मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन के गीत/नवगीत : प्रथम किश्त

अइसन गीत गवाव रे माई

अइसन गीत गवाव रे माई ।।

बन बागन कोयलिया चहकै
जीवन आँगन महुआ महकै
फागुन सावन कै रस लइकै
लहकै तौ पुरवैया लहकै
अस मौसम सरसाव रे माई ।।
अइसन गीत गवाव रे माई ।।

अक्षर पढि़ कै अक्षर गुनि कै
सुन्दर सत् शिव छंद विरचि कै
हमहुँ कबहुँ कबिरा बनि पावैं
हमहुँ कबहुँ तुलसी बनि जावैं
उनहिक राग जगाव रे माई।।
अइसन गीत गवाव रे माई ।।

रतिया बहुतै कजरारी है
राह न सूझै, लाचारी है
कउनौ अकासे बिजुरी चमकै
रंजन कवितन बिजुरी चमकै
अइसन कवित् रचाव रे माई।।
अइसन गीत गवाव रे माई ।।
(गीत-नवगीत संग्रह ‘गीत तुम्हारे नाम’ से)
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मन कहता कुछ गीत लिखूँ.....
मन कहता कुछ गीत लिखूँ मैं,
गीत के नाम, अगीत के नाम ।।
जीवन का संगीत लिखूँ मैं,
हार के नाम या जीत के नाम ।।

दूर कहीं महुआ-वन महके ।
फिर पलाश के जंगल दहके ।।
रतनारे कजरारे नयना,
आज लगे कुछ बहके-बहके ।।

नयनों की अनुभूति लिखूँ मैं,
रीति के नाम, अरीति के नाम ।।

टूटे-जुड़े, जुड़े-टूटे से ।।
राह-ब-राह कहीं छूटे से ।।
अभिलाषा के क्वाँरे सपने,
मान-मनौवल में रूठे से ।।

सपनों से परतीति लिखूँ मैं,
प्रीति के नाम, प्रतीति के नाम ।।

सुख सब, बासी फूल हो गए ।।
नेह, गली की धूल हो गए ।।
बार-बार इतिहास चेताए,
रिश्ते बाँस बबूल हो गए ।।

रिश्तों को मनमीत लिखूँ मैं,
मीत के नाम, अतीत के नाम ।।

(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)

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नई सदी तेरी जय जय हो
नई सदी तेरी जय जय हो !!

देख, उधर कंक्रीट के जंगल,
खोए पनघट, खोई बगिया
बीते दिन   सिसकी ले पूछें
कहाँ पे ढूँढें राम मड़ैय्या

आ जा तुझको दिखला दें हम
तेरा रूप-विरूप !!

नई सदी तेरी जय जय हो !!

गाँव-गाँव तक जा पहुँचा है
जीन्स, शैम्पू, कोका-कोला
टुकड़ा-टुकड़ा सपन बटोरे
मध्य वर्ग तक अब धत् बोला ।।

अलस्सुबह सिर धुनते बैठे
जाँता, मूसल, सूप ।।

नई सदी तेरी जय जय हो !!


गली छोड़ कर सड़क किनारे
बनवाते अब सभी मकान
कौन भला पूछे घर-बाहर
कमरा क्यों बन गया दूकान

दिन बीते वे, जब मुखिया जी
बनवाते थे कूप !!

नई सदी तेरी जय जय हो !!

सुरसा-मुख बन गए बजार
रिश्ते उतने ही सिकुड़ गए !!
औ..र, रिश्तों से सारे रस
जाने-कैसे क्यों बिछुड़ गए।।

आपाधापी छीन ले गई
सबका तत्सम रूप ।।

नई सदी तेरी जय जय हो !!

कम्प्यूटर, टी0वी0, इन्टरनेट
मोबाइल की घुट्टी पीकर
दुनिया अब मेरी मुट्ठी में
कहता छौना बर्गर खाकर ।।

सिहर सिहर कर फैल रही है
विश्वग्राम की धूप ।।

नई सदी तेरी जय जय हो !!

वो कहते तुलसी है उनकी
नहीं बजा सकते घरियाली
हवन से बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग
छीने जो सारी हरियाली

आका का आदेश है रंजन
लगवाओ तुम लूप ।।

नई सदी तेरी जय जय हो !!


(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)

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..... हारे दिन जीते दिन
जनम-जनम के दुश्मन जैसे
ये हारे दिन जीते दिन!
तन-मन धँसी पीर की किर्चें
टीस-टीस कर बीते दिन!!

उँगली के पोरों पर बैठी !
सोन-चिरैय्या पागल जैसी !!
आ सिमटे आँखों में बादल,
आग लगी मत पूछो कैसी !!
सुधियों की साँकल खनकाएँ
कुछ खारे कुछ तीते दिन !!

खाली अँजुरी सपने बोए !
आधी नींद नशे में सोए !!
कौन किसे मेला में ढूँढे,
हम अपने आँगन में खोए !!
हर करवट हम-बिस्तर होते
ये रिश्तों से रीते दिन !!

