मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन की प्रतिनिधि लघुकथाएँ : प्रथम किश्त

 


उज्ज्वला औ..र ज्वाला
                                                   - विजय रंजन

“ तुम जितनी उज्ज्वला हो उतनी ही मैली बना दिया जाएगा आज तुम्हें। ”
तीनों दादाओं का सरदार गरजा था।
“ खबरदार ! मत बढ़ना आगे। लो, उज्ज्वला से ज्वाला बन जाती हूँ मैं !! ”
किचेन से चाकू उठाते हुए दहाड़ी थी वह भी।
दादा लोग भाग खड़े हुए थे।
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सपने
                                                                                                  - विजय रंजन

“ पापा ! आज मैंने सपने में कलुआ से ज्यादा रिक्शा चलाया। 4-5 पैडल उसने चलाया, 9 पैडल मैंने। ” रोहित ने सोल्लास बताया।
“ कितने पैडल चलाया तुमने ? ”  पापा ने पूछा।
“ 9 । ”   उत्तर दिया रोहित ने।
उसे घूरते हुए अपनी जगह से उठे पापा। पास आकर गिन कर पूरे 9 चाँटे रसीद किए उन्होंने रोहित के गाल पर।
“ बेवकूफ ! चलाना ही था तो कार चलाता, हवाई जहाज चलाता, अन्तरिक्ष यान चलाता, कुछ नहीं तो स्कूटर ही चलाता, सपने में रिक्शा क्यों चलाया तुमने ? ”    पापा ने किंचित् आवेश में कहा।
“ यह क्या किया आपने ? ”   मम्मी ने हस्तक्षेप किया जैसे।
“ सपने मनुष्य के अन्तर्मन में पैठी चाहत का प्रतिरूप होते हैं। सपने में जब यह रिक्शा चलाएगा, कुलीगीरी करेगा तो जीवन में तरक्की कैसे करेगा ? जीवन में बड़ा बनने के लिए सपना भी बड़ा ही देखना चाहिए। ”
पापा के तर्क में बल था।
रोहित को अपनी भूल का अहसास हो गया था।
                                                                                (शीघ्र प्रकाश्य लघुकथा-संग्रह ‘ टुकड़े-टुकड़े ’ से)

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