एक अप्रतिम महाकवि : आदि-महाकवि वाल्मीकि
- विजय रंजन
होमो हैबिलिस से विकास करके होमो सैपियन्स सैपियन्स (बुद्धिमान मानव) जब सभ्यता की डगर पर बढ़ रहा था, प्रत्युत अर्द्धविकसित वन-नर भी जब यहाँ-वहाँ विद्यमान थे और जब नगर-सभ्यता कोसल, प्रयाग, काशी, जनकपुर जैसे छिटपुट स्थानों पर ही उपलब्ध थी, उन दिनों कोसल के सीमान्त पर कलकल-निनादिनी तमसा-तट पर एक लोकरक्षक ऋषि लोक-चिन्ता में, लोकहित-चिन्ता में व्यग्रता से मनन-चिन्तन कर रहा था। उस ऋषि की प्रथम चिन्ता थी साम्प्रतम् लोके लोकहिती सद्गुणों से सुसम्पन्न सर्वगुणोपेत नायक के तलाश की। उन्हीं दिनों कोसल, जनकपुर आदि के आसपास तक सर्वग्रासी, अत्याचारी, क्रूर, नृशंस, उदण्ड, तामसी आचरण वाले अर्द्धसभ्य राक्षसजन के स्कंधावार स्थापित हो चुके थे। ऐसे देश-काल में अन्याय, अत्याचार के समुचित प्रतिरोध के लिए जन-जागरण आवश्यक था; परन्तु यह हो कैसे ? यह सम्भव तभी था जब लोक के समक्ष किसी सर्वगुणोपेत नायक के आख्यान को, उसके आदर्श जीवनचरित को सम्प्रस्तुत किया जाए जो मानवीय गुणों से आसिक्त होने के साथ-साथ तमस-निरोधन हेतु सक्षम भी हो। इसी अधिलक्ष्य से लोकचेता ऋषि ने आरम्भ की एक तलाश सर्वगुणोपेत नायक की जिसके आदर्श जीवनचरित को लोकप्रिय लौकिक काव्य के रूप में सम्प्रस्तुत करके तत्कालीन देश-काल में सभ्यता और विकास की नई ऋचा लिख सकें वे। इसी हेतुक से लोक को, समाज को, जन-जन को सकारात्मक, कल्याणकारी, सफल सामाजिक जीवन का एक सार्वहिती सात्विक निदेशन प्रदान करने के लिए तमसावासी ऋषि उन्मन थे।
यह उन दिनों की बात है जब चार दाँत वाले सफेद हाथी धरती पर थे, धान की खेती आरम्भ हो चुकी थी परन्तु यहाँ-वहाँ उत्तर-नवपाषाणकालीन सभ्यता विद्यमान थी। नगर विरले थे और आपवादिक विरले रथी, महारथियों को, महावीरों को छोड़ दें तो सामान्य जन लड़ाई के समय शिलाखण्ड, वृक्षों, वृक्षों की डालों और अपने सिर, हाथ, पैर, मुष्टिका आदि का ही प्रयोग करता था। अथर्ववेद और उपनिषद् आदि रचे नहीं जा सके थे तब तक। केवल ऋक्, साम और यजुः वेद ही विद्यमान थे तब। ऐसे आदिम युग में ऋषि-मुनि ही समाज को दिशा दिखाने का दायित्व-निर्वहन करते थे। वे ही पुरोहित होते थे, कवि होते थे, विश्पति होते थे। ऐसे देश-काल में तमसा-तीरे अपने आश्रम में मनीषी ऋषि प्रचेतस वाल्मीकि लोकचिन्ता से व्यग्र थे। इसी संदर्भ में महर्षि वाल्मीकि ने सर्वगामी मुनिवर नारद से विचार-विमर्श किया और बहुज्ञ चतुर्मुख ब्रह्मा से भी। सुदीर्घ चिन्तन-मनन आदि के पश्चात् विश्व का प्रथम महाकाव्य रचते हैं वे, जिसका नाम ‘दशानन-वध’, बाद में ‘सीतायाम् चरितं महत्’ और अंततः ‘रामायणम्’ रखते हैं वे। इसे आदि-रामायण भी कहते हैं।
आजकल ‘रामायणम्’ नामक मूलग्रंथ के स्थान पर इसके कई पाठ उपलब्ध हैं। इनमें पाठभेद भी हैं। उनमें सर्वाधिक प्रचलित है गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित ‘श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण’ जो स्वयं दक्षिणात्य संस्करण की अनुकृति है।
