मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन प्रणीत आलेख : पंचम् किश्त : कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व

                                          कविता का पश्यन्ती निकष   : नयत्व

                                                                   
‘काव्य-नयवाद’ अर्थात् ‘नयवाद के सापेक्ष काव्य’ अर्थात् ‘काव्य में नय-न्याय के अंशभूत तत्त्वों की सम्पृक्ति की अभिवांछा’। सम्मादिट्ठि से देखें तो दिखेगा कि ‘काव्य’ को ‘सहस्तोमा मंत्रदृष्टारः’ ऋषिगण का आक्षरिक कर्म बताने वाली आर्ष मनीषा के काव्य-निदेशनों का सार है कि ‘काव्य’-चेतना को ऋतशील, सत्त्वशील, लोकमांगलीय, ऊर्ध्ववाही, लोकसंग्रही, संवित् रागात्मकता से संपृक्त किया जाए। ऐसी दशा में ‘काव्य’ से मानव-चेतना के सद्भावी और शिवशील होने की अवधारणा ‘काव्य’ में ‘अंतर्भुक्त’ स्वीकार करनी होगी। वस्तुतः यह एक ऐसी कुतुबनुमा है जिसके इंगित का अनुपालन करा कर हम कविता के वस्तुनिष्ठ गंतव्य तक पहुँच सकते हैं प्रत्युत जिसकी उपेक्षा करने पर इतना सुनिश्चित है कि हम कविता (सम्पूर्ण काव्य-जगत्) का वस्तुनिष्ठ अधिलक्ष्य संधानित नहीं कर सकते। नयत्व के अभाव में सत्त्वशीलता या/और शिवशील संचेतना का सम्यक् निरूपण ही सम्भव नहीं होगा। सत्त्वशीलता, शिवशीलता, ऋतशीलता, लोकमंगल, लोकसंग्रह सदृश तत्त्व नय-न्याय के अंशभूत अंगभूत हैं और ये तत्त्व ही समग्र में नय-न्याय-नयत्व की सृष्टि एवं संपुष्टि करते हैं। अतएव, सत् , शिव, ऋत आदि सारवान् तत्त्वों को काव्य-परिक्षेत्र में विस्मृत कैसे कर सकती है अक्षरब्रह्म और छन्दांसि यज्ञाः की मान्यता वाली आर्ष मनीषा ? काव्य अर्थात् सत्, शिव, सुन्दर की समवेत आराधना, प्रकारान्तर से सत्, चित्, आनन्द का समवेत गान। सत्, शिव, सुन्दर या कि सत्, चित्, आनन्द स्वतंत्र स्वरूप में भले ही अलग-अलग दिखें प...र...न्तु, उनका समग्र, ‘नय’ से विच्छिन्न नहीं है। बाबू गुलाबराय भी मानते हैं कि एक ही तत्त्व ज्ञान के क्षेत्र में सत्य के रूप में, कर्म के क्षेत्र में शिव के रूप में और भाव के क्षेत्र में सौन्दर्य के रूप में लक्षित किया जाता है जबकि सत्य, शिव आदि ‘नय’ के अविच्छिन्न अंग हैं।
औ..र, ‘नय’ की पहचान के अभाव में ‘सत्’, शिव, सुन्दर की सम्यक् पहचान ही सम्भव कहाँ होगी ? तथ्यतया सत् $ शिव $ सुन्दर की समवेत, सर्वहितकारी, ऋतात्मक, लोकसंग्रही, काव्यात्मक आक्षरिक आराधना तक विन्यसित मानना चाहिए कविता को इसलिए कि ‘काव्य’ की मूल प्रकृति-प्रवृत्ति इन अंशभूतों से परे नहीं है।
दूसरी ओर, कथित अंगारभक्षी अनलपक्षी का गाते-गाते आग में जल कर भस्म हो जाने वाली मान्यता और तत्सदृश अन्यान्य व्यंजनाएँ ‘काव्य-न्याय’ के नाम पर प्रचलित बताई जाती हैं प..र..न्तु ‘काव्य-नयत्व’ से तात्पर्य ऐसे भ्रमात्मक ‘काव्य-न्याय’ वाले ‘नयत्व’ से नहीं है। मेरी दृष्टि में ‘काव्य-न्याय’ का कथित परम्परीण अर्थायन भ्रामक अर्थ अर्थायित करता है। ‘काव्य-न्याय’ का तात्पर्य ‘काव्य के नय-समेकित होने से’ किया जाना चाहिए। ‘चित्र-तुरंग न्याय’ आदि के सदृश काव्य-न्याय का अर्थायन भी नय-न्याय के सापेक्ष काव्य-विवेक से या कि नय-न्याय से समेकित काव्य से ही अर्थायित किया जाना चाहिए। त..द..पि, काव्य-न्याय के कथित परम्परागत अर्थ को मिटा पाना सहज संभव नहीं, अतएव, ‘काव्य-न्याय’ के बजाय इस कृति में ‘काव्य-नयत्व’ शब्द-बन्ध प्रयुक्त है। ‘काव्य-नयत्व’ से तात्पर्य यहाँ ‘काव्य में नयत्व’ या कि ‘काव्य में नय-तत्त्वों’ के सद्गुणों के निवेश से ही किया जाना चाहिए। ‘काव्य-नयत्व’ की एकपंक्तीय परिभाषा परिभाषित करनी हो तो कहना होगा कि - ‘न्याय’ के गुण-शील से संकरित (Hybridized) काव्य के विशेष्य को ‘काव्य-नयत्व’ कहा जाना चाहिए। इस तरह ‘काव्य-न्याय’ का परम्परागत अर्थ जहाँ ‘काव्य के न्याय’ से मान्य है वहीं ‘काव्य-नयत्व’ से अर्थ ‘काव्य’ में ‘नय-न्याय’ के तत्त्व    : नयत्व के समेकन से मान्य होगा। इसी समेकन की अभीप्सा का वाद है काव्य-नयवाद जिसका सीधा सा निकष है कि वही काव्य ‘काव्य’ माना जाए जो नय-न्याय की मूल भावना से और/या अ-न्याय के तिरोहण की सद्भावना से सम्पृक्त हो।
पूर्वपरित अध्यायों से अब तक ‘काव्य-नयवाद’ अर्थात् ‘काव्य में नय-न्याय-नयत्व के समग्र/अंशभूत तत्त्व के समेकन की अभीप्सा’ से सारतः अवगत हो चुके होंगे प्रबुद्ध पाठक फिर भी काव्य-नयवाद, काव्य में नय-नयत्व के आंगिक तत्त्वों की परिभाषा-विन्यास आदि पर विस्तृत विमर्श अपेक्षित हो तो इस अध्याय में समीचीन है कतिपय पुनुरुक्ति समेत निम्नांकित विवेचना यथा -
‘नय’ शब्द का अर्थ शब्दकोषों में ‘उचित’, ‘उपयुक्त ढंग’, ‘उपयुक्त आचरण’, ‘नम्रता’, ‘विनय’, ‘नीति’ बताया गया है।
व्याकरणतया ‘नय’ शब्द की भाववाचक संज्ञा है ‘नयत्व’। व्याकरणिकों के अनुसार शब्द ‘नय’ न्याय का आधारभूत शब्द है।
नैयायिकों के अनुसार सत्, शिव, सुन्दर समेकित ऋतकारी प्रमा से उद्भूत ऐसे समस्त सर्वहिताय, लोकसंग्रही उपक्रमों का समग्र स्वरूप ‘न्याय’ है जिनमें अनय के सम्पूर्ण तिरोहण की सीमा तक सदाचार, आदर्श, औदात्य और लोकशास्त्र-प्रणीत विधान से सुसंगत ‘नय’ की संस्थापना/कार्यान्वयन/क्रियान्वयन ‘चरम निमित्त’ होता है। ऋत, सत्, शिव और सुन्दर का प्रमाणाधारित औचित्यपूर्ण अन्वेषण और तद्गत सदाचार, आदर्श, औदात्य आदि के साथ-साथ सर्वहित का साकारीकरण और अ-न्यायी को दण्ड दिए जाने के उपक्रम भी अनुषंगतः समाहित हैं इसमें। ऐसे समस्त उपक्रमों का आश्लेष है ‘नय’।
आर्ष आकर ग्रन्थों के अनुसार नय की भाववाचक संज्ञा: ‘न्याय’ धर्म का ही प्रतिरूप है और धर्म ‘सर्वतोभावेन अभ्युदय’ के साथ ‘निश्रेयस्-सिद्धि’ का पर्याय होता है।
‘नय’ की भाववाचक संज्ञा: ‘न्याय’ का समग्र अर्थ विशिष्ट विवेक के अर्थ में भी होता है। धूम्र-अग्नि न्याय, चित्र-तुरंग न्याय आदि विशिष्ट अर्थवान् विवेक वाले न्याय के परिचायक हैं।
स्मर्त्तव्य है कि यजुर्वेद (अध्याय 40, मंत्र 16)/ईशावास्योपनिषद् (मंत्र 18) के मंत्र- ‘ओ3म् अग्ने नय सुपथा राये ......’ में भी ‘नय’ शब्द ‘प्रयुक्त’ है। वहाँ इसका प्रयोग ‘मार्ग दिखाने’ के अर्थ में किया गया है। इस मंत्र के शांकरभाष्य में ‘नय’ का अर्थ ‘ले चल’ के अर्थ में प्रयुक्त है। प्रकटतः शांकरभाष्य में इंगित अर्थ समुचित और सटीक नहीं है। ध्यान देना होगा कि इस मंत्र में नय ‘सुपथा’ से सहयुजित है। निहितार्थतः वैदिक दृष्टि से ‘नय’ को कुपथ से संयुजित/सहयुजित नहीं किया जा सकता है और ‘अनुकरणीय पथ’:‘सुपथ’ का अवधारण महान् ‘जन’ (जो निश्चित रूप से महानता से, महान् अधिलक्ष्यों से, सम्पृक्त ही होने चाहिए) जिस मार्ग से चलें, वही पथ है (महाजनो येन गतः स पन्थः)’ के आधार पर अवधारित हो सकता है। इस प्रकार ‘सुपथ’ के सम्बन्ध में आर्ष मनीषा में कोई भ्रान्ति नहीं रही है। ‘राये’ का अर्थ ‘ऐश्वर्यवान्’ होता है। ‘ऐश्वर्य’ में ‘ईश्वरत्व’ समाहित होना चाहिए। इस प्रकार ईश्वरत्व युक्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाले सुपथ से सहयुजित किया गया है ‘नय’ को। दूसरी ओर, ‘अग्नि’ असार को भस्मीभूत करती है। इस तरह ‘अग्ने नय सुपथा राये...’ का अधिलक्ष्य सुस्पष्ट है। असारत्व को भस्मीभूत करने वाले अग्नि (देव) से ईश्वरत्व युक्त ऐश्वर्य-प्रदायी ‘नय युक्त सुपथ’ पर चलने की प्रेरणा देने की प्रार्थना है इस मंत्र में।
महाकवि कालिदास ने ‘रघुवंशम्’ के श्लोक 4/10 में ‘नयविद्’ शब्द का प्रयोग किया है-    “  नयविद्भिर्नवे राज्ञि सदसच्चोपदर्शितम् , पूर्व एवाभवत्यपक्षः तस्मिन्नाभवदुत्तरः।  ” 
उपर्युक्त श्लोक की व्यंजना में ‘नय’ का जो अर्थ अर्थायित है वह कमोबेश उपरि-अंकित रूप-स्वरूप में ही ग्राह्य है।
वस्तुतः ‘नय’ सर्वहिताय, ऋतकारी, सत्, शिव, सुन्दर समेकित सामाजिक सदाचार से सुसंगत उपयुक्त नीति-रीति का भाववाची होने के साथ-साथ तद्गत अनय-निरोध का प्रतिमान एवं न्याय का आधारभूत सत्त्व है। ‘नय’ को इन अंशभूतों का समवेत मान लेने पर ही ‘नय’ का वस्तुनिष्ठ अर्थान्वयन सटीक रूप में किया जा सकता है इसलिए कि तभी ‘नय’ के अर्थान्वयन में औचित्य, सदाशय, नीति, प्रमा, औदात्य, आदर्श, सदाचार, नैतिकता, सत्त्व से सुसंगत सर्वहितकारिता, लोकोपयोगिता, सर्वमांगल्य, लोकसंग्रह जैसे सद्गुण सहजता से ‘नय’ में स्वतः समेकित होंगे।
‘नय’ से आविर्भूत ‘न्याय’ में न्यायशास्त्रीय शब्दावलि वाली प्रमा से अवधारित औचित्य, सदाशयता, नीतिसम्मतता आदि के साथ-साथ प्रमाण-आधारित विसंवादक ज्ञान से उद्भूत सत्य के शिवशील लोक-सुन्दरम् का अवगाहन समेकित है। तदनुसार ‘न्याय’ में तर्कतः प्रमा-आधारित विसंवादक ऋत-ज्ञान के सापेक्ष सदाचार, शिवकारिता, सर्वहितकारिता, औचित्य, नीतिसम्मतता आदि सद्गुण समाहित मानने चाहिए।
‘न्याय’ का आधारभूत तत्त्व ‘ऋत’ एवं ‘लोकमंगल’ होने के ब्याज से ‘नय’ में देश-काल सापेक्ष विवेक-सम्मत औचित्य, सदाशयता आदि तो हैं ही, यह (नय) सामाजिक न्याय, सामाजिक सदाचार (Social Ethics), सत्, शिव, सुन्दर समेकित ऋत एवं सत्य जैसे तत्त्वों का विधिक संकरण भी है। वैधानिकता, नीतिगतता (नैतिकता) आदि तत्त्व ‘नय’, ‘न्याय’ दोनों में ही अंतःभुक्त हैं परन्तु तत्त्वतः ‘न्याय’ इन तत्त्वों का समवाय नहीं है। वस्तुतः नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक अधिलक्ष्यों का समुचित समेकित समंजसित स्वरूप होता है ‘नय’ जिसकी भाववाचक संज्ञा है ‘न्याय’ और जिसका प्रत्यय है ‘नयवाद’।
