मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन प्रणीत आलेख : एकादश किश्त : भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग...

                                      भारतीय राष्ट्रवाद का क ख ग...

                                              
राष्ट्रवाद ! स्थूल रूप में परिभाषित करना हो तो लोचनान्धक विभ्रमों को एक किनारे करके कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद ‘राष्ट्र का वाद’ है; अर्थात् राष्ट्र सम्बन्धी वाद अर्थात् राष्ट्र के प्रति ‘ममत्व’ का वाद, राष्ट्र के प्रति ‘मम’ का वाद, राष्ट्र के प्रति अपनत्व का वाद है यह। मानव-मन की सहज गति के अनुसार किसी के प्रति मम/ममत्व/अपनत्व का भाव जाग्रत होते ही उसके कल्याण, उसकी समृद्धि, उसकी संरक्षा, उसके सम्मान की संरक्षा सदृश भावानुभाव स्वतः अनुषंगतः जाग्रत हो जाते हैं उसमें। इस तरह राष्ट्रवाद का आनुषंगिक फलित है कि राष्ट्रीय कल्याण, राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय गौरव का वाद अनुषंगतः बन जाता है राष्ट्रवाद। तब इसमें राष्ट्रिक के राष्ट्र के प्रति प्रेम, समर्पण, उत्सर्ग का भाव और ऐसे ही अन्यान्य उदात्त भावों को साकार करने का आग्रह स्वतः समाहित हो जाता है; होता जाता है। 
तथ्यतः ‘राष्ट्र’ प्लेटो-प्रणीत जातीय संस्कृति के आधार पर गठित छोटे-बड़े यूरोपीय ‘नेशन स्टेट’ का अर्थवाची या कि छोटे-बड़े यूरोपीय व्यापारिक-सांस्कृतिक केन्द्र वाले ‘सिटी नेशन’ का अर्थवाची नहीं है। यहाँ ‘वाद’ भी हीगल के ‘थीसिस-एण्टीथीसिस-सिन्थेसिस’ वाला वाद नहीं है। यह ‘वाद’ न्यायशास्त्रीय वितण्डा-जल्प-वाद वाला वाद भी नहीं है। प्रत्युत संदर्भगत शब्द-बन्ध में ‘राष्ट्र’ और ‘वाद’ की सामासिक अभिव्यंजना वाचाल है। राष्ट्रवाद के सम्यक् अर्थायन के क्रम में अच्छा होगा यदि हम राष्ट्रवाद के ‘राष्ट्र’ और ‘वाद’ का अलग-अलग निर्वचन करने के बजाय भारतीय मनीषा के समानुरूप एक सामासिक शब्द के रूप में ‘राष्ट्रवाद’ को निर्वचित करें। निःसन्देह, पश्चिमी गोलार्द्ध में प्लेटो के युग से लेकर अद्यतन अर्नेस्ट रेनन की कृति ‘ह्वाट इज नेशन’ (अंगेजी अनुवाद) तक राष्ट्रवादी विमर्श उपलब्ध है परन्तु हमारे यहाँ राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारणा पश्चिम के राष्ट्रवाद सम्बन्धी विन्यास-परास के सापेक्ष सर्वथा भिन्न है। हमारे यहाँ राष्ट्रवाद एक सुनिश्चित विमर्श का द्योतक है। सुराष्ट्र, महाराष्ट्र जैसे राज्य ही नहीं, अपितु चक्रवर्ती सम्राट तक की अवधारणाएँ बहुप्रचलित रही हैं हमारे देश-समाज में। राष्ट्र को कौटिल्य राज्य के 7 अंगों में सर्वोपरि महत्ता क अंग का अंग कहा है । वस्तुतः राष्ट्रवाद एक स्वविश्रान्त भाव-वाचक संज्ञा है। राष्ट्रीय भाव, राष्ट्रीय इयत्ता का भाव, राष्ट्रीय अस्मिता का भाव, राष्ट्रीय गरिमा का भाव और राष्ट्रीय गरिमा/अस्मिता/इयत्ता के साथ-साथ राष्ट्र-कल्याण को समवेत में अक्षुण्ण बनाए रखने का भाव, राष्ट्रीय गरिमाबोध के साथ-साथ राष्ट्र केे प्रति समर्पण, उत्सर्ग आदि का समवेत परिचायक भाव है राष्ट्रवाद । धरातलीय स्तर पर इसे राष्ट्रव्यापी राष्ट्रभक्ति वालाकामन इन्टेन्शन आफ नेशन’ माना जाना चाहिए। ऐसे भाव जाज्ज्वल्य तभी होते हैं जब राष्ट्रिक राष्ट्र के प्रति आत्मीयता का, आत्म का भाव रख कर राष्ट्रीय, जातीय गौरव के प्रति, जन्मभूमि भारत के प्रति, भारतीयता के प्रति, भारतान्वयवर्धना, राष्ट्राय वर्धय और राष्ट्ररंजन के निर्देशों को साकार करे। ऐसा आग्रह प्रकटतया ‘राष्ट्रवाद’ अर्थात् राष्ट्र के प्रति प्रेम प्रत्युत राष्ट्र के प्रति अनुराग, राष्ट्र के प्रति त्याग आदि के संश्लिष्ट भाव के रूप में राष्ट्र के प्रति राष्ट्रिक के समर्पण सदृश संस्कारों से उपजता है। विभ्रम तब उत्पन्न होता है जब हम राष्ट्रवाद के विषय में भारतीय मनीषा से इतर पश्चिमोन्मुखी हो जाते हैं। 
इसी क्रम में शब्द ‘राष्ट्रीय’ का विन्यास भी देखें- 
अभिधा में ‘राष्ट्रीय’ का अर्थ है ‘राष्ट्र से सम्बन्धित’। ‘राष्ट्र’ चूँकि जन-संकुल का निवास भी होता है और जन में अनेक कुरीतियाँ स्थानिक और बड़े स्तर पर हो सकती हैं लेकिन राष्ट्रीय गुणगान में हम कुरीतियों को संयोजित नहीं कर सकते हैं। तथैव, व्यंजना में ‘राष्ट्र की अस्मिता, गरिमा से सम्बन्धित’, लक्षणा में ‘राष्ट्र की गरिमा से लगाव/ममत्व से सम्बन्धित’ अर्थवाचन से ‘राष्ट्रीय’ का अर्थविन्यास सटीक स्वरूप में जाना जा सकता हैै। इसी राष्ट्रीय शब्द में भाववाचक प्रत्यय ‘ता’ संयुजित करके ‘राष्ट्रीयता’ का भाव अर्थायित होता है। इस तरह ‘राष्ट्रीय’ अस्मिता से लगाव/ममत्व का भावबोध राष्ट्रीयता है जो मात्र निवासीयता का परिचायक नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे भावबोध की सांस्कारिक सैद्धान्तिक संज्ञा है ‘राष्ट्रवाद’। भाषिक आधारों पर राष्ट्रवाद के सहज अर्थायन के लिए इसे संक्षेपतः राष्ट्रीयता का वाद समझा जा सकता है।
औ..र, दो टूक कहें तो कहना होगा कि ‘राष्ट्रवाद’ राष्ट्र-कल्याण, राष्ट्रप्रेम या देशप्रेम मात्र तक सीमित नहीं, बल्कि यह राष्ट्रीय ‘भौतिक एकात्म’ की भावना, राष्ट्र से एकात्म की भावना है। इस उद्भावना से स्थानिक सभ्यता, आचार, वेशभूषा, भाषा आदि में किंचित् भिन्नता होने की दशा में भी सभ्यता और संस्कृति ‘समरूप-समरस’ बन जाती है जिसके संस्कार बन जाने पर संश्लिष्ट स्वरूप में जन्मती है राष्ट्र के प्रति समर्पण, राष्ट्रहित में उत्सर्ग की भावना जिसके फलित सदृश हैं देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रहित-संरक्षा आदि के भाव । विदेशीय का विरोध भी राष्ट्रवादी उद्भावना से ही वाचाल होता है लेकिन वह आनुषंगिक प्रलाभ है। 
औ..र, ऐसे भाव किसी क्षण-विशेष, अवसर-विशेष के लिए या कि विदेशी आक्रमण के समय पर या कि विदेशी/परदेशी के विरोध के लिए उपयोगी हैं और शेष समय के लिए निरुपयोगी--- ऐसा मानना तर्कसंगत नहीं है; अ..पि..तु आत्मघाती सिद्ध हो सकती है ऐसी अवधारणा। 
सोने की चिडि़या कहलाने वाले ऐश्वर्य-सम्पन्न प्राचीन भारत में आज से विदित हो कि 1000-1100 वर्ष पूर्व तक विशेषकर राजा भोज के शासनकाल तक उपरि-इंगित राष्ट्रीय भाव भरपूर मुखर थे। तब तक राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्र-कल्याण की हमारी दृष्टि धुँधलाई नहीं थी। पाश्चात्य आर्थिक इतिहासकार एंगस मेडिसन की कृति ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था : एक सहस्त्राब्दि’ के अनुसार ग्यारहवीं शती ई0 (भारत में मुस्लिम राज स्थापित होने के पूर्व) में वैश्विक उत्पादन में भारत का योगदान 28.9 प्रतिशत था जबकि अंग्रेजी राज स्थापित होने के समय यह योगदान 24.4 प्रतिशत तक आ गया था। बाद के वर्षों के दासताकाल में यह घटाव निरन्तर बढ़ता रहा। 28.9 प्रतिशत वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कब्जे का अर्थ है कि तत्कालीन भारत बहुविध उन्नत था। अनावश्यक नहीं यह कहना कि प्रसंगित उन्नति भारत के ‘भा + रत’ रहने के कारण हुई थी। यूँ ही नहीं बन गया था भारत सोने की चिडि़या।
11वीं-12वीं शताब्दी से सामाजिक-सांस्कृतिक पतन के कालखण्ड में चक्रवर्तित्व परम्परा क्षीण हो जाने पर (विशेषकर हर्षवर्द्धन के पश्चात्) सम्राटत्व के विलुप्त हो जाने के देशकाल में ‘हमारे अपने’ राष्ट्रवाद से केवल विमुख ही नहीं हो गए, प्रत्युत राष्ट्रवाद को तिलांजलि देकर ‘जयचन्द’ जैसे राजा विदेशी आक्रमणकारियों को भारत पर आक्रमण का न्यौता भी भेजने लगे। तब विदेशी दासता अवश्यंभावी होनी ही थी। महमूद गजनवी यहाँ से केवल धन लूट कर ले गया था, लेकिन मुहम्मद गोरी ने हमारे अपनों की राष्ट्र-विमुखता को पहचाना और उसका लाभ उठाया। यही इतिहास पुनः प्रत्यक्ष हुआ मीरजाफर, मीरकासिम, सिंधिया मानसिंह के युग में। राष्ट्रवाद-हीनता जनित राष्ट्रविमुखता का लाभ उठा कर ही अंग्रेजों ने बंगाल, अवध, मध्य प्रदेश, रुहेलखण्ड, उड़ीसा, बिहार, पंजाब, असम, कर्नाटक और फिर प्रायः सम्पूर्ण भारत में अपना राज जमा लिया। औ..र, कालान्तर में जब हमारा राष्ट्रवाद पुनः वाचाल हुआ तो सात समुन्दर पर राज करने वाले अंग्रेजों को भी भागना पड़ा यहाँ से। 
