मंगलवार, 2 सितंबर 2025

विजय रंजन प्रणीत आलेख : नवम् किश्त : क्या है भारत और भारतीयता

                                            क्या है भारत और भारतीयता 

क्या एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में हिमालय से दक्षिण समुद्रपर्यन्त 3287590 वर्ग कि0मी0 तक विस्तीर्ण या कि पूर्वांचल की 7 बहनों के प्रदेशों से पंजाब तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक विस्तीर्ण भू-भाग वाला प्रायद्वीप प्रखण्ड ही भारत है ?
क्या 127 करोड़ जन के निवास का देश है भारत ?
क्या भारत सपेरों, जादूगरों, नाचनेवालियों या कि चरवाहों का गीत गाने वालों का देश है या कि सती प्रथा, घोटुल जैसी प्रथाओं का और 60 प्रतिशत अनपढ़ों या 40 प्रतिशत भुखमरों का देश है भारत ?
क्या लगभग 900 वर्ष तक लगातार विदेशी आधिपत्य में रहने वाला देश है भारत ?
क्या जिसे 15 अगस्त 1947 को विदेशी दासता से स्वयं संप्रभु राजनीतिक सत्ता हस्तांतरित हुई थी, वही देश है भारत ?
क्या कोलम्बस, वास्कोडिगामा प्रभृति समुद्रीयात्रियों के सपनों का सम्पदासम्पन्न देश तक सीमित है भारत ?
क्या कैसियस की ‘इंडिका’, हेरोडोटस की ‘हिस्टारिका’, मेगस्थनीज़ की ‘इंडिका’, हीकेटियस मिलेटस के ‘जियोग्रॉफिया’ या कि यूनानी इतिहासकार अलबरूनी, प्रथम शती ई0पू0 के चीनी यात्री सुमाचीन या बाद के फाह्यान, ह्वेनसांग आदि द्वारा विवरणित देश मात्र है भारत ? क्या ए0 एल0 बाशम कृत ‘द वन्डर दैट वाज़ इण्डिया’ वाला भारत है हमारा भारत।
क्या बहुलतावादी संस्कृति/समाज का देश मात्र है भारत ?
क्या सार्विक सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान-विहीन देश है भारत ?
या क्या विश्व को शून्य से लेकर 9 तक का अंक प्रदान करने वाला और ज्योतिष, आयुष विज्ञान, कला, संस्कृति, अध्यात्म, धर्म, दर्शन आदि का पाठ पढ़ाने वाला और अधुना युग में 104 संचार उपग्रह एक साथ अंतरिक्ष में भेजने वाला उन्नत राष्ट्र हे हमारा आज का भारत ?
उपरि-अंकित प्रश्न या कि सारतः क्या है भारत ? क्या है भारतीयता ?--- सदृश प्रश्न यदि कोई पूछे तो आज अनपढ़-अधपढ़ की कौन कहे, हमारे बहुलांश कथित बुद्धिजीवी भी अचकचा जाएंगे। बिरला ही होगा जो ‘भारत’ और ‘भारतीयता’ का सटीक रूपायन कर सके।
तब किसी भी राष्ट्रवादी भारतीय के मन को मथने वाला स्वाभाविक प्रश्न उभरेगा कि ‘क्या है भारत’ ?
