मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन प्रणीत आलेख : सप्तम् किश्त : कविता : मिथकीय आधार पर

 कविता : मिथकीय आधार पर


'कविता क्या' जानने के लिए सबसे पहले उसका जन्म संस्कार जाना जाता है। अधुना विज्ञान जिनिया वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि जन्म संस्कार दशहरे में सर्वदा बीज रूप में न केवल साध्य रहते हैं वे समय-समय पर अपना फल भी प्रकट करते रहते हैं। इस दृष्टि से काव्य/कविता के 'जन्म' से जुड़े तथ्य आलोच्य सन्दर्भों में क्या सिखाये जाते हैं?
संयोगात प्रागितिहासिक काल से मानव-जगत से संबंधित कतिपय कविता संगति रहस्य हैं जो कविता के उत्स और उनके जन्मना संयोजन, पारस एवं अधिलक्ष्य आदि को सार्थक स्वरूप में रूपायित करने में सक्षम हैं। इस दिशा में आदि-महाकवि वाल्मिकी और बाद में आचार्य राजशेखर, शरदनय आदि द्वारा प्रस्तुत कविता प्रसंग सन्दर्भों में अति महत्वपूर्ण हैं।
तथ्यतः 'मिथक' अंग्रेजी के 'मिथक' का हिंदी पर्याय है जो मूलत: ग्रीक शब्द 'मिथक' (मिथक)' से व्युत्पत्ति हुआ है। यह 'लोगोज़' (लोगोज़ ट्र तर्क से निष्कर्ष)' का विलोम होता है। इसे लोक-प्रचलित विश्वासों पर आधारित माना जाता है। मिथ्या का हिंदी पर्यायवाची पुराकथा, दंतकथा, धर्मगाथा आदि हैं।
मिथ्या सम्मति के सन्दर्भ में उल्लेख किया गया है कि -
हज़ारीप्रसाद नाटक 'साहित्य का मर्म' (प्र0 39) में रचित हैं-
"मनुष्य के सभी विराट गुणों के मूल में कुछ व्यक्तिगत या सामूहिक विश्वास होते हैं, लेकिन जब वे संस्कारजन्य प्रोफेसर की सीमा का त्याग कर जाते हैं तो मनुष्य की विराट एकता और अपार जिजीविषा का ऐश्वर्य प्रकट होता है।"
डॉ0 नागेन्द्र को 'मिथक और साहित्य' में कहा गया है -
"फ्रायड और जंग ने मानव-मानव के जिन चेतन-अवचेतन शिष्यों को अपनी मूल प्रतिमूर्तियों की पुष्टि के लिए साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने स्वप्न और आदि बिम्ब के साथ-साथ मिथ का भी विशेष महत्व बताया। वास्तव में जब साहित्य में मनोविश्लेषण शास्त्र का प्रवेश हुआ तो मिथ्या भी अनायास अपने संपूर्ण अध्येताविद्या के संकल्पों के साथ शामिल हो गई।
महानलब्धि विचारक कुबेरनाथ राय ने एक ग्रंथ 'कालचिंतन की जिमी' में अक्षरात्वित किया है - "शाश्वत बोध के आधार पर ही 'इतिहास का दृष्टिकोण' या 'मधु' मिथकशास्त्र के रूप में लिखा है। खंडकाल के इतिहास के अनुभव ही सनातन के मध्य पौराणिक संतों का ले लेते हैं। किसी भी जाति का गणित शास्त्र उस जाति के ऐतिहासिक लोमहर्षक का मधु नहीं है। ......दर्शन और जैन इतिहास की तुलना में जीवन का अधिक पावर-सोर्स (पावर) के संस्थापकों में से एक हैं और ये हमारी परमस्मृति (नस्ली स्मृति) के अंग हैं, जबकि इतिहास की सीमा स्मृति तक है।
'मानव-समुदाय का सामूहिक स्वप्न और सामूहिक अनुभव' होता है और 'स्वप्न' एक जादुई इच्छाभीव्यक्ति है।' जबकि 'संदर्श' पत्रिका के विद्वान संपादकों सलाहकारों ने एक साक्षात्कार में कहा था- "साहित्य में स्वप्न वर्तमान के लिए नहीं बल्कि भविष्य के लिए सुंदर निर्माण की भी आवश्यकता है।"
कट्टर विचारक जॉन रस्किन ने मिथ को प्रकृति का रहस्य प्रकट करने वाला नैतिक तत्व कहा था।
पाश्चात्य विचारक सुशान लैंगर की व्याख्या है- "मिथुन वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से विषयवस्तु की अनुभूति तथा रूपात्मक दृष्टि से बिंब से संबंधित होते हैं।" 
लेविस्ट्रास मैथ्यू को 'विशुद्ध मानसिक रूपात्मक क्रिया' में शामिल किया गया है।
उपर्युक्त प्रकथन और इन जैसे अन्यान्य प्रकथनों से स्पष्ट है कि ‘माइथॉस’ से उत्पन्न मिथ/मिथक को भले ही कभी असत्य माना जाता रहा हो परन्तु अधुना विचारक मिथक को असत्य नहीं अपितु जातीय परमास्मृति और जातीय अवचेतना ही मानते हैं।
इस प्रकार ‘मिथकों’ को हम मानव-समुदाय का ‘सामूहिक स्वप्न’ और ‘सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए आवश्यक उपक्रम’ मान सकते हैं। रचनात्मक और रूपात्मक दृष्टियों से कविता सम्बन्धी मिथक किसी भी रूप में तिरस्कार योग्य नहीं हैं। अपितु , मिथक चूँकि जातीय चेतना के परम्परागत संस्कारों को समेकित किए रहते हैं, अतः मिथक जातीय चेतना के अवगाहन के प्रमुख स्रोत होते हैं।
उपर्युक्ततः, आचार्य शारदातनय, राजशेखर, वाल्मीकि आदि द्वारा अभिरूपित मिथकों को कथित बौद्धिक आधुनिकता या उत्तर-आधुनिकता के नाम पर उपेक्ष्य नहीं माना जाना चाहिए प्रत्युत इंगित मिथक चूँकि काव्य के उत्स से सम्बन्धित है अतएव, विज्ञानसम्मत निष्कर्षों के आधार पर इनसे काव्य/कविता की मौलिक प्रकृति-प्रवृत्ति को रेखायित किया जाना चाहिए।
कविता का अनुशीलन प्रथमतः तर्कणा के विपरीत मिथकीय आधारों पर (Antilogos Myth के आधारों पर) अपरिहार्य है इसलिए भी कि कविता का जन्म उस प्रागैतिहासिक युग में हुआ जब होमोहैबिलिस (अर्द्धविकसित मानव) से होमोसैपियन्स (प्रबुद्ध मानव) बना था मानव और जब मानव-चेतना बौद्धिक विकास की डगर पर अग्रसर हो रही थी। उस कालखण्ड का क्रमवार ऐतिहासिक विवरण न उपलब्ध है और न ही पूरी तरह उपलब्ध हो सकता है; अतएव, कविता के जन्मकाल के तत्कालीन कारक-कारण, अवस्थिति-परिस्थिति के तार्किक विवरण लभ्य कर पाना सम्भव नहीं।