इसी क्रम का सत्य है कि पहले मुस्लिम आक्रान्ताओं ने, बाद में जर्मन मैक्समूलर और अंग्रेज मैकाले प्रभृति विदेशियों ने भारतीय संस्कृति को ध्वस्त/धूमिल करने का अथक प्रयास किया। किन्तु, अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा का मैकाले-शस्त्र अंग्रेजों पर ही भारी पड़ गया। अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों में अनेक ऐसे भी निकल आए जिनमें राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले राष्ट्रीय अस्मिता, जातीय गौरव सदृश भाव मुखरित हो गए। राना डे, राजा राममोहनराय, महर्षि अरविन्द, विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, राधाकृष्णन्, जाकिर हुसैन, सरोजिनी नायडू, पं0 मदनमोहन मालवीय आदि-आदि अनेक विद्वत्जन कालान्तर में प्रखर राष्ट्रभक्त सिद्ध हुए इस सीमा तक कि उन्होंने देश में राष्ट्रवाद की अलख को नए सिरे से जगा दिया।
राष्ट्र और राष्ट्रवाद को तनिक विस्तार से देखें-
वाङ्मयिक निषेचनों के आधार पर कह सकते हैं कि राष्ट्र एक विशिष्ट सांस्कारिक सांस्कृतिक सत्ता होती है। कालिदास ‘राष्ट्रीय ऋता’ की बात करते हैं। कुबेरनाथ राय भी राष्ट्र को सनातन मानते हैं। विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महामना मालवीय से लेकर वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभाध्यक्ष मा0 हृदयनारायण दीक्षित या/और प्रो0 शंकरशरण, प्रो0 मकरन्द परांजपे, ‘भास्वर भारत’ के संपादक डॉ0 राधेश्याम शुक्ल, ‘चिन्तन-सृजन’ के संपादक बी0 बी0 कुमार और अन्यान्य ख्यातिलब्ध लाखों विद्वानों तक (जिनकी सूची बहुत लम्बी है) राष्ट्र की सांस्कारिक सांस्कृतिक सत्ता की मान्यता के पोषक हैं। सारतः उनके अनुसार राष्ट्रवाद एक सकारात्मक सांस्कृतिक उद्भावना है। यह उद्भावना हमारे यहाँ प्रागैतिहासिक युग से विद्यमान है।
प्रख्यात राष्ट्रवादी मनीषी, हमारे प्रदेश (उ0प्र0, भारत) के पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री तो ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को अधूरा मानते थे। वे ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर बल देते थे। आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री ने एक आलेख ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के नाम से लिखा भी था। इस आलेख में श्री शास्त्री लिखते हैं - “ यह ठीक है कि राष्ट्र शब्द का प्रयोग (हमारे वाङ्मय में) कभी-कभी राज्य और प्रजावर्ग के लिए भी किया गया है, किन्तु उसका प्रयोग मूलतः देशवाचक है जिसमें एक विशिष्ट विचारधारा, एक विशिष्ट संस्कृति को मानने वाला वर्धिष्णु समाज रहता है। ” इसी आलेख में आ0 शास्त्री ने ‘आराष्ट्रे राजन्य शूरः’ आदि वैदिक मंत्रों को उल्लिखित करते हुए राष्ट्रवाद को भारतीय धर्म, भारतीय संस्कृति, वैदिक राष्ट्रगीत आदि के सम्मान तक आतनोतित किया है। 
विदित हो कि हमारे यहाँ राजा लुई चौदहवें के ‘ला इतात एस्त स म्वाह (मैं ही राष्ट्र हूँ)’ जैसा अहमवादी राष्ट्र-निकष नहीं रहा कभी। आधुनिक युग में हिटलर, मुसोलिनी के फासीवादी राष्ट्रवाद से भी भिन्न रहा है हमारे यहाँ राष्ट्रवाद का विन्यास। हमारे राष्ट्रवाद में किसी अन्य राष्ट्र, देश, समाज, समुदाय के प्रति विद्वेष या कि उसे विजित करने की आकांक्षा कभी समाहित नहीं रही। हमारे पौराणिक आख्यानों के अनुसार विष्णु के मानसपुत्र विरजा की पाँचवीं पीढ़ी में उत्पन्न पृथु द्वारा जन-रक्षण की शपथ लेने के पश्चात् जब स्वयं को लोक-कल्याण के लिए पूर्णतया समर्पित कर दिया गया (स पार्थान्य जुहोतिः) तब उसे ‘राष्ट्रमभवत्’ कहा गया। ध्यातव्य है कि पृथु द्वारा स्वयं अपने लिए ‘ला इतात एस्त स म्वाह’ नहीं कहा गया बल्कि उसे राष्ट्र हिताय शपथ चरितार्थ करने पर तत्कालीन देश-काल के बौद्धिकों द्वारा ‘स पार्थान्य जुहोतिः’ के आधार पर ‘राष्ट्रम् अभवत्’ कहा गया। 
हमारे प्राचीन वाङ्मय में ‘अहम् राष्ट्री संगमनी चिकितुषी वसूनाम....’, ‘मम् द्वितां राष्ट्रं क्षत्रियस्य राज्ञा राष्ट्राणाम् (ऋग्वेद), ‘राष्ट्राय वर्धय’ , ‘वयं राष्ट्रे जाग्रयाम् पुरोहितः ......’ (अथर्ववेद) प्रभृति निदेशन उपलब्ध हैं। आदि-महाकवि वाल्मीकि द्वारा विरचित ‘रामायणम्’ में ‘नगराणि च राष्ट्राणि....’ , ‘..... स्वराष्ट्ररंजनं.......’, ‘देशधर्मस्तु पूज्यताम् ......’ , ‘राष्ट्राणि च विशालानि’ , ‘पृथ्वीमिव विस्तीर्णा सराष्ट्र गृहशालिनीम्......’ आदि निदेशित हैं। वाजसनेयी संहिता में ‘राष्ट्रे राजन्यः इषव्यः शूराः’, शुक्रनीति में ‘पादौ दुर्गः राष्ट्रौ’ निदेशित है। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है-- ‘एते वै राष्ट्रस्य प्रदाता।’ यह ‘राष्ट्राय वर्धय’ और ‘राष्ट्रे जाग्रयाम्’, ‘राष्ट्री संगमनी’, ‘स्वराष्ट्ररंजनम्’ सदृश निर्देश राष्ट्रवाद के ही परिचायक हैं। यहीं जानना समीचीन है कि आविश्व प्राचीनतम ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ में ‘राष्ट्र’ शब्द विभिन्न विभक्तियों में अनेकशः प्रयुक्त है। 
ऋग्वेद में एक ऋचा में स्पष्ट रूप से कहा गया कि -  “ मातृभृूमि, मातृभाषा और स्वसंस्कृति से प्रेम करना धर्म है। ” क्या यह ‘धर्म’ राष्ट्रवाद नहीं है ? क्या ऐसे श्लोक/ऋचा अति-अति-अति प्राचीनकाल से भारतीयों के ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ से परिचित होने की घोषणा नहीं करते हैं ?
कौटिल्य के अर्थशास्त्र, महावस्तु अवदान, ललितविस्तर, याज्ञवल्क्यस्मृति, मनुस्मृति, गौतमसूत्र, विष्णुधर्मसूत्र, अग्निपुराण, कामन्दक, मत्स्यपुराण, दिव्यावदान आदि के राष्ट्र सम्बन्धी नीतिवाक्यों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता आलोच्य सन्दर्भों में। हमारे यहाँ 500 ई0पू0 के जैन ग्रन्थ और बौद्ध ग्रंथ, अगुत्तर निकाय जैसे ग्रंथों में भी ‘महाजनपद’ और वज्जिसंघ सदृश राज्य-संघ वर्णित हैं। तत्कालीन देशकाल में राष्ट्रवाद प्रखर रूप में देखा जा सकता है। 
बताते चलें कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र और यहाँ के अन्यान्य ग्रंथों के अनुसार राज्य के सात अंग हैं- 1. स्वामी, 2. सेना, 3. दण्ड, 4. कोष, 5. दुर्ग, 6. अमात्य 7. जनपद/राष्ट्र। ‘अमरकोश’ के अनुसार राष्ट्र = देश = विषय = जनपद समान अर्थ वाले पर्यायवाची हैं। अग्निपुराण, कामन्दक आदि ग्रंथों में राष्ट्र को सर्वोपरि बताया गया। ऋग्वैदिक जनपद वाले राज्य भी ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रत्व’ को वरीयता से मान देते थे। ‘इण्डियन एण्टीक्वेरी’ जिल्द 8 पृ0 20 और ‘एपिग्रेफिया इण्डिका’ जि0 1 पृ0 5 एवं ‘हिरहडगल्ली दानपत्र’ के अनुसार ‘विषय’ (अमरकोश में राष्ट्र के लिए पर्यायित) से बड़ा क्षेत्र है राष्ट्र। मनुस्मृति 7/109, 10/61 आदि के अनुसार भी ‘राष्ट्र’ प्रदेश, देश, मण्डल का सर्वांगसम है। 
हमारे यहाँ ‘राष्ट्रम्’, ‘राष्ट्रिय’, ‘श्रुते राष्ट्रीय मुखात’ (शकुन्तला नाटक), राष्ट्रीय आदि शब्द भी विभिन्न ग्रंथों में प्रचुरता से प्रयुक्त हैं। ‘राष्ट्रिय’ को ‘मृच्छकटिकम्’ में ‘शासक’ अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। इस अर्थ में इतस्ततः ‘राष्ट्रपति’ भी प्रयुक्त है। ‘राष्ट्रम्’ की व्युत्पत्ति ‘राज $ ष्ट्रन’ के रूप में व्याख्यायित है जिसका अर्थ ‘राज्य’, ‘देश’, ‘साम्राज्य’ अर्थायित किया गया है। तदपि बहुसंख्यक अभिमत राष्ट्र और राज्य को दो अलग-अलग इयत्ताएँ मानते रहे हैं यहाँ। 
कतिपय विद्वान् (जो भारतीय वाङ्मय से परिचित नहीं या कदाशयतः उसे नकारना चाहते हैं) मानते हैं कि शब्द ‘राष्ट्र’ पश्चिमी गोलार्द्ध का अवदान है और ‘राष्ट्रवाद’ अधुनातन पश्चिमी प्रत्यय है। इस विषय में तत्त्वाभिनिवेशी विवेचन करें तो अवगत होगा कि पश्चिमी क्षितिज पर 1884 ई0 में स्पेनिश डिक्शनरी में प्रथम बार प्रकाशित हुआ था अवश्य राष्ट्रार्थी शब्द ‘Nation’ का अर्थवाचन, ले..कि..न उससे बहुत-बहुत पूर्व का इतिहास है ‘राष्ट्र’ शब्द का। कुछ विद्वान् पाश्चात्य राष्ट्रवादी विचारक जोसेफ मेजिनी को श्रेय देते हैं ‘राष्ट्रवाद’ का। यह असत्य है। नेशन/नेशनेलिज्म से विश्व का परिचय स्पेनिश डिक्शनरी के माध्यम से या कि जोसेफ मेजिनी, बिस्मार्क या हीगल के माध्यम से ही हुआ-- ऐसे प्रकथनों को भी सत्य नहीं माना जा सकता। प्लेटो के ‘द रिपब्लिक’ में ‘सिटी नेशन’ को रेखायित किया गया है। प्लेटो ने ही प्रथम बार पश्चिमी गोलार्ध में जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक, रोमन आदि विशिष्ट जातीय सांस्कृतिक पहचान, जातीय चित्तवृत्ति के आधार पर विभिन्न राष्ट्र-राज्य (Nation-State) को रूपायित किया था। इस विषय में मेजिनी को श्रेय इस बात के लिए अवश्य दिया जा सकता है कि पश्चिमी गोलार्द्ध में उसने राष्ट्रवाद की महत्ता को बलशाली ढंग से स्थापित किया। जोसेफ मेजिनी के अनुसार राष्ट्र एक ऐसा ध्येय है जो राष्ट्र-बन्धुत्व के रूप में एकात्म मानवता के समान लक्ष्य का परिपूरक है। मेजिनी के अनुसार राष्ट्र के निवासियों के जीवन का एक विशेष उद्देश्य (अर्थात् राष्ट्रवाद) होना चाहिए। यह उद्देश्य ही राष्ट्रीयता का निर्माण करता है। ऐसे प्रकथन अवश्य पाश्चात्य जगत् में प्रथम बार प्रस्तुत किए थे मेजिनी ने। तथ्यतया हान्स कॉन (Hans Con) जैसे विचारकों एवं उनके अनुनायियों का यह कहना भी सत्य नहीं है कि ‘राष्ट्रवाद’ का आरम्भ फ्रांस की राज्यक्रान्ति से हुआ। इसीतरह यह कहना भी सत्य नहीं है कि नेपोलियन, मेजिनी, फिने, बिस्मार्क, कैबूर, या हीगेल ‘राष्ट्रवाद के जनक’ थे। हीगेल, मेजिनी आदि को पश्चिम में ‘राष्ट्रवाद का प्रस्तारक’ माना जा सकता है, बस ! भारतीयेतर जगत् के जर्मनी के मेजिनी ही नहीं, चीन के सुनयात्सेन भी प्रखर राष्ट्रवादी माने जाते हैं। जापानी भी सातसूमा-विद्रोह के बाद गम्भीर राष्ट्रवादी बन गए जिसके सम्बल से जापानियों ने तत्कालीन महाशक्ति रूस को भी पराजित कर दिया था। 