वस्तुतः ‘भारत’ को जानने के पश्चात् ही जाना जा सकता है भारतीयता का विन्यास।
एक पंक्ति में उत्तर देना हो तो कहना होगा कि आदिकाल से सात्विक रागात्मक रचनाधर्मिता वाली प्रज्ञा-प्रदायी देवी भारती (सरस्वती) की प्रज्ञा से सम्पृक्त है भारत। भारत ‘भा + रत’ है अर्थात् ‘निरन्तर प्रकाश (ज्ञान) की खोज में सतत निरत’ रहने वाला प्रकाश-खोजी सात्त्विक रागात्मक रचनाधर्मिता का देश है यह। भारतत्व, भारतीय आत्मतत्व की सम्यक् खोज के लिए भारत के प्राचीन-अर्वाचीन वाङ्मय को सम्मादिट्ठि से खंगाला जाए तो निश्चित रूप से ‘भारत और भारतीय की अवधारणा’ कमोबेश उपरि-कथित व्याख्या के समरूप ही दिखेगी।
महाभारत में भारत को देवकल्प महौजस बताते हुए भीष्म पर्व में इसे देवराज इन्द्र का प्रिय, देवताओं का प्रिय धर्मालु और शक्तिशाली सम्राटों का प्रिय बताया गया-- “ अन्येषां च महाराज.....सर्वेषामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम्। ” महाभारत में  “ यदिदं भारतवर्षे यत्रेदम् मूर्च्छितम् बलम् ......” के श्लोक में  “ कुरु पांचालाः शाल्व माद्रेय जांगलाः कश्मीराः सिन्धु सौवीराः...आन्ध्रश्च कुलूताश्च शैबला बाहलीकाः   तथा   ”  तक विस्तृत बताया गया इसे। कमोबेश वर्तमान के भारत-पाकिस्तान-बांग्ला देश तक के क्षेत्र-विस्तार तक विस्तृत था महाभारत का भारत। इस तरह आर्यावर्त्त या ब्रह्मावर्त्त से भी बहुत बड़ा था यह।
हजारों वर्षों के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विशिष्टताओं को अपने में समोए रखने वाला हमारा भारत कतिपय विशिष्ट सं+स्कार और सांस्कृतिक संचेतना वाला विशिष्ट देश/समाज/राष्ट्र है। इसकी संदर्भगत विशिष्टताओं पर जो धूल कतिपय विदेशियों ने या कि प्रतिकूल समय ने प्रक्षिप्त की है, आवश्यकता उस धूल को साफ करने की है।
‘भारत’ नामकरण को देेखें--
निरुक्त प्रभृति ग्र्रन्थ अर्थान्वयन के लिए शब्द के संघटक अक्षरों का आश्रय लेते हैं। इस परम्परा में भारत है       भा + रत। अर्थात् ‘भ + ा + र + त + त्व’ का समुच्चय। भ का अर्थ है प्रकाश अर्थात् वह अवयव जो विश्व को ज्योतित करता है, जो ज्ञान भी प्रदान करता है, ज्योति (रोशनी) और ऊर्जा भी। जो सत्त्व भी है और सत्त्व का उद्गाता भी। जो अंधकार-वेधक, तमस-वेधक भी है और तमस-वृत्ति का निवारक भी। ऐसे सद्गुणों के प्रतीक ‘भ’ के ‘भ-त्व’ को उभारने के क्रम में तद्गत अर्थवाचन वाली ‘आ’ की मात्रा ‘ा’ से संयुक्त करने के पश्चात् उसे ‘रत’ से सम्पृक्त करके विनिर्मित होता है ‘भारत’ । अर्थात् ,प्रकाश को उभारने में रत (संलग्न) अर्थवाचन का साक्षात् प्रतीक है ‘भारत’। यह प्रकाश-निरतता यहाँ का प्रमुख आत्मतत्त्व है।
निरुक्त में ‘भारत’ का अर्थ ‘सूर्य को आगे लाने में निरत’ (सूर्योपासक) के अर्थ में अर्थायित किया गया है।
