मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन प्रणीत आलेख : अष्टम् किश्त : भारतीयता का स्वरूप

                                         भारतीयता का स्वरूप

हमारा राष्ट्र भारत वाङ्मयिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, पुरातात्त्विक एवं विश्वसनीय लोकश्रुतियों के साक्ष्यों के अनुसार ऋक् युग से अजनाभवर्षीय भारत, देवश्रवा भारत, देवरात् भारत और ‘जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे’ में उल्लिखित ‘भारतवर्ष’ नाम वाले राष्ट्र के रूप में विश्व-विश्रुत रहा है। अतएव, ‘भारतीयता के स्वरूप’ को अर्थात् ‘भारत के वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय सांस्कारिक सांस्कृतिक चारित्रिक स्वरूप’ को जानने समझने के लिए हमें आज से 10-12 हजार वर्ष पूर्व तक के युगखण्ड तक के पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक, वाङ्मयिक और विश्वसनीय जनश्रुतिक साक्ष्यों का सम्यक् अनुशीलन करना होगा जो भारतीयता-समग्र को वस्तुनिष्ठतया वाचाल करते हों। इस हेतुक से उपरि-इंगित साक्ष्यों का अनुशीलन करेंगे तो प्रथमदृष्टया स्पष्ट होगा कि मानव के होमोहैबिलिस से होमोसैपियन्स सैपियन्स बनने के आदिम युग में आज से 10-12 हजार वर्ष पूर्व के ऋक् युग मंे एक महान् राष्ट्र के रूप में सुस्थापित हो गया था जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्ष नाम का अजनाभवर्षीय देवश्रवा देवरात् राष्ट्र भारत। 

औ..र, तथ्य है कि अनेकानेक सुसंगत तर्कग्राह्य साक्ष्यों के अनुसार ‘अजनाभवर्षीय देवश्रवा देवरात् राष्ट्र: भारतवर्ष की भारतीयता’ (अर्थात् ‘भारत की राष्ट्रीय सामाजिक सांस्कृतिक सांस्कारिक संचेतना’) भारत के जन्मकाल से अद्यतन विशिष्ट रही है जैसा कि अग्रांकित प्रस्तरों से अनुशीलित किया जा सकता है।

ज्ञात हो कि वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत और ऋग्वेद के अग्रांकित अभिवचन आलोच्य परिप्रेक्ष्य में पर्याप्त समीचीन हैं जिनसे प्राचीन भारत की भू-मण्डल में अवस्थिति,  तत्कालीन भारत का क्षेत्र-विस्तार, साथ ही ‘भारत-निवासीजन की चारित्रिक विशिष्टताएँ’, निवासीजन के ‘भारतीय’ कहलाने के सुसंगत कारण आदि को बीजरूप में सुस्पष्टतया समझा जा सकता है। यथा-  

“ यत्र ते भारता जाता भारतान्वय वर्द्धना।

 भारताद् भारती कीर्तिं येनेदं भारतं कुलम्।

    अपि ये चैव पूर्वे वै भारतो इति विश्रुतः। ”                 

                                                                           - मत्स्यपुराण

                          “उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

                          वर्षं तद्  भारतं नाम भारती तत्र सन्ततिः।।”

                                                                  - विष्णुपुराण

  “हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। 

     तस्माद् भारतं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।”    

                                                                           - वायुपुराण 

   “  अपरे ये च पूर्वे च भारताः इति विश्रुताः। 

  भरतस्यान्वाये हि देवकल्पाः महौजसः।। ”                      

                                                                          - महाभारत

                            आ भारती भारतीभिः सजोषाः 

                                                                           - ऋग्वेद

 इसी प्रकार, वाल्मीकि-कृत ‘रामायणम्’, मार्कण्डेय पुराण, बृहस्पति आगम, शबर के जैमिनीभाष्य, जैन ग्रंथ ‘निशीथचूर्ण’, कालिदास के ‘रघुवंशम्’ आदि के अभिकथनो से भी भारत एवं भारत के निवासीजन की ‘भारतीयता’ को एक सीमा तक रूपांकित किया सकता है। इन आख्यानों में आदर्श भारतीय चरित्रों का इतिवृत्तात्मक अभिवर्णन अंकित है।  

तदेव, विभिन्न वाङ्मयिक साक्ष्यों के समेकित निष्कर्षों के अनुसार जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आसेतु हिमालय पश्चिम में वंक्षु नदी (कंधार) से लेकर पूर्व में लोहित नदी-प्रक्षेत्र (लौहित्य प्रदेश) तक विस्तृत विशाल भूखण्ड के निवासीगण (भारतीय) ऋक् युग से ही ‘चिन्मय ज्ञान के सतत अन्वेषी’ और ‘इच्छा+ ज्ञान+ क्रिया’ एवं ‘ज्ञान + कर्म + उपासना’ में समन्वयकारी होने के साथ-साथ सर्वकल्याणक सत्त्वशील, ऋतशील शान्तिपरक रचनाधर्मिता के चिर-आराधक रहे हैं। इसीलिए देवश्रवा भारतवर्ष के निवासीगण अग्निपूजा, सूर्यपूजा, इन्द्र पूजा, विष्णु पूजा के विविध उपासना-रूपों को ‘इच्छा + ज्ञान + क्रिया’ के संस्तर पर अपनाने के पश्चात् अंततः देवी भारती/सरस्वती को अपनी प्रकृति-प्रवृत्ति से समरैखिक और सानुकूल पाकर देवी भारती के अप्रतिम उपासक बन बैठे। इति इतने पर ही नहीं हुई; व...र...न्  देवरात् धर्मालु भारत के निवासीगण ऋक् युग में ही देवी भारती/सरस्वती के गुणों को व्यवहार्यतः मनसा-वाचा-कर्मणा अपना कर उनसे सहयुजित होकर अंततः ‘जानति तुम्हहि तुम्हहिं होय जाई’ के अनुक्रम में देवी भारती के समरूप हो गए। यत्रेव भारतीः प्रजाः। वस्तुतः भारतीत्व को भरपूर या कि पूरी तरह आत्मसात् करने के कारण ही  वे ‘भारती$य’ या कि ‘भारतीय’ कहलाए। 

बताते चलें कि ऋषिक मनस्विता के ज्ञानशील ‘भा+रतीय’ और ‘भारती+य’ प्रकृति-प्रवृत्ति के धनी, वैदिक याज्ञिक ऋषि स्वायम्भुव मनु (प्रथम प्रबुद्ध मानव अर्थात् प्रथम प्रबुद्ध होमोसैपियन्स सैपियन्स जिनसे मानव-सृष्टि का विकास आरम्भित हुआ) से पाँचवीं पीढ़ी या कि स्वायम्भुव मनु वाली पीढ़ी को भी यदि आगणन में लें तो स्वायम्भुव मनु की छठवीं पीढ़ी में स्वायम्भुव मनु के प्रपौत्र भरत ( स्वायम्भुव मनु - प्रियव्रत - अग्नींध्र - नाभि - ऋषभदेव - भरत) ने आसेतु हिमालय विशाल भूभाग को प्रथम बार एक ‘राष्ट्र’ के रूप में सुघटित-सुगठित किया और यहाँ के निवासीगण को प्रथम बार भरण-पोषण की सुचारु व्यवस्था प्रदान करने के साथ-साथ राष्ट्रीय अनुशासन में आबद्ध किया; तथैव, मूलतया लोकपोषणत्व के साथ-साथ ‘अहम् राष्ट्री संगमनी चिकितुषी वसूनाम्’ एवं ‘सम् वदध्वं, सम् गच्छध्वं, सम वो मनांसि’ वाली राष्ट्रीय चेतना से सहयुजित कर दिया। इस तरह वैदिक याज्ञिक सूर्यपूजक परमवीर राजा भरत ने प्रथम बार ऋक् युग में ही राष्ट्र-संघटत्व वाले ‘भरतत्व’ के सम्बल से भारत को एक सुगठित राष्ट्र के रूप में सुस्थापित किया। इसके पूर्व अग्निपूजा से आगे बढ़कर प्रकाश/ज्ञान के सतत खोजी स्थानिक निवासीजन ‘भा+रतत्व’ के आराधक बन प्रतीक रूप में सूर्यपूजक हो चुके थे। भारत के ‘चिन्मय ज्ञान-साधना में सतत निरत’ इन्हीं निवासीगण ने शीघ्र ही शान्ति एवं ज्ञान आदि की साधिका देवी भारती के ‘भारतीत्व’ को देवी भारती के गुण यथा चिन्मयता (आध्यात्मिक ज्ञान), सत्त्वशीलता, सात्त्विक रागात्मक रचनाधर्मिता, तितिक्षा (सहिष्णुता, त्याग, क्षमा), दकारत्व (दत्त, दयध्वं, दमयत् अर्थात् दान, दया, दमन = इन्द्रियदमन = इन्द्रियसंयम = जितेन्द्रियता), ‘योग-साधना की षट्क सम्पत्ति शम, दम, श्रद्धा, आस्था, तितिक्षा (त्याग, सहिष्णुता, क्षमा) एवं समाधानद्व, दैवीयता, सात्त्विकता, धर्मालुता आदि को, भी आत्मसात् कर लिया। तभी तो ऋक् युग से ही भारत के निवासीगण भा+रतीय एवम् भारती+य के समवेत स्वरूप ‘भारतीय’ बन सके। ज्ञातव्य  है कि ज्ञान और शान्ति की प्रदायिका देवी भा+रती (ज्ञानान्वेषण-संधान में निरत) रूप में ‘भारती’ कहलाती हैं जबकि ज्ञान-प्रदायिका रूप में देवी भारती ही देवी सरस्वती कहलाती हैं। ऋक् में ज्ञान की देवी के ‘भारती’ और ‘सरस्वती’ दोनों रूप पूज्य माने गए हैं। ऋक् में सरस्वती नाम की एक सजला सफला निर्मल जलवाहिका प्राणदायिनि सुदीर्घ नदी का भी गुणगान उल्लिखित है; परन्तु भारत के सरस्वती नदी-क्षेत्र के बहुत आगे तक विस्तृत होने से और जड़प्रकृति की नदी के अपेक्षा चेतन-प्रकृति की देवी भारती की प्रकृति-प्रवृत्ति से भारतीय जन के प्रकृति-प्रवृत्ति के साम्य के कारण भारत/भारतीयता के सन्दर्भगत परिप्रेक्ष्यों में भारतीत्व के अवदान को स्वीकारा जाना अधिक तर्कसंगत है। 