उपर्युक्ततः नय-नयत्व के विहंगम अनुशीलन के उपरान्त सिद्धान्त की आधारभूमि से इतर वस्तुनिष्ठ धरातल पर काव्य-नयत्व के सटीक आरेखन के लिए नय/न्याय/नयत्व का बिन्दु-पथ यदि विधेयात्मक स्वरूप में वांछनीय हो तो कहना होगा कि ‘काव्य-नयत्व’ के प्रसंग में नय/न्याय और नयावयवों का उपरिअंकित किंचित् विस्तृत अनुशीलन प्रसंगेतर प्रतीत होने पर भी अपरिहार्य इसलिए है कि जब तक ‘नयत्व’ के सूक्ष्म तत्वों को सटीकतः नहीं समझा जा सकेगा, तब तक ‘काव्य-नयत्व’ को भी सटीकतः रूपायित नहीं किया जा सकता है।
तत्क्रमेण अवधार्य है कि व्याकरणतया ‘नय्’ धातु से उद्भूत शब्द ‘नय’ व्यवहार्यतः/सिद्धान्ततः निम्नांकित नय चतुष्टय पर (चार आधारभूत स्तम्भों पर) आधारित होता है यथा-
1. सत् + शिव + लोक-सुन्दरम् समेकित ऋतकारी सदिच्छा।   इसके प्रमुख अवयव तत्त्व हैं - सत्, ऋत, शिव, लोक-सुन्दरम्।
2. औचित्यपूर्ण आदर्शवाद से निदेशित सर्वहितकारी नैतिकता।  इसका प्रमुख अवयव है औचित्यपूर्ण आदर्शवादी सर्वहितकारी नैतिकता।
3. लोक और व्यक्ति की आवश्यकताओं को समंजसित करने वाले लोक और शास्त्र के लोकसंग्रही, लोकमांगलीय विधायन।
4. सर्जनात्मक प्रमा से उद्भूत अनय-निरोधी न्याय-विवेक।
तथ्यतः उपर्युक्त नय-चतुष्टय जहाँ परिणामी ऋतकारी अनय-निरोधी आचार-विचार के रूप में नय/न्याय का साक्षात्कार कराते हैं, वहीं उक्त चतुष्टय के सभी तत्त्व स्वतन्त्र इयत्तावान् होते हुए भी एक दूसरे के सहायक और सम्पूरक की भूमिका का भी निर्वहन करते हैं।
ध्यातव्य है कि कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने निबन्ध ‘विद्यापति और चण्डीदास’ में लिखा था - “  कवि की यह बहुत बड़ी शक्ति है कि वह विषय से अपनी सत्ता को पृथक रख कर उसका विश्लेषण भी करे और फिर इच्छानुसार उससे मिल कर एक भी हो जाए। ” 
‘निराला’ की उक्त उक्ति की लय में ‘नयत्व’ की भी यह विलक्षण क्षमता है कि यह सत्, ऋत, शिवत्व आदि से स्वतंत्र निजी इयत्ता में इयत्तावान् भी है और सत्, ऋत आदि संघटकों का समग्र भी। कह सकते हैं कि सत् , ऋत आदि ‘नयत्व’ की परिधि के केन्द्रक भी हैं और सतत्व-ऋतत्व आदि के रूप में नयत्व के वृत्त/दीर्घवृत्त की जीवा सदृश भी। वस्तुतः उपर्युक्त चतुष्टय के समस्त तत्त्वों से नय-नयत्व एकाकार भी हो जाता है और उससे विलग रह कर अपने स्वयं की स्वतंत्र इयत्ता को मुखर भी करता है। लोक और शास्त्र से सुसंगत व्यापक सर्वहित के सापेक्ष ‘नीति’ से संयुजित भाव जिस नैतिकता की सृष्टि करते हैं उस नैतिकता की सीमा तक लोक बनाम व्यक्ति तथा व्यक्ति बनाम व्यक्ति की आवश्यकताओं को समंजस प्रदान करने वाला ऐसा ‘औचित्यपूर्ण प्रत्यय’ और तद्गत आदर्श निरूपित होता है ‘नय’ से जिसके मूल में सत् , शिव, सुन्दर की तलाश के साथ-साथ असत्, अशिव, असुन्दर के विभंजन की और ऋत के सुस्थापन की सदिच्छा ही होती है। यह सदिच्छा सर्जनाशील सिसृक्षा (सर्जनात्मकता) की प्रमा से उद्भूत सत्त्वशील रागाकुलता वाले विसंवादक ज्ञान और तद्गत लोकमांगलीय न्यायविवेक को साकार कर देती है। यह न्यायविवेक अनय-निरोधी होने के साथ-साथ लोक को सदाचरण की ओर उन्मुख करने के अधिलक्ष्य से वाचाल होता है।
कहना होगा कि काव्य में नयत्व के वस्तुनिष्ठ सद्गुणों को समावेशित करने पर काव्य-नयत्व से पाश्चात्य काव्य-निकष: आदर्श, नैतिकता, औचित्य, औदात्य आदि की अवधारणाएँ स्वयमेव सध जाती हैं किन्तु तब वहाँ मनोरंजन और सौन्दर्य-बोध जैसे पाश्चात्य अधिलक्ष्य या कि अधुना मार्क्सीय काव्य-निकष: ‘वर्ग-विशेष के हित की प्रतिपूर्ति मात्र’, ‘समाजोपयोगिता’ जैसी वांछाएँ ‘आंशिक अंशभूत’ के रूप में ही समाकलित होंगी। वस्तुतः ‘काव्य-नयत्व’ उपर्युक्त समस्त तत्वों के समवायीकरण के बजाय नयत्व के समस्त नियामकों के संकरण (हाइब्रिडाइजेशन) से आषेचित नियामक है। यह निदेशन आर्ष मनीषा की न्यायिक प्रमा से निःसृत अनय-निरोध समेत नय’ की संस्थापना/क्रियान्वयन के अधिलक्ष्य से सुपुष्ट होता है।
तथ्यतया उपर्युक्त नय-चतुष्टय के परिणामी प्रतिफलन से अर्थात् नयत्व से ‘काव्य’ निकष को वैखरी में सम्पृक्त किया जाना उपादेय ही नहीं प्रत्युत अपरिहार्य मानना अभीष्ट होगा यदि हम काव्य-निकषन के संदर्भ में भारतीय मनीषीगण के साथ-साथ सुचिन्तित पाश्चात्य मनीषीगण द्वारा सुविचारित प्रत्ययों का सारवान् अवगाहन भी आत्मसात् कर सकें।
काव्य-निकषन के परिप्रेक्ष्य में वैखरी में नयत्व को प्रथमतः सम्पृक्त करने के पूर्व उपयुक्त होगा यहीं कि उपर्युक्त नय-चतुष्टय की अभिधारणा के अनुशीलन के साथ-साथ हम नय-चतुष्टय के उपरिअंकित आवयविक शब्दों-- सत्, ऋत, शिव, लोक-सुन्दरम्, नैतिकता आदि के वस्तुनिष्ठ विन्यास का किंचित् गहराई तक अनुशीलन कर लें। यथा-
सत्
शब्दकोश में ‘सत्’ का अर्थ ‘सत्य’, ‘सार’, ‘सत्त्व’ बताया गया है। ‘सत्य’ का शाब्दकोशिक अर्थ ‘ऋत’ भी है यद्यपि ‘सत्’ और ‘ऋत’ मूलतः एकार्थी नहीं हैं।
ऋग्वेद में ‘सत्’ और ‘ऋत’ दो अलग-अलग शब्द सत्ताएँ हैं। ऋग्वेद में इनका अलग-अलग अर्थों में अनेकशः प्रयोग किया गया है। अथर्व के मंत्र   “  सत्यं वृहदृतमुग्रं ......”  (12.1.1) में सत्य को भूतभव्य से सहयुजित किया गया है।
उपनिषदों में ‘ऋत’ और ‘सत्’ दोनों की प्रतिष्ठा है। उपनिषदों में सत्/सत्य को ‘अंततः विजयी’ और ‘सत्त्वगुण सम्पन्न’ बताया गया है। उपनिषदों के सार से सत्य (सत्) अंतिम छोर तक अवगाह्य है।
शंकराचार्य सत्य (सत्) का अर्थान्वयन 1. परिकल्पित 2. व्यवहारिक 3. परमार्थिक अर्थ में बताते थे।
योगाचार्य सम्प्रदाय में सत्य (सत्) के दो स्वरूप 1. परतंत्र 2. परनिष्पन्न बताए गए।
नागार्जुन भी सत्य (सत्) के दो स्वरूप 1. सम्प्रति सत्य 2. परमार्थ सत्य बताते हैं।
मनुस्मृति में सत्य (सत्) को ‘विद्वदाभिः सेवितः सारभिनित्यम् अदृणरागर्भः छंदयेनभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तम् निबोधितः’ के स्वरूप में परिभाषित किया गया है।
महाभारत में ‘यद्भूतहितमत्यंतम् तत्सत्यमृतमम्’ (सर्वप्राणिमात्र के लिए जो अंतिम रूप से हितकारी है वही सत्य है)’ उवाचित है।
‘सत्य’ की आराधना को ‘पुराण’ साहित्य में ‘तप’ बताया गया है।
वैदिक युग में सत्यान्वेषण और सत्य-रक्षा में सन्नद्ध ‘ऋषि’ को ‘साधु’ कहा जाता था। असत्/नश्वर/सतत परिवर्तनशील होने के कारण ही ‘दृश्य’ (जगत् जो स्थूल नेत्रों से दिखाई पड़ता है) को वैदिक तत्ववेत्ता ‘मिथ्या’ घोषित करते हैं और सत्/शाश्वत/चरम अविनाशी परमात्मा को ‘सत्य’ बताते हैं।
आर्ष मनीषा में ईश्वर/परमात्मा/ब्रह्म ‘सत्’ के आधान हैं। आदिशंकराचार्य ने भी उद्घोषणा की थी- ‘ब्रह्म सत्यम् जगत् मिथ्या।’
‘ब्रह्म कौन’ के उत्तर में कहना होगा कि ‘जो अ-नश्वर, अ-क्षर हो, सर्जनाशील हो, सत्त्वस्वरूप हो, सर्व-कल्याणक हो, सर्व-व्यापक हो, परम न्यायकारी हो, वही ब्रह्म है।’
बौद्ध जातक-कथाओं के अनुसार सत्य को जानने के उपक्रम में सिद्धार्थ को सन्यासी और सन्यासी से ‘बुद्ध’ बन जाना पड़ा था।   
जैन-दर्शन में ‘सत्य’ की चरम प्रतिष्ठा है।
सांख्य हो या मीमांसा, नैयायिक दर्शन या तर्कशास्त्र (Logic) आदि--- सभी ‘सत्य’ के संधान के ही शास्त्र हैं। न्याय से सम्पृक्त ‘नयत्व’ भी सत्य का चरम अवगाहन ही है।
सत्य को उसके चरम तक जानने का निर्देश आर्ष-वाङ्मय (ईशावास्योपनिषद् आदि) का सारवान् निर्देश है। चरम सत्य को जान लेने वाला स्वयं सत्यस्वरूप बन जाता है। ऐसे निर्देशों के सम्यक् अनुपालन क्रम में विराट ‘ब्रह्म’ के विस्तार तक विन्यस्त ‘सत्य’ का अवधारण भी नयपरक प्रमा से ही अवधार्य है।
भारतीय और पाश्चात्य समाज-व्यवस्था, राज-व्यवस्था और न्याय-व्यवस्था प्रकटतः ‘सत्य’ पर ही अवधारित है। ‘सत्य’ की प्रतिष्ठा के प्रति चरम आस्था परिव्याप्त है हमारे राष्ट्र और समाज में।
वाल्मीकीय रामायण के नारदोक्त सर्वोत्तम नायक, सर्वगुणोपेत मर्यादा पुरुषोत्तम राम सत्यवान् थे।
संतकवि तुलसी के राम तो सत्यसिंधु हैं। ‘रामचरितमानस’ में सत्य को अजेय समर-रथ की दृढ़ध्वजा बताते हैं वे -   “  सत्यशील दृढ़ ध्वजा पताका।   ” 
कबीर सबसे बड़ा तप ‘सत्य’ बताते थे-  “ साँच बराबर तप नहीं....। ”
आधुनिक भारत के राष्ट्रीय चिह्न पर भी मुण्डक मंत्र ‘सत्यमेव जयते’ अंकित है। यही अंकन सम्राट अशोक की लाट पर भी अंकित है।
अहिंसा के परम पुजारी महात्मा गाँधी, डॉ0 राधाकृष्णन् आदि महानुभावों के लिए ‘सत्य’ प्रथम साध्य था।
विनोबा तो सत्यशोधन को ही जीवन का लक्ष्य मानते थे। न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और इन सबसे बढ़ कर जनसंचार तंत्र (मीडिया) भी घोषित रूप में निरन्तर सत्य-अनुसंधान में निरत बताए जाते हैं।
भारतीय, ब्रिटिश और प्रायः सभी राष्ट्रमण्डलीय राष्ट्रों तथा जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, जापान आदि देशों के न्यायालयों में भी ‘सत्य की सौगन्ध’ सर्वमान्य है।
पाश्चात्य दार्शनिक सुकरात और प्लेटो भी मूलतः सत्य के आराधक थे। प्लेटो ‘सत्य’ को सदैव अधूमिल बताते थे। हैसिओड, होमर से लेकर हाइडेग्गर तक अनेक पाश्चात्य काव्यशास्त्री भी ‘सत्’ (सत्य) की प्रतिष्ठा के परचमधारी रहे हैं।
‘सत्’ का विपरीत-अर्थी होता है असत्। असत् अर्थात् ‘तमस् का आधान’ अर्थात् ‘कालिमा का आधान’।