विदित हो कि ‘राष्ट्रवाद क्या’ की तलाश में इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र आदि को खँगालें तो उनके सम्मा-पाठ से स्पष्ट होगा कि वर्तमान में राष्ट्रवाद से जो अर्थ अर्थायित हैं-- उन अर्थों में भारत से सापेक्षतया बहुत बाद में और वह भी परिवर्तित रूप-स्वरूप में प्रवृत्तमान हुआ था राष्ट्रवाद पश्चिमी जगत् में। वास्तव में पश्चिम में प्रारम्भ में ‘राष्ट्रवाद’ कोई मूल्य नहीं था। इतिहास साक्षी है कि पश्चिम में राष्ट्रवाद ‘पैन यूनानवाद’ के माध्यम से आविर्भूत हुआ लेकिन ‘पैन यूनानवाद’ का प्रयास एक नहीं अनेक बार असफल हुआ। आइसोक्रेटीज़ (436-404 ई0 पू0) ने प्रथम बार ‘पैन हेलेनिज्म’ का नारा दिया था। सिकन्दर के पिता फिलिप पहले सार्वभौम राजा हैं जो 'हेज़ेमोन' बने थे अवश्य, लेकिन सिकन्दर से पूर्व कोई यूरोपीय सम्राट नहीं बन सका था। राजा फिलिप ने भी इस दिशा में प्रयास किया किन्तु असफल रहे थे वे भी। पैन हेलेनिस्टिक लीग की बैठक (कोरिन्थ सम्मेलन) को भी सफल नहीं माना गया अनेक परिप्रेक्ष्यों में। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, चेक गणराज्य, रूस आदि के अन्तर-विरोध इतने सघन हैं कि यूरो साझा मुद्रा के बावजूद पैन यूरोपवाद (पैन यूरोपियनिज्म) आज भी दुष्कर है यूरोपियन क्षितिज पर। ऐसी सांस्कारिक (दुः)व्यवस्था के अद्यतन ज्वलन्त होने का ताजातरीन उदाहरण ‘ब्रेक्जिट’ (ग्रेट ब्रिटेन का साझा यूरोपीय बाजार से विलग होना) है। 
इसी तरह कबीलाई मानसिकता वाले देशों में या कि अमेरिकी जगत् में व्यापक परिधि में राष्ट्रीय एकत्व लभ्य नहीं है अद्यतन। पहले भी यह अलभ्य ही था। चार्ल्स बीयर्ड के ‘रीवक’ के अनुसार अमेरिका दरअसल एक विभाजित समाज है, जिसको अपने स्वार्थ के लिए कुछ शक्तिशाली समूह एक राष्ट्र के रूप में रख कर देशभक्ति की धारणा को अनैतिहासिक तरीके से बढ़ाते हैं । हाँ, अपने-अपने सीमित क्षेत्रों में देशज/कबीलाई या कि कथित राष्ट्रीय स्तर पर अपनी-अपनी क्षेत्रीय अखण्डता के लिए पश्चिमी गोलार्ध के देश/राष्ट्र सजग रहे हैं कमोबेश सर्वदा। इस सजगता को राष्ट्रवाद मानें तभी माना जा सकता है कि पश्चिमी क्षितिज पर राष्ट्रवाद परिव्याप्त रहा है।
इस्लामी जगत् में राष्ट्रवाद कम, उम्माहवाद अधिक हावी रहा है। पैन इस्लामिज्म के नाम पर कुछेक इस्लामिक देशों के संघटन ‘राष्ट्रवाद’ नहीं, अपितु ‘धर्मवाद’ की भावना से संघठित होते हैं। यह धर्मवाद नहीं, धर्म का नहीं, वरन् इस्लामी ‘उम्माह’ का अवदान है। ले...कि...न, इस उम्माह के बावजूद 72 फिरकों वाले इस्लाम, इन 72 फिरकों की अलग-अलग जीवन-शैली, अलग नियम-कायदे, यहाँ तक कि शिया-सुन्नी, सूफी, हनीफिया-कादरिया आदि के टकराव, शिया-सुन्नी की मस्जिद की बनावट तक में अलगाव (एक में नमाज के बाद के खुत्बा के लिए मौलाना के लिए पयम्बर, दूसरे में पयम्बर/खुत्बा आदि चलन से बाहर ), शिया-सुन्नी के मद्देसहाबा बनाम तबर्रा जैसे विवाद ‘पैन इस्लामिज्म’ को काल्पनिक ही सिद्ध कर देते हैं। वास्तव में धर्मवाद यदि राष्ट्रवाद में सहायक होता तो पाकिस्तान का पूर्वी अंश टूट कर बांग्ला देश नहीं बनता; पाकिस्तान में मुहाजिर, सूफी, वहाबी, बलूची विवाद नहीं होते; टर्की, सऊदी अरब, ईराक, ईरान आदि के विवाद भी दृश्यमान नहीं होते और न ही तालिबान, अलकायदा जैसे संगठन ही उद्भूत होते। 
कहना होगा कि इन्हीं कारणों से भारतीय राष्ट्रवाद धर्म के बजाय भारतीय संस्कृति और संस्कारों पर आधृत है। भारत में कर्मकाण्डीय अर्थों में न तो कोई एक धर्म कभी रहा, न कोई एक धर्म-पुस्तक और न ही एकमेव धर्म-पुरुष। ब्रह्म को अवतारवाद में ढालने वाली भारतीय मनीषा कर्मकाण्डीय अर्थों में एक और केवल एक धर्म की उपासक कभी नहीं रही। 
वास्तव में वे देश/समाज जो ‘जीवन एक संघर्ष’, ‘जीवन-संघर्ष में विजय के लिए सबलतर की अभीप्सा’ तथा ‘मत्स्य न्याय’ सदृश तत्वों वाले ‘ उपयोगितावादी बुद्धिवाद’ में विश्वास रखते हैं । उनके सोचने-समझने का रंग-ढंग विलगाववाद या कि सामुदायिक जातीय संस्कृति के आधार पर ‘सिटी नेशन’ स्तर तक अलग-थलग हैं । वे कैथोलिक प्रोटेस्टेंट या ओल्ड टेस्टामेंट बनाम न्यू टेस्टामेंट के विवाद से या कि मद्देसहाबा बनाम तबर्रा जैसे विवाद से वस्तुनिष्ठतः उबर नहीं सके। शायद कभी उबर पाएंगे भी नहीं। उनमें एका या एकात्मकता स्थापित हो जाए, ऐसी परिकल्पना दिवास्वप्न से अधिक नहीं है।
तथैव, उपरि-वर्णित सांस्कारिक अवस्था से संचालित देश-समाज-राष्ट्र के लोग (चाहे वे यूरोपीय, अमेरिकी हों या इस्लामी संस्कार वाले)--- भारतीय राष्ट्रवाद की मूलभावना का ‘क्या, क्यों’ ठीक-ठीक कैसे समझ सकते हैं ? ऐसे लोगों को एक भारत में कई-कई भारत दृष्टिगत होंगे ही। तथ्यतः प्राचीनकाल से ही आसेतु हिमालय कच्छ से कामरूप तक ही नहीं वृहत्तर भारत की सीमाओं तक ‘एकात्म भारत’ विद्यमान रहा है यहाँ, जो अद्यतन विद्यमान है। भले ही राजनैतिक छल छद्म में एक भारत को विखण्डित किए जाने के प्रयास गतिमान हैं आज भी। 
बताते चलें कि भारतीयेतर राष्ट्रों में राष्ट्रवाद पनपने के कारण भिन्न-भिन्न थे। यूरोप में मूलतया राष्ट्रत्व की अवधारणा तब पनपी जब छोटे-छोटे नगर-राज्यों में लगने वाले विभिन्न कराधान से वहाँ के व्यापारियों को कष्ट होने लगा और वेे व्यापक स्तर पर व्यापार करने में कठिनाई महसूस करने लगे। तब ‘सिटी नेशन (नगर-राज्य)’ के स्थान पर ‘नेशन स्टेट’ की अवधारणा विकसित हुई थी प्लेटो-युग में। तदनुरूप ग्रीक, रोम, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मन, प्रशा, पोल, रूस आदि राज्य गठित किए गए थे। बाद के वर्षों में, राष्ट्रीयता इंग्लैण्ड में रोमन-विरोध से जन्मी थी जबकि स्पेन में गृहयुद्ध से उबरने के लिए। 
चीन में राष्ट्रवाद माँचू साम्राज्य के विरुद्ध उत्पन्न जनता की गणतंत्रीय आकांक्षाओं की विजय के फलस्वरूप उभरा, उभारा गया। चीन के अन्यान्य छोटे-छोटे राज्यों की आपसी कलह से निस्तार की वांछा ने भी चीन में राष्ट्रवाद को उभरने में सहायता दी। बाक्सर-विद्रोह और अंततः विदेशियों के विरुद्ध उत्पन्न क्रोध ने राष्ट्रवादी यज्ञ में घी का दायित्व निष्पन्न किया। इसतरह चीन में विविध कारणों से एक राष्ट्र की अवधारणा विकसित हुई। 
जापान में वर्ष 1877 के सातसूमा विद्रोह से आरम्भ हुआ था राष्ट्रवाद। अल्पतंत्रीय वर्ग के तुष्टीकरण के विरोध से पल्लवित हुआ था वहाँ राष्ट्रवाद। वर्ष 1890 में जापानी संसद ‘डाइट’ में राष्ट्रवाद मुख्य विचारणीय प्रश्न बन गया था। अल्पसंख्यक वर्ग की महत्ता को समाप्त करने हेतु स्थानीय जनता ने आन्दोलन आरम्भ किया तो अपरदेशीय सामन्तवाद के उन्मूलन की माँग से वहाँ उग्र राष्ट्रवाद प्रसारित हुआ। अपने इसी राष्ट्रवाद के सम्बल से जापान ने पहले चीन जैसे विशाल राज्य को हराया। बाद में मार्च 1905 में तत्कालीन विश्वशक्ति रूस को गम्भीर शिकस्त दी। 
इजरायल का निर्माण जर्मनी के यहूदी-द्वेष के कारण और फिलिस्तीन का निर्माण इजरायल के विरोध में उस क्षेत्र के निवासियों द्वारा गृहकलह के आधार पर किया गया है। जर्मनी को पूर्वी और पश्चिमी प्रखण्डों में बाँटने के पश्चात् हाल ही में पुनः एकीकृत करके निर्मित किया गया है। सोवियत संघ के विघटन से बने 17 देशों का निर्माण, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, चेक और स्लोवाक आदि का निर्माण इसी प्रकार के उदाहरण हैं। 