तेनेव, ‘भारत क्या है’, ‘भारतीयता क्या है’ सदृश प्रश्नों का उत्तर अति-अति संक्षेप में देना हो तो कहना होगा कि ऋतम्वरा  प्रज्ञा से ज्ञान की खोज में सतत निरत रहने वाला प्राचीन राष्ट्र है भारत औ...र इस ‘भा+रत’ भारत के निवासीगण में लोक-पोषणत्व सह राष्ट्र-संघटनत्व वाला ‘भरतत्व’ साथ ही सत्त्वशील, ऋतशील, शिवशील ज्ञान की आराधिका देवी भारती ‘भारतीत्व’ से संस्कारगत सम्पृक्तता का भाव ही मौलिक ‘भारतीयता’ है। इसी भारती+य+ता के आधार पर यहाँ के निवासीगण आदिकाल से ‘भारतीय’ कहलाते रहे हैं। वहीं, ऋतशील यज्ञानुष्ठान, देवाराधना, तत्त्वमसि आदि के सत्त्वशील, ऋतशील भाव-विभाव, ‘मा हिंस्री’ सदृश लोकहिती वैदिक निदेशन तथा सर्वकल्याणक शिवत्व, अध्यात्मवाद, ब्रह्मवाद सदृश ज्ञानाराधन की पैठ भी वैदिक युग से ही भारती+य मन में गहरे पैठी है। 

 औ...र तथ्य है कि उपरि-इंगित आषेचन निराधार या काल्पनिक नहीं है; अपितु भारत/भारतीयता के सन्दर्भ में भारतीय वाङ्मयों को अनदेखा करें, तो भी बुद्धि-ग्राह्य अन्यान्य साक्ष्य भी उपरि-अंकित भरतत्व सह भारतत्व सह भारतीत्व के सादृश्य में संदर्भगत सांस्कारिक आषेचनों का भौतिक सत्यापन ही साक्षात् कराते हैं। तदनुसार, भरतत्व, भारतत्व और भारतीत्व के बीजरूपीय संस्कारों के बहु-बहुलांश अंश बहु-बहुलांश भारतीय जन के आचार-विचार में न्यूनाधिक परिमाण में आज भी देखे जा सकते हैं।

 निःसन्देह, उपरि-इंगित मूल संस्कारों का फलित ही है कि आज भी बहु-बहुलांशतया भारतीय समूह-मन ज्ञानशीलता, चिन्मयप्रियता, सकारात्मक रचनाधर्मिता, सात्त्विकता, ऋतशीलता, शान्तिप्रियता, पावनता-प्रियता, उदात्तता, सर्वकल्याणक मनस्विता, परमार्थ भावना, धर्मालुता, उदारता, दयालुता, तितिक्षाशीलता (त्यागशीलता, क्षमाशीलता और सर्वसहिष्णुता), समन्वयशीलता, राष्ट्रायवर्द्धना की भावना एवं राष्ट्रभक्ति सदृश सद्गुणों से ओत-प्रोत हैं। ऐसे मूल सद्शीलों के प्रति बहु-बहुलांश भारतीय जन के मन-अन्तर्मन में अधिक न सही तो भी बीजरूपीय सम्मानभाव अद्यतन विद्यमान एवम् दृश्यमान है अवश्य। यह विद्यमानता भारतेतर जगत् में दृश्यमान नहीं है। यदि तद्गत दृश्यमानता अपवादस्वरूप यदा-कदा यत्र-तत्र दृश्यमान है भी, तो उसकी सघनता, उसका परिमाण अति अत्यल्प है और वह प्रायः राजसिक स्वरूप में ही वाचाल है। ऐसा संभवतः इसलिए  अपघटित होता है कि भारतेतर जगत् में देवी सरस्वती के विभिन्न अंशभूत अपररूपों की (देवी म्यूजेस, वीनस, सोफो, डोरोसियस, नीला देवी, नील सरस्वती, वज्रशारदा आदि की) आराधना ही प्रचलन में है औ...र देवी सरस्वती के ये सभी अपररूप देवी सरस्वती के समरूप सात्त्विक या कि ऋतम्वरिक या कि सात्त्विकताप्रदायी या समरूपी शान्तिकामी नहीं हैं व...र...न् सात्त्विकता के बजाय अधिक से अधिक वे सभी रजस्शील और रजस्-प्रदायी ही हैं। इस प्रकार सदाशयता, उदात्तता, पावनता, सात्त्विकता से प्रायः विपरीतिक प्रवृत्तियाँ ही बहुलांशतया मूर्त्तमान हैं भारतेतर जगत् में। 

भारतीयता-समग्र बनाम भारतीयेतर प्रवृत्तियों का सम्यक् अनुशीलन करने से पुनः-पुनः दिखेगा कि भू-सांस्कृतिक भारत से बाहर भारत-इतर जगत् में ज्ञान को ऋतम्वरिक, ऋतम्भरिक प्रज्ञा के स्तर तक ग्रहण करने की प्रवृत्ति/संस्कार और तद्गत सद्गुण प्रायः अलभ्य हैं। भारतीय जगत् की ‘भा+रत’ प्रवृत्ति (ज्ञान को ऋतम्वरिक, ऋतम्भरिक प्रज्ञा के स्तर तक ग्रहण करने की प्रवृत्ति) और भारतीयेतर जगत् की ‘भा+रत’ प्रवृत्ति के अभाव से युक्त ज्ञान-ग्रहण प्रवृत्ति के अन्तर को पहचानने पर भा+रतत्व सह भारती+त्व की विशिष्ट मनस्विता, ऋता एवं विशिष्ट जीवन-दर्शन वाली मौलिक ‘भारतीयता’ का आकलन सहज हो जाता है। 

इतना ही नहीं, संदर्भगत मूल संस्कारगत भाव-विभाव-अनुभाव का अनुषंग फलित है कि सामान्य ‘भारती$य’ ‘देव-बहुदेव-परमात्मा में आस्था’, ‘सात्त्विक भक्ति’, ‘कर्मफल सिद्धान्त और धर्म में विश्वास’, ‘जन्मजात ऋण से विमुक्ति की वांछा’, ‘मोक्ष की वांछा’, ‘पंचयज्ञ की साधना’, ‘भारतीय साहित्य-संगीत-कला की साधना’, ‘भारतीय दर्शन-अध्यात्म आदि के प्रति सम्मान,  अभिरुचि’ आदि से संसिक्त ही दिखता है। इस संसिक्तता का ही फलित है कि एक या अधिक इष्ट देव की उपासना वाली सघन आस्तिकता, सत्त्वशील धर्मालुता, ‘वैष्णव जन तो तेते कहिए, पीर पराई जाने रे’ वाली सदाचारिक वैष्णवता,   लोक-मर्यादा के पालन में निरतता आदि में भी संदर्भगत सात्त्विक भारतीत्व आदि के भाव ही सुफलित हैं यहाँ के बहु-बहुलांश निवासीगण में। धर्मालु भारत की पूजा का संकल्प-मंत्र हो या भारत भर की नदी-जल का आवाह्न, इष्ट देवी-देवताओं के मन्दिर, तीर्थ-क्षेत्रों की आभारत विद्यमानता और अनेकानेक वैचारिक आचारिक भाव-विभाव की समरूपता आदि प्रतीततः अनेकता में एकता के अप्रतिम प्रतिमान भारत के सुदृढ़ सांस्कारिक ऐक्य को प्रमाणित करने में समर्थ हैं। इस ऐक्य के नेपथ्य में भी भारतीत्व की तितिक्षाशील उदारता और समन्वयशीलता का महती अवदान है।  

ध्यातव्य है कि भारतीयों में धर्म की आस्तिकता जब सघन होती है, तो वे उसी समानुपात में राग-द्वेष-हिंसा आदि से परे और शान्तिकामी होते जाते हैं। फलतः वे शान्त, सत्त्वशील, अहिंसक और वीतरागी हो जाते हैं जबकि भारतेतर धर्माचारी अपनी धार्मिकता के सघन होने पर नितान्त तामसिक, कट्टरतावादी, हिंसाकारी और विध्वंसक होकर आतंकवादी तक बन जाते हैं। भारतेतर धर्म में गैर-धर्मी को सह्य नहीं माना जाता। कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट के कत्लेआम, गैर-इस्लामी कथित काफिरों के खात्मे का पैगाम, जिहाद औ...र तो और इस्लामी सम्प्रदायों का परस्पर भीषण टकराव, तबर्रा बनाम मद्देसहाबा तथा यहूदियों का निष्कासन, कश्मीरी पण्डितों का निष्कासन सदृश दृष्टान्त गैर-भारतीय धर्म एवं उनके अनुनायियों को सर्वथा हिंसक, उग्र, असहिष्णु तथा अ-समन्वयशील ही सिद्ध करते हैं। भारतीय धर्म (वैदिक धर्म, सनातनी धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख धर्म, आर्यसमाजी धर्म आदि-आदि) के अनुनायियों द्वारा विगत 2000 वर्षों में भारतेतर-धर्मी को या परस्पर एक-दूसरे को विनष्ट करने वाला खूनी धार्मिक संघर्ष कभी प्रत्यक्ष नहीं हुआ। क्या ‘भारतेतर हिंस्र तमस् धर्मालुता’ बनाम ‘भारतीय सात्त्विक धर्मालुता’ का प्रसंगित अन्तर देवी भारती की ऋतशील, तितिक्षाशील सत्त्वशीलता का प्रदेय नहीं है ? 