औ..र लोकश्रुति और लोक-विश्वासों को चूँकि इतिहास, न्यायशास्त्र आदि में भी समुचित मान दिया जाता है अतएव, परम्परीण लोक-विश्वासों और तद्गत मिथकों (Mythos) को आलोच्य परिकलन में समकक्षी सत्य का मान देना तर्कसंगत ही होगा। इस प्रकार, परम्परीण लोकविश्वासों के आधार पर अथवा तद्गत उपलब्ध छिटपुट विवरणों से लभ्य अवधारणाओं (भले ही उन्हें मिथक नाम दें या कोई और) के आधार पर ‘कविता क्या’ को अनुशीलित करना कविता के जन्मजात (उद्भव सम्बन्धी) संस्कारों, प्रकृति, स्वभाव आदि के आरेखन के निमित्त सर्वथा उपादेय भी है। देखें-
* सनातन बीजकाव्य वाल्मीकीय रामायण में आरम्भ में ही एक प्रसंग है। कल-कल निनादिनी तमसा-तट के सुरम्य वन-प्रान्तर में अपने आश्रम के निकट महर्षि वाल्मीकि लोकहिताय महाकाव्य-विरचन के लिए सर्वगुणोपेत नायक के बारे में मनन-चिन्तन कर रहे थे। उन्हीं दिनों में महर्षि ने एक दिन अचानक देखा-
 “ तथाविधं द्विजं दृष्टवा निषादेन निपातितम् ।
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत ।। ”
“ ततः करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विजः ।
निशाम्य रुदतीं क्रौंचीमिदं वचनमब्रवीत्।। ”
                                     -वाल्मीकीय रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 2, श्लोक 13-14
मिथुनरत क्रौंच युगल के नर क्रौंच का वध कर दिया वधिक निषाद ने जिससे क्रौंची विलापने लगी थी। इस तरह क्रौंची के प्रति जो अधर्म कारित हुआ था उसके शमन हेतु ऋषि वाल्मीकि वाचाल हुए औ..र, अनायास महर्षि वाल्मीकि की वाणी से फूट पड़ी थी विश्व की प्रथम कविता जिसे आदिश्लोक कहते हैं-
“ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम््।। ”
                                              - वाल्मीकीय रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 2, श्लोक 15
जी हाँ ! शापविद्ध वाणी में महर्षि वाल्मीकि के श्रीमुख से निःसृत हुआ था यही आदिश्लोक जिसे आविश्व प्रथम कविता माना जाता है। त्रेतायुगीन दाशरथ राम के समकालीन महर्षि वाल्मीकि के श्रीमुख से निःसृत इस कविता के पहले की कोई लौकिक कविता आविश्व उपलब्ध नहीं है। विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेदादि के वैदिक श्लोक वस्तुतः श्लोक नहीं वरन् ऋचा हैं, मंत्र हैं और वे भी वैदिक संस्कृति के हैं, लौकिक संस्कृति के नहीं। वे दैवीय भी बताए जाते हैं। बहरहाल, तद्गत प्राचीनता की बहस को यहीं स्थगित रख कर देखें कि आलोच्य मिथकीय परिघटना का सारवान् इंगित क्या है ?
विदित हो कि वाल्मीकीय रामायण के ही अनुसार उक्त शापमय श्लोक निःसृत होने के उपरान्त प्रणेता ऋषि को आश्चर्य हुआ और पश्चात्ताप भी कि उनके द्वारा श्राप क्यों निःसृत हुआ ? अंततः उन्होंने ईक्षणतपी ब्रह्माण्ड सर्जक बहुज्ञ चतुर्मुख ब्रह्मा से इस विषय में अपनी चिन्ता व्यक्त की जिस पर ब्रह्मा ने स्वयं कहा-
 “ तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुङ्गवम् ।।
श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा।
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती ।। ”
                                        - वा0रा0, बालकाण्ड, द्वितीय सर्ग, श्लोक 30-31
इस प्रकार उद्विग्नमना वाल्मीकि को बहुज्ञ ब्रह्मा ने बताया कि स्वयं उन्होंने ही देवी सरस्वती को प्रश्नगत संदर्भ में उत्प्रेरित किया था।
प्रकटतः इस मिथक का सारवान् संक्षेप है कि आदि-श्लोक का प्रस्फुटन ब्रह्मा की उत्प्रेरणा से देवी सरस्वती के प्रकरण-प्रवृत्त होने से आविर्भूत हुआ था।
आदिश्लोक-उवाच् में देवी सरस्वती की प्रवृत्ति को, तद्गत कृपा को पुष्ट-सा करते हुए एक अन्य मनीषी भी कहते हैं कि कविता-शक्ति और विद्या के रूप में देवी सरस्वती की कृपा के फलस्वरूप महर्षि (वाल्मीकि) ने रामायण की सृष्टि की थी-   “ कविता शक्तिरूपा च विद्यारूपा सरस्वती, तस्य शोकापनोदाय महर्षेः मुखपाययो। ”
यह श्लोक पुष्ट करता है कि कविता के जन्म को, तथैव कविता को, कविता के गुणावगुण को मूलतः देवी सरस्वती से सहयुजित करना/दर्शाना चाहते हैं रामायणकार। प्रतीततः आदिश्लोक को सम्बन्धित महाकाव्य का मुख-श्लोक और इस मुख-श्लोक को काव्य-जगत् का आमुख दर्शाना चाहते हैं वे जो देवी सरस्वती की कृपा से आविर्भूत हुआ था। यह सर्वथा उचित है। वास्तव में, सनातन काव्य-बीज ‘रामायणम्’ की रचना को स्वयं आदि-महाकवि द्वारा देवी सरस्वती की कृपा से संदर्शित किया जाना अकारण नहीं है। इसके ब्याज से सम्पूर्ण आदि-महाकाव्य और सम्पूर्ण काव्य-जगत् देवी सरस्वती की कृपा से जन्मना आसिक्त सिद्ध हो जाता है।
इस साधारण सी दिखने वाली परिघटना का निहितार्थ गहन गम्भीर है इसलिए कि जीनियायी प्रभाव से उत्पाद में उत्पादक बीज के गुण की प्रकृति-प्रवृत्ति और तद्गत गुण-विशेष विद्यमान होता है। आलोच्य प्रसंग में आदि-श्लोक के आविर्भाव में देवी सरस्वती की प्रवृत्ति/प्रेरणा के ब्याज से देवी सरस्वती की प्रकृति-प्रवृत्ति एवं तद्गत गुण वैशिष्ट्य तो विद्यमान मानना ही होगा काव्य में इसलिए कि देवी सरस्वती हों या कोई और, उनके अपने निज के गुण-वैशिष्ट्य या निज स्वभाव के विपरीत कथित प्रेरणा देंगी ही क्यों ?