‘असत्/तमस्’ को ‘कालिमावर्णी’, ‘रजस्’ को ‘रक्तवर्णी’ तथा सत् को ‘श्वेतवर्णी’ माना जाता है-- यह अकारण नहीं है। वैज्ञानिक अभिमत है कि कालिमा में प्रकाश-किरण को समग्रतः (उसके प्रत्येक अवयव को) सोख लेने की क्षमता होती है। गहरी कालिमा (Black) प्रकाश का अंशमात्र भी परावर्तित नहीं करती। वस्तुतः जो वस्तु जितने ही अधिक परिमाण में प्रकाश को सोषती है, वह उतने ही परिमाण में काली दिखती है। इस वैज्ञानिक सत्य को यदि समाजशास्त्रीय कलेवर प्रदान किया जाए तो वैज्ञानिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि समाज में असत्/तमस् को वरेण्यता प्रदान करने पर शोषक/शोषण उत्तरोत्तर चरम तक परिव्याप्त होता जाएगा। वह समाज की समग्र श्रेष्ठ ऊर्जा/ऊर्जस्विता को सोष लेगा जिससे समाज अंततः क्षरित हो जाएगा क्योंकि तब समाज की समग्र श्रेष्ठ ऊर्जा/ऊर्जस्विता को सोषने के प्रतिकार में कुछ भी परावर्तित/प्रत्यावर्तित न करने की दशा में समाज की सारी ऊर्जा जो सबसे ज्यादा तमस्शील होगा उसी के द्वारा सोष/हड़प ली जाएगी। चूँकि विज्ञान मानता है कि ऊर्जा और संहति आपस में परिवर्तनीय हैं अतएव, ऐसी दुःस्थिति भी आ सकती है कि सृष्टि से सारी संहति ऊर्जा के रूप में या संहति के रूप में सर्वशोषक द्वारा सोष ली जाए, तब समाज ही नहीं अपितु सम्पूर्ण सृष्टि तक का अस्तित्व मिट जाएगा। अ..त..ए..व, तमस्/असत् की आराधना न वरेण्य हो सकती है और न स्वीकार्य। ऐसी चरम क्षरण की अवस्थिति तो किसी चरम तमस्वादी को भी स्वीकार्य नहीं होगी।
औ..र, असत्/तमस् विलोम: सत् एवं सत्त्व का प्रतीक रंग है- श्वेत। प्रकाश विज्ञान के अनुसार जो वस्तु जितने परिमाण में श्वेत प्रकाश किरण को उस रूप-स्वरूप में परिवर्तित/प्रत्यावर्तित कर सकती है कि श्वेत प्रकाश किरण के संघटक सात रंग संयुजित रह कर श्वेताभ ही बने रह सकें, उनमें विलगाव या विचलन न हो सके, उतनी ही ‘श्वेत’ मानी जाती है वह वस्तु। तदेव, लोक-समाज में भी कोई विशृंखलन न हो और ऊर्जा एवं प्रकाश का पूर्ण परावर्तन हो, उसका कहीं अवशोषण न हो जिससे समग्र लोक लाभान्वित हो सके ऐसी क्रिया/कर्त्ता को ‘श्वेतपरक’ ही कहा जाएगा जिसका प्रतीक है सत् और सत्त्व।
इ..सी..लि..ए, ‘मानुस’ से प्रथम बार ‘मानव’ बनने के युग से लेकर अद्यतन तमस् का तिरस्कार करने और सत्त्व को प्रतिष्ठित करने के सत्त्वशील प्रयास गतिमान हैं। सत्यान्वेषी सत्त्वशील विज्ञान की दृष्टि से भी प्रबुद्ध मानव के लिए सत्/सत्य/सत्त्व का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। इसी रूपक के समरूप आक्षरिक आराधना के क्षितिज पर भी सत् की प्रतिष्ठा अपेक्षित है। कविता (साहित्य) को मूलतः सत्त्वशील, सत्यशील, सत्वाही ही होना चाहिए। ‘नयत्व’ (सत्/सत्त्व जिसका अंशभूत है) लोक-कल्याणक अशोषणीय श्वेतवर्णिता के आधार पर कविता (साहित्य) के लिए उपास्य है।
तथ्यतः हमारे देश-समाज में ही नहीं वरन् वैश्विक धरातल पर भी बहु-बहुलांशतः नय और नयत्व का अन्योन्याश्रित सत्य/सत्/सत्त्व ‘इदमित्थम्’ वरेण्य है समाज, संस्कृति, साहित्य के क्षेत्र में भी और अध्यात्म के क्षितिज पर भी। बिना ‘नय’ के ऋत एवं सत्/सत्त्व (शिव, सुन्दर भी) की अवधारणा मूलतः शून्य-लक्षी है क्योंकि ‘ऋत’, ‘सत्’ आदि और ‘नय’ का अंतःसम्बन्ध एक ही सिक्के के दो पहलू सदृश है।
अब, कविता/काव्य के फलक पर पुनः लौटें तो दिखेगा कि ‘कविता’ ऊर्ध्ववाही, लोकसंग्र्रही, सत्-शिव-सुन्दर के समवेत की नयशील, ऋतशील आक्षरिक आराधना की सरस, आनन्ददायी विधा है। तदनुसार, सत्, शिव, सुन्दर की समवेत अक्षराराधना वाली ऋत समेकित सत्त्वशील, शिवशील, नयशील कविता का प्रथम लक्ष्य है- सत् $ शिव $ सुन्दर के समवेत का काव्यात्मक ऊर्ध्ववाही लोकसंग्रही संधान। इस संधान में प्रथम है-- ‘सत्’/सत्य/सत्त्व का संधान। संक्षेपतः ‘सत्’/सत्य/सत्त्व को वस्तुनिष्ठतः साधने का सर्वहितकारी सर्वसहज आक्षरिक उपादान है ‘काव्य’। काव्य से अविच्छिन्न सम्बन्ध होता है सत् का। आर्ष मनीषा यही मानती है।

ऋत
‘ऋत’ क्या है और/या ‘ऋत’ का क्षेत्र-विस्तार कहाँ तक विस्तीर्ण है-- यह जानने के लिए वैदिक संचेतना का अवगाहन एकमेव विकल्प है क्योंकि ‘ऋत’ सम्बन्धी अवधारणा अन्यान्य धर्म-संस्कृति-समाज में उपलब्ध नहीं है। ऋत की वैदिक देशना के बारे में सविस्तार चर्चा पहले की जा चुकी है।
संक्षेपतः, ऋक्, साम आदि में ‘ऋत’ का अर्थ न्यायार्थक स्वरूप में अर्थायित किया गया है। ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त कराने की दिशा में सत्/सत्य से भी आगे की इयत्ता का अर्थबोधक है ‘ऋत’। यह ‘नयत्व’ के अधिक निकट वाली इयत्ता का भी अनुबोधक है।
‘ऋत’ का शब्दकोशीय अर्थ है ‘सत्’ और ‘सत्त्वशील व्यवस्था’। महाभारत युग में ‘ऋत’ और ‘सत्’ पर्यायवाची अर्थों में प्रयुक्त किए जाते रहे हैं तथापि ‘सत्’ और ‘ऋत’ के रूढ़ार्थों के अनुसार समानलक्षी होने के बावजूद ‘ऋत’ का रूढ़ार्थी या पर्यायवाची नहीं है ‘सत्’। वेदों, उपनिषदों में ‘सत्’ और ‘ऋत’ अलग-अलग अर्थों में प्रायः एकसाथ ही प्रयुक्त हैं। ऋक् (2-25-7/8) में कहा गया है कि ‘ऋत’ से ही सारा संसार उत्पन्न होता है। नैयायिक मानते हैं- ‘ऋतेन ज्ञानान्न मुक्तिः’। वैदिक देवता वरुण को ‘ऋत’ का रक्षक बताया जाता है- ‘गोपाः ऋतस्य’। वरुण सर्व-कल्याणक हैं, शान्तिप्रिय हैं, क्षमाशील हैं, अनय-प्रक्षालक हैं, निरामय हैं। वरुण जल के भी अधिष्ठाता देवता हैं। जल जो पावन और विशुद्ध होता है, जल जो प्रवाहशील होता है, जल जो अपदूषण-निवारक होता है, जल जो जग-जीवन का धारक तथा उसकी प्यास जैसी जैविक वांछा को सम्पूर्त्त करने वाला होता है- ऐसे सद्गुणी ‘जल’ के अधिष्ठाता वरुण को ही ऋत का अधिष्ठाता/रक्षक बताया जाना मात्र एक संयोग नहीं है व..र..न् इस सुयोग से ‘ऋत’ का गुणात्मक विन्यास अवकलित किया जा सकता है। विशिष्ट प्रकृति के संवाहक/अधिष्ठाता वरुण देव विपरीत प्रकृति या विरोधाभासी गुण-शील को स्वीकार नहीं कर सकते अतएव ऋत के देवता वरुण के अन्यान्य सद्गुणों को देखते हुए ‘ऋत’ को भी तद्गत गुण-धर्म से आसिक्त माना जाना निषेच्य है। तथैव, ‘ऋत’ को भी पावनता, विशुद्धता, नियमशीलता, नैतिकता, शाश्वत सद्-व्यवस्था के अधिष्ठापक, अपदूषण-प्रक्षालक और जीव-जगत् की प्राकृतिक वांछा के आपूर्तिकर्त्ता के स्वरूप में ही नहीं, वरन् जीव-जगत् के अस्तित्व को बनाए रखने वाली इयत्ता के अर्थ में ही स्वीकार किया जाना चाहिए। प्रख्यात दर्शन अध्येता डॉ0 देवराज के अभिमत से ‘ऋत’ ‘पावन नियमशीलता’ का वाचक है।
उपर्युक्तानुसार पावनता, विशुद्धता, नैतिकता, शाश्वत सद्-व्यवस्था, नियमन की अधिष्ठापना आदि के साथ-साथ अपदूषण-प्रक्षालन जैसे सद्गुण ‘ऋत’ को ‘नयवादी पहचान’ देने में समर्थ हैं। ‘ऋत’ को सघन सत्त्वशील, पावन नियमशीलता का संवाहक, सर्वात्म ब्रह्मत्व के निकटतर, अपावनता का निवारणकर्त्ता एवम् सत्त्वशील पावन ‘नयत्व’ का कारक माना जाना चाहिए। नयत्व का मूल अक्षांश इन्हीं सद्लक्ष्यों का अक्षांश है। इस तरह ‘ऋत’ नयत्व से एकलक्षी है।
द्रष्टव्य है कि यदि ‘ऋत’ समेकित ‘नय’ जैसे आधारभूत लक्ष्य को साहित्य से विलग कर दिया जाए तो लोकमंगल के ‘मंगल वपु’ की ग्लोबल देशान्तर रेखाएँ भी ‘ऋत’ के केन्द्रक के अभाव में अज्ञात ही रहेंगीं। किसका मांगल्य, कैसा मांगल्य, क्यों मांगल्य, कितना मांगल्य जैसे प्रश्न भी अनुत्तरित ही रहेंगे। ऐसे सभी प्रश्नों के समुचित समाहार के लिए काव्य में ‘नयत्व’ का स्वीकार ही एकमेव उपादेय है।

शिव
‘शिव’ का अभिधा/व्यंजना/लक्षणा में सर्वमान्य अर्थ ‘कल्याण’ ही है। ‘शिव’ का शाब्दकोशीय अर्थ है- कल्याण, मंगल, महादेव, शुभ, मांगलिक, भाग्यवान्।
आर्ष वाङ्मय में ‘शिव’ को लोकमंगल के अधिष्ठाता ‘महादेव’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। शैैवागम/तंत्रागम के अनुसार ‘शिव’ महा-देव हैं। औढरदानी हैं, वे जो सद् से सम्मिश्र होकर सद् $ अ $ अशिव = सदाशिव बन कर सम्पूर्ण अग-जग का कल्याण करते हैं।
आक्षरिक काव्य-संयुजन के परिप्रेक्ष्य में तथ्यतया ‘शिव’ के उपर्युक्त गुणधर्म के संवाहक/वाचक अर्थों में शब्द ‘शिवम्’ को भी अर्थायित किया जा सकता है जिसके क्रम में कल्याण को व्यापकता प्रदान करते हुए ‘काव्य’ के ‘शिवत्व’ को लोकमंगल/लोककल्याण का वाचक माना जाता है। दक्षिणात्य विद्वान् एम0 वी नाडकर्णी ‘शिवम्’ को ‘ईश्वर के नैतिक रूप का निचोड़’ कहते हैं। इसी रूप में वे ‘कविता’ में ‘शिवत्व’ की आराधना के हामीकार हैं। पाश्चात्य काव्यशास्त्र में ‘शिवत्व’ को साहित्य का निकष माननेवालों में लांजाइनस के बाद मेण्डलसन प्रमुख है जिनकी विचारणा में साहित्य/कविता में ‘शिवत्व’ मुख्य निकष माना गया है। चूँकि शिवत्व की परिधि का उकेर नयत्व को केन्द्रक मान कर ही किया जा सकता है अतएव, मानना होगा कि कविता/साहित्य के ‘शिवत्व’ पर बल देने वाले विचारकों ने प्रकारान्तर से ‘नयत्व’ को ही निकष माना है।
आचार्य मम्मट निदेशित काव्य-प्रयोजनों में ‘शिवम्’ या कि ‘शिव’ तत्त्व के बजाय ‘शिवेतर-क्षतए’ अंकित है। शिवेतर की क्षति प्रकारान्तर से अनय की ही क्षति है। यह महत्त्वपूर्ण काव्य-प्रयोजन है। मम्मट-प्रणीत ‘शिवेतर-क्षति’ का प्रत्यय काव्य के शिव-तत्व को नय के अति-अति निकट निष्पादित कराने में समर्थ है। ‘नयत्व’ को आधार बनाए बिना ‘शिवेतर की क्षति’ सम्पूर्त्त नहीं होगी। शिवेतर की क्षति तो दूर की बात है, शिवत्व और शिवेतर के सम्यक् अवधारण के लिए भी हमें ‘नयत्व’ की शरण में ही जाना होगा। मम्मट-प्रणीत ‘व्यवहारविदे’ का इंगित भी ‘नयत्वशील व्यवहार’ की ही अपेक्षा करता है।
