काव्यालोचना को काव्य-नयवाद से जोड़ें
आर्ष मनीषा से कविता स + हित भावी प्रादुष्कृतमन्यथा को साकार करने वाली सतत उच्चतर भावदशाप्रदायी सार्वहिती लोकमांगलीय आक्षरिक आराधना का उपक्रम है। तथ्यतया श्वेताश्वतरोपनिषद् में निदेशित ‘छन्दांसि यज्ञाः ......’ या/और वैदिक मंत्र ‘ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये .....’ सदृश निदेशनों की अभीप्सा से लेकर ‘नय’ से ही ‘नायक’ को उद्भूत करके काव्य को नय/न्याय से जोड़ने/जोड़े रखने का ही प्रयास किया था आर्ष मनीषा ने।
दूसरी ओर, अपने देश के कविता-इतिहास को सम्मादिट्ठि से देखें तो दिखेगा कि कविता ही नहीं अपितु काव्य -समग्र को सत्त्वशील, नयशील, शिवशील, ऋतशील और सार्वसुन्दरम् शील प्रकृति वाले नय-न्याय के सम्बल से जोड़ने के फलस्वरूप एकाध अपवादों को छोड़ कर विगत 10,000 वर्षों के मानव-इतिहास में कोई साहित्यसेवी, लेखक या कवि चोर, डकैत, बलात्कारी नहीं हुआ।
फिर भी कविता/साहित्य में भारतीय काव्य-निकषों की उपेक्षा ?
इस विनाशकारी उपेक्षा से व्यक्ति और समाज का आज बहुआयामी अहित हो रहा है। कविता स्वयं भी गम्भीर दुर्गति को प्राप्त हो रही है।
ऐसी दुर्गति की अवस्थिति कारित क्यों हुई ? इसकी विवेचना में परम्परीण पिष्टपेषण उचित नहीं होगा। भौतिकतावादी आपाधापी या कि वैज्ञानिक तकनीकी आविष्कार, बुद्धू बक्सा, कम्प्यूटर, फेसबुक आदि पर ठीकरा फोड़ना भी उचित नहीं होगा। इन पंक्तियों के लेखक की दृष्टि से कविता की उपेक्षा और तेनेव व्यक्ति एवं समाज की मनसा अधोगति का आधारभूत कारण है कि कविता के सम्बन्ध में आर्ष निकषों का परित्याग कर दिया गया है। हमारे बहुलांश समालोचक संभवतः 900 वर्षों की दासता के फलस्वरूप परिवर्तित अपनी पाश्चात्योन्मुखी मानसिकता के कारण भारतीय काव्य-निकषों को देखने के बजाय पश्चिमोन्मुखी हो गए हैं। वे भारतीय काव्यशास्त्र के नाम पर प्रायः नाक-भौं चढ़ाते दिखते हैं। संभवतः उनकी नाक-भौं चढ़ने का एक कारण है कि जाने-अनजाने वे विदेशी दासत्व का जुआठा अब भी अपने काँधे पर लादे रहते हैं। इस जुआठा के बोझ तले हमारे पश्चिम-मुखी काव्य-समीक्षक भारतीय काव्य का, भारतीय काव्यशास्त्र का सम्यक् रसास्वादन नहीं कर पाते। भारतीय कविता/साहित्य जैसे देशज विषयवस्तु पर हमारे अधुना काव्यशाास्त्री पाश्चात्य काव्य-निकषों को वरीयता ही नहीं अपितु सर्वप्रमुख्ता का स्थान देते हैं। इसी अकाव्यज्ञ मानसिकता का दुष्परिणाम है कि वे जो काव्य-सिद्धान्त निरूपित करते हैं उनसे भारतीय मनीषा ताल-मेल नहीं बैठा पाती। फलतः उनके द्वारा निरूपित काव्य-सिद्धान्तों से कविता के प्रति जन-अरुचि उत्पन्न हो रही है। यह अरुचि दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। काव्य-समालोचना में पाश्चात्य काव्य-कसौटियों का वर्चस्व स्थापित होने के बाद, विशेषकर सन् 1935 के आसपास से, देशज साहित्य के मूल्यांकन में देशज काव्य-निकषों को प्रायः परे धकेल दिया गया। देशज काव्य-निकषों को परे धकेले जाने की यह दुष्प्रवृत्ति 1950 के दशक से अधिक वाचाल हो गई। पाश्चात्य उत्साह (जोम) में भारतीय कविता/साहित्य को सर्वतोभद्र सार्वकल्याणक के बजाय पाश्चात्य आनन्दवादी स्वरूप में या कि मनोगत उच्छल भाव की प्रबल भावाभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार लिया गया; या उसे निष्क्रिय सामाजिक दर्पण या कि पार्टीलाइन का प्रचार-संसाधन मान लिया गया। इससे कविता/कवि/ समाज की दुर्गति तो होनी ही थी। वही प्रत्यक्ष हो भी रही है।
उपरि-इंगित दुष्प्रवृत्ति के फलस्वरूप हमारे बहुबहुलांश काव्य-समीक्षकों ने ऋग्वेद, श्वेताश्वतरोपनिषद, रामायणम्, महाभारत, गीता, अग्निपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण से लेकर आचार्य भरत, भामह, दण्डी, रुद्रट, भोज, मम्मट, क्षेमेन्द्र आदि-इत्यादि सभी को उपेक्षित मान लिया जबकि पाश्चात्य विद्वान् सुकरात के आदर्शवाद का निकष हो या होरेस का औचित्यवाद या लांजाइनस का उदात्तता-निकष या मेण्डलसन की शिवकारिता या कि अरस्तू, इलियट, मैथ्यू अर्नाल्ड, जानसन, लुकाच, ग्रामशी आदि के श्रेष्ठ काव्य-निकष --- इन सभी की काव्य-कसौटियों से कमतर श्रेष्ठ नहीं है प्राचीन भारतीय काव्य-समालोचनाशास्त्र। पाश्चात्य विद्वानों के जीवन-मूल्य, काव्य-मूल्य भारतीयों से विलग हैं। वे काव्य को कला मानते हैं जबकि भारतीय मनीषा काव्य को अक्षर-आराधना। ऐसी अक्षर-आराधना जिसमें काव्य को ‘स कविः काव्या पुरु रूपम् द्यौरिव पुष्यति..’(ऋग्वेद) से लेकर ‘छन्दांसि यज्ञाः...भूतम् भव्यम्...सृजते’ (श्वेताश्वतरोपनिषद), ‘महत् क्व’ (वाल्मीकि), ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया....’, ‘लोकधर्मिता’ (आ0 भरत), ‘सहित भाव साहित्यम्’, ‘साहित्य परिष्कारकः’ (भोज), ‘इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सर्वदा वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते’ (आचार्य दण्डी), या कि ‘प्रादुष्कृतमन्यथा’ (आ0 भामह), ‘शिवेतर क्षतए’, ‘व्यवहारविदे’ (आ0 मम्मट) और ‘कीरति भणिति भूति भल सोइ, सुरसरि सम सब कहँ हित होइ’ (तुलसीदास) सदृश श्रेष्ठ काव्य-निकषों का फलित माना गया। इस अन्तर को अनदेखा किए हुए हैं हमारे पश्चिमोन्मुखी काव्य-समीक्षक।
वास्तव में हम इसे सुखद संयोग मात्र नहीं अपितु आर्ष मनीषा का सुविचारित अवदान कह सकते हैं कि आदि-श्लोक के प्रथम उवाच से लेकर रामायणम् के अन्तिम चरण तक आदि-महाकवि ने भी इस दिशा में हमें काव्य-नय की एक सार्थक कुतुबनुमा प्रदान की है; कविकुलगुरु कालिदास ‘नयविद्’ की आशंसा करते हैं, भक्तकवि संत तुलसीदास ‘नयसाली’ की। तुलसीदास ‘सब कँह हित’(सार्वहित), ‘बर-बिचारु’ एवं ‘सुकवि’ का औ...र आ0 क्षेमेन्द्र 'औचित्य' का निकष भी देते हैं। ऐसे सभी काव्य-तत्त्व काव्य को नय-न्याय से मूलतया जोड़े/जोड़े रखने की सदिच्छा के परिचायक हैं।
वस्तुतः, नय/न्याय सदृश महत्त्वपूर्ण कसौटी काव्य ही नहीं अपितु सामान्य लोकयात्रा के सुप्रवर्तन हेतु भी यत्र-तत्र-सर्वत्र समुपयोगी है और सर्वथा समीचीन भी। इसी परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद से लेकर कालिदास, तुलसीदास तक नयविद्ता का निदेशन (पश्यन्ती में ही सही) भरपूर रूपायित करते हैं-- इन निदेशनों की पूर्ण उपेक्षा कर दी गई, की जा रही है। प..र..न्तु , क्या इन निदेशनों के अभाव में तमोनुबेध, तमसःपरस्तात, प्रादुष्कृतमन्यथा, शिवेतर की क्षति आदि सम्भव है ? जब ‘नायक’ ही ‘नय’ से मूलतः विलग नहीं, नायक का मूलाधार नय में ही विहित है, त..ब, नायक के ‘नाट्य/काव्य’ को नय-न्याय से विरहित किया जाना क्या विरोधाभासी नही है ?
तथ्यतः पाश्चात्य नव्य-समीक्षा के सम्प्रभाव में काव्य-जगत् में शाब्दिक संवेदना को या कि समाजशास्त्रीय काव्यज्ञों के सम्प्रभाव में वैश्विक दृष्टि के मर्म समग्र को या कि मार्क्सवाद के सम्प्रभाव में साम्राज्यवाद-विरोध, सामन्तवाद-विरोध या कि शोषण-उत्पीड़न के निरोध को आवश्यक बताने वाले परचम आज लहराए जा रहे हैं साहित्य-समालोचना में भी। प..र..न्तु , भारतीय काव्य-निकष के प्रमुख अवयव आज साहित्य-समालोचना के क्षितिज में प्रायः अनदेखे हैं; विशेषकर तब, ज..ब, प्रादुष्कृतमन्यथा...शिवेतरक्षतए...तमोनुबेध जैसे तत्त्व भारतीय काव्यशास्त्र के प्रमुख मानक हैं । क्यों ?
विदित हो कि राजा भोज के राज-काल तक जब तक भा + रतीय निकषों से आप्लावित रहा हमारा समाज (हमारा काव्य भी), तब तक कविता सर्वप्रिय थी और लोक-व्याप्त भी। तब तक सामान्य श्रमिक बुनकर भी कविता बुन सकता था औ...र उस काल तक भारत सोने की चिडि़या भी था। लेकिन बहुआयामी गिरावटों के दौर में भारतीय मानकों को धता बता दिया गया। फलतः कविता ही नहीं वरन् साहित्यिक, सामाजिक, आर्थिक आदि-इत्यादि सभी फलकों पर ‘धत्’ की दुःस्थिति उत्पन्न हो गई।
यतः कहना तो नहीं चाहिए लेकिन कहना ही होगा कि अंधे का नाम नयनसुख रख लेने से जैसे नयनसुख लभ्य नहीं, वैसे ही आधे-अधूरे सच का परचम लहराने से साहित्य का काम चलने वाला नहीं है। इससे व्यक्ति और समाज का भी सार्थक लाभ होने वाला नहीं है। ऐसे अधूरे सच से साहित्य/काव्य/समाज को अधोगति तो मिलनी ही है। ऐसी मनोदशा भारत की 900 वर्षों की गुलाम-मानसिकता का अवदान हो या हमारे कथित समालोचक साहित्यकारों के अधकचरे संज्ञान वाले ज्ञान (knowledge) का फलित-- उसे उचित और विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता।
तथ्य है कि ‘सभ्यों में सभ्य, परम सभ्य की लोकयात्रा के सुप्रवर्तन हेतु मशाल बन सकने की क्षमता वाले काव्य/साहित्य के सार्वकालिक रूप-स्वरूप को हम तभी रूपायित कर सकेंगे जब काव्य-समालोचना की आधारिक कसौटी हम काव्य-नयवाद को बनाएँ। संयोग से वैदिक वाङ्मय के युग से अद्यतन भारतीय मनीषा में कथ-अनकथ रूप में काव्य-नयवाद भरपूर विद्यमान है।
कहना ही होगा कि उपरि अंकित सर्वथा उपयोगी, सर्वदा प्रासंगिक, सार्वहिती, नयशील काव्य-कसौटियों को छोड़ कर भ्रान्तिपूर्ण पाश्चात्य काव्य-कसौटियों का अन्धानुकरण हमारे काव्य-जगत् को कहाँ तक पतित करेगा, भा + रतीय बौद्धिक इसका अनुमान कर सकते हैं। तथैव, सम्यक् परिमार्जन अपरिहार्य है जिसके लिए हमें काव्य-समालोचना को काव्य-नयवाद से जोड़ना ही होगा।
यदि हम कविता (काव्य) से समाज को समुचित मूल्यमान प्रदान कराना चाहें या/और उसी समानुपात में समाज से कविता को समुचित सम्मान प्रदान कराना चाहें तो प्रचलित काव्य-निकषों में परिवर्तन करना ही होगा और तदनुसार काव्य के उपरि-इंगित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए काव्य में नयवाद की अर्थात् काव्य में नय-न्याय के अंगभूतों की (सत्, ऋत, शिव, लोक-सुन्दरम् , नैतिकता, औचित्य, प्रमासम्मत न्याय की) प्रतिष्ठापना करनी ही होगी।
इस विषय को सम्यक्तः अनुशीलित करने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने 10 अध्यायों में ‘कविता का पश्यन्ती निकष: नयत्व’ नाम्नी कृति का प्रणयन किया है। कृति में प्रमुखतया वैदिक संचेतना से लेकर आदि-महाकवि वाल्मीकि, तुलसीदास एवं अन्यान्य भारतीय काव्यशास्त्रियों के अभिमत की विवेचना, काव्य-नयवाद बनाम भारतीयेतर काव्यशास्त्रियों के अभिमत की विवेचना, तथा काव्य-नयवाद बनाम समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि से सम्बन्धित विवेचना सविस्तार विवेचित हैं।
कृति ‘भारती पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, फैजाबाद (सम्पर्क दूरभाष: 09415048021) से प्रकाशित है।
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