द्रष्टव्य है कि हाईडेग्गर आदि अधुना विचारक एवं कुबेरनाथ राय प्रभृति विद्वान् भी मानते हैं कि मूल-भाव की प्रकृति-प्रवृति आद्यन्त विद्यमान रहती है उत्पाद में। इस तरह, आलोच्य श्लोक चूँकि कविता-जगत् का आदि-श्लोक है जो देवी सरस्वती से आविर्भावतः संयुत है; अतएव, देवी सरस्वती की प्रकृति-प्रवृत्ति से ‘कविता’ की मौलिक प्रकृति-प्रवृत्ति विच्युत हो ही नहीं सकती। ऐसा न माना जाना विज्ञानतः एवं तर्कतः विपर्यय और बौद्धिक प्रदूषण का कारक होगा। यूँ भी, गंगा की अमल निर्मलता देखनी हो तो उसे गोमुख की गंगा में ही देखना चाहिए-- इस तर्क से ‘कविता/काव्य’ की प्रकृति-प्रवृत्ति को उसके मूल आदिश्लोक में ही देखना चाहिए।
औ..र, गंगाजल की पावनता का कुछ न कुछ अंश (प्रायः बहुलांश) गंगासागर की गंगा में भी दिखता है अवश्य। तथैव, कविता के गुणावगुण को, गोमुखीय मूल के आदि-श्लोकीय गुणावगुण को काव्य से अंत तक पूर्णतया वियोजित नहीं माना जा सकता।
आलोच्य संदर्भ में उपरि-अंकित पृष्ठभूमि में यहाँ आलोच्य मिथक से मात्र यह निषेच्य है कि सत्त्वशील नयात्मक प्रेय के संस्थापनार्थ आलोच्य प्रसंग में पुर (लोक) के हित-साधक ऋषि-कवि के श्रीमुख से न्यायविद् के समान अनयी उत्पीड़क के विरुद्ध दण्डादेश सदृृश निःसृत हुआ था आदि-श्लोक। इस आदिश्लोक के स्फुरण हेतु ईक्षणतपी रचनाधर्मी बहुज्ञ ब्रह्मा द्वारा देवी सरस्वती को उत्प्रेरित तथा देवी सरस्वती द्वारा स्वयं प्रवृत्त होकर ऋषि-कवि को प्रेरित किया गया था-- यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है इसलिए कि वह आदिश्लोक था जिसे काव्य-जगत् का गोमुख भी माना जा सकता है।
ज्ञात हो कि ‘रामायणम्’ वर्णित तथ्यों के अनुसार निरीह क्रौंच पक्षीयुगल के सहज जीवनयापन में बधिक द्वारा बाधा डालने एवं निरपराध नर क्रौंच को मार डालने के अपराध के कारण अपराधी बधिक को दण्ड देने के क्रम में बधिक द्वारा कारित अधर्म (अकरणीय कर्म) का शमन करने के सद्-उद्देश्य से आविर्भूत हुआ था आदि-श्लोक। प्रकारान्तर से अन्याय, उत्पीड़न और शिवेतर (तमस्) के निरोध/निषेध के साथ नयशील सत्त्व की संस्थापना-संरक्षा के निमित्त अन्ततः ऋषि वाल्मीकि की ‘निशाम्य अधर्मोऽयमिति’ (उपर्युक्त श्लोक 14) की मनःस्थिति में दण्डादेशीय श्राप के रूप में उवाचित किया गया या कराया गया था यह।
यतः, प्रमा-सापेक्ष विचारण से कहना होगा कि आदि-महाकवि के श्रीमुख से देवी सरस्वती ने जो श्राप उच्चारित कराया उसका मूल हेतुक था कि सम्बन्धित बधिक को उसके दुष्कर्म की सजा मिल जाए; साथ ही, दुष्कर्म पुनः होने की संभावना विलुप्त हो जाए अर्थात्  भविष्य  में हत्यारा बधिक ही नहीं, शेष जीव-जगत् का कोई अन्य बधिक या बलशाली व्यक्ति किसी निरीह (पक्षी तक) को निजी स्वार्थ-लाभ के लिए अन्याय-अत्याचार का शिकार बना कर किसी प्रकार का दुष्कर्म करने का साहस न कर सके जिससे दैनन्दिनि जगत् में निरीह से निरीह जीव भी निर्भय होकर सहज जीवन-यापन कर सके औ..र इस तरह देश-समाज में नयत्व और सत्त्व की संस्थापना साकार हो सके। इसी हेतु आदिश्लोक के माध्यम से उच्चरित हुआ था या उच्चारित कराया गया था आलोच्य श्राप (दण्डादेश) इसलिए कि देवी सरस्वती के सत्त्व की सदाशयी सद्भावना तभी साकार हो सकती थी।
औ..र, यदि माना जाए कि आलोच्य श्राप दण्डादेश नहीं वरन् करुणा या शोक का प्राकट्य था तो प्रश्न उठना चाहिए कि क्रौंची के प्रति संवेदना (दया या तद्गत कोई अन्य भाव-विभाव यदि अस्तित्व में था तो उस दशा में) सहानुभूति या करुणा-भाव की शब्दाभिव्यक्ति आदि-कवि व्यक्त कर सकते थे; बधिक को श्राप देने की उन्हें आवश्यकता ही क्या थी ? शोक/करुणा में ‘हाय-हाय’ स्वरित हो सकता है, श्राप नहीं। ले..कि..न, आदि-महाकवि ने ऐसा नहीं किया या देवी सरस्वती ने ऐसा नहीं कराया। यहाँ ‘करुणाभिव्यक्ति नहीं’ होने का भी गम्भीर निहितार्थ है जिसका प्रकटीकरण आदि-महाकवि ने या देवी सरस्वती ने संभवतः सुनिश्चित अधिलक्ष्य से (अधर्म के निशाम्य हेतु) किया है।
प्रश्नगत श्राप आक्रोशजनित भी प्रतीत नहीं होता। पक्षी-हंता बधिक को श्राप देने के पूर्व या बाद में उसके प्रति प्रतिक्रिया में कवि का क्रोधावेश स्वरित नहीं है। प्रश्नगत आक्रोश की निष्कृति अन्य रूप-स्वरूप में भी हो सकती थी कि..न्तु बधिक को कोई भी अपशब्द न कह कर या ‘हाय-हाय’ न कह कर आदि-कवि द्वारा दण्डादेश सदृृश सीधे-सीधे उच्चारित किया गया था श्राप। स्वयं रामायणकार के अनुसार क्रौंच का हनन देख कर तद्गत कारुण्य (तस्य कारुण्यम्) उपस्थित देख कर (उपर्युुक्त श्लोक 13), अग्रिम सरणि पर आदि-कवि में अन्ततः ‘अधर्म के निशाम्य’ की भावना का उदय हुआ (उपर्युक्त श्लोक 14) जिससे निःसृत हुआ था आदि-श्लोक (उपर्युक्त श्लोक 15)। इस प्रकार आदि-श्लोक के उत्स का अन्तिम कारक तो महामुनि में कवि-भाव उत्पन्न होते ही ‘अधर्म के निशाम्य’ की भावना का उदय ही था।
मनीषी संस्कृतज्ञ और धर्मशास्त्र के विवेचक पी0 वी0 काणे भी ‘संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास’ में पृ0 448-449 पर लिखते हैं-    “ यह नहीं सोचना चाहिए कि ऋषि का हृदय सामान्यजन की भाँति शोकाकुल हो गया। ” ‘रघुवंशम्’ (14.70) और ‘ध्वन्यालोक’ में प्रकरण-प्रयुक्त ‘शोक’ शब्द नाटकीय अर्थ से सम्बद्ध है। ऋषि वाल्मीकि निरीह पक्षी के शोक से व्याकुल नहीं हुए वरन् उनका हृदय समस्त घटना से उद्वेलित हो उठा और इससे काव्यमय उद्गार निकल आए (‘मा निषाद .....’)। कवि की भावुक प्रवृत्ति और कल्पना-शक्ति ने वस्तुस्थिति को आदर्श रूप दिया और उससे काव्य प्रस्फुटित हो गया। जब कवि का हृदय विशिष्ट परिस्थितिजन्य अलौकिक भावानुभूति से परिपूर्ण होता है तब उसके हृदय से काव्य का प्रस्फुटन होता है। लोचनटीका पृ0 32 में यह कहा गया है-  “ यावत्पूर्णो न चैतेन तावन्नैवैवमिति’। ” इस तरह आलोच्य श्राप एक विशिष्ट निहितार्थ (अधर्म के शमन की उद्भावना) को मुखर करता है।
