनान के राजाधिराज आगामेम्नान के नेतृत्व में ट्राय पर चढ़ आए। दोनों पक्ष में गम्भीर युद्ध हुआ। ट्राय का युद्ध-घेरा ९ वर्ष तक चला। इस युद्ध में प्रमुख नायक एक्लीज के पराक्रम से अंततः यूनानियों की विजय हुई। महाकाव्य के अंत में पेरिस का वध होता है। ट्राय का राजा प्रियम अपने पुत्र पेरिस के शव की याचना एक्लीज से करता है--- अंततः इतना दयनीय दर्शाया है होमर ने अनयशील पक्ष को। इस तरह इलियड अन्याय पर न्याय की, अनय पर नय की, असत् पर सत् की अंतिम विजय का शंखनाद है।
एक्लिीज सहित एजैक्स, डायोमेडीज, आगामेम्नान और विपक्षी ट्रोजन हेक्टर--- पाँच प्रमुख पात्र हैं इलियड में यद्यपि इलियड का प्रमुखतम पात्र एक्लीज है। ‘इलियड’ का प्रारंभ एक्लीज की रोषाभिव्यक्ति से दर्शाया है होमर ने, ‘इलियड’ का अंत भी उसी के शौर्य का फलित है।
लक्षणीय है कि ‘एक्लीज की वीरता के गुणगान’ का प्रश्न हो या ‘पेट्रोक्लास के शव-संस्कार’ का या ‘पेट्रोक्लास के देहावसान पर शोक-वर्णन’ का या कि ‘थेटिस को जियस से वरदान’ का प्रश्न हो या ‘एक्लीज के लिए थेटिस द्वारा हफेस्टस से कवच, अस्त्र आदि प्राप्त करने’ का प्रश्न या कि ‘आगामेम्नान एवं एक्लीज के मध्य विवाद और अंत में एक्लीज के मान-मनौव्वल आदि का कथानक’, इलियड का बहुलांश कथानक एक्लीज से ही सम्बन्धित है प..र..न्तु , एक्लीज धीरोदात्त नहीं वरन् धीरोद्धत नायक है वह प्रायः क्रोधावेष्ठित ही दिखता है भले ही उसके क्रोध की परिणति ‘वीर रस’ में हो जाती है। इलियड के प्रथम सर्ग में ही एक्लीज को क्रोधित दिखाया गया है। यूनानी राजा और युद्ध के यूनानी सेनाधिपति आगामेम्नान धीर-वीर तो हैं म..ग..र उदात्तता सदृश सद्गुण से प्रायः विरहित दिखते हैं वे। अन्य नायकों में भी वीरता के अतिरिक्त अन्यान्य सद्गुण अभावित हैं। डॉ0 कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह के अनुसार - “ महाकवि होमर के काव्य में ‘वीरत्व’ की बड़ी आतंककारी उद्भावना मिलती है, युद्ध का अत्यंत रक्त-श्लथ विभीषिकापूर्ण वर्णन करने में उसे बड़ा आनन्द मिलता है, उसके काव्य में युद्धों का विराट व्यापार बर्बर हिंसाओं की अनन्त शृंखला के रूप में वर्णित हुआ है। .... होमर के पात्र हिंसा-प्रिय और रक्त-लिप्सु रूप में चित्रित हुए हैं, होमर के इन पात्रों को विजय प्राप्त करने में उतनी दिलचस्पी नहीं जितनी हेक्टर का रक्त बहाने में है......।”
इसी तरह दुर्दम क्रोध/प्रतिशोध सदृश अनयशील मनोभावों की प्रतिमूर्ति हैं आगामेम्नान भी जो यूनानी सेना के सेना-संयोजक/सेनापति हैं। वे स्वयं आदेश देते हैं - “ एक भी व्यक्ति (शत्रु) परम विनाश से बचने न पाए। ” यह आदेश उन्होंने तब दिया जब मेनेलाओस के पैर पकड़ कर एड्रेटोस ‘प्राणदान’ माँग रहा था। ऐसे आदेश नयशील नहीं कहे जा सकते। रामायण के राम उदार और शरणदाता तो हैं ही, हनुमान जैसे पात्र तक शरण में आए हुए विभीषण को अभयदान देने का सुझाव देते हैं ‘रामायण’ के नायक (महानायक) राम को जिसे मान कर वे विभीषण को बिना शर्त शरण में लेकर अभयदान देते भी हैं। इसे होमर के सापेक्ष वाल्मीकि की उच्चतर महानता कहेंगे या नहीं ? इलियड में गर्भस्थ नर शिशु को भी मार डालने का आह्वान है ! --- आह, कितनी वीभत्स है यह नृशंसता ! रामायण में ऐसी नृशंसता कहाँ है ? महाभारत में अवश्य कौरव पक्ष से ऐसे दुष्कृत्य कारित किए गए लेकिन ऐसे दुष्कृत्य वीरता नहीं वरन् कदर्थना के योग्य ही ठहराए गए हैं वहाँ भी; अश्वत्थामा और सम्पूर्ण कौरव पक्ष दंड का पात्र ही माना/दर्शाया गया है महाभारत में भी।
और देखें यह भी --
युद्धभूमि में ही सही, मगर अनयशील नृशंसता उस समय भी मुखर होती है इलियड में जब सैनिकों के शवों से मूल्यवान अस्त्र-शस्त्र लेने में विजयी सेना के वीर निरत दिखते हैं तब उन्हें नेस्टर (इलियड के जाम्बवान) चिल्लाकर ऐसा कार्य करने से निषेधित करते हैैं। रामायण में ऐसे परिदृश्य भी दृष्टिगम्य नहीं है। उदात्तता के समक्ष कथित यौद्धिक विभाव और हीनयानीय लूट-- उच्चता का अन्तर स्पष्ट है। रामायण के नयशील, सत्त्वशील परम शान्त धीरोदात्त नायक राम और अन्यान्य नयशील सहनायकगण के समक्ष क्रोधावेष्ठित इलियड-नायक एक्लीज या कि अनुदात्त आगामेम्नान आदि की कैसी समता ? रामायण में लक्ष्मण, अंगद जैसे सहनायक धीरोद्धत हैं अवश्य म..ग..र वे सर्वदा अनुशासनबद्ध हैं; नयशीलत्व से परे तो वे हैं ही नहीं।
जब हम ‘इलियड’ के प्रणेता होमर को आदि-महाकवि के सापेक्ष देखते हैं तो दुःखद स्वरों में कहना पड़ता है कि होमर के ‘इलियड’ में अनेक स्थलों पर सामाजिक सत्त्व के प्रक्षेपक वाली सारवानीय उच्चतर मानसिकता, उदात्तता आदि का गम्भीर अभाव ही दृष्टिगोचर होता है। उदाहरणार्थ--- शत्रु की लाश को घसीटने जैसे वीभत्स होमरीय वर्णन आदि। शत्रु की मृत्यु के पश्चात् शत्रु की लाश को घसीटने जैसा नैष कर्म कथित सत्पथ पर नयारूढ़ (?) आगामेम्नान की सेना की नृशंसता का परिचायक है जो ‘इलियड’ को मानवता और मानवीयता के निकष पर श्रीहीन सिद्ध कर देने में समर्थ है ।