परिस्पष्टतया विभिन्न देशकाल में भारतीयेतर जगत् के विभिन्न राष्ट्रों में विलग-विलग कारणों/आधारों पर आविर्भूत/पल्लवित और प्रस्तारित हुआ राष्ट्रवाद।
ले..कि..न, ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ या कि भारत राष्ट्र या कि भारत राष्ट्र के सभी संघटक प्रदेश किसी जातीय, सामाजिक या धार्मिक कलह या संघर्ष से आविर्भूत नहीं हुए। प्रत्युत, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रन्थों में परिगणित प्राचीन भारत के प्रदेशों को देखें तो ज्ञात होगा कि प्राचीन भारत आज की अपेक्षा बहुत बड़ा था जो सम्भवतः राजनैतिक और प्रशासकीय कारणों से छोटा होता गया। मेगस्थनीज की इण्डिका, कैसियस की इण्डिका, फाह्यान, ह्वेनसांग एवं यू एची के यात्रा-विवरण और कल्हण की ‘राजतरंगिनी’ जैसे ग्रंथों में भी जिस राजनैतिक भारत का चित्रांकन है, वह वर्तमान भारत के भू-क्षेत्रों से अधिक ही है, वह भारत वस्तुतः ‘सांस्कृतिक भारत’ और ‘संस्कारतया भारत’ ही था। 
संपिंडिततः हमारे प्राचीन वाङ्मय में जो संस्कार बताए गए हैं--- उन पर आधृत था सांस्कारिक-सांस्कृतिक भारत । ऐसे संस्कारों में थे ‘भारतान्वय वर्धना’ एवं ‘राष्ट्राय वर्धय’ के संस्कार, ‘जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ एवं ‘स्वराष्ट्ररंजनम्’ के संस्कार, ‘माताः भूमिः पुत्रोऽहंपृथिव्याः’ के संस्कार आदि। ऐसे संस्कारों से उद्भूत कर्त्तव्यभाव से विनिर्मित हुआ था प्राचीन सांस्कारिक-सांस्कृतिक भारत और ऐसे भारत का भारतीय राष्ट्रवाद। इसी राष्ट्रवाद के सम्बल से निज धर्म-संस्कृति की क्षति के युग में प्रश्नगत क्षति के विरोध और उसमें विफल होने की अवस्था में विदेशी आक्रान्ताओं के विरोध हेतु कसमसाता रहा भारतीय जन-मन। परन्तु अपरिहार्य कारणों से छिटपुट विरोध करने के बावजूद वे एकसूत्र-बद्ध नहीं हो सके। इसी बीच यूरोपीय शासक हावी हो गए तो हिन्दू-मुस्लिम सभी विदेशी-विरोध के लिए 19वीं शती में एकजुट होने लगे। ऐसी दशा में सक्षम नेतृत्व प्राप्त होते ही भारतीय जन-मन में पैठी राष्ट्रीय भावना पुनः पल्लवित हो उठी। परिणाम प्रत्यक्ष है कि 15 अगस्त 1947 को लाल किले से यूनियन जैक को तिरोहित करके भारतीय तिरंगा लहराने लगा। 
ध्यातव्य है कि सम्राटत्वकाल तक भारत में हिमालय के दक्षिण आसमुद्र अनेकानेक राज्य, अनेकानेक जाति, जाति समूह, अनेकानेक रीति-रिवाज, विविधरंगी संस्कृति होने के बावजूद भारतीय जातीय संस्कार और तद्गत आत्मगौरव के भाव अति सघन थे जिससे सम्पूर्ण भारत एक राष्ट्र था। ‘भा + रतीय’ संस्कारों का प्रभाव ही था कि मंगोल, हूण, शक, ग्रीक आदि आक्रमणकारी बन कर आने वाले भी यहाँ के श्रेष्ठ संस्कारों से प्रभावित होकर अंततः यहीं घुल-मिल गए। कतिपय कट्टर इस्लाम-मतावलम्बी अपवाद हैं इसके, जो प्रारम्भ से ही ठान कर चल रहे थे कि उन्हें यहाँ की संस्कृति-समाज में घुलना-मिलना नहीं है, बल्कि इसे दारुल हर्ब से दारुल इस्लाम बनाना है। वे अद्यतन गजबा-ए-हिन्द के सपनों में उलझे हैं। परन्तु अधिकांश जन भारतीयता से एकात्म ही होते रहे हैं यहाँ।
हमारा राष्ट्र भारत एक मृण्मय भूखण्ड मात्र नहीं अपितु यह एक शाश्वत सांस्कारिक, सांस्कृतिक सत्ता वाला राष्ट्र है। तथैव, प्रख्यात चिन्तक, वर्तमान में उ0 प्र0 विधानसभाध्यक्ष मा0 हृदयनारायण दीक्षित के शब्द ‘हमारा राष्ट्र एक भू-सांस्कृतिक अवधारणा है और राष्ट्रवाद उसी से संपृक्त वाद’ को स्वीकारना उचित है। श्री दीक्षित के अनुसार भूमि और संस्कृति का आग्रही भाव ‘राष्ट्रीयता (राष्ट्रवाद)’ है। ऐसे भाव राष्ट्रवाद के तत्त्वों को आत्मसात करने में सहायक रहे हैं यहाँं। 
विदित हो कि भौगोलिक स्वरूप में राष्ट्र और राज्य समरूपी हैं। एक राज्य का एक राष्ट्र, एक राष्ट्र का एक राज्य। इस अर्थ-विशेष में राष्ट्रवाद एक नवीन यूरोपीय अवधारणा है। परन्तु इतिहास साक्षी है कि विविधता में एकता वाले भारत में प्राचीन काल में अनेक राज्य होने के बावजूद एक राष्ट्र सदैव अस्तित्वमान रहा है। तथैव, मा0 हृदयनारायण दीक्षित का यह कथन सर्वथा ठीक माना जाएगा कि- “ यहाँ अंग्रेज आए, अंग्रेजी राज्य हुआ। राज्य अंग्रेजी था मगर राष्ट्र सनातन। तुर्क आए, राज्य इस्लामी था मगर राष्ट्र हिन्दू। अनेक अवसरों पर भारत छोटे-छोटे राज्यों में भिन्न-भिन्न किस्म की राज्य-व्यवस्थाओं में बँटा रहा मगर राष्ट्र के जीवन-निकष सनातन ही रहे। ”
तथ्यतया भूमि और संस्कृति के आग्रही भाव के अभाव में राष्ट्र की इयत्ता विखण्डित हो जाती है। भारत जैसे प्राचीन भू-सांस्कृतिक सत्ता वाले राष्ट्र के संदर्भ में तो प्रश्नगत अभाव सर्वथा अकल्पनीय है। संभवतः इसी आधार पर पाश्चात्यवादी नेहरू जी ने भी संविधान सभा में माना था कि राष्ट्र का सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार आवश्यक है।
भारतीय संविधान की निर्मात्री संविधान सभा ने 22 जून 1947 को जो संकल्प पारित किया, उसमें भारत को एक प्राचीन भूमि कहा गया। यह सोचना गलत होगा कि संविधान सभा के इस संकल्प में इंगित प्राचीनता का तात्पर्य जिस भूमि से संयुजित है उस भूमि की अपनी कोई सुदृढ़ प्राचीन संस्कृति नहीं रही है। 
विदित हो कि राष्ट्र के सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार होने के सम्बल से ही हमारे यहाँ के काव्य और दर्शन में राष्ट्रवाद एक मूल्य है। डॉ0 रामविलास शर्मा ने इसी मूल्य को इंगित करते हुए जातीय भाषायी संचेतना पर बल दिया है।
राष्ट्रचेता महर्षि अरविन्द राष्ट्रवाद को सनातन धर्म की तरह उपयोगी और आवश्यक बताते थे। प्रतीततः महर्षि अरविन्द जिस धर्म की बात करते हैं वह धर्म तत्त्वतः ‘धृतिः क्षमादमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रयनिग्रहः, धीः विद्या सत्यमऽक्रोधो दशकम् धर्मलक्षणम्’ वाले धर्म से या कि ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि स धर्मः’ वाले धर्म से इतर नहीं है। ऐसा धर्म यदि राष्ट्रीय धर्म मान लिया जाए तो जो मनस्विता राष्ट्रिकों में कारित होगी उससे ‘राष्ट्रवाद’ की अनेक अपेक्षाएँ स्वतः पूर्त्त हो जाएंगी। 
राष्ट्रवादी वी0 डी0 सावरकर तो श्री नेहरू से आगे बढ़ कर मानते थे कि केवल एक जगह रहने से राष्ट्र/राष्ट्रीयता का निर्माण नहीं होता है। उनके अनुसार धर्म-संस्कृति की महती भूमिका होती है किसी देश को राष्ट्र बनाने में।
औ...र, जहाँ तक राष्ट्रवाद के ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर0एस0एस0) मॉडल’ का प्रक्षेत्र है, इन पंक्तियों के लेखक की दृष्टि से राष्ट्रवाद को केवल राष्ट्रधर्म से उद्भूत और वहीं तक विन्यसित माना जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कतिपय कार्यकलापों से असहमति व्यक्त की जा सकती है और उसके कृत्य जो राष्ट्रधर्म के बजाय क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ या कि ‘फूट डालो, राज करो’ जैसी कुनीति के अंतर्गत जातिभेद, वर्णभेद, धर्मभेद को बढ़ावा देने वाले हैं (यदि कोई हैं तो), उनकी उस सीमा तक कदर्थना की जानी चाहिए। त..द..पि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर कितना ही नाक-भौं चढ़ाई जाए, इस संघ की प्रत्यक्ष राष्ट्रवादिता को नकारा नहीं जा सकता। अतएव, अन्यान्य असहमतियों के बावजूद संघ-प्रमुख गोलवलकर की कृति ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ को और/या श्री वी0 डी0 सावरकर की मराठी कृति ‘राष्ट्र-मीमांसा’ सदृश कृतियों को राष्ट्रवाद के सम्यक् विमर्श में विचारित करना ही होगा। संघप्रमुख-प्रणीत कृति के अनुसार भौगोलिक, नस्ली, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषायी 5 लक्षण होते हैं जिनसे राष्ट्र परिभाषित होता है। गोलवल्कर स्वयं स्वीकार करते हैं कि प्राचीन धर्मग्रन्थों में धर्म-संस्कृति व भाषा का जिक्र स्वतंत्र रूप में नहीं है परन्तु उनके अनुसार राष्ट्र-संघटक जनपद में ये शामिल हैं।
तथाकथित संस्कृतिवादी, दक्षिणपंथी वैचारिकों को थोड़ी देर के लिए एक किनारे कर दें तो भी ख्यात अधुना समाजवादी विचारक किशन पटनायक के शब्दों को उद्धृत करना ही होगा यहाँ। समाजवादी चिन्तक किशन पटनायक से अनेक बिन्दुओं पर असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में उनके निम्नांकित दो प्रकथनों पर असहमत होने का औचित्य नहीं है। अपनी कृति ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ के विभिन्न आलेखों में निरूपित करते हैं वे कि भारत में एकता और विविधता की दोनों धाराएँ साथ-साथ चलती हैं। दोनों तरफ गलती हो सकती है। विविधताओं को भूल कर केन्द्रीय ताकत बढ़ाने की गलती हो सकती है और केवल विभिन्नताओं पर जोर देकर बिखराव पैदा करने की गलती हो सकती है। पहली गलती टूट को उकसाती है, दूसरी गलती टूट को प्रोत्साहित करती है। वे आगे कहते हैं- “आज की दुनियाँ राष्ट्रों में विभाजित है। हम इस ढाँचे से अलग नहीं रह सकते थे। इसलिए हमें भी राष्ट्रवाद विकसित करना पड़ा। इसमें हम सफल हुए लेकिन इसको बनाए रखने में हम असमर्थ हो रहे हैं क्योंकि हमारी सामाजिक दृष्टि संकीर्ण हो गई है।” उनका अभिमत है यह भी कि - “ जिन भारतीय भाषाओं का साहित्य 500 साल या अधिक पुराना है, उन्होंने भारत को ‘एक समाज, अनेक राजाओं का देश’ माना है। भाषा के साथ यह धारणा गुँथ गई है। महाभारत से लेकर विवाह मंत्र तक का पठन-श्रवण करने वाले के मन में एक संस्कार पैदा होता है कि वह जम्बूद्वीप का नागरिक है। अंग्रेजों ने जिसे ‘उपमहादेश’ कहा, विवाह-श्लोक ने उसे सिर्फ ‘द्वीप’ कहा। दोनों का भावनात्मक असर एक-दूसरे के विपरीत है। 
प्रख्यात पत्रकार पंकज विष्ट द्वारा संपादित ‘हम भारत के लोग’ में संगृहीत लेख में विचारक लेखक महेश दर्पण ने ‘Country’ शब्द से ‘Countera’ के अंतः सम्बन्धों के आधार पर माना है कि ‘Country’ सांस्कृतिक राष्ट्र और भौगोलिक देश का समन्वित चित्र प्रस्तुत करता है। इस विवेचना के आधार पर कह सकते हैं कि ‘Countera’ में एक संकेन्द्रण बिन्दु होना अवश्यंभावी है। तथैव, राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में यह बिन्दु ‘राष्ट्रवाद’ है। 
पाश्चात्य अभिमत से ‘नेशन’ का अर्थ है ‘पीपुल’, ‘सिटीजनरी’; ‘स्टेट’ का अर्थ है ‘टेरीटरी’, ‘बाउन्ड्री’। इस तरह पाश्चात्य अभिमत में जातिसूचक ‘सिटीजनरी’, देशसूचक ‘टेरीटरी’ दो अलग-अलग इयत्ता/अस्मिता की विषयवस्तु हो सकते हैं। इस तरह Nation state स्वतः दो स्वतंत्र इयत्ताओं वाले शब्दों का युग्म है, जो एकार्थक (एक अर्थ वाला) प्रतीत नहीं होता। 
हिन्दी विद्वान् डॉ0 रामविलास शर्मा के अनुसार लैटिन शब्द ‘Patria’, ‘राष्ट्र’ का अर्थवाची है, राष्ट्र-राज्य (Nation State) नहीं। ‘Patria’ से ही बना है ‘Patriot’ अर्थात् राष्ट्रभक्त अर्थात् ‘राष्ट्रवादी’। 
हीगल ने राष्ट्र को आध्यात्मिक इकाई बताया है। 
पाश्चात्य राजनीतिशास्त्री जे0 एच0 रोज का मानना था कि- “ ‘राष्ट्रवाद’ हृदयों की ऐसी एकता है जो एकबार बन कर नहीं टूटती। ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’ -- इन तीन शब्दों में ही ‘राष्ट्रवाद’ का सम्पूर्ण अर्थ निहित है।” इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार ‘राष्ट्रवाद’ एक ऐसी मनोदशा है जिसमें व्यक्ति अपने राष्ट्र-राज्य के प्रति उच्चतर भक्ति-भावना का अनुभव करता है। फ्रेंच लेखक अर्नैस्ट रेनन की कृति (अंग्रेजी अनुवाद :‘व्हाट इज नेशन’) में राष्ट्रवाद से सम्बंधित अनेक विषयों की सविस्तार विवेचना की गई है। श्री रेनन के अनुसार-- “ राष्ट्र एक आध्यात्मिक सिद्धान्त है। इतिहास की जटिलताओं का हासिल, न कि धरा पर एकजुट हुए जमावड़ों का सिलसिला। ” + + + + + “ राष्ट्र की तामीर के लिए एक भाषा, एक धर्म या एक आर्थिक हितों वाला समुदाय जरूरी नहीं, जरूरी एक विचार, सच्चा भाव और मूल्य होना चाहिए।” जान स्टुअर्ट मिल ‘राष्ट्रवाद’ का विकास समान ऐतिहासिक परम्पराओं से मानते हैं। रैम्जे म्योर ‘राष्ट्रवाद’ को भाषाई एकता से बलशील होना स्वीकारते हैं। प्रख्यात चीनी राष्ट्रवादी राष्ट्रपति सुनयात सेन का मानना था- “ राष्ट्रवाद केवल एक नकारात्मक अवधारणा नहीं, अपितु यह देशवासियों को सकारात्मक मूल्यों के लिए संगठित करने वाली शक्ति भी बन सकती है।” उपर्युक्तानुसार ‘राष्ट्रवाद’ औपनिवेशिक लूट-खसोट का विरोध या कि विदेशी सत्ता का विरोध मात्र भी नहीं है वरन् राष्ट्र के प्रति एक सकारात्मक उद्भावना है। 
बताते चलें कि हमारे यहाँ पदनाम : महाराजा, सम्राट, चक्रवर्ती रामायण-काल के पूर्व से प्रचलन में था। अश्वमेध के माध्यम से अपने सम्राटत्व को प्रकट करने वाले महाराज सगर, दिलीप, अज, दशरथ, राम से लेकर हस्तिनापुर सम्राट युधिष्ठिर तक सभी सम्राट ही थे। महाराज धृतराष्ट्र के तो नाम में ही राष्ट्र शब्द समाहित था। सम्राटत्व की यह परम्परा उपलब्ध भारतीय इतिहास में अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और हर्षवर्द्धन तक विस्तीर्ण रही है। सम्राटत्व में क्या ‘सम्’ अव्यय के साथ राष्ट्रत्व समाहित नहीं है ? भूगोल, भाषा, संस्कृति और सांस्कृतिक सम-मनस्कता जैसे तत्त्वों से भी राष्ट्रवादी संस्कार पल्लवित हुआ था यहाँ। एक राष्ट्र में अनेक राज्य हो सकते हैं। स्वयंसंप्रभु छोटे-बड़े स्वशासी राज्य-राष्ट्र तो आज भी विद्यमान हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ आदि में छोटे-छोटे राज्य एक राष्ट्र के अधीनस्थ हैं । तो क्या वहाँ राष्ट्रवाद अनुपस्थित माना जा सकता है ?
वस्तुतः ‘चक्रवर्तिता’ उपनिवेशवादी व्यवस्था नहीं थी। यह अधीनस्थ राजा द्वारा सम्राट/महाराजा की आधीनता को स्वीकारने और उसे प्रतीकात्मक उपहार देने तथा बदले में पूर्ण संरक्षा, सुरक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था थी। प्रकटतः राष्ट्र-राज्य बनाम राष्ट्र (Nation State Vs Nation) का भेद औपनिवेशिक युग से पल्लवित हुआ। पाश्चात्य विचारक वाकर कोन्नार के अनुसार ‘राष्ट्र-राज्य (Nation State)’ की अवधारणा अमेरिका से आयातित है। यूरोप में एक राज्य में बसने वाले दूसरी जाति के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए आन्दोलित रहते थे। ऐसे में वहाँ ‘राष्ट्र-राज्य’ का विचार पनप जाना आश्चर्य की विषयवस्तु नहीं है। 
दूसरी ओर, भारत में प्राचीनकाल से अद्यतन जातियों की अस्मितावादी राज्य की अवधारणा बलीकृत नहीं हो पाई। आपवादिक स्वरूप में स्वतंत्रता-आन्दोलन के पश्चात् भाषायी आधार पर राज्य-पुनर्गठन का प्रश्न हो या मराठी मानुष वाले शिवसैनिकों की नारेबाजी--- ऐसे विचार भारतीय दृष्टि से कभी स्वीकार्य नहीं रहे। भाषायी आधारों पर राज्य-पुनर्गठन में भी ‘जाति-राज्य’ की अवधारणा कारक-कारण नहीं है। इस प्रकार अद्यतन भारतीय सन्दर्भ में ‘राष्ट्र-राज्य (Nation State)’ का राष्ट्र (Nation) और राज्य (State) अलग-अलग अस्मिता का परिचायक है; जिनके एकत्व की धुरी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एकत्व की उद्भावना ही है। वैदिक काल में ‘अहम् राष्ट्रे संगमनी....,’, ‘संवदध्वं सं वो मनांसि......’ की अवधारणा से लेकर अद्यतन सप्तपुरी, सप्ततीर्थ, सप्तपावन नदियाँ और हमारे पूजापाठ का प्रथम मंत्र (‘संकल्प मंत्र’) हो या किसी अनुष्ठान के आवश्यक उपादान ‘जल’ के संदर्भ में भारत की सभी प्रमुख नदियों की स्तुति जैसे उपक्रम या वैदिक, सनातन, वैष्णव, शैव, शाक्त पूजास्थलों का आ-भारत विद्यमान होना आदि-- इनमें कहीं भी जाति, क्षेत्र आदि के विभेद दृश्यमान नहीं रहे हैं। 
जहाँ तक भारतीय राष्ट्रवाद पर सबसे बड़े आक्षेप (कथित) हिन्दू राष्ट्रवाद होने का प्रश्न है, यह सच है कि आदिकाल से भारत में आर्य जाति (जो बाद में हिन्दू जाति नाम से जानी गई) बहु-बहु-बहुसंख्यक है लेकिन विश्व की सर्वाधिक उदारमना, उदात्तमना हिन्दू जाति से भय क्यों ? मा0 सर्वोच्च न्यायालय भी मान चुका है कि हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं वरन् एक जीवन-शैली है। महीन कतरने वाले कथित प्रबुद्धजन हिन्दू धर्म में वैष्णव धर्म, शैव धर्म, पाशुपत धर्म, शाक्त धर्म, गाणपत्य धर्म आदि-इत्यादि अनेक विभेद परिगणित करते हैं। किन्तु जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख धर्म भी कथित हिन्दू धर्म से इतर कहाँ हैं ? वस्तुतः जिसे हिन्दू धर्म, सनातन धर्म, वैष्णव धर्म आदि कहा जा रहा है, उससे अधिक सहिष्णु धर्म विश्व के किसी भी कोने में उपलब्ध नहीं है। कैथोलिक-प्रोटेस्टैंट, शिया-सुन्नी, हनीफिया-कादरिया-सूफी-वहाबी जैसे अन्यान्य धर्म/वर्ग के संघर्षों के सापेक्ष हिन्दू धर्म में तो धर्म एवं धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों को मानने या न मानने की पूरी छूट है। सच्चा हिन्दू वही है जो धार्मिक कट्टरता से, धर्म-विद्वेष से सर्वथा परे है और हीनम् दूरयति, हिंसाम् दूरयति को साकार करता है। त..ब, कथित हिन्दू जाति से, हिन्दू चित्तवृत्ति से या कि हिन्दूवादी राष्ट्रवाद के नाम से भयभीत होने/करने की क्या आवश्यकता है ? क्या यह भयभीतीकरण भारतीय राष्ट्रवाद को, प्रकारान्तर से भारत को कमजोर करने की किसी अन्तर-राष्ट्रीय साजिश का प्रतिफलन तो नहीं है ? 
कहने-सुनने के लिए भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतिपक्षी हिन्दू समाज में कथित व्याप्त वर्णभेद, जातिभेद भी उछाल सकते हैं, लेकिन सच यही है कि राष्ट्रवाद के फलक पर जातिभेद, वर्णभेद जैसा कोई विभेद कार्यकारी या कार्यशील नहीं रहा है यहाँ कभी। इस बिन्दु पर देखा जा सकता है कि भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई, नानाजी पेशवा सदृश उच्चवर्णी संग्राम-सेनानी थे तो झलकारीबाई, बिजली पासी, पासी राजा दर्शन सिंह और ऐसे अनगिनत निम्नवर्णी जन भी सेनानी थे जिन्होंने अपना सक्रिय योगदान दिया था स्वाधीनता-संग्राम में। इस तरह कथित जातिभेद, वर्णभेद के आरोप कतिपय राजनेताओं की राजनैतिक चालबाजी के अलावा राष्ट्रवाद के धरातल पर तो दृश्यमान नहीं दिखता। 
तथ्यतया हमारे भारत के ‘सनातन जीवन-निकष’ जिन्हें हम ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ कह सकते हैं-- उसे राष्ट्रवाद का निकष मानने पर अर्थात् सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का समर्थन करने पर सबसे अधिक हाय-तौबा मचाने वाले कतिपय पीली दृष्टि (Jaundiced Eye) के मुट्ठी भर लोग हैं। ऐसे लोग नेहरू-राज के युग से नवस्वाधीन भारत में बड़े-बड़े पदों पर हावी हो गए या नेहरूवादियों की कृपा से हावी बना दिए गए। इस तरह उनकी आवाज एक बड़ी आवाज बन गई है। भारतीय संविधान के अनु0 19 (1) का सम्बल लेकर ऐसे लोग ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ मानते-बताते हैं। उनमें से कुछ लोग उसे ‘हिन्दू राष्ट्र की प्रारम्भिक भूमिका’ के रूप में भी अधिनामित करते हैं। ऐसे लोग स्वाधीनता-आन्दोलन में पल्लवित हुए राष्ट्रवाद को भी ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ की संज्ञा देते हैं। वे भूल जाते हैं कि जिस आन्दोलन में लाखोंलाख हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई नर-नारी राष्ट्रीय अस्मिता की संरक्षा में आन्दोलनरत हुए और जिसमें केवल हिन्दू-प्रलाभ के लक्ष्य अधिलक्षित नहीं थे, वह आन्दोलन हिन्दूवादी कैसे संज्ञायित किया जा सकता है ? स्वातंत्र्योत्तर भारत में राष्ट्र की इयत्ता और संप्रभुता अक्षुण्ण रखने के लिए, राष्ट्रीय भाषा-संस्कृति की पहचान और उसके पुनरुत्थान के लिए, राष्ट्रीय गौरव के प्रतिकूल पाए जाने वाले विभिन्न अपशिष्टों के परिहार के लिए, पूँजीवादी अपसंस्कृति के निराकरण के लिए और विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक-सामाजिक प्रदूषणों के तिरोहण के लिए यदि भारतीय जन हुलकते-हुलसते हैं अथवा तद्गत कोई आन्दोलन करते हैं तो ऐसे आन्दोलन को ‘गर्हित’ कहना मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा। वास्तव में ऐसे राष्ट्रवाद को ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ नहीं वरन् ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ ही माना जा सकता है, माना जाना चाहिए भी। ‘हम भारत के लोग’ कृति में ख्यात समाजवादी समालोचक खगेन्द्र ठाकुर ने राष्ट्रीयता/राष्ट्रवाद में राष्ट्र के प्रति अहंकार वाले और धर्म-निरपेक्षता के बदले साम्प्रदायिक चरित्र वाले, दूसरे राष्ट्रों के प्रति नफरत का भाव भरने वाले राष्ट्रवाद को गर्हित कहा है और अपने समर्थन में 1933 में लिखे गए प्रेमचन्द के आलेख में उल्लिखित ‘राष्ट्रवाद आधुनिक काल का कोढ़ है’ को उद्धृत किया है। तदपि प्रेमचन्द (जो उपरिइंगित आलेख-लेखन के समय जाने किस आवेश में राष्ट्रवाद के विषय में प्रश्नगत असत्य धारणा से आवेशित हो गए थे) कहें या खगेन्द्र ठाकुर या पीली दृष्टि वाले कतिपय वामपंथी या 2 + 2 = 5 कहने वाले कतिपय हिन्दू-विरोधी (जिन्हें भारत के प्राचीन बड़प्पनों को छोटा दिखाना ही अभीप्सित है, उसमें उन्हें हिन्दू के बड़प्पन की बू आती है जो उन्हें कतई नहीं सुहाती)--- ऐसे सभी मतिभ्रम से आवेशित लोगों को अनसुना किया जाना राष्ट्रीय आवश्यकता है। वास्तव में सच्चा राष्ट्रवाद राष्ट्र-गौरव से आप्लावित तो होता है लेकिन उसमें अहं का भाव नहीं होता। साम्प्रदायिक चरित्र तो हो ही नहीं सकता भारतीय राष्ट्रवाद का इसलिए कि अनेक मत-मतान्तर के देश भारत की प्रकृति साम्प्रदायिक नहीं है। ब्रह्म को सर्वव्यापी मानने वाले भारतीय और ब्रह्म के अवतारवाद के पोषक भारतीय 'सम्प्रदायवादी' कैसे हो सकते हैं ? इसी तरह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को मानने वाले भारतीयों पर विभिन्न राष्ट्रों के विरुद्ध नफरत फैलाने का आरोप विजडि़त किया ही नहीं जा सकता। ज्ञात इतिहास से अब तक ऐसा कोई दृष्टान्त उद्धृत नहीं किया जा सकता जो भारतीय राष्ट्रवाद को खगेन्द्र ठाकुर के निकषों पर गर्हित सिद्ध कर सके। 
दुर्योग से वर्तमान में प्रो0 दिनेश वार्ष्णेय, प्रो0 प्रभात पटनायक, प्रो0 गोपाल गुरु, प्रो0 निवेदिता मेनन, प्रो0 शमसुल इस्लाम, जस्टिस अशोक गांगुली, सीताराम येचुरी (वामपंथी राजनेता), रामशरण जोशी (पत्रकार/लेखक) जैसे प्रभावशाली पदासीन बुद्धिजीवी हैं हमारे देश में और जे0एन0यू0 जैसी राष्ट्रद्रोहियों की शरणस्थली भी औ..र राष्ट्रविरोधी सोच के कथित बुद्धिजीवियों को ‘इम्पीकेबुल क्रेडेंशियल’ बताने वाली नयनतारा सहगल (श्री नेहरू की भाँजी) जैसी लेखिका भी। विगत 9 फरवरी 2016 को विश्वविद्यालय परिसर में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाल्लाह इंशाल्लाह’ का नारा लगाने वाले उमर खालिद की शरणस्थली बने हुए जे0 एन0 यू0 के प्रो0 प्रभात पटनायक कहते हैं- “ यदि राष्ट्रवाद का राग बहुत अलापा गया तो भारत एक विफल राष्ट्र बन जाएगा। ” तो क्या मात्र ऐसे मतिभ्रमी लोगों के कारण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ‘त्याज्य’ मान लिया जाए ? सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से तो राष्ट्र को एक करने/रखने में सहायता प्राप्त होती है। तत्सम्बन्धी विभ्रम तब क्यों फैलाते हैं प्रो0 प्रभात पटनायक जैसे कथित विद्वान् ? 9 फर0 2016 के काण्ड के पश्चात् जे0एन0यू0 में एक व्याख्यानमाला आयोजित की गई थी जिसमें प्रो0 गोपाल गुरु, प्रो0 निवेदिता मेनन आदि ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद की वामपंथी व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं, राष्ट्रवाद को तत्त्वतः बिना जाने-समझे। अच्छा ही रहा कि जे0एन0यू0 सरीखे कथित बौद्धिक केन्द्रों में कथित राष्ट्रवादी विमर्श की फुलझड़ी बहुत जल्दी फुस्स हो गई। 
औ..र, श्री येचुरी। वे तो घोषित वामपंथी हैं। उपनिषदों का निर्देश है- ‘ऋते दक्षिणपक्षः।’ ले..कि..न वामपंथी तो वामपंथी ! उन्हें ऋत, अनृत से क्या लेना देना ? उन्हें तो अपने पंथ का प्रचार चाहिए बस ! बहुसंख्यक के विरोध में बोलेंगे तो कट्टरवादी अल्पसंख्यकों में लोकप्रिय हो ही जाएंगे। उसी के बल पर सत्ता हथियाना ऐसे वामपंथियों का मनसा-अभीष्ट है ! भारतीय राष्ट्रवाद/सांस्कृतिक राष्ट्रवाद चूँकि उनके पंथ-प्रचार में बाधक है तो भारतीय राष्ट्रवाद का विरोध तो उन्हें करना ही है। 
और प्रो0 शमसुल इस्लाम। समाचारपत्रों में प्रकाशित समाचार के अनुसार फैजाबाद में राष्ट्रवाद सम्बन्धी एक वैचारिक संगोष्ठी में दिल्ली वि0 वि0 के राजनीति विभाग के प्रो0 शमशुल इस्लाम राम जाने अज्ञानता में या कि जानबूझ कर शरारतन यहाँ तक कह बैठते हैं- ‘यह शब्द किताबों में 1884 के पूर्व था ही नहीं।’ उनका इशारा शायद इस ओर था कि 1884 में स्पेनिश डिक्शनरी में पहली बार प्रकाशित हुआ था ‘राष्ट्र’ शब्द। उसके पहले सर्वथा अज्ञात था यह शब्द। भारतीय वाङ्मय : ऋग्वेद, अथर्ववेद, तैत्तिरीयोपनिषद्, वाजसनेयी संहिता, शुक्रनीति, अर्थशास्त्र, ललितविस्तर आदि पढ़ने में लगने वाले बौद्धिक श्रम से अरुचि हो उन्हें, तो भी काश वे 1876 में इतिहास-प्रसिद्ध 'इण्डियन एसोसिएशन' स्थापित करने वाले सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की कृति ‘A Nation in making’ को ही देख लेते ! 1866 में शिक्षाविद् राजनारायण बोस द्वारा की जाने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति की माँग हो या राष्ट्रीय नवगोपाल कहे जाने वाले नवगोपाल मित्र के राष्ट्रवादी राजनैतिक कार्यकलाप--- उन्हें ही जान लेते वे तो ‘राष्ट्र’, ‘राष्ट्रवाद’ के इतिहास के बारे में , तद्गत विन्यास के बारे में डॉ0 शमसुल इस्लाम का भ्रम दूर हो जाता। और तो और, फ्रांस के विदेशमंत्री को राजा राममोहन राय ने जो पत्र लिखा था 1831 में, उसमें विश्ववाद को प्रथम बार उकेरने के लिए 4 बार ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किया गया था। 1831 के इस अभिलेख को भी अनदेखा कर दिया प्रश्नगत फतवाबाजी में कथित ज्ञानी प्रोफेसर डॉ0 शमसुल इस्लाम ने ? 