उपर्युक्त विवेचना के अनुसार, कविता सम्बन्धी आलोच्य प्रथम मिथक से कविता के रूप-स्वरूप, प्रकृति-प्रवृत्ति के साथ ही कविता केे अनेक अधिलक्ष्य, कविता के गंतव्य आदि स्वतः उद्भासित हो जाते हैं कि कविता का मौलिक लक्ष्य देवी सरस्वती के सत्त्वशील, शिवशील, नयशील, ऋतशील सद्गुणों की सम्पृक्ति से और तद्गत अन्याय के प्रतिरोध-विरोध-निषेध के साथ-साथ सर्वत्र सत्त्व की संस्थापना से आलक्षित है।
यहीं, आदि-कविता हेतु देवी सरस्वती को उत्प्रेरित करने वाले बहुज्ञ सर्जनाशील चतुर्मुख ब्रह्मा को संयुत करने का प्रतीकार्थ भी ग्राह्य है। सृष्टि-रचना के पूर्व ईक्षण तप सम्पन्न किया था सृष्टि-नियन्ता त्रिदेवांश ब्रह्मा जी ने। सदैव रचनारत तो रहते ही हैं वे। सत्त्व के साथ-साथ यथावश्यकता सृष्टि को संतुलित बनाए रखने और सत्त्व के महत्त्व को रूपांकित करने के सदुद्देश्य से वे तमस्-रजस् की भी रचना करते हैं परन्तु उनकी मूल प्रवृत्ति सत्त्वशील ही मानी जाती है। इस तरह कविता-उद्भव की उत्प्रेरणा त्रिदेवांश ब्रह्मा द्वारा देवी सरस्वती को दिए जाने की अवधारणा से इंगित है कि बहुज्ञ ईक्षणतपी रचनाशील ब्रह्मा ने अपने स्वभावज सद्गुणों के फलस्वरूप संदर्भगत उत्प्रेरणा प्रदान की थी। इस तथ्य के ब्याज से ‘कविता’ की प्रकृति भी कविता-उत्प्रेरक सत्त्वशील-रचनाशील ब्रह्मदेव की प्रकृति-प्रवृत्ति के समानुरूप दैवीय, रचनाशील एवं सत्त्वशील तो होनी ही चाहिए। यह मिथक यह भी प्रस्थापित करता है कि कविता-रचनाकर्त्ता को मूलतः ईक्षणतप, रचनाशीलता और सत्त्वशीलता सदृश सद्गुणों से सहयुक्त होना चाहिए; तभी वह उचित रूप में पहचान सकेगा कि कविता-शक्ति किसे और कैसे बनाया जाए। इस मिथक के अनुसार काव्योद्भव ही नहीं प्रत्युत उसके रचनाकार को भी ईक्षणतपी, बहुज्ञ, रचनाधर्मी, सत्त्वशील ब्रह्मा के सद्गुणों से आसिक्त होना ही चाहिए। तभी उसे कविता रचने के निमित्त ईक्षणतपी रचनाधर्मी ब्रह्मा जी की अयाचित कृपा प्राप्त हो सकेगी।
उपर्युक्तानुसार निश्चित रूप से कविता सम्बन्धी संदर्भगत प्रथम मिथक बहुविध उपयोगी है कविता के मौलिक सद्गुणों को, उसके अधिलक्ष्य आदि को समझने के लिए।
अग्रेतर देखें। एकाधिक अन्य मूल्यवान् मिथक भी सहयुक्त है कविता के उद्भव से --
आचार्य भरत ने ‘नाट्यशास्त्र’ में ‘कवि-रहस्य’ को प्रकारान्तर से ‘कविता-‘उत्पत्ति’ को शिव से तदन्तर ब्रह्मा से सम्बन्धित बताया है। आचार्य भरत इसी कृति में नाट्य/काव्य के महत्त्वपूर्ण अंग ‘रस’ को ‘ब्रह्मा द्वारा प्रोक्त’ भी बताते हैं। ‘नाट्यशास्त्र’ के भारतीय टीकाकारों ने कहीं भी आचार्य भरत के इस प्रकथन को असत्य नहीं बताया है। ‘द संस्कृत ड्रामा’ में पाश्चात्य समीक्षक ए0 बी0 कीथ भी अनेकानेक पाश्चात्य विद्वानों को उद्धृत करते हुए आचार्य भरत-प्रणीत ‘नाट्य’ के इस मिथकीय आविर्भाव से सहमत दिखते हैं। तभी तो वे कविता के तद्गत मिथकीय आविर्भाव का उल्लेख करते हैं और उस विषय पर अपनी असहमति रूपायित नहीं करते।
कविता को मूलतः शिव एवं ब्रह्मा से सहयुजित दर्शाने वाले मिथक और भी हैं। यथा-
* आचार्य राज्येखर कृत ‘काव्य-मीमांसा’ की प्रस्तावना में मिथकीय स्वरूप में बताया गया है कि नीलकण्ठी शिव ने ‘काव्यविधा’ का उपदेश परमेष्ठी (ब्रह्मा) आदि 64 शिष्यों को दिया। इन शिष्यों में सरस्वती-पुत्र ‘काव्यपुरुष’ भी सम्मिलित था। ‘काव्यविधा’ के प्र्रचारार्थ काव्यपुरुष को ब्रह्मा ने आज्ञा दी। काव्यपुरुष ने काव्य विधा को 18 भागों में विभक्त कर उतथ्य, शेष, कामदेव, भरत, सहस्त्राक्ष आदि 18 शिष्यों को शिक्षित किया। तदनुसार शिव से ब्रह्मा, ब्रह्मा से काव्यपुरुष, काव्यपुरुष से सहस्त्राक्ष आदि से गुजरते हुए काव्यविधा प्रसारित-प्रचारित हुई-   “   कविरहस्यं सहस्त्राक्षः, समाम्नासीत् औक्तिक मुक्तगर्भः, रीतिनिर्णयं सुवर्णनाभः, आनुप्रासिकं प्रचेताः, यमो यमकानि, चित्रं चित्राङ्गदः, शब्दश्लेषः शेषः, वास्तव्यं पुलस्त्यः, औपम्यमौपकायनः, अतिशयं पाराशरः, अर्थश्लेषमुतथ्यः, उभयालंकारिकं कुबेरः, वैनोदिकं कामदेवः, रूपक निरूपणीयं भरतः, रसादिकारिकं नन्दिकेश्वरः, दोषाधिकरणं धिषणः, गुणोपादानिकमुपन्युः, औपनिषदिकं कुचुमारः इति। ”
*  कविता-उद्भव सम्बन्धी उपर्युक्त काव्य-मीमांसीय मिथक का लगभग समरैखिक स्वरूप आचार्य शारदातनय कृत ‘भावप्रकाशम्’ में है। इस ग्रन्थ में नाट्य के उद्भव को नीलकण्ठी शिव से सहयुजित किया गया है। ‘भावप्रकाशम्’ के रचयिता आचार्य शारदातनय के अनुसार ‘नाट्यशास्त्र’ की रचना मनु के काल में आचार्य भरतमुनि के शिष्यों के द्वारा की गई। ‘नाट्यशास्त्र’ वस्तुतः ‘नाट्यवेद’ से लिए गए श्लोक-संग्रह के रूप में है। इसके दो संग्रह हैं- प्रथम संग्रह में बारह हजार श्लोकों का संग्रह है जबकि दूसरे संग्रह में मात्र छः हजार श्लोकों का संग्रह है। ‘नाट्यवेद’ के बारह हजार श्लोकों वाले प्रथम संग्रह का संक्षिप्त रूप ही द्वितीय संग्रह है। लोकप्रचलित नाट्यशास्त्र यही छः हजार श्लोकों वाला द्वितीय संग्रह ही है। इस ‘नाट्यशास्त्र’ के विनिर्माण की