बताते चलें कि ऋक् (2/7/1 एवं 5, 4/75/4, 61/6/19-45) में ऊर्जा-प्रदायी, दोषघ्न अग्नि को भारत कहा गया। वैदिक ग्रन्थों में और श्रीमद्भगवद्गीता में भी ‘भारत’ शब्द का अनेकशः प्रयोग है। उन स्थलों पर ‘भारत’ एक देश या राष्ट्र के रूप में नहीं अपितु एक ‘सचेतन ज्ञानोन्मुख सत्ता’ के रूप में प्रोक्त है।
कहते हैं कि नए स्वर्ग की रचना का सामर्थ्य रखने वाले और गायत्री मंत्र की विरचना पूर्ण करने वाले ऋषि विश्वामित्र के दौहित्र शाकुन्तल भरत के नाम पर या कि जैनियों के आदितीर्थंकर ऋषभदेव के संस्कारी वीर पुत्र भरत के नाम पर नामकृत हुआ था भारत। कतिपय विद्वान् भारत का नामांकन सौवीर नरेश रहूगण को ज्ञानोपदेश देने वाले जड़भरत के नाम पर किया गया बताते हैं। यह भी संभव है सरस्वती-प्रदेश कैकय से लेकर गंगा-तीरे तक विस्तृत कोशल से सम्बद्ध राजकुमार भरत जिनके अग्रज राम ने दक्षिणापथ से भी अन्याय-अत्याचार को मिटा कर श्रेष्ठ संस्कारों वाली संस्कृति से दक्षिणापथ को ओत-प्रोत कर दिया--- ऐसे रामानुज भरत के नाम पर नामांकित हुआ हो भारत। लाला सीताराम लिखित ‘अवध का इतिहास’ स्वीकारें तो कह सकते हैं कि चन्द्रवंशी शाकुन्तल भरत के बहुत पहले पुरुरूवा के ऋग्वेदोल्लिखित अग्नि-ध्वंस को कारित करने वाले ‘भरत गण’ के आदिपुरुष ‘भरत’ के नाम पर इस देश को ‘भारत’ कहा गया। प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ0 सुकुमार सेन के ‘भारतीय साहित्य’ के अनुसार भी ‘भरत’ नामक एक आर्य जनजाति के नाम पर नामित किया गया था भारत। यह जनजाति पाणिनि के समय उत्तरापथ में फैल गई थी। यह भरत जाति साहित्य, संगीत, नाटक आदि में अति प्रवीण थी। वायुपुराण में लोक का भरण करने वाले को ‘भारत’ कहा गया है। वायुपुराण में  प्रथम मानव (प्रथम होमोसैपियन्स सैपियन्स) मनु को भरत कहा गया। प्रतीततः जाग्रत बुद्धि वाला प्रथम होमोसैपियन्स सैपियन्स जिसने ‘कबीला’ की संस्थापना की; उसके सुरक्षा/संरक्षा पोषण की व्यवस्था की, वही थे मनु जिन्हें भरत कहते हुए उनके नाम पर उनके गुणों को चरितार्थ करने वाले देश को ‘भारत’ कहा गया।
‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में दौष्यन्ति को यहाँ का राजा बताते हुए भरत कहा गया। वहीं, ‘महाकर्म भरतस्य न पूर्वे नापरे जनाः’ श्लोक के अनुसार जनों में अप्रतिम महान् कर्म करने वाले को भरत कहा गया।
प्रकट है कि ‘भरत’ चाहे कोई भी माना जाए, भरत के उपरिअंकित विशिष्ट गुण जहाँ यत्र-तत्र-सर्वत्र परिव्याप्त हैं, उस देश (=वर्ष) को ‘भारत’ कहा गया है।
जहाँ तक देश ‘भारत’ के लिए ‘भारतवर्ष’ शब्द के प्रयुक्त होने का प्रश्न है, द्रष्टव्य है कि प्राचीनकाल में इस भूखण्ड (=वर्ष) को ‘अजनाभ वर्ष’ कहते थे। अजनाभ वर्ष अर्थात् सिसृक्षा की कारयित्री शक्ति ‘अज’ की नाभि-भूमि अर्थात् सृष्टिकर्त्ता की धरती।
शबर के जैमिनीभाष्य के श्लोक 10/1/35 के अनुसार हिमवत् से कुमारी अन्तरीप तक एक देश था। इसे भारत कहा गया।