इसी तरह, भारतेतर जगत् जहाँ ‘सृष्टि-रचना’ (विशेषकर मानव-रचना) का कारक जल तत्त्व, अग्नि तत्त्व, विचार तत्त्व मानते-मानते, उससे भी आगे बढ़कर अंततः वर्तमान में चार भौतिक तत्त्व-- जल, वायु , अग्नि और मिट्टी को कारक बताते हैं, वहीं भारतीय मनीषी मानव सहित सम्पूर्ण ‘सृष्टि-रचना’ हेतु उपर्युक्त चार तत्त्वों (जल, वायु , अग्नि, मिट्टी) के अतिरिक्त एक अन्य तत्त्व ‘आकाश तत्त्व (अर्थात् वैराट्य तत्त्व या कि वैराट्य वाला परमात्म तत्त्व)’ को वांछनीय मानते हैं। भारतेतर विचार (दर्शन) में उपरि-इंगित ‘वैराट्य’ का अभाव मात्र ‘दर्शन’ के स्तर पर ही नहीं, अपितु सांसारिक व्यावहारिक स्तर पर भी प्रत्यक्ष है। भारतेतर बौद्धिक स्वार्थवाद, उपयोगितावाद, प्रकृति-दोहन, शोषणवाद, उपनिवेशवाद और शक्ति-संघनन सिद्धान्त के हामीकार हैं, जबकि भारतीय बौद्धिक ‘प्रकृति की पूजा’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’, सर्वशान्ति, सात्त्विक राष्ट्रवाद आदि के आराधक हैं। 

बताते चलें कि ख्यात पाश्चात्य दार्शनिक हीगेल जहाँ ‘सर्वात्मा/विश्वात्मा’ की खोज पर 18वीं सदी में पहुँच सके और जहाँ हीगल एवं उनके सममनस्कों की संख्या भारतेतर जगत् में आज भी अत्यल्प है, वहीं, भारतेतर जगत् के अस्तित्वमान होने के बहुत-बहुत पूर्व के उपनिषद् युग मंे ही भारतीय मनीषी ‘ईशावास्यमिदम् सर्वम् ....’, ‘तत्त्वमसि’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सदृश उदात्त अवधारणाओं को मनसा-वाचा-कर्मणा आत्मसात् कर चुके थे। आज भी ऐसी उदात्त अवधारणाओं को बहु-बहुसंख्य भारतीय जन आचार-विचार में अपनाए हुए हैं। 

इसी तरह, प्लेटो प्रभृति भारतेतर विचारक जहाँ ‘कवि’ को अपने गणतंत्र में किंचित् स्थान देने को भी तत्पर नहीं हैं औ..र आज भी भारतेतर जगत् में कविता (काव्य=साहित्य) के सम्बन्ध में ‘कविता ज्ञान के लिए या मनोरंजन के लिए या शक्ति के लिए ....’ जैसे द्वन्द्व अद्यतन जारी हैं, वहीं, भारतीय मनीषी ‘स कविः काव्या पुरुरूपम् द्यौरिव पुष्यति’ और ‘छन्दांसि यज्ञाः भूतम् भव्यम् सृजते’ कह कर ‘कवि’ और ‘कविता’ को वैदिक युग से ही ‘उदात्त मान’ प्रदान करने को तत्पर हैं। 

सम्मादिट्ठि से विचार किया जाए तो भारतीय जन-मन में परिव्याप्त अन्यान्य सत्त्वशील, ऋतशील, शिवशील वैचारिक आचारिक संस्कारों की विद्यमानता भी प्रत्यक्ष होगी। ऐसे संस्कार भारतीय जन-मन में भारत और भारतीयता के मूल नियामक: ‘वैदिक निदेशन सह भा+रतत्व सह भारतीत्व सह शिवत्व आदि’ की परिव्याप्ति के ही प्रमाणक हैं। 

अग्रेतर, तथ्यसिद्ध है कि उपरि-इंगित नियामकों की सुस्थापना के पश्चात् ज्ञानाराधक भारती+य जड़ीभूत नहीं हुए अपितु अग्निपूजा, सूर्यपूजा, इन्द्रपूजा, वैष्णव पूजा से आगे बढ़ कर भारतीत्व को आत्मसात् करने (देवी भारती के गुणों को मनसा-वाचा-कर्मणा धारण करने) और शिवत्व से सहयुजित होने के पश्चात् त्रेता युग में वे अनयरोधी संकल्पशीलता, तद्गत सक्रिय कर्मठता, मर्यादापालन और सर्वकल्याणक प्रजाहितरतता, परहितरतता वाले रामत्व से अनुप्राणित हुए। कालान्तर में द्वापर युग में कर्त्तव्यपरायणता, कर्मनिष्ठा एवं लोक-संग्रह का पाठ पढ़ाने वाले कृष्णत्व को भी स्वीकारा भारतीय जन-मन ने। तदन्तर महाभारत में हुए महाविनाश के पश्चात् दीर्घ अन्तराल तक कोई ऐसा महापुरुष या महानायक रूपमान नहीं हुआ भारतीय वैचारिक जगत् में, जो भारतीय जन-मन को दूर तक और देर तक गहन रूप से प्रभावित करता। यद्यपि इस बीच चार्वाक से लेकर कपिल, पाणिनी, पतंजलि, दत्तात्रेय, जैमिनी, अक्षपाद गौतम प्रभृति अनेक विद्वान् अवतरित हुए अवश्य, लेकिन वे भारतीय जन-मन पर ‘अंशतः प्रभावकारी’ या ‘अल्पतम प्रभावकारी’ ही सिद्ध हुए। ईसा पूर्व छठीं सदी में महावीर जैन एवं महात्मा गौतम बुद्ध का अवतरण हुआ जिन्होंने भारतीय जन-मन को दूर तक और देर तक गहरे सम्प्रभावित किया। जैन तीर्थंकर महावीर ने आदितीर्थंकर ऋषभदेव तथा अन्य 22 तीर्थंकरों की शिक्षाओं में अपनी ओर से कतिपय ‘शील’ जोड़ कर ‘जिनत्व’ को सुस्थापित किया और गौतम बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग, आर्य सत्य आदि के आधार पर सद्भाव, शान्ति और निर्वाण (मोक्ष) को बल प्रदान किया। शान्तिकामी मोक्षकामी सदाचारिक भारतीय मन ने इन्हें भी सात्त्विकता एवम् धर्मालु आस्तिकता की सीमा तक अंशतः स्वीकार किया। इस तरह भारतीयता में ‘जिनत्व’ एवं ‘बुद्धत्व’ की सात्त्विक शान्तिशीलता और सद्भाव सदृश कतिपय शील भी ई॰पू॰ 500 तक के कालखण्ड में अतिरिक्ततया आमेलित हो गए। बाद में भारतीय सात्त्विकता के विपरीत जब जैन, बौद्ध धर्म में बहुत कुछ जोड़ा-घटाया गया, तो उसे अनास्था की सीमा तक भारतीय जन-मन ने अस्वीकार कर दिया। 

तथैव, ईस्वी सन् के आविर्भाव या कि हजरत जेहोवा, हजरत मूसा, हजरत मोहम्मद आदि सामी पैगम्बरान् के आविर्भाव के बहुत-बहुत पूर्व के कालखण्ड से ही ‘सात्त्विक वैदिक निदेशन सह भरतत्व सह भारतत्व सह भारतीत्व सह शिवत्व सह रामत्व सह कृष्णत्व सह जिनत्व सह बुद्धत्व सदृश नियामक तत्त्व भारतीय जन-मन में व्याप्त हो गए थे और जों सुदीर्घ सीमा तक उपरि-इंगित ‘भारतीयता-समग्र’ को रूपायित करने में अद्यतन सक्षम हैं।  कहना ही होगा कि सन्दर्भगत संस्कारों, विचारों एवं आचारों की परिव्याप्ति बहु-बहुलांश भारतीय मन में इतनी सघन है कि इनके अभाव में हम भारतीय जीवन की, भारतीय की औ...र, वास्तविक भारत की कल्पना ही नहीं कर सकते ! अपितु सच तो यह है कि उनके अभाव में भारतीय (चाहे वह भारत-निवासी हो या विदेश-प्रवासी) स्वयं का जीवन वस्तुतः अ-भारतीय ही मानता है और उनके लिए मन ही मन कलपता रहता है। ‘भारती+य’ से ‘भारती’ को (प्रकारान्तर से भारतीत्व को) वियोजित करने पर ‘भारतीय तो विखण्डित हो ही जाएगा ना ऽऽ ! तदेव, प्रसंगित ‘कलपना’ स्वाभाविक है। 

 यहीं बताना समीचीन है कि उपरि-इंगित संस्कारों का संश्लिष्ट ही है ‘भारतीय संस्कृति’ जिसे भारत का राष्ट्रीय चरित्र कह सकते हैं और जो वास्तव में हमारे भारत की राष्ट्रीय संचेतना, राष्ट्रीय संवेदना, राष्ट्रीय संस्कार के रूप में यत्र-तत्र-सर्वत्र आभारत वाचाल है। यह भारतीय संस्कृति अपने ऊर्ध्ववाही संस्कारों से सुमनस् जन को सतत परिष्कारित करने में अद्यतन समर्थ भी है। वस्तुतः ऐसी उदात्त संस्कृति के प्रसंगित स्थायी भावक संस्कारों के सम्बल से यहाँ ‘राष्ट्रभाव’, ‘स्वराष्ट्ररंजनम्’, ‘राष्ट्रवाद’ आदि राष्ट्रीय भावों के साथ-साथ ‘सत्य, अहिंसा आदि पर अटूट आस्था’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया....’ और ‘ओ३म् द्यौ शान्तिः ......सर्व ँ्म शान्तिः....’ सदृश सार्वहिती मंत्र-जाप करने वाली उदात्त वैश्विक दृष्टि, ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’, ‘तत्त्वमसि’ और ‘सत् $ चिद् $ आनन्द’ के समवेत में ‘सम्पूर्ण सूक्ष्म-स्थूल, चर-अचर और स्थावर-जंगम सृष्टि में ‘ईश्वर’ को देखने वाला ब्रह्मवाद/ अध्यात्मवाद’, ‘कर्मफल एवं पुनर्जन्म’, ‘पंच महायज्ञ’, ‘जन्मजात ऋण’ आदि की अवधारणाएँ विकसित एवं सुस्थापित हुईं जिनके फलित से भारतीय जन की चिन्तना में ‘धारय इति स धर्मः’ और ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस् सिद्धिः स धर्मः’ की सात्त्विक धर्म-दृष्टि वाला ‘धर्म’, ‘अनयरोधी, मर्यादाशील रामत्व’, ‘कर्त्तव्यनिष्ठ सह लोकसंग्रहत्व वाला कृष्णत्व’, ‘सौहार्दशील बुद्धत्व’, ‘अहिंसाशील निर्वाणकामी जिनत्व’ के साथ-साथ ‘ज्ञानशील भारतत्व’ तथा देवी भारती के गुणों (भारतीत्व) वाली तितिक्षाशील उदारता, क्षमा, समन्वयवादी सर्वसहिष्णुता सदृश पावन सात्त्विक आचार-विचार पनप गए। इससे बढ़ कर सारवान् है कि यहाँ ‘भारतेतर-दृष्टि की अवधारणानुसार ‘मानव-जीवन को जीवन-संघर्ष से भरा (Life is Struggle) मानने’ के बजाय ‘मानव-जीवन को भारतीय धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ को प्राप्त करने का सुअवसर मानने की जीवन-दृष्टि’, ‘सबलतम की उत्तर-जीविता’ (Survival of the Fittest) वाली भारतेतर अवधारणा के बजाय ‘सह-अस्तित्व’ और ‘सहजीविता’ को आत्मसात् करने वाला समन्वयवादी सर्वकल्याणक शिवत्वपूर्ण ‘भारतीय जीवन-दर्शन’ आदि पल्लवित हुआ जिसके सम्प्रभाव से ‘भारतीय मनस्विता’ उदात्त सात्त्विक पावन आप्तता से संसिक्त हुई। ऐसी आप्तता वास्तव में ईसा पूर्व के हजारों वर्षों पूर्व से अद्यतन भारत का सामाजिक सांस्कृतिक वैशिष्ट्य है। 