प्रकट है कि शिवत्व और नयत्व का अंतःसम्बन्ध भी एक सिक्के के दो पहलू के समरूप है। व्यापक कल्याण ‘नय’ का भी चरम लक्ष्य है। ‘शिवत्व’ की परिधि का उकेर ‘नयत्व’ को केन्द्रक मान कर ही किया जा सकता है।

लोक-सुन्दरम्
‘लोक-सुन्दरम्’ को ‘काव्य’-जगत् में ही नहीं वरन् न्याय के क्षेत्र में भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

पाश्चात्य काव्य-मनीषी ‘काव्य-सौन्दर्य’ को काव्य का प्रमुखतम लक्ष्य मानते हैं। जो मनीषी इसे काव्य का प्रमुखतम लक्ष्य नहीं मानते, वे भी ‘सुन्दरम्’ को काव्य के लिए महत्त्वपूर्ण तो मानते ही हैं। यूँ भी स्थूल रूप से सत्, शिव के साथ सुन्दरम् की अक्षराराधना है काव्य।
‘सुन्दरम्’ वस्तुतः न्याय-जगत् का शब्द नहीं है। न्याय-जगत् में ‘सुन्दरम्’ वस्तुतः ‘लोक-सुन्दरम्’ के स्वरूप में ही ग्राह्य है। नैयायिक प्रमा के सुयोजित प्रयोग से लोक-कल्याण को अधिकतम साकार करने का और/या सत्य के वस्तुनिष्ठ स्वरूप को अन्वेषित व रूपायित करने का जो अधिलक्ष्य न्यायशास्त्र का प्रमुख अधिलक्ष्य है उससे विलग या विच्छिन्न नहीं माना जा सकता ‘सुन्दरम्’ औ..र, सत्य के चरम को जब ब्रह्म से सहयुजित कर दिया गया तब सत्य के चरम को असुन्दर मानने का कोई अवसर शेष नहीं रह जाता है। ब्रह्म भी असुन्दर नहीं है। न्यायशास्त्र के व्यावहारिक अधिलक्ष्य: चरम लोक-कल्याण को साकार किए जाने पर समग्र लोक के ‘चरम सुन्दरत्व’ को रूपायित किया जा सकेगा, इस प्रत्याशा को कपोलकल्पित नहीं माना जा सकता। ‘लोक-सुन्दरम्’ की प्रत्याशा न्याय-व्यवस्था का मूलाधार है। कमसकम व्यावहारिक न्याय-व्यवस्था में लोक-असुन्दर के तिरोहण का अधिलक्ष्य तो समेकित है ही। इस तरह, यह नहीं कहा जा सकता कि ‘सुन्दरम्’ या ‘सुन्दरत्व’ से ‘न्याय’/‘नय’ का कोई लेना-देना नहीं होता।
काव्य-फलक पर ‘सुन्दरम्’ का महत्त्व आर्ष मनीषा में रस-निमीलन आदि में काव्यांकन/शब्दांकन की कला या उक्ति-वैचित्र्य, अलंकार जैसे काव्यात्मक गुण तक ही सीमित नहीं माना गया है। छन्द, अलंकार, उक्ति-वैचित्र्य सदृश काव्य-सौष्ठव तक ससीम नहीं रहा यहाँ काव्य-अधिलक्ष्य। आर्ष मनीषा ‘सुन्दर’ को मात्र आकर्षक, मनोहर, रम्य, मोहक जैसे शाब्दकोशिक पर्याय तक संकुचित अर्थ-सीमा तक सीमित रखने की पक्षधर प्रतीत नहीं होती। आर्ष मनीषा के लिए ‘सुन्दरम्’ और ‘लोक-सुन्दरम्’ में कोई विपर्यय नहीं है।
कालिदास जैसे सौन्दर्यवादी कवि जो देवी पार्वती की देहयष्टि के सौन्दर्य का कामुक वर्णन करने में भी संकोच नहीं करते थे ऐसे महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसंभवम्’ में ही ‘संस्कारवान् वाणी’ की आशंसा की है (संस्कारवत्एवगिरामनीषी....) और संस्कारवती वाणी को ‘व्यक्ति को पवित्र और अलंकृत करने वाली’ बताया है। ‘रघुवंशम्’ में भी ‘संस्कार’ की ‘बभूवकृत संस्कारा चरितार्थ एव भारती’ कह कर संस्कारवान् वाणी की आशंसा है।
‘किरातार्जुनीयम’ में सौन्दर्यवादी महाकवि भारवि भी ‘अर्थवती भारती’ (भा + रती = प्रकाश-निरत) की आशंसा करते हैं। अर्थवती/संस्कारवती भारती को क्षुद्र-अर्थीय सौन्दर्यवादी कविता के रूप-स्वरूप में नहीं देखा जा सकता है। यह संस्कारवान् वाणी और सार्थक वाणी भी ‘काव्य’ के नयशीलत्व को इंगित करने में समर्थ है।
प..रि..स्प..ष्ट..तः आर्ष मति से कविता के कलात्मक रसात्मक सौन्दर्य हेतु तद्गत वाणी/कविता को संस्कारवान् , अर्थवान् और चेतना-परिष्कारक होना चाहिए। ‘काव्य के सुन्दरत्व’ का आर्ष अर्थ यही है।
विदित हो कि ‘सुन्दर’ शब्द का प्रथमाक्षर ‘स’ है जो ‘उ’ से सहयुजित है। मनोहर/मोहक शब्द में भी ‘उ’ सहयुजित है। भाषाविदों के अनुसार ‘उ’ वैराट्य के प्रतिमान ‘विष्णु’ का वाचक है। तदनुसार, सुन्दर/मनोहर जैसे शब्दों में ‘उ’ के सहयुजन का सीधा सा अर्थ है ऐसा आधान (जिसे सुन्दर/मनोहर कहा जा सके) जिसका वैराट्य से सम्यक् समेकन वांछनीय है। ‘सुन्दर’ को, ‘सुन्दरत्व’ को और उसके पाठ-भेद ‘सौन्दर्य’ को संकुचित अर्थों में अर्थायित किया जाना तर्कसंगत नहीं है। ‘सुन्दरत्व’ के वैराट्य गुण की उपेक्षा करने वाले या/और सौन्दर्य को संकुचित भौतिक स्वरूप में देखने वाले तथाकथित सौन्दर्यबोधी प्रत्येक ‘बोमगार्टन’ को अंततः भर्त्सना ही झेलनी पड़ी है।
कहना होगा कि पाश्चात्य जगत् में जहाँ ‘काव्य’ को मात्र ‘कला’/‘वक्तृताकला’ मानने की परम्परा प्रायः मान्य है वहाँ ‘काव्य’ का सौन्दर्यबोध ‘रूपवादी’ हो सकता है, कि..न्तु, आर्ष-मनीषा ‘काव्य’ के सौन्दर्य को उससे कहीं आगे बढ़ कर ‘रमणीय अर्थ के अनुबोध’ तक विस्तारित मानती रही है। यहाँ ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’ की परिभाषा देते हुए ‘काव्य’ को उन शब्दों का प्रतिफलन बताया गया जो ‘रमण करने योग्य अर्थ’ के प्रतिपादक हों। स्पष्ट है कि आर्ष मनीषा ने ‘शब्द के रूप’ को या ‘शब्द के रूपगत सौन्दर्य’ को ‘रमणीय’ नहीं, प्रत्युत ‘शब्द के अर्थ’ को और ‘शब्द की प्रतिपाद्य क्षमता’ को ‘रमणीय’ बताया है, ‘शब्द’ के ‘रूपगत सौन्दर्य’ पर ( तथैव, शब्दसंयोजन-कला पर) यहाँ बलाघात नहीं है।
देखना होगा कि ‘रमण करने योग्य’ का क्या अर्थ है ?
मेरी दृष्टि में विशदता के परिचायक ‘र’ कार से संयुजित शब्द ‘रमण’ ‘विशद/गहन मनन करने का तथा ‘मणन’ अर्थात् डूब कर/तल्लीन होकर व्यापक चिन्तन करने का वाचक है। इससे भी आगे बढ़ कर म® तो कहना यह भी चाहूँगा कि ‘रमण’ शब्द में आर्ष साहित्य-संस्कृति के अवनति-काल के पूर्व की उस संस्कृति की झंकृति है जिसमें लोकचेता होते थे ऋषिगण जो लोकहिताय व्यापक ‘मणन’ करके विचार-मणन से सम्बद्ध होते थे तो ‘मुनि’ कहलाते थे। सद्-असद् (सत्-असत्) का अवधारण करते थे। ‘मणन’ का लोकप्रचलित अर्थ ‘माँणना’ या ‘गूँथना’ है। तदेव, वैराट्य जिसमें माँणा हुआ, गूँथा हुआ हो-- ऐसे ही भाव का संवाहक मानना चाहिए ‘रमण’। ऐसे भाव वाले रमणीय (मननीय/विचारणीय) अर्थ के प्रतिपादक काव्यात्मक शब्द-संयुजन को ही ‘काव्य’ के रूप में स्वीकारा था आर्ष मनीषा ने।
दुर्योग से ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’ का अर्थविन्यास 17 वीं शताब्दी तक आते-आते रामचन्द्र गुणचन्द्र के कालखण्ड में ‘रत्यादि’ भाव से सहयुजित कर दिया गया। यह आषेचन संभवतः तत्कालीन सामंतवादी राजव्यवस्था/समाजव्यवस्था का गलित-फलित था।
तथ्यतया रसात्मक अनुबोध से आनन्द प्राप्त करने वाले आर्ष आनन्दवादी भी ‘रस’ को जिस रूप-स्वरूप में मूलतः देखते रहे हैं उस मूल से भी ‘चिति चेति चितिः’ वाली चेतना का लक्ष्य अथवा ऊर्ध्वमुखी जागरण प्रदान करने वाले आदान का लक्ष्य ‘काव्य’ से मूलतः वियोजित नहीं रहा है। कह सकते हैं कि चेतना-परिष्कार के अधिलक्ष्य से सहयुजित होना ही ‘काव्य के सुन्दरत्व’ की चरम नियति है।
‘सुन्दरम्’ के नाम पर संस्कृत जगत् और हिन्दी जगत् में ‘रीतिवादी काव्य’ में नायिका के दैहिक नख-शिख सौन्दर्य से लेकर प्राकृतिक उपादानों के सौन्दर्य तक का गायन है परन्तु यदि साहित्य/संस्कृति की पतनावस्था के युग को अनदेखा कर सकें तो दिखेगा कि हमारे यहाँ बलाघात दैहिक सौन्दर्यबोध के बजाय वैचारिक/मानसिक/बौद्धिक सौन्दर्य पर ही किया जाता रहा है। वास्तव में आर्ष मनीषा सुन्दरम् से ‘सार्वसुन्दरम् /लोकसुन्दरम्’ की अपेक्षा करती है। सार्वसुन्दरम् अर्थात् जो सर्वविध और सबके लिए ‘सुन्दर’ हो। लोकसुन्दरम् अर्थात् जो लोक के लिए सुन्दर/कल्याणकर हो।
लोकोक्ति है कि सुन्दरता देखने वाले की आँखों में होती है। किसी भी माँ को अपना कुरूप से कुरूप पुत्र भी कभी असुन्दर नहीं दिखता इसलिए कि माँ के ममत्व सत्त्व का औदात्य कुरूप पुत्र की सारी कुरूपता को ढाँप लेता है। शरीर से कुरूप होने पर भी कुरूप-पुत्र में माँ के लिए पुत्रत्व का सौन्दर्य विद्यमान रहता है।
‘सुन्दर’ बनाम ‘असुन्दर’ के विभेद के क्रम में बताते चलें कि मिथक कथा है कि राजा जनक के दरबार में अष्टावक्र के शरीर-विकृति पर हँसने वाले सभासदों से अष्टावक्र ने प्रश्न पूछा जिसका सार था- ” मोहिं का हँसेसि कि हँसेसि कोंहरहि ? “ औ..र, तब उन सभासदों को सन्न रह जाना पड़ा था। अंततः उन्हीं अष्टावक्र का भारी सम्मान हुआ था राजा जनक के दरबार में। इस मिथक से भी सिद्ध है कि मात्र ‘रूपवादी सौन्दर्य’ हमारे यहाँ अन्तिम प्रेय नहीं रहा कभी।
प्रकट है कि आर्ष मनीषा रूपवादी सौन्दर्य के बजाय सात्त्विक गुणशील के आधार पर सुन्दर-असुन्दर का आगणन करने की पक्षधर है। आर्ष मनीषा में ‘सुन्दर’ उसे ही माना जाता है जो चेतना को रसात्मक श्री-समृद्धि प्रदान कर सके। इसीलिए, आर्ष मनीषा में सत्त्वशीलता (अधिकतमतः रजस्शीलता) के अधिष्ठाता देव एवं सत्त्वशील, रजस्शील मानुष/थलचर/ जलचर/नभचर को ही ‘सुन्दर’ माना गया; किसी अनयी राक्षस, दैत्य आदि तमस्शील प्राणी को नहीं।
ज्ञातव्य है कि ‘काव्य’ में ‘सुन्दरम्/लोक-सुन्दरम्’ के माणन का फलक हो या तद्गत वैराट्य के मनन-चिन्तन या ‘काव्य’ से ‘रसो वै सः’ से सम्पृक्त रसात्मक श्रीसमृद्धि-प्राप्ति का अधिलक्ष्य या काव्य-सौन्दर्य को संस्कारोन्मुखी बनाने का उपक्रम आदि-- इन जैसे सभी संधानों के सम्यक् अवधारण के लिए, तद्गत सम्यक् प्रमासम्मत परिकलन के लिए और ‘काव्य’ के वास्तविक सुन्दरत्व के लिए ‘काव्य’ का ‘नय’ से सहयुजित होना वांछनीय है।