ऐसी दशा में, साहित्य को नैतिक संहिता न मानें तो भी, मानना होगा कि उसमें और उसके अवगाहन से नैतिक संवेदन की अंतर्दृष्टि तो प्रतिभासित होनी ही चाहिए और जैसा कि प्रख्यात विचारक आचार्य नन्दकिशोर ‘साहित्य का स्वभाव’ में पृ0 ४६ पर कहते हैं- “ चेतना के उच्चतम स्तर पर घृणा का अस्तित्व नहीं, वहाँ बुरे के प्रति भी शुभ की आकांक्षा है (होनी चाहिए) .... बल्कि उसके प्रति (बुरे के प्रति) करुणा का भाव शायद अधिक है (होना चाहिए)। ”
उपरि-अंकित विचार-दृष्टि से नैतिक चेतना के निकष पर ‘इलियड’-वर्णित ‘शत्रु की लाश को रथ में बाँध कर घसीटने’ की अभिक्रिया क्या ‘इलियड’ के रचनाकार कवि होमर की चेतना और तद्गत ‘रचना-चेतना’ निकृष्ट गिरावट का प्रतिमान नहीं है ? दुर्योग से होमरीय कृति में ऐसे स्थल एकाधिक हैं जहाँ इलियड के पात्र मानवीय निकष पर निन्दनीय दिखते हैं। एक्लीज द्वारा शत्रु की लाश वापस देने के लिए राजा प्रियम् से भारी धनराशि भेंट के रूप में स्वीकार की गई जबकि वाल्मीकीय राम द्वारा शत्रु रावण की लाश विभीषण या अन्य किसी को देने हेतु कोई उत्कोच दिए-लिए जाने का उपक्रम आलोच्य रामायण में दृष्टिगम्य नहीं है ; इसके विपरीत आलोच्य कृति में ‘मरणानि अन्तानि वैराणि’ और विभीषण को रावण का समुचित अन्तिम संस्कार करने का राम द्वारा निदेशित उच्च नैतिक निर्देश दृश्यमान हैं--- ऐसी दशा में आदि-महाकवि वाल्मीकि के सापेक्ष होमर की कथित कवि-उच्चता कहाँ टिकती हैं ?
अ..ति..रि..क्त..तः, द्रष्टव्य है होमर का यह प्रकथन भी-- “ निर्बल मनुष्य के लिए देवताओं ने भाग्य का यही पट बुना है। उनकी इच्छा है कि मनुष्य सदा क्लेश में जिये और देवता सदा आनन्द में रहें। ”
उपर्युक्त प्रकथन से होमर का साहित्यिक श्रेष्ठत्व गम्भीरतः विक्षत हो जाता है।
होमर को सर्वश्रेष्ठ बताने वाले विचारकगण (?) से पूछा जाना चाहिए कि होमर का यह संदेश किस समाज के किस मनुष्य को उच्चस्तरीय भाव-दशा की ओर या कि निरन्तर उच्चतर भाव-दिशा की ओर अग्रसारित करने में समर्थ होगा सिवा इसके कि आलोच्य होमरीय मानसिकता से ‘गरीब/निर्बल’ मनुष्य और मानव समुदाय निराशा, कुंठा से गम्भीरतः आग्रस्त हो जाए या देवताओं के प्रति और देवताओं के आनन्द के प्रति ईर्ष्या/घृणा/जुगुप्सा के परिभाव से आप्लावित हो जाए !
बताते चलें कि ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में सामी देवता यहोवा (जेहोवा) स्वयं को ‘ईर्ष्यालु देवता’ कहता है। होमर के प्रसंगित ‘देवताओं से ईर्ष्या का जुगुप्सापरक विभाव’ संभवतः यहोवा-मानसिकता का फलित है जबकि ‘ईर्ष्या’ परम्परागत अर्थों में कभी सत्त्वशील या सत्त्वोन्मुखी नहीं हो सकती; इसे तमस्-फलित न मानें तो भी अधिकतमतः इसे रजस् भाव से ही प्रचालित मान सकते हैं; निराशा या कुण्ठा को तो हर स्वरूप में तमस्शील ही माना गया है हर देश/समाज में, जिसका सम्बल सर्वथा त्याज्य है। त..ब, होमर का आलोच्य वाक्य-संदेश साहित्यिक सद्गुण के निकष पर क्या भर्त्सनीय नहीं है ?
इलियड/ओडिसी के नायक-सहनायक पात्र वीर, पराक्रमी, शक्तिमान, शत्रुञ्जय तो हैं; उनमें उत्साह और वीरोचित कर्म-कौशल भी है परन्तु इलियड/ओडिसी के एकाधिक नायक पात्रों में चरित्र की उदात्तता का अभाव है। चारित्रिक उदात्तता का अभाव खलनायक/ प्रतिनायक तक ही सीमित रखा जाता तो शिकायत नहीं होती म..ग..र, प्रमुख नायक/सहनायक जैसे पात्र भी अनेकशः उदात्तता सदृश सद्गुण से श्रीहीन दिखते हैं और उससे भी आगे बढ़ कर दुःखद है कि इलियड/ओडिसी का कोई पात्र---ओडिसियस, पुलिसिस, आगामेम्नान, एक्लीज़ या कि अन्य कोई पात्र--- ‘सर्वगुणोपेत’ तो है ही नहीं। इस प्रकार ‘नायकत्व’ की उच्चता के स्तर पर भी होमर वाल्मीकि के समक्ष टिक नहीं पाते हैं।
‘वाल्मीकि-रामायण’ में तमस्शील राक्षसत्त्व का हनन महाकाव्य के नायक राम और सहनायकगण लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव यहाँ तक कि भरत, शत्रुघ्न भी करते दर्शाए गए हैं। और तो और, स्वयं वाल्मीकि भी व्याध द्वारा क्रौंच-वध प्रकरण में अनय-तिरोहण हेतु सक्रिय होकर व्याध को प्रवासासेध-स्थानासेध का कठोरतम ‘दण्ड’ देते हैं। वे अनय की शिकार सीता के भी शरणदाता बनते हैं और सीता के पुत्रगण को स्वयं ऐसी शिक्षा-दीक्षा प्रदान करते हैं कि अंततः वे आलोच्य प्रकरण में अनयकारी अयोध्या को आहत, विक्षत और श्रीहत करके सीता के प्रति हुए अनय का प्रतिकार करने में समर्थ हो जाते हैं। इस तरह अनय-तिरोहण और तमस्-नियंत्रण का सम्यक् निदेशन है रामायण में।
अग्रेतर देखें---- रामायण बनाम इलियड के परिप्रेक्ष्य में रामायण की सीता के सीतात्व के सापेक्ष इलियड की हेलन के हेलनत्व की तुलना का पक्ष।