यह कृति कितनी महत्त्वपूर्ण है यह इसी से प्रकट है कि इस कृति के रचनाकार स्वयं आदि-महाकवि वाल्मीकि विगत 7000 वर्षों से सम्मान्य हैं। 15वीं शताब्दी तक प्रायः सभी प्रमुख कवि अपनी कृति में वाल्मीकि-वंदना अवश्य करते थे। भक्तकवि तुलसीदास ने भी निभाई यह परम्परा। रचनाकाल से आज तक रचनाकारों ने रामायणम् का किसी न किसी रूप में अनुसरण भी किया है। आदि-महाकवि परवर्ती रचनाकारों के लिए न केवल प्रेरणास्रोत बने अपितु रामायणम् में वर्णित सदाचारों को परवर्ती युग में मानक सदाचार माना गया। रामायण-नायक का जीवनचरित आज तक आदर्श जीवनचरित माना जाता है। संस्कृत-हिन्दी ही नहीं, वरन् प्रायः समस्त भारतीय भाषा-साहित्य के सभी काव्यकार रामायणम् के आदर्शों को जाने-अनजाने अपनाने के अभीप्सु दिखते हैं। एल0 पी0 टेस्सीटोरी को मानें तो मानना होगा कि भक्त कवि तुलसीदास की रामचरितमानस में 84 स्थलों पर रामायणम् का अनुसरण किया गया है। संतकवि तुलसीदास ही नहीं, रामकाव्य के प्रायः सभी कवि रामायणम् की रामकथा की कमोबेश अनुकृति करते रहे हैं। कृष्णकाव्य में भी रामायणम् में जो मानक चरित आदर्शस्वरूप में उकेरे गए हैं-- उनका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गुणगान दृश्यमान है। डाॅ0 भगवान सिंह कहते हैं कि अब तक 300 से अधिक रामायणें लिखी जा चुकी हैं। इन 300 रामायणों में भी रामकथा अपने देश-काल-सम्प्रदाय के सम्प्रभावों के बावजूद मूल रूप में कमोबेश वही है जो रामायणम् में अंकित है। बौद्ध जातक ग्रंथ ‘बट्ठण्णना’ हो या जैनाचार्य पुष्पदन्त की कृति ‘पउमचरिउ’-- इनमें अपने विशिष्ट सम्प्रदाय विशेष के गुणगान और एक सीमा तक साम्प्रदायिक विद्वेष के कारण मूल वाल्मीकीय रामकथा को बदल दिया गया फिर भी बदली हुई रामकथा में भी रामायणम् के प्रभाव को देखा जा सकता है। रामायणम् की लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि बाद में कुशीलवों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी रामकथा-गायन से जीविकोपार्जन करने में सक्षम हो सकी। रामायणम्-प्रणीत रामकथा के पात्रों के नाम से आज हमारे देश की जनसंख्या, स्थान आदि के 60 प्रतिशत से अधिक का नाम जुड़ा हुआ है।
औ..र, रामायणम् का ही अवदान है कि भारत के बाहर आज से 4000 वर्ष पूर्व की हित्ती सभ्यता हो या सुदूर पश्चिम की माया सभ्यता के लोग सभी रामायणम् की रामकथा से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को जुड़ा बताने में गौरव का अनुभव करते हैं। मिस्र के शासक अपने नाम के साथ ‘ फराओ (राम) ’ जोड़ते हैं और कम्बोडिया के शासक भी। कहते हैं कि मिस्र की भाषा में ‘फराओ’ का अर्थ ‘राम’ ही होता है। म्यांमार (बर्मा) में ‘रामावती’ नामक स्थान है, अफगानिस्तन में अयुधिया और थाइलैण्ड में अजुधिया, लवपुरी, जनकपुरी नाम वाले नगर। थाईलैण्ड के सम्राट रामकिएन का नाम राम से जुड़ा था। उन्होंने ‘रामकिएन’ नामक थाई रामायण की रचना भी की थी। कम्बोडिया की खमेर भाषा में रामकेर (रामकोर) नामक ग्रंथ लिखा गया जो रामायणम् का कम्बोडियाई संस्करण है। जावा के मन्दिरों में रामायणम् के श्लोक जगह-जगह उत्कीर्ण हैं। मलयेशिया में मेलापु भाषा में ‘हिकायत सेरीराम’ और इण्डोनेशिया की ‘ककविन रामायण’ में भी रामायणम् जैसी रामकथा है। इण्डोनेशिया में रामायणम् पर हाथ रख कर शपथ ली जाती है। मैक्सिको की इन्का सभ्यता पर भी रामायणम्-संस्कृति प्रभावी है। पेरु के राजा अपने को सूर्यवंशी राम का वंशज बताने में गर्व का अनुभव करते थे। रूस में तीसरी शताब्दी से रामायणम् आधारित रामकथा प्रचलित है। लाओस रामकथा ‘ला फाम’ और ‘फोमचक’ रामायणम् का शब्दान्तर है। लाओस के केन मन्दिर में वट पर रामकथा उत्कीर्ण है। चीन के खेतान नगर की खेतानी भाषा में रामायणम् के समानान्तर ‘खेतानी रामायण’ को खोजा गया है जिसकी प्रति पेरिस के पाण्डुलिपि संग्रहालय में उपलब्ध है। चीन के उत्तर में मंगोलिया की कान्मिक भाषा में भी चार रामकथाएँ लभ्य हैं जिनकी कथा रामायणम् की कथा से अनुप्राणित है। इस तरह रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, मध्य एशिया, आस्ट्रेलिया सभी जगह व्याप्त है रामकथा जिसका मूल है वाल्मीकि कृत ‘रामायणम्’।
यह सच नहीं कि वाल्मीकि से पूर्व रामकथा का प्रणयन नहीं किया गया। भृगु , च्यवन आदि ऋषियों ने भी रामकथा विरची थी लेकिन उनके द्वारा विरचित रामकथा जग-प्रसिद्ध नहीं हो सकी थी। यूँ तो ऋक् में भी राम, दशरथ आदि समुपस्थित हैं। ऋक् में चार स्थलों पर ‘राम’ उल्लिखित हैं। लेकिन ऋक् के राम, दशरथ आदि रामायणम् की रामकथा के पात्र नहीं हैं। ऋक् में रामकथा भी नहीं है। वर्तमान स्वरूप में प्रचलित रामकथा वस्तुतः ‘रामायणम्’ से ही प्रादुर्भूत हुई। रामायणम् की शताधिक पुण्यिका, टीका ‘कतक टीका, नागोजी भट्ट टीका, गोविन्दराज की टीका आदि भी विरचित हुईं। ‘रीडिंग्स इन रामायण’ के अनुसार शताधिक विद्वानों ने रामायणम् की व्याख्या की। महाभारतकार व्यास से लेकर आज तक नरेन्द्र कोहली हों या रमानाथ त्रिपाठी जैसे समर्थ रचनाकार--- सभी रामायणम् की वाल्मीकीय रामकथा को, उस रामकथा के पात्रों को उपजीव्य बना कर अपने-अपने ढंग से गद्य-पद्य में रामकाव्य का प्रणयन कर रहे हैं। अकारण नहीं कि वृहद्धर्मपुराणकार ने रामायणम् को ‘सनातन काव्यबीज’ कहा।
निश्चित रूप से रामायणम् में विद्यमान अनेकानेक विशिष्टताएँ वाल्मीकीय रामायण के विश्वव्यापी होने का सकारात्मक आधार हैं। प्रमुख प्रथम आधार मुनिवर वाल्मीकि ने रामायणम् में अंकित कर दिया है आरम्भ में ही। रचयिता तपस्वी वाग्विद ने ‘कोऽन्वस्मिन् साम्प्रतम् लोके’ से ही आरम्भ किया अपनी कृति को, अ..र्था..त् तत्कालील देश-काल में लोक की चिन्ता, लोकहित की चिन्ता, लोकमंगल को साक्षात् करने की चिन्ता से आग्रस्त होकर एक सर्वगुणोपेत नायक, महानायक की तलाश आरम्भ की थी ऋषि कवि ने। वह नायक तत्कालीन देश-काल की मर्यादा का पुरुषोत्तम था। उसके द्वारा आचरित आदर्श जीवनचरित आज तक सदाचारों की दुनिया में एक मानक है जो मनुष्य को उच्च भावदशा वाला ‘बेहतर मनुष्य’ और समाज को एक ‘बेहतर समाज’ बना सकता है। इतना ही नहीं, ऐसे सर्वगुणोपेत, प्रजाहितरत, धीर, वीर, पुरुषोत्तम नायक का आचार-व्यवहार जो आदि-महाकवि ने महाकाव्यस्वरूप में आद्यन्त प्रवहमान दर्शाया उसका यदि अनुसरण किया जाय तो निश्चित रूप से वैज्ञानिकता और भौतिकता से सराबोर आज के युग में भी न केवल लोकयात्रा का सुचारु सुप्रवर्तन सम्भव है, प्रत्युत ऐसे गुणों से आसिक्त होने पर व्यक्ति पुरुषोत्तम बन सकता है; समाज का नायक महानायक बन सकता है’--- यही आविश्व प्रथम बार सम्पूर्णता के साथ साक्षात् उदाहृत किया आदि-महाकवि वाल्मीकि ने। यह सहित भाव, समाजहिती भाव, लोकहितवादी नैतिकता सह नैतिकतावादी लोकहित का भाव मूलाधार है जो रामायणम् को और इसके प्रणेता को सनातन अप्रतिम प्रतिमानक महाकाव्य बना देता है।
रामायणम् के साहित्यिक सौष्ठव को देखें तो न न्यूनं न अधिकं साहित्यिक गुणों वाले शब्द-चयन, रस, छन्द, अलंकार, धीरोदात्त नायकत्व और ऐसे नायक के सर्वगुणोपेत आचरण को साक्षात् करने का प्रतिमान है यह ग्रंथ।
साहित्यिक सौष्ठव के क्रम में गहरे से देखें तो दिखेगा कि आचार्य दण्डी ने महाकाव्य के जो निकष बताए या बाबू गुलाबराय, आ0 महावीरप्रसाद द्विवेदी महाकाव्य के लिए जो गुण वांछनीय मानते हैं, उन सभी कसौटियों को आ0 द्विवेदी गुलाबराय या आ0 दण्डी से बहुत-बहुत पूर्व समेकित कर दिया है आदि-महाकवि ने रामायणम् में। इसी तरह, प्लेटो का ‘अनुकृति सिद्धान्त’ या कि अरस्तू का ‘स्वच्छन्दतावाद’ को इनके जन्म के पूर्व ही विखण्डित कर चूर्ण-चूर्ण कर देने वाली रचना प्रस्तुत करते हैं वे। यह रचना सुकरात के ‘आदर्शवाद’, मैथ्यू अर्नाल्ड के ‘जीवन की अंततः आलोचना’ और इलियट-प्रणीत ‘डिपर्सोनेशन, डिपर्सनाइजेशन’ को साक्षात् करती है। होरेस और आचार्य क्षेमेन्द्र का ‘औचित्यवाद’ हो या लांजाइनस का ‘उदात्तवाद’ या आ0 भामह का ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’, आ0 मम्मट का ‘शिवेतर क्षतए’ या कि आचार्य दण्डी का ‘इह शिष्टानुशिष्टानाम् .......लोकयात्रा प्रवर्तते’ सिद्धान्त या कि आचार्य भरत-प्रणीत ‘लोकविश्रान्ति’ का अधिलक्ष्य-- इन सारी कसौटियों के अवधारण के युगों पूर्व आदि-महाकवि वाल्मीकि ने अपनी रामायणम् में इन सभी सिद्धान्तों/ अधिलक्ष्यों को पूरी तरह रूपायित कर दिया है। मिल्टन ने जिसे ‘वेज़ टु गाॅड’ कहा है, रामायणम् से बढ़ कर अन्यत्र क्या वह दृश्यमान है ? नहीं ना ! उदात्तता के निकष पर तो होमर भी वाल्मीकि से पीछे हैं। इलियड में विजयी सेना के सिपाही पराजित मृतकों की लाशों से स्वर्णाभूषण, हथियार आदि लूट लेते हैं, वाल्मीकि ‘मरणानि अन्तानि वैराणि’ का निर्देश देते हैं। इलियड की हेलन घर आए सुन्दर अतिथि राजकुमार के साथ पतिगृह से धन-आभूषण आदि लेकर भाग जाती है जबकि सीता का पातिव्रत और पति-प्रेम इतना गहन है कि प्रलोभनों और सघन भय के सम्मुख होने पर भी डिगता नहीं। सीता का पातिव्रत और पति-प्रेम नारी-जाति के लिए आदर्श बन गया है।
बताते चलें कि रामायणम् में कहीं भी महाकाव्य-नायक (महानायक) को ईश्वर या भगवान् या परमात्मा नहीं दर्शाया गया प्रत्युत नायक/महानायक राम स्वयं को बार-बार दाशरथोऽहम् (दशरथ-पुत्र मैं) कहते हैं। वन में प्रतिकूल परिस्थितियों में भी साधनहीन दाशरथ मानव राम द्वारा असीम बलशाली, शक्तिसम्पन्न, साधनसम्पन्न, अनयी, अत्याचारी रावण का विनाश दर्शा कर रामायणम्-कार ‘मानववाद’ की प्रतिष्ठा करते हैं। इस प्रकार विश्व के प्रथम मानववादी महाकवि हैं आदि-महाकवि वाल्मीकि।