नैतिकता
नैतिकता के सन्दर्भ में बहुत विभ्रम है। सुकरात के पूर्व से ही पाश्चात्य मनीषी ‘नैतिकता’ पर बल देते रहे हैं; परन्तु वहाँ नैतिकता (जैसा कि पूर्वपरित अध्याय में बताया जा चुका है, ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ या कि ‘अपनी मुट्ठी अपना आसमान’ सदृश है।
व्याकरणतया नैतिकता ‘नीति’ (‘नि + ईति’) से उद्भूत है। ‘ईति’ कहते हैं कृषि-उत्पादन के प्रति क्षतिकारक कार्य को। ईति के व्यापक अर्थों में कहना होगा कि प्रत्येक वह कार्य ‘ईति’ है जो कृषि-कार्य के प्रति क्षतिकारक प्रकारान्तर से किसी भी प्रकार के उत्पादन के प्रति क्षतिकारक अर्थात् बहुसंख्य जीव के जीवनाधार के प्रति क्षतिकारक अर्थात् मानवता, राष्ट्र एवं सम्पूर्ण विश्व के प्रति क्षतिकारक हो। इसी ‘ईति’ में ‘नि’ उपसर्ग नकारात्मक अर्थ में संयुत होने पर बनती है ‘नि + ईति’ = ‘नीति’ अर्थात् जीवन जीने के वांछनीय संसाधनों को क्षति न पहुँचाने वाला कार्य। इस तरह व्यापक अर्थों में लोक-जीवन के आधारभूत संसाधन को क्षति न करने वाला आचार-विचार होती है ‘नीति’। इसी ‘नीति’ के भावानुभाव का वाचक है ‘नैतिकता’। ऐसा स्वीकारने पर ‘नैतिकता’ मनीषी-सापेक्ष न होकर जीवन के वांछनीय संसाधनों को क्षति न पहुँचाने वाले कार्य के सापेक्ष हो जाएगी जो लोकमंगल के लिए उपादेय होगा। इसी अर्थ में न्याय-क्षेत्र में स्वीकार्य होती है ‘नैतिकता’ और इसी अर्थ में काव्य-क्षेत्र में भी स्वीकार्य होनी चाहिए ‘नैतिकता’।
आदर्श, औचित्य, लोकमंगल जैसे प्रत्ययों की तस्वीर प्रबुद्ध मानस में लगभग सुस्पष्ट है अतएव, नयत्वाधार चतुष्टय के उपर्युक्त ‘सत्’, ‘शिव’, ‘सुन्दर’, ‘ऋत’, ‘नैतिकता’ जैसे सार्थक प्रत्ययों का उपरि-अंकित विवेचन करने के पश्चात् प्रयुक्त तकनीकी शब्द ‘सर्जनात्मक प्रमा’ का स्पष्टीकरण भी एतद्द्वारा वांछनीय है।

प्रमा
‘प्रमा’ वस्तुतः नैयायिकों की शब्दावली का शब्द है। ‘प्रमा’ का सहज अर्थ ‘प्रमाणाधारित वस्तुनिष्ठ ज्ञान’ के अर्थ में अर्थायित किया जाता है।
वस्तुतः चेतना के परिष्कार की वांछा और तद्गत परिकलन, परिष्कार, क्रियान्वयन आदि का ज्ञान नैयायिक प्रमा के बिना संभव नहीं है।
औ..र, ज्ञान ? न्यायागमों के अनुसार निर्विकल्प प्रत्यक्ष के अतिरिक्त सभी ज्ञान दो कोटियों के होते हैं-
1. यथार्थ ज्ञान 2. अयथार्थ ज्ञान।
‘यथार्थ ज्ञान’ के लिए अवधारक के रूप में ही प्रयुक्त होती है ‘नैयायिक प्रमा’। चूँकि ‘प्रमा’ के अभाव में ‘यथार्थ ज्ञान’ कल्पनीय नहीं है अतएव, ‘यथार्थ ज्ञान’ और ‘प्रमा’ अभिन्नता के आधार पर यदा-कदा एक-दूसरे के पर्यायवाची के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं।
विदित हो कि यथार्थ अनुभव (यथार्थ ज्ञान) न्यायागम के अनुसार पाँच प्रकार के आधारों पर उत्पन्न माना जाता है। ये 5 आधार हैं- 1. प्रमाण 2. प्रत्यक्ष 3. अनुमिति 4. उपमिति 5. शब्द ।
न्यायशास्त्र में ‘ज्ञान’ सामान्यतया 3 अर्थों में प्रयुक्त होता है-
1. समझना (ज्ञान-प्राप्ति: Learning की प्रक्रिया के रूप में)
2. समझ (ज्ञान का साधन : Intellect रूप में)
3. प्रतीति (ज्ञान का फल: Cognition के रूप में)
अनुभव के पाँच प्रकारों में और ‘ज्ञान’ के के उपर्युक्त तीनों अर्थों में ‘प्रमा’ की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानते हैं नैयायिक। नैयायिक उसी ज्ञान को ‘ज्ञान’ मानते हैं जो प्रमासम्मत हो।
‘सांख्य’ दर्शन में ‘बुद्धि’ और ‘ज्ञान’ को अलग-अलग माना गया परन्तु अक्षपाद गौतम ‘ज्ञान’ को ‘बुद्धि’/‘विवेक’ से विलग नहीं मानते थे।
जहाँ तक ‘सर्जनाशील प्रमा’ का फलक है उस फलक पर कहना होगा कि प्रमाण-आधारित यथार्थ ज्ञान से जब हमारी सिसृक्षा (सर्जनाशीलता) मुखर हो जाती है तो ऐसी सिसृक्षा स्वतः नयत्वशील हो जाती है।
अब नयाधार चतुष्टय समग्र के सापेक्ष देखें ‘कविता’ को। ‘कविता’ व्यष्टि/वैयक्तिकता से कहीं आगे समष्टि से सम्पृक्त होती है। कविता की रचना-प्रक्रिया भले ही व्यक्तिगत हो, परन्तु ‘कविता’ का लक्ष्यसंधान सिद्धान्ततः वैयक्तिक/व्यष्टि के बजाय समष्टि की हितसाधना के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होता है। तदेव, ‘कविता’ का सरोकार व्यक्ति से अधिक समाज से होता है। भले ही ‘कविता’ में रागात्मक प्रेमभाव प्रमुख संचारीभाव हो, फिर भी रागात्मक होने के बावजूद तद्गत कुल राग लोकोन्मुखी और बहुधा लोकसंग्रही ही होना चाहिए। जयशंकर प्रसाद हों या रामचन्द्र शुक्ल या तत्सदृश अन्यान्य विचारक सभी काव्य से लोकमंगल (समाज-मंगल और समष्टि-मंगल) की अभीप्सा रखते हैं। इस तरह भी ऋत आदि जिसके अंशभूत हैं, वह ‘नय-न्याय’ ‘काव्य’ में समेकित होना ही चाहिए।
जहाँ तक ‘कविता’ के निकष हेतु ‘काव्य-नयत्व’ के विभिन्न अंशभूतों के समेकन का प्रश्न है, तथ्यतः नय-न्याय के उपर्युक्त सद्गुणों से ‘काव्य’ को संकरित करना ही ‘काव्य-नयत्व’ का लक्ष्य है। ‘न्याय’/ ‘नय’/‘नयत्व’ की उपरिअंकित अवधारणा के सम्मादिट्ठि अनुशीलन से आषेचित ‘नयत्व’ को ‘काव्य’ से संकरित करने के क्रम में कहना होगा कि आर्ष मान्यता में ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’, ‘द्योरिव’, ‘धर्मांश तत्त्व का प्रत्याख्यानक’ और ‘ऋषि-कर्म’ के रूप-स्वरूप में ही ग्राह्य है ‘काव्य’। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया’ की अवधारणा में ‘अधर्मोऽयम् इति’ के शमन हेतु विश्व की प्रथम ‘कविता’ (आदिश्लोक) उवाचित करने वाले आदिकवि वाल्मीकि ने स्वरचित ग्रंथ ‘रामायणम्’ के आदिश्लोक में अनयकारी बधिक को न केवल दण्डित करने वाला लोकसंग्रही श्राप दिया वरन् वे स्वयम् अपने महाकाव्य में ऐसे सर्वगुणोपेत नायक का चरित्गान करते हैं जो अनय-विनाश एवं ऋत-नय की सुस्थापना को साकार करने वाला संकल्पबद्ध-कटिबद्ध पुरुषोत्तम है। कविवर तुलसीदास तथा संस्कृत-हिन्दी जगत् के अनेकानेक काव्याराधक मनीषी भी दाशरथ राम का ही गुणगान करते हैं। काव्य-सम्बन्धी ऐसी संचेतनाओं का भी विशिष्ट निहितार्थ है जिसे आलोच्य प्रकरण में अन्वेषित और तद्वत निष्कर्षतः मान्य करना होगा। जैसा कि पूर्वपरित अध्यायों से स्पष्ट है काव्य सम्बन्धी वैदिक संचेतना, आदि-महाकवि वाल्मीकि और कविवर तुलसी के काव्य-निदेशनों से भी काव्य-नयत्व आकलित किया जा सकता है।
पुनः स्मरण करा दें कि ‘कविता-उद्भव’ की अवधारणा में नीलकंठी शिव द्वारा लोककल्याणार्थ ‘कविता को प्रचारित/प्रसारित करने के लिए कवितांगों को उपदेशित करने का ‘मिथक’ है।
‘रामायणम्’ में ‘सत् की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की प्रेरणा से आदिश्लोक के आविर्भाव-प्रकथन’ का तथा ‘आदिश्लोक में अधर्म के शमनार्थ वधिक को श्राप दिए जाने’ का प्रकथन भी है।
भारतीयेतर अभिमत में भी ‘कविता को देवी म्यूज, देवी इन्हेंदुआना, देवी बेंजाइतेन आदि की प्रेरणा से आविर्भूत माने जाने’ का मिथक है।
उपर्युक्त सदृश अन्यान्य प्रकल्प-मिथकों का निहितार्थ बार-बार चेताता है कि ‘कविता’/‘काव्य’ वस्तुतः ‘नय-नयत्व’ के प्रवर्तन, क्रियान्वयन, कार्यान्वयन, संस्थापन के ही आदि-लक्ष्य से संधानित है। ऐसे समस्त निहितार्थों से यह भी प्रकट है कि ‘काव्य’ को उपर्युक्त नयाद्दार चतुष्टय के आधार पर रेखांकित ‘नयत्व’ से अपरिहार्यतः समेकित किया जाना चाहिए।
पूर्वपरित अध्यायों में उल्लिखित कतिपय विवेचनों को आलोच्य परिक्रम में स्मरण करना होगा कि आर्ष मनीषा के द्वारा निर्दिष्ट ‘सुकवि’ और ‘कुकवि’ के विभेद को आलोच्य कवि-विशेष के द्वारा ‘काव्य’ में ‘नयत्व से सुयोजन’ और ‘नयत्व से वियोजन (या कुयोजन)’ के आधार पर देखा जाना उचित होगा। इस तरह देखे जाने पर ‘काव्य’ का बिन्दुपथ भी उपर्युक्त नयाधार चतुष्टय के आधार पर अवधारित हो जाएगा।
नय-नयत्व के अन्य पक्ष देखें-
नय’ का अर्थ हमारे कतिपय अर्वाचीन पाश्चात्यमुखापेक्षी विद्वान् अत्यन्त उदारतापूर्वक (संभवतः पाश्चात्य दृष्टिकोण को उच्चतर दर्शाने के हेतुक से) ‘नैतिकता’ या/और ‘औचित्य’ से अर्थायित बता सकते हैं। ‘नैतिकता’, ‘औचित्य’ ‘नय’ का सटीक पर्याय नहीं हैं। ‘नैतिकता’, ‘औचित्य’ तो ‘नय’/‘न्याय’ के अंशभूत मात्र हैं। ‘नय’ प्रमासम्मत विवेक से निःसृत निष्कर्ष के सापेक्ष होता है जबकि नैतिकता ‘नीति’ (प्रायः शासकीय नीति) के सापेक्ष।
आदर्श रूप में नीति (विशेषकर राज्य की नीति) व्यापक लोकहित की नियामक मानी जाती है तदपि ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहाँ राजाज्ञा या राज्यनीति व्यापक लोकहित के बजाय क्षुद्र स्वार्थसापेक्ष उद्देश्य से विनिर्मित होती आई है, वहाँ नैतिकता और नय का भारी अन्तर मुखर भी होता रहा है। उदाहरणार्थ-
*  राजनीति में कूटनीति को नीतिसम्मत माना गया है जबकि साम, दाम, दण्ड, भेद जैसे अपवित्र संसाधन से स्वार्थसिद्धि को नयवादी स्वीकार नहीं कर सकता है।
* शासन द्वारा आबकारी ठेकों के प्रसार से उनके अधिक से अधिक रुपयों में नीलामी आदि से राजस्व-जुटाने के तर्क को वैधानिक और नैतिक माने जाने के बावजूद नयत्वशील नहीं माना जा सकता है।
* सुरम्य नगर टिहरी का जलावतन, बिना समुचित क्षतिपूर्ति के ‘गंगा एक्सप्रेस वे सेज’ आदि के नाम पर भूमि-अधिग्रहण जैसी परियोजनाएँ हों या बामियान में बुद्ध की महामूर्ति का विध्वंस, 26/11 का वर्ल्ड टेªड सेंटर पर आत्मघाती हमला, भारत में खालिस्तानी- पाकिस्तानी आतंकवाद/तथाकथित धार्मिक जेहाद, तालिबानी फर्मान आदि भले ही किसी संकुचित व्यास वाली ‘नीति’ से सुसंगत बताए जा सकें प..र..न्तु नयवादी उन्हें सर्वथा नयत्वहीन और निन्दनीय ही मानेगा।