मुग्धा उलझी रूप-जाल में !
बड़ी मछरिया गई ताल में !
किसे दिखाएँ क्या बाँधा है,
खुली गाँठ , कोरे रुमाल में !!
शरम के मारे चेहरा छुपाएँ,
बस जमुहाई पीते दिन !!

(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)

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रातें भी बीमार ....
दिन सारे बीमार थे पहले,
अब रातें बीमार हो गईं ।।
कहीं छू सकें जो अन्तर्मन,
वे बातें बीमार हो गईं ।।

बाँसों के झुरमुट में कोई,
टांग गया कोरा अपनापन ।।
आज चिकोटी काट रहा है,
ढाई आखर का सम्बोधन ।।
मदिर मधुर रिश्तों की लेखनी-
दावातें बीमार हो गईं !!

लहूलुहान-सा गूँगा मौसम,
अनचाही हर साँस ढले ।।
करवट बदल दिया नदिया ने,
घाट किनारे रेत जले ।।
ठहर गए आँखों में बादल,
बरसातें बीमार हो गईं !!

सुआ पंख सब जिजीविषा के
जाने किस घाटी में खोए !!
सपने वार-वधू खुशियों के,
अनजाने माटी में सोए !!
‘रंजन’ जलपरियों की सारी,
सौगातें बीमार हो गईं !!!

(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)

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फिर लिखेंगे हम .....

फिर लिखेंगे हम, नदी की धार पर, इक नाम ।।
फिर किसी विश्वास की, पतवार लेंगे थाम ।।

शोख मौसम ने बिखेरा ---संदली यौवन ।
फिर युगों के बाद जागे बंसरी मधुबन ।।
फिर कबीलों ने बजा दी -थाप मादल की,
आ रही छन-छन, कहीं से पायली रुनझुन ।।
फिर भँवर इठला उठी, अँगड़ाईंयाँ लेकर,
हाँ, किसी पागल हवा को, लाज से क्या काम ??
फिर किसी गंगोत्री से ---एक गंगा झर रही।
फिर किसी कैलाश पर, साँझ अब उतर रही ।।
छू रही मन्दिर - कलश फिर, सुनहरी धूप,
फिर कोई कामायनी, सज रही, सँवर रही ।।
प्राण-घट विह्वल हुए, आज महदाकाश * से,
फिर कहीं परिचय नए, मुखरित हुए अविराम ।।

सौ गुलाबों की कली को रूप में घोले !
मूँगिया परिधान पहने चाँदनी डोले !!
फिर किसी ऋषि की, तपस्या, भंग होगी आज,
मेेनका के नयन, पंचम-सुर, कहीं बोले---
‘रंजन’ अगर अवरुद्ध हों, चेतना के द्वार,
क्या प्रकृति, क्या झूठ-सच, क्या मिलेंगे राम ???

* महदाकाश = घट के अन्दर से नवांकुर को दिखता है आकाश का एक छोटा टुकड़ा। वही नवांकुर घट से बाहर आकर देखता है विशाल आकाश। नवांकुर के लिए यही विशाल आकाश प्रतीत होता है महदाकाश।
(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)

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विषकन्या को चूम-चूम कर बोलो कौन जिए
सभी मुखौटों ने मौसम से,
शिकवे सदा किए ।।
बरबस, मैने आज शाम को
चेहरे बदल लिए !!

पलक-फलक पर आग सजाए ।।
पहलू-पहलू नाग सजाए ।।
वीणा के टूटे तारों में,
बर्फीला अनुराग सजाए ।।
नदी किनारे आ बैठे फिर,
अपने ओठ सिए !!

सपनीले संसार की बातें ।।
गेसू और रुखसार की बातें ।।
मीत मेरे, मत याद दिलाओ,
फिर, बिसरे मनुहार की बातें ।।
विषकन्या को चूम-चूम कर
बोलो कौन जिए ??

बंजारा किस गाँव को देखे ?
किस बरगद की छाँव को देखे ??
रेत-घरौंदे सा हर रिश्ता,
अपने-अपने दाँव को देखे !!
तूफानों के आगे ‘रंजन’ --
बुझते रहे दिए !!

(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)

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अभी न लिखना अन्तिम कविता
अभी न लिखना, अन्तिम कविता !!

हरे-हरे कचनार महकते, देवदार-महुआ-चन्दन वन ।।
जवाकुसुम, टेसू, बेला से, अभी तो उलझा पागल मन ।।
अभी कहाँ टूटा है अपना, दर्पण औ’ सिंगार का रिश्ता ??

अभी न लिखना अन्तिम कविता !!

नन्हें हाथ उछालें अब भी, बरसाती पानी में नाव ।।
नई आस-विश्वास जगाएँ, रेत-घरौंदे मेरे गाँव ।।
जुड़ी अभी है किलकारी से-अभिलाषा, करुणा, ममता !!

अभी न लिखना अन्तिम कविता !!

उधर, परिन्दों की पलकों में, थम कर बैठा है भीगापन ।।
कैद न कर ले, मावस-कारा, बाल-समय सूरज आजीवन ।।
अभी से सरगम मौन तो कैसे, परभाती गाए फिर सविता ??

अभी न लिखना अन्तिम कविता !!

(कवितासंग्रह ‘ किर्चें ’ से)


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