‘बृहत्संहिता’ के नक्षत्र कूर्माध्याय 14/1-33 में वर्णित ‘भारतवर्ष’ वर्तमान भारत से बहुत बड़ा प्रक्षेत्र था। उसमें गान्धार से लेकर दक्षिणपूर्व के अनेक देश मलाया, सुमात्रा, जावा आदि को भारतवर्ष में समाहित बताया गया है।
‘भारतवर्ष’ शब्द महाभारत, मत्स्यपुराण मार्कण्डेय पुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण में आदि में अनेकत्र उल्लिखित हैं-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।
                                          - विष्णुपुराण
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमवद्दक्षिणं च यत् ।।
वर्ष यद् भारतं नाम यत्रेयं भारती प्रजा ।
                                             - वायुपुराण
 यत्र ते भारता जाता भारतान्वय वर्द्धना।
भारताद् भारती कीर्तिं येनेदं भारतं कुलम्।
अपि ये चैव पूर्वे वै भारतो इति विश्रुतः।
                                       - मत्स्यपुराण
अपरे ये च पूर्वे च भारताः इति विश्रुताः।
भरतस्यान्वाये हि देवकल्पाः महौजसः।।
                                            - महाभारत
ध्यान से देखें तो दिखेगा कि उपर्युक्त श्लोकों में भारतवर्ष की केवल सारस्वतता या/और भौगोलिक सीमा ही इंगित नहीं है अपितु इनसे ‘भारतीयता क्या है’, ‘भारतीय के कर्त्तव्य क्या हैं’-- आदि भी सूत्र रूप में अवगत हो जाते हैं। ‘भारती-कीर्ति’ का वर्घन एवं ‘भारतन्वय-वर्धनं’ का उपरि-अंकित निर्देश बताता है कि सत्त्वशील भारती के सद्गुणों से अर्थात् सत्त्व, ऋत, नय, रचनाधर्मिता, शिवत्व, सार्वसुन्दरम् आदि से आसिक्त देवी भारती से समेकित ‘भारतान्वयता’ का प्रसार करने वाला और ऐसे सारस्वत सद्गुणों का संवर्धन करने वाला ही ‘भारतीय’ है। ऐसा व्यक्ति ही ‘भारतौविश्रुता’ हो सकता है। भास्वद् दैवीय चिन्मयता का यही संस्कार भारत और भारतीय की रेखांकनीय विशिष्टता, विशिष्ट ऋता है।
उपर्युक्त श्लोकों में भारत की सन्तति को ‘भारती’ बताया गया है। ‘भारती’ नाम एक देवी (देवी सरस्वती) का भी हैं जो आपादमस्तक सत्त्व की देवी हैं जो रचनाधर्मिता, प्रबोधन, शुभता, शुभ्रता, सत्, ऋत, लोक-कल्याण सदृश सद्गुणों से सम्पन्न सर्वपूज्या देवी हैं। वे साहित्य, संगीत, कला, धी, ज्ञान, प्रज्ञा और ऋतम्भरिक प्रज्ञा की प्रदात्री भी हैं। ऐसी देवी सरस्वती की ही सन्तति-प्रसन्तति हैं ‘भारतीय’।
देवी भारती सार्वकल्याणी हैं। वाच्-वाक् स्वरूप में देवी भारती ‘व्यक्ति-व्यक्ति’ और ‘व्यक्ति-समाज’ के सौमनस्यपूर्ण अन्तःसम्बन्धों की कारक हैं। काव्य में स्वयं प्रवृत्त होने पर वे लोकयात्रा सुप्रवर्तन का पथ प्रशस्त करती हैं। संभवतः इसीलिए विश्व के सभी संस्कृति-सम्पन्न समाजों में देवी भारती (सरस्वती) किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं और पूज्या भी हैं। ऐसी समादरणीय देवी से सहयुजित सारस्वत संस्कारों वाली सर्वव्याप्त देवी भारती (सरस्वती) के नाम से समेकित हैं ‘भारतीय’। भारती के नाम से समेकित होते ही हर भारतीय (व्यक्ति हो या विचार या वस्तु) के लिए अपरिहार्य हो जाता है कि वह देवी भारती (देवी सरस्वती) के सद्गुणों से आच्छादित हो।