कथा विस्तार से बताते हुए आ0 शारदातनय ने बताया है-- ”अपने शासनकाल में मनु ने एक बार अपने कार्यभार से व्याकुल होकर भगवान् सूर्य का स्मरण किया। सूर्य भगवान् के द्वारा पूछे जाने पर मनु ने अपनी व्याकुलता/कष्ट से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। उत्तर में सूर्यदेव ने कहा कि एक बार इसी प्रकार ब्रह्मा ने सृष्टि-भार से व्याकुल होकर विश्रान्ति की इच्छा से विष्णु भगवान् से श्रम-क्लान्ति से विश्रान्ति पाने का उपाय बताने का अनुरोध किया था। विष्णु ने ब्रह्मा जी को शिव जी के पास इस हेतुक से भेजा। भगवान् शिव ने ब्रह्मा जी के दुःख को देख कर नन्दिकेश्वर को बुला कर आदेश दिया कि तुमने मेरे पास रह कर जिस नाट्यवेद का अध्ययन किया है उस नाट्यवेद को तुम ब्रह्मा को सिखा दो। नन्दिकेश्वर से नाट्यवेद की सम्पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर ब्रह्मा जी वापस अपने लोक में आए। वहाँ उन्होंने भरत मुनि को आमंत्रित कर उन्हें नाट्यवेद की शिक्षा दी। भरतमुनि अपने शिष्यों के साथ नाट्यवेद के अनुसार अभिनय करते हुए लोक का मनोविनोद करने लगे। यह कथा सुना कर भगवान् सूर्य ने मनु से कहा कि तुम ब्रह्मा द्वारा प्रोक्त (जो मूलतः नाट्यवेदकार भगवान् शिव द्वारा नन्दिकेश्वर को, नन्दिकेश्वर से ब्रह्मा को प्राप्त हुआ तदन्तर), भरत द्वारा प्रयोग किए गए नाट्यवेद से अपना मनोविनोद करके अपनी व्याकुलता दूर करो। यह सुन कर मनु ब्रह्मा के पास गए और उनसे अपना मंतव्य कहा। ब्रह्मा ने भरत-शिष्यों को मनु के साथ कर दिया। भरत-शिष्यों ने बहु काल तक विभिन्न स्थानों में रहते हुए मनु का मनोरंजन किया।“ बाद में मनु के कहने पर ही उन्होंने नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त दो संग्रह प्रस्तुत किए-
“ नाट्यवेदोच्च भरताः सारमुद्धृत्य सर्वतः।
संग्रहं सुप्रयोगार्हं मनुना प्रार्थिता व्यघुः।।
एकं द्वादशसाहस्त्रैः श्लोकैरेकं तदर्धतः।
षड्भिः श्लोकसहस्त्रैर्यो नाट्यवेदस्य संग्रहः।।
भरतैर्निर्मितस्तेषां प्रख्यातो भरताह्वयः।
यदिदं भारतवर्षे मनुना सुप्रकाशितम्।। ”
                                  -‘भावप्रकाशम्’, अधिकार 10: आचार्य शारदातनय
स्पष्ट है कि ‘भावप्रकाशम्’ के अनुसार ‘नाट्यशास्त्र’ का उद्भव ‘नाट्यवेद’ के रूप में भगवान शिव द्वारा बहुत काल पहले किया गया था। उसी नाट्यवेद का प्रकाशन इसके उद्भव-काल के बहुत बाद मनु-काल में हुआ। प्रचलित नाट्यशास्त्र भरत के शिष्यों द्वारा प्रकाशित कराया गया है।
समीचीन है यहीं बताना कि नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र के रूपाकार में भले ही कतिपय विभेद दृश्यमान हों, तो भी सैद्धान्तिक रूप से दोनों के अधिलक्ष्य, गंतव्य, मंतव्य आदि में कोई मौलिक अन्तर या भेद नहीं है।
इस तरह ‘नाट्यशास्त्र’ हो, ‘काव्य-मीमांसा’ हो या ‘भावप्रकाशम्’ आर्ष वाङ्मय के अनुसार काव्य/नाट्य उत्सीय स्वरूप में शिव और ब्रह्मा से संयुत है। सभी कलाओं के प्रथम आचार्य नटराज नीलकण्ठी शिव ने प्रथम बार काव्य-विधाओं का उपदेश नन्दिकेश्वर, ब्रह्मा आदि को प्रदान किया था।
सोचिए क्यों ?
पौराणिक आख्यान है कि ‘समुद्र मंथन’ में ‘विष’ आविर्भूत होने पर देव-दनुज ही नहीं वरन् अखिल विश्व दग्ध होने लगा। तब ब्रह्माण्ड की संरक्षा हेतु उस विष को ‘शिव’ ने पी लिया था। ले..कि..न, विष तो विष है। विष से कुप्रभावित होने लगे शिव भी। तब, उन्होंने उस विष को अपने कण्ठ में ही निरुद्ध कर लिया जिससे उनका कण्ठ नीला पड़ गया। ऐसे दग्धकंठी शिव जो विष की मारकता से सकल विश्व को भी बचाना चाहते हैं और स्वयं को भी, एतदर्थ जो ‘विष’ को अपने गले में ही निरुद्ध किए हुए हैं, अपने शरीर में आगे बढ़ने नहीं दे रहे हैं, ऐसे कण्ठदग्धी, नीलकंठी शिव ने काव्य-विधा के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता प्रथम बार अनुभूत की थी।
कहने की आवश्यकता नहीं कि समुद्र-मंथन और विष-प्रदाह से शिव के नीलकण्ठी बनने की घटना अति अति प्राचीन है। यह उस युग की घटना है जब ‘विश्व’ के वृहत्तर-निर्माण एवं उपयोग हेतु संसाधन एवं उपयोगी अवयव खोजे जा रहे थे। निश्चित रूप से संदर्भगत समुद्र-मंथन की परिघटना उस काल की है जब सृष्टि-रचना को पूर्ण एवं सुखकारी बनाने के लिए पृथ्वी से लेकर समुद्र तक का आलोड़न किया जा रहा था। अश्व, हाथी, लक्ष्मी आदि की खोज की जा रही थी। उस समय देवता और दैत्य, राक्षस ही अस्तित्व में थे जबकि काव्य विधा का प्रचलन पृथ्वी पर तब का है जब सहस्त्राक्ष, यम, चित्रांगद, पुलत्स्य, पाराशर, मनु या/और वाल्मीकि सदृश ऋषिगण अस्तित्व में आ चुके थे। इस तरह काव्य-विधा के उपदेश के समय के बहुत पूर्व शिव का दग्धकण्ठी होना तर्कसम्मत है। निष्कर्षतः जब श्री (लक्ष्मी) समेत चौदह (14) रत्न प्राप्त हुए थे समुद्र-मंथन से; तब देव-दनुज की संस्कृति से आगे बढ़ कर संसृति में ‘भरत’ सदृश मानव सांस्कृतिक सामाजिक विकास की डगर पर आगे बढ़ सका था। निःसंदेह तब तक भगवान् शिव के हृदय में विश्व-कल्याण की शिव-भावना प्रगाढ़ हो चुकी होगी और इसी शिवत्व में आलोच्य काव्य-उपदेश भगवान् शिव द्वारा उपदेशित किए गए होंगे।
क्या आचार्य भरत कृत ‘नाट्यशास्त्र’ में, राजशेखर कृत ‘काव्य-मीमांसा’ में एवं शारदातनय कृत ‘भावप्रकाशम्’ में उद्धृत उपरि-अंकित ‘नीलकण्ठी शिव द्वारा काव्य सम्बन्धी उपदेश’ के आख्यान से ‘कविता’ के विन्यास और उसके ‘क्या’, ‘कैसे’ (और क्यों’ पर भी) कोई प्रकाश नहीं पड़ता?