* महाभारत के युग में जुए में पत्नी को दाँव पर लगाना, फिर जुए में हारी हुई पत्नी (द्रौपदी) के अपमान और चीरहरण के समय पाण्डवों के साथ-साथ भीष्म, द्रोणाचार्य आदि महावीरों का मुखर मौन कथित धर्म से आबद्ध नैतिकता वाले तर्क-कुतर्क से नीतिसम्मत या नैतिक भले ही बताया जाए प...र...न्तु, यह ‘नयत्व’ के निकष पर स्वीकार्य नहीं है।
ऐसे उदाहरण एक नहीं अनगिनत हैं व्यवहारिक धरातल पर जिनसे नैतिकता बनाम नय का गंभीर अन्तर परिलक्षित हो जाता है। यह अन्तर कारित इसलिए होता है कि ‘नीति’ को व्यापक अर्थों में लेने के बजाय हम संकुचित व्यास वाली परिधि में नीति की वांछाओं की अनैतिक व्याख्या कर लेते हैं।
‘विधान’ और ‘न्याय’ की असंगतता के उदाहरण भी अनेक हैं-
* रामायणीय क्षेपक कथाएँ या तंत्रागमों में विधानित बलि-प्रथा आदि-- सभी तत्कालीन लोक-समाज के शास्त्रीय ‘विधान’ से ‘संगत’ होते हुए भी ‘नयशील’ नहीं हैं।
* वैश्विक अर्थ-व्यवस्था स्वीकार करने के बाद शत्रु देश से व्यापार को शासकीय विधान की दृष्टि से ‘अवैधानिक’ नहीं माना जाएगा परन्तु यह ‘नयत्व’ के ‘व्यापक लोकहित’ के सिद्धान्त के विपरीत होगा कि हम शत्रु देश से सामान क्रय करके उसकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करें जिससे वह प्रकारान्तर से हम से ही आर्थिक बल प्राप्त करके भविष्य में हमारे ही राष्ट्र/समाज के हितों पर कुठाराघात कर सके।
* झुग्गी-झोंपडि़यों के भूखण्ड को यदि भू-माफिया खरीद कर उस स्थल पर बहुमंजिली इमारत बनाने की अनुमति शासन से प्राप्त कर लें और प्रभावित झुग्गीवासियों के विस्थापन की समुचित व्यवस्था के बगैर झुग्गी-झोंपड़ी पर बुलडोजर चला कर वहाँ बहुमंजिला भवन बनवाने लगे तो भले ही उसे अवैधानिक नहीं कहा जाए परन्तु भू-माफिया का आलोच्य उपक्रम अनयवादी ही माना जाएगा।
ऐसे उदाहरण भी असंख्य हैं जहाँ ‘विधान’ और ‘न्याय’ विलग हो जाते हैं। केशवानन्द भारती याचिका जैसी अनेक याचिकाओं में प्रवृत्तमान ‘विधान’ को सर्वोच्च न्यायालय ने अ-न्यायी ठहराया है।
‘न्याय’ वस्तुगततः जड़ीभूत न होने पाए औ..र यह दे्य-काल-परिस्थिति से सुर-लय-ताल मिला कर सटीकतः रूपायित हो सके-- इसके लिए आर्ष न्याय-व्यवस्था में न्यायाधिकारी के न्याय-विवेक (प्रमा) को वांछनीय माना गया जो बहुलांशतः शास्त्र-प्रचलित विधान और लोक-परम्परा आदि के सम्मा-दिट्ठि संकरण के समानुरूप संचाल्य होता है। कभी-कभी ‘नय’ की वस्तुगत अवधारणा के लिए ‘प्रचलित विधान’ को नकार देना भी न्यायसम्मत माना जाता है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायाधिकारी को अपनी ओर से विधान रचने की भी छूट रहती है। भारतीय संविधान में भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित व्यवस्था को प्रचलित विधान से इतर होने पर ‘विधान’ के रूप में ही माना जाना स्वीकार्य है। राजतंत्र के युग में ‘राजा (शासक)’ चूँकि सर्वोच्च न्यायाधिकारी भी होता था अतः उसके द्वारा उवाचित हर आदेश न्यायसम्मत माना जाता था क्योंकि सिद्धान्ततया तत्कालीन राजा/शासक नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक अधिलक्ष्यों से ही शासन चलाता था। वर्तमान युग में ‘विधान’ की स्थिति-परिस्थिति बदल गई है इसलिए कि सत्ताधारी शासक (सर्वोच्च प्राधिकारी) के लिए नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक अधिलक्ष्य बाध्यकारी नहीं रह गए हैं।
प्रकटतया ‘नैतिकता’ और ‘विधान’ (शास्त्रीय/राजकीय विधान एवं परम्परागत विधायन) में नीतिसापेक्षता या नीतिसम्मतता प्रचलित विधायन के ही सापेक्षिक होती है जबकि ‘नयत्व’ में केवल न्यायसम्मत उच्च सदाशयी नैतिकता, आदर्श, औचित्य या उपयुक्तता, उत्कृष्टता और लोकहितकारिता आदि तत्त्व तत्त्वतः विवेकपूर्ण स्वरूप में एक साथ समेकित होते हैं। राजाज्ञा/विधान/सामाजिक विधायन आदि मात्र एक औपचारिक नियामक सदृश अस्तित्वमान् होते हैं। इसी आधार पर सक्षम न्यायाधिकारी की प्रमा के अंतर्गत यह विधिक अधिकार प्रायः विहित होता है कि वह नय-न्याय के प्रतिकूल प्रतीत होने वाले विधान/राजाज्ञा/सामाजिक विधायन को पूर्णतः या अंशतः निरस्त घोषित कर दे।
औ..र, ‘नैतिकता’, ‘विधान’ के उपरि-इंगित परिदृश्य की ही तरह भ्रान्ति तब भी उत्पन्न होती है, जब मात्र उदात्तता, औचित्य, सदाचार या आदर्शवाद को स्वतंत्र इयत्ता में ‘नय’ का समरूप बताया जाता है।
‘न्याय’ बनाम ‘सामाजिक न्याय’ को भी देखें-
साम्यवादी जगत् में सिद्धान्ततः ‘समाजोपयोगिता’ के नाम पर कथित रूप में ‘सर्वहारा के हितसाधक’ स्वरूप में औ..र, व्यवहार्यतः ‘सर्वशक्तिशाली साम्यवादी राष्ट्राध्यक्ष के निर्देशानुरूप’ साम्यवादी ‘मेनीफेस्टो’ की व्याख्या के आधार पर ‘न्याय’ संचालित होता है। यह कथित ‘सामाजिक न्याय’ भी समग्र ‘न्याय’ का एकांश मात्र है। समग्र न्याय में सम्पूर्ण लोक के मांगल्य की जयकार होती है, किसी सीमित वर्ग-विशेष की हित-साधना की नहीं।
तथ्यतया वस्तुनिष्ठ ‘नय’ से ‘नैतिकता’, ‘उदात्तता’, ‘औचित्य’ या/और ‘आदर्शवाद’, ‘सामाजिक न्याय’ या ‘सदाचार एवं सुन्दरम्’ आदि प्रत्ययों का आभासी विचलन विचक्ष्य होता रहता है। तदेव, ऐसे प्रत्ययों को स्वतंत्र इयत्ता में ‘नय’ का पर्यायवाची माना जाना न्यायतः जल्प (भ्रान्त प्रकथन) मात्र होगा इसलिए कि नैतिकता, उदात्तता, औचित्य या/और आदर्शवाद, सामाजिक न्याय या ‘सदाचार’ आदि स्वतंत्र इयत्ता में नयत्व के एकांश तो हैं ले..कि..न ‘नैतिकता’, ‘उदात्तता’, ‘औचित्य’ या ‘सदाचार (Ethics)’ या मात्र ‘सामाजिक न्याय’ तक ही सीमित नहीं है ‘नयत्व’। इसी समानुपात में काव्य समेकित नयत्व (काव्य-नयत्व) को भी समझना होगा।
विदित हो कि ‘औचित्य’, ‘उपयुक्तता’, ‘उच्चता’, ‘सदाचारसम्मतता’, ‘नैतिकता’, ‘औदात्य’, ‘विवेकसम्मतता’, ‘न्यायसम्मतता’ जैसे सद्गुण ‘नय’ में इस रूप-स्वरूप में अन्तनिर्हित हैं कि ‘नय’ शब्द का सटीक पर्यायवाची अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। स्वयं हिन्दी/संस्कृत के शब्दकोशों में भी ‘नय’ के उपर्युक्त अधिलक्ष्यों एवं समस्त सद्गुणों को एक साथ समेकित करने वाला सटीक समानार्थी शब्द उपलब्ध नहीं है।
पाश्चात्य न्याय-जगत् के लैटिन शब्द ‘जस्टिस’, ‘जस्टीफाईड’ (जो फ्रेंच, ग्रीक, रोमन, ब्रिटिश, अमेरिकी, आस्ट्रेलियाई न्याय जगत् के सार्वभौमिक शब्द हैं) में ‘औचित्य’ का बोलबाला है। पाश्चात्य न्याय-व्यवस्था में ‘जस्टिस’ में ‘औचित्य’ के साथ-साथ (उदार होने की दशा में अधिकतमतः) ‘नैतिकता’ को समेकित कर लिया जाता है बस ! वह भी संभवतः इसलिए कि भारतीय न्यायशास्त्र से ही अनेक सिद्धान्त ग्रीक, रोमन और प्रायः समस्त पाश्चात्य न्याय जगत् ने आयातित किए हैं। भारतीय न्याय-ग्रंथ ‘तत्त्वचिन्तामणि’ के सूत्रों पर ही अद्यतन आधारित हैं ‘ब्रिटिश एविडेंस एक्ट’ के अनेक प्रावधान जो फ्रेंच, जर्मन, कनाडाई, आस्ट्रेलियाई जगत् में भी न्याय के अवधारण के लिए समानान्तर अवधारणा में प्रचलित है। तथैव, वहाँ ‘नैतिकता’ सदृश तत्वों को ‘न्याय’ में आधार बनाया जाना आश्चर्यप्रद नहीं है।
‘न्याय’ के समानार्थी स्वरूप में सामी जगत् में ‘इंसाफ’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। ‘इंसाफ’ शब्द भी ‘न्याय’ का सटीक पर्याय नहीं है। ‘न्याय’ में न्यायाधीश का न्याय-विवेक मुखर होता है जबकि ‘इंसाफ’ और इंसाफ के परिणामी परिकलन ‘सजा’ में व्यवहार्यतः मुन्सिफ के न्याय-विवेक के बजाय ‘नीतिगतता’ मुखर होती है और यह नीतिगतता प्रायः मुन्सिफ पर बाध्यकारी मजहबी उसूलों की परिधि से बाहर नहीं जाती है। मजहबी उसूलों की परिधि बनाम नैयायिक प्रमा का अन्तर स्पष्ट है।
प्रकट है कि ‘जस्टिस’ या ‘इंसाफ’ जैसे प्रत्ययों में स्वतंत्रतया सत्, शिव, सुन्दर के समवेत की तलाश चरम लक्ष्य नहीं है जबकि ‘न्याय’ के परिकलन में ऋत, सत्, शिव और लोक-सापेक्ष्य सुन्दरम् के चरम का प्रमासम्मत स्वतंत्र अन्वेषण ही अपेक्षित है। तथ्यतया नय-न्याय-नयत्व एक विशिष्ट विवेक: ‘ऋतम्भरिक विवेक’ का अर्थवाची है।
इस प्रकार नय-न्याय वस्तुनिष्ठतः ‘जस्टिस’, ‘इंसाफ’, ‘सामाजिक न्याय’, ‘नैतिकता’, ‘नीति’, ‘विधान’ आदि प्रत्ययों से विलग एक विशिष्ट अर्थ, विशिष्ट इयत्ता है। तथैव, काव्य-नयत्व के उसी विन्यास में काव्य में इंसाफ, जस्टिस, या सामाजिक न्याय जैसे अंशभूतों से विलग स्वतंत्र इयत्ता वाले नय/नय-तत्त्वों के समेकन के रूप-स्वरूप को मान्य किया जाना चाहिए।
एक पक्ष और। आर्ष मनीषा ने आरम्भ से ही सत् + चित् + आनन्द के समवेत को ब्रह्म माना और उसी ब्रह्म की तलाश को मानव-जीवन का चरम लक्ष्य अवधारित किया। क्या यह तलाश सत् की तलाश, शिवकारी चित् की तलाश और लोक सुन्दरम्कारी की तलाश का समग्र नहीं है। पुनुरुक्त करना आवश्यक नहीं कि सत् + शिव + लोकसुन्दरम् की तलाश अपने समग्र में नय-नयत्व की तलाश ही है। वैदिक वाङ्मय में जिसे ब्रह्म बताया गया है, उसे ही चरम सत्त्वशील, चरम शिवशील और चरम सौन्दर्य का परम आधान भी बताया गया है। यह ब्रह्म ही चरम न्यायशील, न्यायकारी भी है। अध्यात्म को दरकिनार कर दें तो भी बुद्धिवादी शास्त्र ‘सांख्य’ में जिसमें ‘ज्ञ’ 25 वाँ चरम तत्त्व है उस ‘ज्ञ’ का चरम आधान भी ब्रह्म ही है। समस्त आर्ष ग्रंथों में यह ब्रह्म साक्षात् चरम सत् स्वरूप है, चरम शिव स्वरूप है, चरम सुन्दर स्वरूप है। शैवागम में ‘शिव’ ही परम देवाधिदेव हैं; शिव ही सत् से सम्पृक्त होकर (सद् + आशिव) ‘सदाशिव’ बन जाते हैं; शिव ही चरम सौन्दर्यवान् हैं और चरम न्यायकारी भी। वैष्णव मनीषियों के अनुसार विष्णु हों या राम, कृष्ण आदि विष्णु के अवतार--- सभी सत्, शिवत्व और सौन्दर्य के परम आधान हैं और न्याय के भी। प्राचीन-अर्वाचीन भारतीय समाज में देवाधिदेव महादेव की कौन कहे देवगण भी सत् + शिव + सुन्दर के साक्षात् स्वरूप माने जाते हैं और न्यायशील भी।