‘राजतरंगिणी’ आदि ग्रंथों में भी भारत का विस्तार सविस्तार वर्णित है। हीकेटियस मिलेटस, हेरोडोटस, कैसियस, सुमाचीन, फाह्यान, ह्वेनसांग, मेगस्थनीज़, अलबरूनी आदि के ग्रन्थों सेे भी भारत/हिन्दुस्तान का सम्मान्य एवं गौरवपूर्ण विन्यास-विस्तार आकलित किया जा सकता है। प्रख्यात संस्कृत आचार्य पी0 वी0 काणे ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में लिखते हैं- “ प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतवर्ष का केवल 9 वाँ भाग आज का भारतवर्ष है। अन्य आठ भाग वे देश-द्वीप हैं जो आज के भारत के दक्षिण पूर्व में पड़ते हैं। ”
इस प्रकार प्राचीन वाङ्मय को स्वीकारें तो धरातलीय स्तर पर भारतवर्ष अति विस्तृत भू-भाग था। यह संभवतः तब की बात होगी जब टेथिस सागर बहुत सीमित रहा होगा।
महाकवि कालिदास के अनुसार हर राष्ट्र की एक विशिष्ट प्रकृति, उसका एक विशिष्ट शील, उसकी एक विशेष ऋता होती है। इस विशिष्ट ऋता, विशिष्ट शील, विशेष प्रकृति का तत्त्वाभिनिवेशित अन्वेषण करें तो मानना होगा कि हिमालय से आसमुद्र, कामरूप से कच्छ, कन्याकुमारी से कश्मीर तक के भूक्षेत्र में परिव्याप्त हमारा भारत भू-क्षेत्र, वनसम्पदा, नदी, पर्वत, खनिज, पशु-पक्षी आदि जैविक सम्पदा और जनसंख्या के सहयुजन वाला भू-क्षेत्र तो मात्र ‘मृण्मय भारत’ या कि भारत का ‘अन्नमय कोश’ है। यहाँ की विशिष्ट ऋता, विशिष्ट संस्कार और यहाँ का भारतत्व ( भ + ा + रत + त्व अर्थात्  (ज्ञान का)   प्रकाश  लाने वाली निरतता) भारत का ‘प्राणमय कोश’ है। यहाँ की भास्वद् सारस्वत भा + रती चिन्मयता भारत का ‘मनोमय कोश’ है। यहाँ का दर्शन-योग-अध्यात्म, विशिष्ट शिक्षा और विशिष्ट संस्कृति भारत का ‘विज्ञानमय कोश’ है।  
परिस्पष्ट है कि ‘भा + रत’ अर्थात् ‘प्रकाश निरत भारत’ अर्थात् ‘ज्ञान (सत्य) की खोज में सतत निरत भारत’ औ..र सत्त्वशील रागात्मकता की देवी भारती से सहयुजित भारतीय शब्दों की अस्मिता अनायास या अकारण नहीं समेकित है यहाँ की अस्मिता से। प्रत्युत इन शब्दों का, इन शब्दों के निहितार्थों का अर्थायन यहाँ की मूल सांस्कृतिक संचेतना का परिचायक है। वास्तव में देवी सरस्वती (भारती) की संचेतना से सम्पृक्त और             ‘भ + ा + र + त + त्व’ (भा + रत + त्व) वाला भारत ही वास्तव में ‘चिन्मय भारत’ है जो श्रेष्ठ है, देव-कल्प है, महौजस है।