वस्तुतः वस्तुगत तथ्यों को हृदयंगम करने के लिए आवश्यकता है कि ‘कविता’ सम्बन्धी उक्त मिथक में इंगित ‘देशना’ को हम वस्तुगततः अनुभूत करें और तद्गत रूपक को वस्तुनिष्ठ वाच्यार्थ में अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में अर्थायित करें। सारतः इस रूपक का प्रथम इंगित है कि विष की दाह से प्रपीडि़त नीलकण्ठी शिव भी जिससे (काव्य से) शान्ति प्राप्त करते हैं उस काव्य/कविता का प्रसार-प्रचार सम्पूर्ण विश्व के हितार्थ एवं क्लान्ति के शमनार्थ वांछनीय मानते हैं नीलकण्ठी शिव भी-- इतना महनीय होता है काव्य। ब्रह्मा और मनु को भी दुःख/क्लान्ति से छुटकारा मिलता हो जिस तरह के नाट्य/काव्य से, ऐसे काव्य, ऐसी ‘कविता’, कैसा भी दुःकाल हो, कैसा भी देश हो, बुधवन्त/सुमनस्/सहृदय ही नहीं अपितु सर्वजन तक सर्वस्वीकार्य होगी-- यह कल्पनातीत नहीं है। शर्त यही है कि उसमें शिव-निदेशित तत्त्व और/या शिवत्व सदृश तत्त्व भरे-पूरे हों।
‘नाट्यशास्त्र’, ‘काव्य मीमांसा’ एवं ‘भाव-प्रकाशम्’ की उपर्युक्त प्रस्थापनाओं को कतिपय विद्वत्जन (?) काल्पनिक करार दे सकते हैं। आपत्तिकर्त्तागण कह सकते हैं कि काव्य-मीमांसा आदि में जो अन्यान्य नाम अंकित हैं उनका कोई ‘सुस्थापित इतिहास’ उपलब्ध नहीं है; नीलकण्ठी शिव सम्बन्धी कोई भौतिक साक्ष्य भी विद्यमान नहीं हैं। त..द..पि, यदि समुचित रूप  विचार किया जाए तो ऐसे कुतर्क निष्प्राण किए जा सकते हैं; उक्त प्रस्थापनाओं के भौतिक साक्ष्य भी खोजे जा सकते हैं।
शिव के साक्ष्य के लिए पूरा शैवागम उपलब्ध है। ‘शिवपुराण’ (जिसमें शिव को योग, दर्शन, कला, नृत्य, संगीत, काव्य में निष्णात बताया गया है) को काल्पनिक गल्प मान कर उपेक्ष्य मान लें तो भी कैलाश, अमरनाथ से लेकर रामेश्वरम् व मक्केश्वर तक के भौगोलिक स्थल भी हैं जो जनश्रुति से और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर शिव से सम्बद्ध बताए जाते हैं। समुद्रमंथन सम्बन्धी मिथक (यदि इसे मिथक मानें तो भी) वैदिक वाङ्मय और जेंदावस्ता जैसे ग्रंथों से परिपुष्ट हैं। दूसरी ओर सहस्त्राक्ष, यम, प्रचेता, चित्रांगद, पुलस्त्य, वामदेव, भरत, पाराशर, नंदिकेश्वर, कुचुमार आदि नाम भी काल्पनिक नहीं कहे जा सकते क्योंकि आर्ष वाङ्मय में इनके नाम, काम आदि का भरपूर उल्लेख है। ‘कामसूत्र’ में और ‘संगीत रत्नाकर’ में नन्दिकेश्वर नाम के आचार्य का उल्लेख है। आचार्य दण्डी के ‘काव्यादर्श’ की एक टीका में आचार्य नन्दिस्वामी को आ0 दण्डी का पूर्वाचार्य बताया गया है। आचार्य भरत कृत ‘नाट्यशास्त्र’ (जिसे ए0 बी0 कीथ जैसे विद्वान ने भी भरपूर प्रशंसित किया है) में ‘नंदि’ सहित उक्त मिथक के विभिन्न पात्रों का उल्लेख है। कहते हैं कि आज भी नाटकों की निर्विघ्न समाप्ति के लिए जो ‘नान्दिपाठ’ किया जाता है वह आचार्य नन्दि/नन्दिकेश्वर की प्रतीकात्मक अर्चना ही है। प्रचेता (रामायणकार वाल्मीकि के पिता) को ब्रह्मा का मानस-पुत्र बताया गया है। वाल्मीकि अयोध्या-नरेश दशरथ और राम के समकालीन थे जिनके द्वारा प्रणीत ‘रामायणम्’ सनातन काव्य-बीज के रूप में समादृत है। यह वाल्मीकि, प्रचेता, ब्रह्मा आदि के अस्तित्वमान होने का प्रबल साक्ष्य है।
और देखें-
आचार्य भरत ने महात्मा द्रुहिण को ‘रसों का प्रोक्ता महात्मा’ बताया है। ‘द्रुहिण’ का अर्थ ‘ब्रह्मा’ ही होता है। आचार्य भरत के अभिमत से काव्यारम्भ के आरम्भिक दिनों में ‘रस’ आदि का प्रोक्तन ब्रह्मा द्वारा प्रारम्भिक रूप से किया गया। पाराशर लिखित ‘पाराशर संहिता’ तत्कालीन विधि-विधान की पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। लंकेश रावण के पूर्वज पुलत्स्य थे जो वर्तमान भारत के उत्तरांचल के एक गाँव के निवासी थे। वहाँ के निवासीगण आज भी स्वयं को पुलत्स्य का वंशज बताते हैं। इसी तरह कवि/काव्यपुरुष को सरस्वतीपुत्र कहा जाना असंगत नहीं है। कवि/काव्यरसिक का नाम ‘काव्यपुरुष’ रखा जाना भी आर्ष समाज में प्रचलित नामकरण संस्कार की प्रविधि के आधार पर उचित ही है जिसमें जातक के भावी गुणों के आधार पर उसे अभिनामित किए जाने की परम्परा है।
‘काव्य मीमांसा’ के आलोच्य श्लोक में वर्णित तथ्यों के अनुसार काव्यविधा के 18 भाग किया जाना और इन अष्टादश विभागों को अलग-अलग विशिष्ट गुणों से सम्पन्न विद्वानों को सौंप दिया जाना व्युत्पत्तिशास्त्र के अनुसार भी उचित प्रतीत होता है। तथ्यों का उन्मीलन करने वाले (अर्थात् विभिन्न अर्थगत तथ्यों के जानकार) ऋषि उतथ्य को काव्य का ‘अर्थ श्लेष’ विभाग, बहुमुखी चपल-जिह्व शेष को ‘शब्द’ के बहुअर्थी अर्थवाचन हेतु ‘शब्दश्लेष’ विभाग, कामदेव को काव्य का आनन्ददायी ‘विनोद’ विभाग, नाट्यशास्त्री भरत को ‘रूपक-निरूपण’ प्रभाग सौंप दिया जाना रूपक स्वरूप में भी और कार्यनिष्ठ निष्पादन हेतु भी उचित ही है। तद्गत कार्य-विभाजन तर्कसंगत ही प्रतीत होता है। आदिकाल से लेकर पारसी थिएटर तक नाट्य में (और काव्य-नाटिकाओं में भी) रूपक-निरूपण ही तो होता रहा है। कविता-कथ्य में पग-पग पर प्रायः रूपक/रूपकों का सन्निधान होता है जिसके समुचित निरूपण की आवश्यकता होती है। यतः नाट्यशास्त्री भरत को यह विभाग सौंपा जाना सर्वथा तर्कसंगत है। इसी