उपर्युक्त आधारों पर निस्संदेह माना जा सकता है (माना जाना चाहिए भी) कि ईसा पूर्व की सदियों से हमारे वर्तमान राष्ट्र भारत का ‘नदी, पर्वत, वनसम्पदा, खनिज सम्पदा, पशु-पक्षी आदि से युक्त जैविक सम्पदा’ और ‘विशाल जनसंख्या’ के सहयुजन वाला भू-क्षेत्र (जो हिमालय से आसमुद्र, कामरूप से कच्छ, कन्याकुमारी से कश्मीर तक विस्तृत है, वह प्राकृतिक सम्पदायुक्त समस्त भू-क्षेत्र) भारत का ‘अन्नमय कोश’ है जिसे ‘मृण्मय भारत’ कहा जा सकता है। यहाँ का भारतत्व (‘भा$रतत्व’ अर्थात् ‘ज्ञान रूपी प्रकाश प्रत्यक्ष करने वाली सतत निरतता की प्रवृत्ति’) भारत का ‘प्राणमय कोश’ है। यहाँ का ‘भारतीत्व’ (‘भारती+त्व’ अर्थात् ‘साधनारत सारस्वत चिन्मयता’) भारत का ‘मनोमय कोश’ है। यहाँ की ‘वेदोपनिषद्, दर्शन-योग-अध्यात्म से आच्छादित शिवत्व + रामत्व + कृष्णत्व वाली विशिष्ट ऋता’ (विशिष्ट मनस्विता) भारत का ‘विज्ञानमय कोश’ है। इसी प्रकार, भारत के स्थानिक निवासीगण की विशिष्ट प्रवृत्ति: ‘सात्त्विक शान्ति एवं आनन्दप्रदायी आस्तिकता से परिपूर्ण ऋतशील, सत्त्वशील धर्मालुता’ भारत का ‘आनन्दमय कोश’ है।   

बताते चलें कि अध्यात्मिक जगत् में आध्यात्मिक उन्नति की उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँच कर ‘सर्वव्याप्त सूक्ष्मतम से सायुज्य’ प्राप्त करने के हेतुक से विभिन्न ‘कोशों’ का परिहरण प्राप्त करके सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतम की ओर अग्रसर होना अभीष्ट होता है परन्तु आध्यात्मिक अधिलक्ष्यों केे विपरीत भौतिक जगत् में भौतिकता के प्रक्षेत्रों में विकास के शिखर पर पहुँचना होता है। भौतिक विकास प्राप्त करने के लिए राष्ट्र (राष्ट्र भारत हो या कोई अन्य) को उपर्युक्त सूक्ष्म-स्थूल सभी भौतिक कोशों में सूक्ष्मतम से स्थूलतम विकास को अस्तित्त्वमान बनाए रखना होता है औ...र ऐसे अस्तित्व के लिए विभिन्न कोशों का मात्र सम्यक् सुयोजन अभीप्सित होता है। तथैव, राष्ट्र के भौतिक शरीर की अक्षुण्णता एवं विकास के लिए (राष्ट्र-आत्मा के  ऊर्ध्वाधर विकास के लिए भी) उपरि-इंगित विभिन्न कोशों का  समुचित सुयोजन ही उपादेय है। तदनुसार, भारतीय मनीषी अपने-अपने ढ़ंग से समय-समय पर भारत के भा$रतत्व, भारती$त्व आदि के सम्बल से संदर्भगत विभिन्न कोशों का सम्यक् सुयोजन ही सुस्थापित करते रहे हैं यहाँ, जिसका सुफलित ही भारतीयता-समग्र के उपरि-इंगित विभिन्न फलितों के रूप-स्वरूप में कमोबेश अद्यतन दृश्यमान है ।  

अग्रेतर ज्ञात हो कि ईसा पूर्व प्रसंगित वर्षों वाला कालखण्ड ‘आकलनीय’ इसलिए है कि उस समय तक भारत का राष्ट्रीय स्वरूप, सांस्कृतिक स्वरूप, वैचारिक श्रेष्ठत्व आदि सुस्थापित हो गया था प्रत्युत तब तक वैदिक ज्ञान, वेदान्त, धर्म-निष्ठा, साहित्य, संगीत, कला, हस्तशिल्प, भाषा-व्याकरण, न्यायशास्त्र, तर्कशास्त्र, व्युत्पत्तिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, आयुष विज्ञान, मनोविज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, खगोल विज्ञान, शून्य से 9 तक के अंक, वैदिक गणित, अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, वास्तुशास्त्र, युद्धकला, व्यूहरचना आदि-आदि ज्ञान-प्रज्ञान-विज्ञान के विविध आयामी ज्ञान से सुसम्पन्न एक सबल राष्ट्र के रूप में सुस्थापित हो चुका था भारत। मानवोचित श्रेष्ठ उदात्त जीवन-शैली, मानवोचित उत्कृष्ट समाजशास्त्रीय आचार, उत्कृष्ट जीवन-दर्शन, ब्रह्मवाद युक्त अध्यात्म आदि के साकारकर्त्ता, सर्वकल्याणकता एवम् सर्वशान्ति के आराधक, धीर-वीर निवासियों के राष्ट्र के रूप में भारत का डंका उस कालखण्ड तक सर्वत्र बज रहा था। तत्कालीन भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। भारत विश्व-गुरु के रूप में स्थापित हो चुुका था तब तक। इसके बाद की सदियों में जिनत्व एवम् बुद्धत्व के सम्प्रसार से पूर्वतः स्थापित ‘विश्वगुरु भारत’ की गरिमा में श्रीवृद्धि ही हुई। 

औ..र, बताना समीचीन है कि- 

- अधुना पाश्चात्य अर्थशास्त्री एंगस मेडिसन के अनुसार ईस्वी सन् के प्रारम्भिक कालखण्ड में आर्थिक सक्षमता, आर्थिक उत्पादन आदि की दिशा में कुल विश्व की आर्थिक सक्षमता में ‘सर्वसमृद्धि से सम्पन्न भारत’ का योगदान ‘एक तिहाई से  अधिक’ था।

- 1450 ईस्वी के बोगाजकोई अभिलेख, हेरोडोटस के आलेख, ‘जेन्दावेस्ता’, असीरियन इतिहास, यहूदी बाईबिल, होण्डुरास की पहाड़ियों के भित्तिचित्र भी प्राचीन गौरवगान के प्रमाणक हैं। 

- पाश्चात्य इतिहासज्ञ मेगस्थनीज कृत ‘इण्डिका’, ए॰एल॰बाशम कृत ‘वण्डर दैट वाज इण्डिया’, हेरोडोटस कृत ‘हिस्टारिका’, हिकेटस मिलिटस कृत ‘जियोग्राफिका’ कैसियस कृत ‘इण्डिका’ और फाह्यान, ह्नेसांग, सुमाचीन आदि विदेशी यात्रियों के यात्रा-वर्णनों से और सिल्वां लेवी के निद्देस विवरण से भी भारत का प्राचीन वैभव एवं गौरव का गान गुंजरित होता है। 

- दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्यान्य शिलालेख तथा पुरातात्त्विक साक्ष्य (यथा- इण्डोनेशिया के संस्कृत में लिखे गए शिलालेख, रोजेटा प्रस्तर लेख, जावा के प्रम्बनान मन्दिर-परिसर में स्थित चण्डीसेवू मन्दिर के अवशेष, कल्सन अभिलेख, करंतेनह अभिलेख, तुकमस शिलालेख, कोताई शिलालेख, शि-अरूतन शिलालेख, केदाह शिलालेख, चंगल शिलालेख, दिनाया शिलालेख, चण्डीप्लासन शिलालेख, पेनांग गुंगेन शिलालेख, मिण्टो शिलालेख आदि), इस्ताम्बुल के राजकीय पुस्तकालय में सुरक्षित काव्य ग्रंथ ‘सेऊखल उकोल’ में संगृहीत अरबी कवि जरहम बिन तॉई की कविता, 1800 ई॰पू॰ के प्राचीन अरबी ग्रंथ में अंकित कवि लबी-बिन-ए-अख्तब-बिन-ए-तुरफा की लम्बी कविता, दिल्ली के बिड़ला मन्दिर के स्तम्भों पर उत्कीर्ण हजरत मोहम्मद के सगे चाचा हजरत उमर-बिन-ए-हश्शाम कृत ‘सेअरूल ओकुल’ की कविता, प्राचीन शषा (आधुनिक सूसा) राज्य के राजमहल में उत्कीर्ण आलेख औ...र, फारसी धर्मग्रन्थ ‘जेन्द-ए-अवेस्ता’ के ‘बंेदिदाद’ खण्ड, पारसीक ग्रन्थ ‘मेहरयास्त’, ‘शातीर’ सदृश ग्रंथ, 486 ई॰ पू॰ के पर्सिपोलिस स्तम्भ पर उत्कीर्ण भारतीय गुणगान आदि के साक्ष्यों से भी तत्कालीन भारत की प्राचीन सांस्कृतिक उत्कृष्टता और प्राचीन भारतीय वैभव आदि को आकलित किया जा सकता है। 

- पाश्चात्य जगत् के ख्यात नौवहन-नायक वास्कोडिगामा की डायरी के अनुसार प्राचीनकाल में भारतीय नौवहन-सक्षमता और भारतीय नौवहन बेड़ा शेष विश्व के सापेक्ष सर्वश्रेष्ठ था।

