अच्छा ही कहूँगा इसे
आजीवन पेन्सिल बनता रहा मैं
वे छीलते रहे मुझे
अच्छा ही कहूँगा इसे ।
जितना-जितना छीलते गए वे मुझे
उतना ही उतना नुकीला होता गया मैं।
अब, कोई चाहे तो मेरे सहारे
लिख सकता है
महीन-महीन अक्षर/सूक्ष्म अक्षर
प्रकट किया जा सकता है जिनसे
विराट ब्रह्म !
पत्थर का अनगढ़ टुकड़ा था मैं
लोगों ने ठोकरें मार-मार कर
इधर-उधर बहुत उछाला मुझे।
अच्छा ही कहूँगा इसे
ठोकरों से घिस-घिस कर
बन रहा हूँ मैं
गोल-मटोल बटिया।
शायद वह दिन भी आए
ऐसे ही
बन जाऊँ मैं
शालिग्राम की बटिया !!
मेरे जल-प्रवाह के लिए चुनी
तुमने एक नदी
चुन लेते कोई पानी भरा छोटा गड्ढा तो भी
विगलित अस्तित्व मैं
कर ही क्या पाता ?
अच्छा ही कहूँगा इसे
नदी-धार के संग बह कर
संभव है अब
पहुँच जाऊँ मैं समुद्र तक
संभव है कर पाऊँ किसी दिन
समुन्दर के विराट से साक्षात्कार
और बन सकूँ कभी
विराट का अंश अनालगिया !!!
(शीघ्र प्रकाश्य अकवितासंग्रह ‘ मुट्ठी भर आकाश ’ से)
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बेचारा न्यूटन
रतनारे धुँधलके में
मिले थे तुम....
औ-र
मिल गया था जैसे
न्यूटन को
आकर्षण का मूल सूत्र।।
मौसम की मन्थरा ने
इसी बीच
जाने क्या क्या सिखाया पढ़ाया
कि
बन गए हैं हम
आज
नदी के दो पाट।।
अ-ब स्वयं हैं इच्छाएँ इतनी उदास
सायास/अनायास
कि बना हुआ है सारा आकर्षण
मौन का मुखर अट्ठहास
कि अब
है निरर्थक किसी नए सूत्र-असूत्र की तलाश
कि अब
स्वयं न्यूटन है बेचारा हत्-आस !!!
(शीघ्र प्रकाश्य अकवितासंग्रह ‘ मुट्ठी भर आकाश ’ से)
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प्रेम
नर्म शैवाल जैसा
सुन्दर, सुखकर
दिखने में भी
महसूसने में भी ।
यही संचारी भाव
मिलते ही अवसर
परत-दर-परत
कर लेता आच्छादित
निकटस्थ की सारी नमी को
कभी-कभी
उसके सम्पूर्ण स्वत्त्व को भी ।।
(शीघ्र प्रकाश्य अकवितासंग्रह ‘ मुट्ठी भर आकाश ’ से)
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मित्र
परिचय के क्षण से अब तक
दौर आँसुओं के हों या कहकहों के
सहे संग-संग
एक से बढ़कर दूसरे ने
बढ़ाते रहे पोछने को आँसू अपना रुमाल
बने कुतुबनुमा भी
जरूरत पर एक दूसरे के लिए
समय-समय पर
झेल-झेल कर बदतमीजियाँ
एक-दूसरे की
रहे हमारे हाथ
साथ-साथ
ताली बजाने के उपक्रम सदृश ;
कब कर सके हम
अनुकरण आस्तीन के साँपों का
या कि / हितैषी दर्शाने का
ढपोरशंखी घोष
कब उचारा हमने ?
तभी तो....
हाँ तभी तो
बने रह सके हम मित्र
एक-दूसरे के
इतने लम्बे समय तक !
काश ! बने रह सकें इसी तरह
हम मित्र आजीवन ।
तुम भी यही चाहते हो न ?
(शीघ्र प्रकाश्य अकवितासंग्रह ‘ मुट्ठी भर आकाश ’ से)
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रोटी ..... कभी सोचा तुमने
रोटी !
कभी सोचा तुमने ?
तुम्हारी गोलाई के अनन्त चक्कर लगाते-लगाते
जाने कितने किसान, मजदूर, दफ्तर के बाबू,
छोटे-मध्यम अधिकारी
शिक्षक, लेखक, कवि, डाक्टर, वकील, इंजीनियर, व्यापारी
किसिम-किसिम के मतान्ध और मतिमान
नेता, नौकरशाह और धनवान्
सीधी सपाट अपनी जिन्दगी
कर बैठे चौकोना, तिकोना, बहुकोनी
जाने कितनी रीढ़ें हो गईं दोहरी
बीत गए, बीत रहे अनेकों के दिन-रात
बिन जाने क्या होते हैं उजाले-अँधेरे
तुम्हें सँवारने-सँजोने के क्रम में !
औ...र, वे जिन्हें अतिशय प्रिय हो तुम
करते रहे बहुत कुछ चाहा-अनचाहा
अपनी कोठार में तुम्हें सहेजने के लिए
सुघर गोल बनाना तुम्हें
फिर भी,
कहाँ सीख पाए सभी ?