कहना ही होगा कि सत् + शिव + सुन्दर का मूलाधार सत् + चित् + आनन्द में ही विहित है। एक सीमा तक सत् + शिव + सुन्दर को सत् + चित् + आनन्द का व्युत्पन्न उत्पाद (Derivative) माना जा सकता है। परन्तु सत् + चित् + आनन्द का आराधन या तद्गत समग्र स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति का संकीर्त्तन का अधिलक्ष्य अथवा तद्गत ब्रह्मानन्द-प्राप्ति अध्यात्म के प्रक्षेत्र हेतु छोड़ देने पर भी वाक्आनन्द से लेकर प्रज्ञानन्द तक की जो अपेक्षा आर्ष-मनीषा ‘कविता’ से करती आई है, इस अपेक्षा के सम्यक् परिकलन हेतु मानना ही होगा कि सत् + शिव + सुन्दर के ‘समवेत ऋतकारी संवित् संधान’ को आर्ष मनीषी ‘काव्य’ के अधिलक्ष्य से परे नहीं मानते हैं। अंततः काव्य का सत् + शिव + सुन्दर का समवेत ‘संवित् संधान’ उच्चतम भाव दशा में अध्यात्म का सत् + चित् + आनन्द का साक्षात्कर्त्ता ही है।
औ..र, ‘कविता’ की स्थूलीय परिभाषा में कविता को केवल सत् + शिव + सुन्दर का रूपायन मात्र कहें तो भी सत् + शिव + सुन्दर से कविता को सम्पृक्त किए जाते ही वस्तुनिष्ठ स्वरूप में सत्त्वशील चिद् की आनन्ददायी आक्षरिक आराधना ही कविता में मुखर होगी। ऐसी आक्षरिक आराधना हेतु कविता को ‘नयत्व’से संकरित किया जाना वांछनीय ही होगा। ‘कविता’ ऐसे ही ब्रह्म के साक्षात् स्वरूप    : अक्षर का समुच्चय और तद्गत संकीर्त्तन के रूप में मान्य रही है आर्ष मनीषा में।
वैदिक मान्यताओं को परिभाषित करने वाले अधुना ग्रंथ ‘सत्यार्थप्रकाश’ में स्वामी दयानन्द सरस्वती ईश्वर का एक नाम ‘अर्यमा’ इस आधार पर बताते हैं कि ईश्वर परम न्यायकारी है। ‘द गॉड’ भी परम सत्, कल्याण और सुन्दर का चरम आधान है और परम न्यायकारी भी। ‘पैराडाइज लास्ट’ में मिल्टन भी ‘गॉड’ के अन्यान्य गुणों के साथ उसके न्यायकारी होने का भी बखान करते हैं। सामी जगत् में चरम सत्ता अल्लाह (परमात्मा) हक (न्याय/सत्) का, जब्बार (शिवम्) का एवं जमील (सुन्दरम्) का साक्षात् रूप हैं और परम न्यायकारी है।
ऐसे अभिमत बहुसंख्य हैं।
निष्कर्षतः आर्ष आस्तिकता हो या मुस्लिम मान्यताएँ या यहूदी क्रिस्तानी विश्वास या अन्यान्य धर्म/ संस्कृति/समाज की बहुमान्य धार्मिक प्रस्थापनाएँ, सभी ईश्वर के परम न्यायकारी स्वरूप के बिन्दु पर केवल सहमत ही नहीं अपितु एकमत हैं जिससे प्रकारान्तर से कह सकते हैं कि नयत्व को परमात्मा से अभिन्न माने जाने की वैदिक मान्यता पर किसी आस्तिक को आपत्ति नहीं है। त..ब, कोई न कोई कारण तो होगा ही कि सत्यम् , शिवम् , सुन्दरम् के परम आधान को ही परम न्यायकारी भी बताया गया है यत्र-तत्र-सर्वत्र। त..थै..व, जब सत् + शिव + सुन्दर का चरम आधान ही ‘न्याय’ से किंचित् विच्छिन्न नहीं माना जाता त..ब ऐसी दशा में सत् + शिव + सुन्दर के समवेत को साकार करने वाली आक्षरिक आराधना ‘कविता’ भी नय/न्याय से कदापि विच्छिन्न नहीं मानी जा सकती है।
औ...र, यजुर्वेद और ईशावास्योपनिषद् में जहाँ सत्य के आवरण को अपावृणु करके चरम सत्य के अवगाहन का निर्देश है, उसी वाङ्मय मंजूषा में अक्षर को ब्रह्म की अभिधा से सहयुजित बताया गया है। क्या यह अकारण है ? यदि नहीं, तो अक्षर-ब्रह्म/शब्द-ब्रह्म के समुच्चय ‘काव्य’ को ब्रह्म के नयशील/न्यायशील गुणों से विच्छिन्न कैसे किया जा सकता है?
बताते चलें कि परम न्यायकारी ईश्वर की अवधारणा प्रथम बार नास्तिक कहे जाने वाले, नैयायिक मत के प्रथम प्रणेता अक्षपाद गौतम ने प्रस्तुत की थी। क्या इसका कोई निहितार्थ नहीं है?
सर्वव्याप्त ‘परम आत्मा’ को ‘ब्रह्म’ बताने वाली वैदिक मनीषा ने ‘अक्षर/काव्य’ को ब्रह्म से सीधे-सीधे सहयुजित/संयुजित कर दिया-- यह भी अकारण या निरर्थक नहीं है। इन्हीं अक्षरों के उत्पाद ‘शब्द’ का अर्थवाही समुच्चय ही होता है ‘काव्य’। ‘शब्द’ जिसमें प्रथम अक्षर से लेकर अन्तिम अक्षर तक के समवेत संस्कार एक साथ उकेरने की शक्ति है। ऐसे शब्द, अर्थ (और भाव भी) सहयुजित होकर ‘काव्य’ अवदानित करते हैं। इस तरह भी अक्षर के उत्पाद ‘शब्द’ एवं शब्द के उत्पाद ‘कविता’ को ब्रह्म से, ब्रह्म के सद्गुणों से, ब्रह्म के अर्यमात्व से विरहित नहीं कर सकते।
औ--र आनन्द ! ‘आनन्द’ के बारे में तैत्तिरीयोपनिषद् में ‘आनन्दोब्रह्मेति व्याजानात्’ ( ब्रह्म को समग्र में जान लेना ही आनन्द है ) कहा गया। ऐसे आनन्द की प्राप्ति के लिए भी नयत्व को उपेक्ष्य इसलिए नहीं माना जा सकता है कि तैत्तिरीयोक्त ब्रह्म हो या वह सत्ता जिसे महर्षि अरविन्द विश्वात्मा कहते हैं या हीगल जिसे Weltgeist कहते हैं या व्यापक अर्थों में पाश्चात्य जगत् में बहुलांश शास्त्रवादी जिसे Anima Mundi ( सर्वात्मा ) कहते हैं उस परमात्मा (अध्यात्म की भाषा में परब्रह्म) /सर्वात्मा/विश्वात्मा/Anima Mundi/Weltgeist का प्रमुख अवयव (कम से कम उसका प्रमुख सद्गुण) नयत्व है जिसके अभाव में कथित Anima Mundi/Weltgeist/The God/विश्वात्मा/सर्वात्मा न तो सत्त्वोन्मुखी होगी न ही शिवशील और न ही परमानन्ददायी। समानान्तरतः ऐसे ‘काव्य’ को भी जो सत् हो, शिवशील संचेतना से युक्त हो और आनन्द से सम्पृक्त लोकसुन्दरम् प्रदायी भी हो, किसी भी रूप-स्वरूप में तत्त्वतः ‘नयत्व’ से विच्छिन्न नहीं माना जा सकता है।
आर्ष दर्शन में अद्वैतवादी, द्वैतवादी और त्रैतवादी भी जिसे ब्रह्म/परब्रह्म की संज्ञा से अभिहित करते हैं और जिसे पाश्चात्य जगत् में विश्वात्मा/सर्वात्मा (World Soul, Weltgeist, Anima Mundi, The God) की संज्ञा दी गई वह चरम सत्ता ‘चरम चैतन्य’, ‘चरम सत्त्ववान्’, ‘चरम नयत्ववान्’ है तभी तो वह राग-द्वेष, भय, क्रोध, लोभ-मोह जैसे दुर्गुणों से सर्वथा विलग रहते हुए चराचर जीव-जगत् को सर्वदा ऋतकारी संवित् चैतन्य प्रदान करती रहती है। इसी ऋतकारी चैतन्य का अबाध अवदान-प्रदान कविता का चरम अधिलक्ष्य है। इस तरह भी चरम चैतन्य विश्वात्मा के संदर्भगत गुणधर्म के रूप में ‘नयत्व’ को ‘काव्य’ से संयुजित देखा जाना समीचीन है।
तथ्यतया परम न्यायकारी, परम सत्त्वशील परब्रह्म सत्ता से संयुजित-सहयुजित होने के ब्याज से अक्षर के समुच्चय के आक्षरिक उत्पाद: ‘काव्य’ को, सत्/सत्य/सत्त्व समेकित काव्य को, ‘नय’ से विच्छिन्न नहीं माना जा सकता है। कविता का मूल सत्त्व ‘सत्य’ आगृहीत ही कैसे होगा यदि काव्य-नयत्व को उपेक्षित कर दिया जाए ? यतः माना जाना चाहिए कि जो ‘कविता/काव्य’ नयत्व के अंशभूत सत्त्व से सम्पृक्त नहीं, उसे वस्तुतः ‘काव्य’ की श्रेणी में नियोजित ही नहीं किया जा सकता है।
इस तरह, काव्य को नयत्व से सम्पृक्त मानने का अर्थ काव्य में परमात्मा (परब्रह्म)/सर्वात्मा/विश्वात्मा/AnimaMundi/Weltgeist/WorldSoul/God/अल्लाह के सद्गुणों को ‘काव्य’ में रूपायित किए जाने के सदृश है जो ‘काव्य’ को सत् + शिव + सुन्दर के समवेत का आधान मानने के ब्याज से निसर्गतः रूपायित है। अन्यथा की दशा में ‘काव्य’ सत् + शिव + सुन्दर का वास्तविक आधान या/और तद्गत अक्षराराधन नहीं होगा।
दूसरी ओर, कतिपय आनन्दवादी/सौन्दर्यवादी जो ‘कविता’/‘काव्य’ को स्वयंकथित रूप में ब्रह्म-स्रह्म की आराधना नहीं, वरन् मात्र स्थूल आनन्दबोध/सौन्दर्यबोध का उपक्रम बताते हैं, उन्हें भी मानना होगा कि ‘सौन्दर्य’ की कथित आवश्यकता जिस ‘आनन्द’ के लिए है वह आनन्दबोध भी चरम स्वरूप में सत् और शिव से सम्पृक्त न हो-- यह मानना उचित नहीं है। क्या ऐसे आनन्दवादी/सौन्दर्यवादी कविता से सत् + शिव + सुन्दरम् को विच्छिन्न कर सकते हैं ? नहीं न। तब कविता से सत् + शिव + सुन्दर के ऋतात्मक संधान: ‘नय’ को और ऋत, सत्, शिव, सुन्दर आदि सत्त्वशील, नयशील सद्गुणों के समग्र के साक्षात् आधान: विश्वात्मा/परमात्मा/सर्वात्मा/ परब्रह्म/ब्रह्म को ब्रह्म-स्रह्म कहना या काव्य से नयत्व जैसे सद्गुण को नकारना क्या स्वतः विरोधाभासी नहीं है ?
विदित हो कि पाश्चात्य जगत् में मूल्य-सिद्धान्त के व्याख्याता आई0 ए0 रिचर्ड्स द्वारा ‘द ट्रू , द गुड, द ब्यूटीफुल’ के प्रथम प्रयोग के या कि ब्रह्मसमाज के देवेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बांग्ला में ‘सत्यम् , शिवम्, सुन्दरम्’ के प्रयोग के बहुत पूर्व से भारतीय कविता-जगत् में ‘सत् + चित् + आनन्द’ को साक्षात् ब्रह्म/ईश्वर माना जाता रहा है। वस्तुतः सत् , शिव, सुन्दर को ‘सत् + चित् +आनन्द’ का उत्पाद ही माना जाना सुतार्किक, नैयायिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक दृष्टि से सुसंगत है। तथैव, ‘कविता’ को आज भी भा + रतीय (प्रकाश-अन्वेषी) भारतीय मनीषा आभासी या सतही नहीं व..र..न् सत् + शिव + सुन्दर के मूल समवेत-निरूपण से विलग नहीं मान सकती है। त..ब, सत् + शिव + सुन्दर की आख्यानक   : ‘कविता’ को न्याय-नय से संकरित किए जाने की अपेक्षा वांछनीय माना जाना असंगत है कहाँ?