रामायणम् के महानायक दाशरथ राम में उदारता, मानवीयता, उदात्तता, प्रजाहितरतता भरपूर विद्यमान है। क्रूरै: नृशंसैः की समाप्ति की प्रतिज्ञा करते हैं वे वन में राक्षसों द्वारा मारे गए ऋषियों की हड्डियों के ढूह को देख कर। इस प्रकार मानवतावाद का भी आविश्व प्रथम रेखायन किया है आदि-महाकवि ने जिससे वे विश्व के प्रथम मानवतावादी महाकवि भी हैं।
जहाँ तक लोकवाद की बात है, सिसरो को लोकवाद का प्रथम आविष्कारक कहा जाता है। मैं इसे पश्चिमी विचारकों की भूल कहता हूँ। सिसरो से हजारों वर्ष पूर्व आदि-महाकवि ने प्रजाहितरतता, लोकहितरतता को अपने महाकाव्य के नायकत्व का आधारभूत गुण माना था और दाशरथ राम में यह गुण भरपूर पाए जाने पर रामायणम् की रचना की थी। रामराज्य से बढ़ कर लोकवादी राज्य-व्यवस्था अद्यतन आविश्व दृश्यमान नहीं है। दाशरथ राम जिन्होंने स्वयं घोषणा की कि लोक के लिए वे अपनी भार्या तक का परित्याग कर सकते हैं और उचित या अनुचित आपनी इस घोषणा को साकार भी किया----.उससे बढ़कर लोकवाद अन्यत्र कहाँ मिलेगा ? पूरी रामायणम् में लोकहित-संरक्षण, लोकवाद का जो अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया गया है उससे सिसरो नहीं, आदि-महाकवि वाल्मीकि ही लोकवाद के जनक माने जाने चाहिए और विश्व के प्रथम लोकवादी महाकवि भी।
औ..र, सन्नारी के शील-सम्मान की रक्षा हेतु आदि-महाकवि सदैव सन्नद्ध दिखते हैं रामायणम् में। वे भरी सभा में स्वयं उपस्थित होकर अपने तप-पुंजों को दाँव पर रखते हुए सीता के पक्ष में आवाज उठाते हैं। यह उनके नारीवादी होने का प्रमाण है। विश्व में प्रथम बार नारी के पक्ष में, नारी-अस्मिता के पक्ष में, नारी-सम्मान के पक्ष में, कह सकते हैं कि शालीन नारीवाद के पक्ष में आवाज उठाने वाले विश्व के प्रथम महाकवि भी हैं आदि-महाकवि वाल्मीकि। इस तरह आदि-महाकवि का रामायणम् सार्थक, सकारात्मक नारीवाद का साक्षात् उदाहरण रूपायित करने में भी सक्षम है। रामायणम्-नायिका सीता के अतिरिक्त अन्य महिला-पात्रों के प्रति भी कहीं कोई असम्मान प्रदर्शित नहीं है रामायणम् में। उद्विग्न मनस्विता में कैकेयी को बुरा-भला कहते समय भी महाराज दशरथ कैकेयी को संसार की अन्य नारियों से विलग बताते हैं और कैकेयी के प्रति व्यक्त अपने मनोभाव/अवधारणा को केवल कैकेयी के प्रति ही सत्य बताते हैं विश्व की समस्त नारियों के प्रति नहीं। रामायणम्-नायिका सीता को तो अति पावन, उदार, सद्गुणी, मर्यादाशील, ज्ञानवान्, वाग्मी, निर्भीक, सर्वथा आदरेण्य महिला के रूप में दर्शाया गया है। वीर्यशुल्का सीता अपनी अस्मिता के प्रति सचेत हैं। अपने पति महासाम्राज्य कोशल के राजकुमार राम को सत्पथ पर लाने के लिए पत्नी सीता द्वारा पति राम के लिए ‘अपशब्द’ कहलाते हैं आदि-महाकवि वह भी त्रेता युग में जब वर्जीनिया वुल्फ का Room for one's own या मारिया एंजेलो का Why the bird sings in the prison जैसा दृष्टिकोण अस्तित्वमान नहीं था। वास्तव में आविश्व साहित्य-जगत् में प्रथम बार ऐसी नायिका को अस्तित्वमान दर्शाया गया है। सीता का गुणगान रामायणम् में इतना अधिक है कि इसके रचयिता आदि-महाकवि वाल्मीकि स्वयं रामायणम् को प्रारम्भ में ‘सीतायाम् चरितम् महत्’ का नाम देते हैं।
औ..र, साहित्य के अनेक अधुनावाद ‘बिम्बवाद/प्रतीकवाद’, ‘प्रकृतिवाद’ ‘मनोविज्ञान’ का भी आदि-ग्रंथ है रामायणम्।