तुम्हारे नर्म-नर्म गुदाजपन का लुत्फ उठाने में
बन गए बहुत से कठोर-दर-कठोर
गिद्ध, कौआ, बन्दर और कठफोर !
रोटी ! बहुत लुभावनी है तुम्हारी सुगन्ध
लेकिन
जिन्हें जितना प्रिय तुम्हारी गन्ध
उतना ही उसी समानुपात में होते वे नाशाद
औ...र
तुम्हारी बिरादरी के ब्रेड, पूड़ी, नान, रूमाली को
शाही टोस्ट बनाने वाले या फिर
पीढि़यों के लिए तुम्हें, तुम्हारी गंध को
कैद करने को आतुर
भले बनें / कहलाएँ चतुर
अक्सर बन गए डकैत, कातिल, चोर, लुटेरे
जमाखोर, समाजद्रोही
करते रहे देश-दुनिया को तबाह
अन्ततः स्वयं भी हो गए बर्बाद !
रोटी ! तुम्हारे ही चक्कर में जब-तब लुट गया
बहुतों का धर्म-ईमान
अनेक नवांगना
बनती रहीं वारांगना !
और, रोटी ! कभी महसूसा तुमने
हुआ तुम्हें क्या दर्द का अहसास
तुम्हारी पीठ पर न पड़ें
काली-भूरी चित्तियाँ
इसके लिए
तवा हो या चिमटा सभी ने
बढ़कर आगे सही आग की तपन
झुलस झुलस गए
तरुणी, किशोरी, वृद्धाओं और रसोईयों के हाथ
उभर भभर आए फफोले
नर्म या खुरदरी हथेलियों पर
तुम्हारे लिए कर दिया अपना सर्वस्व स्वाहा
सुनहरे गन्दुम ने
उगाने को जिसे सदियों से करते आए किसान, मजदूर
श्रम उपवास !
औ..र, रोटी-
खेत से खलिहान, खलिहान से बाजार,
बाजार से रसोई-चूल्हे तक
कितनी त्रासद है तुम्हारी यात्रा !
इस त्रासदी से जूझती रही है
या ऊब-चूब है सारी सृष्टि
तब भी आसान कहाँ तुम्हें पाना
हम जैसे मानव के लिए
मानव-जीवन के पोषण के लिए
आवश्यक हो, पोषक हो तुम
मैंने माना
लेकिन रोटी ! कहूँ एक कड़वा सच
तुम्हारी बुराई ने छीन ली सदा के लिए
बहुतेरों की धवल दृष्टि !
बताओ न, रोटी !
देख कर
अपना दर्शन, राजनीति, भूगोल, इतिहास
क्यों, आखिर क्यों ?
जुड़े, लिपटे रहे तुमसे
इतने सारे विरोधाभास !!
अपने प्रतिवाद में दे सकती तुम
मासूम-सा जवाब
कि / तुम स्वयं हो अकर्मक, निष्क्रिय
....... चरम निरीह
हर कोई बना लेता है तुम्हें निवाला
देती हो तुम सबको निर्विकार भाव से पोषण
बिना दोष, बिना दूषण
बिना किए किसी प्रकार का भेदभाव
यह तो दुष्प्रवृत्ति है उपभोगकर्त्ता मानव की
बना देती जो उसे पापाचारी, दुराचारी
यही, ऐसा ही
कह कर
करना चाहोगी तुम अपना बचाव !
ले..कि..न, रोटी-
तुमसे मिले पोषण से बनते रस-रक्त
उसी से बनते हैं विचार
कारित करते जो अलग-अलग प्रवृत्ति
व्यक्ति-दर-व्यक्ति
कहाँ रहता निर्विकार उनका अन्तिम भाव-फलित ?
करना होगा सत्य स्वीकार
करने को सिद्ध स्वयं को निर्दोष
ढूँढना होगा निदान, उपचार ;
सुलझानी होगी यह गुत्थी
रोटी अन्ततः तुम्हें, तुम्हें ही !!!
(शीघ्र प्रकाश्य अकवितासंग्रह ‘ मुट्ठी भर आकाश ’ से)
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परिकल्पना
सहज, असहज के अलावा भी
होती हैं स्थितियाँ -
मान लीजिए / अनायास
किसी स्थिति को असहज महसूस कर
रोने लगें आप सरे-राह
सिमट आएगी आपके पास
सहज ही
आपके दूर, निकट की भीड़
मगर / अ..ग..र
‘रोने का कारण’ भीड़ को बताने वाला न हुआ
तब
भीड़ के सवाल - दर - सवाल
और आपकी खामोशी
एक दूसरे को न सहज रहने देंगी न असहज !
वहीं / अगर कहीं
यही भीड़ / या भीड़ से दो-चार लोग
न आएँ आपके पास
रोने की आवाज तो क्या
आपकी चीख सुन कर भी ...
तब / कैसी होगी
आपकी अवस्थिति ?
(कवितासंग्रह ‘ हाशिये से ’ से)
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