- नासा एवं पाश्चात्य जगत् के अधुनातन शोधों को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि रामसेतु-विनिर्माण सदृश श्रेष्ठतम वास्तुनिर्माण में और कणाद प्रभृति वैज्ञानिक ज्ञान से सुसम्पन्न ऋषि के श्रेष्ठ भौतिक, रासायनिक, जीव-वैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधारभूतिक विज्ञान में सुदक्ष हो गया था भारत ईस्वी सन् के प्रारम्भ के बहुत-बहुत पूर्व के वर्षों में, जब सामी पैगम्बरान का और पाश्चात्य जगत् के वैचारिक प्रपितामह सुकरात का या कि पाश्चात्य साहित्यिक प्रपितामह होमर का या कि पाश्चात्य राजनीतिक प्रपितामह प्लेटो का नामोनिशान तक आविर्भूत नहीं था। 

- भारत के प्राचीन गौरव के अकाट्य प्रमाण के रूप में मध्य एशियाई रे शासकों का इतिहास, मिस्र, ईरान, अफगानिस्तान आदि के इतिहास तथा जापान, कम्बोडिया, बर्मा, वियतनाम (चम्पा), इण्डोनेशिया, बाली, सुमात्रा, जावा, नार्वे आदि के इतिहास और  इण्डो-अमेरिकी जनजातियों के इतिहास को भी देखा जा सकता है। 

- भारत के प्राचीन वैभव का ही अकाट्य प्रमाण है कि चीन, हिन्दचीन के देश प्राचीनकाल में भारत को ‘शिन्तुको’ या ‘शिन्-तु-को’ अर्थात् ‘देवों का देश’ कहते थे। वहीं, प्राचीन यूनानी विद्वानों ने भारत को ‘इण्डोस’ (पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा देश) का नाम दिया था। ‘इण्डोस’ अर्थात् ‘शान्त स्निग्ध शान्तिप्रदायी प्रकाश से प्रदीप्त पूर्णिमासीय चन्द्रमा सदृश सात्त्विक तेज से युक्त देश (विविध आयामी कल्याणकारी सुविकसित ज्ञान-विज्ञान से पूर्ण प्रदीप्त देश)’। ‘इण्डोस’ के समवाची अर्थ में ही प्लेटो भारत को ‘इण्डोई’,  वर्जिल और मिल्टन ‘इण्डो’ या ‘इण्ड’ कहते थे। अरब के प्राचीन विद्वान् भारत को ‘अहल-ए-किताब’ वाला ‘हफ्त हिन्दुकन’, ‘हिन्दुउ’, ‘हिन्दुव’ सदृश सम्मानजनक सम्बोधन से सम्बोधित करते थे। 

- ‘रामायणम्’, ‘रघुवंशम्’ प्रभृति ग्रंथ, ‘राजतरंगिनी’ सदृश देशज ऐतिहासिक ग्रंथ, सिंधुघाटी, तक्षशिला-नालन्दा के पुरावशेष और 2000 वर्ष पूर्व के कालखण्ड में विनिर्मित विभिन्न भारतीय मन्दिरों की सुन्दरतम वास्तुकला तथा महरौली के लौहस्तम्भ आदि भी प्राचीन भारतीय गौरवगान की जय-ध्वजाएँ फहराते हैं।

- औ...र, अकारण नहीं था कि हजरत ईसा, सुकरात और हजरत अली के नवासे हसन-हुसेन अपने जीवन के अंतिम चरण में भारत आना चाहते थे। ऐसी सदिच्छाएँ भी प्राचीन भारतीय गौरव के प्रमाणक ही हैं।

वस्तुतः महान् माने जाने वाले भारत की ‘भारतीयता’ (भरत+त्व सह भा+रतत्व सह भारती+त्व सह वैदिक औपनिषदिक संस्कार सह शिवत्व) या कि ‘भारतीयता-समग्र’ (भरत+त्व सह भा+रतत्व सह भारती+त्व सह वैदिक औपनिषदिक संस्कार सह शिवत्व सह रामत्व सह कृष्णत्व सह आस्तिक जिनत्व सह सात्त्विक बुद्धत्व) को सम्यक्तया जानना-समझना सुमनस् प्रज्ञावान् के लिए असहज नहीं है इसलिए कि यह मात्र एक ‘मनोदशा’ नहीं व...र...न् ‘सात्त्विक जीवनाचार की एक विशिष्ट सांस्कृतिक इयत्ता’ है जिसमंे भरत+त्व सह भा+रतत्व सह भारती+त्व सह वैदिक औपनिषदिक संस्कार सह शिवत्व सह रामत्व सह कृष्णत्व सह आस्तिक जिनत्व सह सात्त्विक बुद्धत्व सदृश अनेकानेक सद्संस्कार आमेलित हैं, जो बहु-बहुलांश भारतीय जन के आचार-विचारों में पगे-पगे दृश्यमान हैं। वहीं, भारतीयता-समग्र में सर्वप्रभावी भारतीत्व के सम्बल से भारती+य वैशिष्ट्य (सात्त्विकता, चिन्मयता, सर्वकल्याणकता, ऋतशीलता, सत्त्वशील रागात्मक  रचनाधर्मिता, शान्तिप्रियता, नयशीलता, मर्यादाशीलता, लोकसंग्रही आचार आदि) की गहरी पैठ का अनुशीलन भारतीय जन-मन में सहज दृष्टिगम्य है। इस तरह, भारतीयता-समग्र के वैशिष्ट्य के आधार पर भारत और भारतीयता की पहचान शेष जगत् से विलग स्वतः तिर आती है। 

पुनश्च अग्रेतर, जहाँ तक वर्तमान भारत में ‘भारतीयता’ (या कि भारतीयता-समग्र) के अस्तित्वमान होने का प्रश्न है, समाजशास्त्री डॉ॰ श्यामाचरण दुबे ‘भारतीयता’ को आभारत व्याप्त एक विशिष्ट मनोदशा, एक विशिष्ट भावदशा कहते हैं जिसका अवगाहन वांछनीय बताते हैं वे। डॉ॰ दुबे के शब्द हैं-  “भारतीयता की खोज आज के संदर्भ में दो दृष्टियों से आवश्यक है। स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद देश में एक सांस्कृतिक अराजकता व्याप्त हो गई है। स्वदेश और स्वदेशी की भावनाएँ अशक्त होती जा रही हैं। हम बेझिझक पश्चिम का अनुसरण कर अपनी अस्मिता खोते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति सम्प्रति एक छोटे किन्तु प्रभावशाली तबके तक सीमित है, पर उसका फैलाव हो रहा है। यदि हमने इसे बिना बाधा बढ़ने दिया तो हमें परम्पराओं की संभव ऊर्जा से वंचित होना पड़ेगा और हमारी स्थिति बहुत कुछ त्रिशंकु जैसी हो जाएगी। दूसरा कारण और भी महत्त्वपूर्ण है। संस्कृति आज की दुनिया में एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में उभर रही है, न्यस्त स्वार्थी जिसका उपयोग खुल कर अपने उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं। उन पर रोक लग सकती है यदि हम निष्ठा और प्रतिबद्धता से भारतीयता की तलाश करें।” (देखें ‘शब्द और संस्कृति’: प्रो॰ श्यामाचरण दुबे)। प्रो॰ श्यामाचरण दुबे की अग्रांकित सत्योक्ति भी आलोच्य परिप्रेक्ष्यों में अति महत्त्वशील है कि “ भारतीयता की बात आजकल बहुत सुनी जा रही है पर उसके तत्त्वों के विश्लेषण के प्रयत्न (सही प्रयत्न) नहीं किए जा रहे हैं।” इस विषय में समाज-विज्ञानी मैक्किम मैरियट के प्रत्यय ‘सार्वभौमीकरण (Universalization) सह स्थानिकीकरण (Perocialization)’ की तर्ज पर ‘स्थानिकीकरण सह सर्वभारतीयता’ की खोज किया जाना आवश्यक है।  तथैव, भौगोलिक स्थानिकता के साथ-साथ आ-भारत यदि हम महत्तम ‘भारतीय सांस्कृतिकता’ को समाकलित करें अर्थात् हम भारत के भौगोलिक सांस्कृतिक तत्त्वों का ‘समुचित संकरण (Genuine Hybridization)’ कर सकें तो निःसन्देह उपरि-इंगित मौलिक ‘भरतत्व + भारतत्व + भारतीत्व’ आदि से समेकित समग्र ‘भारतीयता’ को वास्तविक भारतीय राष्ट्रीय चरित्र के रूप में रेखायित किया जा सकेगा। इससे अति अति प्राचीन युग से ‘जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आसेतु हिमालय भारतवर्षे’ वाले एक सुगठित सुघटित भू-सांस्कृतिक राष्ट्र भारत की वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय चरित्र वाली भारतीयता का स्वरूप पूरी तरह साक्षात् हो जाएगा।  

तथ्यतया कतिपय कथित विचारक उपरि-इंगित और तत्सृदश अनेकानेक वस्तुगत सत्यों को नकार कर अपनी अलग पिपहरी बजा कर भारत के विविधतावादी अनेकत्व में एकत्व एवम् तद्गत समरसता आदि को सिरे से नकारने का दुष्प्रयास करते हैं। वास्तव में भारत के राष्ट्रीय चिति, उसके संस्कार और इन संस्कारों के संश्लेष: ‘भारतीय संस्कृति’ ‘अनेकता में एकता’ वाली संस्कृति से आगे बढ़ कर ‘विविधता में एकात्मकता’ वाली संस्कृति है जिसे ‘एक राष्ट्र एक जातीय संस्कृृृृृृृृति’ की विचारधारा वाले कुछेक कथित विचारक (?)वस्तुनिष्ठ रूप में समझ पाने में असमर्थ होते हैं, तदेव वे भारत को ‘एक राष्ट्र’ या ‘एक संस्कृति का राष्ट्र’ मानने के बजाय सर्वथा मनगढ़न्त एवं नितान्त असत्य तथ्यों को उकेरते हुए भारत जैसे संस्कृति-धनी राष्ट्र की प्रसंगित भारतीय विविधताओं को ‘विभिन्नता’ बताते हुए ‘विभिन्न समुदाय, विभिन्न संस्कृति और विभिन्न अस्मिताओं की खिचड़ी’ वाला देश करार देते हैं। ऐसे विवेकशून्य कथित बौद्धिक भारत को जबरिया ‘बहुराष्ट्रिकों का समूह’, ‘बहुसंस्कृतियों का खिचड़ी जैसा समुदाय’ सिद्ध करना चाहते हैं। ऐसे सभी मतिभ्रमों से कहना होगा कि भारत को विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न अस्मिताओं की खिचड़ी वाला देश/समाज मानने की अपनी ढाई चावल की खिचड़ी आपको अलग पकानी ही है, तो भी वास्तविक वस्तुस्थिति को वस्तुगततया स्वीकारना ही चाहिए आपको।

