Gazal
आँसू के शरारती बच्चे
आँसू के शरारती बच्चे, कर बैठे ऐसी नादानी !!
अनबोले नयनों ने बरबस, कह दी मेरी कहानी !!
फूलों ने गुमसुम मुरझाना, शायद सिखा दिया इनको,
ओठों ने अब सजा लिया है, अपनी देहरी नील-निशानी !!
क्या करता दरपन बेचारा, दरपन दरपन है,
जाने किसने हठधर्मी की, उतर गया मोती सा पानी !!
गेसू और रुख्सार की बातें, ‘रंजन’ भूल गए हैं,
अर्सा बीता मन-आँगन में, महकी नहीं रात की रानी !!
( गजल संग्रह ‘ दर्पण तीरे ’ से)
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बरसात में
घाट के पत्थर, नदी, किनारे, डूब गए बरसात में ।।
गाँव, गढ़ी, पनघट, चौबारे, डूब गए बरसात में।।
कैसे लहकी सावनि पुरवा, कैसा यह पानी बरसा,
दूर-दूर तक सरहद सारे, डूब गए बरसात में।।
करने वाले करते हैं - संसद से सड़कों की बातें,
बस्ती के बेबस मछुआरे, डूब गए बरसात में।।
कल तक सूरज जो अगियाया, आज उसी पर गर्दिश है,
डर के मारे चाँद सितारे, डूब गए बरसात में।।
काँधे पर लादे हम, तुम, वो- दुनिया अपने गट्ठर में,
एक बार फिर बने बिचारे ! डूब गए बरसात में !!
(गजल संग्रह ‘ दर्पण तीरे ’ से)
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नजर-नजर है
मेरा कसीदा आज मुझे बेमानी दिखता है,
काम तुम्हारा जो भी हो, लासानी दिखता है।।
अपनी आँख तुम धनुष बनाओ या तलवार, कटार,
नजर-नजर है, मुझको वो रुमानी दिखता है।।
शाने पर लहराता दुपट्टा नीला, पीला, लाल,
तुम चाहे जो पहनो, मुझको धानी दिखता है।।
सातों रंग समेटे सूरज, हँसता तेरी हँसी से,
सागर सा हँसता, पोखर का पानी दिखता है।।
सम्भव है मदहोश कहीं हो मेरा मैं लेकिन,
रञ्जन दानिश्वर कहते, रूहानी दिखता है।।
( गजल संग्रह ‘ दर्पण तीरे ’ से)
दर्पण तीरे
आ पहुँचे जाने अनजाने, दर्पण - तीरे ।।
आओ , अब खुद को पहचाने , दर्पण - तीरे ।।
बिनु ‘दर्पण’ ‘रोशनी’ ‘आँख’ ‘वस्तु’ ‘देखने की इच्छा’,
देख सके कुछ कहाँ सयाने दर्पण तीरे ।।
कह पाना तो कह देना, दर्पण झूठा है,
उभरेंगे तब नए फसाने, दर्पण - तीरे ।।
समतल सी चमकीली सतह को मत गाली दो,
चित्र नहीं बनते मनमाने दर्पण - तीरे।।
अगर सत्य है ‘अवगत’ तो ‘वस्तु’ सत्य है ‘बिम्ब’ नहीं,
तुम भी मानो, ‘रंजन’ माने, दर्पण - तीरे।।
( गजलसंग्रह ‘ दर्पण तीरे ’ से)
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