कुबेरनाथ राय प्रभृति अधुना मनीषी ‘भारत’ को विशिष्ट संस्कारों से सुसम्पन्न एक विशिष्ट बोधसत्ता: ‘चिन्मय सत्ता’ के रूप में स्वीकारते है। श्री राय इसे मात्र मृण्मय सत्ता नहीं मानते। इन पंक्तियों के लेखक समेत अनेक अधुना विद्वान् भी इसी अभिमत के हैं। तथ्य भी यही है कि ऋग्वेद, महाभारत, मत्स्यपुराण, वायुपुराण आदि से लेकर कुबेरनाथ राय प्रभृति अधुना विद्वानों को समेकित करें तो अवगत होगा कि कतिपय विशिष्ट संस्कार, श्रेष्ठ संस्कार, चिन्मयी संस्कार, सिसृक्षा संस्कार, अंधकारविनाशक प्रकाशोन्मुख संस्कार, सारस्वत संस्कार आदि से सुसंस्कारित दिदृक्षा वाले देश को ही ‘भारतवर्ष’ कहा जा सकता है।
संपिण्डिततः, उपर्युक्त उल्लेखों में जो भारत निरूपित है, वह मात्र ‘मृण्मय भारत’ नहीं है। मृण्मयता मात्र से केवल भौगोलिक देश अस्तित्वमान होता है ‘राष्ट्र’ नहीं औ..र विशिष्ट संस्कारशील भारत जैसा राष्ट्र तो बिल्कुल नहीं। अनेक विशिष्ट संस्कार यहाँ की मृण्मय भूमि के प्रबुद्ध-सम्बुद्ध जन की सामूहिक विशिष्टता रहे हैं। हजारों वर्षों से प्रकाश-निरत सम्बोधि चिन्तना और देवी भारती से सम्पृक्त भास्वद् चिन्मयता वाले चिन्मय भारत के भास्वद् संस्कार आज भी भारतीय मनीषियों की विशिष्ट संचेतना हैं। भले ही  सुषुप्तावस्था में या बीजीय स्वरूप में विद्यमान हों वे आज। प्राचीनकाल से अद्यतन विद्यमान चिन्मय भारत की बीजरूपीय विद्यमानता और तद्गत शाश्वतता के सम्बल से कह सकते हैं कि ‘चिन्मय भारत’ और ‘मृण्मय भारत’ के साथ ही ‘शाश्वत भारत’ भी अस्तित्ववान् है यहाँ। मृण्मय भारत का भूगोल बदलता रह सकता है, बदलता रहा भी है लेकिन भारतत्व की और भारतीत्व की शाश्वत चिन्मयता जो यहाँ की विशिष्ट निधि है वह उपेक्ष्य नहीं है।
औ..र, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत, बृहत्संहिता के रचयितागण आदि ही नहीं, अपितु विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, डॉ0 राधाकृष्णन्, डॉ0 सम्पूर्णानन्द प्रभृति अधुना विचारक मनीषी भी शब्दान्तर से ‘चिन्मय भारत’ को ही उपास्य मानते हैं। ‘गायन्ति देवाः किल गीतिकानि’ सदृश प्रशंसा ‘शाश्वत चिन्मय भारत’ की ही की गई है। दाराशिकोह, थोरो, शोपेनहावर, रोम्या रोलां, कामिल बुल्के, सिस्टर निवेदिता आदि इसी ‘शाश्वत चिन्मय भारत’ से अभिभूत हुए थे। ‘मृण्मय भारत’ सदृश अनेक मृण्मय देश या कि चिन्मयता से अभावित समाज/देश/राष्ट्र ऐसे विश्व-मनीषियों को अभिभूत करने में अक्षम थे।
जहाँ तक भारतवासियों को ‘हिन्दू’ और भारत को हिन्दूस्थान/हिन्दुस्थान/हिन्दुस्तान कहने का प्रश्न है, उस सन्दर्भ में उल्लेख्य है कि हमारे यहाँ ‘बृहस्पति आगम’ नामक ग्रन्थ के अनुसार ‘हिमालय’ से ‘हि’, इन्दु सरोवर (कन्याकुमारी अन्तरीप) से ‘न्दु’ लेकर देवनिर्मित विस्तृत स्थल का नाम बना ‘हिन्दुस्थान’। ऐसे अनेक ग्रन्थ हैं जो ईरान से पश्चिम भू-क्षेत्र को समुद्रपर्यन्त ‘हिन्दुस्थान’ बताते हैं। इसी ‘हिन्दुस्थान’ को प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में ‘भारत’/‘भारतवर्ष’  बताया गया है।