रामायण की सीता के कारण लंकायुद्ध, दूसरी ओर इलियड की हेलन के निमित्त ट्राय युद्ध में कथित साम्य (?) स्थापित करने वालों के लिए विशेष द्रष्टव्य है कि सीता और हेलन में कहीं कोई साम्य नहीं है। कहाँ लोकहिती मानवीय मूल्यों के प्रति सुदृढ़ समर्पित और मानवीय सद्गुणों की साक्षात् मूर्ति रामायणीय सीता का शील, संस्कार, पति-निष्ठा, पति के प्रति ईमानदार अनुरक्ति, दाम्पत्य आदर्श के प्रति सुदृढ़ समर्पण, विश्वास आदि और कहाँ लम्पट हेलन जो अतिथि पेरिस के रूप-यौवन की ओर आकृष्ट होकर अपने पति-गृह से अपार सम्पदा लेकर भाग जाती है ! हेलन के चरित्र को संभवतः महिमावान् बनाने के लिए उसके जन्म को अयोनिज और दैवी शक्तियों से सम्बन्धित दर्शाया गया है ‘इलियड’ में। सीता का जन्म भी असामान्य है। परन्तु जन्म दैवीय या अमानुषी हो तो भी पात्र के द्वारा आचरित जीवनचरित जब तक सत्त्वशील न हों तब तक उसे दैवीयता से मण्डित करना अकारथ होता है। आलोच्य प्रक्रम में भी यही अपघटित हुआ है। जन्मतः दैवीय या कि अमानुषी होने के बावजूद हेलन का जीवनचरित सत्त्वशील नहीं था जबकि सीता का जन्म असामान्य होने के बावजूद मानवी स्वरूप में ही जन्मित दर्शाया है आदि-महाकवि ने लेकिन सीता का आजीवन आचरण सत्त्वशील गुणों से ओत-प्रोत रहा है। महाकवि होमर हेलनचरित की इन कमजोरियों को अरूपित करने में असमर्थ रहे।
हेलन के पक्षधर कह सकते हैं कि हेलन का विवाह बेमेल (युवा स्त्री से एक वृद्ध पुरुष का विवाह) था, और उसके साथ ‘अन्याय’ हुआ था जिसके प्रतिकार की दृष्टि से हेलन का कृतित्व कदर्थ्य नहीं है। यदि क्षणांश के लिए उक्त कुतर्क स्वीकारें तो भी प्रश्न उभरेगा कि कथित अन्याय के प्रतिकार का कोई अन्य उपाय क्या लभ्य नहीं था ? औ..र यदि लभ्य नहीं था तो भी क्या प्रश्नगत उ..पा..य को समाज-हित में उपयोगी माना जा सकता है ? ऐसी दशा में समाज की मुख्य इकाई: परिवार की व्यवस्था क्या छिन्न-भिन्न नहीं हो जायगी ?
प्रश्न उभरता है कि क्यों स्वीकार किया आदर्शवाद की संप्रतिष्ठा के आकांक्षी दिखने वाले महाकवि होमर ने ऐसे चरित्र को अपने महाकाव्य की नायिका के रूप में ?
औ..र, उससे भी आगे बढ़ कर एक और गम्भीर प्रश्न उभरता है कि क्यों नहीं की गई कहीं भी रचयिता महाकवि होमर द्वारा कदर्थना ऐसे चरित्र की ?
और तो और, महाकाव्य में हेलन का पश्चात्ताप कहीं भी द्रष्टव्य नहीं है ! हेलन यदा-कदा तीसरे/छठें सर्ग में दुःखी दिखाई गई है अवश्य म..ग..र उसका दुःख अपने कृत दुष्कृत्य पर पश्चात्ताप-रूप नहीं है; उसका दुःख पेरिस की कायरता से या कि मेनेलाओस व अपनी पुत्री के बिछोह से आविर्भूत है अतएव, वस्तुतः उसे पश्चात्ताप की संज्ञा दी ही नहीं जा सकती। इसके विपरीत तृतीय सर्ग व षष्टम् सर्ग में हेलन ट्रायवासियों की एवं हेक्टर की हितरक्षा में ही सक्रिय सचेष्ट दिखाई गई है। तृतीय सर्ग में ट्राय की ऊँची प्राचीर से ट्राय के राजा प्रियम् को यूनानी वीरों के बारे में बतलाते हुए यूनानी वीरों का परिचय इंगित करती है ताकि वे सहजता से विजित किए जा सकें। छठें सर्ग में वह हेक्टर की प्राणरक्षा के लिए चिन्तित दिखती है। ट्रायवासी भी हेलन की निन्दा मात्र इसलिए करते हैं कि उन्हें यूनानी वीरों से हार झेलनी पड़ रही थी और युद्ध के फलस्वरूप कष्ट झेलना पड़ रहा था जिसका निमित्त थी हेलन। वे पेरिस/हेलन की निंदा/कदर्थना इस कारण नहीं करते कि पेरिस/हेलन ने कोई दुष्कृत्य/नैतिक अपराध किया था ! दूसरी ओर कैकयी के खलत्व की निन्दा सम्पूर्ण अयोध्यावासी करते हैं परन्तु वे ‘निन्दा’ इसलिए नहीं करते कि उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ राम-वनवास से आक्षेपित हो रहा था। दोनों लोक-निन्दा में कारक-तत्व और तथैव कारकीय उदात्तता के तत्त्व का गम्भीर अंतर तो विद्यमान है ही अपितु कहना चाहिए कि ट्रायवासीगण द्वारा की जाने वाली हेलन की निन्दा क्षुद्रतर स्वार्थ से उत्प्रेरित होने के आधार पर वस्तुनिष्ठ उदात्तता से विरहित है।
संभव है, होमरीय श्रेष्ठत्व के पक्षधरों द्वारा तत्कालीन देश-काल की परिव्याप्त लोक-मानसिकता का बहाना लेकर या कि पश्चिमी नारी की सामान्य आचरित मानसिकता के नाम पर या कि नारी-विमर्श के अतिरेक में हेलनत्व के प्रसंगित कदाचरण को उचित ठहराया जाए और इसी कुतर्की मानसिकता में इलियड प्रणेता होमर द्वारा हेलन-चरित्र को अपने महाकाव्य में प्रतिष्ठापित किया गया बताया जाए परन्तु कथित अतिरेक में अधुना युग में सीतात्व को आदर्श न मानें तो भी सोचना होगा हमें, हम सबको, कि इलियडीय हेलन का समस्त चरित, चरित्र/आचरण/समग्र हेलनत्व क्या औदात्य, उच्चता व श्रेष्ठता की दृष्टि से (औचित्य से भी) सुसंगत है ? क्या यह समाज-हिती है ? क्या उससे मानव-समाज के सर्वतोभद्र उत्कर्ष को या कि मानव के व्यष्टिगत/समष्टिगत कल्याण के समग्र को साकार किया जा सकता है ? क्या इलिडीय हेलनत्व में प्रदर्शित बेईमानी (पति के प्रति/पति-निष्ठा के प्रति आचरित बेईमानी), लम्पटता (कठोर शब्दों में कहें तो धूर्त्तता), धन-यौवन की कामुक लोलुपता (जिसका कोई औचित्य या सारवान् आधारभूत कारक/कारण निगमित नहीं आलोच्य महाकाव्य में) का नयशील समर्थन उचित है ? भारत ही नहीं बल्कि आविश्व प्रतिवर्ष हजारों विवाह ऐसे होते हैं जिनमें ‘कन्या’ के अनुरूप ‘वर’ या कि ‘पत्नी’ के मनोनुरूप ‘पति’ नहीं होता तो क्या उनके लिए हेलनीय उच्छ्रंखलता, विश्वासघात, दाम्पत्य-न्यास भंग और लोकहिताय निगमित नीति-नैतिकता व तद्गत अनुशासन का सर्वांग-भंगीकरण ‘स्वी..