पश्चिमी आलोचक यदि वाल्मीकि-रामायण का ईमानदारी से पाठ करें तो उन्हें भी मानना होगा कि बिम्बवाद/ प्रतीकवाद का आदि-अवदान है रामायणम्। ‘वीर्यशुल्का’ स्वतः एक सार्थक बिम्ब है। ऐसे अनेकानेक बिम्ब/प्रतीक उकेरित हैं रामायणम् में। बिम्बवाद का इतना सटीक रूपायन है रामायणम् में कि एजरापाउण्ड जैसे काव्यज्ञ को बिम्बवाद का आविश्व प्रथम जनक बताने वाली मान्यता स्वतः विखण्डित हो जाती है।
वहीं, रामायणम् में जिस तरह प्राकृतिक सुषमा, नदी, वन, पर्वत, पहाड़ी मौसम, वसन्त, शिशिर, वर्षा, शरद आदि की छटा का उकेर है उसके आधार पर आदि-महाकवि को विश्व का प्रथम प्रकृतिवादी महाकवि मानना ही होगा। प्रकृतिवाद को अशालीन आदिम मानवी दुर्गुणों और तत्सम्बन्धी मानवी कृत्यों के वर्णन (प्रकृतवाद) से जोड़ने वाले विचारकों को प्रकृतिवाद के आदर्श रूप के लिए रामायणम् से सीख लेनी चाहिए।
औ..र, वे समालोचक जो साहित्य को मनोवैज्ञानिक कसौटियों पर कसने के हामीकार हैं, वे भी यदि बे-ईमानी न करें तो उन्हें भी स्वीकारना होगा कि रामायणम् में पात्र-दर-पात्र, चरित्र-दर-चरित्र जो चित्रांकन है, उसमें पगे-पगे मानव-मन की विभिन्न प्रवृत्तियों का, विभिन्न मनोभावों का, ईहा-ऊहा का, ईप्सा, आशा-निराशा का, शोक-हर्ष-उल्लास आदि का यथावसर जीवन्त रेखांकन है। तदनुसार मनोवैज्ञानिक निकष पर भी आदि-महाकवि वाल्मीकि आविश्व प्रथम एक श्रेष्ठ काव्यकार सिद्ध हैं।
अन्य पक्ष भी देखें-
लोकयात्रा-सुप्रवर्तन का कुतुबनुमा होने अर्थात् अनय-निरोधन के साथ सदाचारों के सम्बल से लौकिक जीवनयात्रा का सुचारू ढंग से कैसे निर्वहन किया जाए --- इसका आविश्व प्रथम बार सफल रूपायन करने वाले लौकिक काव्य के प्रथम प्रणेता महाकवि थे प्रचेतस् वाल्मीकि जिन्होंने स्वयं अपनी कसौटी ‘महत् क्व’ को आधार बना कर महत्/महानता को साकार प्रस्तुत करने वाला लौकिक काव्य आविश्व प्रथम बार प्रस्तुत किया। इसके पूर्व ऋक् की ऋचाएँ, यजुर्वेद, सामवेद के मंत्र ही काव्य रूप में लब्ध थे। डाॅ0 रामविलास शर्मा प्रभृति विद्वानों के अनुसार उनमें काव्य-विशेषताएँ विद्यमान हैं। उनमें कथा है, गाथा भी और वन्दना भी। कि..न्तु उनमें लोक से सम्पृक्ति नहीं है। उनमें साम्प्रतम् लोके वाला ‘लोक’ नहीं है। उनमें प्रजाहितरतता नहीं है। अन्याय-निरोधन और तमस्-अनुबेध के बावजूद उनमें लोकयात्रा का सुचारू प्रवर्तन दर्शाने वाला आदर्श चरितगान नहीं है जिसे अनुकरणीय मान कर लोकजन अपनी जीवनयात्रा, लोकयात्रा, सहजता से प्रवर्तित कर सके। ऐसा प्रथम बार प्रस्तुत किया था प्रचेतस् वाल्मीकि ने तंत्रीलय समन्वित महत्लक्षी श्लोकों के विरचन द्वारा साहित्यिक रूप-स्वरूप वाले आदर्श महाकाव्य की रचना करके। इसीलिए प्रचेतस् वाल्मीकि को आदि-कवि कहा जाता है। परन्तु चूँकि उक्त लौकिक महाकाव्य में ‘महत् क्व’ का, ‘महानता के विन्यास’ का पगे-पगे परिपाक प्रस्तुत है, अतएव इन पंक्तियों के लेखक की दृष्टि में रामायणम्-रचयिता को आदि-कवि नहीं अपितु आदि-महाकवि कहा जाना चाहिए।