औ...र, वास्तविक वस्तुस्थिति-अवधारण के क्रम में प्रथम तो यही मानना होगा कि ‘भारत’ एक राष्ट्र/देश या समाज के रूप में कोई ‘भोज्य वस्तु नहीं’ है, अपितु यह बहु-बहुसंख्यक समवायिक मानसिकता के विचार-चेतन, भाव-चेतन, संस्कार-चेतन, संस्कृति-चेतन, चरित्र-चेतन राष्ट्रिकों का विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र है जिसकी संस्कृति, संस्कार, जीवनाचार आदि स्वयं में अति विशिष्ट हैं। 

द्वितीयतः, इसे यदि ‘खिचड़ी’ का रूपक देने पर ही आमादा हैं आप, तो भी मेरे भाई, आपको हृदयंगम करना ही होगा कि भारत विविध संस्कृतियांे/समूहों वाले ‘दाल-चावल‘ के मिश्रण/अपमिश्रण वाली ‘कच्ची खिचड़ी’ नहीं है। ‘खिचड़ी’ यदि अनपकी हो तो ही उससे दाल-चावल के दानों को बीन कर अलग करने वाले खिचड़ी के अवयवों को अलग-थलग कर खिचड़ी को विखण्डित कर सकते हैं जबकि भारत ‘विविध संस्कृतियांे/समूहों वाले ‘दाल-चावल‘ के समवायिक समरस मिश्रण वाली ऐसी पकी खिचड़ी’ है जिसमंे भारत के विविध अंचलों में जन्में-पले-बढे विविध आचार-विचार वाले जन के ‘विविध प्रकारों के साठा से लेकर काला नमक और बासमती प्रकारों तक के चावल और ‘विविध प्रकारों की दालें (अरहर, मूंग, मसूर, उर्द, चना, मटर, राजमा आदि की दालें)’ औ...र ऐसे चावल-दाल के समवायिक मिश्रण विविध स्थानिक समूहों के ‘विविध रीति-रिवाजों के नमक-मसालों’ के साथ मिलकर ‘समन्वय की अदहन’ में ‘समय के ताप’ से पक कर इस तरह ‘एकमेक’ हो चुके हैं कि पकी खिचड़ी वाले ’भात की प्रत्येक सीत में विविध दालों-नमक-मसालों के रस और दाल के प्रत्येक कण में भात-नमक-मसालों के रस विविध खुश्बू सहित एक दूसरे में रस-भिन गए हैं; विविध संस्कृतियों का ‘तड़का (छौंका)’ लगा है उनमें ऊपर से। छौंका लगने के बाद तो खिचड़ी का स्वाद ही बदल जाता है। अब यदि खिचड़ी के अवयव यदा-कदा अलग दिखें तो भी इस पकी खिचड़ी के किसी अंश से उनका एकमेक रस, उनका ‘परस्पर भिनाव’, उनकी सामवायिक सुगन्ध, पौष्टिकता एवम् स्वाद कभी अलग या विवर्णित नहीं की जा सकती इसलिए कि पकी खिचड़ी सुगन्धित, स्वादिष्ट तभी प्रतीत होगी जब दाल-चावल आदि खिचड़ी के सभी अवयवों के रस एक-दूसरे में ‘भिन’ जाने से समरस बन चुके हों। इस पकी खिचड़ी वाले रूपक सदृश समवायविक संस्कृति/संस्कार से बिलगाव या भिन्नता मात्र वहाँ दृश्यमान हो सकती है, जहाँ किसी दुराग्रह में प्रसंगित बिलगाव को जबरिया बनाए रखने का हठ वाचाल हो।  

 बताते चलें कि पूर्वांचलीय उ॰ प्र॰ में ‘खिचड़ी’ का बहुत महत्त्व है। वहाँ लोकोक्ति है: ‘खिचड़ी के चार यार, दही, पापड़, घिउ (घी), अचार। वास्तव में भारत/भारतीयता की प्रसंगित ‘पकी खिचड़ी’ में धर्म/अध्यात्म का ‘दही ’, भरतत्व सह भा$रतत्व सह भारतीत्व का मौलिक ‘घी’, वैदिक संस्कारों का ‘अचार’ और अधुनातन ज्ञान-विज्ञान का ‘पापड़’ सहयुजित, सुयोजित करके भरपूर पौष्टिकता वाला अप्रतिम व्यंजन बन जाता है पकी खिचड़ी वाला प्रसंगित व्यंजन। ऐसे व्यंजन से प्राप्य सुपाच्य कार्बोहाइड्रेट, विविध प्रोटीन, दुर्लभ खनिज (Rare Earths) स्वरूपीय आचार, विचार, संस्कार से ‘भारत’ देश/राष्ट्र/समाज के शरीर-मन-बुद्धि को पुष्टि ही प्राप्त होती है, बशर्ते खिचड़ी में छौंका प्रखर राष्ट्रवाद का लगा हो। निस्सन्देह, भारत एवं भारतीयता को ऐसे ही राष्ट्रवादी विचार, आचार वाले संस्कारों से समवायिक सुपोषण प्राप्त होता रहा है।   

 अतएव, अपेक्षित है कि मतिभ्रमी अपना भूल-सुधार शीघ्रातिशीघ्र साकार करें। प..र..न्तु प्रतीततया ऐसे मतिभ्रमी अपने दुराग्रह में वांछनीय संशोधन के लिए सहजता से तत्पर नहीं होंगें इसलिए कि अपनी अल्पज्ञता, कदाशय, हठधर्मी या कि साजिशी दुराग्रह का प्रभासन करते समय ऐसे मतिभ्रमी भूल जाते हैं कि सममनस्क राष्ट्रीय वैचारिकी विभिन्न जनसमूहों को समरस करके उनके समूहमन को समवायित करके विलग जनसमूह के बजाय एक एकरस समरस समवाय बना देती है; तभी सम्भूत होता है भारत सदृश भू-सांस्कृतिक राष्ट्र। ऐसी विशिष्ट भू-सांस्कृतिकता वाला भारत वास्तव में विविधताओं में एकत्व या कि अनेकत्व में एकात्मकता को मूर्त्तमान करने वाला एकात्म भारत, पकी खिचड़ी वाली संस्कृति के रूपकत्व को एवम् तद्गत एकमेकीय संस्कारों की समवायिकता को ही रूपायित करता है। ऐसी एकात्मकता को वस्तुनिष्ठ स्वरूप में तभी समझा जा सकेगा जब हम भारत के साथ-साथ भा$रतत्व को, उससे बढ़कर भारतीत्व के समेकन को, तद्गत सुफलित तितिक्षाशील सर्वसहिष्णुतावादी समन्वयवाद आदि को सम्यक्तया अनुशीलित कर सकेंगे।

औ...र, मानना ही होगा कि यदा-कदा कतिपय आपवादिक प्रतिकूल भनभन-भनभन, भिनभिन-भिनभिन को अपवाद मानते हुए यदि बहु-बहुसंख्यक की राष्ट्रीय संवेदना, राष्ट्रीय संचेतना, राष्ट्रीय चरित्र के आधार पर भारत का लोक सत्य अवधारित करें, तो यह उपरि-अंकित भा$रतत्व, भारतीत्व आदि के सादृश्य में ही रूपाभ दिखेगा। 

तथ्यतया भारत के संदर्भ में लोक-सत्य यही है कि भारत की शाश्वतता, भारत की चिन्मयता, ‘भारत+त्व’, ‘भारती+त्व’, ‘भारतीयत्व-समग्र’ औ..र, भारत का ‘राष्ट्रत्व’ आदि ऐसे स्वयंतथ्य हैं जो विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किए जाने वाले अकूत विनाश के बावजूद बीज रूप में भारतीय जनमानस में अद्यतन गहरे पैठे हैं। वे पूर्णतया समाप्त होने वाले भी नहीं है, भले ही ऊपरी तौर पर भारतीयता से, भारतीय संस्कारों से आम भारतीय यदा-कदा विच्युत् दिखे, तो भी उसके मन-मस्तिष्क में, उसकी नसों में बहने वाले लहू में भारतीयता या कि भारतीयता-समग्र के उपरि-वर्णित संस्कार (सुषुप्तावस्था में ही सही) विद्यमान रहते हैं मानों उसके गुणसूत्रों के ‘डी॰एन॰ए॰’ में प्रविष्ट हो गए हों वे। 

इस तरह प्राचीनकाल से अद्यतन विद्यमान ‘चिन्मय भारत’ की बीजरूपीय विद्यमानता और तद्गत शाश्वतता के सम्बल से कह सकते हैं कि ‘मृण्मय भारत’ के साथ ही भा+रतत्व सह भारती+त्व से सम्पृक्त ‘चिन्मय भारत’ और भारत की शाश्वत चिन्मयता से सम्पृक्त ‘शाश्वत भारत’ भी हजारों वर्षों से अस्तित्ववान् रहा है यहाँ जिसमें राष्ट्रत्व के प्रायः सभी वांछनीय तत्त्व समाहित रहे हैं ऋक् युग से।

औ...र, कृत कार्य/प्रकार्य के औचित्य के प्रमाणक होते हैं लब्ध फलित। तथैव, ‘भारत के सम्बन्ध में फलित कृत-कार्य देखें तो ऐसा फलित भारत राष्ट्र के एवं यहाँ के निवासीगण के सामूहिक नामधेय क्रमशः ‘भारत’ एवम् ‘भारतीय’ होनें के औचित्य को प्रमाणित करता दिखता है। यह भारत के भरतत्व सह भा+रतत्व सह भारतीत्व आदि के सुफलित: भारतीयता-समग्र के विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र को भी प्रमाणित कर देता है।

