काव्य-रसवाद में संशोधन आवश्यक
काव्य-रसवाद भारतीय काव्यज्ञों का विशिष्ट काव्यशास्त्रीय अवदान है। पश्चिमी जगत् के काव्यशास्त्री प्रथम तो ‘कविता क्या है’ इस बिन्दु पर ही अब तक किसी सारवान् निष्कर्ष अवधारित नहीं कर सके; द्वितीयतः उनकी कविताओं में काव्य-रस की विद्यमानता के बावजूद वे काव्यरस के रसास्वादन से प्रायः अनभिज्ञ ही रहे हैं। ऐसे अनभिज्ञ पाश्चात्य काव्यशास्त्रियों की देखादेखी में हमारे अधुना काव्य-समीक्षक भी काव्य-रस के नाम पर प्रायः नाक-भौं चढ़ाते दिखते हैं। संभवतः उनकी नाक-भौं चढ़ने का एक कारण है कि जाने-अनजाने वे विदेशी दासत्व का जुआठा अब भी अपने काँधे पर लादे रहते हैं। इस जुआठा के बोझ तले हमारे पश्चिम-मुखी काव्य-समीक्षक आर्ष रसवाद के आर्षत्व का सम्यक् रसास्वादन नहीं कर पाते। दूसरी ओर, मानवीयता और मानवीय संवेदना पर कथित बलाघात वाली अधुना कविताएँ (प्रगतिवादी कविता, नयी कविता, जनवादी कविता, समकालीन कविता) चूँकि न्यायवादी तत्त्व अधिक हैं प्रत्युत उनमें प्रचलित आर्ष रसवाद के 11 रसों में से बहुबहुलांश का प्रायः अभाव है। अतएव, अधिकांश अधुना कवि भी इस कहे-अनकहे आधार पर आर्ष रसवाद को उपेक्ष्य कह बैठते हैं।
वस्तुतः काव्य और काव्यशास्त्र (और काव्य-रसवाद भी) कोई जड़ वस्तु नहीं है। देश-काल परिस्थितियों के समानुरूप काव्य के विन्यास और परास परिवर्तित होते आए हैं। इपालीत तेन भी काव्य को क्षण-परिवेश और प्रजाति की देन बताते हैं। तथैव, काव्यशास्त्रीय निकषों में भी युगीन परिवर्तनों के आधार पर अपेक्षित परिवर्तन किए जाते रहे हैं। संभवतः इसी आधार पर काव्यरस सिद्धान्त में भी उपपत्ति, उत्पत्ति-व्याख्या का फलक हो या काव्यरस के प्रकारों का विवेचन आदि में, आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व तक मनन-चिन्तन करके सतत नवीन प्रस्थापनाएँ प्रस्तुत की जाती रही हैं। बाद में यह परम्परा विलुप्त सी हो गई औ..र उपरि-इंगित नाक-भौं चढ़ाने वाली दुर्वह स्थिति वर्तमान में प्रत्यक्ष है।
आर्ष रसवाद की उपेक्षा का दुष्फलित भी प्रत्यक्ष है कि-
“ खीरा सिर तें काटिए, मलिए लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को चहिए यहै सजाय।। ”
+ + + + + +
“ बकरी पाती खात है, काढि़ जात है खाल।
जे नर बकरी खात हैं, तिनकै कौन हवाल।। ”
आदि-इत्यादि काव्यपंक्तियों के बारे में यदि कोई आपसे पूछे कि ऐसी काव्य-पंक्तियों में कौन सा काव्य-रस है तो आप बगलें झाँकने के लिए विवश होंगे।
नहीं ऽऽ !, आपके शर्मसार होने की आवश्यकता नहीं। आप ही क्या, बड़ा से बड़ा काव्यज्ञ भी आर्ष रसवाद के वर्तमान में प्रचलित शृंगार, वीभत्स, रौद्र, भयानक, वात्सल्य, हास्य, अद्भुत, वात्सल्य, भक्ति आदि 11 रसों में से किसी भी रस-कोटि में उपर्युक्त या/और इन जैसी अन्यान्य काव्य-पंक्तियों को समेकित नहीं कर सकेगा।
वस्तुतः ऐसी काव्य-पंक्तियों में अपराध की विवेचना और दण्ड का विधान है। अपराध की विवेचना और तद्गत दण्ड का विधान न्याय का क्षेत्र है। अतएव, इन पंक्तियों के लेखक के विचार से ऐसे काव्य के लिए ‘नय’ रस के नाम से एक नवीन काव्य-रस नामांकित कर आर्ष रसवाद में समेकित किया जाना चाहिए।
विदित हो कि आदि-महाकाव्य ‘रामायणम्’ में ऋषियों की हड्डियों का ढेर देख कर राम का राक्षस-विनाश के लिए संकल्पित होना या सीताहरण के अवसर पर सीता को हरण किए जाने से बचाने के निमित्त जटायु का रावण से संघर्षरत होना या कि अद्यतन आविश्व किसी अंचल में अन्याय कारित होने पर शेष विश्व की अन्यायरोधी प्रतिक्रिया या कि राष्ट्रप्रेमी शहीदों का आत्म-बलिदान या कि संयुक्त राष्ट्रसंघ आदि की प्रस्थापना सदृश परिघटनाएँ सिद्ध करती हैं कि न्याय भावना सत्त्वशील मनुष्य में (रजसशील में भी) सर्वदा विद्यमान रही है। तमसशील में यह भावना स्वार्थासिक्त रहती है। साहित्य/काव्य का इसीलिए तमोनुबेधक होना आवश्यक है। तदनुसार तमोनुबेधक काव्यरस की प्रस्थापना अनुशंसनीय है।
तथ्यतः आचार्य भरत से लेकर 16वीं शती के आचार्य विश्वनाथ तक जो उपरि-अंकित विभिन्न 11 रस आविष्कृत किए गए उनमें नय-न्याय क्षेत्रीय कोई रस-विपाक विवेचित नहीं है। न्यायवादियों की कौन कहे, काव्य में अलंकारवादी वाक्-न्याय आदि पर बल देते रहे; महाकवि कालिदास ‘नयविद्’ और भक्त-शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ‘नयसाली’ का ही गुणगान करते रहे; वैदिक-औपनिषदिक निदेशनों में भी नयवाद पर पश्यन्ती में ही सही, पर्याप्त बलाघात विद्यमान है। ले..कि..न रसवाद के प्रथम प्रणेता आचार्य भरतमुनि से लेकर आचार्य धनंजय तक न्याय भावना को ‘संचारी भाव’ ही मानते रहे जबकि न्याय (नय) भाव एक स्थायी भाव है। अतएव, न्याय भावना को मात्र ‘संचारी’ मान कर छोड़ देना उचित नहीं है। इसे स्थायी भाव ही माना जाना चाहिए ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से क्रोध, शोक, भय, हास्य, रति, विस्मय आदि को स्थायी भाव माना जाता है। तदनुसार वर्तमान 11 काव्यरसों के रस-घट को व्यापक बनाने हेतु और उसमें न्याय-क्षेत्रज काव्य-पंक्तियों को समेकित करने के हेतुक से वांछनीय संशोधन किया जाना आवश्यक है।
तथ्यतः आचार्य भरत-प्रणीत आर्ष रसवाद को पहले भी अनेक बार सर्वमान्य रूप में परिमार्जित किया जा चुका है और उसमें अनेकानेक रसों यथा ‘भक्ति, ‘शान्त’, ‘वात्सल्य’ का परिवर्धन पहले भी किया जा चुका है; परन्तु अज्ञात कारणों से नय-न्याय से सम्बन्धित किसी रस की प्रतिष्ठापना अब तक किसी विचारक ने प्रस्तुत नहीं की। संतकवि तुलसी ने ‘नीति रस’ और अधुना विद्वान् डॉ0 गणपतिचन्द्र गुप्त ने ‘बौद्धिक रस’ प्रस्तावित किया अवश्य, परन्तु मिलते-जुलते गुण-धर्म होने के बावजूद नीति रस या कि बौद्धिक रस न्याय-क्षेत्रीय काव्य-पंक्तियोें को सटीक स्वरूप में रस-दृष्टि से व्याख्यायित नहीं कर सकते। संभवतः वे भी प्राचीन रसवादियों की तरह ही नय-न्याय की उद्भावना को स्वविश्रान्त संवित् स्वरूप में स्थान प्रदान करने में असमर्थ हैं; जबकि नय-न्याय भाव सर्व विद्यमान, स्वविश्रान्त, संवित् गोचर एक स्थायी भाव है जो एक स्वविश्रान्त संवित् गोचर न्यायशील काव्य रस : न्याय रस उत्पन्न करने में सर्वथा समर्थ है। न्याय भाव चूँकि मूलतया नय भाव पर आधृत है, अतएव ऐसे रस को ‘नय’ रस की संज्ञा दिया जाना उचित है। नय रस के नए रस-घट से न्यायभावी समस्त काव्य-पंक्तियाँ, चाहे वे उपरि-अंकित दोहे हों अथवा समकालीन, जनवादी, प्रगतिवादी, नयी कविता आदि की बहुबहुलांश न्यायवादी कविताएँ (जिनमें अपराध की विवेचना और दण्ड का विधान हैं) भी रस-दृष्टि से व्याख्यायित की जा सकेंगी।
ज्ञात हो कि नीति रस जहाँ नीतिगत जीवन-यात्रा वाली काव्यपंक्तियों से समेकित है, वहीं, बौद्धिक रस देकार्त्तवादी बौद्धिकता या कि बेन्थमवादी उपयोगितावादी बुद्धिवाद तक सीमित रहेगा। जबकि न्याय रस/नय रस प्रादुष्कृतमन्यथा वाले न्यायशील जीवन-व्यवस्था को रूपायित करने वाली काव्यपंक्तियों के काव्यरस को व्याख्यायित कर सकेगा। सारतः न्याय रस/नय रस में नीति और बौद्धिकता दोनों का औचित्य-समेकित सार्वहिती अन्तर्भाव परिष्कृत न्यायशील रूप में समाहित है।
कविता (काव्य) के मौलिक लक्ष्य ‘स कविः काव्या पुरु रूपम् द्यौरिव पुष्यति..’ या कि ‘छन्दांसि यज्ञाः...भूतम् भव्यम्...सृजते’ या किे ‘इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सर्वदा वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते’ या कि ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’, ‘शिवेतर क्षतए’ आदि ही माने जाते हैं, माने जाने चाहिए भी। अतएव लोकयात्रा सुप्रवर्तन, पुरु रूपम् द्यौः इव पोषण एवं हर जीव का भव्य सृजन, ऊर्ध्ववाही उच्चतर भावदशा प्रदान कर आदमी को बेहतर आदमी बनाने के लिए हमें काव्य से न्याय (नय) की उद्भावना को बढ़ावा देना ही होगा। इसके लिए काव्य/कविता को नय-न्याय से विलग किया जाना/माना जाना कदापि न्यायोचित नहीं है। तेनेव, काव्य (कविता) में नय-न्याय से सम्बन्धित रस को वैखरी में अधिनामित और तथैव स्वीकार किया जाना अपरिहार्य है।
सम्बन्धित विषय की विस्तृत विवेचना इन पंक्तियों के लेखक की कृति ‘रसवाद औ..र नय रस’ (प्रकाशक: भारती पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, लेखेश्वर काम्प्लेक्स, निकट अवध वि0 वि0 फैजाबाद, सम्पर्क दूरभाष: 09415048021) में विवेचित है।
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