तरह वृषभ के गुणों से अभिषिक्त शिव के गण आचार्य नन्दिकेश्वर को काव्य विधा के अभिन्न अंग ‘रस’ का अधिकरण सौंप दिया जाना भी सुतार्किक है। जिस तरह वृषभ भोजन का पूर्ण पाचन करने हेतु बिना चबाए निगले हुए भोजन का पुनःचर्वण (जुगाली) करके भक्षित भोजन से रस-निष्कर्षण करता है, उसी तरह सुने-पढ़े काव्य का रस त्वरिततः के बजाय धीरे-धीरे चिन्तन-मनन (चर्वण) करके ही ‘रस्यते इति’ स्वरूप में निष्कर्षित करने वाले आचार्य को नन्दिकेश्वर नाम से अभिषिक्त किया जाना असंगत कहाँ है ? आलोच्य मिथक-सार से स्पष्ट है कि सभी कलाओं के आदि आचार्य नीलकण्ठी नटराज शिव के शिष्य नन्दिकेश्वर से दीक्षित होकर ब्रह्मा ने ‘काव्यविधा’ का प्रस्तार एक विशिष्ट विधा के रूप में किया। इसके लिए उन्होंने काव्यपुरुष को और कालान्तर में काव्यपुरुष ने ‘सहस्त्राक्ष’ (हजार आँखों के समान विचक्षण दृष्टिवान् व्यक्ति) को काव्यविधा के प्रचार का कार्य सौंप दिया। काव्य-विषय की गरिमा को देखते हुए ‘काव्य-विधा’ को समुचिततः हृदयंगम करने के लिए वृहत्दृष्टिसम्पन्न, बहुदृष्टि-सम्पन्न, विशिष्ट दृष्टिसम्पन्न, व्यापक दृष्टिसम्पन्न होना आवश्यक तो है ही। क्या आश्चर्य कि ऐसे ही गुण-शक्ति से सम्पन्न ‘सहस्त्राक्ष’ को काव्यविधा के प्रचार/प्रसार में नियोजित किया गया !
उक्त श्लोक के अवशेष नामांकनों को भी इसी प्रकार व्याख्यायित किया जा सकता है। कलेवर-विस्तार भय से प्रतीकात्मक रूप से इतना लिखकर यहीं पर इति की जा रही है। अनुभाव्य है कि आचार्य राजशेखर एवं आचार्य शारदातनय कृत उक्त प्रस्थापना के अन्यान्य नाम भी काल्पनिक नहीं, प्रत्युत वे इतिहाससिद्ध विद्वत्जन ही हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट ज्ञान से सम्पन्न थे। उनका अस्तित्व काल्पनिक नहीं है।
उपर्युक्तानुसार सम्मादिट्ठि से उक्त प्रस्थापना की तार्किक व्याख्या को अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में सम्यक्तः स्वीकारने पर कविता के परास, विन्यास आदि सुस्पष्ट हो जाते हैं। तदनुसार उपर्युक्त श्लोक ‘कविरहस्यं सहस्त्राक्षः,....कुचुमार इति’ में वर्णित काव्यविधा के अष्टादश विभागों को अलग-अलग विशिष्ट काव्यगुणों से सम्पन्न होने के तथ्य से कविता के लिए, कविता के ‘कविता’ होने के लिए, काव्य के ‘काव्य’ होने के लिए उपरि-अंकित मिथकीय इंगित से सुसंगत कतिपय काव्यगुण की पूर्ति अपरिहार्य है।
बताते चलें कि इस बिन्दु पर विवाद निरर्थक है कि पहले कविता का जन्म हुआ या नाट्य का ? निश्चित रूप से कविता का आविर्भाव पहले हुआ था और संसृति का सांस्कृतिक विकास होने पर ‘नाट्य’ लोक में आविर्भूत हुआ। नाट्य भी चूँकि ‘काव्य’ की ही एक विधा है, अतएव, कविता और नाट्य दोनों के मौलिक सद्गुणों में कोई विभेद नहीं मानना चाहिए। आचार्य भरत भी इसीलिए नाट्य के मौलिक सद्गुणों को कविता (वरन् काव्य के समस्त अपररूप) के लिए उपयोगी मानते थे।
तेनेव, कविता और नाट्य के आविर्भाव सम्बन्धी उपरि-अंकित विवेकसम्मत मिथकों के आधार पर सारतः कह सकते हैं कि आलोच्य परिप्रेक्ष्य में ‘कविता’ की संज्ञा से वस्तुतः वह शब्द-संयोजन तात्पर्यित है जो शिवशीलित सद्गुणों से, लोकमंगल, लोककल्याण, लोकशान्ति आदि के अधिलक्ष्य से आप्लावित तथा देवी सरस्वती की सत्त्वशील, ऋतशील, नयशील प्रकृति से समानुकूल और ईक्षणतपी, सर्जनाशील, सत्त्वशील ब्रह्मा के सर्जनात्मक बहुज्ञ गुणों से विभूषित हैं। अतएव, ‘कविता’ के नाम पर शब्दों की जिस तुकबन्दी-अतुकबन्दी में शिव, ब्रह्मा, सरस्वती के प्रकृतिगत एवं प्रवृत्तिगत सद्गुण पूर्णतया या अंशतया उपस्थित हों, उसे ही ‘कविता’ की संज्ञा प्रदान की जा सकती है।
औ..र, बताते चलें यह भी कि काव्य को गद्य-पद्य रूप में विभेदित करते हुए ‘कविता’ को प्रथम बार पद्य के रूप में नितान्त स्वतंत्र इयत्ता प्रदान की थी आचार्य दण्डी ने। आचार्य राजशेखर ने कविता के लिए ‘आगोपालकम् आयोषिदास्तामेतस्यलेह्यता’ (अर्थात् कविता’ वही है जो गोपालकों और स्त्रियों तक की जुबान पर चढ़ सके) लिख कर व्यापक महत्ता प्रदान की थी कविता को। इस प्रकार, उपरिअंकित काव्य-मीमांसीय मिथकीय मानसिकता वाले राजशेखर के इंगित का तात्पर्य इतना तो अवधार्य है ही कि वही कविता गोपालकों/स्त्रियों तक की जिह्वा पर चढ़ सकती है जो मिथक में इंगित कविता-सद्गुणों से समेकित हो।
औ..र कहना होगा कि मिथक-इंगित विशिष्टताओं को समेकित करने वाली कविता (अपितु काव्य के सभी अपररूप) साहित्यिक परिप्रेक्ष्यों को तो सम्पूर्त्त करेगी ही, वह अपने स्थूल से लेकर सूक्ष्म रूप-स्वरूप तक, अध्यात्म की शब्दावली में-- कविता के अन्नमय कोश से लेकर मनोमय कोश और विज्ञानमय कोश तक, भाव-विभाव-संचारीभाव के स्तरों पर व्यष्टि-समष्टि को पावन भी बनाएगी। ऐसी कविता ही सतत उच्चतर भावदशा-प्रदायी होकर मानव के व्यष्टि-समष्टि के अन्नमय से लेकर विज्ञानमय अभिकोशों तक को ब्रह्मा, शिव एवं देवी सरस्वती के सद्गुणों से भरपूर आप्लावित करने में समर्थ सिद्ध होगी--यह देशना भी निस्सृत होती है कविता/काव्य सम्बन्धी उपरि-अंकित मिथकीय आख्यानों से।