तथ्यतया ज्ञान एवं ज्ञानवान् के प्रति आदरभाव ( जिसका प्रतीक आभारत सूर्य-पूजा की ललक आदि के रूपों में दृश्यमान  आज भी है ) के साथ ही सात्त्विक रागात्मक रचनात्मकता, सर्वकल्याणक हितकारिता, समन्वयवादिता, लोक के प्रति सम्मान की भावना, भोग के साथ त्याग-भावना (येन् त्यक्तेन भुंजीथा), सत्-चित्-आनन्द के समवेत से सहयुजन (मोक्ष-प्राप्ति) की अभीप्सा, धर्मालुता, आस्तिकता के साथ-साथ चिन्मयता (अध्यात्मिक ज्ञान)-प्राप्ति की ललक (शब्दान्तर से आध्यात्मिक उत्कर्ष के प्रति ललक), दकारत्व : दान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह/इन्द्रिय-संयम) सदृश देवोपम भावानुभाव, के प्रति सम्मान-भाव, लोकसंग्रह के प्रति सचेतता, अनाचार-निरोधन की लालसा, मर्यादाशीलता, राष्ट्र के प्रति त्याग, बलिदान के लिए तत्परता, सामाजिकता, परहितरतता आदि की सात्त्विक कामना, अहिंसा, सत्त्वशीलता, ऋतशीलता सदृश सद्गुण, सर्वशान्ति, सद्भाव एवं सर्वकल्याण की सदिच्छा आदि के वैशिष्ट्य न्यूनाधिक रूप में आज भी आभारत बहु-बहुसंख्य भारतीय जन-मन में परिव्याप्त हैं, जो व्यक्ति-दर-व्यक्ति, समय-दर-समय कम या अधिक तो होते रहे हैं, परन्तु जिनकी विद्यमानता भारत-भूमि पर प्रायः सतत दृश्यमान रही है। तेनेव, मानना होगा कि ‘भा+रतीय’, ‘भारती+य’ वैदिक संस्कार सह शिवत्व, रामत्व, कृष्णत्व, जिनत्व, बुद्धत्व से सहयुजित भारतीयता के संस्कार’ हिमालय के दक्षिण, हिन्द महासागर के उत्तर, पूर्व में ब्रह्मपुत्र एवं पश्चिम में सरस्वती-सिंधु नदी तक विस्तृत भारतीय भूगोल में ‘एक भारत’ या कि ‘एकात्म भारत’ के ‘राष्ट्रीय चरित्र’ के रूप में कमोबेश सर्वत्र सर्वदा विद्यमान रहे हैं। वास्तव में ऐसे राष्ट्रीय चरित्र वाली ‘भारतीयता’ के संस्कार ही प्रागैतिहासिक काल से अद्यतन भारत को एक विशिष्ट भू-सांस्कृतिक इयत्ता के रूप में, एक विशिष्ट ‘राष्ट्र’ के रूप में, सुस्थापित करते आए हैं। भारतेतर जगत् में राष्ट्रत्व का प्रत्यय अद्यतन समुचिततः परिभाषित नहीं है; अधिकांश पाश्चात्य राष्ट्रविद् राष्ट्रत्व का आधार राजनैतिक सम्प्रभुता या कि शासनिक सत्ता पर आधृत मानते हैं, जबकि भारतीय मनीषा के अनुसार भारतीय राष्ट्रत्व संस्कृति (Culture) पर आधृत है। इसीलिए भारत आरम्भ से ही मात्र एक मृण्मय भू-क्षेत्र के बजाय शाश्वत चिन्मय भू-सांस्कृतिक राष्ट्र (Geo-Political Nation) के रूप में सदैव अस्तित्वमान् रहा है, आज भी है। 

औ...र, कहना अनावश्यक नहीं कि भारत का प्रसंगित सम्पूर्ण प्राचीन वैभव  उपरि-इंगित विशिष्ट ‘भारतीयता’-समग्र का विशिष्ट अवदान  ही था। तथैव, सहस्त्रादिक देशज विदेशज मनीषी जो उपरि-इंगित भारतीयता के प्रशंसक हैं उनकी प्रशस्तियों को निरर्थक नहीं माना जा सकता। वह सब अकारण भी नहीं है। 

प..र..न्तु , भारत सम्बन्धी देशज-विदेशज प्रशंसाओं से चमत्कृत या हतप्रभ होने या कि उन्हें नकारने के बजाय भारतीयता का अनुशीलन यदि सम्मादिट्ठि से करें, तो भी तद्विषयक निम्नांकित देशज-विदेशज टिप्पणियों को हम सटीक औ...र, सर्वस्वीकार्य ही पाएँगे। तब हमें ख्यात पाश्चात्य विचारक हरबर्ट रिजले की इस टिप्पणी से (और इस जैसी अनेकानेक देशज-विदेशज टिप्पणियों से भी) सहमत ही होना पड़ेगा कि - “समाज की, नीति की, भाषा की, रस्म-रिवाज की और धर्मों की जो विभिन्नता भारत में हमें स्पष्ट दिखाई देती है, उन सबके पीछे एक निश्चित मौलिक एकता है जिसने हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक भारतीय जीवन को एक सूत्र में बाँध रखा है।” क्या श्री रिजले का प्रसंगित अभिमत निरर्थक   है ? नहीं नाऽऽ!

जहाँ तक भारतीय मनीषियों के अभिमतों का प्रश्न है, ‘गायन्ति देवाः किल् गीतिकानि’ सदृश सूक्तिगानों को अनसुना कर दें तो भी अधुनातन बहु-बहुमान्य भारतीय विद्वानों के अग्रांकित अभिमतों को भारतीयता को वस्तुगततया समझने-समझाने के क्रम में अनदेखा नहीं किया जा सकता, प्रत्युत प्रतीक रूप में अंकित निम्नांकित अभिमतों के समापवर्त्य से भी भारतीयता को समझा-समझाया जा सकता है। यथा- 

ख्यात भारतविद् वासुदेवशरण अग्रवाल कृत ‘भारत की मौलिक एकता’ के शब्दों से भी हमंे सहमति  ही जतानी होगी कि- “भारतीय जीवन में हमें सब प्रकार की विविधता मिलती है। भेदों से यहाँ के मनुष्य परेशान हुए। अपनी बुद्धि से बाहरी भेदों के पर्दे में छिपी हुई आंतरिक एकता को उन्होंने सात्त्विक भारतीय संस्कृति में और भारतीय संस्कारों में ढूँढ निकाला।” अथर्ववेद के मंत्र 12/1/16 (ता नः प्रजाः सं दुह्रतां समग्रा, वाचो मधु पृथिवी धेहि मह्यम् ) एवं 12/1/45 (जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं, नाना धर्माणं पृथ्वी यथौकसम्) की विवेचना करते हुए श्री अग्रवाल आगे लिखते हैं- “भाषा, जन और धर्म की दृष्टि से हमारी अनेक विभिन्नताएँ हैं।....किन्तु इस प्रकार की विभिन्नता को, जो प्रकृति की ओर से हमें मिली है, जन सहर्ष स्वीकार करता है और इस कठिनाई को अपनी बुद्धि से जीतता है। विभिन्न होते हुए भी प्रजाओं में समग्रता या एकता का भाव मन के ऊँचे धरातल पर विद्यमान है। विश्व के इतिहास में विभिन्न सामग्री को एक में ढाल कर ऐक्य-संपादन का इतना विशाल और सफल प्रयोग किसी दूसरे देश में नहीं हुआ जैसा आज तक भारतवर्ष में होता रहा है। अनेक संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समन्वय प्रधान भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है। यहाँ लोगों की दृष्टि में इस प्रकार का ऐक्य भाव सर्वोपरि था जिसमें प्रत्येक समुदाय को बिना उखाड़े या नष्ट किए हुए समग्र (राष्ट्र के) शरीर का राष्ट्रीय अंग मान कर स्वयं विकसित होने के लिए स्वतंत्र रहने दिया गया।” ऐसी विवेचना तथ्यसंगत, तदेव, स्वीकार्य ही मानी जानी चाहिए।   

औ...र, भारत/भारतीयता के गहन अध्येता, ‘गंधमादन’, ‘निषाद बाँसुरी’, ‘कामधेनु’, ‘त्रेता का वृहत्साम’ जैसी शोधपरक कृतियों के प्रणेता अधुना मनीषी कुबेरनाथ राय तो ‘भारत’ को मात्र मृण्मय सत्ता ही नहीं वरन् विशिष्ट संस्कारों से सुसम्पन्न विशिष्ट बोधसत्ता: ‘चिन्मय सत्ता’ और शाश्वत इयत्ता के रूप में भी स्वीकारते हैं वे। भारत-भारतीयता की प्रसंगित सत्ता-इयत्ता वास्तव में विशिष्ट बोध-सत्ता ही है।  

औ...र, बताते चलें कि भारत की विलक्षण विचक्षण भारतीयता को सारवान् स्वरूप में रेखांकित किया था राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने  निम्नांकित स्वरूप में - 

     एक हाथ में कमल, एक में धर्मदीप्त विज्ञान

    लेकर उठने वाला है धरती पर हिन्दुस्तान

वास्तव में ‘धर्मदीप्त विज्ञान के साथ-साथ त्याग-तपस्या, निष्कलुषता, अहिंसा और शान्ति-प्रेम आदि को समवेत में साक्षात् कराने की सक्षमता’ का पुंजीभूत है कमलवत् भारत। यह भी  भारतीयता-समग्र का एक विशिष्ट रेखांकनीय वैशिष्ट्य है। भारत के परिप्रेक्ष्य में ‘धर्मदीप्त विज्ञान’ अर्थात् ‘चिन्मय पावन धर्म के साथ विज्ञान का समुचित आराधन’ भा+रत के ‘भारती+यता’ के साधकों के लिए असम्भव नहीं है, भले ही यह कितना ही विचक्षण विलक्षण हो। ‘दिनकर’ जी भारत को ‘भूमण्डल भर का शील’ (देखें ‘नीलकुसुम’) और ‘मनुष्य जाति की बहुत बड़ी कविता’ (देखें ‘परशुराम की प्रतीक्षा’) भी बताते हैं। ऐसे समाकलन भी निराधार नहीं हैं।

औ...र ,‘भारत और मानव संस्कृति’ कृति के ख्यात कृतिकार विश्वम्भरनाथ पाण्डेय द्वारा अपनी एक अन्य कृति ‘भारतभूमि की भौगोलिक अखण्डता’ में लिखा गया है- “वास्तव में हमारी यह मौलिक एकता भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य से बहुत पुरानी है। यह कोई नई चीज नहीं है बल्कि इसके पीछे इतना पुराना इतिहास है जो ऐतिहासिक कालों को भेद कर हमें प्रागैतिहासिक काल में पहुँचा देता है। +++ प्राचीन भारतीय अपने महान् देश को एक भारतवर्ष नाम से ही पुकारते थे। इस देश के नाम ‘सिन्ध’, ‘हिन्द’ अथवा ‘इण्डिया’ विदेशियों ने रखे हैं।” +++ ‘भारतवर्ष’ शब्द के पीछे एक गहरी ऐतिहासिक विशेषता है जो हमारी मौलिक एकता को जाहिर करती है। यह एक बड़ा पुराना सिद्धान्त है कि बहुत सी चीजें एक नाम से तभी पुकारी जाती हैं जब उनके पीछे एकता की भावना हो। इसीलिए हमारे प्राचीन ऋषियों ने अनेक जातियों, भाषाओं और धर्मों के होते हुए भी इस देश को एक भारतवर्ष के नाम से पुकारा।” ऐसे प्रकथनों से भारत का प्रसंगित वैशिष्ट्य ही प्रमाणित होता है। 