रामायणम् में सहित भाव के साथ-साथ महानता, उदात्तता, श्रेष्ठता आदि के गुण महाकाव्य स्वरूप में निदेशित हैं। सत्य घटनाओं पर आधारित एक साहित्यिक महाकाव्य में क्या-क्या निमीलित होना चाहिए--- इसका साक्षात् रूपायन आविश्व प्रथम बार कराते हैं आदि-महाकवि। रामायणम् का सम्पूर्ण कथ्य, कथानक, आख्यान, उपाख्यान यत्र-तत्र-सर्वत्र आद्यन्त अनय-निरोधन, तमस्-अनुबेधन, ऋत्, शिव, सत्य, सुन्दर एवं सद् से सम्पृक्त है। आदि-महाकवि के अनुसार राम-रावण युद्ध सीताहरण का परिणाम नहीं वरन् क्रूरैः नृशंसैः राक्षसों के अत्याचारी तामसी कृत्यों के विरुद्ध (कामासक्त शूर्पणखा द्वारा निर्दोष सीता पर आक्रमण, रावण द्वारा सीताहरण, निर्दोष ऋषियों/तपस्वियों का निर्मम वध आदि तामसी कृत्यों के विरुद्ध) लड़ा गया युद्ध था जिसमें अंततः नय, ऋत, सत्य और शिव की विजय हुई। इस तरह सम्पूर्ण वाल्मीकि-कथ्य ऋत और नय-न्याय का कथानुकथन है। न्याय की रक्षा में प्रणेता कवि स्वयं भी सक्रिय भूमिका हेतु तत्पर हो जाते हैं। आदिश्लोक ‘मा निषाद् प्रतिष्ठां त्वम् शाश्वती गमः .....’ में क्रौंच-बधिक को दण्डार्थी शाप देने के उपक्रम से लेकर उत्तरकाण्ड में ‘सीता के धरती-प्रवेश’ के अवसर तक और बाद में अपने धीर-वीर सर्वगुणोपेत धीरोदात्त नायक को पदावनत कर विकत्थन, विलापग्रस्त धीरोद्धत नायक की पदावनति तक महाकवि वाल्मीकि समस्त आख्यानों-उपाख्यानों में परम न्यायवादी ही दिखते हैं। न्याय की अभीप्सा को चरितार्थ करने के आधार पर रामायणम् को नय काव्य, न्याय का काव्य भी माना जाता है। इस तरह रामायणम् के रचयिता आविश्व प्रथम न्यायवादी/नयवादी कवि भी हैं। उपर्युक्तानुसार रामायणम् का प्रमुख काव्य रस ‘शान्त’ या ‘भक्ति’ नहीं अपितु ‘नय रस’ होने से आदि-महाकवि आविश्व प्रथम नयरसवादी महाकवि भी हैं।
साहित्यिक विशिष्टताओं के साथ यदि रामायणम् की महानता के अन्य पक्षों को देखें तो दिखेगा कि इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, सामाजिक आचार, नागरिक आचार, राजनीति, राजा, मंत्री के कर्त्तव्य आदि-आदि के विविध आयामी ज्ञान-विज्ञान का अप्रतिम ग्रंथ है यह। आदि-महाकवि ने महाकाव्य की शैली में रामकथा के महत् तत्त्व का, दाशरथ राम के सर्वगुणोपेतत्व का जो अजस्र स्रोत प्रवाहमान किया उससे लोक को, लोक के जन-जन को सत्-शिव-सार्वसुन्दरम् का, ऋत का, लोकहितवादी नैतिकता का और नैतिकतावादी लोकहित का आविश्व प्रथम बार सफल सकल साक्षात्कार हुआ। लोक-हितैषिता के साथ-साथ ‘महत् क्व’ के साक्षातीकरण और जीवनोपयोगी सदाचारिक ज्ञान के साथ-साथ विविध शास्त्रीय ज्ञान का आगार है यह ग्रंथ। आदि-महाकवि जब वृक्षों के बारे में वर्णन करते हैं तो ऐसा लगता है कि कोई वनस्पति विज्ञानी वनस्पतिशास्त्र पर व्याख्यान दे रहा है। भौगोलिक ज्ञान इतना विस्तृत है उनका कि जब वे देशों का वर्णन करते हैं तो भूगोल वैज्ञानिक बन जाते हैं वे। छोटे-बड़े द्वीपों की पहचान को चरम सीमा तक रूपायित करते हैं वे। आँखें फैल जाती हैं रामायणम् के रचयिता के अपार विशद ज्ञान को देख कर। यही कारण है कि रामकथा और रामायणम् तमाम बक-विरोधों के बावजूद आज भी आदरेण्य है। उपर्युक्त आधारों पर रामायणम् के प्रति समादर का भाव अद्यतन भारतीय मनीषा में विद्यमान है। ऐसी दशा में वर्तमानतः प्रचलित तथ्य स्वतः निरर्थक हो जाते हैं कि