औ..र, आलोच्य सन्दर्भों में विदेशी साक्ष्यों को ही प्रमाण मानना हो तो द्रष्टव्य है कि पारसी धर्मग्रन्थ जेन्द-अवेस्ता के एक भाग ‘बेंदिदाद’ के प्रथम अध्याय के 18वें पद में भारतवासियों के लिए ‘हिन्दू’ शब्द मिलता है- “ जिसे हम भारत कहते हैं वह ईरान से पूर्व का भूखण्ड है, उसे बेंदिदाद में विश्व का सर्वोत्तम 15वाँ प्रदेश ‘हफ्तहिन्दुकन’ कहा गया है। ” (देखें ‘बेंदिदाद’    : अंग्रेजी अनुवादक बेहरामगोर अंकलेेस्परिया, के0 आर0 कामा इंस्टीट्यूट 1949)। अन्य ग्रन्थ ‘मेहरयास्त’ और ‘शातीर’ में भी कमोबेश ऐसा ही वर्णन है। ‘शातीर’ में सम्राट गुष्ताव और जरथ्रुष्ट के बीच वार्त्तालाप में भी इस भूमि को ‘हिन्दू देश’ कहा गया है। संदर्भगत ‘हिन्दू’ शब्द ‘बेंदिदाद’, ‘मेहरयास्त’, ‘शातीर’ आदि में सम्मान्य अर्थों में प्रयुक्त है; वह अहल-ए-किताब है। ‘लुटेरा’, ‘डाकू’, ‘काफिर’, ‘दुज्दी’, ‘गुलाम’ के अर्थ में प्रयुक्त नहीं है ‘हिन्दू’ शब्द प्राचीन अरबी-फारसी ग्रन्थों में। प्राचीन अरबी-फारसी विद्वानों के अनुसार सम्मान्य अर्थोंवाले अहल-ए-किताब ‘हिन्दू’ का मूल देश है हिन्दीक या हिन्द। यही हिन्दीक या हिन्द ही है भारत। 1800 ईसा पूर्व के प्राचीन अरबी कवि लबी-बिन-ए-अख्तब-बिन-ए-तुरफा की लम्बी कविता में भारत भूमि को ‘हिन्दू देश’ कहा गया। काव्य ग्रन्थ ‘सेऊखल उकोल’ में संगृहीत अरबी कवि जरहम बिन तॉई की कविता में भारतीय सम्राट विक्रमादित्य की प्रशंसा है। यह कृति इस्ताम्बूल के राजकीय पुस्तकालय में संरक्षित है। ख्यात पत्रकार और वर्तमान में उ0प्र0 विधानसभाघ्यक्ष डॉ0 हृदयनारायण दीक्षित की कृति ‘राष्ट्र सर्र्वाेपरि’  में एक अन्य अरबी काव्यग्रन्थ ‘सेअरूल ओकुल’ के पृ0 253 से उद्धृत  उद्धरणानुसार  बिड़ला मन्दिर नई दिल्ली के खम्भों पर अंकित एक कविता में मोहम्मद साहब अलैह0 के चाचा हजरत उमर बिन ए हश्शाम ने इस हिन्दू देश का गुणगान किया है।
औ..र, सामी धर्म-दर्शन के आविर्भाव के बहुत पूर्व, हज0 ईसा, मूसा, मोहम्मद साहब के उद्भव के बहुत पूर्व 486 ई0 पू0 के पार्सिपोलिस स्तम्भ में भी ‘हिन्दू/हिन्द देश’ के गुणगान उल्लिखित हैं। 500  ई0 पू0 के ईरानी सम्राट दारा के अभिलेख   : नक्श-ए-रुस्तम से हिन्द-देश और यहाँ के निवासियों के प्रति दारा का आदर-भाव प्रकट है।
प्राचीन चीनी मनीषी भारत को ‘इन्तु (चन्द्र)’ कहते थे। सितारों से घिरे चन्द्र का रूपक था इन्तु देश।
प्लेटो ने इसे ‘इन्डोई (Indoi)’ का नाम दिया था। मिल्टन इसे ‘इन्डो (Indo)’ कहते थे।

संपिण्डिततः, उपर्युक्त उल्लेखों में जो भारत निरूपित है, वह मात्र ‘मृण्मय भारत’ नहीं है। मृण्मयता मात्र से ‘राष्ट्र’ अस्तित्वमान नहीं होता, विशिष्ट संस्कारशील भारत जैसा राष्ट्र तो बिल्कुल नहीं। अनेक विशिष्ट संस्कार यहाँ की मृण्मय भूमि के प्रबुद्ध-सम्बुद्ध जन की सामूहिक विशिष्टता रहे हैं। हजारों वर्षों से  प्रकाश (ज्ञान/सत्य) -निरत सम्बोधि चिन्तना और देवी भारती से सम्पृक्त भास्वद् चिन्मयता वाले चिन्मय भारत के भास्वद् संस्कार आज भी भारतीय मनीषियों की विशिष्ट संचेतना हैं; भले ही सुषुप्तावस्था में या बीजीय स्वरूप में विद्यमान हों वे। चिन्मय भारत की बीजरूपीय विद्यमानता (जो प्राचीनकाल से अद्यतन विद्यमान है) और तद्गत शाश्वतता के सम्बल से कह सकते हैं कि ‘चिन्मय भारत’ और ‘मृण्मय भारत’ के साथ ही ‘शाश्वत भारत’ भी अस्तित्ववान् है यहाँ।
वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत, बृहत्संहिता के रचयितागण आदि ही नहीं, अपितु विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, डॉ0 राधाकृष्णन्, डॉ0 सम्पूर्णानन्द प्रभृति अनेक अधुना विचारक मनीषी भी शब्दान्तर से ‘चिन्मय भारत’ को ही उपास्य मानते हैं। ‘गायन्ति देवाः किल गीतिकानि’ सदृश प्रशंसा ‘शाश्वत ‘चिन्मय भारत’ की ही की गई है। उपरि-अंकित विद्वानों के अतिरिक्त हेलियोडोरस, मिनिन्डर, जहाँगीर, दाराशिकोह, थोरो, शोपेनहावर, विलियम जोंस ,मैक्समूलर, ,रोम्या रोलां, अबे डर्बोइ, कामिल बुल्के, सिस्टर निवेदिता, श्रीमती एनी बीसेंट आदि विश्व-मनीषी ‘शाश्वत भारत’, ‘चिन्मय भारत’ से ही अभिभूत हुए थे। ‘मृण्मय भारत’ सदृश अनेक मृण्मय देश या कि चिन्मयता से अभावित समाज/राष्ट्र उन्हें अभिभूत करने में अक्षम थे। आश्चर्य नहीं कि ईसा मसीह अपने जीवनकाल के अन्तिम दिनों में भारत चले आए थे या कि सुकरात ने भारत आने की इच्छा प्रकट की थी।
तथ्यतः गरिमावान् अस्मिता एवं श्रेष्ठ सम्मान्य अवस्थिति के बावजूद भारत/भारतीयता को जाने-अनजाने हमारे अपनों द्वारा धूसरित किया जा रहा है। अति-अति दुःखद है यह। इस फलक पर संविधान और संविधान-निर्माताओं के प्रति हार्दिक सम्मान व्यक्त करते हुए भी कहना होगा कि हमारे संविधान-निर्माताओं ने जो ‘India that is Bharat’ अंगीकार किया, उसमें प्रकटतया उनकी मानसिकता प्रकट-अप्रकट रूप में मैकाले-प्रणीत शिक्षा-व्यवस्था का फलित दिखती है। संभवतः इसीलिए वे ‘India’ बनाम ‘भारत’ का अन्तर नहीं समझ सके या उन्होंने समझना चाहा नहीं।
यतः आवश्यक है कि भारत को ‘भा + रत’  ही रहने दिया जाए और भारतीय को ‘ भा + रतीय ’। तब और तभी प्रकाश-निरतता, ज्ञाननिरतता, सत्त्व-निरतता, प्रज्ञाशील रागात्मक संचेतना वाली भारतीयता और ऐसे शाश्वत चिन्मय जनसंकुल का राष्ट्र   :  ‘भारत’  वस्तुनिष्ठ अर्थों में मूर्त्तमान हो सकेगा।
समीचीन है यहीं यह कहना  भी कि जब तक हम वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी को भारतीयता से, भा + रत की मौलिक संचेतना से आप्लावित नहीं करते तब तक अभारतीय अराष्ट्रवादी गतिविधियों को या कि 9 फरवरी 2016 को अपघटित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय काण्ड और फरवरी 2017 में अपघटित दिल्ली विश्वविद्यालय काण्ड जैसे दुष्काण्ड या कि भारतमाता की जय का विरोध, वन्देमातरम् - उद्घोष का विरोध जैसे वीभत्स परिदृश्यों को निरोधित नहीं कर सकेंगे।

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