 औ...र, भारतीयता को समझने-समझाने के क्रम में अन्यान्य मनषियों के स्वीकार्य विचारों के साथ-साथ माननीय हृदयनारायण दीक्षित (ख्यात विचारवान् पत्रकार, उ॰ प्र॰ विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष) का यह विचार भी महत्त्वशील है कि “यहाँ अंग्रेज आए, अंग्रेजी राज्य हुआ। राज्य अंग्रेजी था मगर राष्ट्र सनातन। तुर्क आए, राज्य इस्लामी था मगर राष्ट्र हिन्दू। अनेक अवसरों पर भारत छोटे-छोटे राज्यों में भिन्न-भिन्न किस्म की राज्य-व्यवस्थाओं में बँटा रहा, मगर इस राष्ट्र के जीवन-निकष सनातन ही रहे।” (देखें कृति ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ :  हृदयनारायण दीक्षित)। 

औ...र,  एजाज अहमद प्रभृति ख्यात मुस्लिम विद्वान् लिखते हैं--  “हमारी अद्वितीय सभ्यता तब भी स्पष्ट रूप से भारतीय दिखाई देती है जबकि वह न तो एक साझा भाषा से जुड़ी है और न एक साझा धर्म से।...प्राचीन प्रजातीय पौराणिकता उसे बाँधे हुए है।.....धर्मनिरपेक्षता की या कम से कम आपसी सद्भाव की विचारधारा भारत में स्वयं राष्ट्रवाद की विचारधारा के अटूट अंश के रूप में पैदा हुई।.....धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सद्भाव के विचार भारत की विचारधारा के बुनियादी घटक बने रहे।....राष्ट्रीय आन्दोलन का हिरावल दस्ता धर्मनिरपेक्षता को हमेशा एक आधुनिक राष्ट्र में भारत के परिवर्तन के लिए आवश्यक समझता रहा।......आधुनिक भारतीय राष्ट्र जो अन्दरूनी विविधताओं से कहीं अधिक सम्पन्न था लाजिमी तौर पर उस तरह एक भाषा और एक संस्कृति वाली राष्ट्रीयता से भिन्न रहा जो यूरोप की और आमतौर पर उन्नत पूँजीवाद की खासियत है।” (देखें: ‘नया पथ’, अप्रैल-जून 2008)

ऐसे विचारक अनगिनत हैं, जिनमें से प्रतीक स्वरूप में उपरि-नामित विचारकों को उद्धृत किया गया है जिनके सारवान् अभिमतों के आधार पर भारतीयता को बहु-बहुलांशतया जाना-समझा जा सकता है। 

तदनुसार, पुनः-पुनः ध्यातव्य है कि भारत कुछेक लाख वर्ग कि॰मी॰ का भूखण्ड या कुछेक करोड़ जन के निवास की भूमि मात्र नहीं है; बल्कि विशिष्ट सांस्कारिक जीवन-मूल्यों से आभरित राष्ट्रत्व से समेकित एक शाश्वत चिन्मय भू-सांस्कृतिक राष्ट्रीय इयत्ता है जिसका सरोकार ‘भरतत्व’, ‘भारतत्व’ एवं ‘भारतीत्व’ आदि से सम्पृक्त संस्कृति से मूलतया सरोकारित है जिसके परिणामी फलित से यहाँ अनेकानेक विशिष्टताओं के साथ-साथ ‘समन्वयवाद’ और ’अनेकता में एकता’ सदृश अनेक सुफल लब्ध हुए जो आभारत कमोबेश आज भी विद्यमान हैं। इसी विद्यमानता के सुफलित से  ज्ञान-विज्ञान-प्रज्ञान के साथ ही अध्यात्मवाद और धर्मालुता सात्त्विकता के साथ-साथ बहुविध भौतिक विकास का समन्वय स्थापित करता रहा है भारत; आज भी कर रहा है। प्रकटतः इसी सकारात्मक सांस्कारिक सांस्कृतिक क्रियात्मकता के फलस्वरूप भारत वस्तुतः एक भू-सांस्कृतिक दृष्टि से अखण्ड एकात्म भारत बन सका है। 

यतः सांस्कृतिक ‘भारतीयता’ को बढ़ावा देने पर टूट सकता है हमारा ‘भारत’ या/और ‘भारत का, भारतीय का, विश्व का अहित हो सकता है’-- ऐसे सभी कुतर्की प्रकथन न केवल सत्य-तथ्यों से सर्वथा विपरीत हैं वरन् आत्मछली भी हैं। ऐसे सभी कुतर्कों का छल ‘एक संस्कृति’ शीर्षक से लिखित प्रख्यात समाजवादी डॉ॰राममनोहर लोहिया के आलेख से भी विभंजित है। विभिन्न भारतीय प्रान्तों की सांस्कृतिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए डॉ॰लोहिया अटूट भारतीय सांस्कृतिक एकता के सम्बन्ध में लिखते हैं- “जो लोग देश की एकता की सांस्कृतिक बुनियाद को नहीं समझते, वे ही टूट की बातें करते हैं।” डॉ॰ लोहिया का यह संकथन भारत के राष्ट्रीय चरित्र के एक वैशिष्ट्य: ‘भारतीयता’ के सतत अक्षुण्ण स्वरूप का विशिष्ट परिचायक है। 

यतः आवश्यकता केवल संदर्भगत ‘भारतीयता-समग्र’ के वस्तुगत स्वरूप को वस्तुनिष्ठतया जाज्ज्वल्यमान बनाए रखने की है जिसके सम्बल से हमारा भारत न केवल प्राचीन वैभव, प्राचीन गौरव पुनः प्राप्त कर सकता है, अपितु सम्पूर्ण विश्व भी सात्त्विकता, सद्भाव, सर्वकल्याण आदि का अनुसरण करके परम शान्ति के साथ भौतिक-पराभौतिक विकास का चरम प्रकर्ष प्राप्त कर सकता है।

आधार ग्रंथ: 

1.  आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता: कृपाशंकर सिंह

2. इण्डोनेशिया के संस्कृत शिलालेख : देवेन्द्रनाथ ठाकुर 

3. उपनिषद्: बृहदारण्यक, ईशादि नौ उपनिषद  

4. जैन धर्म का प्राचीन इतिहास: बलभद्र जैन

5. क्या है भारत क्या है भारतीयता : विजय रंजन  

6. धर्मशास्त्र का इतिहास (1-5 खण्ड): पी॰ वी॰ काणे

7. पुराण: मत्स्य, मार्कण्डेय, भागवत, वायु , विष्णु , स्कन्द पुराण

8. प्राचीन भारत: प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली 

9. पृथ्वीपुत्र: वासुदेवशरण अग्रवाल 

10. बंकिमचन्द्र: प्रतिनिधि निबन्ध: सम्पा॰ अमित्रसूदन भट्टाचार्य, अनु॰ प्रयाग शुक्ल

11. भारत का इतिहास: रोमिला थापर

12. भारत की राष्ट्रीय संस्कृति: डॉ॰एस॰आबिद हुसैन (अनु॰: दुर्गाशंकर शुक्ल) 

13. भारत और मानव संस्कृृति (खण्ड 1 व 2): डॉ॰ विश्वम्भरनाथ पाण्डेय

14.  भारत सावित्री   : वासुदेवशरण अग्रवाल

15.  भारतमाता धरतीमाता : डॉ॰ राममनोहर लोहिया

16. भारत की मौलिक एकता: वासुदेवशरण अग्रवाल

17. भारतीय संस्कृति: साने गुरु जी: अनु॰ बाबूराव जोशी 

18. भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश (भाग 1, 2): डॉ॰ रामविलास शर्मा

19. भारतीय संस्कृति कुछ विचार : डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन् 

20. भारतीय पुरा-ऐतिहासिक पुरातत्व: धर्मपाल एवं पन्नालाल

21. भारतीय समाज: श्यामाचरण दुबे, अनुवादक: वन्दना मिश्र

22. भारतीयता की पहचान: डॉ॰ विद्यानिवास मिश्र

23.  महाभारत

24. रघुवंशम् : कालिदास 

25. रचना संचयन : कुबेरनाथ राय, संपा॰ हनुमानप्रसाद शुक्ल

26.  राष्ट्र सर्वोपरि: डॉ॰ हृदयनारायण दीक्षित

27.  विश्व सभ्यता का इतिहास: उदयनारायण राय

28.  वेद: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद: टीकाकार : आ॰ श्रीराम शर्मा  

29.  वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास (भाग 1-4): पी॰एन॰ओक

30.  वैदिक सम्पत्ति: रघुनन्दन शर्मा

31. समय और संस्कृति: प्रो॰ श्यामाचरण दुबे 

32. समिधा: डॉ॰ सम्पूर्णानन्द

33.  संस्कृति और साहित्य: डॉ॰रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’

34. संस्कृति के चार अध्याय: रामधारी सिंह ‘दिनकर’  

35. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (दो खण्ड): आदि-महाकवि वाल्मीकि

36. हम भारत के लोग: प्रस्तावना: पंकज विष्ट, संपा॰ राजेन्द्र भट्ट

37.  हमारी विरासत: तेजपाल सिंह धामा

                            पत्रिकाएँ

 38. अवध-अर्चना: अंक 99

39.  चिन्तन-सृजन:  अंक 1/वर्ष 2, 2/6,  13/4 , 14/2; 15/1   

40.  नया पथ: अप्रैल-जून 2008

                        अंग्रेजी पुस्तकें

41. A  Nation  In  Making  :  Surendranath   Bannerji 

42. Discovery of India    :   J.L. Nehru

 43. Foundation Of Indian Culture : Maharshi Arvind 

44. History And Culture Of Indian People : R.C.  Mazumdar

 45. Indian  Society  And  Social  Institution  :  H.R.  M.  Surjeet 

46. Our  Heritage   : Humayun  Kabir

47. The  History  Of   India   As Told By Its Own Historian :   Eliot &  Dowson

48. The Wonder That Was India : A.L. Bosham

49. Vedic Age :  Dr. S. K. Chatterjee


कोई टिप्पणी नहीं: