मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन प्रणीत आलेख : पंचदश किश्त : महिला-हिंसा : कल, आज और कल

 महिला-हिंसा   : कलआज और कल

महिला-हिंसा: कल आज और कल। तद्विषयक समग्र विषयवस्तु वास्तव में प्रचेतस विमर्श की विषयवस्तु ही नहीं अपितु यह आज की प्रास्थिति के सापेक्ष एक मानवीय सरोकार भी है। ऐसे सरोकार से वस्तुनिष्ठ जुड़ाव हर बौद्धिक का, प्रत्युत हर समाजचेता प्रबुद्ध मानव का आवश्यक कर्त्तव्य है। परन्तु दुर्भाग्य से संदर्भगत विषयवस्तु के विभिन्न सन्दर्भों में अनेक विसंगतियाँ हैं। यथा -
किसी विधि-विधान में या कि किसी नारी-संगठन के चार्टर में परिभाषित नहीं है यह प्रत्यय। 16 दिसम्बर 2012 के निर्भया काण्ड के बाद नारी-रक्षा सम्बन्धी क्षणिक जोश-उफान के सम्बल से छोटेे-बड़े वक्तव्यों में बलबलाते दिखते हैं महिला-हिंसा-विरोधी नारे/वायदे/आश्वासन और न जाने क्या-क्या ; इसके पूर्व भी महिला के प्रति प्रायः किसी जघन्य काण्ड घटित होने के बाद जब-तब उफनते दिखे हैं ऐसे जोश। उनमें भी ‘महिला-हिंसा’ के विन्यास रूपायित नहीं किए गए अब तक। 6.6.1987 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ‘स्त्रीषु हिंसा हिंसा न भवति’ नाम्नी एक व्यंग्य शीर्षक के अन्तर्गत चर्चित नारीवादी लेखिका मृणाल पाण्डे के आलेख में भी ‘स्त्रीषु हिंसा’ के विन्यास परिभाषित नहीं हैं। ‘घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम’ में भी घरेलू हिंसा तो परिभाषित है किन्तु महिला-हिंसा नहीं। ‘घरेलू हिंसा’ से अधिक बड़े फलक का शब्द-बन्ध है ‘महिला-हिंसा’। हाँ ! सर्वोच्च न्यायालय ने एअर इण्डिया के एक वाद ‘विशाखा एवं अन्य’ के प्रकरण में इस विषय में कुछ इंगित किए थे। सर्वोच्च न्यायालय के संदर्भगत इंगित को प्रतीकार्थी मानें तो भी यौनिक अपराध   : छेड़छाड़, बलात्कार, तद्गत प्रयास सदृश अपराध ही रेखायित होते हैं प्रश्नगत परिप्रेक्ष्य में। ले-दे कर कतिपय यौनिक अपराध तक सीमित कर दिया जाता है ‘महिला-हिंसा’ को। वस्तुनिष्ठ अर्थों में ‘महिला-हिंसा’/‘स्त्री-हिंसा’ का विन्यास-परास चाहे जो भी हो, सामान्यतया आलोच्य शब्द-बन्ध में बलात्कार, छेड़छाड़, यौन-उत्पीड़न, घरेलू मारपीट, दहेज-हत्या, कन्याभ्रूण-हत्या, कन्याशिशु-हत्या, अपहरण, स्त्री-तस्करी, वेश्यावृत्ति के धन्धे में धकेले जाने के दुष्कर्म को ही आगणित किया जाता है। सती-प्रथा, बाल-विवाह या कि कथित पारिवारिक सम्मान-रक्षा में किए जाने वाले नारी-उत्पीड़न/हत्या सदृश सामाजिक अपराध के विरुद्ध शोर-शराबा कितना भी मचाया जाए, अधिकांश प्रकरणों में (जब तक प्रकरण हत्या का न हो) ऐसे अपराधों को संदर्भगत आपराधिक ग्रॉफ में समायोजित नहीं किया जाता। बालिका-अशिक्षा जैसे अपराध जो बालिका की गरिमा और अस्मिता को, उसके सुखद भविष्य की संभावना को ध्वस्त करते हैं--- उन्हें तो ‘अपराध’ माना ही नहीं जाता ! यह विडम्बना नहीं तो और क्या है ? 
वस्तुतः ‘महिला-हिंसा’ शब्द-बन्ध में ‘महिला’+ ‘हिंसा’ दो अवयव हैं। इनका अभिप्राय महिलाओं के प्रति की जाने वाली हिसा से है। हिंसा का शाब्दकोशीय अर्थ है अरिष्ट या हानि, उत्पात, सताने का कार्य, चोट पहुँचाना आदि। ‘हिंसा’ मौलिक विन्यास में वह दुर्भावना , कुचेष्टा या/और कदाचरण है जो दूसरे व्यक्ति की मानवीय चेतना और सृजनात्मक सम्भावना की अभिव्यक्ति एवं विकास को दमित करती है। यह कायिक, वाचिक और मानसिक-- तीन प्रकार की होती है। स्वभावतः हिंसा जीवन-विरोधी, अमानवीय एवं चेतना-विरोधी पाशविक आचरण है। तथैव, किसी महिला के प्रति किए जाने वाले सभी प्रकार के दुष्कर्म जो महिला को दैहिक, मानसिक, सामाजिक स्तर पर कष्टकारी हो या/और जो उसकी गरिमा/अस्मिता के लिए मारक हो-- ‘महिला-हिंसा’ के विन्यास में विन्यसित माने जा सकते हैं। एक न्यायिक की दृष्टि से ऐसा ही माना भी जाना चाहिए। अति व्यापक है स्त्री-हिंसा की परिधि। इस तरह इस विन्यास में केवल यौनिक अपराध ही नहीं अपितु सभी प्रकार के प्रत्यक्ष-परोक्ष दुष्कर्म जो स्त्री की गरिमा, अस्मिता, के लिए क्षतिकारक हों, ‘स्त्री-हिंसा’ के अन्तर्गत परिगणित किया ही जाना चाहिए। यहाँ ‘महिला-हिंसा’ के बजाय ‘स्त्री-हिंसा’ शब्द-बन्ध का प्रयोग जानबूझ कर किया जा रहा है इसलिए कि ‘महिला’ शब्द से अधिक गरिमावान् है ‘स्त्री’ शब्द। ‘महिला’, ‘माहिल’ सदृश शब्द मूल रूप में (लोक-प्रचलित आल्हा आदि लोककाव्यों में) आदरसूचक नहीं है। आर्ष ग्रन्थों में भी ‘स्त्री’ शब्द ही प्रयुक्त है। अच्छा होगा कि महिला-हिंसा के बजाय आलोच्य परिप्रेक्ष्य में स्त्री-हिंसा, स्त्री-अस्मिता की हिंसा, स्त्री-गरिमा की हिंसा को आगणित किया जाए।
औ..र, अब तक हम जिन्हें महिला (स्त्री) के प्रति अपराध गिनते आए हैं यदि उन्हें ही देखें तो भी दिखेगा कि स्थिति दिनोदिन दारुण होती जा रही है। आँकड़े बताते हैं कि 1991 में जहाँ बलात्कार 19793, अपहरण 12300, छेड़खानी 10283, यातना 15949, दहेज-हत्या 5157 इस तरह कुल 74093 मामले पुलिस अभिलेखों में अंकित हुए थे, वहीं नवीनतम सूचनानुसार वर्ष 2013 में बलात्कार 33707, अपहरण 51881, यातना 118866, मारपीट 70739, दहेज सम्बन्धी 18792 कुल 309546 मामले (वर्ष 1991 की तुलना में लगभग 400 प्रतिशत बढ़ोत्तरी से) अपघटित हो चुके हैं। अकेले बिहार प्रदेश में प्रति वर्ष औसतन 163200 लड़कियों की भ्रूण-हत्या की जा रही है। राजकीय आँकड़ों के अनुसार भारत में 75000 महिलाओं को प्रतिवर्ष वेश्यावृत्ति में धकेला जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘जेण्डर स्टडी ग्रुप’ के एक अध्ययन के अनुसार 90 % से अधिक छात्राओं को यौन-उत्पीड़न झेलना पड़ता है। राजकीय अभिलेखों के अनुसार प्रति घंटे एक महिला शारीरिक शोषण का शिकार होती है, प्रति 25 मिनट में एक छेड़छाड़ की घटना अपघटित होती है, प्रति 40 मिनट में एक महिला बलात्कार का शिकार होती है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो भी मान रहा है कि प्रति घंटा एक दुल्हन दहेज-हत्या की भेंट हो जाती है। प्रफुल्ल बिदवई सरीखे पत्रकारों की गणनानुसार प्रति 21 मिनट में बलात्कार की घटना घटित होती है। विश्व के 53 मेगानगरों में से एक दिल्ली में वर्ष 1953 की अपेक्षा वर्ष 2012 में 678% वृद्धि बलात्कार-प्रकरणों की हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के वर्ष 2000 के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में महिलाओं का यौन-शोषण 46%: प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है और महिला-तस्करी में 87.2% वृद्धि हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह बात हाल ही में प्रकट की जा चुकी है कि प्रति वर्ष 90,000 बच्चे गुम होते हैं जिनमें बहु-बहुसंख्यक अबोध लड़कियाँ होती है। 900 संगठित गिरोह संगठित रूप में बालिका-तस्करी का कार्य कर रहे हैं। एक गैरसरकारी सर्वे के अनुसार एक लाख बालिकाएँ प्रतिवर्ष वेश्याएँ बनाई जा रही हैं जिनमें 15% की आयु 15 वर्ष से कम है। सम्प्रति अकेले भारत में अनुमानतः 5 लाख महिलाओं से वेश्यावृत्ति कराई जा रही है। एक अन्य गैरसरकारी सर्वे के अनुसार हाल के कुछ वर्षों में मात्र चार महानगर---दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई, चेन्नई-- में 4 लाख लड़कियों को देह-व्यापार में धकेला जा चुका है। इसी प्रकार छेड़छाड़ और स्त्री के प्रति अन्य अपराधों की संख्या भी सरकारी आँकड़ों की कम से कम दो-गुनी तो है ही, इसलिए कि पुलिस द्वारा अधिकतर प्रकरणों में एफ0आई0आर0 लिखी नहीं जाती, वहीं बहुत से मामलों में पीडि़ता व उसके परिजनों द्वारा पुलिस में रपट लिखाई ही नहीं जाती। 16 नवम्बर 1984 के ‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित एक पूर्वसाक्षात्कृत साक्षात्कार में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने ‘महिला-उत्पीड़न क्यों ?’ सदृश प्रश्नों के सन्दर्भ में कहा था कि आत्मनिर्भर (धन-कमाऊ) हो जाने के बाद महिला पर अत्याचारों में कमी आ जाएगी परन्तु हाल के वर्षों के सर्वेक्षण बताते हैं कि नौकरीपेशा महिलाओं पर अत्याचार कम नहीं होते। नवीनतम आख्या के अनुसार 92% महिलाएँ नाइट शिफ्ट में काम करने से डरती हैं। अपने देश में इतनी भयावह है नारी-उत्पीड़न की स्थिति !
विश्व के अन्यान्य देशों में भी नारी-अवस्थिति कम भयावह नहीं है।
अन्तरराष्ट्रीय नवीनतम आख्या के अनुसार अमेरिकी सेना की 70% महिलाओं को यौन-उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है। अपने देश की सेना-पुलिस में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। पी0ए0सी0, पुलिस की ट्रेनिंग में प्रशिक्षु महिला कैडेटों के यौन-शोषण की घटना अखबारों की सुर्खियाँ बन चुकी हैं। अमेरिका में प्रति 18 मिनट पर एक औरत पीटी जाती है। पश्चिम में अति उन्नत कहे जाने वाले देशों में भी अनेक चर्चित काण्ड (यथा मोनिका लेविन्स्की, पाउला जोन्स, लिन्डा टैªप सदृश काण्ड) नारी-अस्मिता की अद्यतन दुर्गति बयान करने में सक्षम है। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रपट के अनुसार पाकिस्तान की हर दूसरी महिला हिंसा की शिकार होती है। ‘मलाला-प्रकरण’ प्रत्यक्ष है। यह दूसरी बात है कि तालिबानी हमले के बाद मलाला युसुफजई विश्व की दुलारी बन गई, उन्हें नोबल पुरस्कार भी मिला परन्तु कितनी मलालाओं को पुरस्कार मिल पाता है ? पुरस्कार तो दूर समुचित संरक्षा तक प्रदान नहीं की जा सकी है उन्हें-- ऐसे तथ्य कल्पना से परे नहीं है। ईरान में तालिबान की दरिन्दगी बढ़ने के बाद महिलाओं पर कहर टूट पड़ा है। बांग्ला देश में विगत 5 वर्ष में 10 गुना वृद्धि हुई है तेजाब-प्रकरण में। बांग्ला देश, भूटान आदि से भी भारी संख्या में महिलाओं की तस्करी करके भारत लाकर उनमें से 90% से अधिक से वेश्यावृत्ति कराई जा रही है। बांग्ला देश में वूमेन लायर एसो0 के सर्वेक्षण को मानें तो मानना होगा कि बांग्ला देश से प्रतिवर्ष 7000-10000 लड़कियाँ/महिलाएँ भारत और खाड़ी देशों में बेच दी जाती हैं जिनमें से अधिकांश से वेश्यावृत्ति कराई जाती है। नेपाल के समाजसेवी दुर्गा धीमरे के अनुसार प्रतिवर्ष 1.50 लाख नेपाली लड़कियाँ भारतीय वेश्यालयों में लाई जा रही हैं। इन विक्रीत/अपहृत महिलाओं को ही आगे चल कर महिला-तस्करी के लिए एजेन्ट भी बनाए जाने के उदाहरण पाए गए हैं।
सोवियत रूस में प्रति वर्ष 13000 रेप, 14000 महिला-हत्या के आँकड़ें सरकारी हैं। बीजिंग सम्मेलन के वर्षों बाद अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के खिलाड़ी जे0 सिम्पसन द्वारा पत्नी को मारने-पीटने की घटना चर्चित हुई थी। ‘द फारवर्डिंग जोन’ की लेखिका मीशा के अनुसार राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर की महिला (टेनिस खिलाड़ी) को उसके परिवार द्वारा मनी-मेकिंग मशीन के रूप में उपभुक्त किया जाता है। कोपेनहेगन सम्मेलन में सबसे खराब स्थिति में महिलाएँ पाई गईं।
महिला-साक्षरता सूडान में 28%, स्पेन में 28%, ऑस्ट्रिया में 25%, नेपाल में 35%, भारत में 39%, पाकिस्तान में 24% है। महिला रोजगार दक्षिण एशिया में मात्र 39% ही है। विश्व में कुल 15% महिलाएँ प्रशासनिक पदों पर हैं। 10% महिलाएँ विधायिकाओं में और मात्र 3% शीर्ष शासन पदों पर हैं। अपने देश भारत में तो राष्ट्रपति पद पर या प्रधानमंत्री पद पर महिलाएँ सुशोभित हो चुकी हैं। आज भी अनेक महिलाएँ राज्यपाल, मंत्री पदों पर आसीन हैं; तदपि यहाँ अभी अधिक महिलाएँ प्रशासनिक पदों पर काबिज नहीं हो पाई हैं। वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में अवस्थिति और दुःखद है। कोरिया में महिलाओं का वेतन 47% है। सोवियत रूस में भी महिलाओं को मात्र 60% वेतन दिया जा रहा है।
विश्व में प्रति 1000 में से 437 महिलाओं की मृत्यु गर्भावस्था में कुपोषण से हो रही है। लां सेंट सर्वे 2011 के अनुसार 30 वर्षों में 102 करोड़ भ्रूण-हत्याएँ की गई हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘एम्नियोसेंटेसिस’ के प्रचलन के पश्चात् इन भ्रूण-हत्याओं में 99% हत्याएँ कन्याभ्रूण की ही थीं। कुछ वर्षों पूर्व सम्पन्न थापसन रायटर फाउन्डेशन के सर्वे में महिलाओं की स्थिति के आकलन-क्रम में भारत 19वें पायदान पर था।
औ...र, देखें-
वर्ष 1951 में भारत में जहाँ प्रति 1000 पुरुषों पर 972 महिलाएँ थीं, 1991 की जनगणना में जहाँ यह औसत 929 था; वहीं, 2011 की जनगणना में प्रति हजार पुरुषों पर 914 महिलाएँ थीं जबकि इण्टरनेट के अनुसार यह संख्या 940 है। हरियाणा जैसे प्रदेश में यह संख्या बहुत कम मात्र 611 है। इस देश में कुछेक गाँव ऐसे भी हैं जहाँ विगत 50 वर्षों से कोई बारात नहीं आई अर्थात् वहाँ किसी बेटी को उत्पन्न होने ही नहीं दिया गया जिसका विवाह होता और बारात गाँव में आती अर्थात् वहाँ सारी की सारी बेटियाँ जन्म के पूर्व या जन्म के बाद मार डाली गईं ! 
और तो और, अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ0 रोनाल्ड एरिकसन या/और जापानी वैज्ञानिक रिहाची लिजूका ने एक्स-वाई (गल) गुणसूत्रों के परिवर्तन की जो तकनीक खोजी उसका दुरुपयोग करके अब तो बालिका-भ्रूण बनने के पूर्व ही भ्रूण को बालक-भ्रूण में परिवर्तित कर लिए जाने का तरीका भी अपना लिया गया है। कन्या-भ्रूण ही नहीं तो कन्या-भ्रूण की हत्या का प्रश्न ही समाप्त। नारी-अस्मिता पर एक और आघात।
आँकड़ों की सूची बहुत लम्बी है। औ..र, सच तो यह है कि इस सूची से भी उन अपराधों का सम्यक् आगणन नहीं हो सकता जो आज नारी-गरिमा, नारी-अस्मिता को विभंजित कर रहे हैं।
नारी-अपराधों की उपरिअंकित प्रतीकस्वरूपीय विस्तृत शृंखला और स्मृतियों में तैर रहे ‘दिवराला काण्ड’, ‘भँवरी देवी काण्ड’, ‘रूपम देओल बजाज काण्ड’, ‘प्रियदर्शिनी भट्ट काण्ड’, ‘निर्भया काण्ड’ और नवीनतमतः ‘सुनन्दा पुष्कर काण्ड’ और ऐसे सैकड़ों-हजारों चर्चित-अल्पचर्चित-अचर्चित काण्ड नारी के प्रति कथित पढ़े-लिखे समाज की विकृत दृष्टि को वाचाल करने में समर्थ हैं। ऐसी परिस्थिति में इन्दिरा नूयी, सायना नेहवाल, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स आदि चर्चित नामों को सितारे की तरह चमकाने की कलाबाजी के बावजूद उपरिअंकित विकृति के दर्द में कमी नहीं आती व..र..न् , उपरिअंकित विकृत अवस्थिति घटने के बजाय बढ़ रही हैं विशेषकर तब जबकि हम प्रति वर्ष 22 मई को ‘मदर्स डे’, प्रथम ‘राष्ट्रीय बालिका वर्ष 2014 से प्रति वर्ष 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ और प्रथम महिला वर्ष 1975 से प्रति वर्ष 8 मार्च को ‘अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाते हैं। दक्षेेस राष्ट्र भी ‘बालिका दिवस’ मनाते हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नया नारा भी दिया है। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र में महिलाओं पर विशेष सत्र आयोजित किया जा चुका है; 1995 में चीन में अन्तरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर महिला-संरक्षण से सम्बन्धित अनुशंसाओं का दस्तावेज प्रारूपित किया जा चुका है और अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन जिनेवा कांफ्रेंस, कोपेनहेगेन कांफ्रेंस आदि में महिला-अधिकार भारत समेत अन्तरराष्ट्रीय जगत् द्वारा स्वीकार किए जा चुके हैं। अपने देश में 1970 के दशक (संभवतः 1974) में नारीवादी संगठन अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ (AIPWA) आदि गतिशील हो चुके हैं; ‘सहेली’ जैसी अनेक महिला-संस्थाएँ गतिशील हैं; केन्द्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग भी संस्थापित हो चुके हैं।
बताते चलें कि 18वीं सदी के अन्तिम दशक में स्कैन्डेनेविया-देशों में आविर्भूत ‘वीमेन लिब’ आन्दोलन जो आरम्भ में स्त्रियों को पुरुषों के समान वेतन और मताधिकार के लिए आरम्भ हुआ था। न्यूयार्क के विशाल महिला-सम्मेलन में भी नारी-आन्दोलन का लक्ष्य मुख्यतः पुरुष-समान समता का अधिकार प्राप्त करने तक सीमित था। उसमें असमानता की समाप्ति, समान कार्य के लिए समान वेतन और नारी-उत्पीड़न की समाप्ति जैसे बिन्दु थे परन्तु कालान्तर में महिला-आन्दोलनों के अधिलक्ष्यों को ‘पुरुष-विरोधी’ स्वरूप देकर कथित रूप में नारीवाद का परचम बुलन्द किया जा रहा है ; इतना सब कुछ होने के बावजूद संदर्भगत तस्वीर सुखद नहीं है।
कहने का आशय यह नहीं कि नारी-जागरण के आन्दोलन, नारीवाद या नारीवादी संगठन निरर्थक हैं या उनके द्वारा नारी-हिंसा के प्रक्षेत्र में कोई कार्य नहीं किया जा सका है। निस्संदेह नारी-संगठनों ने भँवरी देवी काण्ड से लेकर रूपम देओल प्रकरण या/और गर्भ-निरोधक दवा-प्रकरण तक नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध अपनी सार्थक आवाज बुलन्द की है और नारी-उत्पीड़न के विरोध में जन-जागृति को प्रांजल किया है। अत्युक्ति नहीं कि राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय नारी-जागृति के फलस्वरूप विधि-विधान में नारी-हितरक्षा सम्बन्धी अनेकानेक प्रावधान समाहित किए गए। स्वातंत्र्योत्तर 17 नारी-संरक्षा विषयक भारतीय विधायन को राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय नारी-जागरण के लिए अवदान माना जा सकता है, त..द..पि इतना तो कहना ही होगा कि आलोच्य फलक पर कल और आज की बदरंग तस्वीर देखने से लगता है कि आने वाले निकटवर्ती कल में भी आज के नारी-मुक्ति आन्दोलन नारी-पक्ष में कुछ ‘दीर्घकालिक सार्थक’ कर पाने में सफल सिद्ध नहीं होंगे जब तक उनकी रीति-नीति में आमूल-चूल सकारात्मक परिवर्तन न किया जाए इसलिए कि हमारे देश भारत में नारी-आन्दोलनों की दिशा उचित अक्षांशों में संचालित नहीं है। नारी-मुक्ति आन्दोलन को ‘पुरुष-विरोध’ का रूप दे दिया गया है, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। इस तरह पुरुष-विरोध तक सीमित रहने वाली दृष्टि से नारी का वस्तुनिष्ठ भला साधित नहीं किया जा सकेगा।
बताना ही होगा कि हिंसा, उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार आदि से आग्रस्त स्त्रियों की सामाजिक दुःस्थिति को संज्ञान में लेते हुए इसके सुधार और महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा, उत्पीड़न, शोषण आदि के विरुद्ध सर्वप्रथम स्वर बुलन्द करने वाले ‘जन’ पुरुष ही थे। 1790 में ‘द एडमीशन ऑफ वीमेन टु फुल सिटीजनशिप’ और 1792 में ‘ए विन्डीकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वीमेन’ लिख कर समाज, शिक्षा, व्यवसाय आदि में समानता की माँग करने वाले लेखक पुरुष ही थे। स्त्री-स्वातन्त्र्य पर बल देने वाले ‘द सब्जेक्शन ऑफ वूमेन’ के लेखक जॉन स्टुअर्ट मिल या आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व सन् 1818 में पुस्तक ‘स्त्री-शिक्षा विधायक’ लिख कर नारी-शिक्षा पर बल देने वाले गौरमोहन विद्यालंकार, या सती प्रथा निरोधक आन्दोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय या/और उपरिअंकित नारी-हितसंरक्षण के भारतीय विधि-विधान के प्रणेतागण या/और डम्बरओक्स चार्टर में नारी-हितसंरक्षण को प्रावधानित कराने वाले प्रबुद्धजन--- सभी पुरुष ही थे। नारी-उत्पीड़न का विरोध करने वाले प्रेमचन्द हों या मैथिलीशरण गुप्त प्रभृति कवि, नारी-अधिकारों के समर्थक जैनेन्द्र और/या नारी के सामाजिक उत्थान के हामीकार स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे समाज-सुधारक और/या फिल्मकार महेश भट्ट या/और डॉ0 लोहिया, महात्मा गाँधी प्रभृति राजनेता--- ऐसे सभी सुचित्त चिन्तक ‘पुरुष संवर्ग’ से ही आते हैं। डॉ0 लोहिया तो ‘नारी’ के इतने बड़े हमदर्द थे कि वे नारियों को एक स्वतंत्र ‘शोषित वर्ग’ मानने की वकालत करते थे। इस तरह नारी-आन्दोलन के नाम पर पुरुष संवर्ग को निशाने पर लेने की कोशिश या समूचे पुरुष समुदाय से छत्तीस (3 6) का रिश्ता बना लेने का उपक्रम नारी-समाज का कल्याण नहीं कर सकता और न ही उससे नारियों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध में कोई गुणात्मक परिमाणात्मक कमी ही आएगी अपितु महिला-हिंसा में पुरुष द्वारा नारी को अपना शत्रु मान प्रतिशोधात्मक कार्यवाही करने के फलस्वरूप भी वृद्धि की आशंका ही बलवती होगी। यह मानना निम्नांकित विवेचना से समीचीन इसलिए भी है कि नारी सम्बन्धी अनेक अपराधों के लिए अकेले पुरुष वर्ग दायित्ववान् नहीं है। इस तरह कथित नारीवादियों की सोच सही नहीं है। इस सन्दर्भ में ‘राष्ट्रीय सहारा’ के प्रखर पत्रकार विभांशु दिव्याल का यह कथन न्यायोचित है कि “नारी-चेतना की एक विडम्बनापूर्ण धारा बह रही है जिसमें उसके अधिकार और उसके कल्याण की प्रतिष्ठा सीधे-सीधे पुरुष के विरोध में की गई है......... दरअसल स्त्री और पुरुष को एक पूरक एकक के रूप में देखने पर अपराधों की प्रवृत्ति का कहीं बेहतर विश्लेषण किया जा सकता है ”(देखें राष्ट्रीय सहारा, हस्तक्षेप, 4 मार्च 1995)। प्रस्तुत आलेख का विषय नारी-मुक्ति आन्दोलन या नारीवादी संगठन की आलोचना-प्रत्यालोचना नहीं है, अतएव, इस विषय पर फिर कभी सही। परन्तु आलोच्य प्रसंग में ख्यातनाम स्तम्भकार मधु यादव के इस मन्तव्य से सहमति जतानी ही होगी कि “ स्त्री-मुक्ति का मानदण्ड.........किससे मुक्ति, कैसी मुक्ति, किन अर्थों में मुक्ति--- इन बिन्दुओं पर सोचना पड़ेेगा।” निष्कर्षतः श्री दिव्याल के इन शब्दों को भी मानना होगा कि “दरअसल स्त्री-पुरुष को एक संयुक्त इकाई न मान कर अलग-अलग इकाई में विभाजित करना सामाजिक विचलन है। क्रूर, अभद्र, अविकसित, जड़, कुन्द समाज में हर वह व्यक्ति उत्पीड़न का शिकार होता है जो कमजोर होता है। प्राकृतिक देह-रचना के आधार पर उत्पीड़न की प्रकृति बदल जाती है।” यह तर्क अनुचित नहीं है इसलिए कि रावण ने सीता-हरण किया था तो विभीषण को भी भरी सभा में लात मारी थी, हनुमान की पूँछ जलाने का आदेश भी दिया था, कुबेर से लंका और पुष्पक विमान भी छीना था। इसी प्रकार कंस ने देवकी के साथ वसुदेव को भी कारागार में निरुद्ध किया था; कृष्ण को मारने के लिए भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी उसने। इसी तरह दुर्योधन ने द्रौपदी का चीर-हरण आदेशित किया था; उसके पूर्व लाक्षागृह में पाँचों पाण्डवों को भस्म करने का षड्यन्त्र भी कारित किया था उसने और उसके भी पूर्व भीम को मारने का अथक प्रयास कर चुका था वह। प्रकट है कि तमस्-प्रकृति के पुरुष अपराध करेंगे अवश्य नारी के प्रति भी और शेष पुरुषों के प्रति भी। आवश्यकता तमस् प्रकृति के समुचित नियन्त्रण की है। तदनुसार, महिला-हिंसा कल और आज के परिप्रेक्ष्य में नारी-पुरुष को एक एकक के रूप में देखा जाना ही श्रेयस्कर होगा। मलेशियाई कहावत भी है कि ‘एक मिले-जुले जीवन-लक्ष्य के बिना स्त्री-पुरुष आखीर तक अपूर्ण रहते हैं।’ इस कहावत से भी सीख लेनी ही चाहिए। 
पुनः नारी के प्रति अपराध के संदर्भगत धरातल पर लौटें।
कन्फ्यूशियस का कहना था कि औरत के आँसू भूचाल हैं, उसका रोना बीमारी और उसकी चुप्पी प्रलय है। महात्मा गाँधी भी ‘स्त्री को अहिंसा की सजीव प्रतिमा’ कहते थे। ऐसी अहिंसा-प्रतिमा: नारी के प्रति हिंसा, उत्पीड़न (यूँ भी अन्याय/अत्याचार/उत्पीड़न हिंसा किसी के भी प्रति हो, उसे निन्दनीय ही माना जाना चाहिए) ! निश्चय ही यदि महिलाओं के प्रति प्रश्नगत हिंसा-उत्पीड़न आदि को रोका न गया तो कन्फ्यूशियस जिस प्रलय का इंगित करते हैं वह भयावह स्वरूप में साक्षात् हो उठेगी।
औ..र उस दशा में जब अहिंसा की प्रतिमा स्वयं नारी के प्रति भयावह स्वरूप में उत्पीड़न-हिंसा कारित किया जाए (जिसका आतंककारी प्रतीकार्थी स्वरूप उपरिअंकित आँकड़ों से मुखर होता है)-- त..ब सुनिश्चित है कि नारी के प्रति किए जाने वाले संदर्भगत अपराध को वर्तमान में ‘गम्भीर समस्या’ मानना होगा। सैद्धान्तिक क्षितिज पर नारी के प्रति हिंसा वाली समस्या गम्भीर न होती तो 66वें गणतंत्र की पूर्वसंध्या पर अपने भाषण में हमारे राष्ट्रपति नारी-हत्या को भयावह क्यों बताते और क्यों भारतीय प्रधानमंत्री, अमेरिकी राष्ट्रपति के समक्ष बेटियों की पढ़ाई, संरक्षा सम्बन्धी समस्याओं का उल्लेख करते ? 
ध्यातव्य है कि अधुना समाजशास्त्रीगण फुल्लर एवं मेयर्स, होर्टन एवं नेस्ले, मर्टन एवं निस्वेत ग्रीन, राव एवं सेल्जनिक के अनुसार भी जब मानवीय सम्बन्धों की चुनौती की स्थिति प्रत्यक्ष होने लगे या/और उससे बहुत से लोग कुप्रभावित होने लगें या/और समाज के बहुसंख्यक उसे नैतिकतया गलत समझने लगें तो उसे ‘सामाजिक समस्या’ ही माना जाता है। इन प्रतिमानों से प्रसंगित आँकड़े भी नारी के प्रति किए गए अपराधों को ‘सामाजिक अपराध’ की संज्ञा दिलाने में सक्षम है। अतएव, आवश्यक है कि नारी-हिंसा सम्बन्धी भयावहता को समझा जाए और तदनुसार इस समस्या के हल के लिए समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार गुणात्मक और गणनात्मक दोनों प्रारूपों से समुचित आकलन करते हुए समाजमिति आदि के आधार पर तद्गत निदान/निराकरण आदि की तलाश की जाए।
इस दृष्टि से समाजशास्त्रीय स्वरूप में देखना होगा कि प्रसंगित समस्या किस रूप-स्वरूप की है ? उसके कारक-कारण क्या-क्या हैं ? बिना सम्यक् निदान  के रोग का समुचित उपचार संभव नहीं होगा।
तत्क्रम में जब हम प्रश्नगत समस्या के रूप-स्वरूप की सम्मादिट्ठि पड़ताल करतें हैं तो स्पष्ट होता है कि स्त्री के प्रति किए जाने वाले अपराधों के विभिन्न अपररूप और उनके कारक/कारण रूप-स्वरूप निम्नवत् हैं- 

(1) प्राकृतिक उत्तेजनागत किए गए अपराध 
महिला-हिंसा से सम्बन्धित बहुत बड़ी संख्या के सामाजिक अपराध: छेड़खानी, यौनांगों से छेड़छाड़, एकल बलात्कार सदृश अपराध इसी श्रेणी के अपराध हैं। प्रायः ऐसे कामुक सुख (उत्तेजना सुख) के सामाजिक अपराध का बहुलांश गणना में ही नहीं आ पाता इसलिए कि इनकी शिकायतें प्रायः अंकित नहीं कराई जातीं और ऐसे कामुक अपराधी के यौन अपराध/अत्याचार को बालिका (स्त्री भी) मन-मसोस कर सह लेती है। 
तथ्यतः विपरीतलिंगी जीव में यौनाकर्षण प्रकृतिगत होता है परन्तु सार्वभौमिक सत्य है कि सभ्यता के पायदान पर चढ़ने के समय से ही मानव ने आश्रमवासी अध्ययनशील प्रबुद्ध माणव बनने के पूर्व कथित प्राकृतिक प्रवाह के विरुद्ध जाकर प्रकृति को भी और स्वयं को भी ‘सभ्यता’ का पाठ पढ़ाया है। सभ्यता अर्थात् सभा/समाज में जाने की योग्यता का भाव अर्थात् नितान्त प्राकृतिक होने के बजाय सामाजिक बनने और सामूहिक अभिकर्म करने की योग्यता। ऐसी योग्यता के अर्जन से ही ‘जंगली मानव’ पहले अर्द्धसभ्य फिर सभ्य और फिर प्रबुद्ध बन सका है। त..ब, प्राकृतिक यौनाकर्षण की दुहाई देकर आधी आबादी को वैयक्तिक या सामूहिक रूप से कष्टकर या/और अप्रीतिकर दशा में डालने का उपक्रम ‘प्रबुद्ध मानव’ स्वीकार्य नहीं मान सकता। परन्तु प्राकृतिक दुर्गुण उपरिअंकित प्रकृति-नियंत्रण की योग्यता के अर्जन से, तद्गत संस्कार-अर्जन से अर्थात् ‘मन-बुद्धि के समुचित संस्कारीकरण’ से ही नियंत्रित हो सकते हैं अतएव, प्रश्नगत दुर्गुणों को निराकृत/नियंत्रित करने के लिए ‘समुचित संस्कारों’ का उद्बोध वांछनीय होगा। यहाँ यह कहने की आवश्यकता संभवतः नहीं है कि संस्कारों का उद्बोध बालक में बचपन मंे या कि किशोरावस्था और तरुणावस्था में समुचित ढंग से प्रक्षेपित किए जा सकते हैं। बचपन और किशोरावस्था में सत्संस्कार जो मन-बुद्धि में बैठा दिए जाते हैं वे अधिक स्थायी होते हैं। मानव-मन का प्रकृतिगत बहाव (रुझान) प्रायः नीचे (नैतिकतया गिरावट) की ओर और येन-केन प्रकारेण स्वयं के लिए भौतिक/ऐन्द्रिक सुख-प्राप्ति करने हेतु यत्नशील होता है। अतएव, प्रश्नगत समस्या के स्थायी निराकरण के लिए मानव के मन-बुद्धि का सतत संस्कारीकरण किया जाना आवश्यक होगा जो समुचित शिक्षा-प्रदान से ही सम्भव है। 
और, संस्कार किस रूप-स्वरूप के हों, इस विषय में मानना होगा कि पाश्चात्य भोगवादी संस्कारों की अपेक्षा इस विषय में भारतीय संस्कार-- ‘मातृवत् परदारेषु’, ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता’ तथा ‘विद्या समस्ताः देवि तव भेदाः स्त्रियाः समस्ता सकला जगत्सु’ सदृश भावबोध जमा देने होंगे बालक, किशोर, तरुण, युवा के मन-बुद्धि में। ‘मातृवत् परदारेषु’ का भाव-बोध आवश्यक है इसलिए भी कि भगिनीवत् सम्बन्धों में यौनाकर्षण के उदाहरण अनेकशः उदाहृत होते आए हैं परन्तु मातृवत् सम्बन्धों में यौनाकर्षण (फ्रायड मानें तो मानें) भारतीय समाज में दृष्टिगम्य नहीं हैं, अपवादस्वरूप कोई हो तो उसकी बात दूसरी है।
बलात्कार सदृश जघन्य अपराधों के क्रम में ध्यान रखना होगा कि प्रायः तमस् प्रकृति के लोग ही बलात्कार करते हैं। इस्रायली शोधकर्त्ता डॉ0 मेनचिआम आमिर के अनुसार बलात्कारी प्रायः समाज के निचले स्तर के अपराधी वर्ग के लोग होते हैं। ऐसे लोगों में कम से कम 50: किसी अन्य अपराध में पहले भी जेल-यात्रा कर चुके होते हैं। कैलिफोर्निया हिप्नोथिरैपी इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया की मनोचिकित्सक डॉ0 सीमा भाटिया भी डॉ0 आमिर के निष्कर्षों से सहमत दिखती हैं। वे ‘रेप की मानसिकता’ सम्बन्धी एक आलेख में लड़कियों-महिलाओं की सुरक्षा हेतु उपाय बताते हुए लिखती हैं जिस तरह चोरी न हो इसके लिए हम ताला लगा कर घर सुरक्षित करते हैं उसी तरह अक्लमंदी इसी में है कि कुछ सावधानी रख कर हम स्वयं को सुरक्षित करें। सावधानियों के नाम पर वे लिखती हैं -   “ घर पर अकेले में इलेक्ट्रीशियन, मिस्त्री आदि को न आने दें, अज्ञात व्यक्ति को न लिफ्ट दें, न लें, रात में अकेले घर से बाहर न जाएँ--- कार चलाने से पहले पिछली सीट देख लें..... ” आदि-आदि। लड़कियों को मार्शल आर्ट की शिक्षा देने की पक्षधर डॉ0 सीमा भाटिया भी हैं। निस्संदेह डॉ0 भाटिया के सुरक्षा-उपाय एक सीमा तक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। परन्तु उन उपायों से भी बढ़ कर कारगर हो सकता है यदि डॉ0 आमिर के शोध-निष्कर्षों के आधार पर तमस् प्रकृति वाले लोगों को, प्रत्युत व्यापक स्तर पर समाज मंे तमस् प्रकृति को नियंत्रित किया जाए। तथैव, अपराधी को भयावह दण्ड देकर तमस्शील उत्तेजना के नियंत्रण,और भोगवाद की ललक का निर्मूलन और उससे बढ़ कर समाज में सत्त्वशील मनोवृत्ति के प्रस्तार एवं तद्गतशिक्षा आदि के प्रयास अपेक्षित हैं।
जहाँ तक कठोरतम दण्ड का प्रश्न है, कथित आधुनिक दृष्टि वाले मानवाधिकार के नाम पर कठोर दण्ड के विरुद्ध नाक-भौं चढ़ाते हैं परन्तु मानवाधिकार की दलील देने से पहले हर निस्पृह प्रबुद्ध को सोचना चाहिए कि जिनके प्रति अपराध कारित हुआ उनके भी मानवाधिकार होते हैं जिनका हनन करके ही अपराधी अपराध कारित करता है और उत्पीडि़त व्यक्ति के अतिरिक्त राज्य और समाज के विरुद्ध भी अपराध कारित करता है अपराधी प्रश्नगत अपराध के साथ ही। त..ब, कथित मानवाधिकार के नाम पर अपराधी पर दया क्यों ? कहते हैं कि सजा के बल पर या डण्डे के जोर से अपराध-नियंत्रण आधुनिक दृष्टि से ‘बीमार समाज’ का लक्षण होता है। इसके बावजूद भारत जैसे देश में जहाँ वर्तमान में साक्षरता-दर अब भी बहुत कम है और उच्च शिक्षा प्राप्त प्रबुद्ध जन का प्रतिशत अति अत्यल्प है और जहाँ लगभग हजार वर्ष दासता का जुआ नागरिकों के कंधों पर रहा है और वे व्यवहार्यतः बिना दण्ड-विधान के उचित कार्य-संचालन न करने के अभ्यस्त हो गए हैं-- वहाँ कठोर दण्ड-विधान अपरिहार्य है।
इसी क्रम में उल्लेख्य है कि अपराधशास्त्र के अधुना विशेषज्ञ और भारतीय दण्ड-विधान के प्राचीन मनीषी दोनों संवर्ग के नैयायिक अपराधी को सार्वजनिक स्थल पर कठोर दण्ड देने के पक्षधर रहे हैं, वहीं देखा जा सकता है कि उन देशों में जहाँ बलात्कार जैसे अपराधों के लिए कठोरतम दण्ड का विधान है वहाँ ‘बलात्कार के काण्ड अत्यल्प होते हैं। इससे सिद्ध है कि बलात्कारी को कठोरतम दण्ड दिया जाना इस दिशा में कारगर सिद्ध होगा।
अग्रेतर ,बच्चियों को ,किशोरियों को पुरुष की वासनापरक दृष्टि को पहचानने की शिक्षा, ऐसे कथित आत्मीय पुरुष से एक दूरी बना कर रहने की शिक्षा और उन्हें अन्याय का प्रतिकार करने वाली वीर नारियों की सत्साहसी शिक्षा देकर भी ऐसे अपराध लगभग तिरोहित किए जा सकते हैं। छेड़छाड़, यौनांगों से छेड़खानी, बलात्कार आदि प्रकरणों में ‘सजा’ के कठोरतम बना देने से भी ऐसे अपराध करने से पूर्व सामान्य अपराधी हो या पेशेवर उसे दस बार सोचना पड़ेगा शर्त यह है कि सजा त्वरित न्याय से प्रदान की जाए।