कार्..य’ माना जा सकता है ? ऐसी अधिमान्यता क्या मानव-समाज की प्रथम ईकाई (परिवार) को और तथैव, समस्त मानव-समाज को अस्त-व्यस्त कर देने में सक्षम सिद्ध नहीं होगी ? त..ब ऐसे आचरण की कदर्थना महाकाव्य इलियड या/और ओडिसी में न होने से कवि होमर और उनका महाकाव्यत्व औदात्य के निकष पर (औचित्य के निकष पर भी) क्या श्रीहीन सिद्ध नहीं हो जाता है ? औ..र, यदि उपरिइंगित हेलनत्व श्लाघ्य है तो ट्राय-युद्ध का औचित्य ही क्या था ? प्रकट है कि हेलनत्व की कदर्थना न करने में प्रणेता कवि होमर से गंभीर चूक हो गई है।
रामायण में कैकेयी, मंथरा, शूर्पणखा जैसी खलनायिकाएँ हैं अवश्य जिनका आचरण निश्चितरूपेण खल-आचरण है म..ग..र केकैयी हो या कि मंथरा, शूर्पणखा, लंका के आस-पास और/या अशोकवन में राक्षसियों द्वारा आचरित अनाचार, लोक-त्रास--- सभी की भरपूर कदर्थना/निन्दा और सक्षम पात्र (नायक/ सहनायक) द्वारा यथास्थान खल-पात्रों को दण्ड दिए जाने की रामायणीय देशना भरपूर मुखर है वाल्मीकीय रामायण में।
पुनश्च देखें --
यह सत्य है कि लंकायुद्ध और ट्रॉय-युद्ध में मात्र साम्य यह ढूँढा जा सकता है कि दोनों युद्ध ‘नारी’ के लिए ही लड़े गए लेकिन क्या यहीं ऐसे समालोचकों को यह नहीं देखना चाहिए कि राम-रावण युद्ध का आरम्भ पंचवटी में ‘सीता-हरण’ मात्र से उद्भूत नहीं हुआ था बल्कि अनय के विरुद्ध रामायण-नायक राम का युद्धारम्भ विश्वामित्र के ‘यज्ञ-रक्षा’ के प्रकरण से ही उद्भूत हुआ था जब प्रथम बार राम ने यज्ञ जैसे पावन कर्म में बाधा डालने वाली राक्षसी ताड़का/ताटका का वध किया था और राक्षस मारीच को यज्ञस्थल से सैकड़ों योजन दूर ‘दक्षिण’ में निर्जन स्थान पर पलायन करने के लिए विवश कर दिया था। पूछते चलें कि रावण द्वारा सीता-हरण से पूर्व ही जनस्थान में राक्षसों द्वारा मारे गए ऋषियों की हड्डियों का ढेर देख कर राम का द्रवित होना और अनयशील राक्षसों के संहार का संकल्प लिए जाने जैसा कोई पावन संकल्प क्या ओडिसी/इलियड के नायक में भी दूर-दूर तक दृष्टिगम्य है। यह संकल्प तो सीता-हरण के बहुत पूर्व का है। त..ब, राम-रावण युद्ध का कारक-कारण मात्र सीताहरण नहीं माना जा सकता है।
इलियड में महारानी हेलन स्वेच्छा से पेरिस के पास उसके यौवन, धन-सक्षमता आदि से आकर्षित होकर चली गई थी; जबकि रामायण की सीता का बलात् हरण हुआ था। ‘बलात् हरण’ और ‘स्वेच्छा से पति-गृह से प्रेमी के साथ पति का माल-मत्ता लेकर भाग जाना’--- क्या दोनों को समरूप माना जा सकता है ?
इस तरह सद्गुणों के निकष पर (और नयत्वशीलता के निकष पर भी) पत्नी के बलात् अपहरण के प्रतिकार में लड़े गए युद्ध और घर से स्वेच्छया भागी हुई पत्नी के निमित्त लडे़ जाने वाले युद्ध (विशेषकर वह युद्ध जिसमें नारी के स्वेच्छतया पति-गृह से भाग जाने का प्रतिशोध आशयित हो) का कोई साम्य/जोड़ नहीं है प्र..त्यु..त, कह सकते हैं कि ट्राय का युद्ध तो स्वेच्छतया निष्क्रमित धन-यौवन-लोलुप, यौनक्षुधा-पीडि़त नारी की इच्छा के विरुद्ध उसे (नारी को) पति की सम्पत्ति मान कर लड़ा जाने वाला युद्ध था---ऐसी दशा में कहाँ अनय-निरोध का उच्च लक्ष्य-बेध और कहाँ मानवीयता से हीन हीनतर अधिलक्ष्य ! आगे कुछ कहने-लिखने की आवश्यकता नहीं।
औ..र, यदि कुछ न कुछ कहना/लिखना मजबूरी हो तो कहना/लिखना होगा कि महाकवि होमर ने ट्राय युद्ध में अनयशील खलनायक पेरिस और पेरिस-पक्ष की हार दर्शा कर जहाँ अनाचार पर सदाचार की, अनय पर नय की जीत को रूपांकित करने का प्रयास किया वहीं हेलनत्व की सार्थक कदर्थना न करके अनाचार पर सदाचार या/और अनय पर नय की जीत के कथित गुणगान को आंशिक बना दिया जबकि सम्पूर्ण वाल्मीकीय रामायण अनाचार पर सदाचार की, अनय पर नय की सांगोपांग विजय का प्रशस्तिगान आद्यन्त यत्र-तत्र-सर्वत्र सुझंकृत/सुरूपायित करती है।
तथ्यतया होमर द्वारा हेलनत्व के चित्रांकन-प्रसंग में उक्त तत्व की उपेक्षा के फलस्वरूप इलियड को सार्वगतिक आदर्शवादी महाकाव्य या कि सांगोपांग औदात्य का काव्य या कि सर्वतोभद्र कल्याण का महाकाव्य या कि सार्वतः लोकहिती महाकाव्य नहीं माना जा सकता है और इस प्रकार इलियड/ओडिसी के प्रणेता महाकवि (?) को उपरि-अंकित दृष्टिबोध से सुकवि-महाकवि भी नहीं ही माना जाना चाहिए।
गौरांग श्रेष्ठता के पोषक कतिपय आलोचकों को (जो वाल्मीकीय रामायण को होमर का अनुगान कहते हैं---उन्हें) देखना चाहिए कि ओडिसी व इलियड के नायक-नायिका मानवीय सद्गुणों की उच्चता के उस शिखर को ‘छू’ भी नहीं पाए हैं जो रामायण के ‘नायक’ राम और नायिका सीता का ‘सहज लाघव’ है ?