यहीं महत्त्वपूर्ण है यह देखना भी कि मात्र संस्कृत, हिन्दी काव्य-जगत् ही यह नहीं मानता कि कविता-साहित्य मिथकीय ‘सत्त्व, ज्ञान व सुन्दरम्’ की देवी सरस्वती के आशीर्वाद से शक्तिमान् बनता है अपितु सुमेरीय जगत्, सामी जगत् और यूरोपीय जगत् की मान्यता भी कविता/साहित्य को मिथकीय एवं आध्यात्मिक जुड़ाव से जोड़ती आई है। सुमेरियन कहते हैं कि सुमेरियन देवी इन्हेंदुआना ने विश्व में पहली बार किसी देवी की अर्चना में गाए जाने वाले ‘गीत’ की रचना की थी। तभी से ‘गजल (कविता)’ का प्रादुर्भाव हुआ। सामी जगत् की मान्यता है कि विश्व में प्रथम बार ‘गजलुलगजलियात’ की गजलें पैगम्बरान द्वारा सल्फ पहाडि़यों पर अपने तम्बूरे से झंकृत की गई थीं जिनसे इन्सान और पशु-पक्षी उनकी ओर खिंचे चले आते थे। ग्रीक और यूरोपीय जगत् में ‘कविता’ के जन्म को देवी ‘डोरोसियस’, ‘म्यूज’ देवी, क्लीपी, वीनस और एरातो देवी आदि की कृपा से सहयुजित किया जाता है। प्रख्यात अंग्रेजी कवि समालोचक बेन जानसन भी कविता-उद्गम को स्वर्ग से जोड़ते थे। प्रख्यात शायर मिर्जा गालिब शायरी को गैबी मानते हैं। प्रख्यात अधुना विचारक कवि चेश्वाव मीबोश की स्वीकारोक्ति है कि वे खुद से कविता नहीं लिखते; वे कविता ‘दायोमेनियन प्रभाव’ में रचते हैं। काव्य के आदि-रूप कविता के उद्भव-क्रम में वर्णित मिथकीय मान्यताओं से स्पष्ट है कि मूल रूप में कविता/गीत/गजल कहीं न कहीं दैवीय प्रेरणा से संयुत है जिसके फलस्वरूप कविता (वरन् समग्र काव्य के सभी अपररूप) सत्त्व, लोककल्याण, लोकसंग्रह जैसे मनोभावों से मूलतः सम्पृक्त रही है अवश्य। आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता या उत्तर-उत्तरआधुनिकता के संप्रभाव में या किसी अनास्था की झंझा में यदि ‘कविता’ से देवत्वशीलता, पावनता, सत्त्व, लोकहित, सार्वकल्याण जैसे मौलिक गुणों का तिरोहण कर दिया जाए तो निश्चित है कि मूल कट जाने पर जैसे मोटे भारी वृक्ष भी सूख जाते हैं, उसी प्रकार ‘कविता’ भी मूल से कट जाने के कारण लोक से विलुप्त होने की ओर अग्रसर होकर ‘सूख’ ही जाएगी।
अ..र, सामिचिन में यह भी कहा गया है कि सत्त्व के देवदेव बहुज्ञ एकान्तपि ब्रह्मा, सर्व कल्याणक शिव और सत्त्वशील प्रचेतस देवी सरस्वती, क्वैश्चन, मुज देवी आदि या पैगम्बरन से सहयुजित 'काव्य-उद्भव' को स्वीकार करने का महत्व यह नहीं है कि केवल भजन तक सीमित कर दिया जाए 'कविता' को। भजन रागात्मकता से विपरीत ध्रुव की ओर ले जाने के लिए नृत्य नवधा भक्ति की अंगोपांग साधना के क्रम में संगत होते हैं जबकि धार्मिकता एवं कल्याण संस्कृति के निमित्त सात्विक एवं शिवशील जीवनराग से संप्रक्त रागात्मकता प्रदान की जाती है। संभावित काव्य को लोकधर्मी रचनाधर्मी सत्त्व से जापानी दर्शन के मंत्र से आर्ष वाङ्मय में 'काव्य' शिव, ब्रह्मा एवं देवी सरस्वती से संप्रक्त किया गया है। सत्त्व की अधिष्ठात्री होने के साथ देवी सरस्वती जीवन-राग, कला एवं कलाजन्य सौंदर्य के भाव-स्वभाव-प्रभाव की भी अधिष्ठात्री हैं। कला, संगीत के साथ-साथ 'धी' को भी नियंत्रित-अधिष्ठित लिखा जाता है और प्रचेतयति भी वे हैं। उनकी वीणा 'विपंची' का अष्टवाँ तार आधिभौतिक स्वरूप में ही है। जीवन-राग से कभी विमुख नहीं होतीं देवी सरस्वती। ब्रह्मा भी रचनाधर्मी हैं। शिव तो 'सर्वकल्याणक' के साक्षात् स्वरूप हैं। महायोगीराज भी वे लास्य देवता नट भी हैं। अ..त..ए..व, देवी सरस्वती, ब्रह्मा और/या शिव से सहयुक्त कविता कला निवृत्तिमार्गी, पवित्रता से विच्युति या विरागात्मक भजन नहीं बन सकता। इनके आधारों पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अध्यात्मवादियों को कविता से इन्कार करते थे।
मेरे विचार से तद्गत पौराणिक सत्त्वपेक्षा की मात्रा इतनी ही अभीप्सित है कि लोक कल्याण, लोकसंग्रह, सात्विक जीवनराग, ऋत और नए आदि की रचना धार्मिक मूल भावना से 'काव्य' नि:सृत हुए वही अनुभव सहयुजित काव्य/कविता को प्राप्त हुआ। कविता-गीत-गजल आदि या काव्य के विभिन्न अपररूपों की रचनाओं में सत्त्वादि लोक-कल्याणकारी भावानुभाव से समाहित हुए निमित्त सदैव ही उसे तत्त्वतः देवी सरस्वती, ब्रह्मा एवं शिव की रचना, धार्मिक लोकसंग्रही सद्गुणों से सहयुजित माना जाए।
संपिंडिततः, आरंभ उत्सव अनुशीलन के आधार पर यह माना जाता है कि प्राचीन आर्ष ग्रंथों की रचनाएँ भारतीय और अन्य लोकविश्वासों में उपलब्ध हैं--उन्हें निरर्थक नहीं माना जाए। इस प्रकार, आर्ष काव्यज्ञ आचार्य भरत, आचार्य राजशेखर, सारदातनय द्वारा निरूपित कथ्य, स्टेप आदि को समर्थित भौतिक सिद्धांतों की शुरुआत में शुरू किया गया है, यदि मिथीय सिद्धांत तो भी संदर्भगत रचना से वस्तुनिष्ठ काव्य/कविता की स्थापना, पार्स, अधिलक्ष्य आदि को शास्त्रीय रूप से जाना जा सकता है। तथैव, उपरि-अंकित पौराणिक आधारों पर कविता/साहित्य के समग्र स्वरूपों का जन्म सत्त्वशील, ऋतशील, सृजनशील, लोक-कल्याणकारी, सत्त्व-प्रवर्तक, तमस्-बेधक, अन्य-रोधक रचनाएँ धार्मिक, स्वरूप आदि-इत्यादि का अवधारण कर उनका सकारात्मक स्वरूप भी निरूपित किया जा सकता है।
                                               (अलेखा कृति 'कविता क्या है' इसी शीर्षक से प्रकाशित।)

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