अतिरक्ततः संदर्भगत श्रेणी के अपराध रोकने की दशा में उपयोगी हो सकता है यदि बचपन से ही बालिका को मार्शल आटर््स जूडो-कराटे आदि की ट्रेनिंग दे दी जाए। यह ट्रेनिंग नगर, महानगर से लेकर गाँव-गाँव तक कैम्प लगा कर दी जा सकती है जिससे विद्यालयों में पढ़ने वाली बालिका-किशोरियों के साथ-साथ विद्यालय न जाने वाली बालिकाएँ-किशोरियाँ भी लाभान्वित हो सकती हैं। मार्शल आर्ट्स से भिज्ञ बालिकाएँ छेड़छाड़ आदि से अपनी रक्षा करने में समर्थ होंगी। सामान्य और छोटे-मोटे गुण्डे तब ऐसी बालिका-किशोरी से छेड़छाड़, बलात्कार करने का साहस भी नहीं जुटा सकेंगे। यही किशोरी जब बड़ी होगी तब भी वह एक सीमा तक अपनी रक्षा में स्वयं समर्थ होगी।

(2) प्रातिशोधिक अपराध
सामूहिक बलात्कार, स्त्री को निवर्सन कर गाँव में घुमाना जैसे अपराध प्रायः प्रतिशोध-वशात् कारित किए जाते हैं जिनके लिए अपराधी अपराध से पूर्व योजना बनाते हैं। ऐसे अपराध एकल/वैयक्तिक के बजाय सामूहिक स्वरूप में अंजाम दिए जाते रहे हैं। ऐसे अपराधों के निवारण के लिए पुलिस-प्रशासन और न्याय-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने के साथ गाँव-नगर में ऐसी व्यवस्था किया जाना आवश्यक है कि गाँव-नगर में कोई वैमनस्यमूलक समस्या भयंकर न होने पाए। ऐसे अपराध बहुलांशतया प्रतिद्वन्द्वी का प्रतिरोध दबाने के लिए, उसके मान-सम्मान को ठेस पहुँचाने, उसके आत्मसम्मान का मर्दन करने के लिए कारित होते हैं इसलिए कि हमारे समाज में ‘स्त्री’ को ‘घर की इज्जत/मर्यादा’ कहा जाता है।
सामूहिक बलात्कार, नारी-निवर्सन या/और नारी-उत्पीड़न के हर प्रकरण के लिए यदि कठोरतम दण्ड प्रावधानित कर दिया जाए, इतना कठोर कि अपराधी अपराध कारित करना तो क्या, अपराध की योजना बनाने तक से तौबा कर ले तो इससे भी ऐसे अपराधों में कमी आएगी। 

(3) पारिवारिक महिला-अपराध
महिला के प्रति होने वाले पारम्परिक पारिवारिक अपराध घरेलू हिंसा, दहेज-हत्या, वधू-दहन आदि के नाम से जाने जाते हैं। ये अपराध वस्तुतः पारिवारिक आधार पर अपघटित होते हैं जिनमें पति के साथ-साथ वधू के ससुराल पक्ष के अन्यान्य सम्बन्धी यथा, सास, ससुर, ननद, जिठानी, देवरानी, देवर, जेठ आदि सहभागी होते हैं। वस्तुतः बिना ससुराल पक्ष की महिलाओं के सहयोग के ऐसे अपराध कारित हो ही नहीं सकते। प्रत्युत ऐसे मामलों में प्रायः ‘सास’ ही की भूमिका अगुआ की होती है। इस परिप्रेक्ष्य में प्रख्यात पत्रकार विभांशु दिव्याल का यह प्रश्न सारवान् है कि  “ किस माँ को पचता है कि नई बहू उसके पुत्र पर कब्जा कर ले ? ” निःसन्देह, ऐसे अपराधों के लिए केवल ‘पुरुष’ को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता।
दहेज वास्तव में परम्परागत सामाजिक अपराध है जिसके फलस्वरूप ससुराल में वधू की ही हत्या नहीं की जाती वरन् कोख में पलती पुत्री (कन्या-भ्रूण) को भी मार दिया जाता है। ऐसी दशा में दहेज लेने-देने के विरुद्ध सामाजिक जागृति और दहेज-हत्या के अपराधियों को भयावह दण्ड दिया जाना वांछनीय है। तथ्यतया दहेज-विरोधी अधिनियम बना दिए जाने के बावजूद इस विषय में पुलिस-प्रशासन एवं समाज द्वारा लीपापोती ही अधिक की जाती है। हिन्दू-मुसलमान किसी का भी विवाह हो, प्रतिवर्ष खरबों रुपए दहेज के नाम पर लिए-दिए जाते हैं जिसकी सूचना पुलिस-प्रशासन और समाज को बखूबी रहती है (और यदि समुचित सूचना नहीं है तो एल0आई0यू0 आदि के माध्यम से तद्गत सूचना प्राप्त की जा सकती है), परन्तु ऐसे प्रकरणों में कोई कार्यवाही नहीं की जाती। काश ! दहेज के लेन-देन पर समुचित अंकुश लगाया जा सके तो दहेज कम लाने पर घरेलू-हिंसा, दहेज हत्या और वधू-दहन जैसे अपराध रोके जा सकेंगे। एतदर्थ प्रशासन, समाज और नारीवादी संगठनों को दहेज-विरोधी सामाजिक आन्दोलन के लिए सचेष्ट होना होगा।
महिला के प्रति होने वाले इसी कोटि के अन्य सामाजिक अपराध हैं- सतीप्रथा, नवजात कन्या की हत्या, कन्याभू्रण-हत्या और मान-हत्या (अर्थात् पारिवारिक मान-सम्मान के नाम पर की जाने वाली हत्या विशेषकर अन्तरजातीय/अन्तरधार्मिक विवाह-प्रकरण में, जाति-समाज, बिरादरी और खाप पंचायत के निर्देश/सहयोग से की जाने वाली हत्या) आदि।
सती-प्रथा से सम्बन्धित हत्या तो अब बहुत कम हो गई है। दिवराला काण्ड के पश्चात् सती के नाम पर हत्या के काण्ड अपवादस्वरूप ही सुनने को मिले परन्तु नवजात कन्या की हत्या अति की सीमा तक आज भी देश के कुछ राज्यों में प्रचलित है जबकि कन्याभ्रूण-हत्या तो समाज के अधिकांश वर्ग में प्रचलित है, चाहे वह शिक्षित है या अशिक्षित, गाँव का निवासी है या शहर का। राजस्थान का निवासी है या हरियाणा का, या कहीं और का।
इसी प्रकार खाप पंचायतें और बिरादरी के निर्देश/सहयोग से की जाने वाली स्त्री-हत्या (जिनमें उसके परिवारीजन स्वयं अपनी पुत्री की हत्या सरेआम कर देते हैं) वह भी पारिवारिक मान/बिरादरी मान-सम्मान के नाम पर। ऐसे अनेक प्रकरण हाल के वर्षों में बहुत बार प्रत्यक्ष हो चुके हैं। ऐसी हत्याओं को निर्मूल तभी किया जा सकता है जब कथित बिरादरी, पंचायत आदि को अंकुशित किया जाए और अन्तरजातीय/अन्तरधार्मिक विवाह सम्पन्न होने की दशा में पुलिस-प्रशासन तत्काल विशेष सतर्कता बरतें। समाज से जाति के ऊँचा-नीचा होने का भाव मिटा कर भी ऐसी हत्याओं को निराकृत किया जा सकता है। इस हेतु भी सामाजिक जागृति आवश्यक है। मान-हत्या प्रकरण में भी भयकारी दण्ड न केवल हत्याकर्त्ता को अपितु सम्बन्धित खाप-सदस्यों-बिरादरी को भी दिया जाना वांछनीय होगा। बिना समुचित ‘डर’ के ऐसे अपराध रुकने वाले नहीं हैं।