तमसा-तट के आश्रमवासी महर्षि वाल्मीकि कभी अग्निशर्मा थे या कि रत्नाकर नामक डाकू थे जिन्होंने रामनाम का उल्टा जाप करके महर्षि पद प्राप्त किया था; अपनी तपस्या में वह इतना लीन हुए कि उनका शरीर वल्मीकि-आच्छादित हो गया और इसी वल्मीकि को फोड़ कर बाहर निकलने के कारण वे वाल्मीकि कहलाए थे या कि वे वाल्मीकि कुल के दलित कवि थे या कि वे भृगुवंशी ऋषि प्रचेता के पुत्र (प्रचेतस्) थे या कि जन्मतः ही नहीं कर्मतः भी प्रचेतस् थे वे। संभवतः भृगुवंशी प्रचेतस् ( प्रचेता का पुत्र ) होने के बावजूद अपनी किशोर या युवावस्था में किसी कुसंग में पड़ कर जब वे व्याध कर्म, नीच कर्म करने में निरत हो गए तो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था (वर्ण-व्यवस्था) के अनुरूप उन्हें नीच वर्ण (अन्त्यज वर्ण ) में बहिष्कृत कर दिया गया होगा। परन्तु जब वे तपस्यारत होकर ऋषि बन गए तो उन्हें प्रचेतस् का मान दिया जाने लगा। इस तरह प्रश्नगत विसंगति का शमन संभव है। यद्यपि ऐसी विसंगतियों पर हाय-तौबा मचाने का आज कोई औचित्य नहीं है। सच तो यह है कि अभटक महिमावाली रामायणम् की, रामायणम्-रचयिता प्रचेतस् वाल्मीकि की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम दिखती है। तभी तो महाकवि व्यास हों, वृहद्धर्मपुराणकार हों या कालिदास, भास या सुभाषित पद्धति के निर्माता कविवर शार्गंधर या वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त बताने वाले फादर कामिल बुल्के-- सभी आदि-महाकवि को भाव-विभोर होकर अपना नमन अर्पित करते हैं। अकारण नहीं कि सर मोनियर विलियम्स भी आदि-महाकवि वाल्मीकि की ‘रामायणम्’ को विश्व की समस्त साहित्यिक कृतियों के सापेक्ष सर्वश्रेष्ठ बताते थे।
आश्चर्य का विषय है (और दुःखद भी) कि विदेशी आक्रान्ताओं के इस देश का शासक बनने के बाद से इतने महान् कविश्रेष्ठ की आज भी घोर उपेक्षा की जा रही है संभवतः इसलिए कि वाल्मीकि संस्कृत के कवि हैं जो राजनीतिक कारणों से आज भी त्याज्य मानी जा रही है। दूसरी ओर, कथित विद्वान् संस्कृत भाषा-साहित्य के हों या हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के--- वे वाल्मीकि और रामायणम् को केवल उपजीव्य के रूप में उपभुक्त करते हैं। बिरला ही कोई भारतीय कवि-लेखक आज अपनी कृति में (उपजीव्य बनाने के बावजूद) उन्हें अपना नमन अर्पित करता है। कविता-साहित्य में भी हमारे कवि-लेखक आदि-महाकवि वाल्मीकि के ‘महत् क्व’ आदि का सम्यक् अनुपालन प्रायः नहीं करते हैं।
काश ! हम आदि-महाकवि के इंगित निदेशनों को महाकाव्य/काव्य/साहित्य में, प्रत्युत अपने दैनन्दिनि जीवन में भी, सम्यक्तः अनुपालित कर सकें तो न केवल हमारे कविता, साहित्य की दशा-दिशा सुचारू हो जाएगी अपितु हम और हमारा समाज, सम्पूर्ण लोक सुचारू लोकयात्रा सुसम्पन्न करने में समर्थ सिद्ध हो जाएगा।
वस्तुतः आदि-महाकवि वाल्मीकि के महिमा-गान में बहुत कुछ कहा-लिखा जा सकता है परन्तु संक्षेपतः एतद्द्वारा पूर्वसूरिभिः महाकवि वाल्मीकि के प्रति संतकवि तुलसीदास से शब्दों को उधार लेकर मैं कहूँगा-
“बंदउँ मुनि पद कंजु , रामायन जेहि निरमयउ।”
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