औ..र, उग्र राष्ट्रीयतावादी श्री अरविन्द के तत्सम्बन्धी आलेख हों या 1895 में प्रखर राष्ट्रवादिता के जनक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक द्वारा प्रस्तावित गणेश पूजा के उपक्रम या/और 1875 में आर्यसमाज की स्थापना के उद्देश्य या विश्वख्याति अर्जित करने वाले स्वामी विवेकानन्द के अनेकानेक भाषण--- इन सबसे राष्ट्र/राष्ट्रवाद के अधुना भारतीय परिप्रेक्ष्य स्वतः परिस्पष्ट हो जाते हैं। पश्चिमी बौद्धिक वर्तमान अर्थों वाले राष्ट्र/राष्ट्रवाद से भले 1884 में प्रथम बार स्पेनिश डिक्शनरी के माध्यम से परिचित हुए हों ले..कि..न भारतीय मनीषा में राष्ट्र और राष्ट्रवाद अपरिचित नहीं रहा है अति प्राचीनकाल से। दुर्योगात् डॉ0 शमसुल इस्लाम उस समुदाय से सम्बद्ध हैं जो ‘वी आर सेपेरेट नेशन’ का नारा दे चुका है। यदि ‘नेशन’ का ही अस्तित्व पुरातन नहीं तो ‘सेपेरेट नेशन’ कहाँ से उद्भूत होगा ? तब क्यों और कैसे अपने लोचनान्ध अज्ञान का परिचय दे बैठे प्रो0 शमसुल इस्लाम राष्ट्रवाद के बिन्दु पर आयोजित एक सेमिनार में ? आश्चर्य है कि इतने अधपढ़ डॉ0 शमसुल इस्लाम दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर कैसे बने हुए हैं ! विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक बर्खास्त क्यों नहीं किया ऐसे अज्ञानी और आँय-बाँय-शाँय बोलने वाले प्रोफेसर को ? 
औ..र, यहीं, सच है कि ऐसे राष्ट्र-विरोधी दृष्टिकोण मात्र एक व्यक्ति या एक समुदाय-विशेष के कथित विद्वान् के नहीं हैं। प्रत्युत ऐसे विरोध उन तमाम बौद्धिकों (?) की दिनौंधी के परिचायक हैं जिन्हें ‘भारत’, ‘आर्य (शब्दान्तर से हिन्दू)’, 'भारतीय संस्कृति' और 'भारतीयता' में कोई अच्छाई दिखती ही नहीं। अरे भाई, हिन्दू, आर्य या प्राचीन भारत की श्रेष्ठताओं को अनदेखा करना चाहते हैं तो ऐसा ‘अनदेखा’ न उवाचें जो स्वयं आपको ही अधपढ़/अनपढ़ सिद्ध कर दे। 
जहाँ तक नवजागरण या तथाकथित आधुनिक सोच का प्रश्न है, भारत में नवजागरण 19वीं शताब्दि में आविर्भूत बताया जाता है। संयोगात् यहाँ जीवन-मूल्यों में, जीवन-शैली में आधुनिकता की पैठ का समय भी कमोबेश 19वीं शताब्दि ही है। राजा राममोहन राय, विवेकानन्द, बंकिमचन्द्र से लेकर तिलक, गाँधी तक का युग खण्ड। नवजागरण शब्द डॉ0 रामविलास शर्मा द्वारा अवदानित है। इसके पूर्व इसे पुनर्जागरण, पुनरुत्थान, प्रबोधन सदृश शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता रहा है। भारतीय नवजागरण को 15-16 वीं शताब्दि के यूरोपीय रेनेसां (Renaissance) की देन बताया जाता है। डॉ0 रामविलास शर्मा यूरोपीय रेनेसां को भारतीय परिप्रेक्ष्य में लोकजागरण के समकक्ष रखते हैं। डॉ0 नामवर सिंह के अभिमत से नवजागरण यूरोपीय इनलाइटमेंट (प्रबोधन) का पर्यायवाची है जो 19वीं शती का अवदान है। इसे नवचेतना, नवीन उदित चेतना के नाम से भी जाना जाता है। इन पंक्तियों के लेखक के विचार से भारतीय राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में ‘नवीन उदित चेतना’ के बजाय संदर्भगत नवजागरण को ‘पुनरुत्थानवादी राष्ट्रीय चेतना’ की संज्ञा दिया जाना अधिक सटीक है। 
इसी अनुक्रम का सच है कि 'नवजागरण काल' आधुनिक सोच का कालखण्ड होने के साथ-साथ हिन्दी जगत् में भी महत्त्वपूर्ण ‘काल’ है इसलिए कि आधुनिक हिन्दी साहित्य का नवजागरण भी इसी कालखण्ड में आविर्भूत हुआ। मध्ययुगीन हिन्दी जगत् के भक्तिकाल का और तदन्तर सामन्तवादी रीतिकाल का चोला कमोबेश उतार कर हिन्दी जगत् में आधुनिक सोच-समझ की चेतना के उद्भव का कालखण्ड तो है ही यह। वहीं, भाषा और साहित्य के प्रति लगाव में नए दृष्टिबोध केे साथ-साथ राष्ट्रीय संचेतना के पुनरुत्थान से भी इस नवजागरणकाल में साक्षात्कार होता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हों या महावीरप्रसाद द्विवेदी, शिवपूजन सहाय, बनारसीदास चतुर्वेदी आदि अनेक हिन्दी-विद्वानों ने इसी कालखण्ड में अपनी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रचिन्ता उकेरी। साथ ही राष्ट्रीय क्षितिज पर व्याप्त सामाजिक सांस्कृतिक कुरीतियों के विरोध को भी वाचाल किया गया इसी कालखण्ड में। यह अंततः हमारे स्वाधीनता संग्राम को धार देने में सहायक सिद्ध हुआ। दूसरी ओर, राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द प्रभृति राष्ट्रचेता मनीषियों की चेतना जो नवजागरण-काल में मुकुलित हुई, उसी शृंखला के जाज्ज्वल्य नक्षत्र बने महर्षि अरविन्द, बंकिमचन्द्र चटर्जी आदि जो प्रखरतम राष्ट्रवादी सिद्ध हुए। कह सकते हैं कि नवजागरण वास्तव में राष्ट्रवाद-पल्लवन में सहायक ही सिद्ध हुआ। तदनुसार यह आशंका स्वतः निर्मूल हो जाती है कि ‘राष्ट्रवाद’ पोंगापंथी या संकुचित विचारधारा का पोषक है या कि राष्ट्रवाद और आधुनिकतावादी सोच में 36 का सम्बन्ध है।
ध्यातव्य है कि प्लेटो ने भले ही कभी विभिन्न जातीय संस्कृति के नाम पर राष्ट्रों का अलग-अलग क्षेत्रांकन किया हो, लेकिन 21वीं सदी में विश्वग्राम बन चुकी आज की दुनिया में कोई राष्ट्र/देश एक-केन्द्रिक संस्कृति/समाज का देश या राष्ट्र नहीं रह गया है। एक-केन्द्रित रह सकता भी नहीं वर्तमान आर्थिक- सामाजिक तानेबाने में। तब भी क्या विश्व के अन्यान्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीयता का, राष्ट्रवादिता का परित्याग कर सकते हैं ? नहीं ना ! त....ब बहुकेन्द्रिक होने या भारत के समाज/संस्कृति में बहुकेन्द्रीयता होने का हुंकार भर कर यहाँ के बहु-बहु-बहुसंख्यकों की संस्कृति वाले भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आक्षेपित क्यों किया जाता है ? संस्कृति कोई रुद्राक्ष नहीं होती जिसके एकमुखी होने पर उसका मूल्य बढ़ जाए। विशाल भू-क्षेत्र वाले भारत की संस्कृति ‘विविधता में सांस्कृतिक एकता’ को वाचाल करती है और यहाँ का समाज एकायामी नहीं है तो उससे भारतीय राष्ट्रवाद आक्षेपित कैसे हो सकता है ? इस क्रम में सम् मनांसि, संवदध्वं, संगच्छध्वं .... आदि के अर्थायन हेतु सम् उपसर्ग का वस्तुनिष्ठ अर्थायन अभीष्ट है। 'संवदध्वं' आदि का अर्थ 'एकवदध्वं, एक गच्छध्वं, एक मनांसि' से तात्पर्यित नहीं है। उनमें समरैखिकता आवश्यक है, बस। हाँ इस क्रम में किसी अराजकता की छूट नहीं दी जा सकती। 
और देखें-
पाश्चात्य लेखक एल्विन टाफलर के ‘पावर शिफ्ट’ के अनुसार- “ विकास के खास चरण में राष्ट्र...राज्य बदलते हैं। उन्हें नए प्रश्नों को जगह देनी पड़ती है। ...... पहचान का सवाल सत्ता को प्राप्त करने की ही एक प्रक्रिया है। ऐसे में स्थानीयतावाद, जातिवाद प्रमुख हो उठता है। ” शब्दान्तर से वे राष्ट्रवाद को अप्रत्यक्ष रूप में स्थानीयतावाद, जातिवाद जैसे पहचान के प्रश्नों से समेकित करते प्रतीत होते हैं। ले..कि..न, भारत की समग्र पहचान यदि भू-सांस्कृतिक पहचान के रूप में पहचानित की जाए (जो इसी रूप-स्वरूप में की जानी चाहिए भी) तो सत्ताकांक्षी स्थानीयता, जातिवाद या स्वत्व की पहचान जैसे प्रश्नों को पीछे धकेल कर भारतीय राष्ट्रवाद सम्पूर्ण भारत की भू-सांस्कृतिक पहचान के रूप में उभर आता है।
दूसरी ओर, एल्विन टाफलर को जस का तस मान लें तो भी कहना होगा कि राज्य का क्षेत्र-विस्तार और चरित्र बदलता रह सकता है त..द..पि भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र की ऋता, प्रकृति, प्रवृत्ति और उसके राष्ट्रीय अधिलक्ष्य प्रायः अपरिवर्तित या अति-अति सूक्ष्मतया परिवर्तनीय होते हैं इस सीमा तक कि उनकी सततता शाश्वतता कमोबेश अविच्छिन्न दिखती है। 
ज्ञात हो कि प्लेटो ने विशिष्ट संस्कृति (विशिष्ट जातीय चित्तवृत्ति) के आधार पर मिस्र, यूनान, रोम आदि राष्ट्रों को नामित किया था। बाद में भले ही पश्चिम में ‘राष्ट्र’ शब्द का अर्थ बदल गया हो, लेकिन भारत अद्यतन मृण्मय राष्ट्र : जियो-पॉलिटिकल नेशन मात्र नहीं है व..र..न यह मृण्मयता से आगे बढ़कर जियो-कल्चरल : सांस्कृतिक राष्ट्र है। भा..रत..त्व (प्रकाश-निरतता) औ..र सत्व की देवी भारती (सरस्वती) की सात्विक चिन्मयता यहाँ के जन-मन में रची-बसी हैं। यही यहाँ का मनोमय-कोश है। भारतीय राष्ट्रवाद वस्तुतः इसी चिन्मय मनस्विता का जयकारा है।
यहीं, समाजवादी चिन्तक किशन पटनायक के शब्दों को उद्धृत करना ही होगा कि “ राष्ट्रवाद की भावना से हम मनुष्य को मुक्त नहीं कर सकते। औसत नागरिक अगर राष्ट्रवादी नहीं होगा तो जाति या धर्म के प्रति वफादारी उसको संकीर्णता की तरफ ले जाएगी। राष्ट्रवाद उसको जातिवाद या साम्प्रदायिकता की संकीर्णता से ऊपर उठाता है। सम्पूर्ण मानव समाज के प्रति वफादारी भावनात्मक स्तर पर औसत नागरिक के लिए आज की दुनिया में सम्भव नहीं है। लेकिन राष्ट्रवादी भावक को मानव-कल्याण के लिए प्रेरित किया जा सकता है। ”
औ..र यहीं , प्रासंगिक है यह बताना भी कि ‘राष्ट्रवाद’ स्वतः नकारात्मकता का पोषक नहीं है। प्रत्युत यह भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप वाला हो या चीनी/जापानी प्रारूप वाला या मेजिनी-प्रारूपित राष्ट्रवादी अधिलक्ष्यों वाला -- प्रायः सभी स्वरूपों में 'राष्ट्रवाद' राष्ट्र को सशक्त करने वाला सकारात्मक भावानुभाव है। इससे संस्कारित होने पर प्रायः सम्बन्धित राष्ट्र के पक्ष में बहुविध आशातीत प्रलाभ लभ्य हुआ है। ‘राष्ट्रवाद’ की सकारात्मकता का सबलतम उदाहरण है हमारा पड़ोसी शक्तिशाली देश चीन, जहाँ राष्ट्रवादी भावना के उदय के साथ ही 1911 से चीन नया चीन बन कर दिन-ब-दिन सशक्त होता गया, आज भी होता जा रहा है। 
औ..र, छोटे से देश जापान ने अपने सशक्त राष्ट्रवाद के बल पर ही पहले चीन, बाद में 1904 में तत्कालीन प्रथम कोटि के विश्वशक्ति वाले देश : रूस तक को परास्त किया। 
औ..र, नेपोलियन हो या सिकन्दर---- ऐसे नायक अपने-अपने राष्ट्र के नागरिकों में, सेना में राष्ट्रवाद को हुंकरित करने के पश्चात् ही महान् विजेता बन सके। 
और तो औ..र, अधुना भारत में भी राष्ट्रवाद के सकारात्मक उपयोग के बल से ही 15 अगस्त 1947 को लालकिला पर तिरंगा फहराया जा सका। बाल लाल पाल से लेकर गाँधी तक के आन्दोलन में , नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के आजाद हिन्द फौज के सैन्य अभियान में, भारतीय नेवी के विद्रोह में राष्ट्रवाद की सार्थक भूमिका को नकारा जा सकता है क्या ? पाकिस्तानी आक्रमण 1947, 1965, 1971 और 1999 या कि चीनी आक्रमण 1962 के विरुद्ध हमारी सेना ने जो विजय प्राप्त कीं या कि 1947 से अद्यतन हमारी सेना के जवान जिस जोश से दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमान्त सुरक्षा में जुटे पड़े हैं, क्या वह राष्ट्रवाद के अभाव में सम्भव है ? 