जहाँ तक नवजात कन्या की हत्या, कन्याभ्रूण-हत्या का प्रश्न है। इस विषय में स्थिति निस्संदेह खतरे के निशान को पार कर रही है जिसका यही प्रमाण पर्याप्त है कि 1951 में जहाँ प्रति हजार पुरुषों पर 970 महिलाएँ थीं वहीं सम्प्रति में यह संख्या 840 हो गई है जबकि कनाडा में यह संख्या 1070 है। इस आलेख में उपरिअंकित अन्य आँकड़े भी कन्याभ्रूण-हत्या के भयावह होने को प्रमाणित करने में सक्षम हैं। इस विषय में एम्नियोसिन्टेसिस और एरिकसन तकनीक सदृश तकनीकों पर समुचित रोक लगाने के साथ तत्सम्बन्धित डॉक्टर, अल्ट्रासाउन्ड क्लीनिक, नर्सिंग होम आदि को भी प्रतिबन्धित किया जाना और उन्हें भी यथावश्यकता कठोर दण्ड दिया जाना वांछनीय होगा। कन्या-भ्रूण हत्या से भी आगे बढ़ कर यदि समाज में डॉ0 एरिकसन और डॉ0 रिहाची लीजूका द्वारा प्रणीत नवीनतम वैज्ञानिक प्रविधि के प्रयोग से कन्या-भ्रूण बनने ही नहीं दिया जाएगा, तब तो स्थिति और ही भयावह हो जाएगी। तथ्यतः नवजात कन्याशिशु की हत्या और कन्याभ्रूण-हत्या बालिकाओं की उनके विवाह में आने वाली अड़चनों, बालिकाओं की उनके विवाह से पूर्व सामाजिक और विवाह के बाद संभावित पारिवारिक असुरक्षा की आशंका के भयवश की जाती है। इसके अतिरिक्त पुत्र न होने की दशा में अथवा पुत्र के ‘नालायक’ निकल जाने की अवस्थिति में पुत्री के माता-पिता को वृद्धावस्था में दामाद से कोई आर्थिक/सामाजिक सुरक्षा का सहारा मिलने की सामाजिक परम्परा का न होना भी पुत्रैष्णा को बढ़ावा देता है और कन्या-सन्तान के प्रति माता-पिता में वितृष्णा उत्पन्न करता है जो अंततः नवजात कन्या की हत्या या कन्याभ्रूण-हत्या के लिए न केवल कन्या के पिता को प्रेरित करता है वरन् अनेक बार कन्या की माँ, दादी आदि भी चाहे-अनचाहे इसके लिए सहमत होने को प्रेरित हो जाती हैं। तथैव, यदि राज्य और समाज बालिका/महिला की घर के अन्दर और घर के बाहर की सुरक्षा आश्वस्त कर दे तथा समाज कन्या को भी यह अधिकार दे कि वह अपने वृद्ध, निस्सहाय माता-पिता की देखरेख कर सके तो कन्याशिशु से वितृष्णा कम हो सकती है। अच्छा होगा कि नवजात कन्या-हत्या/कन्याभ्रूण-हत्या सदृश अपराधों के विरुद्ध भी समुचित सामाजिक जागृति उत्पन्न की जाए।
(4) पारिवेशिक उत्तेजनागत अपराध
आज के संचार युग में जब एक नहीं दो-दो मोबाइल लोगों की जेब में हैं और दुनिया सभी की मुट्ठी में आ गई है, जब टी0 वी0, इण्टरनेट, एण्ड्रायड आदि सामान्यजन को भी सुलभ है; जब आए दिन आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य भौतिकतावादी भोगवादी जीवन-शैली परोसी जा रही है; पोर्नोग्राफिक फिल्म, फूहड़ वासनापरक एसएमएस, एमएमएस, ब्लू फिल्म भी सहज उपलब्ध हैं; जब नए जमाने की ‘गुण्डे’, ‘इश्कजादे’ सदृश फिल्में या उनकी फिल्मी-नायिकाएँ या/और रैम्प पर थिरकती लगभग विवसना माडल्स, फिल्मी नायक-नायिकाओं की चकाचौंध भरी जिन्दगी की सेल्यूलायडी झिलमिल की उपलब्धता छोटे-बड़े सभी के चित्त को आकर्षित करने में सक्षम है और ऐसी उपलब्धता के प्रति ललक जगाने के उपक्रम भी 24 घंटे जारी हैं; साथ ही नगर-नगर, गाँव-गाँव, गली-गली देशी-विदेशी शराब की सरकारी-गैर सरकारी दूकानें, ब्राउन शुगर जैसे मादक द्रव्यों की सहज उपलब्धता....... बहुत कुछ लभ्य है सर्वजन के लिए। ऐसे में किसी भी किशोर युवा मन की यौन-वासना को भड़काने का पूरा प्रबन्ध विद्यमान है--- त..ब, अवसर मिलते ही किशोर/युवा (और कभी-कभी प्रौढ़-मन भी) उत्तेजित होकर छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक के यौनापराध कर बैठता है। ऐसे दुष्काण्डों के दृष्टान्त अनगिनत हैं। ऐसी दशा में संदर्भगत निदान के क्रम में पारिवेशिक उत्तेजनाओं को और तद्गत परिवेश को मूलतः नियंत्रित करना ही होगा।
बताते चलें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में शराब/मादक द्रव्य अधिक उपभुक्त किए जाते हैं उन क्षेत्रों में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध बढ जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्व-प्राप्ति के नाम पर राज्य स्तर से शराब/मादक पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है जिसे ‘समाप्त’ करना ही होगा यदि महिला के प्रति होने वाली हिंसा-वृत्ति को समाप्त करना है। अकारण नहीं कि आन्ध्र प्रदेश जैसे प्रदेशों में नारीवादी संगठनों ने व्यापक स्तर पर शराबबन्दी का सार्थक और सफल प्रयास किया जिससे उन अंचलों में प्रश्नगत अपराधों में कमी आई।
इसी श्रेणी का कटु सत्य है कि पारिवेशिक उत्तेजना उद्दीप्त करने में कथित आधुनिकाएँ कम दोषी नहीं हैं। ढेर सारी अभिनेत्रियाँ और मॉडल्स हैं जिन्होंने पुरुष की इस कमजोरी को भाँप लिया है जिसके नाम पर वे अधिकाधिक धन कमाने के कुत्सित उद्देश्य से लगभग-लगभग पूर्ण विवसन पोज देने को आतुर दिखती हैं। फिल्म-निर्माता भी उनकी धन-लिप्सा को भाँप कर उनसे अधिकाधिक कामुक पोज की शूटिंग करवाते हैं और अपनी ऐसी फिल्मों के प्रदर्शन से अपनी जेब भरते हैं। फलतः सारा उपक्रम अंततः पारिवेशिक उत्तेजना बढ़ाने का ही उपादान बन जाता है। तदनुसार फैशनपरस्त तितली या विवसना मॉडल्स बनने के बजाय कथित आधुनिकाओं को अपने सामान्य आचरण में इस विषय में इस सीमा तक संयम से काम लेना चाहिए कि सामान्य प्रकृति का किशोर, युवा, प्रौढ़ अपना संयम तोड़ न बैठे।
यहीं बताना उपयुक्त है कि “ मुझी से सब कहते हैं रख नीची नजर अपनी, कोई उनसे नहीं कहता न निकलो यूँ अयाँ होकर ”--- किसी फिल्म में कहे गए इन शब्दों में जो दर्द है, आलोच्य संदर्भों में उसे भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय कामशास्त्रीय पुस्तकों को दरकिनार कर दें तो भी अधुनातन चिकित्साशास्त्र में अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले हारमोनों के ‘प्रभाव’ को स्वीकार किया जाता है। तथैव, आवश्यकता से अधिक ‘अयाँ होने’ से यौनिक हारमोनों के अधिक स्राव के फलस्वरूप किशोर, युवा, प्रौढ़ में उत्तेजना भर जाय तो उसे पूर्णतया अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता अतएव, टी0 वी0, इण्टरनेट, मॉडलिंग, फिल्म सदृश व्यवसायों में लगे लोगों को इस बिन्दु पर अवश्य ध्यान देना ही होगा कि पारिवेशिक उत्तेजना एक सीमा से अधिक बढ़ाई न जाए। पारिवेशिक उत्तेजना की उपलब्धता बढ़ा कर महिला के प्रति किए जाने वाले अपराधों को समाप्त तो क्या, कम भी नहीं किया जा सकता--- यह तथ्य निर्विवाद है।
पारिवेशिक उत्तेजना सम्बन्धी निदान भी काल्पनिक नहीं हैं और न ही इन तर्कों की प्रस्तुति से ऐसे यौनापराधी को कम दण्डित किए जाने का आशय ही आशयित है। त..द..पि प्रश्नगत कारकों के मूल का सम्यक् निदान और उपचार वांछनीय है। 

(5) आर्थिक पृष्ठभूमिक महिला-अपराध
आँकड़ें बताते हैं कि महिला-तस्करी (कबूतरबाजी) और वेश्यावृत्ति में महिलाओं को धकेले जाने का अपराध भी खतरे के निशान को पार कर चुका है। महिला-अपहरण और उनसे वेश्यावृत्ति कराए जाने के अपराध संभव है किसी युग-विशेष में पुरुष की कथित वासना के शमनार्थ एक उपक्रम प्रदान करने के रूप में या पौरुष-प्रदर्शन के क्रम में सामाजिक स्वीकृति से या कि राज्य की स्वीकृति से संचालित होते रहे हों प..र..न्तु आज वेश्यावृत्ति और महिला-तस्करी सदृश अपराध मूलतः भोगवादी समाज में अधिकाधिक धन-उपार्जित करने की बुभुक्षा के परिणामस्वरूप कारित किए जाते हैं। दुर्भाग्य से ऐसे अपराधों में प्रायः महिला-संवर्ग का सहयोग भी प्राप्त होता है अपराधी पुरुषों को। वेश्यावृत्ति के अड्डे, कोठे, सेक्स-रैकेट आदि बिना महिला-सहयोग के संचालित हो ही नहीं सकते। प्रायः सेक्स-रैकेट और वेश्यावृत्ति के अड्डों आदि की संचालिका महिला ही होती है। वेश्याओं के कोठे की मालकिनें कथित ‘मौसियाँ’ होती हैं; वहाँ ‘पुरुष’ (दलाल आदि) इनके अधीनस्थ सहयोगी की भूमिका में होते हैं। मातृ-प्रधान व्यवस्था होती है उनके समाज में। गरीब समुदाय की लड़कियाँ धन-लिप्सा में या कहीं-कहीं स्थान-विशेष के समूचे समाज (यथा बेडि़या समाज) की लड़कियाँ ंपरिवार के पोषण के लिए धनोपार्जन हेतु प्रश्नगत गर्हित व्यवसाय स्वयं अपनाती हैं जिसके विरुद्ध भी अभियान चला कर जनजागृति उत्पन्न किया जाना आवश्यक है। वहीं, कबूतरबाजी/महिला-तस्करी, महिला-अपहरण आदि के बहुसंख्यक दोषी पुरुष होते हैं, जो आर्थिक आधारों पर प्रश्नगत अपराध कारित करते हैं। तद्गत जबरदस्ती, अपहरण, कबूतरबाजी सदृश अपराधों की रोकथाम के लिए भी अपराधी और उनके सहयोगियों को कठोरतम दण्ड की व्यवस्था आवश्यक है, वहीं, ऐसे कथित ‘व्यवसाय’ की अनैतिकता और तद्गत अनौचित्य के सम्बन्ध में भी व्यापक जन-जागृति आवश्यक है।
साथ ही, आलोच्य सन्दर्भों में ‘बुभुक्षित किम् न करोति पापम्’ को दृष्टि में रखते हुए गरीब जनवर्ग, गरीब नारी संवर्ग, जनजाति संवर्ग आदि के लिए समुचित आय के साधन, रोजगार और दाल-रोटी का प्रबन्ध जुटा कर और अशिक्षा, गरीबी आदि को दूर करने की व्यवस्था भी आवश्यक होगी तभी ऐसे अपराधों में यथेष्ट कमी लाई जा सकेगी ।
(6) अंधविश्वासगत महिला-हिंसा
हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर आदिवासी समाज में अनेक अंधविश्वास जड़ें जमाए बैठे हैं जो अनेक बार महिला-हिंसा का कारण बनते हैं। वहाँ का समाज अशिक्षा के कारण आज भी तांत्रिकों और ओझाओं के निर्देशानुसार चलता है। प्रायः देखा जाता है कि जब किसी असहाय स्त्री की सम्पत्ति हड़पनी होती है या उससे अनैतिक सम्बन्ध बनाने में कोई पुरुष असफल रहता है या किसी स्त्री से किसी को किसी अन्य कारण से वैमनस्य/शत्रुता निबाहनी होती है तो वह स्वयं या समाज के ओझा/तांत्रिक के माध्यम/सहमति से समाज में यह प्रचारित कर देता है कि अमुक महिला डायन/चुड़ैल है जिससे समाज पर कोई कथित खतरा मँडरा रहा है या समाज की अमुक समस्या/विपदा उस डाइन/चुड़ैल के कारण है। इसके परिणामस्वरूप लोगों की अंधविश्वासी भीड़ उस स्त्री को पत्थर मार-मार कर मौत के घाट उतार देती है। मध्य युग में यूरोप में डाइन-हत्या के नाम पर लाखों स्त्रियों को मार डाला गया--- यूरोपीय इतिहास इसका साक्षी है।
ऐसी अपराधों की रोक के लिऐ अंधविश्वासों-रूढि़यों के विनाश के प्रयास और पुलिस-प्रशासन की सतत जागरूकता एवं कठोरतम दण्डविधान के साथ त्वरित न्याय के उपाय अपनाने होंगे।
स्त्री-हिंसा सम्बन्धी अन्य कारणों की पड़ताल के क्रम में उपर्युक्त कोटि के नारी-अपराधों की विवेचना के उपरान्त हम अतिरिक्ततः देख सकते हैं कि हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी धर्मग्रन्थों में नारी-सम्बन्धी कतिपय हेय अवस्थिति का प्रदर्शित है। मानना होगा कि संभव है आदिम युग में जब ‘शारीरिक बल’ ही सर्वोपरि महत्व का था तब अबला नारी सम्मान्य न रही हो; इसी तरह मध्य युग में विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण-युग में बालिका/स्त्री की सुरक्षा खतरे में पड़ जाने से उन्हें शिक्षा से वंचित होना पड़ा जिसके फलस्वरूप संभव है कतिपय अवगुण उनमें उत्पन्न हो गए हों; परन्तु अब जब नारी जीवन के विविध क्षेत्रों में पुरुष के समकक्ष (अनेक स्थलों पर पुरुष से बढ़ कर) अपनी क्षमता प्रमाणित कर रही है--- ऐसी दशा में कथित धर्मग्रन्थों में नारी सम्बन्धी जो अधर्मयुक्त उक्तियाँ हैं उनके विरुद्ध समुचित जन-जागरण करके प्रश्नगत उक्तियों को निरस्त करने वाले सुसंगत तर्कपूर्ण आलेख प्रसारित-प्रचारित किया जाना चाहिए। इस तरह नारी-हेयता सम्बन्धी जो कुसंस्कार पुरुष-मन में बैठ गए हैं, उनसे निस्तार मिल जाएगा जिसके परिणामस्वरूप स्त्रीषु-हिंसा निर्मूलित की जा सकेगी। इस दिशा में अधुना बौद्धिकों को भी आगे आना होगा। 
निर्विवादतः महिला सम्बन्धी अपराध बहुआयामी हैं, भयावह हैं और भर्त्सनीय भी जो पुरुष को आदिम पुरुष, पशुवत् पुरुष और तामसी बताने के वाचक भी हैं; अतएव, आर्थिक कारण या सामाजिक आधार बता कर महिला के साथ होने वाले अपराधों की भयावहता कम नहीं आँकी जा सकती। कम आँकना चाहिए भी नहीं।
औ..र, निस्संदेह यह भी कि महिला-सम्बन्धी अपराधों की अनगिनत कोटियों में से कतिपय प्रमुख का ही उल्लेख यहाँ प्रतीक स्वरूप में किया जा सका है। विस्तृत विवेचन का अवकाश/अवसर प्रस्तुत आलेख के कलेवर से परे है, त..द..पि कह सकते हैं कि प्रस्तुत आलेख में इंगित कुतुबनुमाओं को अपना कर हम प्रश्नगत दिशा में अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। तदनुसार, हम विश्वास कर सकते हैं कि आलेख-इंगित उपायों के सम्बल से ‘आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ वाली नारी की दयनीय स्थिति दूर की जा सकेगी। तब, प्रत्युत तभी, आगत कल न केवल नारी मात्र के लिए ही सार्थक रूप में ‘सुखद’ होगा व..र..न् पुरुष प्रत्युत सम्पूर्ण समाज के लिए भी सुखद होगा। गाँधी जी ठीक ही कहते थे कि जनसंख्या का आधा भाग यदि पिछड़ा रहा तो समाज प्रगति नहीं कर सकता। वास्तव में कतिपय विशेष सद्गुणों से सम्बलित नारी ‘आधी आबादी’ ‘बेटर हॉफ’ तो है ही, वह शेष आधी आबादी (पुरुष आबादी) की जननी भी है। अतएव, आधी आबादी की आँखों में पानी किसी रूप में उचित नहीं है। प्रत्युत, उसे पीयूष-स्रोत सम मान दिया जाना अपरिहार्य है। तभी हम डॉ0 लोहिया की यह मान्यता साकार कर सकेंगे कि  “ नारी राष्ट्र की वह निधि है जो संसार के मरघट को भी केसर-क्यारी में बदल सकती है। ”   ले..कि..न, महिला-हिंसा के विगत कल और आज की अवस्थिति को देखते हुए, विगत कल से भी अधिक दारुण आज की अवस्थिति में अभी तो नारी ‘बेचारी’ दिखती है। निस्संदेह, ऐसी दुर्वह प्रास्थिति से निस्तार अपरिहार्य है।

(प्रस्तुत आलेख कृति ‘ महिला हिंसा का अंत : कल आज और कल’ (सम्पा0ःडॉ0 प्रत्यूष वत्सला, प्रकाशक भारती पब्लिकेशन, नई दिल्ली, में प्रथम आलेख के रूप में प्रकाशित है।)

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