परन्तु ब्रह्म के सद्गुणों को रूपायित करने वाली ‘नयवादी कविता’ का अर्थ यह भी आशयित नहीं है कि कविता ‘भजन’ के रूप-स्वरूप तक सिमट जाए या कविता में ‘अनय/ असुन्दर/असत्य का विवरण तक न हो बल्कि होना यह चाहिए कि ऐसी कविता में अनय/अशिव/असत्य/असुन्दर जैसे दुर्गुणों का रूपांकन यदि हो भी तो वह इस रूप में सम्प्रस्तुत और प्रभावी हो कि तद्गत विवरण समग्र संधान से भी असुन्दर-अशिव-असत्- अनय-अनृत आदि की निष्कृति की सदिच्छा ही दृष्टिगम्य हो।
जहाँ तक ब्रह्म/परब्रह्म के सद्गुणों से सम्पृक्त कविता या कि सत् + चित् + आनन्द या कि सत् + शिव + सुन्दर की इदमित्थम् आक्षरिक आराधना का प्रश्न है उस परिप्रेक्ष्य में इतना और कहना होगा कि जहाँ सत् + शिव + सुन्दर वस्तुतः ‘सत् + चित् + आनन्द’ का मूल है और ‘नय’ से अविच्छिन्न है वहीं सत् + शिव + सुन्दर का परिमापन, परिकलन मात्र नहीं अपितु तद्गत सम्यक् पहचान/आकलन को भी नैयायिक प्रमा के अभाव में सटीकतः आकलित नहीं किया जा सकता है। ऐसी दशा में ‘कविता’ को यदि स्थूल रूप में भी सत् + शिव + सुन्दर का समवेत आक्षरिक कवि-कर्म मानें तो भी ‘कविता’ को ‘नयत्व’ से सर्वदा संयुजित माना जाना ही श्लाघ्य होगा।
इसी तरह काव्य में नयवाद के समावेशन का अर्थ यह भी नहीं कि काव्य को चरम बुद्धिवादी बना दिया जाए। काव्य के लिए विचार और विवेक तो श्लाघ्य हो सकते हैं परन्तु बुद्धिवाद नहीं। प्रथम आधुनिक बुद्धिवादी देकार्त ने ‘प्रकृति पर स्वामित्व’ का जो नारा बुलन्द किया उससे बुद्धिवाद का पर्यवसान ‘प्रकृति बनाम मानव’ के अंतःसम्बन्धों में 36 के स्वरूप में हो गया। व्यक्ति बनाम शेष समष्टि’ के मध्य सम्बन्धों के फलक पर न्यायशील रागात्मक सम्बन्ध 63 के बजाय 36 के स्वरूप में पर्यवसित होने से प्रकृति के शोषण-दोहन से लेकर भोगवाद, सम्पत्तिवाद से बढ़ते-बढ़ते साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, अधुना भौतिकतावाद, उपभोक्तावाद तक अनेकानेक अप-फलित फलीभूत हो गए। रही-सही कसर पूरी कर दी फायरबाख ने। अपितु कहना होगा कि थोड़ा और आगे बढ़ कर शिश्नोदरी निजी सुख-लाभ तक सीमित कर गया ‘बुद्धिवाद’ व्यक्ति की बुद्धि को। इस तरह बुद्धिवाद अंततः भोगवाद, स्वार्थवाद, छल-प्रपंच, राग-द्वेष, कुण्ठा-कुत्सा, ईर्ष्या, संघर्ष, प्रकृति-द्रोह और युद्ध सदृश अपसंस्कारों के रूप-स्वरूप में ही पर्यवसित हुआ जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में तमस्-वृत्ति का फलित मान सकते हैं। यह ‘फलित’ अपफलित हुआ संभवतः इसलिए भी कि देकार्त ने ‘बुद्धिवाद’ की सर्वोपरिता के नाम पर ‘प्रकृति पर स्वामित्व’ का जो नारा उछाला था उसमें व्यक्ति की तमस् प्रकृति/प्रवृत्ति पर नियंत्रण एवं आत्मसंयम जैसे नियमन का सर्वथा अभाव था।
संभव है देकार्त ने ‘श्रीमद्भगवत्गीता’ और नयशीलत्व के प्रथम महाकाव्य ‘वाल्मीकीय रामायण’ सदृश आर्ष ग्रंथों का अध्ययन-अनुशीलन न किया हो परन्तु आर्ष मनीषा का वर्ग-चरित्र (जो जन्मजात परिवेशगत सम्प्रभाव से उक्त आर्ष ग्रंथों के प्रति श्रद्धावनत् रहता है वह वर्ग-चरित्र) ‘तमस् बनाम सत्त्व’ के संचयन के अवसर पर तमस्-आरोहण को स्वीकार करने को तत्पर नहीं होता। तथैव, ऐसी मनीषा के लिए एकमेव ‘बुद्धिवाद’ स्वीकार्य नहीं हो सकता है। औ..र बुद्धिवाद को न्याय-नियमन से समेकित कर देने पर बुद्धि धीरे-धीरे प्रज्ञा-प्रमा-ऋतम्भरा प्रज्ञा से समन्वित होती जाती है। यह प्रज्ञासमन्विता स्वतः तमस् के बजाय सत्त्व और ऋत जैसे तत्त्वों से बलशील होने के सम्बल से आर्ष मनीषा को स्वभावतः ‘स्वीकार्य’ ही होगी।
तथ्यतया बुद्धि को ऋतम्भरा प्रज्ञा से एकबारगी समन्वित भी नहीं किया जा सकता है; उसके लिए गम्भीर ‘साधना’ अपेक्षित होती हैं और वह ‘साधना’ सर्वसाधारण जन के लिए सहज नहीं होती। दूसरे, गम्भीर प्रज्ञा साधना करने वाले प्रवृत्तिमार्गी साधक की दिशा, उसकी मनोदशा साधना के उच्चतर स्तर पर पहुँचते ही प्रायः निवृत्तिमार्गी भी हो जाती है। तब प्रवृत्तिमार्ग के आरोही साधक साधना-पथ चाहे कंटकाकीर्ण हो या नयनाभिराम, प्रायः साधना-पथ से अधबीच में ही भटक जाते हैं ऐसे मनीषी। गम्भीर साधना के भटकाव भरे अधिलक्ष्यों के बजाय न्याय के पाथेय के सहारे प्रवृत्ति-मार्ग पर पथ-संचरण सहज ही होगा। तदनुसार आलोच्य परिप्रेक्ष्य में बुद्धिवाद को न्याय-विवेक से सम्मिश्र कर दिया जाना अपरिहार्य है इसलिए भी कि सृष्टि के सम्यक् संचरण के लिए लोकयात्रा का सम्यक् निर्वहन आवश्यक है। ‘श्रीमद्भगवत्गीता’ में श्रीकृष्ण ने प्रवृत्तिमार्ग की सक्रियता को श्लाघ्य बताया है। प्रवृत्तिमार्ग की संवित् रागात्मकता नयत्व का भी लक्षण है जिससे काव्य में समुचित संयुजन से काव्य-विवेक में निखार ही अभीप्सित है।
बताते चलें यह भी कि ‘काव्य’ में ‘नयत्व’ के समेकन का अर्थ ‘काव्य’ को न्यायशास्त्र का अपररूप बनाने से भी आशयित नहीं है बल्कि ‘काव्य-नयत्व’ के निकष से मात्र इतना आशयित है कि ‘काव्य’ (पद्य/गद्य) में ‘नय’/‘न्याय’ के अंशभूत (यथा सत् + शिव + सुन्दर के ऋतात्मक रूपांकन के साथ-साथ लोकसंग्रह, लोकहितकारिता, सर्वहितकारिता, सदाशयी शास्त्रानुपालन, शिवेतर की क्षति आदि) के तत्त्व उपचयित हों। तत्त्वतः ‘काव्य-नयत्व’ की अपेक्षाएँ उस दशा में आक्षेेपित हो जाएंगी यदि प्रश्नगत ‘काव्य’ में ‘नयत्व’ या/और ‘नयत्व के अंशभूतों’ का पूर्ण नकार प्रतिध्वनित हो अथवा वह द्योरिव, प्रादुष्कृतमन्यथा, निरामयता, भूतिभल, सर्वहित, सत्यान्वेषण, शिवकारिता आदि के आर्ष लक्ष्य-संधान से श्रीहीन हो या जब कथित काव्य (गद्य-पद्य) एक या अधिक उपरिअंकित तत्त्वों की उपस्थिति अंशतः भी साकार न करता हो। अपरिहार्यतः ऐसी दशा में कथित काव्य को ‘काव्य’ मानने से ही तत्त्वतः अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।
दो टूक शब्दों में कहें तो काव्य-नयत्व से अभिप्रेत है कि ‘कविता’ में (और ‘काव्य’ के अन्यान्य अपररूपों में भी) ‘नयत्व’ के उपरिअंकित सद्गुणों का सम्यक् समावेशन हो। साथ ही, ‘काव्य’ (पद्य एवं गद्य के विभिन्न अपररूप) के मान्य-निकषों में समीक्षा-विवेक का आधार ‘नयत्व’ को इस रूप-स्वरूप में वांछनीय माना जाए कि काव्य के अन्यान्य सद्गुणों के साथ-साथ न्याय के उपर्युक्त तात्त्विक कषन पर खरा उतरने के बाद ही आलोच्य काव्यात्मक शब्द-संयोजन को ‘काव्य’ की अभिधा प्रदान की जाए।
ध्यातव्य है कि पाश्चात्य काव्य-समीक्षा में और भारतीय काव्य-समीक्षा में भी मान्य काव्य-निकषों में से किसी एक/एकाधिक निकष-तत्त्व की अनुपस्थिति मात्र से आलोच्य काव्यखण्ड को ‘काव्य’ न मानने का चलन नहीं है। यथा- गद्य में रस, छन्द, अलंकार आदि प्रायः अनुपस्थित रहते हैं, ‘शब्द’ के 10 सद्गुणों में से भी बहुलांश प्रायः अनुपस्थित रहते हैं काव्य के गद्य प्रारूप में, फिर भी वे ‘साहित्य/काव्य’ की अभिधा से परे नहीं माने जाते। उसी न्याय से काव्य-नयत्व के निकष के स्वीकार के उपरान्त भी आलोच्य रचना में काव्य-नयत्व के एकाधिक अंश की आंशिक या पूर्ण अनुपस्थिति स्वीकार्य तो हो सकेगी परन्तु यदि आलोच्य काव्य-खण्ड में नय/न्याय के सभी अंशभूत या कि समग्रतः नय/न्याय सर्वथा अनुपस्थित हों या उनका निषेध/निगेशन (Negation) ही मुखर हो वहाँ तो यह स्वीकार्य नहीं होगा, ऐसा काव्य ‘काव्य’ न माना जाना ही श्रेयस्कर होगा।
लावेन्थल प्रभृति पाश्चात्य मनीषी भी ‘भाव’ की संरचना के हामीकार हैैं। तथैव, ‘नय’/‘न्याय’ के आधारभूत चतुष्टय और तद्गत विभिन्न अंग-उपांगों के सम्यक् अनुशीलन के सम्बल से कहना होगा कि ‘काव्य-नयवाद’ को मात्र ‘नैतिकता’, ‘सदाचार’ या कि ‘सामाजिक न्याय’ तक सीमित अर्थों में अर्थायित नहीं किया जाना चाहिए अपितु रचना में यदि ‘नय भाव’ किसी अंश तक या कि नय-न्याय के किसी एकांश के भाव तक समाहित दिखे, तो भी ऐसी रचना को ‘काव्य’ स्वीकार करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए, शर्त यह कि रचना का मूल भाव नय-विरोधी न हो। परन्तु यदि रचना का भाव नयत्व से पूरी तरह वियोजित हो तब तो उसे ‘काव्य’ नहीं ही माना जाना चाहिए। इस प्रकार, आलोच्य काव्य में सदाशयता से सम्पूर्ण नय-न्याय के समग्र का या नय/न्याय के किसी अंशभूत विशेेष का स्पन्दन और/या अनय, अनृत सदृश तत्त्वों की निष्कृति का समावेशन अपरिहार्य होगा; इतने से ही काव्य-नयत्व की अपेक्षाओं को आपूर्त माना जा सकेगा। तब कविता न तो भजन होगी और न ही बुद्धिवाद आदि से बोझिल ही।
सारतः, ‘काव्य’ को वस्तुगततः काव्य रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए, ‘काव्य’ के शास्त्रोक्त अधिलक्ष्यों के वस्तुनिष्ठ संधान के लिए, काव्य के माध्यम से व्यष्टिगत और समष्टिगत समस्त अनृतत्व एवं अपावनता के प्रक्षालन के लिए, अनय-असत्-अशिव-असुन्दर कीे निष्कृति केे लिए और इन जैसे अन्यान्य सत्त्वशील अधिलक्ष्यों के लिए, तद्गत अधिलक्ष्यों के समुचित आकलन/परिकलन के लिए औ..र तद्गत संधान/अनुसंधान को परासित करने के लिए ‘काव्य’ का नयशीलत्व अर्थात् नय/नयत्व के अंगभूत अंशभूत तत्त्वों से आशीलित होना अपरिहार्य है। साथ ही, ‘काव्य’ में न्यायसम्मत आचार के प्रतिकूल आचरण किए जाने पर समुचित दण्ड की व्यवस्था व्यवस्थित करने के लिए ‘काव्य’ को ‘काव्य-नयत्व’ से प्रमासम्मततः आसिंचित किया जाना वांछनीय होगा और समीचीन भी। ‘काव्य के नयवाद’ (काव्य-नयवाद) की न्यायसंगत माँग यही है, भले ही ऐसी काव्यापेक्षा को ‘काव्य-नयवाद’ का नाम दिया जाए या कुछ और।
संपिंडिततः, सर्वथा उपादेय है कि हम कविता में (साहित्य की सभी विधाओं में भी) ‘नयशीलता को वैखरी में सम्यक् मान अविलम्ब प्रदान करें जिसे हमारे प्राचीन काव्यज्ञ और बहुलांश पाश्चात्य काव्य-मनीषी पश्यन्ती में वांछनीय मानते आए हैं, परन्तु जिसे हम कथित आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता के अपबोध में या कि पाश्चात्य-सम्प्रभाव में उपेक्ष्य मान बैठे हैं।

(आलेख कृति ‘कविता का पश्यन्ती निकष : नयत्व’ में इसी शीर्षक से प्रकाशित )

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