तब, हाँ त..ब, कथित राष्ट्रवादी राग के विरोध की हिमाकत क्यों और कैसे कर रहे हैं कथित इम्पीकेबुल क्रेडेंशियल्स। 
औ..र, राष्ट्रवाद का व्यावहारिक स्वरूप क्या होता है, इसका अप्रतिम उदाहरण देखें --
वर्षों पूर्व की घटना है। जापान में विदेश से जहाज भर कर फल आयात किया गया। जापानी फल-उत्पादकों के अनुसार फल-आयात देशज फलोत्पादक, फलोत्पादन और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए घातक था। जहाज से आयातित फलों को उतारने के लिए कोई कुली आगे नहीं आया। जहाज बन्दरगाह पर डेरा डाले रहा किन्तु मजदूरों ने जहाज से माल उतारने से इन्कार कर दिया। कारण ? उनकी मान्यता थी कि राष्ट्रहित के विपरीत कोई कार्य वे नहीं करेंगे भले ही इससे उनकी निजी आजीविका में क्षति उत्पन्न हो जाए। फलतः जहाज का सारा का सारा फल जहाज पर ही सड़ गया। प्रभाव यह हुआ कि जापानी सरकार को अपनी भूल स्वीकारनी पड़ी और आयात-नीति परिवर्तित करनी पड़ी उसे अपने ही नागरिकों (जापानियों) से हार कर। यह है जापानियों का राष्ट्रवाद, राष्ट्र-अनुराग, राष्ट्रभक्ति जिसने अनपढ़-अधपढ़ गरीब श्रमजीवी जापानियों को विदेशी फल से भरे जहाज से माल उतारने पर प्राप्त होने वाली अपनी आय को स्वराष्ट्रहित हेतु उत्सर्ग करने के लिए प्रेरित किया।
एक पक्ष और। ‘समानो मंत्रः समितिः समानी....’ और ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि .....’ सदृश ऋग्वेदीय ऋचाओं में राष्ट्रीय आसंगता दृश्यमान हैं। मैक्डूगल ने भी ‘सामान्य मन (Common mind)’ को समाज के निर्माण के लिए वांछनीय बताया हैं। समाज से ही कालान्तर में राज्य का निर्माण हुआ और राष्ट्र का भी। राष्ट्र/देश/समाज के स्थायित्व के लिए भी ‘समान मन’ की आवश्यकता अन्यान्य परिप्रेक्ष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक है। निर्विवादतः किसी समाज/देश को ‘राष्ट्र’ बनाने के लिए राष्ट्रिकों में ‘सामान्य मन’ का होना अति वांछनीय है। कोई राष्ट्र वास्तविक अर्थों में तब तक ‘राष्ट्र’ नहीं बन सकता जब तक उसके राष्ट्रिकों का मनोमय-कोश राष्ट्रीय संस्कारों से समरैखिक न हो जाए। 
विदित हो कि ‘अहम् राष्ट्री संगमनी....’ (कहीं-कहीं ‘अहम् राष्टेª संगमनी....’ पाठ भी मिलता है) में ऋक् वेदकार ‘राष्ट्रम् संगमनी’ नहीं कहते, वरन् वे ‘अहम् राष्ट्री संगमनी....’ कहते हैं। इसमें प्रयुक्त शब्द ‘राष्ट्री है जो ‘राष्ट्र से सम्बन्धित’ अथवा ‘राष्ट्र के साथ’ के अर्थवाचक संदर्भ में प्रयुक्त है। अर्थात् राष्ट्र को राष्ट्रिक (राष्ट्रवासी) के साथ संगमन नहीं करना है अपितु राष्ट्रिक को राष्ट्र के साथ राष्ट्र में संगमन करना अपेक्षित है। इस ऋक्-निर्देश के अनुसार सभी राष्ट्रिकों की मानसिकता ऐसी होनी चाहिए कि वे राष्ट्र के साथ संगमन, सहगमन कर सकें। यजुर्वेद में कहा गया है- ‘विद्यात् सूत्रं वितते यास्मिन्नोताः प्रज्ञा इमा।’ ऐसी विद्या जो राष्ट्र को एक सूत्र में निबद्ध करने की प्रज्ञा उत्पन्न कर सके वही उपास्य है। इस तरह से राष्ट्रवादी शिक्षा आदि के माध्यम से राष्ट्रिकों में सूत्रबद्धता और तद्वत सममनस्कता, सहगमन/संगमन भाव पल्ल्वित किया जा सकता है, किया जाना चाहिए भी। 
एक दूसरा पक्ष। भारतीय राष्ट्रवाद को ‘उग्र राष्ट्रवाद’ या ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ कह कर उसका रचनात्मक उपयोग न करना बौद्धिक पलायन है। नेताओं या बुद्धिजीवियों के न चाहने से राष्ट्रवाद की विशिष्ट मानसिकता (म्जीवे) समाप्त नहीं होगी। सांस्कृतिक जनचेतना जो भारत जैसे प्राचीन संस्कृतिधनी राष्ट्र में जन-जन की नस-नस में अभिमूलित है, उसे निर्मूल किया जाना संभव नहीं है। उपादेय भी नहीं है।
उपर्युक्त अनुशीलनों के आधार पर इन पंक्तियों के लेखक के विचार से धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ‘धर्म’ को विलग कर दें या ग्लोबल गाँव के युग में एकल के बजाय बहुलतावादी संस्कृति-समाज को अंगीकार कर लें तो भी संप्रभु सत्ता, देश (भू-क्षेत्र), कोष, सेना एवं जन के साथ-साथ भारतीय संस्कृति तथा संदर्भगत संस्कृति/संस्कार के निर्वहन में सक्षम भाषा को वर्तमान में हमें भारतीय राष्ट्रवाद का अपरिहार्य तत्त्व मानना ही होगा। इसी में भारत राष्ट्र का कल्याण सन्निहित है। आसेतु हिमालय, कन्याकुमारी से कश्मीर तक और कामरूप से कच्छ तक भारतभूमि से धर्म तत्त्व को और हमारे पावन सात्विक संस्कारों को पूरी तरह विच्छिन्न किया जाना संभव भी नहीं है। यतः राष्ट्रवाद के फलक पर धर्म के कर्मकाण्डीय स्वरूप के विभेद एवं तद्गत मत-वैभिन्य को एक किनारे करके अच्छा होगा कि ‘धार्मिक कर्मकाण्ड’ के स्थान पर ‘धर्म के तात्त्विक/सात्विक आशय वाले सदाचरण एवं कर्त्तव्यों’ को भारतीय संस्कृति का अपरिहार्य अंग मान कर राष्ट्रवाद को राष्ट्रधर्म के रूप में प्रतिष्ठापित किया जाए। इस तरह भारत की धर्मालु प्रकृति-प्रवृत्ति को भी सकारात्मक बनाया जा सकेगा और उससे भारतीय राष्ट्रवाद को अतिरिक्ततया बलशील भी किया जा सकेगा।
तथैव इतिहास की सीख है कि हम राष्ट्रवाद-विमुखता, राष्ट्र-विमुखता या कि राष्ट्रीय संस्कृति से विमुखता के बजाय इस क्षितिज पर सतत जागरूकता का परिचय दें। इसे किसी काण्ड-विशेष से या किसी घटना-विशेष से सम्बद्ध न करें। अच्छा होगा कि राष्ट्र-कल्याण, राष्ट्रीय गरिमा/अस्मिता/इयत्ता के प्रति गौरव-बोध, तद्गत संरक्षा-भावना के साथ-साथ प्रत्येक राष्ट्रिक की राष्ट्र के प्रति सात्मीकरण की भावना को हम ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ के रूप में सतत ज्वलन्त करें।
सर्वांत में कहना होगा यह भी कि राष्ट्र, राष्ट्रवाद आदि के सन्दर्भ में विशेषकर भारतीय सांस्कारिक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में सम्यक् जागृति न होने के कारण ही प्रो0 शमसुल इस्लाम, प्रो0 प्रभात पटनायक जैसे कथित विद्वान् तद्विषयक भ्रम कारित करने में सफल हो जाते हैं औ...र ऐसे ही विभ्रमों से कारित होते हैं 9 फरवरी 2016 सदृश दुष्काण्ड। 
काश ! भारतीय राष्ट्रवाद को भा + रतीय राष्ट्रीयता से, भारतीय राष्ट्रिकता से जोड़ लें हम, तो डॉ0 शमसुल इस्लाम सदृश विभ्रमकारी मानसिकता सिरे से विलुप्त हो जाएगी। 
काश ! प्रस्तुत आलेख में इंगित निहितार्थों वाले भारतीय राष्ट्रवाद को मनस्येकम् वचनस्येकम् कर्मस्येकम् स्वरूप में साकारित कर सकें हम ; वह भी शीघ्रातिशीघ्र।

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