त..थै..व, इलियड की सर्गबद्धता, अलंकार-सौष्ठव, प्रवहमानता आदि शैलीगत विशेषताओं की उच्चता को स्वीकार करते हुए भी चक्षुष्क होकर स्वीकारना होगा कि कथ्य के औदात्य आदि के निकष पर अनय पर नय की, अनाचार पर सदाचार की विजय को या/और उदात्तता एवं आदर्शवाद को रूपांकित करने के काव्यगत अधिलक्ष्यों के समग्र चित्रांकन में (जो हरेक सुचिन्तित, सुचित्त सुकवि का मूल संधान-लक्ष्य होना चाहिए उस अधिलक्ष्य के संधान में) होमर आदि-महाकवि वाल्मीकि से बहुत पीछे हैं।
औ..र, जैसा कि पूर्वीण अध्यायों से अनुशील्य है --आलोच्य कृति ‘रामायण’ में आदि-महाकाव्यकार काव्य के निदेशन-सकल ‘शिष्टानुशिष्ट शिष्टानामपि वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्त्तते’ के साथ-साथ ‘कीरति-भनिति’ के ‘सुरसरि सम सार्व-हितकारी होने’ के निकषों पर जहाँ एक ओर तद्गत अनुदेशं का सफल साक्षात्कार कराते हैं; वहीं रामायणकार ‘रामायण’ में मर्मस्वरूपीय सत्त्व और उससे भी आगे बढ़ कर नयत्वशीलत्व से भरपूर समेकित सार्वजनीन दृष्टि एवं उच्चतम भाव-दशा का सम्यक् अग्रसारण भी प्रदान करते हैं।
आचार्य भट्टतौत के संकथन: ‘दर्शनाद् वणर््ानाच्चैव लोके जाता कविश्रुतिः’ को स्वीकार करते हुए अधुना विचारक डॉ0 राममूर्ति त्रिपाठी के संकथन: ” रचना ‘संवेदना का रूपान्तरण’ है “ को सपठित करें तो अवधार्य होगा कि संवेदना के निकष पर, मानवीयता के निकष पर, रचना-दर्शन के निकष पर, उच्चता/उदात्तता/औचित्य औ..र तत्सदृश अन्यान्य निकषों पर वाल्मीकि की ‘कविश्रुतिः’ होमर के सापेक्ष श्रेष्ठतर सिद्ध है।
कहना ही होगा कि संदर्भगत उच्चता/उदात्तता/औचित्य के दिग्दर्शन की दृष्टि से, तथ्यपरकता व मूल्यपरकता की दृष्टि से, सत्व-परकता की दृष्टि से या/और वैश्विक हितकारिता की दृष्टि से वाल्मीकि-रामायण की सर्वत्र व्याप्त उदात्तता, उच्चता, श्रेष्ठता होमरीय कृतियों की अपेक्षा श्रेष्ठतर ही सिद्ध होती है इसलिए भी कि दृष्टि-निकष (उपरिअंकित) लुकाच का हो या कि ल्यूसिए गोल्डमान का, हाईडेग्गर का, ईपालीत तेन का, रेमण्ड विलियम्स का, लावेन्थल का, लूनाचार्स्की का या कि आर्ष मनस्विता का ---सभी तद्वत दृष्टि-निकषों पर ‘इलियड’/‘ओडिसी’ की अपेक्षा ‘वाल्मीकि-रामायण’ कहीं भारी है।
इ..सी त..र..ह, पाश्चात्य महा-समीक्षक अरस्तू ने ‘द पोयटिक्स’ में किसी ‘कृति के महाकाव्य होने के लिए कृति में उदात्तता के समावेशन’ पर बल दिया है; लांजाइनस की दृष्टि से तो ‘कृति में बहुस्तरीय ‘उदात्तता’--- यथा उदात्त विचार, उदात्त भावावेग, उदात्त रचना-विधान आदि---अति वांछनीय है। डॉ0 नगेन्द्र ने भी पाँच उदात्तताएँ यथा उदात्त कथानक, उदात्त कार्य, उदात्त चरित्र, उदात्त भाव और उदात्त शैली से युक्त कृति को ही ‘महाकाव्य’ बताया है--- इस दृष्टि से (डॉ0 नगेन्द्र के निकष को भारतीय होने के ब्याज से प्रश्नगत परिप्रेक्ष्य में अनुपयुक्त मानें तो भी) अरस्तू एवं लांजाइनस के द्वारा अभिवांछित ‘उदात्तता: उदात्त विचार, उदात्त भावावेग आदि’ के निकषों पर होमरीय इलियड के अभावित दिखने पर कठोर समीक्षक हो जाएँ तो कहना होगा कि ‘इलियड’ एक ‘महाकाव्य की शास्त्रोक्त गरिमा’ से भी श्रीहीन है।
इसी क्रम में इतना और कि पाश्चात्य जगत् के प्रपितामह महाकवि होमर (जिनके नाम पर पाश्चात्य जगत् में होमरीय शैली एक उदाहरण बन गई और अलेक्जेण्डर पोप सदृश काव्य-मनीषी जिसकी अंधभक्ति में “दिन में होमर को पढ़ने और रात में उसे ‘मेडिटेट’ करने ” का नारा देते हैं, जार्ज लुकाच जिसके संदर्भ में कहते हैं कि “ महान् उपन्यासकार हमेशा होमर के सच्चे पुत्र होते हैं ”--- ऐसे होमर) से कहीं आगे बढ़ कर उदात्तता के महाकवि हैं रामायण-प्रणेता आदि-महाकवि वाल्मीकि इसलिए कि अनेक प्रसंगों में इलियड और ओडिसी में संदर्भगत उदात्तता जहाँ अधोमुखी हो गई, वहीं रामायण के किसी भी प्रसंग में नायकीय उदात्तता का भावानुभाव कहीं भी कथमपि अधोमुखी नहीं है।
औ..र भी देखें---
* एंगेल्स ने ‘इलियड’ को ‘आर्थिक विश्लेषण का पाठ्यग्रंथ’ और ‘युग का दर्पण’ माना मात्र इसलिए कि इलियड में पशुधन तथा खेती के विस्तार और दस्तकारी के आरम्भ के साथ जनसंख्या-वृद्धि का संकेत मिलता है (कृपया देखें सोमेत्ज का ‘द ओरिजिन ऑफ फेमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एण्ड द स्टेट’)।
इस निकष पर भी यदि ‘रामायण’ का अनुशीलन करें तो स्पष्ट होगा कि यद्यपि वाल्मीकि-रामायण का कथ्य-विन्यास भौतिकतावादी नहीं, त..था..पि, दस्तकार, कृषक या सामान्य नागरिक प्रत्युत सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के प्रचुर श्री-सम्पन्न होने का सम्यक् उल्लेख इस ग्रंथ में भी है। अयोध्या नगरी के राजपथ आदि के वर्णन में भी जनसुविधा-सम्पन्नता भरपूर उकेरित की गई है। तक्षशिला जैसे नगर और राज्य सुस्थापित किए जाने का भी विवरण है इस महाकाव्य में औ..र, वहीं शरद ऋतु-वर्णन, पावस ऋतु-वर्णन के अवसर पर कृषकगण द्वारा विभिन्न कृषि-कार्य किए जाने का भी उल्लेख है। कह सकते हैं कि तत्कालीन समाज-व्यवस्था के अर्थतंत्र का आवश्यक निरूपण पुरस्कृत किया जा सकता है वाल्मीकि-रामायण से। इस क्षितिज पर भी कोई उपेक्षा सम्प्रस्तुत नहीं की है महाकवि वाल्मीकि ने।
* अर्थशास्त्र से आगे बढ़ कर (यदि अध्यात्म, धर्म, दर्शन आदि को आगणन में न लें तो भी) भूगोल-ज्ञान सदृश विज्ञान-ज्ञान के फलक पर होमर की अपेक्षा वाल्मीकि अधिक समृद्ध जान पड़ते हैं।
‘ओडिसी’ में अवश्य होमर ने ट्राय-युद्ध के पश्चात् ओडिसियस की उसके ‘वतन’ तक की यात्रा में अनेक देश-- इथियोपिया, लेबनान, स्पार्टा से लेकर हेडोंज लोक (नर्क), हेलियोस, हाइपेरियन लोक आदि-- का उल्लेख किया है परन्तु हेडोंजलोक, हेलियोस, हाइपेरियन लोक आदि अभी कवि-कल्पना ही प्रतीत होते हैं, इनका भौतिक सत्यापन अब तक संभव नहीं हो सका है जबकि प्रकटतः ‘इलियड’/‘ओडिसी’ मुख्यतः यूनान (अधिक से अधिक यूरोप) के भौगोलिक ज्ञान तक ही सीमित हैं और ‘द न्यू साइंस’ के रचयिता विको को मानें तो मान सकते हैं कि इलियड ‘यूनान के उत्तर-पूर्व’ से और ओडिसी ‘यूनान के दक्षिण-पूर्व’ से ही सम्बन्धित है। यतः कुल मिला कर अपने लेखा में ले-दे कर कुल यूनान की भौगोलिक सीमा से बाहर नहीं गए महाकवि होमर जबकि महाकवि वाल्मीकि की ‘रामायण का भूगोल’ अति विस्तृत है। वह तमसा-तट से लेकर कोसल, प्रयाग, चित्रकूट, जनस्थान, पंचवटी, श्रीलंका और उससे भी आगे बढ़ कर सुदूरवर्ती दक्षिण एशिया, रूस, मध्य यूरोप, अरब देश अफ्रीका तक विस्तारित है। दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के अति विशाल भू-भाग तक को अपने अंक में समेटे ‘रामायण’ के कृतिकार वाल्मीकि का भौगोलिक ज्ञान देख कर आश्चर्य होता है कि एक छोटी सी नदी तमसा के तट पर बैठे आदिम-युगीन वनवासी ऋषि ने उस युग में जबकि किसी प्रकार के संचार-साधन तक सुलभ नहीं थे, सुदूरवर्ती दक्षिणी एशिया और दक्षिणपूर्वी एशिया के नदी/पर्वत/भू-स्थल आदि का इतना सटीक ज्ञान कैसे प्राप्त कर लिया जो अद्यतन वस्तुगततः स्थलीय भूगोल के सापेक्ष अति सटीक है !
ज्ञातव्य है कि भले ही अपने देश के कतिपय पश्चिममुखी बुद्धिजीवी (कथित) वाल्मीकि की उपेक्षा करें म..ग..र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाल्मीकि के भौगोलिक ज्ञान को भरपूर अधिमान्यता प्रदान की गई है, यहाँ तक कि अभी कुछेक वर्ष पूर्व दक्षिण एशियाई देश जावा-सुमात्रा-इण्डोनेशिया के बीच के एक ‘द्वीप’ के स्वामित्व-प्रकरण में ‘विवाद का निपटारा’ वाल्मीकि-रामायण के ‘साक्ष्य’ के आधार पर ही निस्तारित किया गया है-- इतना सटीक और विश्वसनीय माना गया है वाल्मीकि और उनकी रामायण को। कनिंघम की ‘एशिया डिक्शनरी’ हो या कि ‘एशियाटिक सोसायटी जर्नल’ में प्रकाशित अनेक आलेख या कि पं0 गिरीशचन्द्र की कृति ‘वैदिक धरातल’ आदि--- इन सभी के आक्षरिक साक्ष्यों से रामायण के कृतिकार महाकवि वाल्मीकि का भौगोलिक ज्ञान अति विशद और सटीक सिद्ध है।
परिस्पष्ट है कि भौगोलिक ज्ञान के फलक पर महाकवि वाल्मीकि के समक्ष महाकवि होमर लिलिपुटियन ही दिखते हैं।
* राजनैतिक क्षितिज पर देखें तो, रामायण यद्यपि राजनीति का ग्रंथ नहीं, तो भी रामायणकार रामायण में यथास्थान केवल राजपुरोहित वसिष्ठ आदि द्वारा ही यथावसर नीति-राजनीति उपदेशित नहीं कराते वरन् विश्वामित्र, अगस्त्य आदि द्वारा उपदेशित ‘राजा द्वारा आचरण-योग्य नीति’ के उपदेश भी अंकित करते हैं औ..र महाकाव्य के महानायक राम द्वारा भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, विभीषण, हनुमान आदि को समय-समय पर एक श्रेष्ठ राजा द्वारा आचरित किए जाने वाली नय-सम्मत नीति अनेकशः उपदेशित कराते हैं। रावण-वध के पश्चात् अयोध्या-वापसी के समय स्वयं प्रयाग ठहर कर हनुमान को अयोध्या जाकर भरत केे मन की थाह लेने वाले प्रसंग में ही नहीं, अन्यत्र भी, राजनीतिज्ञ/राजपुरुष राम द्वारा आचरण-योग्य नीति का बहुशः उपदेेश अनेक स्थलों पर सीधे-सीधे उपदेशित करते दर्शाया है महाकवि ने; यथा-- चित्रकूट-प्रसंग में भरत को, किष्किंधाकाण्ड में सुग्रीव को, लंकाकाण्ड में विभीषण को राम द्वारा दिए गए उपदेश आदि।
इतना ही नहीं, महाकाव्य के प्रमुख पात्र: हनुमान द्वारा अंगद को सीता-खोज के अभियान के पूर्व दिए जाने वाला उपदेशात्मक सुझाव भी या कि हनुमान द्वारा किष्किंधा में सुग्रीव को दिए जाने वाले अनेक सुझाव भी नयपरक नीति और नय-सम्मत राजनीति से समन्वित ही हैं।
सदाचार की सत्प्रेरणा के प्रेरकत्व के अतिरिक्त अन्यान्य सामाजिक नैतिक कथ्य आदि की दृष्टियों से भी महाकवि वाल्मीकि के कथ्य होमर के कथ्य के सापेक्ष सर्वथा उच्चतर हैं क्योंकि होमर सत्पथारूढ़ नायकत्व के आरेखन-क्रम में उपर्युक्त तर्कों के आलोक में सौ प्रतिशत सफल सिद्ध नहीं हो पाए हैं।
* होमर का प्रथम महाकाव्य इलियड ‘इलियम’ अर्थात् ‘ट्राय की कथा’ का अर्थवाची है जबकि रामायण किसी स्थान-विशेष या कि व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं। रामायण नामतः भले ही राम का अयन माना जाए, यह महाकाव्य वस्तुतः रामत्व का, नयत्व का, सत्त्व का महाकाव्यीय अयन है जो स्थान-विशेष के कथा-गान की अपेक्षा विशदतर, विराटतर वैश्विक दृष्टि का बोधक है
पुनश्च अग्रेतर देखें--
* अरस्तू ‘उच्चकोटि के पात्रों के चरित्र की पद्यबद्ध काव्यकृति’ को ही ‘महाकाव्य’ मानते थे; वे सावयवी सांगोपांग (Organic Whole) श्रेष्ठता को कृति के श्रेष्ठत्व के लिए वांछनीय मानते थे जबकि इलियड के नायक-पात्रों के चरित्र ‘उच्चकोटि’ से अनेकशः स्खलित हैं---- इस आषेचन को नकारा नहीं जा सकता। इस प्रकार, अति कठोर समालोचक हो जाएँ तो अरस्तू के निकष पर होमर की काव्यकृतियों को महाकाव्य मानने में ही हिचक होगी ।
* होमर के काव्य को युद्धविषयक बताते हुए उसे सर्वथा अशालीन, अनुपयोगी, अश्रेयास्पद, अन-उच्चतर और अन-अनुकरणीय बताया है प्लेटो ने। उसने प्रश्न पूछा कि क्या कोई ऐसा युद्ध है जो होमर की सलाह मान कर लड़ा गया हो। प्लेटो आगे कहते हैं कि होमर वास्तव में मनुष्य जाति के शिक्षण और उन्नयन में भी समर्थ नहीं हुए। प्रकट है कि प्लेटो की दृष्टि में तथाकथित सर्वश्रेष्ठ कवि होमर का यह युद्धविषयक महाकाव्य निरर्थक भी था और सर्वथा हेय भी था। असंभावित नहीं कि तत्कालीन सर्वाधिक प्रतिष्ठित, कथित सदाचार-पोषक महाकवि होमर के महाकाव्य में चारित्रिक हीनताओं को आलक्षित करके ही सदाचारवादी सुकरात के शिष्य प्लेटो ने कवि/कविता को हीनताओं से ग्रसित मान लिया हो कि जब कथित सदाचार-पोषी महाकवि होमर का हाल ये है तो अन्य कवि/महाकवि तो न जाने क्या-क्या विरच दें अपनी कविता में-- इसी आधार पर प्लेटो अपने आदर्शवादी राज्य से कवि/कविता को बहिष्कृत करने को उद्यत हो गए हों !
* व..स्तु..तः, हीगल, मार्क्स और विको पश्चिम के तीन ऐसे प्रमुख मनीषी हैं जिन्होंने अपने-अपने निकषों पर साहित्य और तत्कालीन उपलब्ध प्रमुख पाश्चात्य साहित्यिक कृतियों की ‘समीक्षा’ की है। विको का कहना था -- ‘‘ इलियड की रचना में उस युग का वर्णन था जब यूनान जवान था और परिणामतः आत्माभिमान, रोष और प्रतिशोध जैसे उदात्त मनोवेगाों से सुलग रहा था। ’’ मार्क्स भी होमर-काव्य के प्रति कालातीत आकर्षण को उस युग की यूनानी सभ्यता का फलित मानते थे। हीगेल भी इसे यूनानी सौन्दर्यशस्त्रीय आकर्षण के रूप में देखते थे। ऐसे कहनों का शब्दान्तरित अर्थ है कि होमर-काव्य के प्रति आकर्षण का कारण था उस युग की यूनानी सभ्यता के प्रति आत्माभिमान या मानवजातीय सभ्यता के शैशवीय भोलेपन के प्रति आकर्षण या कतिपय सौन्दर्यशास्त्रीय फलित आदि।
ऐसे निष्कर्षों का अतिरिक्त ध्वन्यार्थ है कि तत्कालीन मानव-जातीय सभ्यता का शैशवी भोलापन और तद्गत सहज आत्माभिमान आदि यदि ‘न’ होते तो होमर के प्रति आकर्षण शून्य या शून्यवत् होता। महाकवि होमर के प्रति ऐसे निर्वचन नितान्त करुष तो हैं, मेरी दृष्टि में अनुचित भी। वस्तुतः जो कुछ और जितना कुछ सदाचारोन्मुख सम्प्रस्तुति दी है महाकवि होमर ने वह तत्कालीन क्षण-परिवेश-प्रजाति को देखते हुए कम महत्त्वशील नहीं है।
त..द..पि, काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों के निर्वचन-क्रम में भी महाकवि होमर आदि-महाकवि वाल्मीकि से अल्प-संहत ही दिखते हैं इसलिए कि इलियड, ओडिसी में काव्यशास्त्रीय आदर्श प्रायः शून्यवत् हैं। होमरीय ‘हिम टु अपोलो’ में भी महत्त्वपूर्ण या अद्वितीय-उपयोगी काव्य-निकष सम्प्रस्तुत नहीं दिखते हैं वैखरी में भी और पश्यन्ती में भी; जबकि ‘सदाचार’, ‘आदर्शवादी नैतिकता’, ‘लोक-कल्याण’, ‘लोकसंग्रह’ के साथ-साथ ‘सत्, ऋत से सुसम्मतता’ और सबसे बढ़ कर ‘नयशीलता’, ‘नयशील नायकत्व’ आदि का समेकन आद्यन्त उच्छलित है रामायणम् में। वहीं, श्लोक की परिभाषा से लेकर महाकाव्य की परिभाषा तक का महत्त्वपूर्ण उकेर सम्प्रस्तुत कर दिया है आदि-महाकवि ने।
उपर्युक्त तथ्यों से इदमित्थं स्पष्ट है कि क्षितिज चाहे समाजशास्त्रीय सदाचरण का हो या कि न्यायसम्मत नय-नीति का या कि सर्वहित स$हित भाव के संधान वाले साहित्य का या कि धर्म/अध्यात्म/दर्शन का, महाकवि वाल्मीकि के समक्ष टिक पाने से बहुत पीछे हैं होमर।
तत्त्वतः महाकाव्य-प्रबंधन की दृष्टि से, महाकाव्य के कथानक की प्रवहमानता की दृष्टि से, संवाद-सम्पन्नता की दृष्टि से, कथ्य के स्वाभाविक सम्प्रेषण की दृष्टि से, काव्यगत श्रेष्ठता की दृष्टि से, अंततः बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय दर्शाने की लक्ष्य-लभ्यता की दृष्टि से और तत्सदृश अन्यान्य महाकाव्यीय सद्गुणों के अभिनिवेशन व तद्गत सम्प्रस्तुति की दृष्टि से ‘इलियड’ भी एक श्रेष्ठ महाकाव्य है ; तभी तो पश्चिम के काव्य-गुरु कहे जाने वाले होमर का अनुकरण वर्जिल ने किया और मिल्टन, दान्ते आदि ने भी। प..र..न्तु, जब हम वाल्मीकि- रामायण के सापेक्ष होमर की कृति ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ को देखते हैं तो रामायण के कृतिकार वाल्मीकि की संदर्भगत विशिष्टताएँ ‘तुलना की तराजू’ में होमर की सारी विशेषताओं को बहुत हल्का सिद्ध कर देती हैं।
* जहाँ तक महाकवि वाल्मीकि द्वारा होमर के अनुकरण की संभावना का प्रक्षेत्र है-- इस प्रक्षेत्र में द्रष्टव्य है कि ग्रीक विचारक हेराडोटस (मृत्यु 425 ई0पू0) ने बताया है कि उससे चार सौ वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए थे होमर। फादर डॉ0 कामिल बुल्के ने अपने एक आलेख में पूर्ववर्ती ग्रीक विचारक हेराडोटस को उद्धृत करते हुए होमर का समय 9वीं शती ई0 पू0 माना है। अन्यान्य साक्ष्यों से भी होमर 9 वीं शती ई0 पू0 से प्राचीनतर नहीं हैं। दूसरी ओर, आदि-महाकवि वाल्मीकि महाकवि होमर से बहुत-बहुत पूर्व के काल के हैं। प्रतीततः उत्तर-नवपाषाण युग (Later Neo-Lithic Age) के हैं वाल्मीकि। उस काल में इतस्ततः कहीं-कहीं ही सभ्य मानव-समाज (होमोसैपियन्स-सैपियन्स) के सुस्थापित नगर-राज्य आदि सुस्थापित हो सके थे। तब तक होमोसैपियन्स सैपियन्स के पूर्व के अर्द्धसभ्य मानव, वनों में रहने वाले, वृक्षों-शिलाखण्डों से युद्ध करने वाले ‘अर्द्धविकसित मानव-समुदाय (होमोसैपियन्स होमोहैबिलिस) भी बहुसंख्य रूप में विद्यमान थे। आलोच्य कृति के अंतःसाक्ष्यों के अनुसार जिस समयावधि में चार दाँत वाले सफेद हाथी विद्यमान थे --- तभी के हैं दाशरथ राम के समकालीन आदि-महाकवि वाल्मीकि (द्रष्टव्य: इन्हीं पंक्तियों के लेखक की शीघ्र प्रकाश्य कृति: ‘ आदि-महाकवि वाल्मीकि का कालखण्ड’)। तथैव निर्भ्रान्ततः वाल्मीकि द्वारा होमर के अनुकरण का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं हो सकता।
उपर्युक्त विवेचना से इलियड/ओडिसी के समग्र बनाम रामायण-समग्र को न्यायतः तुलित करें तो संपिंडित होगा कि लावेन्थल के ‘अर्थ के मर्म’ का फलक हो या रेमण्ड विलियम्स के ‘भाव की संरचना’ का या कि ‘वर्चुअस डिसिप्लिन की फैशनिंग सम्बन्धी काव्यकार के प्रत्यक्ष/परोक्ष अधिलक्ष्य’ आदि के निकषन का प्रश्न-- इन सभी के सादृश्य वाले मूल्यपरक तात्त्विक (आंटिकल आन्टोलॉजिकल) कषन पर ओडिसी को कौन कहे इलियड भी रामायणम् से हीनतर सिद्ध है। ‘सतत उच्चतर भाव-दशा प्रदान करने’ या कि ‘वास्तव में बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा देने में या कि‘वेज़ टु गॉड’ को सारतः निदेशित करने’ के परिप्रेक्ष्य’ में भी आदि महाकवि के सापेक्ष ‘हीनतर’ ही दृश्यमान हैं होमर।
तद्वत् उपरि-इंगित हीनताओं के ब्याज से कह सकते हैं कि महाकवि होमर महाकवि वाल्मीकि के सापेक्ष साहित्यिक अधिलक्ष्यों की सम्पूर्ति के प्रसंग में पासंग मात्र की इयत्ता रखते हैं।
एक पाश्चात्य समीक्ष्क फ्रेडरिक रियूकार्ट का भी कहना है--‘रामायण’ जैसे उच्च विचार और गहन अनुभूतियाँ ‘इलियड’ में नहीं दिखतीं।
सम्भवतः इन्हीं आघारों पर सर मोनियर विलियम्स ने कहा था - “ ग्रीक साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना ‘इलियड’ अथवा ‘ओडिसी’ की तुलना ‘रामायण’ (वाल्मीकि कृत) से करना ऐसा ही होगा जैसे कि कैसेली के पर्वतीय स्रोतों की तुलना गंगा की पवित्र धारा से की जाए। ”
निः..सं..दे..ह, अप्रतिम लोकमंगल, नयवादिता, महत्-विचार, चरम उदात्तता, मानवता, मानवीयता के साथ-साथ श्रेष्ठतम महाकाव्यात्मक सम्प्रस्तुति-कौशल आदि के निकष पर युग-युग से सफल सिद्ध महाकवि हैं आदि-महाकवि वाल्मीकि। ऐसे महाकवि की समता में होमर तो क्या विश्व का कोई भी कवि/महाकवि टिक पाने में समर्थ नहीं है।
(ब्लाग में किंचित् परिवर्धन के साथ प्रस्तुत यह आलेख कृति ‘साहित्यिक तुला पर वाल्मीकि-रामायण’ में उत्तरार्चिक प्रखण्ड में मूल रूप में इसी शीर्षक से प्रकाशित । )
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